जमीन, आसमान, हवा, पानी व आग के मेल से दुनिया बनी है, लेकिन इन महापंचों की नजर टेढ़ी होने पर बनाबनाया खेल बिगड़ जाता है. किसानों को अकसर यह मार सहनी पड़ती है, क्योंकि ज्यादातर खेती कुदरत के भरोसे है. जमीन ऊसर, बंजर, बीहड़ या दलदली हो, आसमान से बिजली, ओले गिरें, आंधी, तूफान, चक्रवात आएं, बादल फटें, पानी न बरसे या पकी फसल जल जाए, किसानों को जानमाल का नुकसान ज्यादा होता है, क्योंकि खेती में जोखिम बहुत हैं. खतरे उठा कर फसलों को महफूज रखना आसान नहीं है. भले ही खेती को देश की रीढ़ व किसान को अन्नदाता कहें, लेकिन सहूलियतों की बरसात कारखानेदारों पर ज्यादा, किसानों पर कम होती है. लिहाजा दूसरों की थाली भरने वाले किसानों की थाली खाली रहती है. ऊपर से सूखे की मार पड़ जाने के कारण किसानों की मुश्किलें बेहिसाब बढ़ जाती हैं.

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