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सफा ने किया इरफान को बोल्ड, जल्द करेंगे निकाह

लंबे समय से टीम इंडिया में वापसी का इंतजार कर रहे ऑलराउंडर क्रिकेटर इरफान पठान फरवरी के दूसरे सप्ताह में निकाह कर सकते हैं. उनकी शादी बड़ौदा की सफा से तय हुई है. फैमिली से जुड़े करीबियों के मुताबिक, इरफान की फैमिली ने हाल में सूरत की एक ज्वैलरी शॉप से शॉपिंग भी की. निकाह बड़ौदा में ही होगा और डेट वेलेनटाइन डे के आसपास रखी गई है. इसी बीच, इरफान के पिता महमूद खान पठान और मां समीमबानो ने हाल ही में दुल्हन के लिए सूरत की ज्वैलरी शॉप से शॉपिंग की. बताया जा रहा है कि इरफान और सफा की फैमिली एक-दूसरे को काफी पहले से जानती हैं.

सीए से रह चुका है अफेयर…

आपको बता दें कि क्रिकेटर इरफान पठान ऑस्ट्रेलिया में रहने वाली सीए शिवांगी के साथ 6 साल रिलेश्नशिप में रहे. दोनों शादी भी करने वाले थे, लेकिन फैमिली तैयार नहीं थी. साल 2012-13 में इरफान पठान और शिवांगी की राहें जुदा हो गई.

2013 में यूसुफ पठान ने किया था निकाह

इरफान पठान के भाई यूसुफ ने 2013 में होली के दिन फिजियोथेरेपिस्ट आफरीन से निकाह किया था.

आईसीसी टेस्ट रैंकिंग में भारत फिर बना नंबर वन

इंग्लैंड की दक्षिण अफ्रीका पर चार मैचों की श्रृंखला में 2-1 से जीत के बाद भारत ने मंगलवार को लगभग साढ़े चार साल बाद फिर से टेस्ट क्रिकेट में नंबर एक स्थान हासिल किया. इससे पहले शीर्ष पर काबिज दक्षिण अफ्रीका ने सेंचुरियन में आखिर टेस्ट मैच में 280 रन से जीत दर्ज की लेकिन इससे उसकी टीम खुद को रैंकिंग तालिका में तीसरे स्थान पर खिसकने से नहीं बचा पायी.

भारत अब 110 अंक लेकर शीर्ष पर काबिज हो गया है. उसके बाद आस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका का नंबर आता है. पाकिस्तान चौथे, इंग्लैंड पांचवें, न्यूजीलैंड छठे, श्रीलंका सातवें, वेस्टइंडीज आठवें, बांग्लादेश नौवें और जिम्बाब्वे दसवें स्थान पर है. आईसीसी ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा है, ‘इंग्लैंड की दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 2-1 से जीत के बाद भारत टेस्ट रैंकिंग में आधिकारिक तौर पर नंबर एक बन गया.’

भारत अगस्त 2011 के बाद पहली बार टेस्ट रैंकिंग में नंबर एक पर पहुंचा है. वह पिछले साल दक्षिण अफ्रीका को अपनी सरजमीं पर 3-0 से हराने के बाद दूसरे स्थान पर पहुंचा था.

युवराज को पीछे छोड़ विराट-रैना ने तोड़ा 6 साल पुराना रिकॉर्ड

ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध वनडे सीरीज में बुरी तरह हार झेलने वाली भारतीय टीम ने 26 जनवरी को टी20 सीरीज का पहला मैच जीतकर शानदार आगाज किया है. इसी वर्ष भारत में होने जा रहे टी-20 वर्ल्ड कप से पहले यह गणतंत्र दिवस का शानदार तोहफा था. इस मैच में जीत के साथ ही कई रिकॉर्ड भी बने.

कोहली-रैना ने तोड़ा छह वर्ष पुराना रिकॉर्ड

अंतर्राष्ट्रीय टी-20 क्रिकेट में भारतीय टीम की ओर से तीसरे विकेट के लिए सबसे बड़ी साझेदारी (134 रन) का रिकॉर्ड अब विराट कोहली और सुरेश रैना के नाम हो गया है, इससे पहले यह रिकॉर्ड युवराज सिंह और सुरेश रैना के नाम था, जिन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 2 मई 2010 को खेले गए मैच में 88 रनों की साझेदारी की थी.

टी-20 में भारत की ओर से तीसरी बड़ी साझेदारी

कोहली-रैना की यह साझेदारी भारती की तरफ से अंतर्राष्ट्रीय टी-20 क्रिकेट में किसी भी विकेट के लिए तीसरी बड़ साझेदारी है. इस लिस्ट में कोहली-रोहित शर्मा 138 रनों के साथ सबसे आगे है, उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 2 अक्टूबर 2015 को दूसरे विकेट के लिए 138 रन जोड़े थे. वहीं दूसरे नंबर पर वीरेन्द्र सहवाग और गौतम गंभीर हैं, जिन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ 19 सितंबर 2007 को पहले विकेट के लिए 136 रन जोड़े थे.

कोहली की टी-20की टॉप पारी

विराट कोहली ने 55 गेंदों में 90 रनों की तेज तर्रार पारी खेली जो उनका सर्वोच्च स्कोर है. कोहली ने अपनी इस पारी में 9 चौके और दो छक्के लगाए. इस पारी के लिए कोहली को मैन ऑफ द मैच से नवाजा गया. यह उनके करियर का 10वां अर्धशतक भी था.

टी-20 में रैना बने एक हजारी

टी-20 के बेहतरीन बल्लेबाज सुरेश रैना ने अंतर्राष्ट्रीय टी-20 क्रिकेट में एक हजार रन पूरे कर लिए हैं, ऐसा करने वाले वे विराट कोहली (1106 रन) के बाद दूसरे भारतीय बल्लेबाज हैं. ऑस्ट्रेलिया के विरुद्ध  खेली गई 41 रनों की पारी के दौरान रैना ने यह उपलब्धि प्राप्त की, अब उनके खाते में 1024 रन हो गए हैं. रैना अब तक अंतरराष्ट्रीय टी-20 करियर में एक शतक और तीन अर्धशतक लगा चुके हैं.

राकेश ओमप्रकाश मेहरा क्यों बना रहे हैं ‘मिर्जिया’..?

सामाजिक सरोकार के पैरवीकार माने जाने वाले फिल्मकार राकेश ओमप्रकाश मेहरा ने 2006 में ‘‘रंग दे बसंती’’ जैसी फिल्म बनाकर हलचल मचा दी थी. उसके बाद से वह लगातार सामाजिक मुद्दों को उकेरने वाली फिल्में ही बनाते रहे हैं. अब जबकि उनकी फिल्म ‘‘रंग दे बसंती’’ के रिलीज को दस साल पूरे हो गए हैं, तो वह सामाजिक चेतना की बात को परे रखकर प्रेम कहानी वाली फिल्म ‘‘मिर्जिया’’ लेकर आ रहे हैं. जिसमें अनिल कपूर का बेटा और सोनम कपूर का भाई हर्षवर्धन कपूर हीरो है. तो क्या राकेश ओम प्रकाश मेहरा की सोच में बदलाव का यह परिणाम है?

वैसे फिल्मकार मेहरा खुद इसे सोच का बदलाव नहीं मानते हैं. वह कहते हैं-‘‘मैंने हमेशा अपनी हर फिल्म में किसी न किसी सवाल या मुद्दे का जवाब तलाशने की कोशिश की. मेरी फिल्में ‘रंग दे बसंती’, ‘दिल्ली 6’ और ‘भाग मिल्खा भाग’ ’त्रियोलाजी थी. तीन फिल्मों की श्रृंखला थी. इन तीनों में मैं कुछ खोज रहा था, जिसका जवाब मुझे मिला. ‘रंग दे बसंती’ में करप्शन के मुद्दे को लेकर, युवा बैठकर सरकार को कोसने की बजाय खुद सड़क पर निकलता है. इसमें यह बात उभरी थी कि सिर्फ बैठे न रहे, मुद्दे हल भी करे. ‘दिल्ली 6’ में जांत पांत और हिंदू मुस्लिम को लेकर जो असहिष्णुता की बात हो रही थी, उसका आइना दिखाने का मौका मिला. ‘भाग मिल्खा भाग’में मुझे यह जवाब मिला कि असली लड़ाई हमारी अपनी आंतरिक है. हमें अपने आपको बदलना व उठाना है. यदि हम सभी इस बात को समझकर खुद को बदलने लगें, तो सब कुछ संभव है. अब मैं अपनी नई फिल्म ‘मिर्जिया’ में प्यार के मायने क्या हैं, उसे तलाश रहा हॅूं. इस फिल्म से मैं प्रेम को लेकर लोगो की सोच व समझ में आए बदलाव को समझने का प्रयास कर रहा हूं. प्रेम का भी समाज से गहरा संबंध है. तो मैं आज भी समाज व देश से जुड़ी बात ही करने जा रहा हूं.’’

फिल्म ‘‘रंग दे बसंती’’ में तो मंत्री पर गोली चलवा दी गयी थी? इस पर मेहरा कहते हैं-‘‘आज दस साल बाद मेरी यह फिल्म ज्यादा मायने रखती है. देखिए, हम इतिहास को भूलकर अपनी गलतियों को दोहराते हैं, जिसकी हम बहुत बड़ी कीमत चुकाते हैं. इतिहास भी कमाल की चीज है. कई बार इसका पुनः लेखन होता है. जैसे जैसे विचार व आईडियोलॉजी बदलती है, वैसे वैसे इतिहास में भी बदलाव किया जाता रहा है. जब हमने फिल्म ‘रंग दे बसंती’ बनाने जा रहे थे, उस वक्त मुझे 1916 से 1937 तक जो आम आजादी का आंदोलन शुरू हुआ था, उसकी याद आयी थी. आजादी के इस आंदोलन में युवा वर्ग शामिल था. जिनकी सोच यह थी कि हमें आजादी सिर्फ अंग्रेजों से नहीं चाहिए, बल्कि आजादी एक इंसान से दूसरे इंसान के शोषण खत्म को करने की चाहिए. हम खुद के गुलाम न बने. कोई बाहर से आकर आपकी मातृभूमि का बलात्कार करे या खुद अपनी जननी यानी कि मातृभूमि का बलात्कार करे, यह गलत ..मैने उसी सोच को लिया और सोचा कि यदि आज भगत सिंह या राजगुरू होते, तो क्या करते, तो फिल्म के क्लायमेक्स में फिल्म का किरदार करण सिंह अपने आपको गोली से मार देता है. फिल्म रिलीज हुई. दस साल हो गए. इन दस वर्षों में हजारों घटनाक्रम हुए, जब युवा पीढ़ी ने बंदूक नहीं उठाई, बल्कि मोमबत्तियां जलाकर शांति मार्च निकाला. किसी युवक ने हाथ में बंदूक नहीं उठायी. वह समझदार है. अंततः हम शांतिप्रिय लोग हैं.’’

राकेश ओमप्रकाश मेहरा आगे कहते हैं-‘‘हमारी फिल्म ‘रंग दे बसंती’ के प्रदर्शन के बाद पार्लियामेंट में एक कानून में बदलाव किया गया. कई ग्रुप बने. जेसिका लाल कांड, मट्टू कांड से लेकर कैंडल मार्च वगैरह बहुत कुछ है. पर मैं यह नहीं कहूंगा कि यह सब ‘रंग दे बसंती’ का असर है, पर यह जरुर कहूंगा कि कहीं न कहीं यह फिल्म इन घटनाक्रमों के पीछे कैटेलिस्ट रही. इंसान को एक इशारे की जरूरत होती हैं. मुझे लगता है कि हमारी फिल्म ने इशारा किया था. पर उसका श्रेय मैं नही लूंगा. वह सब तो लोंगो के उपर हैं.’’

बौलीवुड में नया इतिहास रच रही हैं मावरा होकाने

बौलीवुड से पाकिस्तानी अभिनेत्रियों व अभिनेताओं का जुड़ना आम बात है. अब तक कई पाकिस्तानी कलाकार बौलीवुड में अपनी किस्मत आजमा चुके हैं. पर वह दोनों देशों में खास लोकप्रियता नहीं बटोर सके. हां! 1980 में पाकिस्तानी अभिनेत्री जेबा बख्तियार ने जरुर दोनो देशों में शोहरत पाने का एक रिकार्ड बनाया था. अब जेबा बख्तियार की बराबरी करने के साथ ही उनके रिकार्ड को तोड़कर बौलीवुड में नया इतिहास रचने का काम कर रही हैं पाकिस्तानी अभिनेत्री मावरा होकाने.

मावरा होकाने पहली पाकिस्तानी अदाकारा हैं, जो कि महज 22 साल की उम्र में 14 पाकिस्तानी सीरियलों, वह भी दो साल के अंदर तीन इंटरनेशनल सीरियलों में अभिनय कर जबरदस्त शोहरत बटोरने के  बाद बौलीवुड में भी सुर्खियां बटोर रही हैं. मावरा होकाने इन दिनों पांच फरवरी को प्रदर्शित होने वाली विनय सप्रू और राधिका राव निर्देर्शित तथा इरोज इंटरनेशनल निर्मित फिल्म ‘‘सनम तेरी कसम’’ में हर्षवर्धन राणे के साथ एक संजीदा किरदार निभाने की वजह से चर्चा में हैं.

आखिर मावरा होकाने को इतनी कम उम्र में इतनी शोहरत कैसे मिल रही है? इस बारे में खुद मावरा कहती हैं-‘‘मुझे लगता है कि हर इंसान की अपनी जिंदगी को लेकर अपनी एक अलग अप्रोच होती है. मुझे लगता है कि मेरी सकारात्मक सोच मुझे फायदा देती है. यदि मैं यह सोचने लगूं कि लोग मेरी आलोचना करेंगे, मुझे उनका प्यार नहीं मिलेगा, तो शायद एक सप्ताह में मुझे प्यार मिलना बंद हो जाएगा. मुझे लगता है कि आप जिस तरह से सोचते हैं, उसी तरह से फल आप पाते हैं. मैंने बचपन से प्यार ही मांगा. मैने 22 साल की उम्र में जितना प्यार कमाया है, वह इसलिए कमाया, क्योंकि मेरा प्यार में यकीन रहा है.मैं अपने यकीन को बदलना नहीं चाहती.

मुझसे पहले इतनी शोहरत, इतना प्यार किसी भी पाकिस्तानी अभिनेत्री को नहीं मिला. अभी से भारतीय दर्शकों के बीच जिस तरह से मुझे स्वीकार किया जा रहा है, उतनी स्वीकरोक्ति किसी भी पाकिस्तानी अभिनेत्री को नहीं मिली. मेरी यह अनकंडिशनल यात्रा रही है. मुझसे पहले पाकिस्तानी अभिनेत्री जेबा बख्तियार को भारतीयों ने प्यार दिया था. यह तीस साल पहले की बात है. उन्होने 1980 में ‘हीना’ फिल्म की थी. अब मैं चाहती हॅू कि मैं एक नया उदाहरण पेश कर सकूं. मेरे लिए यह संभव है.क्योंकि अल्लाह ने मुझे पहली ही फिल्म में मेरे निर्माता, निर्देशक लेखक व सह कलाकार के रूप में हीरे परोसकर दिए हैं. मुझे अब तक कोई समस्या नहीं हुई.’’

मगर तीस साल के दौरान किसी भी पाकिस्तानी अभिनेत्री को आप जैसी सफलता न मिलने की वजह या रही? इस बारे में मावरा ने कहा-‘‘वजह तो मैं नहीं जानती.पर मैं तो ईश्वर कि बहुत चहेती लड़की हूं. मेरी जिंदगी में हमेशा वह सब हो जाता है, जो दूसरों की जिंदगी में मैंने कभी नहीं देखा. मेरी किस्मत कमाल की है. हां मुझे जिंदगी में आगे बढ़ना और मेहनत करना अच्छा लगता है. मुझे लगता है कि मुझसे पहले जो अभिनेत्रियां आयी,उनमें जेबा बख्तियार को छोड़कर सभी काफी उम्र होने के बाद आयी. सभी अभिनेत्रियां मुझसे आठ दस साल बड़ी रही है.’’

विन राणा लाएंगे इंडोनेशियन दुल्हन

सीरियल ‘‘महाभारत’’ में नकुल का किरदार निभा चुके अभिनेता विन राणा 22 फरवरी को इंडोनेशियन मॉडल, अभिनेत्री और ‘‘इंडोनेशियन ब्यूटी पीजेंट’’ विजेता नीता सोफियानी संग विवाह करने वाले हैं. सूत्रों की माने तो एक सीरियल की शूटिंग के सिलसिले में छह माह तक इंडोनेशिया में रहने के दौरान ही विन राणा और नीता सोफियानी एक दूसरे के करीब आ गए थे.

सूत्रों के अनुसार इंडोनेशिया में एक सीरियल की शूटिंग एक साथ करते करते दोनों के बीच प्यार हो गया. और फिर दोनों ने शादी करने का निर्णय ले लिया. लेकिन नीता सोफियानी के माता पिता उसकी शादी एक दूसरे देश और दूसरी संस्कृति से संबंध रखने वाले युवक विन राणा के साथ करने को हिचकिचा रहे थे. मगर अंततः विन राणा के प्यार की जीत हुई.

सूत्रों की माने तो विन राणा तथा नीता सोफियानी के परिवार के लोगों ने आपस में विचार विमर्श करके 22 फरवरी को दिल्ली में बाकायदा हिंदू रीति रिवाज से शादी को संपन्न करने का निर्णय लिया है. यूं तो विन राणा अभी भी इंडोनेशिया में है. मगर विन राणा के नजदीक लोगों की माने तो इस शादी में विन राणा और नीता सोफियानी के पारिवारिक सदस्य व कुछ खास दोस्त ही मौजूद रहेंगे.

सैन फ्रांसिस्को की तैयारी में गौतम गुलाटी

‘‘बिग बास’’ सीजन आठ के विजेता रहे गौतम गुलाटी छोटे परदे के साथ साथ बड़े परदे पर भी व्यस्त है. यूं तो गौतम गुलाटी ने अपने करयिर की शुरूआत छोटे परदे पर एकता कपूर के सीरियल ‘‘कहानी हमारे महाभारत की’’ में दुर्योधन का किरदार निभाकर की थी. पर उन्हें पहचान मिली सीरियल ‘‘दिया और बाती हम’’ में अभिनय करने से. उसके बाद वह ‘बिग बास सीजन 8’ के विजेता बने. इन दिनों वह एमटीवी के शो ‘बिग एफ’ के संचालक के तौर पर भी काफी शोहरत बटोर रहे हैं तो दूसरी तरफ हाल ही में उन्होने फिल्म ‘अजहर’ में क्रिकेटर रवि शास्त्री का किरदार निभाया है. पर इन सबसे परे वह एक लघु फिल्म ‘‘डरपोक’’ का निर्माण व इसमें अभिनय कर अंतरराष्ट्रीय ख्याति बटोर रहे हैं.

गौतम गुलाटी की लघु फिल्म ‘‘डरपोक’’ को ‘‘कान इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल’’ सहित कई अंतरराष्ट्री फिल्म समारोहों में  काफी सराहा जा चुका है. अब खबर है  कि उनकी लघु फिल्म को जुलाई माह में सैन फ्रांसिस्को में संपन्न होने वाले विश्व फिल्म समारोह में प्रदर्शित की जाने वाली है. इस फिल्म समारोह में अपनी फिल्म ‘‘डरपोक’’ के साथ हिस्सा बनने के लिए गौतम गुलाटी अब सैन फ्रांसिस्को जाने की तैयारी कर रहे हैं.

हिंदू राष्ट्र की कल्पना

सत्ता में आने के बाद से ही नहीं, सत्ता में आने से बहुत पहले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभिन्न घटकों के नेता एक ऐसे राष्ट्र की कल्पना करते रहते थे जहां सुख, चैन, अमन, शांति, प्रगति हो. यह सपना लगभग हर देश के राजनीतिक विचारकों का रहा है और इस के ग्राहक भी बहुत रहे हैं जो कल की पीढि़यों को सपनों का संसार देने के लिए वर्तमान को न्यौछावर करने को तैयार थे और अंतिम बलिदान, मृत्यु को भी गले लगाने को तैयार थे. जो पूरी तरह व्यावहारिक राजनीति से परिचित नहीं थे उन की तो छोडि़ए जो जानते हैं और समझते हैं कि आज तक इस प्रकार का यूरोपियन, काल्पनिक, समाज या राष्ट्र नहीं बन पाया है, संघ के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाने को तैयार रहे हैं और जब उन के पास सत्ता है, मजबूती है, फैसले लेने की शक्ति है, इस प्रयोग को करने में आमादा हैं.

संघ जिस वाद की वकालत करता है उसे वह राष्ट्रवाद के चोले में छिपा कर रखता है क्योंकि वह असल में हिंदू राष्ट्र है जिस पर भारतीय राष्ट्रवाद का लेप लगा है. यह हिंदू राष्ट्रवाद भी 80 प्रतिशत जनता का अपना नहीं है भले ही 80 प्रतिशत जनता अपने को हिंदू मानती हो. यह पौराणिक हिंदूवाद है जिस में असली शक्ति स्मृतियों के अनुसार ऋषिमुनियों, राजपुरोहितों के पास हो, जो शास्त्रों का मनन मात्र करते हों और उन का कल्याण से अर्थ भजनवाद या तपस्या करना भर हो. ये वे लोग थे जो आमतौर पर हथियार नहीं उठाते थे, व्यापार नहीं करते थे, खेती नहीं करते थे. इन की चाह थी कि राजा या शासक कैसे भी इन्हें आश्रमों में मुफ्त बिना काम किए रहने की इजाजत व सुविधा दे और जनता को दान सहित आदर देने को मजबूर करे.

ऐसा नहीं कि इस प्रकार का वर्ग दूसरे समाजों में नहीं रहा. लगभग सभी समाजों का गठन ऐसा ही रहा है और आज के आधुनिक औद्योगिक तार्किक समाज में यह वर्ग अब लैपटौपों के पीछे जमा हो गया है. यह केवल पुस्तकें पढ़ कर, सौफ्टवेयर प्रोग्राम बना कर, शासन चलाने के कानून बना कर, कानूनों की व्याख्या कर के, अपने विचारों को प्रकट कर के और पुस्तकें लिख कर या पावर पौइंट प्रैजेंटेशन दे कर समाज को हाथों पर रखता है और अफसोस यह है कि आम जनता हर देश में अपने को इन्हीं के हाथों सुरक्षित समझती है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यूरोप के देशों के चर्चों, चीन की कम्युनिस्ट पार्टी, इसलामी देशों के इमामों की तरह संकीर्ण राष्ट्रवाद को आगे रखता है ताकि देशभक्ति के नाम पर धर्मभक्ति, पार्टीभक्ति या विचारभक्ति को जबरन गले उतारा जा सके.

आम नागरिक जो कर रहा है या जो उस से करवाया जा रहा है या उस से जो छीना जा रहा है या उस पर जो नियंत्रण लगाए जा रहे हैं वे राष्ट्रहित के लिए हैं, यह कह कर उस के प्राकृतिक नैसर्गिक विरोध को दबा दिया जाता है और उसे राष्ट्र के लिए त्याग कर लिया जाता है.

आज देश में संघ छोटेछोटे प्रयोग कर के इस राष्ट्रवाद की नई परिभाषा लिखने की कोशिश कर रहा है. जैनियों के पर्व के दिनों मांस न खाना, फिल्म संस्थान में संघ विचारधारा के लोगों को लायक, स्वच्छ भारत का आंदोलन चलाना, योग को राष्ट्रीय पर्व सा मानना उस वृहत राष्ट्रवाद को थोपना है जो आमतौर पर जनता के गले नहीं उतरता पर कल अच्छा होगा, भारत दुनिया का सब से समृद्ध देश होगा, हिंदू का सम्मान होगा आदि का सपना दिखा कर उसे पटरी पर लाया जा रहा है.

किसी भी तरह के राष्ट्रवाद को थोपने के लिए छोटेछोटे कदम उठाने पड़ते हैं. प्रवर्तक की किताब के प्रति अंधश्रद्धा, एक प्रतीक का गले पर पहनना, एक झंडा अपनाना, खास तरह का पहरावा, किसी विशेष दिन को पर्व की तरह अपनाना राष्ट्रवाद को हरदम मस्तिष्क में रखने के लिए इस्तेमाल किए जाते हैं. राष्ट्रवाद के विरोधियों को छांटने के लिए भी प्रतीकों का इस्तेमाल करना होता है. जरमनी ने यहूदियों को स्टार औफ डेविड कपड़ों पर लगाने का हुक्म दिया. भारत में दलितों को झाड़ू बांध कर चलने का हुक्म था. आजकल मांस पर प्रतिबंध लगवाया जा रहा है. यह हिंदू शासक द्वारा अल्पसंख्यक जैनियों के कहने पर करा गया पर असली निशाना मुसलमान हैं.

भारत में अब धार्मिक पर्व जोरशोर से मनवाए जा रहे हैं. गणेश, दुर्गा, छठ, दशहरा, दीवाली को प्रतीक का रूप दे दिया गया है ताकि दूसरे धर्मों से अपनों को अलगथलग करा जा सके. संस्कृत का किसी भी सभा के प्रारंभ में पाठ करा कर बारबार श्रेष्ठता की गुणवत्ता थोपी जा रही है. चीन ने इस बार कम्युनिस्ट धर्म छोड़ने के लिए 1 अक्तूबर की जगह 3 सितंबर को सैनिक परेड की जो चीन की जापान पर विजय का दिवस है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू राष्ट्रवाद को सर्वग्रहित नहीं बना पा रहा. उस ने हर जाति को अपनेअपने देवता पकड़ा दिए हैं. संघ के नेता हर जाति के त्यौहारों में उपस्थित रहते हैं पर खुद नहीं मनाते. उन के लिए जाति व वर्णवाद राष्ट्रवाद का हिस्सा हैं और यह अभी तो जातियों और वर्णों को खल नहीं रहा पर फिर इन्हें ही संघ के अपने राष्ट्रवाद के लिए इस्तेमाल करेंगे.

कठिनाई यह है कि दुनिया भर में जब भी ऐसा राष्ट्रवाद थोपा गया है, विध्वंस हुआ है. सपनों के संसार से पहले वास्तविक संसार टूट कर बिखर गया. नाजी जरमनी के जमाने में यहूदियों या अल्पसंख्यकों ने ही कहर नहीं झेला, वे जरमन भी जो हिटलर की नहीं मानते थे, राष्ट्रद्रोही करार कर मार दिए गए, तड़पातड़पा कर. लेनिन और स्टालिन ने यही किया. चीन में माओ ने यही किया. क्यूबा के फीडेल कास्त्रो ने ऐसा ही किया. इसलामिक देशों में यही हुआ. तालिबानी, अलकायदाई और अब इसलामिक स्टेट सब एक राष्ट्रवाद का सपना देख रहे हैं जिस से स्वर्ग का रास्ता मिलेगा और इन सब की वजह से लाखों नहीं करोड़ों की जानें गईं या करोड़ों को घर छोड़ना पड़ा.

हिंदू राष्ट्रवाद का सपना देखते हुए संघ के प्रवर्तक देशहित की सोच रहे हैं. वे व्यावहारिक नहीं हैं, वे यह सोच ही नहीं सकते. वे जिस हिंदू प्रणाली में विश्वास रखते हैं, वह घुन खाई है जिस ने समाज को सैकड़ों टुकड़ों में बांट रखा है और आज हर टुकड़ा अपनी स्वतंत्रता फिर मांग रहा है, यह संघ के विचारक नहीं सोच पा रहे हैं.

इसलामी शासकों के दौरान जब धर्म परिवर्तन का मौका मिला तो यही टुकड़े अलग हो गए. आज ये टुकड़े फिर बेचैन हैं क्योंकि संघ के राष्ट्रवाद को 20 साल हांकने के बाद भी उन्हें लग रहा है कि उन्हें रथ पर बैठने नहीं दिया जा रहा. हार्दिक पटेल इसी का नमूना है. संघ हार्दिक पटेल को इसी तरह निष्क्रिय कर देगा जैसे उस ने रामविलास पासवान, उदित राज या जीतन राम मांझी को किया है पर नीतीश कुमार जैसे विद्रोही स्वर फिर उठते रहेंगे और वर्णीय संघर्ष वर्णों के आपसी समागम में राष्ट्रवाद की चाशनी में विलय हो कर समाप्त होने के बजाय इस सड़ी चाशनी, मोलासिस, में मोटी गांठें बन कर उसे प्रोसेस होने से भी रोक देगा.

आज जरूरत संकीर्ण राष्ट्रवाद की नहीं है. चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग चीन कम्युनिज्म की जगह चीनी राष्ट्रवाद के सहारे असंतोष पर काबू पाने की कोशिश कर रहे हैं. पुतिन रूस में सोवियती सपना साकार करने के लिए यूक्रेन में फौजों का परीक्षण कर रहे हैं. यूरोप के देश यूरोपियन यूनियन को तोड़ कर छोटे देशों के राष्ट्रवाद को फिर पनपाना चाह रहे हैं. अमेरिका में गोरे, प्रोटैस्टैंट कालों, लेटिनों से ऊपर सामाजिक गठन की पुनर्कल्पना कर रहे हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदू पर्वों के सहारे राष्ट्रवाद का नया संस्करण देश को स्वीकार कराने के चक्कर में है.

ये सब प्रयोग भयंकर सामाजिक संघर्ष पैदा करेंगे. शुरुआत हो चुकी है, बहुमतीय, बहुदलीय, बहुविचारणीय लोकतंत्र, स्वतंत्र मीडिया, पहले से ज्यादा जागरूक जनता, आधुनिक तकलीफ इस संकीर्ण राष्ट्रवाद के इबोला और डेंगू जैसे वायरस से बचा पाएगी या नहीं या विश्वयुद्धों की तरह महायुद्धों, जिन में गृहयुद्ध शामिल होंगे, में दुनिया को धकेलेगी यह आज नहीं कहा जा सकता पर आज तो आसार आंधी के आने के हैं, सपनों के काल्पनिक संसार के आने के नहीं.

इलाहाबाद: शिक्षा और साहित्य की राजधानी

ऐतिहासिक शहर इलाहाबाद को शिक्षा और साहित्य की राजधानी कहें तो यह अतिशयोक्ति न होगा. इस शहर से नेहरू खानदान का नाम जुड़ा है जिस ने देश को 3 प्रधानमंत्री दिए हैं.

इलाहाबाद शहर का मशहूर चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपने यात्रा वृत्तांत में जिक्र किया है. इसे पहले प्रयाग नाम से जाना जाता था. समूचे उत्तर प्रदेश से ही नहीं बल्कि देशभर से छात्र पढ़ने के लिए यहां आते हैं. यहां इलाहाबाद विश्वविद्यालय के अलावा मोतीलाल नेहरू रीजनल इंजीनियरिंग कालिज, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ रूरल टैक्नोलाजी और राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन मुक्त विश्वविद्यालय शिक्षा के बड़े संस्थान हैं. शाह आलम और क्लाइव लायड के बीच हुई ऐतिहासिक संधि के लिए भी यह शहर जाना जाता है. संगम इलाहाबाद के आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र है.

दर्शनीय स्थल

इलाहाबाद का किला : इस का निर्माण अकबर ने 1583 में यमुना के तट पर करवाया था. इस किले की खासियत इस की संरचना और शिल्पकारी है. इस विशाल और भव्य किले में 3 गैलरियां हैं जो ऊंची मीनारों के सहारे टिकी हैं. यहां पर सरस्वती कूप, अशोक स्तंभ और जोधाबाई का रंगमहल भी देखा जा सकता है. किले के सामने जो अशोक स्तंभ बना है उस के बारे में कहा जाता है कि लार्ड कर्जन द्वारा कहीं और से ला कर इस को यहां पर स्थापित किया गया था.

खुसरो बाग : इलाहाबाद रेलवे स्टेशन से कुछ कदमों की दूरी पर यह बाग स्थित है. इस को जहांगीर के पुत्र अमीर खुसरो ने बनवाया था. लकड़ी के विशाल दरवाजों वाला खुसरो बाग पत्थरों की दीवारों से घिरा है. यह मुगलकालीन कला का एक जीवंत उदाहरण है. इस बाग में अमीर खुसरो व उस की बहन सुलतानुन्निसा की कब्रों पर बना एक मकबरा भी है.

इलाहाबाद संग्रहालय : यह संग्रहालय कमला नेहरू रोड पर चंद्रशेखर आजाद पार्क के पास स्थित है. यहां कच्ची मिट्टी की अद्भुत मूर्तियों और शिल्प के विविध नमूनों, निकोलस रोरिच की पेंटिंग्स, राजस्थानी लघुचित्रों की वजह से पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है. कौशांबी की खुदाई में मिली ऐतिहासिक वस्तुओं को भी यहीं रखा गया है. ऐतिहासिक जानकारी हासिल करने के लिए छात्र इस संग्रहालय में आते हैं. इस संग्रहालय में 8 गैलरियां हैं. यह रविवार को छोड़ कर हर दिन सुबह 10 से शाम 5 बजे तक खुला रहता है.

जवाहर प्लेनिटोरियम : विज्ञान से संबंधित रहस्यमय संसार को जानने के लिए यह उपयुक्त स्थान है. यहां आप ग्रहों व नक्षत्रों से संबंधित अद्भुत खगोलीय जानकारियों से रूबरू होंगे.

संगम : 3 नदियों के संगम तट पर ज्यादातर लोग स्नान करने आते हैं. इस स्नान को धर्म की मान्यता मिलने के कारण यहां भिखारियों से अधिक पंडों की भीड़ है जो सैलानियों को तरहतरह से ठगने की कोशिश करते हैं. यहां आने वालों को चाहिए कि वे पंडों के बहकावे में न आएं और पूजापाठ करवाने से बचें.

‘सिंगल हैं पर कमजोर नहीं’

दुनिया में अकेली औरतों की संख्या बढती ही जा रही है. घरेलू हिंसा की बढती घटनाओं और आत्मनिर्भर बनने की चाह में आंकडे बताते है कि करीब 7 करोड महिलायें अकेली रहती हैं. बीते 10 सालों में यह आंकडे 39 फीसदी तक बढ गये है. 2001 में यह संख्या 5 करोड के आसपास थी. 1990 में लडकियो की शादी की औसत उम्र 19 साल थी जो 2011 में बढ कर 21 साल हो गई है. अकेली रहने वाली ज्यादातर लडकियां 25 से 29 आयु वर्ग की है. देश के भीतर के आंकडों को देखे तो उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक महिलाये अकेली रह रही है. इनकी संख्या करीब 1 करोड 20 लाख है. 62 लाख महिलायें महाराष्ट्र में और 47 लाख आंध्र प्रदेश में है. अकेली महिलाओं की बढती संख्या से अब इनको सामाजिक सुरक्षा और मान्यता भी मिलने लगी है. इनके मान सम्मान और अधिकार के लिये लोग जागरूक हो रहे है.

24 जनवरी को राष्ट्रीय बालिका दिवस के मौके पर उत्तर प्रदेश की राजधनी लखनऊ में उत्तर प्रदेश महिला सम्मान प्रकोष्ठ के कार्यालय से एक मार्चपास्ट निकाला गया. जिसकी अगुवाई महिला सम्मान प्रकोष्ठ की प्रमुख एडीजी पुलिस सुतापा सन्याल ने किया. अंश वेलफेयर फांउडेशन द्वारा आयोजित रैली में महिलायें ‘सिंगल है कमजोर नहीं’ का नारा लगाते चल रही थी. मार्चपास्ट में महिला आयोग की सदस्य श्वेता सिंह, महिला सम्मान प्रकोष्ठ की साध्ना सिंह और सत्या सिंह, अंश वेलपफेयर की श्रद्वा सक्सेना, ममता सिंह, रीता सिंह और अनूप घोष इनरव्हील क्लब गोमती की अपर्णा मिश्रा सहित बहुत सारी महिलाओं ने हिस्सा लिया. इस मौके पर अकेली महिलाओं के लिये काम करने वाली महिलाओं को सम्मानित भी किया गया.

मार्चपास्ट के उद्देश्य पर बात करते अंश वेलपफेयर फांउडेशन की श्रद्वा सक्सेना ने कहा ‘समाज में अकेली औरतों की संख्या बढती जा रही है. कई बार इस तरह की महिलाओं को कमजोर मानकर उनका हक मारा जाता है. हम चाहते है कि यह महिलायें खुद में कमजोर न रहे.यह खुद में आत्मनिर्भर बनी रहेगी तो समाज भी इनका साथ देगा. हम समाज के लडने की नहीं उसके साथ अच्छे से रहने और एक दूसरे की भावनाओं को समझने पर जोर दे रहे है.जिससे अकेली रहने वाली महिला को कमजोर न समझा जाये.कई बार कमजोर समझ कर समाज ऐसी महिलाओं की उपेक्षा करता है.समाज की उपेक्षा से अकेली रहने वाली महिलायें कमजोर न हो ऐसा हमारा प्रयास होगा.समाज को भी इस तरह अकेली महिलाओं की मदद करनी चाहिये.’

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