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सर्दियों के फूलों के पौधे उगा कर सुंदर बनाएं घरआंगन

सर्दी के मौसम के एक साला फूलों के पौधों में ऐसे पौधे शामिल हैं, जो कि अपना पूरा जीवन (बीज बोने व अंकुरण से ले कर फूल आने और उन के खत्म होने तक) 1 साल या 1 मौसम में ही पूरा कर लेते हैं. इन में ज्यादातर पौधे ऐसे होते हैं, जोकि अपना जीवन 3 से 6 महीने में ही पूरा कर लेते हैं.  ऐसे 1 साल वाले फूलों के पौधों को बहुत ही आसानी से कम मेहनत से पैदा किया जा सकता है. ये पौधे देखने में काफी आकर्षक होते हैं. इन की खेती बगीचे को सजा देती है. किसान भाई इन की नर्सरी तैयार कर के और खेती कर के बीज उत्पादन में भी अच्छा लाभ कमा सकते हैं.

इन तमाम सालाना फूलों के पौधों को कई मकसद पूरे करने के लिए पैदा किया जाता है. इन्हें गमलों में लगाने, क्यारियों में लगाने, लटकाने वाली टोकरियों में लगाने, सड़कों के किनारे लगाने व चट्टान उद्यान में लगाने में इस्तेमाल किया जाता है.

बोआई का समय : इन पौधों की बढ़ोतरी और फूलने के लिए कम तापमान की जरूरत होती है, लिहाजा इन के बीजों को अगस्तसितंबर के दौरान नर्सरी में बोया जाता है. अक्तूबरनवंबर के बीच इन पौधों को स्थायी स्थानों पर लगा दिया जाता?है.

नर्सरी के लिए जगह का चुनाव : पूरी तरह खुली और भरपूर हवा व रोशनी वाली जगह नर्सरी बनाने के लिए अच्छी रहती है. इन फूलों की नर्सरी के लिए बलुई दोमट मिट्टी वाली जमीन बेहतर होती है.

क्यारियों की तैयारी : नर्सरी के अंदर 4-6 इंच उठी हुई क्यारियां बनाई जाती हैं, ताकि फालतू पानी बाहर निकल सके और नर्सरी के छोटेछोटे पौधे खराब न हो सकें. क्यारियों की लंबाई 3 मीटर और चौड़ाई 1 मीटर रखते हैं, ताकि सिंचाई और निराईगुड़ाई आसानी से की जा सके. क्यारियों की गहरी जुताई कर के उन में सड़ी गोबर की खाद मिला कर मिट्टी समतल कर लेनी चाहिए.

बोआई का तरीका : कुछ पौधों के बीजों को सीधे स्थायी क्यारियों में भी बोया जा सकता है, जैसे गेंदा व कोसमोस वगैरह. नर्सरी बेड में बीजों को बोते समय खास ध्यान दिया जाता है. ऐसे बीज जो ज्यादा बारीक होते हैं (जैसे पिटूनिया व पोपी), उन्हें बालू या राख में मिला कर बोना चाहिए ताकि उन्हें समान दूरी पर गिराया जा सके.

नर्सरी बेड में बीजों को हमेशा लाइन बना  कर बोना चाहिए. बोने के बाद बीजों को बारीक छनी हुई खाद और बालू के मिश्रण की हलकी तह से ढक देना चाहिए. उस के बाद क्यारियों के ऊपर घास व पत्तियां डाल देनी  चाहिए, जिस से बीज खराब न हो सकें और नमी को ज्यादा समय तक कायम रखा जा सके. क्यारियों को रोजाना हजारे से सींचना चाहिए. जब बीज उग आएं तो घास व पत्तियों को हटा कर अलग कर दें और फालतू पौधों को भी निकाल दें. पौधे ज्यादा घने होने की हालत में कवक रोग पैदा हो जाते हैं, नतीजतन पौधों का विकास रुक जाता है या कभीकभी पौधे मर भी जाते हैं.

खरपतवारों की रोकथाम : नर्सरी में समयसमय पर निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकालते रहना चाहिए. पौधों को अधिक मजबूत बनाने के लिए जब वे छोटे होते हैं, तो उन्हें दूसरी क्यारियों में लगा देते हैं.

पौध लगाना : पौधों को लगाने से पहले स्थायी क्यारियों को गोबर की खाद वगैरह डाल कर ठीक तरह से तैयार कर लेना चाहिए. उस के बाद पौधों को उन की ऊंचाई के आधार पर लगाना चाहिए. पहले लंबे पौधों को, फिर मध्यम पौधों को और बाद में छोटे पौधों को लगाना चाहिए.

देखभाल : पौधे लगाने के तुरंत बाद पानी देना चाहिए. सर्दियों में सिंचाई का अंतर 4-7 दिन रखा जाता है. समयसमय पर खुरपी की मदद से निराईगुड़ाई कर के खरपतवार निकालते रहना चाहिए. ज्यादा फूल उत्पादन के लिए पौधों को तरल खाद देना जरूरी होता है.

पौधों के फूल जैसेजैसे मुरझाते जाएं वैसेवैसे उन को पौधों से काट कर अलग करते रहना चाहिए. इस प्रकार से फूल अधिक तादाद में पैदा किए जा सकते हैं.

बीमारियां : 1 वर्षीय पौधों में बहुत सी बीमारियां लग जाती हैं जैसे कि लीफ स्पोट, मिल्ड्यू बिल्ट व बर्निंग वगैरह. इन से बचाव के लिए डायथेन एम 45 या कापर आक्सीक्लोराइड वगैरह दवाओं का छिड़काव करते रहना चाहिए.

कीड़े : केटरपिलर, लारवे, मोथ सा फ्लाई वगैरह कीड़ों के इलाज के लिए कीटनाशी दवाओं जैसे कारबोरिल 2 ग्राम या इंडोसल्फान 35 ईसी 1.5 ग्राम का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर स्प्रे करें.

बीजों को जमा करना : बीज लेने के लिए आकार, रंग व सेहत को ध्यान में रख कर फूलों को चुन लेते हैं.

1 वर्षीय फूलों की खेती कर के हमारे किसान भाई सब्जी की फसल की तरह कम समय में अपने खेतों से ज्यादा आमदनी हासिल कर सकते हैं.     

– डा. अनंत कुमार (कृषि विज्ञान केंद्र, मुरादनगर, गाजियाबाद), डा. वीरेंद्र पाल (कृषि विज्ञान केंद्र, हस्तिनापुर, मेरठ)

पौलीटनल तकनीक से सब्जीपौध उगाना

भारत की जलवाय व वातावरण अलगअलग होने से यहां पूरे साल हर किस्म की सब्जियों का उत्पादन होता रहता है. घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में स्वस्थ सब्जियों की बढ़ती मांग से भारत में हमेशा भरपूर सब्जी उत्पादन की जरूरत बनी रहती है. यही वजह है कि पिछले 10-12 सालों में सब्जियों के रकबे व उत्पादन में काफी तरक्की हुई है. इस समय देश में सब्जियों का रकबा करीब 9.42 मिलियन हेक्टेयर व उत्पादन करीब 162.38 मिलियन टन है. भारत में सब्जियों की औसत उत्पादकता 17.78 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है, जिस में इजाफे की तमाम उम्मीदें हैं. अगर किसान समय पर उन्नतशील प्रजाति, हाईब्रिड बीज व प्रजातियों की अगेती व पछेती बोआई का ध्यान रख कर समयानुसार बोआई, रोपाई व सिंचाई पर ध्यान दें, तो सब्जी की उत्पादकता को 2 गुना तक बढ़ाया जा सकता है. देश में सब्जियों की व्यावसायिक खेती कर के उत्पादन को बढ़ावा देने की कड़ी में स्वस्थ पौध तैयार करना बहुत खास विषय?है, जिस पर आमतौर पर किसान कम ध्यान देते?हैं. इसी वजह से किसानों को कम आमदनी का सामना करना पड़ता है. पौलीटनल तकनीक से सब्जीपौध उगाने का खास महत्त्व?है. इस तकनीक से पौध तैयार करने में सब्जी के बीजों का जमाव सौ फीसदी होता है और पौधों की बढ़वार सही तरीके से होती है. इस के अलावा कीटों व बीमारियों का असर भी कम होता है.

इस तकनीक की खासीयत है कि विपरीत मौसम जैसे कि ज्यादा बारिश, गरमी व ठंड में भी पौध तैयार करने में सफलता मिल जाती है. पौलीटनल तकनीक से सब्जीपौध तैयार करने पर पौधों में कठोरीकरण के लिए सहायता मिलती है और ऐसे पौधों की रोपाई करने पर उन की मृत्यु दर न के बराबर होती है. सर्वे के मुताबिक इस तकनीक से पौधशाला में सब्जीपौध का औसतन नुकसान 25-30 फीसदी है. साधारण तरीके में यह नुकसान अकसर 60-70 फीसदी तक हो जाता?है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के तमाम सब्जी उत्पादकों के मुताबिक अभी भी 75-80 फीसदी किसान सब्जियों की पौध खुले मौसम व माहौल में उगाते हैं, सब्जी की पौध खुले मौसम व माहौल में उगाने से बीजों का जमाव कम होता?है, जमाव के बाद पौधों की बढ़वार में कमी होती?है और कीटों व बीमारियों का हमला ज्यादा होता है.

पौलीटनल तकनीक क्या है : इस तकनीक से विपरीत मौसम (ज्यादा बारिश, गरमी या सर्दी) में सब्जीपौध तैयार की जाती?है. यह तकनीक टिकाऊ, सस्ती, कारगर व व्यावसायिक है. सब्जीपौध तैयार कर के बेचना आमदनी के लिहाज से अच्छा जरीया है.

पौलीटनल तकनीक की विधि : पौलीटनल बनाने के लिए 2 सूत की लोहे की सरिया या बांस को लेते?हैं, जिन की लंबाई 6 फुट या बेड के मुताबिक होती है. 1 मीटर चौड़े बीज बोने के बेड के दोनों तरफ 6-8 इंच गहराई में लोहे की सरिया या बांस को जमीन के अंदर गाड़ देते?हैं. इस प्रकार सुरंग बन जाती?है. इसी प्रकार हर 4 मीटर की दूरी पर लोहे की सरिया या बांस गाड़ दें, इस के अंदर फूलगोभी, पत्तागोभी, मिर्च, बैगन, टमाटर, शिमला मिर्च, खीरा, लौकी, करेला व तुरई वगैरह की बोआई करने के लिए 1 मीटर चौड़ा बेड (लंबाई जरूरत के मुताबिक) बना लें. 1 हेक्टेयर क्षेत्रफल के लिए 10-12 मीटर लंबाई व 1 मीटर चौड़ाई के 4 बेड काफी हैं.

पौलीटनल में सब्जियों के बीजों की बोआई : पौलीटनल में सब्जियों के बीजों की बोआई करने के लिए बेड की गुड़ाई कर के मिट्टी को भुरभुरी व नमीयुक्त बना लें. 1 मीटर चौड़े व 10 मीटर लंबे पौलीटनल में करीब 1.5 क्विंटल गोबर की सड़ी खाद अच्छी तरह मिट्टी में मिला दें, फिर बेड की सिंचाई करें. इसी क्रम में 4-5 दिनों बाद बेड की गुड़ाई कर के लाइन में बोआई कर देते?हैं. बोआई के लिए 2-3 सेंटीमीटर गहरी लाइन बनाते?हैं, जिसे बाद में मिट्टी से ढक देते हैं. लाइन से लाइन की दूरी करीब 2-3 इंच रखते हैं. अगर नमी कम लगे तो फुहारे से हलकी सिंचाई करें.

पौलीटनल में पौलीथीन का इस्तेमाल : इस के लिए 4 मीटर चौड़े पौलीथीन को जरूरत के मुताबिक लंबाई में खरीद लेते हैं. ध्यान रखें कि पौलीथीन 200 माईक्रोन का ही हो. बोआई के बाद पौलीटनल को रात के वक्त पौलीथीन से ढक देते हैं. यदि दिन का तापमान 25-28 डिगरी सेंटीग्रेड से ज्यादा हो तो दिन में पौलीथीन को हटा देना चाहिए. इस तरीके से 25-28 दिनों में सब्जी की पौध तैयार हो जाती?है.

पौलीटनल में कद्दूवर्गीय सब्जियों की पौध तैयार करना : कद्दूवगीय फसलों जैसे खीरा, करेला, लौकी व तुरई वगैरह की पौध तैयार करने के लिए 5 इंच लंबा व 4 इंच चौड़ा काला पौलीथीन बैग या पानी पीने वाला प्लास्टिक का गिलास लेते?हैं. काले पौलीथीन बैग या प्लास्टिक के गिलास में आधा भाग मिट्टी व आधा भाग सड़ी गोबर की खाद का मिश्रण भरते हैं. इस मिश्रण में फफूंदीनाशक वैविस्टीन या थीरम या कार्बंडाजिम मिला देते?हैं. इस के बाद पौलीथीन बैग या गिलास को तैयार पौलीटनल में रख कर बोआई करते हैं. 1 हेक्टेयर रकबे में करीब 8-10 हजार पौधों की जरूरत होती है.

जनवरी महीने में काफी सर्दी होती है, लिहाजा उस दौरान कद्दूवर्गीय सब्जियों की पौध तैयार करने के लिए पौलीटनल में रखे पौलीथीन में बीजों की बोआई करते?हैं और 15-20 फरवरी तक या मौसम व वातावरण सही न होने तक सफेद पौलीथीन से ढक देते हैं. नमी कम हो तो पौलीथीन बैग में हलकी सिंचाई कर देते हैं. फरवरी महीने के अंतिम पखवाड़े में रोपाई के लिए सही वातावरण व मौसम रहता?है. इस प्रकार से मार्च के अंतिम हफ्ते तक उत्पादन मिलना शुरू हो जाता?है. इस दौरान सब्जी उत्पादन होने से इन सब्जियों से किसानों को उन के उत्पाद का वाजिब दाम लाभकारी आमदनी के रूप में मिल जाता है.

पौलीटनल में कीटों व बीमारियों की रोकथाम

* बीज जमाव के बाद पौधों में आर्द्रगलन बीमारी का खतरा होता?है. इस बीमारी के लक्षण दिखाई देते ही 1 ग्राम कार्बंडाजिम व 1 ग्राम मैंकोजेब का 2 लीटर पानी में घोल बना कर पौधों व उन की जड़ों के नजदीक छिड़काव करें.

* पौध रोपाई से पहले कीटनाशक एमिडाक्लोरप्रिड (0.2 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करना चाहिए. इस से वायरस फैलाने वाले सूक्ष्म कीटों से बचाव होता है. नर्सरी अवस्था में पौधों पर नीम तेल का 5 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करना चाहिए. इस से पौधे महफूज रहते हैं.

* नर्सरी अवस्था में फफूंदीनाशक कापर आक्सीक्लोराइड का 02 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से पौधों पर छिड़काव करने से भी बेहतर नतीजे पाए गए हैं.

पोषण

* सब्जियों की बोआई के 15 दिनों के बाद नाइट्रोजन, फास्फोरस व पोटाश की 2 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी में?घोल बना कर छिड़काव करने से पौधों की बढ़वार व विकास में मदद मिलती है.

* सब्जियों के बीजों की बोआई के 18 दिनों के बाद सूक्ष्म तत्त्वों (कंपाउंड सूक्ष्म तत्त्व) की 4 ग्राम मात्रा का प्रति लीटर पानी में घोल बना कर छिड़काव करने से अच्छे नतीजे मिलते हैं.

* प्याज के पौध तैयार करते समय पत्तियों में पीलापन आने की रोकथाम के लिए 2 ग्राम यूरिया का प्रति लीटर पानी में घोल बना कर 7 दिनों के अंतराल पर 2-3 बार छिड़काव करने से काफी फायदा होता है. इस से पौधों की बढ़वार में मदद मिलती है. 

गुलाबजामुन मीठा और रसीला

अगर आप को रसीली और गरम मिठाई खाने का शौक है तो आप के लिए गुलाबजामुन से बेहतर कोई दूसरी मिठाई नहीं हो सकती है. गुलाबजामुन पंजाबी स्वीट डिश मानी जाती है. चाशनी में डूबा गुलाबजामुन गरमगरम खाने में ही मजा देता है. कोई भी दावत गुलाबजामुन के बिना अधूरी मानी जाती है. अगर आप गरम और ठंडा स्वाद एकसाथ लेना चाहते हैं, तो गुलाबजामुन और वनीला आइसक्रीम को मिला कर खाया जा सकता है.

कैसे बनता है गुलाबजामुन

लखनऊ के गणेश स्वीटहाउस के मालिक मोहित गुप्ता ने बताया, ‘गुलाबजामुन बनाने के लिए खोया, मैदा, चीनी, बेकिंगपाउडर और इलायचीपाउडर का इस्तेमाल किया जाता है. सब से पहले खोए को कद्दूकस कर लें. उस में मैदा, बेकिंगपाउडर और इलायचीपाउडर मिलाएं. इस मिश्रण में थोड़ा कुनकुना दूध डालते हुए आटे की तरह गूंध लें. जब यह खूब चिकना हो जाए तो मनचाहे गोल या लंबे आकार में इसे लोइयों की तरह तैयार कर लें. यह ध्यान रखें कि लोई फटे नहीं. फटी लोई तलने पर उस में दरार बन जाती है. तैयार लोइयों को कपड़े से ढक कर रखें. ‘कड़ाही में जरूरत के मुताबिक तेल डाल कर तैयार लोइयों को तल लें. जब ये ब्राउन कलर की हो जाएं, तो इन को बाहर निकाल लें और साफ कागज पर रख दें. इस के बाद चीनी और पानी बराबर मात्रा में मिला कर चाशनी बनाएं. चाशनी में कुटी इलायची, गुलाबजल और केसर डालने के बाद तले गुलाबजामुन डालें. जब गुलाबजामुनों के अंदर तक रस घुल जाए, तो उन को निकाल कर गरमगरम खाएं व सभी को खिलाएं.’

लुभाता स्वाद

गोपालगंज बिहार की रहने वाली सुप्रिया पांडेय मुंबई में एक्टिंग की दुनिया में नाम कमा रही हैं. वे कहती हैं, ‘मुझे तो गुलाबजामुन वनीला आइक्रीम या फिर ठंडीठंडी मलाई के साथ खाने में मजा देता है. गुलाबजामुन का खयाल आते ही मेरे मुंह में पानी भर जाता है. इसे गरमगरम खाने का मजा अलग ही होता है. मुझे तो हर दावत गुलाबजामुन के बिना अधूरी लगती है.’ दिल्ली, मुंबई व कोलकाता जैसे बड़े शहरों में छोलेभटूरे या राजमाचावल के बाद गरमगरम गुलाबजामुन का स्वाद लेने वाले भी कम नहीं हैं. गुलाबजामुन 350 रुपए प्रति किलोग्राम से ले कर 500 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से छोटीबड़ी दुकानों में बिकता है. वैसे गुलाबजामुन पीस के हिसाब से भी मिलता है. 10 रुपए से 20 रुपए प्रति पीस की दर से गुलाबजामुन का स्वाद लिया जा सकता है. आजकल सड़क किनारे खाने की दुकानों के साथ छोटे आकार के गुलाब जामुन 10 रुपए में 2 पीस की दर से भी मिल जाते हैं. इस तरह हर हैसियत के लोग बिना किसी परेशानी के इस का जायका ले सकते हैं. गुलाबजामुन में भरपूर कैलोरी होती है, इसलिए इसे खाते वक्त अपनी सेहत का खयाल रखना जरूरी है.

गेहूं के बीज की कुछ खास किस्में

कुदरत 8 विश्वनाथ

प्रगतिशील किसान प्रकाश सिंह रघुवंशी द्वारा विकसित की गई गेहूं कुदरत 8 विश्वनाथ बौनी किस्म की नई प्रजाति है. इस प्रजाति के पौधों की ऊंचाई करीब 90 सेंटीमीटर व बाली की लंबाई करीब 20 सेंटीमीटर (9 इंच) की होती है. इस का दाना मोटा व चमकदार होता है. फसल पकने का समय 110 दिन है और इस की पैदावार 25-30 क्विंटल प्रति एकड़ है.

कुदरत 8 विश्वनाथ में मौसम में घटतेबढ़ते तापमान को सहने की कूवत है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, गुजरात व महाराष्ट्र राज्यों के हजारों किसानों ने इस किस्म को परीक्षण के लिए अपने यहां लगाया, जिस से उन्हें जबरदस्त सफलता प्राप्त हुई और वे इस बीज के मुरीद हो गए.

कुदरत विश्वनाथ

कुदरत विश्वनाथ भी एक खास विकसित प्रजाति है. इस प्रजाति की शुरु नवंबर से ले कर 10 जनवरी तक पछेती बोआई कर के भी किसान ज्यादा पैदावार ले सकते?हैं. पिछले साल तेज बारिश, ओलों व तेज हवाओं के प्रकोप में भी यह किस्म खेतों में खड़ी रही थी,क्योंकि इस का तना मोटा व मजबूत होता?है. इस में लंबेचौड़े पत्ते व 9-10 इंच लंबी बालियां होती हैं.प्रकाश सिंह रघुवंशी का कहना?है कि उन्होंने अब तक कृषि क्षेत्र में बीजों की तकरीबन 300 प्रजातियां विकसित की हैं, जिन में गेहूं, धान, अरहर, मूंग व सब्जियों वगैरह की अनेक ऐसी किस्में हैं, जिन का फायदा किसान उठा रहे?हैं. जन कल्याणी मूंग इन की खास विकसित प्रजाति?है. 2 बार राष्ट्रपति से सम्मानित होने वाले प्रकाश सिंह रघुवंशी किसानों के हित में कुछ न कुछ करते रहते हैं. प्रकाश सिंह रघुवंशी ने अभी हाल ही में ‘फार्म एन फूड’ को बताया कि वे पूरे भारत में जगहजगह स्वदेशी बीज बैंक की स्थापना कर रहे हैं और देश के अलगअलग इलाकों में जा कर देशी बीजों से खेती करने के लिए किसानों को मुफ्त में बीज के सैंपल दे रहे?हैं व उन्हें जैविक तरीके से खेती करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं. उन का मकसद यही?है कि किसान देशी बीजों का उत्पादन करें व दूसरे किसानों को भी बीज उत्पादन करना सिखाएं.

कोई भी किसान या संस्था उन के इस बीज बैंक अभियान के तहत जुड़ना चाहे या बीज मंगाना चाहे तो प्रकाश सिंह रघुवंशी के मोबाइल नंबर 09839253974 व 09415643838 पर संपर्क कर सकते हैं. उन के पते पर भी संपर्क कर सकते हैं. उन का पता है : कुदरत कृषि शोध संस्था, टडि़या, जाक्खिनी, जिला वाराणसी, उत्तर प्रदेश, पिन 221305.   

गेहूं की करें अच्छी पैदावार

भारत में गेहूं की पैदावार बड़े पैमाने पर होती है. मौसम बेरहमी से पेश न आए, तो पैदावार किसानों को खुश कर देती है. भारत गेहूं का दूसरा बड़ा उत्पादक देश है. केरल, मणिपुर व नागालैंड राज्यों को छोड़ कर अन्य सभी राज्यों में इस की खेती की जाती है. उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश व पंजाब सर्वाधिक रकबे में गेहूं की पैदावार करने वाले राज्य हैं. वैज्ञानिक तरीकों से गेहूं की फसल की सही देखभाल कर के और बीजों के चयन में सतर्कता अपना कर पैदावार को बढ़ाया जा सकता है और इस की उपज से अधिकतम लाभ लिया जा सकता है. इस के लिए जरूरत इस बात की है कि किसान इस के प्रति जागरूक हों. वैज्ञानिकों की मानें, तो गेहूं की फसल के लिए ऐसी दोमट मिट्टी वाले खेत सही रहते हैं, जहां ज्यादा जलभराव की स्थिति न रहती हो. वैसे पौधों को संतुलित मात्रा की खुराक देने वाली पर्याप्त खाद दी जाए, तो हलकी जमीन से भी अच्छी पैदावार ली जा सकती है.

गेहूं की बोआई से करीब 1 महीने पहले ही प्रति हेक्टेयर के हिसाब से 4 से ले कर 10 टन तक गोबर की खाद या कंपोस्ट खाद खेत में डाल देनी चाहिए. इस में 3 किलोग्राम कैलडर्मा व 10 किलोग्राम कैलबहार भी डालना बेहतर होता है. इस के बाद खेत की जुताई कर के पलेवा कर देना चाहिए. फिर हैरो व टिलर से जुताई कर के पाटा लगा कर खेत को पूरी तरह से समतल कर देना चाहिए. बोआई के वक्त खेत में थोड़ी नमी होना जरूरी है. मिट्टी भुरभुरी होनी चाहिए और खेत में खरपतवार नहीं होने चाहिए.

बीजों का चयन व बोआई

बीजों का चयन जलवायु, बोने के समय व क्षेत्रफल के हिसाब से करना चाहिए. सरकारी उपकेंद्रों व बाजारों में गेहूं के कई तरह की प्रजाति वाले बीज मिलते हैं. सौ फीसदी शुद्ध बीज को उत्तम बीज कहा जाता है. हर सूरत में प्रमाणित बीज का ही किसानों को इस्तेमाल करना चाहिए. इस से बेहतर उत्पादन प्राप्त होता है. आमतौर पर 4 तरह के बीज होते हैं, जो प्रजनन बीज, आधरीय बीज, प्रमाणित बीज व सत्यापित बीज कहलाते हैं. हाइब्रिड बीज भी उपलब्ध होते हैं. गुणों का विकास कर के तैयार किए गए बीजों को हाइब्रिड बीज कहा जाता है.

कृषि वैज्ञानिकों की राय में समय के मुताबिक बीजों की किस्मों का चुनाव किया जाना चाहिए. अलगअलग राज्यों में दर्जनों किस्में होती हैं. सिंचित अगेती खेती का समय 15 अक्तूबर से 25 नवंबर तक माना जाता है. अगेती बोआई के लिए बाजार में जो बीज की किस्में मिलती हैं, उन में एचडी 2329, एचडी 2428, एचडी 2204, पीबीडब्ल्यू 550, एचडी 2733, एचडी 2851, एचडी 2894, सीपीएएन 3004, डब्ल्यू एच 1105, यूपी 2338, डब्ल्यूएच 542, पीबीडब्ल्यू 343 व एचडी 2687 वगैरह शामिल हैं. पछेती बोआई का समय 25 नवंबर से 25 दिसंबर तक माना जाता है. इस के लिए यूपी 2425 व 3338, पीबीडब्ल्यू 373, राज 3765, पीबीडब्ल्यू 226, एचडी 2967, एचडी 2270, डब्ल्यूएच 291, एचडी 2932, पीबीडब्ल्यू 711 वगैरह बीजों की किस्में अच्छी होती हैं.

कृषि वैज्ञानिक दीपक कुमार कहते हैं कि बीजों का चयन महत्त्वपूर्ण कड़ी है. उन की गुणवत्ता पर यदि शक हो, तो सरकारी जांच केंद्रों पर उन की जांच कराई जा सकती है. बीज खरीदते समय किसानों को रसीद भी जरूर हासिल कर लेनी चाहिए. अगेती बोआई के लिए 100 किलोग्राम व पछेती बोआई के लिए 110 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर के हिसाब से लेने चाहिए. अच्छी पैदावार के तरीके के तौर पर बीजों को 5 से 6 सेंटीमीटर नीचे बोया जाना चाहिए और लाइन से लाइन की दूरी 23 सेंटीमीटर व बीज से बीज की दूरी 18 सेंटीमीटर होनी चाहिए. हल या ट्रैक्टर चालित मशीन के जरीए बोआई करने के बाद बीजों को ढक देना चाहिए. कई बार किसान छिड़काव, हल के पीछे कूंड़ों में, डिबलर द्वारा, उभरी हुई क्यारी विधि व अन्य विधियों के जरीए भी बीज बोते हैं. वैज्ञानिक छिड़काव के तरीके को अच्छा नहीं मानते. इस से आधे से ज्यादा बीज बेकार हो जाते हैं.

बीजशोधन

बेहतर फसल के लिए बीजों को शोधित कर के बोआई करनी चाहिए. 2.5 ग्राम थीरम या 2.5 ग्राम कार्बंडाजिम या 5 ग्राम ट्राईकोडरमा स्पोर से प्रति किलोग्राम बीज को शोधित करना चाहिए. शोधन से जोरदार जमाव होता है और तमाम रोगों से बचाव होता है. इस के जरीए मिट्टी से पैदा होने वाली बीमारियां भी कम हो जाती हैं.

जैविक उर्वरक का इस्तेमाल

किसानों को जैविक उर्वरक ही इस्तेमाल करने चाहिए. कैलजोटो (एजोटोबैक्टर या एजोस्पेलियम) आधा लीटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल किया जाना चाहिए. यह नाइट्रोजन की पूर्ति करता है. कैलफोरस (पीएसबी कल्चर) जोकि फास्फोरस की पूर्ति करता है, उसे 1 लीटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करें. पोटाश की पूर्ति के लिए कैल्टास (फ्रेट्यूरिमा ओरेंसिया) आधा लीटर प्रति हेक्टेयर के हिसाब से इस्तेमाल करना चाहिए. यदि रासायनिक उर्वरक का इस्तेमाल सीडड्रिल मशीन द्वारा किया जाता है, तो उस में 80 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम पोटाश व 40 किलोग्राम फास्फोरस प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बोआई के साथ ही डाल देना चाहिए. यूरिया को 2 भागों में बांट लेना चाहिए. इस में से 1 भाग दूसरी सिंचाई से पहले व दूसरा भाग चौथी सिंचाई से पहले देना चाहिए. यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि जैविक या रासायनिक उर्वरकों में से किसी एक का ही इस्तेमाल करना चाहिए, वरना फसल को नुकसान हो सकता है.

सिंचाई व खरपतवार

गेहूं की फसल को 6 बार सिंचाई की जरूरत होती है. पहली सिंचाई मुख्य जड़ निकलने के बाद के बाद, दूसरी सिंचाई गेहूं के कल्ले निकलने पर, तीसरी सिंचाई गेहूं में गांठ बनने पर, चौथी सिंचाई बालियां निकलते समय, पांचवी सिंचाई दानों में दूध पड़ने पर व छठी सिंचाई दानों में आटा बनने पर की जानी चाहिए. जब गेहूं की बालियां आनी शुरू हों, तो सिंचाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए. ऐसे में यदि खेत में नमी की कमी रह गई, तो बालियां परिपक्व नहीं हो सकेंगी और पैदावार गड़बड़ा सकती है. सिंचाई करते समय यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उस वक्त हवा ज्यादा तेज न हो, वरना फसल गिरने का डर रहता है. जहां भूमि रेतीली हो वहां सिंचाई ज्यादा करनी पड़ सकती है. फसल की सिंचाई भूमि के प्रकार और बारिश पर भी निर्भर करती है. गेहूं में आमतौर पर 2 प्रकार के खरपतवार (पतली व चौड़ी पत्ती वाले) पाए जाते हैं. उन्हें खुरपी की सहायता से गेहूं के पौधों को नुकसान पहुंचाए बिना निकाल देना चाहिए. खरपतवार रोकने का रासायनिक तरीका भी अपनाया जा सकता है. इस के लिए सल्फ्यूसल्फोरान जैसे रसायन व पाउडर आते हैं. उन्हें बताई गई विधि व मात्रा के मुताबिक घोल कर छिड़कावकर देना चाहिए.

गेहूं के रोग :

पहचान व इलाज

गेहूं की फसल कई प्रकार के रोगों का शिकार हो जाती है. इन में अनावृत्त कंडुआ, इयर काकल, करनाल बंट, गुजिया (बीविल), पत्ती धब्बा रोग, दीमक व स्मट वगैरह शामिल हैं.

अनावृत्त कंडुआ : इस रोग में बालियों में दानों के स्थान पर काला चूर्ण बन जाता है. इस रोग के जीवाणु हवा के जरीए तेजी से फैलते हैं और स्वस्थ बालियां भी संक्त्रमण का शिकार हो जाती हैं. इस की रोकथाम के लिए बायोपेस्टीसाइड, ट्राइकोडरमा 2.5 ग्राम प्रति हेक्टेयर व 60 से 70 किलोग्राम सड़ी हुई गोबर की खाद को मिला कर हलके पानी का छींटा मार कर 8-10 दिनों तक छाया में रखने के बाद बोआई से पहले भूमि में मिला कर भूमिशोधन करना चाहिए. रसायनों के जरीए भी इस पर नियंत्रण पाया जा सकता है.

इयर काकल : इस रोग से पौधे बौने रह जाते हैं और उन में स्वस्थ पौधों की अपेक्षा अधिक पत्ताफूट होती है. रोगग्रस्त बालियां छोटी व फैली हुई होती हैं. उन में अनाज की जगह भूरे व काले रंग की गांठें बन जाती हैं, जिन में सूत्रकृमि पाए जाते हैं, इस रोग के इलाज के लिए कार्बोफुरान 3 जी का 10-15 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से बुरकाव करना चाहिए. दूसरे तरीके के तौर पर नमक के पानी में बीजों को बोने से पहले डुबोने के बाद सुखा कर इस्तेमाल में लाना चाहिए.

करनाल बंट : इस रोग में दाने काले चूर्ण में बदल जाते हैं. यह रोग भूमि के कारण फैलता है. इस रोग से बचाव के लिए बीजशोधन करने के अलावा खड़ी फसल में प्रोपिकोनाजोल 25 ईसी की 500 मिलीलीटर मात्रा को 750 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

गुजिया (बीविल) : यह एक प्रकार का कीट होता है. इस का रंग भूरा व मटमैला होता है, जो सूखी जमीन की दरारों में रहता है. यह कीट उग रहे पौधें को जमीन की सतह से काट कर उन्हें नुकसान पहुंचाता है. इस से बचाव के लिए बोआई से पहले खेत की गहरी जुताई करनी चाहिए. पिछली फसलों के अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए. खड़ी फसल में सिंचाई के पानी के साथ इमिडाक्लोरप्रिड 17.8 एमएल 350 मिलीलीटर या क्लोरोपाइरीफास 20 ईसी की 2.5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करनी चाहिए.

पत्तीधब्बा रोग : इस रोग की शुरुआती अवस्था में पीले व भूरापन लिए हुए अंडाकार धब्बे नीचे की पत्तियों पर दिखाई देते हैं. बाद में ध्ब्बों का किनारा कत्थई रंग का और बीच का भाग हलके भूरे रंग का हो जाता है. इस रोग के इलाज के लिए मैंकोजेब 75 डब्ल्यूपी की 2.0 किलोग्राम मात्रा 750 लीटर पानी में घोल कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव करना चाहिए.

दीमक : दीमक सफेदमटमैले रंग का कीट है, जो कालोनी बना कर रहते हैं. इस के श्रमिक कीट पंखहीन, छोटे व पीलेसफेद रंग के होते हैं. बलुई दोमट मिट्टी में सूखे की हालत में दीमक के प्रकोप की संभावना रहती है. श्रमिक कीट जम रहे बीजों व पौधों की जड़ों को खा कर नुकसान पहुंचाते हैं. प्रभावित पौधे अनियमित आकार में कुतरे हुए दिखाई देते हैं. इस की रोकथाम के लिए खेत में कच्चे गोबर का प्रयोग नहीं करना चाहिए. फसलों के अवशेषों को नष्ट कर देना चाहिए. नीम की खली 10 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले खेत में मिलाने से दीमक के प्रकोप में कमी आ जाती है. खड़ी फसल को दीमक के प्रकोप से बचाने के लिए इमिडाक्लोप्रिड 17.8 एमएल की 750 मिलीलीटर मात्रा या क्लोरपाइरीफास 20 ईसी की 2.5 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करनी चाहिए.    

गेहूं का शुद्ध बीज तैयार करने की विधि

गेहूं की अच्छी व अधिक पैदावार लेने के लिए शुद्ध बीज का होना जरूरी है. लेकिन किसानों को हर साल शुद्ध बीज प्राप्त करने के लिए बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. उन को या तो शुद्ध बीज प्राप्त नहीं होता या इस के लिए ज्यादा पैसा व समय खर्च करना पड़ता है. इन परेशानियों से बचने के लिए किसान एक बार किसी प्रमाणित संस्था जैसे कृषि विश्वविद्यालय, राज्य बीज विकास निगम व राष्ट्रीय बीज निगम से शुद्ध बीज ला कर अपने खेत में बिजाई कर के उसी से शुद्ध बीज तैयार कर के उस की शुद्धता को कई साल तक कायम रख सकते हैं. शुद्ध बीज कम से कम 98 फीसदी साफसुथरा होना चाहिए यानी इस में कचरा 2 फीसदी, खरपतवार 0.10 फीसदी व अन्य फसलों के बीज  0.10 फीसदी से ज्यादा नहीं होने चाहिए. इस बीज की जमाव शक्ति कम से कम 85 फीसदी और बीज में नमी 10-12 फीसदी तक होनी चाहिए.

गेहूं का शुद्ध बीज तैयार करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

खेत का चुनाव : शुद्ध बीज तैयार करने के लिए किसान ऐसा खेत चुनें, जिस की जमीन उपजाऊ हो और सिंचाई की सुविधाएं ठीक हों. साथ ही इस खेत में दूसरी फसलों के पौधे व खरपतवार नहीं होने चाहिए.

बीजों का उपचार : बीज यदि पहले से उपचारित नहीं हैं, तो उन में 2 ग्राम वीटावैक्स या बावस्टिन प्रति किलोग्राम बीज की दर से मिलाएं ताकि खुली कांगमारी नामक बीमारी की रोकथाम हो सके. खुली कांगमारी, ध्वजपत्ता कांगमारी व करनाल बंट से बचाव के लिए 1 ग्राम रैक्सिल प्रति किलोग्राम बीज की दर से ले कर बीज उपचारित करें.

बीजाई का तरीका : शुद्ध बीज तैयार करने के लिए इस की बीजाई समय पर कतारों में करनी चाहिए, जिस से अन्य किस्म के पौधों को निकालने में आसानी रहे. यदि मुमकिन हो सके, तो खेत के बीचोंबीच में 1 या 2 रास्ते भी छोड़ दें, तो बेहतर रहेगा. खेत में खाद व पानी किस्म के अनुसार दें. ध्यान रखें कि फसल गिरने न पाए.

फसल की छंटाई : शुद्ध बीज तैयार करने के लिए फसल की छंटाई का काम बेहद अहम है. शुद्ध बीज वाली फसल में अगर कोई अन्य किस्म का पौधा या खरपतवार हो तो उसे निकाल देना चाहिए. खुली कांगमारी से प्रभावित पौधों को पौलीथीन के थैले में ढक कर सावधानीपूर्वक निकाल कर खेत से दूर मिट्टी में दबा देना चाहिए ताकि बीमारी के कण खेत में न बिखरें. कुछ खरपतवार जैसे जई व हिरनखुरी वगैरह फसल के अंत तक आते रहते हैं, इन को निकालना बेहद जरूरी होता है.

कटाई व मड़ाई : जो खेत शुद्ध बीज तैयार करने के लिए चुना गया है, अगर उस के आसपास गेहूं की अन्य किस्मों की बीजाई नहीं की गई है, तो सारे खेत को काट लेना चाहिए. लेकिन यदि खेत के किसी तरफ भी गेहूं की अन्य किस्म की बिजाई की गई हो, तो खेत के उस ओर 3 मीटर चौड़ी पट्टी फसल काट कर अलग से साफ कर लेनी चाहिए.

बीजों का भंडारण : बीजों को छान लें ताकि खरपतवार के बीज व छोटे सिकुड़े हुए दाने निकल जाएं. मोटे दानों में भी यदि कोई दाना अन्य प्रकार का दिखाई दे तो उसे भी निकाल देना चाहिए. इन साफ व शुद्ध बीजों को सुखा कर लोहे की टंकी वगैरह में भर कर अलग से रखें. कीड़ों से बीजों के बचाव के लिए सल्फास का इस्तेमाल करना चाहिए. यदि ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखा जाए, तो किसान हर साल खुद ही शुद्ध बीज तैयार कर सकते हैं और शुद्ध बीज प्राप्त करने में होने वाली कठिनाइयों से बच सकते हैं. 

गेहूं के परजीवी निमेटोड की पहचान व इलाज

भारत की प्रमुख फसल गेहूं पूरे देश में उगाई जाती है. भारत में साल 2010-11 में 87.7 मिलियन टन गेहूं उत्पादन हुआ. गेहूं में कीटों, सूत्रकृमियों व रोग के कारण 5-10 फीसदी उपज की हानि होती है और दानों व बीजों की गुणवत्ता भी खराब होती है. गेहूं की फसल में 80 से ज्यादा नेमेटोड की प्रजातियां होती हैं. सूत्रकृमि या निमेटोड बहुत छोटे आकार के सांप जैसे जीव होते?हैं, जिन्हें नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता. ये माइक्रोस्कोप से ही दिखाई देते हैं. ये अधिकतर मिट्टी में रह कर पौधों को नुकसान पहुंचाते हैं. इन के मुंह में एक सुईनुमा अंग स्टाइलेट होता?है. इस की सहायता से ये पौधों की जड़ों का रस चूसते हैं, जिस के कारण पौधे भूमि से खादपानी पूरी मात्रा में नहीं ले पाते. इस से इन की बढ़वार रुक जाती है और पैदावार में भारी गिरावट आ जाती है. बीज गाल (पिटिका) निमेटोड (एंगुनिया ट्रिटीसाई) : इस निमेटोड की मादा 6 से 12 दिनों के अंदर 1000 अंडे नए गाल (पिटिका) के अंदर देती है. जब फसल पकने वाली होती है, तो पिटिका भूरे रंग की हो जाती?है. दूसरी अवस्था वाले लार्वे पिटिका में भर जाते हैं. दूसरी अवस्था के लार्वे 28 साल पुरानी बीज पिटिका में जीवित अवस्था में पाए गए हैं. फसल की कटाई के समय स्वस्थ बीज के साथ पिटिका से ग्रसित बीज भी इकट्ठा कर लिए जाते हैं.

जब अगले साल की फसल की बोआई की जाती है, तो अगला जीवनचक्र फिर शुरू हो जाता है. 1 बीज पिटिका में तकरीबन 3 हजार से 12 हजार दूसरी अवस्था वाले लार्वे पाए गए हैं. जब ये लार्वे नमी वाली भूमि के संपर्क में आते हैं, तो नमी सोखने के कारण मुलायम हो जाते हैं. ये पिटिका को फाड़ कर बाहर निकल आते हैं. लार्वे की दूसरी अवस्था हानिकारक होती?हैं. इस अवस्था के लार्वे भूमि से 10 से 15 दिनों में बाहर आ जाते हैं और बीज के जमने के समय हमला कर देते हैं. लार्वे बीज के जमने वाले भाग से ऊपर पौधे के चारों ओर बढ़ने वाले क्षेत्र में और पत्ती की सतह में पानी की पतली परत के सहारे ऊपर चढ़ जाते हैं. ये पत्ती के बढ़ने वाले भाग से पत्ती की चोटी पर चढ़ जाते हैं. पौधे की बढ़वार अवस्था में फूल के बीज बनने वाले स्थान पर निमेटोड हमला करते?हैं और लार्वे फूल के अंदर चले जाते हैं. इस अवस्था में निमेटोड बीज बनने वाले भाग में रहते हैं और संख्या बढ़ने के कारण फूल पिटिका में बदल जाते?हैं. लार्वे 3 से 5 दिनों में फूलों पर आक्रमण कर के नर व मादा में परिवर्तित हो जाते?हैं. बहुत से नर व मादा हरी पिटिका में मौजू रहते हैं.

नुकसान के लक्षण

निमेटोड से ग्रसित नए पौधे का नीचे का भाग हलका सा फूल जाता?है. इस के अलावा बीज के जमाव के 20-25 दिनों बाद नए पौधे के तने पर निकली पत्ती चोटी पर से मुड़ जाती है. रोग ग्रसित नए पौधे की बढ़वार रुक जाती है और अकसर पौधा मर जाता है. रोग ग्रसित पौधा सामान्य दिखाई देता?है. उस में बालियां 30-40 दिनों पहले निकल आती?हैं. बालियां छोटी व हरी होती हैं, जो लंबे समय तक सामान्य बाली के मुकाबले हरी रहती?हैं. बीज पिटिका में बदल जाते हैं. इस रोग का मुख्य लक्षण यह है कि बीज गाल यानी पिटिका में बदल जाते?हैं. गाल (पिटिका) छोटा व गहरा होता है, जो स्वस्थ बीज के मुकाबले भूरा और अनियमित आकार का हो जाता है. गाल (पिटिका) के आकार के अनुसार 1 गाल में 800 से 3500 की संख्या में लार्वे पाए जाते हैं. इस निमेटोड के कारण पीली बाल या टुंडा रोग हो जाता है. निमेटोड बीजाणु फैलाने का काम करते हैं. इस रोग के कारण नए पौधों की पत्तियों व बालियों पर हलका पीला सा पदार्थ जमा हो जाता है. रोग ग्रसित पौधों से बालियां ठीक से नहीं निकल पातीं और न ही उन में दाने बनते हैं.

रोकथाम

बीज की सफाई : टुंडा रोग या बाल गांठ रोग या निमेटोड रहित बीज लेने चाहिए. बीजों को छन्नी से छान कर पानी में 20 फीसदी के बराइन घोल में डाल कर तैरते हुए बीज अलग कर लेने चाहिए.

गरम पानी से उपचारित करना : बीजों को 4 से 6 घंटे तक?ठंडे पानी में भिगोना चाहिए. इस के बाद 54 डिगरी सेंटीग्रेड गरम पानी में 10 मिनट तक उपचारित करना चाहिए.

फसल हेरफेर कर बोना : निमेटोड को खेत से बाहर करने के लिए प्रभावित फसल की 2 या 3 सालों तक बोआई नहीं करनी चाहिए.

रोगरोधी किस्म : निमेटोड अवरोधी प्रजातियां ही खेत में बोनी चाहिए.

संक्रमित पौधे निकालना : निमेटोड से संक्रमित पौधे पता लगा कर अगेती अवस्था में ही नष्ट कर देने चाहिए.

सूप से फटकना या हवा में उड़ाना : यह विधि भी सहायक गाल को बाहर करने के लिए कारगर है, पर इस विधि से गाल (पिटिका) पूरी तरह से बाहर नहीं होते?हैं.

सिस्ट गांठ निमेटोड (हेटरोडेरा एविनी) : गांठ निमेटोड नीबू के आकार की गांठ के अंदर अंडे देता है, जो कई सालों तक जीवित रहते?हैं. ये गांठ से अलग हो कर भूमि में निकल आते?हैं. मार्चअप्रैल और अक्तूबरनवंबर तक गांठ में करीब 400 अंडे रहते हैं. इस समय अंडों में दूसरी अवस्था के लार्वे बेकार अवस्था में रहते हैं. फसल की अगली बोआई के समय नवंबर से जनवरी के दौरान रोग ग्रसित लार्वे गांठ से निकलने शुरू हो जाते हैं. एक सीजन में 50 फीसदी अंडे फूट जाते?हैं और बाकी अगले सीजन तक महफूज रहते हैं. जब फसल 4 से 5 सप्ताह पुरानी व ताप 16 से 18 डिगरी सेंटीग्रेड हो जाता है, तब दूसरी अवस्था के लार्वे जड़ की चोटी से घुसते हैं. शरीर विकसित होने में 4 हफ्ते लगते हैं. भोजन लेने के बाद दूसरी अवस्था चौड़ाई में बढ़ती है. मादा नीबू का आकार लेती है और सफेद रंग की होती है.

जड़ में घुसने के 4-5 हफ्ते बाद लार्वों को जड़ से बाहर निकलते देखा जा सकता?है. मादा तभी मर जाती है. उस के शरीर का कठोर व गांठ से भरा अवशेष अगले सीजन को संक्रमित करने के काम आता?है. नर वयस्क गोलाकार केंचुए जैसा होता?है. नर का विकास लार्वे में होता है. लार्वे वयस्क में बदलते?हैं. इन का जीवनचक्र 9 से 14 हफ्ते में पूरा होता?है और साल में 1 पीढ़ी पाई जाती?है. यह निमेटोड गेहूं और जौ में मोल्या रोग फैलाता है.

नुकसान के लक्षण

इस निमेटोड के लक्षण शुरू में खेत में टुकड़ों में दिखाई देते?हैं, जो 3-4 सालों में पूरे खेत में फैल जाते हैं. इस के शुरुआती लक्षण फसल के जमाव के समय दिखने लगते हैं. इस की वजह से पौधों की जमीन से पोषक तत्त्वों को लेने की कूवत कम हो जाती है और जड़ों में गांठें बन जाती हैं. इस के अलावा पौधों की बढ़वार रुक जाती?है और रोगग्रस्त पौधे हरेपीले रंग के दिखाई देते हैं. ऐसे रोगग्रसित पौधों की बालियों में बहुत कम दाने बनते?हैं. पौधों के आधार पर मूसला जड़ें विकसित हो जाती हैं. जड़ों पर फरवरी के मध्य में निमेटोड का आक्रमण दिखाई पड़ता?है. रेशे वाली जड़ें भूमि से आसानी खींची जा सकती हैं. इस के प्रकोप से रेतीली मिट्टी में 45 से 48 फीसदी नुकसान होता?है.

रोकथाम

कृषि क्रियाएं विधि : गांठ निमेटोड अवरोधी और सूखा न सहने वाला?है. फसलचक्र व गरमी की जुताई से इस की रोकथाम की जा सकती है.

पोशक अवरोधी फसलें जैसे सरसों, चना, कारिंडर, गाजर व फ्रैंचबीन वगैरह से इस की रोकथाम कर सकते हैं.

मईजून महीनों में 2-3 बार गरमी की जुताई करने पर निमेटोड की संख्या कम की जा सकती है. गरमी के महीनों में गांठें कम हो जाती हैं. गेहूं की अगेती बोआई करने पर नुकसान को कम किया जा सकता?है.

अवरोधी प्रजातियां : भारत में गेहूं की निमेटोड अवरोधी प्रजातियां सीसीएनआरवी 1 व राज एमआर 1 उगाई जाती हैं.

जौ की अवरोधी प्रजातियां राज किरन, आरडी 2035, आरडी 2052 और सी 164 संक्रमित क्षेत्र में उगाई जाती हैं. इन प्रजातियों में मादा के अंडे देने में असफल होने के कारण निमेटोड की तादाद कम हो जाती है.

रसायनिक विधि : खेत में कार्बोफुरान 3 फीसदी 65 किलोग्राम या फोरेट 10 जी 25 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से डालने से निमेटोड पर काबू पाया जा सकता है.

एकीकृत इलाज : मईजून के महीनों में गरमी की जुताई कर के और अवरोधी फसलों जैसे चना व सरसों की बोआई कर के निमेटोड की तादाद कम करने में सफलता पाई जा सकती है.

कुछ कहती हैं तसवीरें

खेतों में खुशहाली : धान और गन्ने की फसलें कटनी शुरु हो गई हैं और राहत की बात है कि कई जगह इन की फसलें खूब अच्छी हुई हैं. यही वजह है कि किसान और उन के परिवारों के लिए यह पर्व मनाने का मौका है और वे मस्ती में बौराए अपने खेतों में नाचगा रहे हैं. तो आप भी झूमिए देश के अन्नदाताओं के साथ.

फसल को कीटों से बचाएं नए तरीके अपनाएं

आजकल फसल की सुरक्षा को ले कर किसान परेशान हैं, क्योंकि बाजार में मौजूद तमाम कीटनाशक फसल को कीड़ों से बचाने में नाकाम हो रहे हैं. इस का ताजा उदाहरण देश भर में बीटी काटन (नरमा) की तबाही है. किसानों की नरमा फसल बरबाद हो चुकी है. इस में इस्तेमाल किए गए कीटनाशक बेअसर रहे हैं. बीटी काटन बीज की खासीयत होती है कि इस में कीट नहीं लगते हैं और यह सामान्य कपास की फसल से ढाई गुना अधिक पैदावार देती है. लेकिन बीज बनाने वाली विदेशी कंपनियों के सारे दावे धरे रह गए. सफेद मक्खी ने कपास पर जम कर कहर बरपाया और किसानों को लाखों रुपए का नुकसान झेलना पड़ा. सफेद मक्खी का खरीफ की फसलों पर सब से ज्यादा हमला होता है. यह मक्खी कपास की सब से बड़ी दुश्मन होती है. यह बरसात के मौसम में सब से ज्यादा पनपती है. कपास के हर पत्ते पर 30 से ज्यादा मक्खियां बैठती हैं. हर मक्खी 100 से ज्यादा अंडे देती है. इस मक्खी का चक्र 30 से 35 दिनों का होता है. इस साल सफेद मक्खी ने करीब 4200 करोड़ रुपए की कपास की फसल को बरबाद किया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों से मन की बात करते हैं, लेकिन किसानों के मन की बात सुनने वाला कोई नहीं है. हरियाणा, पंजाब और महाराष्ट्र देश के ऐसे राज्य हैं, जहां कपास की बंपर पैदावार होती है, लेकिन इस साल सफेद मक्खी के प्रकोप से कपास की फसल बरबाद हो गई है. किसानों की हालत बदतर हो रही है. हालांकि इस बारे में प्रदेश सरकारों का कहना है कि किसानों को उन के हुए नुकसान की भरपाई मुआवजा दे कर की जा रही है. सरकार का किसानों को मुआवजा देने का मापदंड और तरीका क्या है, यह किसी से छिपा नहीं है. पिछले दिनों गेहूं की फसल में हुए नुकसान की भरपाई के लिए सरकार ने 50-50 रुपए तक के चेक किसानों को दिए थे, जिस पर देश भर में खूब होहल्ला हुआ था. जिन किसानों को मुआवजे की रकम कुछ ठीकठाक मिली भी, तो उन्हें दलालों व पटवारियों को चढ़ावा भी चढ़ाना पड़ा था. यह एक कड़वी हकीकत है, इसलिए किसानों को सरकार का मुंह न ताक कर खुद पर भरोसा करना होगा और प्रगतिशील बनना होगा.

लगाएं फसल रक्षक फसलें

फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों से बचाने के लिए किसान फसल रक्षक फसलें उगा सकते हैं, जो एक खास समय के दौरान कीटों को अपनी ओर खींच कर खास फसल को अनेक कीटों से बचाती हैं. इन फसलों को मुख्य फसल के बीचबीच में कहींकहीं लाइनों में लगाया जाता है या मुख्य फसल के चारों ओर बाड़ की तरह लगाया जाता है.

ऐसी फसल का फायदा

ऐसी फसलें किसान की मुख्य फसल की गुणवत्ता व पैदावार को बनाए रखती हैं और साथ ही मिट्टी के स्वास्थ्य और आबोहवा को भी ठीक रखती हैं. ये फसलें मित्र कीटों को आकर्षित करती हैं और हानिकारक कीटों के प्रकोप से मुख्य फसल को सुरक्षा देती हैं, जिस से मुख्य फसल को फायदा मिलता है. ऐसी फसलें लगाने पर किसानों को कीटनाशकों का इस्तेमाल कम ही करना पड़ता है. कीट आकर्षित करने वाली पारंपरिक फसलें : ऐसी रक्षक फसलों को मुख्य फसल के आगे लगाया जाता है, जिस से रक्षक फसलें मुख्य फसल के मुकाबले ज्यादा कीटों को भोजन व अंडे देने के लिए आकर्षित करती हैं. गतिरोधी फसलें : इस प्रकार की रक्षक फसलें कीटों को अपनी ओर खींचने वाली होती हैं. लेकिन इन का फायदा ज्यादा लंबे समय तक नहीं रहता है.

आनुवंशिक परिवर्तित फसलें : इस तरह की रक्षक फसलें आनुवंशिक रूप से परिवर्तित रहती हैं, जो फसल को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों को आकर्षित करती हैं.

बाड़ वाली फसलें : ऐसीरक्षक फसलों को मुख्य फसल के चारों ओर बाड़ के रूप में लगाया जाता है, जैसे कपास के चारों ओर भिंडी की बाड़ लगा सकते हैं. इस में कपास मुख्य फसल और भिंडी रक्षक फसल है.

अनेक फसलें : इस के तहत रक्षक फसलों की विभिन्न प्रजातियों को कीटों को अपनी ओर खींचने के लिए मुख्य फसल के साथ लगाया जाता है. 

कीट आकर्षित करने वाली रक्षक फसलों को लगाने का तरीका :

* गोभी की फसल में कीट रोकथाम के लिए गोभी फसल की 25 लाइनों के बाद 2 लाइनों में सरसों लगाई जाती है.

* कपास की इल्ली/सफेद मक्खी की रोकथाम के लिए लोबिया को कपास की 5 कतारों के बाद 1 कतार में लगाया जाता है या तंबाकू को कपास की 20 कतारों के बाद 2 कतारों में लगाया जाता है.

* टमाटर की फसल को फल छेदक/निमेटोड से बचाने के लिए अफ्रीकन गेंदे को टमाटर की 14 लाइनों के बाद 2 लाइन में लगाएं.

* बैगन में तनाछेदक व फलछेदक की रोकथाम के लिए धनिया या मेथी को बैगन की 2 लाइनों के बाद 1 लाइन में लगाया जाता है.

* चने में इल्ली की रोकथाम के लिए धनिया या गेंदे को चने की 4 लाइनों के बाद 1 लाइन में लगाया जाता है.

* अरहर में इल्ली की रोकथाम के लिए गेंदे को अरहर के चारों तरफ बार्डर के रूप में लगाया जाता है.

* सोयाबीन में तंबाकू की इल्ली की रोकथाम के लिए सूरजमुखी या अरंडी को सोयाबीन के चारों तरफ बार्डर के रूप में लगाया जाता है.

किसानों को फसल में हानि पहुंचाने वाले कीटों की पहचान होनी चाहिए और फसल की नियमित रूप से देखभाल करनी चाहिए. अगर फसलरक्षक फसल लगाने के बाद भी मुख्य फसल में कीटों का प्रकोप बढ़ने की संभावना हो तो कीटनाशी का छिड़काव भी करना चाहिए साथ ही नजदीकी कृषि माहिरों से सलाह लेनी चाहिए

जागरूक रहें

* किसान अपनी फसल में 10-15 दिनों के अंतराल पर मुनासिब कीटनाशक का छिड़काव करें, लेकिन कई कीटनाशक मिला कर न छिड़कें.

* फसल की ऊपरी सतह तक ही छिड़काव न करें, बल्कि नीचे पौधों की जड़ों तक सही तरीके से छिड़काव करें.

*  कीटनाशक छिड़कते समय पूरे बदन के कपड़े पहनें और मुंह पर कपड़ा या मास्क लगा कर छिड़काव करें.

इस बारे में ज्यादा जानकारी के लिए किसान काल सेंटर के टोल फ्री नंबर 18001801551 पर पूछताछ कर सकते हैं. इस नंबर पर लैंडलाइन व मोबाइल फोन से सुबह 6 बजे से ले कर रात 10 बजे तक जानकारी ले सकते हैं. देश भर में अलगअलग भाषाओं में 25 स्थानों पर किसान काल सेंटर बनाए गए हैं.

ऐसे करें मवेशियों का शुरुआती इलाज

मवेशी अपने पालकों को अच्छाखासा मुनाफा कराते हैं, इसलिए हर मवेशीपालक को अपने मवेशियों का खास ध्यान रखने की जरूरत है. अकसर मवेशी बीमार पड़ जाते हैं या चोट के शिकार हो जाते हैं या कभी जहरीला पौधा वगैरह खा कर बीमार पड़ जाते हैं. बीमार मवेशी को डाक्टर के यहां ले जाने से पहले अगर उस का शुरुआती इलाज कर दिया जाए तो मवेशी की बीमारी ज्यादा नहीं बढ़ती और इलाज का खर्च बहुत कम हो सकता है. अकसर लू लगने, जहरीला पौधा खा लेने  या खून के ज्यादा बह जाने से मवेशी की मौत हो जाती है और मवेशीपालकों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है. इस से मवेशीपालकों की आमदनी भी बंद हो जाती है. इन परेशानियों से बचने के लिए मवेशीपालकों को मवेशियों के शुरुआती इलाज  की जानकारी होना बेहद जरूरी है.

सभी मवेशीपालकों को अपने पास रुई, फिटकरी, बांस की खपच्ची, टिंचर वैंजोइन, एंटीसेप्टिक क्रीम, नया ब्लेड, कारबोलिक एसिड, मैगनीशियम सल्फेट, जमालगोटा, जौ का आटा, तारपीन का तेल, कपूर, मांड, खडि़या, अरंडी का तेल, सेवलान या डिटाल व बोरिक एसिड वगैरह जरूर रखना चाहिए. ये सारी चीजें मवेशियों के इलाज में काम आती हैं. इस के अलावा मवेशीपालकों को अपने पास पशु अस्पताल व नजदीक के वेटनरी डाक्टर के फोन नंबर जरूर रखने चाहिए, ताकि मवेशी के बीमार पड़ने पर तुरंत ही डाक्टर से संपर्क किया जा सके. वेटनरी डाक्टर कौशल किशोर प्रसाद बताते हैं कि जैसे ही यह महसूस हो कि कोई मवेशी बीमार है, तो तुरंत ही उसे बाकी मवेशियों से दूर हटा कर बांध देना चाहिए. बीमार पशु को हवादार, साफ और शांत जगह पर ही रखना चाहिए. पशुओं के बेचैन होने, खानापीना छोड़ देने या कम कर देने, दूध में कमी होने या उस का रंग बदलने, मल और मूत्र के रंग में बदलाव होने, नथुने सूख जाने, लगातार रंभाने या चाल में बदलाव होने पर मवेशीपालकों को ध्यान रखना चाहिए और तुरंत ही उस का शुरुआती इलाज शुरू कर देना चाहिए. इस के बाद डाक्टर से जांच करा लेनी चाहिए.

जब लू या ठंड लगे : गरमी में लू और जाड़े में ठंड लगने से मवेशियों का बीमार पड़ना आम बात है. गरमियों में लू लगने पर मवेशी को ठंडी जगह में रख कर उस के शरीर पर ठंडा पानी डालें और ठंडे पानी में चीनी, भूना जौ का आटा और नमक मिला कर बारबार पिलाएं. पुदीना और?प्याज का अर्क देने से भी पशु को आराम मिलता है. जाड़े के मौसम  में ठंड लगने पर पशु की नाक और आंख से पानी बहता है और वह कांपने लगता है. ऐसी हालत में कुनकुने पानी में गुड़ मिला कर देने  बीमार मवेशी को राहत मिलती है. अजवायन, सेंधा नमक व अदरक की बराबर मात्रा गुड़ में मिला कर खिलाने से भी पशु को आराम मिलता है. तारपीन या सरसों के तेल में कपूर मिला कर रोगी मवेशी की मालिश करने से उसे राहत मिलती है. जब गले में कुछ अटक जाए : अकसर ऐसा होता है कि बड़े आकार का फल, नारियल, आलू या पौलीथीन निगल लेने से वह मवेशी के खाने की नली में अटक जाता है. ऐसी हालत में मवेशी के मुंह से लार बहने लगती है और गले में अटकी चीज को निगलने की कोशिश में वह छटपटाने लगता है. पानी पिलाने पर पानी नाक से बाहर बहने लगता है. ऐसे में मवेशी के गले पर हाथ फेर कर पता किया जा सकता है कि कहां पर रुकावट है. पता चलने पर उसे दबाव दे कर सहलाने से अटकी हुई चीज अंदर चली जाती है. इस के बाद भी वेटनरी डाक्टर से मवेशी का चेकअप जरूर करा लेना चाहिए.

जब चोट लगने पर ज्यादा खून बहने लगे : जब गड्ढे या कुएं में गिरने से मवेशी को गहरा जख्म लगे और तेजी से खून बहने लगे तो कटी हुई जगह पर कस कर साफ कपड़े का टुकड़ा बांध कर खून के बहने को रोका जा सकता है. कई बार कपड़े को बांधना मुमकिन नहीं हो पाता है, तो कपड़े को फिटकरी के घोल में भिगो कर कटी हुई जगह पर लगाने से खून का बहना रुक जाता है. चोट लगने पर कभी केवल सूजन आ जाती है और कभी खून भी बहने लगता है. दोनों ही हालत में बर्फ या ठंडे पानी से चोट की जगह पर सिंकाई करनी चाहिए. खून बहने वाली जगह पर एंटीसेप्टिक क्रीम या टिंचर वैंजोइन लगा देनी चाहिए. इस के तुरंत बाद डाक्टर को जरूर दिखा लें कि कहीं हड्डी में गहरी चोट या टूट तो नहीं है.

जब कब्ज या दस्त हो : सड़ागला चारा, ज्यादा सूखा चारा या दाना खाने से मवेशी को अकसर कब्ज की शिकायत हो जाती है. ऐसी हालत में मवेशी को 60 ग्राम काला नमक, 60 ग्राम सादा नमक, 15 ग्राम हींग व 50 ग्राम सौंफ को 500 ग्राम गुड़ में मिला कर 2 घंटे के अंतराल पर देने से फायदा होता है. दस्त होने पर मवेशी को गुड़, नमक और जौ के पके आटे का घोल पिलाना चाहिए. इस से शरीर में पानी की कमी नहीं हो पाती है. इस के अलावा मांड और खडि़या का घोल भी दस्त को ठीक करता है. बीमार मवेशी की त्वचा खींचने के बाद अपनी जगह पर आने में अगर 6 सेकेंड से ज्यादा समय लगे तो समझना चाहिए कि बीमारी का खतरा बढ़ गया है. ऐसी हालत में तुरंत डाक्टर से इलाज कराएं.

जब सांप या पागल कुत्ता काट ले : खेतों या अंधेरी जगहों पर अकसर मवेशियों को सांप, बिच्छू या जहरीले कीड़े काट लेते हैं. मवेशी के जिस्म के जिस हिस्से में सांप ने डसा हो, उस के 4-5 इंच ऊपर डोरी से कस कर बांध देना चाहिए. डसी गई जगह पर नए ब्लेड से चीरा लगा कर जहर को खून के साथ बाहर निकलने दें. डाक्टर के आने तक मवेशी को गरम पानी या चाय पिलाते रहें, ताकि उसे नींद न आ सके. अगर किसी मवेशी को पागल कुत्ता काट ले तो कटी हुई जगह को साबुन लगा कर 4-5 बार धोएं. इस के बाद कारबोलिक एसिड से घाव को जला दें. उस मवेशी को बाकी मवेशियों और इनसानों से दूर रखें.

जब जहरीली घास खा ले : जहरीला पौधा, कीटनाशक दवाएं, यूरिया, चूहा मारने की दवा व जहरीला चारा वगैरह खा लेने से मवेशी जहरबाद से पीडि़त हो जाता है. ऐसा होने पर मवेशी के मुंह में उदर नलिका से ज्यादा से ज्यादा पानी डालें. छोटे मवेशियों को कुनकुने पानी में नमक या पीसी हुई सरसों घोल कर पिलाने से उलटी हो जाती है, इस से आमाशय में भरा जहर बाहर निकल जाता है.

आंतों का जहर निकालने के लिए दस्तावर या बिरौयक दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है. बड़े मवेशी को 250 ग्राम और छोटे को 100 ग्राम मैगनीशियम सल्फेट पानी में घोल कर पिलाना चाहिए. जब तक मवेशी का शुरुआती इलाज किया जाए, उसी बीच किसी को डाक्टर को बुलाने के लिए भेज देना चाहिए ताकि समय रहते बीमार मवेशी का सही इलाज हो सके और उसे बचाया जा सके.

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