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मुहब्बतें

दिल जल गया है मेरा

खाक उठा कर ले जाइए

किसी वीराने में

उस को बिखेर आइए

मेरा दावा है

उगेंगे वहां पौधे मुहब्बत के

और, लहराएंगे हर मौसम में

फूल वफाओं के.

           – शमा खान

आप का खयाल

आप की बातों में

कुछ न कुछ तो खास है

बड़ी ही मधुर हैं

लगें दिल के बहुत पास हैं

आप की जो आंखें हैं

न जाने क्या बोलती हैं

आप के दिल के भावों के

भेद कई खोलती हैं

आप के होंठ जैसे बातों के

रस भरे पिटारे हों

सुनना चाहूं मैं बातें

सवाल कितने सारे हों

कुछकुछ मीठा सा लगे

आप के सवालों में

जी चाहे चंपा बन गुंथ जाऊं

आप के बालों में

आप के लहराते आंचल में

खुशबुएं हजार हैं

खयालों में लिपटी जैसे

बसंत की बयार है

दिन चला जाता है

पर रात नहीं कटती है

आप की याद मन का

द्वार खटखटाती है

इस कदर रचबस गई हैं

आप यों जीवन में

देखूं जो दर्पण कभी तो

आप नजर आती हैं

झिझकता हूं पर

मेरे दिल में इक खयाल है

गर मैं संग चलूं तो

आप को कोई एतराज है?

      – जयश्री वर्मा

इच्छामृत्यु पर कानून

बीती 18 मई को मुंबई के किंग एडवर्ड मैमोरियल (केईएम) अस्पताल में अरुणा शानबाग की हुई मौत पर उस की पत्रकार मित्र और हमदर्द पिंकी विराणी ने दोटूक कहा था कि अरुणा की मौत तो 27 नवंबर, 1973 को ही हो गई थी जिस रात दुराचार के बाद वह कोमा में चली गई थी. आज तो अरुणा की कानूनी मौत हुई है. 42 साल के असीम दर्द के बाद उसे सुकून की नींद आई है. अरुणा शानबाग इसी अस्पताल में नर्स थी. हादसे के दिन अस्पताल के ही वार्डबौय सोहनलाल ने उस से दुष्कर्म करने की कोशिश की थी. अरुणा को काबू करने के लिए सोहनलाल ने कुत्ता बांधने वाली चेन से उस का गला दबा दिया था. इस से उस के मस्तिष्क में खून की सप्लाई रुक गई और वह कोमा में चली गई थी. 7 साल की सजा काट कर सोहनलाल तो जेल से छूट गया लेकिन अरुणा 42 साल कोमा में रही. उस के परिजनों ने शुरूशुरू में उस में दिलचस्पी ली, फिर धीरेधीरे आनाजाना भी बंद कर दिया. हादसे के पहले अरुणा की सगाई एक डाक्टर संदीप सरदेसाई से तय हो चुकी थी.

संदीप ने 4 साल अरुणा के होश में आने का इंतजार किया, नाउम्मीद हो कर उस ने दूसरी महिला से शादी कर ली और विदेश में बस गया. तब से ले कर मौत के दिन तक केईएम अस्पताल का स्टाफ अरुणा की देखभाल करता रहा. एक तरह से सारे कर्मचारी उसे अस्पताल परिवार का हिस्सा मानते हुए उस की सेवा करते रहे. इसी के फलस्वरूप वह लंबे समय तक जिंदा रही. ये और इस तरह की कई बातें अरुणा की मौत के बाद उजागर हुईं जो वाकई किसी दिलचस्प और रोमांचक उपन्यास की तरह थीं. आम लोगों ने अरुणा से सहानुभूति रखी. वहीं, बुद्धिजीवी वर्ग में एक दफा फिर इच्छामृत्यु पर खासी बहस छिड़ गई कि आखिरकार इच्छामृत्यु को कानूनी दरजा देने में हर्ज क्या है? 2 खेमों में बंटे बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने हर्ज भी गिना दिए कि वे क्याक्या और कैसेकैसे हैं तो सहज लगा कि इच्छामृत्यु के मुद्दे पर किसी कानून की जरूरत ही नहीं है. वजह, यह परिवार और समाज से जुड़ा संवेदनशील मामला है जिस के फायदे कम, नुकसान ज्यादा हैं. और अगर कानून बना तो उस का दुरुपयोग ज्यादा होगा. दुरुपयोग की आशंका जता रहे लोगों के पास दरअसल अनुभव ज्यादा हैं कि भारतवासी कानूनों के बेजा इस्तेमाल करने के कैसे विशेषज्ञ हो गए हैं चाहे वह फिर दहेज का कानून हो, घरेलू हिंसा का हो या फिर हरिजन ऐक्ट. इन का इस्तेमाल न्याय के लिए कम, व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए ज्यादा होता है और इस में स्वाभाविक है कि दूसरे बेकुसूर पक्ष को परेशानी उठानी पड़ती है.

तर्क, कुतर्क और कानून

अरुणा का मामला अपवाद था क्योंकि उस की देखभाल एक नामी अस्पताल के कर्मचारी स्वेच्छा से कर रहे थे. उस के परिवारजनों और मंगेतर को इस आधार पर क्रूर नहीं ठहराया जा सकता कि उन्होंने अरुणा की अनदेखी की थी क्योंकि इस सवाल का जवाब शायद ही ईमानदारी से कोई दे पाए कि आखिर वे और क्या करते. 42 साल का अरसा मामूली नहीं होता, इसलिए बहस का केंद्र अपराध कम, कोमा और इच्छामृत्यु ज्यादा रहा. खुद इस पर बहस करने वाले भ्रम के शिकार और असमंजस में दिखे. पिंकी विराणी पत्रकारिता या लेखन का बहुत बड़ा नाम नहीं है लेकिन वह चर्चा में तब आई थी जब उस ने अरुणा की हालत बयान करते हुए सुप्रीम कोर्ट से उस के लिए इच्छामृत्यु की मांग की थी. हालांकि अदालत ने उसे अस्वीकार कर दिया था. मार्च 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने अरुणा को यूथेनेसिया का इस्तेमाल कर (जहरीला इंजैक्शन दे कर) मौत देने की अपील को खारिज कर दिया था. इस फैसले के अपने अलग माने थे जिस में अदालत ने यह संकेत भी दिया था कि खुद अरुणा ने इच्छामृत्यु नहीं चाही है और पिंकी उस की परिजन नहीं है. इन से भी ज्यादा अहम बात यह कि ऐसा कोई प्रावधान संविधान में है ही नहीं. चूंकि प्रावधान नहीं है, इसलिए 42 साल एक महिला को रोजरोज मरने दिया जाए, यह कौन सी तुक की बात है. यह सवाल अरुणा की मौत के बाद तेजी से उठा और साथ, यह सुझाव ले कर भी आया कि अगर उसे मौत दे दी जाती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता. इच्छामृत्यु यानी यूथेनेसिया की हिमायत करने वालों का यह कहना अपनी जगह ठीक है कि जब कोई मरीज असाध्य रोग या भयंकर पीड़ा से गुजर रहा हो तो उसे जिंदा क्यों रखा जाए. यह तो उस के साथ कू्ररता और ज्यादती है. उदाहरण स्विट्जरलैंड, बेल्जियम और नीदरलैंड जैसे देशों के दिए गए जहां यूथेनेसिया की इजाजत है.

जो लोग असहमति जताते नजर आए, उन का यह कहना भी अपनी जगह ठीक था कि अगर भारत में यूथेनेसिया का कानून बना तो उस का दुरुपयोग ज्यादा होगा. इच्छामृत्यु चाहने वालों के उदाहरण कम नहीं है. पटना के तारकेश्वर सिन्हा ने 2005 में राज्यपाल से गुहार लगाई थी कि 5 साल से बेहोश पड़ी उस की पत्नी कंचन देवी को दयामृत्यु दी जाए. 2001 में वी के पिल्लई नाम के रोगी की याचिका हाईकोर्ट ने यह कहते खारिज कर दी थी कि देश में ऐसा कोई कानून नहीं है. वी के पिल्लई भी असाध्य रोग से पीडि़त था. इसी तरह 2005 में ओडिशा के काजीपुरा निवासी मोहम्मद यूनुस अंसारी ने राष्ट्रपति से अपील की थी कि उस के 4 बच्चे असाध्य रोग से पीडि़त हैं. उस के पास उन के इलाज के लिए पैसा नहीं है. लिहाजा, उन्हें दयामृत्यु की इजाजत दी जाए. यह अपील भी नामंजूर कर दी गई थी. साफ है कि इस तरह मरनेमारने के हक पर अदालतें और सरकारें खुद गफलत में हैं कि क्या किया जाना ठीक होगा.

सरकार की न के माने

उदाहरणों और बहस से परे नरेंद्र मोदी सरकार का नजरिया एकदम साफ है कि यह एक तरह की खुदकुशी है जिस की इजाजत देश में नहीं दी जा सकती. सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नोटिस का जवाब देते सरकार ने अपने दृढ़ इरादे और सहमति जुलाई 2014 में ही दिखा दिए थे कि किसी भी तरह की इच्छामृत्यु को कानूनी मान्यता नहीं दी जा  सकती क्योंकि यह आत्महत्या का ही एक रूप है जो देश में अपराध है. अगर इसे मान्यता दी गई तो इस का दुरुपयोग हो सकता है. यह आशंका निर्मूल नहीं है. लोकतंत्र की एक खूबी यह होती है कि इस में अधिकांश नेता जमीनी होते हैं, हवा में पैदा नहीं होते. इसलिए वे बेहतर तरीके से समाज को जानते हैं. अगर इस कानून को मान्यता दी गई या किसी भी रूप में बनाया गया तो होगा यह कि लोग जमीनजायदाद हड़पने के लिए इस के बेजा इस्तेमाल ज्यादा करेंगे. सिजोफ्रेनिया, डिमैंशिया और अल्जाइमर्स जैसी बीमारियों में मरीज के परिजन इच्छामृत्यु मांगने लगेंगे. उन की मंशा कष्ट से मुक्ति बिलकुल नहीं, बल्कि जमीनजायदाद हड़पना और जिम्मेदारियों से भागना व इलाज के पैसे बचाना होगी. इस के अलावा रोगी के परिजन हत्या के आरोप से बच जाएंगे. आएदिन अखबारों में छपती इस तरह की खबरें लोगों को हिला देती हैं कि संपत्ति के लिए वृद्ध मातापिता की हत्या संतान ने की या भतीजे ने चाचा, ताऊ को कुल्हाड़ी से काटा. अगर कानून लागू हुआ तो आफत यह आ जाएगी कि लोग इच्छामृत्यु के कानून को ढाल बना कर अपराध करने लगेंगे. हैरानी नहीं होनी चाहिए, अगर वे ऐसे उपाय ढूंढ़ कर उन पर अमल करने लगें जिन से असाध्य बीमारियां बूढ़ों को दी जा सकें. नाम न छापने की शर्त पर भोपाल के एक नामी डाक्टर ने दिलचस्प पर चिंतनीय बात यह बताई कि ऐसा अभिजात्य वर्ग में भी इफरात से होता है कि असाध्य बीमारियों से ग्रस्त बुजुर्गों को उन के परिजन दवा नहीं देते ताकि वे जल्द मर जाएं, जबकि दवा और इलाज हर किसी का हक है. दवा इसलिए नहीं देते या अंतराल से देते हैं कि बीमारी बढ़ती जाए और संपत्ति स्वामी जल्द मर जाए जिस से वे जमीनजायदाद अपने नाम करवा सकें.

गांवदेहातों में जायदाद हड़पने के लिए संपत्ति स्वामी को पागल करार देने, उसे धतूरा जैसी घातक वनस्पतियां देना आम है तो सभ्य शहरी समाज नशीली दवाओं और नींद की गोलियों के ओवरडोज से इस कृत्य को अंजाम देता है. अगर ऐसा 10-20 फीसदी मामलों में होता है तो कानून के वजूद में आ जाने के बाद 10-20 फीसदी मामलों में ऐसा नहीं होगा, इसलिए वाकई इस कानून की जरूरत नहीं. यह बेहद क्रूर बात है. हालत तो यह है कि बगैर किसी कानून के ही पैसिव यूथेनेसिया का चलन मौजूद है. ऐसे में अगर कानून बन गया तो तसवीर क्या होगी, सहज अंदाजा लगाया जा सकता है. एक मिसाल आस्ट्रेलिया की भी बतौर सबक ली जा सकती है. वह दुनिया का पहला देश है जिस ने इच्छामृत्यु को साल 1996 में संवैधानिक दरजा दिया था. बहुत ज्यादा नहीं, एक साल में ही इच्छामृत्यु चाहने वालों का सैलाब सा आ गया और कानून के दुरुपयोग के मामले थोक में सामने आए. झक मार कर वहां की सरकार को मार्च 1997 में यह कानून वापस लेना पड़ा था. भारतीय समाज बहुत ज्यादा क्रूर नहीं हुआ है लेकिन धीरेधीरे संवेदनहीन हो रहा है. परिवारों की बनावट बदल रही है और संस्कार जैसी बातें व उपदेश बासी हो चले हैं. ऐसे में इच्छामृत्यु कानून यहां बड़ा घातक साबित होगा, इसलिए सरकार के फैसले से इत्तफाक रखा जा सकता है. लेकिन बात जहां तक अरुणा जैसी (मरीजों) की है तो इस पर जरूर बहस की गुंजाइशें हैं. जिन का कोई नहीं और जिन के बारे में डाक्टरों या कोई मैडिकल बोर्ड भी दावे से नहीं कह सकता कि वे कब तक जिंदा रहेंगे, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह कहना प्रासंगिक है कि विशेष परिस्थितियों में मौत दी जा सकती है. वैसे भी, ऐसे मामले बड़े पैमाने पर सामने नहीं आते, इसलिए कानूनी यथास्थिति बनी रहे, हर्ज की बात नहीं.

पाठकों की समस्याएं

मैं 26 वर्षीया युवती हूं. मातापिता का बचपन में ही देहांत हो गया था, तब से मैं अपनी मौसी व मौसा के साथ रहती हूं. मेरी मौसी एक प्राइवेट संस्थान में नौकरी करती हैं और मौसा घर पर  रहते हैं. मेरी समस्या यह है कि मौसी जैसे ही सुबह नौकरी पर चली जाती हैं, मौसा मेरे साथ जोरजबरदस्ती करते हैं और शारीरिक संबंध बनाने के लिए मजबूर करते हैं. शुरूशुरू में मैं ने उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की पर वे अपनी बात पर अड़े रहे. वे मुझे धमकाते हैं कि अगर मैं ने उन की बात नहीं मानी तो वे किसी न किसी बहाने मुझे घर से निकाल देंगे और मुझे बदनाम कर देंगे. मौसी को इस बारे में कुछ भी पता नहीं है. मैं उन की इस जबरदस्ती से तंग आ चुकी हूं. जब भी मेरी शादी के लिए कोई रिश्ता आता है तो वे उस लड़के में कोई न कोई कमी निकाल कर शादी के लिए टाल देते हैं. मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा, मैं क्या करूं, कहां जाऊं? कोई आसरा नहीं है. क्या इस बारे में मुझे अपनी मौसी से बात करनी चाहिए? कहीं वे मुझ पर अविश्वास तो नहीं करेंगी? मैं डरती हूं कि मेरे मौसा के बारे में सचाई बताने से कहीं मौसी की जिंदगी बरबाद न हो जाए. मैं उन से कैसे पीछा छुड़ाऊं. मैं उन से नफरत करती हूं, फिर भी मजबूरीवश मुझे यहां रहना पड़ रहा है. मैं बहुत परेशान हूं. मेरी समस्या का समाधान करें.

युवतियों, महिलाओं के साथ शारीरिक शोषण की अधिकांश घटनाएं, उन के अपने घरों में, उन के अपने नजदीकी रिश्तेदारों द्वारा घटित होती हैं और डर व मजबूरीवश अधिकांश मासूम लड़कियां सबकुछ चुपचाप सहती रहती हैं. आप के साथ ऐसा ही हो रहा है. हमारी सलाह है कि आप बिना डरे इस शोषण के बारे में अपनी मौसी से बात करें और यदि आप को झिझक हो रही है तो घर के किसी विश्वस्त सदस्य को इस बारे में बताएं और उन्हें मौसी से इस बारे में बात करने को कहें. आप डर रही हैं, इसलिए आप के मौसा फायदा उठा रहे हैं. आप को अपने खिलाफ हो रहे इस अपराध के खिलाफ आवाज उठानी होगी और डट कर इस का मुकाबला करना होगा. आप की मौसी को अपने पति की इस गंदी हरकत का अवश्य पता चलना चाहिए. मौसी व मौसा के रिश्ते को बचाने के लिए आप अपनी जिंदगी दांव पर हरगिज न लगाएं. आप 26 वर्ष की हैं, अगर पढ़ीलिखी हैं, अपने पैरों पर खड़ी हैं तो यहां से चली जाएं लेकिन अपने मौसा की सचाई सब को बता कर जाएं, ताकि समाज के सामने उन का घिनौना चेहरा उजागर हो सके और उन्हें उन के दुष्कर्म की सजा मिले.

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मैं 28 वर्षीया अविवाहित युवती हूं. 3 वर्षों से एक लड़के से प्यार करती थी. लेकिन 1 साल पहले उस लड़के की कहीं और शादी हो गई. वह लड़का कहता है कि उस ने मजबूरीवश शादी की थी और वह आज भी मुझ से प्यार करता है और शादी करना चाहता है. मैं बहुत कन्फ्यूज्ड हूं कि मैं क्या करूं. कृपया मेरी मदद कीजिए.

प्यार और शादी कोई गुड्डेगुडि़यों का खेल नहीं है. आप की बातों से लगता है कि आप ने इसे गुड्डेगुडि़यों का खेल ही समझ रखा है कि जब चाहे किसी से प्यार कर लिया, फिर किसी और से शादी कर ली, फिर पहले वाले से प्यार हो गया. में रिश्ते सोचसमझ कर बनाए व निभाए जाते हैं. आप के लिए यही सलाह है कि आप उस लड़के को भूल जाइए और उस से कहिए कि भले ही उस ने शादी मजबूरीवश की है लेकिन अब उस लड़की की जिंदगी बरबाद न करे. अब उसी के साथ निभाए. उसी से प्यार करे. आप उस लड़के की तरफ से ध्यान हटा कर अपनी नई भावी जिंदगी के बारे में सोचिए. जिंदगी दो नावों पर सवार हो कर नहीं जी जा सकती. अपने जीवन का एक लक्ष्य बनाइए और अपना ध्यान इधरउधर मत भटकाइए. आप के भटकाव से उस लड़की की जिंदगी तो बरबाद होगी ही, आप भी कहीं की न रहेंगी.

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मैं एक विवाहित महिला हूं. उम्र 47 वर्ष है. मेरी समस्या यह है कि मेरे पति ने अब तक मुझ से कभी प्यार से बात नहीं की. जराजरा सी बात पर गुस्सा हो जाते हैं. सहवास में भी मेरी इच्छा या अनिच्छा उन के लिए कोई माने नहीं रखती. मुझे बेमन से उन का साथ देना पड़ता है. हाल ही में एक लड़का मेरी जिंदगी में आया है. वह उम्र में मुझ से काफी छोटा है. वह मुझे अच्छा लगता है लेकिन वह मुझे पसंद करता है या नहीं, यह मैं नहीं जानती पर मुझे उस में कुछ आकर्षण दिखाई देता है और मेरा मन उस के साथ शारीरिक संबंध बनाने को करता है पर डर के मारे मैं अभी तक हिम्मत नहीं कर पाई हूं. मैं क्या करूं? बहुत असमंजस की स्थिति में हूं. एक तरफ पति का बेरुखापन है तो दूसरी तरफ उस नवयुवक की तरफ आकर्षण. समझ नहीं आता क्या करूं. अपने मन को किस तरह समझाऊं.

आप ने इतने वर्षों तक पति का साथ निभाया है लेकिन आज आप को उन में कमियां दिखाई दे रही हैं. उम्र के इस पड़ाव पर अपने से कम उम्र के युवक के प्रति आप का आकर्षण आप को शोभा नहीं देता. आप ने यह नहीं बताया कि आप के बच्चे हैं या नहीं और अगर हैं तो कितने बड़े हैं. आप अपने बच्चों के भविष्य के बारे में सोचिए. उन में अपना मन लगाइए. और आप ने अब तक अगर उस लड़के से शारीरिक संबंध बनाने की हिम्मत नहीं की है तो आगे भी न करें. यह आप की और उस लड़के दोनों की जिंदगी में तूफान ले आएगा. वह लड़का अभी मैच्योर नहीं है, उसे सहीगलत की समझ नहीं है लेकिन आप समझदारी से काम लीजिए और अपने पति से जो शिकायत है उसे सुलझाने की कोशिश कीजिए.

सचेत रहें एटीएम धारक

जबलपुर निवासी राकेश मुदलियार के मोबाइल पर कौल आई. कौल करने वाले ने खुद को बैंक का शाखा प्रबंधक बताते हुए उन से कहा, ‘‘आप का एटीएम कार्ड बहुत पुराना हो गया है और जांच के लिए आप का कार्ड बंद करना पडे़गा.’’ उस के बाद उस ने एटीएम नंबर मांगा. फिर एक नंबर दिया और कहा कि इस नंबर में अपना एटीएम पिन जोड़ दें तो उन्हें नया एटीएम पिन दे देंगे. जैसा उस तथाकथित बैंक अधिकारी ने कहा, राकेश ने वैसा ही किया. फिर क्या था उन के बैंक खाते से 78,400 रुपए निकाल लिए गए 

इस घटना के 4 दिन बाद ही संजय के मोबाइल पर फोन आया. फोन करने वाले ने कहा, ‘‘मैं बैंक के मुंबई औफिस से जनरल मैनेजर बोल रहा हूं. तुम्हारा एटीएम 1 घंटे बाद बंद हो जाएगा. अगर एटीएम चालू रखना है तो एटीएम कार्ड के ऊपर लिखा नंबर बता दो.’’ उस की बातों में आ कर संजय ने नंबर बता दिया. उस ने पासवर्ड पूछा तो 4 नंबर का पासवर्ड भी बता दिया. फिर क्या था उस व्यक्ति ने 27 हजार रुपए की खरीदारी कर ली. पुलिस ने मोबाइल धारक के विरुद्ध भादंवि की धारा-420 एवं 66 आईटी ऐक्ट का अपराध पंजीबद्ध कर दिया. इस तरह की ठगी एटीएम धारकों के साथ की जा रही है. एटीएम धारकों के साथ ठगी करने वाले गिरोह कुछ दिन शांत रहने के बाद फिर से सक्रिय हो जाते हैं. गिरोह के सदस्य अपनेआप को बैंक का अधिकारी बता कर लोगों को ठग रहे हैं.

ऐसे भी ठगे जा रहे हैं

एटीएम धारक एटीएम मशीन के पास भी ठगी का शिकार हो रहे हैं. एटीएम मशीन से पैसे निकालते समय यदि राशि नहीं निकल रही है, तो वहीं खड़ा व्यक्ति आप की मदद करने को आ जाएगा और आप से एटीएम कार्ड ले कर उसे देखेगा, एटीएम मशीन में डालेगा, फिर निकालेगा. इसी दौरान वह हाथ की सफाई दिखाते हुए आप को दूसरा एटीएम कार्ड थमा देगा और आप से एटीएम मशीन में डालने को कहेगा और पिन नंबर भी डालने को कहेगा, जिसे वह याद कर लेगा. जब पैसे नहीं निकले तो एटीएम मशीन खराब होने की बात कहेगा. यह सुन कर आप घर चले जाएंगे. फिर वह व्यक्ति आप के एटीएम कार्ड से पैसे निकाल लेता है. यही नहीं, जहां हम एटीएम कार्ड डालते हैं वहां पर कार्ड को रीड करने वाली मशीन लगा दी जाती है और जहां पिन नंबर डालते हैं, ठीक उस के ऊपर एक कैमरा लगा देते हैं, जो पिन नंबर को रीड कर लेता है और वह पिन नंबर पैनड्राइव में सेव हो जाता है. इस तरह की ठगी का कोई ठोस समाधान नहीं निकला तो एटीएम धारक अपना एटीएम कार्ड बंद करवा कर सीधे बैंक से ही ट्रांजैक्शन करने लगेंगे और तब बैंक वालों का काम फिर से बढ़ जाएगा.

हालांकि सभी बैंकों में स्पष्ट लिखा हुआ होता है कि बैंक शाखा के अधिकारी या कर्मचारी एटीएम के पिन से संबंधित जानकारी कभी अपने ग्राहकों से नहीं पूछते. यदि कोई व्यक्ति अपनेआप को बैंक अधिकारी बता कर आप से एटीएम कार्ड की तथा कुछ व्यक्तिगत जानकारी जैसे एटीएम कार्ड नंबर, वैधता दिनांक, आप का नाम, पता, बैंक का खाता नंबर, जन्मतिथि और अंत में धीरे से एटीएम पिन नंबर भी मांगता है तो सचेत हो जाएं. यह इतना सुनियोजित ढंग से होता है कि व्यक्ति उक्त सारी जानकारी बिना सोचेसमझे दे डालता है. कुछ ही घंटों के बाद उसे पता चलता है कि उस के खाते से किसी ने महंगा सामान खरीद लिया है या उस के खाते से हजारों का कैश निकल चुका है.

क्या है साइबर क्राइम?

किसी भी व्यक्ति की आइडैंटिटी या पहचान चोरी कर के उस के व्यक्तिगत बैंक खाते तथा सोशल अकाउंट की जानकारी हासिल कर उन का दुरुपयोग करना साइबर क्राइम श्रेणी में आता है. अकेले अमेरिका में इंटरनैट का उपयोग करने वाले 64 प्रतिशत लोग इस के शिकार हो चुके हैं. वहां हर 10 में से एक उपभोक्ता आइडैंटिटी थैफ्ट के जाल में फंस जाता है. यदि आप की भी पहचान चोरी हुई है तो उस का पुख्ता प्रमाण अपने पास रखें, जैसे किसी ने आप की फर्जी आईडी बना कर किसी सोशल साइट पर आपत्तिजनक तसवीरें, कमैंट्स या अन्य चीजें पोस्ट की हैं, आप उस का पिं्रट निकाल कर रख लें और शीघ्र ही साइबर क्राइम ब्रांच में इस की शिकायत करें. तकनीक के फायदे हैं तो उस के नुकसान भी हैं. लोग इस का गलत उपयोग भी कर रहे हैं. ऐसा कोई भी इलैक्ट्रौनिक यंत्र, जो किसी सूचना को अपने में समेटता है और फिर उस सूचना का उपयोग अवैधानिक तरीके से किया जाता है, तो यह साइबर क्राइम पर नियंत्रण के लिए बनाए गए आईटी ऐक्ट के दायरे में आता है.

बड़ी विडंबना यह है कि साइबर क्राइम ब्रांच मात्र बड़ेबड़े शहरों में ही है. यदि अपराधी पकड़ा जाता है तो न्यायालय में प्रकरण दायर करने के लिए व्यक्ति को उसी शहर में जाना पड़ता है, जहां पर साइबर क्राइम की ब्रांच होती है. ऐसे में गांव के लोग न्याय से वंचित हो रहे हैं. उपरोक्त साइबर क्राइम यूनिट के अलावा महाराष्ट्र के थाणे व पुणे, गुजरात के गांधीनगर, झारखंड के रांची, हरियाणा के गुड़गांव, जम्मूकश्मीर के जम्मू, केरल के तिरुअनंतपुरम, बिहार के पटना, पंजाब के पटियाला, पश्चिम बंगाल के कोलकाता, उत्तर प्रदेश के लखनऊ व आगरा, उत्तराखंड के देहरादून आदि के पुलिस कार्यालय में साइबर क्राइम यूनिट उपलब्ध हैं.

दिन दहाड़े

हमारा संयुक्त परिवार है, घर काफी बड़ा है. डेढ़ साल से कोई मेड भी नहीं थी. ऐसे में ससुरजी ने एक लड़की को काम पर रखा. लड़की चुप रहती पर काम तेजी से व साफसफाई से करती थी. वह सुबह 10 बजे आती और शाम 6 बजे जाती. उसे काम पर आए 3 दिन ही हुए थे. एक दिन मैं ने उसे शाम को 5 बजे छोटी देवरानी के रूम से आते देखा. मैं ने पूछा, ऊपर क्यों गई थी तो कहने लगी वाशरूम गई थी. मैं ने कहा, हमारे यहां सर्वेंट वाशरूम अलग बना हुआ है. ऊपर मत जाया करो. 10 मिनट बाद ही वह घर चली गई. मुझे शक हुआ. मैं ने चैक किया. उस ने मेरी ही अलमारी से नकदी व कुछ जेवर चुरा लिए थे. वह मेरी अलमारी पर नजर रखे थी. लेकिन परिवार के साथ सहयोग व पुलिस प्रशासन की तत्परता से 4 घंटे के भीतर ही वह पकड़ी गई. मुझे मेरा सामान मिल गया.

सोनाली जैन, राजनांदगांव (छ.ग.)

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मेरी पड़ोसिन के यहां एक महिला आई. उस ने खुद को शहर की नामी दुकान का कर्मचारी होना बताया. पड़ोसिन को दुकान की एक स्कीम बताई और उसे 2 नारियल (जो मिट्टी के बने हुए थे) दिए. उस ने कहा कि नारियल को फोड़ने पर एक में से दुकान से कोई भी इलैक्ट्रौनिक सामान खरीदने पर 3 हजार से 5 हजार रुपए तक का डिस्काउंट कूपन व दूसरे नारियल में से एक निश्चित उपहार की पर्ची निकलेगी. पड़ोसिन उस महिला की बातों में आ गई. उस ने महिला से 500 रुपए में मिट्टी के 2 नारियल खरीद लिए. एक नारियल को फोड़ने पर दुकान का 5 हजार रुपए का डिस्काउंट कूपन निकला. दूसरे नारियल में से चम्मच सैट की पर्ची निकली. वह महिला, पड़ोसिन को चम्मच सैट, जिस की कीमत 100 रुपए होगी, और दुकान के नाम का डिस्काउंट कूपन दे कर चलती बनी. दूसरे दिन पड़ोसिन डिस्काउंट कूपन ले कर दुकान पहुंची. दुकानदार ने ऐसी किसी भी स्कीम देने से इनकार कर दिया. उस ने कहा कि वह महिला हमारी दुकान की कर्मचारी नहीं है, साथ ही यह कूपन भी फर्जी है. 

भावना भट्ट, भोपाल (म.प्र.)

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हमारे पड़ोस में एक लड़का है. उस की उम्र लगभग 22 वर्ष है. स्वभाव से बड़ा मिलनसार व हंसमुख है. एक दिन वह सड़क के किनारे पैदल चलता हुआ बाजार से घर वापस आ रहा था. उस ने अपना मोबाइल फोन कान से लगा रखा था. अचानक तेज रफ्तार मोटरसाइकिल सवार 2 लोग पीछे से आए और मोबाइल फोन झपट कर फुर्र हो गए. वह लड़का ताकता व चिल्लाता रह गया, कोई कुछ न कर सका.

बृजलाल उमरार, जालौन (उ.प्र.)

मोबाइल फोनसेवा प्रदाता कंपनी का जलवा

हमारी आर्थिक तरक्की और गरीबों की संख्या घटने की रफ्तार भले ही धीमी हो, लेकिन देश का मोबाइल फोनसेवा का बाजार तेजी से तरक्की कर रहा है. आंकड़ों के अनुसार, देश में मोबाइल कनैक्शन आधी से अधिक आबादी के पास है. भारत की मोबाइल कंपनियां भी अच्छा कारोबार कर रही हैं. सरकारी क्षेत्र की सेवा प्रदाता कंपनियां बीएसएनएल और एमटीएनएल ईमानदारी से तो काम करती हैं लेकिन सेवा प्रदाता के रूप में उन की साख अच्छी नहीं है. अच्छी सेवा नहीं होने के कारण लोग इन कंपनियों की सेवा लेने से कतराते हैं. निजी क्षेत्र की कंपनियां भारती एअरटेल की देश में भी अच्छी स्थिति है. उपभोक्ता अच्छी सेवा प्रदाता कंपनी को प्राथमिकता देते हैं. देश में एअरटेल की स्थिति जो भी हो, लेकिन विदेशों में उस का डंका बज रहा है. वर्ल्ड सैल्युलर इनफौरमेशन सर्विस के हाल में जारी डाटा के अनुसार, सुनील भारती मित्तल की कंपनी भारती एअरटेल दुनिया की तीसरी सब से बड़ी मोबाइल सेवा प्रदाता कंपनी है. कंपनी के पास 30.30 करोड़ ग्राहक हैं. उस से पहले चाइना मोबाइल और वोडाफोन हैं जिन की ग्राहक संख्या क्रमश: 62.62 करोड़ तथा 40.30 करोड़ हैं. चीन की यूनीकौम तथा अमेरिका की मोविल उस की तुलना में पीछे हैं. दक्षिण एशिया तथा अफ्रीका महाद्वीप के 20 देशों में एअरटेल यूनिकौम तथा मोविल से आगे है. एअरटेल का यह जलवा भारतीय मोबाइल फोनसेवा प्रदाता कंपनियों के लिए प्रेरणा का स्रोत होना चाहिए और उन्हें पहले, देश में अपनी सेवाएं बेहतर बनाने के लिए काम करना चाहिए. मुश्किल यह है कि सभी भारतीय मोबाइल कंपनियां ग्राहकों के हितों के बजाय अपनी कमाई को महत्त्व दे रही हैं.

इलाज के लिए निजी अस्पताल लोगों की पसंद

सरकार हर साल स्वास्थ्य बजट बढ़ाती है और लोग स्वस्थ रहें, इस के लिए नीतियां बना कर आमजन को अच्छी स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने का दावा करती है. महानगरों से ले कर गांवों तक अस्पताल खोल कर लोगों को स्वास्थ्य सेवा तत्परता से देने का प्रचार किया जा रहा है जबकि हकीकत में ये सब नाममात्र की घोषणाएं हैं. गांव को तो छोड़ो, कसबों तक में सरकारी अस्पतालों में चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. वहां सिरदर्द, बुखार और सामान्य मरहमपट्टी के अतिरिक्त कोई व्यवस्था नहीं है. स्वास्थ्य सेवाओं के प्रति सरकार की इसी उदासीनता के चलते लोग निजी अस्पतालों में इलाज कराने को मजबूर हो रहे हैं. ‘मरता क्या न करता’ वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए गरीब भी निजी अस्पतालों में लुटने को बाध्य हैं. सरकारी अस्पतालों में जहां सुविधा है वहां शल्य चिकित्सा के लिए मरीजों की लंबी कतारें हैं और 8-10 माह बाद लोगों का नंबर आ रहा है. उस के ठीक विपरीत, निजी अस्पताल में एक सप्ताह में ही सर्जरी हो जाती है. लोग मजबूरन निजी अस्पतालों की तरफ भाग रहे हैं, इस से देश में गरीबी का आंकड़ा बढ़ रहा है. गरीब अपने मरीजों का इलाज सरकारी अस्पतालों की तुलना में 5 से 6 गुणा अधिक कीमत पर निजी अस्पताल में करा रहे हैं.

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के 2014 के सर्वेक्षण के अनुसार, देश में 70 प्रतिशत लोग निजी अस्पतालों में इलाज करा रहे हैं. एनएसएसओ ने 3.3 लाख लोगों पर कराए सर्वेक्षण के आधार पर कहा है कि शहरी क्षेत्रों में 79 प्रतिशत और ग्रामीण क्षेत्रों में 72 प्रतिशत लोग इलाज के लिए निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं. लोगों के इस रुख को देखते हुए पिछले 10 साल में निजी अस्पतालों, चैरिटेबल संस्थाओं और क्लीनिकों की संख्या में 4 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. सर्वेक्षण में यह भी कहा गया है कि निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च बहुत अधिक है. पिछले वर्ष सरकारी अस्पतालों में इलाज पर औसत खर्च 6,120 रुपए और निजी अस्पतालों में 25,850 रुपए दर्शाया गया है. एक दशक पहले यह अंतर लगभग दोगुना था. इसी तरह से कैंसर जैसी घातक बीमारी पर सरकारी अस्पतालों में औसत खर्च 24,526 रुपए और निजी अस्पतालों में78 हजार रुपए से अधिक बताया गया है. चर्म रोग जैसी बीमारियों में तो निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च 10 गुना से अधिक है.

सैट टौप बौक्स पर ‘मेक इन इंडिया’ का जादू

देश का हर घर केबल औपरेटरों की मनमानी से लंबे समय तक पीडि़त रहा है. उस सेवा के खट्टे अनुभव हर व्यक्ति की यादों का अटूट हिस्सा हैं. कई जगह आज भी लोग इस के संचालकों के दुर्व्यवहार से पीडि़त हैं. जिन नगरों में सरकार ने सख्ती दिखाते हुए सैट टौप बौक्स सेवा शुरू की है वहां भी केबल औपरेटरों की मनमानी थमी नहीं है.राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में ही कई औपरेटर हैं जो निर्धारित फौर्म में भरी गई सूचना के अनुसार उपभोक्ता को सेवा नहीं दे रहे हैं. हर माह केबल सेवा के बदले दिए जाने वाले भुगतान के लिए रसीद देने का तो सवाल ही नहीं उठता. औपरेटरों ने कार्ड बना रखे हैं और उसी पर सेवा के बदले लिए जाने वाले भुगतान की राशि दर्ज होती है. यह मनोरंजन कर चोरी का उन के लिए सुविधाजनक उपाय है. इन औपरेटरों की मनमानी से परेशान उपभोक्ता डीटीएच सेवा की तरफ भाग रहे हैं लेकिन वहां भी परेशानी है. सैट टौप बौक्स का बाजार फैल रहा है, इस से इनकार नहीं किया जा सकता. सरकार की इसे हर शहर में लागू करने की योजना है. सरकार सख्ती करे तो इस में पारदर्शिता को बरकरार रखा जा सकता है मगर चप्पेचप्पे पर बैठे घपलेबाज पारदर्शिता से डरते हैं और वे ऐसे सभी प्रयासों को व्यर्थ करने की कोशिश में लगे रहते हैं.

बहरहाल, सैट टौप बौक्स बनाने की कंपनियों में होड़ लग गई है. ये सारी कंपनियां‘मेक इन इंडिया’ नारे के तहत अपना कारोबार बढ़ाना चाहती हैं. भारतीय इलैक्ट्रौनिक्स बाजार को अपनी कुल मांग के लिए 65 फीसदी तक आयात पर निर्भर रहना पड़ता है. हाल में दुपहिया वाहन बनाने वाली मशहूर कंपनी हीरो इंडिया ने सैट टौप बौक्स निर्माण की घोषणा की है और कंपनी की योजना इस कारोबार में अगले कुछ साल में 500 करेड़ रुपए खर्च करने की है.

ट्यूशन : एक जबरन जरूरत

5 वर्षीय अभिषेक एक पब्लिक स्कूल में पहली कक्षा का छात्र है. 2 बजे स्कूल से आने के बाद 4 बजे तक वह खानापीना और आराम करता है. 4 बजते ही अपना स्कूल बैग उठा कर एक और स्कूल यानी ट्यूशन जाने के लिए तैयार हो जाता है. यह दिनचर्या सिर्फ अभिषेक की ही नहीं, बल्कि स्कूल जाने वाले हर आयु व कक्षा के छात्रों की है. जीवनशैली में बदलाव, अभिभावकों की बढ़ती अपेक्षाएं, उच्च कैरियर की आकांक्षा, अभिभावकों के पास समयाभाव ने ट्यूशन को बच्चों की दिनचर्या का एक आवश्यक अंग बना दिया है. लेकिन क्या सिर्फ उपरोक्त कारण ही ट्यूशन को एक जरूरी जरूरत बनाते हैं? ट्यूशन क्यों एक जरूरी जरूरत बन गई है? क्यों ट्यूशन के बिना हर अभिभावक व विद्यार्थी स्वयं को बेसहारा महसूस करता है? पल्लवी गुप्ता, जिन की बेटी राधिका दूसरी कक्षा में पढ़ती है, कहती हैं, ‘‘आज हर जगह इतना कंपीटिशन हो गया है कि बिना प्रोफैशनल सहयोग के बच्चों को आगे रखना बहुत ही मुश्किल हो गया है. परीक्षाएं, पाठ्यक्रम सभीकुछ इतना तनावपूर्ण है कि हर कदम पर एक मददगार की जरूरत पड़ती है. ऐसे में आज की पीढ़ी व अभिभावक दोनों ही एक ऐसा समस्यासाधक चाहते हैं जो उन्हें हर कदम पर हर समय पढ़ाई व कैरियर के क्षेत्र में मदद कर सके फिर चाहे वह रोजमर्रा का होमवर्क हो, स्कूली परीक्षाएं हों या नौकरी के लिए प्रतियोगी परीक्षाएं. स्कूल द्वारा दिए गए होमवर्क, जो नएनए विषयों से भरे होते हैं, आम आदमी की समझ से बाहर होते हैं.’’

ट्यूटर ट्रबलशूटर

पहले जितनी अंगरेजी की जानकारी छठीसातवीं कक्षा के छात्र को होती थी आज उस से अधिक, अच्छी अंगरेजी एक नर्सरी का छात्र जानता है. अच्छे पब्लिक स्कूलों के छात्र ऐसी फर्राटेदार अंगरेजी बोलते हैं कि बड़ों में भी हीनभावना आ जाती है. ऐसे में बच्चों को समय के साथ हर जरूरी जानकारी देने, कक्षा में आगे रहने के लिए ट्यूशन एक मूलमंत्र बन गया है. ट्यूटर न केवल छात्रों को परीक्षाओं के लिए तैयार कराते हैं बल्कि रोज के कठिन होमवर्क से भी निजात दिलाते हैं. इन ट्यूटर की एक निश्चित कार्यशैली होती है जिस में निश्चित समय के अंदर कोर्स पूरा कराना, साप्ताहिक टैस्ट ले कर अच्छे अंक दिलाना उन का मुख्य ध्येय होता है. रश्मि जौहरी, जो स्वयं एक पत्रकार हैं, मानती हैं कि अपने बच्चों को एक जगह 1 घंटे के लिए बैठा कर पढ़ाना अपनेआप में एक समस्या है, ऊपर से कठिन पाठ्यक्रम की अधूरी जानकारी बच्चों के सामने अभिभावकों को अनपढ़ व अज्ञानी सिद्ध कर देती है. ट्यूशन भेजने से बच्चा गृहकार्य, अपनी परीक्षाओं के बारे में गंभीर रहता है और ध्यान से मन लगा कर बढ़ता है. रश्मि जब अपनी तीसरी कक्षा की बेटी को पढ़ाने बैठती थीं तो थोड़ी ही देर में परेशान हो कर झुंझला जाती थीं. ऐसे में केवल समय बरबाद होता था, कुछ परिणाम हाथ नहीं आता था. इसलिए थक कर उन्होंने अपनी बेटी को ट्यूशन पर भेजना शुरू कर दिया है.

7वीं कक्षा के छात्र मेहुल के अनुसार, ‘‘ट्यूशन जाने से पहले मुझे साइंस विषय बहुत मुश्किल लगता था, कुछ समझ में नहीं आता था. लेकिन ट्यूशन में जिस तरह से साइंस को समझाया गया, अब वह विषय मेरा फेवरेट बन गया है. स्कूल टीचर का पढ़ाया थोड़ी देर समझने के लिए तो ठीक है लेकिन किसी भी विषय को हमेशा के लिए समझने के वास्ते ट्यूशन ही सही रहता है क्योंकि वहां हर विषय को अकेले में आसान तरीके से समझाया जाता है.’’ आज की ट्यूशन व्यवस्था परिणाम आधारित हो गई है. इस का निश्चित उद्देश्य एक निश्चित समय के अंदर कोर्स पूरा करना होता है. ट्यूटर का ध्येय होता है कि हर छात्र हर विषय में अधिकतम अंक प्राप्त करे, इस के लिए वे कोर्स को विभिन्न तरीकों द्वारा सरल व रुचिकर बनाते हैं. वे अभिभावकों के प्रति उत्तरदायी होते हैं. ट्यूटर की नीति व योग्यता छात्रों को प्रोत्साहित करने के साथसाथ उन में विषय के प्रति रुचि भी पैदा करती है. यही कारण है कि आज बोर्ड के परीक्षा परिणाम में छात्रों के शतप्रतिशत अंक आते हैं जबकि कुछ वर्षों पूर्व तक अगर 60 या 70 प्रतिशत अंक आते थे तो बहुत समझा जाता था. यह ट्यूशन की मदद का ही परिणाम है.

ट्यूशन का अर्थ बेफिक्री नहीं

अंजू साहनी, जिन का बेटा अतिशय प्रारंभ से ही ट्यूशन जाता है, कहती हैं, ‘‘ट्यूशन भेज देना ही काफी नहीं. ट्यूशन भेज देने भर से अभिभावकों की जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती. ट्यूशन में क्या पढ़ाया जा रहा है, घर में पढ़ने व याद करने को क्या दिया जा रहा है, ट्यूशन भेजने के बाद छात्र के परीक्षा परिणाम में कितना अंतर आया, इन सब पर नजर रखना भी अभिभावक की जिम्मेदारी है. आज के प्रतियोगिता भरे दौर में बच्चे को प्रारंभ से ही एक ऐसे सहारे की जरूरत होती है जो न केवल उस की शिक्षा संबंधी आधार व नींव को मजबूत करे बल्कि अंत तक एक सफल कैरियर प्राप्त कराने में छात्र की मदद करे. इसलिए ट्यूशन एक फैशन या स्टेटस सिंबल न हो कर, समय की एक जरूरी मांग बन गई है. जहां तक इस सहारे की कीमत या फीस का सवाल है, यह शिक्षा के स्तर से ले कर कैरियर के निर्माण तक बड़ी तेजी से बढ़ती है. बाजार में ट्यूशन की विभिन्न कक्षाओं की फीस कुछ इस प्रकार है : अगर ट्यूशन की फीस देने के बाद आप का बच्चा अधिकतम अंक प्राप्त कर लेता है तो यह फीस उस अच्छे परीक्षा परिणाम का सही मुआवजा है. स्कूलों में तो पाठ्यक्रम को समझना एक खानापूरी मात्र है. ऐसे में ट्यूशन ही पूरे पाठ्यक्रम को गंभीरता से समझने व जानने का एकमात्र जरिया बन जाता है जिसे अपनाना हर छात्र व अभिभावक की आवश्यक जरूरत बन गई है. हालांकि, यह जबरन जरूरत है क्योंकि छात्रों के अभिभावक स्कूलकालेजों को फीस देते ही हैं.

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