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टैनिस पर फिक्सिंग का साया

क्या हो गया है खेलों को, क्रिकेट के बाद अब टैनिस पर फिक्सिंग का साया मंडरा रहा है. आस्ट्रेलियन ओपन से ठीक पहले टैनिस जगत के 16 पेशेवर खिलाडि़यों के फिक्सिंग में शामिल होने के सुबूत मिले हैं. बजफीड न्यूज और ब्रिटिश ब्रौडकास्टिंग कौर्पोरेशन ने इस का खुलासा किया है.

खेल प्रेमियों को तो आभास तक नहीं होता कि फलां मैच में किस खिलाड़ी की हार या जीत होने वाली है. माना जाता है कि सट्टेबाजों द्वारा मैच फिक्स करने के लिए खिलाडि़यों को 50 हजार डौलर का प्रस्ताव दिया जाता था. इतने रुपए पा कर भला खिलाडि़यों का मन क्यों नहीं डोलेगा.

इस खुलासे के बाद भले ही चार टैनिस निकायों-महिला टैनिस संघ, अंतर्राष्ट्रीय टैनिस संघ, टैनिस पेशेवर संघ और ग्रैंड स्लैम बोर्ड के पदाधिकारी यह दंभ भर रहे हों कि उन का तंत्र मजबूत है और किसी भी तरह का भ्रष्टाचार करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा पर यह तय है कि खेल संघ खेल को बचा पाने में असफल रहे हैं.

टैनिस संघों की हिदायत के बाद भी खिलाड़ी मैच फिक्स कर रहे हैं. इस का मतलब तो यही है कि खिलाडि़यों को कोई भय नहीं है. ऐसे में खिलाडि़यों का मनोबल बढ़ता है.

वर्ष 2007 में एसोसिएशन औफ टैनिस प्रोफैशनल ने एक जांच शुरू करवाई थी. जांच में 2 खिलाडि़यों निकोलाई देविदेको और मार्टिन वास्लयो आर्गुल्यो के बीच खेल में कथित सट्टेबाजी के मामले की जांच की जानी थी. बाद में इन दोनों खिलाडि़यों के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला था पर इस जांच में नामचीन व बड़े खिलाडि़यों के नाम सामने आए जिन्होंने मैच फिक्स किए थे. पर हुआ क्या, जांचदल ने वर्ष 2008 में रिपोर्ट पेश की और कहा कि 28 खिलाडि़यों के खिलाफ जांच हो. लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ पाया.

जाहिर है जब मामला आगे बढ़ ही नहीं पाता और खिलाडि़यों के ऊपर कार्यवाही होती ही नहीं है तो भला खिलाड़ी इस से डरेंगे क्यों? खेल संघों के पदाधिकारी केवल जांच की बात करते हैं पर जांच केवल कागजों में ही होती है यदि वे खिलाडि़यों व सट्टेबाजों पर लगाम लगाते तो खेल की ऐसी दुर्गति  न होती.

फोर्ड मोटर का नया सफर

अमेरिकी मोटर वाहन निर्माता कंपनी फोर्ड मोटर भारतीय कार बाजार में अपनी पैठ बनाने का प्रयास लंबे समय से कर रही है. पिछले 2 दशकों में देश के आटो मार्केट में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने का वह लगातार प्रयास कर रही है लेकिन कंपनी भारतीय कार बाजार में सिर्फ 3 फीसदी कब्जा ही कर सकी है. यह रफ्तार बहुत धीमी है और इस बात का उस को एहसास है. वह अब मारुति सुजूकी की राह पर चल पड़ी है.

कंपनी को अब समझ आया है कि यदि उसे अपनी बाजार हिस्सेदारी बढ़ानी है तो महानगरों के साथ ही छोटे शहरों व कसबों का रुख करना पड़ेगा. उस के लिए कंपनी ने अपनी रफ्तार तेज कर दी है. कंपनी के एक अधिकारी का कहना है कि उस ने छोटे शहरों में उपभोक्ता सेवा केंद्रों की संख्या बढ़ाने का निर्णय लिया है. इस के साथ ही, वह अपने बिक्री केंद्रों की संख्या भी बढ़ा रही है. कंपनी का लक्ष्य जल्द ही 5 प्रतिशत बाजार हिस्सेदारी हासिल करना है. इस के लिए वह अगले 5 साल में देश में 500 वर्कशौप खोलेगी. अब तक उस के 250 वर्कशौप देश के विभिन्न क्षेत्रों में काम कर रहे हैं.

कंपनी का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों से वह लगातार अपनी कार्यशालाएं खोल रही है और उन में 50 फीसदी कार्यशालाएं छोटे शहरों में खोली गई हैं. अच्छी बात यह है कि दुनिया की बड़ी कंपनियों की समझ में आने लगा है कि भारतीय बाजार महानगरों और बड़े नगरों तक ही सीमित नहीं है बल्कि छोटे नगरों व कसबों में भी है. उस का बड़ा फायदा देश के युवाओं को मिलेगा और उन्हें रोजगार के लिए महानगरों का रुख नहीं करना पड़ेगा.

शेयर बाजार में भूचाल

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई के सूचकांक में इस साल की शुरुआत से ही गिरावट का रुख रहा है लेकिन 20 जनवरी को बाजार में भूचाल आ गया और सूचकांक 640 अंक गिर कर 20 माह के निचले स्तर पर आ कर 24 हजार अंक नीचे चला गया.

मोदी सरकार के कार्यकाल में सूचकांक अब सब से निचले स्तर पर पहुंचा है. पिछले वर्ष मार्च के बाद सूचकांक 6 हजार अंक तक गिर चुका है जबकि इस साल अकेले जनवरी में बाजार 8 प्रतिशत यानी 2,055 अंक तक गिर चुका है. रुपए में भी डौलर के मुकाबले जबरदस्त गिरावट दर्ज की गई है. इस गिरावट की वजह विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमत के 12 साल में सब से निचले स्तर पर पहुंचने और चीन में अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट को माना जा रहा है. चीन में सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की दर 25 साल में सब से ज्यादा सुस्ती पर है. वह दुनिया की तेजी से बढ़ती और दूसरी सब से बड़ी अर्थव्यवस्था है और ड्रैगन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार 1990 के बाद अब सब से कमजोर है जिस से वैश्विक बाजारों में हलचल है.

चीन की अर्थव्यवस्था में गिरावट की वजह उस के निर्यात में गिरावट को बताया जा रहा है जिस का बड़ा असर उस के शेयर बाजार पर पड़ा और चीनी स्टौक मार्केट धराशायी हुआ है. नतीजतन, विश्व के वित्तीय बाजार में खलबली मची. चीन में औद्योगिक विकास की दर में भी जबरदस्त गिरावट आई है. इन सब कारणों से उस की अर्थव्यवस्था ढही है जिस का सीधा असर भारतीय शेयर बाजार में देखने को मिला है.

हौलीवुड में धनुष

तमिल फिल्म अभिनेता धनुष सिर्फ 2 हिंदी फिल्मों के जरिए ही इतने चर्चित हो गए हैं कि उन्हें हिंदी समेत तमाम भाषाओं की फिल्मों के औफर मिल रहे हैं. वे हौलीवुड में भी अभिनय की पारी शुरू कर रहे हैं. धनुष ईरान मूल के फ्रांसीसी निर्देशक मर्जने सत्रापी की फिल्म ‘द एक्स्ट्राऔर्डिनरी जर्नी औफ द फकीर हू गौट ट्रैप्ड इन एन इकिया कपबोर्ड’ में काम करेंगे.

इस फिल्म में प्रसिद्ध हौलीवुड अभिनेत्री उमा थर्मन भी नजर आएंगी. फिल्म में ‘बैंडिट क्वीन’ की अभिनेत्री सीमा बिस्वास भी हैं. वैसे, चूंकि फिल्म भारतीय संदर्भ में बन रही है और इस की निर्माण टीम में मुंबई के फिल्म प्रोडक्शन हाउस भी शामिल हैं, इसलिए इसे पूरी तरह से हौलीवुड फिल्म नहीं कहा जा सकता है लेकिन फ्रैंच फिल्मकार के साथ काम करना धनुष के लिए काफी चुनौतीपूर्ण व रोमांचक होगा.

कोंकणा का निर्देशन

अभिनेत्रियों में अलग पहचान रखने वाली कोंकणा सेन अब निर्देशक की भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं. वे फिल्म ‘अ डैथ इन द गंज’ से बतौर निर्देशक नई पारी शुरू करने जा रही हैं. फिल्म को ले कर कोंकणा इतनी संजीदा हैं कि इस फिल्म के सभी आर्टिस्ट लगातार वर्कशौप कर रहे हैं. वैसे, कोंकणा जिस तरह की फिल्में करती आई हैं, उस हिसाब से लगता है वे औफबीट तरह का सिनेमा ही बनाएंगी. उन की समकालीन अभिनेत्री नंदिता दास ने भी गुजरात दंगों पर ‘फिराक’ जैसी गंभीर फिल्म बना कर सब को चौंका दिया था. ऐसे में कोंकणा से भी कुछ ऐसे ही सरप्राइज की उम्मीद की जा रही है. गौरतलब है कि कोंकणा की मां भी हिंदी समेत कई अवार्ड विनिंग बंगाली फिल्मों का निर्देशन कर चुकी हैं.

काजोल का असहिष्णुता बोध

आमिर खान के असहिष्णुता पर दिए गए बयान पर हुआ विवाद थमा नहीं था कि अभिनेता अक्षय कुमार और शत्रुघ्न सिन्हा एक बार फिर आमिर पर बरस पडे़. इतना ही नहीं, जयपुर साहित्य उत्सव में भाग लेने आई अभिनेत्री काजोल भी असहिष्णुता का बोध करते हुए अपनी विशेष टिप्पणी देने लगीं. उन के मुताबिक, हमारा फिल्म उद्योग, समाज में जो चल रहा होता है उसे हमेशा दर्शाता रहेगा. बौलीवुड में कोई विभाजन रेखा नहीं है. न ही जाति, नस्ल है और न ही असहिष्णुता. बहरहाल, इस देश में असहिष्णुता इसी बात से जाहिर हो जाती है जब शाहरुख और आमिर खान जैसे कलाकारों के कुछ बोलने पर उन की फिल्मों का बायकाट करने का सुर सुनाई देने लगता है.

 

तेरी याद

दर्द की कीमत चुकाई जाएगी

याद तेरी जब भी पाई जाएगी

चैन फिर उड़ने लगेगा प्यार में

नींद आंखों से चुराई जाएगी

दूरियां उस को समझ आ जाएंगी

जब मेरी अरथी उठाई जाएगी

वो मुझ से मिलने का वादा तो करे

पथ पर चांदनी बिछाई जाएगी

उलटा दर्पण उस ने सीधा कर दिया

अब हकीकत ही दिखाई जाएगी

रूठने का भी सबब होता है क्या

बात कोई तो बनाई जाएगी.

 

             – बलविंदर बालम

भारत और नेपाल: दरकते रिश्ते

भारत और नेपाल के दशकों पुराने राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक रिश्तों पर पिछले 5-6 महीने से छाए काले बादल गहराते जा रहे हैं. भारत और नेपाल के शासक मामले को सुलझाने के बजाय आग में घी डालने का काम कर रहे हैं, जिस से चीन फायदा उठाने की जुगत में लगा हुआ है. मधेशियों के आंदोलन को ले कर भारत से नेपाल के बिगड़ते रिश्तों के बीच चीन नेपाल में अपनी पैठ बनाने की कोशिशों में लगा हुआ है और कुछेक मामलों में उसे कामयाबी भी मिल रही है. खास बात यह है कि नेपाल अब किसी भी तरह की मदद के लिए भारत की ओर देखने के बजाय चीन के सामने हाथ फैलाने लगा है और चीन भी बढ़चढ़ कर उस की मदद करने लगा है.

नेपाल में जारी हिंसा के बहाने नेपाल की नई सरकार चीन के साथ गुपचुप कारोबारी समझौता कर भारत के कारोबार को झटका देने की मुहिम में लगी हुई है. इस साजिश में चीन नेपाल का साथ दे कर अपना मतलब साधने में लग गया है. इस के तहत नेपाल के रसुआ जिला के टिमुरे इलाके में चीन ने ड्राईपोर्ट बनाने की तैयारी शुरू कर दी है.

नेपाल और चीन के बीच यह गुप्त करार अप्रैल 2015 में ही हो चुका है. नेपाल वाणिज्य मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय की ओर से नेपाल इंटर मौडल यातायात विकास समिति के कार्यकारी निदेशक लक्षुमन बहादुर वस्नेत और चीन की ओर से आर्किटैक्चर रिकौनसंस ऐंड डिजायन इंस्टिट्यूट औफ तिब्बत औटोनोमस रिजन कंपनी के अध्यक्ष फुंझिन झाउल ने करार पर हस्ताक्षर किए हैं.

करार में कहा गया है कि चीनी कंपनी अगले 3 महीने में प्रोजैक्ट रिपोर्ट नेपाल को पेश कर देगी, उस के बाद ड्राईपोर्ट बनाने का काम चालू किया जाएगा. चीनी कंपनी ने ड्राईपोर्ट बनाने के लिए प्रस्तावित 5 हेक्टेयर जमीन का मुआयना कर शुरुआती नक्शा तैयार कर लिया है. ड्राईपोर्ट को 4 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में बनाया जाना है. इस के अलावा, चीन ने नेपाल में 2 बड़े सीमेंट प्लांट्स में भारी निवेश करने की मंजूरी दी है. मधेशी नेता उपेंद्र यादव बताते हैं कि मधेशी आंदोलन  के बहाने नेपाल भारत को ठेंगा दिखा कर चीन से सांठगांठ करने की साजिश में लगा हुआ है. वह चाहता है कि मधेशी आंदोलन में भारत को उलझा कर रखा जाए और चीन से दोस्ती बढ़ा कर भारत को सबक सिखाया जाए.

नेपाल की भौगोलिक बनावट ऐसी है कि वह भारत की मदद के बगैर नहीं बढ़ सकता है. भारत और नेपाल के बीच लगभग 1850 किलोमीटर खुली सीमा है, जो बिहार और उत्तर प्रदेश से लगी हुई है. दोनों देश के लोग आसानी से इधरउधर आ और जा सकते हैं. नेपाल जाने के लिए भारत से ही हो कर जाया जा सकता है, इसलिए नेपाल की मजबूरी है कि वह भारत से रिश्ता बना कर रखे.

ऐसे बढ़ी दूरियां

भारत-नेपाल मैत्री संघ के सदस्य अनिल कुमार सिन्हा कहते हैं कि भारत-नेपाल शांति और मैत्री समझौता साल 1950 में हुआ था. उस के बाद से नेपाल की आर्थिक हालत को बनाने और बढ़ाने में भारत का बहुत बड़ा हाथ रहा है.  साल 1988 में जब नेपाल ने चीन से बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद की तो भारत ने नाराजगी जताई और उस के बाद से दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. साल 1991 में भारत और नेपाल के बीच व्यापार व आर्थिक सहयोग को ले कर नया समझौता हुआ. इस के बाद साल 1995 में नेपाल के तब के प्रधानमंत्री मनमोहन अधिकारी ने दिल्ली यात्रा के दौरान 1950 के समझौते पर नए सिरे से विचार करने की मांग उठाई.

साल 2008 में जब नेपाल में माओवादियों की सरकार बनी और पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने 1950 के समझौतों में बदलाव की आवाज बुलंद की. प्रचंड की सोच है कि 60 साल पुराने समझौते से भारत को ज्यादा और नेपाल को काफी कम फायदा हो रहा है. सरकार गंवाने के बाद भी प्रचंड ने भारत विरोध की सियासत जारी रखी, क्योंकि इस से जहां पहाड़ी नेपालियों का उन्हें पुरजोर समर्थन मिल सकता है, वहीं चीन को भी खुश रखा जा सकता है. 31 जुलाई, 1950 को नेपाल के तब के प्रधानमंत्री शमशेर जंग बहादुर राणा और नेपाल में भारत के राजदूत चंद्रशेखर प्रसाद नारायण सिंह ने भारत-नेपाल समझौते पर दस्तखत किए थे. समझौते के तहत दोनों देशों के बीच रक्षा के मामले पर सहयोग और माल की मुफ्त आवाजाही की अनुमति मिली है. इस के साथ ही, दोनों देशों को एकदूसरे की संप्रभुता, क्षेत्रीय अखंडता और आजादी को स्वीकार व सम्मान करने पर सहमति जताई गई. समझौते में 10 अनुच्छेद हैं.

अनुच्छेद-1 में कहा गया है कि यह समझौता चिरस्थायी होगी, पर अनुच्छेद-10 कहता है कि एक साल के नोटिस पर इस समझौते को खत्म किया जा सकता है. अनुच्छेद-5 में इस बात का जिक्र है कि नेपाल की सुरक्षा के लिए भारत हथियार, गोलाबारूद, जंगी सामान और जरूरी मशीनों को अपने देश से आनेजाने देगा. वहीं अनुच्छेद-7 कहता है कि दोनों देशों के नागरिक एकदूसरे के देशों में बेरोकटोक आनेजाने के साथ कारोबार या नौकरी कर सकते हैं. कई नेपाली शासक और कुछ कट्टरपंथी नेता पिछले कुछ सालों से यह हल्ला मचा रहे हैं कि इस समझौते की नींव असमानता के आधार पर रखी गई है. नेपाली कानून खुली सीमा की अनुमति नहीं देता है. भारतीयों के नेपाल में जमीन खरीदने और कारोबार करने से भी कुछ नेता नाराज हैं. साल 2008 में जब माओवादी नेता प्रचंड नेपाल के प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने संविधान सभा में इस समझौते को खत्म कर नया समझौता बनाने का प्रस्ताव पारित भी करा लिया था, पर सरकार बनने के 9 महीने के भीतर ही उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा और मामला खटाई में पड़ गया.

गौरतलब है कि माओवादी सुप्रीमो प्रचंड बारबार रट लगाते रहे कि इस संधि से सिर्फ भारत को ही फायदा हो रहा है. साल 2010 शुरू होते ही प्रचंड ने भारत पर यह आरोप लगाना चालू किया कि उस ने नेपाल के काफी बड़े भूभाग पर अवैध कब्जा जमा रखा है. इस के अलावा सीमा के पास भारत पर कई बांधों का एकतरफा निर्माण करने का भी आरोप लगाते हुए कहा कि इस से नेपाल के काफी बड़े हिस्से में बारहों महीने पानी जमा रहता है. गौरतलब है कि यह इलाका भारत-नेपाल-चीन का जंक्शन है. नेपाल के पहले प्रधानमंत्री माधव कुमार नेपाल कहते हैं कि उन के देश की भी चिंता है कि उन की जमीन का भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल न हो. दरअसल, भारत और चीन के बीच बफर स्टेट बने नेपाल की हालत सांपछछूंदर वाली रही है. नेपाल न भारत की अनदेखी कर सकता है न ही चीन की.

सीमा का समीकरण

नेपाल मामलों के जानकार हेमंत राव कहते हैं कि नेपाल की सब से बड़ी दिक्कत यह है कि उसे हमेशा यह खयाल रखना पड़ता है कि वह जानेअनजाने कोई ऐसा कदम न उठा ले जिस से दोनों में से किसी को तकलीफ हो. नेपाल के लिए सब से बड़ी परेशानी यह रही है कि भारत और चीन दोनों उसे अपने हिसाब से चलाना चाहते हैं और एकदूसरे पर रौब व धौंस जमाने के लिए नेपाल की जमीन का बेजा इस्तेमाल करते रहे हैं. 2 बड़े एशियाई देशों की नाक की लड़ाई में नेपाल जंग का मैदान बना हुआ है. चीन के साथ नोपाल की 1,414.88 किलोमीटर सीमा लगती है. भारत के साथ लगभग 1,850 किलोमीटर सीमा लगी हुई है. यह उत्तराखंड से ले कर बिहार, बंगाल और सिक्किम तक फैली हुई है. इतनी लंबी खुली सीमा होने की वजह से नेपाल की सुरक्षा से ही भारत की सुरक्षा जुड़ी हुई है. नेपाल के प्रधानमंत्री भारत और नेपाल के लोगों को एकदूसरे देश में आनेजाने के लिए वीजा सिस्टम लागू करने की मांग उठा रहे हैं. उन का मानना है कि इस से आतंकियों और अपराधियों को भारत या नेपाल में पैठ बनानी मुश्किल होगी.

चीन, भारत और नेपाल के प्रति आक्रामक रवैया रखता है, जबकि भारत नेपाल को छोटे भाई के रूप में देखता है और चीन से भी मधुर रिश्ता बनाए रखना चाहता है. चीन नेपाल में अपना दबदबा बढ़ा कर भारत पर निशाना साधे रखने की जीतोड़ कोशिशों में लगा हुआ है. चीन के लिए सब से बड़ा सिरदर्द नेपाल में रहने वाले 20 हजार तिब्बती शरणार्थी हैं जो नेपाल के रास्ते चीन और भारत आतेजाते रहते हैं. नेपाल को आर्थिक मदद दे कर चीन उसे दिमागी रूप से अपना गुलाम बनाए रखना चाहता है

राष्ट्रीय जनता दल उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह कहते हैं कि नेपाल में जारी मधेशियों के आंदोलन में भारत को तुरंत ठोस दखल देना चाहिए, वरना नेपाल चीन की गोद में बैठ सकता है. नेपाल चीन के एहसान तले दब कर भारत से अपनी पुरानी दोस्ती तोड़ने को आतुर है. नेपाल में चीन की पैठ से भारत की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी और नेपाल, चीन के भारतविरोध की सियासत का अड्डा बन सकता है.

अंतरिक्ष में खिला फूल

शून्य गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र में पहली बार जिंदगी की उम्मीद खिली है. नासा के वैज्ञानिकों ने अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन में दुनिया का पहला फूल खिलाया है. और इस से इस बात को बल मिला है कि अंतरिक्ष में भी जीवन संभव है. नासा के वैज्ञानिकों ने ट्वीट कर इस की घोषणा की है. उन्होंने इस फूल का नाम जिन्निया रखा है. यह फूल खाने में सलाद की तरह प्रयोग हो सकता है. यह अमेरिका में उगाया जाता है. इस फूल को उगाने में 60 से 80 दिनों का समय लगा था. यह वैज्ञानिकों का दूसरा प्रयास था जब यह फूल खिल पाया है. इस से पहले भी वैज्ञानिकों ने स्पेस स्टेशन के वैजी लैब में पौधों को उगाने का प्रयास किया था. इस फूल के उगने से यह संभावना बढ़ी है कि भविष्य में स्पेस यात्री भी ताजी सब्जियों का मजा ले सकेंगे.

पिछले साल ही वहां सफलतापूर्वक गोभी उगाई गई थी. उगाने के बाद गोभी को वहीं पर फ्रीज कर दिया गया था. वैज्ञानिक परीक्षण में यह बात साफ होने पर कि यह गोभी सेहत के लिए हानिकारक नहीं है, नासा ने अंतरिक्ष में ऐसे अन्य प्रयोग करने की अनुमति दे

दी थी. स्पेस स्टेशन के निवासियों ने 10 अगस्त, 2015 को पहली बार अंतरिक्ष में उगाई गई सब्जियों का जायका लिया था. इस से धरती से आने वाले राशन पर अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की निर्भरता कुछ कम होगी. जिन्निया के खिलने की कामयाबी से वैज्ञानिक उत्साहित हैं और अब वे वर्ष 2018 तक अंतरिक्ष में टमाटर और चाइनीज कैबेज उगाने की कोशिश कर रहे हैं. अंतरिक्ष में टमाटर जैसी सब्जियों को उगाना नासा के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण होगा. इस से अंतरिक्ष यात्रियों के लिए मार्स जैसे लंबी दूरी के मिशन तय करना आसान होगा.

वैटिरिनरी साइंस में बनाएं कैरियर

मनुष्य की तरह पशुपक्षी भी अनेक रोगों के शिकार होते हैं. मनुष्य तो आसानी से अपने दर्द को बयां कर सकता है और डाक्टर भी उस की बीमारी के अनुरूप उस का इलाज करता है, पर जानवर तो बेजबान होते हैं, वे अपनी पीड़ा किसी को नहीं बता सकते इसलिए उन के शारीरिक लक्षणों को देख कर वैटिरिनरी डाक्टर अंदाजा लगा लेते हैं कि पशु की तबीयत खराब है. मनुष्य की तरह पशुओं की बीमारियों को भी डाक्टर टैस्ट करता है और फिर उस का इलाज करता है.

वैटिरिनरी साइंस अपने में एक कंप्लीट साइंस है, इसलिए जिन युवाओं को पशुओं से प्रेम है वे वैटिरिनरी डाक्टर बन कर पशुओं का इलाज कर सकते हैं.

एक वक्त था, जब पशुओं के चुनिंदा अस्पताल और डाक्टर होते थे, इसलिए बहुत से पशु तो बीमारी की वजह से बिना इलाज के मर जाते थे. इसी वजह से कई पक्षियों की तो प्रजातियां ही विलुप्त हो गईं. जानवरों की रक्षा और उन्हें विलुप्त होने से बचाने के लिए ‘वर्ल्ड एनिमल वेलफेयर डे’ 4 अक्तूबर को पूरे विश्व में मनाया जाता है. अब जानवरों की रक्षा के लिए सरकारी और निजी संस्थानों द्वारा अथक प्रयास किए जा रहे हैं. उन की रक्षा के लिए विशेषज्ञों की नियुक्ति से ले कर चिकित्सक तक रखे जा रहे हैं. हाल के वर्षों में बीमारियां फैलने के मामले सामने आ रहे हैं जैसे बर्ड फ्लू व स्वाइन फ्लू. इस कारण इस क्षेत्र में प्रशिक्षित पशु विशेषज्ञों की आवश्यकता और बढ़ गई है. यदि आप साइंस बैकग्राउंड से हैं और पशुओं की रक्षा करना चाहते हैं, तो आप के लिए वैटिरिनरी साइंस में बेहतर कैरियर विकल्प हो सकता है.

क्या है वैटिरिनरी साइंस

पशुपक्षियों में होने वाली बीमारियों का पता लगा कर सही तरीके से इलाज कर उन्हें उन की तकलीफ से छुटकारा दिलाना ही वैटिरिनरी साइंस है. एक अनुमान के मुताबिक भारत में पशुओं की संख्या लगभग 50 करोड़ है जोकि विश्व में सब से अधिक है. लेकिन इन की देखभाल व इलाज के लिए वैटिरिनरी डाक्टर्स की भारी कमी है.

प्रमुख कोर्स

–       बैचलर औफ वैटिरिनरी साइंस ऐंड एनिमल हसबैंड्री -5 वर्ष.

–       वैटिरिनरी ऐंड लाइवस्टौक डैवलपमैंट डिप्लोमा – 2 वर्ष.

–       मास्टर औफ वैटिरिनरी साइंस – 2 वर्ष.

–       पीएचडी इन वैटिरिनरी साइंस – 2 वर्ष.

कैसे मिलेगा प्रवेश

वैटिरिनरी साइंस में ग्रैजुएशन के लिए प्रवेश परीक्षा होती है. इस परीक्षा में आवेदन के लिए फिजिक्स, कैमिस्ट्री व बायोलौजी विषयों में 50% अंकों के साथ 12वीं पास करना अनिवार्य है. यह परीक्षा वैटिरिनरी काउंसिल औफ इंडिया के द्वारा हर वर्ष मई व जून में आयोजित की जाती है. प्रत्येक राज्य के वैटिरिनरी कालेज की 15% सीटें इसी परीक्षा के द्वारा भरी जाती हैं. बाकी सीटें उसी राज्य के प्रतियोगियों के लिए आरक्षित होती हैं जहां वैटिरिनरी कालेज स्थित होता है.

किस तरह के पाठ्यक्रम

इस के पाठ्यक्रम में आप को थ्योरी तथा प्रैक्टिकल दोनों का ज्ञान दिया जाता है. शुरू में आप को एनाटोमी, बायोकैमिस्ट्री, फिजियोलौजी, न्यूट्रीशन, लाइवस्टौक मैनेजमैंट ऐंड प्रोडक्शन पैथोलौजी तथा जैनेटिक्स आदि विषय पढ़ाए जाते हैं. इस के बाद प्रैक्टिकल ट्रेनिंग के लिए वैटिरिनरी हौस्पिटलों में भेजा जाता है.

कार्यस्वरूप डाक्टर्स का कार्य पशुओं के स्वास्थ्य का खयाल रखना, उन्हें बीमारियों से छुटकारा दिलाना, उन के रहनसहन व खानपान में सुधार तथा उन की उत्पादन तथा प्रजनन क्षमता बढ़ाना होता है.

फ्यूचर प्रौस्पैक्टस

वैटिरिनरी इंडस्ट्री के कमर्शियलाइजेशन तथा भारत सरकार की उदारीकरण नीतियों के कारण यह इंडस्ट्री काफी उन्नति कर रही है. फूड मैन्युफैक्चरिंग, फार्मास्युटिकल्स, वैक्सीन प्रोडक्शन इंडस्ट्री से संबंधित मल्टीनैशनल कंपनियों के आने से वैटिरिनरी क्षेत्र में नौकरी की अपार संभावनाएं पैदा हुई हैं.

पशु चिकित्सक जहां सरकारी तथा गैर सरकारी वैटिरिनरी अस्पतालों, एनिमल हसबैंड्री डिपार्टमैंट, पौल्ट्री फार्म, डेयरी इंडस्ट्री, मिल्क ऐंड मीट प्रोसैसिंग इंडस्ट्री, फार्मास्युटिकल सैक्टर तथा एनिमल बायोटैक्नोलौजी के क्षेत्र में कार्य कर सकते हैं वहीं निजी अस्पताल या क्लीनिक खोल कर भी अच्छी कमई कर सकते हैं. इस के अलावा रिसर्च ऐंड डैवलपमैंट के क्षेत्र तथा शिक्षण संस्थानों में शिक्षक के तौर पर भी काम किया जा सकता है

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