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शादियों में शान के नाम पर फुजूलखर्ची

कभी शादियां बहुत बड़ा सामाजिक उत्सव होती थीं. ऐसा उत्सव जिस में भारी संख्या में लोग शामिल होते थे. बरातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं होती थी. लड़के वाले 300 बरातियों की बात कर के 600-700 बराती ले कर लड़की वालों के दरवाजे पर धूमधड़ाके के साथ पहुंचते थे. लेकिन भारी संख्या में बराती देख लड़की वाले घबराते नहीं थे. उन्होंने ऐसी किसी स्थिति से निबटने के लिए पहले से ही पूरी तैयारी कर रखी होती थी. उन दिनों कैटरिंग सिस्टम नहीं था. बरात के लिए खाना तैयार करने हेतु हलवाई बिठाए जाते थे जो अपने काम में बेहद माहिर होते थे. एक तरह से बरात को निबटाने की सारी जिम्मेदारी हलवाइयों की होती थी.

शादीब्याह के मामलों में हलवाइयों के पास गहरा अनुभव होता था. अगर उन को 300 लोगों का खाना तैयार करने के लिए बोला जाए तो सूझबूझ और समझदारी से काम लेते हुए वे 600 से ज्यादा लोगों के खाने का इंतजाम रखते थे. ज्यादा मेहमानों की वजह से लड़की वालों के शादीब्याह का बजट गड़बड़ाता नहीं था. सस्ता जमाना था. शादीब्याह के आयोजन महंगे होटलों, रिसोर्टों और फार्महाउसों में नहीं, धर्मशालाओं, शादीघरों (मैरिज होम) और किसी खुली जगह पर लगाए गए शामियानों में होते थे. बरातियों की आवभगत लड़की के रिश्तेदार और पड़ोसी किया करते थे, वेटर नहीं. शादीब्याह में सपरिवार शामिल होने का भी रिवाज था. नजदीकी रिश्तेदार ही नहीं, दोस्त और महल्ले के लोग भी बिना किसी हिचक के पूरे परिवार के साथ शादीब्याह के जश्न में शिरकत करते थे. बहुत दूर के रिश्तेदारों को भी शादीब्याह का निमंत्रणपत्र भेजा जाता था, बेटी की ननद की ससुराल वालों तक को भी.

कैटरिंग सिस्टम का चलन

लेकिन अब वैसा कुछ भी नहीं रहा. महंगी शादियों और खाने के कैटरिंग सिस्टम ने सारे पुराने समीकरण बदल डाले हैं. शादियां आज भी एक सामाजिक उत्सव हैं, किंतु पहले की अपेक्षा बहुत खर्चीली व महंगी हो गई हैं. अब 300 लोगों के खाने का इंतजाम कर के 600 लोगों को निबटाने वाली बात नहीं रही. किसी के पास समय नहीं, इसलिए सभी किस्म के झंझटों से छुटकारा पाने के लिए शादीब्याह के मौके पर हर कोई अपनी हैसियत व बजट के अनुसार खानेखिलाने के मामले में कैटरिंग सिस्टम को ही तरजीह देता है.

अब शादीब्याह में किसी मेहमान को बुलाना पहले के मुकाबले में कहीं महंगा हो गया है. अब खानेपीने का हिसाब किसी मेहमान के खाने से नहीं, उस के हाथ में पकड़ी हुई प्लेट से होता है.

कैटरिंग सिस्टम में टेबल पर सजी खाली प्लेटों की कीमत जगह और व्यंजनों की गिनती के हिसाब से अलगअलग हो सकती है. देश के महानगरों की बात हम छोड़ भी दें तो किसी शहर के छोटे होटल या रिसोर्ट में खाने की एक प्लेट की कीमत 500 रुपए से ले कर 800 रुपए से कम नहीं. अगर किसी अच्छे रिसोर्ट और सितारा होटलों की बात करें तो खाने की एक प्लेट की कीमत 1500 रुपए से ले कर 3 हजार रुपए तक हो सकती है.

इस बात के कोई माने नहीं कि आप कितना खाते हैं? एक निवाला खाएं या 50 कोई फर्क नहीं पड़ता. आप टेबल से प्लेट को उठा कर सिर्फ जूठा ही कर दें, तब भी उस की कीमत उतनी ही रहेगी. मतलब, किसी मेहमान के खाने की प्लेट को जूठा कर देने मात्र से ही मेजबान को एक मोटी रकम की चपत लग जाएगी.

बदलते सामाजिक समीकरण

महंगी शादियों और खाने के लिए कैटरिंग सिस्टम ने किसी हद तक सामाजिक समीकरणों को भी बदल डाला है. शादीब्याह के लिए निमंत्रण भेजना अब अच्छीखासी दिमागी कसरत वाला काम हो गया है. अब के हालात में हर ऐरेगैरे और गैरजरूरी लोगों को शादीब्याह में शामिल होने का न्योता देना तर्कसंगत नहीं रह गया है. यह तो ऐसा ही होगा जैसे आ बैल मुझे मार. बहुत दूर के रिश्तेदारों को निमंत्रण दे कर अपना शादीब्याह का बजट खराब करना भी अक्लमंदी नहीं. नजदीक के रिश्तेदारों में से भी किस को बुलाना है, किस को नहीं, यह भी देखना होगा. कई रिश्तेदारियां नजदीक की होते हुए भी किसी काम की नहीं होतीं. जो नजदीक का रिश्तेदार कभी आप के दुखसुख में शामिल नहीं हुआ उस को न्योता देने का कोई तुक नहीं. ऐसे मतलबी दोस्तों को भी कभी निमंत्रण मत दें जो आप के बुरे वक्त में तो आप से कतराते हैं मगर जब मुफ्त की दावत उड़ाने का मौका आए तो आप से प्यारमोहब्बत और नजदीकियां दिखलाने लगते हैं. ऐसे स्वार्थी दोस्त स्वभाव से घाघ व्यापारी होते हैं. महंगी और शानोशौकत भरी शादी के समारोह में शामिल होना उन के लिए घाटे का सौदा नहीं होता. 100-200 रुपए का शगुन डाल कर अपने पूरे परिवार के साथ किसी महंगे होटल में बढि़या खाना खाने में उन को अपना मुनाफा ही दिखता है.

खाने की महंगी प्लेट का यह मतलब भी नहीं कि हम अपने उन दोस्तों और रिश्तेदारों को नजरअंदाज करें जो हमारे शुभचिंतक हैं, हम से प्यार करते व हमदर्दी रखते हैं, किंतु आर्थिक दृष्टि से कमजोर हैं और मोटा शगुन नहीं दे सकते. ऐसे लोगों को प्लेट की कीमत के पलड़े में रख कर तौलना सही नहीं है. हालांकि समाज में ऐसा ही हो रहा है. गरीब रिश्तेदारों और गरीब दोस्तों को महंगी शादियों में शरीक करने के मामले में कुछ लोग भूलने का बहाना बना देते हैं, जो किसी भी दृष्टि से ठीक नहीं. शादी जैसे उत्सव सिर्फ खास और संपन्न लोगों की महफिल बन कर ही नहीं रह जाने चाहिए.

आप के पत्र

 

 

 

 

 

 आप की संपादकीय टिप्पणी ‘फ्रांस पर हमला’ पढ़ कर साफ हो गया है कि समूची दुनिया में इसलामिक स्टेट आतंकवाद के खौफ से धार्मिक राज स्थापित करना चाहते हैं.

जरूरत है कि आज विश्व के सभी देश एकजुट हों. अमेरिका ने आतंकवाद को ध्वस्त करने की पहल कर दी है, ऐसे में सभी देशों को अमेरिका का साथ देना चाहिए.

डा. जसवंत सिंह जनमेजय (दिल्ली)

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‘बिहार चुनाव नतीजे के माने’ शीर्षक से प्रकाशित संपादकीय में अच्छी चीरफाड़ है. भाजपा के आम चुनाव जीतने के बाद हर्ष के अतिरेक में कई राज खोलने वाले आलेख पढ़ने को मिले. तय हुआ था कि बिना कांग्रेस को डुबोए सत्ता पाना कठिन है. यह भी कि इस बार यदि सत्ता नहीं मिली तो लोग ब्राह्मणों को भूल जाएंगे. लिहाजा, आम चुनाव में साम, दाम, दंड व भेद नीति अपनाई गई.

उन दिनों रोज 3-3 अखबार पढ़ते रहने पर पता चलता रहा कि अखबार कांग्रेस सहित अन्य पार्टियों की बुराई तथा भ्रष्टाचार बिना सुबूत के छाप रहे हैं पर भाजपा के भ्रष्टाचार पर चुप हैं. आज भी अखबार यही कर रहे हैं.

भारत पर विदेशी डेढ़ हजार साल तक क्यों राज करते रहे, इस पर सभी कन्नी काट रहे हैं. लंबी गुलामी के दौरान भारत की बुद्धि व बहादुरी को दुनिया ने देखा. अचरज नहीं कि बिहार का नतीजा अगले चुनावों का डीएनए साबित हो.

माताचरण पासी, देहरादून (उ.खं.)

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आप के संपादकीय ‘बिहार चुनाव नतीजे के माने’ और ‘भाजपा में विद्रोह’ में आप का यह निष्कर्ष कि नरेंद्र मोदी ‘भगवाई तालिबानियों पर रोक लगाएंगे, सब को साथ ले कर चलेंगे,’ यह मूलमंत्र उन को दबदबे के साथ वर्षों तक सत्ता में स्थापित किए रहेगा.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित तमाम हिंदूवादी संगठन यदि सत्ता चलाने की नीति बघारने लगेंगे तो सरकार की कमजोरी मानी जाएगी. बिहार चुनाव के लिए प्रधानमंत्री का विकास एजेंडा सही रास्ते पर चल रहा था कि संघ प्रमुख ने आरक्षण पर गलत बयान दे कर चुनाव की विजय का रुख महागठबंधन की ओर मोड़ दिया. आरक्षण पर मोदी की कोई सफाई काम नहीं आई.

2014 में जनता का भरोसा जीत कर मोदी पूर्ण बहुमत के साथ प्रधानमंत्री बने. उन की पार्टी में जो लोग प्रधानमंत्री भगवा मंत्री बनने का सपना पाले रहे वे पिछड़ गए, उन के मन में टीस बनी रही. बिहार चुनाव में वही महानुभाव पार्टी के भीतर रहते हुए पार्टी को चुनाव हराने वाले बोल बोलते रहे.

भारतीय राजनीति में विकास के साथसाथ क्षेत्रवाद और जातिवाद का वर्चस्व हमेशा रहेगा. उत्तर प्रदेश और बिहार में जातिवाद अव्वल रहता है. कोई भी चुनावी राजनीति बनाते समय सामाजिक न्याय का ध्यान रखने वाले ही सफलता का दावा कर सकते हैं. भाजपा ने जब मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया तब जा कर देश की जनता ने उन के अतीत को देख कर उन पर भरोसा जताया कि वे देश को भ्रष्टाचार मुक्त कर अपने नारे के अनुसार अच्छे दिन लाएंगे.

उन के कार्य से जब देश का आम आदमी अच्छा महसूस करेगा तब जा कर उन को मजबूती मिलेगी.

आप ने सही कहा है कि आम आदमी को सस्ता खाना, सस्ती दवाएं, अमनचैन मिलना ही उसे अच्छे दिन का एहसास कराएगा. अब चुनाव प्रचार में शालीनता न बरतने वालों की जीत मुश्किल ही होगी. बिहार चुनाव में महागठबंधन जीता नहीं है, बल्कि राजग गठबंधन हारा है. प्रदेश चलाने वाले नेता का नाम चुनाव पूर्व घोषित करने से मतदाताओं को मत देने में आसानी होती है, यह बिहार में भी सही साबित हुआ है.

जयप्रकाश भारती, गाजीपुर (उ.प्र.)

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संपादकीय के अंतर्गत ‘बिहार चुनावी नतीजे के माने’ और ‘भाजपा में विद्रोह’ द्वारा भाजपा को दिए गए सलाहबतौर आप के विचार अच्छे लगे. देखना यह है कि वह बिहार और दिल्ली की हार से कितना सीखती है और अपनेआप को बदल पाती है कि नहीं. सच तो यह है कि आईने में अपनेआप को हम सुंदर ही दिखाई देते हैं, अपनी कमियां तो उसी को दिखाई देती हैं जो देखना चाहे. दिल्ली की हार के बाद कुछ सबक न लेने से बिहार में भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. अब तो एक के बाद एक प्रदेशों के चुनाव हैं, और यदि हाल यही रहा तो 2019 में लोकसभा चुनाव में इस की हार निश्चित है.

गुजरात के म्यूनिसिपल और पंचायत चुनावों के नतीजे घोषित हुए. शहरों में बीजेपी और गांवों में कांग्रेस जीती. मुझे टीवी देख कर हैरानी यह थी कि गांवों में बुरी तरह हारने के बाद भी भाजपा खेमे में खुशियां मनाई जा रही हैं, एकदूसरे को मिठाइयां खिलाई जा रही हैं. बेशर्मी की भी हद होती है कि जैसे गांवों से भाजपा का कोई वास्ता ही न हो.

अब यह तो साफ हो गया है कि राजनीति में सब एक से ही हैं, अधिक फर्क नहीं है. जनता के पास कोई विकल्प नहीं है सिवा इस के कि वह घूमफिर कर वापस उन्हीं को ले आए जिन पर से उस का भरोसा उठ चुका था.

कांग्रेस की छवि तो 2014 में खराब हुई, भाजपा की अब हो रही है. केजरीवाल में भी अब वह बात नहीं रही. जल्द ही आने वाले दिनों में लालू के हाथों नीतीश की छवि खत्म होने वाली है.

ओ डी सिंह, बड़ौदा (गुज.)

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 दिसंबर (प्रथम) अंक में ‘बिहार चुनाव नतीजा : काम न आई भाजपा की विकास कल्पना’ लेख पढ़ा. इस बार लगभग सभी दलों ने अनर्गल और अपशब्दों से भरे बयानों से पुराने रिकौर्ड तोड़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी. न जाने कितनी एफआईआर लिखी गईं, जिन का भविष्य अब गर्त में है.

भाजपा की गलती यह रही कि वह दिल्ली की तरह बिहार में भी क्षेत्रीय कम और राष्ट्रीय चुनाव की तरह ज्यादा मुद्दे उछालती रही, जबकि स्थानीय मुद्दों को स्थानीय नेता ही अच्छी तरह पकड़ और सुलझा सकते हैं. राष्ट्रीय नेतृत्व राह तो दिखा सकता है मगर मतदाताओं की नब्ज तो स्थानीय मुद्दों के साथ क्षेत्रीय नेता ही पकड़ सकते हैं जोकि बिहार में सफलतापूर्वक हुआ.

मुकेश जैन पारसबंगाली मार्केट (न.दि.)

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दिसंबर (प्रथम) में प्रकाशित आलेख ‘आतंक का पर्याय बनते शिक्षक’ पढ़ा. पढ़ कर शरीर सिहर गया. धरती की जिन हस्तियों पर नई पीढ़ी के निर्माण का दायित्व है उन का ऐसा नैतिक पतन समाज को किस ओर ले जाएगा, यह कल्पना करते ही समाज की एक भयावह तसवीर सामने आ जाती है. अब यह विचारणीय प्रश्न है कि शिक्षा के क्षेत्र में आई गिरावट का कारण क्या है? मेरे विचार से शिक्षा के विकास के चारों स्तंभ (शिक्षक, छात्र, अभिभावक एवं वातावरण) इस के जिम्मेदार हैं.

सर्वप्रथम शिक्षक की बात करें तो पूरे देश में शिक्षकों की भारी कमी को दूर करने के लिए राज्य सरकारों ने शिक्षामित्र, पराशिक्षक आदि पदों पर भारी मात्रा में शिक्षकों की नियुक्ति की. ऐसे शिक्षकों को दैनिक मजदूरों की तरह मजदूरी (मानदेय) दिया जा रहा है. उन्हें भविष्यनिधि, पैंशन, ग्रेच्युटी आदि की सुविधा नहीं है. नतीजतन, इन पदों पर अयोग्य व्यक्ति नियोजित हो गए हैं. सोचने की बात यह है कि जब इन शिक्षकों का अपना भविष्य सुरक्षित नहीं है तो वे बच्चों का भविष्य कैसे बनाएंगे. साथ ही, शिक्षकों को मध्याह्न भोजन, छात्रवृत्ति, जनगणना आदि अनेक गैरशैक्षणिक कार्य भी करने होते हैं. मानदेय कम और कार्यों का बेशुमार बोझ. स्वाभाविक है व्यक्ति तनाव में रहेगा ही और अवसाद के कारण उस से गलत कार्यों की भी आशा तो रहेगी ही.

शिक्षकों की स्थिति के सुधार हेतु समुचित वेतन, भविष्यनिधि, ग्रेच्युटी आदि की सुविधा लागू होनी चाहिए. उन्हें गैरशैक्षणिक कार्यों से पूरी तरह मुक्त कर देना चाहिए. उन के प्रशिक्षण में बाल मनोविज्ञान का व्यापक समावेश होना चाहिए एवं समयसमय पर उन का प्रशिक्षण होते रहना चाहिए. नियुक्ति प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए. इलाहाबाद हाईकोर्ट के निर्णय के अनुसार सभी सरकारी कर्मियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने की बाध्यता से भी शिक्षा में क्रांतिकारी परिवर्तन हो सकता है.

अभिभावकों की बात करें तो उन में भी धैर्य की कमी आ गई है. शिक्षकों की छोटीमोटी भूल पर भी उन की पिटाई और हत्या आम बात हो गई है. सरकारी योजनाओं का अनुचित लाभ लेने के लिए वे शिक्षकों पर गलत दबाव बनाते हैं. उन्हें भी अपनी लालची प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी.

छात्रों में धैर्य की कमी आ गई है और उन्हें क्रोध भी अधिक आने लगा है. तकनीकी विकास के कारण

आज ज्ञान का विस्फोट हो गया है और छात्र डिगरी के लिए शौर्टकट तरीके अपनाने से भी संकोच नहीं करते. छात्र शिक्षकों को मानसम्मान देना भूल गए हैं. उच्च वर्ग के छात्र शिक्षा लेते समय अपने स्टेटस व रुतबे का गरूर दिखाते हैं.

छात्रों का उद्देश्य मात्र डिगरी हासिल करना रह गया है. सरकारी योजनाओं के लाभ के लिए प्रदर्शन

एवं अनशन से भी वे बाज नहीं आते. अधिकांश छात्र ट्यूशन/कोचिंग को स्टेटस सिंबल मानते हैं और विद्यालय में केवल उपस्थिति बनाना पर्याप्त समझते हैं. छात्रों को अपनी इन प्रवृत्तियों में सुधार लाना होगा.

वातावरण की बात करें तो पाठ्यक्रम में प्रारंभ से ही नैतिक शिक्षा का समावेश, आधुनिक परीक्षा प्रणाली, व्यावसायिक पाठ्यक्रमों को प्राथमिकता, परीक्षा को पूरी तरह भारमुक्त बनाना आदि शामिल है.

मेरा यह विचार है कि यदि उक्त चारों स्तंभों में जागृति आ जाए तो शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हो सकती है.

रवीश कुमार रवि, खगडि़या (बिहार) द्य

 

पेरिस सम्मेलन के मकसद को नकारा नहीं जा सकता. लेकिन क्या सम्मेलन के फैसलों से पृथ्वी बच सकेगी? इस पर शंका है. अंतर्राष्ट्रीय समझौते निश्चित रूप से माने जाएंगे, लेकिन एक सीमा तक ही, जबकि धरती के हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि तत्कालीन अथवा दीर्घकालीन कदम भी हमें अपनीअपनी करनी से मुक्त नहीं कर पाएंगे. कारण यह है कि आज सुविधाग्रस्त समाज की आवश्यकताएं थमने वाली नहीं हैं.

दुनिया का हर देश और व्यक्ति अपने लिए सुविधाओं को जुटाने के लिए जिस तरह जुटा है, उस का हल हम शायद ही खोज पाएं. विकास की जो परिभाषा हम ने गढ़ी है, उस से कैसे समझौता हो सकता है.

जब एक तरफ एक समाज और देश के पास सबकुछ हो और दूसरा वंचित हो और बिगड़ते पर्यावरण को वही भुगते तो सबकुछ चरमरा जाना तय है. जलवायु परिवर्तन किसान, किसानी और गांव को कहीं अधिक प्रभावित करता है. सभी देशों को पहले आत्ममंथन करना चाहिए कि क्या उन के यहां हालात ठीकठाक हैं?

कहावत भी है कि पहले घर सुधरे और तब दुनिया. कम से कम यह पर्यावरण के मामले में अधिक महत्त्व रखती है. पेरिस या यूरोप का पर्यावरण कितना भी बेहतर हो लेकिन वह हमारे किस काम का? अपने देश के लोग तो बाढ़, सूखे और धुंध में ही फंसे हैं. हमारे लिए घर की बहस अधिक महत्त्वपूर्ण है, न कि पेरिस के फैसले?

कहीं पर्यावरण नियंत्रण की आखिरी जिम्मेदारी उन्हीं लोगों के गले न आ पड़े जो आज भी कई मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित हैं.

– शैलेंद्र कुमार चतुर्वेदी, फिरोजाबाद (उ.प्र.)

पाठकों की समस्याएं

मैं एक विद्यार्थी हूं और अंगरेजी विषय से एमए कर रहा हूं. मेरे साथ अकसर अजीब सी घटना होती है. किसी भी विषय पर बात करतेकरते अचानक मैं कोई सटीक शब्द या वाक्य भूल जाता हूं जिस के कारण मैं अपने विचारों को सही से प्रकट नहीं कर पाता हूं और मुझे अपनी काबिलीयत पर अफसोस होता है. जब तक मुझे वह सटीक शब्द या वाक्य सूझता है तब तक देर हो जाती है. क्या यह कोई कमी है और अगर है तो इसे कैसे दूर किया जा सकता है? कृपया मार्गदर्शन करें.

यह कोई कमी नहीं है इसलिए अपनी काबिलीयत पर अफसोस न करें. ऐसा कई बार होता है जब लोगों को शब्दावली का अच्छा ज्ञान भी होता है लेकिन उन्हें सही समय पर सही शब्द नहीं सूझता और वे उस समय ‘उसे क्या कहते हैं’ और ‘वो’ ‘वो’ कह कर अपने विचारों को प्रकट करते हैं. आप की इस समस्या का समाधान यही होगा कि आप तनावग्रस्त हुए बिना आत्मविश्वास के साथ अधिक से अधिक अपने विचारों को प्रकट करें. जो भी बोलें, धीरेधीरे बोलें. आप अपने विचारों को जितना अधिक प्रकट करने की प्रैक्टिस करेंगे, आप की यह समस्या उतनी जल्दी दूर होगी. लोगों से बात करते समय नर्वस न हों. क्योंकि नर्वसनैस से याददाश्त और विषय दोनों पर पकड़ कमजोर होती है. आप चाहें तो अकेले में अलगअलग विषयों पर अपने विचार प्रकट करें, साथ ही आप पहले लिख कर और फिर बोल कर ऐसा करने की प्रैक्टिस कर सकते हैं. इस से आप की समस्या में सुधार अवश्य होगा. अगर इस से भी बात न बने तो आप किसी स्पीकिंग स्किल्स स्पैशलिस्ट से भी संपर्क कर सकते हैं.

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मैं 23 वर्षीया लड़की हूं. एक लड़के को 5 साल से प्यार करती हूं. वह लड़का भी मुझ से प्यार करता है. पर कुछ दिनों से पता नहीं क्यों मुझे उस की हर बात पर गुस्सा आता है या शक होता है और बात करतेकरते हमारा झगड़ा हो जाता है. वह मुझे समझाने की, मेरे शक को दूर करने की कोशिश भी करता है पर मैं न तो उस विषय पर उस से बात करना चाहती हूं और न ही उस की बात को समझती हूं. मैं उस से बहुत प्यार करती हूं और उसे खोना भी नहीं चाहती. फिर भी न जानें उस के साथ ऐसा व्यवहार क्यों करती हूं. मैं अपने इस व्यवहार को कैसे बदलूं? सलाह दें.

जब हम किसी रिश्ते में लंबे समय से रह रहे होते हैं तो हम उस रिश्ते का महत्त्व खोने लगते हैं. चूंकि आप पिछले 5 सालों से एकदूसरे को जानते हैं इसलिए एकदूसरे के बारे में सबकुछ जान चुके हैं, आप के बीच कोई नयापन या फौर्मेलिटी नहीं बची है इसलिए आप ने अपने बौयफ्रैंड को महत्त्व देना छोड़ दिया है और यही वजह है कि आप को उस की हर बात गलत लगती है और उस के क्रियाकलापों पर आप को शक होता है. अगर आप अपने बौयफ्रैंड को खोना नहीं चाहतीं तो अपना व्यवहार बदलें और बातबात पर गुस्सा करना व शक करना बंद कर दें. वरना, अभी तो वह आप को समझा रहा है, हो सकता है वह आप से दूरी ही बना ले. आप सोचें कि उस की किन अच्छी बातों, गुणों को देख कर उस से प्यार किया था. उस की खासीयतों को महत्त्व दें न कि कमियों को.

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मैं 19 वर्षीया युवती हूं व 1 पैर से अपाहिज हूं. मैं गांव के एक लड़के को चाहती हूं. लड़का गरीब है व उस की 8 बीघा जमीन है. लड़का पूरी तरह से स्वस्थ है. हम दोनों विवाह करना चाहते हैं. मैं अभी बीकौम कर रही हूं. उस के घर के सभी लोग मुझे पसंद करते हैं लेकिन मेरे परिवार में मेरे पिताजी को छोड़ कर सभी इस विवाह के लिए राजी हैं. पिताजी चाहते हैं कि मेरा विवाह किसी आर्थिक रूप से संपन्न घर में हो. मैं पिताजी को विवाह के लिए कैसे राजी करूं?

पिताजी से जानें कि उस लड़के से विवाह न करने का कारण सिर्फ उस का गरीब या अधिक संपन्न न होना ही है या कुछ और भी है. अगर संपन्नता को आप के पिता आप के सुखी होने की गारंटी मानते हैं तो उन्हें समझाएं कि वे गलत हैं. हो सकता है वे संपन्न परिवार में किसी तरह आप का विवाह करा भी दें लेकिन इस बात की क्या गारंटी है कि आप का होने वाला पति व उस का परिवार आप को आप की शारीरिक कमी के साथ स्वीकारेगा. अपने पिता को समझाएं कि लड़के के परिवार वाले आप के बारे में सबकुछ जानते हैं और आप को सहर्ष स्वीकार कर रहे हैं, इसलिए वे इस रिश्ते के लिए हां कर दें. हां, आप अपनी पढ़ाई अवश्य पूरी करें और आर्थिक रूप से स्वयं को आत्मनिर्भर अवश्य बनाएं.

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मैं 32 वर्षीया विवाहिता हूं. 9 महीने पूर्व नौर्मल डिलीवरी से मेरा बेटा हुआ है. समस्या यह है कि मुझे सैक्स की इच्छा नहीं होती. मेरे पति चाहते हैं कि मैं उन्हें सहयोग करूं लेकिन मैं उन को सहयोग नहीं कर पाती. इस से हमारे आपसी संबंधों पर असर पड़ रहा है. मैं क्या करूं? उपाय बताइए.

प्रसव के पश्चात हर स्त्री की सैक्स इच्छा के सामान्य होने का समय अलगअलग होता है. किसी को 2 माह के बाद ही नौर्मल सैक्स इच्छा होती है तो किसी को आप की तरह समय लग जाता है. यह इस बात पर भी काफी निर्भर करता है कि आप वर्किंग हैं या नौनवर्किंग. साथ ही, बच्चे की देखभाल में कोई आप की मदद करने वाला है या सबकुछ आप अकेले ही मैनेज करती हैं. आप पति से अपनी समस्या शेयर करें. जब आप शारीरिक और मानसिक रूप से रिलैक्स होंगी, आप की रुचि सैक्स के लिए खुद ब खुद जागेगी. आप चाहें तो इस बारे में अपनी गाइनोकोलौजिस्ट से भी सलाह ले सकती हैं.

मेरी गौरैया

सर्द भरे मौसम में

मेरी खिड़की पर

बैठती थी एक गौरैया

मुझे अकसर अपनी

चीं-चीं-चीं से

रोज आगमन की सूचना देती थी

मैं भी मुसकरा कर

उस के आगमन पर

अपनी खुशी व्यक्त कर देता था

उस का रोज शाम को आना

खिड़की पर रात गुजारना

और भोर में उड़ जाना

यहीं! हम दोनों का, साथ था

यह क्रम रोज ही रहा

पूरी सर्दियों में

एक दिन वह शाम से

देर रात तक नहीं आई

मैं बेचैन हो गया

बारबार खिड़की की तरफ

निहारता रहा

पर वह न रात में

न दिन में लौटी

तीसरे दिन शाम को

वह लौटी, खिड़की पर

खूब चीं-चीं-चीं करती रही

जब तक कि मैं ने

उसे देख न लिया

परंतु अगली सुबह

जब से गई फिर

नहीं लौटी शाम तक

शायद?

अंतिम दिन

मुझ से मिलने आई थी

कुछ कह रही थी वह

चीं-चीं के स्वर में

मैं नहीं समझ सका

उस के कोमल मन की भाषा

बस! उसी दिन से

मुझे प्रतीक्षा है

मेरी गौरैया की

वह जहां भी हो

सुरक्षित एवं स्वस्थ हो

और सदा ही

चहचहाती रहे

इस संसार में

बस,

मुझे प्रतीक्षा है

उस के आगमन की.

                             – देवेंद्र थापक

अधूरे ख्वाब

वफा उस की कागजी थी शायद

जरा सी आंच न सह सकी शायद

उस के आने का करते रहे इंतजार

कोई गलतफहमी थी जरूर शायद

ख्वाब न पूरे हो सके अपने

कोशिशों में थी कमी शायद

सांस बेशक उस की चलती रहती है

जीने की तमन्ना खत्म हो चुकी शायद

तुम से मिलने हम आते जरूर लेकिन

प्यार से बुलाया नहीं कभी शायद.

              – हरीश कुमार अमित

दिन दहाड़े

मेरे पिताजी गंभीर रूप से बीमार होने के कारण अस्पताल में भरती थे. मैं कमरे के बाहर बरामदे में मोबाइल पर बात कर रहा था कि अचानक एक व्यक्ति बदहवास सा भागता हुआ मेरे पास आया, कहने लगा, ‘‘मेरी बहन यहीं बगल के कमरे में भरती हैं. उन की हालत बहुत खराब हो गई है. मुझे अपने पिताजी को सूचित करना है. कृपया आप मुझे मोबाइल से एक फोन करने दें.’’ मैं ने उसे अपना मोबाइल दे दिया. वह मोबाइल पर बात करता आगे चला गया जहां कई अन्य व्यक्ति भी थे. मैं ने सोचा कि वे लोग उस व्यक्ति के परिचित होंगे. अचानक वह व्यक्ति मोबाइल ले कर बाहर की ओर भागा जहां पहले से ही उस का परिचित मोटरसाइकिल स्टार्ट कर के खड़ा हुआ था. वह व्यक्ति मेरे देखते ही देखते मोटरसाइकिल पर बैठ कर रफूचक्कर हो गया.

– पवन सेठ, रेवाड़ी (हरि.)

*

मेरे कुकर की रबर टूट गई थी. कालोनी में अकसर गैस का चूल्हा और कुकर ठीक करने वाले चक्कर लगाया करते हैं. एक दिन मैं ने उन में से एक को बुला कर रबर देने को कहा. उस ने मेरे हाथ से ढक्कन ले लिया. मैं काफी देर खड़ी रही कि वह रबर दे तो मैं अंदर आऊं. पर मेरे सामने वह काफी देर तक अपना बैग खोलने का ऐसा नाटक करता रहा जैसे उस की चेन फंस गई हो. मैं कुछ काम से अंदर आ गई. वापस गई तो वह ढक्कन पर हथौड़ी से खटखट कर रहा था. मैं ने टोका तो उस ने कहा, ‘‘किनारा मुड़ गया है, ठीक कर रहा हूं.’’ मैं ने उस से यह कहते हुए ढक्कन ले लिया, ‘‘ढक्कन बिलकुल ठीक है, इस में कुछ करने की जरूरत नहीं है.’’ उस के जाने के बाद मुझे संदेह सा हुआ कि केवल रबर देनी थी, फिर उस ने इतना टाइम क्यों लगाया और ढक्कन से बिना कहे छेड़छाड़ क्यों की? मैं ने तुरंत वह ढक्कन कुकर में लगा कर गैस पर चढ़ाया तो देख कर दंग रह गई. उस लड़के ने कोई नुकीली चीज डाल कर ढक्कन के ‘सैफ्टी वौल्व’ में छेद कर दिया था जिस के रास्ते पूरी हवा (गैस) निकलती जा रही थी. उस ने सोचा होगा कि मुझे दिखा कर कहेगा कि सैफ्टी वौल्व खराब है और मैं उस से ही बदलने को कहूंगी किंतु मेरे द्वारा झटके से उस के हाथ से ढक्कन ले लेने की वजह से उसे इस बात का मौका ही नहीं मिला. सतर्क रहते हुए भी दिनदहाड़े वह लड़का मुझे बेवकूफ बना कर मेरा नुकसान कर गया.

– शन्नो श्रीवास्तव, फरीदाबाद (हरि.)

टीपू सुलतान को इतिहास से सड़क पर न लाएं

18वीं सदी और 21वीं सदी के बीच का फासला इतना है कि अब उस दौर के शासकों व हुक्मरानों के किस्से इतिहास के चंद पन्नों में सिमट कर रह गए हैं. कुछ फिल्मकार इन पर व्यावसायिक फिल्में और धारावाहिक बना कर उन पात्रों को अपनेअपने तरीके व नजरिए से पुनर्जीवित करने की कोशिश करते रहे हैं. पर इस इतिहास पर शोध की बराबर गुंजाइश भी बनी रहती है. यही गुंजाइश बीते कल को कई बार अपने शोध के आधार पर बदले स्वरूप में पेश कर देती है जिन से इन पर अकसर विवाद उठते हैं और सियासत करने वालों को विवादों से कुछ मुद्दे मिल जाते हैं. टीपू सुलतान की बात कर लीजिए या फिर अंगरेजों से लोहा लेने वाले किसी दूसरे शासक की.

सब के अपनेअपने माने हैं. पिछले गणतंत्रदिवस की परेड के बाद से 225 साल पहले मैसूर के शासक रहे टीपू सुलतान को ले कर सियासत 2 खेमों में बंटी है. एक खेमा उन्हें अपने ऐतिहासिक आईने में कट्टर मुसलिमपरस्त बादशाह साबित करने पर तुला है तो दूसरा खेमा दावा कर रहा है कि वह धर्मनिरपेक्ष और सहिष्णु शासक था.

आखिर ऐसी क्या जरूरत है कि 200 साल से ज्यादा पुराने किसी बादशाह के इतिहास को कुरेदा जाए. जब सहमति की गुंजाइश कम हो तो क्यों न ऐसे इतिहास को इतिहास के पन्नों में ही दफन रहने दिया जाए. देश, काल और परिस्थिति के बारे में सोचने का वक्त किसी के पास नहीं होता कि आखिर टीपू ने इतनी लड़ाइयां लड़ीं तो क्यों लड़ीं, आखिर अंगरेजों ने तमाम रियासतों पर कब्जा करने की जो कोशिशें कीं तो उन्हें बचाने के लिए देशी शासकों ने जंग लड़ीं तो क्यों लड़ीं? सीधा सा जवाब है कि इन शासकों, सुलतानों ने आजादी की जंग नहीं लड़ी, न ही वे अंगरेजों को पूरी तरह अपने देश से बाहर करने के लिए किसी राष्ट्रीय आंदोलन का हिस्सा बने, उन्होंने केवल अपनीअपनी रियासतें ही बचाईं.

इतिहास से यह तो पता चलता है कि इन शासकों ने अपने स्तर पर फिरंगियों से जम कर लोहा लिया था. अपने दम पर ही टीपू सुलतान ने 3 बार मैसूर के युद्ध में अंगरेजों को परास्त किया था. क्या यह गौरतलब नहीं है कि आखिर टीपू सुलतान की तलवार में ऐसा क्या खास है कि उस की नीलामी 21 करोड़ रुपए में होती है. यही नहीं, लंदन के बोनहैम्स नीलामी घर से टीपू सुलतान के केवल 30 सामानों की कीमत 56 करोड़ रुपए आंकी जाती है. ब्रिटिश सैनिक ड्यूक औफ वेलिंगटन आर्थर बेलेसले ने यह अंगूठी सुलतान की उंगली से निकाल ली थी. ‘राम’ नाम लिखी इस अंगूठी को मुसलिम शासक पहनता था. लगभग सवा 4 तोला वजनी यह सोने की अंगूठी रैगलन के निजी संग्रहालय में थी.

अंगरेजों के साथ लड़ाई में उन्होंने कई बार छोटेछोटे रौकेट्स का इस्तेमाल किया था. उस वक्त अंगरेजों के लिए यह हैरानी की बात थी, क्योंकि उन्हें भी टीपू सुलतान की इस टैक्नोलौजी की जानकारी नहीं थी. उन के मिसाइल अंगरेजों के मिसाइल से ज्यादा उन्नत थे, जिन की मारक क्षमता 2 किलोमीटर तक थी. बाद में अंगरेजों ने इस से प्रेरणा ले कर रौकेट टैक्नोलौजी को विकसित किया जिस का यूरोप की लड़ाइयों में उन्होंने प्रयोग भी किया.

राजनीति से प्रेरित मुद्दा

आजाद भारत के मिसाइल मैन डा. अब्दुल कलाम ने भी टीपू को मिसाइल तकनीकी का खोजकर्ता बताया है. नैशनल आर्मी म्यूजियम के आलेख के अनुसार, टीपू सुलतान अपनी फौज को यूरोपियन तकनीक के साथ ट्रेनिंग देने में विश्वास रखते थे. टीपू विज्ञान और गणित में गहरी रुचि रखते थे. यहां यह कहने का तात्पर्य है कि कई शासकों ने अपनी रियासतें बचाने के अलावा अपनी बहादुरी के पैमाने भी रखे.

आज सवाल यह है कि टीपू सुलतान को ले कर देश में छिड़ी जंग क्या जायज है? कर्नाटक सरकार के टीपू की जयंती मनाने के फैसले को इस कदर सियासी रंग देना, क्या किसी खास धारा को आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं है? सरकारें तो ऐसी जयंतियां मनाती ही रहती हैं. उन के मंत्रालयों को भी कुछ न कुछ ऐसे काम करने होते हैं जो कहीं न कहीं खबर बनें.

ऐसा लगता है कि खुद को धर्मनिरपेक्ष साबित करने के लिए कर्नाटक सरकार ने टीपू की जयंती का ऐलान सबकुछ जानतेबूझते किया था. उसे पता था कि इस का विरोध होगा और ऐसे माहौल में यह खबर अपना संदेश देने का काम करेगी कि वह एक खास वर्ग की हितैषी है. लगता है कि वह अपने मकसद में कामयाब होती दिख रही है क्योंकि टीपू सुलतान हीरो या विलेन, महान या ऐंटी हिंदू, कर्नाटक से शुरू हुई यह बहस अब पूरे देश की राजनीति को प्रभावित कर रही है. इस को ले कर विरोध प्रदर्शन भी हो रहे हैं. उसे यह भी पता है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इन मामलों पर चुप रहते हैं जिस से तमाम ऐसे संगठनों को अपने को राष्ट्रवादी साबित करने का मौका मिल जाता है. ये संगठन किसी भी मामले में हिंसक होने से भी परहेज नहीं करते हैं.

मोदी सरकार की किरकिरी

कर्नाटक ऐसा राज्य है जहां कई राजवंशों ने वहां की संस्कृति को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई. टीपू सुलतान और उस के बाद बाजीराव पेशवा की हार के बाद अंगरेजों ने कर्नाटक पर कब्जा किया. फिर भी टीपू और पेशवा को ले कर यहां आज भी सियासत कम नहीं होती. तो क्या यह मान लेना चाहिए कि संचार क्रांति और तकनीकी विकास के इस युग में टीपू सुलतान को ले कर चल रही सियासत को बेकार में हवा दी जा रही है? यह विवाद उसी कड़ी का हिस्सा है जिस से मोदी सरकार की पूरी देश में किरकिरी हो रही है. क्या टीपू सुलतान की जयंती मनाना सचमुच कर्नाटक की अस्मिता से जुड़ा सवाल है? देश का हाल देख कर, माहौल भांप कर, आहत हो कर गिरीश कर्नाड जैसा फिल्मकार क्यों अपने बयान पर माफी मांग लेता है? देश का एक बड़ा तबका आखिर क्यों वैचारिक लड़ाई में खुल कर सामने आ गया है? सांस्कृतिक एकता और समरसता की बात करने वाला हमारा देश क्या ऐसी मानसिकता वालों की गिरफ्त में सचमुच आ रहा है?

ऐसे में टीपू सुलतान की कहानी को सड़कों पर लाने की जगह इतिहास की किताबों में रहने देना चाहिए.

यों मिसाल बनी गुलाबो

करोड़ों दूसरे लोगों की तरह उस ने न किस्मत को कोसा न ही गरीबी का रोना रोया और न ही कभी छोटी जाति में पैदा होने को अभिशाप माना. अपने हुनर, मेहनत और लगन के बल पर देशविदेश में दौलत व शोहरत कमा कर उस ने साबित कर दिया कि अगर कोई ठान ले तो नामुमकिन कुछ भी नहीं. हम बात कर रहे हैं मशहूर कालबेलियाई डांसर गुलाबो की, जिस का हुनर लोगों के सिर चढ़ कर बोलता है. जब वह डांस करने के लिए स्टेज पर आती है तो मानो सारा समा थिरकने लगता हैं, देखने वाले सुधबुध खो बैठते हैं और ऐसा लगता है कि जैसे वह सिर्फ डांस करने के लिए ही पैदा हुई है.

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल स्थित ट्रायबल म्यूजियम में गुलाबो एक कार्यक्रम में डांस करने आई तो अपनी जिंदगी से ताल्लुक रखती कई अनछुई बातों को उस ने खास बातचीत में साझा किया जो न केवल रूढि़यों और अंधविश्वासों से घिरे समाज की दासतां को बयां करती हैं बल्कि यह भी बताती हैं कि इन से लड़ना ही इन से जीतना है. जरूरत है बस जज्बे की जो गुलाबो में कूटकूट कर भरा है. गुलाबो बताती है, ‘‘जिस सपेरा समाज में मैं पैदा हुई उस में दिल दहला देने वाला एक रिवाज यह है कि लड़की को पैदा होते ही जिंदा जमीन में गाड़ दिया जाता है. लड़की के जन्म को सपेरे अच्छा नहीं मानते. मेरे साथ भी यही हुआ था कि मुझे पैदा होते ही जमीन में गाड़ दिया गया था लेकिन मेरी मौसी ने मुझे कब्र से निकाल लिया. फिर जब समझदार हुई तो मैं ने तय कर लिया कि कुछ बन कर दिखाऊंगी. औरतों को समाज में इज्जतदार दरजा दिलाऊंगी लेकिन यह इतना आसान काम नहीं था. वजह, मुझे सिवा नाच के कुछ आता नहीं था और पैसे भी ज्यादा नहीं थे. इधर, मुझे कब्र से निकाल लेने की वजह से समाज वालों ने मेरे परिवार को समाज से बेदखल कर दिया था.

वह आगे बताती है, ‘‘पिताजी सपेरे थे और सांप से ही हमारी जाति की रोजीरोटी चलती थी. बचपन में मैं ने और मेरे घर वालों ने काफी दुख उठाए. 2 दफा तो मेरी सगाई टूटी पर मैं ने हिम्मत नहीं हारी. तब कालबेलिया डांस को ज्यादा लोग नहीं जानते थे जो एक लिहाज से राजस्थान का लोकनृत्य है. इस में माहिर हो कर मैं ने शो करने शुरू किए तो लोगों की खूब तारीफें मिलीं और सरकार की तरफ से विदेश जाने का मौका मिला.’’ इसी दौरान अपने जमाने की हिट फिल्मों ‘गुलामी’ और ‘बंटवारा’ में डांस करने का मौका डायरैक्टर जे पी दत्ता ने दिया तो देशभर के लोग कालबेलिया डांस के मुरीद हो गए जबकि वे इस डांस का नाम तक नहीं जानते थे लेकिन इस की खासीयत उन्होंने समझ और पकड़ ली थी.

भोपाल के एक कार्यक्रम में उस ने राजस्थान का मशहूर लोकनृत्य भंवई डांस पेश कर भी लोगों की खूब वाहवाही लूटी. इस डांस में डांसर्स पानी के मटके पर 4 गिलास रख इतने सधे ढंग से तेज गति से नाचती हैं कि गिलास गिरते नहीं हैं. देखने वालों का जोश देख गुलाबो ने राजस्थान का बंजारा डांस भी पेश किया. देखने वाले की हैरत का ठिकाना उस वक्त नहीं रहा जब कालबेलिया डांस के दौरान गुलाबो ने आंख की पलक से अंगूठी और नोट उठाने का कारनामा कर दिखाया जिस के लिए वह खासतौर से जानी जाती है. वह आगे कहती है, ‘‘आज हालत यह है कि मैं साल में 3 महीने डेनमार्क में रहती हूं. विदेश में मेरा म्यूजिक ग्रुप काफी शोहरत हासिल कर चुका है. फ्रांस में आमिर खान नाम का शख्स मेरा सहयोगी है जो एक म्यूजिक ग्रुप चलाता है. हम ने मिल कर जिप्सी जिकान नाम का ग्रुप बनाया जिस में कालबेलिया डांस में गिटार का इस्तेमाल होता है. हमारे इसी ग्रुप के एक मैंबर टी वी रौबिन ने मेरे ऊपर एक किताब भी लिखी है.’’

लेकिन इन सब बातों से ज्यादा खुशी गुलाबो को इस बात की है कि उस के समाज में उस की वजह से औरतों के बारे में लोगों का नजरिया बदल गया है. वह बड़े फख्र से बताती है, ‘‘अब लोग कहने लगे हैं कि बेटियां बोझ नहीं, सिर का ताज हैं. मुझे समाज का अध्यक्ष चुना जाना इस बात का सुबूत भी है.’’ देशविदेश में कई इनामों व सम्मानों से नवाजी गई गुलाबो के पास अब किसी चीज की कमी नहीं. लेकिन कुछ महीनों पहले, सालों बाद उसे फिर एक हादसे को ले कर दुख हुआ. इस बार वजह उस का बेटा भवानी था. गुलाबो बताती है, ‘‘वह हमारे फार्महाउस में अपने दोस्तों के साथ एक रेव पार्टी कर रहा था, पुलिस के छापे में वह पकड़ा गया. बेटे की इस बेजा हरकत से दुखी गुलाबो ने एक और फैसला यह ले लिया कि अब बेटे से कभी सलीके से बात नहीं करना है. वह कहती है, ‘‘मैं ने उस से एक ही बात कही कि तुम ने मेरी 40 सालों की मेहनत पर पानी फेर दिया.’’

कालबेलिया डांस की इकलौती मशहूर और कामयाब डांसर गुलाबो चाहती है कि समाज में औरतों की बराबरी से इज्जत हो, जाति की बिना पर भेदभाव न रहे और सपेरों को दूसरे कामधंधों के लिए सरकार कर्ज दे जिस से वे यह पेशा छोड़ इज्जत की जिंदगी जी सकें. बीन बजा कर सांप नचा कर पैसा कमाने को गुलाबो ठीक नहीं मानती. मिसाल बन चुकी गुलाबो की जिंदगी से जो सबक लिए जा सकते हैं उन में खास हैं कि हालात कैसे भी हों, आदमी को हिम्मत नहीं हारनी चाहिए, अपने हुनर को निखारते रहना चाहिए और मेहनत व लगन से काम करना चाहिए. जाति और गरीबी को रोते रहने से वक्ती हमदर्दी तो बटोरी जा  सकती है लेकिन अंधविश्वासों व कुरीतियों की जंजीरें तोड़ने के लिए उन से लड़ने की जरूरत है न कि उन के सामने घुटने टेक देने की.

क्यों पिछड़ रहे हैं दुनिया में मुसलिम

गुलाबी सपनों का शहर, फैशन की राजधानी, साहित्य और कलाओं का महातीर्थ, उदार यूरोप का सब से उदार शहर, जहां जिंदगी जैसे नई हिलोरें भरती है. लेकिन कुछ दिन पहले उस शहर यानी पेरिस पर हुए आईएस के आतंकी हमले ने स्वप्न को दुस्वप्न में बदल दिया. 120 लोगों की मौत से फ्रांस की राजधानी पेरिस सन्न रह गई. वहां जब एक के बाद एक 7 धमाके हुए जिस से पूरा शहर ही नहीं, पूरा देश और पूरी दुनिया दहल गई.

पेरिस अभी शार्ली एब्दो पर हुए हमले की पीड़ा से उबरा भी नहीं था कि उस पर कुछ ही महीने बाद एक और बड़ा हमला हुआ. पहली प्रतिक्रिया में ही लोग दांत पीसते हुए इसलामी आतंक को जिम्मेदार ठहराने लगे थे जिस की तस्दीक थोड़ी देर में ही आईएसआईएस की मुनादी ने कर दी कि हां, हम ने किए हमले.

कट्टरवाद व पिछड़ेपन का दुश्चक्र

मजहब के नाम पर लोगों का सरेआम कत्ल करना और निर्दोषों की मौत का जश्न मनाना आतंकवाद का धर्म बना हुआ है.हमले के बाद से यूरोप में मुसलमान शरणार्थियों को पनाह देने के फैसले का विरोध शुरू हो गया. दरअसल, 2001 के बाद से दुनियाभर में मुसलमानों के प्रति नफरत की भावना बलवती होती जा रही है. यूरोप तो इसलामीफोबिया से ग्रस्त है. लोग कुछ सिरफिरे लोगों द्वारा किए गए नरसंहार और हिंसा के लिए आम मुसलमान को दोषी मानते हैं.

उन के बारे में यह आम है कि वे बहुत हिंसक और कट्टरवादी हैं जिस से आतंकवाद को बढ़ावा मिलता है. अपनी 1400 साल पुरानी धार्मिक पोथियों से चिपके हुए, उस जमाने के कानून को आज के जमाने में ज्यों का त्यों लागू करने की हिमायत करने वाले, आज भी 1400 साल पुरानी जिंदगी जीने की तमन्ना रखने वाले, उस के लिए गाहेबगाहे हिंसा का सहारा लेने वाले घोर कट्टरपंथी हैं.

तेज रफ्तार से बदलती जिंदगी जीने वाले पश्चिम को कट्टरवादियों से नफरत होने लगे तो अचरज कैसा. कट्टरवादियों की सब से बड़ी कमजोरी यह होती है कि वे किसी भी तरह के बदलाव को बरदाश्त नहीं कर सकते. किसी नए के लिए उन का मन तैयार ही नहीं होता. लेकिन जिंदगी तो निरंतर परिवर्तन का नाम है. जो रुक जाता है उस की प्रगति भी रुक जाती है. जिंदगी की दौड़ में वह पिछड़ जाता है. उन की कट्टरता उन्हें प्रगति की दौड़ में पीछे धकेल देती है. यही हो रहा है मुसलमानों के साथ.

कट्टरता ने मुसलिमों को दुनियाभर में पिछड़ा बना दिया है. इस का उलटा भी हो रहा है, चूंकि वे दुनिया में सब से ज्यादा पिछड़े हैं इसलिए वे कट्टर बनते जा रहे हैं. उन्हें नए से डर लगता है, इसलिए पुराने से चिपके रहते हैं. उन में यह भावना पनपती है कि वे पिछड़े इसलिए हैं क्योंकि वे अपने धर्म का ठीक से पालन नहीं कर रहे हैं और इसलिए वे धर्म के मामले में कट्टर होते जा रहे हैं. उन में तालिबान, आईएस, बोको हराम और अलकायदा जैसे धार्मिक कट्टरवादी संगठन उभर रहे हैं. इस तरह कट्टरवाद और पिछड़ेपन के दुश्चक्र में फंस गए हैं मुसलमान.

भारतीय मुसलमान इस के अपवाद नहीं हैं. सदियों तक इस देश में शासक रहने के बावजूद मुसलिम समुदाय देश के सब से पिछड़े समुदायों में से एक है. देश के मुसलिमों की दशा पर विचार करने के लिए बनी सच्चर कमेटी की रिपोर्ट में कहा गया था कि वे दलितों से भी ज्यादा पिछड़े हैं. इस के साथ ही, कमेटी ने उन की स्थिति को सुधारने के लिए कई सिफारिशें भी की थीं. तब मुसलमानों को लगा था कि सच्चर कमेटी किसी देवदूत की तरह है जो पिछड़ेपन के अंधेरे में विकास की रोशनी ले कर आई है. उस के बाद यह माहौल बना कि इस पिछड़ेपन के लिए भारत सरकार और भारतीय समाज का मुसलमानों के प्रति भेदभावपूर्ण नजरिया ही जिम्मेदार है. इस बात में थोड़ीबहुत सचाई है भी.

इस विषमता को मिटाने के लिए तब की मनमोहन सिंह सरकार ने अपना सारा खजाना खोल दिया था. तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है.

मुसलमानों के लिए विशेष उपाय योजना

बैंक कर्जों में 15 प्रतिशत कर्ज मुसलमानों को देने का प्रावधान, मुसलिम छात्रों को स्कौलरशिप आदि न जाने कितने विशेष उपाय किए गए थे लेकिन ये उपाय बेकार साबित हुए थे. मुसलमानों की स्थिति पर तब से लगातार बहस होती रही है. तब केंद्र में मुसलिमों की हमदर्द होने का दावा करने वाली कांगे्रस की सरकार थी लेकिन मुसलमानों की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ.

कुछ साफसाफ बात करने वाले लोगों का कहना है कि मुसलमान हैं ही पिछड़ी मानसिकता के. दुनियाभर के मुसलमान पिछड़े हैं. यही मानसिकता भारत के मुसलमानों को भी प्रभावित किए हुए है. मध्यपूर्व के देशों में मुसलिम ब्रदरहुड नामक इसलामी संस्था यह नारा लगाती है–इसलाम इज सोल्यूशन. लेकिन पश्चिमी देशों में बैठे इसलामी देशों के विशेषज्ञों को लगता है कि मामला उलटा है यानी इसलाम इज प्रौब्लम. मौलाना वहीदुद्दीन खान कहते हैं, ‘‘मुसलमान सारी दुनिया में पिछड़े हैं, केवल भारत में नहीं, अमेरिका, यूरोप और अन्य जगहों पर भी. ऐसा उन की अलगाववादी सोच के कारण है. उन पर अलगाववादी सोच सवार है. उन का विश्वास है कि उन्हें लगातार अपनी अलग सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना है.’’

कई मुसलिम नेता कहते हैं कि इसलाम के संस्थापक पैगंबर मोहम्मद ज्ञानविज्ञान के पक्ष में बहुत थे. उन्होंने कहा था कि ज्ञान पाने के लिए चीन जाना पड़े तो जाओ. पता नहीं, मुसलमान कभी ज्ञान प्राप्त करने के लिए चीन गए या नहीं, लेकिन लड़ने के लिए भारत जरूर पहुंच गए क्योंकि इसलाम के मानने वालों का भरोसा कलम पर कम, तलवार पर कुछ ज्यादा ही रहा है. लेकिन आज का युग ज्ञानविज्ञान का युग है. सूचना का युग है, इसलिए आज सिकंदर वही है जो ज्ञानविज्ञान में अव्वल है. जो उस में पिछड़ गया वह पिछड़ ही जाता है.

मुसलमानों के पिछड़ेपन और कट्टरतावाद में एक पेंच है कि वे पुराने मूल्य, कानून और सोच से तो चिपके रहना चाहते हैं मगर लड़ने की नई तकनीक व हथियारों से उन्हें कोई परहेज नहीं है. यह तो वैसा ही है कि गुड़ खाए और गुलगुले से परहेज करे. सारी दुनिया में 57 मुसलिम देश हैं. इन में से कुछ देशों (सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, ईरान, तुर्की, इंडोनेशिया) की स्थिति काफी अच्छी मानी जाती है. कुछ देश तो अमीर माने जा सकते हैं पर उत्पादन के कारण नहीं, जमीन में दबे तेल के कारण. लेकिन बाकी मुसलिम देश गरीब और पिछड़े हैं. इस कारण पिछड़ापन उन की पहचान बन गया है. कुछ वर्ष पहले पाकिस्तान के स्वतंत्र पत्रकार डा. फारुक सलीम के एक लेख ने मुसलिम जगत को चौंका दिया. लेख के आंकड़े कुछ साल पुराने हैं लेकिन आज भी प्रासंगिक हैं. वे कहते हैं, ‘‘हालांकि दुनिया में कई मुसलिम देश काफी अमीर हैं लेकिन मुसलमान दुनिया के गरीबों में भी सब से गरीब हैं.’’

कई देश हैं जो अकेले इतना उत्पादन करते हैं जितना 57 मुसलिम देश मिल कर नहीं कर पाते. तेल के बूते अमीर बनने वाले देशों (सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर) का मिला कर सकल घरेलू उत्पाद 430 बिलियन डौलर्स ही है. नीदरलैंड जैसे छोटे देश और बौद्ध धर्मावलंबी थाईलैंड का सकल घरेलू उत्पाद इस से कहीं ज्यादा है. दुनिया की 22 प्रतिशत आबादी मुसलिम है लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में उन का योगदान 5 प्रतिशत का है. चिंता की बात यह है कि यह प्रतिशत भी लगातार गिरता जा रहा है. दुनिया के जो 9 सब से ज्यादा गरीब देश हैं उन में से 6 मुसलिम देश हैं.

साक्षरता का अभाव

फारुक सलीम ने संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था यूएनडीपी द्वारा जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर ईसाई और मुसलिम देशों की शिक्षा की स्थिति की तुलना की. 15 ईसाई बहुल देश ऐसे हैं जहां साक्षरता 100 प्रतिशत है. मगर एक भी मुसलिम देश ऐसा नहीं है जहां साक्षरता 100 प्रतिशत हो. मुसलिम बहुल देशों में औसत साक्षरता 40 प्रतिशत के नजदीक है. ईसाई देशों में 40 प्रतिशत ने कालेज शिक्षा भी ली है जबकि मुसलिम देशों में यह आंकड़ा केवल 2 प्रतिशत का है. फारुक सलीम इस के आधार पर निष्कर्ष निकालते हैं कि मुसलिम देशों में ज्ञान पैदा करने की क्षमता का ही अभाव है. ऐसे में वे ज्ञानविज्ञान की प्रगति में कहीं शामिल हैं ही नहीं.

मुसलिम देशों की जनता साक्षरता में बहुत पीछे है, इसलिए ज्ञान और सूचनाओं का प्रचार करने वाले अखबारों व किताबों के मामले में भी वे बहुत पीछे हैं. पाकिस्तान के कायदेआजम विश्वविद्यालय में 3 मसजिदें हैं, चौथी बनने वाली है लेकिन वहां किताबों की कोई दुकान नहीं है. यह इस बात का प्रतीक है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल कोर्स की किताबों को रटना भर है न कि आलोचनात्मक दृष्टि पैदा करना. सऊदी अरब की सरकार के स्कूलों में जो कुछ किताबें पढ़ाई जाती हैं उन से यही पता नहीं चलता कि धर्म की किताबें हैं या विज्ञान की, जैसे एक किताब का नाम है–‘अन चैलेंजिएबल मिरेकल औफ द कुरान’ या ‘द फैक्ट्स दैट कैन नौट बी डिनाइड बाय साइंस’.

किसी देश द्वारा किए गए निर्यात में उच्च तकनीक उत्पादों का कितना हिस्सा है, यह पैमाना होता है कि कोई देश ज्ञानविज्ञान का कितना इस्तेमाल कर पा रहा है. पाकिस्तान के निर्यात में उच्च तकनीक उत्पादों का हिस्सा एक प्रतिशत है तो कुवैत, मोरक्को, अल्जीरिया और सऊदी अरब आदि मुसलिम देशों में यह आंकड़ा 0.3 प्रतिशत है. दूसरी तरफ सिंगापुर में यह आंकड़ा 57 प्रतिशत का है. इस से स्पष्ट है कि मुसलिम देश विज्ञान के व्यावहारिक प्रयोग या तकनीकी क्षेत्र में प्रयोग में कहीं है ही नहीं. नोबेल पुरस्कार भी किसी देश या समाज की वैज्ञानिक प्रगति को नापने का पैमाना होता है. अब तक केवल 2 मुसलिम वैज्ञानिकों को नोबेल पुरस्कार मिले हैं मगर दोनों ही ने अपनी उच्चशिक्षा पश्चिमी देशों में पाई है. दूसरी तरफ यहूदी, जिन की आबादी दुनिया में मात्र 1 करोड़ 40 लाख है, अब तक 15 दर्जन नोबेल पुरस्कार जीत चुके हैं.

मुसलिम देशों के पिछड़ेपन के बारे में ये चौंकाने वाले आंकड़े देख कर डा. फारुक सलीम सवाल उठाते हैं कि मुसलिम गरीब, निरक्षर और कमजोर हैं. आखिर क्या गलत हो गया? फिर वे खुद ही जवाब देते हैं कि हम पिछड़े इसलिए हैं क्योंकि हम ज्ञान का निर्माण नहीं कर रहे. हम ज्ञानविज्ञान को अमल में लाने में भी नाकाम रहे हैं. जबकि आज का युग सूचना और ज्ञान का युग है.

इन सारे कारणों से मुसलिम देशों में ज्ञान पर आधारित समाज बनने की संभावना दूरदूर तक नजर नहीं आती. इस की पहली शर्त है शिक्षा व ज्ञान के प्रति जिज्ञासा जिस का मुसलिम समाज में घोर अभाव है. ये तथ्य बात की ओर इंगित करते हैं कि मुसलिम केवल भारत में ही नहीं, दुनियाभर में सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हैं. भारत पर दोष मढ़ा जाता है कि यहां की सरकार मुसलमानों से भेदभाव करती है लेकिन उन 57 मुसलिम देशों का क्या? यहां तो मुसलिम सरकारें हैं, फिर मुसलिम शिक्षा में पिछड़े क्यों हैं. इसलिए भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए केवल भारतीय समाज और भारत सरकार को दोषी ठहराना बेकार है.

दरअसल, सच्चर कमेटी को भारतीय मुसलमानों के पिछड़ेपन के कारणों का भी पता लगाना चाहिए था, साथ ही साथ, इस बात पर भी गौर करना चाहिए था कि क्यों मुसलमान दुनियाभर में पिछड़े हैं. कहीं

उन की विशिष्ठ धार्मिक सोच, धर्मांधता, रीतिरिवाजों का कट्टरपन, मुल्लामौलवियों का शिकंजा इस पिछड़ेपन की वजह तो नहीं?

इसलाम के कुछ जानकारों का कहना है कि मुसलमानों में अपने हर सवाल के जवाब अपने धर्मग्रंथों में खोजने की आदत पड़ी हुई है जो उन की जिज्ञासा को कुंठित कर देती है. उन्हें यह गलतफहमी है कि उन की हर जिज्ञासा का जवाब कुरान व हदीस में मौजूद है. फिर पढ़नेलिखने की जरूरत क्या है.

ज्ञानार्जन की घटती प्रवृत्ति

इसलामी धर्मशास्त्र के मुताबिक, इसलाम के पूर्व का युग अज्ञान और अंधकार का युग रहा है, इसलिए उस से कुछ लेने का सवाल ही नहीं उठता. इसलाम खुद कोई ज्ञानविज्ञान कभी पैदा नहीं कर सका. दूसरे धर्मों द्वारा पैदा किए गए ज्ञानविज्ञान को वह कभी बरदाश्त नहीं कर पाया. यही वजह है कि मुसलिम आक्रांताओं ने कई विश्वविद्यालयों को नेस्तनाबूद कर दिया. उन के ग्रंथालयों को जला डाला. मुसलमान तो इस देश में 7 सदियों तक शासक रहे और काफी लूटखसोट की मगर उस से महल बनवाए, मकबरे बनवाए लेकिन उच्चशिक्षा का कोई संस्थान नहीं बनवाया. अगर उन के नाम पर दर्ज हैं तो कुछ इसलामी शिक्षा देने वाले संस्थान.

मुसलमान आज बाकी समुदायों की तुलना में पिछड़े हैं तो इसलिए कि वे शिक्षा में पिछड़े हैं. वे अपने शैक्षणिक पिछड़ेपन की कीमत चुका रहे हैं और इस के लिए पूरी तरह से मुसलमान ही दोषी हैं. मुसलिम उलेमाओं ने कई फतवे जारी कर दावा किया है आधुनिक शिक्षा गैर इसलामी है. यह मुसलिमों के पिछड़ेपन का कारण है. उलेमाओं के प्रभाव में मुसलिम मानते हैं कि असली शिक्षा धार्मिक शिक्षा ही है. इसलिए सब से पहले मुसलमानों को इस बात के प्रति जागरूक बनाना होगा कि आधुनिक शिक्षा महत्त्वपूर्ण है.

कई विद्वान मानते हैं कि मुसलमानों में ज्ञानार्जन की घटती प्रवृत्ति ही उन के आर्थिक और राजनीतिक पतन का मुख्य कारण है. मलयेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने विश्व मुसलिम संगठन की बैठक में मुसलिमों को बहुत सही सलाह दी थी कि मुसलमानों को अपनी रूढि़वादिता छोड़ कर नए समय में नई पहचान बनानी चाहिए क्योंकि सामाजिक परिस्थितियां अब बदल चुकी हैं. मुसलमानों को यह याद रखने की जरूरत है कि आज के वैज्ञानिक विकास से परिभाषित विश्व में किसी भी देश की इज्जत और शक्ति उस की जनसंख्या पर आधारित नहीं है. आज के विश्व में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास ही शक्ति, इज्जत और संसाधनों की गारंटी है.

ऐसे कई उदाहरण हैं जहां अधिक जनसंख्या के साथ आर्थिक पिछड़ापन और कम सामरिक सामर्थ्य है. यहूदी देश इसराईल को देखिए, छोटा सा देश पूरे अरब पर हावी रहता है. ऐसा इसलिए है क्योंकि यह एक आर्थिक, सामरिक और वैज्ञानिक रूप से समृद्ध देश है, जिस के सामने पिछड़ेपन के शिकार अरब देशों को झुकना पड़ता है, हार मान लेनी पड़ती है. एक तरफ वे मुसलमान हैं जो आज पश्चिमी देशों में रहते हैं और अपनी समृद्धि से खुश हैं. जबकि वहीं वे मुसलमान भी हैं जो मुसलिम बाहुल्य देशों के बाशिंदे हैं और आर्थिक रूप से पिछड़ेपन में डूबे हुए हैं. यूरोप में रहने वाले 2 करोड़ मुसलमानों की आय पूरे भारतीय महाद्वीप के 50 करोड़ मुसलमानों से अधिक है.

कर्मकांडों में समय की बरबादी

पिछले दिनों अभिनेता नसीरुद्दीन शाह के भाई और अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति जमीरुद्दीन शाह ने बहुत पते की बात कही कि मुसलमान अपनी सामाजिक हालत के लिए खुद ही दोषी हैं. वे नमाज और रमजान महीने के कर्मकांडों पर बहुत समय बरबाद करते हैं. इस के अलावा वे अपनी आधी आबादी यानी औरतों का उत्पादन में कोई इस्तेमाल नहीं करते, जिन को उन्होंने घरों में गुलाम बना कर रखा है. अपना सऊदी अरब का अनुभव बताते हुए उन्होंने कहा कि वहां भी यही हालात हैं. औरतों को घरों में कैद कर के रखा जाता है. ये हालात सारी मुसलिम दुनिया के हैं. इस कारण मुसलिम देश पिछड़े हुए हैं. रमजान के दिनों में वे काम नहीं करते. सामान्य दिनों में वे ढाई घंटा काम नहीं करते. शुक्रवार के दिन तो बहुत सारा समय नमाज पर खर्च कर देते हैं. इस के बाद बाकी विश्व का वीकेंड आ जाता है. शिक्षा को तो उन्होंने छोड़ दिया है. किसी गैर इस्लामी देश में कोई धार्मिक भेदभाव नहीं है लेकिन इस के बावजूद मुसलमान अवसर न मिलने का रोना रोते रहते हैं. मुसलिम समुदाय उस भेदभाव का रोना रोता है जो असल में है ही नहीं.

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक जफर आगा कहते हैं, ‘‘मुसलमान उस दकियानूसी सोच के भी शिकार हुए जिसे उन के उन्हीं उलेमाओं ने पोषित किया और आगे बढ़ाया जो आधुनिकता को गैर इसलामी मानते हैं. यह वह खौफ था जो 19वीं सदी में ब्रिटिश औपनिवेशिक हुकूमत से मुसलमानों की पराजय के बाद सामने आया.’’

1857 के बाद मुसलिम नेतृत्व ने उभरती हुई पश्चिमी सभ्यता और नई तकनीक को अपनी तहजीब पर हुए हमले के तौर पर लिया. उन्हें इस से इसलाम और मुसलमानों के अस्तित्व पर खतरा मंडराता दिखाई दिया. यह वह सोच थी जो मदरसों से उभरी. इस सोच ने पश्चिमी ईसाई और पूरब के इसलाम के बीच जारी तहजीबों में मानसिक टकराव का रूप ले लिया. मुसलिम धार्मिक नेतृत्व पश्चिमी सभ्यता से बहुत ज्यादा नफरत करने लगा.

19वीं व 20वीं सदी के आरंभ में उन्होंने मुसलमानों को यह नसीहत देनी शुरू कर दी कि वे आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, आधुनिक उद्योग, राजनीति और आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था से दूरी बना लें. मुसलिम नेतृत्व ने फतवों के जरिए मुसलमानों से अपील की कि वे पश्चिमी सभ्यता पर आधारित आधुनिकता को सिरे से नकार दें. इस दौरान सर सैय्यद अहमद खां एकमात्र समाजसुधारक थे जिन्होंने आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और वैज्ञानिक सोच की आवश्यकता पर बल दिया.

संकीर्ण सोच के शिकार

दुख की बात यह है कि नेताओं को मुसलमानों के नेतृत्व और भद्रलोक को इस दारुण त्रासदी का कोई एहसास ही नहीं है. वे मुसलमानों में आधुनिक शिक्षा के प्रसार के बजाय उन की धार्मिक अस्मिता से संबंधित सवालों, मदरसे के परंपरागत चरित्र को बनाए रखना, अलीगढ़ मुसलिम विश्वविद्यालय के मुसलिम चरित्र की रक्षा और बाबरी मसजिद जैसे सवालों में ही उलझे रहे और शिक्षा का मसला हाशिये पर चला गया. अगर पश्चिमी एशिया में तेल के कुएं न हों तो इन देशों की हालत अफ्रीका के गरीब देशों जैसी होती.

यही बात भारतीय संदर्भ में बहुत बेबाकी के साथ मौलाना वहीदुद्दीन खान कहते हैं, ‘‘मेरा मुसलमानों के लिए 2 सूत्री कार्यक्रम है. एक, वे बड़े पैमाने पर शिक्षा को अपनाएं. शिक्षा से मेरा मतलब है सैकुलर शिक्षा. यह बेहद महत्त्वपूर्ण है. दूसरा, समुदाय पर आधारित सोच को छोड़ वे देश के बारे में सोचें, अपने और अपने संकीर्ण स्वार्थों के बजाय सारे देश के बारे में सोचें.’’ दरअसल, मौलाना की बातों में काफी दम है. आधुनिक शिक्षा और उस से निकली आधुनिक सोच ही ऐसे जहाज हैं जो मुसलिमों का बेड़ा पार लगा सकते हैं.

मैला ढोने की प्रथा राष्ट्रीय कलंक

स्वच्छ भारत अभियान के तहत शौचालय को ले कर देशभर में खूब चर्चा है. एक पक्ष इस को ले कर वाहवाही लूट रहा है, नित नए दावे और आंकड़े पेश कर रहा है तो दूसरा पक्ष इन दावों की कलई खोलने में जीजान से लगा हुआ है. साथ ही, वह इस अभियान के बहाने लगाए गए टैक्स की आलोचना कर रहा है. इन सब के बीच, मानवता को शर्मसार करने वाली सिर पर मैला ढोने की प्रथा का कहीं कोई जिक्र तक नहीं हो रहा है. जबकि इस प्रथा को खत्म करने का कागजी अभियान काफी पुराना है. आजादी के बाद 1948 में इसे खत्म करने की मांग पहली बार हरिजन सेवक संघ की ओर से उठाई गई थी. तब से ले कर अब तक, इस प्रथा को खत्म करने की जबानी कोशिश बहुत हुई है. कानून बने, लेकिन सब धरे के धरे रह गए हैं. यह प्रथा खत्म होने का नाम नहीं ले रही है.

दुनिया के सब से बडे़ लोकतंत्र में यह प्रथा एक कलंक है. बड़े शर्म की बात है कि एक तरफ जब दुनिया की सब से बड़ी अर्थव्यवस्था इस समय मंदी की मार झेल रही है और दूसरी तरफ सरकारी दस्तावेजों में ही सही, भारत ने एक सम्मानित विकास दर को प्राप्त कर लिया है और विदेशी निवेशकों के लिए हमारा देश लाभकारी बन गया है, तब भी इस देश में यह देखना कि एक विशेष समुदाय के लोग मैला अपने सिर पर ढोने के लिए अभिशप्त हैं, बेहद दुखद है.

2 अक्तूबर, 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की घोषणा के साथ झाड़ू को तो इतना अधिक प्रचार मिला कि दिल्ली की सत्ता अरविंद केजरीवाल के हाथ लग गई. यह और बात है कि स्वच्छ भारत अभियान शुरू होने और केजरीवाल के सत्ता पर काबिज होने के बाद देश की राजधानी दिल्ली में कुछ ज्यादा ही कचरा फैला. अभियान शुरू होने के साथ समयसमय पर सूखे पत्ते बटोर कर स्वच्छ अभियान में शामिल होते प्रधानमंत्री समेत छुटभइए नेता तसवीरों में खूब कैद हुए लेकिन किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं गया कि हजारोंहजार सालों से हमारे ही देश में कुछ लोग पीढ़ी दर पीढ़ी सिर पर मैला ढो रहे हैं, पाखाने को हाथों से उठा रहे हैं, सैप्टिक टैंक में कमर तक डूब कर सफाई कर रहे हैं. यह राष्ट्रीय शर्म नहीं है? स्वच्छ भारत अभियान के बावजूद अछूता रहा यह मुद्दा अभियान के मुंह पर क्या झन्नाटेदार तमाचा नहीं है?

वर्णव्यवस्था के साथ सदियों से यह परंपरा चली आ रही है. नारद संहिता और वाजसनेयी संहिता के अनुसार, दलितों के जिम्मे यह काम सौंपा गया है. इस के बाद बौद्ध व मौर्यकाल में भी यह परंपरा रही है. 1556 ईसवी में मुगलकाल में जहांगीर ने दिल्ली से लगभग 120 किलोमीटर दूर अलवर में 100 परिवारों के लिए एक सार्वजनिक शौचालय बनवाया था. लेकिन वहां मानव मैला का निबटारा कैसे किया जाता था, इस का विस्तृत ब्यौरा नहीं मिला है. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि वहां भंगी मैला ढोते थे. ब्रिटिश भारत के म्यूनिसिपल रिकौर्ड के अनुसार भी मल का निबटारा भंगी या मेहतर द्वारा होता था.

मैला ढोने का चलन

दुख की बात है कि आज भी यह परंपरा बदस्तूर जारी है. विभिन्न राज्यों में आज भी शुष्क शौचालय उपयोग में होता है. इन शौचालयों में पाखाना उठाने का काम इंसान करते हैं, वह भी हाथों से झाड़ू के जरिए. झाड़ू, बाल्टी और पैन के अलावा कोई विशेष उपकरण उन के पास नहीं होता है. उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पंजाब के गांवदेहात में आज भी पाखाना सिर पर ढो कर ले जाने का चलन है.

हालांकि आजादी के बाद 1948 में महाराष्ट्र हरिजन सेवक संघ ने मैला ढोने की प्रथा का पहली बार विरोध करते हुए इसे खत्म करने की मांग की थी.

1949 में बर्वे समिति ने सफाईकर्मियों के लिए काम के माहौल में सुधार की सिफारिश की थी. अगर राज्यों की बात की जाए तो पहली बार 1950 में तमिलनाडु के गोबिचेट्टीपलयाम म्युनिसिपल्टी के चेयरमैन व स्वतंत्रता सेनानी जी एस लक्ष्मण अय्यर ने इस पर प्रतिबंध लगाया था. इस के बाद 1957 में एक अन्य समिति ने भी सिर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने की सिफारिश की. 1968 में राष्ट्रीय श्रम आयोग ने एक समिति का गठन किया, जिस के जिम्मे झाड़ूदार और मैला ढोने वाले के कामकाज के माहौल की जांच का काम था. इन तमाम संगठन और समितियों ने सिर पर मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने की मांग व सिफारिश की थी.

बहरहाल, 2001 के सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इन शुष्क शौचालयों की सफाई के काम में तब लगभग 7 लाख लोग लगे हुए थे, जबकि गैर सरकारी आंकड़ा 12 लाख बताता है. लेकिन 2011 की जनगणना के आंकड़े की मानें तो 10 सालों के बाद हमारे देश के 13 लाख लोग सिर पर मैला ढोने और अस्थायी शौचालयों की सफाई के काम में लगे हुए हैं.

उन से इस तरह का काम कराया जाना अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार प्रतिरोध) कानून के तहत भी अपराध करार दिया गया है. 1993 में नरसिम्हा राव सरकार में शहरी विकास मंत्रालय ने सिर पर मैला ढोने के रोजगार और शुष्क शौचालय निर्माण (निवारण) कानून को पारित किया. इस का उल्लंघन किए जाने पर 1 साल के लिए जेल या 2 हजार रुपए का जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया था. केंद्र सरकार की ओर से सफाई कर्मचारी राष्ट्रीय आयोग का भी गठन किया गया. उसी साल सफाई कर्मचारियों और उन के परिजनों के लिए पुनर्वास योजना की भी घोषणा की गई. योजना के कार्यान्वयन का दायित्व सामाजिक न्याय व आधिकारिता मंत्रालय पर था.

बहरहाल, 2003 की कैग रिपोर्ट के अनुसार, 16 राज्यों ने उक्त कानून को अपने यहां मान्यता दी. लेकिन किसी ने इसे लागू नहीं किया. महज 6 राज्यों ने अपने यहां हर्जाने का कानून लागू किया. 2002-07 तक की 10वीं पंचवर्षीय योजना में मैला ढोने की प्रथा को खत्म करने का लक्ष्य निर्धारण किया गया था. कैग रिपोर्ट के अनुसार, 600 करोड़ रुपए व्यय किए जाने के बाद भी परियोजना अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर पाई. इस की वजह सामाजिक जटिलता को बताया गया.

17 जून, 2011 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पेशे को भारत की विकास की प्रक्रिया में एक धब्बा बताते हुए अगले 6 महीनों में इस प्रथा को खत्म करने का वादा किया था, जो पूरा नहीं हुआ. 10 सितंबर, 2011 को तमिलनाडु विधानसभा में सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव आया, जिस में कहा गया कि पुराना कानून कमजोर ही नहीं, उस में बहुत तरह की खामियां हैं. इसीलिए केंद्र को एक नया और पुख्ता कानून बनाना चाहिए, जो देश के सभी राज्यों को मान्य हो.

इस के बाद 12 मार्च, 2012 को तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने संसद में कहा कि सरकार मैला ढोने और मैला की सफाई को ले कर 2 नए कानून ले कर आएगी, जिन में समाज के इन लोगों के लिए पुनर्वास और वैकल्पिक सम्मानित रोजगार का प्रावधान होगा. गौरतलब है कि 1993 में पारित हुए कानून में केवल मैला ढोने वालों को ही शामिल किया गया था. लेकिन 2012 के नए कानून में शुष्क शौचालय, खुली नालियों, रेललाइन से मैला उठाने वालों, सैप्टिक टैंक की सफाई करने वालों को शामिल कर इस कानून को विस्तृत और व्यापक बनाने की कोशिश की गई.

मनमोहन सिंह की यूपीए-2 सरकार ने मैला ढोने का रोजगार निवारण और पुनर्वास अधिनियम 2013 पारित किया. चूंकि यह मामला केंद्र व राज्य दोनों का है इसीलिए इस से संबंधित अधिसूचना तमाम राज्यों को भी भेज दी गई.

इस कानून के तहत ऐसे शौचालय के निर्माण करने पर या किसी से इस तरह के काम ले कर पहली बार कानून का उल्लंघन करने पर 2 साल की सजा या 2 लाख रुपए का जुर्माना या दोनों दिए जाने का प्रावधान है. फिर से इस के उल्लंघन पर 5 साल की सजा या 5 लाख रुपए का जुर्माना भरने या जेल व जुर्माना दोनों दिए जाने का प्रावधान है.

यह गैर जमानती कानून है. इस के अलावा, आर्थिक मदद के साथ आवास सुविधा और बच्चों को छात्रवृत्ति, अन्य कोई पेशा अपनाने के लिए कर्ज व प्रशिक्षण दे कर उन के पुनर्वास का भी प्रावधान किया गया. लेकिन विडंबना यह है कि सरकारी महकमे में इतना भ्रष्टाचार है कि सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के लिए लोग आगे आते ही नहीं हैं.

नतीजतन, 1993 में और फिर 2013 में बनाए गए कानून के तहत सिर पर मैला ढोने की प्रथा पर कानूनन प्रतिबंध के बावजूद आज की तारीख में भी यह प्रथा देश के विभिन्न हिस्सों में बदस्तूर जारी है. पिछले 22 सालों में इस कानून के तहत किसी को सजा नहीं हुई है. शायद 13 लाख लोगों का मुद्दा राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन पाया है. यही जमीनी हकीकत है.

दलित समाज की पीड़ा

दलितों की राजनीति कर के अपना राजनीतिक कैरियर संवारने वाले नेता इस बात से बाखबर हैं कि इस काम में दलित समुदाय के लोग ही लगे हुए हैं. इस पर भी, उन में से लगभग 80 प्रतिशत दलित महिलाएं हैं जो यह काम कर रही हैं. वहीं, केंद्र सरकार आंखें मूंदे स्वच्छ भारत अभियान में अपना ध्यान केंद्रित किए हुए है. जाहिर है ईमानदार कोशिश के अभाव में सरकारी अभियान तसवीरों, पोस्टरों और नारों तक सिमट कर रह गया है और इस प्रथा के खिलाफ बना कानून आज केवल कागजों का पुलिंदा बन कर रह गया है.

बहरहाल, इस समस्या के कई पक्ष हैं. एक, देश में इस प्रथा के खिलाफ समयसमय पर कानून बने, सरकारी योजनाओं की घोषणाएं की गईं लेकिन इन का ठीक तरीके से क्रियान्वयन नहीं हो पाया. दो, हमारी जातिपांति और भेदभाव की मानसिकता नहीं बदली है. जब तक समाज की मानसिकता नहीं बदल जाती तब तक न तो इस प्रथा को खत्म किया जा सकता है और न ही कानून और तमाम सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिल पाएगा. तीन, जातिपांति की इसी सामाजिक मानसिकता का लाभ राजनीतिक पार्टियां और नेता उठाते हैं. इस मानसिकता के चलते वे अपना वर्तमान व भविष्य चमकाने में लगे हुए हैं. दलित राजनीति के बल पर नेता केवल सत्ता ही नहीं हासिल करते हैं, बल्कि सत्ता पर काबिज होने के बाद अपनी मूर्तियां लगाने में लग जाते हैं. इस से दलितों का भला कहां हो पाता है. जाहिर है मानवता पर लगे इस धब्बे को मिटाने के लिए इस मुद्दे पर जमीनी स्तर पर ईमानदारी के साथ काम करने की जरूरत है.

1917 में महात्मा गांधी के निर्देश पर साबरमती आश्रम के निवासियों ने खुद अपने शौचालयों की सफाई की. इसीलिए मोदी सरकार ने 2 अक्तूबर, 2014 को 5 साल तक के लिए स्वच्छ भारत अभियान शुरू किया और इस में समाज के सभी स्तर के लोगों के सक्रिय सहयोग का प्रयास किया. लेकिन इस अभियान में कहीं भी सिर पर मैला ढोने वालों का कोई जिक्र नहीं है. यह अभियान केवल सफाई, शौचालय निर्माण और निकासी पर केंद्रित हो कर रह गया है. स्वच्छ भारत निर्माण अभियान के तहत इस अमानवीय प्रथा को भी शामिल किया जाना चाहिए. अगर मोदी सरकार की नीयत वाकई साफ है तो 5 साल क्या, अगले 2 साल में इस अमानवीय प्रथा को समूल खत्म किया जाना संभव है. वरना तो आजादी के 6 दशक के बाद भी हजारोंहजार परिवार समाज के निचले स्तर का जीवन जीने को मजबूर हैं. हां, यह प्रथा हमारे देश के लिए राष्ट्रीय लज्जा है. इसे खत्म होना ही चाहिए.

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