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फितूर में फंसी कैटरीना

कैटरीना कैफ ने अपने शुरुआती कैरियर के दौर में भले ही हर तरह की फिल्में की हों लेकिन अब वे अपने कैरियर के लिए बेहद चूजी हो गई हैं. यही वजह है उन की भी आमिर खान की तरह साल में इक्कादुक्का फिल्में ही रिलीज होती हैं. फिलहाल कैटरीना फिल्म ‘फितूर’ को ले कर बड़ी जनूनी हो रही हैं. उन के मुताबिक, फितूर ने कलाकार के तौर पर उन के जनून को फिर से जिंदा कर दिया, ‘‘जब यह फिल्म शुरू हुई तो हम लोग सुस्त हो गए थे लेकिन बाद में मैं ने समझना शुरू किया और इस फिल्म से बहुतकुछ सीखा.’’ हालांकि एक सच यह भी है इस फिल्म में देरी रेखा की वजह से हो रही है. पहले वे लीड रोल में थीं और बाद में किन्हीं कारणों से फिल्म छोड़ दी और उन्हें तब्बू ने रिप्लेस किया और फिल्म को दोबारा शूट करना पड़ा. इस के चलते फिल्म लटक गई.

काम में यकीन रखते हैं नवाज

नवाजुद्दीन सिद्दीकी बौलीवुड में 90 के दशक में पदार्पण कर चुके थे लेकिन छोटीमोटी भूमिकाओं तक सिमटे रहे. नवाज 10-15 साल गुमनामी में ही रहे. संघर्ष करतेकरते आमिर खान की फिल्म ‘सरफरोश’ और ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में चंद सैकंड के दृश्यों के अलावा इन के हाथ कुछ नहीं लगा. इस की कई वजहें रही होंगी. पहली कि जिस तरह का सिनेमा नवाज आजकल कर रहे हैं, उस दौरान उस तरह की फिल्मों के लिए न तो दर्शक थे और न ही बाजार. जाहिर है नवाज चौकलेटी हीरो के रोल तो कर नहीं सकते थे, लिहाजा उन दिनों उन का सफल होना मुश्किल ही था. उन के लुक और उन की अभिनय शैली तो आज भी उन्हें मेन स्ट्रीम का चौकलेटी हीरो नहीं बनने देगी. यह उन की सीमित प्रतिभा का भी परिचायक है और उन की कदकाठी व चेहरामोहरा भी इस में रुकावट डालता है. वे एक बेहतर कलाकार तो बन सकते हैं लेकिन पारंपरिक हीरो बन कर अभिनेत्रियों से रोमांस करना भी उन के लिए असहज है

हालांकि आज जिस प्रयोगधर्मी दौर में बौलीवुड गुजर रहा है, उस की बदौलत नवाज सफल हैं लेकिन अपने कंधे पर किसी भी फिल्म को सफल करा पाना उन के बस की बात नहीं. 100-200 करोड़ रुपए कमाना तो दूर की कौड़ी है. उन की लीड भूमिका की लगभग सभी फिल्में औसत बिजनैस कर पाई हैं फिर चाहे वह फिल्म ‘आत्मा’ हो या ‘मांझी द माउंटेन मैन’. बाकी बड़े सितारों के साथ ‘बदलापुर’ और ‘बजरंगी भाईजान’ व ‘किक’ जैसी फिल्में सफल हुईं तो सलमान खान और वरुण धवन की बदौलत. हरहाल, फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ से चर्चित हुए अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी आज फिल्म इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बना चुके हैं. वे एक ट्रैंड ऐक्टर हैं, उन्हें फिल्मों में आने का कोई खास शौक नहीं था. वे दिल्ली में नैशनल स्कूल औफ ड्रामा से प्रशिक्षण ले कर थिएटर में अभिनय करते थे. करीब 3 साल थिएटर में काम करने के बाद भी उन्हें अधिक पैसा नहीं मिला तो उन्होंने दोस्तों की सलाह पर मुंबई आने की ठान ली. यहां आने पर उन्हें लगा कि आसानी से काम मिल जाएगा पर ऐसा नहीं हुआ. उन्हें लंबे संघर्ष से गुजरना पड़ा.नवाजुद्दीन उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के बुढ़ाना गांव के हैं. 9 भाईबहनों में सब से बड़े होने की वजह से परिवार का दायित्व उन पर था. जब वे गांव से निकले तो परिवार वालों को लगा कि वे अच्छा काम कर परिवार को सहारा देंगे. पर यह हो नहीं पा रहा था. वे कहते हैं कि परिवार वाले अनपढ़ हैं, अत: उन्हें समझाने की जरूरत नहीं पड़ी. उन्हें लगा कि यह जो भी कर रहा है अच्छा ही होगा. गांव से तो अच्छा ही कमा लेगा.

नवाज का कहना है, ‘‘पढ़ाई पूरी करने के बाद मैं ने बड़ौदा में भी कुछ दिनों तक चीफ कैमिस्ट का काम किया. उस के बाद दिल्ली आया और नैशनल स्कूल औफ ड्रामा से प्रशिक्षण लेने के बाद अभिनय को अपना कैरियर बनाया. दिल्ली में थिएटर करते हुए मैं ने चौकीदारी का भी काम किया. मैं किसी भी काम को गलत नहीं समझता जब तक कि उस में मेहनत जुड़ी हो.’’नवाजुद्दीन अपनेआप को अब भी स्ट्रगलर ही मानते हैं. पहले काम न मिलने का संघर्ष, अब अच्छा काम मिलने का संघर्ष. इस तरह उन की खोज हमेशा जारी रहती है. वे भावुक हो कर कहते हैं, ‘‘मैं हमेशा कोशिश जारी रखता हूं. जब तक कि मुझे मनचाही चीज मिलती नहीं. छोटीछोटी भूमिका कर के ही आज मैं यहां तक पहुंचा हूं. कई बार ऐसा हुआ कि किसी बड़ी फिल्म में हीरो का रोल मिला. मैं खुश हुआ कि चलो मुझे बे्रक मिल गया. मेरे कौस्ट्यूम तक तैयार हो गए थे मगर अंत में मुझे बताए बिना ही फिल्म से निकाल दिया गया. मुझे बहुत बुरा लगा पर मैं ने हिम्मत नहीं हारी. ‘मांझी द माउंटेन मैन’ के दौरान जब एक सीन में बारबार हथौड़ा मारने पर भी पहाड़ नहीं टूटता, तब मैं पागलों की तरह पत्थर पर बारबार वार करता. उस सीन ने मुझे अपने पुराने दिनों में मिले रिजैक्शन की याद दिलाई. मैं भावुक हो उठा था.’’

फिल्मों के बदलते ट्रैंड के बारे में नवाजुद्दीन को काफी खुशी है. उन का कहना है, ‘‘बिना गौडफादर के कलाकारों को भी आगे आने का अब मौका मिल रहा है. उन की फिल्में हिट भी हो रही हैं.’’उन का यह भी कहना है, ‘‘बड़े बजट की फिल्मों में कहानी नहीं होती. बड़ी ‘स्टारकास्ट’ होती है. किसी ने किसी को एक लात मार दी, सब उड़ गए, एक आदमी 10 कारें लात मार कर गिरा देता है. ये बच्चों की कहानी है, वे ही खुश होते हैं, बाकी दर्शकगण नहीं. ऐसी फिल्में मैच्योर और स्वस्थ माइंड की नहीं होतीं. इन फिल्मों पर बुरी तरह से पैसा बहाया जाता है. अब यह दौर थम रहा है. दर्शक समझदार हो चुके हैं. वे भी अच्छी फिल्में देखना चाहते हैं.’’

नवाजुद्दीन ने टिपिकल हीरो के बजाय चरित्रप्रधान फिल्मों में अधिक काम किया. इस की वजह बताते हुए वे कहते हैं, ‘‘मुझे हीरो या विलेन जैसे दो शब्दों में कोई रुचि नहीं. मैं एक ऐक्टर हूं और हर तरह के रोल निभाना चाहता हूं. फिर चाहे वह भिखारी का रोल हो या कैदी का. आज के दर्शकों की पसंद बदल चुकी है. वे हमेशा अलग फिल्म देखने की इच्छा रखते हैं. मैं भी वैसी ही कहानी तलाश करता हूं जिस में कुछ नई और अलग भूमिका हो. ‘बजरंगी भाईजान’ के कई दृश्य ऐसे थे जिन में सलमान ने अच्छीअच्छी पंचलाइन दीं. कम भूमिका होने के बावजूद लोगों ने मुझे याद रखा. फिल्म ‘रईस’ में एक बार फिर मैं अलग दिखूंगा. मैं सोचता हूं कि जो भी भूमिका मुझे मिले उस में मैं सब से अच्छा परफौर्मेंस दूं ताकि फिल्मकार मुझे उस काबिल समझें. ‘मांझी द माउंटेनमैन’ जैसी फिल्मों का मिलना मेरे कैरियर में अहम पड़ाव है.’’

इतनी सारी सफल फिल्मों के बाद भी नवाजुद्दीन अपनेआप को सफल नहीं मानते. उन के जीवन का टर्निंग पौइंट फिल्म ‘गैंग्स औफ वासेपुर’ थी जो उन्हें 10 साल की मेहनत के बाद मिली थी. वे 10 साल अभी भी उन्हें याद आते हैं जब एक कमरे में 5-5 लोग साथ रहते थे. वे कहते हैं, ‘‘उस समय पैसे की किल्लत रहती थी. जब पैसे की कमी पड़ी तो एक से उधार ले लिया, उसे चुका नहीं पाया, तो दूसरे से ले कर उसे चुकाया, इस तरह सालों चलता रहा. एक मजदूर और टीचर से बहुत प्रभावित रहा हूं. जो हमेशा काम करते रहते हैं, प्रसिद्धि से उन का कोई सरोकार नहीं. जिंदगी में सिर्फ काम करना है. मैं भी सफलता को मानने के बजाय काम करने में यकीन करता हूं. मैं मैटीरियलिस्टिक नहीं. दमदार रोल में विश्वास रखता हूं. मैं सफलता को अपने परिवार के साथ मनाता हूं. मैं उन की सुरक्षा के लिए सोचता हूं और चाहता हूं कि मैं अपने बच्चों को पढ़ालिखा कर अच्छा इंसान बना सकूं.’’नवाजुद्दीन को बनावटी लोग पसंद नहीं. वे जिस ईमानदारी से काम करते हैं उसी ईमानदारी की अगले से भी अपेक्षा रखते हैं.

नवाजुद्दीन की आने वाली फिल्मों में ‘रईस’, ‘गवाह’, ‘फर्जी’, ‘केरला’ आदि हैं. वे कहते हैं, ‘‘ऐक्टर के तौर पर मेरा काम हमेशा बेहतर होना चाहिए. जब मैं सैट पर होता हूं तो यह नहीं सोचता कि किस के साथ काम कर रहा हूं, वरना मेरी ऐक्टिंग ठीक नहीं होगी. अभी अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का अवसर पा कर खुशी महसूस कर रहा हूं. क्योंकि ऐसा सुनने में आया है कि उन्होंने ‘केरला’ फिल्म के निर्देशक से कहा है कि वे मुझ से बात करें. उन्हें मेरी फिल्म ‘मांझी द माउंटेनमैन’ बहुत पसंद आई है.’’इस में शक नहीं कि विद्या बालन, सलमान खान, शाहरुख खान और अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म मिलने की खबर ने नवाज को सफलता की नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है.उम्मीद की जा सकती है कि नवाजुद्दीन का नाम एक दिन बौलीवुड की महान हस्तियों में शुमार हो जाएगा. 

सिरपुर महोत्सव

किसी मौल में बैठ कर शास्त्रीय संगीत का मजा लिया जा सकता है, किसी वातानुकूलित हौल या औडिटोरियम में देख कर भी आनंद लिया जा सकता है लेकिन वाकई अगर शास्त्रीय नृत्य और संगीत का सुख महसूस करना है तो सिरपुर से ज्यादा सटीक जगह और खूबसूरत मौका, सिरपुर अंतर्राष्ट्रीय नृत्य एवं संगीत महोत्सव से बेहतर कोई नहीं. पिछले 3 सालों से न केवल देश से, बल्कि विदेशों से भी कला और संगीतप्रेमी सिरपुर महोत्सव में आ कर शास्त्रीय गायन व नृत्य का लुत्फ उठा रहे हैं. इस की वजह यातिनाम कलाकारों की प्रस्तुतियों के साथसाथ ऐतिहासिक महत्त्व वाला व नैसर्गिक रूप में सुंदर शहर सिरपुर भी है. छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से 85 किलोमीटर दूर बसा सिरपुर एक ऐसा शहर है जिस में लगभग सारी संस्कृतियों के एकसाथ दर्शन होते हैं. महानदी किनारे बसे इस शहर की छटा अद्भुत है. शहर का प्राचीनतम नाम श्रीपुर उल्लेखित है. पांडुवंश की राजनीतिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र रहे सिरपुर में 7वीं सदी में चीन के यातिनाम यात्री पर्यटक ह्वेनसांग का आना एक ऐतिहासिक घटना थी.

ह्वेनसांग के आगमन के समय सिरपुर एक विकसित बौद्धस्थली था और आज भी है लेकिन तब वहां लगभग 100 संघाराम और 10 हजार बौद्ध भिक्षु निवास करते थे. हैरानी की बात यह है कि तत्कालीन शासक महाशिव गुप्त बालार्जुन खुद शैव मतावलंबी था लेकिन उस ने बौद्ध विहारों और भिक्षुकों को उदारतापूर्वक संरक्षण दिया था. बीते कल की शांति आज भी यहां मौजूद है, ऐतिहासिक अवशेष हैं तो दर्शनीय मंदिर भी. लेकिन इन के साथसाथ सिरपुर आने की अब एक नई वजह जुड़ गई है– ‘सिरपुर महोत्सव’, जिस ने महज 3 साल में ही अंतर्राष्ट्रीय नक्शे पर अपनी अलग पहचान बना ली है. पंडित बिरजू महाराज ने बीते साल जब लक्ष्मण मंदिर परिसर में कथक प्रस्तुति दी थी तो मानो समूचा समारोह स्थल ध्यानस्थ हो गया था. छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल द्वारा आयोजित सिरपुर महोत्सव के बारे में बेहिचक कहा जा सकता है कि यह कोणार्क और खजुराहो उत्सवों की तर्ज पर कला और संगीत प्रेमियों को लुभाने लगा है. यहां एक बेहतर कुदरती माहौल है जो कला और संगीत प्रेमियों को चाहिए होता है. वे तमाम सुविधाएं यहां मुहैया कराई जाती हैं जिन की जरूरत हर किसी को होती है.

इस ऐतिहासिक नगरी में नृत्य की लय और संगीत की तीनदिवसीय धुन देखतेसुनते कब समय निकल जाता है, इस का एहसास पर्यटकों और कला प्रेमियों को नहीं हो पाता. छत्तीसगढ़ का पारंपरिक नृत्य संगीत भी सिरपुर महोत्सव में देखने को मिलता है. मांदर, मृदंग, झांज, ढोल, लोहाटी, टिमकी, गदुमबाजा और खंजरी से ले कर ड्रम, बोंगो, कोंगो, डबरबुका और काहेना जैसे विदेशी वाद्ययंत्रों को एकसाथ सुनने का मौका शायद ही दुनिया में कहीं और मिलता हो. सिरपुर में देशीविदेशी कलाकारों का संगम एक वैश्विक संगीत का एहसास कराता है. कला और संस्कृति के मामले में छत्तीसगढ़ क्यों छत्तीसगढ़ कहा जाता है, इसे साबित करने में सिरपुर महोत्सव का योगदान अहम हो गया है, साथ ही सिरपुर महोत्सव पर्यटन को बढ़ावा और प्रोत्साहन दे ही रहा है. आदिवासी बाहुल्य इस राज्य के प्रति जो जिज्ञासाएं लोगों के दिलोदिमाग में हैं, यह महोत्सव उन का भी समाधान कला के जरिए करता है. अंतर्राष्ट्रीय स्तर के कलाकारों और कला से ले कर स्थानीय स्तर तक की कला व कलाकारों को एकसाथ देखने का मौका कलाप्रेमियों को फिर 2016 की सर्दियों में मिलेगा जब पर्यटन के लिहाज से भी छत्तीसगढ़ और सिरपुर आने के लिए मौसम अनुकूल रहता है. कई नामी देशीविदेशी कलाकारों की प्रस्तुतियां सिरपुर को गुलजार करेंगी. नृत्य और संगीत के बाद आप के पास आदिवासी जीवन और संस्कृति की सरलता को बेहद नजदीक से देखने और महसूस करने का भी मौका होगा.

वैसे भी सिरपुर में पर्यटन स्थलों की कमी नहीं, मंदिरों की शृंखला में लक्ष्मण मंदिर, गंधेश्वर मंदिर, राम मंदिर हैं तो बौद्ध विहार में बुद्ध की साढ़े 6 फुट ऊंची प्रतिमा भी सहज आकर्षित करती है. सिरपुर संग्रहालय में इस क्षेत्र में मिली दुर्लभ मूर्तियां और कलाकृतियां संगृहीत हैं. ये कलाकृतियां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन चारों संस्कृतियों से संबंधित हैं. संग्रहालय का एक आकर्षण अंगड़ाई लेती एक नायिका की प्रतिमा है जिस का सहज सौंदर्य उसे निहारते रहने को विवश करता है. छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल इस बार भी मेहमानों को लुभाने व सुविधाएं देने के लिए खास तैयारियां कर रहा है. वजह, यह तय है कि इस बार और ज्यादा संख्या में कला व संगीत प्रेमी आएंगे. पर्यटकों की आवाजाही जाड़े के मौसम में यहां ज्यादा रहती है.

धर्म की आड़ में रंगीन लीला

ऋषिमुनि, साधुसंत और तपस्वियों की भारतभूमि पर इन दिनों धर्म का खूब डंका बज रहा है. मां, बाबाओं, साधु, साध्वियों की लीलाएं धूम मचा रही हैं. चमत्कारी लीलाएं देख कर आत्ममुग्ध रहने वाले भक्तगण इस बार हैरान दिख रहे हैं. एक से बढ़ कर एक लीलाधारियों में इस बार राधे मां, साध्वी त्रिकाल भवंता, सच्चिदानंद गिरि, प्रकाशानंद, सारथी बाबा, गोल्डन बाबा भक्तों को चमत्कृत कर रहे हैं. कुछ विघ्नसंतोषी लोग हैं जो धर्म और साधु, साध्वियों को बेवजह बदनाम करने की चेष्टा कर रहे हैं. जो कुछ हो रहा है वह तो लीला है, अपरंपार लीला.

कुलविंदर कौर से राधे मां

चटकदार, खास डिजाइन की हुई लाल साड़ी, हाथों में लाल चूडि़यां, माथे पे सजा लाल टीका, लाल लिपस्टिक, लाल नेलपौलिश और हाथों में लाललाल गुलाबों के फूल. ऐसे तड़कभड़क अवतार में अपना दरबार लगाने वाली राधे मां के आज देशविदेश में हजारों भक्त हैं. लाल रंग जो तेज, चमक का पर्याय होता है उसी लाल रंग के पीछे छिपा राधे मां का आडंबर आज सामने आ गया है. खुद को भगवान शंकर का वरदान मिला होने और दुर्गा का अवतार बताने वाली राधे मां आजकल सुर्खियों में है. फिल्मी डांस करते हुए और विभिन्न मुद्राओं में छोटे कपड़ों में राधे मां के वीडियो और फोटो टैलीविजन चैनलों से ले कर अखबारों व सोशल मीडिया पर खूब छाए हुए हैं. इन फोटो में राधे मां की मिनी स्कर्ट में खुली टांगें, सोफे पर अधलेटी हुई मुद्रा में जांघें और क्लीवेज दिखाई दे रहे हैं. राधे मां पर अश्लीलता फैलाने, दहेज के लिए उत्पीड़न और धोखाधड़ी करने के मामले दर्ज किए गए हैं. मुंबई के बोरिवली में एक महिला ने अपने पति और ससुराल वालों समेत राधे मां के खिलाफ दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया है. महिला का आरोप है कि राधे मां ने उस के सासससुर से कहा कि वे उस पर और दहेज लाने का दबाव डालें. इस के बाद उसे प्रताडि़त किया गया.

इस के अलावा फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट नामक एक महिला वकील ने भी उस के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है कि राधे मां धर्म के नाम पर धोखाधड़ी कर रही है. भोपाल में अश्लीलता फैलाने का मामला दर्ज किया गया है. आरोप है कि वह लोगों को धमकियां देती है और बात न बनने पर प्यार का जाल फेंकती है. ये कारगुजारियां सामने आने के बाद शंकराचार्य और साधु संगठनों द्वारा राधे मां को नासिक कुंभ में शाही स्नान करने से रोके जाने की मांग की गई. वह श्रीपंचादशनाम जूना अखाड़ा की महामंडलेश्वर थीं. राधे मां की 31 जून, 2012 को जूना अखाड़े के आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि सहित प्रमुख साधुओं की मौजूदगी में महामंडलेश्वर पद पर ताजपोशी की गई थी लेकिन अगले दिन से ही साधुओं में उस के खिलाफ विरोध के स्वर उठने लगे थे. कांग्रेसी नेता संजय निरूपम, गायक दलेर मेहंदी, हंसराज हंस, अभिनेत्री डौली बिंद्रा, जाहिरान विश्व के प्रह्लाद कक्कड़, मनोज तिवारी, अनूप जलोटा, शार्दुल सिकंदर, अनुराधा पौडवाल, रूपकुमार राठौड़ जैसे नामचीन लोग राधे मां के दरबार में आतेजाते रहते हैं. पंजाब के गुरुदासपुर जिले के दारांगला गांव में 3 मार्च, 1969 को जन्मी राधे मां का नाम कुलविंदर कौर है. पंजाब के बिजली विभाग में अधीक्षक अभियंता रहे अजीत सिंह की यह छोटी संतान है. पति मनमोहन सिंह से उसे 2 बच्चे भी हुए.

मनमोहन सिंह कारोबार के सिलसिले में कतर की राजधानी दोहा में बस गया. पति के विदेश जाने के बाद उस ने कुछ दिन सिलाई का काम किया. इसी दौरान अपनी और बच्चों की जरूरतों को पूरा करने की कशमकश से बाहर निकलने का शायद कुलविंदर ने यह आसान रास्ता चुना. वर्ष 1991 में नजदीक के मुकेरिया में परमहंस निवास में वयोवृद्ध महंत रामदीन ने उस की परमेश्वर भक्ति से प्रभावित हो कर उस का नामकरण कुलविंदर से राधे मां किया. उस ने शुरुआत में दरबार (माता की चौकी) लगाना शुरू किया. वहां वह भक्तों की समस्याओं के निराकरण के उपाय बताने लगी और देखते ही देखते वह राधे मां बन गई. दिल्ली के भक्त रामभज अग्रवाल के घर में 3 साल तक राधे मां की चौकी लगती रही. 2002 में मुंबई के ग्लोबल एडवरटाइजिंग के मालिक शिव गुप्ता, राधे मां को मुंबई ले गए. वहां पर राधे मां का पूरी तरह से मेकओवर किया गया. राधे मां के कपड़े, जेवर, सिर पर मुकुट, हाथों में छोटा त्रिशूल, उंगलियों में 7 हीरे की अंगूठियों वाला परिवेश डिजाइन किया गया. बोरिवली में शिव गुप्ता के पांचमंजिला घर में हर शनिवार राधे मां की चौकी लगती थी. राधे मां अपने भक्तों से अंगरेजी में ‘भक्तो, आय लव यू फ्रौम बौटम औफ माय हार्ट’ बोलती है. ‘जो होता है वह शिव भगवान करते हैं’ ऐसा कहने वाली राधे मां की दुकानदारी मीडिया में शोर उठने की वजह से ठंडी पड़ी थी. लेकिन फिर जूना अखाड़े की तरफ से महामंडलेश्वर पद से उसे निलंबित किए जाने के बाद जांच किए जाने से राधे मां की दिक्कतें बढ़ गई थीं. जरूरत है कि महिलाएं ऐसे मोहजाल से बाहर निकलें और सत्य और तार्किकता के आधार पर कोई भी निर्णय लें.

सच्चिदानंद की सचाई

नोएडा के शराब, डिस्कोथेक और जमीन कारोबारी से महामंडलेश्वर बनाया गया सच्चिदानंद गिरि की पोल भी जल्दी ही खुल गई. सच्चिदानंद उर्फ सचिन दत्ता निरंजनी अखाड़े से निलंबित कर दिया गया. यह बाबा अब न तो निरंजनी अखाड़े का महामंडलेश्वर रहा और न ही संन्यासी है. इस की घोषणा नासिक में निरंजनी अखाड़े की कार्यकारिणी बैठक में हुई. इस से पहले 31 जुलाई को संन्यास दिला कर मठ बाघंबरी गद्दी में सचिन को निरंजनी अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया गया था. सचिन दत्ता की चादरपोशी के वक्त हैलिकौप्टर से फूलों की वर्षा की गई थी. सचिन दत्ता को महामंडलेश्वर बनाने वाला महंत नरेंद्र गिरि था. उस के विरोधी महंत ज्ञानदास ने महंत नरेंद्र गिरि की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए. सचिन को महामंडलेश्वर बनाने की पैरवी करने वाले अग्नि अखाड़े के महामंडलेश्वर कैलाशानंद ने सचिन दत्ता की पोल खुलने के बाद मौन साध लिया. मीडिया में जब विवाद उठने लगा तो महंत नरेंद्र गिरि ने 3 अगस्त को सचिन दत्ता के महामंडलेश्वर के रूप में धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने व नासिक कुंभ में प्रवेश पर रोक लगाने के लिए 4 महंतों की समिति बना कर जांच बैठा दी. बाद में सच्चिदानंद गिरि उर्फ सचिन दत्ता को महामंडलेश्वर पद से निष्कासित करने का निर्णय लिया गया.

एक और चर्चित बाबा प्रकाशानंद है जो विदेश में यानी अमेरिका में धर्म की ‘पताका’ फहरा कर भारत में छिपा बैठा है. कहा जा रहा है कि वह हिमाचल प्रदेश में कहीं भूमिगत है. अयोध्या के रहने वाले प्रकाशानंद सरस्वती को अमेरिकी पुलिस और खुफिया एजेंसी खोज रही हैं. वह 4 साल पहले 3 लड़कियों का यौन शोषण करने के बाद से फरार है. अमेरिका में अपराधियों की तलाश पर आधारित टीवी शो ‘द हंट विद जौन वाल्स’ के दौरान उत्पीड़न की शिकार इन लड़कियों ने अपनी पीड़ा हाल ही में बताई थी. 1990 के दशक में श्यामा रोज, उस की बहन कैट और वेस्ला टोनेंसेन टैक्सास के बरसाना धाम आश्रम में अपने मातापिता के साथ रहती थीं. कई अन्य परिवार भी अपना सबकुछ छोड़ कर प्रकाशानंद के इस आश्रम में रहते थे. ये लोग प्रकाशानंद को इस धरती पर ईश्वर का रूप मानते थे. रोज ने आरोप लगाया था कि जब वह जवान हुई तो प्रकाशानंद उस का यौन उत्पीड़न करने लगा. तीनों बहनों की शिकायत पर 2008 में आरोपी गुरु के खिलाफ मुकदमा शुरू हुआ. उसे गिरफ्तार किया गया पर उस के भक्तों ने 6 करोड़ रुपए की राशि दे कर जमानत दिला दी थी. 4 मार्च को उसे 14 साल की सजा सुनाई गई लेकिन वह फरार हो गया और भारत पहुंच गया. कहा जा रहा है कि वह अब दिल्ली से मसूरी के बीच कहीं रह रहा है.भारतभूमि पर पहले भी कई लीलाधारी अवतरित हुए हैं. आएदिन उन के ढोंग उजागर होते रहते हैं.

निर्मल बाबा के बेतुके सुझाव

निर्मलजीत सिंह नरूला उर्फ निर्मल बाबा के चुटकुलेनुमा उपाय हंसाने वाले साबित हो रहे हैं. पर टैलीविजन पर उस के भक्त इस बाबा द्वारा बताए गए चुटकुलों में समाधान ढूंढ़ते हैं. बाबा पर धोखाधड़ी के कई मामले चल रहे हैं. बाबा के इंटरनैट पर करीब 30 लाख से ज्यादा लिंक्स हैं. पंजाब में पटियाला जिले के समाना गांव के निर्मलबाबा का परिवार 1947 में देश के बंटवारे के वक्त भारत आया था. यह बाबा विवाहित है. इस के एक लड़का और एक लड़की है. निर्मल बाबा के साले का ईंटभट्ठे का धंधा था. ईंटभट्ठे का धंधा नहीं चला तो निर्मल बाबा ने कपड़े की दुकान खोली पर इस में भी असफल होने पर खदान व्यवसाय शुरू किया. बहरागोडा गांव में इस बाबा ने आत्मज्ञान प्राप्ति का ढोंग रच कर अध्यात्म की दुकान शुरू की. अंदाजन 36 देशीविदेशी चैनल्स पर 24 घंटे निर्मल बाबा के चमत्कार प्रसारित किए जाते हैं. भक्तगण बाबा के दरबार में प्रवेश पाने के लिए 2 हजार रुपए देते हैं. पैसे जमा करने के लिए वैबसाइट पर बैंक के अकाउंट नंबर दिए गए हैं. बैंक अकाउंट को ‘थर्ड आई औफ निर्मल दरबार’ के नाम से प्रचारित किया गया है.

ऐसे हर दरबार के जरिए 1 करोड़ रुपए जमा करना और इस तरह के 7 से 10 दरबार आयोजित करने का धंधा निर्मल बाबा का था. सालभर में बिना परिश्रम के श्रद्धा का बाजार लगा कर अमूमन 84 करोड़ रुपए ऐंठने में निर्मल बाबा एक्सपर्ट है. गौरतलब है कि बाबा के 2 खातों में अमूमन 109 करोड़ रुपए जमा होने का दावा किया गया है. अपना धंधा चमकाने के लिए बाबा जूनियर आर्टिस्ट का भी उपयोग करता है.एक भक्त ने इलैक्शन में टिकट न मिलने पर उपाय पूछा तो निर्मल बाबा ने उसे बताया कि तुम गोलगप्पे खाओ, तुम पर कृपा होगी. शिष्यो, फ्रिज में कोल्डडिं्रक रखो, कृपा होगी. काले कपड़े अलमारी में रखो. कृपा होगी. गुरुवार के दिन लाल शर्ट पहनो, कृपा होगी, मेरे बैंक अकाउंट में 10 हजार रुपए जमा करो कृपा होगी. 10 रुपए की धूप से कृपा होने वाली नहीं, उस के लिए 50 रुपए की धूप जलाओ, कृपा होगी. समोसे के साथ हरी चटनी खाओ तो कृपा बरसनी शुरू होगी. इस तरह के हंसाने वाले, अवैज्ञानिक, बेसिरपैर के अजीबोगरीब उपाय बताने में निर्मलबाबा धार्मिक दुनिया में कुख्यात है.

निर्मला माता का स्वांग

देशविदेश में बनाए गए आलीशान महल, महंगी गाडि़यां, भड़कीले परिधान और साथ में 300-400 गोरे भक्तों की फौज लिए दुनियाभर में सफर करने वाली निर्मला माता का रुतबा देखने लायक होता है. पत्नी के साथ आशीर्वाद लेने आया पति निर्मला माता के पैर धोता है, पत्नी धीरेधीरे पानी डालती है. फिर पति पैर पोंछता है. खुद का सिर नीचे झुका कर माता के पैर खुद के सिर पर रखने में अपने को बड़ा धन्य महसूस करता है. लाइन में खड़ा अगला भक्त भी इसी भक्तिभाव से यही कृत्य दोहराता है. माताजी का भोजन होने के बाद उस की प्लेट में बचा सारा खाद्यान्न प्रसाद के तौर पर भक्तों में बांट दिया जाता है. खाने के बाद माताजी द्वारा धोए हाथों का और मुंह में ले कर किए गरारों का पानी एकत्रित कर प्रसाद के रूप में बांटा जाता है.

चमत्कारी सत्यसाईं बाबा

14 साल की आयु में खुद शिर्डी के साईंबाबा का अवतार होने की घोषणा कर सत्यनारायण राजू आगे चल कर सत्यसाईं बाबा बना. वर्ष 1926 में आंध्र प्रदेश में धनगर परिवार में जन्मा सत्यनारायण राजू स्कूल में शिक्षा ग्रहण करने के दौरान ही हवा से पैंसिल निकालने का चमत्कार करता था. चमत्कार के नाम पर हाथ की चालाकी करने वाले बाबा को नेताओं और भक्तों ने अहमियत देनी शुरू कर दी. हवा में हाथ लहरा कर भभूत निकालना, सोने की चेन निकालना, मुंह से शिवलिंग निकालना, जानलेवा बीमारियां ठीक करने जैसे कई चमत्कारों की कहानियां इस बाबा के नाम पर चलती रहीं. बाबा के आश्रम में उस के नजदीकी 5 शिष्यों ने उस पर जानलेवा हमला किया, तब बाबा भाग कर बाथरूम में छिप गया और सहीसलामत बचा. यह प्रयास करने वाले 4 शिष्यों को बंद रूम में पुलिस ने गोली मार कर खत्म किया. इस पर मीडिया ने होहल्ला किया.उम्र के 55 साल पूरे होते ही बाबा पर यौन शोषण तथा समलैंगिक संबंधों के आरोप लगे. बाबा के ही चलाए स्कूल के बच्चों के साथ और अपने शिष्यों के साथ भी घिनौनी हरकतें सामने आती थीं.

20 साल तक साईं संगठन के अमेरिका के दक्षिणमध्य विभाग प्रमुख रहे जैक युंग और उन की पत्नी ने अपने बच्चे सैम के साथ सत्यसाईं बाबा द्वारा किए गए यौन शोषण की कहानी बताई थी. औरों को कभीकभार दर्शन देने वाले सत्यसाईं बाबा सैम से मिल कर चमत्कार से निकाली महंगी घडि़यां, अंगूठियां देता. सैम का कहना था कि बाबा उसे सहलाता, उस का चुंबन लेता, उसे मुखमैथुन करने के लिए मजबूर करता और उस से यौन संबंध बनाने का प्रयास भी किया गया.साईं बाबा के डाक्टर शिष्य डेविड बेले की ‘दी फाइंडिंग’ नामक किताब ने पोल खोल कर सनसनी फैला दी थी. इस किताब में बाबा द्वारा शिष्यों के यौन शोषण के किस्से बताए गए हैं.इन गंभीर आरोपों के बाद बाबा के चरित्र पर जोरदार चर्चा छिड़ी. इस वजह से बाबाओं के शिष्यों की तादाद घटने लगी और यूनेस्को ने बाबा के एजूकेशनल संस्थानों को दी गई मदद को रद्द कर दिया. सत्य साईंबाबा 24 अप्रैल, 2011 को मर गया. बाद में उस की संपत्ति को ले कर झगड़ा शुरू हो गया.

भविष्यवाणी और चंद्रास्वामी

अलवर, राजस्थान का नेमीचंद जैन उर्फ चंद्रास्वामी जब छोटा था, तभी उस के पिता हैदराबाद आ गए. बचपन में तंत्रविद्या के आकर्षण से प्रभावित नेमीचंद शिक्षा अधूरी छोड़ बिहार के जंगल में भाग गया. चंद्रास्वामी वहां पर अघोरपंथी साधुओं से कथित तंत्रमंत्र, अघोरी विद्या, काला जादू आत्मसात कर 4 साल की तपस्या के बाद सिद्धि प्राप्त होने का दावा करता रहा. ज्योतिषवेत्ता के तौर पर शुरुआत में काम करने वाला चंद्रास्वामी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री बनने के बाद ज्यादा मशहूर

हुआ. राव के आध्यात्मिक सलाहकार रहे चंद्रास्वामी के आगे अनेक सत्ताधारी नेता सलामी देने लगे. राव के बाद प्रधानमंत्री बने चंद्रशेखर भी उस के भक्त थे. इंदिरा गांधी ने उसे महरौली में जमीन दी थी. उस पर उस ने ‘विश्व धर्मायतन सनातन’ नाम का शाही आश्रम बनाया. पामेला बोर्डेस, बहरीन के शेख खलीफा, हौलीवुड अभिनेत्री एलिजाबेथ टेलर, अस्त्रशस्त्रों का सौदागर अदनान खशोगी, जनता दल के लालू प्रसाद यादव, दिल्ली के राज्यपाल रहे रोमेश भंडारी उस के शिष्यों में थे. उस के शिष्यों की तादाद बढ़ने लगी. उस के सचिव विक्रम सिंह और कैलाशनाथ अग्रवाल उर्फ मामाजी का सियासी गलियारों में काफी दबदबा था.

लखूभाई पाठक केस में पाठक पर चंद्रास्वामी और नरसिम्हा राव को रिश्वत दिए जाने के आरोप लगे थे. ऐसे आरोपों के बाद चंद्रास्वामी का असली चेहरा खुल गया. इस केस में राव निर्दोष साबित हुए लेकिन चंद्रास्वामी और कैलाशनाथ अग्रवाल को जेल की हवा खानी पड़ी. प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्याकांड में चंद्रास्वामी के सहभागी होने का आरोप लगा था. इस मामले की जांच करने वाले न्यायाधीश जैन आयोग के सामने राजीव गांधी के हत्यारों ने चंद्रास्वामी को पैसे देने की बात बताई थी. अदनान खशोगी को दिए गए एक करोड़ डौलर से अधिक दलाली के कागजी सुबूत उस के आश्रम पर डाले छापे में मिले थे.

रंगीला आसाराम बापू

72 वर्षीय आसाराम बापू पिछले 2 सालों में किसी न किसी मुद्दे को ले कर चर्चा में रहा, चाहे वह निर्भया केस में दिया गैरजिम्मेदाराना वक्तव्य हो या महाराष्ट्र में सूखे की स्थिति होने के बावजूद होली का त्यौहार मनाने के लिए उड़ाए गए लाखों लिटर पानी की बरबादी. कहर तब हुआ जब उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में 16 वर्षीय लड़की का जोधपुर के आश्रम में आसाराम द्वारा यौन शोषण का मामला सामने आया. इस संदर्भ में दिल्ली पुलिस के कमला मार्केट थाने में 20 अगस्त को शिकायत दर्ज कराई गई और एक घटना में सूरत की एक महिला ने आसाराम पर आरोप लगाया कि उस महिला को अहमदाबाद के आश्रम में वर्ष 1998 से 2006 के दौरान अवैध रूप से बंदी बना कर उस से बारबार बलात्कार किया गया. महिला की छोटी बहन ने आसाराम के लड़के नारायण साईं के विरोध में ऐसी ही शिकायत दर्ज कराई. आसाराम आजकल जोधपुर की जेल में बंद है. कई गवाहों की हत्या के आरोप भी आसाराम पर लगे हैं. आसाराम के पुराने आयुर्वेद चिकित्सक ने आश्रम में 2 किशोरों की मृत्यु होने के बाद आसाराम पर गंभीर आरोप लगाए थे. इसी कारण 7 बार प्रजापति पर आसाराम के समर्थकों द्वारा जानलेवा हमला किया गया. 23 मई, 2014 में हुए राजकोट के हमले में उन की मृत्यु हो गई. आसाराम तथा नारायण साईं के खिलाफ चल रहे बलात्कार मामले में बयान देने वाले 3 लोगों पर उस के समर्थकों द्वारा एसिड फेंका गया. तहकीकात कर रहे पुलिस अधिकारी को जान से मारने की धमकी दी गई है.

स्कैंडलर स्वामी नित्यानंद

2010 में स्वामी नित्यानंद का दक्षिण की लोकप्रिय अभिनेत्री रंजीता के साथ आपत्तिजनक स्थिति में एक वीडियो निजी चैनल पर प्रसारित किया गया. मीडिया ने इस मामले को बहुत उछाला. कर्नाटक पुलिस ने उस के खिलाफ शिकायत दर्ज की और इस मामले के बाद स्कैंडलर स्वामी नित्यानंद प्रचलित हो गया. पुलिस से मुंह छिपा कर भागने वाले नित्यानंद को बेंगलुरु पुलिस ने हिमाचल प्रदेश से पकड़ कर जेल में डाल दिया. 52 दिन जेल में रहने के बाद जमानत मिलने पर नित्यानंद जेल से बाहर आया. सैक्स स्कैंडल के सवाल अभी स्वामी के पीछे लगातार बने हुए थे, तभी एक एनआरआई महिला ने स्वामी पर यौन शोषण का आरोप लगाया. इस संदर्भ में स्पष्टीकरण के लिए नित्यानंद आश्रम द्वारा एक प्रैस कौन्फ्रैंस की गई, तभी वहां पर हुए होहल्ले में स्वामी समर्थकों ने तोड़फोड़ की. नित्यानंद की लीला जारी थी. तभी एक पुरुष अनुयायी ने उस पर यौन शोषण के आरोप लगाए और बाबा के खिलाफ इस संदर्भ में भी शिकायत दर्ज कराई.

नित्यानंद पर नित्यानंद ध्यानपिटम मठ के दुरुपयोग के आरोप लगाए गए. स्वामी नित्यानंद पर एक और सनसनीखेज आरोप उन्हीं के भक्त ने लगाया, जिस के अनुसार आश्रम में बाघ की खाल और हाथीदांत का उपयोग किया जाता है. इस आरोप के बाद नित्यानंद पर वन्य जीवन संरक्षण कानून के अंतर्गत मुकदमा चलाया गया. स्वामी के सैक्स स्कैंडल के बाद गुरुपूर्णिमा के दिन भक्तों को हवा में अपने इशारे पर उछालने का दावा भी काफी चर्चा में रहा. 2013 में महाकुंभ मेले में विवादों से घिरे नित्यानंद को पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी की तरफ से महामंडलेश्वर बनाया गया और दूसरे साधुबाबाओं के विरोध करने पर नित्यानंद फिर एक बार विवादों में आ गया.

जाल में फांसते नरेंद्र महाराज

नरेंद्र महाराज यानी जगदीश सुर्वे, 10वीं पास करने के बाद ग्रामसेवक की नौकरी में लगा. काम में आनाकानी करने के साथ ही काम की जगह हेराफेरी करने का भी उस के ऊपर आरोप लगा. इस वजह से नौकरी से निकाला गया. यहां पर आत्महत्या करते समय गजानन महाराज ने साक्षात दर्शन दिए, यह अफवाह फैलाई. नाणीज आ कर पीपल का पौधा लगा कर आध्यात्मिक मार्गदर्शन की शुरुआत की. 5-7 वर्षों में नरेंद्र महाराज एक बड़ा साधु बन गया. नाणीज के पहाड़ों पर महाराज के प्रवचन, समस्या निवारण का कार्यक्रम शुरू हो गया. महीने के दूसरे शनिवार को 2-3 लाख भक्त आने लगे. ठंड का मौसम हो या कड़ी धूप, मठ के सामने लोगों की कतार लगती है. एक कतार सिर्फ दर्शन के लिए, दूसरी विशेष दर्शन की यानी सवाल पूछने की. नसीब में क्या है, यह जानने के लिए नंबर आने तक पत्नी व बच्चों के साथ लोग 4 दिनों तक कतार में लगे रहते हैं. भक्ति के साथ धर्म की दुकानदारी में तेजी आई. 2 रुपए में नहाने का पानी, खाने के लिए 15 रुपए, स्वच्छता के लिए 50 पैसे, सभी स्टाल चाहे वे किताबों के हों, प्रसाद के या कोल्डडिं्रक्स के, उन पर मठ का ही मालिकाना हक है. बाजार में नारियल 7 रुपए तो स्टाल पर 10 रुपए में. वह महाराज को देने के बाद फिर से वहीं पहुंच जाता है.

नरेंद्र महाराज की फोटो वाला पैन 10 रुपए में व महाराज का फोटो वाला बिल्ला 5 रुपए में बिकने लगा. यह बिल्ला सुरक्षाकवच है. यह जिस की छाती पर सजेगा वही इस दुनिया की समस्याओं से पार हो पाएगा. साथ में, महाराज की चमत्कारिक लीलाओं की किताब ‘लीलामृत’ 50 रुपए में. आने वाला भक्त पैन, बिल्ला, नारियल और लीलामृत ले कर ही घर लौटता है. अपने भक्तों को सुरक्षा कवच देने वाले इस महाराज को स्वसुरक्षा के लिए रिवौल्वर की जरूरत पड़ती है.

अनिरुद्ध बापू की दैवी शक्ति

वर्ष 1965 में जन्मे डा. अनिरुद्ध धैर्यधर जोशी ने वर्ष 1982 में चिकित्सा में एमडी किया. अनिरुद्ध बापू का चालीसा भी है. इस का पठन करने से भक्तों की समस्याओं का निवारण होता है और बापू साधना से सिद्ध की हुई सुपारी हाथों में लिए मन की इच्छा बोल दे तो काम बन गया समझो. लेकिन उस के लिए बापू से भेंट का या चालीसा पठन का संकल्प करना जरूरी है. बापू की तारीफों के पुल बांधने वाला साहित्य उन के दरबार के बाहर लगने वाले बाजारों में उपलब्ध रहता है. बापू और नंदामाई (बापू की पत्नी) की पोथियां, मंत्रों के स्टिकर्स, जेब में लगाने के पैन से ले कर अंगूठियां, कड़े तक पैसे दे कर भक्तगण खरीदते हैं. बापू के गुणगान करने वाली आरतियां, भजन, चालीसा, कवच ये सभी चीजें बापू के नाम से यहां पर बिक जाती हैं. पुणे से वडोदरा तक और पश्चिम बंगाल से पाश्चिमात्य देशों तक बापू के भक्त बिखरे हैं, यह बात यहां के सेवादार आने वाले भक्तों को बताते हैं. बापू की अहमियत बताने वाले ‘कृपासिंधु’ अंक में गुम हुआ बैग दिला दिया, एक रात में आंखें ठीक करवा दीं, आपत्ति आने से पहले भक्तों की सुरक्षा करने को बापू आ धमके, ऐसे बापू के चमत्कारों से भरे भक्तों के किस्से प्रकाशित किए जाते हैं.

आज बाबा के पास जाने वाला वर्ग बहुत शिक्षित है. इन आधुनिक बाबाओं और मठ, आश्रमों का सच यही है कि उन्होंने समाज के शिक्षित वर्ग को अपना लक्ष्य बनाया है. लोगों की श्रद्धा जिन देवीदेवताओं में है, उन की तसवीरें भी आसानी से बिकती हैं. इस का अर्थ यह हुआ कि शिक्षित वर्ग को भी चूना लगाने में वह सफल हुआ है. इन सारे बाबा, माताओं की जीवनी पर नजर डालें तो एक बात सामने आती है कि इन सभी योगी कहलाने वाले साधु महाराजों की भोगी, ऐशोआराम की वृत्ति खत्म नहीं हुई है. आज भी वे सामान्य जीवन के मोहमाया के आकर्षण में खुद ही फंसे हुए हैं — चाहे वह आसाराम हो, निर्मलजीत सिंह हो, सत्यनारायण राजू हो या कोई और. सच तो यह है कि इन बाबाओं के पैरों पर गिरने वाली सामान्य जनता भी अपनी मूलभूत समस्याओं का हल ढूंढ़ने ही वहां पर जाती है. सवालों से जूझते, आने वाली कठिन स्थितियों से मुक्ति की अपेक्षा से लोग इन की शरण लेते हैं. मनोवैज्ञानिक डा. राजेंद्र बर्वेजी इन महाराज, बापू, बाबाओं की आध्यात्मिकता और उन के प्रवचनों को सुनने वाले भक्तों की आध्यात्मिकता, साधना, ध्यान, धारणा, तंद्रा की तुलना एक गिलास मद्यपान करने वाले शराबी, जिसे नशा चढ़ता है, से करते हैं.

दरअसल धर्म, आस्था की आड़ में बाबा लोग जनता के हर वर्ग को अंधविश्वास के गड्ढे में डुबकी लगाने को प्रोत्साहित करते रहते हैं. अंधभक्त डुबकी लगाते रहेंगे, बाबा लोगों की झोली भरती रहेगी. हैरानी यह है कि पढ़ेलिखे, उम्रदराज अनुभवी, समझदार लोग भी उन के झांसे में आते रहे हैं. खुद को देवीदेवता, भगवान समझने वाले इन मां, बाबाओं और संतों ने अपने नाम के आगे ये उपाधियां स्वयं लगाई हैं. दैवी चमत्कार दिखाने का दावा करने वाले दैवत्व की दुकान चलाते ये बाबा और मां का एकमात्र उद्देश्य भक्तों की मानसिक कमजोरी का लाभ उठा कर अपनी दुकान चलाना है. जरूरत है कि भक्त की इच्छाओं के पीछे की सत्यता को जानने की कोशिश करें और इन के मोहमाया में फंसने के बजाय इन का परदाफाश करें.

नकली दवाओं का बाजार

बीमार आदमी इस उम्मीद से अस्पताल पहुंचता है कि वह स्वस्थ हो कर लौटेगा और फिर अपने कारोबार में जुट कर अपने घरपरिवार के भरणपोषण में जुट जाएगा. डाक्टर जो लिखता है और जिस तरह की जांच कराता है, मरीज सवाल किए बिना हाथ जोड़ कर उस का पालन करने के लिए विवश रहता है. डाक्टर और उस की दवा पर इतना विश्वास होता है कि मरीज उस के दिशानिर्देशों पर सख्ती से चलता है और अनुशासनात्मक ढंग से उस का पालन करता है. उसे मालूम नहीं होता कि जिस दवा से वह ठीक होने की उम्मीद पाल रहा है वह नकली है और संभव है कि इलाज कराने के दौरान इस से उस का स्वास्थ्य और खराब हो जाए. ऐसा इसलिए होता है कि बाजार में नकली दवाओं की भरमार है.

सरकार के पास इस पर नियंत्रण का कोई इलाज नहीं है. हाल ही में अमेरिका के फार्मास्युटिकल सिक्युरिटी इंस्टिट्यूट यानी पीएसआई ने एक सर्वेक्षण किया है जिस के अनुसार भारत नकली दवा के कारोबार में दुनिया में तीसरे स्थान पर है. पहले स्थान पर अमेरिका और उस के बाद चीन है. जबकि ब्रिटेन भारत के बाद चौथे स्थान पर है. वर्ष 2014 के इस सर्वेक्षण के अनुसार, अमेरिका में 319, चीन में 309, भारत में 239 तथा ब्रिटेन में 157 दवाएं नकली पाई गई हैं. भारत में 8.4 फीसदी दवा नकली बिक रही है अथवा उन में गुणवत्ता नहीं होती है. नकली दवाओं के कारण दुनिया में हर साल लगभग 10 लाख लोगों की मौत हो रही है. इन दवाओं के इस्तेमाल से यदि मरीज बच जाता है तो उसे अन्य कई तरह की परेशानियां होनी शुरू हो जाती हैं. सर्वेक्षण के अनुसार नकली दवाओं की दुनिया में लगभग 90 अरब डौलर का सालाना कारोबार है जो लगातार बढ़ रहा है. वर्ष 2013 में शीर्ष 5 नकली दवा के कारोबारी देशों में चीन, भारत, पाकिस्तान, जापान और अमेरिका शामिल थे. वर्ष 2014 के दौरान भारत में 2,35,000 डौलर की नकली दवाएं पकड़ी गई थीं. इस के अलावा इस अवधि में 39,300 डौलर की विटामिन, कैल्शियम आदि की नकली दवाएं पकड़ी गई थीं.

नेपाल की चीन से नजदीकी भारत की अनदेखी

नेपाल के नए संविधान की वजह से भारत और नेपाल के सालों पुराने रिश्ते पर दोधारी तलवार लटक गई है. नए संविधान में मधेशी ही नहीं बल्कि भारत की भी अनदेखी की गई है. ऐसा कर के नेपाल ने खुद ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारी है और भारत की सुरक्षा के लिए भी संकट खड़ा कर दिया है. नेपाली माओवादी पार्टियों की चीन से नजदीकियां बढ़ाने और भारत को तवज्जुह नहीं देने की सोचीसमझी साजिश है. मधेशी आंदोलन की वजह से भारत से जरूरी चीजों का आना बंद होने के बाद नेपाल ने चीन के सामने हाथ फैलाने में जरा भी देरी नहीं लगाई. नेपाल ने चीन से मांग की है कि वह नेपाल से लगी सीमा को खोल दे, ताकि वह जरूरत की चीजों को खरीद सके. नेपाल की इस मांग पर चीन की बाछें खिल गईं लेकिन भारत के लिए राहत की बात यह है कि पिछले दिनों नेपाल में आए भयंकर भूकंप से नेपाल और चीन के बीच बनी 27 किलोमीटर लंबी सड़क पूरी तरह बरबाद हो गई, जिस से चीन को अपना ‘खेल’ खेलने का मौका नहीं मिल सका.

नया संविधान लागू होने के बाद 11 अक्तूबर को सीपीएन-यूएमएल के अध्यक्ष खड्ग प्रसाद शर्मा ओली नेपाल के नए प्रधानमंत्री चुन लिए गए. नेपाल के 38वें प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ लेने के बाद ओली ने कहा कि वे नेपाल को हर तरह के संकट से उबारने की कोशिश करेंगे और नए संविधान को बेहतर तरीके से लागू करेंगे. ओली ने नेपाली कांगे्रस के अध्यक्ष सुशील कोइराला को हराया. इस के पहले संविधान सभा के निर्वाचन द्वारा प्रधानमंत्री की कुरसी पर बिठाए गए कोइराला ने 10 अक्तूबर को इस्तीफा दे कर दोबारा अपनी दावेदारी पेश की थी. स्पीकर सुभाष नेम्बांग ने प्रधानमंत्री चुनने के लिए चुनाव कराया, जिस में ओली को 388 वोट मिले और कोइराला को 249 वोट ही हासिल हुए. संविधान सभा के 597 सदस्यों में से 587 ने मतदान में हिस्सा लिया. बहुमत के लिए 299 वोटों की जरूरत थी. नेपाल में ओली की बातों को ‘ओली की गोली’ कहा जाता है. उन की छवि आक्रमक नेता की रही है और भारत विरोध की आग को वे अकसर हवा देते रहे हैं. फरवरी 1970 में कम्युनिस्ट पार्टी औफ नेपाल में शामिल होने वाले ओली माओवादी आंदोलन के दौरान 1973 से 1987 तक जेल में रहे. 4 फरवरी, 2014 को वे सीपीएन-यूएमएल के मुखिया बने. साल 1990 में लोकतंत्र बहाली के बाद 1994-95 में नेपाल के गृहमंत्री बने थे.

नेपाल मामलों के जानकार हेमंत राव कहते हैं कि ओली के प्रधानमंत्री बनने से भारत के लिए नया खतरा पैदा हो गया है क्योंकि ओली माओवादी हैं और प्रचंड की तरह वे भी भारत की अनदेखी कर चीन से रिश्ते बढ़ाएंगे. चीन नेपाल के कंधे पर बंदूक रख कर भारत को परेशान करने के मंसूबे आसानी से बना सकेगा. चीन के साथ नेपाल की 1,414.88 किलोमीटर सीमा लगती है. भारत के साथ 1850 किलोमीटर सीमा लगी हुई है. यह उत्तराखंड से ले कर बिहार, बंगाल और सिक्किम तक फैली हुई है. इतनी लंबी खुली सीमा होने की वजह से नेपाल की सुरक्षा से ही भारत की सुरक्षा जुड़ी हुई है.वहीं, नेपाल की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि वह भारत की मदद के बगैर एक कदम भी नहीं चल सकता है. भारत और नेपाल के बीच 1750 किलोमीटर खुली सीमा है, जो बिहार और उत्तर प्रदेश से लगी हुई है. दोनों देशों के लोग आसानी से इ धरउधर आ-जा सकते हैं. नेपाल जाने के लिए भारत से ही हो कर जाया जा सकता है, इसलिए नेपाल की मजबूरी है कि वह भारत से बेहतर रिश्ता बना कर रखे.

मधेशी आंदोलन

भारत-नेपाल शांति और मैत्री समझौता साल 1950 में किया गया था. उस के बाद से नेपाल की माली हालत के बनाने और बढ़ाने में भारत का बहुत बड़ा हाथ है. साल 1988 में जब नेपाल ने चीन से बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद की तो भारत ने नाराजगी जताई और उस के बाद से दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. साल 1991 में भारत और नेपाल के बीच व्यापार व माली सहयोग को ले कर नया समझौता हुआ. इस के बाद साल 1995 में नेपाल के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी ने दिल्ली यात्रा के दौरान 1950 के समझौते पर नए सिरे से विचार करने की मांग उठाई थी.

साल 2008 में जब नेपाल में माओवादियों की सरकार बनी और प्रचंड प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 1950 के समझौतों में बदलाव की आवाज बुलंद की. प्रचंड की सोच रही है कि इस 65 साल पुराने समझौते से भारत को ज्यादा और नेपाल को काफी कम फायदा हो रहा है. सरकार गंवाने के बाद भी प्रचंड ने लगातार भारत विरोध की सियासत जारी रखी है क्योंकि इस से जहां पहाड़ी नेपालियों का उन्हें पुरजोर समर्थन मिलता है वहीं चीन को भी खुश रखा जा सकता है. चीन को खुश करने के साथ नए प्रधानमंत्री के सामने भारत से तालमेल बना कर रखने और मधेशियों के आंदोलन को शांत करने की चुनौती है. मधेशी आंदोलन की आग में झुलसे नेपाल पर मरहम लगाने और मधेशियों के गुस्से पर पानी डालने के लिए ओली ने मधेशी नेता विजय कुमार गच्छधर को उपप्रधानमंत्री की कुरसी पर बिठा दिया है. दूसरी ओर देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की आग को हवा देने वाले कमल थापा को भी उपप्रधानमंत्री बना कर सत्ता संतुलन साधने की पूरी कोशिश की है. थापा के विश्व हिंदू परिषद के कद्दावर नेता अशोक सिंघल और भाजपा के सांसद योगी आदित्यनाथ से करीबी रिश्ते रहे हैं.

भारत के प्रधानमंत्री ने नेपाल के प्रधानमंत्री को भारत आने का न्यौता दिया है, लेकिन उन से पहले कमल थापा ने भारत आ कर मोदी से मुलाकात की. मोदी और भारत के कई नेताओं से कमल के बेहतर रिश्ते होने की वजह से भारत के साथसाथ नेपाल की नई सरकार को भी भरोसा है कि कमल दोनों देशों के बीच पैदा हुई खटास को आसानी से दूर कर लेंगे. गच्छधर को परिवहन और थापा को विदेश मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया है.मधेशी पीपुल्स राइट्स फोरम के नेता गच्छधर ने प्रधानमंत्री के चुनाव में ओली का समर्थन किया था, जिस वजह से उन्हें उपप्रधानमंत्री पद का पुरस्कार मिला है. उन की इस दगाबाजी से मधेशियों के बाकी संगठनों के नेता खफा हैं. गच्छधर  की मधेशियों के बीच कोई खास पैठ नहीं होने की वजह से मधेशियों की नाराजगी कम होने की उम्मीद काफी कम है, जबकि गच्छधर दावा करते हैं कि वे मधेशियों की समस्याओं को सुलझाने और उन की मांगों को पूरा करने के मकसद से सरकार में शामिल हुए हैं. वहीं, कई मधेशी नेता ओली पर यह आरोप लगा रहे हैं कि उन्होंने मधेशियों के बीच फूट डालने व मधेशी आंदोलन को कमजोर करने के लिए गच्छधर को उपप्रधानमंत्री पद दिया और गच्छधर ओली के जाल में फंस गए हैं

मधेशी आंदोलन की वजह से नेपाल में जरूरी सामानों की भारी किल्लत से अलग ही परेशानी खड़ी हो गई है. नेपाल में रोजाना 18,430 बैरल पेट्रोल, डीजल, कैरोसिन तेल और जेट ईंधन की खपत होती है और नेपाल इस के लिए पूरी तरह से भारत पर निर्भर है. पटना में रैस्टोरेंट चलाने वाला नेपाली दिनेश गुरंग कहता है कि संविधान में नेपालियों को अधिकार नहीं दे कर संविधान बनाने वाली समिति ने ही ‘आ बैल मुझे मार’  का काम किया है. पहाड़ी नेपालियों और तराई में रहने वाले मधेशियों के टकराव की वजह से नेपाल की आम जनता को जरूरी सामानों की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है. भारत-नेपाल सीमा के कई रास्तों पर हजारों ट्रक पिछले कई दिनों से खड़े रहे और नेपाल में जाने का इंतजार करते रहे. इस मुसीबत से निकलने के लिए भारत से रास्ता निकालने के लिए बात करने के बजाय नेपाल ने चीन के सामने मदद के लिए हाथ फैला दिया. चीन तो इसी ताक में बैठा था. नेपाल ने तातोपानी और रासुवगधी सीमा चौकियों को खोल कर व्यापार शुरू करने का अनुरोध किया है. चीन ने नेपाल की इस मांग को गंभीरता से ले कर रास्ते को खोलने का भरोसा दिया है.

आयात-निर्यात का पेंच

चीन तुरंत नेपाल को मदद पहुंचाने में नाकाम साबित हो रहा है क्योंकि पिछले अप्रैल महीने में नेपाल में आए भयंकर भूकंप के बाद नेपाल और चीन से सटे कई रास्ते बंद हो गए थे. नेपाल के सिंधुपाल्चोक जिले और चीन के तातोपानी जिले को जोड़ने वाली करीब 27 किलोमीटर लंबी सड़क भूकंप की वजह से पूरी तरह से बरबाद हो गई है. इस से पहले नेपाल ने 4 अक्तूबर को भारत को धमकी और चेतावनी देने के अंदाज में कहा था कि अगर भारत पैट्रोलियम व बाकी जरूरी सामानों को नेपाल भेजने पर रोक लगाता है तो मजबूर हो कर चीन के साथ जाना पड़ेगा. और कुछ ही दिनों में नेपाल ने अपनी मंशा चीन के साथ जा कर जाहिर कर दी. नेपाल के राजदूत दीप कुमार उपाध्याय ने कहा कि नेपाल सरकार की किसी भी भूल से पैदा हुए भ्रम और नकारात्मक बातों को भुला कर भारत को सही दिशा में आगे बढ़ना चाहिए. इस से दोनों ही देशों को फायदा होगा. वहीं नेपाल में भारत के राजदूत रंजीत राय लगातार नेपाल सरकार से संपर्क साध कर जरूरी सामानों की आपूर्ति बहाल करने की दिशा में बात करते रहे.

भारत लगातार यह सफाई देता रहा कि उस ने नेपाल को जरूरी सामान सप्लाई करने पर रोक नहीं लगाई है, बल्कि नेपाल में हो रहे विरोध प्रदर्शन व मधेशियों के आंदोलन की वजह से सामान नेपाल नहीं जा पा रहा है. भारतीय कंपनियों और टांसपोर्टर अपनी सुरक्षा की  गारंटी मांग रहे हैं. नेपाल सरकार ने जब ट्रकों की सुरक्षा का भरोसा दिलाया तब 4 अक्तूबर की रात को कुछ भारतीय ट्रक नेपाल की सीमा में घुसने को राजी हुए.

गौरतलब है कि नेपाल का करीब 90 फीसदी कारोबार और आयात भारत से ही होता रहा है. इस के बाद भी चीन से व्यापार के लिए सीमा खोलने की गुहार लगा कर नेपाल ने भारत और मधेशियों को ठेंगा दिखा दिया है. नेपाल ने मधेशियों को यह साफ कर दिया है कि वह भारत से सामानों के आने का और ज्यादा इंतजार नहीं कर सकता है. और भारत के बगैर भी उस का काम चल सकता है. भारत की अनदेखी कर नेपाल यह भूल गया है कि नेपाल में जरूरी सामान पहुंचाने का इकलौता रास्ता सड़क है जो भारत की ओर से ही गुजरती है. संविधान के विरोध में मधेशियों के आंदोलन की वजह से सारा रास्ता ठप हो गया. फलस्वरूप नेपाल में रोजमर्रा की जरूरी चीजों की किल्लत बढ़ने लगी थी.

बिहार-नेपाल सीमा के ‘नो मैंस लैंड’ पर 24 सितंबर से मधेशी धरने पर बैठे हुए हैं और जहांतहां विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं. रक्सौल, गौर, बैरगैनिया, औरईया, सिकटा, मंगलवा, मटियरवा, भिस्वा, भैरहवा जिलों में मधेशियों के आंदोलन से जनजीवन पूरी तरह से ठप हो गया था. मधेशी नेपाल के नए संविधान में मधेशियों को वाजिब अधिकार की मांग कर रहे हैं. 26 साल पहले साल 1989 में व्यापार एवं परागमन संधि के नवीकरण के बाद भी भारत और नेपाल की सीमा पर कई दिनों तक तनाव के हालात बने रहे थे. नेपाल की आबादी 2 करोड़ 60 लाख है और उस के 69 फीसदी मधेशी (भारतीय मूल के नेपाली), जनजाति और अल्पसंख्यक हैं. संविधान बनाने में देश की 69 फीसदी आबादी की अनदेखी करना किसी भी तरीके से इंसाफ नहीं कहा जा सकता है. ऐसी हालत में विरोध और उपद्रव होना हैरानी की बात नहीं है. मधेशी चूंकि भारतीय मूल के ही हैं, इसलिए भारत उन की परेशानियों को ले कर ज्यादा समय तक खामोश भी नहीं रह सकता है. नए संविधान को ले कर भारत सरकार अपनी निराशा और चिंता जाहिर कर चुकी है. अपनी पिछली नेपाल यात्रा के दौरान नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला से बातचीत के दौरान संविधान निर्माण में सभी की बराबर भागीदारी देने का अनुरोध किया था, उस के बाद भी नेपाल ने उन के अनुरोध को नकार दिया है. संविधान लागू होने के 2 दिन पहले भारत के विदेश सचिव एस जयशंकर नेपाल पहुंचे थे लेकिन उन्हें भी खास भाव नहीं दिया गया था.

रिटायर्ड आईएएस अफसर कमला प्रसाद कहते हैं कि नेपाल भारत को अपना बड़ा भाई मानते हुए एक ओर जहां उस से हर तरह की मदद पाने की जुगाड़ में लगा रहता है वहीं दूसरी ओर वह भारत पर चीन की धौंस जताने में जरा भी संकोच नहीं करता है. नेपाल एक दशक से भारत और चीन दोनों को खुश करने का खेल बड़ी ही चालाकी से खेल रहा है. जबकि भारत और चीन के बीच बफर स्टेट बने नेपाल की हालत पिछले 2 दशकों से सांपछछूंदर वाली रही है. नेपाल न भारत की अनदेखी कर सकता है न ही चीन की. उस की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि उसे हमेशा यह खयाल रखना पड़ता है कि वह जानेअनजाने कोई ऐसा कदम न उठा ले जिस से दोनों में से किसी को तकलीफ हो. नेपाल के लिए सब से बड़ी परेशानी यह रही है कि भारत और चीन दोनों उसे अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं. अब देखना है कि ओली की गोली की तरह निकलने वाली बोली का भारत और चीन पर क्या नया असर होता है.

साहित्यकारों की जागरूकता

आमतौर पर साहित्य अकादमी जैसी सरकारी संस्थाओं से जुड़े साहित्यकारों के प्रति धारणा रहती है कि वे सरकारी नीतियों के समर्थक होते हैं पर जिस तरह एकएक कर के लगभग 50 साहित्यकारों ने साहित्य के नाम पर मिले पुरस्कारों को लौटाया है उस से यह संतोष होता है कि देश में विचारों की स्वतंत्रता की रक्षा करने वाले मौजूद हैं भारतीय जनता पार्टी की चुनावी विजय के साथ यह अंदेशा तो था ही कि धार्मिक प्रचारप्रसार के साथ आलोचना करने वालों का मुंह बंद किया जाएगा क्योंकि यह पार्टी केवल सरकार चलाने के लिए नहीं गठित हुई थी. भारतीय जनता पार्टी शुरू से ही शास्त्रीय हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना करने का दावा करती रही है. उस का आदर्श वह रामराज्य है जिस में राजा चुना नहीं जाता था, पैदा होता था व जिस में राजा के तीरों की कम जबकि ब्राह्मणों, ऋषियों, मुनियों की ज्यादा चलती थी. रामायण व महाभारत यज्ञों के बखानों से ज्यादा भरे हैं बजाय सुशासन के, जिस का नारा दे कर 2014 का चुनाव जीता गया था.

स्पष्ट बात है कि 2014 की विजय को भारतीय जनता पार्टी अपनी धार्मिक विजय मानती है. धर्म को थोपने के लिए विधर्मी और अधर्मी दोनों को शत्रु मान सकती है. वह धर्म के खिलाफ ही नहीं बल्कि सामाजिक कुरीतियों, पाखंडों, अंधविश्वासों, चंदा जमा करने वालों के खिलाफ बोलने व मंदिरों के अतिक्रमणों तक की बात करने वालों को धर्मविरोधी मान सकती है. वह सोचती है कि उस के पास पोप के वे सब अधिकार हैं जिन को पोपों ने यूरोप में प्रोटैस्टैंट क्रांति से पहले लागू किया था और जनता को तो छोडि़ए राजाओं तक को अपनी उंगलियों पर नचाया था. यहां पोपशाही नहीं है पर उस जैसा माहौल बनाने की भरसक कोशिश की जा रही है. पाखंड विरोधियों, गोमांस, मंदिर निर्माण को ले कर मुंह बंद करने के जो प्रयास किए जा रहे हैं वे पोपशाही जैसी व्यवस्था की स्थापना के उद्देश्य से हैं.

साहित्यकारों का विरोध स्वाभाविक व आवश्यक है. वे जानते हैं और समझते हैं कि चंद लोगों के चलते आने वाला परिवर्तन देश को तालिबानी बना देगा. गांवगांव में धर्म के नाम पर ही नहीं, जाति के नाम पर भी लाइनें खिंच जाएंगी. इसलामी व ईसाई कट्टरता ने न केवल विधर्मियों के नरसंहार को समर्थन दिया, स्वधर्मियों को भी मारने में हिचकिचाहट नहीं दिखाई. समाज ने बड़ी कठिनाइयों से औरतों के बराबरी के अधिकारों, दलितों से भेदभाव में कमी, गरीबीअमीरी की खाई को कम किए जाने जैसे मुकाम हासिल किए हैं तो इसलिए कि साहित्य ने राजा व धर्म के गुणगान के स्थान पर फैली गंद को समाप्त करना पहला उद्देश्य माना. आज की सरकारें और उन से ज्यादा गलीगली फैले उन के अंधभक्त इस सुधार को समाप्त कर के न केवल विधर्मियों का बल्कि महिलाओं, स्वतंत्र विचारकों और किसी भी तरह की पोल खोलने वालों का भी मुंह तोड़ कर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते हैं. साहित्यकार कोई फौज तो तैयार नहीं कर सकते, वे अगर विरोध में पुरस्कार व सम्मान लौटा ही दें तो यह ही बेहद प्रशंसनीय है.

समाचार

राजस्थान में किसानों से सीखेंगे कृषि विभाग के लोग

जयपुर : किसानों को खेतीकिसानी की जानकारी देने वाले राजस्थान के कृषि अधिकारी व कर्मचारी अब प्रगतिशील व खेतों में काम कर के सफलता की बुलंदियां छूने वाले किसानों से एक कार्यशाला में खेतीबाड़ी की तालीम व जानकारी लेंगे.

‘राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति एवं सेंटर फार इंटर नेशनल ट्रेड इन एग्रीकल्चर एग्रो बेस्ड इंडस्ट्रीज’ (सिटा) द्वारा 16-17 अक्तूबर को आयोजित की गई 2 दिवसीय ‘कृषि पुनर्जागरण एवं कृषक संवाद संगोष्ठी’ के समापन के मौके पर राजस्थान के राज्य कृषि प्रबंध संस्थान के निदेशक डा. शीतल शर्मा ने यह जानकारी दी. उन्होंने कहा कि इस के लिए जल्दी ही कृषि विभाग द्वारा राज्य कृषि प्रबंध संस्थान में एक कार्यशाला आयोजित कराई जाएगी और इस में चुने हुए प्रगतिशील किसानों को बुलाया जाएगा. उन्होंने कहा कि नई व आधुनिक खेती में सब को एकदूसरे से सीखने की जरूरत है और ज्ञान से विज्ञान को जोड़ने की भी जरूरत है. अतिरिक्त उद्यान निदेशक शरद गोधा ने कहा कि राजस्थान के हर जिले में आज 25 से 50 किसान ऐसे हैं, जिन्होंने आधुनिक कृषि अपना कर अपना जीवन स्तर बदला है. उन्होंने कहा कि किसानों को बड़े आकार के फल और सब्जियां पैदा करने का रिकार्ड बनाने की बजाय बाजार व उपभोक्ताओं की जरूरत को ध्यान में रख कर सब्जियों का उत्पादन करना चाहिए.

गोष्ठी के उद्घाटन में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उपमहानिदेशक प्रो. नरेंद्र सिंह राठौर ने कहा कि हमारे देश में खेती के लिहाज से आज भी दूसरे देशों की तुलना में कम जमीन है. उन्होंने कहा कि देश में दलहन के लिए उपलब्ध रकबे में से आधे हिस्से पर ही इस की खेती किए जाने से दालों के उत्पादन में कमी आई है. यदि पूरे रकबे में इस का उत्पादन होता तो दालों का संकट पैदा नहीं होता. उन्होंने किसानों से पैदावार की ट्रेडिंग का काम अपने हाथों में लेने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि ऐसा होने पर किसान खुदबखुद खुशहाल हो जाएंगे. प्रो. राठौर ने कहा कि केंद्र सरकार का खेती की ओर पूरा ध्यान है और 13वीं पंचवर्षीय योजना में कृषि विज्ञान केंद्रों की संख्या भी 642 से बढ़ कर 1200 होने जा रही है, जिस का फायदा भी किसानों को मिलेगा. राजस्थान के कृषि आयुक्त कुलदीप रांका ने किसानों से आधुनिक कृषि तकनीक और नवीन व मिश्रित फसलों को शामिल कर के सरकारी योजनाओं का अधिक से अधिक लाभ उठाने को कहा. उन्होंने कम पानी में होने वाली जैविक खेती पर बल देते हुए किसानों से क्लस्टर बना कर जैविक खेती का विस्तार करते हुए आगे बढ़ने की बात कही. राजस्थान पशुचिकित्सा एवं पशुविज्ञान विश्वविद्यालय बीकानेर के कुलपति प्रो. एके गहलोत ने कहा कि कृषि व पशुपालन में आज भी नवाचार अपनाने की गति धीमी है, इस में तेजी लाने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि इस के लिए किसानों तक जानकारी पहुंचानी होगी और किसानों को उसे अपनाना होगा. उन्होंने कहा कि वैश्विक स्तर पर परिवर्तित जलवायु से कृषि क्षेत्र में भी चुनौतियां बढ़ी हैं, इन का तोड़ भी निकालना होगा.

इस अवसर पर सिटा के निदेशक भागवत धड़ाजी पवार ने कहा कि वर्तमान खेती इतनी खराब नहीं है, लेकिन हमें खेती में क्या करना है, क्या कर सकते हैं, नई दिशा क्या हो सकती है, निर्यातक कैसे बनें? वगैरह पहलुओं को मद्देनजर रखते हुए सही तकनीक से खेती करनी होगी, तभी हम आत्मनिर्भर बन सकेंगे. उन्होंने पौलीहाउस, ग्रीनहाउस और प्लास्टिक कल्चर की उपयोगिता से खेती में होने वाले लाभ पर भी प्रकाश डाला. गोष्ठी में दूरदर्शन केंद्र जयपुर के निदेशक रमेश शर्मा ने कहा कि आज खेती की जमीन किसी और की है और उस का लाभ कोई और ले रहा है. उन्होंने कहा कि जब कोई किसान खेती से दुखी हो कर आत्महत्या करता है तो लगता है कि एक कौम ने आत्महत्या कर ली है. यह दुखद है. राजस्थान प्रौढ़ शिक्षण समिति के निदेशक राजवीर सिंह ने उन्नत खेती पर जोर देते हुए इस में आने वाली समस्याओं पर विस्तार से अपने विचार जाहिर किए जबकि समिति के अध्यक्ष डा. राजेंद्र भाणावत ने किसानों की समस्याओं को सुना और समाधान की कोशिश की.

कृषक संवाद में जम्मू कश्मीर से आए मकबूल मोहम्मद रैना, हरियाणा के ईश्वर सिंह कुंडू, प्रिंस कंबोज, राजस्थान की राज दईयां, सुंडाराम वर्मा, भगवती देवी, जगदीश पारीक, मोटाराम शर्मा, गुरमेल सिंह धौंसी व जसवीर कौर सहित तमाम प्रगतिशील किसानों ने अपनी सफलताओं की जानकारी दी और वहां तक पहुंचने में आई कठिनाइयों के बारे में बताया.इस मौके पर देशभर से आए करीब 30 किसानों को सम्मानपत्र दे कर सम्मानित किया गया. गोष्ठी के समाप्न पर डा. महेंद्र मधुप ने सभी का शुक्रिया अदा किया.                       

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सभी किसानों को मिलेगा मुआवजा

लखनऊ : कुदरती कहर से फसल तबाह होने पर अब उत्तर प्रदेश सूबे के सभी किसान मुआवजे के हकदार होंगे, भले ही बैंक ने संबंधित किसान के ‘किसान क्रेडिट कार्ड’ पर बीमा की किस्त काटी हो या न काटी हो. ‘राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन’ के राष्ट्रीय संयोजक वीएम सिंह की याचिका पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने यह फैसला दिया?है. वीएम सिंह के मुताबिक पिछले साल रबी के दौरान भयंकर बारिश व ओलों से सूबे के 1 करोड़ 60 लाख किसानों की फसलें तबाह हुई थीं. इसी बीच 1153 किसानों की मौतें हुईं. इन में से कई किसानों ने खुदकुशी की तो तमाम किसानों की मौत फसल की तबाही के सदमे में हो गई. सिंह ने बताया कि ओलों व बरसात से सूबे के 73 जिलों में करीब 84 लाख हेक्टेयर यानी 2 लाख 13 हजार एकड़ रकबे में फसलों की बरबादी हुई. सूबे की सरकार ने तबाही में कुल मिला कर 7543 करोड़ 14 लाख रुपए के नुकसान का अंदाजा लगाया. इस पर सिंह ने तर्क दिया कि 1 एकड़ रकबे में अगर महज 10 हजार रुपए का भी नुकसान माना जाए, तो भी कम से कम 20 हजार करोड़ रुपए का नुकसान बैठेगा.   

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इजाफा

अनाज भंडारण कूवत बढ़ेगी

पटना : बिहार में अनाज भंडारण की कूवत बढ़ाने की कवायद शुरू की गई है. साल 2017 तक 20 लाख 75 हजार मीट्रिक टन अनाज भंडारण की कूवत बढ़ा लेने का लक्ष्य रखा गया?है. फिलहाल राज्य में 37 करोड़ रुपए खर्च कर के 143 गोदामों को बनाने का काम पूरा कर लिया गया है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून व अंत्योदय योजना सहित अन्य कई योजनाओं के लाभ पाने वालों को समय पर अनाज मुहैया कराने के लिए अनाज भंडारण की कूवत बढ़ाने का काम चालू किया गया है. गोदामों को बनाने का काम पंचायत लेबल पर किया जाना है.

अनाज भंडारण की कूवत बढ़ाने के लिए पैक्सों और व्यापार मंडलों को 10 लाख, 75 हजार मीट्रिक टन कूवत के गोदाम बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. वहीं दूसरी ओर राज्य भंडार निगम को 10 लाख मीट्रिक टन कूवत के गोदाम बनाने का काम सौंपा गया है. राज्य भंडार निगम से मिली जानकारी के मुताबिक अब तक 6.50 लाख मीट्रिक टन कूवत के गोदाम बनाने का काम अंतिम स्टेज में?है और चालू माली साल में 2 लाख मीट्रिक टन की कूवत वाले गोदाम बना लिए जाएंगे.पैक्स और व्यापार मंडल इन गोदामों में धान व गेहूं सहित सभी अनाज रख सकेंगे. इन गोदामों में किसान खाद भी रख सकेंगे.     

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हकीकत

गन्ने की मिठास चीनी से भी कम

चंडीगढ़ : लगता है कि इस बार गन्ने की मिठास चीनी से भी कम है. चीनी तो मीठी है, पर हरियाणा के गन्ने की मिठास कम होती जा रही है. पिछले साल की तुलना में इस बार गन्ने से कम मात्रा में चीनी निकली. यूरिया का ज्यादा इस्तेमाल इस की अहम वजह मानी जा रही है. प्राइवेट शुगर मिलें गन्ने से चीनी की कम रिकवरी को आधार बना कर इस बार समय से पहले उत्पादन करने को तैयार नहीं हैं. वहीं किसानों के भुगतान के लिए राज्य सरकार निजी शुगर मिलों को लोन दिलाने में मदद करती है, लेकिन सरकार से ज्यादा मदद की आस में मिलमालिकों के नखरे बढ़ रहे हैं. बाजार में इस बार चीनी के दाम काफी नीचे गिरे हैं. कच्चे तेल के दाम में गिरावट और ब्राजील समेत दूसरे चीनी उत्पादक देशों द्वारा एथेनोल बनाने के बजाय ज्यादा चीनी का उत्पादन इस का सब से बड़ा कारण रहा है. हरियाणा में चीनी मिलों की लागत ज्यादा आ रही है. लागत अधिक होने और चीनी की रिकवरी कम पड़ जाने से मिलें घाटे में जा रही हैं. इसे आधार बना कर वे किसानों का गन्ना खरीदने को तैयार नहीं हैं. कृषि मंत्री ओमप्रकाश धनखड़ ने विधानसभा के मानसून सत्र में खुद इस बात को माना. उन्होंने कहा कि जमीन की स्थिति, मौसम और दूसरी भौगोलिक हालात के कारण गन्ने से चीनी की रिकवरी इस बार काफी कम हुई है. उत्तर प्रदेश में 9 फीसदी और महाराष्ट्र में 11 फीसदी चीनी की रिकवरी हुई है, वहीं हरियाणा में साढे़ 8 से 9 फीसदी तक रिकवरी हुई है.                          

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हालात

अरहर की दाल हुई बेकाबू किल्लत बरकरार

नई दिल्ली : त्योहार का सीजन आते ही दालों ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए हैं. कभी साधारण तबके का आहार समझी जाने वाली अरहर की दाल अब आम लोगों के बस से बाहर की बात हो गई है. कहा जाता है कि पैसे वाले लोग ही महंगी दालें खा सकते हैं, पर ऐसा नहीं है. सच यही है कि महंगाई की मार से कोई भी अछूता नहीं बचा है. हैदराबाद में लोग दाल छोड़ कर अंडे खा रहे हैं. वहीं बिहार में गरीब लोग चावल और चटनी का जायका ले रहे हैं. वे कहते हैं कि पता नहीं क्यों दाल की आसमान छूती कीमतें चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाईं. अरहर की दाल अब 200 रुपए प्रति किलोग्राम है. दिल्ली में इस से सस्ता तो चिकन है. चिकन 150-160 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से मिल रहा है. सड़क के किनारे खाने की दुकान लगाने वाली एक औरत ने बताया कि जब दाल 140 रुपए प्रति किलोग्राम थी, तो वह 1 प्लेट दालचावल का 40 रुपए लेती थी. अब दाल की कीमत बढ़ गई है, तो वह 1 प्लेट दालचावल का दाम 50 रुपए लेती है. दिल्ली में अरहर या तूर की दाल की कीमत खुदरा बाजार में 200 रुपए प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई है. वहीं दिल्ली के बाहर दूसरी दालें भी सस्ती नहीं हैं.

डब्बाबंद तूर की दाल 180 से 200 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही है. धुली मसूर की कीमत 130 और 180 रुपए प्रति किलोग्राम के बीच है. इसी तरह मूंग व उड़द की दालें भी 140 ये 150 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही हैं. मार्च में बेमौसम बरसात के कारण इस साल दाल की कीमतों में बेइंतहा इजाफा हुआ है. कुछ लोगों का कहना है कि कीमतें अभी और भी बढ़ेंगी.          

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नसीहत

पढ़ाई के साथ सब्जियां उगाएं

पटना : शहर में एक ऐसा कालेज है, जहां के स्टूडेंट पढ़ाई के साथसाथ कालेज कैंपस की खाली पड़ी जमीन पर सब्जियां और फल उगाते हैं. खेती से कालेज को आमदनी होती?है और साथ ही कैंपस में हरियाली भी रहती है. पटना वूमेंस कालेज की छात्राएं कैंपस में खेती कर के राज्य और देश के बाकी कालेजों के लिए मिसाल पेश कर रही?हैं. कैंपस में कालेज के स्टाफ और छात्राएं मिल कर खेती का काम करते हैं. फल और सब्जियों को मार्केट रेट से काफी कम कीमत पर बेचा जाता है. कालेज के हास्टल में रहने वाली छात्राओं को इस से काफी फायदा मिल जाता?है. उन्हें हास्टल में भी कम कीमत पर फलसब्जियां मिल जाती हैं.                   

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फरमान

धान का पैसा दे सरकार

पटना : बिहार के किसानों को तय समय पर धान का पैसा नहीं मिलने से नाराज और हताश किसान आखिरकार अदालत का दरवाजा खटखटा रहे?हैं. इस मामले पर दर्जन भर से ज्यादा रिट याचिकाओं की सुनवाई करते हुए पटना हाईकोर्ट ने आदेश दिया है कि राज्य और केंद्र सरकार हर हाल में किसानों को पैसा दें. इस के साथ ही धानखरीद की तय की गई तारीख तक खरीदे गए धान का उठाव भी किया जाए. अदालत ने कहा है कि जिन किसानों ने निर्धारित समय से पहले पैक्स समेत खरीद केंद्रों पर अपना धान दे कर उस की रसीद ले ली है, उन किसानों को धान का पैसा फौरन देना होगा. गौरतलब है कि पैक्स किसानों का धान लेने के बाद भी भुगतान करने में आनाकानी कर रहे?हैं. इस से किसानों की मालीहालत खराब हो रही?है और?बैंकों और महाजनों से लिया गया कर्ज चुकाने में दिक्कत हो रही?है. इस साल 91 लाख मीट्रिक टन धान उत्पादन का लक्ष्य रखा गया था और 30 लाख मीट्रिक टन धान की खरीद का भी लक्ष्य तय किया गया था. धान की खरीद में देरी होने और कई तरह के पेंच होने की वजह से कई किसान बैंकों और महाजनों का कर्ज चुकाने और अपने परिवार का पेट पालने के लिए बिचौलियों को अपना धान बेचने के लिए मजबूर हुए थे. उम्मीद है कि अदालत के फरमान के बाद किसानों को अपना पैसा मिल जाएगा.     

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तरक्की

मुरगीपालन में नया कदम

नई दिल्ली : भारत के देहाती इलाकों में मुरगीपालन पारंपरिक काम रहा है. यह काम आमतौर पर काफी लोग करते हैं, लेकिन इस काम से वे ज्यादा मुनाफा नहीं ले पाते. क्योंकि उन लोगों को नईनई तकनीको के बारे में जानकारी नहीं होती?है. मुरगीपालन को बढ़ावा देने की दिशा में नई तकनीक इजाद की है ‘तेलंगाना स्टेट यूनिवर्सिटी फोर वैटेरिनटी, एनिमल एवं फिशनरी साइंस हैदराबाद’ ने. इस तकनीक से 1 साल के अंदर 1 मुरगी 150 अंडे देती है. इसतकनीक के तहत मुरगी का वजन 18 हफ्तों में डेढ़ किलोग्राम हो जाता?है और 5 से 6 महीने में मुरगी दोबारा अंडे देने के लिए तैयार हो जाती है. इस मुरगी के अंडे ब्राउन कलर के होते?हैं, जो दूसरे अंडों के मुकाबले ज्यादा पौष्टिक होते हैं. ठ्ठ

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खोज

खून बढ़ाएगी आलू की नई किस्म

पटना : केंद्रीय आलू अनुसंधान केंद्र ने आलू की एक नई किस्म को विकसित किया है. इस का ऊपरी हिस्सा नीला और भीतरी हिस्सा लाल रंग का?है. इसे खाने से शरीर में खून की कमी दूर होगी. खास बात यह है कि इस नई किस्म के आलू के पौधों को कीटों से?भी कोई खतरा नहीं होगा और साधारण आलू के मुकाबले उत्पादन भी ज्यादा होगा. इस किस्म का शुरुआती प्रयोग कामयाब रहा?है और जल्द ही नई किस्म को नाम भी दिया जाएगा. अगले 2 सालों में किसानों को इस नई किस्म का बीज मिलने लगेगा. आलू का उत्पादन करने वाले किसानों को कीमत भी ज्यादा मिलेगी. बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, पंजाब और छत्तीसगढ़ वगैरह राज्यों में आलू की नई किस्म के उत्पादन के लिए सही वातावरण है. इस आलू में विटामिन ए और सी भरपूर मात्रा में हैं और इसे खाने से मोटापा भी नहीं बढ़ेगा. इस में फैट की मात्रा कफी कम?है. इस में फाइबर की मात्रा ज्यादा है, जिस से यह पचने में आसान है. आलू की बाकी किस्मों के मुकाबले यह ज्यादा समय तक सुरक्षित रह सकता?है. इस आलू को गाजर, मूली, खीरा, टमाटर व चुकंदर वगैरह की तरह सलाद के रूप में भी खाया जा सकता?है. केंद्रीय कृषि अनुसंधान केंद्र की पटना शाखा के डायरेक्टर वीरपाल सिंह ने बताया कि इस आलू की फसल कम से कम 70 और अधिक से अधिक 90 दिनों के भीतर तैयार हो जाएगी. इस आलू की प्रति हेक्टेयर 400-500 क्विंटल तक पैदावार मिल सकेगी और इस में झुलसा रोग होने का खतरा भी काफी कम होगा.

गौरतलब है कि बिहार में सालाना 70 लाख टन आलू की पैदावार होती है. मुख्य रूप से पटना, नालंदा, वैशाली, सिवान, छपरा, समस्तीपुर, बेगूसराय, गोपालगंज, पूर्णियां, कटिहार, भागलपुर, मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण में आलू का उत्पादन बड़े पैमाने पर होता?है.                       ठ

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तकनीक

मिट्टी की जांच अब होगी जीपीएस से

लखनऊ : भारत के तमाम किसान खेतीबारी में अभी भी पुराने तरीके ही आजमाने की कोशिश करते हैं. ज्यादातर किसानों का मानना है कि पुराने तरीके तो सीखे हुए हैं, लेकिन नए तो सीखने पडे़ंगे. सीखने के लिए वक्त चाहिए, जो उन के पास नहीं है. जितने दिन सीखेंगे, उतने दिनों में तो पूरी खेती हो जाएगी. पुराने समय में भले ही मिट्टी की जांच हाथ में ले कर की जाती थी, पर अब ऐसा नहीं है. सूत्रों के मुताबिक, अब जीपीएस सिस्टम से मिट्टी की जांच की जाएगी. मिट्टी नमूनों की जांच के लिए जमीन भी जीपीएस सिस्टम से तय की जाएगी. जांच के आधार पर जो आंकड़े आएंगे, उन की भी डिजिटल मैपिंग की जाएगी. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अफसरों ने यह हिदायत उत्तर भारत के राज्यों से आए कृषि विभाग के अधिकारियों को एक बैठक में दी. इस बैठक में सामने आया कि ज्यादा से ज्यादाकैमिकल खाद के इस्तेमाल से मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है. उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश सब से बड़ा राज्य है. यहां की मिट्टी में भी उर्वरता में काफी कमी आई है, जो कि चिंता की बात?है. बैठक में सभी राज्यों को निर्देश दिया गया कि 5 दिसंबर को अंतर्राष्ट्रीय मृदा यानी मिट्टी दिवस बड़े पैमाने पर मनाया जाए, ताकि किसानों में मिट्टी को ले कर जागरूकता आए.

बैठक में कृषि विभाग के अफसरों से कहा गया कि मिट्टी जांच का जो विश्लेषण हो, उस की पूरी जानकारी किसानों को जरूर दी जाए. मिटटी के नमूनों की जांच के आधार पर ही जरूरत के अनुसार खाद का इस्तेमाल करने के लिए किसानों को बताया जाए. कैमिकल खाद के कम से कम इस्तेमाल और जैविक खाद के ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल पर जोर दिया जाए.     

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मुहिम

बाढ़ का गाद बेच किसान बनेंगे मालामाल

पटना : बिहार की कोसी नदी की बालू से टाइल्स, क्राकरी के सामान और ईंट बनाने की योजना बनाई गई?है. साल 2008 में कोसी नदी में आई भयंकर बाढ़ के बाद बाढ़ प्रभावित इलाकों में काफी बालू और गाद जमा हो गया?है. कोसी ने जिन इलाकों में बाढ़ का कहर मचाया था, उन इलाकों में करीब 20 फुट तक बालू और गाद जमा हो गया है, जिसे हटाना सरकार के लिए मुसीबत बनी हुई है. कृषि उत्पादन आयुक्त विजय प्रकाश ने बताया कि वेस्ट को वेल्थ बनाने के लिए कोसी की जमी बालू और गाद की जांच का काम शुरू किया गया?है. इस के रासायनिक और भूगर्भीय गुणों के साथ ही इस के औद्योगिक कामों में इस्तेमाल की संभावनाओं की पड़ताल भी की जा रही?है. खेतों में जमा बालू को बेच कर किसानों को काफी मुनाफा भी हो सकेगा. आईसीएआर (पटना), सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (नई दिल्ली) और सेंट्रल ग्लास एंड सेरेमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (कोलकाता) बालू की स्टडी का काम कर रही?हैं. अगले 2 महीने में रिपोर्ट आने के बाद बालू और गाद से टाइल्स वगैरह बनाने के लिए इंडस्ट्री मालिकों से बाकायदा बातचीत की जाएगी.

सेंट्रल ग्लास एंड सेरेमिक रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिक पीके मुखोपाध्याय ने बताया कि शुरुआती रिपोर्ट के मुताबिक कोसी की बालू और गाद से टाइल्स और क्राकरी वगैरह के बनाने का काम किया जा सकता?है. इस में लागत भी कम आने की उम्मीद है. अंतिम रिपोर्ट आने के बाद अगर बालू व गाद का इस्तेमाल हो सकेगा, तो जिन किसानों के खेतों में बालू और गाद जमा?हैं, उन किसानों को भी खासा मुनाफा हो सकेगा.               

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तालीम

पढे़लिखे ही पाएंगे बिक्री का लाइसेंस

नई दिल्ली : उर्वरक बिक्री करने का लाइसेंस कृषि की पढ़ाई करने वालों को ही मिल सकेगा. केंद्र सरकार ने इस संदर्भ में एक गजट नोटिफिकेशन जारी किया?है. हालांकि जिन लोगों के पास पहले से लाइसेंस है, उन्हें अभी कोई समस्या नहीं होगी. कृषि जानकारों का कहना?है कि सरकार के इस फैसले से कृषि के क्षेत्र में दूरगामी नतीजे होंगे. अब तक कृषि उर्वरक, कीटनाशक बेचने का लाइसेंस कोई भी व्यक्ति आसानी से ले सकता था, जिस के कारण घटिया उर्वरक, बीज, कीटनाशक वगैरह उन के द्वारा किसानों तक पहुंचते थे. किसानों को किस खेत में कितना खाद बीज इस्तेमाल करना है इस की जानकारी भी ये लोग नहीं दे सकते?थे. इसलिए सरकार का यह फैसला किसानों के हित में होगा. साथ ही कृषि पढ़ने वालों को रोजगार का साधन भी मिलेगा. सरकार के इस फैसले के तहत जिन्होंने कृषि विज्ञान में स्नातक किया हो या किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से कृषि क्षेत्र का कोई कोर्स किया हो. उन्हें ही इस का फायदा मिल सकेगा.      

             

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सुविधा

एससीएसटी को मुफ्त चूजे

पटना : बिहार के एससी और एसटी वर्ग के लोगों की माली हालत में सुधार के साथ उन के स्वास्थ्य को दुरुस्त रखने के लिए एक ही तीर से 2 शिकार करने की योजना बनाई गई?है. इस के तहत एससी और एसटी वर्ग के गरीब लोगों को मुफ्त में 25-25 चूजे दिए जाएंगे. सरकार को यकीन है कि इस से एससीएसटी के गरीब लोग मुरगीपालन कर के अपनी आमदनी बढ़ाएंगे और साथ में मुरगी के अंडों को खा कर अपने स्वास्थ्य को भी दुरुस्त रख सकेंगे. मुरगीपालन कर के हर परिवार को हर महीने 3 हजार रुपए तक की आमदनी हो सकेगी. 63 हजार एससीएसटी परिवारों के बीच 15 लाख, 75 हजार चूजे बांटने का लक्ष्य रखा गया?है. 1 चूजे को 1 महीने तक मदर यूनिट में रख कर वैक्सीन कराने के लिए 35 रुपए दिए जाएंगे. इस योजना पर राज्य सरकार 6 करोड़ रुपए खर्च करेगी. लो इनपुट वेराइटी की मुरगी बाकी वेराइटी के मुकाबले ज्यादा अंडे देती है. इस वेराइटी की मुरगी हर साल 150 से 175 अंडे देती?है. सब से खास बात यह?है कि इस वेराइटी की मुरगी के रखरखाव पर ज्यादा खर्च भी नहीं आता है. इस किस्म की मुरगी को घर के आसपास ही खाने के लिए अनाज और कीड़ेमकोड़े मिल जाते?हैं, इसलिए उसे खिलाने के लिए अलग से कोई इंतजाम नहीं करना पड़ता है. अगर अलग से कुछ खाने को दिया जाए तो इस किस्म की मुरगी और मुरगा का वजन काफी बढ़ जाता है. एक मुरगा 2-3 किलोग्राम तक का हो सकता?है और ऐसे मुरगे की कीमत 300 से 400 रुपए तक आसानी से मिल जाती?है. वहीं 1 अंडे के 7 से 10 रुपए तक मिल जाते?हैं.                    

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वापसी

मैगी अब नए रंगरूप में

मुंबई : बस 2 मिनट में बनने वाली बेहद लोकप्रिय मैगी बच्चों को आज भी याद है. मैगी का नाम सुनते ही उन के मुंह में पानी आ जाता है. बच्चों की चहेती बन चुकी नैस्ले की मैगी फिर से बाजार में जल्दी ही दिखने लगेगी मैगी के नमूने की जांच को मुंबई हाईकोर्ट ने सही ठहराया है. कंपनी का कहना है कि वह दोबारा बाजार में मैगी उतारेगी. बता दें कि नैस्ले कंपनी की मैगी में लैड की मात्रा ज्यादा पाई गई थी. इस के बाद कंपनी ने बाजार से मैगी के पैकेट वापस मंगा लिए थे और उन को जला दिया गया था. इस से इस कंपनी को करोड़ों रुपए की चपत लगी थी. इधर बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि की आटे से बनी मैगी बाजार में जल्दी ही देखने को मिलेगी. अब देखना यह है कि बच्चों को कौन सी मैगी भाती है. अरबों रुपए का कारोबार करने वाले बाबा रामदेव बडे़बडे़ रिटेल स्टोरों के साथ तालमेल बनाने पर जुटे हैं. बाबा रामदेव की कंपनी पतंजलि ने अपनी चीजों को बेचने के लिए फ्यूचर ग्रुप से एक करार किया है.           

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मुहिम

बिहार में दूध उत्पादन में लंबी छलांग

पटना : बिहार सरकार का दावा है कि पिछले 7 सालों में राज्य में दूध उत्पादन में 4 गुना इजाफा हुआ है. दुग्ध संघों और सहकारी समितियों की कोशिशों की वजह से यह मुमकिन हो सका है. पटना, मगध और तिरहुत समेत सभी 38 जिलों के दुग्ध संघों ने बेहतर नतीजे दिए हैं. साल 2008 में जहां 4 लाख, 17 हजार किलोग्राम दूध उत्पादन होता था, वह आज बढ़ कर 16 लाख, 90 हजार किलोग्राम हो चुका है. इस के अलावा हजारों किलोग्राम दूध दुग्ध उत्पादक अपने घरों के लिए भी रख रह हैं. बिहार स्टेट मिल्क कोआपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड सहित बाकी सहकारी समितियों के मुताबिक नई तकनीक और रिसर्च का फायदा मिल्क इंडस्ट्री को मिला?है. राष्ट्रीय डेरी विकास के द्वारा चलाए जा रहे ट्रेनिंग प्रोग्राम से दूध उत्पादकों को काफी मदद मिली है. बिहार स्टेट मिल्क कोआपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड के एमडी आदेश तितरमारे ने बताया कि डेरी विकास की योजनाओं से किसानों और दूध उत्पादकों को फायदा मिल रहा है. पशुपालन से ले कर पशुओं को पौष्टिक चारे और संतुलित आहार देने तक की ट्रेनिंग पशुपालकों को दी गई है और किसानों ने उस पर अमल भी किया है.

राज्य के बड़े दुग्ध उत्पादन संघ वैशाल पाटलीपुत्र दुग्ध उत्पादन संघ ने साल 2011-12 में 210.15 लाख किलोग्राम, साल 2012-13 में 224.85 लाख किलोग्राम, साल 2013-14 में 282.09 लाख किलोग्राम और साल 2014-15 में 318.15 लाख किलोग्राम दूध का उत्पादन किया.        

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बेबसी

सूखे से लाखों किसान परेशान

जयपुर : राजस्थान भी सूखे की मार झेल रहा है. राजस्थान के मुख्यमंत्री रह चुके अशोक गहलोत ने कहा कि प्रदेश और देश में आज भयंकर अकाल व सूखे जैसे हालात हैं. लाखों किसानों के सामने जीवन का संकट खड़ा हो गया है, जिसे सरकार को गंभीरता से लेना चाहिए. उन्होंने कहा कि मनरेगा के कारण सरकारों पर से अकालसूखे से निबटने का दबाव कम तो हुआ है, फिर भी इसे गंभीरता से लिया जाना जरूरी?है. अशोक गहलोत ने माना कि जब से संप्रग सरकार ने कानून बना कर मनरेगा लागू किया है, तब से सरकारों पर से दबाव कम हुआ है, लेकिन फिर भी समय पर राहत कार्य नहीं किए जा रहे हैं. पीने के पानी का भी सही इंतजाम नहीं है. उन्होंने जोर दे कर कहा कि राज्य सरकार ने ओले गिरने और बेमौसम बारिश के समय जिस लापरवाही का प्रदर्शन किया, उस से सबक लेते हुए उसे समय रहते तुरंत सूखे से जुडे़ राहत कार्य शुरूकरने चाहिए.              

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हालात

एक करोड़ टन दाल के आयात की जरूरत

नई दिल्ली : काफी अरसे से मचा दाल का हाहाकार किसी से छिपा नहीं है. इस मामले ने आम आदमी का चावलरोटी तो फीका किया ही है, साथ ही सरकार की हालत भी खस्ता कर दी है. अब आलम यह है कि घरघर की दाल की दिक्कत दूर करने के लिए सरकार को 1 करोड़ टन दाल का आयात करना पड़ेगा. कमजोर मानसून के कारण इस साल दाल का उत्पादन महज 170 लाख टन रहने का अंदाजा है. बीते साल में दाल का उत्पादन 172 लाख टन था, तब इतना हाहाकार मचा तो उत्पादन और कम होने पर क्या नजारा होगा, इस का अंदाजा लगाया जा सकता है. औद्योगिक संगठन एसोचैम के एक अध्ययन में इस बात का खुलासा किया गया है. इसी अध्ययन के मुताबिक इस साल दाल की मांग में और इजाफा होने से 1 करोड़ टन दाल आयात करनी पड़ेगी. एसोचैम का अंदाजा है कि वैश्विक स्तर पर दाल की आसानी से आपूर्ति न होने के कारण इस साल दाल की मांग व आपूर्ति के अंतर को पाटना मुश्किल होगा. दाल के दामों में लगातार इजाफे से इस का असर महंगाई पर भी नजर आएगा. खरीफ की फसल दाल के उत्पादन में पूरे भारत में महाराष्ट्र सूबा पहले नंबर पर है. महाराष्ट्र के बाद कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश व उत्तर प्रदेश सूबों में सब से ज्यादा दाल पैदा की जाती है. खरीफ में दाल के उत्पादन में इन पांचों सूबों की हिस्सेदारी 70 फीसदी है, मगर इन सभी सूबों में इस बार मौसम ने कहर बरपाया है, लिहाजा पैदावार गड़बड़ाना लाजिम है.

बहरहाल, हालात आसानी से काबू में आने वाले नहीं हैं. बड़े पैमाने पर दाल के आयात से आयात बिल पर बोझ बढ़ेगा, इस के अलावा आयातित दाल को देश के सभी हिस्सों में पहुंचाना भी सरल नहीं है.         

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मुहिम

किसान आंदोलन : रेल हुई बेपटरी

चंडीगढ़ : बरबाद हुई फसल का सही मुआवजा न मिलने के विरोध में उतरे किसानों ने रेल रोको आंदोलन चलाया. इस से पंजाब में रेल यातायात ठप रहा.  उधर, किसानों के आंदोलन व धरने को कमजोर करने के लिए मुख्य रास्तों और गंवई इलाके के कच्चे रास्तों पर नाकाबंदी कर दी गई. बठिंडा पुलिस ने अब तक 3 सौ से ज्यादा किसानों को पकड़ा है. वहीं रामपुरा में पुलिस और रेलवे ट्रैक जाम कर रहे किसानों के बीच टकराव होतेहोते टला. इसी तरह अमृतसर के गांव मुछल में बासमती धान की वाजिब कीमत की मांग को ले कर किसान अपनी बात पर डटे रहे. अमृतसर स्टेशन पर न तो कोई रेलगाड़ी पहुंची और न ही वहां से कोई ट्रेन चली. सभी रेलगाडि़यों को ब्यास स्टेशन सेपहले ही रोक दिया गया. कृषि मंत्री तोता सिंह से इस्तीफे की मांग की गई. किसानों की मांग है कि कपास फसल की बरबादी का मुआवजा 40 हजार रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से दिया जाए, किसानों का कहना है कि आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार को माली मदद दी जाए और ऐसे परिवारों के 1-1 सदस्य को नौकरी भी दी जाए.

मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने रेल रोको आंदोलन कर रहे किसानों से संघर्ष का रास्ता छोड़ने की अपील की. इस वजह से मुसाफिरों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. मुख्यमंत्री ने कहा कि वे किसानों की जायज मांगों को मानने के लिए हमेशा तैयार रहे हैं. किसानों के आंदोलन का असर भारतपाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस पर भी पड़ा. साथ ही, किसानआंदोलन की गाज सरकारी अफसरों पर भी गिरी. प्रदेश सरकार ने पुलिस महकमे में भारी फेरबदल करते हुए 3 एसएसपी समेत 21 आईपीएस और 6 पीपीएस अधिकारियों का तबादला कर दिया. सरकार का मानना है कि किसानों में उपजे गुस्से के बारे में सरकारी मुलाजिम पूरीपूरी और सही सही जानकारी नहीं जुटा सके, इसी वजह से किसान रेल रोको आंदोलन कर रहे हैं. देखते हैं कि सरकार झुकती है या किसान यों ही इस आंदोलन को खत्म करते हैं.    

               

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सख्ती

दाल की जमाखोरी पर लगाम

लखनऊ : यह सारी दुनिया का दस्तूर है और हमारे देश का तो है ही कि जैसे ही किसी चीज की किल्लत हुई तो उसे आननफानन में मार्केट से गायब कर दिया जाता?है. आजकल दाल बाजार से गायब है, पर न जाने कितने कारोबारियों ने उसेअपने गुप्त गोदामों में छिपा कर रखा होगा. इस जमाखोरी का अंदाजा तो लगाया जा सकता?है, पर पता लगाना आसान नहीं है. इसी सिलसिले में मुख्य सचिव आलोक रंजन ने कहा कि दाल की जमाखोरी व कालाबाजारी रोकने के लिए सरकार जल्द ही कानून लागू करेगी. इस मामले में जल्दी से जल्दी कैबिनेट से प्रस्ताव मंजूर कराया जाएगा. मुख्य सचिव ने बताया कि सूबे में दाल पर स्टाक लिमिट कानून तो लागू है, मगर यह ज्यादा खुल कर नहीं बनाया गया. दाल आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे में भी नहीं आती, लिहाजा इस पर इस अधिनियम की धारा 3/7 के तहत भी कार्यवाही नहीं की जा सकती. अब कैबिनेट में लाए जाने वाले प्रस्ताव में इस कमी को भी दूर कर के जमाखोरी व कालाबाजारी रोकने का सख्त कानून बना कर लागू किया जाएगा.

सवाल सिर्फ दाल की जमाखोरी का नहीं?है. भारत में कभी चीनी गायब हो जाती?है, तो कभी आटे के लाले पड़ जाते हैं. कभी प्याज लापता हो जाता?है, तो कभी आलू तलाशने से भी नहीं मिलता. यानी हर किस्म की जरूरी चीजों की जमाखोरी बंद करना लाजिम है.   

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पेशकश

सोनालिका ने पेश की एडवांस्ड ट्रैक्टर सीरीज

कुल्लू : देश में तीसरी सब से बड़ी ट्रैक्टर बनाने वाली कंपनी सोनालिका इंटरनेशनल ट्रैक्टर्स लिमिटेड ने कूल्लू, हिमाचल प्रदेश के दशहरा मेले में नए एडवांस्ड गार्डन ट्रैक 26 और आरएक्स 30 बागबान सुपर ट्रैक्टर पेश किए. इन ट्रैक्टरों को फलों के बागानों (सेब, अंगूर, पपीता और अनार) व कतारबद्ध फसलें जैसे कपास, गन्ना और मूंगफली की खेती की विशेष जरूरतों को ध्यान में रखते हुए तैयार किया गया है. गार्डन ट्रैक 26 और आरएक्स 30 बागबान सुपर ट्रैक्टर तकनीकी रूप से बेहद उन्नत हैं और इन में 26 एचपी और 30 एचपी का बेहद दमदार इंजन लगा है. इस के साथ ही इन में पावर स्टीयरिंग हाइड्रोलिक सिस्टम विद आटोमैटिक डैप्थ एंड ड्राफ्ट कंट्रोल (एडीडीसी) है, जो काम को बहुत आसान बना देता है. ईंधन की खपत के लिहाज से बेहद किफायती ये ट्रैक्टर आसानी से लंबे समय तक लगातार काम कर सकते हैं. ये ट्रैक्टर आकार में छोटे डिजाइन किए गए हैं. इन का टर्निंग रेडियस यानी मोड़ने में लगने वाली जगह भी बहुत कम है और ये 4 व्हील ड्राइव में आते हैं, जो ट्रैक्टर को बेहतर पकड़ व ताकत प्रदान करते हैं. इन का हर एक कलपुर्जा हैवी ड्यूटी बनाया गया है, ताकि ट्रैक्टर को लंबी उम्र मिले.

सोनालिका इंटरनेशनल ट्रैक्टर्स लिमिटेड के सहायक उपाध्यक्ष (सेल्स) विवेक गोयल ने बताया, ‘हमारे नए एडवांस्ड गार्डन ट्रैक 26 और आरएक्स 30 बागबान सुपर ट्रैक्टर बागबानी करने वाले किसानों के लिए बहुत फायदेमंद साबित होंगे. इन दोनों ही ट्रैक्टरों को आज की मांग को ध्यान में रखते हुए विकसित किया गया है और ये अंतर खेती, स्प्रेइंग, रोटावेटर, ट्राली और दूसरे कामों के लिए बिलकुल सही हैं. हमारी एडवांस्ड सीरीज के ये ट्रैक्टर हमारे ग्राहकों की जरूरतों को पूरा करने की हमारी प्रतिबद्धता को पुख्ता करते हैं. हम अपने ट्रैक्टरों में लगातार सुधार करते रहते हैं और क्वालिटी पर करीब से नजर रखते हैं.’                                                           ठ्ठ

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धांधली

ब्लैक में बिक रहा सेना का दूध 

मनाली : बेईमान किस्म के लोगों के लिए दुनिया में कोई दायरा नहीं बना. जहां भी जिस हद तक मुमकिन होता है, बेईमान लोग चोरीचकारी कर लेते हैं. ऐसा ही नजारा हिमाचल प्रदेश के मनाली में भी सामने आया, सेना के लिए भेजा जाने वाला दूध वहां के बाजार में ब्लैक में बेचा जा रहा है. मनाली की एसडीएम ज्योति राणा ने छापेमारी कर के एक दुकान से करीब 50 लीटर दूध की की थैलियां बरामद कीं. उन पैकेटों पर ‘डिफेंस सर्विस ओनली’ छपा था. पैकेटों पर दाम भी दर्ज नहीं थे. दुकानदार के मुताबिक सेना के लोग उसे 40 रुपए प्रति लीटर की दर से दूध बेच जाते हैं, जिसे वह 60 रुपए प्रति लीटर की दर से बेचता है. मनाल के पचलान में सेना के ट्रांजिट कैंप, सीमा सड़क संगठन और लेहलद्दाख से सटे इलाकों में तैनात जवानों के लिए खानेपीने की चीजें इसी रास्ते से जाती हैं, ऐसे में ये चोरी हैरानी वाली बात नहीं है. 

हैरत

मटन से महंगी दाल

झूलघाट (पिथौरागढ़) : जब भारत में अरहर की दाल के दाम 200 रुपए प्रति किलोग्राम का दायरा लांघ गए थे, तो तमाम लोग कहने लगे थे कि इस से बेहतर तो 150 रुपए प्रति किलोग्राम के आसपास मिलने वाल चिकन ही है. और अब नेपाल में अरहर की दाल 400 रुपए प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही है यानी मटन से महंगी बिक रही है. पश्चिमी नेपाल के बैतड़ी जिला मुख्यालय से सटे देहमाणू बाजार में इन दिनों खामोशी छाई हुई है. भारत की ओर से की गई नाकेबंदी के बाद महंगाई चरम पर पहुंच गई है. पैट्रोल व डीजल की दिक्कत की वजह से धनगढ़ी मंडी से सामान नहीं आ पा रहा है. जरूरी चीजों की सप्लाई न होने से अरहर की दाल 400 रुपए (नेपाली मुद्रा) प्रति किलोग्राम की दर से बिक रही है. बहुत महंगी होने की वजह से व्यापारियों ने अरहर की दाल मंगाना कम कर दिया है. नेपाल में स्थानीय लोबिया, गहत, राजमा, सोयाबीन व भट्ट की दाल के दाम भी बेहद बढ़ गए हैं. पिछले साल के मुकाबले स्थानीय दालों की कीमतें 30 फीसदी तक बढ़ गई हैं. नेपाल के डडेलधुरा, बैतड़ी व दार्चुला बाजारों में जरूरी चीजों की बेहद कमी हो गई है.    

राहत

सूखे की वजह से अभी वसूली नहीं

लखनऊ : उत्तर प्रदेश सरकार ने सूबे में सूखे का आलम देख कर मुख्य देयकों यानी लगान की वसूली 31 मार्च, 2016 तक रोकने का फैसला किया है. मुख्य सचिव आलोक रंजन ने किसानों के साथ किसी भी तरह की सख्त कार्यवाही न करने का आदेश दिया है. फिलहाल न तो कोई आरसी जारी की जाएगी न ही किसी मुद्दे पर किसानों को गिरफ्तार कर के जेल भेजा जाएगा. वसूली संबंधी मामलों में फिलहाल राहत देने के साथसाथ मुख्य सचिव ने 15 लाख किसानों को फसलबीमा की रकम का जल्दी से जल्दी भुगतान कराने को कहा?है. मुख्य सचिव आलोक रंजन ने इस बार के सूखे पर विभागीय अफसरों के साथ हालात पर गौर किया. इस के अलावा उन्होंने मंडलायुक्तों व कलेक्टरों से बात कर के सूखे के लिहाज से की जा रही कार्यवाही की भी जानकारी ली. जांचपड़ताल में सूबे के 31 जिले ऐसे पाए गए हैं, जहां 50 फीसदी से भी कम बरसात हुई?है. सरकार द्वारा किसानों का खयाल रखा जाना काबिलेतारीफ?है.                                                            

– मधुप सहाय, भानु प्रकाश, अक्षय कुलश्रेष्ठ, बीरेंद्र बरियार और मनोहर कुमार जोशी

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सवाल किसानों के

सवाल : मैं अनार का छोटा सा बाग लगाना चाहती हूं. कृपया इस बारे में जानकारी दें?

-शीला, फतेहपुर, उत्तर प्रदेश

जवाब : अनार के पौधे ज्यादा सर्दी नहीं झेल पाते. इस की बागबानी के लिए अच्छे जल निकास वाली मिट्टी बेहतर रहती?है. इस की खास किस्में हैं. गणेश, अलांदी, धोलका, कनधारी व मस्कट. अनार को बसंत के मौसम या बारिश के मौसम में लगाना अच्छा रहता है. पौधों को 3 से 5 मीटर के फासले पर लगाना सही रहता?है और विस्तार से जानकारी के लिए आप अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र से संपर्क कर सकती हैं.

सवाल : मैं बड़े पैमाने पर बैगन की खेती करना चाहता हूं. कृपया इस की अच्छी किस्मों की जानकारी दें. कीड़ों व बीमारियों से बचाव के बारे में भी बताएं?

-पप्पू श्रीवास्तव, जबलपुर, मध्य प्रदेश

जवाब : बैगन की लंबे फल वाली उन्नतशील किस्में हैं: पंजाब सदाबहार, पंजाब बरसाती, पूसा परपल लांग व पंत सम्राट. बैगन की गोल फल वाली उन्नतशील किस्में हैं: पंत ऋतुराज, अरुणा व राजनगर जाइंट. बैगन की संकर किस्में?हैं: पूसा संकर 5, 8 व नवकिरण. बैगन की बोआई का समय जूनजुलाई, दिसंबरजनवरी व मार्चअप्रैल?है. बैगन को तनाबेधक व फलबेधक कीटों से बहुत नुकसान पहुंचता है. तनाबेधक कीटों द्वारा प्रभावित तनों को?ऊपर से सूंड़ी सहित तोड़ कर नष्ट कर देना चाहिए. यह काम हफ्ते में 1 बार जरूर करें. खेत में फेरोमोन ट्रेप लगा कर नर कीटों को पकड़ कर अंडों की तादाद में कमी लाई जा सकती?है. इस के अलावा कार्बोसिल्फान 25 ईसी की 2 मिलीलीटर मात्रा का प्रति लीटर पानी की दर से घोल बना कर छिड़काव करें. हरा फुदका (जैसिड) की रोकथाम के लिए बैगन के पौध की जड़ को कानफिडोर नामक दवा की 1 मिलीलीटर मात्रा को 1 लीटर पानी में मिला कर बनाए गए घोल में 1 घंटे तक डुबोने के बाद क्यारी में लगाएं. बैगन की खेती के बारे में और ज्यादा जानकारी हासिल करने के लिए आप अपने इलाके के कृषि विज्ञान केंद्र जा कर बात कर सकते?हैं.

सवाल : मैं अपने किचन गार्डन में मशरूम उगाना चाहती हूं. क्या यह मुमकिन है? कृपया पूरी जानकारी दें?

-संतोष कुमारी, मुंबई, महाराष्ट्र

जवाब : संतोष कुमारीजी मशरूम की खेती खुले खेत में नहीं की जा सकती. इस के लिए भूसे का मिक्चर तैयार कर के उस पर बंद कमरे या ग्रीन हाउस में मशरूम उगाया जाता?है. इस के लिए आप अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र में जा कर प्रशिक्षण प्राप्त करें. मशरूम के बीज यानी स्पान भी आप को कृषि विज्ञान केंद्र के जरीए ही हासिल हो सकते?हैं. आप को मशरूम की खेती का शौक तो है, मगर इसे करना उतना आसान नहीं?है.       

एसडब्ल्यूआई विधि से गेहूं की उन्नत खेती

घटते कुदरती संसाधनों और बढ़ती कृषि लागतों के कारण नए ढंग से खेती करना समय की मांग है. खेती की दुनिया में रोजाना लाभकारी नवाचार हो रहे हैं. जरूरत है तो बस उन्हें अपनाने की. ऐसे ही गेहूं की खेती का एक नया तरीका है सिस्टम आफ व्हीट इंटेंसीफिकेशन (एसडब्ल्यूआई), जो कि श्री विधि से गेहूं के खेती के नाम से जाना जाता है. 1990 में इसे यूएसए में अपनाया गया था. आज देश के कुछ हिस्सों में इस विधि से खेती कर के भारी मुनाफा कमाया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की तरफ से फार्म सेक्टर प्रमोशन फंड के तहत इस तरह के नवाचार को अपनाने पर वित्तीय सहायता भी दी जा रही है. जरूरत है तो बस इसे अपनाने की.

क्या है एसडब्ल्यूआई विधि : सिस्टम आफ राइस इंटेंसीफिकेशन (श्री पद्धति) के आधार पर ही सिस्टम आफ इंटेंसीफिकेशन (एसडब्ल्यूआई) विधि से गेहूं की खेती की जाती है. इस में कार्बनिक खादों के ज्यादा इस्तेमाल पर जोर दिया जाता है. इस के अलावा लाइन से सही दूरी पर गेहूं की बोआई की जाती है, ताकि पौधों को बेहतर तरीके से प्रकाश व पोषक तत्त्व मिल सकें और हर पौधा स्वस्थ हो सके. इस के अलावा इस विधि में मैकेनिकल तरीकों से खरपतवार निकाले जाते हैं और बेहतर सिंचाई व्यवस्था पर जोर दिया जाता है. इस विधि से एक ओर जहां पैदावार बढ़ती  है, वहीं दूसरी ओर खेती की लागत भी घटती है.

बोआई का समय : गेहूं की समय से बोआई करना बहुत ही अहम है. जैसेजैसे गेहूं की बोआई में देरी होती है, पैदावार घटने लगती है. देर से पकने वाली प्रजातियों की बोआई भी समय से कर देनी चाहिए. गेहूं की बोआई का सही समय नवंबर से मध्य दिसंबर तक है.

प्रजाति : स्थानीय जलवायु और मौजूद बीजों के आधार पर रोगरोधी प्रजातियों को अपनाना चाहिए.

बीजशोधन व बीजउपचार : इस विधि यानी एसडब्ल्यूआई से गेहूं की खेती में बीजशोधन व बीजउपचार बहुत जरूरी हैं. बीजशोधन व बीजउपचार निम्न प्रकार से करते हैं:

*      सब से पहले मिट्टी के बरतन में 20 लीटर कुनकुना पानी लिया जाता है. इस पानी में 10 किलोग्राम बीज डालने चाहिए. बेकार व हलके बीज पानी में तैरने लगेंगे. तैरते हुए बीजों को हटा देना चाहिए. उस के बाद 4 लीटर देशी गाय का पेशाब, 3 किलोग्राम वर्मीकंपोस्ट व 2 किलोग्राम गुड़ को ले कर आपस में खूब अच्छी तरह से मिलाएं. तैयार मिश्रण 1 एकड़ खेत के हिसाब से है.

*      तैयार मिश्रण को 6-8 घंटे के लिए अलग रखें. इस के बाद जूट के बोरे में मिश्रण रख कर हलका पानी छिड़कें. फिर 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बावस्टीन फफूंदीनाशी या 2-3 ग्राम प्रति किलोग्राम ट्राइकोडर्मा जैविक फफूंदीनाशी, 7.5 ग्राम प्रति किलोग्राम पीएसबी कल्चर, 6 ग्राम प्रति किलोग्राम एजेटोबैक्टर की परत बीजों पर अच्छी तरह से चढ़ाएं.

*      इस के बाद रात भर (करीब 10-12 घंटे) इन शोधित बीजों को किसी नमीयुक्त जूट के बोरे में अंकुरण के लिए रखें. अंकुरण के बाद बीज बोआई के लिए तैयार हो जाते हैं.

बीज दर : बोआई में प्रति एकड़ 10 किलोग्राम बीजों का इस्तेमाल करें.

खेत की तैयारी : मिट्टी को भुरभुरा बनाने के लिए 3-4 बार तकरीबन 6-8 इंच गहरी जुताई करें. यदि खेत ऊपरनीचे है, तो उसे समतल जरूर करें. बेहतर होगा कि सिंचाई के लिए पानी का सही इंतजाम कर के खेत को छोटेछोटे टुकड़ों में बांटें.

खाद व उर्वरक : खाद व उर्वरक मिट्टी की जांच के आधार पर ही ठीक होते हैं. मोटेतौर पर इस विधि से गेहूं की बोआई करने पर 20 क्विंटल प्रति एकड़ खूब सड़ी हुई कंपोस्ट खाद या 4 क्विंटल प्रति एकड़ वर्मी कंपोस्ट को खेत में अच्छी तरह से मिलाना चाहिए. खेत की तैयारी के समय 30 किलोग्राम प्रति एकड़ डीएपी व 15 किलोग्राम प्रति एकड़ पोटाश प्रयोग में लाना चाहिए. उत्तर भारत में अमूमन जिंक व सल्फर की कमी पाई जाती है, लिहाजा यदि जिंक की कमी हो तो 10 किलोग्राम प्रति एकड़ जिंक सल्फेट अवश्य दें.

बोआई : बोआई के लिए खेत में पर्याप्त नमी होना जरूरी है. यदि खेत में नमी नहीं है, तो बोआई से पहले हलकी सिंचाई करें. एक मार्कर व रस्सी के सहारे लाइन से लाइन और पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर रखते हुए निशान लगा लेने चाहिए. इस के बाद निशानों पर ही 3-4 सेंटीमीटर गहराई पर 2 बीजों की बोआई कर देनी चाहिए. यदि खेत की उर्वराशक्ति कमजोर है, तो 3 बीजों की बोआई कर सकते हैं. देरी से बोआई की दशा में लाइन से लाइन व पौधे से पौधे की दूरी थोड़ी घटाई जा सकती है.

सिंचाई : इस विधि में परंपरागत गेहूं की खेती से लगभग दोगुनी सिंचाई करनी चाहिए, मगर हर बार हलकी सिंचाई करना ज्यादा मुफीद है. पहली सिंचाई 15-20 दिनों पर यानी ताजमूल अवस्था पर बहुत जरूरी है. वैसे ताजमूल अवस्था, गांठ बनने की अंतिम अवस्था व दुग्धावस्था पर सिंचाई करना लाभकारी होता है.

कुछ और ध्यान देने वाली बातें

गेहूं की परंपरागत खेती के तरीके से कुछ अलग होने के कारण इस विधि में निम्न बातें जरूर ध्यान में रखी जानी चाहिए:

*      निराईगुड़ाई व खरपतवार की रोकथाम : मशीनी निराईगुड़ाई करना जरूरी है. इस के लिए सूखे में चलने वाले वीडर का इस्तेमाल करना चाहिए. इस से निराईगुड़ाई और खरपतवार निकालने के काम एकसाथ हो जाएंगे. निराईगुड़ाई व खरपतवार निकालने के काम पहली, दूसरी व तीसरी सिंचाई के 2-3 दिनों बाद करने चाहिए.

*      यूरिया की टापड्रेसिंग : यूरिया की पहली टाड्रेसिंग पहली सिंचाई के दूसरे दिन 25 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से करें. दूसरी टापड्रेसिंग तीसरी निराईगुड़ाई के ठीक पहले (लगभग 40 दिनों के आसपास) 13.5 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से करें.

*      मिलने वाली इमदाद : नवीनतम तरीकों से खेती करने के लिए देश भर में विभिन्न योजनाओं के तहत कई तरह की सरकारी मदद का इंतजाम है, जोकि अलगअलग राज्यों में अलगअलग हो सकती है. मगर राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की तरफ से फार्म सेक्टर प्रमोशन फंड के तहत इस तरह के नवाचार को अपनाने पर माली मदद व सहूलियतें भी दी जा रही हैं, जो कि सभी राज्यों में लागू हैं. इस बारे में राष्ट्रीय कृषि व ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के लखनऊ स्थित रीजनल कार्यालय के असिस्टेंट जनरल मैनेजर व पीआरओ नवीन कुमार राय ने बताया, ‘कृषि में नवाचार को अपनाने के लिए हमारा बैंक ‘फार्म सेक्टर प्रमोशन फंड’ के तहत आर्थिक सहायता मुहैया कराता है. यही फंड पहले फार्मर टेक्नोलाजी ट्रांसफर फंड (एफटीटीएफ) के नाम से जाना जाता था. ‘फंड सीधे किसानों को नहीं दिया जाता. इस के लिए किसान भाइयों को संगठित हो कर किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्थान (एनजीओ) जैसे कृषि विज्ञान केंद्र वगैरह से जुड़ना होगा. ’

सरसों उगाएं तिलहन में मजबूत बनें

सरसों व राई को मस्टर्ड व रेपसीड के नामों से भी जाना जाता है. सरसों भारत में सोयाबीन व मूंगफली के बाद उगाई जाने वाली खास तिलहनी फसल है. भारत में तोरिया व सरसों का कुल रकबा 65 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 77 लाख टन है व उत्पादकता करीब 1200 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर है. बीज की मात्रा, बीजोपचार व बोआई : बोआई के लिए 4 किलोग्राम (1000 दानों का वजन 3 ग्राम हो) या 5-6 किलोग्राम (1000 दानों का वजन 4-5 ग्राम हो) बीज प्रति हेक्टेयर की दर से सिंचित व असिंचित दोनों हालात में रखते हैं. बीजों को 2 ग्राम मैंकोजेब या 3 ग्राम थीरम से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करने के बाद सफेद रोली से बचाने के लिए एपरान 35 एसडी की 6 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित कर के बोआई करें. पेंटेड बग की रोकथाम के लिए एमिडाक्लोप्रिड 70 डब्ल्यूएस की 5 ग्राम मात्रा से प्रति किलोग्राम बीज की दर से बीजों को उपचारित कर के बोआई करें. जैविक उर्वरक के रूप में एजोटोवैक्टर 200 ग्राम पीएसवी व माइकोराइजन की 200 ग्राम मात्रा से प्रति 10 किलोग्राम बीज की दर से बीजों को उपचारित कर के बोआई करनी चाहिए.

बरानी इलाकों में 15 सितंबर से 15 अक्तूबर व सिंचित इलाकों में 15-20 अक्तूबर तक सरसों की बोआई कर देने से उपज अच्छी होती है. बोआई में लाइन से लाइन की दूरी 30-45 सेंटीमीटर और पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेंटीमीटर और गहराई 5 सेंटीमीटर रखनी चाहिए. असिंचित क्षेत्रों में बीज की गहराई नमी के मुताबिक रखनी चाहिए.

खाद व उर्वरक : सरसों में रासायनिक खाद, जैविक खाद व जैविक उर्वरक एकसाथ मिला कर देने चाहिए. सिंचित दशा में 8-10 टन व असिंचित दशा में 4-5 टन अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद के साथ हलकी मिट्टी में 2.5-3.0 किलोग्राम ववेरियावे्रसियाना (प्रयोग करने से 15-20 दिन पहले सड़े गोबर में मिला कर नमी वाले स्थान में बोरे से ढक कर रखें) को बोआई से पहले इस्तेमाल करने से दीमक व भूमिगत कीटों को काफी हद तक काबू किया जा सकता है.

अगर मिट्टी में जस्ते की मात्रा 0.6 पीपीएम से कम है, तो अंतिम  जुताई के समय करीब 20 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में अच्छी तरह मिला दें. जहां तक संतुलित उवर्रकों की बात है, तो मिट्टी की जांच के मुताबिक उन का इस्तेमाल करना चाहिए. मिट्टी की जांच न होने की दशा में सिंचित क्षेत्रों में 80-100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 45-50 किलोग्राम फास्फोरस, 40 किलोग्राम पोटाश, 20 किलोग्राम सल्फर व 2 किलोग्राम बोरान और बरानी क्षेत्रों  में 60 किलोग्राम नाइट्रोजन, 40 किलोग्राम फास्फोरस, 20 किलोग्राम पोटाश व 20 किलोग्राम सल्फर व 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से स्तेमाल करना चाहिए. 5 टन केंचुआ खाद या 10 टन सड़ी हुई गोबर की खाद और 75 फीसदी संतुलित उर्वरकों को प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल से करने 5-10 फीसदी पैदावार में इजाफा होता है. बरानी क्षेत्रों में उर्वरकों की पूरी मात्रा बोआई के समय देनी चाहिए. फास्फोरस को सिंगल सुपर फास्फेट से देने पर सल्फर भी मिल जाता है. यदि डीएपी का प्रयोग किया गया हो तो बोआई से पहले 200 किलोग्राम जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करना चाहिए. सिंचित दशा में नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा बोआई के समय नाई या चोंगा द्वारा बीज से 2-3 सेंटीमीटर नीचे देना फायदेमंद होता है. नाइट्रोजन की बाकी मात्रा पहली सिंचाई की (बोआई के 25-30 दिनों बाद) टाप ड्रेसिंग के रूप में देनी चाहिए. फूल आने की अवस्था में थायोयूरिया के 0.1 फीसदी घोल का छिड़काव करने से उपज में इजाफा होता है.

विरलीकरण : सरसों में बोआई के करीब 15-20 दिनों के अंदर घने व कमजोर पौधों को निकाल कर पौधों से पौधों की दूरी 15-20 सेंटीमीटर कर देनी चाहिए. सही तौर पर 2.5-3.0 लाख पौधे प्रति हेक्टेयर में या 25-30 पौधे प्रति वर्गमीटर में होने से अच्छी उपज मिलती है. सरसों की खेती के साथ मधुमक्खीपालन काफी फायदेमंद होता है.

खरपतवारों की रोकथाम : पौधों की संख्या ज्यादा होने की दशा में बोआई के करीब 15-20 दिनों बाद विरलीकरण के साथसाथ खरपतवारों को भी निराई कर के खेत से निकाल देना चाहिए. करीब 45-60 दिनों तक खेत खरपतवारों से मुक्त होना चाहिए. रासायनिक खरपतवारनाशी फ्लूक्लोरेलिन की 1.25 लीटर मात्रा प्रति हेक्टेयर की दर से बोआई से पहले जमीन में मिला दें या 0.7 किलोग्राम मात्रा बोआई के बाद प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करें. सूखी बोआई की स्थिति में बोआई के बाद फ्लूक्लोरेलिन का छिड़काव कर के सिंचाई करनी चाहिए. बोआई के करीब 20-25 दिनों बाद आइसोप्रोट्यूरान की 0.75 किलोग्राम मात्रा का घोल बना कर प्रति हेक्टेयर की दर से छिड़काव कर सकते हैं.

सिंचाई : पहली सिंचाई बोआई के 30-40 दिनों बाद फूल आने से पहले और दूसरी सिंचाई बोआई के 70-80 दिनों बाद फलियां बनने के वक्त करें. बलुई दोमट मिट्टी में 12 मीटर की दूरी पर नोजल लगा कर फुहारा सेट 7 घंटे चला कर 2 बार सिंचाई करने पर सामान्य विधि के बराबर उपज मिलने के साथसाथ 40 फीसदी पानी की बचत की जा सकती है. बरानी क्षेत्रों में धान के पुआल से 2 टन प्रति हेक्टेयर की दर से माचिंग करने से पानी की बचत के साथसाथ 30-40 फीसदी उपज बढ़ जाती है.

सहफसली खेती

सरसों की कुछ प्रजातियां जैसे पीआर 43, आरएच 30, वरदान, आरएच 781, लाहा 101, पूसा बोल्ड व संजुक्ता वगैरह सहफसली खेती के लिए अच्छी हैं. सरसों के खास सहफसली इस प्रकार हैं : गेहूं व सरसों (9:1), चना व सरसों (3:1), आलू व सरसों (3:1), गन्ना व सरसों (1:1).

कटाईमड़ाई

सरसों की फसल फरवरीमार्च तक पक जाती है. आमतौर पर जब पत्तियां झड़ने लगें और फलियां पीली पड़ने लगें, तब फसल की कटाई व मड़ाई कर के 3-4 दिन सुखा कर 8 फीसदी नमी रहने पर भंडारण करते हैं.

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