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तेरी सास तो बहुत मौडर्न है: मिसेज चंद्रा की चर्चा क्यों हो रही थी

शादी के समय ही रिश्तेदारों व जानपहचान वालों ने कहना शुरू कर दिया कि तेरी सास तो बड़ी मौडर्न है, पर नियति ही जानती है कि उस की सास उस के लिए कितनी केयरिंग है. सास के कहने पर जब नियति मायके आई तो क्या वह उन के प्रति अपनी मां की सोच बदल पाई? आज सुबहसुबह जैसे ही नियति का फोन श्रीकांतजी के मोबाइल पर आया, उन की पत्नी लीला ने उन्हें फोन स्पीकर पर डालने का इशारा किया और उन्होंने स्पीकर औन कर दिया. नियति हंसती हुई बोली, ‘‘हैलो पापा, आप ने स्पीकर औन कर लिया हो और मम्मी आ गई हों तो मैं अपनी बात शुरू करूं.’’ पिछले 2 महीनों से यही चल रहा है.

नियति का फोन जब भी आता है, श्रीकांतजी स्पीकर औन कर देते हैं क्योंकि नियति और उस की मां लीला की बातचीत तब से बंद है, जब से नियति ने अपना निर्णय सुनाया है कि वह शादी अपने कलीग और स्कूलफ्रैंड विकल्प से करना चाहती है. यह बात जानते ही दोनों मांबेटी के बीच अबोलेपन ने अपना स्थान ले लिया. लेकिन जब भी नियति का फोन आता है, लीला अपने सारे काम छोड़ कर फोन के करीब आ जाती है, यह जानने के लिए कि नियति क्या कह रही है. नियति की बातों को सुन कर लीला के चेहरे के हावभाव बनतेबिगड़ते रहते हैं,

क्योंकि लीला किसी हाल में नहीं चाहती कि उन की बेटी किसी विजातीय लड़के से ब्याह करे. वैसे, लीला कई दफा विकल्प की मां मिसेज चंद्रा से नियति के स्कूल फंक्शन और पेरैंट्सटीचर मीटिंग में मिल चुकी है. मिसेज चंद्रा मौडर्न और स्वतंत्र विचारधारा की महिला हैं. लीला को लगता है कि मिसेज चंद्रा जरूरत से ज्यादा ही मौडर्न हैं. मिस्टर चंद्रा इंडियन नेवी में वरिष्ठ अधिकारी के पद पर थे. उन का घर ग्वालियर के पौश एरिया में है और काफी आलीशान भी है. नौकरचाकर सब हैं. किसी चीज की कोई कमी नहीं है. उन के घर का वातावरण, रहनसहन थोड़ा भिन्न है, जो लीला को शुरू से ही अटपटा लगता आया है.

क्योंकि लीला जहां रहती है, वहां की औरतें न तो मिसेज चंद्रा की भांति बिना आस्तीन का ब्लाउज पहनती हैं और न ही बिना सिर पर पल्लू लिए घर से बाहर निकली हैं. ऊपर से इन का पूरा परिवार शुद्ध शाकाहारी और उन के घर पर बिना अंडा, मांस, मछली के काम ही नहीं चलता. श्रीकांतजी एक सुलझे हुए और सरल व्यक्तित्व के धनी हैं. उन्हें इस रिश्ते से कोई एतराज नहीं, क्योंकि उन के लिए तो नियति की खुशी ही सब से बड़ी है. उन का मानना है कि जातिपांति, धर्म कुछ नहीं होता, मनुष्य की बस एक ही जाति है और एक ही धर्म होता है और वह है मानवता का धर्म. श्रीकांतजी को मिसेज चंद्रा के मौडर्न होने से भी कोई तकलीफ नहीं है. श्रीकांतजी ने भी हंसते हुए कहा, ‘‘हां बोलो, तुम्हारी मम्मी आ गई हैं.’’

‘‘पापा, कल मैं और विकल्प ग्वालियर आ रहे हैं, फिर शाम को विकल्प के मौमडैड आप और मम्मी से हमारी शादी की बात करने आएंगे.’’ श्रीकांतजी नियति को आश्वस्त करते हुए बोले, ‘‘तुम चिंता मत करो, सब ठीक होगा.’’ यह सुनने के बाद नियति ने कहा, ‘‘थैंक्यू पापा, मुझे आप से एक बात और शेयर करनी है. मैं ने और विकल्प ने कंपनी चेंज कर ली है. हमारी नई कंपनी का सबडिविजनल औफिस ग्वालियर में भी है तो शादी के बाद हम दोनों ग्वालियर आ जाएंगे.’’ ‘‘यह तो और भी अच्छी बात है. हमारी बेटी शादी के बाद भी इसी शहर में रहेगी, हमें और क्या चाहिए. यह खबर सुनते ही तुम्हारी भाभी बहुत खुश हो जाएगी.’’ भाभी का नाम सुनते ही नियति चहकती हुई बोली, ‘‘पापा, भाभी कहां हैं, बात तो कराइए.’’

‘‘इस वक्त तो वह किचन में व्यस्त है.’’ नियति थोड़ा नाराज होती हुई बोली, ‘‘पापा, मैं ने मम्मी से कितनी बार कहा है कि एक फुलटाइम मेड रख लो, सुबह से ले कर रात तक भाभी बेचारी घर के कामों में ही उलझी रहती हैं. यहां तक कि उन के पास अपने खुद के लिए भी समय नहीं होता और मम्मी हैं कि कुछ समझती ही नहीं. उन्हें लगता है कि घर का सारा काम बहू का ही है. ऊपर से भाभी को सारे काम साड़ी पहन कर करने पड़ते हैं. उन्हें काम करने में कितनी असुविधा होती है. ‘‘पापा, आप मम्मी को समझाइए, वक्त तेजी से बदल रहा है. अब मम्मी को भी थोड़ा बदलना होगा.

अच्छा पापा, अब मैं फोन रखती हूं.’’ ऐसा कह कर नियति ने फोन रख दिया. नियति के फोन रखते ही लीला के चेहरे का रंग गुस्से से लाल हो गया और वह बड़बड़ाती हुई कहने लगी, ‘‘लो, अब यह छोरी सिखाएगी मुझे बहू से क्या काम करवाना है और क्या नही. खुद को तो धेलेभर की अक्ल नहीं. एक ऐसी औरत की बहू बनने को उतावली हुए जा रही है, जिसे हमारी संस्कृति का जरा सा भी ज्ञान नहीं. न तो वह अपने सिर पर पल्लू लेती है और न ही उसे छोटेबड़े का लिहाज है. शादी हो जाने दो, फिर पता चलेगा मौडर्न सास कैसी होती है.’’ लीला को अपनी स्वयं की बेटी के लिए इस प्रकार मुंह से आग उगलता देख श्रीकांतजी बोले, ‘‘अब बस भी करो लीला. मिसेज चंद्रा मौडर्न हैं, इस का मतलब यह नहीं कि वे बुरी हैं या फिर बुरी सास ही साबित होंगी. कम से कम अपनी बेटी के लिए तो अच्छा सोचो और अच्छा बोलो.

विकल्प अपने पेरैंट्स के साथ हम से मिलने आ रहा है. कल नए रिश्तों की नींव पड़ने वाली है. मैं नहीं चाहता कि किसी भी रिश्ते की शुरुआत खटास से हो.’’ श्रीकांतजी के ऐसा कहते ही लीला कोई प्रतिक्रिया व्यक्त किए बगैर वहां से चली गई. दूसरे दिन नियति आ गई. शाम की पूरी तैयारियां जोरों पर थीं. वह वक्त भी आ गया जब विकल्प अपने पेरैंट्स के साथ नियति के घर पहुंचा. मिसेज चंद्रा की खूबसूरती आज भी बरकरार थी. उसे देखते ही लीला मन ही मन कुड़कुड़ाने लगी. जवान बेटे की मां और यह साजोसिंगार, अपनी उम्र तक का लिहाज नहीं. आग लगे ऐसे मौडर्ननैस को.

मिसेज चंद्रा इन सब से बेखबर, घर के सभी सदस्यों के साथ बड़ी आत्मीयता से मिल रही थीं. बातों ही बातों में मिसेज चंद्रा ने कहा, ‘‘मैं बड़ी खुश हूं, जो मुझे नियति जैसी खूबसूरत और समझदार बहू मिल रही है. मैं ढूंढ़ने भी निकलती तो नियति जैसी बहू मुझे न मिलती.’’ मिसेज चंद्रा के ऐसा कहने पर लीला व्यंग्यात्मक लहजे में बोली, ‘‘खूबसूरत, समझदार के साथसाथ कमाऊ बहू भी मिल रही है मिसेज चंद्रा, यह कहना भूल गईं आप.’’ लीला का ऐसा कहना श्रीकांतजी, नियति और उस के भैयाभाभी को बड़ा अटपटा और बुरा लगा, लेकिन मिसेज चंद्रा बड़े सहज भाव से लीला की बातों को हंसी में उड़ा गईं. उस के कुछ सप्ताह बाद नियति और विकल्प की शादी बड़ी धूमधाम से हो गई. शादी में आए सभी मेहमानों द्वारा शादी में किए गए शानदार इंतजाम को ले कर खूब तारीफ हुई,

साथ ही साथ, नियति व विकल्प की भी काफी प्रशंसा हुई. इन सब के अलावा सभी की जबान पर एक और बात की चर्चा जोरों पर थी और वह थी मिसेज चंद्रा की लेटेस्ट ज्वैलरी, स्टाइलिश साड़ी और हेयरस्टाइल. लीला के सभी सगेसंबंधी और सहेलियां उस से यह कहने से नहीं चूकीं कि लीला बहन, तुम ने तो दामाद के संग समधन भी बड़ी जोरदार पाई है. नियति की सास तो बड़ी मौडर्न है. इस उम्र में इतना स्टाइल… कमाल है, तुम्हारी समधन तो काफी स्टाइलिश है. सभी के मुंह से बस एक ही बात सुन कर कि ‘नियति की सास तो बड़ी मौडर्न है,’ लीला के कान पक गए और जब नियति शादी के बाद पहली बार घर आई तो लीला नियति की खैरखबर लेने के बजाय उस से कहने लगी, ‘‘कैसी है तेरी मौडर्न सास? सजनेसंवरने के अलावा भी कुछ करती है या बस सारा दिन केवल आईने के सामने ही बैठी रहती है?’’ अपनी मां का इस तरह बातबेबात नियति को उस की सास के मौडर्न होने का ताना देना उसे अच्छा नहीं लगता था,

इसलिए धीरेधीरे अब नियति अपने मायके आने से कतराने लगी. बस, फोन पर ही अपने पापा और भाभी से बात कर लेती. औफिस का भी यही हाल था. नियति के हर फैं्रड और कलीग को बस यही जानना होता है कि उस की सास का उस के साथ व्यवहार कैसा है? उसे परेशान तो नहीं करती है? नियति अपनी सास के होते हुए इतना फ्री कैसे रहती है? क्योंकि सभी को लगता है कि नियति की सास बड़ी तेजतर्रार, स्टाइलिश और मौडर्न है. नियति को यह बात समझ ही नहीं आ रही थी कि लोग सभी को एक ही तराजू पर क्यों तौलते हैं. ऐसा जरूरी तो नहीं कि जो महिला स्टाइलिश हो, मौडर्न हो, वह तेजतर्रार और बुरी सास ही होगी और जो देखने में सिंपल हो, सीधीसादी लगती हो, वह अच्छी सास ही होगी. एक शनिवार नियति अपने मायके में फोन कर अपनी मम्मी से बोली, ‘‘मम्मी, इस वीकैंड पर हम पिकनिक पर जा रहे हैं. मौम कह रही थीं कि आप सब भी हमारे साथ चलते तो एक अच्छी फैमिली पिकनिक हो जाएगी. आप भैयाभाभी से भी चलने को कह देना.’’ नियति का इतना कहना था कि लीला भड़क उठी और कहने लगी,

‘‘हमें कहीं नहीं जाना तेरी मौडर्न सास के साथ और न ही हमारी बहू जाएगी तुम लोगों के साथ. तुम सासबहू दोनों घूमो जींसपैंट पहन कर पूरे शहर में. तुम्हें न सही, पर हमें तो है लोकलाज का खयाल. ‘‘वैसे भी तुम्हारी भाभी अपने मायके इंदौर गई है और तुम्हारा पत्नीभक्त भाई उस के साथ ही गया है. दोनों यहां होते भी तो हम में से कोई न जाता तुम्हारे मौडर्न परिवार के साथ कहीं, क्योंकि उस दिन मेरे गुरुजी का जन्मदिन है, इसलिए हमारी समिति की ओर से इस अवसर पर भव्य सत्संग आयोजित किया जाएगा. उस दिन गुरुजी सभी को दर्शन और आशीर्वाद देंगे, जो जीवन की सद्गति के लिए बहुत जरूरी है. यह सब तेरी मौडर्न सास क्या समझेगी.’’ लीला का इतना कहना था कि नियति ने गुस्से में फोन काट दिया. निर्धारित दिन पर नियति अपने पूरे परिवार के साथ इधर पिकनिक के लिए निकल पड़ी, उधर लीला और श्रीकांतजी गुरुजी से आशीष लेने सत्संग के लिए निकल पड़े. आज पूरा दिन परिवार के संग इतना अच्छा समय बिता कर नियति काफी खुश थी. उसे बस इस बात का अफसोस था कि आज की इस खुशी का हिस्सा उस के अपने मम्मीपापा नहीं बन पाए थे. पिकनिक से लौटते वक्त नियति इन्हीं सब बातों में गुम थी कि अचानक उस का मोबाइल बजा. फोन किसी अनजान नंबर से था.

फोन रिसीव करते ही नियति की आंखों से अविरल अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी. यह देख नियति की सास ने उस से कारण जानना चाहा तो नियति रोती हुई बोली, ‘‘मम्मी का फोन था. सत्संग से लौटते हुए मम्मीपापा का ऐक्सिडैंट हो गया है. पापा गंभीररूप से घायल हो गए हैं. मम्मी को ज्यादा चोटें नहीं आई हैं. मोबाइल भी टूट गया है, इसलिए उन्होंने किसी दूसरे के मोबाइल से फोन किया था. भैयाभाभी शहर से बाहर हैं और वहां सिटी अस्पताल में पुलिस प्रक्रिया में देर होने की वजह से पापा का इलाज शुरू नहीं हो पा रहा है. मम्मी बहुत घबराई हुई हैं और परेशान हैं.’’ इतना सुनते ही मिसेज चंद्रा बोलीं, ‘‘तुम्हें रोने या परेशान होने की जरूरत नहीं बेटा, शहर के डीएसपी से मेरा बहुत अच्छा परिचय है. मैं अभी उन्हें फोन कर देती हूं और अस्पताल में भी फोन कर देती हूं. वहां भी मेरी पहचान के काफी सीनियर डाक्टर हैं, वे सब संभाल लेंगे. तुम्हें चिंता करने की जरूरत नहीं और कुछ घंटों में तो हम भी शहर पहुंच ही जाएंगे.’’ ऐसा कहती हुई मिसेज चंद्रा ने अपने कई मित्रों और पहचान की नामीगिरामी हस्तियों को फोन कर नियति के मम्मीपापा को हर संभव मदद करने को कह दिया.

जब नियति अपने पूरे परिवार के साथ अस्पताल पहुंची तो उस के मम्मीपापा का इलाज शुरू हो गया था. पुलिस और अस्पताल के डाक्टर व स्टाफ अपना पूरा सहयोग दे रहे थे. यह देख एक बार फिर नियति की आंखें नम हो गईं और उस के चेहरे पर अपनी सास के प्रति आदर और कृतज्ञता के भाव उभर आए. नियति की मम्मी 3 दिनों तक अस्पताल में एडमिट रहीं और उस के पापा 15 दिनों तक. मिसेज चंद्रा पूरी आत्मीयता से हर रोज अस्पताल में उन से मिलने जातीं. उन की वजह से नियति के मम्मीपापा को अस्पताल में कोई परेशानी नहीं हुई. वहां उन का विशेष ध्यान रखा गया और अस्पताल के डाक्टरों व स्टाफ से भरपूर सहयोग मिला. उस के बावजूद मिसेज चंद्रा के प्रति लीला के विचार और बरताव में कोई फर्क न आया. लीला अब भी अपने स्वस्थ होने और सही समय पर इलाज मिलने का श्रेय अपने गुरुजी की कृपा और आशीर्वाद को ही दे रही थी. मिसेज चंद्रा को लीला अपने गुरुजी के द्वारा भेजा गया केवल एक माध्यम समझ रही थी, जबकि गुरुजी का इस बात से कोई वास्ता ही न था.

लीला की इस प्रकार अंधभक्ति देख और बारबार अपनी ही मां से अपनी सास के लिए अपमानभरे शब्द सुनसुन कर नियति ने यह तय कर लिया कि वह अब न तो अपने मायके जाएगी और न ही अपनी मम्मी को फोन करेगी. काफी दिनों तक जब नियति अपने मायके नहीं गई तो एक दिन नियति की सास ने उस से कहा, ‘‘नियति बेटा, तुम बहुत दिनों से अपने मायके नहीं गई हो, इस संडे समय निकाल कर उन से मिल आओ. उन्हें तुम्हारी चिंता होती होगी.’’ नियति अपनी सास की बात टालना नहीं चाहती थी और न ही उन्हें सच बता कर उन का दिल दुखाना चाहती थी, इसलिए वह बोली, ‘‘जी, इस संडे चली जाऊंगी.’’ संडे को जब नियति अपने मायके पहुंची तो पापा उसे बरामदे में आरामकुरसी पर बैठे किताब पढ़ते मिल गए. काफी देर पापा के पास बैठने के बाद जब नियति अंदर गई तो उस ने देखा कि उस की मम्मी अपनी सहेलियों के साथ बैठी हंसीठिठोली कर रही हैं और उस की भाभी भागभाग कर सब के लिए चायनाश्ता और पानी की व्यवस्था कर रही है. यह देख नियति अपनी भाभी का हाथ बंटाने किचन की ओर बढ़ी ही थी कि वहां बैठी उस की मम्मी की सहेलियों में से एक ने कहा,

‘‘अरे नियति, तुम कब आईं? इधर आ, हमारे पास बैठ. मैं ने तो सुना है कि तेरी सास बड़ी मौडर्न हैं, तुम अपनी सास के साथ ससुराल में कैसे निभा रही हो?’’ नियति चुप रही, फिर क्या था एक के बाद एक सभी ने नियति की सास का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया. कोई उन की लिपस्टिक पर फिकरे कसने लगा, तो कोई हेयरस्टाइल पर, किसी को उन का इस उम्र में जींस पहनना गलत लग रहा था, तो किसी को उन के लहराते हुए आंचल से आपत्ति थी. सभी की अनर्गल बातें सुन कर नियति से रहा नहीं गया और वह सब पर बरस पड़ी, ‘‘हां, मेरी सास बड़ी मौडर्न हैं. वे केवल मौडर्न ड्रैस ही नहीं पहनतीं, उन की सोच भी मौडर्न है. वे अपनी बहू को चारदीवारी में घूंघट के पीछे घुटनभरी जिंदगी नहीं, खुली हवा में आजादी की सांस लेने देती हैं. ‘‘यहां आप में से कितनी सास अपनी बहू को उन की मरजी से जीने देती हैं, अपनी बहू का बेटी की तरह मां बन कर ध्यान रखती हैं? लेकिन, मेरी मौडर्न सास मेरा खयाल अपनी बेटी की तरह रखती हैं और मुझे उन के मौडर्न होने पर गर्व है क्योंकि वे मुझे केवल बेटी बुलाती ही नहीं, अपनी बेटी समझती भी हैं. और सब से बड़ी बात यह कि, बुरे वक्त में साथ खड़ी रहती हैं. ऊपर वाले की इच्छा कह कर अपना पल्ला नहीं झाड़ लेती हैं.’’ नियति की बातें सुन कर सब की आंखें शर्म से झुक गईं और नियति के पापा बरामदे में बैठे मंदमंद मुसकरा रहे थे.

बदला: आखिर अंजली का मन क्यों मचलने लगता था

मनीष सुबह टहलने के लिए निकला था. उस के गांव के पिछवाड़े से रास्ता दूसरे गांव की ओर जाता था. उस रास्ते से अगले गांव की काफी दूरी थी. वह रास्ता गांव के विपरीत दिशा में था, इसलिए उधर सुनसान रहता था. मनीष को भीड़भाड़ से दूर वहां टहलना अच्छा लगता था. वह इस रास्ते पर दौड़ लगाता और कसरत करता था. मनीष जैसे ही अपने घर से निकल कर गांव के आखिरी मोड़ पर पहुंचा, तो उस ने देखा कि सामने एक लड़की एक लड़के से गले लगी हुई. मनीष रुक गया था. दोनों को देख कर उस के जिस्म में सनसनाहट पैदा होने लगी थी. वह जैसे ही नजदीक पहुंचने वाला था, वह लड़की जल्दी से निकल कर पीछे की गली में गुम हो गई. ‘‘अरे, यह तो अंजलि थी,’’ वह मन ही मन बुदबुदाया.

वही अंजलि, जिसे देख कर उस के मन में कभी तमन्ना मचलने लगती थी. उस के उभारों को देख कर मनीष का मन मचलने लगता था. आज उसे इस तरह देख कर वह अपनेआप को ठगा सा महसूस करने लगा था. आज मनीष पूरे रास्ते इसी घटना के बारे में सोचता रहा. आज उस का टहलने में मन नहीं लग रहा था. वह कुछ दूर चल कर लौटने लगा था. वह जैसे ही घर पहुंचा कि गांव में शोर हुआ कि किसी की हत्या हुई है. लोग उधर ही जा रहे थे. मनीष भी उसी रास्ते चल दिया था. वह हैरान हुआ, क्योंकि भीड़ तो वहीं जमा थी, जहां से अंजलि निकल कर भागी थी. एक पल को तो उसे लगा कि भीड़ को सब बता दे, पर वह चुप रहा. सामने अंजलि अपने दरवाजे पर खड़ी मिल गई.

शायद वह भी बाहर हो रही घटनाओं के संबंध में नजरें जमाई थी. मनीष ने उसे धमकाते हुए कहा, ‘‘मैं ने सबकुछ देख लिया है. मैं चाहूं तो तुम सलाखों के पीछे चली जाओगी.’’ अंजलि ने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘अपना मुंह बंद रखना. मैं तुम्हारी अहसानमंद रहूंगी.’’ ‘‘ठीक है. आज शाम 7 बजे झाड़ी के पीछे वाली जगह पर मिलना. मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा.’’ ‘‘अच्छा, लेकिन अभी जाओ और घटना पर नजर रखना.’’ मनीष वहां से चल दिया. घटनास्थल पर भीड़ इकट्ठा हो गई थी. कुछ देर बाद पुलिस भी आ गई थी. पुलिस ने हत्या के बारे में थोड़ीबहुत जानकारी ले कर लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया था. मनीष अपने घर लौट आया था. मनीष अंदर से बहुत खुश था कि आज उस की मनोकामना पूरी होगी. फिर हत्या कैसे और क्यों की गई है, इस का राज भी वह जान पाएगा. उस के मन में बेचैनी बढ़ती जा रही थी. आज काम में बिलकुल भी मन नहीं लग रहा था, इसलिए समय बिताने के लिए वह अपने कमरे में चला गया था. मनीष तय समय पर घर से निकल गया था.

जाड़े का मौसम होने के चलते अंधेरा पहले ही हो गया था. मनीष तय जगह पर पहुंच चुका था, तभी उस की ओर एक परछाईं आती हुई नजर आई. मनीष थोड़ा सा डर गया था. परछाईं जैसेजैसे उस की ओर बढ़ रही थी, उस के मन से डर भी खत्म हो रहा था, क्योंकि वह कोई और नहीं बल्कि अंजलि थी. अंजलि के आते ही मनीष ने उस के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया था. कुछ पल के बाद उसे अपने आगोश में भरते हुए उस ने पूछा, ‘‘अंजलि, तुम ने जितेंद्र की हत्या क्यों की?’’ ‘‘उस की हत्या मैं ने नहीं की है, उस ने मेरे साथ सिर्फ शारीरिक संबंध बनाए थे, जो तुम देख चुके हो.’’ ‘‘हां, लेकिन हत्या किस ने की?’’ ‘‘शायद मेरे जाने के बाद किसी ने हत्या कर दी हो. यही तो मुझे भी समझ में नहीं आ रहा है… और इसीलिए मैं डर रही थी और तुम्हारी बात मानने के लिए राजी हो गई,’’ अंजलि अपनी सफाई देते हुए बोली थी. ‘‘क्या उस की किसी से दुश्मनी रही होगी?’’ मनीष ने सवाल किया.

‘‘मुझे नहीं पता… अब तुम पता करो.’’ ‘‘ठीक है, मैं पता करता हूं.’’ ‘‘मुझे तो डर लग रहा है, कहीं मैं इस हत्या में फंस न जाऊं.’’ ‘‘मेरी रानी, डरने की कोई बात नहीं है, मैं तुम्हारे साथ हूं. मैं तुम्हारी मदद करूंगा. बस, तुम मेरी जरूरतें पूरी करती रहो,’’ मनीष के हाथ उस की पीठ से फिसल कर उस के कोमल अंगों को छूने लगे थे. थोड़ी सी नानुकुर के बाद जब मनीष का जोश ठंडा हुआ, तो उस ने अंजलि को अपनी पकड़ से आजाद कर दिया. मनीष अगले सप्ताह रविवार को मिलने के लिए अंजलि से वादा किया था. अंजलि राजी हो गई थी. इधर अंजलि के मन का बोझ थोड़ा शांत हुआ कि वह मनीष को समझाने में कामयाब रही. मनीष को मुझ पर शक नहीं हुआ है. वह हत्यारे के बारे में पता करने में मदद करेगा. अब अंजलि और मनीष के मिलने का सिलसिला जारी हो चुका था. मनीष एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाता था.

अभी उस की शादी नहीं हुई थी. अंजलि महसूस कर रही थी कि मनीष दिल का बुरा नहीं है. उस की सिर्फ एक ही कमजोरी है. वह हुस्न का दीवाना है. कई बार अंजलि महसूस कर चुकी है कि आतेजाते मनीष उसे देखने की कोशिश करता था, लेकिन वह जानबूझकर शरीफ होने का नाटक करता था. इसीलिए औरों की तरह वह मेरा पीछा नहीं कर पाया था. जितेंद्र की हत्या की जांच कई बार की गई, लेकिन यह पता नहीं चल पाया कि उस की हत्या किस ने की. पुलिस द्वारा जहरीली शराब पीने से मौत की पुष्टि कर तकरीबन उस की फाइल बंद कर दी गई थी. अब अंजलि भी समझ चुकी थी कि पुलिस की ओर से कोई डर नहीं है. जितेंद्र की हत्या के बारे में गांव के लोगों की ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी. इस के पीछे वजह यह थी कि वह लोगों की नजरों में अच्छा इनसान नहीं था. वह शराब तो पीता ही था, औरतों व लड़कियों को भी छेड़ता रहता था.

बहुत से लोग उस के मरने पर खुश भी थे. अंजलि तकरीबन एक साल से मनीष से मिल रही थी. कई बार मनीष उसे उपहार भी देता था. अब तो अंजलि का भी मनीष के बगैर मन नहीं लगता था. एक दिन मनीष अंजलि को अपने गोद में ले कर उस के बालों से खेल रहा था. उस ने अपनी इच्छा जाहिर की, ‘‘क्यों न हम दोनों शादी कर लें? कब तक यों ही हम छिपछिप कर मिलते रहेंगे?’’ इस पर अंजलि बोली, ‘‘मुझे कोई एतराज नहीं है, पर मुझे अपनी मां से पूछना होगा.’’ ‘‘तुम अपनी मां को जल्दी से राजी करो.’’ ‘‘मां तो राजी हो जाएंगी, लेकिन यह बात मैं राज नहीं रखना चाहती हूं.’’ ‘‘कौन सी बात?’’ ‘‘यही कि जितेंद्र की हत्या किस ने की थी.’’ ‘‘किस ने की थी?’’ ‘‘मैं ने…’’ ‘‘कैसे और क्यों?’’ ‘‘3 साल पहले की बात है. मेरी एक बहन रिया भी थी.

घर में मां और मेरी बहन समेत हम सभी काफी खुश थे. पिताजी के नहीं होने के चलते मेरी छोटी बहन रिया मौल में काम कर के अच्छा पैसा कमा लेती थी. उसी के पैसों से हमारा घर चल रहा था. ‘‘जब भी मेरी बहन घर से निकलती थी, जितेंद्र अपनी मोटरसाइकिल से उस का पीछा करता था. मना करने के बाद भी वह नहीं मानता था. ‘‘मेरी बहन रिया उस से प्यार करने लगी थी. जितेंद्र ने मेरी बहन से कई बार शारीरिक संबंध बनाए. बहन को विश्वास था कि जितेंद्र उस से शादी जरूर करेगा. ‘‘लेकिन, जितेंद्र धोखेबाज निकला. मेरी बहन रिया को जितेंद्र के बारे में पता चला कि वह कई लड़कियों की जिंदगी बरबाद कर चुका है. मेरी बहन पेट से हो गई थी.

5 महीने तक मेरी बहन शादी के लिए इंतजार करती रही. जितेंद्र केवल झांसा देता रहा. ‘‘आखिरकार जितेंद्र ने शादी करने से इनकार कर दिया था. उस का मेरी बहन से झगड़ा भी हुआ था. ‘‘मेरी बहन परेशान रहने लगी थी. उस ने मुझे सबकुछ बता दिया था. मैं बहन को ले कर अस्पताल गई थी. वहां मैं ने उस का बच्चा गिरवाया, पर वह कोमा में चली गई थी. उस का बच्चा तो मरा ही, मेरी बहन भी दुनिया छोड़ कर चली गई. उसी दिन मैं ने कसम खाई थी कि जितेंद्र का अंत मैं ही करूंगी. ‘‘इस बार मैं ने गोरा को फंसाया था. मैं भी उस से प्यार का खेल खेलती रही. उस ने कई बार मुझे हवस का शिकार बनाना चाहा, लेकिन मैं उस से अपनेआप को बचाती रही. ‘‘उस दिन जितेंद्र ने मुझे अपने गुसलखाने में बुलाया था. मैं सोच कर गई थी कि आज रात काम तमाम कर के आना है. मैं ने उस की शराब में जहर मिला दिया. ‘

‘मैं उस की मौत को नजदीक से महसूस करना चाहती थी, इसलिए उस की हत्या करने के बाद मैं भी उस के साथ रातभर रही. वह तड़पतड़प कर मेरे सामने ही मरा था. ‘‘सुबह मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूं. जानबूझ कर उस के शरीर से मैं लिपटी हुई थी, ताकि कोई देखे तो गोरा को जिंदा समझे. पकड़े जाने पर पुलिस को गुमराह किया जा सके. हत्या के बारे में शक किसी और पर हो. यही हुआ भी. तुम ने मुझे बेकुसूर समझा. ‘‘मैं शादी करने से पहले सबकुछ तुम्हें बता देना चाहती हूं, ताकि भविष्य में पता चलने पर तुम मुझे गलत न समझ सको. मैं ने अपनी बहन रिया की मौत का बदला ले लिया, इसलिए मुझे इस बात का कोई अफसोस नहीं है.’’

मनीष यह सुन कर हक्काबक्का था. उस के मन में थोड़ा डर भी हुआ, लेकिन जल्द ही अपनेआप को संभालते हुए बोला, ‘‘तुम ने ठीक ही किया. तुम ने उस को उचित सजा दी है. तुम्हारे ऊपर किसी तरह का इलजाम लगता भी तो मैं अपने ऊपर ले लेता, क्योंकि मैं अब तुम से प्यार करने लगा हूं.’’ अंजलि ने मनीष को अपनी बांहों में ले कर चूम लिया था. वह अपनेआप पर गर्व कर रही थी कि उस ने गलत इनसान को नहीं चुना है. फिर वह सुखद भविष्य के सपने देखने लगी थी. उन दोनों ने जल्दी ही शादी कर ली. अंजलि अब मनीष को अपना राजदार समझती थी.

प्रायश्चित्त

“राजकुमारी, वापस आ गई वर्क फ्रौम होम से? सुना तो था कि घर पर रह कर काम करते हैं पर मैडम के तो ठाठ ही अलग हैं, हिमाचल को चुना है इस काम के लिए.” बूआ आपे से बाहर हो गई थी मिट्ठी को अपनी आंखों के सामने देख कर.

“अपनाअपना समय है, बूआ. कोई अपनी पूरी ज़िंदगी उसी घर में बिता देता है जहां पैदा हुआ हो और किसी को काम करने के लिए अलगअलग औफिस मिल जाते हैं, वह भी मनपसंद जगह पर,” मिट्ठी ने इतराते हुए बूआ के ताने का ताना मान कर ही जवाब दिया.

बूआ पहले से ही गुस्से में थी, अब तो बिफर पड़ी, “सिर पर कुछ ज्यादा चढ़ा दिया है, तुझे. पर मुझे हलके में लेने की गलती मत करना. तेरी सारी पोलपट्टी खोल दूंगी भाई के सामने. नौकरी ख्वाब बन कर रह जाएगी. मुंह पे खुद ही पट्टी लग जाएगी.”

“आप से ऐसी ही उम्मीद है, बूआ. लेकिन कोई भी कदम उठाने से पहले सोच लेना कि मैं मां की तरह नहीं हूं, जो तुम्हारे टौर्चर से तंग आ कर अपनी जान से चली गई.”

बूआ मिट्ठी को मारने के लिए दौड़ी ही थी कि कुक्कू बीच में आ गया. उन्हें दोनों हाथों से पकड़ कर अंदर ले गया. तब तक गुरु भी आ गया था. वह मिट्ठी को उस के कमरे तक छोड़ कर आया. मिट्ठी आंख बंद कर के अपनी कुरसी पर बैठ गई. जो उस ने जाना था उस से भक्ति बूआ के लिए उस की नफ़रत और भी बढ़ गई थी. बचपन से ही उसे बूआ से नफ़रत थी. वजह, उन का दोगला व्यवहार. कुक्कू और गुरु को हमेशा प्राथमिकता देती. घर का कोई भी काम हो, मिट्ठी से करवाती और हर बात में उसे ही पीछे रखती. घर में खाना उन दोनों की पसंद का ही बनता था. मिट्ठी का कुछ मन भी होता तो उस में हज़ार कमियां बता कर बात को टाल दिया जाता. मिट्ठी को समझ नहीं आता था कि वह अपनी ससुराल में न रह कर उन के घर में क्यों रह रही है. सब के सामने उन का बस एक ही गाना था-

‘मां तो छोड़ कर चली गई अपने दोनों बच्चों को. वह तो मेरी ही हिम्मत है जो अपना घरबार छोड़ कर यहां पड़ी हुई हूं इन की परवरिश के लिए.’

‘अब तो हम बड़े हो गए हैं, अब तो अपना घर संभालो जा कर.’ मन ही मन मिट्ठी बुदबुदाती. घर में सबकुछ बूआ की मरजी से ही होता आ रहा था. मिट्ठी और उस का छोटा भाई कुक्कू उन की हर बात मानते आ रहे थे. बूआ का बेटा गुरु भी कुक्कू का हमउम्र था, इसलिए दोनों साथ ही रहते थे. लेकिन मिट्ठी को अब घर में रहना और बूआ के कायदेकानून से चलना बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था. यही कारण था कि उस ने कालेज पूरा होते ही नौकरी ढूंढ ली थी. पैकेज ज्यादा नहीं था. नौकरी दूसरे शहर में थी. छह महीने होतेहोते कंपनी में उस की अच्छी साख बन गई थी. घर आने का उस का मन ही नहीं होता था. इस बार पापा से ज़िद कर के उस ने हिमाचल वाले फ्लैट में रहने का मन बनाया. वर्क फ्रौम होम ले लिया. कुक्कू को जैसे ही भनक लगी, तुरंत उस के पास आया.

“देखो दीदी, मैं जानता हूं, तू हिमाचल क्यों जा रही है. मां के बारे में जानने का मेरा भी उतना ही मन है जितना तुम्हारा. बस, मैं कभी दिखाता नहीं हूं. मेरी भी अब छुट्टियां हैं. मैं भी वहीं पर कोई इंटर्नशिप कर लूंगा.”

मिट्ठी को कुक्कू की बात सही लगी और उसे साथ ले जाने को तैयार हो गई. गुरु को उस के पापा ने अपने पास बुला लिया था, इसलिए दोनों भाईबहन अपनाअपना सामान ले कर रवाना हो गए. बूआ अपने बेटे गुरु को उन के साथ भेजना चाहती थी लेकिन पति को मना नहीं पाई. भौंहें तान कर मिट्ठी और कुक्कू को विदा किया.

“गगन, तूने भेज तो दिया हिमाचल पर कोई बीती बात बच्चों के सामने आ गई तो क्या होगा ? उसी फ्लैट में रुकने की क्या पड़ी थी, किसी होटल में भी तो रुक सकते थे. तुम तो सब कुछ भूल गए हो.” बूआ ने लगभग डांटते हुए अपने भाई गगन को अपनी बात समझाने की कोशिश की.

“दीदी, 20 साल बीत चुके हैं उस घटना को. हम ने कोई जुर्म नहीं किया है जो छिपे रहेंगे और बच्चों को उस फ्लैट से दूर रखेंगे. वे दोनों उसी फ्लैट में पैदा हुए थे. अपनी जन्मभूमि इंसान को अपनी ओर खींच कर बुला ही लेती है. आप डरिए मत. सब ठीक होगा.” गगन ने अपनी बड़ी बहन को समझाने की कोशिश की.

“मिट्ठी अब कब तक ऐसे ही बैठी रहेगी? चल उठ, नहा कर आ जा. नाश्ता ठंडा हो गया है. हम दोनों कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं? मुझे भी सुनना है तुम लोग कैसे बिता कर आए हो मेरे बिना पूरा एक महीना.” गुरु मिट्ठी को बाथरूम भेज कर ही कमरे से बाहर गया.

“पापा मेरी कंपनी का एक औफिस शिमला में भी है. मैं ने सोचा है वहीं पर ट्रांसफर ले लेती हूं. अपना फ्लैट तो है ही वहां पर,” शाम को पापा घर आए तो मिट्ठी ने प्रस्ताव रखा.

“देखो बेटा, कुछ दिन वहां जा कर रहना दूसरी बात है और वहीं ठहर जाना बिलकुल अलग. तुम जहां हो, अभी वहीं पर रह कर काम करो,” पापा की स्पष्ट न थी.

“पापा, आप ने भी तो सालों वहां पर नौकरी की है. अपना फ्लैट बंद पड़ा है, मैं रहूंगी तो उस का अच्छे से रखरखाव भी हो जाएगा. फिर मेरा मन है वहां जा कर रहने का. प्लीज, एक बार मेरी तरह सोच कर देखो न,” मिट्ठी ने डरतेडरते अपनी बात दोहराई.

“तुझे सीधी तरह से कोई बात क्यों नहीं समझ आती है, लड़की? गगन वैसे ही उन बातों को याद करके परेशान हो जाता है, तुम हो कि खुद के अलावा किसी के बारे में सोचती ही नहीं हो. जा कर अपना काम करो,” बूआ ने अपने लहजे में मिट्ठी को डांटा. पापा के सामने मिट्ठी चुप रह जाती थी लेकिन आज उसे गुस्सा आ गया.

“आप से कौन बात कर रहा है, बूआ? पापा को ही जवाब देने दो. हिमाचल के नाम से इतना डर क्यों जाती हो? कहीं आप के कहने से ही तो पापा वापस नहीं आए वहां से, आप को इसी घर में जो रहना था?” गुस्से में मिट्ठी बोलती चली गई.

गुरु और कुक्कू आ कर उसे अपने साथ ले गए. घर में क्लेश पसर गया. उस रात किसी ने भी खाना नहीं खाया. गगन का गुस्सा शांत हुआ तो बेटी पर प्यार उमड़ पड़ा और उस के कमरे में आ गए. मिट्ठी लैपटौप पर कुछ काम कर रही थी. उसे देख कर गगन जाने के लिए वापस मुड़े, तभी बेटी ने आवाज़ लगाई.

“आइए पापा, मेरा काम तो पूरा हो गया है. बस, कुछ फोटो देख रही थी हिमाचल की.” गगन मिट्ठी के पास दूसरी कुरसी पर बैठ कर फोटो देखने लगे.

“यह फोटो तुम्हे कहां से मिली?” गगन, मिट्ठी, कुक्कू और नीतू की फोटो थी. मिट्ठी ने आश्चर्य से पापा को देखा, बोली, “फ्लैट के स्टोररूम में कुछ सामान पड़ा हुआ था. यह फोटो उस समान में ही थी.” मिट्ठी ने बताया तो गगन ने आगे पूछा, “बाकी सामान कहां है?”

“इस में है, पापा. आपकी और मम्मी की बहुत सारी यादें. मैं अपने साथ उठा लाई. मिट्ठी ने एक थैला गगन के हाथ में थमा कर दरवाज़ा बंद कर दिया. उसे डर था कि पापा को उन के कमरे में नहीं पाएंगी, तो भक्ति बूआ यहीं धमक पड़ेंगी. पापा जितनी देर घर में रहते हैं, उन की नज़र उन्हीं पर रहती है बूआ की, विशेष रूप से जब मिट्ठी आसपास हो तब. पापा उदास हो गए थे उन फोटो को देख कर, मम्मी के छोटेमोटे सामान को देख कर.

“कितना समझाता था कि छोटीछोटी बातों को दिल से लगाना ठीक नहीं लेकिन उसे तो बात की तह तक जाना होता था. क्यों कही, किस ने कही, क्या जवाब देना चाहिए था, बस, इसी में घुलती रहती थी.”

मिट्ठी को अच्छा लगा. बड़े दिनों बाद पापा ने मम्मी के बारे में खुल कर कुछ बोला था. पर अचानक पापा खड़े हो गए. “बेटा, तुम अपना काम करो, मैं चलता हूं. तुम्हारी बूआ ने दूध बना कर रख दिया होगा. उस के भी सोने का टाइम हो गया है. दिनभर काम में लगी रहती है.” दरवाजा बंद कर के पापा मिट्ठी के कमरे से बाहर निकल गए.

बूआ के लिए पापा की चिंता नई बात न थी. उन के एहसान में दबे हुए थे, पापा. उन के बच्चों की परवरिश कर के बूआ ने उन पर बड़ा एहसान चढ़ा दिया था. मिट्ठी ने सामान वापस समेट कर रख दिया. किसी और को पता चल जाता तो बात का बतंगड़ बन जाता. मां के बारे में घर में कोई भी बात नहीं करता था. कुक्कू के ऊपर बूआ अपना अतिरिक्त प्यार लुटाती थी, इसलिए उसे मां की कमी बस तभी महसूस होती जब मिट्ठी को रोते हुए देखता. मिट्ठी जब भी घर में होती उसे मां की कमी हर पल महसूस होती. बचपन के दिन याद आ जाते. मां कैसे हर जगह उसे साथ रखती थीं.

‘लड़के की इतनी परवा नहीं है जितनी लड़की की है. दिनभर इसी के चोंचलों में लगी रहती है. पढ़लिख कर दिमाग खराब हो जाता है छोरियों का. आखिर वंश तो लड़के से ही चलेगा. लड़की को तो एक दिन अपने घर चली जाना है.’ बूआ के ऐसे ताने से मां आहत होती लेकिन हंस कर जवाब देती.

‘दीदी, आप और मैं भी तो लड़कियां ही हैं. और फिर आप के घर का तो रिवाज़ है. आप अपनी ससुराल नहीं गईं तो मिट्ठी को भी यहीं रख लेंगे.’ मां के जवाब से बूआ आपे से बाहर हो जाती.

‘मेरी क्या रीस करनी है? मेरी तो मां बचपन में ही मर गई थी. गगन को अपने हाथों से पाला है मैं ने. कोई बूआ, चाची या ताई भी नहीं थी जो संभाल लेती. गगन ही नहीं जाने देता है. रहो अपने घर और ससुर की भी रोटी सेंको. मैं तो कल ही चली जाऊंगी अपने घर.’

मां फिर हंस पड़ती. ‘नाराज़ क्यों होती हो, दीदी? आप के भाई ही मुझे साथ ले कर गए हैं. मेरा तो मन भी नहीं लगता वहां. यहां छोड़ेंगे तो ससुरजी को रोटी नहीं, सब्जी भी खिलाऊंगी. रिटायर हो गए हैं, खुद ही सब काम करते हैं फिर भी. मुझे अच्छा नहीं लगता है.’

बूआ बात को पकड़ कर अपने पक्ष में कर लेती. ‘तो इसीलिए तो अपना घरबार छोड़ कर पड़ी हूं यहां. तुम अपना घर संभाल लेती तो गगन क्यों मुझे रोके रखता?’ कुछ भी कर के मां के सिर पर हर बात पटक दिया करती थी, बूआ.

कई सालों बाद इस बार नाना मिट्ठी के सामने ही आए. मां के जाने के बाद हर साल नाना दोनों नातियों से मिलने बेटी की ससुराल आते थे. न कोई उन से बात करता था और न ही कोई उन के पास बैठता था. अकेले आते थे और दोनों बच्चों को उन के हिस्से का चैक दे कर चले जाते थे.

नाना ने अपनी वसीयत में अपने बेटे और बेटी को बराबर का हिस्सा दिया था. सालभर की कमाई का आधा हिस्सा बेटी के दोनों बच्चों को दे जाते थे उस के जाने के बाद.

‘कितना फजीता किया था हमारे परिवार का इस आदमी ने. अब लाड़ बिखेरने आता है, बच्चों पर. इस की बेटी गई तो पुलिस ले कर गया था फ्लैट पर. अखबार में भी खबर दी कि मार दिया मेरी बेटी को,’ नाना चले गए तो बूआ का बड़बड़ाना शुरू हो गया.

“वे हमारे नाना हैं, बूआ. उन के बारे में ऐसा सोचना ठीक नहीं,” कुक्कू ने बोला तो बूआ ऐसे शुरू हुई जैसे इंतज़ार ही कर रही थी.

“तेरे दादा और पापा को जेल की हवा खानी पड़ती. वह तो तेरी मां की मैडिकल जांच में नहीं निकला कि उस को मारा है किसी ने.” मिट्ठी चाहती थी कि बूआ और भी कुछ बोल दे. “आप तो तब फ्लैट पर ही थी बूआ. पूजा भी आप ने ही रखवाई थी और पंडित को भी आप ही ले कर गई थी. आप को तो सच पता था, फिर आप ने क्यों छिपाया यह सब.” बूआ आज़ पहली बार डर अपने चेहरे पर छिपा नहीं पाई.

“तुझे किस ने बताया यह सब?” मिट्ठी इसी सवाल का जवाब देना चाहती थी.

“आप के पंडित ने, उन सब लोगों ने जो पूजा में आए थे, पड़ोस वाले.” बूआ सीधे मिट्ठी के सामने आ कर खड़ी हो गई.

“इसीलिए मैं नहीं चाहती थी कि तू जाए वहां पर. यही सब कर के आई है वर्क फ्रौम होम के बहाने.” बूआ के हर शब्द से गुस्सा टपक रहा था.

“मम्मी, पापा आए हैं. थोड़ा ध्यान उन पर दो. अकेले बैठे हैं बैठक में.” गुरु बूआ को वहां से ले गया और मिट्ठी भी पीजी वापस जाने के लिए अपना सामान पैक करने चली गई. गुरु 2 साल से खाली घूम रहा था. छोटीमोटी नौकरी उसे समझ नहीं आती थी और बड़ी के लायक न तो उस में काबिलीयत थी और न ही उस ने कोशिश की. जैसेतैसे इंजीनियरिंग पास की थी.

“मां, मुझे उसी कंपनी में नौकरी मिल गई है जिस में मामा काम करते थे.” गुरु ने घोषणा की तो बूआ रसोई से लड्डू का डब्बा उठा कर ले आई. कुक्कू ने लड्डू खा कर डब्बा उन के हाथ से ले लिया.

“बूआ, तुम खा लो, फिर बैठक में ले जा रहा हूं और वहां से बच कर नहीं आएंगे.” बूआ रोकती रह गई पर कुक्कू डब्बा उठा कर भाग गया. मिट्ठी बिना कुछ कहे ही घर से निकल गई. बूआ ने रोकने की कोशिश नहीं की. पीजी में जाते ही बिस्तर पर लेट गई. हमेशा की तरह मां याद आ रही थी.

‘एक हफ्ता तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी मां?’ मां पहली बार कुक्कू को ले कर नाना के घर गई तो मिट्ठी को पापा ने अपने पास ही रोक लिया था. रोतेरोते मुंह से निकल गया था मिट्ठी के. बाथरूम में चली गई मुंह धोने के लिए जिस से पीजी की बाकी लड़कियों को शक न हो. हर बार घर से आ कर एकदो दिन इसी तरह परेशान रहती थी मिट्ठी.

चार दिनों बाद ही पापा का फोन आया, देख कर मिट्ठी सोच में पड़ गई. पहली बार में तो फोन उठाना ही भूल गई. दूसरी बार जब आया तो उठाया, ‘बेटा, तुम्हारी भक्ति बूआ एक पूजा करवाना चाहती हैं. शिमला वाला फ्लैट तुम्हारी मां के जाने के बाद से बंद ही है. अब गुरु वहीं रहेगा, इसलिए पूजा कर के उसे पवित्र करवाना चाहती हैं. अगले रविवार को तुम भी थोड़ा समय निकाल लेना.”

“पापा, आप को पता है, मां जब से गई हैं, विश्वास उठ गया है मेरा पूजापाठ से.” मिट्ठी ने स्पष्ट किया.

“जानता हूं, बेटा. पर हो सकता है यह पूजा तुम्हारे टूटे विश्वास को जोड़ने में कामयाब हो जाए. ऐसा करते हैं, इस पूजा को तुम ही करवाओ. पंडितजी से तो मिल ही चुकी हो.” मिट्ठी समझ गई, वह मना नहीं कर पाएगी पापा को. तभी एक विचार उस के दिमाग में कौंधा.

“ठीक है पापा, कोशिश करती हूं. फ्राइडे तक आप को बताती हूं. भक्ति बूआ को बोलना अब उन के टैंशन के दिन गए. पंडितजी से मैं खुद ही बात कर लूंगी.”

पापा की खुशी फ़ोन पर ही फूट पड़ी. “अब उस का एहसान चुकाने का समय आ गया है. खुद को भुला कर उस ने हमारे घर को संभाला है. तुम ने यह ज़िम्मेदारी ले कर मेरे दिल का बोझ हलका कर दिया है.” पापा फ़ोन रखने ही वाले थे कि मिट्ठी ने कहा, “पापा, मैं चाहती हूं कि इस पूजा में नाना को भी बुलाऊं. मां के जाने के बाद नानी भी चली गईं. वे भी अकेले ही हैं. दादाजी भी गांव में चले गए हैं उस के बाद. प्लीज, उन दोनों को भी बुलाने दीजिए.”

कुछ देर तक पापा ने कुछ नहीं कहा लेकिन फ़ोन नहीं काटा. फिर यह कहते हुए फ़ोन रखा, “तुम कहती हो तो मना कैसे कर सकता हूं. बुला लो. भक्ति को मैं समझा लूंगा.”

मिट्ठी ने कमरे से बाहर आ कर आसमान की ओर देखा. उसे महसूस हुआ जैसे मां वहीं से मुसकरा कर कह रही है. “आखिर तुम ने रास्ता निकाल ही लिया सच से परदा उठाने का.” मिट्ठी केवल निर्देश दे रही थी और कुक्कू उस का पालन कर रहा था. पापा ने इस बार चौका लगाया था. “भक्ति दीदी, तुम इतने सालों से सब संभालती आ रही हो, अब मुझे भी कुछ करने का अवसर दो. इस बार पूजा की पूरी ज़िम्मेदारी मैं संभाल लूंगा. आजकल वैसे भी सब काम मोबाइल से हो जाते हैं. लंचटाइम में औफिस में बैठ कर सब प्रबंध कर दूंगा.”

भक्ति सकपका कर बोली, “गगन, क्या तू भी यही मानता है कि मेरी पूजा के कारण ही नीतू की जान गई?”

गगन ने दीदी का हाथ पकड़ लिया. “ऐसा कुछ नहीं है, दीदी. तुम ने मिट्ठी और कुक्कू के लिए कितनाकुछ किया है. मैं भी चाहता हूं कि गुरु को नौकरी मिलने और वहां सैट होने में मदद कर पाऊं. बस, इसीलिए आप को तनाव नहीं देना चाहता हूं.”

भक्ति का दिल भाई की बात मानने से इनकार कर रहा था लेकिन उसे मना भी नहीं कर सकती थी. “ठीक है, गगन. मुझे तो इस बात की खुशी है कि तू पूजा के लिए तैयार हो गया है. कितने साल हो गए, घर में कोई शुभ काम नहीं हुआ.”

“अब होगा दीदी और आप को परेशान भी नहीं होना पड़ेगा. बच्चे अब बड़े हो गए हैं. उन को भी ज़िम्मेदारी लेना सीखना चाहिए न. बस, इस बार उन की ही सहायता लूंगा.”

निश्चित तारीख पर सब लोग शिमला के उस फ्लैट में इकट्ठे हो गए. दादाजी और नाना को कुक्कू ने मना लिया. सब काम तैयार हो गया तो मिट्ठी भी आ गई. पूजा शुरू हुई. पंडितजी ने हवन और आरती करने के बाद जैसे ही जाने को कहा, भक्ति बूआ ने आदतन उन्हें रोक लिया.

“पंडितजी, गुरु की कुंडली देख कर बताइए कि क्या सावधानियां रखनी हैं और कुछ ऊंचनीच हो जाए तो क्या उपाय होगा?”

पंडितजी ने काफ़ी देर तक कुंडली को देख कर कुछ गणना की, फिर बोले, “गुरु मामा की छोड़ी हुई नौकरी पकड़ रहा है. उन्हीं के घर में रहेगा तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बहूरानी की आत्मा इन से संपर्क करे.” भक्ति बूआ ने तुरंत गुरु की कुंडली पंडितजी के हाथ से ले ली. लेकिन उन्होंने अपनी बात जारी रखी. “आज़ की पूजा में ही अगर कुछ मंत्र और पढ़ लिए जाएं और सच्चे दिल से बहूरानी को याद कर के उन से माफ़ी मांगी जाए तो बला टल सकती है.”

सब भक्ति बूआ की ओर देख रहे थे.

“तो जो सही है वो करो, मैं कौन सा मना कर रही हूं. इन बातों का कुछ मतलब थोड़े ही है.” बूआ उठ कर जाना चाहती थी लेकिन फूफाजी ने बिठा दिया.

“पंडितजी, जो बाकी है उस को भी पूरा कीजिए. बेटे को मुश्किल से रोज़गार मिला है, उस में कोई अड़चन न आए, उस का उपाय आप शुरू कीजिए.”

पंडितजी ने मंत्र पढ़ने शुरू किए. सबसे पहले नानाजी बोले. “नीतू बेटा, अगर तू सुन रही है तो मुझे माफ़ करना. मैं समय से तुम्हारी चिट्ठी नहीं पढ़ सका. तुम बच्चों को ले कर मेरे पास आना चाहती थीं लेकिन तुम्हारा खत मुझे तुम्हारे जाने के बाद मिला.”

अब पापा भी चुप नहीं रहे. पहली बार उन्होंने बच्चों के सामने अपनी पत्नी को ले कर कुछ कहा. “मैं भी खतावार हूं, नीतू. तुम्हारे मना करने पर भी मैं ने अपने बिजनैस के जनून के कारण नौकरी छोड़ी और तुम्हें तुम्हारे घर भी नहीं जाने दिया. मुझे डर था कि ससुराल में मेरी साख कम हो जाएगी.”

अब पंडितजी ने बोल कर सब को चौंका दिया. “हो सके तो माफ़ कर देना, बहूरानी. मैं नहीं जानता था कि तुम पूरे महीने व्रत कर रही थी. मैं ने ही भक्तिजी के कहने पर यह घोषणा की थी कि तुम्हारे कुंडली दोष के कारण ही गगन की नौकरी गई है और व्यवसाय भी शुरू नहीं हो पा रहा है. मुझे पता होता तो तुम्हें लगातार 3 दिन निर्जल, निराहार व्रत का उपाय न बताता.” सब की नजर भक्ति की ओर थी.

फूफाजी ने उन्हें कुछ बोलने के लिए हाथ से इशारा किया. भक्ति बूआ रोते हुए बोली, “नीतू, हो सके तो मुझे भी माफ़ करना. पंडितजी से बात कर के मैं ने ही वह पूजा रखी थी. मेरे कहने पर ही उन्होंने कुंडली देखी थी. दूध पीते बच्चे की मां ऐसी कठिन विधि नहीं अपना पाएगी यह जानते हुए भी मैं ने तुम पर दबाव बनाया.” बूआ बोल ही रही थी कि मिट्ठी बीच में बोल पड़ी.

“मां को 3 दिनों से उलटीदस्त हो रहे थे, फिर भी वे पूजा के काम में लगी रहीं और अपनी दवाई भी नहीं ले पाईं व्रत करने के कारण. अगर दवा लेतीं तो उन को हार्टअटैक न आता.”

आज़ पहली बार भक्ति बूआ ने मिट्ठी को घूर कर नहीं देखा.

नाना उठ कर खड़े हो गए. “बस, यही जानने के लिए मैं बेचैन था. अगर सही बात पता चल जाती तो मैं पुलिस के पास कभी न जाता. मेरी बेटी अचानक चली गई, अपनी नातियों से रिश्ता क्यों तोड़ता.”

कुक्कू ने नाना को पकड़ कर बिठा दिया और खुद भी उन के पास ही बैठ गया. फूफाजी ने भक्ति बूआ को वहां से उठा दिया और सामान ले कर चलने लगे. आज़ गगन ने उन्हें नहीं रोका.

बूआ खुद ही गगन के पास आई. “हो सके तो माफ़ कर देना, मेरे भाई. इसी एक गलती को सुधारने के लिए अपने घर नहीं गई.”

“पर मुझे तो सच बता देतीं, दीदी. जीनामरना अपने हाथ में नहीं है लेकिन मेरे विश्वास का कुछ तो मान रखतीं आप.”

भक्ति बूआ साड़ी के पल्लू में मुंह छिपा कर रो रही थी. फूफाजी ने आ कर पापा को सांत्वना दी.

“इस गलती की सज़ा अब मिलेगी इस को. अब यह तब तक तुम्हारे घर नहीं आएगी जब तक तुम बुलाओगे नहीं.” दादाजी उठने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मिट्ठी ने उन्हें रोक दिया.

“भक्ति को विदा कर देता हूं, बेटा. शादी के 26 साल बाद ससुराल जा रही है. अब तो तू सब संभाल लेगी. उस को जाने दो.”

कुक्कू पंडितजी की ओर देख कर मुसकरा दिया. उन के प्रायश्चित्त पाठ ने वह कर दिखाया था जो सालों से कोई नहीं कर पाया था.

बाबाओं का महाजाल

पिताजी को महंत श्रवणदास के कमरे में छोड़ कर रक्षित बाहर आया और बड़े बेमन से हौल में लगा टीवी देखने लगा. अचानक टीवी पर आ रहे समाचार ने उसे चौंकाया-

‘हाथरस में भोलेबाबा के प्रवचन के दौरान हुई भगदड़, 121 लोगों की मौत. भगदड़ में दबे अधिकांश लोग भयंकर गरमी और उमस में सांस न ले पाने व दबने से मर गए.’

ओह, ये बाबा लोग और न जाने कितने परिवारों को तोड़ेंगे और न जाने कितने लोगों की जान लेंगे. जाते ही क्यों हैं लोग इन के प्रवचन सुनने, आखिर हमारे जैसा ही कोई इंसान कैसे भगवान का दूत हो सकता है? अब वह दूसरों की क्या कहे, उस के अपने पिता ने ही मंदिर और भगवान को ले कर तूफान मचा रखा है. आखिर हार कर उसे पिताजी को उन के कहे अनुसार महंत के पास लाना ही पड़ा है.

वह बहुत अच्छी तरह जानता है कि ये सब ढोंगी हैं पर खुद को बताते ऐसे हैं जैसे मानो ये भगवान से साक्षात्कार कर के आए हों. पर आज सबकुछ जानते हुए भी वह अपने पिता के आगे मजबूर है और अपने ही पिता को अपने साथ अहमदाबाद में रहने के लिए राजी करने के लिए उसे मंदिर के महंत के आगे नतमस्तक ही होना पड़ रहा है. इन ढोंगियों के आगे झुकते हुए वह बेबस है, हताश है पर करे तो करे क्या. अपने पिता को यों मंदिर में इन के भरोसे भी तो नहीं छोड़ सकता.

“अरे, तुम यहां बैठे हो, पिताजी कहां हैं,” बड़ीबहन रितिका की आवाज सुन कर वह चौंक गया.

“बड़ी देर हो गई तुझे आने में. तुम तो सुबह ही पहुंचने वाली थीं यहां,” रक्षित ने कुछ उदास स्वर में कहा.

“दिल्ली से तो सही समय पर चली थी ट्रेन पर आगरा पहुंचतेपहुंचते लेट हो गई. हां, तो फिर क्या हुआ, कुछ निराकरण निकला कि नहीं,’’ रितिका ने रक्षित के पास बैठते हुए कहा.

“क्या निकलेगा, वे बस मंदिर में रहना चाहते हैं और कहीं नहीं, न तेरे पास, न मेरे पास. मंदिर के बड़े महंत जी से कहा है उन्हें समझाने के लिए, देखो क्या होता है,” रक्षित ने उदास स्वर में कहा.

“ओह, पूरी जिंदगी तो निकल गई हमारी यह सब देखतेदेखते, अब और कितना देखना पड़ेगा. सच, मैं आज 55 वर्ष की होने को आई लेकिन बचपन से यही सब देखती आई हूं अपने घर में,” कहते हुए रितिका मानो अपने बचपन में पहुंच गई.

उस समय वह 10 साल की थी जब प्रोफैसर पिता हर दिन एक बाबा के आश्रम में जाया करते थे. हमेशा कालेज के बाद पिता को लेट आते देख एक दिन मां झगड़ पड़ीं, ‘आजकल कहां चले जाते हो, रोज ही लेट आते हो और आते ही, बस, खाना खा कर सो जाते हो? न बच्चों की चिंता होती है तुम्हें और न घर की. पूरे दिन खटतेखटते मैं थक जाती हूं, तुम्हें समझ क्यों नहीं आता?’

‘अरेअरे भागवान, इतना गुस्सा क्यों कर रही हो, तुम्हें पता है, आज मैं बाबा रामेश्वर जी का प्रवचन सुनने गया था. बहुत पहुंचे हुए संत हैं. तुम भी चलना मेरे साथ, बहुत अच्छा लगेगा. बहुत अच्छा प्रवचन देते हैं. सच पूछो तो जिंदगी जीना सिखा रहे हैं वे लोगों को. इतने सारे लोग आए थे कि जगह कम पड़ गई.’

‘मुझे नहीं जाना ऐसे किसी भी बाबा के पास. मेरा तो घर ही मेरा मंदिर है और तुम्हें भी यही सलाह दूंगी कि तुम भी अपना ध्यान बीवीबच्चों में लगाओ, इन बाबा के पास नहीं.’ मां ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा.

‘तुम अपना उपदेश अपने पास रखो. मैं तो जाऊंगा. कब से तलाश थी मुझे एक गुरु की. अब लगता है मेरी वह खोज पूरी हो गई है. तुम्हें पता नहीं है कि हर इंसान का एक गुरु होना जरूरी है ताकि जीवन के किसी भी मोड़ पर आई समस्याओं के समाधान के लिए गुरु जी की शरण में जाया जा सके, और गुरु ही वह सीढ़ी होता है जो इंसान को इस संसार में जीवन जीने का तरीका व मोक्ष प्राप्त करने का मार्ग बताता है,’ पापा ने उत्सुकतापूर्वक और अपने गुरुजी पर भरोसा जताते हुए कहा था.

“पापा हर दिन अपने कालेज के बाद न केवल बाबा के आश्रम में जाते थे बल्कि खासा पैसा भी देते थे. जिस पर घर में हमेशा झगड़े होते रहते थे. इसी सब के बीच एक दिन अचानक पापा का तथाकथित गुरु वह बाबा अपने सारे भक्तों का पैसा ले उड़ा. भक्त हैरत से रोते कल्पते रहे. आम भक्तों की ही तरह पापा काफी दिनों तक उदास रहे और फिर धीरेधीरे ठीक हो गए.

“और फिर उस के बाद अपने घर में आगमन हुआ बाबा बाल ब्रह्मचारी का जिन के बारे में उन के चेलेचपाटों ने प्रचारित किया कि वे बाल्यावस्था में हैं और बाल्यावस्था वह अवस्था होती है जब पूर्ण जीवन जी चुकने के बाद इंसान मोक्ष और जीवन के अंत की ओर प्रस्थान करने लगता है तो उस की बुद्धि और विवेक बिलकुल बच्चे जैसा हो जाता है और ये ब्रह्मचारी बाबा अपनी उसी अवस्था में हैं.

“बाबा हर दिन नईनई चीजों की मांग करते थे, बिलकुल बच्चों की तरह जिद किया करते थे. कभी बच्चों की तरह रोना शुरू कर देते तो कभी जोरजोर से हंसना, रक्षित ने अपनी याददाश्त पर जोर डालते हुए कहा.

“तुझे याद है, पापा ने खुद कभी मोंटी कार्लो का स्वेटर नहीं पहना था और बाबा जी के लिए मोंटी कार्लो का स्वेटर ले कर आए थे और बाबा जी ने बच्चों की तरह खुश होते हुए खुद वह ब्रैंडेड स्वेटर पहन कर पापा को अपना फटा व मैलाकुचेला स्वेटर दे दिया था जिसे पहन कर पापा जी खुद को देवदूत समझते थे और नहाधो कर उस फटे स्वेटर को पहन कर बाहर वाक किया करते थे,” रितिका ने उदास स्वर में कहा.

“वह दिन याद है जब चाचाचाची आए हुए थे और पापा अपने उन बालब्रह्मचारी गुरुजी को घर ले कर आ गए थे. वह ढोंगी बाबा अकसर पानी के गिलास को उठा कर फेंक देता था. सामान इधर उधर छुपा देता था और फिर पापा कहते थे कि वो अभी बालबुद्धि में होने के कारण इस तरह का व्यवहार कर रहे हैं,” रक्षित ने कहा.

“अरे तुम्हें याद है कि अकसर इस बात के पीछे मम्मीपापा में जम कर लड़ाई हुआ करती थी. वे कहती थीं कि यदि बाबा बच्चा हैं तो कभी जमीन पर क्यों नहीं बैठते, क्यों अपने हाथ में पहना सोने का कड़ा किसी को नहीं देते,” रितिका बोली थी.

“सच में उस दिन तो अति ही हो गई थी जब पापा एक दिन के लिए घर आए चाचाचाची को घर छोड कर बाबा के पीछेपीछे चले गए थे और 2 दिनों बाद वापस लौटे थे और इस घटना के कुछ दिनों बाद ही वह बालब्रह्मचारी बाबा मंदिर के आश्रम के लिए इकट्ठा किया गया सारा चंदा ले कर रफूचक्कर हो गया था. बाद में पता चला कि वह ढोंगी बालब्रह्मचारी बाबा हरियाणा का रहने वाला 5 बच्चों का पिता था और उस के नाम अनेक एफ़आईआर दर्ज थीं और फिर जब हम ने पापा से कहा कि आप के गुरुजी नौदोग्यारह हो गए तो पापा के पास शब्द नहीं थे उस के बारे में बोलने को,” रक्षित ने व्यंग्यपूर्ण हंसते हुए कहा.

“भाई, मुझे समझ नहीं आता कि एक पढ़ालिखा इंसान, जो कालेज में बच्चों को इतिहास पढ़ाता है, दिमाग से कभी क्यों नहीं सोच पाया कि ये जितने भी बाबा होते हैं इन का सारा क्रियाकलाप उन की स्वार्थसिद्धि और आम जनता से पैसा वसूलने के लिए होता है. हां, वह बात दूसरी है कि ये सारे काम अप्रत्यक्ष रूप से होते हैं जो आम जनता को जरा भी दिखाई नहीं देते और जनता हमेशा यही गुणगान करती है कि, ‘फलां बाबा बहुत पहुंचा हुआ है. मेरी फलांनी समस्या को चुटकियों में हल कर दिया,’ रितिका ने गंभीरतापूर्वक कहा तो रक्षित फिर एक घटना को याद करते हुए बोला, “अरे रितू, तुम ने सही कहा. तुम्हें वह अपने पड़ोस में रहने वाली बिल्लो आंटी याद हैं जो बिलकुल सामान्य महिला थीं पर नवरात्र के दिनों में शाम होते ही चाची को शाम के 6 बजे से देवी आनी प्रारंभ हो जाती थी. दिन में साधारण सी साड़ी पहनने वाली आंटीजी शाम को सुर्ख लाल रंग की साड़ी पहन, खुले काले बालों को सामने अपने मुख पर फैला कर बारबार गरदन को आगेपीछे ठीक वैसे ही हिलाती थीं जैसे फिल्मों में देवी का रूप दिखाया जाता है. उन का एक बेरोजगार लड़का उन देवीरूपी आंटी जी का दूत बना रहता था जो देवी का असिस्टेंट बन कर आंटी के साइड में मोरपंखी का चंवर हिलाता रहता था.

“आंटी के वेदी पर बैठते ही कुछ ही देर में वहां कितने लोगों की भीड़ लग जाया करती थी जो अपनी जिंदगी की अनेक समस्याएं ले कर आते थे देवी जी से निराकरण करवाने. कोई अपने बीमार बेटे को लाता, कोई बेरोजगार अपनी नौकरी की तारीख़ पूछता तो कोई अपने विवाह की तारीख़. और वे तथाकथित देवी जी एक कटोरी में रखे ज्वार के कुछ दाने बेटे के हाथ में रख देती थी और बेटा फिर एक कलावा का धागा और कुछ हवन की भभूत समस्याग्रस्त भक्तों के हाथ में रख देता व समस्या के अनुसार समय बता कर कहता था, जब समस्या हल हो जाए तो देवीजी पर सामर्थ्यानुसार चढ़ावा चढ़ा देना.”

“पर रक्षित, बिल्लों आंटी ज्वार के दाने क्यों रखती थीं अपने बेटे के हाथ में?” रितिका ने कुछ उत्सुकता से पूछा.

“अरे, यह बिल्लो आंटी के पूरे परिवार का मिलाजुला प्रयास था. उन लोगों ने कोडवर्ड बना रखे थे जैसे बीमारी के लिए 2 दाने, नौकरी के लिए 4 और विवाह के लिए 5 दाने. बस, आंटी समस्या के अनुसार दाने अपने बेटे के हाथ पर रखती थीं और बेटा उस की व्याख्या करता था. आंटी का बेटा बीमारी वाले को 15 दिन, शादीविवाह वाले को 6 माह में समस्या हल हो जाने को कहता था क्योंकि आमतौर पर बीमारी 15 दिन में ठीक हो जाती है, शादीविवाह, नौकरी आदि के लिए चूंकि इंसान प्रयासरत रहता है तो 6 माह में सौल्व हो ही जाती है. तुम याद करो, वे अंकल कहते थे कि चार बेटों और एक बेटी यानी कुल 7 सदस्यीय परिवार के लिए साल के 2 नवरात्र बहुत बड़े सहारा होते हैं क्योंकि साल में 2 बार आने वाली इन 9 रात्रियों के दौरान उन के यहां नकद, कपड़े, फल और ढेरों मेवा चढ़ावे के रूप में इतने अधिक आ जाया करते थे कि सालभर खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती थी.”

“मुझे तो कभी समझ ही नहीं आता कि हमारे जीवन की समस्यायों को कोई दूसरा कैसे सुलझा सकता है, किसी की बीमारी को डाक्टर ठीक करेगा या ये बाबा और देवियां. नौकरी तो इंसान की मेहनत से लगेगी या इन ढोंगियों के आशीर्वाद से. क्यों अपने ऊपर भरोसा न कर के लोग इन बाबाओं के चक्कर में पड़ते हैं और वे बाबा तो सम्रद्ध होते जाते हैं जबकि आम आदमी कंगाल हो जाता है,” रितिका ने अपनी बात को स्पष्ट करते हुए कहा.

“क्या ये सब हमारे पापा के टाइम में ही होता था, दीदी? आज का यूथ इन सब से दूर है क्या?” रक्षित ने कुतूहल से कहा.

“अरे कहां का दूर है, आज का युवा तो और अधिक उलझा है. तुम खुद ही सोचो, अगर युवा दिमाग से काम लेता तो क्या यह हाथरस वाला हादसा होता, क्या हर दिन नए कथावाचक और धर्मगुरुओं का जन्म होता, सीहोर में पंडित प्रदीप मिश्रा की कथा में रुद्राक्ष वितरण के दौरान हुई भगदड़ और मारी गई जनता इस बात का प्रतीक है कि क्या युवा और क्या वृद्ध, सभी इन की गिरफ्त में हैं और ये लोग खुद ऐशोआराम की जिंदगी जीते हैं और जनता को मूर्ख बनाते हैं.

“आजकल अकसर मंदिरों और बाबाओं के प्रवचनों में इतनी अधिक भीड़ होती है कि पुलिस और प्रशासन की सारी तैयारियां धरी की धरी रह जाती हैं और हर दिन नएनए हादसे हो जाते हैं. तुम्हें क्या लगता है, यह केवल बड़ेबुजुर्गों की भीड़ होती है? बिलकुल नहीं. इन में युवा अधिक, बुजुर्ग कम होते हैं.

“अपनी इटावा वाली मौसी अपनी बेटी के मिर्गी के दौरों के इलाज के लिए एक बाबा के पास जाया करती थीं और वह बाबा मौसी को बाहर बिठा कर उन की बेटी के साथ संबंध बनाया करता था जो उन की बेटी ने खुद बाद में बताया. अब मिर्गी जैसी बीमारी का इलाज ये बाबा करेंगे या डाक्टर. पर बात यह है कि अभी तो हमारे पिताजी ने ही अपनी सारी तार्किक बुद्धि को एक डब्बे में बंद कर रखा है. कुछ समझ नहीं आता कि क्या करें?” रितिका ने उदास स्वर में कहा.

“अपने पिताजीमाताजी तो और भी महान हैं. इन लोगों ने तो सारी सीमाएं ही क्रौस कर दी हैं. हम दोनों की शादी के बाद रिटायमैंट का जितना भी पैसा मिला उस सब को तो इन्होंने मंदिर बनवाने में लगा दिया. मंदिर के पुजारी और महंत ने भी भांप लिया कि इन के पास पैंशन का अच्छाखासा पैसा है, मोटा आसामी है, सो न केवल पुजारी बल्कि पुजारी का पूरा परिवार इन दोनों की जम कर सेवा करता था और ये लोग जम कर उन के ऊपर खर्च करते थे.

“इन लोगों ने अपने प्रवचनों से उन का इतना अधिक ब्रेनवाश कर दिया कि हम दोनों में से किसी के भी पास रहना पसंद न कर के इन्होंने यहां मंदिर पर रहना पसंद किया. उन्हें हम दोनों से अधिक ये पुजारी और इन का परिवार अपना लगने लगा. अचानक एक दिन माताजी को अटैक आ गया, रह गए बेचारे पिताजी. जो जिंदगीभर मोक्ष और गुरु व ईश्वर की तलाश करते लेकिन हाथ आया पत्नी का वियोग और अब इन्हें मंदिर से बढ कर और कोई जगह अपने लिए उपयुक्त नहीं लगती. यानी, अब जितना भी पैसा बचा है उस पर भी नजर है इन सब की.”

“समस्या पिताजी की नहीं है, रक्षित, समस्या इन तथाकथित पंडे, पुजारी और बाबाओं ने उत्पन्न कर रखी हैं क्योंकि इन्होंने आम आदमी के दिमाग में अपने उलटेसीधे प्रवचनों से यह भर दिया है कि मनुष्य जीवन का मुख्य उद्देश्य मोक्ष प्राप्त करना है और इसी मोक्ष के चक्कर में पिताजी इन बाबाओं के चक्कर लगाते रहे और अब यहां मंदिर पर ही रहने की जिद लगा कर बैठ गए हैं. न चाहते हुए भी हमें इन बाबाओं की शरण में आना पड़ा है.”

रक्षित और रितिका को मंदिर के प्रांगण में बैठा देख कर मंदिर के पुजारी ने उन्हें बड़े महंतजी के कमरे में जा कर विश्राम करने के लिए कहा तो वे दोनों उस कमरे की तरफ चल दिए. एसी, डबल बेड, सोफे और महंगे कारपेट जैसी आधुनिक सुखसुविधाओं से संपन्न इस कमरे को देखते ही वे दोनों दंग रह गए. रितिका ने जैसे ही अपना सिर सोफे पर टिकाया, उसे वह दिन याद आ गया जब उस की बोर्ड की परीक्षाएं होने वाली थीं और मम्मीपापा पर आसाराम बापू के दीक्षा शिविर में जाने का भूत सवार था क्योंकि आसाराम बापू के भक्तों ने उस समय यह प्रचारित किया था कि इस समय दीक्षा लेने से बहुत बड़ा पुण्य प्राप्त होने वाला है और मोक्ष तो प्राप्त हो ही जाएगा. रिजर्वेशन न मिलने के बावजूद ये दोनों 2 ट्रेन बदल कर अहमदाबाद में दीक्षा लेने पहुंचे थे और फिर घर के मंदिर में आसाराम बापू की तसवीर लगा कर उसी की पूजा की जाती थी.

“दूसरों को मोक्षप्राप्ति का रास्ता बताने वाले वे आसाराम बापूजी आज जेल की हवा में मोक्ष प्राप्त कर रहे हैं,” व्यंग्यपूर्ण हंसी हंसते हुए रक्षित ने कहा.

“पर भैया, मुझे यह समझ नहीं आता कि बारबार धोखा खाने के बाद भी ये पापा जैसे लोग संभलते क्यों नहीं, क्यों इन के झांसे में आ जाते हैं?’’

“इस का कारण है न, दीदी, कि जब इंसान अपने जीवन की समस्याओं से परेशान हो जाता है तो उन का सामना करने की जगह इन बाबाओं के पास जाता है और ये बाबा, जो अपने को भगवान का दूत बताते हैं, इंसान को समस्यायों का सामना करना नहीं, उन से भागना सिखाते हैं ताकि समस्या बनी रही और भक्त इन के पास आता रहे और ये मालामाल होते रहें. पर सोचने की बात है जो इंसान अपने जीवन की समस्याओं न सुलझा पाने के कारण बाबा और पंडित बन जाता है वह हमारे जीवन की समस्याओं को क्या सुलझाएगा.

“तुम्हें याद होगा कि जब अपने पड़ोस में रहने वाली आंटी के पति लिवर की बीमारी के कारण अस्पताल में भरती थे तभी आंटी के गुरु ने उन्हें महामृत्युंजय मंत्र का जाप कराने की सलाह देते हुए कहा था कि आप बस 21 हज़ार बार मंत्र का जाप करवा लो, गारंटी से अंकल ठीक हो कर घर आ जाएंगे. इस प्रति मंत्र के 100 रुपए के हिसाब से पंडितजी ने 21,000 हज़ार रुपए मंत्र के और 4,000 रुपए अन्य सामग्री के लिए हथियाए. उधर पंडितजी मंत्र का जाप करते रहे, इधर अंकलजी की मृत्यु हो गई.”

“सब अच्छी तरह याद है मुझे, कुछ भी नहीं भूला हूं. एक बात और याद आ रही है जब मम्मी लिवर सिरोसिस के कारण लंबे समय तक बीमार रही थीं और तब पापा के एक दोस्त अपने घर में एक बाबा को ले कर आए थे. बाबा क्या, 55 साल के अधेड़ थे वे. 15 वर्षों से फल और दूध का ही सेवन करने वाले वे बाबा अपने घर को देख कर पापा से बोले थे,

“शर्माजी, आप का घर बहुत बढ़िया है परंतु ड्राइंगरूम के कोने में एक बहुत ही खतरनाक आत्मा का वास है जिस ने मुझे आप के घर का अन्न-जल तक ग्रहण नहीं करने दिया है. यदि आप ने इस का इलाज नहीं करवाया तो अभी तो केवल पत्नी ही बीमार हुई है, आगे चल कर घर के मुखिया को भयंकर हानि भी हो सकती है. बस, इस के बाद उन बाबा जी अपने घर में 11 हज़ार रुपए ले कर पूजा की. मम्मी तो दवाई और डाक्टर से सही हुईं पर वह बाबा 11 हज़ार रुपए ले कर चला गया था. और तुम्हें पता है, वह यूपी के अयोध्या में रहने वाला एक बेरोजगार युवक था जिस की पत्नी बीमार रहती थी और 35 साल की अविवाहित बेटी घर में बैठी थी. अब सोचो, जो बाबा अपने ही घर का भला नहीं कर पा रहा, वह दूसरों का क्या भला करेगा.”

रक्षित और रितिका बातें कर ही रहे थे कि तभी मंदिर के पुजारी ने कमरे में आ कर कहा, “बड़े महंतजी आप को बुला रहे हैं.”

जैसे ही वे दोनों बड़े महंतजी के कमरे में पहुंचे, वे बोले, “शर्माजी अभी आप के साथ अहमदाबाद ही जाएंगे. हां, हर 2-3 माह में आप दोनों इन्हें यहां जरूर ले कर आएंगें, इस बात का वादा करिए आप लोग.”

“जीजी बिलकुल,” कहते हुए उन दोनों ने न चाहते हुए भी हाथ जोड़ दिए.

“अभी आप लोग आराम करें. शाम की आरती और भोजन ग्रहण कर के जाइएगा,” बड़े महंतजी ने अपनी मधुर वाणी से कहा.

बाहर आ कर रक्षित और रितिका दोनों ने लंबी सांस ली, चलो पापा ने अपनी जिद तो छोड़ दी.

“पर दीदी, इस सब से बचने का कोई उपाय है क्या. क्या लोग मेरी और तुम्हारी जैसी तार्किक सोच को अपना कर जीवन को सरल और सहज नहीं बना सकते?” रक्षित ने रितिका की तरफ़ मुखातिब होते हुए कहा.

“देखो रक्षित, जब तक इंसान ख़ुद के आत्मबल पर भरोसा न कर के इन बाबाओं, पंडितों के चक्कर में फंसता रहेगा तब तक जनता ख़ुद कंगाल और ये मालामाल होते रहेंगे. जिस दिन आम जनता इन के पास आना बंद कर देगी, इन का सारा धंधा चौपट हो जाएगा. एक और बात, जब तक हमारेतुम्हारे जैसे लोग तर्क से नहीं सोचेंगे तब तक इन के जाल में फंसते रहेंगे. और देश में हर दिन एक नए बाबा का जन्म होता रहेगा,” रितिका ने लंबी सांस भरते हुए कहा.

एक दुखद सूचना

देश के आम और खास को जो समोसों से प्यार करते हों या न, जो समोसे चटनी के साथ खाते हों या फिर बिन चटनी के, जो समोसे गरमागरम खाने के शौकीन हों या फिर जैसे मिल गए वैसे ही, जो समोसे चाय के साथ खाने के शौकीन हों या फिर चाय समोसे के साथ पीने के शौकीन हों, देश के वोटर हों या कि जिन के पास चारचार आधारकार्ड हों, वयस्क-अवयस्क जो भी हों, जो जरा सा भी देशभक्त हों, उन सब के लिए दुखद सूचना है कि जनता के आटे में से चुराए मंत्रीजी के समोसे गुम हो गए हैं. उन के समोसों को ढूंढने के लिए मौजिया विभाग आकाशपाताल एक किए हुए है. उस ने अपना खासों का दस्ता, जो चांद पर घूमने का इच्छुक था, अपने खोजी कुत्तों के साथ चांद पर भी भेज दिया है.

मौजिया विभाग सहित इलैक्ट्रौनिक मीडिया से ले कर प्रिंट मीडिया तक के सारे पत्रकार जनहित की खबरें छोड़ कर मंत्रीजी के समोसों की खोज में अपनेअपने स्तर लीडियाते जुटे हैं. पर एक समोसा हैं कि उन का अभी तक कुछ अतापता नहीं. मंत्रीजी के समोसों को पता नहीं कौन अजगर निगल गया? यह देश के लिए संकट की घड़ी है.

मंत्रीजी का कहना है कि उन्होंने इस बारे में अपने सीबीआई प्रमुख से व्यापक चर्चा की और उन्हें आदेश दिया कि वे दूसरी सारी खोजें बंद कर समोसों पर अपनी आंख केंद्रित करें. गए तो गए, पर आखिर उन के समोसे गए कहां? जनता का बजट जनता तक नहीं पहुंचा, पर वे चुप रहे.

जनता के रोजगार के अवसर जनता तक नहीं पहुंचे, वे चुप रहे. जनता का आटा जनता तक नहीं पहुंचा, वे चुप रहे. जनता के अधिकार जनता तक नहीं पहुंचे, वे चुप रहे. पर अब उन के समोसे भी उन तक नहीं पहुंचे? अब वे चुप रहने वाले नहीं. यदि उन के समोसों का पता नहीं चला तो उन सब को निलंबित किया जाए जिन्हें उन तक समोसे पहुंचाने का काम सौंपा गया था. अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे विभाग बंद करा देंगे. देश वैसे ही आर्थिक ‘खुशहाली’ से जूझ रहा है.

लानत है, हे उन के विभागों के मुस्तैद बड़ेबड़े पेटधारियो, क्या उन्होंने इसलिए तुम्हें बड़ेबड़े पदों पर योग्यों को छोड़ कर बैठाया है कि तुम उन के समोसों तक की रक्षा विपक्ष से न कर सको?

असल में हुआ यों कि मंत्रीजी को नवनिर्मित श्मशानघाट का लोकार्पण कर उसे जनता को समर्पित करना था. उन्होंने जनहित में मुसकराते हुए लोकार्पण किया भी. लोकार्पण के बाद श्मशान निर्माण विभाग द्वारा वहां पर चायसमोसों का कार्यक्रम रखा गया था. पर ऐन मौके पर मंत्रीजी को समोसे समर्पित होने से पहले ही गायब हो गए.

लोकार्पण की सफलता के लिए श्मशान निर्माण विभाग के हैड ने श्मशानघाट पर मंत्रीजी के शुभागमन पर श्मशान घाट का शुभारंभ करने की प्रसन्नता में पार्टी आयोजित करने के सिलसिले में अपने से निचले अधिकारी को उन के पेट के अनुरूप समोसे लाने का आदेश दिया. उन से निचले अधिकारी ने अपने बौस के आदेश की तामील करते हुए समोसे लाने के आदेश अपने से छोटे अधिकारी को सुपुर्द कर दिया. उन से छोटे अधिकारी ने समोसे लाने के आदेश अपने से निचले अधिकारी के गले में बांधा. जब सब से नीचे के अधिकारी को अपने नीचे कोई अधिकारी नहीं दिखा तो उसे बहुत गुस्सा आया. बहुत बदनसीब होता है वह अधिकारी जिस के नीचे कोई अधिकारी न हो. जब वही सब से नीचे का अधिकारी निकला तो मन को मारते हुए उस ने अपने से नीचे के कर्मचारी को समोसे लाने का आदेश दिया.

सब से नीचे का कर्मचारी उछलताउछलता समोसे लाने बाजार गया. वह नौकरी ही समोसों की करता है. उस ने मंत्रीजी के लिए उन की पंसद के समोसे लिए और उन में से 4 समोसे वहीं बैठ कर खा उन्हें भी बिल में लगवा दिया. वह समोसे लाया और औफिस में रख दिए. फिर समोसे कहां गए, किसी को कोई पता नहीं. श्मशानघाट का लोकार्पण करने के बाद ज्यों ही मंत्रीजी के समोसों की ढूंढ पड़ी तो समोसे गायब! मंत्रीजी को ज्यों ही अपने समोसों के गुम होने का पता चला, वे लालपीले हो गए.

उन्होंने तत्काल चहेते अफसरमंडल की आपात बैठक बुलाई. अफसरमंडल की बैठक में उन के चहेतों ने इस बात पर गुस्सा जाहिर किया कि लोकप्रिय मंत्रीजी के समोसे गुम हो जाना सच्ची ही गंभीर मुद्दा है. जिस देश में मंत्रीजी तक के समोसे गुम हो जाएं उस देश की कानून व्यवस्था पर उंगलियां नहीं, हाथ-लात उठने चाहिए.

अफसरमंडल ने तत्काल इसे देश की एक और दुखद घटना मानते हुए एक आवाज में कहा कि संबधित विभाग के हैड के खिलाफ कानूनी जांच की जाए. माना, मंत्रीजी समोसे बिन चटनी के ही खाते हैं, पर अब यह भी पता किया जाए कि समोसों के साथ वाली चटनी कहां है? कहीं उसे रिकौर्ड में लिए बिना चुपचाप चटोरे चाट तो नहीं गए? जब तक भोगप्रिय मंत्रीजी के समोसे नहीं मिल जाते तब तक संबंधित अधिकारी को निलंबित किया जाए ताकि जांच में आंच न आए और समोसों को समोसा किया जाए व चटनी को चटनी. जो चहेता अक्षम अधिकारी मंत्रीजी के समोसों की रक्षा नहीं कर सकता वह जनता के आटे की रक्षा क्या खाक करेगा? मंत्रीजी के समोसों की जांच सीबाआई, सीआईडी से न करवा कर रौ से करवाई जाए ताकि देश की जनता को लगे कि देश में कानून व्यवस्था अभी भी कायम है.

हर आम और खास को यह भी सूचित किया जाता है कि जो भी आम या खास मंत्रीजी के समोसे ढूंढ कर लाएगा या सरकार को यह सूचना देगा कि उन के समोसे किस के पेट में हैं उसे 26 जनवरी को डैमफूल पुरस्कार से दिल्ली में सम्मानित किया जाएगा.

मुझे अपनी पत्नी से जैलेसी होने लगी है. मुझे समझ नहीं आ रहा मैं क्या करूं.

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं बाराबंकी का रहने वाला हूं और हाल ही में मेरी शादी हुई है. मेरी पत्नी दिखने में बेहद सुंदर है और साथ ही काफी समझदार भी है. वे पढ़ी-लिखी होने के साथ साथ घर को भी अच्‍छी तरह संभालती है. मैं दिखने में ऐवरेज हूं और ज्यादा पढ़ा लिखा भी नहीं हूं. मेरा खुद का बिजनेस है और अपने इस काम से मैं इतना कमा लेता हूं कि अपने घर का खर्च आसानी से उठा लेता हूं. जब भी कोई रिश्तेदार या दोस्त घर आता है तो मुझे एक बात जरूर बोलता है कि मैं बहुत लकी हूं जो मुझे इतनी सुंदर पत्नी मिली है. वे सब मुझे ऐसे जताते हैं जैसे मैं तो कुछ हूं ही नहीं. मेरे मन में अपनी ही पत्नी को लेकर जलन पैदा होने लगी है लेकिन मैंने अपनी पत्नी को कभी मुझसे निराश नहीं देखा. वह मेरे साथ साथ मेरे पूरे परिवार का अच्छी तरह से खयाल रखती है. कई बार मुझे डर लगता है कि कहीं मेरी जैलेसी मेरे और मेरी पत्नी का रिलेशन खराब ना कर दे. मुझे क्या करना चाहिए ?

जवाब –

मैं आपकी फीलिंग्स अच्छी तरह से समझ सकता हूं लेकिन अपनी ही पत्नी के लिए अपने मन में इस तरह की जलन लाना बेहद गलत बात है. अगर वह आपसे ज्यादा सुंदर है और आपसे ज्यादा पढ़ी-लिखी है तो इसमें उसकी तो कोई गलती नहीं है. एसे में अपनी पत्नी से क्‍यों ईष्‍या कर रहे हैं. आपकी गलती यह है कि आप दूसरों की बातों में आकर अपने आप को नीचा देखने समझने लगे हैं. इसे इंफीरियरिटी कौम्‍पलेक्‍स कहते हैं. यह भाईबहनों या भाईभाई के बीच भी होता है. इस तरह की भावनाएं दोस्‍तों के बीच भी देखी जाती है लेकिन घर के रिश्‍ते में इस तरह के मनोभवों पर लगाम लगाना चाहिए. घर के अंदर ऐसी स्थिति किसी भी रिश्‍ते के भविष्‍य के लिए खतरनाक होता है. आज के समय में अपनों के साथ रिश्‍तों को संवारने पर जोर देना चाहिए न कि तोड़ने पर.

अगर कोई आपको बोलता है कि आपकी किस्मत अच्छी है कि आपको ऐसी पत्नी मिली है तो आपको ईष्‍या करने की बजाय खुश होना चाहिए. अपनी पत्नी की और भी ज्यादा तारीफ करनी चाहिए जिससे कि आपकी पत्नी भी आपसे खुश रहे. बाहर वाले चाहे लाख तारीफ करें लेकिन पति अगर के आगे वह सब फीके हैं.

जैसा कि आपने बताया कि आपकी पत्नी को आपसे कोई शिकायत नहीं है और वह आपके साथ साथ आपके परिवार का पूरा खयाल रखती है तो इस स्थिति में आपको भी पत्नी से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए. आपको खुश होना चाहिए कि आपको ऐसी पत्नी मिली है जो आपके ही नहीं आपके घर के हर सदस्‍यों की मदद के लिए तैयार रहती है. हर इंसान में एक अलग काबि‍लियत होती है. अपनी काबिलियत को नजरअंदाज नहीं करे. अपने मन में इस यकीन को पक्‍का करें कि आप भी पूरा दिन महनत करके अपने घर का खर्चा उठाते हैं. घर के सदस्‍यों की जरूरतों को पूरा करते हैं इसलिए बेहतर होगा यदि आप दूसरों की बातों में आकर अपना रिलेशन को खराब न करें और खुशी खुशी पत्नी के साथ अपना जीवन बिताएं.

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अगली बार कब: आखिर क्यों वह अपने पति और बच्चों से परेशान रहती थी?

उफ, कल फिर शनिवार है, तीनों घर पर होंगे. मेरे दोनों बच्चों सौरभ और सुरभि की भी छुट्टी रहेगी और अमित भी 2 दिन फ्री होते हैं. मैं तो गृहिणी हूं ही. अब 2 दिन बातबात पर चिकचिक होती रहेगी. कभी बच्चों का आपस में झगड़ा होगा, तो कभी अमित बच्चों को किसी न किसी बात पर टोकेंगे. आजकल मुझे हफ्ते के ये दिन सब से लंबे दिन लगने लगे हैं. पहले ऐसा नहीं था. मुझे सप्ताहांत का बेसब्री से इंतजार रहता था. हम चारों कभी कहीं घूमने जाते थे, तो कभी घर पर ही लूडो या और कोई खेल खेलते थे. मैं मन ही मन अपने परिवार को हंसतेखेलते देख कर फूली नहीं समाती थी.

धीरेधीरे बच्चे बड़े हो गए. अब सुरभि सी.ए. कर रही है, तो सौरभ 11वीं क्लास में है. अब साथ बैठ कर हंसनेखेलने के वे क्षण कहीं खो गए थे.

मैं ने फिर भी जबरदस्ती यह नियम बना दिया था कि सोने से पहले आधा घंटा हम चारों साथ जरूर बैठेंगे, चाहे कोई कितना भी थका हुआ क्यों न हो और यह नियम भी अच्छाखासा चल रहा था. मुझे इस आधे घंटे का बेसब्री से इंतजार रहता था. लेकिन अब इस आधे घंटे का जो अंत होता है, उसे देख कर तो लगता है कि यह नियम मुझे खुद ही तोड़ना पड़ेगा.

दरअसल, अब होता यह है कि हम चारों की बैठक खत्म होतेहोते किसी न किसी का, किसी न किसी बात पर झगड़ा हो जाता है. मैं कभी सौरभ को समझाती हूं, कभी सुरभि को, तो कभी अमित को.

सुरभि तो कई बार यह कह कर मुझे बहुत प्यार करती है कि मम्मी, आप ही हमारे घर की बाइंडिंग फोर्स हो. सुरभि और मैं अब मांबेटी कम, सहेलियां ज्यादा हैं.

जब सप्ताहांत आता है, तो अमित फ्री होते हैं. थोड़ी देर मेल चैक करते हैं, फिर कुछ देर टीवी देखते हैं और फिर कभी सौरभ तो कभी सुरभि को किसी न किसी बात पर टोकते रहते हैं. बच्चे भी अपना तर्क रखते हुए बराबर जवाब देने लगते हैं, जिस से झगड़ा बढ़ जाता और फिर अमित का पारा हाई होता चला जाता है.

मैं अब सब के बीच तालमेल बैठातेबैठाते थक जाती हूं. मैं बहुत कोशिश करती हूं कि छुट्टी के दिन शांति प्यार से बीतें, लेकिन ऐसा होता नहीं है. कोई न कोई बात हो ही जाती है. बच्चों को लगता है कि पापा उन की बात नहीं समझ रहे हैं और अमित को लगता है कि बच्चों को उन की बात चुपचाप सुन लेनी चाहिए. ऐसा नहीं है कि अमित बहुत रूखे, सख्त किस्म के इंसान हैं. वे बहुत शांत रहने और अपने परिवार को बहुत प्यार करने वाले इंसान हैं. लेकिन आजकल जब वे युवा बच्चों को किसी बात पर टोकते हैं, तो बच्चों के जवाब देने पर उन्हें गुस्सा आ जाता है. कभी बच्चे सही होते हैं, तो कभी अमित. जब मेरा मूड खराब होता है, तीनों एकदम सही हो जाते हैं.

वैसे मुझे जल्दी गुस्सा नहीं आता है, लेकिन जब आता है, तो मेरा अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं रहता है. वैसे मेरा गुस्सा खत्म भी जल्दी हो जाता है. पहले मैं भी बच्चों पर चिल्लाने लगती थी, लेकिन अब बच्चे बड़े हो गए हैं, मुझे उन पर चिल्लाना अच्छा नहीं लगता.

अब मैं ने अपने गुस्से के पलों का यह हल निकाला है कि मैं घर से बाहर चली जाती हूं. घर से थोड़ी दूर स्थित पार्क में बैठ या टहल कर लौट आती हूं. इस से मेरे गुस्से में चिल्लाना, फिर सिरदर्द से परेशान रहना बंद हो गया है. लेकिन ये तीनों मेरे गुस्से में घर से निकलने के कारण घबरा जाते हैं और होता यह है कि इन तीनों में से कोई न कोई मेरे पीछे चलता रहता है और मुझे पीछे देखे बिना ही यह पता होता है कि इन तीनों में से एक मेरे पीछे ही है. जब मेरा गुस्सा ठंडा होने लगता है, मैं घर आने के लिए मुड़ जाती हूं और जो भी पीछे होता है, वह भी मेरे साथ घर लौट आता है.

एक संडे को छोटी सी बात पर अमित और बच्चों में बहस हो गई. मैं तीनों को शांत करने लगी, मगर मेरी किसी ने नहीं सुनी. मेरी तबीयत पहले ही खराब थी. सिर में बहुत दर्द हो रहा था. जून का महीना था, 2 बज रहे थे. मैं गुस्से में चप्पलें पहन कर बाहर निकल गई. चिलचिलाती गरमी थी. मैं पार्क की तरफ चलती गई. गरमी से तबीयत और ज्यादा खराब होती महसूस हुई. मेरी आंखों में आंसू आ गए. मुझे बहुत गुस्सा आ रहा था कि इतनी बहस क्यों करते हैं ये लोग. मैं ने मुड़ कर देखा. सुरभि चुपचाप पसीना पोंछते मेरे पीछेपीछे आ रही थी. ऐसे समय में मुझे उस पर बहुत प्यार आता है, मैं उस के लिए रुक गई.

सुरभि ने मेरे पास पहुंच कर कहा, ‘‘आप की तबीयत ठीक नहीं है, मम्मी. क्यों आप अपनेआप को तकलीफ दे रही हैं?’’

मैं बस पार्क की तरफ चलती गई, वह भी मेरे साथसाथ चलने लगी. मैं पार्क में बेंच पर बैठ गई. मैं ने घड़ी पर नजर डाली. 4 बज रहे थे. बहुत गरमी थी.

सुरभि ने कहा, ‘‘मम्मी, कम से कम छाया में तो बैठो.’’

मैं उठ कर पेड़ के नीचे वाली बेंच पर बैठ गई. सुरभि ने मुझ से धीरेधीरे सामान्य बातें करनी शुरू कर दीं. वह मुझे हंसाने की कोशिश करने लगी. उस की कोशिश रंग लाई और मैं धीरेधीरे अपने सामान्य मूड में आ गई.

तब सुरभि बोली, ‘‘मम्मी, एक बात कहूं मानेंगी?’’

मैं ने ‘हां’ में सिर हिलाया तो वह बोली, ‘‘मम्मी, आप गुस्से में यहां आ कर बैठ जाती हैं… इतनी धूप में यहां बैठी हैं. इस से आप को ही तकलीफ हो रही है न? घर पर तो पापा और सौरभ एयरकंडीशंड कमरे में बैठे हैं… मैं आप को एक आइडिया दूं?’’

मैं उस की बात ध्यान से सुन रही थी, मैं ने बताया न कि अब हम मांबेटी कम, सहेलियां ज्यादा हैं. अत: मैं ने कहा, ‘‘बोलो.’’

‘‘मम्मी, अगली बार जब आप को गुस्सा आए तो बस मैं जैसा कहूं आप वैसा ही करना. ठीक है न?’’

मैं मुसकरा दी और फिर हम घर आ गईं. आ कर देखा दोनों बापबेटे अपनेअपने कमरे में आराम फरमा रहे थे.

सुरभि ने कहा, ‘‘देखा, इन लोगों के लिए आप गरमी में निकली थीं.’’ फिर उस ने चाय और सैंडविच बनाए. सभी साथ चायनाश्ता करने लगे. तभी अमित ने कहा, ‘‘मैं ने सुरभि को जाते देख कर अंदाजा लगा लिया था कि तुम जल्द ही आ जाओगी.’’

मैं ने कोई जवाब नहीं दिया. सौरभ ने मुझे हमेशा की तरह ‘सौरी’ कहा और थोड़ी देर में सब सामान्य हो गया.

10-15 दिन शांति रही. फिर एक शनिवार को सौरभ अपना फुटबाल मैच खेल कर आया और आते ही लेट गया. अमित उस से पढ़ाई की बातें करने लगे जिस पर सौरभ ने कह दिया, ‘‘पापा, अभी मूड नहीं है. मैच खेल कर थक गया हूं… थोड़ी देर सोने के बाद पढ़ाई कर लूंगा.’’

अमित को गुस्सा आ गया और वे शुरू हो गए. सुरभि टीवी देख रही थी, वह भी अमित की डांट का शिकार हो गई. मैं खाना बना रही थी. भागी आई. अमित को शांत किया, ‘‘रहने दो अमित, आज छुट्टी है, पूरा हफ्ता पढ़ाई ही में तो बिजी रहते हैं.’’

अमित शांत नहीं हुए. उधर मेरी सब्जी जल रही थी, मेरा एक पैर किचन में, तो दूसरा बच्चों के बैडरूम में. मामला हमेशा की तरह मेरे हाथ से निकलने लगा तो मुझे गुस्सा आने लगा. मैं ने कहा, ‘‘आज छुट्टी है और मैं यह सोच कर किचन में कुछ स्पैशल बनाने में बिजी हूं कि सब साथ खाएंगे और तुम लोग हो कि मेरा दिमाग खराब करने पर तुले हो.’’

अमित सौरभ को कह रहे थे, ‘‘मैं देखता हूं अब तुम कैसे कोई मैच खेलते हो.’’

सौरभ रोने लगा. मैं ने बात टाली, ‘‘चलो, खाना बन गया है, सब डाइनिंग टेबल पर आ जाओ.’’

सौरभ ने कहा, ‘‘अभी भूख नहीं है. समोसे खा कर आया हूं.’’

यह सुनते ही अमित और भड़क उठे. इस के बाद बात इतनी बढ़ गई कि मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा.

‘‘तुम लोगों की जो मरजी हो करो,’’ कह लंच छोड़ कर सुरभि पर एक नजर डाल कर मैं निकल गई. मैं मन ही मन थोड़ा चौंकी भी, क्योंकि मैं ने सुरभि को मुसकराते देखा. आज तक ऐसा नहीं हुआ था. मैं परेशान होऊं और मेरी बेटी मुसकराए. मैं थोड़ा आगे निकली तो सुरभि मेरे पास पहुंच कर बोली, ‘‘मम्मी, आप ने कहा था कि अगली बार मूड खराब होने पर आप मेरी बात मानेंगी?’’

‘‘हां, क्या बात है?’’

‘‘मम्मी, आप क्यों गरमी में इधरउधर भटकें? पापा और भैया दोनों सोचते हैं आप थोड़ी देर में मेरे साथ घर आ जाएंगी… आप आज मेरे साथ चलो,’’ कह कर उस ने अपने हाथ में लिया हुआ मेरा पर्स मुझे दिखाया.

मैं ने कहा, ‘‘मेरा पर्स क्यों लाई हो?’’

सुरभि हंसी, ‘‘चलो न मम्मी, आज गुस्सा ऐंजौय करते हैं,’’ और फिर एक आटो रोक कर उस में मेरा हाथ पकड़ती हुई बैठ गई.

मैं ने पूछा, ‘‘यह क्या है? हम कहां जा रहे हैं?’’ और मैं ने अपने कपड़ों पर नजर डाली, मैं कुरता और चूड़ीदार पहने हुए थी.

सुरभि बोली, ‘‘आप चिंता न करें, अच्छी लग रही हैं.’’

वंडरमौल पहुंच कर आटो से उतर कर हम  पिज्जा हट’ में घुस गए.

मैं हंसी तो सुरभि खुश हो गई, बोली, ‘‘यह हुई न बात. चलो, शांति से लंच करते हैं.’’

तभी सुरभि के सैल पर अमित का फोन आया. पूछा, ‘‘नेहा कहां है?’’

सुरभि ने कहा, ‘‘मम्मी मेरे साथ हैं… बहुत गुस्से में हैं… पापा, हम थोड़ी देर में आ जाएंगे.’’

फिर हम ने पिज्जा आर्डर किया. हम पिज्जा खा ही रहे थे कि फिर अमित का फोन आ गया. सुरभि से कहा कि नेहा से बात करवाओ.

मैं ने फोन लिया, तो अमित ने कहा, ‘‘उफ, नेहा सौरी, अब आ जाओ, बड़ी भूख लगी है.’’

मैं ने कहा, ‘‘अभी नहीं, थोड़ा और चिल्ला लो… खाना तैयार है किचन में, खा लेना दोनों, मैं थोड़ा दूर निकल आई हूं, आने में टाइम लगेगा.’’

कुछ ही देर में सौरभ का फोन आ गया, ‘‘सौरी मम्मी, जल्दी आ जाओ, भूख लगी है.’’

मैं ने उस से भी वही कहा, जो अमित से कहा था.

‘पिज्जा हट’ से हम निकले तो सुरभि ने कहा, ‘‘चलो मम्मी, पिक्चर भी देख लें.’’

मैं तैयार हो गई. मेरा भी घर जाने का मन नहीं कर रहा था. वैसे भी पिक्चर देखना मुझे पसंद है. हम ने टिकट लिए और आराम से फिल्म देखने बैठ गए. बीचबीच में सुरभि अमित और सौरभ को मैसज देती रही कि हमें आने में देर होगी… आज मम्मी का मूड बहुत खराब है. जब अमित बहुत परेशान हो गए तो उन्होंने कहा कि वे हमें लेने आ रहे हैं. पूछा हम कहां हैं. तब मैं ने ही अमित से कहा कि मैं जहां भी हूं शांति से हूं, थोड़ी देर में आ जाऊंगी.

फिल्म खत्म होते ही हम ने जल्दी से आटो लिया. रास्ता भर हंसते रहे हम… बहुत मजा आया था. घर पहुंचे तो बेचैन से अमित ने ही दरवाजा खोला. मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोले, ‘‘ओह नेहा, इतना गुस्सा, आज तो जैसे तुम घर आने को ही तैयार नहीं थी, मैं पार्क में भी देखने गया था.’’

सुरभि ने मुझे आंख मारी. मैं ने किसी तरह अपनी हंसी रोकी. सौरभ भी रोनी सूरत लिए मुझ से लिपट गया. बोला, ‘‘अच्छा मम्मी अब मैं कभी कोई उलटा जवाब नहीं दूंगा.’’

दोनों ने खाना नहीं खाया था, मुझे बुरा लगा.

अमित बोले, ‘‘चलो, अब कुछ खिला दो और खुद भी कुछ खा लो.’’

सुरभि ने मुझे देखा तो मैं ने उसे खाना लगाने का इशारा किया और फिर खुद भी उस के साथ किचन में सब के लिए खाना गरम करने लगी. हम दोनों ने तो नाम के कौर ही मुंह में डाले. मैं गंभीर बनी बैठी थी.

अमित ने कहा, ‘‘चलो, आज से कोई किसी पर नहीं चिल्लाएगा, तुम कहीं मत जाया करो.’’

सौरभ भी कहने लगा, ‘‘हां मम्मी, अब कोई गुस्सा नहीं करेगा, आप कहीं मत जाया करो… बहुत खराब लगता है.’’

और सुरभि वह तो आज के प्रोग्राम से इतनी उत्साहित थी कि उस का मुसकराता चेहरा और चमकती आंखें मानो मुझ से पूछ रही थीं कि अगली बार आप को गुस्सा कब आएगा?

शौर्टकट: नसरीन ने सफलता पाने के लिए कौन-सा रास्ता अपनाया?

उफ फिर एक नया ग्रुप. लगता है सारी दुनिया सिर्फ व्हाट्सऐप में ही सिमट गई है. कालेज जाने से पहले अपने मोबाइल में व्हाट्सऐप मैसेज चैक करते समय नसरीन ने खुद को एक नए व्हाट्सऐप ग्रुप सितारे जमीं पर से जुड़ा पाया.

यह व्हाट्सऐप का शौक भी धीरेधीरे लत बनता जा रहा है. न देखो तो कई महत्त्वपूर्ण सूचनाओं और जानकारी से वंचित रह जाते हैं और देखने बैठ जाओ तो वक्त कब बीत जाता है, पता ही नहीं चलता. किसीकिसी ग्रुप में तो एक ही दिन में सैकड़ों मैसेज आ जाते हैं. बेचारा मोबाइल हैंग हो जाता है. आधे से ज्यादा तो मुफ्त का ज्ञान बांटने वाले कौपीपेस्ट ही होते हैं और बचे हुए आधों में भी ज्यादातर तो गुडमौर्निंग, गुड ईवनिंग या गुड नाइट जैसे बेमतलब के होते. लेदे कर कोई एकाध मैसेज ही दिन भर में काम का होता है. बच्चे का नैपी जैसे हो गया है मोबाइल. चाहे कुछ हो या न हो बारबार चैक करने की आदत सी हो गई है. नसरीन सोचतेसोचते सरसरी निगाहों से सारे मैसेज देख रही थी. कुछ पढ़ती और फिर डिलीट कर देती. कालेज जाने से पहले रात भर के आए सभी मैसेज चैक करना उस की आदत में शुमार है.

देखें तो क्या है इस नए ग्रुप में? ऐडमिन कौन है? कौनकौन जुड़ा है इस में? क्या कोई ऐसा भी है जिसे मैं जानती हूं? नसरीन ने नए ग्रुप के गु्रप इन्फो पर टैब किया. इस ग्रुप में फिलहाल 107 लोग जुड़े थे. स्क्रोल करतेकरते उस की उंगलियां एक नाम पर जा कर ठहर गईं. राजन? ग्रुप ऐडमिन को पहचानते ही नसरीन उछल पड़ी.

अरे, ये तो फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट के आयोजक हैं. इस का मतलब मेरा प्रोफाइल फर्स्ट लैवल पर सलैक्ट हो गया है. नसरीन के अरमानों को छोटेछोटे पंख उग आए.

नसरीन जयपुर में रहने वाले मध्यवर्गीय मुसलिम परिवार की साधारण युवती है. मगर उस की महत्त्वाकांक्षा उसे असाधारण बनाती है. 5 फुट 5 इंच लंबी, आकर्षक नैननक्श और छरहरी काया की मालकिन नसरीन के सपने बहुत ऊंचे हैं और अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह किसी भी हद तक जाने का जनून रखती है. जिंदगी को अपनी शर्तों पर जीने वाली नसरीन को समाज के रूढिवादी रवैए ने बागी बना दिया. उस का सपना मौडल बनने का है. मगर सब से बड़ी बाधा उस का खुद का परिवार बना हुआ है. उस के भाई को उस का फैशनेबल कपड़े पहनना फूटी आंख नहीं सुहाता और मां भी जितनी जल्दी हो सके अपने भाई के बेटे से उस का निकाह कराना चाहतीं. मगर इस सब से बेखबर नसरीन अपनी ही दुनिया में खोई रहती है. उस की जिंदगी में फिलहाल शादी और बच्चों के लिए कोई जगह नहीं है. उस की हमउम्र सहेलियां उस से ईर्ष्या करती हैं. मगर मन ही मन उस की तरह जीना भी चाहती हैं.

महल्ले के बड़ेबुजुर्गों और मौलाना साहब तक उस के अब्बा हुजूर को हिदायत दे चुके हैं कि बेटी को हिजाब में रखें और कुरान की तालीम दें, क्योंकि उसे देख कर समाज की बाकी लड़कियां भी बिगड़ रही हैं. लेकिन अब्बा को जमाने से ज्यादा अपनी बेटी की खुशी प्यारी थी, इसलिए उन्होंने उसे सब की निगाहों से दूर फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करने दिल्ली भेज दिया.

एक दिन कालेज के नोटिस बोर्ड पर राजन की कंपनी द्वारा आयोजित फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट का विज्ञापन देखा, तो उसे आशा की एक किरण नजर आई. हालांकि दिल्ली में आए दिन इस तरह के आयोजन होते रहते हैं, मगर राजन की कंपनी द्वारा चुने गए मौडल देश भर में अलग पहचान रखते हैं. विज्ञप्ति के अनुसार विभिन्न चरणों से होते हुए प्रतियोगिता का फाइनल राउंड मुंबई में होना था तथा विजेता मौडल को क्व10 लाख नकद इनाम राशि के साथसाथ 1 साल का मौडलिंग कौंट्रैक्ट साइन करना था. यह जानते हुए भी कि फिल्मों की तरह इस क्षेत्र में भी गौड फादर का होना जरूरी है, नसरीन ने इस प्रतियोगिता के लिए अपनी ऐंट्री भेज दी. उस का सोचना था कि वह यह कौंटैस्ट जीत गई तो आगे का रास्ता खुल जाएगा.

राजन फैशन जगत में जाना माना नाम है. उस की रंगीनमिजाजी के किस्से अकसर सुनाई देते हैं. फिर भी उस के लिए मौडलिंग करना किसी भी नवोदित का सपना होता है. आज खुद इस ग्रुप में राजन के साथ जुड़ कर नसरीन को यों लगा मानो उस की लौटरी लग गई. आज आसमान मुट्ठी में कैद हुआ सा लग रहा था. उसे अचानक नीरस और उबाऊ व्हाट्सऐप अच्छा लगने लगा.

‘सब कुछ सिस्टेमैटिक तरीके से करना होगा.’ सोचते हुए मिशन की प्लानिंग के हिसाब से सब से पहले नसरीन ने व्हाट्सऐप प्रोफाइल की डीपी पर लगी अपनी पुरानी तसवीर हटा कर सैक्सी तसवीर लगाई. फिर राजन को पर्सनल चैट बौक्स में मैसेज भेज कर थैंक्स कहा. राजन ने जवाब में दोनों हाथ नमस्कार की मुद्रा में जुड़े हुए 2 स्माइली प्रतीक भेजे. यह नसरीन की राजन के साथ पहली चैट थी.

एक दिन नसरीन ने अपने कुछ फोटो राजन के इनबौक्स में भेजे तथा तुरंत ही सौरी का मैसेज भेजते हुए लिखा, ‘‘माफ कीजिएगा, गलती से सैंड हो गए.’’

‘‘इट्स ओके. बट यू आर लुकिंग वैरी सैक्सी,’’ राजन ने लिखा.

‘‘सर, मैं इस वक्त दुनिया की सब से खुशहाल लड़की हूं, क्योंकि मैं आप जैसे किंग मेकर से सीधे रूबरू हूं.’’

‘‘मैं तो एक अदना सा कला का सेवक हूं.’’

‘‘हीरा अपना मोल खुद नहीं आंक सकता.’’

‘‘आप नाहक मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा रही हैं.’’

‘‘जो सच है वही कह रही हूं…’’

राजन ने 2 हाथ जुड़े हुए धन्यवाद की मुद्रा में भेजे.

‘‘ओके सर बाय. कल मिलते हैं,’’ और 2 स्माइली के साथ नसरीन ने चैट बंद कर दी.

2 दिन बाद प्रतियोगिता का पहला राउंड था. नसरीन ने राजन को लिखा, ‘‘सर, यह मेरा पहला चांस है, क्या हमारा साथ बना रहेगा?’’

‘‘यह तो वक्त तय करेगा या फिर खुद तुम,’’ कह कर राजन ने जैसे उसे एक हिंट दिया.

नसरीन उस का इशारा कुछकुछ समझ गई. फिर ‘मैं यह कौंटैस्ट हर कीमत पर जीतना चाहूंगी,’ लिख कर नसरीन ने उसे हरी झंडी दे दी.

पहले राउंड में देश भर से चुनी गईं 60 मौडलों में से दूसरे राउंड के लिए  20 युवतियों का चयन किया गया. नसरीन भी उन में से एक थी. राजन ने उसे बधाई देने के लिए अपने कैबिन में बुलाया. आज उस की राजन से प्रत्यक्ष मुलाकात हुई. राजन जितना फोटो में दिखाई देता था उस से कहीं ज्यादा आकर्षक और हैंडसम था. अपने कैबिन में उस ने नसरीन के गाल थपथपाते हुए कहा, ‘‘बेबी, हाऊ आर यू फीलिंग नाऊ?’’

‘‘यह राउंड क्वालिफाई करने के बाद या फिर आप से मिलने के बाद?’’ नसरीन ने शरारत से पूछा.

‘‘स्मार्ट गर्ल.’’

‘‘अब आगे क्या होगा?’’

‘‘कहा तो है कि यह तुम पर डिपैंड करता है,’’ राजन ने उस की खुली पीठ को हलके से छूते हुए कहा.

‘‘वह तो है, मगर अब कंपीटिशन और भी टफ होने वाला है,’’ नसरीन ने राजन की हरकत का कोई विरोध न करते हुए कहा.

‘‘बेबी, तुम एक काम करो, नैक्स्ट राउंड में अभी 10 दिन का टाइम है. तुम रोनित शेट्टी से पर्सनैलिटी ग्रूमिंग की क्लासेज ले लो. मैं उसे फोन कर देता हूं,’’ राजन ने उस के चेहरे पर आई लटों को हटाते हुए कहा.

‘‘सो नाइस औफ यू… थैंक्स,’’ कह नसरीन ने उस के हाथ से रोनित का कार्ड ले लिया.

10 दिन बाद प्रतियोगिता के सैकंड राउंड में नसरीन सहित 10 मौडलों का चयन किया गया. अब आखिरी राउंड में विजेता का चयन किया जाना था. प्रतियोगिता का फाइनल मुंबई में होना था. निर्णायक मंडल में राजन सहित एक प्रसिद्ध टीवी ऐक्ट्रैस और एक प्रसिद्ध पुरुष मौडल था.

नसरीन भी सभी प्रतिभागियों के साथ मुंबई पहुंच गई. प्रतिभागियों के रुकने की अलग व्यवस्था की गई थी और बाकी टीम की अलग. राजन ने नसरीन को मैसेज कर के अपने रूम में बुलाया.

‘‘तो बेबी, क्या सोचा तुम ने?’’

‘‘इस में सोचना क्या? यह तो एक डील है… तुम मुझे खुश कर दो, मैं तुम्हें कर दूंगी,’’ नसरीन ने बेबाकी से कहा.

‘‘तो ठीक है, रात को डील पर मुहर लगा देते हैं.’’

‘‘आज नहीं कल रिजल्ट के बाद.’’

‘‘मुझ पर भरोसा नहीं?’’

‘‘भरोसा तो है, मगर मेरे पास भी तो सैलिब्रेट करने का कोई बहाना होना चाहिए न?’’ नसरीन ने उसे अपने से अलग करते हुए कहा.

‘‘ऐज यू विश… औल द बैस्ट,’’ कहते हुए राजन ने उसे बिदा किया.

अगले दिन विभिन्न चरणों की औपचारिकता से गुजरते हुए अंतिम निर्णय के आधार पर नसरीन को फेस औफ द ईयर चुना गया. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच पिछले वर्ष की विजेता ने अपना क्राउन उसे पहनाया तो नसरीन की आंखें खुशी के मारे छलक उठीं. उस ने राजन की तरफ कृतज्ञता से देखा तो राजन ने एक आंख दबा कर उसे उस का वादा याद दिलाया. नसरीन मुसकरा दी.

आज की रात अपनी देह का मखमली कालीन बिछा कर नसरीन ने अपनी मंजिल को पाने के लिए शौर्टकट की पहली सीढ़ी पर पांव रखा. एक गरम कतरा उस की पलकों की कोर को नम करता हुए धीरे से तकिए में समा गया.

खिताब जीतने के बाद पहली बार नसरीन अपने शहर आई. पर रेलवे स्टेशन पर कट्टर समाज के लोगों ने उस के भाई की अगुआई में उसे काले झंडे दिखाए, मुर्दाबाद के नारे लगाए और उसे ट्रेन से उतरने नहीं दिया. भीड़ में सब से पीछे खड़े उस के अब्बा उसे डबडबाई आंखों से निहार रहे थे. नसरीन उन्हें देख कर सिर्फ हाथ ही हिला सकी और ट्रेन चल पड़ी. इस विरोध के बाद उस ने फिर कभी जयपुर का रुख नहीं किया.

देखते ही देखते विज्ञापन की दुनिया में नसरीन छा गई. लेकिन शौर्टकट सीढि़यां चढ़तेचढ़ते काफी ऊपर आ गई नसरीन के लिए मंजिल अभी भी दूर थी. उस की ख्वाहिश इंटरनैशनल लैवल तक जाने की थी और सिर्फ राजन के पंखों के सहारे इतनी ऊंची उड़ान भरना संभव नहीं था. उसे अब और भी सशक्त पंखों की तलाश थी, जो उस की उड़ान को 7वें आसमान तक ले जा सके.

एक दिन उसे पता चला कि फैशन जगत के बेताज बादशाह समीर खान को अपने इंटरनैशनल प्रोजैक्ट के लिए फ्रैश चेहरा चाहिए. उस ने समीर खान से अपौइंटमैंट लिया और उस के औफिस पहुंच गई. इधरउधर की बातों के बाद सीधे मुद्दे पर आते हुए समीर ने कहा, ‘‘देखो बेबी, यह एक बीच सूट है और बीच सूट कैसा होता है, आई होप तुम जानती होंगी.’’

‘‘यू डौंट वरी. जैसा आप चाहोगे हो जाएगा,’’ नसरीन ने उसे आश्वस्त किया.

‘‘ठीक है, नैक्स्ट वीक औडिशन है, लेकिन उस से पहले हम देखना चाहेंगे कि यह जिस्म बीच सूट लायक है भी या नहीं,’’ समीर ने कहा.

नसरीन उस का इशारा समझ रही थी. अत: उस ने कहा, ‘‘पहले औडिशन ले कर ट्रेलर देख लीजिए. कोई संभावना दिखे तो पूरी पिक्चर भी देख लेना.’’

‘‘वाह, ब्यूटी विद ब्रेन,’’ कहते हुए समीर ने उस के गाल थपथपाए.

नसरीन का चयन इस प्रोजैक्ट के लिए हो गया. 1 महीने बाद उसे समीर की टीम के साथ सूट के लिए विदेश जाना था. अब राजन से उस का संपर्क कुछ कम होने लगा था.

आज राजन ने उसे डिनर के लिए इनवाइट किया था. नसरीन जानती थी कि वह रात की गई सुबह ही वापस आएगी. कुछ भी हो, मगर राजन के लिए उस के दिल में एक सौफ्ट कौर्नर था.

‘‘समीर के साथ जा रही हो?’’

‘‘हूं.’’

‘‘मुझे भूल जाओगी?’’

‘‘यह मैं ने कब कहा?’’

‘‘तुम उसे जानती ही कितना हो… एक नंबर का लड़कीखोर है.’’

‘‘तुम्हें भी कहां जानती थी?’’

‘‘शायद तुम्हें उड़ने के लिए अब आकाश छोटा पड़ने लगा?’’

‘‘तुम्हें कहीं मुझ से प्यार तो नहीं होने लगा?’’ नसरीन ने माहौल को हलकाफुलका करने के लिए हंसते हुए कहा.

‘‘अगर मैं हां कहूं तो?’’ राजन ने उस की आंखों में झांका.

‘‘तुम ऐसा नहीं कहोगे.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘क्योंकि फैशन की इस दुनिया में प्यार नहीं होता. वैसे भी तुम्हारी कंपनी फेस औफ द ईयर कौंटैस्ट फिर से आयोजित करने वाली है. फिर एक नया चेहरा चुना जाएगा, जो तुम्हारी कंपनी और तुम्हारे बिस्तर की शोभा बढ़ाएगा. फिर से तुम साल भर के लिए बिजी हो जाओगे. मैं ने पिछले वर्ष की मौडल के चेहरे पर एक पीड़ा देखी थी जब वह मुझे क्राउन पहना रही थी. वह पीड़ा मैं अपनी आंखों में नहीं आने देना चाहती,’’ नसरीन ने बहुत ही साफगोई से कहा.

राजन उसे अवाक देख रहा था. उस ने अपनी जिंदगी में आज तक इतनी पारदर्शी सोच वाली लड़की नहीं देखी थी.

नसरीन ने आगे कहा, ‘‘मेरी मंजिल अभी बहुत दूर है राजन. तुम जैसे न जाने कितने छोटेछोटे पड़ाव आएंगे. मैं वहां कुछ देर सुस्ता तो सकती हूं, मगर रुक नहीं सकती.’’

रात को सैलिब्रेट करने का राजन का सारा उत्साह ठंडा पड़ गया. उस ने नसरीन से कहा, ‘‘चलो, तुम्हें गाड़ी तक छोड़ दूं.’’

‘‘ओके, बाय बेबी… 2 दिन बाद मेरी फ्लाइट है. देखते हैं अगला पड़ाव कहां होता है,’’ कहते हुए नसरीन ने आत्मविश्वास के साथ गाड़ी स्टार्ट कर दी.

राजन उसे आंखों से ओझल होने तक देखता रहा.

समझौता: शादी के दिन देवर के घर कैसे पहुंच गई शिखा?

जब मां का फोन आया, तब मैं बाथरूम से बाहर निकल रहा था. मेरे रिसीवर उठाने से पहले ही शिखा ने फोन पर वार्त्तालाप आरंभ कर दिया था. मां उस से कह रही थीं, ‘‘शिखा, मैं ने तुम्हें एक सलाह देने के लिए फोन किया है. मैं जो कुछ कहने जा रही हूं, वह सिर्फ मेरी सलाह है, सास होने के नाते आदेश नहीं. उम्मीद है तुम उस पर विचार करोगी और हो सका तो मानोगी भी…’’

‘‘बोलिए, मांजी?’’ ‘‘बेटी, तुम्हारे देवर पंकज की शादी है. वह कोई गैर नहीं, तुम्हारे पति का सगा भाई है. तुम दोनों के व्यापार अलग हैं, घर अलग हैं, कुछ भी तो साझा नहीं है. फिर भी तुम लोगों के बीच मधुर संबंध नहीं हैं बल्कि यह कहना अधिक सही होगा कि संबंध टूट चुके हैं. मैं तो समझती हूं कि अलगअलग रह कर संबंधों को निभाना ज्यादा आसान हो जाता है.

‘‘वैसे उस की गलती क्या है…बस यही कि उस ने तुम दोनों को इस नए शहर में बुलाया, अपने साथ रखा और नए सिरे से व्यापार शुरू करने को प्रोत्साहित किया. हो सकता है, उस के साथ रहने में तुम्हें कुछ परेशानी हुई हो, एकदूसरे से कुछ शिकायतें भी हों, किंतु इन बातों से क्या रिश्ते समाप्त हो जाते हैं? उस की सगाई में तो तुम नहीं आई थीं, किंतु शादी में जरूर आना. बहू का फर्ज परिवार को जोड़ना होना चाहिए.’’ ‘‘तो क्या मैं ने रिश्तों को तोड़ा है? पंकज ही सब जगह हमारी बुराई करते फिरते हैं. लोगों से यहां तक कहा है, ‘मेरा बस चले तो भाभी को गोली मार दूं. उस ने आते ही हम दोनों भाइयों के बीच दरार डाल दी.’ मांजी, दरार डालने वाली मैं कौन होती हूं? असल में पंकज के भाई ही उन से खुश नहीं हैं. मुझे तो अपने पति की पसंद के हिसाब से चलना पड़ेगा. वे कहेंगे तो आ जाऊंगी.’’

‘‘देखो, मैं यह तो नहीं कहती कि तुम ने रिश्ते को तोड़ा है, लेकिन जोड़ने का प्रयास भी नहीं किया. रही बात लोगों के कहने की, तो कुछ लोगों का काम ही यही होता है. वे इधरउधर की झूठी बातें कर के परिवार में, संबंधों में फूट डालते रहते हैं और झगड़ा करा कर मजा लूटते हैं. तुम्हारी गलती बस इतनी है कि तुम ने दूसरों की बातों पर विश्वास कर लिया. ‘‘देखो शिखा, मैं ने आज तक कभी तुम्हारे सामने चर्चा नहीं की है, किंतु आज कह रही हूं. तुम्हारी शादी के बाद कई लोगों ने हम से कहा, ‘आप कैसी लड़की को बहू बना कर ले आए. इस ने अपनी भाभी को चैन से नहीं जीने दिया, बहुत सताया. अपनी भाभी की हत्या के सिलसिले में इस का नाम भी पुलिस में दर्ज था. कुंआरी लड़की है, शादी में दिक्कतें आएंगी, यही सोच कर रिश्वत खिला कर उस का नाम, घर वालों ने उस केस से निकलवाया है.’

‘‘अगर शादी से पहले हमें यह समाचार मिलता तो शायद हम सचाई जानने के लिए प्रयास भी करते, लेकिन तब तक तुम बहू बन कर हमारे घर आ चुकी थीं. कहने वालों को हम ने फटकार कर भगा दिया था. यह सब बता कर मैं तुम्हें दुखी नहीं करना चाहती, बल्कि कहना यह चाहती हूं कि आंखें बंद कर के लोगों की बातों पर विश्वास नहीं करना चाहिए. खैर, मैं ने तुम्हें शादी में आने की सलाह देने के लिए फोन किया है, मानना न मानना तुम्हारी मरजी पर निर्भर करता है,’’ इतना कह कर मां ने फोन काट दिया था. मां ने कई बार मुझे भी समझाने की कोशिश की थी, किंतु मैं ने उन की पूरी बात कभी नहीं सुनी. बल्कि,? उन पर यही दोषारोपण करता रहा कि वह मुझ से ज्यादा पंकज को प्यार करती हैं, इसलिए उन्हें मेरा ही दोष नजर आता है, पंकज का नहीं. इस पर वे हमेशा यहां से रोती हुई ही लौटी थीं.

लेकिन सचाई तो यह थी कि मैं खुद भी पंकज के खिलाफ था. हमेशा दूसरों की बातों पर विश्वास करता रहा. इस तरह हम दोनों भाइयों के बीच खाई चौड़ी होती चली गई. लेकिन फोन पर की गई मां की बातें सुन कर कुछ हद तक उन से सहमत ही हुआ. मां यहां नहीं रहती थीं. शादी की वजह से ही पंकज के पास उस के घर आई हुई थीं. वे हम दोनों भाइयों के बीच अच्छे संबंध न होने की वजह से बहुत दुखी रहतीं इसीलिए यहां बहुत कम ही आतीं.

लोग सही कहते हैं, अधिकतर पति पारिवारिक रिश्तों को निभाने के मामले में पत्नी पर निर्भर हो जाते हैं. उस की नजरों से ही अपने रिश्तों का मूल्यांकन करने लगते हैं. शायद यही वजह है, पुरुष अपने मातापिता, भाईबहनों आदि से दूर होते जाते हैं और ससुराल वालों के नजदीक होते जाते हैं.

दूसरों शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि महिलाएं, पुरुषों की तुलना में अपने रक्त संबंधों के प्रति अधिक वफादार होती हैं. इसीलिए अपने मायके वालों से उन के संबंध मधुर बने रहते हैं. बल्कि कड़ी बन कर वे पतियों को भी अपने परिवार से जोड़ने का प्रयास करती रहती हैं. वैसे पुरुष का अपनी ससुराल से जुड़ना गलत नहीं है. गलत है तो यह कि पुरुष रिश्तों में संतुलन नहीं रख पाते, वे नए परिवार से तो जुड़ते हैं, किंतु धीरेधीरे अपने परिवार से दूर होते चले जाते हैं. भाईभाई में, भाईबहनों में कहासुनी कहां नहीं होती. लेकिन इस का मतलब यह तो नहीं होता कि संबंध समाप्त

कर लिए जाएं. मेरे साथ यही हुआ, जानेअनजाने मैं पंकज से ही नहीं, अपने परिवार के अन्य सदस्यों से भी दूर होता चला गया. सही माने में देखा जाए तो संपन्नता व कामयाबी के जिस शिखर पर बैठ कर मैं व मेरी पत्नी गर्व महसूस कर रहे थे, उस की जमीन मेरे लिए पंकज ने ही तैयार की थी. उस के पूर्ण सहयोग व प्रोत्साहन के बिना अपनी पत्नी के साथ मैं इस अजनबी शहर में आने व अल्प पूंजी से नए सिरे से व्यवसाय शुरू करने की बात सोच भी नहीं सकता था. उस का आभार मानने के बदले मैं ने उस रिश्ते को दफन कर दिया. मेरी उन्नति में मेरी ससुराल वालों का 1 प्रतिशत भी योगदान नहीं था, किंतु धीरेधीरे वही मेरे नजदीक होते गए. दोष शिखा का नहीं, मेरा था. मैं ही अपने निकटतम रिश्तों के प्रति ईमानदार नहीं रहा. जब मैं ने ही उन के प्रति उपेक्षा का भाव अपनाया तो मेरी पत्नी शिखा भला उन रिश्तों की कद्र क्यों करती?

समाज में साथ रहने वाले मित्र, पड़ोसी, परिचित सब हमारे हिसाब से नहीं चलते. हम में मतभेद भी होते हैं. एकदूसरे से नाखुश भी होते हैं, आगेपीछे एकदूसरे की आलोचना भी करते हैं, लेकिन फिर भी संबंधों का निर्वाह करते हैं. उन के दुखसुख में शामिल होते हैं. फिर अपनों के प्रति हम इतने कठोर क्यों हो जाते हैं? उन की जराजरा सी त्रुटियों को बढ़ाचढ़ा कर क्यों देखते हैं? कुछ बातों को नजरअंदाज क्यों नहीं कर पाते? तिल का ताड़ क्यों बना देते हैं? मैं सोचने लगा, पंकज मेरा सगा भाई है. यदि जानेअनजाने उस ने कुछ गलत किया या कहा भी है तो आपस में मिलबैठ कर मतभेद मिटाने का प्रयास भी तो कर सकते थे. गलतफहमियों को दूर करने के बदले हम रिश्तों को समाप्त करने के लिए कमर कस लें, यह तो समझदारी नहीं है. असलियत तो यह है कि कुछ शातिर लोगों ने दोस्ती का ढोंग रचाते हुए हमें एकदूसरे के विरुद्ध भड़काया, हमारे बीच की खाई को गहरा किया. हमारी नासमझी की वजह से वे अपनी कोशिश में कामयाब भी रहे, क्योंकि हम ने अपनों की तुलना में गैरों पर विश्वास किया.

मैं ने निर्णय कर लिया कि अपने फैसले मैं खुद लूंगा. पंकज की शादी में शिखा जाए या न जाए, किंतु मैं समय पर पहुंच कर भाई का फर्ज निभाऊंगा. उस की सगाई में भी शिखा की वजह से ही मैं तब पहुंचा, जब प्रोग्राम समाप्त हो चुका था. सगाई वाले दिन मैं जल्दी ही दुकान बंद कर के घर आ गया था, लेकिन शिखा ने कलह शुरू कर दिया था. वह पंकज के प्रति शिकायतों का पुराना पुलिंदा खोल कर बैठ गई थी. उस ने मेरा मूड इतना खराब कर दिया था कि जाने का उत्साह ही ठंडा पड़ गया. मैं बिस्तर पर पड़ापड़ा सो गया था. जब नींद खुली तो रात के 10 बज रहे थे. मन अंदर से कहीं कचोट रहा था कि तेरे सगे भाई की सगाई है और तू यहां घर में पड़ा है. फिर मैं बिना कुछ विचार किए, देर से ही सही, पंकज के घर चला गया था.

मानव का स्वभाव है कि अपनी गलती न मान कर दोष दूसरे के सिर पर मढ़ देता है, जैसे कि वह दोष मैं ने शिखा के सिर पर मढ़ दिया. ठीक है, शिखा ने मुझे रोकने का प्रयास अवश्य किया था किंतु मेरे पैरों में बेड़ी तो नहीं डाली थी. दोषी मैं ही था. वह तो दूसरे घर से आई थी. नए रिश्तों में एकदम से लगाव नहीं होता. मुझे ही कड़ी बन कर उस को अपने परिवार से जोड़ना चाहिए था, जैसे उस ने मुझे अपने परिवार से जोड़ लिया था.

शिखा की सिसकियों की आवाज से मेरा ध्यान भंग हुआ. वह बाहर वाले कमरे में थी. उसे मालूम नहीं था कि मैं नहा कर बाहर आ चुका हूं और फोन की पैरलेल लाइन पर मां व उस की पूरी बातें सुन चुका हूं. मैं सहजता से बाहर गया और उस से पूछा, ‘‘शिखा, रो क्यों रही हो?’’ ‘‘मुझे रुलाने का ठेका तो तुम्हारे घर वालों ने ले रखा है. अभी आप की मां का फोन आया था. आप को तो पता है न, मेरी भाभी ने आत्महत्या की थी. आप की मां ने आरोप लगाया है कि भाभी की हत्या की साजिश में मैं भी शामिल थी,’’ कह कर वह जोर से रोने लगी.

‘‘बस, यही आरोप लगाने के लिए उन्होंने फोन किया था?’’ ‘‘उन के हिसाब से मैं ने रिश्तों को तोड़ा है. फिर भी वे चाहती हैं कि मैं पंकज की शादी में जाऊं. मैं इस शादी में हरगिज नहीं जाऊंगी, यह मेरा अंतिम फैसला है. तुम्हें भी वहां नहीं जाना चाहिए.’’

‘‘सुनो, हम दोनों अपनाअपना फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं. मैं चाहते हुए भी तुम्हें पंकज के यहां चलने के लिए बाध्य नहीं करना चाहता. किंतु अपना निर्णय लेने के लिए मैं स्वतंत्र हूं. मुझे तुम्हारी सलाह नहीं चाहिए.’’ ‘‘तो तुम जाओगे? पंकज तुम्हारे व मेरे लिए जगहजगह इतना जहर उगलता फिरता है, फिर भी जाओगे?’’

‘‘उस ने कभी मुझ से या मेरे सामने ऐसा नहीं कहा. लोगों के कहने पर हमें पूरी तरह विश्वास नहीं करना चाहिए. लोगों के कहने की परवा मैं ने की होती तो तुम को कभी भी वह प्यार न दे पाता, जो मैं ने तुम्हें दिया है. अभी तुम मांजी द्वारा आरोप लगाए जाने की बात कर रही थीं. पर वह उन्होंने नहीं लगाया. लोगों ने उन्हें ऐसा बताया होगा. आज तक मैं ने भी इस बारे में तुम से कुछ पूछा या कहा नहीं. आज कह रहा हूं… तुम्हारे ही कुछ परिचितों व रिश्तेदारों ने मुझ से भी कहा कि शिखा बहुत तेजमिजाज लड़की है. अपनी भाभी को इस ने कभी चैन से नहीं जीने दिया. इस के जुल्मों से परेशान हो कर भाभी की मौत हुई थी. पता नहीं वह हत्या थी या आत्महत्या…लेकिन मैं ने उन लोगों की परवा नहीं की…’’ ‘‘पर तुम ने उन की बातों पर विश्वास कर लिया? क्या तुम भी मुझे अपराधी समझते हो?’’

‘‘मैं तुम्हें अपराधी नहीं समझता. न ही मैं ने उन लोगों की बातों पर विश्वास किया था. अगर विश्वास किया होता तो तुम से शादी न करता. तुम से बस एक सवाल करना चाहता हूं, लोग जब किसी के बारे में कुछ कहते हैं तो क्या हमें उस बात पर विश्वास कर लेना चाहिए.’’

‘‘मैं तो बस इतना जानती हूं कि वह सब झूठ है. हम से जलने वालों ने यह अफवाह फैलाई थी. इसी वजह से मेरी शादी में कई बार रुकावटें आईं.’’ ‘‘मैं ने भी उसे सच नहीं माना, बस तुम्हें यह एहसास कराना चाहता हूं कि जैसे ये सब बातें झूठी हैं, वैसे ही पंकज के खिलाफ हमें भड़काने वालों की बातें भी झूठी हो सकती हैं. उन्हें हम सत्य क्यों मान रहे हैं?’’

‘‘लेकिन मुझे नहीं लगता कि वे बातें झूठी हैं. खैर, लोगों ने सच कहा हो या झूठ, मैं तो नहीं जाऊंगी. एक बार भी उन्होंने मुझ से शादी में आने को नहीं कहा.’’ ‘‘कैसे कहता, सगाई पर आने के लिए तुम से कितना आग्रह कर के गया था. यहां तक कि उस ने तुम से माफी भी मांगी थी. फिर भी तुम नहीं गईं. इतना घमंड अच्छा नहीं. उस की जगह मैं होता तो दोबारा बुलाने न आता.’’

‘‘सब नाटक था, लेकिन आज अचानक तुम्हें हो क्या गया है? आज तो पंकज की बड़ी तरफदारी की जा रही है?’’

तभी द्वार की घंटी बजी. पंकज आया था. उस ने शिखा से कहा, ‘‘भाभी, भैया से तो आप को साथ लाने को कह ही चुका हूं, आप से भी कह रहा हूं. आप आएंगी तो मुझे खुशी होगी. अब मैं चलता हूं, बहुत काम करने हैं.’’ पंकज प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बिना लौट गया.

मैं ने पूछा, ‘‘अब तो तुम्हारी यह शिकायत भी दूर हो गई कि तुम से उस ने आने को नहीं कहा? अब क्या इरादा है?’’

‘‘इरादा क्या होना है, हमारे पड़ोसियों से तो एक सप्ताह पहले ही आने को कह गया था. मुझे एक दिन पहले न्योता देने आया है. असली बात तो यह है कि मेरा मन उन से इतना खट्टा हो गया है कि मैं जाना नहीं चाहती. मैं नहीं जाऊंगी.’’ ‘‘तुम्हारी मरजी,’’ कह कर मैं दुकान चला गया.

थोड़ी देर बाद ही शिखा का फोन आया, ‘‘सुनो, एक खुशखबरी है. मेरे भाई हिमांशु की शादी तय हो गई है. 10 दिन बाद ही शादी है. उस के बाद कई महीने तक शादियां नहीं होंगी. इसीलिए जल्दी शादी करने का निर्णय लिया है.’’

‘‘बधाई हो, कब जा रही हो?’’ ‘‘पूछ तो ऐसे रहे हो जैसे मैं अकेली ही जाऊंगी. तुम नहीं जाओगे?’’

‘‘तुम ने सही सोचा, तुम्हारे भाई की शादी है, तुम जाओ, मैं नहीं जाऊंगा.’’ ‘‘यह क्या हो गया है तुम्हें, कैसी बातें कर रहे हो? मेरे मांबाप की जगहंसाई कराने का इरादा है क्या? सब पूछेंगे, दामाद क्यों नहीं आया तो

क्या जवाब देंगे? लोग कई तरह की बातें बनाएंगे…’’ ‘‘बातें तो लोगों ने तब भी बनाई होंगी, जब एक ही शहर में रहते हुए, सगी भाभी हो कर भी तुम देवर की सगाई में नहीं गईं…और अब शादी में भी नहीं जाओगी. जगहंसाई क्या

यहां नहीं होगी या फिर इज्जत का ठेका तुम्हारे खानदान ने ही ले रखा है, हमारे खानदान की तो कोई इज्जत ही नहीं है?’’

‘‘मत करो तुलना दोनों खानदानों की. मेरे घर वाले तुम्हें बहुत प्यार करते हैं. क्या तुम्हारे घर वाले मुझे वह इज्जत व प्यार दे पाए?’’ ‘‘हरेक को इज्जत व प्यार अपने व्यवहार से मिलता है.’’

‘‘तो क्या तुम्हारा अंतिम फैसला है कि तुम मेरे भाई की शादी में नहीं जाओगे?’’ ‘‘अंतिम ही समझो. यदि तुम मेरे भाई की शादी में नहीं जाओगी तो

मैं भला तुम्हारे भाई की शादी में क्यों जाऊंगा?’’

‘‘अच्छा, तो तुम मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो?’’ कह कर शिखा ने फोन रख दिया.

दूसरे दिन पंकज की शादी में शिखा को आया देख कर मांजी का चेहरा खुशी से खिल उठा था. पंकज भी बहुत खुश था.

मांजी ने स्नेह से शिखा की पीठ पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘बेटी, तुम आ गई, मैं बहुत खुश हूं. मुझे तुम से यही उम्मीद थी.’’ ‘‘आती कैसे नहीं, मैं आप की बहुत इज्जत करती हूं. आप के आग्रह को कैसे टाल सकती थी?’’

मैं मन ही मन मुसकराया. शिखा किन परिस्थितियों के कारण यहां आई, यह तो बस मैं ही जानता था. उस के ये संवाद भले ही झूठे थे, पर अपने सफल अभिनय द्वारा उस ने मां को प्रसन्न कर दिया था. यह हमारे बीच हुए समझौते की एक सुखद सफलता थी.

Food Poisoning से बचें : रेस्‍तरां में खाने के बाद मरी महिला, मिडडे मील से 20 बच्‍चे बीमार

तेलंगाना राज्य के निर्मल कस्बे में एक रेस्तरां में खाना खाने के बाद विद्यालय की 19 वर्षीय महिला कर्मचारी की मृत्यु हो गई और साथ ही 4 कर्मी बीमार हो गए. यह घटना हमें खाद्य विषाक्तता के खतरे की ओर ध्यान दिलाती है. खाद्य विषाक्तता अर्थात फूड पायजनिंग एक गंभीर समस्या है जो लापरवाही के कारण आम है.

यह समस्या न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक रूप से भी हमारे समाज को प्रभावित करती है.

दरअसल,खाद्य विषाक्तता के कई कारण हो सकते हैं. इन में से कुछ प्रमुख कारण हैं-

दूषित और संक्रमित खाद्य पदार्थ, खराब भंडारण और परिवहन, अनुचित पकाने की विधि, भोज्य पदार्थों में मिलावट.

इन कारणों से खाद्य पदार्थों में हानिकारक बैक्टीरिया, वायरस और अन्य जीवाणु प्रवेश कर जाते हैं. और ये जीवाणु हमारे स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाते हैं. दूषित खाद्य के लक्षण अनेक हो सकते हैं. इन में से कुछ प्रमुख लक्षण हैं:

उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार, सिरदर्द.

इन लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. यदि आप को इन में से कोई भी लक्षण दिखाई दे, तो तुरंत चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए.

बावजूद- घटना दर घटना

ऐसी अनेक घटनाएं हमारे आसपास घटित होती जाती हैं इस में जागरूकता के साथसाथ आपसी समझदारी की भी आवश्यकता है. शायद ही ऐसा कोई दिन होता हो जब फूड प्वाइजनिंग की घटना घटित न होती हो. लिए कुछ घटनाओं के परिपेक्ष में हम इस की गंभीरता को समझने का प्रयास करें.

प्रथम घटना – हाल ही में मध्य प्रदेश में दूषित खाद्य खा कर 50 लोग बीमार हो गए. एक शादी समारोह था जहां खाना खाने के बाद 50 व्यक्ति अचानक बीमार हो गए. पता चला कि खाद्य विषाक्तता के कारण यह बीमारी हुई.

द्वितीय घटना – छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले के कटोरी नगोई में खाद्य विषाक्तता से 20 स्कूली बच्चे बीमार हो गए. स्कूल में मिड-डे मील खाने के बाद 20 बच्चे बीमार हो गए. जांच में पता चला कि दूषित खाद्य के कारण बच्चे बीमार हो गए.

तृतीय घटना- उत्तर प्रदेश में खाद्य विषाक्तता से 10 लोगों की मौत हो गई. एक गांव में खाना खाने के बाद 10 लोगों की मौत हो गई. जांच में पता चला कि दुषित खाद्य के कारण मौत हुई.

इन घटनाओं से पता चलता है कि खाद्य विषाक्तता के मामलों में कितनी गंभीरता से लेने की आवश्यकता है. सरकार और समाज को मिल कर खाद्य विषाक्तता के खतरे को कम करने के लिए काम करना होगा.

स्वच्छता और स्वच्छता का ध्यान

खाद्य पदार्थों का सही भंडारण और परिवहन खाद्य पदार्थों में मिलावट को रोकने के लिए कानूनी कार्रवाई और सख्त करनी होगी.

सरकार और समाज को मिल कर दूषित खाद्य के खतरे को कम करने के लिए जागरुकता प्रसार का प्रयास करना चाहिए. हमें अपने स्वास्थ्य की रक्षा के लिए जागरूक और सावधान रहना चाहिए.

दूषित खाद्य के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव भी बहुत गहरे हो सकते हैं. इन में से कुछ प्रमुख प्रभाव हैं.

स्वास्थ्य खर्च में वृद्धि,उत्पादकता में कमी,आर्थिक नुकसान, सामाजिक तनाव इन प्रभावों को कम करने के लिए हमें इस के खतरे को गंभीरता से लेना होगा.

खाद्य विषाक्तता एक गंभीर समस्या है जो हमारे देश में आम है. यह समस्या न केवल स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है, बल्कि यह आर्थिक और सामाजिक रूप से भी हमारे समाज को प्रभावित करती है.

कानून दर कानून

भारत में दूषित खाद्य के मामलों में कई कानूनी प्रावधान हैं. इन में से कुछ प्रमुख कानून हैं:

बिलासपुर हाई कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता बीके शुक्ला के मुताबिक इस संदर्भ में पहले से ही नियम कायदे और कानून हैं जो कुछ इस प्रकार हैं-

1. भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006
2. खाद्य सुरक्षा और मानक नियम, 2011
3. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986

अधिवक्ता बीके शुक्ला के मुताबिक इन कानूनों के तहत, खाद्य विषाक्तता के मामलों में दोषी पाए जाने पर:

– जुर्माना तक 10 लाख रुपये
– 6 महीने से 7 साल तक की जेल
– खाद्य लाइसेंस रद्द करना

इस के अलावा, सरकार ने खाद्य विषाक्तता के मामलों में जागरूकता फैलाने के लिए कई अभियान चलाती रहती हैं. इस के बावजूद घटनाएं घटित हो रही है इस का मतलब यह है कि जागरूकता की कमी और लापरवाही इस का प्रमुख कारण है.

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