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फसल को कीटों से बचाएं नए तरीके अपनाएं

आजकल फसल की सुरक्षा को ले कर किसान परेशान हैं, क्योंकि बाजार में मौजूद तमाम कीटनाशक फसल को कीड़ों से बचाने में नाकाम हो रहे हैं. इस का ताजा उदाहरण देश भर में बीटी काटन (नरमा) की तबाही है. किसानों की नरमा फसल बरबाद हो चुकी है. इस में इस्तेमाल किए गए कीटनाशक बेअसर रहे हैं. बीटी काटन बीज की खासीयत होती है कि इस में कीट नहीं लगते हैं और यह सामान्य कपास की फसल से ढाई गुना अधिक पैदावार देती है. लेकिन बीज बनाने वाली विदेशी कंपनियों के सारे दावे धरे रह गए. सफेद मक्खी ने कपास पर जम कर कहर बरपाया और किसानों को लाखों रुपए का नुकसान झेलना पड़ा. सफेद मक्खी का खरीफ की फसलों पर सब से ज्यादा हमला होता है. यह मक्खी कपास की सब से बड़ी दुश्मन होती है. यह बरसात के मौसम में सब से ज्यादा पनपती है. कपास के हर पत्ते पर 30 से ज्यादा मक्खियां बैठती हैं. हर मक्खी 100 से ज्यादा अंडे देती है. इस मक्खी का चक्र 30 से 35 दिनों का होता है. इस साल सफेद मक्खी ने करीब 4200 करोड़ रुपए की कपास की फसल को बरबाद किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों से मन की बात करते हैं, लेकिन किसानों के मन की बात सुनने वाला कोई नहीं है. हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र देश के ऐसे राज्य हैं, जहां कपास की बंपर पैदावार होती है, लेकिन इस साल सफेद मक्खी के प्रकोप से कपास की फसल बरबाद हो गई है. किसानों की हालत बदतर हो रही है. हालांकि इस बारे में प्रदेश सरकारों का कहना है कि किसानों को उन के हुए नुकसान की भरपाई मुआवजा दे कर की जा रही है. सरकार का किसानों को मुआवजा देने का मापदंड और तरीका क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है. पिछले दिनों गेहूं की फसल में हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने 50-50 रुपए तक के चेक किसानों को दिए थे, जिस पर देश भर में खूब होहल्ला हुआ था. जिन किसानों को मुआवजे की रकम कुछ ठीकठाक मिली भी, तो उन्हें दलालों व पटवारियों को चढ़ावा भी चढ़ाना पड़ा था. यह एक कड़वी हकीकत है, इसलिए किसानों को सरकार का मुंह न ताक कर खुद पर भरोसा करना होगा और प्रगतिशील बनना होगा.

लगाएं फसल रक्षक फसलें

फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से बचाने के लिए किसान फसल रक्षक फसलें उगा सकते हैं, जो एक खास समय के दौरान कीटों को अपनी ओर खींच कर खास फसल को अनेक कीटों से बचाती हैं. इन फसलों को मुख्य फसल के बीचबीच में कहींकहीं लाइनों में लगाया जाता है या मुख्य फसल के चारों ओर बाड़ की तरह लगाया जाता है.

ऐसी फसल का फायदा

ऐसी फसलें किसान की मुख्य फसल की गुणवत्ता व पैदावार को बनाए रखती हैं और साथ ही मिट्टी के स्वास्थ्य और आबोहवा को भी ठीक रखती हैं. ये फसलें मित्र कीटों को आकर्षित करती हैं और हानिकारक कीटों के प्रकोप से मुख्य फसल को सुरक्षा देती हैं, जिस से मुख्य फसल को फायदा मिलता है. ऐसी फसलें लगाने पर किसानों को कीटनाशकों का इस्तेमाल कम ही करना पड़ता है. कीट आकर्षित करने वाली पारंपरिक फसलें : ऐसी रक्षक फसलों को मुख्य फसल के आगे लगाया जाता है, जिस से रक्षक फसलें मुख्य फसल के मुकाबले ज्यादा कीटों को भोजन व अंडे देने के लिए आकर्षित करती हैं. गतिरोधी फसलें : इस प्रकार की रक्षक फसलें कीटों को अपनी ओर खींचने वाली होती हैं. लेकिन इन का फायदा ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहता है.

आनुवंशिक परिवर्तित फसलें : इस तरह की रक्षक फसलें आनुवंशिक रूप से परिवर्तित रहती हैं, जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को आकर्षित करती हैं.

बाड़ वाली फसलें : ऐसीरक्षक फसलों को मुख्य फसल के चारों ओर बाड़ के रूप में लगाया जाता है, जैसे कपास के चारों ओर भिंडी की बाड़ लगा सकते हैं. इस में कपास मुख्य फसल और भिंडी रक्षक फसल है.

अनेक फसलें : इस के तहत रक्षक फसलों की विभिन्न प्रजातियों को कीटों को अपनी ओर खींचने के लिए मुख्य फसल के साथ लगाया जाता है. 

कीट आकर्षित करने वाली रक्षक फसलों को लगाने का तरीका :

* गोभी की फसल में कीट रोकथाम के लिए गोभी फसल की 25 लाइनों के बाद 2 लाइनों में सरसों लगाई जाती है.

* कपास की इल्ली/सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए लोबिया को कपास की 5 कतारों के बाद 1 कतार में लगाया जाता है या तंबाकू को कपास की 20 कतारों के बाद 2 कतारों में लगाया जाता है.

* टमाटर की फसल को फल छेदक/निमेटोड से बचाने के लिए अफ्रीकन गेंदे को टमाटर की 14 लाइनों के बाद 2 लाइन में लगाएं.

* बैगन में तनाछेदक व फलछेदक की रोकथाम के लिए धनिया या मेथी को बैगन की 2 लाइनों के बाद 1 लाइन में लगाया जाता है.

* चने में इल्ली की रोकथाम के लिए धनिया या गेंदे को चने की 4 लाइनों के बाद 1 लाइन में लगाया जाता है.

* अरहर में इल्ली की रोकथाम के लिए गेंदे को अरहर के चारों तरफ बार्डर के रूप में लगाया जाता है.

* सोयाबीन में तंबाकू की इल्ली की रोकथाम के लिए सूरजमुखी या अरंडी को सोयाबीन के चारों तरफ बार्डर के रूप में लगाया जाता है.

किसानों को फसल में हानि पहुंचाने वाले कीटों की पहचान होनी चाहिए और फसल की नियमित रूप से देखभाल करनी चाहिए. अगर फसलरक्षक फसल लगाने के बाद भी मुख्य फसल में कीटों का प्रकोप बढ़ने की संभावना हो तो कीटनाशी का छिड़काव भी करना चाहिए साथ ही नजदीकी कृषि माहिरों से सलाह लेनी चाहिए

जागरूक रहें

* किसान अपनी फसल में 10-15 दिनों के अंतराल पर मुनासिब कीटनाशक का छिड़काव करें, लेकिन कई कीटनाशक मिला कर न छिड़कें.

* फसल की ऊपरी सतह तक ही छिड़काव न करें, बल्कि नीचे पौधों की जड़ों तक सही तरीके से छिड़काव करें.

*  कीटनाशक छिड़कते समय पूरे बदन के कपड़े पहनें और मुंह पर कपड़ा या मास्क लगा कर छिड़काव करें.

इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए किसान काल सेंटर के टोल फ्री नंबर 18001801551 पर पूछताछ कर सकते हैं. इस नंबर पर लैंडलाइन व मोबाइल फोन से सुबह 6 बजे से ले कर रात 10 बजे तक जानकारी ले सकते हैं. देश भर में अलगअलग भाषाओं में 25 स्थानों पर किसान काल सेंटर बनाए गए हैं.

ऐसे करें मवेशियों का शुरुआती इलाज

मवेशी अपने पालकों को अच्छाखासा मुनाफा कराते हैं, इसलिए हर मवेशीपालक को अपने मवेशियों का खास ध्यान रखने की जरूरत है. अकसर मवेशी बीमार पड़ जाते हैं या चोट के शिकार हो जाते हैं या कभी जहरीला पौधा वगैरह खा कर बीमार पड़ जाते हैं. बीमार मवेशी को डाक्टर के यहां ले जाने से पहले अगर उस का शुरुआती इलाज कर दिया जाए तो मवेशी की बीमारी ज्यादा नहीं बढ़ती और इलाज का खर्च बहुत कम हो सकता है. अकसर लू लगने, जहरीला पौधा खा लेने  या खून के ज्यादा बह जाने से मवेशी की मौत हो जाती है और मवेशीपालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. इस से मवेशीपालकों की आमदनी भी बंद हो जाती है. इन परेशानियों से बचने के लिए मवेशीपालकों को मवेशियों के शुरुआती इलाज  की जानकारी होना बेहद जरूरी है.

सभी मवेशीपालकों को अपने पास रुई, फिटकरी, बांस की खपच्ची, टिंचर वैंजोइन, एंटीसेप्टिक क्रीम, नया ब्लेड, कारबोलिक एसिड, मैगनीशियम सल्फेट, जमालगोटा, जौ का आटा, तारपीन का तेल, कपूर, मांड, खडि़या, अरंडी का तेल, सेवलान या डिटाल व बोरिक एसिड वगैरह जरूर रखना चाहिए. ये सारी चीजें मवेशियों के इलाज में काम आती हैं. इस के अलावा मवेशीपालकों को अपने पास पशु अस्पताल व नजदीक के वेटनरी डाक्टर के फोन नंबर जरूर रखने चाहिए, ताकि मवेशी के बीमार पड़ने पर तुरंत ही डाक्टर से संपर्क किया जा सके. वेटनरी डाक्टर कौशल किशोर प्रसाद बताते हैं कि जैसे ही यह महसूस हो कि कोई मवेशी बीमार है, तो तुरंत ही उसे बाकी मवेशियों से दूर हटा कर बांध देना चाहिए. बीमार पशु को हवादार, साफ और शांत जगह पर ही रखना चाहिए. पशुओं के बेचैन होने, खानापीना छोड़ देने या कम कर देने, दूध में कमी होने या उस का रंग बदलने, मल और मूत्र के रंग में बदलाव होने, नथुने सूख जाने, लगातार रंभाने या चाल में बदलाव होने पर मवेशीपालकों को ध्यान रखना चाहिए और तुरंत ही उस का शुरुआती इलाज शुरू कर देना चाहिए. इस के बाद डाक्टर से जांच करा लेनी चाहिए.

जब लू या ठंड लगे : गरमी में लू और जाड़े में ठंड लगने से मवेशियों का बीमार पड़ना आम बात है. गरमियों में लू लगने पर मवेशी को ठंडी जगह में रख कर उस के शरीर पर ठंडा पानी डालें और ठंडे पानी में चीनी, भूना जौ का आटा और नमक मिला कर बारबार पिलाएं. पुदीना और?प्याज का अर्क देने से भी पशु को आराम मिलता है. जाड़े के मौसम  में ठंड लगने पर पशु की नाक और आंख से पानी बहता है और वह कांपने लगता है. ऐसी हालत में कुनकुने पानी में गुड़ मिला कर देने  बीमार मवेशी को राहत मिलती है. अजवायन, सेंधा नमक व अदरक की बराबर मात्रा गुड़ में मिला कर खिलाने से भी पशु को आराम मिलता है. तारपीन या सरसों के तेल में कपूर मिला कर रोगी मवेशी की मालिश करने से उसे राहत मिलती है. जब गले में कुछ अटक जाए : अकसर ऐसा होता है कि बड़े आकार का फल, नारियल, आलू या पौलीथीन निगल लेने से वह मवेशी के खाने की नली में अटक जाता है. ऐसी हालत में मवेशी के मुंह से लार बहने लगती है और गले में अटकी चीज को निगलने की कोशिश में वह छटपटाने लगता है. पानी पिलाने पर पानी नाक से बाहर बहने लगता है. ऐसे में मवेशी के गले पर हाथ फेर कर पता किया जा सकता है कि कहां पर रुकावट है. पता चलने पर उसे दबाव दे कर सहलाने से अटकी हुई चीज अंदर चली जाती है. इस के बाद भी वेटनरी डाक्टर से मवेशी का चेकअप जरूर करा लेना चाहिए.

जब चोट लगने पर ज्यादा खून बहने लगे : जब गड्ढे या कुएं में गिरने से मवेशी को गहरा जख्म लगे और तेजी से खून बहने लगे तो कटी हुई जगह पर कस कर साफ कपड़े का टुकड़ा बांध कर खून के बहने को रोका जा सकता है. कई बार कपड़े को बांधना मुमकिन नहीं हो पाता है, तो कपड़े को फिटकरी के घोल में भिगो कर कटी हुई जगह पर लगाने से खून का बहना रुक जाता है. चोट लगने पर कभी केवल सूजन आ जाती है और कभी खून भी बहने लगता है. दोनों ही हालत में बर्फ या ठंडे पानी से चोट की जगह पर सिंकाई करनी चाहिए. खून बहने वाली जगह पर एंटीसेप्टिक क्रीम या टिंचर वैंजोइन लगा देनी चाहिए. इस के तुरंत बाद डाक्टर को जरूर दिखा लें कि कहीं हड्डी में गहरी चोट या टूट तो नहीं है.

जब कब्ज या दस्त हो : सड़ागला चारा, ज्यादा सूखा चारा या दाना खाने से मवेशी को अकसर कब्ज की शिकायत हो जाती है. ऐसी हालत में मवेशी को 60 ग्राम काला नमक, 60 ग्राम सादा नमक, 15 ग्राम हींग व 50 ग्राम सौंफ को 500 ग्राम गुड़ में मिला कर 2 घंटे के अंतराल पर देने से फायदा होता है. दस्त होने पर मवेशी को गुड़, नमक और जौ के पके आटे का घोल पिलाना चाहिए. इस से शरीर में पानी की कमी नहीं हो पाती है. इस के अलावा मांड और खडि़या का घोल भी दस्त को ठीक करता है. बीमार मवेशी की त्वचा खींचने के बाद अपनी जगह पर आने में अगर 6 सेकेंड से ज्यादा समय लगे तो समझना चाहिए कि बीमारी का खतरा बढ़ गया है. ऐसी हालत में तुरंत डाक्टर से इलाज कराएं.

जब सांप या पागल कुत्ता काट ले : खेतों या अंधेरी जगहों पर अकसर मवेशियों को सांप, बिच्छू या जहरीले कीड़े काट लेते हैं. मवेशी के जिस्म के जिस हिस्से में सांप ने डसा हो, उस के 4-5 इंच ऊपर डोरी से कस कर बांध देना चाहिए. डसी गई जगह पर नए ब्लेड से चीरा लगा कर जहर को खून के साथ बाहर निकलने दें. डाक्टर के आने तक मवेशी को गरम पानी या चाय पिलाते रहें, ताकि उसे नींद न आ सके. अगर किसी मवेशी को पागल कुत्ता काट ले तो कटी हुई जगह को साबुन लगा कर 4-5 बार धोएं. इस के बाद कारबोलिक एसिड से घाव को जला दें. उस मवेशी को बाकी मवेशियों और इनसानों से दूर रखें.

जब जहरीली घास खा ले : जहरीला पौधा, कीटनाशक दवाएं, यूरिया, चूहा मारने की दवा व जहरीला चारा वगैरह खा लेने से मवेशी जहरबाद से पीडि़त हो जाता है. ऐसा होने पर मवेशी के मुंह में उदर नलिका से ज्यादा से ज्यादा पानी डालें. छोटे मवेशियों को कुनकुने पानी में नमक या पीसी हुई सरसों घोल कर पिलाने से उलटी हो जाती है, इस से आमाशय में भरा जहर बाहर निकल जाता है.

आंतों का जहर निकालने के लिए दस्तावर या बिरौयक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. बड़े मवेशी को 250 ग्राम और छोटे को 100 ग्राम मैगनीशियम सल्फेट पानी में घोल कर पिलाना चाहिए. जब तक मवेशी का शुरुआती इलाज किया जाए, उसी बीच किसी को डाक्टर को बुलाने के लिए भेज देना चाहिए ताकि समय रहते बीमार मवेशी का सही इलाज हो सके और उसे बचाया जा सके.

आरक्षण का बवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने एक इंटरव्यू में आरक्षण के बारे में जो कहा है उस पर चौंकने की जरूरत नहीं है. संघ और भारतीय जनता पार्टी की ही नहीं, लगभग समस्त सवर्णों की यह राय है चाहे वे कम्युनिस्ट पार्टी में हों या बहुजन समाज पार्टी में. आरक्षण को देश का सामाजिक तौर पर संपन्न वर्ग अपने पुश्तैनी अधिकारों पर गहरा प्रहार मानता है. वह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि जिन्होंने निचले, पिछड़ी, दलित, आदिवासियों में जन्म लिया है वे ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्यों के समकक्ष हो सकते हैं. वास्तविकता तो यह है कि कई हजार साल की मानसिक गुलामी ने इस जन्मजात भेदभाव के पीडि़तों की खुद की सोच भी इस तरह कुंद कर दी है कि वे इसे ईश्वर की देन मान कर खुश हैं और आपसी स्तर पर भेदभाव को इसी का सुखद परिणाम मान कर संतुष्ट हैं. आरक्षण का सवाल तो बहुत थोड़े से वंचित वर्ग उठाते हैं जिन्हें उम्मीद होती है कि इस से उन्हें कुछ मिल जाएगा. मोहन भागवत ने अगर कुछ कहा तो गलत नहीं क्योंकि वे सवर्णों व गैरसवर्णों दोनों की ही भावनाओं को दर्शा रहे थे.

जब तक समाज उन ग्रंथों, उन रिवाजों, उन त्योहारों, उन देवीदेवताओं को मानता रहेगा जिन में इस भेदभाव को बारबार घटनाओं, कहानियों, भगवान के आदेशों से कहलवाया गया है, जन्मजात भेदभाव बना रहेगा और विवाद खड़ा रहेगा. ऊंची जातियां जन्म को मेरिट का नाम देती रही हैं और देती रहेंगी. आरक्षण के कारण कुछ लाख दबेकुचलों को जगह मिल जाए तो भी देश का समाज नहीं बदलेगा और गलीगली में यह ऊंचनीच चालू रहेगी. अब तो इस वर्णव्यवस्था की दीवार को और मजबूत करने के लिए पिछड़ों के ही नहीं, अछूत दलितों के भी अलग मंदिर बनवा दिए गए हैं ताकि वे मंदिरविहीन होने का दुख न भोगें. इन पिछड़ोंनिचलों के मंदिरों से होने वाली भारी आय भी ऊंची जातियों के लोग ले जा रहे हैं और भारी संख्या में व्यापारी वर्ग के लोगों ने गैर सवर्णों के मंदिरों के ट्रस्टों पर कब्जा कर लिया है. जब पिछड़ों व दलितों ने स्वयं सामाजिक क्षेत्र में भेदभाव को मजबूत कर लिया है तो मोहन भागवत ने नौकरियों में, शिक्षा संस्थानों में इस पर बहस की गुंजाइश का सवाल उठा कर गलत क्या किया है? इस के लिए तो पिछड़ों व दलितों के नेता ही हैं जो हर थोड़े दिनों में किसी नए मंदिर में से तिलक लगाए, प्रसाद की थाली लिए निकलते हैं. वे लाउडस्पीकरों पर घोषणा कर रहे हैं कि उन की धार्मिक दुकान कमजोर नहीं है. ऐसे में वे किस मुंह से आरक्षण की मांग कर सकते हैं?

आरक्षण का बवाल

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने एक इंटरव्यू में आरक्षण के बारे में जो कहा है उस पर चौंकने की जरूरत नहीं है. संघ और भारतीय जनता पार्टी की ही नहीं, लगभग समस्त सवर्णों की यह राय है चाहे वे कम्युनिस्ट पार्टी में हों या बहुजन समाज पार्टी में. आरक्षण को देश का सामाजिक तौर पर संपन्न वर्ग अपने पुश्तैनी अधिकारों पर गहरा प्रहार मानता है. वह यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि जिन्होंने निचले, पिछड़ी, दलित, आदिवासियों में जन्म लिया है वे ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्यों के समकक्ष हो सकते हैं. वास्तविकता तो यह है कि कई हजार साल की मानसिक गुलामी ने इस जन्मजात भेदभाव के पीडि़तों की खुद की सोच भी इस तरह कुंद कर दी है कि वे इसे ईश्वर की देन मान कर खुश हैं और आपसी स्तर पर भेदभाव को इसी का सुखद परिणाम मान कर संतुष्ट हैं. आरक्षण का सवाल तो बहुत थोड़े से वंचित वर्ग उठाते हैं जिन्हें उम्मीद होती है कि इस से उन्हें कुछ मिल जाएगा. मोहन भागवत ने अगर कुछ कहा तो गलत नहीं क्योंकि वे सवर्णों व गैरसवर्णों दोनों की ही भावनाओं को दर्शा रहे थे.

जब तक समाज उन ग्रंथों, उन रिवाजों, उन त्योहारों, उन देवीदेवताओं को मानता रहेगा जिन में इस भेदभाव को बारबार घटनाओं, कहानियों, भगवान के आदेशों से कहलवाया गया है, जन्मजात भेदभाव बना रहेगा और विवाद खड़ा रहेगा. ऊंची जातियां जन्म को मेरिट का नाम देती रही हैं और देती रहेंगी. आरक्षण के कारण कुछ लाख दबेकुचलों को जगह मिल जाए तो भी देश का समाज नहीं बदलेगा और गलीगली में यह ऊंचनीच चालू रहेगी. अब तो इस वर्णव्यवस्था की दीवार को और मजबूत करने के लिए पिछड़ों के ही नहीं, अछूत दलितों के भी अलग मंदिर बनवा दिए गए हैं ताकि वे मंदिरविहीन होने का दुख न भोगें. इन पिछड़ोंनिचलों के मंदिरों से होने वाली भारी आय भी ऊंची जातियों के लोग ले जा रहे हैं और भारी संख्या में व्यापारी वर्ग के लोगों ने गैर सवर्णों के मंदिरों के ट्रस्टों पर कब्जा कर लिया है. जब पिछड़ों व दलितों ने स्वयं सामाजिक क्षेत्र में भेदभाव को मजबूत कर लिया है तो मोहन भागवत ने नौकरियों में, शिक्षा संस्थानों में इस पर बहस की गुंजाइश का सवाल उठा कर गलत क्या किया है? इस के लिए तो पिछड़ों व दलितों के नेता ही हैं जो हर थोड़े दिनों में किसी नए मंदिर में से तिलक लगाए, प्रसाद की थाली लिए निकलते हैं. वे लाउडस्पीकरों पर घोषणा कर रहे हैं कि उन की धार्मिक दुकान कमजोर नहीं है. ऐसे में वे किस मुंह से आरक्षण की मांग कर सकते हैं?

जीवन की मुसकान

मेरे पति आर्मी में थे और उन का ट्रांसफर अंबाला कर दिया गया. अत: शादी के तुरंत बाद हम अंबाला के लिए रवाना हुए. ट्रेन में हमारा एक सूटकेस चोरी हो गया जिस में पति के सर्विस से संबंधित जरूरी कागजात और पेबुक आदि थे. नई जगह और जेब में पड़े हुए मात्र कुछ रुपए ले कर जैसेतैसे हम अंबाला पहुंचे. वहां रहने के लिए हमें ‘फैमिली क्वार्टर’ मिल गया. किंतु घर खर्च कैसे चले. पेबुक के बिना तनख्वाह भी नहीं मिल पाएगी, यह पति जानते थे. अनजान शहर में किस से मदद मांगी जा सकती थी? हम लोग बहुत ही पसोपेश में थे. पति के सीनियर अफसर को जब यह बात पता चली तो उन्होंने न केवल पैसे बल्कि अन्य जरूरी सामान भेज कर हमारी मदद की और पेबुक बनवाने की कार्यवाही में भरपूर सहायता की. 2 महीने के बाद जब पति की दूसरी पेबुक बन कर आई तब उन्हें वेतन मिला.जब हम ने सीनियर अफसर को उन के रुपए देने चाहे तो उन्होंने लेने से इनकार कर दिया, बोले, ‘‘यदि तुम्हारी जगह मेरा अपना बेटा होता, तो क्या मैं उस से पैसे वापस लेता? तुम दोनों मेरे बेटेबहू समान हो.’’ उन के द्वारा कहे गए ये वाक्य मेरे दिल को छू गए और ऐसा लगा मानो अनजान शहर में हमें हमारे मातापिता मिल गए हों.

संतोष कुलश्रेष्ठ, आगरा (उ.प्र.)

*

बात वर्ष 1953 की है. तब दिल्ली शांत व सुरक्षित शहर था. यमुना नदी पानी से भरपूर थी. सुबह 4-5 बजे स्त्रीपुरुष यमुना नदी में स्नान आदि के लिए चल पड़ते थे. मेरी दादी भी नित्य यमुना स्नान के लिए तोता के घाट पर जाती थीं. उस दिन हमें 6 बज कर 40 मिनट वाली ट्रेन से कहीं जाना था, सो, दादीजी ड्राइवर के साथ 5 बजे ही यमुना चली गईं. नहाते समय वे अचानक यमुना में गिर गईं और उन की हीरे की 3 अंगूठियां न जाने कहां गायब हो गईं. उन का शोर सुन कर कई लोग आए पर किसी की हिम्मत डुबकी लगा कर अंगूठियां निकालने की नहीं हुई. एक लड़के ने डुबकी लगालगा कर आखिरकार तीनों अंगूठियां निकाल दीं. दादी के पास उस समय, समय की भी कमी थी व ज्यादा रुपए भी नहीं थे. उन्होंने उस लड़के से वादा किया कि वे वापस आ कर उस से अवश्य मिलेंगी. वापस आने पर दादी ने उसे इनामस्वरूप सोने की अंगूठी दी.

जयश्री रोहतगी, लक्ष्मी नगर (दिल्ली)

मोदी का विदेश दौरा

नरेंद्र मोदी द्वारा कांगे्रस सरकार के संयुक्त राष्ट्र संघ में सुरक्षा परिषद की परमानैंट वीटो वाली सीट पाने के कार्यक्रम को और जोरशोर से चलाने को निरर्थक ही कहा जाएगा. दुनिया की स्थिति ऐसी नहीं हुई है कि उसे गर्ज पड़ी हो कि वह भारत, जरमनी, ब्राजील व जापान को स्थायी वीटो वाले पद पर बैठा दे. संयुक्त राष्ट्र संघ, जो अपनी भारी नौकरशाही के कारण वैसे ही आलोचना का शिकार हो रहा है, अमेरिका के टुकड़ों पर पल रहा है. इन 4 देशों के पास पैसा है पर उतना नहीं कि वे अमेरिका का मुकाबला कर सकें.

एक तरह से नरेंद्र मोदी न्यूयार्क में वही कर रहे हैं जो हार्दिक पटेल अहमदाबाद में कर रहा है और जाट राजस्थान में कर रहे हैं, एक विशेष आरक्षण की मांग भीख के तौर पर मांगना. 1932 में अंबेडकर-गांधी पूना पैक्ट के तहत अंबेडकर ने दलितों के लिए जो हक लिया था वह भीख में नहीं लिया था. गांधी की गर्ज थी. 1980 में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग गिड़गिड़ाने पर नहीं दिया था. पिछड़ों का हक बन गया था. भारत व ब्राजील आज भी गरीब हैं, पिछड़े हैं, भ्रष्टाचार व लालफीताशाही के शिकार हैं, तकनीक में दूसरे देशों से सैकड़ों मील पीछे हैं. जरमनी और जापान पर द्वितीय विश्वयुद्ध में करोड़ों की मौत का जिम्मेदार होने की कालिख आज भी साफ दिखाई दे रही है.

अमेरिका, रूस, फ्रांस, इंगलैंड और चीन को कोई वजह नहीं दिखती कि 1945 के संयुक्त राष्ट्र संघ के गठन के समय बने नियमों में वे बदलाव लाएं और अपने लिए नए प्रतियोगी खड़े करें. ब्राजील और भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ रही है पर उस का एक बड़ा कारण अमेरिकी कंपनियों का अपने नागरिकों की कीमत पर इन देशों में टैक्नो कुली (मजदूर) या टैक्नो स्लेव (गुलाम) बनाने के कारण है और अगर अमेरिका अपने पेंच कस दे तो भारत और ब्राजील का रंग फीका पड़ने में देर नहीं लगेगी. अगर भारत में नरेंद्र मोदी को इस क्षेत्र में सफलता दिलानी है तो शायद संघ (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) को संघ (संयुक्त राष्ट्र संघ) में प्रवेश दिलाने के लिए देशभर में अंगवस्त्र पहन कर यज्ञहवनों का आयोजन करना चाहिए जैसा पुराणों में लिखा है. एक अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ना चाहिए जो न्यूयार्क, मास्को, लंदन, पेरिस और बीजिंग में पहुंचे. संघ सेना को वाट्सऐप और फेसबुक पर करोड़ों की संख्या में संदेश जारी करने चाहिए कि 100 करोड़ हिंदुओं का देश विश्वगुरु के बाद विश्वचक्रवर्ती बनेगा और आर्यवर्तीय रामराज या वैश्विक राज की स्थापना होगी.अपने गाल बजाने में हम बहुत तेज हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थायी सीट के लिए नरेंद्र मोदी जो बेचैनी दिखा रहे हैं वह जरमनी की एंजेला मर्केल या जापान के श्ंिजो ऐब नहीं दिखा रहे.

कोर्ट, औस्कर और विवाद

बौलीवुड की फिल्में अकसर औस्कर में सर्वश्रेष्ठ विदेशी फिल्म श्रेणी में भेज तो दी जाती हैं लेकिन वे लौटती खाली हाथ ही हैं. इस बार औस्कर के लिए फिल्में चुनने वाली भारतीय ज्यूरी ने देश का आधिकारिक प्रतिनिधित्व करने के लिए फिल्म ‘कोर्ट’ का चयन किया है. चैतन्य तमहाने की पहली फिल्म ‘कोर्ट’ को इस साल राष्ट्रीय पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ फिल्म घोषित किया गया था. फिल्म में अदालती मामलों पर गंभीर विमर्श है. लेकिन जैसे ही एफएफआई ने इसे भारत की आधिकारिक प्रतिनिधि के तौर पर चुना, विवाद भी पैदा हो गया. ज्यूरी में से एक सदस्य राहुल रवैल ने यह कहते हुए इस्तीफा दे दिया कि कमेटी के अहम सदस्य अमोल पालेकर जोड़तोड़ वाले आदमी हैं. अब, देखते हैं कि ‘कोर्ट’ औस्कर की दौड़ में कहां तक जा पाती है.

एंग्री इंडियन गौडेसेस

हिंदी फिल्मों में पुरुष किरदारों को ले कर तो खूब सारी फिल्में बनी हैं जहां इन के बनतेबिगड़ते रिश्ते दिखाए जाते हैं. लेकिन अलगअलग सोच रखने वाली भारतीय महिलाओं की नजदीकी मित्रता दर्शाती फिल्म ‘एंग्री इंडियन गौडेसेस’ अपनी तरह की अलहदा फिल्म है. हाल ही में टोरंटो इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में प्रदर्शित हुई इस फिल्म ने फर्स्ट रनर अप का स्थान हासिल किया. इस फैस्टिवल में ‘एंग्री इंडियन गौडेसेस’ को ‘ग्रोल्स्क पील चौइस’ अवार्ड से नवाजा गया. फिल्म की स्टार कास्ट में सारा जेन, तनिष्ठा चटर्जी, अनुष्का मनचंदा, संध्या मृदुल, अमृत मघेरा, पवलीन गुजराल और राजश्री देशपांडे जैसे बहुमुखी कलाकार शामिल हैं. फिल्म का निर्देशन पैन नलीन ने किया है.

गौरव की यारी रोड

लघु फिल्म ‘यारी रोड’ इन दिनों खासी चर्चा में है. यह फिल्म क्वींसलैंड के इंडियन इंटरनैशनल फिल्म फैस्टिवल में बैस्ट शौर्ट फिल्म का खिताब जीत चुकी है और जल्द ही एशियन अमेरिकन फिल्म फैस्टिवल में भी दिखाई जाएगी. फिल्म में गौरव द्विवेदी, जतिन गोस्वामी और सम्राट चक्रवर्ती ने मुख्य भूमिका निभाई है. प्रतिभाशाली अभिनेता गौरव द्विवेदी को जब भी मौका मिला, उन्होंने खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित किया है. फिर चाहे वह सीरियल ‘गोरा’ हो, फिल्म ‘इनकार’ हो या फिर फिल्म ‘मांझी द माउंटेन मैन.’ बहरहाल, हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में शौर्ट फिल्मों का चलन बढ़ा है. अनुराग कश्यप और सुजोय घोष सरीखे निर्देशक भी इस में हाथ आजमा रहे हैं. इन फिल्मों की कामयाबी कुछ हद तक देश व दुनिया के उन फिल्म समारोहों पर भी निर्भर है जो ऐसी फिल्मों को प्रोत्साहित करते हैं.

औनलाइन ठगी और अभिनेता

फिल्म अभिनेता और उन से जुड़े ब्रैंड कई बार भ्रामक सामग्री व झूठे वादों के चलते विवादों में आ चुके हैं. जैसे मैगी के प्रचार को ले कर अमिताभ बच्चन समेत कई कलाकारों के खिलाफ शिकायतें दर्ज हुईं. हाल में एक औनलाइन शौपिंग पोर्टल, जो ग्राहकों को कथित तौर पर ठग रहा है, के प्रचारक अभिनेता रणबीर कपूर भी विवादों के घेरे में आ गए हैं. हालांकि सफाई में वे कह रहे हैं कि अब उस पोर्टल से उन का कोई वास्ता नहीं है लेकिन विज्ञापनों के चलते उस पोर्टल ने काफी कमाई की है और इस आधार पर उन की भी जिम्मेदारी बनती है. उन के अलावा औनलाइन शौपिंग साइट को प्रमोट करने के लिए फरहान अख्तर और रणबीर के खिलाफ आईपीसी के तहत आपराधिक विश्वास हनन को ले कर एक प्राथमिकी दर्ज कराई गई है. अगर ये अभिनेता सिर्फ पैसों के लिए किसी भी ब्रैंड का प्रचार करने के बजाय उस की विश्वसनीयता भी देखें तो बेहतर हो.

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