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जब जाना हो सैरसपाटे पर

गरमी की लंबी छुट्टियों में घर पर बोर होने से ज्यादा मन होता है, कहीं घूमने जाने का, जिस से न केवल चेंज मिलता है बल्कि जानकारी भी बढ़ती है और आत्मविश्वास भी. अमूमन जब आप सैरसपाटे पर जाते हैं तो आप की तैयारी मम्मी करती हैं, लेकिन कोशिश करें कि आप खुद ही तैयारी करें व घर से बैग पैक करने से ले कर वहां ऐंजौय करने तक सारी जिम्मेदारी खुद ही निभाएं. साथ ही जहां जाएं वहां कुछ खास बातों का भी विशेष ध्यान रखें ताकि सैरसपाटे को ऐंजौय कर सकें. यहां कुछ टिप्स दिए जा रहे हैं जिन्हें ध्यान में रख कर आप सैरसपाटे को न केवल ऐंजौय कर सकते हैं बल्कि यादगार भी बना सकते हैं.

ऐसे करें तैयारी

–       अपने डैस्टिनेशन को ध्यान में रखते हुए तैयारी करें. वहां कैसा मौसम है, उसी हिसाब से कपड़े पैक करें. ध्यान रहे कपड़े अधिक न हों. अगर ज्यादा दिन के लिए सैरसपाटे पर जा रहे हैं, तो ज्यादा कपड़े रखने से अच्छा होगा साबुन की टिकिया साथ रखें ताकि कपड़े वहीं धोसुखा कर पहन सकें. ज्यादा वजन सैरसपाटे में बाधक बनता है.

–       अपने बैग में रोजमर्रा का सामान अवश्य रखें ताकि आप को वहां परेशान न होना पड़े.

–       अपने साथ कुछ किताबें व एक डायरी अवश्य रखें. किताबें इसलिए कि स्टूडैंट लगें व डायरी इसलिए कि हर जगह जाने पर वहां की जानकारी नोट कर सकें. इस से कहीं भी मदद मिलने में आसानी रहती है.

–       अपना बस या ट्रेन का टिकट पहले ही संभाल कर रख लें और उसे बैग में ऐसी जगह रखें ताकि निकाल कर दिखाने में आसानी रहे. अपना स्कूलकालेज का आईकार्ड या फिर आधार कार्ड भी पहचान के लिए साथ अवश्य रखें.

–       यदि आप के पास कैमरा है तो साथ रखें या फिर स्मार्टफोन है तो उसे भी बतौर कैमरा इस्तेमाल कर सकते हैं. साथ ही स्मार्टफोन या डिजिटल कैमरे का चार्जर रखना न भूलें. यदि आप के पास स्मार्टफोन या कैमरा नहीं है तो अपने किसी परिचित से अरेंज कर साथ ले जाएं ताकि सैरसपाटे का हर पल यादगार बना सकें. बाद में कैमरा व स्मार्टफोन लौटाते समय फोटो कंप्यूटर में डाउनलोड करना न भूलें.

–       अपने बैग में मोटी चादर अवश्य रखें ताकि कहीं भी आराम करने के लिए बिछा कर बैठ सकें.

–       आप जहां जा रहे हैं वहां की विस्तृत जानकारी, दर्शनीय स्थल, ऐतिहासिक स्थल आदि नैट पर सर्च कर लें. साथ ही यह जानकारी भी रखें कि कम से कम खर्च में कैसे

इन जगहों पर जा कर सैरसपाटे का आनंद ले सकते हैं. मसलन, लोकल बस, ट्रेन आदि की जानकारी, किराया व अन्य सुविधाएं.

–       अगर कोई दवा लेते हैं या जिस की आप को जरूरत पड़ती है उसे साथ रखें. अगर सफर में उलटी आना या जी मिचलाना जैसी समस्याएं आप के साथ होती हैं तो चटपटी गोली साथ रखें.

हिल डैस्टिनेशन पर जाना हो तो

–       सैरसपाटे के लिए यदि आप पहाड़ी इलाके में जा रहे हैं तो वहां के मौसम के अनुसार कपड़े ले जाएं. ध्यान रहे, पहाड़ी इलाकों पर जाते समय एकाध गरम कपड़ा जैसे स्वैटरजैकेट अवश्य ले जाएं, क्योंकि वहां गरमी के मौसम में भी कभीकभी रातें अधिक ठंडी होती हैं.

–       अगर आप के पास बरसाती है तो उसे साथ रखें, क्योंकि पहाड़ी इलाकों में कभी भी अचानक बरसात हो सकती है. ऐसे में बरसाती आप के काम आएगी. वैसे ऐसी चीजें इन स्थानों पर किराए पर भी मिल जाती हैं पर उस से आप का बजट बिगड़ेगा.

–       ऐसे इलाकों में सैरसपाटे पर जाते समय सामान की पैकिंग पहले पन्नी के अंदर करें और बाद में बैग में रखें. इस से सामान सुरक्षित रहेगा व बरसात में गीला भी नहीं होगा साथ ही नमी से भी बचेगा.

–       इन इलाकों में जाते समय यदि खाने में ड्राइफू्रट्स साथ रख सकें तो अच्छा रहेगा. सूखे मेवे ठंड में गरमी का एहसास कराते हैं.

–       पहाड़ी इलाकों में सैरसपाटे पर जाते समय फ्लैट जूते पहनें. स्पोर्ट्स शूज यहां के लिए सब से उपयोगी रहते हैं.

समुद्री इलाकों में जाएं तो

–       अगर आप सैरसपाटे के लिए समुद्री इलाकों की तरफ जा रहे हैं तो कपड़ों में लड़के निकर, टीशर्ट भी रखें. लड़कियां अपनी सुविधानुसार स्विमिंग सूट, निकर, शौर्ट्स आदि रख सकती हैं. साथ में तौलिया व अपने अंत:वस्त्रों का सैट भी अवश्य रखें.

–  बीच पर जाएं तो अपने साथ कम से कम सामान ले जाएं. फ्लैट चप्पल या फ्लिपफ्लौप ऐसे इलाकों के लिए ज्यादा कंफर्टेबल रहते हैं.

–  समुद्र का पानी खारा होने के कारण पीने लायक नहीं होता इसलिए वहां मिनरल वाटर साथ ले जाएं. भूखे न रहें. नमकीनबिस्कुट आदि खाते रहें व पानी की कमी भी न होने दें.

–  बीच पर नहाते समय समुद्र में ज्यादा आगे न जाएं. लहरों से खेलना खतरनाक हो सकता है. सैल्फी लेते समय भी इस बात का ध्यान रखें.

गरम प्रदेशों में जा रहे हैं तो

–       अगर आप गरम मैदानी इलाकों में सैरसपाटे पर जा रहे हैं तो पैकिंग में टोपी और धूप का चश्मा रखना न भूलें. टोपी जहां सिर को तेज धूप से बचाएगी, वहीं चश्मा आंखों को सेफ रखेगा.

–       ऐसे इलाकों में सैरसपाटे के लिए शाम के समय जाएं तो अच्छा रहेगा. दिन में किसी ठंडी जगह पर आराम करें.

–       अगर संगीत प्रेमी हैं तो अपने साथ कोई हलका वाद्ययंत्र जैसे गिटार आदि रख सकते हैं. इस से सैरसपाटे में आप का मजा और भी बढ़ जाएगा.

–       अगर आप गरमी सहन नहीं कर पाते या नकसीर आने की समस्या है तो उस की दवा साथ रखें.

कुछ सामान्य बातें

–       जिस भी स्थान पर जाएं, वहां फोटोग्राफ अवश्य लें. उस जगह पर लगे निर्देशों का पालन भी अवश्य करें.

–   सैल्फी लेते समय सजग रहें और खतरनाक अंदाज न अपनाएं जैसे पहाड़ी पर या समुद्र में काफी आगे जा कर, बसट्रेन में लटक कर या छत पर चढ़ कर सैल्फी लेना जीवन के साथ खिलवाड़ है.

–  प्राकृतिक नजारों का लुत्फ उठाना न भूलें. आप वहां की लोकल संस्कृति से रूबरू हो जानकारी हासिल कर सकते हैं.

–  सस्ता कमरा, धर्मशाला आदि आप के रहने का खर्च कम करेंगे. अगर वहां किसी दोस्त का घर है तो उस के साथ प्रोग्राम बनाएं.

–       पहाड़ी नदियों में बिना सोचेसमझे न उतरें. इन की गहराई का अंदाजा नहीं लगता.

–       अठखेलियों से हर जगह बचें. अपने सामान का स्वयं ध्यान रखें.

–       ऐतिहासिक स्थानों पर घूमने जाते समय ध्यान रखें कि इमारतों की दीवारों आदि पर नाम न लिखें, जिस तख्ती पर उस स्थान का ब्योरा लिखा रहता है उस का फोटो अवश्य लें. यह बाद में ज्ञान बढ़ाने के काम आएगा.                   

लिफ्ट: ऊंची इमारतों में चढ़ने का सुलभ साधन

आजकल बहुमंजिला इमारतों का जमाना है. ऐसी इमारतों में सीढि़यों से ऊपरनीचे आनाजाना दुष्कर कार्य है. 16-16 मंजिल चढ़नाउतरना न केवल थकाने वाला होता है बल्कि सांस भी चढ़ा देता है. ऐसे में ऊंची इमारतों में चढ़ने का एकमात्र कारगर तरीका लिफ्ट ही है. लिफ्ट ही वह साधन है, जिस से किसी इमारत में ऊपर जाना या नीचे आना बहुत सुलभ है. लगभग सवा सौ वर्ष पहले अमेरिका के ओटिस नामक व्यक्ति ने लिफ्ट तैयार की थी. परंतु इस का अधिक प्रयोग उस समय होने लगा जब बिजली की मोटर से इसे चलाने की व्यवस्था की गई. आजकल बड़े नगरों में बहुमंजिला इमारतों में लिफ्ट लगाना कानून की दृष्टि से भी आवश्यक है.

इमारत के जिस स्थान पर लिफ्ट लगाई जाती है, वहां कुएं जैसा स्थान खाली रखा जाता है. तीनों ओर से बंद छोटे कमरे जैसा एक प्लेटफौर्म लगाया जाता है, जिस पर लोग खड़े होते हैं. यह प्लेटफौर्म बिजली की मोटर से नीचेऊपर आताजाता है. मोटर सब से ऊपर लगाई जाती है. यह मोटर उन पहियों (पुलियों) को चलाती है जो लिफ्ट के साथ लगे होते हैं. इन पुलियों पर स्टील की मोटी रस्सियां चलती हैं जो प्लेटफौर्म को नीचेऊपर ले जाती हैं. प्लेटफौर्म का जितना वजन होता है, लगभग उतने वजन की लोहे की एक मोटी सिल्ली एक ओर लगाई जाती है. इसे ‘काउंटरवेट’ (संतुलन भार) कहते हैं. प्लेटफौर्म को चलाने के लिए उतनी ही शक्ति की आवश्यकता होती है जितनी प्लेटफौर्म और लोहे की इस मोटी सिल्ली के भार के अंतर को चलाने के लिए आवश्यक हो. लिफ्ट में 2 बटन लगे होते हैं. एक ऊपर जाने का और दूसरा नीचे जाने का. जब ऊपर जाने वाला बटन दबाया जाता है तो पुलियां घूमती हैं और उस पर चलने वाले लोहे के रस्से प्लेटफौर्म या लिफ्ट को ऊपर ले जाते हैं. जब नीचे जाने वाला बटन दबाया जाता है तो पहिए उलटी दिशा में घूमते हैं और लिफ्ट लोहे के उन्हीं रस्सों के सहारे नीचे आती है.

लिफ्ट में हर मंजिल पर रुकने के लिए अलगअलग बटन लगे होते हैं, जिस मंजिल पर जाना हो, उसी नंबर का बटन दबाने से लिफ्ट उसी मंजिल पर रुकती है. लिफ्ट रोकने के लिए बिजली के चुंबक (इलैक्ट्रोमैग्नेट) लगे रहते हैं. बटन दबाने पर ये चुंबक ऊपर लगी पुलियों के शैफ्ट को रोकते हैं ऊपर मोटर और पुलियों के साथ स्टार्टर और कंट्रोलर तथा दरवाजा खोलने और बंद करने के स्विच लगे होते हैं. किसी भी मंजिल पर पहुंचने से पहले लिफ्ट की गति धीमी हो जाती है. वैसे लिफ्ट में ऐसे बटन भी लगे रहते हैं जिन को दबाने से लिफ्ट बिना रुके निर्धारित मंजिल पर सीधे ऊपर जा सकती है या नीचे आ सकती है. लिफ्ट के पीछे स्टील की मोटी रस्सियां भी लगी होती हैं. ये सुरक्षा के लिए लगाई जाती हैं. यदि लिफ्ट खराब हो जाए तो ये सुरक्षा रस्सियां जल्दी घूमने लगती हैं और सुरक्षा के लिए बनाए गए उपकरण को चालू कर देती हैं. इस से लिफ्ट का प्लेटफौर्म भारी दांतों में फंस जाता है और नीचे नहीं गिरता. पुरानी लिफ्टों में दरवाजे को स्वयं बंद करना पड़ता था. परंतु नई किस्म की लिफ्टों में दरवाजे अपनेआप बंद होते हैं और खुलते हैं.

हाइड्रोजन बम : मानवनिर्मित भूकंप

बम चाहे कोई भी हो, वह सिर्फ तबाही ही मचाता है. हाइड्रोजन बम को मानवनिर्मित भूकंप कहना ज्यादा उचित होगा, क्योंकि इस के फटने से भूकंप आ सकता है जैसा कि अभी हाल ही में उत्तर कोरिया में हुए हाइड्रोजन बम परीक्षण से वहां भूकंप का झटका महसूस किया गया था. ताकत चाहे सत्ता की हो या फिर उपाधि की, इस का नशा बरबादी का कारण ही बनता है. उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने भी जैसे दुनिया को तबाह करने की ठान ली है. कहने को तो वे उत्तर कोरिया के सर्वोच्च नेता हैं, लेकिन उन की हरकतें किसी तानाशाह से कम नहीं.

दरअसल, उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने अपनी विस्फोटक सोच से भारत सहित पूरी दुनिया को चिंता में डाल दिया है. 8 जनवरी को किम जोंग उन का 33वां जन्मदिन था. अपने जन्मदिन से 2 दिन पहले उन्होंने हाइड्रोजन बम का सफल परीक्षण किया. इस बम को थर्मल परमाणु बम भी कहा जाता है. उत्तर कोरिया ने अपनी न्यूक्लियर टैस्ट साइट से हाइड्रोजन बम की कामयाब टैस्टिंग का दावा भी किया. इस परीक्षण के बाद हाइड्रोजन बम की टैस्टिंग साइट से 48 किलोमीटर के दायरे में रेक्टर स्केल पर 5.1 तीव्रता का भूकंप भी आ गया. हाइड्रोजन बम, परमाणु बम की तुलना में 1 हजार गुना ज्यादा ताकतवर, लेकिन आकार में छोटा होता है और इसे मिसाइल में आसानी से फिट किया जा सकता है. इस बम का एक विस्फोट कई शहर तबाह करने की ताकत रखता है. अभी तक किसी भी युद्ध में हाइड्रोजन बम का इस्तेमाल नहीं किया गया है. पहले विश्वयुद्ध में तोप और गोलों का इस्तेमाल किया गया था. दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के हिरोशिमा और नागासाकी में परमाणु बम गिराए गए थे. अगर दुनिया में तीसरा विश्वयुद्ध हुआ तो उस में हाइड्रोजन बम के इस्तेमाल की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता.

हाइड्रोजन बम की शक्ति

हाइड्रोजन बम शक्तिशाली परमाणु बम है. इस में हाइड्रोजन के समस्थानिक ड्यूटीरियम और ट्राइटीरियम की आवश्यकता पड़ती है. परमाणुओं के संलयन करने से बम का विस्फोट होता है. इस संलयन के लिए बड़े ऊंचे ताप लगभग 500,00,000० सेल्सियस की आवश्यकता पड़ती है. यह ताप सूर्य के ऊष्णतम भाग के ताप से बहुत ज्यादा है. परमाणु बम द्वारा ही इतना ज्यादा ताप प्राप्त किया जा सकता है. जब परमाणु बम आवश्यक ताप उत्पन्न करता है तभी हाइड्रोजन परमाणु संलयित होते हैं. इस संलयन से ऊष्मा और शक्तिशाली किरणें उत्पन्न होती हैं जो हाइड्रोजन को हीलियम में बदल देती हैं.

1922 में पहलेपहल पता चला था कि हाइड्रोजन परमाणु के विस्फोट से बहुत अधिक ऊर्जा उत्पन्न हो सकती है. 1932 में ड्यूटीरियम और 1934 में ट्राइटीरियम नामक भारी हाइड्रोजन का आविष्कार हुआ. 1950 में संयुक्त राज्य अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ट्रु मैन ने हाइड्रोजन बम तैयार करने का आदेश दिया था. इस के लिए 1951 में साउथ कैरोलिना में एक बड़े कारखाने की स्थापना हुई. 1953 में राष्ट्रपति आइजेनहाबर ने घोषणा की थी कि उन का हाइड्रोजन बम तैयार हो गया है. इस के बाद 1955 में सोवियत संघ ने हाइड्रोजन बम का परीक्षण किया. फिर चीन और फ्रांस ने भी इस का परीक्षण किया.

एक बड़ी भूल

अमेरिका ने द्वितीय विश्वयुद्ध के आखिरी दिनों में जापान पर एटम बम गिराया था. तब हिरोशिमा में 0.01 मेगाटन और नागासाकी में 0.02 मेगाटन ऊर्जा पैदा हुई थी. इस से तापमान 4 हजार डिग्री सेल्सियस पार कर गया और अकेले हिरोशिमा में ही 2 लाख लोग मारे गए थे. लेकिन क्या आप जानते हैं कि हाइड्रोजन बम एटम बम से 1 हजार गुना ज्यादा ताकतवर होता है. एक लड़ाकू विमान ने 4 हाइड्रोजन बम गिरा दिए थे. वह तो अच्छा हुआ कि एक भी हाइड्रोजन बम फटा नहीं वरना सर्वनाश निश्चित था. हाइड्रोजन बम का पहला परीक्षण अमेरिका ने 1952 में किया था, तब से दुनिया में कई बार यह सवाल उठाया जा चुका है कि आखिर ऐसे जनसंहारक हथियार रखने की जरूरत ही क्या है. अगर गलती से भी हाइड्रोजन बम फट गया तो क्या होगा?

एक बार अमेरिकन बी52 लड़ाकू विमान से एक बहुत बड़ी भूल हो गई. इस लड़ाकू विमान पर तैनात चारों हाइड्रोजन बम बड़ी तेजी से जमीन की तरफ गिरने लगे. सिर्फ 2 मिनट में सारी दुनिया तबाही का वह नजारा देखती जिसे अभी तक किसी ने नहीं देखा था. एक झटके में ही पूरे देश का नामोनिशान मिट जाता. लाखों लोग हजारों सेंटीग्रेट तापमान में भाप बन कर उड़ जाते. यह हादसा ठीक 50 साल पहले सोमवार को यानी 17 जनवरी, 1966 को पलोमारेस, स्पेन का है. उस हादसे को याद कर दुनिया आज भी कांप जाती है, उस दिन स्पेन ही नहीं पूरा यूरोप ही तबाह हो जाता.

कैसे हुआ हादसा

दरअसल, वह शीतयुद्ध का दौर था. सोवियत रूस के किसी भी संभावित परमाणु हमले से बचने के लिए अमेरिकी वायुसेना के विमान एटम बम और हाइड्रोजन बम से लैस हो कर 24 घंटे अमेरिका से यूरोप तक गश्त लगा कर लौट आते थे. इसे औपरेशन क्रोम डोम कहा जाता था. 16 जनवरी, 1966 को भी अमेरिका के उत्तरी करोलीना के एयरबेस से बी52 विमान उड़ा. यूरोप पहुंचने के बाद उसे स्पेन के आसमान में केसी135 स्ट्राटोटैंकर विमान से 31 हजार फुट ऊपर हवा में ही ईंधन भरना था. 500 मील प्रतिघंटा की रफ्तार से बमवर्षक और टैंकर विमान एकदूसरे के करीब आए. टैंकर विमान से निकली नली को तेल भरने के लिए बी52 से जुड़ना था. लेकिन ठीक से तालमेल नहीं बैठ पाया. फिर वही हुआ जिस की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी. दोनों ही विमान जबरदस्त धमाके के बाद हवा में ही आग के गोले में बदल गए. जलते हुए बी52 बमवर्षक के साथ चारों हाइड्रोजन बम भी तेजी से जमीन पर गिरे, लेकिन वे फटे नहीं वरना धरती पर हाइड्रोजन बम का पहला हमला दुनिया देख लेती.

स्पेन में बी52 विमान से जो हाइड्रोजन बम गिरा था वह था बी28 हाइड्रोजन बम. बी28 बहुत ही ताकतवर हाइड्रोजन बम है, जिस से होने वाली तबाही हिरोशिमा और नागासाकी से भी कई गुना ज्यादा विनाशकारी होती. लेकिन ऐसा हुआ नहीं, दरअसल, विमान से नीचे गिरे चारों हाइड्रोजन बमों में से एक सूखी नदी के तट पर गिरा, दूसरा भूमध्य सागर में, तीसरा जमीन में जा धंसा और चौथे के जमीन से टकराने से जबरदस्त धमाका हुआ. उस दिन फ्लोमारेस के लोग बच गए थे. आखिर तेज रफ्तार से जमीन से टकराने के बावजूद हाइड्रोजन बम क्यों नहीं फटे? यह प्रश्न अभी भी सभी के सामने था. हादसे की जांच होने के बाद इस की वजह पता चली कि अमेरिकी बमवर्षक विमान पलटवार के मिशन पर जरूर था, लेकिन चालक दल ने हाइड्रोजन बम का इलैक्ट्रिक सर्किट औन नहीं किया था, फिर जो 2 धमाके हुए वे क्या थे?

दरअसल, हाइड्रोजन बम एक थर्मोन्यूक्लियर डिवाइस है, जिस में हमारे सूरज की तरह फ्यूजन रिऐक्शन से भयंकर ऊर्जा निकलती है. इस फ्यूजन रिऐक्शन को शुरू करने के लिए 5 करोड़ सेंटीग्रेट तापमान की जरूरत होती है, जिसे फिशन डिवाइस से पैदा किया जाता है जिसे आमतौर पर छोटे एटम बम से करते हैं. एटम बम में फिशन रिऐक्शन शुरू कराने के लिए ऊंची क्वालिटी का विस्फोटक इस्तेमाल किया जाता है. स्पेन में गिरे 2 बी28 हाइड्रोजन बमों से भी साधारण विस्फोटक का धमाका हुआ. बेशक, यह एटमी धमाका नहीं था लेकिन इस धमाके से पूरा शहर 3 किलोग्राम प्लूटोनियम-239 से प्रदूषित हो गया. प्लूटोनियम-239 से रेडियोऐक्टिव विकिरण फैल गया. शहर के 500 एकड़ के इलाके में विकिरण का प्रभाव फौरन महसूस किया गया.

सनकी तानाशाह

हाइड्रोजन बम के खतरे को जानते हुए भी उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उन ने इस का परीक्षण किया. अगर किसी भी देश का भविष्य और वर्तमान किसी सनकी तानाशाह के हाथ में हो तो फिर वह देश हमेशा तड़पता ही रहता है. ऐसा ही कुछ उत्तर कोरिया के साथ हो रहा है, जहां किम जोंग उन अपनी सनक के कारण न सिर्फ मानवता को तबाह करने वाले टैस्ट कर रहे हैं बल्कि अपने ही लोगों की हत्या भी करवा रहे हैं. आप को यह जान कर हैरानी होगी कि पिछले वर्ष उत्तर कोरिया के तानाशाह किम ने अपने रक्षामंत्री को 260 हजार फुट की रेंज वाली ऐंटी एयरक्राफ्ट गन से सिर्फ 100 फुट दूर खड़ा कर के गोलियों से भुनवा दिया था. उस रक्षामंत्री की गलती सिर्फ इतनी थी कि वह किम जोंग की मौजूदगी में एक सैन्य कार्यक्रम के दौरान सो गया था. यह देख कर किम जोंग उन का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया और अपने आदेशों की अनदेखी के आरोप में उन्होंने अपने रक्षामंत्री को मौत की सजा सुना दी.

2011 में सत्ता संभालने के बाद से किम जोंग उन अपने राजनीतिक विरोधियों और सत्ता को चुनौती देने वाले करीब 70 से ज्यादा नेताओं और अधिकारियों को मौत के घाट उतार चुके हैं. वैसे किम जोंग जैसे तानाशाह के हाथ में उत्तर कोरिया की सत्ता होना वहां के लोगों के लिए एक सजा की तरह है. अब उन्होंने सारी दुनिया को हाइड्रोजन बम के खतरे के साए में ला खड़ा किया है.                                           

सरकारी खरीद और बेईमानी

नरेंद्र मोदी सरकार अच्छे दिनों को तो नहीं ला पाई, पर अब कांग्रेस के बुरे दिन लाने के लिए उस ने कमर कस ली है. इटली की एक अदालत में अगस्ता हैलीकौप्टरों की बिक्री पर दी गई रिश्वत पर कुछ को सजा मिलने पर भारतीय जनता पार्टी की बांछें खिल गई हैं. हर फं्रट पर पिटने पर उसे बड़ी विरोधी पार्टी को पछाड़ने के कुछ उपाय मिले हैं और पूरी भाजपा फौज अब इस मोरचे पर तैनात कर दी गई है. कांग्रेस को फिक्र है. किसी हथियार खरीद में नेताओं का हाथ न हो यह हो नहीं सकता. जब भाजपा सरकार चली जाएगी, तो भाजपा नेताओं की पोल भी खुलेगी. दुनियाभर में लड़ाइयां केवल रिश्वतों के इसी भंडार में हिस्सा पाने के लिए लड़ी जा रही हैं. देश की रक्षा के नाम पर हर देश में सैनिकों के खर्चों पर पूछताछ न के बराबर होती है और इसलिए उसे मोटी रिश्वत का सब से आसान तरीका माना जाता है. इस में खतरा तो आपसी है, क्योंकि बेचने वाले व बिचौलिए जानलेवा हथियार बनाते हैं और खरीदार अफसरों व नेताओं के न करने पर उन्हें जान से मार भी सकते हैं.

कांग्रेस ने इटली से खरीदे इन हैलीकौप्टरों में कुछ पैसा लिया था, यह साबित कभी न हो पाएगा. अभी भी सरकार के पास केवल वे ही दस्तावेज हैं, जो इटली की अदालत में पेश किए गए. उस में कांग्रेस कहां है, यह पता नहीं चलता. भाजपा बिना निशाने वाली गोलीबारी कर रही है कि शायद कहीं कोई सही निशाने पर लग जाए. सरकारी खरीद में बेईमानी खत्म हो गई होती तो आम आदमी कांग्रेस को दोषी मान लेता, पर असल बात तो यह है कि नरेंद्र मोदी के लाख वादों के बावजूद सरकारी रवैया वैसा का वैसा ही है. जब देश में रोजमर्रा की खरीदी में करप्शन बंद न हुई हो, तो यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि करोड़ोंअरबों की एकदम गुप्त खरीद पर रिश्वतें नहीं ली जाएंगी. अगर ऐसा होता तो देश के बाहर सैनिक सामान बेचने वालों की लाइन लगी होती और विदेशी सैनिक हथियार आधे दामों में मिल रहे होते. अखबारी खबरों से ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा.

अगर अगस्ता हैलीकौप्टरों की खरीद में नरेंद्र मोदी सोनिया गांधी व राहुल गांधी को असल में सजा दिलवा पाएं, जैसे 1975 में इंदिरा गांधी को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के जगमोहन सिन्हा ने चुनावी भ्रष्टाचार पर दी थी, तो ही सरकार में रिश्वत के बारे में सही डर बिठाया जा सकेगा. पर अरविंद केजरीवाल तो कहते हैं कि ऐसा कुछ न होगा. ये दोनों तो फिक्स खेल खेल रहे हैं. सरकार है तो रिश्वत है. रिश्वत है इसीलिए सरकार है.

उड़ता पंजाब पर विवाद ठीक नहीं: प्रियंका चोपड़ा

हम एक लोकतांत्रिक देश में रहते हैं और किसी को अपनी बात कहने की आजादी होनी चाहिए. क्रिएटिविटी पर रोक लगाने से कला का विकास रूक जाता है. ‘उड़ता पंजाब’ को लेकर बेवजह का विवाद पैदा किया जा रहा है. ऐसा नहीं होना चाहिए. किसी फिल्म पर वेबजह सेंसर की कैंची ठीक नहीं है.

अपने प्रोडक्शन हाउस पर्पल पेब्लस की पहली भोजपुरी पिफल्म ‘बम बम बोल रहा है काशी’ के प्रमोशन के लिए 9 जून को पटना पहुंची प्रियंका ने कहा कि अगर अच्छी कहानी और स्क्रिप्ट मिले तो वह भोजपुरी फिल्मों में एक्टिग भी करेंगी. उन्होंने कहा- ‘भोजपुरी मेरी मातृभाषा है और इसी वजह से पहली बार फिल्म बनाने का ख्याल आया तो सोचा कि क्यों नही भोजपुरी फिल्मही बनाई जाए. इसलिए भोजपुरी फिल्म लेकर दर्शकों के सामने हाजिर हूं.’

फिल्म के कई द्विअर्थी संवाद के सवाल पर वह सफाई देते हुए कहती हैं कि यह क्षेत्रीय फिल्मों के लिए जरूरी है और इसके बाद भी उनकी फिल्म पूरी तरह से पारिवारिक है. पूरी फिल्म काशी नाम के एक सीधे-सादे लड़के के इर्द-गिर्द घूमती है. प्रियंका की सोच है कि अगर फिल्म में लटके-झटके और मनोरंजन नहीं होगा, तो फिल्म चलेगी ही नहीं. उन्होंने कहा कि हिन्दी फिल्मों में कापफी लटके-झटके होते हैं, जो मुझे कापफी अच्छे लगते हैं.

उन्होंने कहा कि वह बिहार की बेटी हैं और उन्होंने पैदा होते ही बिहार को देखा है. प्रिंयंका का जन्म जमशेदपुर में हुआ और शुरुआती पढ़ाई भी वहीं से हुई. इस वजह से बिहार से उनका गहरा नाता और लगाव-जुड़ाव रहा है. प्रियंका ने अपनी फिल्म की शूटिंग गुजरात में की है.

बिहार में शूटिंग करने के सवाल पर उन्होंने कहा कि उनकी अगली फिल्म की पूरी शूटिंग बिहार में होगी और इसके लिए बिहार सरकार के साथ बातचीत हो रही है. राजय के कला संस्कृति मंत्री ने बिहार में शूटिंग करने का न्यौता दिया है. उन्होंने दावा किया कि उनकी अगली फिल्म बिहारी बैकग्राउंड पर ही आधरित होगी. इसके लिए कहानी की तलाश की जा रही है. उन्होंने कहा कि बिहार में फिल्म निर्माण की काफी संभावनाएं हैं.

बम बम बोल रहा है काशी’ फिल्म में दिनेशलाल यादव निरहुआ, अम्रपाली दूबे, सीमा सिंह और अंतरा बनर्जी कर मुख्य भूमिका है. यह पिफल्म 10 जून को रीलिज हुई है.

उड़ता पंजाबः अफवाहों का दौर गर्म

फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ के निर्माता अनुराग कश्यप अपनी फिल्म को ‘‘सेंट्ल बोर्ड आफ फिल्म सर्टीफिकेशन’’ से पारित कराने की लड़ाई को अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई के रूप में लड़ने का दावा कर रहे हैं. अनुराग की कंपनी ‘‘फैंटम’’ ने ‘‘भारतीय सेंट्रल बोर्ड आफ फिल्म सर्टीफिकेशन’’ के खिलाफ अदालत का दरवाजा खटखटाया हुआ है. मगर सूत्रों की माने तो अदालत में दोनों पक्षों की दलीलों के बहस के बीच कुछ नए खेल भी हो रहे हैं.

गुरूवार 9 जुन 2016 को शाम होते बालीवुड में कई तरह की अफवाहें गर्म रहीं. कई निर्माताओं व निर्देशकों के पास उनके वाट्सअप पर कई तरह के संदेश आते रहे. अफवाहों और सूत्रों के अनुसार अनुराग कश्यप जिस ढंग से ‘उड़ता पंजाब’ को लेकर हंगामा किए हुए हैं, उससे एकता कपूर और उनके पिता जीतेन्द्र  नाराज हैं. जिसके चलते अनुराग कश्यप ने इन दोनों के साथ बैठक की. सूत्र दावा करते है कि अनुराग कश्यप ने जीतेन्द्र व एकता कपूर को समझाया की वह यह सब फिल्म को चर्चा में लाने के मकसद से ही कर रहे हैं. वैसे वास्तव में अनुराग व जीतेंद्र के बीच क्या बातचीत हुई, इसका किसी के पास कोई सबूत नही है. पर बालीवुड सूत्र यही दावा कर रहे हैं.

बालीवुड में यह चर्चाएं भी गर्म हैं कि अनुराग कश्यप से मिलने के बाद जीतेंद्र व एकता कपूर ने ‘सेंट्रल बोर्ड आफ फिल्म सर्टीफिकेशन’ के चेयरमैन पहलाज निहलानी से निजी स्तर की मुलाकात की. इस मुलाकात की खबरें वाट्सअप पर चलती रहीं. मगर किसी ने भी इन मुलाकातों की पुष्टि नहीं की.

इस विवाद के चलते सबसे ज्यादा परेशान पहलाज निहलानी के बेटे चिराग निहलानी व बहू राधिका निहलानी हैं. वास्तव में चिराग निहलानी फरवरी 2015 से ‘‘बालाजी मोशन पिक्चर्स’’ में क्रिएटिब डायरेक्टर की हैसियत से काम कर रहे हैं और वह फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ से भी जुड़े हुए हैं. जबकि चिराग निहलानी की पत्नी राधिका निहलानी भी ‘बालाजी मोशन पिक्चर्स’ से जुड़ी हुई हैं और वह ‘‘उड़ता पंजाब’’ की मार्केटिंग टीम का हिस्सा हैं.

दूसरी तरफ अफवाहें गर्म हैं कि अनुराग कश्यप और एकता कपूर के बीच जो बातचीत हुई है, उसके आधार पर अब अनुराग पैंतरा बदलते हुए हाईकोर्ट के जज से निवेदन कर सकते हैं कि वह अपनी फिल्म को एफसीएटी यानी कि ट्रिब्यूनल में ले जाना चाहते हैं. मगर इस वक्त ट्रिब्यूनल के चेयरमैन छुट्टी पर हैं. तो अदालत से गुहार लगा सकते हैं कि अदालत एफसीएटी में किसी अन्य जज की नियुक्ति करे, जिससे उनकी फिल्म ट्रिब्यूनल जल्द से जल्द देख सके. अब देखना यह है कि आज शाम तक या कल तक क्या परिदृश्य उभरकर आता है.

उधर सभी की निगाहें हाई कोर्ट के जज पर भी टिकी हुई हैं. सूत्र दावा करते है कि एकता कपूर अभी भी चाहती हैं कि उनकी फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ 17 जून को ही रिलीज हो सके. जबकि ‘‘बालाजी मोशन पिक्चर्स’’ से जुडे़ कुछ सूत्र दावा कर रहे हैं कि अनुराग कश्यप व एकता कपूर के बीच हुई बातचीत में यह सहमति बन चुकी है कि अब वह फिल्म ‘‘उड़ता पंजाब’’ को 5 जुलाई को रिलीज करेंगे.

नीलगायों पर चलती सियासी गोलियां

बिहार में किसानों और खेती को बचाने के लिए नीलगायों को मारने की पहल पर सियासत शुरू हो गई है. पर्यावरण और जानवरों के हितों की पैरोकार और केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने अपने ही दल और सरकार के पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. बिहार में मोकामा के दियारा इलाकों में नीलगायों के बढ़ते आतंक को रोकने के लिए जब उन्हें मारने की कवायद शुरू की गई, तो उन्होंने कहा कि पता नहीं जानवरों को मारने की कौन सी हवस पैदा हो गई है? अपने साथी मंत्री के आरोपों के जबाब में जावडेकर सफाई देने के लहजे में कहते हैं कि बिहार सरकार ने नीलगायों को मारने की अनुमति मांगी थी और कानून के तहत मंजूरी दी गई है. नीलगायों को मारना केंद्र की कोई योजना नहीं है.

मोकामा के दियारा इलाकों में पिछले कुछ दिनों से नीलगायों को मारने की मुहिम चल रही है और अब तक 300 से ज्यादा नीलगायों को मारा जा चुका है. इसके लिए हैदराबाद के शिकारी नवाब शफाथ अली खान और उनकी टीम को लगाया गया है.

नीलगायों को मारने से मेनका इस कदर खफा हैं कि उन्होंने केंद्र सरकार और बिहार सरकार दोनों को ही कठघरे में खड़ा कर दिया है. उन्होंने कहा कि आरटीआई से पता चला है कि किसी राज्य ने भी जानवरों को मारने की मंजूरी नहीं मांगी है. वहीं नीतीश सरकार पर हमला बोलते हुए उन्होंने कहा कि आजादी के बाद बिहार में होने वाला यह पहला इतना बड़ा प्राणी संहार है. मेनका कहती हैं कि गुजरात में एक लाख 86 हजार नीलगाएं हैं और वह अकसर मूंगफली, अरांडी, बाजरा, गन्ना, कपास आदि फसलों को नुकसान पहुंचाती है, इसके बाद भी वहां एक भी नीलगाय नहीं मारी गई है. गौरतलब है कि साल 2007 में ही केंद्र सरकार ने गुजरात सरकार को नीलगायों को मारने की मंजूरी दी थी.

मेनका इतने पर ही नहीं रूकती हैं. आगे वह कहती हैं कि क्या अब गोवा में मोरों को मारा जाएगा? बंगाल में हाथियों को मारने की परमिशन दी जाएगी? हिमाचल में बंदरों की संख्या ज्यादा है तो क्या बंदरों को मारा जाएगा? चंद्रपुर में जंगली सूअरों को निशाना बनाया जाएगा? सरकार को सोचना चाहिए कि जंगलों के कटने और जंगलों में आग लगने की वजह से ही जानवर बाहर निकल आते हैं.

जदयू के प्रदेश प्रवक्ता नीरज कुमार कहते हैं कि केंद्र सरकार ने एक दिसंबर 2015 को ही नीलगायों और जंगली सूअरों को मारने की इजाजत का गजट जारी किया था, उस समय मेनका गांधी ने उसका विरोध क्यों नहीं किया? अगर मेनका को नीलगायों से प्रेम है तो उसे खेतों से हटा कर कहीं और रखने का इंतजाम करवाएं.

नीरज कहते हैं मेनका गांधी को पता नहीं है कि नीलगायों की वजह से बिहार समेत कई राज्यों के किसान तबाह हो रहे हैं. नीलगायों से फसलों को बचाने के निए साल 2007 में किसानों का बड़ा आंदोलन हो चुका है और उसी के बाद पटना हाई कोर्ट ने भारत सरकार को काररवाई का आदेश दिया था. उसके बाद ही नीलगायों और जंगली सूअरों को अनुसूची-3 से हटा कर अनुसूची-5 में डाला गया और उनके शिकार की इजाजत दी गई. वन्य प्राणी अधिनियम-1972 की धरा-11 बी के तहत कहा गया है कि इनके शिकार के लिए पेशेवर शिकारियों की मदद ली जाए. बिहार के 20 जिलों में पूरी तरह से और 11 जिलों के सीमित इलाकों में नीलगायों के शिकार की अनुमति है. वहीं 10 जिलों में जंगली सूअरों का शिकार करने की मंजूरी है.

गौरतलब है कि पटना जिला के मोकामा के दियारा इलाकों में पिछले कई सालों से नीलगायों का आतंक मचा हुआ है और वहां के किसानों ने चोती करना बंद कर दिया है. नीलगायों का झुंड दलहन, तिलहान, रबी, खरीफ समेत सब्जियों की पफसलों को पलक झपकते ही चर जाता है या बर्बाद कर देता है. फतुहा से लेकर बड़हिया तक फैले मोकामा दियारा क्षेत्र में एक लाख 67 हजार हेक्टेयर में खेती की जाती है, पर पिछले कुछ सालों से हजारों हेक्टेयर खेत खली पड़े हैं. सरकारी आंकड़ों में बिहार में करीब 25 हजार नीलगाएं हैं.

नीलगायों के आतंक से परेशान उत्तर बिहार के कई इलाकों में किसान हजारों एकड़ खेत में खेती नहीं कर पा रहे हैं. उनकी मेहनत और पूंजी को झटके में नीलगाय चर जाते हैं और किसानों के सामने सिर पीटने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जाता है. बिहार में हरेक साल नीलगाय किसानों को करीब 600 करोड़ रूपए का चपत लगा देती हैं और उनके खौफ की वजह से पिछले साल करीब 25 हजार हेक्टेयर खेत खाली रह गए. राज्य के पटना, भोजपुर, बक्सर, रोहतास, औरंगाबाद, सिवान, पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, मुजफ्फरपुर, वैशाली, सारण, बेगुसराय और मधुबनी में नीलगाय और जंगली सूअर करीब 21 हजार टन अनाज गटक जाते हैं, जिससे किसानों को हर साल 600 करोड़ रूपए का नुकसान उठाना पड़ रहा है.

उत्तर बिहार के गंगा और सोन नदी के तटीय इलाकों में नीलगायों के आतंक से किसान परेशान और खेती तबाह है. खेतों में झुंड के झुंड नीलगाय घूमते रहते हैं और कई एकड़ में लगी फसलों को चट कर जाते हैं. मोतिहारी जिला के पिपरा गांव का किसान मलंग लाल कहता है कि उसने अरहर की खेती के लिए कर्ज लेकर बीज, खाद से लेकर सिंचाई तक का इंतजाम किया था, लेकिन उसकी सारी फसल को नीलगाय चट कर गए. अब महाजन का कर्ज चुकाना बहुत बड़ी समस्या बन गई है.

टैक्स माफी या 12 लाख की दक्षिणा

हालांकि सभी मंत्री सहमत नहीं थे, लेकिन मामला चूंकि धर्म का था इसलिए कोई भी विरोध जताने की हिम्मत नहीं जुटा सका. मध्य प्रदेश सरकार की कैबिनेट बैठक मे आखिरकार जगतगुरु कहे जाने वाले शंकराचार्य स्वरूपानन्द की डेढ़ करोड़ की कीमत बाली लग्जरी गाड़ी का कोई 12 लाख रुपये का टैक्स माफ कर दिया गया. शंकराचार्य के पास अरबों की संपत्ति है, इसके बाद भी उन्हें टैक्स में यह भारी भरकम छूट क्यों दी गई, यह सवाल ना कोई पूछेगा ना कोई इसका जबाब देगा.

एक हफ्ते पहले से ही इस टैक्स माफी रूपी दक्षिणा पर सुगबुगाहट शुरू हो गई थी. गृह मंत्री बाबूलाल गौर इस जिद पर अड़े थे कि जगतगुरु की गाड़ी टैक्स फ्री की जाए, लेकिन कुछ मंत्रियों को इस पर स्वभाविक एतराज था, क्योकि ये शंकराचार्य कांग्रेसी विचारधारा के हैं और हर कभी भाजपा की नीतियों का खुला विरोध करते रहते हैं. उज्जैन सिंहस्थ मे दलित स्नान पर उन्होंने इसे भेदभाव फैलाने वाला कहा था, क्योकि यह वर्ण व्यवस्था पर प्रहार करता हुआ था. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पहले ही भोपाल में उनके पाँव पकड़ चुके थे, इसलिए उन्होने ज्यादा बवंडर खड़ा नहीं किया और एवज में अपनी गाड़ी का यह टैक्स माफ करवा लिया.

इस आलीशान गाड़ी मे आधुनिक सुख सुविधाओं के तमाम साधन हैं, जिनसे साधु सन्यासियों को कोई मोह या जरूरत भी नहीं होनी चाहिए, लेकिन आजकल के सन्यासी बेचारे कहां घास फूस पर सोते मौसम की मार सहन कर पाते हैं, इसलिए इस गाड़ी मे एसी भी है , लिफ्ट और शौचालय भी है और हाइटेक कैमरे भी लगे हैं. आम आदमी अगर वक्त पर नल का बिल भी अदा ना कर पाये, तो नगर निगम के मुलाज़िम टोंटी खोल कर ले जाते हैं और जो परिवहन विभाग बिना रोड टैक्स वाली गाड़ी पकड़ लेता है, तो कोई दलील या मजबूरी नहीं सुनता, फिर इस धर्मगुरु पर मेहरबानी क्यों, जबकि 12 लाख या डेढ़ करोड़ रुपये उसके लिए हाथ का मैल है, यानि बेहद मामूली रकम है.

सीधे सीधे राज्य सरकार धर्म गुरुओं को जनता का पैसा नगद चढ़ावे में देगी तो जरूर कुछ लोग हल्ला मचाते, इसलिए रास्ता इस तरह निकाला जाता है कि साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे. यह देश वीर जवानों का नहीं, बल्कि धर्मभीरुओं का देश है, जिस सूबे का सीएम प्रशासनिक काम काज छोड़ एक महीने कुम्भ में साधू संतों की खिदमत में लगा रहे, अरबों रुपये एक धार्मिक आयोजन पर फूक खुद अपनी पीठ थपथपाए, उसमें अगर इन धर्माचार्यों को अगर इस तरह की छूटें न दी जाएँ, तो जरूर बात हैरत की होती. ये वही शंकराचार्य हैं, जो यह कहते हैं कि अगर महिलाएं शनि पूजन करेंगी, तो उनके साथ बलात्कार की घटनाएँ बढ़ेगीं. ये शिर्डी वाले साईं बाबा को वेश्या का बेटा बताते सनातन धर्म की दुहाई देते हैं कि उसका पूजन मत करो. ऐसा इसलिए कि चढ़ावा सिर्फ ब्राह्मण को मिले. ऐसे धर्म गुरु से टैक्स लिया जाना वाकई गुनाह है, जिससे मध्य प्रदेश सरकार ने खुद को बचा लिया है.

139 साल के क्रिकेट इतिहास में पहली बार बनेगा यह रिकॉर्ड

बीसीसीआई ने 2016-17 में टीम इंडिया के इंटरनेशनल और डोमेस्टिक सीजन का शेड्यूल जारी कर दिया है. इस सीजन में छह नए मैदानों पर पहली बार टेस्ट खेला जाएगा. टीम 23 सितंबर से डोमेस्टिक सीजन की शुरुआत न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज से करेगी. वहीं, 11 जून से टीम 17 टेस्ट खेलेगी.

ये 139 साल की क्रिकेट हिस्ट्री का नया रिकॉर्ड है. इससे पहले, ऑस्ट्रेलिया ने 1979-80 सीजन में 15 टेस्ट खेले थे. वहीं इंडिया ने भी उसी साल सबसे ज्यादा 13 टेस्ट खेले थे.

इसी दौरान टीम इंडिया पहली बार कोलकाता के ईडन गार्डेन्स में न्यूजीलैंड के साथ डे नाइट मैच खेलेगी.

यहां होंगे पहली बार टेस्ट मैच…

बोर्ड ने बताया कि राजकोट, ‌विशाखापट्टनम, पुणे, धर्मशाला, रांची और इंदौर में पहली बार टेस्ट मैच होंगे. भारतीय टीम इस साल घरेलू मैदानों पर 13 टेस्ट, 8 वनडे और 3 टी20 मैच खेलेगी. 11 जून को जिम्बाब्वे में शुरू हो रही सीरीज में टीम इंडिया 3 वनडे और तीन टी20 मैच खेलेगी.

इसके बाद टीम वेस्टइंडीज में 4 टेस्ट खेलकर वापस देश लौटेगी और 23 सितंबर से डोमेस्टिक सीजन की शुरुआत न्यूजीलैंड के खिलाफ सीरीज से करेगी. इस तरह इस सीजन में कुल 17 टेस्ट, 11 वनडे और 6 टी20 मैच खेलने का शेड्यूल है.

किसके साथ कितने मैच

इंडिया टूर पर न्यूजीलैंड 3 टेस्ट और 5 वनडे खेलेगा. टेस्ट मैच इंदौर, कानपुर और कोलकाता में होंगे. वनडे सीरीज के 5 मैच धर्मशाला, दिल्ली, मोहाली, रांची और विशाखापट्टनम में खेले जाएंगे.

कीवी टीम के बाद टीम इंग्लैंड के खिलाफ 5 टेस्ट, 3 वनडे और 3 टी20 खेलेगी. टेस्ट मोहाली, राजकोट, मुंबई, विशाखापट्टनम और चेन्नई में होंगे. पुणे, कटक और कोलकाता में 3 वनडे मैच. बेंगलुरु, नागपुर और कानुपर में 3 टी20 खेले जाएंगे.

ऑस्ट्रेलियाई टीम फरवरी-मार्च, 2017 में भारत दौरे पर आएगी. दोनों के बीच 4 टेस्ट मैच होंगे. सीरीज के टेस्ट मैच बेंगलुरु, धर्मशाला, रांची और पुणे में होंगे.

बांग्लादेश क्रिकेट टीम भी एक टेस्ट मैच के लिए भारत आएगी. यह टेस्ट हैदराबाद में खेला जाएगा.

पहली बार डे नाइट मैच खेलेगी टीम इंडिया

इस साल पहली बार टीम इंडिया डे नाइट टेस्ट मैच भी खेलना जा रही है. न्यूजीलैंड के खिलाफ यह टेस्ट मैच कोलकाता के ईडन गार्डेन्स मैदान पर होगा. क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ बंगाल (सीएबी) के अफसरों ने इसे कन्फर्म भी किया है. सीएबी ने डे नाइट मैच होस्ट करने के लिए बीसीसीआई को लेटर लिखा था.

अब जॉनसन एंड जॉनसन जांच के घेरे में

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) ने अमेरिकी कंपनी जॉनसन एंड जॉनसन के दो बेबीकेयर उत्पादों की प्रयोगशाला जांच के आदेश दिए हैं. कंपनी के पाउडर वाले उत्पादों के खिलाफ अमेरिकी अदालतों के आदेशों की मीडिया रिपोर्टो पर आयोग ने स्वत: संज्ञान लेते हुए यह कदम उठाया है.

एनसीपीसीआर ने पांच राज्यों गुजरात, झारखंड, असम, आंध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश से कंपनी के बेबी पाउडर और शैंपू के नमूने लेकर सरकारी प्रयोगशाला में जांच कराने को कहा है. राज्यों को पिछले महीने लिखे पत्र में आयोग ने कुछ समाचार रिपोर्टों का हवाला दिया था. इन रिपोर्टों में कंपनी के उत्पादों में एस्बेस्टस और फॉर्मेल्डिहाइड जैसे जहरीले पदार्थो के इस्तेमाल पर चिंता जताई गई है.

संपर्क करने पर कंपनी के एक अधिकारी ने बताया कि उन्हें इस संबंध में सरकार की ओर से कोई आपत्ति नहीं मिली है. कंपनी ने 2015 से सभी तरह के डिहाइड्रेट का इस्तेमाल बंद कर दिया है. वहीं एनसीपीसीआर प्रमुख स्तुति कक्कड़ ने कहा, 'हमें किसी मसले पर स्वत: संज्ञान लेने का अधिकार है और हमने वही किया है. यह तथ्यों को जानने का प्रयास है. हम बच्चों के स्वास्थ्य से कोई समझौता नहीं कर सकते.'

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