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बोलिए लालूजी

बिहार में अब शांति है. लोग अगले 5 सालों के लिए फुरसत पा चुके हैं लेकिन जीत के बाद हीरो बन कर उभरे राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव की बातें सुनने के लिए जरूर बेचैन हैं जो जाने क्यों खामोश हैं. जीत के बाद लालू ने कई फिल्मों सरीखे डायलौग मारे थे कि अब काशी जा कर मोदी की लुटिया डुबो दूंगा, इसलिए न केवल बिहार, बल्कि देशभर के लोग पटना से काशी का रास्ता ताक रहे हैं लेकिन लालू ने कदम नहीं उठाए तो तरहतरह की बातें होना भी लाजिमी हैं, जो आमतौर पर देश के बड़े विश्लेषक केंद्रों, चाय के होटलों और पान की गुमटियों पर होती हैं. ये विश्लेषक किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं पर उन की खामोशी को उन के समधी मुलायम सिंह यादव की इच्छा और अस्तित्व से जोड़ कर देख रहे हैं.

लोकायुक्त और जनहित

लोकायुक्त क्या करता है और उस की जरूरत क्या है, इस सवाल पर कोई नहीं सोचता. वजह, लोगों ने मान लिया है कि चूंकि लोकायुक्त होता है इसलिए उसे होना चाहिए. सुप्रीम कोर्ट ने लोगों की इन्हीं भावनाओं का यथोचित सम्मान करते हुए रिटायर्ड जज वीरेंद्र सिंह को लोकायुक्त नियुक्त कर बेवजह के झंझट से मुक्ति और उत्तर प्रदेश की सरकार को झटका दे दिया, लेकिन लखनऊ के एक नागरिक सच्चिदानंद गुप्ता ने इस पर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका लगा दी. ऐसी याचिकाओं में बड़ा मजा आता है. इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट ने बीती 20 दिसंबर को सुनवाई करते हुए वीरेंद्र सिंह के शपथग्रहण पर रोक लगा दी. यानी कि आरोप बड़े शाकाहारी थे कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के सामने तथ्य नहीं रखे.

साध्वी का उखड़ा मूड

कुंभ मेले की रेलमपेल में नदी में शुभमुहूर्त में डुबकी लगा पाना वाकई जोखिम वाला, रोमांचक और चुनौती भरा काम है. इसीलिए इस पुण्य को लूटने व मोक्ष पाने के लिए करोड़ों श्रद्धालु जिंदगी दांव पर लगाने को तैयार रहते हैं क्योंकि वह नश्वर होती है. लेकिन उज्जैन में होने जा रहे सिंहस्थ को ले कर जाने क्यों साध्वी उमा भारती का मूड उखड़ा हुआ है. उन्होंने घोषणा कर दी है कि वे कुंभ में नहीं जाएंगी. अब निकालने वाले तरहतरह के मतलब निकाल रहे हैं जिन में से पहला यह है कि शिवराज को यह कमजोर करने का तरीका है. एक मतलब यह भी निकाला जा रहा है कि क्षिप्रा नदी गंदी है जो उमा के डुबकी लगाने लायक नहीं है. पर यह ज्यादा अहम है कि वे दरअसल कुंभ के सियासी अखाड़े की सियासत का हिस्सा नहीं बनना चाहतीं.

जश्न मनाओ, भरोसा जीतो

आमलोग गुंडेमवालियों से ज्यादा खौफ खाते हैं या पुलिस वालों से, इस सवाल का जवाब निष्पक्षता से दिया जाए तो औसत नतीजा पुलिस वालों के हक में तो नहीं निकलने वाला. पुलिस वालों को ऐसा क्या करना चाहिए जिस से उन की छवि सुधरे. इस बाबत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कच्छ के रण में आयोजित 3 दिवसीय सम्मेलन में देशभर के पुलिस निदेशकों को महत्त्वपूर्ण टिप्स दिए. इन में से एक अहम यह था कि पुलिस वालों को थानों में आम लोगों की उपलब्धियों का जश्न मनाना चाहिए. बात में दम इस लिहाज से है कि वाकई थानों का बाहरी माहौल बेहद खौफनाक सा रहता है. वैसे देशभर के थानों में अंदरूनी और कथित तौर पर रोज दारू, मुरगा पार्टियां होती रहती हैं. बस इस में आम लोग नहीं, बल्कि खास लोग होते हैं जो इन पार्टियों को स्पौंसर करते हैं.

घोटालों की गिरफ्त में क्रिकेट संघ

क्रिकेट में घोटाले के एक और मामले ने सियासी उबाल ला दिया है. आईपीएल के सरताज रहे ललित मोदी के साथ भाजपा की केंद्रीय मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के नाजायज कारोबारी रिश्तों की बदनामी का दाग धुला भी नहीं था कि अब वित्त मंत्री अरुण जेटली के दामन पर क्रिकेट का कलंक चस्पां हो गया है.

बीसीसीआई, आईपीएल और राजस्थान, हिमाचल प्रदेश व जम्मूकश्मीर जैसे राज्य क्रिकेट संघों में व्याप्त अनियमितताओं के खुलासों के बाद ताजा मामला दिल्ली और जिला क्रिकेट संघ (डीडीसीए) में भ्रष्टाचार का सामने आया है. मामले में केंद्र और दिल्ली सरकार आमनेसामने हैं पर मामले में भाजपा मुसीबत से घिरी दिख रही है. उस के भ्रष्टाचारमुक्त भारत और अच्छे दिन आएंगे जैसे नारे झूठे साबित होते जा रहे है.

डीडीसीए में भ्रष्टाचार के मामले में केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली कठघरे में हैं. जेटली करीब 13 साल तक डीडीसीए के अध्यक्ष रहे हैं. उन पर सीधेसीधे आरोप तो नहीं हैं पर उन के कार्यकाल में हुए कोटला स्टेडियम के निर्माण व अन्य मामलों में हुई अनियमितताओं के चलते वे विपक्ष के निशाने पर हैं. जेटली पर आरोप कोई और नहीं, उन्हीं की पार्टी के सांसद और पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद ने लगाए हैं. दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार ने मामले की जांच शुरू कर केंद्र को और भड़का दिया. दिल्ली सरकार के जांच के आदेश के अधिकार पर ही सवाल उठाए गए और जेटली ने अरविंद केजरीवाल पर मानहानि का दावा ठोंक दिया. इस मामले के बाद पहले से ही उभर रहे असंतोष के बीच भाजपा की सियासी और कानूनी दिक्कतें भी बढ़ गई हैं.

असल में डीडीसीए में भ्रष्टाचार की बात उस समय उजागर हुई जब 15 दिसंबर को दिल्ली सचिवालय में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के दफ्तर पर सीबीआई ने छापा मारा और कुछ फाइलें टटोल कर अपने साथ ले गई. इस छापे से अरविंद केजरीवाल केंद्र सरकार पर नाराज हुए. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया कि यह छापा प्रधानमंत्री के कहने पर उन के दफ्तर पर मारा गया. इसे राज्य की स्वायत्तता पर हमला बताया. पूरी आम आदमी पार्टी भाजपा हमलावर हो गई.

अरविंद केजरीवाल ने खुलासा किया कि असल में उन के पास डीडीसीए में भ्रष्टाचार संबंधी फाइलें थीं और वे शीघ्र ही जांच बैठाने वाले थे. इसलिए मोदी ने अपने वित्त मंत्री को बचाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल किया और उन के दफ्तर की फाइलें टटोली गईं. उधर, भाजपा नेताओं का कहना है कि सीबीआई ने छापा केजरीवाल के दफ्तर में नहीं, प्रमुख सचिव राजेंद्र कुमार के यहां मारा. राजेंद्र कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच की जा रही है. विभिन्न पदों पर रहते हुए उन्होंने अपने लोगों को सरकारी खजाने से लाभ पहुंचाया.

केजरीवाल ने राजेंद्र कुमार को ईमानदार अधिकारी के तौर पर प्रमुख सचिव बनाया था. प्रधान सचिव बनाने से पहले ही राजेंद्र कुमार के भ्रष्टाचार के मामलों पर चर्चा सामने आ चुकी थी. इस से केजरीवाल की ईमानदारी पर भी सवाल खड़े किए जा रहे हैं.

मामले में कीर्ति आजाद के पार्टी से निलंबन और दूसरे नेताओं की नाराजगी से  संदेश यह जा रहा है कि भाजपा नेतृत्व भ्रष्टाचार को संरक्षण देने में शामिल है. बहरहाल, आम आदमी पार्टी और कीर्ति आजाद के आरोपों पर यकीन किया जाए तो जेटली के कार्यकाल के दौरान क्रिकेट संघ में 400 करोड़ रुपए की हेराफेरी की गई.

क्या है मामला

डीडीसीए ने स्टेडियम बनाने के लिए 24 करोड़ रुपए आवंटित किए थे. इस के निर्माण में 114 करोड़ रुपए खर्च हो गए. इतना पैसा कैसे खर्च हो गया? एक कंस्ट्रक्शन कंपनी को 57 करोड़ रुपए दिए गए तो 57 करोड़ रुपए कहां गए? कहा गया है कि स्टेडियम में कौर्पोरेट बौक्स समेत अन्य निर्माण कराए गए. आम आदमी पार्टी का आरोप है कि 1.55 करोड़ रुपए का 3 कंपनियों को कर्र्ज दिया गया, उस का कोई ब्योरा नहीं है. जिन 5 कंपनियों को अलगअलग ठेके दिए गए, उन के ईमेल, पते और निदेशक सब एक हैं. यह सब बड़ा फर्जीवाड़ा है. डीडीसीए के खजांची नरेंद्र बत्रा के साथ अरुण जेटली के रिश्तों पर भी सवाल उठाए गए.

आरोप है कि डीडीसीए द्वारा लैपटौप के एक दिन के किराए की राशि 16 हजार रुपए चुकाई गई. इस राशि में थोक के हिसाब से एक नया लैपटौप खरीदा जा सकता है. प्रिंटर का एक दिन का किराया 3 हजार रुपए बताया गया जो करीब उस की कीमत के बराबर है.

कहा गया है कि सरकार द्वारा 5 हजार करोड़ रुपए से अधिक कीमत की 14 एकड़ जमीन कुछ लाख रुपए सालाना दर पर डीडीए को दिए जाने के  अलावा उसे करोड़ों रुपए सालाना टैक्स छूट भी मिलती है.

धांधलियों को उठाने वाले कीर्ति आजाद कई सालों से कोशिश में थे कि डीडीसीए में गहरी जड़ें जमा चुके भ्रष्टाचार पर अरसे से अध्यक्ष रहे अरुण जेटली कार्यवाही करें पर उन की नहीं सुनी गई. आजाद के साथ पूर्व क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी भी मामले को उठाते रहे हैं. जेटली ने आजाद पर मानहानि का केस दायर नहीं कराया. इस पर आजाद ने उन्हें चुनौती दी. बहरहाल, कीर्ति आजाद और बिशन सिंह बेदी दोनों की डीडीसीए की सदस्यता पर खतरा मंडराने लगा है.

मामले में दिल्ली सरकार ने विधानसभा का एक दिन का विशेष सत्र बुला कर डीडीसीए में 1992 से 2015 के बीच हुए कथित भ्रष्टाचार की जांच के लिए पूर्व सौलिसिटर गोपाल सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में एक जांच आयोग के गठन की अधिसूचना जारी कर दी. सरकार ने आयोग को कहा कि 3 महीने में वह अपनी रिपोर्ट सौंपे.

भाजपा ने विधानसभा के बाहर प्रदर्शन किया और इस अधिसूचना को उप राज्यपाल नजीब जंग ने असंवैधानिक करार देते हुए कहा कि दिल्ली सरकार को जांच आयोग बैठाने का अधिकार नहीं है क्योंकि डीडीसीए कंपनी ऐक्ट के तहत रजिस्टर्ड है और यह विभाग केंद्र के अधीन है. इसे ले कर दोनों ओर से बहस जारी है.

इस से पहले केजरीवाल ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर के मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने प्रमुख सचिव के बहाने सीबीआई द्वारा छापा मेरे दफ्तर पर मारा. यह खेल केवल अरुण जेटली को बचाने के लिए किया गया क्योंकि दिल्ली सरकार डीडीसीए में भ्रष्टाचार पर जांच आयोग बैठाने की तैयारी कर रही थी. यह भी कहा गया कि डीडीसीए को अमीरों के क्लब की तरह चलाया गया, आम आदमी वहां जा ही नहीं सकते थे.

छापे पर गुस्साए केजरीवाल द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस्तीफा मांगा गया और ट्विटर पर उन्हें कायर व मनोरोगी करार दिया गया. केजरीवाल के इस ट्वीट पर भाजपा ने उन्हें इस तरह की भाषा को ले कर खूब आड़े हाथों लिया.

इसी बीच, पूर्व आईपीएस के पी एस गिल ने जेटली पर आरोप लगाया कि  एडवाइजरी बौडी का सदस्य रहते हुए उन्होंने अपनी बेटी सोनाली जेटली को हौकी इंडिया का वकील बनाया और फीस के तौर पर भारी भुगतान दिलवाया. गिल ने केजरीवाल से हौकी इंडिया में हुई अनियमितताओं की जांच की मांग भी की है.

मामले में भाजपा के सांसद और सीनियर वकील सुब्रह्मण्यम स्वामी और पूर्व भाजपाई व वकील राम जेठमलानी भी केजरीवाल के पक्ष में आ गए. कीर्ति आजाद का दावा है कि उन की लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं, डीडीसीए में व्याप्त भ्रष्टाचार से है.

क्रिकेट में भ्रष्टाचार का मामला नया नहीं है. आएदिन किसी न किसी राज्य क्रिकेट संघ में अनियमितताओं के होने का भंडाफोड़ होता आया है. अभी दिसंबर माह में राजस्थान क्रिकेट संघ में ललित मोदी की वापसी ने सब को चौंका दिया. कुछ माह पहले हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ के अध्यक्ष भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर पर करोड़ों रुपयों की गड़बडि़यों के आरोप सामने आए थे. कहा गया था कि अनुराग ठाकुर ने भाजपा के पिछले कार्यकाल के दौरान अपने पिता के नाम का फायदा उठाते हुए ग्रामीणों से खिलाडि़यों के लिए आलीशान होटल बनाने के लिए जमीन अधिगृहीत कर ली थी. कांग्रेस के पूर्व केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने आरोप लगाया था कि हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ को 16 एकड़ जमीन 1 रुपए महीने किराए पर 99 साल के लिए दी गई थी. इस से सरकार को 100 करोड़ का घाटा हुआ.

इस मामले में भी भाजपा नेता की कथित कंपनी को निर्माण का ठेका देने का आरोप है. कांग्रेस ने कहा था कि हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ अगर कोई कंपनी चलाना चाहता है तो उसे इस के लिए भूमि खरीदनी चाहिए.

कोर्ट का आदेश

कुछ दिन पहले जम्मूकश्मीर हाईकोर्ट ने राज्य क्रिकेट संघ के खिलाफ करोड़ों रुपए के क्रिकेट घोटाले की सीबीआई जांच किए जाने के आदेश दिए थे. घोटाले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री फारुक अब्दुल्ला समेत जम्मूकश्मीर क्रिकेट संघ के कई अधिकारी शामिल बताए गए.

2012 में सामने आए इस घोटाले के मद्देनजर, राज्य में क्रिकेट के विकास के लिए दी गई करोड़ों की राशि राज्य क्रिकेट संघ के अधिकारियों द्वारा अलगअलग खातों में स्थानांतरित कर दी गई थी. इस पर स्थानीय क्रिकेट खिलाडि़यों-अब्दुल माजिद डार और निसार अहमद खान द्वारा दायर जनहित याचिका पर न्यायालय ने यह आदेश दिया था.

पिछले दिनों केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे पर ललित मोदी की नाजायज मदद किए जाने के आरोप लगे थे. इन दोनों नेताओं पर मोदी की मदद के बदले लाभ लेने की बातें सामने आई थीं. मोदी ने गलत तरीके से विदेशी कंपनी के शेयर वसुंधरा के सांसद बेटे दुष्यंत सिंह की कंपनी में ट्रांसफर कराए थे तो सुषमा की बेटी को आईपीएल के वकील के पैनल में रखा गया था. सुषमा स्वराज के पति पहले से ही ललित मोदी के कानूनी मामले दिखते रहे हैं.

2009 में राज्यसभा में जेटली द्वारा दाखिल शपथपत्र के अनुसार, उन के पास मात्र 23 करोड़ रुपए संपत्ति थी. नियमित वकालत न करने के बावजूद जेटली 120 करोड़ रुपए की संपत्ति के मालिक बन गए. संपत्ति इजाफे के मामले में जेटली ने किसी कौर्पारेट कंपनी को भी पीछे छोड़ दिया. केवल 5 साल में इतना इजाफा आश्चर्यजनक है. कहा जाता है कि यह दौलत पटियाला में उन के प्रतिद्वंद्वी रहे महाराज अमरिंदर सिंह की संपत्ति से भी अधिक है.

जेटली पिछले करीब 3 दशकों से बिना कोई चुनाव जीते पार्टी में शीर्ष पर बने रहे हैं. पार्टी ने उन्हें चोर दरवाजे से संसद में भेजती रही. वे जनता के नेता भले न बन पाए हों, ताकतवर नेता और वकील होने के नाते कौर्पोरेट और कंपनियों की वकालत करते रहे हैं. कई बार उन्होंने काले कारनामे करने वालों को बचाने से परहेज नहीं किया.

आईपीएल की गड़बडि़यां जगजाहिर हैं. बीसीसीआई के कामकाज में बदलाव के लिए गठित लोढा कमेटी की रिपोर्ट में इस संस्था के भ्रष्टाचार और अनियमितताओं का खुलासा है और इसे दूर करने की सिफारिशें हैं.  

2013 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नेता और व्यापारी भारतीय खेलों को बरबाद कर रहे हैं. इन सब के बावजूद देश में क्रिकेट माफिया द्वारा सरकारी संसाधनों की लूट जारी है. हर राज्य क्रिकेट संघ में राजनीतिबाज काबिज हैं. ये अपनेअपने तरीके से क्रिकेट संघों को हांक रहे हैं. इन संघों को न सरकार का भय है, न कानूनकायदों का. क्रिकेट संघों पर लंबे समय से आरोप लगते आ रहे हैं पर इन की जांच करने वाला कोई नहीं है.

गुजरात में पहले नरेंद्र मोदी थे, फिर अमित शाह को गुजरात राज्य क्रिकेट संघ का प्रमुख बना दिया. राजस्थान में सी पी जोशी रहे, ललित मोदी वसुंधरा के करीबी माने जाते हैं. बिहार में लालू प्रसाद यादव रहे, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, महाराष्ट्र में शरद पवार, प्रफुल्ल पटेल, राजीव शुक्ला, दिगंबर कामथ जैसे दिग्गज क्रिकेट में चौधराहट से जुड़े रहे हैं. यही नेता खेल और खिलाडि़यों के खेवनहार बने रहे हैं, जिन को खेलों की कोई जानकारी नहीं है.

असल में क्रिकेट संघों में खूब माल है. राजनीतिबाजों ने खिलाडि़यों को दरकिनार कर दिया और राज्य क्रिकेट संघों पर खुद कुंडली मार कर बैठ गए. इन में हर पार्टी के लुटेरे हैं और लुटेरो का धर्म केवल लूट है. इन में गजब की एकता है. लूट का भांड़ा फूटने पर एकदूसरे को बचाना फर्ज समझने लगते हैं, इसीलिए एनसीपी के शरद पवार अरुण जेटली के पक्ष में बोल रहे हैं तो कांग्रेसी राजीव शुक्ला भी जेटली के पक्ष में हैं.

इधर, कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी मोदी की ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ वाली बात पर निशाना साधते हुए यह भूल जाते हैं कि 2013 में उन्हीं की सरकार ने डीडीसीए में मनी लौंड्रिंग और बोगस कंपनियों को गैर कानूनी पेमैंट जैसे आपराधिक मामलों के गंभीर अपराधों की जांच से संबंधित विभाग ने सामान्य पैनल्टी लगा कर रफादफा कर दिया था.

जेटली कहते हैं कि उन्होंने कोई लाभ नहीं लिया पर सवाल है कि फिर क्यों वे एक बड़े राजनीतिबाज होते हुए जिला क्रिकेट खेल संघ के 13 साल तक अध्यक्ष रहे? जेटली खुद इस मामले में पाक साफ हो सकते हैं पर डीडीसीए के 13 साल तक अध्यक्ष और बाद में संरक्षक बने रहने से क्या उन की जवाबदेही खत्म हो जाती है?

बिचौलियों का बोलबाला

क्रिकेट में मैच फिक्सिंग से ले कर सट्टेबाजी, नशाखोरी, बेईमानी, भ्रष्टाचार आम है. इस में कर्पोरेट, बौलीवुड, राजनीति और बिचौलिए मिल कर कराड़ों रुपए कमा रहे हैं. यह वह खेल है जिस में खिलाड़ी देश का सर्वोच्च पुरस्कार भारतरत्न तक दिया जाता है. इस बदनाम खेल के लिए पिछले दिनों सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान दिया गया था. क्रिकेट संघों में सुनियोजित, संगठित गिरोहों का भ्रष्टाचार है जो अपने बचाव के लिए कानून को वर्षों तक खेल के तौर पर खेलने में माहिर हैं. नेता और नौकरशाहों द्वारा मिल कर लाखोंकरोड़ों रुपए के वारेन्यारे किए जा रहे हैं. मोटे अनुमान के अनुसार, ऐसे घोटालों में 70 फीसदी तक रकम इन की जेब में चली जाती है. मुश्किल यह है कि भ्रष्टाचार खत्म करने के तमाम दावों के बाद भी मामले खुलते जा रहे हैं और राजनीतिक पार्टियों व सरकारों की नीयत भ्रष्टों पर कानूनी कार्यवाही करने की नहीं, उन्हें बचाने की दिखाई पड़ती है.

दुख की बात है कि जो नेता कानून बनाते हैं, किसी न किसी रूप में अमल भी उन्हीं के हाथों में होता है. भ्रष्ट नेता या नौकरशाह के खिलाफ कार्यवाही का आदेश सरकार ही देगी. ऐसे में ईमानदारी की उम्मीद कौन करे? कहा जाता है कि सीबीआई के पास करीब 1 हजार नौकरशाहों के भ्रष्टाचार की रिपोर्ट है पर उन के खिलाफ कभी कोई कार्यवाही नहीं हुई. ये लोग राजनीतिबाजों के घपलों में शामिल हैं, लिहाजा इन्हें बचाने का जिम्मा नेताओं का ही है, इसलिए कार्यवाही कौन करे. जाहिर है हमारा देश किसी विदेशी द्वारा नहीं, अपनों द्वारा ही लूटा जा रहा है. मजे की बात देखिए, अभियुक्तों के अधिकारों की रक्षा के नाम पर भुक्तभोगी जनता के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है.

बदलाव की मोदी ने जो उम्मीद जगाई थी वह अब धराशायी होती जा रही है. अच्छे दिनों की उम्मीद में भाजपा को कई मोरचों पर नाकामी के बाद भ्रष्टाचार पर आखिरी आस थी पर मोदी दिल्ली सचिवालय में सीबीआई द्वारा मारे गए छापे में निकले भूत को उतारने का मंत्र भूल गए हैं. उन की मुश्किल यह है कि अगर जेटली से इस्तीफा लें तो सरकार का नुकसान, न लेने पर बचीखुची साख जाने का खतरा. मामले में पार्टी के लिए मुसीबतें बढ़ सकती हैं. अगर प्रथमदृष्ट्या मामला जेटली के खिलाफ आया तो उन का कुरसी पर बने रहना तो मुश्किल होगा ही, सरकार और पार्टी को भी फजीहत झेलनी होगी.

कैटरीना कैफ की मुरीद हुई अनुष्का, बताया हॉट एंड फिट

हाल ही में प्रदर्शित ‘फितूर’ के एक गीत को देखने के बाद अभिनेत्री अनुष्का शर्मा अपनी सह-अभिनेत्री कैटरीना कैफ की फिटनेस की मुरीद हो गयी हैं. अभिषेक कपूर के निर्देशन में बनी फिल्म के दूसरे गीत ‘पश्मीना’ में कैटरीना सह-अभिनेता आदित्य राय कपूर के साथ डांस करती हुयी नजर आ रही हैं.

अनुष्का ने ट्वीट किया है कि फितूर के नए गीत में कैटरीना कितनी हॉट और फिट लग रही हैं. कैटरीना ने शानदार नृत्य किया. पश्मीना कल बेव पर जारी की गयी है. इस गीत का संगीत अमित त्रिवेदी ने दिया है और स्वानंद किरकिरे ने गीत के बोल लिखे हैं. यह फिल्म 12 फरवरी को सिनेमा घरों में प्रदर्शित हो रही है.

साहिर लुधियानवी पर होगी भंसाली की अगली फिल्म

अपनी पिछली फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ की जबर्दस्त सफलता के बाद निर्देशक संजय लीला भंसाली जाने माने कवि-गीतकार साहिर लुधियानवी पर आधारित अपनी अगली फिल्म पर काम शुरू करने की तैयारी में हैं.

‘गुस्ताखियां’ नाम से बन रही इस फिल्म का निर्माण उनके भंसाली प्रोडक्शन के बैनर तले होगा. भंसाली ने यहां एक बयान में कहा, ‘साहिर का गुरूर, उनकी नज्में और उनकी नजाकत ना केवल मुझे बल्कि पूरे फिल्म उद्योग को प्रभावित करती है. वह अपनी मां के साथ रहते थे. उनकी प्रेमकहानी अधूरी ही रही और जिस दर्द से वह गुजरे उसने उन्हें कुछ चमत्कारिक लिखने में मदद की.’

उन्होंने कहा, ‘मैं उनसे खास लगाव महसूस करता हूं, बाजीराव से लेकर अब तक की सभी फिल्मों में मेरे सारे मुख्य पात्र उनसे प्रभावित हैं और इनमें से कोई भी प्यार से महरूम नहीं है.’ फिल्मकार ने अभी फिल्म के सितारों और अन्य विवरण की घोषणा नहीं की है.

ये तीन भारतीय फिल्में हुईं ऑस्कर की दौड़ से बाहर

ऑस्कर पुरस्कारों के लिये बेस्ट विदेशी फिल्म की श्रेणी में स्थान पाने में असफल रही  फिल्म 'कोर्ट' के बाद तीन और भारतीय फिल्में इस होड़ से बाहर हो गई.

ऑस्कर के लिए घोषित नामांकित सूची में  'जलम ', 'रंगीतरंगा ' और 'नचोमिया कुम्पसर' अपना स्थान बना पाने में असफल रही. इससे पहले पिछले महीने मराठी फिल्म 'कोर्ट ' ऑस्कर की होड़ से बाहर हो गई थी.

भारत को 'कोर्ट ' के लिए काफी आशाएं थी, लेकिन इसे सफलता नहीं मिलने के बावजूद बेस्ट ओरिजनल सांग और बेस्ट ओरिजनल स्कोर जैसी श्रेणियों में 'जलम' , 'रंगीतरंगा' और ' नचोमिया कुम्पसर' जैसी फिल्मों से उम्मीदें बंधी थी लेकिन ये भी इस दौड़ से बाहर हो गई.

88वें एकेडमी अवार्ड के लिये नामांकित सूची की घोषणा एकेडमी प्रेसीडेंट चेर्ली बून इसाक्स, अभिनेता जॉन क्रांसिस्की और फिल्म निर्माताओं गिलेरमो टोरो और आंग ली ने की. भारत की ओर से मलयालम फिल्म 'जलम' और ' रंगीतरंगा' बेस्ट ओरिजनल सांग तथा कोंकणी फिल्म 'नचोमिया कुम्पसर' बेस्ट ओरिजनल स्कोर की प्रतिस्पर्धा में थी , लेकिन ये फिल्में घोषित सूची में अपना स्थान नहीं बना पाईं.

88वें ऑस्कर समारोह अगले महीने 28 फरवरी को अमेरिका में डॉल्बी थियेटर में होगा. ऑस्कर फिल्मों के इतिहास में बेस्ट फिल्म के तीन भारतीय फिल्में महबूब खान की 'मदर इंडिया', मीरा नायर की 'सलाम बॉम्बे' और आशुतोष गोवारीकर की 'लगान: वंस अपना एक टाइम इन इंडिया ' ऑस्कर पुरस्कार की रेस में रही लेकिन जीत के लक्ष्य तक पहुंचने में कामनाब न हो सकी.

 

कंगना ने खोले कई राज, कई बार हुआ शारीरिक शोषण

बॉलीवुड की 'क्वीन' बनने के लिए कंगना रनौत को बहुत महंगी कीमत चुकानी पड़ी है. उनका कई बार शारीरिक शोषण हुआ. उन्हें तरह तरह की यातनाएं दी गयी. एक बात तो उनके सिर पर इतनी जोर से वार किया गया कि उनके सिर से खून निकलने लगा.

कंगना रानौत ने बॉलीवुड में आने से पहले के दिनों को याद करते हुए पत्रकार बरखा दत्त की किताब 'द यूनीक लैंड' के लांच पर कई चौकाने वाले खुलासे किये. उन्होंने खुलासा किया कि कैसे वह बहुत कम उम्र में कुछ करने का सपना लेकर मुंबई आयी थी लेकिन एक वक्त आया जब उन्हें लगा कि वो फंस गयी है.  

कंगना ने उस शख्स के नाम का खुलासा नहीं किया लेकिन उन्होंने बताया कि एक वक्त ऐसा आया था जब उन्हें लगने लगा था कि उन्हें इस दलदल से कोई नहीं निकाल पायेगा. कंगना ने बताया कि वह शुरुआती दिनों में उनके मेंटर की तरह था लेकिन धीरे-धीरे उसने मेरा शारीरिक शोषण करना यातनाएं देना शुरू कर दिया. वह पल मेरे लिए काफी मुश्किल भरा था. मैं ज्यादा गहराई में नहीं जाना चाहती लेकिन जिंदगी का वह पल मेरे लिए सबसे ज्यादा तकलीफ देने वाला था.

 पत्रकार बरखा दत्त ने जब उस शख्स के बारे में पूछा तो कंगना ने उसका नाम नहीं लिया उन्होंने कहा कि उस वक्त मेरी उम्र 17 साल की थी और वो मेरे पिता की उम्र का था. वह दिखावा करता था कि मैं इसका गॉडफादर हूं 

अपने ही ‘सरबजीत’ को नहीं पहचान सके उमंग कुमार

रणदीप हुडा बौलीवुड के उन चंद कलाकारों में से हैं, जो कि अपनी फिल्म की विषयवस्तु व अपने किरदार को लेकर स्वयं काफी होमवर्क करते हैं. किरदार के लुक आदि पर भी काम करते हैं. इन दिनों वह राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म निर्देशक उमंग कुमार के संग पाकिस्तानी जेल में बंद रहे सरबजीत पर बन रही फिल्म ‘‘सरबजीत’’ में सरबजीत का किरदार निभा रहे हैं, जिसकी शूटिंग शुरू हो चुकी हैं.

सूत्रों के अनुसार रणदीप हुडा ने पाकिस्तानी जेल में बंद सरबजीत के लुक में खुद को तैयार करके पैदल ही सेट पर पहुंचे, तो पहले गेट पर वाचमैन ने उन्हे नहीं पहचाना. किसी तरह से वह उसे समझाकर सेट पर पहुंचे और एक कोने में कुर्सी लेकर बैठ गए. फिल्म के निर्देशक उमंग कुमार ने उन्हे देखा पर यह पहचान नहीं पाए कि यह रणदीप हुडा ही है.

उमंग कुमार कुछ देर तक रणदीप हुडा का इंतजार करते रहे, फिर गुस्से में बड़बड़ाने लगे कि आज कल कलाकार भी सेट पर समय से नहीं पहुंचते हैं. धीरे धीर सभी कलाकार अनप्रोफेशनल होते जा रहे हैं. तब रणदीप ने भी चिल्लाकर एक कैदी की ही तरह जवाब दिया कि, ‘‘मैं कब से शूटिंग शुरू होने का इंतजार कर रहा हूं. पर आप ही आराम कर रहे हैं. तो मैं क्या करुं’’

रणदीप की आवाज सुनकर उमंग कुमार ने उन्हे पहचाना और उन्हे सरबजीत के लुक में देखकर हैरान रह गए. इसका जिक्र जब उमंग कुमार से चला तो उमंग कुमार ने इस बात को स्वीकार करते हुए कहा- ‘‘सच तो यही है कि मैने भी उन्हे सरबजीत के लुक में नहीं पहचाना था. एक कलाकार के तौर पर यह उनका अपने काम व अपनी कला के प्रति समर्पण व त्याग की मिसाल ही है. वह मैथिड एक्टिंग के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इस किरदार के लिए वह उससे भी कई कदम आगे बढ़ गए.

यूं तो रणदीप बहुत बेहतरीन कलाकार हैं, मगर सरबजीत का किरदार उनके करियर का सर्वाधिक कठिन और चुनौतीपूर्ण किरदार है. उस दिन सेट पर जब मैने उन्हे नहीं पहचाना, तो मैं इस बात से संतुष्ट हो गया कि वह पूरी फिल्म में सरबजीत के किरदार के साथ भरपूर न्याय कर सकते हैं.’’

ज्ञात है कि फिल्म निर्माता संदीप सिंह, उमंग कुमार और वासु भगनानी तथा निर्देशक उमंग कुमार अपनी फिल्म ‘‘सरबजीत’’ का वर्ल्ड प्रीमियर 20 मई 2016 को ‘‘कान अंतरराष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल’’ में करने की मंशा के साथ इस फिल्म को पूरा करने में जुटे हुए हैं.

 

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