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टौयलेट में पानी बचत के लिए आया एक ऐप

दुनिया में अगर कोई सबसे निजी जगह होती है तो वह टौयलेट या बाथरूम ही होता है. लेकिन कभी-कभी यहां भी प्राइवेसी की चिंता हो ही जाती है. सुबह हो या शाम ‘फ्रेश’ होने के लिए जब कोई टौयलेट में जाता है तो आमतौर पर उसे यही चिंता लगी रहती है कि फ्रेश होने के दौरान भीतर की आवाज बाहर न पहुंचे. इसी चिंता में टौयलेट में पहुंच कर सबसे पहले जो काम आमतौर पर लोग करते हैं वह यह कि एकाध नल खोल ही देते हैं इससे होता यह है कि फ्रेश होने के दौरान होनेवाली आवाज के बाहर पहुंचने की शर्म से तो बच जाते हैं. लेकिन बहुत सारा पानी बेजा बह जाता है. कहते हैं पूरे विश्व में बाथरूम में सबसे ज्यादा पानी बर्बाद होता है. बाथरूम में खर्च होनेवाले पानी का 75 प्रतिशत यूं ही बर्बाद हो जाता है. ब्रश करते हुए, शेविंग करते हुए हम बहुत सारा पानी पहले ही जाया करते हैं. इसके बाद नहाने और कपड़े धोने में. फ्रेश होने के दौरान भी बहुत सारा पानी बिला वजह जाया होता है.

जहां तक शेविंग करने या ब्रश करने के दौरान होने वाली बर्बादी का सवाल है तो इस ओर लोगों को जागरूक बनाने के लिए सरकारी तौर पर विज्ञापन जारी किए गए हैं. लेकिन इसका कितना लाभ हुआ, इसका हिसाब किसने रखा या नहीं – यह तो पता नहीं. लेकिन इतना जरूर है कि देश के विभिन्न हिस्से में पानी की मौजूदा किल्लत समस्या की गंभीरता का एहसास कराती ही है.

पानी की किल्लत आज भारत में बड़ी समस्या बन कर उभर आयी है. निकट भविष्य में इस समस्या का समाधान नजर भी नहीं आता. भूगर्भजल का स्तर भी खतरनाक तरीके से कम होता जा रहा है. जाहिर है आगे चल समस्या और भी अधिक गंभीर होगी. बहरहाल, कम से कम फ्रेश होने के दौरान होनेवाली पानी की बर्बादी के लिए एक नया ऐप जारी हुआ है और उसका नाम है – साइलेंट लू. टौयलेट में पानी की बर्बादी को बचाने के लिए ही इस ऐप को तैयार किया गया है. कम से कम ऐसा ही दावा करती है. इस ऐप को विज्ञापन बनानेवाली ब्रिटेन की एक कंपनी सात्ची एंड सत्ची और बाथस्टोर ने मिल कर बनाया है. कंपनी का कहना है कि लंबे समय से सोशल मीडिया में इस तरह के किसी ऐप की मांग की जा रही थी. अंतत: 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस को कंपनी ने इस ऐप को लांच कर दिया. कंपनी इसे क्रांतिकारी ऐप मानती है. कंपनी को उम्मीद है कि इस एक तीर से कई निशाना साधना संभव होगा. सबसे पहला मकसद पानी की बचत है. इसके अलावा लोगों में पानी की बर्बादी को लेकर जागरूकता फैलाना भी है. इससे न केवल पानी की बचत होगी, पैसे और ऊर्जा की भी बचत इसका बोनस है.

इस ऐप में सामान्य नल से पानी गिरने की आवाज से लेकर शावर और ह्वेल की अपनी पूंछ पानी में पकटने से निकलनेवाली झपाक की आवाज से लेकर नियाग्रा फौल, मानसून, यहां तक कि सुनामी तक की आवाज लोड की गयी है. यह ऐसन आईअओएस और एंड्रायड दोनों ही तरह की डिवाइज के लिए उपलब्ध है: इसे गुगल प्ले और एप स्टोर से फ्री डाउनलोड किया जा सकता है.

टौयलेट में फ्रेश होने के लिए जाने पर अगर किसीको लगे कि ‘स्थिति’ बहुत अच्छी नहीं है और आवाज के बाहर जाने का खतरा हो सकता है तो इस अपने र्स्माट फोन में इस ऐप का सहारा लिया जा सकता है. टौयलेट में कदम रखते ही इस ऐप को चला दें. इस ऐप में बहुत तरह की पानी बहने की आवाज लोड की गयी है. शर्मशार करनेवाली आवाज से भी बचा जा सकता है और पानी की बर्बादी से भी.

भूख से मौत का ‘तकनीकी पेंच’

देश में भूख से होने वाली मौतों को लेकर राजनीति करना अलग बात है और सच्चाई इससे बहुत अलग है. हर राज्य में हर सरकार के शासनकाल में ऐसी मौतें होती हैं. जो सत्ता में दल होता है वह अपना बचाव करता है और जो विपक्ष में होता है वह सत्ता की आलोचना करता है. भूख से होने वाली मौतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बेहद गंभीर है. वहां ऐसे मामलों की मानिटरिंग होती है. सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कहा है कि भूख से होने वाली मौत के मामले में उस जिले के डीएम को सीधा जिम्मेदार माना जायेगा. तमाम समाजसेवी संगठन इसका हिस्सा हैं. जिससे कि गडबडी न हो और भूख से होने वाली मौतों को रोका जा सके.

केन्द्र सरकार से लेकर प्रदेश सरकार तक ऐसे पुख्ता प्रबंध करने का दावा करते है कि कोई मौत भूख से नहीं होगी. सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी आज तक किसी जिले के डीएम को भूख से मौत का जिम्मेदार मान कर कोई सजा नहीं दी गई है. दरअसल भूख से मौत का एक तकनीकी पेंच है. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मौत का कारण कभी भी भूख नहीं लिखा जाता है.

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के हैदरगढ तहसील के पकरिया गांव में 40 साल के श्रीकांत दीक्षित की मौत को भूख से हुई मौत मानने से प्रशासन ने इंकार कर दिया है. बाराबंकी जिला प्रशासन ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में श्रीकांत के शरीर में 50 ग्राम खाना निकला है जिससे पता चलता है कि उसकी मौत भूख से नहीं हुई है.

डीएम अजय यादव का कहना है कि श्रीकांत गरीब जरूर था लेकिन उसकी मौत भूख से नहीं हुई. श्रीकांत की 70 साल की मां कल्याणी का कहना है कि कुछ दिनों से उसे केवल आटा घोल कर दिया जा रहा था. श्रीकांत को किसी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिल रही थी. उसकी मां को 300 रूपये महीनें की पेंशन मिलती थी. मार्च माह से वह भी नहीं मिली थी. श्रीकांत को चोट लगी थी इसलिये वह मेहनत मजदूरी करने नहीं जा पा रहा था. श्रीकांत की मां के पास अंत्योदय कार्ड था पर उसको 4 माह से राशन नहीं मिला था.

श्रीकांत की मौत को बाराबंकी प्रशासन मौत से हुई मौत मानने को तैयार नहीं है. अगर श्रीकांत की मौत को भूख से होने वाली मौत का प्रमाणपत्र मिल गया तो डीएम बाराबंकी के खिलाफ कररवाई तय हो जायेगी. भूख से होने वाली मौतों में सुप्रीम कोर्ट के दखल से डीएम बाराबंकी के खिलाफ सरकार को कदम उठाना ही पडेगा. डीएम को बचाने के लिये पोस्टमार्टम रिपोर्ट में भूख को मौत का जिम्मेदार नहीं बनाया जा रहा है. तकनीकी रूप से कोई मौत भूख से नहीं होती. मौत का कारण कुपोषण होता है. जिसका जिम्मेदार शरीर को खाना न मिलना होता है.

शरीर को जब सही से खाना नही मिलता तो तमाम तरह की बीमारियां हो जाती है. इनमें खून का न बनना सबसे बडी बीमारी होती है. जब शरीर में खून नहीं बनता तो हार्टअटैक जैसी तमाम बीमारियां होती है. जिस वजह से पोस्टमार्टम के हिसाब से मौत का जिम्मेदार भूख को नहीं बल्कि भूख की वजह से होने वाली बीमारियों को माना जाता है. इस तकनीकी पेंच की वजह से कोई भी जिलाधिकारी सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन से बचने में सफल हो जाता है.

चारा घोटाले की फाइलों का घोटाला

बिहार के करीब तीन दशक पुराने चारा घोटाले की फाइलों को लेकर अब नया घोटाला हो गया है. पशुपालन विभाग के विधि शाखा से चारा घोटाले से जुड़ी कई महत्वपूर्ण फाइलें गायब हो गई हैं. विभाग की 3 अलमारियों का ताला तोड़ कर चोरों ने बड़ी ही सफाई से घोटाले से जुड़े दस्तावेजों को गायब कर दिया. चारा घोटाले के आरोपी कई नेताओं, वेटनरी डाक्टर और अराजपत्रित मुलाजिमों के खिलाफ चल रही न्यायिक और विभागीय जांच की फाइलें चोरी हो गई हैं.

विभाग से फाइलों के चोरी होने की बात को विभाग के आला अफसरों ने दबा कर रखा और गुपचुप तरीके से फाइलों की खोज की गई, पर फाइलें नहीं मिल सकीं. थक-हार कर सचिवालय थाना में चोरी की एफआईआर दर्ज की गई. विभाग की अलमारी से करीब 300 फाइलों की चोरी हुई है. विभागीय सचिव राधेयाम साह ने बताया कि एफआईआर कराने के साथ ही मामले की जांच के लिए 3 सदस्यों की जांच कमिटी बनाई गई है. इसके साथ ही सचिव यह भी दावा कर रहे हैं कि चोरी हुई फाइलों में चारा घोटाले से जुड़ी फाइलें नहीं हैं. अधिकतर फाइलें वेटनरी डाक्टरों की मांगों से जुड़ी थी. वहीं पशुपालन मंत्री अवधेश कुमार सिंह बताते हैं कि विभागीय मुकदमों से जुड़ी फाइलों की चोरी हुई है, पर उन्होंने भी चारा घोटाला की फाइलों के चोरी होने से इंकार कर दिया.

गौरतलब है कि जनवरी 1996 में 950 करोड़ रूपए के चारा घोटाले का भंडाफोड़ हुआ था. उस समय उपायुक्त रहे अमित खरे ने पशुपालन महकमे के दफ्तरों पर छापा मार कर खुलासा किया था कि चारा सप्लाई के नाम पर फर्जी कंपनियों के ओट में करोड़ों रूपयों की हेरापफेरी हुई है. बाद में इस घोटाले की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा गया था. 17 साल तक की जांच और अदालती सुनवाई के बाद लालू समेत पहले के मुख्यमंत्री और जदयू नेता जगन्नाथ मिश्रा, जदयू सांसद जगदीश शर्मा, राजद विधयक आरके राणा समेत 32 आरोपियों को सजा मिली है.

1996 में 950 करोड़ रूपए के जिस चारा घोटाला का पर्दाफाश हुआ था, उसके 1 केस चाईबासा ट्रेजरी से अवैध निकासी का मामला, केस नंबर- आरसी 20ए/1996 का फैसला सुनाया जा चुका है और लालू को 5 साल की कैद की सजा मिली है. गौरतलब है कि 10 जुलाई 2013 को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश जारी करते हुए कहा था कि 2 साल या इससे ज्यादा सजा पाने वाले नेता 6 सालों तक चुनाव नहीं लड़ सकेंगे. इस लिहाज लालू यादव  साल 2023 तक चुनाव नहीं लड़ सकते हैं

फिलहाल तो चारा घोटाले के 1 ही मामले में फैसला आया है और 5 मामलों में फैसला आना बाकी है.  केस नंबर- आरसी 38ए/1996 ; दुमका ट्रेजरी 3 करोड़ 97 लाख का घोटाला, आरसी- 47ए/1996 ; डोरंडा ट्रेजरी 184 करोड़ का घोटाला, आरसी- 64ए/1996 ; देवघर ट्रेजरी 97 लाख का घोटाला, आरसी- 68ए/1996 ; चाईबासा ट्रेजरी 32 करोड़ का घोटाला और आरसी-63ए/1996 ; भागलपुर ट्रेजरी के घोटाले का फैसला आना अभी बाकी ही है.

कुल 64 मामलों पर 17 साल तक चले सीबीआई जांच में कुल 56 लोगों के खिलाफ आरोप साबित किया गया. इनमें से 7 आरोपियों की मौत हो चुकी है.  475 पेज के फैसले में इस केस की सुनवाई के दौरान 7 जज बदले गए और आखिरकार आठवें जज प्रभास कुमार सिंह ने फैसला सुनाया. 950 करोड़ के चारा घोटाला की जांच में सीबीआई ने 622 करोड़ के घोटाले को सही पाया. साल 1996 में तब बिहार के डीसी रहे अमित खरे ने घोटाला का केस दायर किया था. चारा घोटाले के फंदे में 9 राजनेता, 7 आईएएस अपफसर, 1 आईआरएस अफसर, 66 ट्रेजरी अपफसर और पशुपालन महकमे के 197 अफसर फंसे थे.

चारा घोटाला के मामले में लालू यादव कई दफे जेल के अंदर जा चुके हैं और जमानत पर बाहर निकल चुके हैं. सबसे पहले 30 जुलाई 1997 को केस नंबर- 20ए/1996 में मामले में 134 दिनों तक जेल में रह चुके हैं. उसके बाद केस नंबर-64ए/1996 मामले में 28 अगस्त 1998 को जेल भेजे गए और 73 दिनों के बाद बाहर आए. 5 अप्रैल 2000 को 36 दिनों तक जेल में कैद रहे और पिफर 28 नबंबर 2000 को केस नंबर-5ए/1998 के मामले में 1 दिन के लिए जेल में रहे. केस नंबर-47ए/1996 के मामले में 26 नबंबर 2001 को जेल की सलाखों के पीछे पहुंचाएं गए और 59 दिनों तक अंदर रहे.

भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी कहते हैं कि बिहार के मुख्यमंत्री भले ही नीतीश कुमार हों पर असल में राजपाट लालू यादव ही चला रहे हैं. अपनी सरकार ही है तो फाइलों को गायब करना कौन सी बड़ी बात है? इस चोरी से जनता के बीच यही मैसेज जा रहा है कि लालू ने अपने बचाव के लिए ही फाइलों को गायब करवाया है, इस मामले की सही और तेज जांच के बाद ही चोरों का खुलासा हो सकेगा.

20 सालों से गायब है लालू के पीए

लालू यादव जब बिहार के मुख्यमंत्री थे तो उनके पीए मुकुल कपूर की तूती बोलती थी. वह 1990 से 1996 तक लालू की आंख और कान रहे. चारा घोटाले का खुलासा होने के बाद से लेकर आज तक 20 सालों से ज्यादा समय बीत गया पर मुकुल कपूर का अता-पता नहीं चल सका है. सीबीआई खाक छानती रह गई पर मुकुल को ढूंढ नहीं सकी है. सीबीआई ने जब मुकुल के घर पर छापा मारा था तो उसे एक डिजिटल डायरी हाथ लगी थी, जिसमें चारा सप्लायरों का जिक्र था और सभी के नाम और एकाउंट नंबर दर्ज थे. माना जाता है कि लालू के इशारे पर ही मुकुल गायब हो गए. कई बार उन्हें पटना और दिल्ली में देखे जाने की हवा उड़ती रही. यह भी हवा है कि वह उत्तराखंड में नाम और चेहरा बदल कर रह रहा है, पर सीबीआई उस तक पहुंच पाने में नाकाम ही रही है.

‘स्वच्छता अभियान’ वालों की जलती झुग्गियां

दिल्ली के नवादा मैट्रो स्टेशन से महज 5 सौ मीटर की दूरी पर मटियाला, मछली मार्केट कबाड़ी झुग्गी बस्ती है. इस बस्ती में तकरीबन 125 झुग्गियां हैं, जिन में घर और गोदाम दोनों हैं. ये लोग बिहार के पटना, नालंदा, शेखपुरा जिले के पासवान, रविदास, मलिक (डोम), साव जाति से हैं, जो अपने परिवारों के साथ 10-12 सालों से यहां रह रहे हैं. इन लोगों की झुग्गी बस्ती जिस जमीन पर बसी है, वह डीडीए की है. लेकिन इस जमीन को ले कर जयकिशन वत्स और जसबीर सोलंकी का झगड़ा चलता रहा है. दोनों ही अलगअलग राजनीतिक पार्टी से जुड़े हैं. इन झुग्गी बस्ती वालों से जयकिशन वत्स किराया वसूलते हैं, तो दूसरी तरफ जसबीर सोलंकी बिल्डिंग मैटीरियल वालों से पैसा वसूलते हैं.

यहां के झुग्गी बस्ती वाले घरों, सड़कों, गलीमहल्ले से कूड़ा उठाने का काम करते हैं. उन को कूड़ा उठाने के मेहनताने के रूप में कुछ पैसा नहीं मिलता है. हां, गंदा या चोर की उपाधि जरूर मिल जाती है. दूसरों की गंदगी उठा कर खुद गंदगी में रहने वालों के साथ छुआछूत का भेद बहुत ज्यादा है. यहां तक कि उन के साथ उठनाबैठना तो दूर की बात है, उन के बच्चों को स्कूल में दाखिला तक नहीं दिया जाता है. इस कबाड़ी बस्ती में एक से 14 साल के 250 बच्चे हैं, लेकिन एक साल पहले तक एक भी बच्चा स्कूल में नहीं जाता था. एक अध्यापक की कोशिश से पिछले साल 75 बच्चों का दाखिला हो पाया था, लेकिन इस साल स्कूल ने बच्चों का दाखिला लेने से मना कर दिया. खासकर एक भी लड़की का दाखिला नहीं हो पाया.

पिछले साल जिन बच्चों को दाखिला मिला था, उन में से कई बच्चे अपने स्कूल में पहले नंबर पर आए थे. इस बस्ती के एक किलोमीटर के दायरे में  2 उच्च माध्यमिक विद्यालय, 4 माध्यमिक विद्यालय व 3 आंगनबाड़ी केंद्र हैं. उन्हीं अध्यापकों की कोशिश से बस्ती में ‘अक्षर ज्ञान अभियान’ चला कर बच्चों को पढ़ाने की कोशिश की गई. लेकिन अब तो बस्ती जल चुकी है. ज्यादा उम्मीद तो यह है कि उसे जलाया गया है. 16 अप्रैल, 2016 को जब सभी लोग अपनेअपने काम पर चले गए थे, तो बस्ती में आग लग गई या लगा दी गई. देखते ही देखते 93 घर आग में जल कर स्वाहा हो गए. सरकारी अफसरों का दौरा हुआ, आननफानन तंबू लगाए गए और एक दिन बाद ही तंबू उखाड़ लिए गए. इस गरमी से आम जनता की जान जा रही है, वहीं इन लोगों को इस तपती धूप में खुले आसमान के नीचे प्रशासन द्वारा छोड़ दिया गया. अरुण माली की पत्नी अपने एक महीने के बेटे देवराज को गोद में लिए एक कीकर के पेड़ के नीचे बैठी हुई थी. उसे वह अपने आंचल की छांव से ढकने की कोशिश कर रही थी.

उस ने बताया कि उन के घर में टैलीविजन, पंखा सबकुछ था, लेकिन सभी जल कर खाक हो गए. इस बस्ती में बिजली, पानी, शौचालय जैसी सुविधाएं नहीं हैं. पीने के लिए पानी 3-4 बजे सुबह उठ कर अलगअलग जगहों से लाते हैं. खुले में शौच करने पर आसपास के लोग कांच की बोतलें और पत्थर फेंकते हैं. इस तरह की जलालत सहने के बाद भी लोगों की एक छोटी सी उम्मीद है कि ‘सरकार कुछ दे या न दे, उन्हें यहां रहने दे’. सोना देवी, जिन की उम्र 70 साल से ज्यादा है, ने बताया कि जब वे लोग यहां आए थे, तो जंगल था. उन्हीं लोगों ने इस जगह को बनाया और बसाया है.

जब बस्ती वाले कर्ज ले कर अपने घरों को दोबारा ठीक करने लगे, तो कुछ लोग, जो अपने को नगरनिगम का मुलाजिम बता रहे थे, 18 अप्रैल, 2016 को बुलडोजर ले कर पहुंच गए, उस जगह को समतल करने लगे और लोगों से बांसबल्ली उखाड़ने के लिए कहने लगे. लोगों ने मिल कर खिलाफत की और कहा कि वे ऐसे ही रहेंगे. अपने को नगरनिगम का मुलाजिम कहने वालों ने यह कहते हुए समझाने की कोशिश की कि वे कचरा उठाने आए हैं. इस पर बस्ती वालों ने जवाब दिया कि वे सारी दुनिया का कचरा साफ करते हैं, उन का कचरा कौन साफ करेगा? लोगों की खिलाफत के बाद उन को वापस जाना पड़ा. दूसरे दिन फिर कुछ लोग (इस बार उन की तादाद ज्यादा थी) आए और बुलडोजर से इन लोगों के बांसबल्ली उखाड़ने लगे. वे धमकी दे गए कि 2 दिन में जगह खाली कर दो, नहीं तो हम मार कर भगा देंगे. बस्ती वाले डर के चलते बचाखुचा सामान समेटने लगे. तब दूसरी खबर यह आई कि जिस को रहना है, नाम लिखवाए और किराया हमें दे.

देशभर में मोदी सरकार ‘स्वच्छता अभियान’ पर करोड़ों रुपए प्रचार में लगा रही है, लेकिन जो लोग ‘स्वच्छता अभियान’ को कामयाब कर रहे हैं, उन को सिक्योरिटी की गारंटी भी नहीं दे रही है, बल्कि सफाई करने के चलते इन लोगों के बच्चों को पढ़ाईलिखाई से दूर रखा जा रहा है. शकूरबस्ती में झुग्गियां टूटने पर रात में पहुंचने वाले नरेंद्र मोदी ने इन की कोई खोजखबर नहीं ली. अब इन्हें भी अपने आशियाने से उजाड़े जाने का डर सता रहा है. चुनाव में भाजपा, कांग्रेस व आम आदमी पार्टी तीनों ने झुग्गी की जगह मकान देने का वादा किया था, पर क्या वह वादा चुनाव जीतने तक का था? आजकल लोगों में डाक्टर भीमराव अंबेडकर को अपनाने की होड़ लगी हुई है, जिस से कि वे अपनेआप को दलित का मसीहा साबित कर सकें. झुग्गी वाले दलित और महादलित जाति से हैं, तो इन के लिए मसीहा कौन होगा? कब तक वोट बैंक के लिए दलित व गरीबों के साथ जुमलेबाजी चलती रहेगी? 

मैं मर्चैंट नेवी में हूं. घर वाले शादी पर जोर दे रहे हैं. क्या करूं.

सवाल

मैं मर्चैंट नेवी में हूं. 5 सालों से मैं एक लड़की से प्यार करता हूं. घर वाले शादी पर जोर दे रहे हैं, पर सालभर पानी के जहाज पर ही रहना पड़ता है, वह भी विदेश में. क्या करूं?

जवाब

मर्चैंट नेवी वाले भी इनसान होते हैं और शादी करते हैं. आप घर वालों की बात मान कर प्रेमिका से शादी कर लें और अपनी नौकरी के मुताबिक अपना कार्यक्रम तय करें.

 

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ऐसे भी हैं कंटेनर शिप

दुनिया के सब से बड़े जहाज बैंजामिन फ्रैंकलिन ने 28 दिसंबर, 2015 को अमेरिका के लौस एंजिलस बंदरगाह पर जब लंगर डाला तो लोग उसे देख दंग रह गए. पहली बार इतना विशाल जहाज इस बंदरगाह पर पहुंचा था. इस के बाद 31 दिसंबर, 2015 को यह जहाज औकलैंड के बंदरगाह पर पहुंचा. बैंजामिन फ्रैंकलिन नामक इस कंटेनर जहाज का आकार अमेरिका की एंपायर स्टेट बिल्डिंग से लंबा और किसी फुटबौल के मैदान से चौड़ा है. इस की लंबाई 396 मीटर यानी 13 सौ फुट और चौड़ाई 177 फुट है. इस में 20 फुट लंबे 18 हजार कंटेनर एकसाथ रखे जा सकते हैं. यदि इस पर रखे कंटेनर्स को एक पंक्ति में रखा जाए तो वह दूरी 120 किलोमीटर होगी. इस की अधिकतम क्षमता 235 ओलिंपिक पूल यानी करीब 5 लाख 90 हजार क्यूबिक मीटर है. इस जहाज की ऊंचाई 197 फुट है, इस में लगे एंटीना की ऊंचाई आंकी जाए तो यह 230 फुट होती है.

यह जहाज इतनी बिजली पैदा करता है कि 16 हजार लोगों के घर रोशन किए जा सकते हैं, जोकि अपनेआप में ऊर्जा उत्पादन का उदाहरण है. इस का 78 फुट लंबा इंजन 900 फोर्ड फोकस कारों के बराबर ऊर्जा पैदा करता है और इस से पैदा होने वाला 21 नौट का धक्का 11 बोइंग 747-400 इंजन से निकली ऊर्जा के बराबर होता है. अब तक ऐसे जहाज एशिया से यूरोप के बीच व्यापार के लिए बनाए जाते थे, लेकिन यूरोपीय संघ में मंदी के बाद इस नए मार्ग का विकल्प ढूंढ़ा गया. लौस एंजिलस के बंदरगाह पर अब तक 8 से 10 हजार कंटेनर वाले जहाज ही लंगर डालते थे, लेकिन यह जहाज उन से दोगुना बड़ा है.

दुनिया का सब से बड़ा मालवाहक जहाज चीन का सीएससीएल ग्लोब है. इस की लंबाई 400 मीटर तथा चौड़ाई 54 मीटर है. 2013 में बने इस जहाज की क्षमता 1.84 लाख टन वजन की है. जनवरी, 2015 में जब यह जहाज पहली बार ब्रिटेन पहुंचा, तो सफौक के पोर्ट पर इसे देखने पहुंचे लोगों का जमघट लग गया. इस जहाज में हजारों कंटेनर थे, जिन में खानेपीने की सामग्री, कपड़े आदि थे जिन्हें ब्रिटेन में उतारा गया. 109 कंटेनरों में सोफा और फर्नीचर, 62 में फ्रिज और वाशिंग मशीनें, 144 में फुटवियर, 16 में बैग और 15 में खिलौने थे. सामान उतारने के बाद उस में विशालकाय 3,909 कंटेनर लोड किए गए और जहाज बेल्जियम और हैमबर्ग की ओर रवाना हो गया.

वर्तमान में दूसरे स्थान पर है डेनमार्क का मेगलबो मेयर्स. इस की लंबाई 398 मीटर व चौड़ाई 58 मीटर है. 2013 में बने इस जहाज की क्षमता 165 हजार टन है. दुनिया के सब से बड़े कंटेनर जहाज को टक्कर देने के लिए स्विट्जरलैंड की एक कंपनी एमएससी औस्कर कंटेनर जहाज का निर्माण कर रही है. इस की लंबाई 395.4 मीटर तथा चौड़ाई 56 मीटर होगी. इस की क्षमता 193 हजार टन वजन ढोने की होगी.

सामान ले जाने के लिए 1986 में निर्मित नौर्वेडियन खनिज वाहक कंटेनर वरजेस्टाइल की क्षमता 3,64,767 टन है जिसे दक्षिण कोरिया में नौर्वे के सिग वटगेसेव के लिए बनाया गया है. इस की लंबाई 343 मीटर तथा चौड़ाई 63.5 मीटर है. गौरतलब है कि सब से पहले 1955 में जहाजों में कंटेनर ले जाने आरंभ हुए जबकि टैंकर आइडियल ऐक्स को पालवोम मैकलीन, अमेरिका द्वारा बदला गया. यह पोत केवल डैक पर ही कंटेनर रख कर ले जाता था. अमेरिकन प्रैजिडैंट लाइंस ने प्रैजिडैंट एडमस, प्रैजिडैंट जैक्सन, प्रैजिडैंट पोल्क और प्रैजिडैंट टे्रमन नामक जहाज जरमनी में बनवाए. ये जहाज पोस्ट पनामाक्स के नाम से जाने जाते हैं. विशालकाय होने के कारण ये पनामा में वहन नहीं कर सकते. ये 275.4 मीटर लंबे और 41 मीटर चौड़े हैं.

ज्यादातर मालवाहक जहाजों का निर्माण चीन, डेनमार्क, फ्रांस और स्विट्जरलैंड में किया जाता है. विश्व का सब से ताकतवर देश समझा जाने वाला अमेरिका इस में बहुत पीछे है. दुनिया के सब से बड़े कंटेनर जहाजों में अमेरिका का एक भी कंटेनर जहाज शामिल नहीं है. आप को जान कर हर्ष होगा कि भारत में भी ऐसे बड़े 2 जहाज हैं. शिपिंग कौर्पोरेशन औफ इंडिया ने दक्षिण कोरिया की कंपनी हुंडे सेम्हो हैवी इंडस्ट्री के साथ 2 कंटेनर शिप निर्माण का अनुबंध किया था, जोकि 2008 में भारत को प्राप्त हुए.            

दब्बू और बैकबैंचर न बनें

फिल्म ‘थ्री इडियट्स,’ जो स्कूलकालेज के छात्रों के बीच कल्ट स्टेटस पा चुकी है, बैकबैंचर्स की बड़ी दिलचस्प कहानी है. फरहान कुरैशी और राजू रस्तोगी नाम के छात्र एक इंजीनियरिंग कालेज में दाखिला लेते हैं और वे अपने दब्बूपन और परंपरागत एटिट्यूड के चलते बैकबैंचर बनने पर मजबूर हैं. क्लास में सरेआम उन का मजाक बनाया जाता है. वे प्रोफैसर के सामने किसी सवाल का जवाब देने से पहले हकलाने लगते हैं, जब कालेज में उन के तीसरे रूममेट रणछोड़दास श्यामल दास छाछड की ऐंट्री होती है तो नजारा ही बदल जाता है. अपने मुखर व्यवहार और हाजिरजवाबी से रणछोड़दास न सिर्फ ट्रैडिशनल सिस्टम को तोड़ कर कालेज में नंबर वन बन जाता है बल्कि फरहान और राजू जैसे बैकबैंचर्स में नया आत्मविश्वास भर कर इन्हें फ्रंटबैंचर बना देता है.

फरहान और राजू की तरह आज भी कई युवा इसी तरह के दब्बूपन और आत्मविश्वास में कमी की मार झेल रहे हैं. इस के चलते न तो वे पढ़ाई में अच्छे मार्क्स ला पाते हैं और न ही कैरियर को ले कर सही फैसला ले पाते हैं. ब्रिटेन के साउथ ऐंपटन विश्वविद्यालय के मैडिकल रिसर्च काउंसिल के कुछ डाक्टर्स ने दब्बू, अंतर्मुखी और पिछलग्गू स्वभाव के लोगों पर गंभीर अध्ययन किया, जिस के अनुसार 16 से 26 वर्ष की उम्र में बहिर्मुखी स्वभाव और नकारात्मक अवस्था में बने रहने वाले लोगों के 60 से 64 वर्ष की उम्र में पहुंचने पर उन के मानसिक स्वास्थ्य और जिंदगी से संतुष्टि पर दिलचस्प तरीके से अलगअलग असर दिखता है यानी ज्यादातर किशोर व युवाओं की जिंदादिली और आगे बढ़ने की बहिर्मुखी चाहत उन की बाद की जिंदगी में संतुष्टि और सकारात्मक प्रभाव डालती है, जबकि इस के विपरीत दब्बू, अंतर्मुखी और पिछलग्गू स्वभाव के लोगों पर नकारात्मक अवस्था में बने रहने का बुरा प्रभाव होता है और बाद में ऐसे लोगों में चिंता, अवसाद और शारीरिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं की आशंकाएं ज्यादा होती हैं.

भारतीय संदर्भ में यह अध्ययन बिलकुल खरा उतरता है. अकसर अभिभावक इस बात से परेशान दिखते हैं कि उन का बच्चा क्लास में सब से पिछली बैंच पर बैठता है, उस का लंच कोई दूसरा बच्चा खा लेता है, अध्यापकों से सवालों के जवाब आते हुए भी वह खामोश रहता है, स्कूल में होने वाली ऐक्टिविटीज में शामिल होने के नाम पर घबरा जाता है, वह सही बात तक मातापिता, मित्र,  शिक्षक या घर के अन्य लोगों के सामने नहीं रख पाता है और कई बार अपनी बात कहतेकहते हकलाने लगता है. दरअसल, ये तमाम लक्षण इस बात की ओर इशारा करते हैं कि उस की झिझक और संकोच उसे अंतर्मुखी ही नहीं बना रहे बल्कि दब्बू और कमजोर भी बना रहे हैं यह जिंदगी की भागदौड़ में पीछे रहने का सब से बड़ा कारण बन सकता है. शुरुआत में यह व्यवहार और बदलाव सामान्य मान कर दरकिनार कर दिया जाता है, लेकिन बच्चे जब युवा होते हैं तो बालपन की यही कमजोरी उन्हें दब्बू बना देती है. अगर इन कारणों को शुरुआती दौर में ही समझ लिया जाए तो काफी हद तक बच्चों को आगे बढ़ कर अपनी बात रखने और खुल कर जीने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है.

युवाओं में दब्बूपन क्यों

ग्लोबल पैमाने पर बेहद पौपुलर अमेरिकन टीवी सीरीज ‘रे डोनोवन’ में बंची डोनोवन नाम का किरदार अपने फैसले खुद नहीं ले पाता. अपने भाई पर आश्रित बंची न तो किसी के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध बना पाता है और न ही घर पर अकेले रहने की हिम्मत जुटा पाता है. बातबात पर घबराना और बच्चों के पास जाने से डरना. पढ़ाईलिखाई और नौकरी में भी उस में आत्मविश्वास की कमी नजर आती है. कहानी की अगली कडि़यों में जब बंची के इस जटिल किरदार की गांठें खुलती हैं तो पता चलता है कि बचपन में उस के अकेलेपन का फायदा उठा कर चर्च का पादरी उस का जबरन यौन शोषण करता था.

उस घटना ने उस के बालमन पर ऐसा प्रभाव डाला कि किशोरावस्था से ले कर युवा होने तक वह मानसिक तौर पर कभी उभर नहीं सका. कहने का अर्थ है कि अतीत की ज्यादातर घटनाएं बालमन को दब्बू बना देती हैं. तब अभिभावक इन घटनाओं को अनदेखा कर देते हैं, लेकिन जब दिक्कत समझ आती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है. अच्छे नंबर लाने का दबाव, शक्लसूरत को ले कर पैदा हुई कुंठा, घरपरिवार के विवाद, यौन हिंसा या फिर स्नेहदुलार की कमी के कारण बड़े हो क र भी किशोर के स्वभाव में वही कमियां घर कर जाती हैं. इस विकार से ग्रसित किशोर कई बार हिंसा, मादक द्रव्यों का सेवन, असुरक्षित यौन संबंध और अन्य जोखिम भरे कार्यों में लिप्त हो जाते हैं. मातापिता और शिक्षक यह सोच कर शांत रह जाते हैं कि उन के बच्चे दब्बू हैं और यह व्यावहारिक समस्या है, जबकि इन को सही से पहचानना और इन के लक्षणों को समझना बेहद जरूरी है.

ह्यूमन न्यूरोसाइंस जर्नल में प्रकाशित शोध की मानें तो कुछ लोगों के शरीर में डोपामाइन नामक फील गुड कैमिकल की आवश्यकता अपेक्षाकृत तेजी से पड़ती है, वे आत्मविश्वास से जीते हैं. रिसर्च बताती है कि बहिर्मुखी और अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाले लोगों के मस्तिष्क की क्रियाएं अलगअलग होती हैं. शोध के दौरान बहिर्मुखी व अंतर्मुखी व्यक्तित्व वाले 70 लोगों का व्यक्तित्व परीक्षण किया गया और पाया गया कि अलगअलग मानसिक क्रियाओं के लिए डोपामाइन जैसे फीलगुड कैमिकल की जरूरत के लिए उन का मस्तिष्क अलगअलग तरह की क्रियाएं करता है. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि अकसर बच्चे किसी भयावह घटना या हादसे के चलते ऐसे हो जाते हैं. कई बार उन्हें भूतप्रेत या अंधविश्वास भरी बातें सुना कर भयग्रस्त कर दिया जाता है. अकसर बच्चों को डराने के लिए उन्हें अंधेरे या अकेले होने का भय दिखा कर दब्बू बनने पर मजबूर कर दिया जाता है. कई बार निरुत्साहित करने पर भी वे भीरु प्रवृत्ति के बन जाते हैं. आमतौर पर बचपन में यौन हिंसा या बाल शोषण के शिकार किशोर भी आजीवन दब्बू प्रवृत्ति के हो जाते हैं और कभी भी खुल कर अपनी बात सामने नहीं रख पाते. कई बार सफलता को ले कर बना दबाव और अव्वल आने की अपने बड़ों की जिद भी उन में तनाव पैदा करती है. इन सब बातों का प्रभाव उन के स्वभाव पर इस कदर पड़ता है कि स्कूल से निकल कर कालेज और आगे की जिंदगी में भी वे सहमे रहते हैं और जिंदगी के कई निर्णायक क्षणों में सही फैसला न लेने के कारण पिछड़ जाते हैं.

अकेलापन, उलझन और हीनभावना

अधिकतर युवा इंटरव्यू या स्टेज पर बोलने के दौरान हकलाने लगते हैं या फिर नर्वस हो जाते हैं. आमतौर पर हर किशोर का व्यवहार अलग होता है. कोई मिलनसार होता है तो कोई एकांत को तरजीह देता है. कोई ज्यादा बोलना पसंद करता है तो कोई खामोशी पसंद होता है. कोई हंसी-मजाक का आदी तो कोई आदतन गंभीर स्वभाव का होता है. ऐसे में बड़ी बारीकी से समझाने की जरूरत है कि कौन दब्बू, अंतर्मुखी, पिछलग्गू स्वभाव का है और कौन बहिर्मुखी.

अकसर अकेले रहना पसंद करने वाले लोग अंतर्मुखी और शर्मीले हो जाते हैं. ये घंटों अकेले बैठे रह सकते हैं. ज्यादा बोलने वालों से दूर रह कर संक्षिप्त बातें करना और अपनी पसंद के विषय पर जरूरत से ज्यादा डूब कर शोध करना संकेत है कि इन का नेचर ऐसा होगा. इस के अलावा ये बहुत सोचसमझ कर बोलते हैं या फिर बोलते ही नहीं. ये लोग जरूरी विषयों पर वादविवाद से बचते हुए पलायनवादी नजरिया अपनाएंगे. टीमवर्क या फिर समूह से बच कर अकेले ही काम करेंगे. 

मस्तमौला बनें, झिझक छोडें

एक बार समस्या की जड़ पता हो जाए तो उस का समाधान आसान हो जाता है. मनोवैज्ञानिक और मनोचिकत्सक दोनों ही इस विषय पर अपनीअपनी राय रखते हैं. कोई इसे रोग और ट्रीटमैंट का विषय मानता है जबकि कोई इसे व्यावहारिक दोष मानते हुए प्यार, स्नेह और अपनेपन से हल करने की बात कहता है. लेकिन दोनों ही विशेषज्ञों की राय में जो बात कौमन है वह यह है कि इस स्वभाव के लोगों के मन को समझ कर उन के साथ तालमेल बना कर ही उन्हें दब्बू, अंतर्मुखी और पिछलग्गू जैसे स्वभाव से मुक्त किया जा सकता है. इस में जरूरी भूमिका अभिभावकों, अध्यापकों और करीबी रिश्तेदारों की होती है. गार्जियन बच्चों को आत्मविश्वास से भरपूर, साहसिक और प्रेरक कहानियां बचपन से ही सुनाएं. उन्हें स्टेज फियर से मुक्त करें. हर चीज में आगे बढ़चढ़ कर भाग लेने के लिए प्रोसाहित करें. छोटेछोटे कार्यों की जिम्मेदारी दे कर उन्हें लीडर की भूमिका का एहसास कराएं. उन में आत्मविश्वास की भावना पैदा करने के लिए किसी प्रकार के दबाव और हतोत्साहित करने वाली बातों से बचें. अगर फिर भी हीनभावना से न उबरें तो आप उन की काउंसिलिंग का विकल्प भी आजमा सकते हैं.                          

ऐसे वापस लाएं आत्मविश्वास

–       हर समय गंभीर रहने के बजाय मनोरंजन और खेलकूद में भी सक्रिय रहें.  

–       कंपीटिशन में जम कर भाग लें और हारने पर हतोत्साहित न हों.

–       रिश्तेदारों और दोस्तों के घर जाने में बिलकुल न हिचकिचाएं.

–       रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दें ताकि व्यक्तित्व का विकास हो.

–       दब्बू, अंतर्मुखी और पिछलग्गू स्वभाव के लोगों को अकेलेपन से दूर रहना चाहिए.

–       कम्युनिकेशन स्किल मजबूत करें ताकि आप का मजाक न बने.

–       टीम वर्क में काम करना सीखें.

–       समूह की लीडरशिप करने से पीछे न हटें.

–       मन में पैदा हुई कुंठा को बाहर निकालें.  

–       असफलता से घबरा कर दोबारा प्रयास करना न छोडें.

औफिस पौलिटिक्स से कैसे निबटें

मैनेजमैंट कंसल्टैंट पैट्रिक फोरसिथ ने अपनी किताब ‘डिटौक्स योर कैरियर’ में लिखा है, ‘ऐसा औफिस जहां पौलिटिक्स न हो, दरअसल होता ही नहीं है.’ औफिस में कर्मचारी की मेहनत को नजरअंदाज करना, पीछे से उस के खिलाफ षड्यंत्र करना, बुराई करना, उस के खिलाफ झूठी खबरें उड़ाना, दूसरे के काम का श्रेय लूटना, जानबूझ कर बौस या सहकर्मी द्वारा सताया जाना जैसी अनेक समस्याएं औफिस पौलिटिक्स के अंतर्गत आती हैं, जिन का सामना प्राय: सभी को कभी न कभी करना पड़ सकता है. ऐसे में जरा सी सूझबूझ से काम ले कर इन समस्याओं से आसानी से निबटा जा सकता है.

मुझे इग्नोर किया जाता है

कनाडा के वकील, मध्यस्थ और थियोलोजियन जौन बर्टन, जो लोगों और संस्थाओं को बेहतर रिलेशनशिप बनाने में मदद करते हैं, कहते हैं, ‘अगर आप को लगातार इग्नोर किया जाता है, तो किसी वरिष्ठ सहकर्मी की मदद लें. ‘संस्थान में आप को एकआध अच्छा व्यक्ति जरूर मिल जाएगा. कार्यालय में बात न बने तो दूसरे विभाग या किसी बाहरी व्यक्ति से मदद लें.’

मेरे काम का श्रेय दूसरे ले लेते हैं

औफिस में नए आइडियाज की बड़ी कद्र होती है. कई चालाक कर्मचारी दूसरों से बातचीत कर के उन के आइडियाज अपने नाम से सीनियर्स तक पहुंचा देते हैं और सारी वाहवाही खुद लूट लेते हैं. अगर आप ऐसी स्थिति से बचना चाहते हैं, तो अपने आइडियाज लोगों के साथ शेयर न कर के सीधे बौस से शेयर करें, बातचीत का मौका न मिले, तो ईमेल या एसएमएस का सहारा लें. अगर कोई कठिन जौब आप निबटा रहे हैं तो बौस को कार्य की प्रगति से अपडेट कराते रहें ताकि उन्हें पता चल जाए कि यह काम आप कर रहे हैं. मीटिंग में मुखर हो कर अपने आइडियाज प्रकट करें ताकि दूसरा उन्हें चुरा न सके.

आप को नैगेटिव रिमार्क्स मिलते हैं

औफिस में दिनभर काम करने के बावजूद बौस आप के बारे में किसी से कह देते हैं, ‘समझ में नहीं आता कि वह दिनभर करता क्या है.’ ऐसी टिप्पणी सुनने पर बिफरने या बौस के खिलाफ उलटी टिप्पणी कर के दूसरे सहकर्मियों के हाथ अपने खिलाफ मसाला न लगने दें. हो सकता है कि आप की यह टिप्पणी वे बोस को जा कर बता दें. औफिस पौलिटिक्स डौट कौम की एडवाइजर और ‘बीइंग स्ट्रेटजिक’ की लेखिका एरिका एंडरसन कहती हैं, ‘किसी औफिस मीटिंग में या बौस से मिल कर बातों ही बातों में अपने काम की जानकारी दें और उन्हें बताएं कि सुबह से शाम तक का आप का समय किनकिन कामों में व्यतीत होता है और उन से राय मांगें कि आप अपना समय कैसे बेहतर तरीके से इस्तेमाल कर सकती हैं ताकि औफिस को फायदा हो.’ इस तरह आप अपनी स्थिति भी स्पष्ट कर देंगे और बौस या नैगेटिव रिमार्क्स करने वालों को उन की भूल का एहसास भी हो जाएगा. इस बात का बौस पर भी अच्छा इंप्रैशन पड़ेगा.

सहकर्मी या बौस अपमानित करते हैं

कुछ सहकर्मी या बौस बड़े मुंहफट होते हैं और बातबात पर अपमानित कर के मूड औफ कर देते हैं, जिस से काम का माहौल खराब हो जाता है. औफिस पौलिटिक्स डौट कौम की संपादक और संस्थापक तथा ‘द औफिस पौलिटिक्स गेम’ की सृजनकर्ता फ्रैंक जेम्स ऐसी स्थिति के लिए 3 विकल्प सुझाती हैं, ‘ह्यूमिलिएट करने वालों को इग्नोर करें और व्यंग्यबाणों से अप्रभावित रहने की कोशिश करें. ‘दृढ़ प्रतिज्ञा कर लें कि आप उस से प्रभावित नहीं होंगे. दूसरा ऐसी अपमानजनक  बातों को रोज एक डायरी में सिलसिलेवार नोट करें और अपने सीनियर के सामने पेश कर दें. ‘अगर फिर भी स्थिति में कोई बदलाव न आए तो आप के सामने तीसरा और अंतिम विकल्प यही है कि वहां से अपना तबादला करवा लें या फिर दूसरी जगह जौब तलाश कर वहां से प्रस्थान कर जाएं, क्योंकि ऐसे घुटनशील वातावरण में काम करना संभव नहीं है.’

कैसेकैसे औफिस पौलिटीशियन

‘गस्ट द टेल वाइंड औफ औफिस पौलिटिक्स’ के लेखक टीमोथी जौनसन ने अपनी किताब में औफिस पौलिटीशियंस के 3 प्रकार बताए हैं, स्नेक, औस्ट्रिच और बियर.

स्नेक : ये वे लोग हैं जो पीठ पीछे वार और हर वक्त षड्यंत्र करते रहते हैं. इस के अलावा ये दूसरों के आइडियाज भी चुराते हैं.

औस्ट्रिच : ये हमेशा छिपे रहते हैं और असहमति की स्थिति से दूर रहते हैं.

बियर : ये संवेदनशील पौलिटीशियन होते हैं जो औफिस की पूरी कार्यप्रणाली और गतिविधियों पर पैनी नजर रखते हैं और स्थिति के मुताबिक रणनीति तैयार कर लेते हैं.

जौनसन बियर पौलिटीशियन बनने की सलाह देते हैं.

अपने स्लो हो रहे स्मार्टफोन को ऐसे बनाएं फास्ट

3जी हो या फिर 4जी, स्पीड वही की वही. क्योंकि जब अपना ही सिक्‍का खोटा हो तो क्‍या किया जा सकता है. लाख कोशिशों के बाद भी अगर आपका फोन फास्‍ट नहीं चल रहा है तो इसके लिए नेटर्वक प्रोवाइडरों को मत कोसिए. हो सकता है आपका फोन स्‍लो हो.

यदि आप भी उन लोगों में से हैं जो एक मैसेज करने के लिए व्हाट्सएप को कई बार ओपन और क्लोज करते हैं. या फिर फोन को बार-बार ऑन ऑफ करते हैं, जिसे वो थोड़ा बेहतर रिस्पांस करे तो आपको ये टिप्स फॉलो करने की सख्त जरुरत है.

अपने स्मार्टफोन का फर्मवेयर अपडेट करे

अपने स्मार्टफोन की स्पीड बढ़ाने के लिए आप अपने फोन का फर्मवेयर अपडेट कर सकते हैं. ये आपके फोन बग्स को फिक्स करता है. नए फीचर्स को जोड़ता है और अन्य चीजें जो आपको नहीं पता हो उन्हें भी ठीक करता है. इसलिए इसे टाइम पर करते रहना सही होगा.

अपने फोन को रिसेट करें

आप अपने  फोन  को रिसेट कर सकते हैं. इससे आपका फोन फिर से वैसे ही हो जाएगा जैसे कि पहले था जब आप उसे खरीदा था. लेकिन ये एक टेम्पररी ऑप्शन है.

इंटरनल मेमोरी चेक करें

अपने  फोन  की इंटरनल मेमोरी को चेक करें. कई बार इंटरनल मेमोरी में स्पेस कम होने की वजह से भी फोन स्लो होने लगता है. आप अपने  फोन  से म्यूजिक, पिक्चर्स आदि को मेमोरी कार्ड में सेव कर सकते हैं.

क्लीनिंग एप

फोन की स्लो स्पीड को फिर से बढ़ाने के लिए गूगल प्ले स्टोर में कई तरह की एप्स मौजूद हैं. आप इन एप्स को डाउनलोड कर अपने फोन को क्लीन कर सकते हैं.

Widgets ऑफ करें

Widgets आपके फोन में लाइव अपडेट्स देते रहते हैं. ये इंटरनेट डाटा का इस्तेमाल कर आपकी फोन स्क्रीन पर लाइव अपडेट्स भेजते हैं. ऐसे में फोन स्लो काम करने लगता है. साथ ही, ये बैटरी भी कन्ज्यूम करता है. अगर आप इन लाइव अपडेट्स का इस्तेमाल नहीं करते तो फोन स्क्रीन से इन्हें रिमूव करें. स्लो स्मार्टफोन फास्ट हो जाएगा.

बेकार एप्स अनइंस्टॉल करें

हमारा फोन कई सारी एप्स मौजूद होने के कारण भी स्लो हो सकता है. आप जिस एप को इस्तेमाल नहीं करते हैं या जो जरुरी नहीं है उसे अनइंस्टॉल कर दें.

कसक होइबे करी…

हमारा जमाना अभी बहुत पीछे नहीं छूटा है. फकत 50-60 साल पीछे चले जाओ. आप को पुराने फैशन के नैरो या बेलबौटम पतलूनशर्ट, घाघराचोली धारी युवकयुवतियां यानी ‘प्री जींस’ युग के जीव मिल जाएंगे. ये लोग प्रेम के दीवाने होते थे. कालेज की सीढि़यों पर पांव रखे नहीं कि स्टेटस सिंबल बनाए रखने के लिए एक अदद ‘पे्रमी’ या ‘प्रेमिका’ की जरूरत महसूस होने लगती थी. जो लोग ‘स्टेटस’ की पहुंच से दूर रह जाते थे या स्टेटस पा सकने में, किसी तकनीकी, आर्थिक व सामाजिक कारण विशेष के चलते अक्षम होते थे, वे ‘एकतरफा मुहब्बत’ का रोग लगा बैठते थे.

कुल मिला कर मुहब्बत करनी है, ‘चाहे मां रूठे या बाबा…’ वाले दिन थे वे.

‘… मैं नू यारा इश्क होंदा…’ ‘कुड़ी’ को पता हो या न हो या सालों बाद पता चले अपनी तरफ  से हम ने शुरुआत कर दी थी. हम मुहब्बत के आलम में डूबे नियमित रूप से उन की गली के दोचार चक्कर लगा आते थे या जहांजहां उन के पाए जाने की संभावनाएं होती थीं वहांवहां चक्कर लगा लेते थे. उन दिनों किसी बात की जल्दी होती कहां थी. ज्यादातर एकतरफ ा प्रेम करने वालों से महल्ला, देहात, शहर ऐसे भरे रहते थे जैसे इन दिनों साइबर कैफे में भीड़ होती है. वे ‘एक तरफा प्रेम’ को भी आजीवन न भुलाने की कसम खाए हुए संजीदा किस्म के लोग होते थे. सामाजिक प्राणी की मान्यता मिलने के  बाद भी उन्हें लगता था, बीवी है, बच्चे हैं मगर संतुष्टि नहीं है.

‘प्यार का गठिया’ कभीकभी सालता तो गमगीन हुए जाते. उन्हें जीने के लिए एक ‘कसक’ की जरूरत शिद्दत से महसूस हुआ करती थी. काश, एक ‘कसक’ दिल में रहे तो मजा आ जाए. ‘कसक’ वालों के लिए एक से एक गाने या यों कहें फि ल्मी गानों का भंडार भरा पड़ा है. यह कसक ही पूरी फि ल्म इंडस्ट्री की धुरी हुआ करती थी और टिकट खिड़की पर अच्छा रिस्पौंस दिलाती थी. जो शख्श मुश्किल से कालेज की फीस का जुगाड़ कर पाता था, मुहब्बत किस बूते करता भला. इसीलिए मुहब्बत के एकतरफा कसक वाले किस्से, ज्यादा हुआ करते थे.

अभी तक किसी शोध कराने वाले गाइड ने इस विषय  को छुआ या छेड़ा नहीं है. शोध करवाने वाले गाइड डाक्टर साहब को इस विषय में मैं कुछ क्लू दे देता हूं, जिस में वे आगे पैदा होने वाले स्कौलर्स को नएनए विषय में शोध के लिए प्रेरित कर सकते हैं. मसलन, ‘भारत में एकतरफा मुहब्बत के किस्से और सामाजिक परिवेश’, ‘कालेज में इश्क करने के हजार नायाब नुसखे’, ‘असफ ल प्रेमियों के40 साल बाद की जिंदगी, प्रेम के प्रति उन का नजरिया’, ‘वर्तमान में प्रेमीप्रेमिकाओं पर फि ल्मों का बढ़ता प्रभाव’ और ‘सामाजिक दायित्व और निर्वाह’, ‘राजनीतिक’ उथलपुथल में प्रेम व ‘समसामयिक दृष्टिकोण पर एक नजर’ ‘मोबाइल, इंटरनैट, एसएमएस के जमाने में प्रेम करने के तरीकों में बदलाव.’

‘क्या प्रेमपत्र आज के जमाने में संग्रहणीय दस्तावेज हो गए हैं, खोज और आंकड़े…’ आदि विषयों की फेहरिस्त लंबी है, सविस्तार जानने के इच्छुक शोधार्थी बाद में संपर्क साध सकते हैं. खैर जाने भी दो. जिसे जो खोजबीन करनी है वह अपना दुखड़ा अलग पाले, अपना राग अलग अलापे… बात लेदे कर फ ीस का जुगाड़ करने वाले छात्रों की हो रही थी.

हमारे साथ भी, कमोबेश मामला इसी के  आसपास का था. इतना जरूर था कि हम पढ़ाकू होने की कैटेगरी में थे, जिस कारण साथ पढ़ने वाली जो बाला हम से नोट्स मांगने आ जाती, उसी के इर्दगिर्द पूरे महीने भर की ‘इकतरफ ा वाली’ कवायद चालू हो जाती और यही अमिट पूंजी बन हमारे दिल की तिजोरी में कैद होने लगती. सपनों में उन के चाहे गए नोट्स की बनावट तरहतरह से, रहरह कर बनतीबिगड़ती रहती. किताबें, गाइड, लाइब्रेरी खंगालने में दिन बीत जाते. नोट्स बनाने के नएनए तरीके नएनए खयालोंविचारों का जुगाड़ करते और फि र तरहतरह के नोट्स बनातेबनाते हालत ऐसी हो जाती कि पूरा का पूरा चैप्टर हमें मुंहजबानी याद हो जाता. यकीन मानिए, किसी की एवज में परीक्षा देने का चलन होता तो हमारी कमाई का आसान जरिया जरूर निकल आता.

इतना जरूर होता कि हमारी किताबी पकड़ की बदौलत ऐग्जाम के दिनों में हमारी ‘पूछपरख’ बढ़ जाती. परीक्षा हौल में सवाल हल करते हुए स्टूडैंट को बाहर से जवाब मुहैया कराने का काम मिल जाता. परीक्षा के दिनों में, जब हमारी कक्षा के तमाम छात्र पढ़ने से पल भर का समय नहीं निकल पाते थे, तो हमारी स्थिति उलट हुआ करती थी. हम रात को सैकंड शो देख कर भी अगले दिन परीक्षा हौल में जाने के न केवल काबिल बने रहते बल्कि सब से अव्वल पेपर इनविजिलेटर को सौंप कर निकल जाते. परिणाम भी हमारे पक्ष में अभीअभी गए इलैक्शन के माफि क आता, जिस में आगे, ये दिल मांगे मोर कहने की गुंजाइश नहीं रहती.

एकतरफा मुहब्बत को हर किसी ने धीरेधीरे मोम की तरह पिघलते देखा है. सब देवदासमजनुओं का एक अंजाम. उस ने कालेज की पढ़ाई कब खत्म की. उधर वाली पार्टी कब डोली चढ़ गई. कब उन के बच्चेकच्चे हो गए, कब समय की सुनामी आई और क्या बहा ले गई पता ही नहीं चला. इन्हीं में से जब कोई किसी शौपिंग मौल में अचानक आमनेसामने हो जाती है तो एक असहज असमंजस की स्थिति पैदा हो जाती है. वह बड़े मजे से अपने बेटे या बेटी से परिचय कराती है, ‘बेटे, ये हैं तुम्हारे अंकल, नमस्ते करो…’

उस समय सारे के सारे नोट्स, जो उन के लिए, रातरात भर जाग कर लिखे, आंखों के सामने घूम जाते हैं. दिल में एक कसक सी उठती है. मगर तुरंत बाद एक ताजा हवा एक नई खुशबू का एहसास दिलाती हुई फि र भीतर तक समा जाती है, जो उस के बदन ने अभीअभी छोड़ी है.

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