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अच्छे हैं भैया, करीबी डुबा रहे नैया

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को प्रदेश के लोग प्यार से भैया कहते है. मुख्यमंत्री के समर्थक ही नहीं विरोधी तक उनके अच्छे स्वभाव की तारीफ दिल खोलकर करते है. इसके बाद भी सरकार की छवि जनता के बीच अच्छी नहीं बन पा रही है. प्रदेश में रहने वाले ज्यादातर लोग मानते है कि अखिलेश यादव अच्छे आदमी है पर उनके करीबी नेता, अफसर उनको सही बात सुनने और समझने का मौका नहीं देते है. ऐसे नेता और अफसर मुख्यमंत्री को यह समझाने में सफल हो रहे है कि पूरे प्रदेश में चारो तरफ उनकी जय जयकार हो रही है. मुख्यमंत्री के करीबी लोगों के ऐसे व्यवहार से प्रदेश की जनता ही नहीं खुद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के पिता और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अघ्यक्ष मुलायम सिंह यादव भी परेशान दिखते है.

मुलायम सिंह यादव कई बार मंच से खुलेआम ऐसी बातें कह चुके है. अखिलेश यादव कहते है नेता जी पार्टी के संरक्षक है उनको आलोचना का पूरा हक है. मुख्यमंत्री अगर एक बार अपने करीबी अपफसरों और नेताओं से हकीकत समझ लेते तो पता चलता कि जनता में उनके स्वभाव की छवि भले ही अच्छी हो पर उनके कामकाज से कोई खुश नहीं है. इसका बडा कारण मुख्यमंत्री अखिलेश यादव नहीं उनके करीबी नेता और अपफसर है.

लखनऊ के विक्रमादित्य मार्ग स्थित समाजवादी पार्टी ने कार्यालय समाजवादी नेता कर्पूरी ठाकुर की जयंती समारोह में बोलते हुये मुलायम सिंह यादव ने कहा कि कुछ मंत्री सिर्फ पैसा कमा रहे है. कई मंत्री तो सुधर गये हैं पर कई अभी बाकी हैं. मुलायम सिह यादव ने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री को चुगलखोरों से होशियार रहना चाहिये. राजनीति में सुननी सबकी चाहिये पर  सबकी सुनकर जो सही हो वही करना चाहिये. मुलायम सिंह यादव सरकार बनने के समय से यह कह रहे है कि महिला नेताओं को पार्टी में आगे लाना चाहिये. वह सभी स्थल पर पीछे बैठी महिलाओं को देखकर नाराजगी जताते हुये बोले इनको पीछे क्यों बैठाया? अखिलेश मंत्रीमंडल में केवल 2 ही महिलायें मंत्री है. मुलायम पार्टी के कार्यकर्ताओं से मिलते हैं और उनसे सच बात कहने को कहते है. ऐसे में कार्यकर्ता जो बताते हैं उससे मुलायम को निराशा और दुख होता है. यह पीडा वह कई बार व्यक्त कर चुके है.

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव पिता मुलायम की बात से इत्तेफाक तो रखते हैं पर उस पर अमल नहीं करते. मुख्यमंत्री तक जनता की कोई पहुंच नहीं है. जो लोग उन तक पहुंचते हैं वह मुख्यमंत्री को सच्चाई बताने की जगह पर तारीफ करते है. पार्टी और सरकार दोनो ही स्तर पर मुख्यमंत्री तक पहुंच रखने वाले लोग जनता के स्वर को मुख्यमंत्री तक पहुचने नहीं देना चाहते. मुख्यमंत्री से मिलना उनसे अपनी परेशानी कहना सरल नहीं रह गया है.

लखीमपुर खीरी जिले में 3 लडकियों का अपहरण होता है. फिरौती में 50 लाख रूपये मांगे जाते है. पीडित परिवार 5 लाख की फिरौती देकर अपनी लडकियों को छुडाता है. पुलिस तब सक्रिय होती है जब मुख्यमंत्री को इस घटना की जानकारी होती है. अफसर और मंत्री मोबाइल के अपने सीयूजी फोन खुद नहीं उठाते. ऐसे में कैसे जनता परेशानी कहेगी यह सोचने वाली बात है.

छुक छुक चलती रेलगाड़ियों में छेड़खानी

17 जनवरी की सर्द रात में कटिहार रेलवे स्टेशन से डिब्रूगढ-नई दिल्ली राजधनी एक्सप्रेस खुली तो ट्रेन के अंदर का महौल काफी गर्म हो गया. जोकीहाट के जदयू विधायक सरफराज आलम बगैर टिकट के ट्रेन में सवार हो गए और एक महिला मुसाफिर के साथ छेड़खानी करने लगे. ट्रेन जब पटना जंक्शन पर पहुंची तो दिल्ली के वीरेंद्र नगर के रहने वाले इंद्रपाल सिंह बेदी ने रेलवे थाने में शिकायत दर्ज कराई कि विधायक ने उनके और उनकी बीबी रूपसी बेदी के साथ बदसलूकी की.

एफआईआर में कहा गया है कि कटिहार स्टेशन पर बोगी नंबर एसी-4 में विधायक और उनके साथ 2 लोग सवार हुए और हंगामा शुरू कर दिया. नशे की हालत में हंगामा करते हुए वह फर्स्ट एसी के कूपे में चले गए और वहां से लौटने के बाद उनकी बीबी के साथ बदसलूकी करने लगे. छेड़खानी मामले के तूल पकड़ने के बाद विधायक के होश उड़ गए और उन्होंने राजधानी एक्सप्रेस से सफर करने की बात से ही इंकार कर दिया.

कटिहार और पटना जंक्शन के सीसीटीवी फुटेज की जांच के बाद साफ हो गया कि विधायक उस दिन ट्रेन में सवार हुए थे. वहीं रेलवे के मुताबिक 17 जनवरी के रिजर्वेशन चार्ट में भी सरफराज आलम नाम के किसी मुसाफिर का नाम नहीं था. जांच में खुलासा हुआ है कि विधायक के पिता अररिया के राजद सांसद मोहम्मद तसलीमुद्दीन की ओर से एक पीएनआर वीवीआईपी कोटा से कंफर्म कराने के लिए भेजा गया था. उसमें कामरान आदिम, वी मैहर और एस अंजुम का नाम था. इसमें कामरान का कोच नंबर ए3/ 32 पहले से ही कंफर्म था और अंजुम को ए3 को बर्थ नंबर 43 कंफर्म हुआ था. मैहर का टिकट कंफर्म नहीं हो सका था.

6 दिनों तक चले हाइ वोल्टेज ड्रामा के बाद आखिरकार 24 जनवरी को सरफराज को गिरफ्तार कर लिया गया. उनके साथ सफर कर रहे बौडीगार्ड इंजमामुल हक और कमर सईद को भी गिरफ्तार किया गया. पटना के रेल थाना में 7 घंटे की पूछताछ के बाद तीनों को जमानत दे दी गई. विधायक का कहना है कि वह बेकसूर हैं. वहीं रेल एसपी पीएन मिश्रा ने बताया कि विधायक का पासपोर्ट जब्त कर लिया है और कुछ शर्तों के साथ विधायक को जमानत दी गई है. विधायक की छेड़खानी को लेकर फजीहत झेलने के बाद जदयू ने उन्हें पार्टी से सस्पेंड भी कर दिया है. 

यह तो था हाई प्रोफाइल छेड़खानी का मामला, लेकिन चलती रेलगाडि़यों में महिलाओं और लड़कियों के साथ छेड़खानी करने के मामले में काफी तेजी से इजाफा होता जा रहा है. रेलगाडि़यों में साथ सफर करने वाली महिलाओं के जरिए सेक्स की कुंठा शांत करने की ओछी कोशिश करने वालों की कतार लंबी होती जा रही है. पिछले साल 23 मार्च को डिब्रूगढ़-दिल्ली राजधनी एक्सप्रेस में पैंट्रीकर्मी ने 9 साल की बच्ची के साथ छेड़खानी कर छुकछुक करती चलती रेलगाड़ी पर एक और बदनुमा दाग लगा दिया. 9 साल की लड़की अपने भाई के साथ गुवाहाटी में सवार हुई थी और दिल्ली जा रही थी. रेल पुलिस में दर्ज रिपोर्ट में कहा गया है कि बरौनी रेलवे स्टेशन से जब ट्रेन खुली तो लड़की बाथरूम गई. जब वह बाथरूम से बाहर निकली तो पैंट्रीकर्मी जितेंद्र पांडे ने उसे गोद में उठा लिया और उसके साथ छेड़खानी करने लगा. बच्ची जब शोर मचाने लगी तो पैंसेजर उसकी ओर दौड़े. पैंसेंजर ने जितेंद्र की जम कर पिटाई कर डाली. वहीं जितेंद्र का कहना है कि लड़की जब बाथरूम से निकली तो ट्रेन की स्पीड अचानक कम होने की वजह से लड़खड़ा कर गिर गई थी इसलिए उसने उसे उठाकर उसकी सीट की ओर ले जा रहा था.

इसी तरह पिछले साल दिसंबर महीने में भी डिब्रूगढ़-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस में टीटीआई ने एक महिला से छेड़खानी की थी. वह महिला अपने बच्चे के साथ सपफर कर रही थी. पटना जंक्शन पर ट्रेन के रूकते ही मुसाफिरों ने हंगामा मचा दिया और टीटीआई को गिरफ्तार करने की मांग करने लगे. आरपीएपफ थाने में टीटीआई के खिलाफ केस दर्ज कराया गया. रेलवे पुलिस ने टीटीआई की खोजबीन की तो पता चला कि टीटीआई समेत ट्रेन की पूरी स्कार्ट पार्टी ही फरार हो चुकी थी.

छेड़खानी की शिकार महिला चारू ने पुलिस में दर्ज रिपोर्ट में कहा था कि वह अपने 3 साल के बच्चे के साथ कानपुर जा रही थी. ट्रेन के बोगी नंबर-बी-10 में 31 नंबर सीट पर चारू को अकेली बैठी देख टीटीआई भरत कुमार शर्मा के अंदर का हैवान जाग गया और उसने उसके साथ बदतमीजी शुरू कर दी. वह महिला की सुरक्षा का हवाला देकर महिला की सीट पर बैठ गया और ओछी हरकतें करने लगा. मौका मिलते ही महिला ने अपने पति और पटना में रहने वाले अपने रिश्तेदार को मोबाइल फोन पर मामले की जानकारी दी थी.

इससे पहले नबंबर महीने में गुवहाटी-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस में ही नशे की हालत में सेना के 2 जवानों ने जम कर उत्पात मचाया और महिला मुसाफिरों के सामने गंदी हरकतें की. कोच नंबर बी-9 में सफर कर रहे जवानों ने पहले तो जम कर दारू पिया और उसके बाद मुसाफिरों के साथ बदसलूकी करने लगे. महिलाओं के सामने ही नशे में धुत्त जवानों ने अपने कपड़े उतार डाले और मना करने पर गाली-गलौज करने लगे. ट्रेन के पटना जंक्शन पहुंचते ही दोनों जवानों को गिरफ्तार कर लिया.

पिछले कुछेक सालों में चलती ट्रेनों में महिला मुसाफिरों के साथ छेड़खानी की वारदातों में तेजी से इजाफा हुआ है. अकसर ही इस तरह की वारदातें होती रहती हैं और रेल पुलिस और रेलवे महकमा आरोपियों को पकड़ने और मामले की जांच की बात कह कर पल्ला झाड़ लेता है. ज्यादातर मामलों में देखा गया है कि रेलवे ऐसे मामलों में आरोपियों को सजा देने या दिलाने के बजाए मामले को दबाने में ज्यादा दिलचस्पी लेता है. रेल पुलिस फोर्स के एक रिटायर्ड अपफसर अंजनी सिन्हा कहते हैं कि ट्रेनों में औरतों के साथ छेड़खानी, भद्दे इशारे या गप्पबाजी करना आम बात हो गई है, अपने सामने या आजू-बाजू की सीट या बर्थ पर बैठी महिला या लड़कियों को देखकर गलत हरकतें ओछी मानसिकता वाले लोग ही करते हैं. इसमें मुसाफिर, ट्रेन के स्टाफ, आरपीएफ और सेना के जवान समेत हर तरह के लोग शामिल होते हैं, जिससे छेड़खानी के ज्यदातर मामलों को आसानी से दबा दिया जाता है.

ट्रेनों में महिलाओं के साथ छेड़खानी करने वाले मनचलों के बारे में मनोविज्ञानी अजय मिश्र कहते हैं कि खुराफाती मानसिकता वाले और साथ में औरतों को बैठा देख सेक्स की भावना जगने वालों की कमी नहीं है. कुछ लोग खुद पर काबू रख कर खामोश रह जाते हैं और कुछ लोगों की सेक्स कुंठा पास बैठी लड़कियों और औरतों को देख कर ज्यादा ही मचलने लगती हैं. जिससे वह औरतों के साथ गलत हरकत कर बैठते हैं. यह सब तो दिमागी रोग की तरह है और ऐसे लोगों पर कानून के डंडे से रोक नहीं लगाई जा सकती है.

समाजवादी पार्टी के अधेड़ उमर के बडे़ नेता भी ट्रेन में छेड़खानी कर अपने चेहरे वा कालिख पोत चुके हैं. 18 मार्च 2013 को समाजवादी पार्टी के पूर्व सांसद चंद्रनाथ सिह भी ट्रेन में महिला के साथ छेड़खानी के आरोप में गिरफ्तार हो चुके हैं. 62 साल के सिंह पद्मावत एक्सप्रेस में साथ में सपफर कर रही एक औरत के साथ गलत व्यवहार कर रहे थे. पीडि़त महिला ने नेता पर आरोप लगाया था कि वह नशे की हालत में थे और कई बार समझाने के बाद भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे थे.

एक बड़ी प्राइवेट कंपनी में काम करने वाले राजेश कुमार राज बताते हैं कि मार्केटिंग के काम के सिलसिले में वह हर महीने करीब 15-20 दिन ट्रेनों में ही गुजारते हैं. चलती ट्रेन में लड़कियों और औरतों को देखकर छेड़खानी करने या गंदी फब्तियां कसने वालों की अलग ही सोच होती है. वह लड़कियों को छूने, उनके बदन से सटने और चिपकने के मौके ढ़ूंढ़ते रहते हैं और कोई मौका न मिले तो खुद मौका पैदा कर लेते हैं. मसलन इधर-उधर आती जाती लड़कियों के शरीर से सटने के लिए वैसे लोग रास्ते पर खड़े हो जाते हैं, नीचे झुक कर कोई सामान निकालने का स्वांग करने लगते हैं. ऐसे ज्यादातर मामले में महिलाएं खामोश रह जाती हैं. कोई हंगामा न हो या फिर लोक-लाज के डर से औरतों के चुप रहने की वजह से ही लफंगों का मन बढ़ जाता है. अगर पीडि़त महिला हल्ला मचाए तो ट्रेन की बोगी में सवार बाकी मुसाफिर लफंगे को सबक सीखा सकते हैं.

महिला बिग्रेड के जरिए बिहार में औरतों को उनके हकों को लेकर जागरूक करने की मुहिम चलाने वाली अनीता सिन्हा कहती हैं कि औरतों को अपनी रक्षा और सुरक्षा को लेकर खुद ही सतर्क और जागरूक होना होगा, केवल कानून और पुलिस के भरोसे महिलाओं को सुरक्षा हासिल नहीं हो सकती है. आज काफी पढ़ने लिखने के बाद भी ज्यादातार महिलाएं छेड़खानी और शारीरिक उत्पीड़न को लेकर चुप्पी साधे रह जाती हैं, इसके पीछे बस एक ही वजह होती है, लोक-लाज के डर, लोग क्या कहेंगे, बेकार का फसाद खड़ा होगा. कई मामलों में देखा गया है कि छेड़खानी के खिलाफ हो-हल्ला मचाने या आवाज उठाने वाली महिला को ही समाज बदचलन करार दे देता है. इस वजह से भी कई महिलाएं लफंगों की बेजा हरकतों को चुपचाप सह लेती हैं. ऐसी औरतों को यह समझना पड़ेगा की खामोश रह कर वह लफंगों के मनोबल को बढ़ाने की ही काम करती हैं.

पटना में रेल एसपी प्रकाश नाथ मिश्रा का दावा है कि रेलगाडि़यों में छेड़खानी करने वालों के साथ कड़ी कानूनी कारवाई की जाती है. वह कहते हैं कि ट्रेनों में अगर कोई लफंगा किसी महिला के साथ छेड़खानी करता है या गंदी बातें करता है तो ऐसे में बोगी में मौजूद बाकी सवारियों को इसका विरोध करना चाहिए. इसकी जानकारी ट्रेन में मौजूद रेल पुलिस के जवानों को देनी चाहिए. कोई लफंगा बोगी में गलत हरकत करता है तो बाकी मुसफिरों के चुपचाप रहने से ही बदमाशों का हौसला बढ़ता है, अगर उसे सही समय पर सही सबक दे दिया जाए तो आगे वह ऐसी हरकतें करने से पहले कोई भी लफंगा सौ बार सोचेगा.

रेलगाडि़यों में जब कोई करे छेड़खानी

– अगर कोई रेलकर्मी ही छेड़खानी कर रहा हो तो अपने बोगी या कूपे के बाकी मुसपिफरों की मदद लें.

– कोई लफंगा जब छेड़छाड़ करने की कोशिश करे तो चुप्पी नहीं साधें.

– अगर आपके साथ कोई अपना सपफर कर रहा हो तो उसे बताएं, नहीं तो बाकी मुसाफिरों या फिर रेल पुलिस को तुरंत सूचना दें.

– अपने मोबाइल फोन के जरिए किसी रिश्तेदार या दोस्त को एसएमएस के जरिए पूरी जानकारी दें.

– रेल पुलिस की महिला हेल्पलाइन नंबर अपने पास जरूर रखें. हेल्प लाइन नंबर-1800-111322

अब रवीना टंडन बनीं वेडिंग प्लानर

अभिनेत्री रवीना टंडन अब नए रूप में हमें दिखाई देगी. जी नहीं वह किसी फिल्म के किरदार के लिए नहीं. रवीना अपनी सबसे छोटी बेटी (अडॉप्टेड) छाया की शादी के लिए वेडिंग प्लानर बनने को तैयार हुई हैं. सूत्रों की माने तो रवीना को यह विचार अपने परदे पर निभाए गए शादियों द्वारा प्रेरित किरदार से आया है।

छाया की शादी हिंदू और ईसाई रीती-रिवाज़ों के अनुसार होगी. उनके होने वाले पति मूल रूप से गोवा के हैं. 

रवीना द्वारा आयोजित संगीत समारोह में बहुत ही करीबी रिश्तेदारों और मित्रों को आमंत्रित किया गया है,  तथा चूड़ा और घरा घरोली के अलावा एक मेंहदी समारोह का भी आयोजन किया गया हैं, रवीना ने व्यक्तिगत रूप से प्रत्येक समारोह को डिजाइन किया है. 

हाउ टू डील: टेढे़ लोगों से कैसे निबटें

जीवन की राह में हमेशा स्ट्रेट फौरवर्ड चलने वाले लोगों से ही वास्ता पड़े ऐसा संभव नहीं, क्योंकि सब का व्यवहार एकजैसा नहीं होता. कोई हर परिस्थिति में खुश रहने वाला होता है तो कोई गुस्सेबाज व स्वभाव से चिड़चिड़ा. जब तक हमारा वास्ता सीधेसादे लोगों से पड़ता है, सब सही चलता रहता है लेकिन जब टेढ़े लोगों से पाला पड़ता है तो उलझनें व परेशानियां खड़ी हो जाती हैं. ऐसे उलझे मिजाज के लोगों से परेशान होने के बजाय जरूरत है डट कर मुकाबला करने की.

कम बात करने में ही भलाई

कुछ लोगों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वे सीधी बात का भी टेढ़ा ही जवाब देते हैं. ऐसे में जब सामने वाला आप को कुछ गलत जवाब देगा तो आप भी रिप्लाई में जरूर कुछ बोलेंगे, जिस से बात बिगड़ेगी ही. इस से अच्छा है कि ऐसे व्यक्ति से दूरी बना कर रखें, जिस से उसे कुछ कहने का मौका ही न मिले.

दिमाग ठंडा रख कर बात करें

जब कभी भी आप को उलझे मिजाज वाले व्यक्ति से काम पड़े तो आप उस के सामने कूल डाउन हो कर जाएं. यह बात भी मन में ठान लें कि चाहे वह कितने भी गुस्से में व गलत अंदाज में जवाब दे लेकिन फिर भी आप अपना नियंत्रण नहीं खोएंगे. हो सकता है आप के ऐसे व्यवहार से वह खुद को बदलने पर मजबूर हो जाए.

प्रयासों से उसे बदलने की कोशिश करें

यह कहना भी सही नहीं होगा कि सारे टेढ़े मिजाज के लोगों को बदला नहीं जा सकता. जिन लोगों में खुद को बदलने की इच्छा होती है उन्हें प्रयास कर के बदला जा सकता है. आप उन्हें प्यार से समझाएं कि आप के ऐसे व्यवहार से कोई आप का दोस्त तो क्या आप के पास बैठना भी पसंद नहीं करेगा इसलिए अपने व्यवहार में परिवर्तन लाएं. कोशिश करें कि जब कभी भी कोई आप से बात करे तो आप अपनी बातों से उस के चेहरे पर मुसकान लाने की कोशिश करें न कि उसे परेशान करें.

स्थितियों के अनुसार खुद को ढालें

लाख प्रयासों के बावजूद अगर वह खुद को न बदले तो स्थितियों के अनुसार खुद को ढालना सीखें. जब कभी भी वह रूखे लहजे में बात करे तो उसे हंस कर टाल दें या फिर बात के सब्जेक्ट को ही बदल दें. हो सके तो किसी जरूरी काम का बहाना बना कर वहां से चले जाएं. ध्यान रखें, ऐसे लोगों के व्यवहार का खुद की पर्सनैलिटी पर जरा भी असर न पड़ने दें, न ही उन के कारण खुद को तनाव में रखें.                     

 

समाज की विकृति झेलती युवतियां

प्रेममें सबकुछ जायज हो सकता है पर प्रेम से पहले युवती को फुसलाने के लिए जोरजबरदस्ती, धमकी, छींटाकशी, मारपीट, तेजाब फेंकना, बदनामी करना, वीडियो बनाना न प्रेम है न सफल प्रेम की शुरुआत, पर कम से कम हमारे देश में यह उत्तर से दक्षिण तक कौमन है. हमारे यहां सहमी, डरी, दुबकी युवतियों को बात करने और दोस्ती करने के लिए राजी करने के लिए सबकुछ जायज मान लिया जाता है.

जब कोई अनजान, अनचाहा युवक पीछा करने लगे और दोस्त बनाने की पेशकश करने लगे तो युवती को जिस तनाव से गुजरना पड़ता है, यह बयान करना आसान नहीं है. चलतेफिरते दोस्ती हो जाए, पड़ोसी हो, सहकर्मी हो, सहपाठी हो तो दोस्ती करने में आनंद आता है, चाहे वह प्रेम में बदले या न बदले पर जब युवक पीछा करते, सीटियां बजाते, घर के आगे लटक कर दोस्ती पर जोर डाले तो दहशत हो जाती है.

दिल्ली के एक स्कूल की 12वीं कक्षा की छात्रा को दोस्ती करने के लिए मजबूर करने वाला एक युवक पुलिस से शिकायत करने पर गिरफ्तार किया गया पर इस से होगा क्या? ज्यादा से ज्यादा मारपीट कर उसे दोचार रोज जेल में बंद कर के छोड़ दिया जाएगा. अगर वह आसपास कहीं रहता होगा तो सदा ही संकट बना रहेगा.

हमारे यहां युवतियों के प्रति इतनी अधिक कुंठा और सैक्स फ्रस्ट्रेशन है कि हर लड़का मानो पगलाया हो. समाज एक तरफ तो युवतियों को ताले में बंद कर रखता है और दूसरी ओर युवक को मर्दानगी दर्शाने के लिए उकसाता है. चालू जबान में सैक्स भरे वाक्य ऐसे उछाले जाते हैं मानो वे गांधी या लेनिन के विचार हों.

समाज इतना दोगला है कि अपने घर की युवतियों को तो ले कर तो वह बेहद संकुचित है पर युवकों को छुट्टे सांड़ की तरह छोड़ देता है. उसी घर में दोहरा मानदंड चलता है. दोगलापन असल में सोच के अभाव का परिणाम है. हमारे यहां बंधीबंधाई लीक पर चलने की इतनी आदत है कि हम तर्क और व्यावहारिकता के बारे में सोच ही नहीं सकते. पंडों, पादरियों और मुल्लाओं के चक्कर में पड़ कर अपने को शुद्ध समझने वाले हमारे समाज में असल में विकृति ही भरी है जो हर कोने पर दिखती है. युवतियों पर खुद को थोपने की वजह भी यही है.

इस का इलाज पुलिस का डंडा नहीं क्योंकि पुलिस वाले तो हर युवती को वेश्या मान कर चलते हैं जो उन्हें बिना पैसा लिए सुख दे. इस का इलाज तो घरों में है पर घरों में न पहले और न अब यह पाठ पढ़ाया जा रहा है कि लड़कियों से छेड़खानी मंहगी पड़ती है और कब यह मारपीट में बदल जाए, कहा नहीं जा सकता. घरों को शराफत सीखनी होगी वरना प्रेम भी समाप्त होगा और आजादी भी.

 

बेरोजगारी का मकड़जाल

शिक्षा व्यक्ति के विकास का मार्ग प्रशस्त करती है लेकिन जब एक गै्रजुएट युवक को चपरासी की नौकरी के लिए संघर्ष करना पड़े तो इसे आप क्या कहेंगे? बेरोजगारी का दानव दिनप्रतिदिन हताश हो रहे शिक्षित युवावर्ग को लील रहा है. डिग्री प्राप्त बेरोजगार युवकों की जो तसवीर आज हमारे सामने है वह निसंदेह रोंगटे खड़े करने वाली है.

आज समस्त शिक्षा प्रणाली सवालों के कटघरे में खड़ी है. सुरक्षित कैरियर के लिए संघर्षरत युवक की मानसिक स्थिति का अंदाजा लगा कर देखिए, जब स्नातक या उस से आगे की डिग्री लेने के बाद उसे चपरासी की नौकरी पाने के लिए भी दरदर भटकना पड़ रहा हो. बेरोजगारों की दिनोदिन लंबी होती कतार कहीं न कहीं संदेह पैदा करती है कि आखिर पढ़लिख कर क्या मिला?

भारत को विश्व के समक्ष आर्थिक महाशक्ति के रूप में अघाने वाले नेताओं की तंद्रा भंग होनी चाहिए और उन्हें सचाई का पता चलना चाहिए. 21वीं शताब्दी को युवाओं की शताब्दी का खोखला नारा कब तक लुभा पाएगा, इस में संदेह है. यदि हम सरकारी आंकड़ों को सच मानें और वस्तुस्थिति की गंभीरता का वास्तविकता के परिप्रेक्ष्य में आकलन करें तो सचाई सामने आ जाएगी. ज्ञातव्य है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा सचिवालय में 368  चपरासी के रिक्त पदों को भरने के लिए प्राप्त आवेदनों की संख्या देख कर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इन पदों को भरने के लिए 23 लाख अर्जियां आईं, यानी एक पद के लिए 6 हजार आवेदन, यह आंकड़ा भविष्य के खतरे की ओर इशारा कर रहा है. किसी विकासशील देश के लिए इस से अधिक शर्म की बात और क्या हो सकती है कि उच्च शिक्षा प्राप्त उस का युवावर्ग नौकरी के लिए दरदर भटके.

गौरतलब है कि वैश्विक आर्थिक मंदी के चलते इंजीनियर और एमबीए डिग्रीधारकों को भी रोजगार नहीं मिल रहा. भारत के औद्योगिक क्षेत्रों में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है. 21-22 करोड़ की आबादी वाले देश के सब से बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में मात्र चपरासी के पदों को भरने के लिए 23 लाख आवेदनपत्र प्राप्त हुए. गौरतलब है कि चपरासी पद के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता 5वीं पास मांगी गई थी. इस के लिए आवेदनपत्र आए 53,226 लेकिन छठी पास आवेदकों की संख्या थी 20 लाख से अधिक. इतना ही नहीं साढ़े 7 लाख आवेदक इंटरमीडिएट पास थे और 1 लाख 52 हजार आवेदक उच्चशिक्षा प्राप्त थे. हद तो तब हो गई, जब चपरासी के पद को भरने के लिए प्राप्त आवेदनपत्रों में 255 आवेदक पीएचडी डिग्रीधारक निकले.

देखसुन कर यह हैरानी होती है कि शिक्षा के स्तर का इस कदर हृस हुआ है? बेरोजगारी का यह सच एक बड़े खतरे की ओर इशारा कर रहा है. आंकड़े बताते हैं कि केंद्र सरकार की नौकरियों में स्थिति बद से बदतर हुई है. कर्मचारी चयन आयोग की 2013-14 की परीक्षाओं में आवेदन करने वालों की संख्या 1 करोड़ से अधिक दर्ज की गई थी. इन आवेदकों ने मात्र 6 परीक्षाओं में हिस्सा लेना था. निजी कंपनियों में मिलने वाले कम पैकेज और नौकरियों की अनिश्चितता के चलते हर कोई सरकारी नौकरी की तरफ भाग रहा है. लाखों पढ़ेलिखे युवक बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं.

यदि शिक्षा वास्तव में ही गुणवत्तापूर्ण और रोजगारमूलक होती है तो उच्चशिक्षा प्राप्त अभ्यर्थी चौथी श्रेणी की छोटी नौकरी के लिए आवेदन नहीं करते. सो ऐसी स्थिति से सामना करने के लिए आवश्यक है कि शिक्षाप्रणाली में ही आमूलचूल परिवर्तन किया जाए. इसे रोजगारमूलक बनाने की आवश्यकता है. छठा वेतनमान लागू होने के बाद से सरकारी नौकरियों के प्रति आकर्षण कई गुना बढ़ गया है. इसी के चलते एक साधारण शिक्षक 30-40 हजार और महाविद्यालयों के प्राध्यापक एक सवा लाख वेतन पा रहे हैं. सेवानिवृत्त प्राध्यापक को घर बैठे 60-70 हजार रुपए तक पैंशन मिल जाती है जो केवल सरकारी नौकरी में ही संभव है.

भारत की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और भौगोलिक परिस्थितियों और विशाल जनसमुदाय की मानसिकता को ध्यान में रख कर यदि सार्थक शिक्षा के बारे में किसी ने सोचा था तो वे थे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जिन का कहना था, ‘बुद्धि की सच्ची शिक्षा हाथ, पैर, कान, नाक जैसे शरीर के अंगों के उचित अभ्यास और शिक्षण से ही हो सकती है.’ आज हम बुद्धि के एकांगी विकास की गिरफ्त में आ गए हैं. इस शिक्षा व्यवस्था की अपेक्षा रहती है कि वह ऐसे सरकारी संस्थागत ढांचे खड़े करती चली जाए, जिस के राष्ट्र और समाज के लिए हित क्या हैं, यह तो स्पष्ट न हो, लेकिन नौकरी और ऊंचे वेतनमान की गारंटी हो.

बहरहाल, हमारे नीतिनिर्धारकों को उस कड़वे सच को स्वीकारना चाहिए, जो उत्तर प्रदेश में शिक्षित बेरोजगारों को ले कर उजागर हुआ, जिस ने समूची शिक्षा प्रणाली को संदेह के घेरे में ला खड़ा किया है. यक्ष प्रश्न बस यही है कि क्या हमारी शिक्षा हमें रोजीरोटी दे सकती है? इस प्रश्न का उत्तर हमें अपने अंदर ही ढूंढ़ना होगा.                              

 

पीएम को खत: दाल के इंतजार में

प्रधानमंत्रीजी, नमस्कार.

 

हमें पूरी उम्मीद है कि आप अपने विदेशी दौरों पर मस्तव्यस्त होंगे. हमें तो हमें, अब तो आप की पार्टी वालों को भी आप के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं. किसी खास मौके पर आप अपने घर में दिख गए तो दिख गए, वरना टैलीविजन पर ही कभी इस देश, तो कभी उस देश देख कर हम संतोष कर लेते हैं कि चलो जहां भी हैं, अपने प्रधानमंत्रीजी सेहतमंद हैं. मैं ने जितनी बार भी आप के बंगले की ओर देखा, बंद ही पाया. हां, वहां पर काम करने वाली हरदम आप के कपड़े प्रैस करती जरूर मिली. आप का पता ही नहीं चलता कि आप कब घर आए और कब विदेश हो लिए.

मैं अपने पति से तो कई बार यह निवेदन कर चुकी हूं, लेकिन उन्होंने तो अब मेरी बात सुनना ही बंद कर दिया है. वे कहते हैं, ‘अब अगर दाल की बात करोगी, तो खुदकुशी कर लूंगा. मैं बाजार से सबकुछ ला सकता हूं, पर तुम्हारी दाल नहीं.’ अब उन से बाजार से दाल लाने को कहते हुए भी मैं डरने लगी हूं. हमारा बेटा मुन्नू अगर दा… भी कहता है, तो उन को लगता है कि वह कहीं दा के बाद ल न कह दे, इसलिए उस के दा कहने के तुरंत बाद वे उस के मुंह पर हाथ रख देते हैं. कहीं वह दाल कहना ही न सीख पाया तो…? कहीं वे ऐसावैसा कुछ कर गए तो…? इसी डर से उन के आगे दा से शुरू होने वाले हम ने सारे शब्द ही कहनेसुनने बंद कर दिए हैं. न रहेगा दा और न बनेगी दा से दाल.

प्रधानमंत्रीजी, मेरे पास तो लेदे कर एक बस यही पति हैं. भला है, बुरा है, जैसा भी है, मेरा पति मेरा देवता है. शाम को दफ्तर से जब घर लौट कर आता है, तो ऊपर की कमाई के सौपचास ऊपए औरों से छिपाबचा कर चुपचाप मेरे हाथों पर वरदी बदलने से पहले ही रख देता है. बिना किसी झिझक के. ऐसा पति मुझे हर जनम में मिले. पर मेरी और सभी बहनों से दोनों हाथ जोड़ कर प्रार्थना है कि मेरे इस कथन को किसी धर्म से जोड़ कर न देखा जाए. केवल और केवल पतिपत्नी के संबंध से जोड़ कर ही देखा जाए.

प्रधानमंत्रीजी, आप जिस देश में भी हों, आप से दोनों हाथ जोड़ कर बस एक ही गुजारिश है कि आप अब के जब विदेश से स्वदेश के लिए कोई बड़ी डील ले कर आएं, तो प्लीज, विदेश से आते हुए 2 किलो साबुत मूंग, एक किलो साबुत उड़द, 2 किलो बिना छिलके वाली चने की दाल, 2 किलो अरहर, 2 किलो राजमा, 2 किलो लोबिया भी साथ ले कर आएं. और आप जब एयरपोर्ट पर उतरें, तो हमें फोन कर दें. मैं अपने पति को एयरपोर्ट पर आप से दालें लेने भेज दूंगी. आप की कसम, अब बिन दाल और नहीं रहा जाता. पहले कमर में ही दर्द रहता था, पर अब घुटनों में भी दर्द होने लग गया है.

याददाश्त तो अब धीरेधीरे मुझे धोखा देने ही लग गई है. पर सच मानें, अब तो हमारे घर में बच्चे भी दालों के रंग भूलने लग गए हैं. उन्हें कितना ही रटाओ कि मूंग हरे रंग की होती है, पर दूसरे दिन पूछो तो मूंग का रंग काला ही बताते हैं. उन्हें याद ही नहीं रहता कि चने भूरे रंग के होते हैं, तो धुली मसूर का रंग लाल होता है. याद तो तब रहे, जो उन्हें ये देखनी भी नसीब हों. उन को रटातेरटाते मर गई कि उड़द धुली सफेद रंग की होती है, तो अरहर पीले रंग की. पर पूछने पर सब गलत कर जाते हैं. कमबख्त दाल न हुई, हिसाब की किताब के मूलधन, दर, समय और ब्याज के मौखिक सवाल हो गए.

वाह, क्या जमाना था वह भी, जब कोई किताब न होने के बाद भी मेरी मां ने हमें रंगों की पहचान दालों से ही कराई थी. अब आप ही बताओ कि मैं अपने बच्चों को रंगों की जानकारी किस से दूं? इधर हरे रंग के जंगल बिल्डरों ने काट दिए, तो उधर उद्योगों के धुओं के चलते गांवशहर से लाललाल सूरज ही गायब है. ऊपर से मुए शिक्षा बोर्ड ने रहीसही कमी पूरी कर दी है. उस ने किताबें ऐसी छापी हैं कि काले हाथी का लाल चूहा बना दिया है, तो शेर किताबों में बिल्ली की तरह कालाफटा कोट पहने दुबका दिखता है, बाहर के कुत्ते के तलवे चाटता हुआ.

धुली मसूर का रंग किताब छापने वालों ने लाल की जगह काला कर दिया है. ऐसे में बच्चे दुविधा में हैं कि शिक्षा बोर्ड की किताबों पर यकीन करें कि अपने मांबाप पर? हे प्रधानमंत्रीजी, अच्छे दिनों की बाट जोहतेजोहते अब तो आंखों की जोत जाने लगी है. पर कलेजा तब कुछ ठंडा हो जाता है, जब आप अच्छे दिनों के प्रति अपने वचन को दोहराते हो. आप के इसी वचन के आसरे ही तो बिना दाल रोटी खाए जा रहे हैं, आप के गुण गाए जा रहे हैं.

दाल के इंतजार में आप के देश की आम गृहिणी.     

क्रिकेट और बौलीवुड का लव कनैक्शन

इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल के वजूद में आने से बहुत पहले से ही बौलीवुड व क्रिकेट जगत का कनैक्शन जुड़ चुका था. खासतौर पर क्रिकेटरों व बौलीवुड हसीनाओं के खट्टेमीठे प्रेम संबंधों के चलते कई प्रेम कहानियां शादी के बंधन में बंध गईं, तो कई अधूरी कहानियां अपने मुकाम तक नहीं पहुंच सकीं. अपने वक्त की मशहूर व खूबसूरत हीरोइन शर्मिला टैगोर इस की एक मिसाल हैं, जिन्होंने अपने कैरियर की ऊंचाई पर आ कर भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके नवाब मंसूर अली खान पटौदी से प्रेम विवाह कर लिया था.

‘टाइगर’ के नाम से मशहूर मंसूर अली खान पटौदी व शर्मिला टैगोर की जोड़ी बौलीवुड व क्रिकेट के मेल की उम्दा मिसाल है. 80 के दशक की मशहूर हीरोइन रीना राय और पाकिस्तानी बल्लेबाज मोहसिन खान की प्रेम कहानी भी खूब परवान चढ़ी, मगर इस का अंत दुखद रहा. ‘नागिन’, ‘कालीचरण’, ‘नसीब’ और ‘जानीदुश्मन’ जैसी हिट फिल्मों में काम करने वाली रीना राय ने अपने चमकदार फिल्म कैरियर पर साल 1983 में मोहसिन खान से शादी करने के बाद फुल स्टौप लगा दिया था. मोहसिन खान ने भी हिंदी फिल्मों में काम किया, मगर नाकाम रहे. शादी के बाद अनेक मनमुटावों के चलते इस शादी का अंत हो गया.

फिल्म हीरोइन संगीता बिजलानी व भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके मोहम्मद अजहरुद्दीन की प्रेम कहानी भी बेहद चर्चित रही. संगीता बिजलानी ने साल 1980 में ‘मिस इंडिया’ का खिताब जीता था, इस के बाद उन्होंने फिल्मों में आने का फैसला किया. फिल्मों में उन्हें कोई खास कामयाबी तो नहीं मिली, मगर हीरो सलमान खान के साथ उन के प्रेम प्रसंग की हमेशा चर्चा रही. इस के बाद मोहम्मद अजहरुद्दीन से मुलाकात करने के बाद उन दोनों की नजदीकियां बढ़ती गईं. आखिरकार मोहम्मद अजहरुद्दीन ने अपनी पहली पत्नी से तलाक लेने के बाद संगीता बिजलानी से दूसरी शादी कर ली.

देशी तो क्या विदेशी क्रिकेटर भी भारतीय खूबसूरती से बच नहीं सके. वैस्टइंडीज टीम के दिग्गज आलराउंडर रह चुके कप्तान विवियन रिचर्ड्स भारतीय फिल्म कलाकार नीना गुप्ता के इश्क में गिरफ्तार हुए. नीना गुप्ता से मिलने से पहले ही विवियन रिचर्ड्स शादीशुदा थे. दोनों ने बिना किसी बंधन में बंधे एक गंभीर रिलेशनशिप को निभाया. हालांकि यह बेहद छोटी सी लव स्टोरी रही. नीना और रिचर्ड्स की एक बेटी भी है, जो अपनी मां के साथ रहती है. क्रिकेट से कमैंटेटर बने रवि शास्त्री और फिल्म हीरोइन अमृता सिंह का इश्क भी एक जमाने में क्रिकेट जगत में चर्चा की बात रहा था. रवि शास्त्री उस समय एक बेहद हैंडसम नौजवान थे और लड़कियां उन पर फिदा थीं. वहीं 80 के दशक में अमृता सिंह बौलीवुड में अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही थीं. शारजाह में क्रिकेट मैच के दौरान स्टेडियम में बैठी अमृता सिंह व मैदान में मौजूद रवि शास्त्री की भावनाएं एकदूसरे पर न्योछावर रहती थीं, जिन्हें कई बार कैमरा भी कैद कर लेता था. यह कहानी भी लंबी नहीं चली और रवि शास्त्री ने ऋतु सिंह व अमृता सिंह ने ऐक्टर सैफ अली खान को अपना जीवनसाथी बना लिया.

साल 1992 में क्रिकेट का वर्ल्ड कप जीतने वाली पाकिस्तान क्रिकेट टीम के कप्तान इमरान खान और बौलीवुड की बला की खूबसूरत हसीना जीनत अमान के बीच प्यार की खबरें भी मीडिया व आम जनता में सुर्खियां बनी रहीं. क्रिकेटर संदीप पाटिल का नाम पूनम ढिल्लों व कपिल देव का नाम सारिका के साथ खूब जुड़ा, मगर यहां सिर्फ धुआं ही ज्यादा दिखा, आग को छिपाए रखा गया. वैस्टइंडीज टीम के बल्लेबाज सर गैरी सोबर्स ने हीरोइन अंजू महेंद्रू को दिल दिया था, जबकि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान रह चुके सौरव गांगुली व हीरोइन नगमा का नाम भी लव बर्ड्स में शुमार हुआ. युवराज सिंह भी आशिकमिजाजी के लिए काफी मशहूर हैं. उन का नाम कई हीरोइनों के साथ जुड़ा रहा. उन्होंने हीरोइन किम शर्मा के साथ अपने

प्रेम संबंध और फिर अलगाव को स्वीकारा भी. बाद में ‘युवी’ का नाम दीपिका पादुकोण से ले कर मौडल करिश्मा कोटक के साथ भी जुड़ा, जिन्हें तमाम पार्टियों व दूसरी जगहों पर लोगों ने साथसाथ देखा था. अब सुनने में आया है कि युवराज सिंह बौलीवुड की नई हीरोइन हेजल कीच के साथ शादी करने जा रहे हैं. तेज गेंदबाज जहीर खान भी इस मामले में पीछे नहीं रहे. वे कभी फिल्म ‘किसना’ की हीरोइन ईशा शेरवानी के प्रेम में डूबे थे और लंबी प्रेम कहानी के बाद दोनों अलग हो गए. हरभजन सिंह और गीता बसरा के बीच भी प्रेम संबंध रहे और हाल ही में उन्होंने शादी भी कर ली. अब क्रिकेटर विराट कोहली और हीरोइन अनुष्का शर्मा का लव कनैक्शन होने की सुर्खियां भी काफी चर्चा में हैं. 

शहाबुद्दीन: उम्रकैद काटेगा गुनाहों का बाहुबली

‘साहेब’ के नाम से मशहूर बाहुबली नेता मोहम्मद शहाबुद्दीन को कोर्ट के ताजा फैसले में साल 2004 के सिवान, बिहार तेजाब कांड में मुजरिम करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई गई है. कोर्ट ने यह माना है कि मोहम्मद शहाबुद्दीन ने जेल से बाहर आ कर इस हत्याकांड की साजिश रची थी. गौरतलब है कि तकरीबन 11 साल पहले सिवान के यादव मार्केट में रहने वाले कारोबारी चंद्रकेश्वर प्रसाद उर्फ चंदा बाबू के 2 बेटों का अपहरण कर लिया गया था और 2 लाख रुपए की फिरौती की मांग की गई थी. फिरौती नहीं देने पर उन दोनों की तेजाब से नहला कर हत्या कर दी गई थी.

16 अगस्त, 2004 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के इशारे पर उन के गुरगों ने 24 साला गिरीश कुमार उर्फ निक्कु और 18 साला सतीश कुमार उर्फ सोनू को अलगअलग जगहों से अगवा कर लिया था और फिरौती नहीं मिलने पर हुसैनगंज थाने के प्रतापपुर गांव में मार डाला था. इस मामले में मारे गए दोनों भाइयों की मां कलावती देवी के बयान पर आईपीसी की धारा 341, 323, 380, 435, 364/34 के तहत मुफस्सिल थाने में कांड संख्या 131/2004 दर्ज कराया गया था, जिस में राजकुमार साह, शेख असलम, मोनू मियां उर्फ सोनू उर्फ आरिफ हुसैन को नामजद किया गया था.

इस मामले की जांच के दौरान तब के राजद सांसद रहे मोहम्मद शहाबुद्दीन पर हत्या की साजिश रचने का खुलासा हुआ था. इस मुकदमे में स्पैशल कोर्ट ने 4 जून, 2010 को आईपीसी की धारा 120 (बी) और 364 (ए) में साजिश रचने व अपहरण का आरोपी बनाया था. बाद में हाईकोर्ट के आदेश पर 1 मई, 2014 को आईपीसी की धारा 302, 201 व 120 (बी) के तहत आरोपी बनाया गया. इस सुनवाई के दौरान दोनों मारे गए लड़कों के भाई और घटना के चश्मदीद गवाह राजीव रोशन की भी 16 जून, 2014 को हत्या कर दी गई थी. इस मामले में मोहम्मद शहाबुद्दीन और उन के बेटे ओसामा पर भी आरोप लगा था.

इस समूचे मामले की शुरुआत सिवान के गोशाला रोड में चंदा बाबू के मकान के बाहरी हिस्से को ले कर झगड़े से हुई थी. उन की जमीन पर दबंग लोगों की नजरें गड़ी हुई थीं. 16 अगस्त, 2004 की सुबह जमीन को ले कर पंचायत हो रही थी कि उसी समय कुछ लोग आ धमके और जमीन पर कब्जा करने लगे. कुछ बदमाशों ने गालीगलौज करते हुए मारपीट शुरू कर दी, तो चंदा बाबू और उन के घर वालों ने घर में रखे तेजाब को बदमाशों पर फेंक कर उन्हें भागने के लिए मजबूर कर दिया.

इस के कुछ देर बाद ही चंदा बाबू की बड़हडि़या रोड पर बनी दुकान से उन के बड़े बेटे गिरीश कुमार का अपहरण कर लिया गया था. उस के कुछ देर बाद ही चिउड़ा हट्टा बाजार से छोटे बेटे सतीश कुमार को भी उठा लिया गया था. इस वारदात के 7 साल बाद तेजाब हत्याकांड के चश्मदीद गवाह के रूप में गिरीश और सतीश का बड़ा भाई राजीव रोशन सामने आया. उस ने 6 जून, 2011 को अपने बयान में कहा कि उस के दोनों भाइयों के साथ उस का भी अपहरण किया गया था. बाद में तीनों भाइयों को मोहम्मद शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर ले जाया गया, जहां उस की आंखों के सामने मोहम्मद शहाबुद्दीन के कहने पर गिरीश और सतीश को तेजाब से नहला कर मार डाला गया. इसी बीच वह वहां से भागने में कामयाब रहा था.

राजीव की गवाही पर कई सवाल खड़े हुए थे और तब के सिवान कोर्ट के स्पैशल सैशन जज एके पांडे की अदालत ने सुनवाई के दौरान मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ मामला चलाने से इनकार कर दिया था. पटना हाईकोर्ट के आदेश पर मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ सुनवाई शुरू हो सकी थी. उस के बाद राजीव ने कोर्ट को बताया था कि दोनों भाइयों की हत्या होने के बाद वह जान बचाने के लिए गोरखपुर भाग गया था और वहीं छिप कर रहने लगा था. मोहम्मद शहाबुद्दीन के जेल जाने और बिहार में सरकार बदलने के बाद राजीव वापस लौटा और उस ने गवाही देने की हिम्मत जुटाई.

पटना हाईकोर्ट ने 1 मई, 2014 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ आरोप बनाने का आदेश दिया और 16 जून, 2014 को राजीव की सिवान में गोली मार कर हत्या कर दी गई. चंदा बाबू की पत्नी कलावती कहती हैं कि शहाबुद्दीन को सजा सुनाए जाने के बाद उन के लिए खतरा और ज्यादा बढ़ गया है. उन के तीनों बेटों की हत्या कर दी गई है और अब उन की और उन के पति की भी हत्या हो सकती है. मोहम्मद शहाबुद्दीन को सजा सुनाए जाने पर उन की पत्नी हेना शहाब कहती हैं कि उन के शौहर को साजिश के तहत फंसाया गया है. तेजाब कांड 2004 में हुआ था और साल 2009 में पूर्व सांसद को भी आरोपी बना दिया गया.

विरोधी लोग कह रहे हैं कि जेल से बाहर निकल कर मोहम्मद शहाबुद्दीन ने तेजाब कांड को अंजाम दिया था, तो फिर इस मामले में उस समय के सिवान जेल के जेलर पर भी कार्यवाही होनी चाहिए. 10 मई, 1967 को सिवान जिले के हुसैनगंज ब्लौक के प्रतापपुर गांव में जनमे मोहम्मद शहाबुद्दीन ने कालेज में पढ़ाई के दौरान ही अपराध की दुनिया में कदम रख दिया था. साल 1986 में हुसैनगंज थाने में उन पर पहला केस दर्ज हुआ था. साल 1990 में सिवान के डीएवी कालेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन राजनीति में उतरे और वामपंथियों से टक्कर लेते रहे.

साल 1990 में जीरादेई विधानसभा सीट से पहली बार निर्दलीय विधायक बनने के बाद वे लालू प्रसाद यादव की पार्टी में शामिल हो गए. साल 1995 में उन्होंने दोबारा जीरादेई सीट से विधानसभा का चुनाव जीता. साल 1996 में जनता दल के टिकट पर सिवान लोकसभा सीट से चुनाव जीत कर वे संसद पहुंच गए. 15 मार्च, 2001 को जब राजद के पूर्व जिला अध्यक्ष मनोज कुमार को गिरफ्तार करने वाली पुलिस टीम दारोगा राय कालेज पहुंची थी, तब मोहम्मद शहाबुद्दीन ने पुलिस अफसर संजीव कुमार को थप्पड़ मार दिया था और उन के गुरगों ने दूसरे पुलिस वालों की भी जम कर पिटाई कर?डाली थी.

इस के बाद मोहम्मद शहाबुद्दीन को पकड़ने के लिए जब उस समय सिवान के एसपी रहे बच्चू सिंह मीणा की अगुआई में पुलिस ने उन के प्रतापपुर गांव वाले घर पर छापा मारा, तो पुलिस और मोहम्मद शहाबुद्दीन के समर्थकों के बीच तकरीबन 4 घंटे तक गोलीबारी हुई थी, जिस में 8 बेकुसूर गांव वाले ही मारे गए थे और पुलिस को खाली हाथ  लौटना पड़ा था. सियासी हलकों में उस समय यह चर्चा गरम रही थी कि लालू प्रसाद यादव ने मोहम्मद शहाबुद्दीन की आकौत बताने के लिए यह छापा मरवाया था. मोहम्मद शहाबुद्दीन उस समय तो पुलिस को झांसा दे कर भाग निकले थे, पर उन्होंने एसपी बच्चू सिंह मीणा को धमकी दी थी कि वे उन्हें राजस्थान तक खदेड़ के मारेंगे.

साल 2013 में जब डीपी ओझा बिहार के डीजीपी बने, तो उन्होंने मोहम्मद शहाबुद्दीन पर कानूनी शिकंजा कसना शुरू कर दिया था. उन्होंने मोहम्मद शहाबुद्दीन के पुराने मामलों को दोबारा खोल कर उन के खिलाफ सुबूत जुटाए. माले कार्यकर्ता मुन्ना चौधरी के अपहरण और हत्या के मामले में मोहम्मद शहाबुद्दीन के खिलाफ वारंट जारी हुआ और अदालत में उन को आत्मसमर्पण करना पड़ा. इस से राज्य में सियासी बवाल मच गया था और राजद को अपने मुसलिम वोटों के खिसकने का खतरा महसूस होने लगा था.

मोहम्मद शहाबुद्दीन की मुसलिम वोटरों पर खासी पकड़ थी. नतीजतन, तब की राबड़ी देवी सरकार ने डीजीपी डीपी ओझा को हटा दिया था. साल 2005 में राष्ट्रपति शासन के दौरान सिवान के एसपी संजय रत्न ने 24 अप्रैल, 2005 को मोहम्मद शहाबुद्दीन के गांव प्रतापपुर में छापा मारा और भारी तादाद में हथियार, गोलाबारूद, चोरी की गाडि़यां और विदेशी मुद्राएं पकड़ी थीं. लंबे समय तक फरार रहने के बाद 6 नवंबर, 2005 को पुलिस ने मोहम्मद शहाबुद्दीन को दिल्ली में उन के घर पर दबोच लिया था. उस के बाद से आज तक वे जेल में बंद हैं.               

विराट सेलफिश नहीं, शानदार खिलाड़ी हैं: मैक्सवेल

ऑस्ट्रेलिया के आक्रामक बल्लेबाज ग्लेन मैक्सवेल ने उन रिपोर्ट्स को खारिज किया कि उन्होंने विराट कोहली की आलोचना की थी. मैक्सवेल ने कहा कि यह पूरी तरह से गलत है और ऑस्ट्रेलियाई टीम असल में भारतीय टेस्ट कप्तान से काफी प्रभावित है.

दाएं टखने में चोट और बाएं पैर की मांसपेशियों में सूजन के कारण मैक्सवेल का पांचवें और अंतिम वनडे मैच में नहीं खेल रहे हैं. उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए रिपोर्ट को लेकर सफाई दी.

मैक्सवेल ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, 'बात को गलत तरीके से पेश किया गया. मैंने भी उसे (कोहली को) बधाई दी थी कि वह कितना अच्छा खेला और अपनी टीम को जीत की स्थिति में ले गया.'

मैक्सवेल ने क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया से भी बात करके कोहली को लेकर अपनी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण दिया. इस आक्रामक बल्लेबाज ने कहा, 'मुझे यह आकलन करने को कहा गया था कि मौजूदा सीरीज में बल्ले से कौन दबदबा बना रहा है और मैंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि फिलहाल दुनिया में विराट से बेहतर गेंद को कोई हिट कर रहा है.'

उन्होंने कहा, 'वह मैदान पर जो कर सकता है उससे हमारे में से कई प्रभावित हैं और कैनबरा में वह जिस तरह मैच को हमारे से दूर ले जा रहा था उसे रोकना काफी हद तक संभव नहीं था.'

मैक्सवेल ने कहा, 'लेकिन मैंने देखा कि इसे ऐसे लिखा गया जैसे मैं निजी तौर पर खेल के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों में से एक के खेलने के तरीके पर निशाना साध रहा हूं जो पूरी तरह से गलत है.'

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