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इरफान खान की आंखों का दीवाना है ये हॉलीवुड स्टार

हॉलीवुड के सुपरस्टार टॉम हैंक्स को लगता है कि फिल्म “इन्फर्नो” में उनके साथी कलाकार इरफान खान की आंखें जादुई हैं, जो उन्हें मोहित करती हैं. डान ब्राउन के उपन्यास “इन्फर्नो” के फिल्मी रुपांतरण का निर्देशन रॉन होवार्ड कर रहे हैं, जिसमें हैंक्स मुख्य भूमिका में हैं और 48 वर्षीय इरफान को हैरी सिम्स के किरदार में देखा जा सकेगा, जो एक रहस्यमयी संगठन कंसोर्टियम के प्रमुख होंगे.

मेक्सिको के कानकून में एक प्रेस कार्यक्रम में हैंक्स ने इरफान के बारे में कहा, मैं उनकी जादुई आंखों से अभिभूत हूं. उनका शारीरिक विन्यास आकर्षित करता है. 59 वर्षीय हैंक्स ने जून में मेक्सिको में फिल्म के प्रचार के दौरान हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय नायक इरफान की तारीफ तब की थी जब उन्होंने साथ में शूटिंग भी नहीं की थी.

शाहरूख खान और रोहित शेट्टी के बीच खिंची तलवारें

अजय देवगन को लेकर ‘गोलमाल’ और ‘सिंघम’ सीरीज की सुपरडुपर हिट फिल्मों के निर्देशक रोहित शेट्टी इन दिनों आग बबुला हैं. उनका यह गुस्सा शाहरूख खान की मार्केटिंग टीम पर है. सूत्र बताते हैं कि रोहित शेट्टी निर्देशित हर फिल्म दो सौ करोड़ रुपये कमाती रही है. अजय देवगन का साथ छोड़कर ‘‘चेन्नई एक्सप्रेस’’ से शाहरूख खान का साथ पकड़़ने वाले रोहित शेट्टी काफी खुश थे. वह अजय देवगन के साथ फिल्म शुरू करने को लेकर बहाने बाजी करते हुए शाहरूख खान के साथ ही फिल्म करना चाहते थे. लेकिन बाक्स आफिस पर फिल्म ‘दिलवाले’ की जो दुगर्ति हुई है, उससे उनकी उम्मीदों पर पानी फिर गया है.

रोहित शेट्टी का दावा रहा है कि उनकी हर फिल्म बाक्स आफिस पर दो सौ करोड़ से कम नहीं कमाती है. मगर अफसोस की बात यह है कि ‘दिलवाले’ बाक्स आफिस पर दो सौ करोड़ का आंकड़ा छूने में असफल रही. बड़ी मुश्किल से सौ करोड़ बना पायी. जबकि 18 दिसंबर को ही ‘दिलवाले’ के साथ रिलीज हुई संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’अब तक सिर्फ भारत में 211 करोड़ रुपये कमा चुकी है. इस बात से रोहित शेट्टी बौखला गए. सूत्रों का दावा है कि रोहित शेट्टी अपने गुस्से पर काबू नहीं रख पाए और वह शाहरूख खान के आफिस जाकर उनकी प्रोडक्शन कंपनी ‘रेड चिल्ली’ की मॉर्केटिंग टीम पर जमकर बरसे.

सूत्रों का दावा है कि रोहित शेट्टी ने मॉर्केटिंग टीम पर ठीक से काम ना करने, फिल्म ‘दिलवाले’ के प्रमोशन और मॉर्केटिंग की गलत स्ट्रेटजी बनाने का आरोप लगाया. रोहित शेट्टी के नजदीकी सूत्रों का दावा है कि शाहरूख खान की कंपनी की मॉर्केटिंग टीम ने रोहित शेट्टी को समझाने की कोशिश की कि ‘दिलवाले’ को बाक्स आफिस पर जो नुकसान हुआ, उसकी वजह शाहरूख खान का असहिष्णुता पर दिया गया बयान है. पर रोहित शेट्टी ने इसे नहीं माना. सूत्रों के अनुसार रोहित शेट्टी ने दावा किया कि शाहरूख खान के इस बयान ने फिल्म को नुकसान नहीं पहुंचाया. बॉलीवुड के सूत्रों का दावा है कि शाहरूख खान की मॉर्केटिंग टीम के कुछ सदस्यो ने रोहित शेट्टी के सामने फिल्म ‘दिलवाले’ की कमियां भी गिनायी. इस पर रोहित शेट्टी को और अधिक गुस्सा आ गया. बालीवुड के सूत्रों की माने तो रोहित शेट्टी अब लोगों से बताते फिर रहे हैं कि उन्होने कैसे शाहरूख खान की टीम को सुनाया. जबकि कुछ सूत्र दावा कर रहे है कि रोहित शेट्टी के इस कदम से शाहरूख खान काफी नाराज हैं. जिसके चलते अब रोहित शेट्टी और शाहरूख खान के बीच शीत युद्ध की शुरुआत हो चुकी है.

धौनी बोले, संन्यास के बारे में सही समय पर सोचूंगा

भारतीय वनडे क्रिकेट टीम के कप्तान महेंद्र सिंह धौनी ने कहा है कि वह सही समय पर खेल से संन्यास लेने के बारे में सोचेंगे.

भारत के आईसीसी विश्व कप से बाहर होने के बाद भी 34 साल के धौनी से उनके संन्यास को लेकर यही सवाल पूछा गया था और उन्होंने ऐसी किसी योजना से इनकार कर दिया था. विराट कोहली को तीनों प्रारूपों में कप्तान बनाने की मांग जोर पकड़ रही है क्योंकि टेस्ट क्रिकेट में उनके आक्रामक रवैये से काफी लोग प्रभावित हैं.

इसके अलावा पिछले एक साल से बल्ले से धौनी का प्रदर्शन भी प्रभावी नहीं रहा है. इस तरह की अटकलें हैं कि वह भारत में होने वाली आईसीसी विश्व टी20 चैम्पियनशिप के बाद फैसला कर सकते हैं.

ऑस्ट्रेलिया दौरे के लिए भारतीय टीम की रवानगी से पहले जब धौनी से संन्यास के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि मैं ऐसा व्यक्ति हूं जो वर्तमान में जीता है और विश्व टी20 चैम्पियनशिप से पहले ध्यान ऑस्ट्रेलिया दौरे पर है. मैं सही समय आने पर इसके बारे में सोचूंगा.

प्रियंका चोपड़ा को मात देने पर आमादा कंगना रानौट

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘‘फैशन’’ में एक साथ काम करने वाली अभिनेत्रियों प्रियंका चोपड़ा और कंगना रानौट ने अपनी पहचान नारी प्रधान फिल्मों में अभिनय करने वाली अदाकारा के रूप में बना रखी है. पर बॉलीवुड के सूत्रों की माने तो इन दोनों के बीच कभी नहीं जमती. जबकि दोनों एक दूसरे को अपना दोस्त बताती हैं.

बॉलीवुड के अंदरूनी सूत्रों के अनुसार कंगना रानौट और प्रियंका चोपड़ा के बीच कुछ दूरियां उस वक्त बढ़ीं, जब फिल्म ‘क्वीन’ के लिए कंगना रानौट को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल गया, जबकि उस वक्त प्रियंका चोपड़ा को उम्मीद थी कि फिल्म‘‘मैरी कॉम’’के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार मिलेगा.

उसके बाद से प्रियंका चोपडा व कंगना के बीच मुलाकातें नहीं हुई. इस बीच प्रियंका चोपड़ा ने फिल्म निर्माण के क्षेत्र में कदम रखते हुए ‘फैशन’ के निर्देशक मधुर भंडारकर के साथ फिल्म ‘मैडम जी’ का निर्माण करने की सोची. पर तमाम उठापटक के बाद अंततः फिल्म ‘मैडमजी’ का निर्माण रुक गया.

सूत्रों के अनुसार ‘मैडम जी’ नहीं बनने वाली हैं. पर ‘क्वाटिंको’ सीरियल में अभिनय कर प्रियंका चोपड़ा ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शोहरत बटोर ली है. तो अब वह अपनी इस शोहरत को भुनाने के लिए एक बार फिर एक नारी प्रधान फिल्म बनाने का निर्णय किया है.सूत्रों की माने तो प्रियंका चोपड़ा ने अपनी इस नारी प्रधान फिल्म में मुख्य भूमिका निभाने के लिए कंगना रानौट से संपर्क किया. मगर सूत्रों का दावा है कि कंगना रानौट ने प्रियंका चोपड़ा की पूरी बात सुने बगैर ही उनकी इस फिल्म में अभिनय करने से साफ मना कर दिया.

इतना ही नहीं अब कंगना रानौट धीरे धीरे उन सभी फिल्मकारों के साथ काम करने की कोशिश कर रही हैं, जिनके साथ कभी प्रियंका चोपड़ा ने काम किया था. इसी स्ट्रेटजी के चलते कंगना रानौट इन दिनों विशाल भारद्वाज के संग फिल्म ‘‘रंगून’’ कर रही है. कंगना के इस रवैये को देखते हुए चर्चाएं गर्म है कि कंगना रानौट, प्रियंका चोपड़ा को मात पर मात दे रही हैं.

एक्टिंग के बाद अब डायरेक्शन कर रही हैं कोंकणा

लगता है रणवीर शोरी से तलाक लेते ही अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा की लाटरी लग गयी है और अब वह निर्देशक बन गयी हैं. जी हां! कोंकणा एक फिल्म ‘‘ए डेथ इन द गंज’’का निर्देशन कर रही हैं, जिसके निर्माता अभिषेक चौबे और हनी त्रेहान हैं.

हनी त्रेहान बॉलीवुड के जाने माने कास्टिंग डायरेक्टर हैं और पहली बार वह अभिषेक चौबे के साथ मिलकर फिल्म निर्माण में उतर रहे हैं. जबकि विद्या बालन, नसिरूद्दीन शाह व अरशद वारसी के अभिनय से सजी फिल्म ‘‘डेढ़ इश्किया’’का निर्देषन कर अभिषेक चौबे बतौर निर्देशक अपनी एक पहचान बना चुके हैं, पर अब पहली बार वह हनी त्रेहान के साथ निर्माता बने हैं.

अभिनेत्री से निर्देशक बन चुकी अभिनेत्री कोकणा सेन कैरियर की अपनी इस नयी पारी से काफी खुश हैं. कोंकणा के नजदीकी सूत्रों का दावा है कि रणवीर शोरी के साथ कोंकणा तलाक ने उनकी जिंदगी व करियर में खुशियां ला दी हैं.

कठघरे में जेटली

सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे सिंधिया, शिवराज सिंह चौहान, स्मृति ईरानी और नितिन गडकरी के बाद अब अरुण जेटली भी आरोपों के फंदों में फंस गए हैं. आरोप सही हैं या गलत, यह तो वर्षों बाद पता चलेगा पर इतने दिन स्वच्छ नरेंद्र मोदी की सुशासित, भ्रष्टाचारमुक्त सरकार पर गलत कारनामों के छींटे दिखते रहेंगे चाहे वे विरोधियों के फेंके हुए हों या काजल की कोठरी में घुसने पर लगे हों.

भारतीय जनता पार्टी का दूसरों से अलग होने का दावा उतना ही खोखला साबित हो रहा है जितना उस की भजभज मंडली का श्रेष्ठ, महान, सभ्य, ज्ञान का जनक, त्याग और तपस्या वाले हिंदू राष्ट्र होने का दावा. भारतीय जनता पार्टी विशुद्ध भारतीय राजनीतिक दलों की तरह है जिन में भ्रष्टाचार, परिवारवाद, भेदभाव, अपनों का खयाल रखना उतनी ही मात्रा में है जितना दूसरे दलों में. आम जनता के लिए यह दुखद बात है कि जिसजिस पर उस ने भरोसा किया उस के पैर कीचड़ में सने निकले.

अरुण जेटली ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला क्रिकेट स्टेडियम को बनवाने में पैसों का हेरफेर किया या नहीं, यह साबित करना या ठुकराना वर्षों का काम है. मोटे तौर पर यह दिख रहा है कि हरी घास के नीचे बहुत काली मिट्टी है और स्टेडियम की कुरसियों के नीचे गंद की परतें जमी हैं. अब उन का लाभ अरुण जेटली को मिला, उन के परिवार को, उन के सहयोगियों को या यह सिर्फ प्रशासनिक भूल थी, यह बहुत बाद में पता चलेगा.

एक ही घर में बनी कईकई कंपनियों को उन कार्यों के लिए करोड़ों रुपए दिए गए जो उन के कार्यक्षेत्र में नहीं आते थे और वह पैसा दिया गया जो टिकट खिड़की से नहीं, औद्योगिक घरानों से आया. ऐसे में संदेह तो होगा ही. अगर अरविंद केजरीवाल की टीम उत्साहित है और भारतीय जनता पार्टी पैनिक मोड में है तो इसलिए कि उन्हें लग रहा है कि इस सारे कांड में हनुमान की पूंछ जल सकती है और लक्ष्मण को घातक चोट लग सकती है.

नरेंद्र मोदी सरकार के ढीलेढाले शासन, भाजपा के कट्टरवादी संगठनों का हिंदूजनित विवाद खड़ा करना, महंगाई, बढ़ते कर वगैरा पहले से ही भाजपा सरकार पर भारी पड़ रहे हैं और मतदाता नाराज दिख ही रहे हैं, उस पर अरुण जेटली कांड ने और स्याही पोत दी है.

अपने दूसरे नंबर के सब से जुझारू और तार्किक वक्ता व नेता को बचाने में पार्टी लगी है पर क्या यह बचाव नाव में हुए एक छेद का पानी दूसरा छेद कर के निकालने का प्रयास तो साबित न होगा? सांसद कीर्ति आजाद को निलंबित करने से नाव और डगमगा गई है क्योंकि अब अपनों में से एक और दुश्मन तैयार कर लिया गया है. नरेंद्र मोदी साबित कर रहे हैं कि इतिहास में वर्णित हिंदू राजाओं का ढीलापन क्या और कैसे था. दरअसल, केवल पूजे जाने और ब्राह्मण भोजों से राज सफल नहीं होता.

जानिए आखिर कैसे बन रहा है इंडिया ई खरीददार

औनलाइन शौपिंग के इतिहास में 6 अक्तूबर, 2014 ऐतिहासिक दिन के रूप में जाना जाता है. इस दिन फ्लिपकार्ट ने 3 दिनों के लिए ‘बिग बिलियन डे’ के रूप में मेगा सेल की शुरुआत की, जिस में स्मार्ट फोन से ले कर टैबलेट तक, परफ्यूम से ले कर किचन ऐप्लायंसेज तक, कपड़ों से ले कर जूतों तक और इलैक्ट्रौनिक्स सामान की खरीदारी पर भारी छूट दी गई. महज 3 दिनों में फ्लिपकार्ट ने इतना बड़ा कारोबार किया कि यह खुदरा कारोबार के लिए चुनौती बन गया और 6 अक्तूबर के दिन तो फ्लिपकार्ट ने 700 करोड़ का शुद्ध मुनाफा कमाया.

सफलता की ओर

हालांकि इन 3 दिनों में खरीदारों की शिकायतें भी कम दर्ज नहीं हुईं. खरीदारी शुरू होने के कुछ घंटों में ही इतने बड़े पैमाने पर खरीदारी के लिए साइट में भीड़ लगी कि साइट स्लो हो गई. यही नहीं, शिकायत तो यह भी दर्ज हुई कि साइट पर छूट दिखाए जाने के बावजूद छूट नहीं मिली, उलटे अधिक कीमत देनी पड़ी. फ्लिपकार्ट ने इस तरह की गड़बड़ी की बात को स्वीकार करते हुए कहा कि उम्मीद से कहीं बहुत बड़े पैमाने पर लोगों के लौग इन होने से यह दिक्कत पेश आई.

बहरहाल, औनलाइन शौपिंग के इस कदर सफल होने की उम्मीद किसी को नहीं थी. 6 अक्तूबर ने मार्केट के बड़ेबडे़ विशेषज्ञों को चौंका दिया. अब तो खुदरा विक्रेताओं से ले कर बड़ेबड़े शौपिंग मौल्स को अपने कारोबार को बचाए रखने की चिंता सताने लगी है.

इंडियन रिटेल सेल्स सर्च इन फैस्टिव सीजन के नाम से किए गए सर्वे की मानें तो इस फैस्टिव सीजन के पहले चरण में शौपिंग मौल्स को बड़ा नुकसान हुआ. इन की बिक्री में 50 से 55 फीसदी की कमी आई. यह सर्वेक्षण कोलकाता, दिल्ली, मुंबई, पुणे, अहमदाबाद, बैंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, देहरादून और चंडीगढ़ जैसे शहरों में किया गया.

ऐसोसिएटिड चैंबर्स औफ कौमर्स ऐंड इंडस्ट्री औफ इंडिया (ऐसोचैम) का अनुमान है कि इस पूरे फैस्टिव सीजन में दिल्ली के शौपिंग मौल्स की बिक्री सब से अधिक प्रभावित हुई है. वहां पिछले साल की तुलना में बिक्री में 49.5 फीसदी की कमी रही. अहमदाबाद में 48.2 फीसदी, चेन्नई में 46 फीसदी, मुंबई में 42 फीसदी तो हैदराबाद में 39 फीसदी की कमी रही.

औनलाइन शौपिंग साइट्स साल भर थोड़ीबहुत छूट देती हैं और त्योहारों के मौके पर तो भारी छूट दी जाती है. इस के अलावा आगे की खरीदारी के लिए कूपन भी दिए जाते हैं. फिर चाहे वह स्नैपडील हो या फ्लिपकार्ट, मंत्रा हो या जबोंग अथवा अमेजौन सभी ने भारी छूट के साथ हर तरह का सामान फैस्टिव सीजन में बेचा.

खुदरा व्यापार पर भारी

औनलाइन कारोबार ने अगर सब से ज्यादा किसी को प्रभावित किया है तो वे हैं मोबाइल फोन के खुदरा विक्रेता. इन के कारोबार में 50 फीसदी की कमी आई है. यह कमी औनलाइन पर स्मार्ट फोन की बिक्री पर अधिकतम छूट दिए जाने के कारण आई है.

हाल ही में खुदरा कारोबार सलाहकार संस्था टैक्नोपैकर के अध्यक्ष अरविंद सिंघल का बयान आया था कि भारत में खुदरा कारोबार लगभग 52,500 करोड़ डौलर का है और 2020 तक इस के 10 लाख करोड़ डौलर तक पहुंचने की उम्मीद है. ई-कौमर्स इस खुदरा कारोबार के एक बड़े हिस्से पर कब्जा जमाने में फिलहाल कामयाब नहीं हुआ है, क्योंकि औनलाइन शौपिंग अभी भी बहुत सारे लोगों का भरोसा नहीं जीत पाई है. लेकिन शौपिंग की नई संस्कृति के जानकारों का मानना है कि बहुत सारी चीजें ऐसी हैं जिन से खुदरा कारोबार आने वाले समय में बुरी तरह प्रभावित होने वाला है. स्मार्ट फोन और दूसरे मोबाइल फोन की औनलाइन बिक्री पिछले कुछ महीनों में बहुत अधिक बढ़ी है और आने वाले दिनों में इन की औनलाइन बिक्री में और इजाफा होगा.

कोलकाता के सैंटर फौर स्टडीज इन सोशल साइंस के प्रोफैसर सैबाल कर का कहना है कि कुल मिला कर औनलाइन शौपिंग एक तरह से और्डर सप्लाई का कारोबार है. इन का अपना  कुछ भी प्रोडक्शन नहीं होता है. दूसरे शब्दों में यह औनलाइन मार्केट प्लेस है, जहां ब्रैंडेड कपड़ों से ले कर जूते, जेवर, गिफ्ट, मोबाइल फोन, घडि़यां, इलैक्ट्रौनिक सामान सब कुछ मिल जाता है और वह भी थोड़ीबहुत छूट के साथ. क्रैडिट कार्ड पर निर्भरता और इंटरनैट पर क्रैडिट कार्ड के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिहाज से भी औनलाइन शौपिंग फूलफल रहा है. औनलाइन शौपिंग में सब से ज्यादा भरोसे की अमेरिका की वैरीसाइन जैसी कंपनियां हैं. गौरतलब है कि औनलाइन लेनदेन के मामले में वैरीसाइन प्रामाणिक सेवा प्रदान करती है. इस से लेनदेन सुरक्षित रहता है. खरीदारों के लिए यह एक बड़ा भरोसा है.

शौपिंग का नया अनुभव

औनलाइन शौपिंग में न तो समय की बरबादी होती है और न ही पैसों की. इन का कैटलौग देख कर और्डर किया जा सकता है. जहां तक डिलिवरी का सवाल है तो वह कहीं से भी हो सकती है. कभी मुंबई से, कभी अहमदाबाद से तो कभी दक्षिण के किसी अन्य राज्य से. औनलाइन शौपिंग कंपनी के गोदाम लगभग हर बडे़ शहर में हैं.

सैबाल बताते हैं कि बारकोड की सूरत में और्डर कंपनी की मार्फत औनलाइन खुदरा कारोबारी के पास पहुंच जाता है और खरीदार तक समान की सप्लाई हो जाती है. और्डर दिलाने के एवज में मुनाफे का एक हिस्सा कमीशन के तौर पर कंपनी को मिल जाता है.

इस कारोबार के फूलनेफलने के पीछे एक बड़ा कारण सैबाल यह भी बताते हैं कि किसी भी औनलाइन शौपिंग पोर्टल में जितने लोग एकसाथ किसी भी एक प्रोडक्ट को देख पाते हैं, उतने लोगों तक एकसाथ कोई भी कंपनी नहीं पहुंच पाती है. ऐसा केवल औनलाइन शौपिंग के मामले में ही नहीं होता है, बल्कि होटल, रेलवे, फ्लाइट टिकट बुकिंग में भी लागू होता है. डिपार्टमैंटल स्टोर, एसी मार्केट, शौपिंग मौल्स भी एकसाथ इतने सारे ग्राहकों को आकर्षित नहीं कर पाते हैं.

औनलाइन शौपिंग ने अच्छेअच्छों को पानी पिला दिया है. वालमार्ट भी इस में शामिल है. हालांकि वालमार्ट हफ्ते में 1 दिन यानी शुक्रवार को रोलबैक नाम का औफर देता है. इस दिन चीजों की कीमत कम होती है.

यों तो औनलाइन शौपिंग वैबसाइट्स को नईनई चीजों की खरीदारी के लिए जाना जाता है, पर ओएलएक्स और क्विकर जैसी वैबसाइट्स ने  पुराने सामान को खरीदने और बेचने का एक नया जरीया लोगों को दिया है. इन साइट्स के जरीए बिना किसी टैंशन और खर्च के अपने सामान को फोटो के साथ विज्ञापन के तौर पर लगा सकते हैं. पुराने घरेलू सामानों को बेचने व खरीदने का यह तरीका बड़े शहरों के साथसाथ अब छोटे शहरों में भी प्रचलित हो रहा है.

जानकारों का मानना है कि अगर औनलाइन शौपिंग के प्रति इसी तरह लोगों का रुझान बढ़ता रहा तो खुदरा व्यापार और करोड़ों रुपयों की लागत से बनाए गए शौपिंग मौल्स की बिक्री का प्रतिशत बेहद गिर जाएगा.

औनलाइन शौपिंग की शिकायतों के मद्देनजर केंद्रीय वाणिज्य व उद्योग मंत्रालय औनलाइन शौपिंग को ले कर नई नीति बनाने जा रहा है. हालांकि एसोचैम औनलाइन शौपिंग के मद्देनजर नई नीति व कानून बनाने के खिलाफ है. एसोचैम का कहना है कि ऐसा करने पर भारत में नयानया फूलनेफलने वाला कारोबार पूरी तरह नष्ट हो जाएगा. इसलिए मौजूदा कानून के तहत ही क्रेता सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाना चाहिए.

शादी की शौपिंग का नया अड्डा

दीपा तिवारी

अगर शहनाई बजने वाली है तो शौपिंग की चिंता छोड़ें. बस एक क्लिक पर घर बैठे परिवार के सभी लोग अपनीअपनी पसंद के अनुसार ईपोर्टल पर सामान चुनें और और्डर कर दें. कुछ ही दिनों में होम डिलिवरी के जरीए सारा सामान आप के घर पर होगा. यह शौपिंग का आसान और भागदौड़ से बचने का अच्छा तरीका है. इस से समय और पैसे दोनों की बचत होती है. यों तो औनलाइन शौपिंग कंपनियां साल भर सस्ते औफर देती हैं पर त्योहारों में डिस्काउंट और बढ़ जाते हैं. महंगे और ब्रैंडेड सामानों पर सामान्य तौर पर 15 से 25% तक की छूट आसानी से मिल ही जाती है.

कंपीटिशन को देखते हुए आजकल औनलाइन शौपिंग वैबसाइट्स खूब छूट देती हैं. फ्लिपकार्ट, स्नैपडील, एसबाइज डौट कौम, 99 लेबल्स डौट कौम, फैशन ऐंड यू डौट कौम, ऐक्सक्लूसिवली डौट इन, मिंत्रा डौट कौम आदि कुछ प्रमुख वैबसाइट हैं, जहां से शादी की बेहतरीन खरीदारी की जा सकती है. जिस रंग का सूट या फैब्रिक चाहिए या फिर मेकअप किट यहां सब उपलब्ध हैं. कपड़ों के अलावा बैल्ट, बैग, परफ्यूम और घड़ी जैसे सामानों पर औनलाइन पोटर्ल पर 50% की छूट आसानी से मिल जाती है. इन के पास देशीविदेशी कई ब्रैंड मौजूद हैं, बस एक क्लिक की जरूरत है. इन के जरीए आप एक स्मार्ट शौपिंग कर के अपना बैंडबाजा और बरात बड़े धूमधाम से ले कर चल सकते हैं.

ई-शौपिंग में रखें इन बातों का ध्यान

औनलाइन शौपिंग ने खरीदारी को काफी आसान तो बनाया है पर यदि सामान खरीदते समय जरा सी चूक हो जाए तो आप का नुकसान भी हो सकता है. इसलिए ई खरीदारी करते समय कुछ बातों का ध्यान जरूर रखें:

औनलाइन साइट्स पर आप के बजट के मुताबिक सभी तरह के प्रोडक्ट मौजूद हैं, तो कुछ साइट किसी खास प्रोडक्ट को सेल करती हैं. आप प्रोडक्ट का चुनाव अपनी आवश्यकता के अनुसार करें, प्रलोभन में पड़ कर नहीं.

सभी शौपिंग साइट्स नए वर्ष और त्योहारों के मौकों पर खास तरह के औफर सीमित समय यानी कुछ दिनों के लिए अपने ग्राहकों को उपलब्ध कराती हैं. इस तरह के औफर्स का लाभ जरूर उठाएं.

हमेशा डिस्काउंट वाले प्रोडक्ट ही न देखें, क्योंकि ज्यादा डिस्काउंट वाले प्रोडक्ट क्वालिटी के मामले में उतने अच्छे नहीं होते. लेकिन एक बार औफर जोन में विजिट जरूर करें. जो प्रोडक्ट पसंद आ रहा है, उसे शौपिंग कार्ट में शौर्टलिस्ट करती जाएं. प्रोडक्ट को खरीदने के पहले उस के सिमलर प्रोडक्ट को देखना न भूलें. हो सकता है कि जिस कंपनी का प्रोडक्ट आप खरीदना चाहती हैं, उस से अच्छा प्रोडक्ट किसी दूसरे ब्रैंड में आप को बैस्ट प्राइज में मिल जाए.

खरीदते समय (चेक एबिलिटी के औप्शन में) अपने एरिया का पिनकोड डाल कर यह पता लगा लें कि उस प्रोडक्ट की डिलिवरी आप के एरिया में हो सकती है या नहीं. प्रोडक्ट की डिलिवरी के कई औप्शन मौजूद होते हैं. जैसे प्रोडक्ट की फ्री डिलिवरी में कुछ समय लगता है, पर अगर आप सिर्फ 1 ही दिन में ही डिलिवरी चाहती हैं, तो कुछ ऐक्स्ट्रा चार्जेज देने पड़ेंगे.

प्रोडक्ट के पेमैंट के भी कई औप्शन मौजूद होते हैं. जैसे डिलिवरी के समय कैश पेमैंट, नैट बैंकिंग से पेमैंट और ईएमआई औप्शन. किसी भी महंगे प्रोडक्ट को आप अपने बजट के मुताबिक 3 महीने से ले कर 12 महीने तक की ईजी ईएमआई से खरीद सकती हैं. लेकिन यह सुविधा केवल क्रैडिट कार्ड धारकों को ही मिल सकती है.

आजकल सभी औनलाइन कंपनियां 30 दिन में ईजी रिटर्न की सुविधा दे रही हैं. प्रोडक्ट पसंद न आने पर या कुछ खराबी होने पर आप 30 दिनों के अंदर सामान वापस करवा सकती हैं. आप का सामान घर से वही डिलिवरी करने वाला ले कर जाएगा और बिना कुछ अतिरिक्त राशि लिए हुए पूरा पेमैंट वापस होगा.

डिलिवरी लेते समय यह जरूर कन्फर्म करें कि यह वही प्रोडक्ट है जिस का आप ने और्डर किया था. अगर डिलिवरी के पहले पेमैंट हो चुकी है तो आप डिलिवरी करने वाले के सामने ही पार्सल की पैकिंग खोल कर देख लें. अगर कुछ गड़बड़ है तो उसी समय पार्सल को वापस कर दें.

अपने और्डर किए हुए प्रोडक्ट के साथ उस का गारंटी कार्ड है या नहीं, यह अच्छे से जांच लें. प्रोडक्ट की गारंटी उस औनलाइन कंपनी के बिल की डेट से शुरू होती है. गारंटी पीरियड में कुछ समस्या आने पर उस कंपनी से बात कर सकती हैं या खरीदे गए प्रोडक्ट के सर्विस सैंटर पर जा कर बिल के आधार पर उस प्रोडक्ट की प्रौब्लम सौल्व करवा सकती हैं. डिलिवरी के लिए अपना सही पता, पिनकोड, फोन नंबर और ई-मेल बिलकुल सहीसही दें. आप के मेल पर आई डिलिवरी ट्रैकिंग मेल से और्डर डिलिवरी का समय और कहां तक पार्सल पहुंचा, पता लगा सकती हैं.

क्या द्रोण आचार्य कहलाने के पात्र थे…?

महाभारत काल में और आज के समय में समाज, नैतिक मूल्यों, विचारधारा और शिक्षा आदि क्षेत्रों में बहुत बदलाव आया है. कुछ सामाजिक परिस्थितियों के चलते तो कुछ भारतीय समाज के गिरे हुए नैतिक मूल्यों के प्रसार ने शिक्षा जैसे सामाजिक कार्य को भी व्यवसाय बना दिया है. यहां हमारा उद्देश्य शिक्षकों की बदलती स्थिति की चर्चा करना नहीं बल्कि एक ऐसे गुरु की छवि की चर्चा करना है जिसे बरबस ही प्रसिद्धि मिल गई, जिसका प्रमाण है कि आज भी कई लोगों के मुख से यह कहते सुना जा सकता है, ‘आज द्रोणाचार्य जैसे आदर्श गुरु नहीं रहे और अर्जुन जैसे शिष्यों की संख्या भी नाममात्र रह गई है.’

जिन लोगों ने महाभारत नामक ऐतिहासिक ग्रंथ का गंभीरता से अध्ययन किया है उनकी नजर में परशुराम के शिष्य और पांडवों व कौरवों के गुरु आचार्य द्रोण की छवि कदापि आदर्श गुरु की नहीं हो सकती. महाभारत को धार्मिक ग्रंथों के बजाय ऐतिहासिक ग्रंथों की श्रेणी में इसलिए रखा गया है, क्योंकि महाभारत में धर्म का पालन अगर कौरवों ने नहीं किया तो पांडव पुत्र भी धर्म के मार्ग से कई बार विचलित हुए हैं. अत: इसे धार्मिक न कहा जाए तो शायद ज्यादा बेहतर होगा.

अब बात आती है गुरु द्रोण की आदर्शता को लेकर प्रमाण की. चलिए, द्रोण के जन्मकाल की विचित्र कथा से शुरू करते हैं. द्रोण, जो जाति प्रथा के कट्टर समर्थक थे, उन के खुदके जन्म की कथा बेहद विचित्र है. मुनि भरद्वाज बहुत कठोर व्रतों का पालन करने वाले थे. एक दिन उन्हें एक खास तरह के यज्ञ का अनुष्ठान करना था. इसलिए वह मुनियों आदि को साथ लेकर गंगा में स्नान करने गए. वहां महर्षि भरद्वाज ने घृताची अप्सरा को देखा जो पहले से ही स्नान करके नदी के तट पर खड़ी वस्त्र बदल रही थी. वस्त्र बदलते समय उस रूपवती का वस्त्र खिसक गया और उसे उस अवस्था में देख कर भरद्वाज महर्षि का मन डोल गया.

ऋषि का मन उस अप्सरा में आसक्त हुआ, इस से उन का वीर्य स्खलित हो गया. ऋषि ने उस वीर्य को द्रोण यानी यज्ञकलश में रख दिया. तब उस कलश से बालक उत्पन्न हुआ. बालक का जन्म द्रोण से हुआ था इसलिए उस का नाम द्रोण ही रख दिया. इस प्रकार द्रोण को ऋषि भरद्वाज की संतान माना जाता है. कितनी विचित्र है यह कथा.

स्पष्ट है द्रोण किसी विवाहेत्तर संबंध से उत्पन्न हुए. द्रोण ने प्रारंभिक शिक्षा अपने पिता भरद्वाज से प्राप्त की किंतु मूल रूप से वह परशुराम के शिष्य कहलाए. परशुराम जिस समय वन में जाने की इच्छा से अपना सर्वस्व दान कर रहे थे तो द्रोण उन के सामने पहुंचे और बोले, ‘‘मैं भरद्वाज पुत्र द्रोण धन की इच्छा से आया हूं और ऐेसे धन की याचना करता हूं जिस का कभी अंत न हो.’’ किंतु उस समय परशुराम अपना सबकुछ दान कर चुके थे. उन्होंने द्रोण को अस्त्रशस्त्रों का ज्ञान अथवा अपना शरीर दान में लेने के लिए कहा. द्रोण ने उन से अस्त्रशस्त्र का ज्ञान दानस्वरूप ग्रहण किया.’’

इस में कोई शक नहीं कि द्रोणाचार्य एक सर्वश्रेष्ठ ब्राह्मण योद्धा थे किंतु ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध व प्रतिशोध की भावनाओं से भरपूर द्रोण ने भेदभाव और पक्षपात की नीति को अपना कर खुद अपनी छवि पर कई दाग लगा दिए.

बात गुरु द्रोण के विद्याकुल से शुरू की जाए तो इस तथ्य को साबित करने में आसानी हो जाएगी कि द्रोण में प्रतिशोध व क्रोध की भावना शुरू से ही कूटकूट कर भरी हुई थी, जिसे वह जीवन के आखिरी समय तक त्याग नहीं सके. द्रोण व द्रुपद एक ही गुरु महर्षि अग्निवेश के शिक्षार्थी थे. दोनों की गहरी दोस्ती एक मिसाल थी. इसी गहरी दोस्ती के चलते द्रुपद के राजसिंहासन पर बैठने के बाद द्रोण ने अपने दोस्त को उस के वचन की याद दिलाई किंतु द्रुपद ने द्रोण को अपमानित कर दिया. शायद द्रोण, द्रुपद के राज्य न देने को ही अपमान समझ बैठे. उस समय उन के मन में बेहद क्रोध तथा प्रतिशोध की भावना को महाभारत ग्रंथ के संभवपर्व के 12वें श्लोक में इस प्रकार प्रकट किया है :

द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाज: प्रतापवान..

मुहूर्ते चिंतयित्वा तु मन्युनाभिपरिप्लुत:.

स विनिश्चित्य मनसा पांचाल बुद्धिमान.

जगाम कुरु मुख्यानां नगरं नाग साहृयम्॥

(अर्थात राजा द्रुपद के मना करने पर प्रतापी द्रोण क्रोध से जल उठे और दो घड़ी तक गहरी चिंता में डूबे रहे. वे बुद्धिमान तो थे ही, पांचाल नरेश से बदला लेने के बारे में मन ही मन कुछ निश्चय कर के कौरवों की राजधानी हस्तिनापुर चले गए.)

भीष्म के द्वारा द्रोण को कौरवों तथा पांडवों का गुरु नियुक्त करने पर द्रोण को दु्रपद से प्रतिशोध लेने का मार्ग नजर आने लगा. अपने इस मनोभाव को उन्होंने भीष्म के समक्ष प्रकट भी किया. महाभारत के संभवपर्व के 76वें श्लोक में वह कहते हैं:

अभ्यागच्छं कुरुन् भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वतै:.

ततोऽहं भवत: कामं संवर्धयितुमागत:.

इदं नागपुरं रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते.

(अर्थात मैं गुणवान शिष्यों के द्वारा अपने अभीष्ट की सिद्धि चाहता हुआ आप के मनोरथ को पूर्ण करने के लिए ही पांचाल देश से हस्तिनापुर नगर में आया हूं. बताइए, मैं आप का कौन सा प्रिय कार्य करूं.)

गुरु द्रोण द्वारा शिक्षा शुरू करने की नींव ही उन का खुद का स्वार्थ था. यह बात किसी से नहीं छिपी कि अर्जुन द्रोण का प्रिय शिष्य था. उसे उन्होंने पूर्ण रूप से शिक्षा दी. किंतु वास्तव में उचित न्याय तो उन्होंने अर्जुन के साथ भी नहीं किया था. यह अलग बात है कि अर्जुन ने अपनी निष्ठा व लगन के आगे द्रोण को वह सबकुछ सिखाने के लिए विवश कर दिया जो सब उन्होंने अपने पुत्र अश्वत्थामा को गुपचुप सिखाने का प्रयास किया था. महाभारत संभवपर्व के 16वें तथा 17वें श्लोक में वर्णित है :

कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात.

पुत्राय च ददौ कुंभमविलंब चकारणात॥

यावत् ते नोपगच्छन्ति तावदस्मै परां क्रियाम्.

द्रोण आचष्ट पुत्राय तत कर्म जिष्णुरौहत॥

(अर्थात द्रोणाचार्य अन्य सब शिष्यों को तो पानी लाने के लिए कमंडल देते जिस से उन्हें लौटने में कुछ विलंब हो जाए, परंतु अपने पुत्र अश्वत्थामा को बडे़ मुंह का घड़ा देते जिस से वह पानी भरने के कार्य से शीघ्र निवृत्त हो जाए. जब तक दूसरे शिष्य लौट नहीं आते, तब तक द्रोणाचार्य अपने पुत्र अश्वत्थामा को अस्त्र संचालन की कोई उत्तम विधि बतलाते थे.)

चूंकि अर्जुन ने उन के इस कार्य को जान लिया था अत: वह शीघ्रता से कमंडल भर कर आचार्यपुत्र अश्वत्थामा के साथ ही गुरु के समीप आ जाता जिस से गुरु द्रोण उन्हें गुप्त अस्त्र विद्या सिखाने के लिए विवश हो गए. वास्तव में पुत्र मोह में जितना अंधा धृतराष्ट्र को माना जाता है उतना ही पुत्र मोह द्रोण में भी था. वह अपने पुत्र अश्वत्थामा को संसार का सब से बड़ा धनुर्धर बनाना चाहते थे. किंतु हालात के चलते अर्जुन ने वह स्थान प्राप्त कर लिया.

अर्जुन के बढ़ते हुए धनुष कला कौशल को देख कर द्रोण ने ईर्ष्या भाव से रसोइए से यहां तक कह दिया कि तुम अर्जुन को कभी अंधेरे में भोजन न परोसना और मेरी बात भी अर्जुन से कभी न कहना. ध्यान देने योग्य बात है कि अर्जुन को अंधेरे में धनुष अभ्यास की प्रेरणा अंधेरे में भोजन कर रहे भीम से प्राप्त हुई थी.

द्रोण की भेदभाव व पक्षपातपूर्ण नीति से महाभारत के पाठक तब अवगत हो जाते हैं, जब एकलव्य की कथा उभर कर आती है. द्रोणाचार्य का अस्त्र कौशल सुन कर हजारों राजा और राजकुमार धनुर्वेद की शिक्षा लेने के लिए वहां जमा हो गए. तदनंतर निषादराज हिरण्यधनु का पुत्र एकलव्य द्रोण के पास आया, पर उसे निषाद पुत्र जान कर धर्मज्ञ आचार्य ने धनुर्विद्या विषयक शिष्य नहीं बनाया.

एकलव्य ने द्रोणाचार्य के चरणों में प्रणाम किया और वन में लौट कर उन की मिट्टी की मूर्ति बनाई तथा उसी में आचार्य की परम उच्च भावना रख कर उस ने धनुर्विद्या का अभ्यास शुरू किया. एकलव्य ने अपने निरंतर अभ्यास से धनुर्वेद का ज्ञान अर्जित किया तथा स्वयं को द्रोणाचार्य का शिष्य माना. किंतु द्रोण ने क्या किया? अपने एक ऐसे शिष्य से जिसे शिक्षा देने में उन्होंने जरा भी परिश्रम नहीं किया, गुरु दक्षिणास्वरूप उस के दाहिने हाथ का अंगूठा केवल इस कारण से गुरुदक्षिणा में मांग लिया कि वह उन के प्रिय शिष्य अर्जुन से अधिक निपुण था और अर्जुन को उन्होंने वचन दिया था कि द्रोण का कोई भी शिष्य उस से बढ़ कर नहीं हो सकता. ईर्ष्या तथा द्वेष की भावना से भरा द्रोण का हृदय क्षण भर के लिए नहीं कांपा जब उन्होंने एकलव्य से कहा कि

तमवतीत् त्वयाडंगुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति.

(अर्थात तुम मुझे गुरुदक्षिणा में दाहिने हाथ का अंगूठा दे दो.)

इतने वर्ष बीत जाने पर भी द्रोण के मन से द्रुपद के प्रति प्रतिशोध की भावना खत्म नहीं हुई. गुरुदक्षिणा के रूप में उन्होंने कौरवों एवं पांडवों से द्रुपद को युद्ध में कैद करने के लिए कहा. पांडवों द्वारा यज्ञसेन द्रुपद को मंत्रियों सहित संग्राम भूमि में बंदी बना कर द्रोणाचार्य को उपहारस्वरूप दे दिया गया. द्रोण ने उस समय द्रुपद का अपमान करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा. वह द्रुपद से व्यंग्यपूर्ण बोले :

विमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया.

प्राप्य जीवं रिपुवशं सखिपूर्व किमिष्यते॥

(अर्थात मैं ने बलपूर्वक तुम्हारे राष्ट्र को रौंद डाला, तुम्हारी राजधानी मिट्टी में मिला दी. अब तुम शत्रु के वश में पडे़ हुए जीवन को ले कर यहां आए हो. बोलो, अब पुरानी मित्रता चाहते हो क्या?)

ऐसा कह कर द्रोणाचार्य कुछ हंसे. इस के बाद बोले, ‘‘वीर, प्राणों पर संकट आया जान भयभीत न होओ. तुम बचपन में मेरे साथ आश्रम में खेलेकूदे हो उस से तुम्हारे ऊपर मेरा स्नेह व प्रेम बहुत बढ़ गया है. तुम इस राज्य का आधा भाग मुझ से ले लो.’’

इस प्रकार द्रोण ने द्रुपद से प्रति- शोध लिया किंतु प्रतिशोध की भावना यहीं पर समाप्त नहीं हुई. महाभारत युद्ध में सेनापति बनने पर द्रोण ने द्रुपद की हत्या कर के अपने प्रतिशोध को अंतिम रूप दिया.

ऐसा नहीं है कि महाभारत के रचनाकार ने द्रोण के सभी क्रियाकलापों को नजरअंदाज किया है. महाभारत के द्रोणपर्व के अध्याय 190 के 32 से ले कर 40 तक के 9 श्लोकों में द्रोण की आलोचना भी की गई है किंतु यह आलोचना इतनी माने नहीं रखती. महाभारत के इतने श्लोकों में से केवल 9-10 श्लोकों में एक ऐसे व्यक्ति की थोड़ी सी आलोचना की गई जिस ने अपने शिष्यों के होते हुए बुरे कर्म को भी अपनी आंखों के सामने होते देखा किंतु मौन रहे.

धृतराष्ट्र की राजसभा में उस समय कौरवों तथा पांडवों के गुरु द्रोण भी उपस्थित थे जब द्रोपदी को चोटी से पकड़ घसीट कर भरी सभा में लाया गया. द्रोपदी उस समय रजस्वला थी और एक ही वस्त्र में थी. ऐसी स्थिति में दुर्योधन का उसे अपनी जंघा पर बैठने के लिए कहना, दुशासन द्वारा उस के चीरहरण का प्रयास करना कोई छोटी बात नहीं थी किंतु ऐसे गंभीर अवसर पर भी गुरु द्रोण चुप रहे. उन्होंने अपने शिष्यों से एक शब्द भी नहीं कहा. वह चाहते तो अपने शिष्यों को ऐसा दुष्कर्म न करने का आदेश दे सकते थे किंतु नहीं. आखिर कैसे गुरु थे वह?

पांडवों को जब वनवास हुआ तो द्रोण जानते थे कि सबकुछ गलत हो रहा है किंतु उन्होंने अपना मौन नहीं तोड़ा. अगर वह चाहते तो कौरवों का साथ छोड़ कर पांडवों के साथ हस्तिनापुर का त्याग कर सकते थे. पितामह भीष्म की तरह वह हस्तिनापुर के साथ किसी बंधन से नहीं जकड़े थे. किंतु शायद राजसी सुख को त्यागना उन्हें गवारा नहीं था.

पांडव जब अज्ञातवास का 1 वर्ष पूरा कर रहे थे तो द्रोण कहते हैं सांम्प्रतं चैव यतं कार्य तचक्षिप्रमकालिकम.

क्रियतां साधु संचिनत्य वासश्चैषां प्रचिन्त्यताम॥

यथावत पांडुपुत्राणां सर्वार्थेषु धृतात्मनाम.

(विराटपर्व, श्लोक 7-8)

(अर्थात इस समय जो कुछ करना है सोचविचार कर शीघ्र किया जाना चाहिए. इस में विलंब उचित नहीं है. सभी विषयों में धैर्य करने वाले उन पांडवों के निवास स्थान का ही ठीकठाक पता लगाना चाहिए. वे सभी शूर और तपस्या से आवृत्त हैं, अत: उन्हें पाना कठिन है. पा लेने पर भी पहचानना तो और भी कठिन है.)

द्रोण एक ओर तो अपने शिष्य अर्जुन की प्रशंसा करते नहीं थकते थे किंतु दूसरी ओर गोहरणपर्व के 18वें और 19वें श्लोक में दोगलेपन की नीति अपनाते हुए वह कहते हैं:

यदेतत प्रथमं वाक्यं भीष्म: शान्तनवोब्रवीत.

तेनैवाहं प्रसन्नो वै नीतिरत्र विधीयताम्॥

यथा दुर्योधनं पार्थों नोपसर्पति संगरे.

साहसाद यदि वा मोहात यथा नीतिर्विधीयताम॥

यानी अब ऐसी नीति से काम लेना चाहिए जिस से अर्जुन इस युद्ध में दुर्योधन के पास तक  न पहुंच सके. साहस से अथवा प्रमादवश भी दुर्योधन पर उस का आक्रमण न हो, ऐसी नीति निर्धारित करनी चाहिए.

द्रोण के ही नेतृत्व में अभिमन्यु की जिस निर्ममता से हत्या की गई उसे कैसे भूला जा सकता है. द्रोण के चरित्र पर इतने आक्षेप होने के बावजूद उन्हें शोहरत मिली हुई है. समझ में नहीं आता इस का क्या कारण हो सकता है? शायद परशुराम सरीखे गुरु के शिष्य होने के गौरव से वह खुद गौरवान्वित हो गए या महाभारत युद्ध के कारण, जो उन के शिष्यों की आपसी फूट का परिणाम था या केवल इसी कारण कि उन्होंने राजघराने के बच्चों को ही अपना शिष्य बनाया. कारण चाहे कुछ भी रहा हो, गौरव तो उन्हें मिला ही है.

गुरु होने के नाते द्रोणाचार्य चाहते तो कौरव-पांडवों के बीच युद्ध की स्थिति आने से रोक सकते थे लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया. यह जानते हुए भी कि दुर्योधन धर्मयुद्ध नहीं लड़ रहा, द्रोणाचार्य ने अपनी विद्या के प्रभाव से दुर्योधन को ऐसा कवच पहनाया, जिसे कोई तोड़ नहीं सकता था.

सरकार, विचारों की स्वतंत्रता, कोर्ट

देश के संविधान की मूल आत्मा असल में वोटतंत्र में नहीं, आवाज की स्वतंत्रता में है. हर स्वतंत्रता, कानून का राज, अपनी संपत्ति रखने का हक, बिना कारण गिरफ्तारी से बचने का हक, बराबरी का हक और यहां तक कि अंधविश्वासी व कट्टरपंथी बने रहने का हक भी विचारों को व्यक्त करने की स्वतंत्रता से मिलता है. सुप्रीम कोर्ट आजकल इस पर सुनवाई कर रहा है, क्योंकि विचारों में विभिन्नता को कुचलने के लिए भारतीय दंड विधान की कुछ धाराओं का जम कर दुरुपयोग किया जाता है.

धार्मिक विश्वासों को चोट पहुंचाने के भारतीय दंड विधान में कई प्रावधान ऐसे हैं, जिनके जरिए बड़ी आसानी से मुकदमे दायर कर दिए जाते हैं और मुकदमा दायर करने वाला मजे में घूमता रहता है, जबकि अपनी स्वतंत्रता को बचाने वाला अदालतों के गलियारों की ठोकरें खाता है. हिंदू धर्म की अतार्किक, असहिष्णु, अन्यायी मान्यताओं व उस के अय्याश देवी-देवताओं की पोल खोलने के चलते दिल्ली प्रेस की पत्रिकाओं पर हिंदू कट्टरपंथियों ने मुकदमे किए. संपादकों ने जब एक-एक बात को स्वयं हिंदू धर्मग्रंथों से प्रमाणित करना चाहा, तो मामले ठंडे पड़ गए और विरोधी मुंह छिपाते रह गए. इन मामलों में कट्टरपंथियों की बंद आंखें और बंद दिमाग देख कर वास्तव में आश्चर्य होता है.

पहले कांग्रेस सरकार और अब भारतीय जनता पार्टी की केंद्र सरकार दोनों इस विषय पर एकमत हैं कि धार्मिक अंधविश्वासों को फैलाने का अधिकार तार्किक व सत्यता को प्रस्तुत करने से ऊपर है. वे दोनों ही कहते रहे हैं कि हम सांप को पूजें या शेर को, हम कान में सीसा डलवाने को सच कहें या जातिगत भेदभाव को ईश्वर की देन, हम झूठे व मक्कारों की पूजा करें या बेईमानी को भगवान की लीला मानें, यह हमारी धार्मिक स्वतंत्रता है.

आप की विचारों की स्वतंत्रता हमारी इन बेवकूफियों को उजागर कर जनता को जाग्रत करने की नहीं है. ऐसा किया गया तो हमारे करोड़ों अंधभक्त, जो खरबों रुपयों का दान देते हैं और धर्म के व्यापार को सोने-चांदी से मढ़ते हैं, गायब हो जाएंगे. धर्म के ये पैरोकार संविधान के मूल अधिकार, विचारों की स्वतंत्रता के अधिकार को धर्म के जहरीले दलदल में डूबने देना चाहते हैं, ताकि इस दलदल और इसकी बदबू का किसी को एहसास न हो.

इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में जो मामला चल रहा है, भाजपा सरकार के तर्क वही हैं, जो कांग्रेस सरकार के होते थे, कि विचारों की स्वतंत्रता को अपना हक देने पर कानून व्यवस्था खराब हो जाएगी. एक तरह से व्यवस्था का नाम ले कर अदालत को ब्लैकमेल किया जा रहा है. सर्वोच्च न्यायालय धार्मिक पोलपट्टी खोलने का मौलिक अधिकार विचारकों को देगा, इसमें संदेह है पर आशा है कि वह उस पर और बंदिशें लगाने का रास्ता नहीं खोलेगा.

नवाज के द्वार पर मोदी

नरेंद्र मोदी की सरकार यह सोचे कि 2 घंटे की पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के घर की मीटिंग से भारत व पाकिस्तान की कटुता मिट जाएगी तो वह बहुत गलतफहमी में है. यह सूक्ष्म मुलाकात निरर्थक है. यह भारत के प्रधानमंत्री पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है.

नरेंद्र मोदी ने 26 मई, 2014 को अच्छी शुरुआत की थी पर उस के बाद उन्होंने उन निकम्मों और विध्वंसकों को अपनी ओर जमा कर लिया जिन का सिद्धांत है–न काम करेंगे, न करने देंगे.

जिस असहिष्णुता पर ढेरों साहित्यकारों, फिल्मकारों, वैज्ञानिकों ने सरकार से मिले सम्मान लौटाए वह सीधे पाकिस्तान से जुड़ी है क्योंकि नरेंद्र मोदी का मौन और कट्टरवादियों की लाउडस्पीकरी मुखरता में हिंदू-मुसलिम विवाद व भारत-पाकिस्तान विवाद की प्रतिच्छाया है.

भारत सरकार शपथग्रहण के दिन की अच्छी शुरुआत के बाद पाकिस्तान से लड़ने के अवसर ढूंढ़ती रही है और यह साफ है कि इस के पीछे हिंदू श्रेष्ठता साबित करना रहा है जो भाजपा के कट्टरपंथियों की मांग और पहचान है.

नरेंद्र मोदी को दिल्ली, बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों, लोकसभा उपचुनावों या पंचायत चुनावों में जो हार का सामना करना पड़ा, उस असफलता के बीज हिंदू कट्टरवाद ने बोए थे.

सवाल है कि क्या नरेंद्र मोदी ने विश्व कूटनीति के कारण लाहौर की यात्रा की या देशीय योजना के चलते. क्या यह रूसीअमेरिकी प्लान का हिस्सा है जो इराक व अफगानिस्तान के तालिबानियों को घेरने की तैयारी में हैं या यह उत्तर प्रदेश के दलित व मुसलिम वोटरों को समझाने की कोशिश है कि नरेंद्र मोदी दोनों को अछूत नहीं मानते और प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की मां के पैर तक उसी तरह छुए जा सकते हैं जैसे पंडितों के छुए जाते हैं.

अमेरिका और रूस पश्चिमी एशिया में पांव जमाते खूंखार वहशी इसलामिक स्टेट के पैतरों से परेशान हैं जो कब्जाई जमीन पर जमे हैं और जिन के समर्थक पेरिस और सेन बर्नार्डिनो, अमेरिका तक में हमला कर सकते हैं. इसलामिक स्टेट को काबू करने में उन्हें पाकिस्तान की बहुत जरूरत है. वह सेना दे सकता है और हथियार भी. सुन्नी बहुल होने के कारण उस पर इसलामिक स्टेट ‘विधर्मी’ होने का आरोप भी नहीं लगा सकता. पाकिस्तान को पूरी तरह मनाना है तो भारत-पाकिस्तान संबंध ठीक करने होंगे.

नरेंद्र मोदी ने उन दोनों में से कौन सी वजह से लाहौर में नवाज शरीफ की नातिन की शादी की मिठाई खाई, इस बाबत कहना अभी संभव नहीं है. हां, बहाना चाहे जो भी हो, अगर पाकिस्तान के साथ संबंध सुधर जाएं तो दोनों देशों के लगभग करोड़ों गरीबों को लाभ होगा क्योंकि दोनों देशों की सेनाओं पर बरबाद होते कई लाख करोड़ रुपए बचेंगे.

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