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Maharashtra Election : महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव परिणाम किस ने की धर्म की अफीम चटाने वालों की जीतने में मदद

Maharashtra Election : महाराष्ट्र राज्य विधान सभा चुनाव परिणामों ने हर किसी को चौंका दिया है. महाविकास अघाड़ी की बुरी तरह से हुई पराजय और महायुति की प्रचंड जीत ने कई सवाल उठा दिए हैं. ऐसा पहली बार हुआ है, जब इन चुनाव परिणामों को देख कर महाराष्ट्र की जनता भी गुस्से में है. तो वहीं विपक्ष यानी कि ‘महाविकास अघाड़ी’ की तरफ से हार को स्वीकार करने की बजाय चुनाव आयोग व सरकारी मशीनरी पर ही सारा दोश मढ़ा जा रहा है. उधर उद्धव ठाकरे और संजय राउत ने अपनी पार्टी की पार्टी की हार का ठीकरा चुनाव आयोग के साथ ही पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ पर फोड़ा है, मगर कोई भी अपने गिरेबान में झांक कर नहीं देखना चाहता. जबकि ‘महा विकास अघाड़ी की इस पराजय के पीछे सरकारी मशीनरी और चुनाव आयोग की करतूतों के साथ इन दलों के अंदर पल रहे ‘पैरासाइट्स / परजीवी तथा इन दलों की अपनी कार्यशैली कम जिम्मेदार नहीं है. तो वहीं इस बार पूरे महाराष्ट्र में ‘आरएसएस’ जमीनी सतह पर बहुत ही ज्यादा सक्रिय रहा.

भजपा और आरएसएस ने जम कर वोटरों को ढर्म की चाशनी चटाई. चुनाव के दौरान सक्रिय रहे पत्रकार भी विपक्षी दलों की हार से आश्चर्यचकित हैं, मगर किसी ने भी इन की कार्यशैली की कमियों की तरफ इशारा न चुनाव के दौरान किया था और परिणाम आने के बाद कर रहे हैं. किसी को भी दोश देने से पहले जरुरत होती है कि पहले आप अपना घर मजबूत करें, अफसोस विपक्षी दलों के घर के अंदर ही मतभेद और एकदूसरे को नीचा दिखाने की आग धधकती रही.

विपक्षी दल व कुछ राजनैतिक विश्लेशक दावा कर रहे हैं कि भाजपा समर्थित ‘महायुति’ को ‘लाड़ली बहना योजना’, जिस के तहत महिलाओं को हर माह 1500 दिए गए, ने जिताया. यह एक फैक्टर हो सकता है मगर बड़ा फैक्टर नहीं. महज इस योजना के चलते ‘महायुति’ के खाते में 288 में से 230 सीटें और महाविकस अघाड़ी केवल 49 पर सिमट जाए, यह नहीं हो सकता. बहरहाल, महाराष्ट्र राज्य के दल गत चुनाव परिणाम इस प्रकार रहे. भजपा 132, शिवसेना शिंदे गुट 57, एनसीपी अजीत पवार गुट 41 सीट, शिवसेना उद्धव गुट 20, कांग्रेस 16 और एनसीपी शरद पवार गुट 10 सीटें.

महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव परिणामों के विश्लेशण करने से पहले विपक्षी दलों की हार की मूल वजह पर एक नजर डाना जरुरी है. ‘यथा राजा तथा प्रजा.’ यही सच है. 2014 से बौलीवुड और विपक्षी दलों की कार्यशैली एक जैसी हो गई है. इसी वजह से बौलीवुड की हर फिल्म व हर दिग्गज कलाकार बौक्स औफिस पर डूब रहा है, तो वहीं विपक्षी दल हर चुनाव हारते जा रहे हैं.

2014 के बाद बौलीवुड दो खेमों में बंट चुका है. एक खेमा वह है जो कि ‘द कश्मीर फाइल्स’ या ‘द साबरमती रिपोर्ट’ जैसी सरकार परस्त व धर्म बेचने वाली प्रपोगंडा सिनेमा बना रहा है, जिसे सरकारी मशीनरी से भरपूर मदद मिल रही है तो दूसरी तरफ वह खेमा है जो कि पैरासइट्स / परजीवियों की सलाह पर काम करते हुए घटिया फिल्में बनाने के साथ ही फिल्म के प्रमोशन के लिए जनता व पत्रकारों से दूर हो कर कुछ शहरों के कालेज ग्राउंड या माल्स में जा कर भाड़े की भीड़ बुला कर अपनी फिल्म के सुपरडुपर हो जाने के दावे करते रहते हैं. पर फिल्म बौक्स औफिस पर धराशाही हो जाती है.

वास्तव में जब से बौलीवुड के दिग्गजों ने अपनी कार्यशैली बदली है तब से उन का आम दर्शकों से संबंध विच्छेद हो गया है और अब इन्हें जनता की नब्ज की पहचान नहीं रही कि जनता किस तरह का सिनेमा देखना चाहती है.

ठीक यही हालत राजनीतिक जगत में है. राजनीति में सत्तापक्षा के पास धन बल के साथ ही धर्म भीरू जनता है. सत्ता पक्ष हिंदू धर्म को बचाने व राष्ट्र को मजबूत बनाने के नाम पर आम जनता को मूर्ख बनाते हुए चुनाव दर चुनाव अपनी विजय पताका फहराता जा रहा है. दूसरी तरफ विपक्ष में बैठे पुराने नेता अपनेअपने दलों के मठाधीशों व पैरासाइट्स / परजीवियों की गलत राय पर चलते हुए चुनाव दर चुनाव पराजय का मुंह देखते जा रहे हैं.

अब जब हम इसी तर्ज पर इस बार के महाराष्ट्र चुनाव की जांच पड़ताल करते हैं तो यह बात साफ तौर पर उभर कर आती है कि आम जनता ने इन्हें नहीं हराया बल्कि इन्हें इन के परजीवियों और खुद को खुदा मानने वालों ने ही हराया है. अन्यथा महज ठाणे क्षेत्र की दो तीन सीटों पर प्रभुत्व रखने वाले एकनाथ शिंदे की पार्टी कैसे 57 सीटें जीत गई. अथवा शरद पवार के गढ़ को महज 5 माह पहले संपन्न लोकसभा चुनावों न भेद पाने वाले अजीत पवार ने इस बार कैसे नेस्तानाबूद कर 41 सीट जीत लीं.

इस बार महाराष्ट्र में अमित शाह से ले कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की चुनावी सभाओं में खाली पड़ी कुर्सियों को देख कर विपक्षी दल और विपक्षी दलों का समर्थन करने वाले पत्रकार गदगद होते रहे और दावा करते रहे कि इस बार भाजपा समर्थित ‘महायुति’ का विस्तार गोल हो जाएगा. मगर विपक्षी दल के नेता और यह पत्रकार इस बात की तरफ ध्यान ही नहीं दे रहे थे कि इस बार भाजपा और आरएसएस असली खेल क्या कर रही है.

इस बार महायुति ने चुनावी सभाओं में भाड़े की भीड़ बुलाने पर पैसा खर्च नहीं किए, जबकि विपक्षी पार्टीयां चुनावी सभाओं में भीड़ बुलाने पर ही ध्यान केंद्रित रखा. आम जनता से सीधा संपर्क बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. वहीं भाजपा और आरएसएस हर दरवाजा खटखटाते रहे. सब से पहले आरएसएस व भाजपा के कार्यकर्ता घरघर जा कर दो पन्नों का हिंदी व मराठी भाषा में छपे पम्पलेट बांटे, जिस का शीर्षक है- मतादाताओं से विनम्र अपील’. इस में राष्ट्र निर्माण, देश की आंतरिक सुरक्षा, विकास वगैरह को ध्यान में रख कर वोट देने की बात लिखी है.

आरएसएस के कार्यकर्ता यह पम्पलेंट देने के साथ ही हर घर के सदस्य से कम से कम 5 मिनट तक बात कर उन्हें भाजपा व महायुति के साथ जुड़ने के लिए प्रेरित करने का काम किया. इस के बाद उम्मीदवार की तरफ से हर घर अपनी व अपने नेता की तस्वीर सहित पोस्टर भिजवाने गए. फिर सभी के पास वोटर पर्ची भिजवाई जिस में उम्मीदवार की तस्वीर के साथ ही मतदान केंद्र पर ले कर जाने वाली जानकारी अंकित थी. जबकि चुनाव आयोग की तरफ से हर वोट के पास जानकारी भेजी जा चुकी थी.

उम्मीदवार ने सड़क पर रैली निकालने के साथ ही हर इमारत / सोसायटी के गेट पर रूक कर लोगों से बात की, कुछ सोसायटी के सदस्यों ने गेट पर उस उम्मीदवार की आरती भी उतारी. मतदान से एक दिन पहले 19 नवंबर को आरएसएस के कार्यकर्ता घरघर जा कर सभी से वोट डालने का निवेदन किया. मतदान वाले दिन आरएसएस कार्यकर्ता सुबह 9 बजे और फिर दोपहर 2 बजे घरघर पहुंच कर पूछा कि वोट दिया या नहीं और जिस ने उस वक्त तक नहीं दिया था, उस से कहा कि आप हमारे साथ चले और अपने हक का उपयोग करें.

आरएसएस कार्यकर्ता सिर्फ भाजपा उम्मीदवार ही नहीं बल्कि एकनाथ शिंदे और अजीत पवार के दल के उम्मीदवार के क्षेत्र में भी इसी तरह सक्रिय रहे. इसी के साथ शहरी क्षेत्रों में कुछ भाजपा उम्मीदवारों ने मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई कर चुके लड़केलड़कियों को अपना पीआरओ बना कर घरघर भेजा. मजेदार बात यह है कि इन में से कई तो महज 228 या 500 वोट से जीत गए.

इस के विपरीत कांग्रेस, शिवसेना उद्धव गुट और एनसीपी शरद पवार गुट के उम्मीदवार तो सिर्फ अपने बडे़ नेताओं की रैली में जुट रही भीड़ के बल पर जीत जाने के भ्रम में बैठे रहे. यह सभी पैरासाइट्स / परजीवी ही कहे जाएंगे. इतना ही नहीं महाविकास अघाड़ी के नगर सेवक वगैरह भी अपनेअपने औफिसों को शोभायमान करते रहे. इन सभी में अहम ही नजर आता है.

बतौर उदाहरण हम ‘ओवला माजीवाड़ा’ विधान सभा क्षेत्र की बात कर लें. यहां से महयुति की तरफ से एकनाथ शिंदे के शिवसेना गुट के उम्मीदवार प्रताप बाबू राव सरनाइक थे. जिन की टक्कर उद्धव ठाकरे की शिवसेना के उम्मीदवार नरेश मणेरा से थी. मतदान से पहले तक इस क्षेत्र की जनता को पता ही नहीं था कि नरेश मणेरा उम्मीदवार हैं. नरेश मणेरा तो छोड़िए, उद्धव ठाकरे गुट की नगरसेवक तक ने कोई प्रचार नहीं किया. इसी चुनाव क्षेत्र में एक कालोनी है, जहां 40 इमारतें / सोसायटी हैं. इसी कालेनी के अंदर भाजपा और शिवसेना, उद्धव ठाकरे गुट की नगर सेविका का औफिस हैं. भाजपा कार्यालय दिनभर खुला रहता, चहल पहल बनी रहती थी. जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना का औफिस दोपहर 11 से एक बजे तक और शाम को 6 से 8 बजे तक खुलता, नगरसेविका आ कर बैठती थी. औफिस से बाहर वह खड़ी कभी नजर नहीं आई.

उन्होने इस कालोनी की 40 सोसायटी वालों से भी बात कर शिवसेना, उद्धव गुट के उम्मीदवार को जिताने की बात नहीं की. उम्मीदवार नरेश मणेरा खुद भी किसी से नहीं मिले और न ही तो घर घर वोटर पर्ची ही भिजवाई. ऐसे में आप कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि आप चुनाव जीत जाएंगे और अब आप दूसरों पर दोष मढ़ रहे हैं. यदि आप वोटरों के बीच नहीं जाएंगे तो आप वोटर की नब्ज कैसे पहचान सकते हैं. अब वह वक्त गया जब बाला साहेब ठाकरे के नाम पर आप घर बैठे चुनाव जीत सकते थे.

इस चुनाव क्षेत्र में प्रताप सरनाइक को 184178 वोट मिले, जबकि नरेश को महज 76020 वोट मिले. यानी कि प्रताप सरनाइक ने 108158 वोटो से जीत हासिल की. यह महज एक उदाहरण है, मगर इस चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी, शरद पवार की पार्टी और उद्धव ठाकरे की पार्टी के कार्यकर्ता, नगर सेवक आदि इसी तरह से सिर्फ बड़ी रैलियों में नजर आने के अलावा कहीं नजर नहीं आए.

माना कि इन दलों के पास भाजपा की तरह धन बल की कमी है, पर इन के उम्मीदवार, इन के कार्यकर्ता अपने घर से निकल कर आम जनता तक शारीरिक रूप से तो पहुंच कर अपनी बात कह सकते थे. पर ऐसा करना इन लोगों ने अपनी शान के विपरीत समझा. यही वजह है कि अब तक शिवसेना, उद्धव गुट का गढ़ रहा मुंबई की सीटें भी उद्धव ठाकरे नहीं बचा पाए.

क्या रहा स्ट्राइक रेट

अब पहले चुनाव परिणामों के नतीजों का विश्लेषण कर लिया जाए. भाजपा ने 149 सीटों पर चुनाव लड़ा और 132 पर जीत हासिल की, यानी कि भाजपा का स्ट्राइक रेट 89 प्रतिशत रहा. जबकि शिंदे गुट की शिवसेना ने 81 सीटों पर चुनाव लड़ कर 57 पर जीत हासिल की तो इन का स्ट्राइक रेट 70 प्रतिशत रहा, एनसीपी अजीत पवार गुट ने 59 सीटों पर चुनाव लड़ कर 41 सीटें जीत लीं. इन का स्ट्राइक रेट 69 प्रतिशत रहा. कांग्रेस 100 सीटों पर लड़ कर महज 16 सीटें जीती, इन का स्ट्राइक रेट रहा 16 प्रतिशत, शिवसेना, उद्धव ठाकरे गुट 94 सीटों पर लड़ कर 20 सीटें जीती, स्ट्राइक रेट रहा 21.3 प्रतिशत, शरद पवार की एनसीपी 86 सीटों पर लड़ कर केवल 10 पर जीत हासिल की, स्ट्राइक रेट रहा 11.6 प्रतिशत.

शिवसेना, उद्धव गुट ने इसे बेइमानी की जीत व ईमानदारी की हार की संज्ञा दी है. संजय राउत ने ‘सामना’ में लिखा है, ‘‘ महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के परिणाम आ गए हैं. मगर यह जनमत यानी कि जनादेश नहीं है. महायुति को 230 सीटें मिल सकती हैं, इस पर कौन यकीन करेगा. यह नतीजा विचलित करने वाला है. सरकार के खिलाफ प्रचंड आक्रोश फिर भी इतनी सीटें. कैसे?

महाराष्ट्र की धरती पर बंटेंगे तो कटेंगे जैसे जहरीले प्रचार अभियान के तीर चलाए गए, पर चुनाव अयोग ने कोई आपत्ति नहीं उठाई. अब गर पैसे के बल पर चुनाव जीतना है तो फिर लोकतंत्र को ताला ही जड़ देना होगा और यहां पर केवल अडाणी की पार्टी ही चुनाव लड़ सकेगी.’..वगैरह..वगैरह’.

संजय राउत ने जो कुछ सामना में लिखा है, उस के पीछे उन की अपनी बौखलाहट है, क्योंकि अब उन्हें अहसास हो गया है कि अगली बार वह राज्य सभा नहीं पहुंच पाएंगे. अगर उद्धव ठाकरे अपने दल की हार पर गंभीरता से विचार करें, तो उन्हें पता चलेगा कि इस हार के लिए असली दोषी संजय राउत और उन का बड़बोलापन ही है.

चुनाव के वक्त टिकट बंटवारे को ले कर ‘महायुति’ में भी मतभेद रहे होंगे, मगर वह मतभेद बाहर नहीं आए. जबकि महाविकास अघाड़़ी के यहां टिकट बंटवारे के मतभेद बहुत बड़ा मुद्दा बन कर आम लोगों के सामने आता रहा और यह काम संजय राउत ही कर रहे थे हर मीटिंग के बाद संजय राउत बाहर आ कर बेवजह की बयान बाजी करने के साथ ही मुख्यमंत्री शिवसेना, उद्धव गुट का ही होना चाहिए कि रट लगाते रहे. इस तरह देखा जाए तो उद्धव ठाकरे के लिए संजय रउत ने दुष्मन का ही काम किया, पर उद्धव ठाकरे सच को कब समझ पाएंगे पता नहीं.

इस के अलावा चुनावों के दौरान उद्धव ठाकरे के कुछ बयानों का मतलब यह निकाला गया कि वह भाजपा के साथ जा सकते हैं. मगर उद्धव ठाकरे या संजय राउत की तरफ से इस को ले कर स्पष्टीकरण नहीं दिया गया. इस का खामियाजा भी उद्धव ठाकरे की पार्टी को झेलना पड़ा. इतना ही नहीं बाल ठाकरे की आवाज में एक जोश हुआ करता था, उन के भाषण सुन कर लोग उन की तरफ खिंचते थे. मगर उद्धव ठाकरे या आदित्य ठाकरे की आवाज में वह बात नहीं है. संजय राउत बयानबाजी करने में माहिर हैं, पर वह कुछ ज्यादा ही बड़बोले है, जिस का नुकसान पार्टी को हो रहा है. इस के अलावा जब तक बाल ठाकरे जिंदा रहे, तब तक उद्धव ठाकरे ने पार्टी की राजनीति में बहुत ज्यादा सक्रिय भूमिका नहीं निभाई.

150 चुनाव याचिकाएं होगी दाखिलः जीते हुए विधायक देंगें इस्तीफा ?

चुनाव में बुरी तरह से हारने के बाद कांग्रेस, शरद पवार और उद्धव ठाकरे गुट ने जम कर चुनाव आयोग पर वार किया है और इन का आरोप है कि ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी की गई. इसी के चलते इन दलों ने योजना बनाई है कि इन के 150 उम्मीदवार प्रति बूथ 47 हजार रूपए भर कर चुनाव आयोग से वीवीपैट की मिलान कराने के लिए कहेंगे. तो वहीं इस पर विचार किया जा रहा है कि सभी विधायक इस्तीफा दें, इस पर कितना अमल होगा, यह कहना मुश्किल है पर यदि ऐसा हुआ तो चुनाव आयोग पर दबाव जरुर बनेगा.

वायनाड और झारखंड की बजाय महाराष्ट्र पर रहा भाजपा का सारा जोर

महाराष्ट्र में आम राय यही बन रही है कि केंद्र सरकार और भाजपा की सरकारी मशीनरी ने वायनाड और झारखंड की बजाय सारा खेल महाराष्ट्र में किया जिस के पीछे कई वजहें हैं. आरोप लगाए जा रहे हैं कि गुजरात से कंटेनर में भर कर 3400 करोड़़ रूपए महाराष्ट्र ला कर चुनाव में बांटे गए. भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को मतदान से दो दिन पहले 5 करोड़ रूपए नगद के साथ पकड़ा गया. कहा जा रहा है कि भाजपा ने इस नीति पर काम किया कि ‘झारखंड ले लो और महाराष्ट्र दे दो’.

अब यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि कांग्रेस पार्टी के अंदर मौजूद कुछ जयचंद तो भाजपा के इशारे पर काम करते हुए कांग्रेस को हराने में अहम भूमिका निभाई. भाजपा के लिए महाराष्ट्र महत्वपूर्ण क्यों है. पहली बात तो इस वक्त 2 लाख करोड़ का धारावी प्रोजेक्ट अहम है. धारावी के रिडेवलपमेंट का कमा अडाणी को दिया गया है और चुनावी सभा में उद्धव ऐलान करते रहे हैं कि चनाव जीतने के बाद उन की सरकार अडाणी से धारावी का प्रोजेक्ट छीन लेगी. अब भला अडाणी दो लाख करोड़ के प्रोजेक्ट को जाने से देने के लिए धन बल सहित हर तरह की मदद भाजपा की की होगी, ऐसे आरोप लग रहे हैं.

इस के अलावा भी महाराष्ट्र में अडाणी के कई प्रोजेक्ट लंबित हैं. दूसरी बात यह है कि भाजपा कुछ समय से देश की आर्थिक राजधानी को मुंबई से अहमदाबाद, गुजरात ले जाने के लिए भी प्रयासरत है. 2014 के बाद कई बड़े प्रोजेक्ट व कई बड़े उद्योगपति महाराष्ट्र से गुजरात पहुंच चुके हैं.

लाड़ली बहना योजना

आज विपक्ष इस बात पर चिल्ला रहा है कि एकनाथ शिंदे की सरकार की 1500 रूपए देने की ‘लाड़की बहना योजना’ ने महायुति को जिता दिया. पहली बात तो हमें इस योजना के चलते दो तीन प्रतिशत से ज्यादा वोटों में फर्क पड़ना नजर नहीं आता. पर अहम सवाल यह है कि इस का फायदा विपक्ष को क्यों नहीं मिला? जबकि उद्धव ठाकरे, शरद पवार आदि ने अपनी चुनावी सभाओं में घोषणा की थी कि वह ‘लाड़ली बहना योजना’ के तहत चुनाव जीतने पर 1500 की बजाय 3 हजार रूपए देंगे, पर महिलाओं ने इन की बातों पर यकीन क्यों नहीं किया. इस की वजह जमीनी सतह पर काम न करना.

जब जुलाई माह में एकनाथ शिंदे की भाजपा समर्थित सरकार ने ‘लाड़ली बहना योजना’ के तहत हर महिला को 1500 रूपए देने की घोषणा की थी और कहा था कि पहली किश्त रक्षा बंधन के अवसर पर दी जाएगी, तो भाजपा, अजीत पवार व शिंदे की पार्टी के कार्यकर्ता औनलाइन फार्म भरने में औरतों की मदद कर रहे थे. पर उद्धव गुट, शरद पवार गुट और कांग्रेस के लोगों ने इस से दूरी बना कर रखी हुई थी. जबकि उस वक्त इन्हें पता था कि यह तो चुनावी छुनछुना है.

ऐसे में इन्हे भी आगे बढ़ कर महिलाओ के फार्म भरने में मदद करनी चाहिए थी. हमें पता है कि उद्धव ठाकरे व कांग्रेस के कार्यकर्ताओं व नगर सेवकों के पास जब महिलाएं गई कि उन का फार्म भरवा दें, तो इन लोगों ने मदद नहीं की, बल्कि यह कह कर चलता कर दिया कि भाजपा के कार्यायल में जाएं. जबकि फार्म तो इंटरनेट पर भरने थे. अगर शिवसेना, कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भी अपने क्षेत्र के मतदाता महिलाओं के फार्म भरवाए होते तो उन्हें भी रकम मिलती और अब यकीन करते कि कांग्रेस व उद्धव की सरकार आने पर उन्हें 1500 से बढ़ा कर 3 हजार मिलेंगें पर ऐसा नहीं हुआ.

‘बंटेंगे तो कटेंगे’ का सही जवाब देने में विपक्ष रहा असफल

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने नारा दिया था कि ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ जिस से वह समाज में हिंदू मतों का धुरीकरण कर सके, जिस में वह सफल रहे. इस के जवाब में कांग्रेस ने कहा, ‘एक हैं तो सेफ हैं.’’ पर योगी आदित्यनाथ के नारे के जवाब में विपक्ष मतदाताओं को समझाने में असफल रहा कि ‘बंटेंगे तो कटेंगे’ की बात करने वाले ही किस तरह समाज को बांटने का काम कर रहे हैं.

प्रचार में आक्रामता का अभाव

इस के अलावा विपक्षी पार्टियां आम मतदाता, किसानों की समस्याओ को सही ढंग से उठाने में विफल रहीं. यह लोग महंगाई के मुद्दे पर खामोश ही रहे. कांग्रेस चुनाव प्रचार के दौरान आक्रामक नहीं रही. आखिर संविधान की दुहाई देने और खुद को ‘राष्ट्र प्रहरी’ बताने वाली कांग्रेंस ने कैसे धर्म की अफीम चटाने वालों का सच जनता तक नहीं पहुंचा पाई, इस पर गहन विचार करने की जरुरत है.

वास्तव में कांग्रेस के अंदर ही बैठे नाना पटोले व वेणुगोपाल जैसे ही जय चंद हैं. यह तो सिर्फ मुख्यमंत्री बनने के लिए ताल ठोकते रहे, पर वोटरों को कांग्रेस के पक्ष में लाने की दिशा में कोई काम नहीं किया. सब कुछ राहुल गांधी के भरोसे रहे. उद्धव ठाकरे की सब से बड़ी गलती यह रही कि इस चुनाव के दैारान वह खुद चेहरा नहीं बने. उन की पार्टी के तमाम उम्मीदवारों के पोस्टरों में उद्धव व बाल ठाकरे का चेहरा प्रमुख नहीं रहा. इन्हें एकनाथ शिंदे से कुछ तो सीखना चाहिए. रिजल्ट आने के बाद दूसरे दिन विजयी बनाने के लिए मतदाताओं को धन्यवाद देने के विज्ञापन में एकनाथ शिंदे ने खुद को केंद्र में रखा. अपने अगलबगल में अजीत पवार व देवेंद्र फड़नवीस की छोटी तस्वीर रखी और बाला साहेब ठाकरे तथा मोदी की तस्वीर को उपर बड़े आकार में दिया. इस तरह उन्होने मुख्यमंत्री के तौर पर अपनी दावेदारी भी ठोक दी.

ज्योतिषी की भविष्यवाणी भी कांग्रेस को रही डुबा

कांग्रेस को डुबाने में एक मशहूर ज्येातिषी की भी अहम भूमिका की तरफ कुछ लोग इशारा कर रहे हैं. इन दिनों एक यूट्यूब चैनल पर हर रविवार कांग्रेस व राहुल गांधी के ग्रहों की बात कर उन्हें 2024 के हर चुनाव में प्रचंड जीत हासिल होने व मोदी के बुरे वक्त की भविष्यवाणी करते रहे हैं.

लोकसभा चुनाव से ले कर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हरियाणा के चुनावों में भी उन्होंने कांग्रेस के ही विजय होने की बात कही थी. पर उन की भविष्यवाणियां गलत निकली, तो सफाई में कह दिया कि फलां ग्रह की वजह से ईवीएम का खेल हो गया. महाराष्ट्र व झारखंड चुनाव से पहले भी इस ज्येतिषी ने कांग्रेस गठबंधन को पूर्ण बहुमत दिलाया था. अब फिर वह ईवीएम पर सारा दोष मढ़ेगें. कांग्रेस, शरद पवार व उद्धव ठाकरे को कम से कम ऐसे ज्योतिषियों के मायाजाल में फंसने से बचना चाहिए.

शरद पवार, प्रियंका चतुर्वेदी और संजय राउत के लिए राज्यसभा का रास्ता बंद

अब जो महाराष्ट्र विधान सभा चुनाव के परिणाम आए हैं, उन के चलते अब शरद पवार, प्रियंका चतुर्वेदी और संजय राउत के लिए राज्यसभा की राह पकड़ना मुश्किल हो गया. शरद पवार व प्रियंका चतुर्वेदी का राज्यसभा का कार्यकाल 3 अप्रैल 2026 के तथा संजय राउत का कार्यकाल 1 जलुाई 2028 को खत्म होगा. पर अब विधान सभा में ‘महायुति’ के पास इतनी ताकत नहीं रही कि वह इन्हें राज्यसभा में भेज सके.

 

बौक्स आयटम
कहीं 75 तो कहीं 377 वोटों से हुई जीत

बुलढाणा विधानसभा सीट पर एकनाथ शिंदे की शिवसेना के गायकवाड संजय रामभाऊ ने महज 841 वोटों से शिवसेना (यूबीटी) की महिला प्रत्याशी जयश्री सुनील शेलके को हराया.

मलेगांव सेंट्रल में ओवैसी की पार्टी औल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रत्याशी मुफ्ती मोहम्मद इस्माइल अब्दुल खलीके ने इंडियन सेकुलर लार्जेस्ट असंबेली औफ महाराष्ट्र के प्रत्याशी आसिफ शेख रशीद को 75 वोटों से हराया.
औरंगाबाद पूर्व से भाजपा प्रत्याशी अतुल मोरेश्वर सेव ने सिर्फ 2161 वोटों से चुनाव जीता.
बेलापुर सीट पर भाजपा की मंदा विजय म्हात्रे ने शरद पवार की पार्टी के प्रत्याशी संदीप गणेश नाईक को 377 वोटों से हराया.
करवी विधानसभा सीट पर शिवसेना के चंद्रदीप शशिकांत सिर्फ 1976 वोटों से विधायक बने.
शाहपुर से एनसीपी के दौलत भीका दरोदा ने 1672 वोटों से जीते
अंबेगांव से दिलीप दत्तात्रेय पाटिल ने 1523 मतों से जीत हासिल की.
जोगेश्वरी पूर्व, मुंबई से शिवसेना (यूबीटी) के अनंत ने 1541 वोटों से जीत हासिल की.
वर्सोवा से हारून खान ने 1600 से जीत पक्की की.
माहिम, मुंबई से महेश बलिराम सावंत 1316 मतों से सीट अपने कब्जे में की.
नवापुर से कांग्रेस प्रत्याशी शिरीश कुमार नाईक ने 1121 सीट हासिल की.
अकोला पूर्व, मुंबई से साजिद खान 1283 वोटों से जीते.
कर्जत जामखेड से एनसीपी (एसपी) के रोहित पवार 1243 मतों से जीते.

10 सीटों पर 5 हजार से कम अंतर से जीता महाविकास अघाड़ी.
भाजपा ने 9 सीटों पर 5 हजार मतों से कम के अंतर से चुनाव जीता
शिवसेना, शिंदे गुट की 6 और अजित पवार की एनसीपी ने 4 सीटों पर 5 हजार से कम मतों से जीत हासिल की.

एक लाख से अधिक मतों से जीतने वाले प्रत्याशी
शिरपुर से भाजपा के आशीराम वेचन पवारा ने 1,45,944 मतों से चुनाव जीता.
बागलान से भाजपा के दिलीप मंगलू बोरसे ने 1,29,297 मतों से चुनाव जीता.
चिंचवाड़ सीट से भाजपा के जगताप शंकर पांडुरंग 103865 मतों से जीते.
बोरीवली, मुंबई से भाजपा के संजय उपाध्याय 1,00,257 मतों से जीते.
कोथरुड से भाजपा के चंद्रकांत पाटिल ने 1,12,041 मतों से जीत दर्ज की.
सतारा से भाजपा के शिवेन्द्रराजे अभयसिंहराजे भोंसले ने 1,42,124 मतों से चुनाव जीता.
मालेगांव आउटर से शिवसेना प्रत्याशी दादाजी दगडू भूसे ने 1,06,606 मतों से जीत दर्ज की.
ओवाला माजीवाड़ा से शिवसेना के प्रताप बाबूराव सरनाईक 1,08,158 मतों से जीते.
कोपरी – पचपाखड़ी से सीएम एकनाथ शिंदे ने 1,20,717 मतों से चुनाव जीता.
बारामती से अजित पवार ने 1,00,899 मतों से जीत दर्ज की.
मावल से एनसीपी के सुनील शंकरराव शेलके ने 1,08,565 मतों से जीत दर्ज की.
कोपरगांव से एनसीपी के आशुतोष अशोकराव काले 124624 मतों से जीते.
पर्ली से एनसीपी के धनंजय मुंडे 140224 मतों से जीते.

बीमारी के नाम पर झटके ढाई करोड़

जयपुर के एक सरकारी कर्मचारी शिवनारायण जोशी, जिन्होंने अपने बेटे की बीमारी के नाम पर अपने विभाग से हजार या लाख रुपए नहीं बल्कि ढाई करोड़ रुपए से अधिक की रकम निकलवाई और हजम कर गए, बदले में उन्हें क्या मिला? बेटे सहित वे जेल गए, नौकरी से निलंबित कर दिए गए और इज्जत गई सो अलग.

राजस्थान के जयपुर के सार्वजनिक निर्माण विभाग (पीडब्लूडी) में शिवनारायण जोशी सहायक अभियंता के पद पर कार्यरत थे. बीते लगभग डेढ़ साल से उन का बेटा अमित जोशी बीमार चल रहा था और उस का इलाज दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में चल रहा था. इलाज के दौरान ही अमित जोशी का लिवर ट्रांसप्लांट हुआ था. उस समय शिवनारायण जोशी जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) में कार्यरत थे. उन्होंने आपरेशन और दवा के बिल के बदले में 25 से 30 लाख रुपए विभाग से वसूले थे जबकि दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में लिवर ट्रांसप्लांट का कुल खर्च करीब 17 लाख रुपए आया था जो जेडीए से सीधे अस्पताल के खाते में ट्रांसफर हो गया था.

डाक्टरों का कहना है कि सर गंगाराम में लिवर ट्रांसप्लांट के बाद कई माह तक दवाएं चलती हैं और इस में हर माह लगभग 50 हजार रुपए का खर्च आता है, लेकिन 21 दिसंबर, 2008 से ले कर 1 अक्तूबर, 2009 तक शिवनारायण ने इलाज के नाम पर लगभग ढाई करोड़ रुपए निकाल लिए. इस भारीभरकम मैडिकल बिल भुगतान पर जब विभाग को शक हुआ तो नवंबर में मामले की जांच के लिए मुख्य अभियंता ने 3 सदस्यों की एक जांच कमेटी बनाई. कमेटी ने जब दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में जा कर पूछताछ की तो उन्हें पता चला कि लिवर प्रत्यारोपण में करीब 16 से 18 लाख रुपए खर्च होते हैं और उन्होंने अपने यहां से 2 करोड़ 66 लाख के बिल बनाए जाने से भी इनकार कर दिया. जांच कमेटी द्वारा जांच में दोषी पाए जाने पर विभाग ने 22 दिसंबर को जोशी को निलंबित कर दिया.

ऐसा नहीं था कि शिवनारायण जोशी को अपनी गलती और उस के अंजाम का डर नहीं था. वे पहले से सतर्क भी थे. तभी तो उन के स्टेट बैंक के खाते में ढाई करोड़ रुपए आए लेकिन मामला पुलिस के पास पहुंचने तक उस खाते में मात्र 50 हजार रुपए ही छोड़े गए थे. रकम आते ही जोशी या तो पैसे निकाल लेते या दूसरे खातों में ट्रांसफर कर देते थे. पुलिस को आशंका है कि ये सभी फर्जी खाते उन के या उन के रिश्तेदारों के होेंगे.

इतना ही नहीं शिवनारायण द्वारा पास कराए गए बिल जब पीडब्लूडी ने पुलिस को दिए तो उस में एक बिलबुक में 14907 नंबर से शुरू कर 14941 तक कुल 34 बिल 21 दिसंबर, 2008 से 10 जुलाई, 2009 के बीच काटे गए हैं. दूसरी बिलबुक में 24802 नंबर से शुरू कर 44 बिल 13 जुलाई, 2009 से 1 अक्तूबर, 2009 के बीच काटे गए हैं. इन बिल नंबरों के बारे में जब सर गंगाराम अस्पताल वालों से पूछा गया तो उन्होंने इन बिलबुकों को अपने यहां की बिलबुक होने से इनकार कर दिया.

पुलिस का मानना है कि सर गंगाराम अस्पताल के नाम से फर्जी बिलबुक छपवा कर बिल काटे गए हैं. जो बिल जोशी ने विभाग को पेश किए उन पर बिल के नंबर या तो एक के बाद एक या फिर 2-3 नंबरों के अंतराल में हैं, जबकि हर रोज अस्पताल में हजारों बिल कटते हैं. ऐसे में कहा जा सकता है कि जोशी ने फर्जी बिलबुक छपवाई और धोखाधड़ी को अंजाम दिया.

ऐसा नहीं है कि शिवनारायण जोशी पहली बार जांच के घेरे में आए हैं. इस से पहले भी भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने उन के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज किया था. उस समय उन की पत्नी के नाम कई कारें होने की जानकारी सामने आई थी. इस मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने लंबी जांच के बाद प्राथमिकी लगा दी थी. सिर्फ शिवनारायण की पत्नी ही नहीं बल्कि उन के बेटे अमित जोशी का भी मामला विवादित रहा है. अमित का उदयपुर में टूर एंड टै्रवल्स का काम था. कारखाने में आग लग गई थी. इस के लिए उस ने बीमा कंपनी से करीब 60 लाख से अधिक का दावा पेश किया था. यही नहीं, बिल पास करवाने के लिए शिवनारायण ने अपने बेटे को अविवाहित बताया और 34 वर्षीय पुत्र अमित की आयु 26 साल बताई थी.

पुलिस अब यह जानने में लगी है कि जोशी ने फर्जी बिलों से हड़पी इतनी बड़ी रकम कहांकहां निवेश की है. पुलिस को मिली जानकारी के मुताबिक जोशी ने उदयपुर व जोधपुर में काफी अचल संपत्ति खरीदी हैं. उन्होंने अपने एक रिश्तेदार लोकेश पालीवाल के खाते में 26 अक्तूबर को 3 बार 18-18 लाख रुपए जमा करवाए. उन के द्वारा पत्नी के खाते और अपने खाते में भी रुपए जमा कराने की पुष्टि हुई है. उदयपुर के उन के एक रिश्तेदार के बैंक खाते में 54 लाख रुपए होने की जानकारी मिली है. शिवनारायण जोशी ने ब्याज पर भी खूब पैसे दिए हैं और जमीन खरीदने में भी काफी निवेश किया है लेकिन इतना होने के बाद भी आरोपी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है.

शिवनारायण जोशी कहते हैं, ‘‘मैं ने कोई गलत काम नहीं किया है. कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से ऐसा हुआ है. मैं ने तो बेटे के इलाज के लिए रुपए जमा कर अस्पताल द्वारा दिए गए बिल विभाग को दिए थे. अब ये बिल असली बिलबुक से थे या फर्जी थे, मु   झे नहीं मालूम. मेरे सेवानिवृत्त होने में सिर्फ 1 साल बाकी है. मेरी पदोन्नति होने वाली थी. कुछ आला अधिकारी नहीं चाहते थे कि मेरी पदोन्नति हो. शायद इसीलिए ऐसा किया गया.’’

अब देखना यह है कि शिवनारायण जोशी द्वारा दी गई सफाई कितनी सही है वहीं पुलिस इस मामले में कितनी सक्रियता से काम कर रही है. यदि दोषी पकड़ा नहीं जाएगा तो इस तरह के काम करने वाले लोगों की फेहरिस्त लंबी होती जाएगी और वास्तव में बीमार और जरूरतमंदों को नुकसान उठाना पडे़ेगा.

चिकन ऐंड मटन करी

अधीर और शीरी दोनों काफी देर से शौपिंग करने गए थे. मां बारबार घड़ी देख रही थीं. उन्हें लगा कि फोन मिला कर पूछ लूं कि आखिर और कितनी देर लगेगी? मां ने अभी मोबाइल लौक खोला ही था कि बहूबेटे की आवाज मां के कानों में पड़ी. अधीर और शीरी दोनों ऊंची आवाज में बात कर रहे थे. सुनने वाले को ऐसा लग सकता था कि शीरी और अधीर एकदूसरे से लड़ रहे हैं पर वे लड़ नहीं रहे थे बल्कि यह तो एक मीठी नोकझोंक थी, जो अकसर युवा पतिपत्नी के जोड़ों में होती हैं. अधीर शीरी के इस फालतू शौक को कोस रहा था कि वह किचन के लिए कितने ढेर सारे मसाले ले आई है.

“अब तुम ही बताओ मां, हमारे घर में इतने बड़ेबड़े चाकुओं का क्या उपयोग? हमलोग तो ठहरे शाकाहारी, हमें कौन सा मटन चौप करना है,” अधीर ने मां से शिकायती लहजे में कहा.

मां शीरी के इस खाने के शौक को अच्छी तरह जानती थी इसलिए उन्होंने शीरी की वकालत करते हुए अधीर से कहा कि वह यह न समझे कि किचन में सिर्फ हलदी, धनिया और मिर्ची से ही मसालों की पूर्ति हो जाती है बल्कि अलगअलग सब्जी के लिए अलगअलग मसाले होते हैं. और तो और अब तो चाय और रायता भी मसाले वाला बनता है और रह गई बात चाकुओं के सैट की तो वह बड़े काम की चीज है.

शीरी जो यूट्यूब चैनल और इंस्टाग्राम के लिए खाने के वीडियो बनाती है उस में टेबल पर सजाने के लिए बहुत अच्छे हैं क्योंकि जब तक शोऔफ न किया जाए तब तक वीडियोज पर व्यूज ही नहीं आएंगे. मां ने शीरी को सफाई में कुछ भी कहने का मौका दिए बिना सबकुछ स्वयं ही कह डाला था.

“अब जब आप ही अपनी बहू को इतना प्रोटैक्ट कर रही हो तब मुझे क्या? मैं तो चला नहाने के लिए,”यह कहते हुए अधीर बाथरूम की ओर बढ़ गया. शीरी ने मुसकराते हुए मां को देखा मानो उस की आंखें धन्यवाद कह रही हों मां से.

अधीर और शीरी की शादी को 2 साल ही हुए थे हालांकि यह एक अंतरजातीय विवाह था. अधीर एक जैन परिवार से था तो शीरी कायस्थ थी और शुरुआत में इस शादी में भी अड़चने आई थीं पर दोनों के परिवार वाले काफी सुलझे हुए और खुले दिमाग के थे और आर्थिक रूप से संपन्न भी थे. संपन्न परिवारों पर तो वैसे भी समाज का अंकुश कम ही रहता है. सारे नियमकायदे, कानून गरीबों के लिए ही तो हैं.

दोनों के परिवार वालों ने समाज की परवाह किए बिना सिर्फ अपने बच्चों की खुशी देखी और शीरी और अधीर की शादी हो गई. वैसे तो शीरी को ससुराल में सारे सुख थे, प्यार करने वाला पति और बहू का ध्यान रखने वाले सास और ससुर पर शीरी अब ससुराल में एक परेशानी महसूस कर रही थी. दरअसल, शीरी को नौनवेज खाना बहुत पसंद था पर उस का ससुराल तो ठहरा एकदम शाकाहारी, लहसुनप्याज तक नहीं खाया जाता था यहां.

हालांकि शादी से पहले शीरी के जेहन में यह बात नहीं आई थी कि अधीर के घर वाले शाकाहारी होंगे. उस ने सोचा था कि आजकल नौनवेज खाना तो फैशन स्टेटमैंट बन गया है पर ससुराल आ कर उसे पता चला कि यहां पर सभी लोग शाकाहारी हैं.

घर में जब भी कुछ अच्छा पकता तो बाकी सब लोग तो उस का ऐंजौय करते पर शीरी को नौनवेज खाने की तलब लगती. मौसम में थोड़ी सी ठंडक हो या हलकी सी बूंदाबांदी हो जाए तो शीरी नौनवेज फूड खाने के लिए मचल उठती थी.

अब ससुराल में किसी तरह के प्रेम की कमी तो थी नहीं पर जीवन में जबान के स्वाद का अपना ही महत्त्व होता है, इसलिए शीरी ने अधीर से नौनवेज खिलाने की जिद करी. पहले तो अधीर ने एकदम सिरे से खारिज कर दिया पर जब शीरी ने बारबार आग्रह किया और नौनवेज नहीं खिलाने पर नाराज हो गई तब अपना मन मार कर अधीर शीरी को बाहर ले जा कर किसी रेस्टोरैंट में नौनवेज खिलाने पर राजी हो गया. शर्त यह रखी गई कि वह घर आने से पहले मुंह में इलायची या कोई माउथ फ्रैशनर खा लेगी जिस से मम्मी और पापा को किसी तरह का कोई शक न हो. फिर क्या था शीरी तुरंत ही मान गई.

एक बढ़िया रेस्टोरैंट में अधीर और शीरी ने अपनेअपने लिए खाने का और्डर दिया. जहां अधीर ने सिर्फ कुछ डेजर्ट और आइसक्रीम ही और्डर करी, वहीं शीरी ने जीभर कर नौनवेज फूड का और्डर दिया जिस में तंदूरी फिश टिक्का और कोल्हापुरी मटन करी मुख्य रूप से थी और इन सब के साथ 2 बार सलाद भी मंगवाया था शीरी ने. उसे इस तरह से खाने पर टूट पड़ते हुए देख कर अधीर को बहुत अजीब लग रहा था.

शीरी नौनवेज खाने को इस तरह से खा रही थी जैसे वह कितने दिनों से भूखी है. खाने के बाद बिल चुकता करते समय अधीर ने शीरी के चेहरे पर नजर डाली तो एक गहरी तृप्ति का भाव था शीरी के चेहरे पर और जैसा कि तय हुआ था कि नौनवेज खाने के बाद कुछ न कुछ माउथ फ्रैशनर खाया जाएगा इसलिए शीरी ने माउथ फ्रैशनर को मुंह में चारों तरफ घुमाना शुरू कर दिया ताकि नौनवेज खाने का कोई सुबूत न रह जाए.

अपने पति को इस अच्छे व्यवहार और उस की पसंद का ध्यान रखने के लिए उसे थैंक यू भी कहा. पर भला अधीर को क्या पता था कि निकट भविष्य में उसे ऐसे कई ‘थैंक यू’ मिलने वाले हैं क्योंकि एक बार बाहर जा कर नौनवेज खा लेने से तो शीरी को एक बहुत अच्छा औप्शन मिल गया था जिस से वह रेस्टोरैंट जा कर नौनवेज खा सकती थी और उस के सासससुर को इस का पता भी नहीं चलता और घर में पकाने का झंझट भी नहीं.

अधीर को लगा कि उस ने शीरी को बाहर ले जा कर नौनवेज खिला कर गलती कर दी है क्योंकि अब यह क्रम रुकने वाला नहीं दिखता था. जब भी शीरी का मन होता वह अधीर से जिद करने लगती और अगर अधीर नौनवेज खिलाने में टालमटोल करता तो शीरी मुंह फुला लेती.

हालांकि जिस दिन शीरी नौनवेज खाती तो उस दिन अधीर उस के बिस्तर पर दूरी बना कर ही सोता था. ऐसी ही एक शाम को जब वे दोनों रेस्टोरैंट में डिनर कर रहे थे और शीरी के सामने ढेर सारा नौनवेज फूड रखा हुआ था कि तभी रेस्टोरैंट के अंदर शीरी के ससुर अपने किसी दोस्त के साथ दाखिल हुए. अचानक से उन की नजरें अपने बेटे और बहू पर आ कर टिक गईं और अधीर और शीरी ने भी पापा को देख लिया था. पापा की अनुभवी आंखों ने यह भी देख लिया कि अधीर और शीरी की टेबल पर नौनवेज फूड रखा हुआ है. शीरी के ससुर बहुत समझदार थे. इसलिए उन्होंने उन दोनों को अनदेखा कर दिया और सब से कोने वाली टेबल पर जा कर इस तरह से बैठ गए जैसे उन की पीठ ही शीरी और अधीर की तरफ हों. अधीर की हलक के नीचे तो कुछ नहीं उतरा और शीरी ने भी जैसेतैसे ही कुछ खाया और जो नहीं खाया गया उस को वहीं छोड़ कर दोनों वहां से निकल लिए. शीरी को आज पहली बार अपराधबोध हो रहा था कि उस ने अपनी जीभ के जरा से जायके के लिए सासससुर की नजरों में अपनी इमेज को खराब कर लिया.

‘अब पापा सारी बात मां को बताएंगे और मां न जाने कैसा व्यवहार करेंगी मेरे साथ… हो सकता है आज के बाद मुझे किचन में जाने ही न दिया जाए,’ अपने ही मन में सोच रही थी शीरी.

शीरी और अधीर के घर पहुंचने के कुछ देर बाद ही उस के ससुर भी घर लौट आए थे. उन के हाथ में मिठाई का एक डब्बा था. उन्होंने शीरी को देते हुए कहा कि कृष्णा नगर वाले रेस्टोरैंट की यह बहुत फेमस मिठाई है. एक प्लेट में निकाल कर सब को दे दो और मुझे अधिक देना. पापा के चेहरे को देखती रह गई थी शीरी. उस ने पापा के चेहरे के भावों को पढ़ना चाहा पर पढ़ न सकी, कांपते हाथों से मिठाई निकाल कर सब को देने लगी और पापा उस मिठाई को ऐसे खा रहे थे जैसे पहली बार खा रहे हों.

कई दिन बीत गए लेकिन पापा ने रेस्टोरैंट और नौनवेज वाली बात का कोई भी जिक्र घर में मां से नहीं किया. वह अपने बड़ेपन का परिचय दे रहे थे.

‘अब आज के बाद मैं बाहर रेस्टोरैंट में नौनवेज खाने नहीं जाऊंगी,’ मन ही मन सोचा था शीरी ने लेकिन 20-22 दिन ही बीते थे कि शीरी का मन फिर से चिकन टिक्का खाने का करने लगा. यह बात उस ने अधीर से शेयर करी तो अधीर थोड़ी देर तो चुप रहे लेकिन फिर बाद में उस ने एक औप्शन सुझाया,”तुम बाहर नहीं जा सकतीं तो क्या? घर में चिकन करी और फिश टिक्का ला ही सकते हैं.”

“अरे, घर में कैसे लाओगे? मम्मीपापा जान जाएंगे तब…” शीरी ने चिंता दिखाई.

“वह सब तुम मुझ पर छोड़ दो,” अधीर ने कहा.

अधीर अब चिकन करी और फिश टिक्का व अन्य नौनवेज डिश घर में ही पैक करा कर लाने लगा था. वह इस बात का ध्यान जरूर रखता कि कहीं नौनवेज खाने की सुगंध घर में न फैल जाएं जिस से मम्मी को किसी तरह का कोई शक हो. हालांकि नौनवेज फूड को घर में लाना और फिर उसे चुपके से खा कर पैकिंग के पैकेट घर से बाहर फेंकना इतना सरल काम भी नहीं था. मां को कभी भी शक हो सकता था और ससुर तो शीरी की हकीकत जान ही गए थे जिस से शीरी के मन में हमेशा एक आत्मग्लानि बनी रहती थी.

‘मुझे अधीर इतना प्रेम करते हैं कि घर में मांसाहार का निषेध होने पर भी वे मेरी पसंद का खाना खिलाने बाहर ले जाते और जरूरत पड़ने पर घर में भी लाते हैं,’ अपनेआप से ही कुछ बात कर रही थी शीरी.

‘पापा ने यह जानते हुए भी कि मैं नौनवेज खाती हूं मां को नहीं बताया. कितना ध्यान रखते हैं वे मेरा, क्यों न मैं ही धीरेधीरे अपनी इस नौनवेज खाने की आदत को कंट्रोल कर लूं और शाकाहारी बन कर अधीर के मन की पत्नी और एक आदर्श परिवार की आदर्श बहू बन जाऊं,’ शीरी के दिमाग में कई विचार चल रहे थे.

नौनवेज फूड खाने बाहर जाना हो या घर में ला कर खाना, इन दोनों कामों में आने वाली दिक्कतों के चलते शीरी ने इंटरनैट पर कुछ ऐसे फूड्स ढूंढ़े जो भले ही शाकाहार में आते हों मगर उन का स्वाद कुछकुछ नौनवेज फूड्स के जैसा हों और उसे बहुत से ऐसे शाकाहारी फूड्स मिलें जो यदि अच्छे मसालों और तैयारी के साथ बनाए जाएं तो वे काफी हैल्दी और स्वादिष्ठ बनते थे और ऐसे खानों में प्रोटीन की मात्रा नौनवेज फूड के जितनी ही थी.

शीरी ने इन शाकाहारी फूड्स को जब किचन में बना कर ट्राई किया तो उन का स्वाद गजब का निकला. भले ही यह शाकाहारी खाना स्वाद में मांसाहार की बराबरी नहीं कर रहे थे पर फिर नौनवेज फूड को घर में लाना या बाहर खाने जाना जैसा सरदर्द और खतरा भी तो नहीं था और फिर शीरी अपने यूट्यूब चैनल पर शाकाहार को प्रमोट कर लोगों की तारीफें भी तो पा सकती थी.

‘जब हम बुफे सिस्टम में खाना खाते हैं तो हमे तो पता नहीं होता कि कहीं इन बरतनों का प्रयोग मांसाहारी खानों में तो नही किया गया है?’ अधीर अपनेआप से सवाल पूछ कर चुप हो गया जैसे खुद को ही उत्तर दे रहा हो.

‘और फिर ऐलोपैथिक दवाइयां, कैप्सूल वगैरह भी तो पशुओं की चरबी से ही बनते हैं,’ बुदबुदा रहा था अधीर. साथ ही साथ उस के मन में यह बात भी बारबार आ रही थी कि अगर वह भी नौनवेज खाना शुरू कर दे तो शीरी के चिकन और मटन करी के शौक को पूरा करने में आसानी रहेगी और तब तो वह मां और पापा को भी अपने शौक के नाम पर घर में नौनवेज ले आने की परमिशन मांग सकेगा.

अधीर को आज अपने घर गीतापुर से 200 किलोमीटर दूर लखनऊ किसी काम से जाना था और काम निबटा कर अपनी ही गाड़ी से वापसी भी करनी थी. वापसी करने में उन्हें देर हो गई थी इस बात की सूचना अधीर ने मोबाइल पर अपने मांपापा और शीरी को दे दी थी.

अधीर घर आया तो सीधा अपने बैडरूम में गया और एक पैकेट निकाल कर टेबल पर रख आया और शीरी के मोबाइल पर एक मैसेज टाइप कर के सैंड कर दिया. शीरी किचन में व्यस्त थी. आज डिनर में उस ने पंजाबी छोले, अरहर की फ्राई दाल और तंदूरी रोटी बनाई थी. अधीर फ्रैश हो कर डाइनिंग टेबल पर आ गए और खाने से सजी टेबल देखर चकित रह गए. सब ने खाना शुरू कर दिया. मांपापा को खाना बहुत पसंद आया था पर अधीर शीरी को चकित हो कर देखे जा रहे थे जो दाल, सब्जी भी बड़ी रुचि से खा रही थी. खाना निबटा तो अधीर और शीरी अपने कमरे में गए.

“अरे मैं ने तुम्हें मैसेज किया था कि मां और पापा के सामने थोड़ा कम ही खाना क्योंकि मैं तुम्हारे लिए लखनऊ के अमीनाबाद से मशहूर टुंडेजी के कबाब परांठे और चिकन बिरियानी लाया हूं,” इतना कह कर अधीर ने कबाब के पैकेट को खोल दिया.

“और आज नौनवेज खाने में मैं भी तुम्हारा साथ दूंगा,” अधीर ने कहते हुए कबाब खाना शुरू कर दिया तो शीरी के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रह गया. अधीर ने शीरी को देख कर उस की शंका का समाधान करते हुए कहा कि दोस्तों के बीच यह कहना कि मैं नौनवेज नहीं खाता बहुत अजीब लगता था और उस का मजाक भी बनता था और इस के अलावा उस ने शीरी की पसंद में अपनी पसंद मिलाने के लिए नौनवेज खाना शुरू किया था. पहले तो उसे थोड़ा अजीब लगा पर धीरेधीरे निष्पक्ष भाव से स्वाद लिया तो नौनवेज भी काफी स्वादिष्ठ लगा.

शीरी ने मुसकराते हुए एक नजर कबाब परांठे पर डाली और कहने लगी कि अधीर और उस के परिवार से उसे इतना प्रेम मिला कि उसे लगा कि शाकाहारी परिवार में मांसाहारी खाना खा कर वह गलत कर रही है और मां और पापा को धोखा दे रही है इसलिए उस ने शाकाहारी खाने में इंटरैस्ट लेना शुरू किया. नौनवेज को छोड़ना सरल नहीं था पर थोड़े ही प्रयास और कठोर संकल्प से उसे शाकाहारी बनने में बहुत हैल्प मिली है और आज अपने यूटयूब चैनल पर वह शाकाहार भोजन को प्रमोट करती है. हालांकि उस की मंशा किसी नौनवेज खाने वाले को गलत या सही ठहराने की नहीं होती. अधीर ने आगे बढ़ कर शीरी को गले लगा लिया था.

मांसाहार या शाकाहार यह तो प्रत्येक व्यक्ति की अपनी पसंद हो सकता है पर अधीर और शीरी ने अपने साथी के प्रेम और पसंद को ध्यान में रखते हुए अपने पसंदीदा भोजन का त्याग दिया और एकदूसरे की पसंद को अपना लिया था.

अधीर और शीरी ने अपने मां और पापा को जा कर इन सारी बातों के बारे में बताया तो वे दोनों अपने बेटे और बहू के प्रेम और समर्पण को देख कर बहुत खुश हुए.

प्रेम में किसी की दासतां के लिए जगह नहीं होती और न ही किसी तरह की ईगो का स्थान, पर जैसे संगम में 2 लहरें मिल कर एक हो जाती हैं उसी तरह एकदूसरे के रंग में रंग जाना ही सच्चे प्रेम की निशानी होती है.

Young Girls के लिए सैक्सी फील करना गलत नहीं

Young Girls: लड़कियों के पैर फैला कर बैठने की आदत को सोसाइटी गलत मानती है और ऐसी लड़कियों को समाज अच्छी नजरों से नहीं देखता, क्यों? कोई लड़की सैक्स के बारे में बात करे तो समाज में उसे पाप करना मान लिया जाता है और उस को कोसा जाता है, क्यों? भारतीय समाज में आज भी विवाह के पहले सैक्स करने को वर्जित माना जाता है, क्यों? फीमेल प्लेजर के बारे में बात करना पाप माना जाता है, क्यों? जो लड़कियां खुल कर अपनी इस इच्छा को एक्स्प्रेस करती हैं उन्हें समाज बदचलन व गंदा मानता है, क्यों? लड़कियां सैक्स टौयस यूज करती हैं या मास्टरबेट करती हैं तो सोसाइटी उसे गलत मानती है व संस्कृति के खिलाफ भी मानती है लेकिन वही काम लड़का करे तो उस पर कोई सवाल नहीं, क्यों?

पीरियड्स या मेंस्ट्रुएशन एक सामान्य नैचुरल बाइलौजिकल प्रक्रिया है लेकिन आज भी लड़कियों को इस के बारे में खुल कर बात ‘न’ करने की सीख दी जाती है. अगर कोई लड़की पीरियड्स पर खुल कर बात करती है तो समाज के लोग उसे बेशर्म समझते हैं, उसे अजीब नज़रों से देखते हैं.

क्यों हमारे समाज में लड़कों के लिए नशा करना और देररात पार्टी करना गलत नहीं है जबकि लड़कियों के लिए यह सब गलत है? समाज घर से कालेज और कालेज से घर आनेजाने वाली लड़की को सही मानता है, लड़कों से फ्रैंडशिप करने वाली लड़कियों को गलत मानता है, क्यों?

लड़की का अगर बौयफ्रैंड है तो वह लड़की चरित्रहीन है लेकिन वह लड़का जो उस का बौयफ्रैंड है उसे चरित्रहीन नहीं कहा जाता. अगर लड़की गलत है तो लड़का कैसे सही हो सकता है. वह भी तो चरित्रहीन हुआ न. क्यों लड़कियों पर बातबात पर लांछन लगाए जाते हैं?

लड़कियों के लिए भी सैक्स लड़कों जितना जरूरी

सोसाइटी को यह बात समझनी होगी कि सैक्स लड़का या लड़की दोनों के जीवन का अहम हिस्सा है. अगर कोई यह सोचता है कि सैक्स की चाहत केवल लड़कों को होती है तो वह गलत सोचता है. यंग गर्ल्स को भी बौयज जितनी ही सैक्स की चाहत होती है.

जिस तरह लड़के खुद को सुख देने के लिए सैक्स टौयज की तलाश करते हैं, मास्टरबेट करते हैं उसी तरह लड़कियों के लिए भी मास्टरबेशन पूरी तरह से एक सामान्य और हैल्दी सैक्शुअल ऐक्टिविटी है, जो उन्हें संतुष्टि देती है.

मास्टरबेशन करने का कोई एक तरीका नहीं है. यह एक पर्सनल अनुभव है, इसलिए यंग गर्ल्स का अपने शरीर को एक्सप्लोर करने में कोई हर्ज नहीं है. दिक्कत यह है कि गर्ल्स खुद अपने शरीर के बारे में सही से नहीं जानतीं. सैक्सी फील करना कैसा होता है, यह वे समझतीं नहीं. उन्हें यह समझना होगा कि इस उम्र में सैक्स के बारे में खयाल आना गलत नहीं है.

लड़कियों को अपने बौडी पार्ट्स और उन के साइज को ले कर अनेक तरह के भ्रम होते हैं और अपनी ही बौडी पार्ट्स को ले कर उन्हें एम्बरेसमैंट होती है. उन की अपने शरीर की जरूरतें क्या हैं, वे समझ नहीं पातीं जिस से आगे चल कर उन्हें अपने सैक्शुअल रिलेशनशिप में समस्याओं का सामना करना पड़ता है. इसलिए यंग गर्ल्स का अपने शरीर को एक्सप्लोर करने, जाननेसमझने में कोई बुराई नहीं.

सैक्स कोई तिलिस्म नहीं

सैक्स आज भी भारतीय समाज के लिए एक तिलिस्म जैसा है. समाज को अपनी इस सोच को बदलने की जरूरत है कि यंग गर्ल्स और बौयज में सैक्शुअल फीलिंग आना स्वाभाविक है. इसे रोका नहीं जा सकता और न ही रोकना चाहिए. शादी से पहले सेफ सैक्स होना या करना भी गलत नहीं. जब तक 2 लोगों के बीच सहमति से सैक्स हो रहा है तब तक दूसरे लोगों की राय का कोई महत्त्व नहीं होना चाहिए.

अगर 2 जागरूक लोग शादी से पहले यौन संबंध बनाने का फैसला कर रहे हैं, चाहे वे रिश्ते में हों या न, समाज को उन की पसंद की स्वतंत्रता को छीनने का कोई अधिकार नहीं है. यह उन की अपनी इच्छा है.

मदर्स की रिस्पौन्सिबिलिटी

मदर्स को अपनी टीनएज बेटी को सुरक्षित सैक्स संबंधित एजुकेशन देने में हिचकिचाना नहीं चाहिए. सैक्स को किसी तरह का हौवा नहीं बनाना चाहिए कि वह घबराती रहे. बल्कि बेहतर यह है कि वे अपनी यंग बेटी को इस बात का एहसास कराएं कि वे उस की भावनाओं को समझ रही हैं और यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिस से हर कोई गुजरता है.

सैक्सी या बोल्ड फील करना गलत नहीं

लड़कियों को यह समझने की जरूरत है कि जो लड़कियां सैक्सी, दबंग दिखती हैं उन से पंगा लेना आसान नहीं होता. लड़के भी उन्हें छेड़ने से डरते हैं. कई लड़कियां जो बोल्ड ड्रैस पहनती हैं लड़के उन्हें आहें भर कर देखते तो हैं पर उन्हें कुछ भी कह देने का कौन्फिडैंस लड़कों में नहीं होता.

सही मानो में सैक्सी फ़ील करना, खुद के शरीर के साथ कंफर्टेबल फील करना, अच्छा महसूस करना, खुद को महत्त्व देना कौन्फिडैंट फील करना होता है. कुछ यंग गर्ल्स वैलफिटेड कपड़े पहनने से भी बोल्ड फील करती हैं.

कई गर्ल्स एक अच्छा सा हेयरस्टाइल बना कर भी सैक्सी फील करती हैं. कुछ हील्स पहन कर सैक्सी फील करती हैं. अपने फेवरेट परफ्यूम को लगाना भी बोल्ड एंड हौट फील करा सकता है.

• एक छोटी ब्लैरक ड्रैस किसी भी यंग गर्ल को सैक्सी फ़ील करा सकती है
• वैक्स किए हुए शाइनी लेग्स भी सैक्सी फ़ील कराने का एक आसान तरीका होता है.
• रेड लिपस्टिक लगाना भी खुद को सैक्सी फील कराने का एक आसान तरीका होता है.
• सौफ्ट, सैटिन और लेस वाली मैचिंग सैक्सी इनरवियर या पुशअप ब्रा पहन कर सैक्सी फ़ील कराया जा सकता है.
• पोषक तत्त्वों से भरपूर हैल्दी डाइट गर्ल्स को एक सुडौल शरीर और ग्लोइंग स्किन दे कर सैक्सी फ़ील कराने में मदद करती है.
• रैगुलर वर्कआउट कौन्फिडैंस बूस्ट करता है और सैक्सी महसूस कराता है.
• फ्लर्ट करना भी किसी भी लड़की को सैक्सी महसूस करा सकता है.

बाहरी सुंदरता से अधिक जरूरी है इनर ब्यूटी और स्मार्टनेस

“अरे, ये आप की बेटी है? आप का रंग तो बहुत साफ है ! इस के नैननक्श और रंग आप जैसे बिल्कुल नहीं हैं. शायद आपने बचपन में इसे उबटन नहीं लगाया…”
पड़ोस वाली आंटी की बात सुन कर 17 साल की रिया अपनी मौम की तरफ देखने लगी. रिया की मौम और रिया की आंखोंआंखों में बात हुई और दोनों मुसकरा दिए और पड़ोसन को कुछ समझ नहीं आया और वह खिसिया कर वहां से चली गई !

दरअसल, रिया की मौम ने रिया को बचपन से यह बात सिखाई थी कि अगर आप को दुनिया और अपनी नज़रों में खूबसूरत बनना है तो रंग, नाकनक्श और फिगर से ज्यादा अंदर की खूबसूरती निखारनी चाहिए. अपनी पर्सनालिटी पर ध्यान देना चाहिए और लोगों की बाहरी सुंदरता के पैमाने के तराजू में खुद को नहीं तोलना चाहिए. यही कारण था कि रिया को पड़ोस वाली आंटी की बात का कोई फर्क नहीं पड़ा.

आमतौर पर हमारे समाज में जब लड़कियों की खूबसूरती की बात आती है तो लोग रंग, नाकनक्शर और फिगर की बात करते हैं. उन्हें बचपन से ही सिखाया जाता है कि तुम्हारे लिए खूबसूरत दिखना जरूरी है. लोग उन्हें क्यों नहीं सिखाते कि यदि आप शिक्षित नहीं हैं आप में आत्मविश्वास नहीं है आप में इंसानियत नहीं है तो उस सुंदरता का कोई मोल नहीं है.

सुंदरता से जरूरी है इनर ब्यूंटी

बाहरी खूबसूरती के साथ दिल की खूबसूरती यानी इनर ब्यूरटी बहुत मायने रखती है. कोई भी भले ही दिखने में चाहे कितना ही खूबसूरत हो लेकिन उस के अंदर इंसानियत, आत्मविश्वास, अपने आसपास के लोगों के प्रति प्याोर और दुलार नहीं है वह भरोसेमंद नहीं है तो बाहरी खूबसूरती किसी को अपनी ओर अट्रैक्ट नहीं कर पाएगी.

व्यवहार की खूबसूरती

बाहरी सुंदरता से ज्यादा जरूरी यह है कि आप का लोगों के साथ व्यवहार कैसा है, उन के लिए आप की सोच कैसी है. लोगों के साथ सही तरीके से बात करने वाले, अच्छे से व्यवहार करने वाले को लोग पसंद करते हैं क्योंकि सुंदरता सिर्फ चेहरे से नहीं बल्कि व्यवहार से भी होती है.

कोई भी लड़की दिखने में चाहे कितनी ही गुड लुकिंग क्यों न हो लेकिन वह सैल्फिश हो हमेशा खुद के बारे में सोचती हो, किसी की परवाह न करती हो तो ऐसी लड़की को कोई पसंद नहीं करेगा लेकिन अगर वहीं अगर वह खुद से पहले दूसरों के बारे में सोचती हो, खुद को भूल कर सब की मदद करने की कोशिश करती हो, उस के अंदर इंसानियत हो तो उस के पीछे पूरी दुनिया खड़ी रहती है और उस के आसपास के लोग उस की इज्जउत करते हैं.

इसी तरह अगर किसी के मन में सभी के लिए प्याेर या दुलार का भाव हो तो यकीन मानिए वह लड़की हर दिल पर राज कर सकती है.

इंटेलिजेंस और आत्मविश्वास

आत्म विश्वापस किसी की भी पर्सनैलिटी को कई गुना निखारने में मदद करता है. आप ही सोचिए आप के सामने दो लड़कियां हैं, एक सिर्फ दिखने में अच्छी है लेकिन उसे अपने काम की कोई समझ या जानकारी नहीं है, वह अपनी बात सही से प्रेजेंट नहीं कर पाती वहीं दूसरी ओर एक लड़की है जो दिखने में भले ही साधारण हो लेकिन उसे अपने काम की पूरी नौलेज है, वह आपनी बात को सही तरीके से कौन्फिडेंटली प्रेजेंट कर पाती है तो आप पक्का दूसरी लड़की से ही इंप्रेस होंगे.

जिंदादिली

कोई भी लड़की सुंदर है लेकिन वह एरोगेंट है किसी से सीधे मुंह बात नहीं करती ,चेहरे पर हमेशा बारह बजे रहते हैं तो आप भी बताइए क्या आप उसे पसंद करेंगे? वहीं एक साधारण दिखने वाली लड़की जो लोगों के साथ काफी गर्मजोशी से खुश हो कर मिलती है और लोगों के साथ उस का व्यवहार अच्छाम है तो यकीन मानिए यहां भी आप की चौइस दूसरी लड़की ही होगी.

स्मार्ट दिखना है अधिक जरूरी

खूबसूरती से ज्यादा जरूरी है किसी का भी स्मार्ट दिखना. कोई भी अगर कितना भी खूबसूरत हो लेकिन उसे ड्रैसिंग सेंस सही नहीँ हो, उसे किसी सिचुएशन को हैंडल करना नहीं आता हो, वह छोटीछोटी बात में पैनिक कर जाती हो, मेंटली स्ट्रौंग न हो, लोगों से बात करते समय आई कान्टेक्ट न करता हो, आप का बौडी पोस्चर सही न हो तो उसे कोई पसंद नहीं करेगा क्योंकि सिर्फ बाहरी खूबसूरती किसी काम की नहीं, अगर कोई स्मार्ट न हो.

स्मार्ट और अट्रैक्टिव दिखने के तरीके

अट्रैक्टिव और स्पैशल दिखने के लिए कुछ बातों को, कुछ खास आदतों को अपनी लाइफस्टाइल का हिस्सा बना कर, पर्सनैलिटी में शामिल कर के आप खुद को आसानी से निखार सकती हैं. लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर सकती हैं.

सेल्फ केयर रूटीन

भरपूर नींद लेने से ले कर डेली वर्कआउट और साफसफाई का सैल्फ केयर फार्मूला फौलो कर के पर्सनैलिटी में निखार लाया जा सकता है.

काम में एक्टिव रवैया

घर और औफिस के कामों में ढीलाढाला रवैया रखने की बजाय एक्टिव रेस्पोन्सिव और एनर्जेटिक रवैया रख कर अपने सैल्फ कान्फिडेंस को बूस्ट किया जा सकता है, आसपास के लोगों को इंप्रेस किया जा सकता है.

विनम्रता और शिष्टता

बाहरी खूबसूरती में निखार की जगह अपने साथ रहने वाले लोगों के साथ विनम्रता और शिष्टता से पेश आना सहानुभूति रखना, लोगों की ज्यादा से ज्यादा मदद करना किसी की भी पर्सनैलिटी को अट्रैक्टिव बनाएगा.

पौजिटिव एटीट्यूड

हर बात में निराशा, लोगों में कमियां ढूंढने के रवैये की जगह पौजिटिव एटीट्यूड की मदद से भी व्यक्तित्व को निखारा जा सकता है. ऐसे में हमेशा खुद की स्ट्रेंथ पर फोकस कर के और हर चीज को पौजिटिव सोच के साथ देख कर पर्सनैलिटी में निखार लाया जा सकता है.

रिश्तों और काम में ईमानदारी

कोई भी लड़की घर बाहर, औफिस में अपने काम, रिश्तों के प्रति ईमानदार और औनेस्ट एटीट्यूड फौलो कर के खुद को अट्रैक्टिव बना सकती हैं. ऐसा कर के वह दूसरों को आसानी से इंप्रेस कर सकती है और लोगों के सामने अपनी पौजिटिव इमेज भी बरकरार रख सकती है.

Mental Health: ऊब हो रही है तो टालिए मत, मनोचिकित्सक से जानें टिप्स

Mental Health Awareness : आज ही अखबार में खबर पढ़ी कि एक तकनीकी संस्थान में काम करने वाला नौजवान कभीकभार औटो चलाता है. उस के अनुसार, ऐसा वह अपनी बेचैनी तथा ऊब को कम करने के लिए करता है. उस के अनेक फोटो भी अखबार में प्रकाशित हुए जिन में वह खुशीखुशी औटो चला रहा है. सवारी को गंतव्य तक पहुंचा रहा है. ऊब होने का यह मनोभाव सचमुच विचारणीय है.

मन को ऊब किसलिए होने लगती है, यह टालने या नजरअंदाज कर देने की बात नहीं है. मनोचिकित्सक कहते हैं कि अचानक ही हर चीज से मन का उचट सा जाना इन दिनों एक सामान्य बात हो रही है. ऐसा लगभग हर किसी के साथ होता है. कुछ लोग अपनी दिनचर्या से इतने परेशान हो रहे हैं कि उन को हर बात से अरुचि सी होने लगी है. जब भी कोई चर्चा करो, अधिकांश का जवाब यह होता है कि सुबह चाय और कौफी गटक ली. नहाया. नाश्ता हो गया. वैब सीरीज देख ली. फोन ले कर सारे सोशल मीडिया के मंच पर जा कर दुनियाभर की चीजें देख लीं. अब मन अजीब हो रहा है.

इस का कारण साफ है. हम को एक ही बटन दबाने से सौ चैनल मिल रहे हैं. एक बटन दबाने से सौ तरह की फिल्मी गपशप का स्वाद मिल रहा है. कुछ खरीदना है तो एक बटन दबाया और सौ तरह की दुकानें सौ तरह के सामान हाजिर. इस से होता यह है कि यह मन बावला होने लगता है, भटकने लगता है. इसीलिए मन को झुंझलाहट होती है. जरूरत से अधिक मनोरंजन, जरूरत से अधिक सुखसुविधा भी मन को उचाट कर देती है. सुकरात ने तो सैकड़ों साल पहले ही कह दिया था कि अति हमेशा दुख देती है. कोई चीज जरूरत से अधिक मिल जाती है तो वह खुशी नहीं, बेचैनी देती है.

वैसे, मन का उचाट हो जाना उन के साथ भी अधिक होता है जो जीवन में कुछ करने की ख्वाहिश रखते हैं मगर वहां तक नहीं पहुंच पाते जहां पहुंचना होता है. सो, उन को भी ऊब तथा बेचैनी सी होने लगती है. अमेरिका के सुप्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने भी कहा था कि, “खुश मानव के 2 दुश्मन- उदासी और बोरियत- होते हैं. विश्व प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक सिगमंड फ्रायड के शिष्य मनोचिकित्सक ओटो फेनीशेल ने सिगमंड फ्रायड के साथ मिल कर इस ऊब तथा बोरियत पर अनगिनत प्रयोग किए थे.
ओटो फेनीशेल बोरियत के विस्तारित सिद्धांत को विकसित करने वाले पहले मनोविश्लेषकों में से एक थे. अपने लेख ‘औन द सायकोलौजी औफ बोरडम’ में उन्होंने ‘सामान्य’ और ‘पैथोलौजिकल’ बोरियत के रूप में बताया था. इन के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए फेनीशेल ने समझाया कि सामान्य बोरियत तब पैदा होती है जब हम वह नहीं कर सकते जो हम करना चाहते हैं या जब हम कुछ ऐसा करते हैं जो हम नहीं करना चाहते.

फेनीशेल ने जोर दे कर कहा कि दोनों ही स्थितियों में कुछ अपेक्षित या वांछित नहीं होता. यहां हम को खुद पर गौर करने की आवश्यकता होती है. जरा सा खुद पर विचार हम को बोरियत की जड़ तक ले आता है, तब समाधान भी मिलता है.

कई बार जो ऊब जैसा लगता है वह वास्तव में उस कार्य से बचने का बहाना होता है जिसे आप करना ही नहीं चाहते. ‘बोरडम – अ लाइवली हिस्ट्री’ के लेखक टूही पीटर कहते हैं, “बोरियत से उसी प्रकार की मानसिक थकान होती है जैसे निरंतर एकाग्रता वाले कामों में होती है.”

कभीकभी बोरियत होना स्वाभाविक है, लेकिन जब यह स्थायी मनोदशा बन जाए तो चिंताजनक है. बोरियत नकारात्मक विचारों की जड़ है. इस से व्यवहार में चिड़चिड़ापन आने लगता है. कार्यक्षमता और रिश्तों पर इस का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है. इस की वजह से व्यक्ति डिप्रैशन में भी जा सकता है. मनोवैज्ञानिक थार्नडाइक का कहना है कि कई बार ऐसा होता है कि जब हम बहुत ज़्यादा तनाव में होते हैं तो कामों को टालते रहते हैं. लगातार एकजैसा काम करने पर एक स्थिति यह आती है कि हम अपना काम कर ही नहीं पाते और इस के कारण अन्य कामों में मन नहीं लगता, तब भी हम को ऊब होने लगती है.

डाक्टर रोलो मे, एक मानववादी तथा मनोवैज्ञानिक थे. उन्होंने तर्क दिया कि ऊब महसूस करने की मानसिक स्थिति का जन्म बहुत छोटी उम्र से हो जाता है. सो, अप्रिय लगने के बावजूद आवश्यक है कि रचनात्मक और उत्साह से कैसे रहें, यह सीखें. उन्होंने कहा, “यदि आप एक सफल इंसान के रूप में बोरियत से बचने की चाहत रखते हैं, तो आप को सब से पहले इस का सामना करना सीखना है, स्वीकार करना है कि आप ऊब रहे हैं.

मनोविज्ञान के अनुसार, बोरियत से कुछ मनोभाव सीधेसीधे जुड़े हैं, मिसाल के तौर पर झुंझलाहट, बिखराव, अकेलापन, क्रोध, दुख और चिंता आदि. लगातार बोर रहने वाले व्यक्ति ज़्यादा खाते हैं. उन में मादक पदार्थों के सेवन सहित धूम्रपान व अपराध जैसे दुर्गुणों के बढ़ने की आशंका भी रहती है. अगर आप ऊब रहे हैं तो एक बार एकांत में बैठ कर खुद को परिभाषित करें कि आप को सब से अच्छा क्या लगता है.

सुप्रसिद्ध हौलीवुड स्टार व एंकर ओपेरा विन्फ्रे ने अपने एक साक्षात्कार में कहा था कि जब मन उचटता है तो वे कुछ बेक करती हैं, पकाती हैं या आइसक्रीम बनाती हैं. इस उपाय से उन का मन दुरुस्त हो जाता है. इसीलिए आप भी अच्छे लगने वाले कामों को पहचानें. फ़ुरसत के पलों में मोबाइल देखने के बजाय कोई अच्छी किताब पढ़ें, अपने दोस्तों से बातचीत करें, फूलों के पौधे लगाएं व गमलों को पेंट करें. घर की व्यवस्था व सजावट को बदल कर देखें.

हर वह काम जो सुखद तबदीली दिखाए, ऊब से बाहर निकलने में मदद करेगा. फूलों के पौधे भी इसीलिए सुझाए जाते हैं कि जब पौधे पर कलियां आती हैं, फूल खिलते हैं, तो मन प्रसन्न होता है. ऊबाऊ जीवनशैली को बदल लीजिए. महापुरुषों की जीवनगाथा को पढ़िए, आप को उम्मीद मिलेगी. कुदरत की सेवा कीजिए. सार्वजनिक जगह पर जा कर गपशप भी राहत देती है. राह चलते किसी अनजान से बात होने पर भी बहुत ख़ुशी मिलती है. कोई नई आदत पाल लें- नाचना, गाना, चित्रकारी, बागबानी आदि.
बोरियत लगभग सौ फीसदी लोगो को महसूस होती है. इसलिए इसे महसूस करते हुए डरें नहीं. इसे नजरअंदाज भी न करें. इसे ठीक से देखें और इस की आग पर अपने शौक व अपने हुनर का शीतल जल छिड़क दें. बोरियत या ऊब दुम दबा कर भाग जाएगी.

Hemant Soren घिरे अभिमन्यु की तरह, लेकिन जीते अर्जुन की तरह

Hemant Soren: झारखंड चुनाव नतीजों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को यूं ही हीरो नहीं बना दिया है बल्कि इस कामयाबी के पीछे उन की मेहनत के नंबर ज्यादा हैं. वे वोटर से लगातार कनेक्ट रहे और जेल में डाले जाने के बाद यह जिम्मेदारी उन की पत्नी कल्पना सोरेन ने संभाली जो राजनीति से दूर ही रहती थीं.

बटेंगे तो कटेंगे और एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे जैसे भड़काऊ भाजपाई नारों के मुकाबले झारखंड के वोटर ने तबज्जो दी इंडिया गठबंधन के इन दो नारों को, ‘हेमंत है तो हिम्मत है’ और ‘एक ही नारा हेमंत दुबारा’. ये नारे इतने असरदार साबित हुए कि इंडिया गठबंधन राज्य की 81 विधानसभा सीटों में से 56 सीटें जीत ले गया और एनडीए 24 पर सिकुड़ कर रह गया.

23 नवंबर को आए नतीजों ने बहुत सी बातों के साथ एक अहम बात यह साबित कर दी है कि इस बार भी चुनावी खेल में रांची की पिच पर मेन औफ द इलैक्शन निर्विवाद रूप से हेमंत सोरेन हैं. 24 नवंबर को रांची में लगे ये पोस्टर भी हर किसी को आकर्षित कर रहे थे जिन पर लिखा था – ‘सब के दिलों पर छा गया, शेरदिल सोरेन फिर आ गया.’

बात में और नारों दम है क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, केन्द्रीय कृषि मंत्री और झारखंड के चुनाव प्रभारी शिवराज सिंह चौहान के अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव और 24 X 7 नफरत व हिंदुत्व की आग मुंह से उगलते रहने वाले असम के मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा सहित 2 दर्जन धाकड़ भाजपा नेताओं ने हेमंत सोरेन की ठीक वैसे ही घेराबंदी कर रखी थी जैसी कि महाभारत की लड़ाई में कौरवों ने अभिमन्यु की की थी. लेकिन हेमंत सोरेन इस चक्रव्यूह को भेदते जंग के मैदान में आए तो बिना किसी कृष्ण की मदद के अर्जुन की तरह लड़े और जीते भी तो एक धुरंधर योद्धा की तरह जिस के सियासी तीरों के आगे ये भगवा शूरवीर कागजी शेरों की तरह ढेर हो गए.

महाराष्ट्र की जीत का जश्न मनाते एनडीए के मन में झारखंड की हार तय है कसक ही रही होगी क्योंकि लोकसभा चुनाव में भाजपा को यहां 14 में से 8 सीटें मिली थीं जबकि इंडिया गठबंधन 5 पर रुक कर रह गया था. इस नतीजे से उत्साहित भाजपा ने यह मान लिया था कि अब सत्ता में वापसी तय है क्योंकि वोटर का मन झामुमो और कांग्रेस से उचट रहा है और आदिवासी बाहुल्य इस राज्य में भी उसे वोट हिंदुत्व और राम मंदिर के नाम पर मिले हैं लिहाजा इस सिलसिले को जारी रखा जाए.

लिहाजा उस ने 31 जनवरी 2024 की रात मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जमीन घोटाले के एक केस में ईडी से उठवा लिया. तब सोचा यह गया था कि हेमंत के जेल में रहने से इंडिया गठबंधन टूट जाएगा और झामुमो भी बिखर जाएगा. ऐसा होना मुमकिन था लेकिन जैसे ही हेमंत की पत्नी कल्पना सोरेन अपना चलता छोटा सा स्कूल छोड़ पोलिटिकल यूनिवर्सिटी में उतरीं तो बाजी पलट गई.

खूबसुरत और आकर्षक कल्पना ने बेहद सधे ढंग से पार्टी की कमान संभाली और इस खेल को वहीं से खेलना शुरू किया जहां हेमंत छोड़ गए थे. झामुमो ने अपने भरोसेमंद सिपहसलार चम्पई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया और कल्पना गांवगांवव गलीगली घूम कर वोटर को यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहीं कि यह भाजपा की साजिश है और हमे आप से दूर करने रची गई है.

मई के महीने में झारखंड हाईकोर्ट ने हेमंत सोरेन को जमानत देते हुए साफतौर पर कहा था कि किसी भी रजिस्टर या रेवन्यू रिकौर्ड में उक्त जमीन के अधिग्रहण और भागीदारी में याचिकाकर्ता की प्रत्यक्ष भागीदारी का कोई जिक्र नहीं है, अदालत ने पाया है कि पीएमएलए ( प्रिवेंशन औफ मनी लांड्रिंग एक्ट ) की धारा 45 की शर्त पूरी करते हुए ये मानने के पर्याप्त कारण हैं कि याचिकाकर्ता कथित अपराध का दोषी नहीं हैं.

हेमंत के 5 महीने जेल में रहने के दौरान कल्पना ने ताबड़तोड़ तरीके से झारखंड के दौरे किए और वोटर को यह समझाने में कामयाब रहीं कि भाजपा आदिवासियों की हितेषी पार्टी नहीं है. और वह आप के बेटे, आप के भाई को आप से अलग करना चाहती है इसलिए उस ने झूठा आरोप लगा कर हेमंत को जेल भेज दिया. ये वही कल्पना सोरेन हैं जो पति के जेल जाने के पहले तक खुद को राजनीति और सार्वजनिक जीवन से जितना हो सके दूर रखती थीं. लेकिन मार्च के महीने से उन्होंने पति की लड़ाई संभाली तो आदिवासी तो आदिवासी गैर आदिवासियों ने भी उन्हें हाथोंहाथ लिया. पोलिटिकल कपल्स में ऐसी साझेदारी कम ही देखने में मिलती है. कल्पना के बात करने के लहजे से वही अपनापन और सहजता थी जो हेमंत सोरेन और उन के पिता शिबू सोरेन में है.

जेल से छूटने के बाद हेमंत सोरेन ने भी कोई ढिलाई या लापरवाही नहीं दिखाई और वे खासतौर से आदिवासियों को यह समझाने में सफल रहे कि अगर भाजपा जीती तो झारखंड को दिल्ली से चलाएगी. चुनाव प्रचार के दौरान हेमंत और कल्पना सोरेन ने 200 से भी ज्यादा रैलियां और सभाएं की. इस के पहले एक और नाटकीय लेकिन अपेक्षित घटनाक्रम में चम्पई सोरेन झामुमो छोड़ भाजपा में शामिल हो गए थे. क्योंकि झामुमो जेल से छूटे हेमंत को मुख्यमंत्री बनाना चाहती थी. तब भी भाजपा को लगा था कि अब तो राह और आसान है क्योंकि चम्पई सोरेन झामुमो के धाकड़ नेता हैं. उन के आने से बहुत न सही कुछ तो आदिवासी वोट पाले में आएंगे. लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं, उलटे चम्पई सोरेन के बेटे बाबूलाल सोरेन ही चुनाव हार गए. उन्हें घाटशिला विधानसभा सीट पर झामुमो के रामदास सोरेन ने 18 हजार से भी ज्यादा वोटों से शिकस्त दी.

भाजपा का यह भ्रम लोकसभा चुनाव में भी टूटा था जब सोरेन परिवार की बगावती बहू यानी हेमंत की भाभी सीता सोरेन भी भगवा खेमे में जा शामिल हुई थी. एवज में बतौर इनाम भाजपा ने उन्हें दुमका लोकसभा सीट से टिकट दे दिया था लेकिन झामुमो के नलिन सोरेन ने उन्हें 22 हजार से ज्यादा वोटों से हरा दिया था. फायदा तो भाजपा को बाबूलाल मरांडी की पार्टी जेवीएम के विलय का भी नहीं मिला जो 2019 के चुनाव में 3 सीटें जीती थी लेकिन इस बार जीत का जायका चखने को तरस गई. यानी झारखंड में सोरेन परिवार का कोई तोड़ भाजपा के पास नहीं है और न ही वह हेमंत सोरेन के कद और वजन का कोई नेता खड़ा कर पाई है. वोटर ने भाजपा नेताओं की इस बात पर भी कान नहीं दिए कि एक ही परिवार राज कर रहा है और भ्रष्टाचार कर रहा है. ‘कटेंगे तो बटेंगे’ और ‘एक रहेंगे तो सेफ रहेंगे’ जैसे नारे झारखंड में दम तोड़ते नजर आए क्योंकि आदिवासी समुदाय हिंदूमुसलिम में कोई भेद नहीं करता है और तो और वह खुद को हिंदू मानता ही नहीं.

पिछली जीत के बाद जब इस संवाददाता ने रांची में हेमंत सोरेन से उन के निवास पर बात की थी तो उन्होंने भी एक सवाल के जवाब में कहा था कि आदिवासी हिंदू नहीं हैं. ये इंटरव्यू सरिता व सरस सलिल दोनों पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए थे.

आज भी सभाओं में हेमंत आदिवासियों को मूल निवासी बताते हैं और खुद को धरतीपुत्र कहते हैं तो आदिवासी होने के कारण उन की कनेक्टिविटी आदिवासियों से और बढ़ती है. यही वजह है कि आदिवासी बाहुल्य 28 सीटों में से भाजपा गिरते पड़ते महज एक सीट ही जीत पाई. हकीकत तो यह भी है कि भाजपा ने कभी आदिवासियों की बुनियादी जरूरतों और समस्याओं को समझने की कोशिश ही नहीं की. वह सिर्फ हवाहवाई बातों से बहका कर ही उन के वोट झटकती रही है. यह टोटका 2014 के चुनाव में चल गया था तो भाजपा इसे धर्म ग्रंथों का मंत्र समझने की भूल कर बैठी. इसी के चलते उसे पिछले चुनाव के मुकाबले 3 सीट कम मिली और झामुमो की 30 से बढ़ कर 34 हो गईं.

इस चुनाव में भाजपा ने झारखंड के वोटरों को एक नया डर बांग्लादेशी घुसपैठियों का दिखाया. नरेंद्र मोदी से ले कर तमाम छोटेबड़े नेता इसे रट्टू तोते की तरह बोलते रहे. अव्वल तो इस बात कोई दम ही नहीं था और दूसरी वजह उपर बताई गई है कि आदिवासियों में खुद के हिंदू होने की फीलिंग ही नहीं है, लिहाजा उन्होंने इस से कोई सरोकार ही नहीं रखा.

दरअसल में दूसरे राज्यों की तरह भाजपा झारखंड में जो निगेटिव नेरेटिव सेट करना चाहती थी उस ने खासतौर से आदिवासियों को इतना अपसेट कर दिया कि इस चुनाव में भी उस से राम राम कर ली.

लेकिन हैरत इस बात की कि करारी शिकस्त के बाद भी भाजपा इस मरे मुद्दे को सीने से लगाए हुए है. इंडिया गठबंधन को जीत की बधाई देते हुए नरेंद्र मोदी ने इशारा कर ही दिया कि वह बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा छोड़ेंगे नहीं. यह एक तरह की खीझ और जिद ही है जिस के झारखंड में कोई माने नहीं. क्योंकि वहां इस मुद्दे पर वोट करने वाले सवर्णों की तादाद महज 10 फीसदी ही है जो बिना किसी ऐसे या वैसे मुद्दे के भी भाजपा को ही वोट देते हैं. 28 फीसदी आदिवासियों और 50 फीसदी के लगभग पिछड़े तबके के अधिकतर वोटरों ने भी इस मुद्दे पर ध्यान नहीं दिया. बचे 12 फीसदी ईसाई और आदिवासी शुरू से ही झामुमो के परम्परागत वोट रहे हैं.

जाहिर है 85 बनाम 15 का इंडिया गठबंधन का फार्मूला यहां चला जिसे हवा देने के लिए राहुल गांधी जातिगत जनगणना की अपनी बात दोहराते रहे. इस का फायदा भी इंडिया गठबंधन को मिला. सीटों और वोटों के मामले में कांग्रेस की स्थिति हालांकि 2019 के नतीजों जैसी ही रही लेकिन चौंकाया राजद ने जिस ने 4 सीटें जीत ली. माकपा माले को भी उम्मीद के मुताबिक 2 सीट मिलीं.

हेमंत सोरेन को एक बड़ा फायदा मैया सम्मान योजना का भी मिला जिस के तहत राज्य की कोई 16 लाख महिलाओं जिन की उम्र 19 से ले कर 49 साल के बीच है को 1000 रु महीना दिए जाते हैं. इसे बढ़ा कर उन्होंने ढाई 2500 करने का वादा किया तो औरतों के वोट उन पर बरस पड़े. 31 सीटों पर महिला वोटरों की खासी तादाद है उन पर महिलाओं की वोट फीसदी भी पुरुषों से ज्यादा रहा है. इन में से 30 इंडिया गठबंधन के खाते में गईं. यह कार्ड भाजपा ने सब से पहले मध्य प्रदेश में और फिर हालिया चुनाव में महाराष्ट्र में भी खेला था जिस का फायदा उसे भी मिला था.

आने वाले विधानसभा चुनावों में यह ट्रेंड ट्रम्प कार्ड ही साबित होगा लेकिन इन तीनों राज्यों के नतीजों से लगता है कि सत्तारूढ़ दल को ही इस का फायदा होता है क्योंकि सरकार चुनाव के 3 – 4 महीने पहले से महिलाओं के खाते में यह पैसा डालना शुरू कर देती है जिस से महिलाओं का भरोसा उस पर बढ़ता है. ऐसे में विपक्षी दल दोगुना तिगुना देने का भी वादा करें तो बात बनती नहीं क्योंकि महिला वोटर उन के वादों पर एतबार नहीं करती. दूसरी कई कल्याणकारी योजनाओं का फायदा भी हेमंत सरकार को मिला. मसलन मुफ्त 200 यूनिट बिजली देना और पुराने बिजली बिलों की माफी. कर्मचारियों को पुरानी पेंशन स्कीम बहाल करने के वादे ने भी झामुमो के वोट बढ़ाए.

इन सब चुनावी बातों और वादों से परे एक बात मील के पत्थर की तरह झारखंड के नतीजों से साबित हुई है कि अब जीतेगा वही जो मेहनत करेगा, वोटर के बीच जाएगा और किसी न किसी बहाने उन से कनेक्ट रहेगा. एयर कंडिशंड घरों में बैठ कर राजनीति करना अब पहले की तरह मुमकिन नहीं रह गया है और न ही वे नेता चुनाव जीत पा रहे जो चुनाव की घोषणा और टिकट मिलने के बाद कुछ ही दिन अपना पसीना बहाते हैं.

Up Byelection Result : उत्तर प्रदेश में ‘साइकिल’ और ‘हाथ’ की दूरी बनी हार की वजह

Up Byelection Result: केरल की वायनाड लोकसभा सीट पर कांग्रेस प्रत्याशी प्रियंका गांधी की 4 लाख से अधिक वोटों की जीत के बाद उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में आनंद भवन पर एक होर्डिंग लगी जिस में लिखा था ‘इंदिरा इज बैक’. वोटर अभी भी कांग्रेस से उम्मीद रखे हैं. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के साथ उपचुनाव में सपा ने जिस तरह का व्यवहार किया उस से लोकसभा में नंबर एक की पार्टी बनी सपा को भाजपा के मुकाबले मुंह की खानी पड़ी.

उत्तर प्रदेश की 9 विधानसभा सीटों पर उपचुनावों को 2027 के विधानसभा चुनाव का सेमीफाइनल माना जा रहा था. लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीत कर सपा उत्साह से लबरेज थी. कांग्रेस के साथ मिल कर इंडिया गठबंधन को 43 सीटें मिली थीं. उत्तर प्रदेश ने ही भाजपा को बहुमत के आंकड़े से दूर रखा था. इस जीत का श्रेय राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी को गया था. चुनाव के बाद दोनों नेताओं में दूरी बढ़ने लगी. अखिलेश यादव के करीबी लोगों ने उन को समझाया कि कांग्रेस को मिलने वाली सफलता का कारण सपा थी. कांग्रेस जैसेजैसे मजबूत होगी सपा वैसेवैसे कमजोर होगी. इस के बाद कांग्रेस और सपा के बीच बनी दोस्ती में दरार आने लगी.

हरियाणा और जम्मू कश्मीर के विधानसभा चुनाव में सपा-कांग्रेस के बीच सीटों का कोई तालमेल नहीं हुआ. जम्मू कश्मीर में सपा ने अपने प्रत्याशी चुनाव में उतारे. सपा को करारी हार का सामना करना पड़ा. इस के बाद महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनाव के साथ ही साथ उत्तर प्रदेश में उपचुनाव भी थे. सपा महाराष्ट्र में कांग्रेस से तालमेल कर सीटें चाहती थी. महाराष्ट्र में कांग्रेस के साथ एनसीपी और शिवसेना भी गठबंधन का हिस्सा थी. ऐसे में सपा के लिए बड़ी गुंजाइश नहीं बनी. इस का बदला अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में लेने की सोची. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 3 से 5 सीटें चाहती थी. सपा ने 2 सीटें दी उस में भी कई तरह की शर्तें थीं.

कांग्रेस के कारण सपा के साथ खड़ा था दलित

ऐसे में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में उपचुनाव लड़ने से इंकार कर दिया. अब चुनाव में सपा और कांग्रेस साथ होते हुए भी साथ नहीं थे. कांग्रेस का फोकस महाराष्ट्र, झारखंड और वायनाड सीट पर था. उस के नेता वहीं प्रचार करते नजर आए. उपचुनाव में कांग्रेस मंझवा और फूलपुर सीट अपने लिए चाहती थी. सपा कांग्रेस को खैर और गाजियाबाद सीट दे रही थी. असल में 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को दलित और मुसलिम वोट मिले थे. कांग्रेस के साथ होने के कारण ही दलित वोट सपा को मिले थे. ‘दलित और मुसलिम’ वोटों के एक साथ आ जाने से भाजपा को काफी नुकसान हुआ था.

दलित वोट की एक खासियत है कि वह कभी एकजुट हो कर समाजवादी पार्टी को वोट नहीं देता है. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के कारण सपा को दलित वोट मिल गए. उपचुनाव में कागज के ऊपर सपा-कांग्रेस का गठजोड़ बना था. चुनाव संचालन के लिए कमेटियां भी बनी थीं. इस के बाद सपा ने कांग्रेस के नेताओं को कोई महत्व नहीं दिया था. जिस के कारण कांग्रेस उत्तर प्रदेश में साइलेंट हो गई थी. जिस से चुनावी नतीजे इतने विपरीत आ गए.

2022 की विधान सभा चुनाव में इन्ही 9 सीटों में से 4 करहल, सीसामऊ, कटेहरी और कुदरकी पर सपा और 4 फुलपुर, गाजियाबाद, मंझवा और खैर पर भाजपा ने चुनाव जीता था. एक सीट मीरापुर लोकदल के खाते में गई थी. उस समय लोकदल सपा की सहयोगी पार्टी थी. 2022 के चुनावी नतीजों में देखें तो सपा के पास 5 और भाजपा के पास 4 सीटें थीं. 2024 में जब इन सीटों पर उपचुनाव हुए तो सपा के पास केवल 2 सीटें ही रह गई. जबकि 5 माह ही पहले सपा ने लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था. इस की मूल वजह दलित वोट रहा जो ‘पीडीए’ यानि पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक का नारा देने के बाद भी सपा के साथ खड़ा नहीं हुआ.

चुनाव प्रचार में नहीं दिखे सपा के सांसद

उपचुनावों में अखिलेश यादव ने पूरी मेहनत के साथ प्रचार किया. यह बात और है कि उन की पार्टी के दूसरे नेताओं ने उस तरह से प्रचार नहीं किया जैसे टोलियां बना कर भाजपा के लोगों ने प्रचार किया. भाजपा की टोलियों ने जमीनी स्तर पर सपा के जातीय गोलबंदी के खिलाफ प्रचार किया. ‘बंटेगे तो कटेंगे’ के नारे को लोगों के बीच ले गए. भाजपा ने इन टोलियों में उन नेताओं को कमान सौंपी जिन जातियों के वोट ज्यादा थे. सपा इस की काट नहीं कर पाई.

सपा को लग रहा था कि दलित उस के साथ हैं, मुसलिम भाजपा को वोट नहीं देगा और पिछड़े भी सपा के साथ हैं. ऐसे में उसे जीत के लिए कांग्रेस के कंधे की जरूरत नहीं है.

सपा का अति आत्मविश्वास उसे ले डूबा. उस ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए भाजपा को आक्सीजन देने का काम किया है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को ले कर जो विवाद भाजपा में था वह भी खत्म हो गया है. दलित और मुसलिम वोटर ने एक और संकेत दे दिया है कि वह सपा और बसपा की जगह पर दूसरे विकल्प की ओर भी देख रहा है. दलित भाजपा के साथ ही साथ चन्द्रशेखर की आजाद समाज पार्टी की ओर भी जा रहा है. इन उपचनावों में आजाद समाज पार्टी ने दलित वोटों को अपनी ओर खीचने का काम किया है.

सब से खराब हालत बहुजन समाज पार्टी की रही है. बसपा को कुदरकी में 1036, मीरापुर में 3248, करहल में 8409 और सीसामऊ में 1500 वोट मिले हैं. प्रदेश की तीसरे दर्जे की पार्टी की यह हालत बताती है कि दलित किस तरह से बसपा से दूर जा रहा है. इस के बदले आजाद समाज पार्टी को कुदरकी में 13,896, मीरापुर में 22,661, करहल में 2499 वोट मिले. दलित वोटर आजाद समाज पार्टी के बीच झुकता दिखा तो मुसलिम वोट ओबैसी की पार्टी एआईएमआईएम की तरफ झुकता दिखा. समाजवादी पार्टी को इस खतरे को समझ कर अपनी आगे की रणनीति बनानी चाहिए.

जिन जतियों ने लोकसभा चुनाव में अपना समर्थन सपा को दिया था अब उन की चिंता सपा को नहीं है. सपा के जीते सासंदों की बात करें या हारे हुए, जनता के बीच कोई नहीं जा रहा. उन की परेशानियों को हल करने की दिशा में पहल नहीं कर रहा. सपा में जातीय रूप से यादव सब से हावी रहते हैं. वह दूसरी पिछड़ी जातियों को सहन नहीं करते हैं.

सपा में परिवारवाद हावी है. वहां मुलायम परिवार ही नहीं दूसरे नेताओं के परिजनों को सब से ज्यादा टिकट दिए जाते हैं. जो पार्टी में विरोध के स्वर का मजबूत करता है. 9 विधानसभा सीटों के चुनाव में 3 टिकट परिवार के लोगों को दिए गए. करहल में तेज प्रताप यादव मुलायम परिवार का हिस्सा है. सीसामऊ से चुनाव लड़ी नमीस सोलंकी पूर्व विधायक इरफान सोलंकी की पत्नी थीं और कटेहरी से चुनाव लड़ी शोभावती वर्मा सांसद लालजी वर्मा की पत्नी हैं.

इन चुनावों में सपा ने 4 सीटों फूलपुर, सीसामऊ, कुदंरकी और मीरापुर में मुसलिम प्रत्याशी चुनाव मैदान में उतारे जिन के कारण चुनावी समीकरण गड़बड़ हो गया. सपा ने जिन दो सीटों पर जीत हासिल की उन में करहल में 14 हजार और सीसामऊ में 8 हजार से ही जीत हासिल हुई. लोकसभा चुनाव के मुकाबले विधानसभा चुनाव में सपा की सीट वितरण में कमी नजर आई, जिस की वजह से यह हार हुई है. इस से भाजपा लोकसभा चुनाव की हार के नैतिक दबाव से बाहर आ गई है.

सपा और कांग्रेस दोनों ही दलों में केवल राहुल गांधी और अखिलेश यादव से ही उम्मीद की जाती है कि वह जीत को थाली में परोस कर दे दें. भाजपा में जिस तरह से तीसरे और चौथे नंबर के नेता भी जीत के लिए मेहनत करते हैं उस तरह की मेहनत सपा-कांग्रेस के लोग नहीं करते हैं. ऐसे में दोनों ही दलों को नए सिरे से संगठन पर काम करने की जरूरत है. तभी यह उठ खड़े हो पाएंगे. 2024 की हार के 5 माह के अंदर ही भाजपा ने जो ‘कमबैक’ किया उस से दूसरे दलों को सीखने की जरूरत है.

बिन तेरे सब सून

इंद्रपत्नी की मृत्यु के बाद बेटी के साथ अमेरिका चले गए थे. 65 साल की आयु में जब पत्नी विमला कैंसर के कारण उन का साथ छोड़ गई तो उन की जीवननैया डगमगा उठी. इसी उम्र में तो एकदूसरे के साथ की जरूरत अधिक होती है और इसी अवस्था में वह हाथ छुड़ा कर किनारे हो गई थी.

पिता की मानसिक अवस्था को देख कर अमेरिकावासी दोनों बेटों ने उन्हें अकेला छोड़ना उचित नहीं समझा और जबरदस्ती साथ ले गए. अमेरिका में दोनों बेटे अलगअलग शहर में बसे थे. बड़े बेटे मनुज की पत्नी भारतीय थी और फिर उन के घर में 1 छोटा बच्चा भी था, इसलिए कुछ दिन उस के घर में तो उन का मन लग गया. पर छोटे बेटे रघु के घर वे 1 सप्ताह से अधिक समय नहीं रह पाए. उस की अमेरिकन पत्नी के साथ तो वे ठीक से बातचीत भी नहीं कर पाते थे. उन्हें सारा दिन घर का अकेलापन काटने को दौड़ता था. अत: 2 ही महीनों में वे अपने सूने घर लौट आए थे.

अब घर की 1-1 चीज उन्हें विमला की याद दिलाती और वे सूने घर से भाग कर क्लब में जा बैठते. दोस्तों से गपशप में दिन बिता कर रात को जब घर लौटते तो अपना घर ही उन्हें बेगाना लगता. अब अकेले आदमी को इतने बड़े घर की जरूरत भी नहीं थी. अत: 4 कमरों वाले इस घर को उन्होंने बेचने का मन बना लिया. इंद्र ने सोचा कि वे 2 कमरों वाले किसी फ्लैट में चले जाएंगे. इस बड़े घर में तो पड़ोसी की आवाज भी सुनाई नहीं पड़ती, क्योंकि घर के चारों ओर की दीवारें एक दूरी पैदा करती थीं. फ्लैट सिस्टम में तो सब घरों की दीवारें और दरवाजे इतने जुड़े हुए होते हैं कि न चाहने पर भी पड़ोसी के घर होते शोरगुल को आप सुन सकते हैं.

सभी मित्रों ने भी राय दी कि इतने बड़े घर में रहना अब खतरे से भी खाली नहीं है. आए दिन समाचारपत्रों में खबरें छपती रहती हैं कि बूढ़े या बूढ़ी को मार कर चोर सब लूट ले गए. अत: घर को बेच कर छोटा फ्लैट खरीदने का मन बना कर उन्होंने धीरेधीरे घर का अनावश्यक सामान बेचना शुरू कर दिया. पुराना भारी फर्नीचर नीलामघर भेज दिया. पुराने तांबे और पीतल के बड़ेबड़े बरतनों को अनाथाश्रम में भेज दिया. धोबी, चौकीदार, नौकरानी और ड्राइवर आदि को जो सामान चाहिए था, दे दिया. अंत में बारी आई विमला की अलमारी की. जब उन्होंने उन की अलमारी खोली तो कपड़ों की भरमार देख कर एक बार तो हताश हो कर बैठ गए. उन्हें हैरानी हुई कि विमला के पास इतने अधिक कपड़े थे, फिर भी वह नईनई साडि़यां खरीदती रहती थी.

पहले दिन तो उन्होंने अलमारी को बंद कर दिया. उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि इतने कपड़ों का वे क्या करेंगे. इसी बीच उन्हें किसी काम से मदुरै जाना पड़ा. वे अपनी कार से निकले थे. वापसी पर एक जगह उन की कार का टायर पंक्चर हो गया और उन्हें वहां कुछ घंटे रुकना पड़ा. जब तक कोई सहायता आती और कार चलने लायक होती, वे वहां टहलने लगे. पास ही रेलवे लाइन पर काम चल रहा था और सैकड़ों मजदूर वहां काम पर लगे हुए थे. काम बड़े स्तर पर चल रहा था, इसलिए पास ही मजदूरों की बस्ती बस गई थी.

इंद्र ने ध्यान से देखा कि इन मजदूरों का जीवन कितना कठिन है. हर तरफ अभाव ही अभाव था. कुछ औरतों के शरीर के कपड़े इतने घिस चुके थे कि उन के बीच से उन का शरीर नजर आने लगा था. एक युवा महिला के फटे ब्लाउज को देख कर उन्हें एकदम से अपनी पत्नी के कपड़ों की याद हो आई. वे मन ही मन कुदरत पर मुसकरा उठे कि एक ओर तो जरूरत से ज्यादा दे देती है और दूसरी ओर जरूरत भर का भी नहीं. इसी बीच उन की गाड़ी ठीक हो गई और वे लौट आए.

दूसरे दिन तरोताजा हो कर इंद्र ने फिर से पत्नी की अलमारी खोली तो बहुत ही करीने से रखे ब्लाउज के बंडलों को देखा. जो बंडल सब से पहले उन के हाथ लगा उसे देख कर वे हंस पड़े. वे ब्लाउज 30 साल पुराने थे. कढ़ाई वाले उस लाखे रंग के ब्लाउज को वे कैसे भूल सकते थे. शादी के बाद जब वे हनीमून पर गए तो एक दिन विमला ने यही ब्लाउज पहना था. उस ब्लाउज के हुक पीछे थे. विमला को साड़ी पहनने का उतना अभ्यास नहीं था. कालेज में तो वह सलवारकमीज ही पहनती थी तो अब साड़ी पहनने में उसे बहुत समय लगता था. उस दिन जब वे घूमने के लिए निकलने वाले थे तो विमला को तैयार हो कर बाहर आने के लिए कह कर वे होटल के लौन में आ कर बैठ गए. कुछ समय तो वे पेपर पढ़ते रहे और कुछ समय इधरउधर के प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते रहे. आधे घंटे से ऊपर समय हो गया, मगर विमला बाहर नहीं आई. वे वापस कमरे में गए तो कमरे का दृश्य देख कर जोर से हंस पड़े. कमरे का दरवाजा खोल कर विमला दरवाजे की ओट में हो गई. और वह चादर ओढ़े थी.

 

वे बोले, ‘‘अरे, अभी तक तैयार नहीं हुईं?’’

‘‘नहीं. मैं तुम्हारा इंतजार कर रही थी. तुम्हें कैसे बुलाऊं, समझ में नहीं आ रहा था.’’

‘‘क्यों, क्या हुआ?’’

‘‘ब्लाउज बंद नहीं हो रहा.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘हुक पीछे हैं और मुझ से बंद नहीं हो रहे.’’

‘‘तो कोई दूसरी ड्रैस पहन लेतीं.’’

‘‘पहले यह उतरे तो… मैं तो इस में फंसी बैठी हूं.’’

विमला की स्थिति देख कर वे बहुत हंसे थे. फिर उन्होंने उस के ब्लाउज के पीछे के हुक बंद कर दिए थे. तब कहीं जा कर उस ने साड़ी पहनी थी. ब्लाउज के हुक बंद करने का उन का यह पहला अनुभव था और वे इतना रोमांचित हो गए कि विमला के ब्लाउज के हुक उन्होंने फिर से खोल दिए. वह कहती ही रह गई कि इतनी मुश्किल से साड़ी बांधी है और तुम ने सारी मेहनत बेकार कर दी. उस के बाद जब भी वह इस ब्लाउज को पहनती थी तो दोनों खूब हंसते थे.

मगर आज हंसने वाली बहुत दूर जा चुकी थी. हनीमून के दौरान पहना गया हर ब्लाउज उन्हें याद आने लगा. सफेद मोतियों से सजा काला ब्लाउज तो विमला के गोरे रंग पर बेहद खिलता था. जिस दिन विमला ने यह ब्लाउज पहना था उस की उंगलियां उस की गोरी पीठ पर ही फिसलती रहीं.

तब वह खीज उठी और बोली, ‘‘बस करो सहलाना गुदगुदी होती है.’’

‘‘अरे, अपनी बीवी की ही तो पीठ सहला रहा हूं.’’

‘‘मैं ने कहा न गुदगुदी होती है.’’

‘‘अरे, तुम्हारी तो पीठ में गुदगुदी हो रही है यहां तो सारे शरीर में गुदगुदी हो रही है.’’

‘‘बस करो अपनी बदमाशी.’’

विमला की खीज को देख कर उन्होंने चलतेचलते ही उसे अपनी बांहों के घेरे में कस कर कैद कर लिया था और वह नीला ब्लाउज तो विमला पर सब से ज्यादा सुंदर लगता था. नीली साड़ी के साथ वह नीला हार और नीली चूडि़यां भी पहन लेती थी. उस की चूडि़यों की खनक इंद्र को परेशान कर जाती थी. विमला जितनी बार भी हाथ उठाती चूडि़यां खनक उठती थीं और सड़क चलता आदमी मुड़ कर देखता कि यह आवाज कहां से आ रही है.

इंद्र चिढ़ाने के लिए विमला से बोले, ‘‘ये चूडि़यां क्या तुम ने राह चलतों को आकर्षित करने के लिए पहनी हैं? जिसे देखो वही मुड़ कर देखता है. यह मुझ से देखा नहीं जाता.’’

तब विमला खूब हंसी और फिर उस ने मजाकमजाक में सारी चूडि़यां उतार कर इंद्र के हवाले करते हुए कहा, ‘‘अब तुम ही

इन्हें संभालो.’’ तब एक पेड़ की छाया में बैठ कर इंद्र ने विमला की गोरी कलाइयों को फिर से चूडि़यों से भर दिया था.

इतनी प्यारी यादों के जाल में इंद्र इतना उलझ गए और 1-1 ब्लाउज को ऐसे सहलाने लगे मानो विमला ही लिपटी हो उन ब्लाउजों में.

इंद्र बड़ी मुश्किल से यादों के जाल से बाहर आए. फिर उन्होंने दूसरा बंडल उठाया. इस बंडल के अधिकतर ब्लाउज प्रिंटेड थे. उन्हें याद हो आया कि एक जमाने में सभी महिलाएं ऐसे ही प्रिंटेड ब्लाउज पहनती थीं. प्लेन साड़ी और प्रिंटेड ब्लाउज का फैशन कई वर्षों तक रहा था. उन्हें उस बंडल में वह काला प्रिंटेड ब्लाउज भी नजर आ गया जिसे खरीदने के चक्कर में उन में आपस में खूब वाक् युद्ध हुआ था.

विमला को एक शादी में जाना था और उस की तैयारी जोरशोर से चल रही थी.

एक दिन सुबह ही चेतावनी मिल गई थी, ‘‘देखो आज शाम को जल्दी वापस आना. मुझे बाजार जाना है. शीला की शादी में मुझे काली साड़ी पहननी है और उस के साथ का प्रिंटेड ब्लाउज खरीदना है.’’

‘‘तुम खुद जा कर ले आना.’’

‘‘नहीं तुम्हारे साथ ही जाना है. उस के साथ की मैचिंग ज्वैलरी भी खरीदनी है.’’

‘‘अच्छा कोशिश करूंगा.’’

‘‘कोशिश नहीं, तुम्हें जरूर आना होगा.’’

‘‘ओ.के. मैडम. आप का हुक्म सिरआंखों पर.’’ पर शाम होतेहोते इंद्र यह बात भूल गए और रात को जब घर लौटे तो चंडीरूपा विमला से उन का सामना हुआ. उन्हें अपनी कही बात याद आई तो तुरंत अपनी गलती को सुधार लेना चाहा. बोले, ‘‘अभी आधा घंटा है बाजार बंद होने में. जल्दी से चलो.’’

‘‘नहीं, मुझे नहीं जाना. आधे घंटे में भी कोई खरीदारी होती है?’’

‘‘अरे, तुम चलो तो.

तुम्हारे लिए मैं बाजार फिर से खुलवा लूंगा.’’

‘‘बस करो अपनी बातें. मुझे पता है आजकल तुम मुझे बिलकुल प्यार नहीं करते. सारा दिन काम और फिर दोस्त ही तुम्हारे लिए सब कुछ हैं आजकल.’’

‘‘यही बात मैं तुम्हारे लिए कहूं तो कैसा लगेगा? अब तो तुम्हारे बच्चे ही तुम्हारे लिए सब कुछ हैं. तुम मेरा ध्यान नहीं रखती हो.’’

‘‘शर्म नहीं आती है तुम्हें

ऐसा कहते हुए? बच्चे क्या सिर्फ मेरे हैं?’’

विमला की आंखों में आंसू देख कर वे संभल गए और बोले, ‘‘अब जल्दी चलो. झगड़ा बाद में कर लेंगे,’’ और फिर उन्होंने जबरदस्ती विमला को घसीट कर कार में बैठाया और कार स्टार्ट कर दी थी.

पहली ही दुकान में उन्हें इस काले प्रिंटेड ब्लाउज का कपड़ा मिल गया. फिर ज्वैलरी शौप में काले और सफेद मोतियों की मैचिंग ज्वैलरी भी मिल गई. फिर वे बाहर ही खाना खा कर घर लौटे.

इसी बंडल में उन्हें बिना बांहों का पीली बुंदकी वाला ब्लाउज भी नजर आया. जब विमला ने पहली बार बिना बांहों का ब्लाउज पहना था तो वे अचरज से उसे देखते रह गए थे. फिर दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं उन्होंने महसूस की थीं. एक ओर तो वे विमला की गोल मांसल और गोरी बांहों को देखते रह गए, तो दूसरी ओर उन में ईर्ष्या की भावना भी पैदा हो गई. वे विमला को ले कर बहुत ही पजैसिव हो उठे थे इसलिए उन्होंने विमला से कहा, ‘‘मेरी एक बात मानोगी?’’

‘‘बोलो.’’

‘‘यह ब्लाउज पहन कर तुम बाहर मत जाना. लोगों की नजर लग जाएगी.’’

‘‘बेकार की बातें मत करो. मेरी सारी सहेलियां पहनती हैं. किसी को नजर नहीं लगती है. तुम अपनी सोच को जरा विशाल बनाओ. इतने संकुचित विचारों वाले मत बनो.’’

‘‘मुझे जो कहना था, कह दिया. आगे तुम्हारी मरजी,’’ कह कर वे बिलकुल खामोश हो गए.

विमला ने उन की बात रख ली और फिर कभी बिना बांहों वाला ब्लाउज नहीं पहना. उसी बंडल में 20 ब्लाउज ऐसे निकले जो बिना बांहों के थे. लगता था विमला ने एकसाथ ही इतने सारे ब्लाउज सिलवा लिए थे. पर अब देखने से पता चलता कि उन्हें कभी इस्तेमाल ही नहीं किया गया.

अब उन्होंने अगला बंडल उठाया. इस में तरहतरह के ब्लाउज थे. कुछ रेडीमेड ब्लाउज थे, कुछ डिजाइनर ब्लाउज थे, 1-2 ऊनी ब्लाउज और कुछ मखमल के ब्लाउज भी थे.

जब काले मखमल के ब्लाउज पर इंद्र ने हाथ फेरा तो वे बहुत भावुक हो उठे. जब विमला ने यह काला ब्लाउज पहना तो उन की नजर उस की गोरी पीठ और बांहों पर जम कर रह गई.

40 साल पार कर चुकी विमला भी उस नजर से असहज हो उठी और बोली, ‘‘कैसे देख रहे हो? क्या मुझे पहले कभी नहीं देखा?’’

‘‘देखा तो बहुत बार है पर इस मखमली ब्लाउज में तुम्हारी गोरी रंगत बहुत खिल रही है. मन कर रहा है कि देखता ही रहूं.’’

‘‘तो मना किस ने किया है,’’ वह इतरा कर बोली.

कुछ साडि़यां ब्लाउजों सहित हैंगरों पर लटकी थीं. एक पेंटिंग साड़ी इंद्र ने हैंगर सहित उतार ली. हलकी पीली साड़ी पर गहरे पीले रंग के बड़ेबड़े गुलाब बने थे. इस साड़ी को पहन कर 50 की उम्र में भी विमला उन्हें कमसिन नजर आ रही थी. उस की देहयष्टि इस उम्र में भी सुडौल थी. अपने शरीर का रखरखाव वह खूब करती थी. जरा सा मेकअप कर लेती तो अपनी असली उम्र से 10 साल छोटी लगती.

उधर इंद्र ने कभी अपने शरीर की ओर ध्यान नहीं दिया. उन की तोंद निकल आई थी. बाल तो 40 के बाद ही सफेद होने शुरू हो गए थे. बाल काले करने के लिए वे कभी राजी नहीं हुए. सफेद बाल और तोंद के कारण वे अपनी उम्र से 10 साल बड़े लगते थे.

तभी तो एक दिन जब उन के एक मित्र घर आए तो गजब हो गया. मित्र का स्वागत करने के लिए विमला ड्राइंगरूम में आई और हैलो कह कर चाय लाने अंदर चली गई. उस दिन विमला ने यही पीली साड़ी पहनी हुई थी. वह चाय की ट्रे रख कर फिर अंदर चली गई.

आधे घंटे बाद जब मित्र चलने लगे तो बोले, ‘‘यार तू ने भाभीजी से मिलवाया ही नहीं.’’

‘‘अरे अभी तो तुम्हें हैलो कह कर चाय रख कर गई थी.’’

‘‘वे भाभी थीं क्या? मैं ने समझा तुम्हारी बेटी है.’’

‘‘अब तुम चुप हो जाओ, नहीं तो मेरे से पिटोगे.’’

‘‘जो मैं ने देखा और महसूस किया, वही तो बोला. अब इस में बुरा मानने की क्या बात है? छोटी उम्र की लड़की से शादी करोगे तो बापबेटी ही तो नजर आओगे.’’

‘‘तुम मेरे मेहमान हो अन्यथा उठा कर बाहर फेंक देता.’’

दोनों की बातें सुन कर विमला भी ड्राइंगरूम में चली आई. फिर अपने पति के बचाव में बोली, ‘‘लगता है भाईसाहब का चश्मा बदलने वाला है. जा कर टैस्ट करवाइए. अब सफेद बालों और काले बालों से तो उम्र नहीं जानी जाती. आप मेरे पति का मजाक नहीं उड़ा सकते.’’

बात हंसी में उड़ा दी गई. पर हकीकत यही थी कि विमला अपनी उम्र से 10 साल छोटी और इंद्र अपनी उम्र से 10 साल बड़े लगते थे.

छोटे बेटे की शादी में सिलवाए ब्लाउज ने तो उन्हें हैरानी में ही डाल दिया. अधिकतर विमला अपनी खरीदारी स्वयं ही करती थी और स्वयं ही भुगतान भी करती थी. पर उस दिन दर्जी की दुकान से एक नौकर ब्लाउज ले कर आया और क्व800 की रसीद दे कर पैसे मांगने लगा. क्व800 एक ब्लाउज की सिलवाई देख कर वे चकित रह गए. उन्होंने रुपए तो नौकर को दे दिए पर विमला से सवाल किए बिना नहीं रह पाए.

‘‘तुम्हारे एक ब्लाउज की सिलवाई रू 800 है?’’

‘‘हां, है. पर तुम्हें इस से क्या मतलब? मेरे बेटे की शादी है, मेरा भी सजनेसंवरने का मन है.’’

‘‘इतना महंगा ब्लाउज पहन कर ही तुम लड़के की मां लगोगी?’’

‘‘आज तक तो कभी मेरे खर्च का हिसाब नहीं मांगा. आज भी चुप रहो भावी ससुरजी,’’ कह कर विमला जोर से हंस दी.

उन्हें तो उस ब्लाउज में कुछ विशेष नजर नहीं आया था पर विमला की सहेलियों के बीच वह ब्लाउज चर्चा का विषय रहा. उस ब्लाउज को देखते ही उन्हें विमला का वह सुंदर चेहरा याद हो आया, जो बेटे की शादी की खुशी में दमक रहा था.

फिर उन की नजर कुछ ऐसे ब्लाउजों पर भी पड़ी, जिन्हें देख कर लगता था कि उन्हें कभी पहना ही नहीं गया है. पता नहीं विमला को ब्लाउज सिलवाने का कितना शौक था. उन्हें लगा इतने ब्लाउज देख कर वे पागल हो जाएंगे. औरत का मनोविज्ञान समझना उन की समझ से परे था. पर अफसोस जिस विमला को ब्लाउज सिलवाने का इतना शौक था, वही विमला जीवन के आखिरी दिनों में ब्लाउज नहीं पहन सकती थी.

2 साल पहले उसे स्तन कैंसर हुआ और जब तक उस का इलाज शुरू होता वह पूरी बांह में फैल चुका था. उस से अपनी बांह भी ऊपर नहीं उठती थी. बीमारी और कीमोथेरैपी ने उस के गोरे रंग को भी झुलसा दिया था. 3 महीनों में ही वह अलविदा कह गई थी.

आज इंद्र उन्हीं ब्लाउजों के अंबार में बैठे यादों के सहारे कुछ जीवंत क्षणों को फिर से जीने का प्रयास कर रहे थे. पर कुछ समय बाद वे उठे और उन्होंने अपने नौकर को आवाज लगाई. कहा, ‘‘इस अलमारी के सारे कपड़ों को संदूकों में बंद कर के कार में रख दो.’’

सुबह होते ही इंद्र कार ले कर उस रेलवेलाइन जा पहुंचे और फिर दोनों संदूकों को मजदूरों के हवाले कर बहुत ही हलके मन से घर लौट आए कि विमला के कपड़ों से किसी की नग्नता ढक जाएगी.

प्रायश्चित्त

“राजकुमारी, वापस आ गई वर्क फ्रौम होम से? सुना तो था कि घर पर रह कर काम करते हैं पर मैडम के तो ठाठ ही अलग हैं, हिमाचल को चुना है इस काम के लिए.” बूआ आपे से बाहर हो गई थी मिट्ठी को अपनी आंखों के सामने देख कर.

 

“अपनाअपना समय है, बूआ. कोई अपनी पूरी ज़िंदगी उसी घर में बिता देता है जहां पैदा हुआ हो और किसी को काम करने के लिए अलगअलग औफिस मिल जाते हैं, वह भी मनपसंद जगह पर,” मिट्ठी ने इतराते हुए बूआ के ताने का ताना मान कर ही जवाब दिया.

बूआ पहले से ही गुस्से में थी, अब तो बिफर पड़ी, “सिर पर कुछ ज्यादा चढ़ा दिया है, तुझे. पर मुझे हलके में लेने की गलती मत करना. तेरी सारी पोलपट्टी खोल दूंगी भाई के सामने. नौकरी ख्वाब बन कर रह जाएगी. मुंह पे खुद ही पट्टी लग जाएगी.”

“आप से ऐसी ही उम्मीद है, बूआ. लेकिन कोई भी कदम उठाने से पहले सोच लेना कि मैं मां की तरह नहीं हूं, जो तुम्हारे टौर्चर से तंग आ कर अपनी जान से चली गई.”

बूआ मिट्ठी को मारने के लिए दौड़ी ही थी कि कुक्कू बीच में आ गया. उन्हें दोनों हाथों से पकड़ कर अंदर ले गया. तब तक गुरु भी आ गया था. वह मिट्ठी को उस के कमरे तक छोड़ कर आया. मिट्ठी आंख बंद कर के अपनी कुरसी पर बैठ गई. जो उस ने जाना था उस से भक्ति बूआ के लिए उस की नफ़रत और भी बढ़ गई थी. बचपन से ही उसे बूआ से नफ़रत थी. वजह, उन का दोगला व्यवहार. कुक्कू और गुरु को हमेशा प्राथमिकता देती. घर का कोई भी काम हो, मिट्ठी से करवाती और हर बात में उसे ही पीछे रखती. घर में खाना उन दोनों की पसंद का ही बनता था. मिट्ठी का कुछ मन भी होता तो उस में हज़ार कमियां बता कर बात को टाल दिया जाता. मिट्ठी को समझ नहीं आता था कि वह अपनी ससुराल में न रह कर उन के घर में क्यों रह रही है. सब के सामने उन का बस एक ही गाना था-

‘मां तो छोड़ कर चली गई अपने दोनों बच्चों को. वह तो मेरी ही हिम्मत है जो अपना घरबार छोड़ कर यहां पड़ी हुई हूं इन की परवरिश के लिए.’

‘अब तो हम बड़े हो गए हैं, अब तो अपना घर संभालो जा कर.’ मन ही मन मिट्ठी बुदबुदाती. घर में सबकुछ बूआ की मरजी से ही होता आ रहा था. मिट्ठी और उस का छोटा भाई कुक्कू उन की हर बात मानते आ रहे थे. बूआ का बेटा गुरु भी कुक्कू का हमउम्र था, इसलिए दोनों साथ ही रहते थे. लेकिन मिट्ठी को अब घर में रहना और बूआ के कायदेकानून से चलना बिलकुल पसंद नहीं आ रहा था. यही कारण था कि उस ने कालेज पूरा होते ही नौकरी ढूंढ ली थी. पैकेज ज्यादा नहीं था. नौकरी दूसरे शहर में थी. छह महीने होतेहोते कंपनी में उस की अच्छी साख बन गई थी. घर आने का उस का मन ही नहीं होता था. इस बार पापा से ज़िद कर के उस ने हिमाचल वाले फ्लैट में रहने का मन बनाया. वर्क फ्रौम होम ले लिया. कुक्कू को जैसे ही भनक लगी, तुरंत उस के पास आया.

“देखो दीदी, मैं जानता हूं, तू हिमाचल क्यों जा रही है. मां के बारे में जानने का मेरा भी उतना ही मन है जितना तुम्हारा. बस, मैं कभी दिखाता नहीं हूं. मेरी भी अब छुट्टियां हैं. मैं भी वहीं पर कोई इंटर्नशिप कर लूंगा.”

मिट्ठी को कुक्कू की बात सही लगी और उसे साथ ले जाने को तैयार हो गई. गुरु को उस के पापा ने अपने पास बुला लिया था, इसलिए दोनों भाईबहन अपनाअपना सामान ले कर रवाना हो गए. बूआ अपने बेटे गुरु को उन के साथ भेजना चाहती थी लेकिन पति को मना नहीं पाई. भौंहें तान कर मिट्ठी और कुक्कू को विदा किया.

“गगन, तूने भेज तो दिया हिमाचल पर कोई बीती बात बच्चों के सामने आ गई तो क्या होगा ? उसी फ्लैट में रुकने की क्या पड़ी थी, किसी होटल में भी तो रुक सकते थे. तुम तो सब कुछ भूल गए हो.” बूआ ने लगभग डांटते हुए अपने भाई गगन को अपनी बात समझाने की कोशिश की.

“दीदी, 20 साल बीत चुके हैं उस घटना को. हम ने कोई जुर्म नहीं किया है जो छिपे रहेंगे और बच्चों को उस फ्लैट से दूर रखेंगे. वे दोनों उसी फ्लैट में पैदा हुए थे. अपनी जन्मभूमि इंसान को अपनी ओर खींच कर बुला ही लेती है. आप डरिए मत. सब ठीक होगा.” गगन ने अपनी बड़ी बहन को समझाने की कोशिश की.

“मिट्ठी अब कब तक ऐसे ही बैठी रहेगी? चल उठ, नहा कर आ जा. नाश्ता ठंडा हो गया है. हम दोनों कब से तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं? मुझे भी सुनना है तुम लोग कैसे बिता कर आए हो मेरे बिना पूरा एक महीना.” गुरु मिट्ठी को बाथरूम भेज कर ही कमरे से बाहर गया.

“पापा मेरी कंपनी का एक औफिस शिमला में भी है. मैं ने सोचा है वहीं पर ट्रांसफर ले लेती हूं. अपना फ्लैट तो है ही वहां पर,” शाम को पापा घर आए तो मिट्ठी ने प्रस्ताव रखा.

“देखो बेटा, कुछ दिन वहां जा कर रहना दूसरी बात है और वहीं ठहर जाना बिलकुल अलग. तुम जहां हो, अभी वहीं पर रह कर काम करो,” पापा की स्पष्ट न थी.

“पापा, आप ने भी तो सालों वहां पर नौकरी की है. अपना फ्लैट बंद पड़ा है, मैं रहूंगी तो उस का अच्छे से रखरखाव भी हो जाएगा. फिर मेरा मन है वहां जा कर रहने का. प्लीज, एक बार मेरी तरह सोच कर देखो न,” मिट्ठी ने डरतेडरते अपनी बात दोहराई.

“तुझे सीधी तरह से कोई बात क्यों नहीं समझ आती है, लड़की? गगन वैसे ही उन बातों को याद करके परेशान हो जाता है, तुम हो कि खुद के अलावा किसी के बारे में सोचती ही नहीं हो. जा कर अपना काम करो,” बूआ ने अपने लहजे में मिट्ठी को डांटा. पापा के सामने मिट्ठी चुप रह जाती थी लेकिन आज उसे गुस्सा आ गया.

“आप से कौन बात कर रहा है, बूआ? पापा को ही जवाब देने दो. हिमाचल के नाम से इतना डर क्यों जाती हो? कहीं आप के कहने से ही तो पापा वापस नहीं आए वहां से, आप को इसी घर में जो रहना था?” गुस्से में मिट्ठी बोलती चली गई.

गुरु और कुक्कू आ कर उसे अपने साथ ले गए. घर में क्लेश पसर गया. उस रात किसी ने भी खाना नहीं खाया. गगन का गुस्सा शांत हुआ तो बेटी पर प्यार उमड़ पड़ा और उस के कमरे में आ गए. मिट्ठी लैपटौप पर कुछ काम कर रही थी. उसे देख कर गगन जाने के लिए वापस मुड़े, तभी बेटी ने आवाज़ लगाई.

“आइए पापा, मेरा काम तो पूरा हो गया है. बस, कुछ फोटो देख रही थी हिमाचल की.” गगन मिट्ठी के पास दूसरी कुरसी पर बैठ कर फोटो देखने लगे.

“यह फोटो तुम्हे कहां से मिली?” गगन, मिट्ठी, कुक्कू और नीतू की फोटो थी. मिट्ठी ने आश्चर्य से पापा को देखा, बोली, “फ्लैट के स्टोररूम में कुछ सामान पड़ा हुआ था. यह फोटो उस समान में ही थी.” मिट्ठी ने बताया तो गगन ने आगे पूछा, “बाकी सामान कहां है?”

“इस में है, पापा. आपकी और मम्मी की बहुत सारी यादें. मैं अपने साथ उठा लाई. मिट्ठी ने एक थैला गगन के हाथ में थमा कर दरवाज़ा बंद कर दिया. उसे डर था कि पापा को उन के कमरे में नहीं पाएंगी, तो भक्ति बूआ यहीं धमक पड़ेंगी. पापा जितनी देर घर में रहते हैं, उन की नज़र उन्हीं पर रहती है बूआ की, विशेष रूप से जब मिट्ठी आसपास हो तब. पापा उदास हो गए थे उन फोटो को देख कर, मम्मी के छोटेमोटे सामान को देख कर.

“कितना समझाता था कि छोटीछोटी बातों को दिल से लगाना ठीक नहीं लेकिन उसे तो बात की तह तक जाना होता था. क्यों कही, किस ने कही, क्या जवाब देना चाहिए था, बस, इसी में घुलती रहती थी.”

मिट्ठी को अच्छा लगा. बड़े दिनों बाद पापा ने मम्मी के बारे में खुल कर कुछ बोला था. पर अचानक पापा खड़े हो गए. “बेटा, तुम अपना काम करो, मैं चलता हूं. तुम्हारी बूआ ने दूध बना कर रख दिया होगा. उस के भी सोने का टाइम हो गया है. दिनभर काम में लगी रहती है.” दरवाजा बंद कर के पापा मिट्ठी के कमरे से बाहर निकल गए.

बूआ के लिए पापा की चिंता नई बात न थी. उन के एहसान में दबे हुए थे, पापा. उन के बच्चों की परवरिश कर के बूआ ने उन पर बड़ा एहसान चढ़ा दिया था. मिट्ठी ने सामान वापस समेट कर रख दिया. किसी और को पता चल जाता तो बात का बतंगड़ बन जाता. मां के बारे में घर में कोई भी बात नहीं करता था. कुक्कू के ऊपर बूआ अपना अतिरिक्त प्यार लुटाती थी, इसलिए उसे मां की कमी बस तभी महसूस होती जब मिट्ठी को रोते हुए देखता. मिट्ठी जब भी घर में होती उसे मां की कमी हर पल महसूस होती. बचपन के दिन याद आ जाते. मां कैसे हर जगह उसे साथ रखती थीं.

‘लड़के की इतनी परवा नहीं है जितनी लड़की की है. दिनभर इसी के चोंचलों में लगी रहती है. पढ़लिख कर दिमाग खराब हो जाता है छोरियों का. आखिर वंश तो लड़के से ही चलेगा. लड़की को तो एक दिन अपने घर चली जाना है.’ बूआ के ऐसे ताने से मां आहत होती लेकिन हंस कर जवाब देती.

‘दीदी, आप और मैं भी तो लड़कियां ही हैं. और फिर आप के घर का तो रिवाज़ है. आप अपनी ससुराल नहीं गईं तो मिट्ठी को भी यहीं रख लेंगे.’ मां के जवाब से बूआ आपे से बाहर हो जाती.

‘मेरी क्या रीस करनी है? मेरी तो मां बचपन में ही मर गई थी. गगन को अपने हाथों से पाला है मैं ने. कोई बूआ, चाची या ताई भी नहीं थी जो संभाल लेती. गगन ही नहीं जाने देता है. रहो अपने घर और ससुर की भी रोटी सेंको. मैं तो कल ही चली जाऊंगी अपने घर.’

मां फिर हंस पड़ती. ‘नाराज़ क्यों होती हो, दीदी? आप के भाई ही मुझे साथ ले कर गए हैं. मेरा तो मन भी नहीं लगता वहां. यहां छोड़ेंगे तो ससुरजी को रोटी नहीं, सब्जी भी खिलाऊंगी. रिटायर हो गए हैं, खुद ही सब काम करते हैं फिर भी. मुझे अच्छा नहीं लगता है.’

बूआ बात को पकड़ कर अपने पक्ष में कर लेती. ‘तो इसीलिए तो अपना घरबार छोड़ कर पड़ी हूं यहां. तुम अपना घर संभाल लेती तो गगन क्यों मुझे रोके रखता?’ कुछ भी कर के मां के सिर पर हर बात पटक दिया करती थी, बूआ.

 

कई सालों बाद इस बार नाना मिट्ठी के सामने ही आए. मां के जाने के बाद हर साल नाना दोनों नातियों से मिलने बेटी की ससुराल आते थे. न कोई उन से बात करता था और न ही कोई उन के पास बैठता था. अकेले आते थे और दोनों बच्चों को उन के हिस्से का चैक दे कर चले जाते थे. नाना ने अपनी वसीयत में अपने बेटे और बेटी को बराबर का हिस्सा दिया था. सालभर की कमाई का आधा हिस्सा बेटी के दोनों बच्चों को दे जाते थे उस के जाने के बाद.

‘कितना फजीता किया था हमारे परिवार का इस आदमी ने. अब लाड़ बिखेरने आता है, बच्चों पर. इस की बेटी गई तो पुलिस ले कर गया था फ्लैट पर. अखबार में भी खबर दी कि मार दिया मेरी बेटी को,’ नाना चले गए तो बूआ का बड़बड़ाना शुरू हो गया.

“वे हमारे नाना हैं, बूआ. उन के बारे में ऐसा सोचना ठीक नहीं,” कुक्कू ने बोला तो बूआ ऐसे शुरू हुई जैसे इंतज़ार ही कर रही थी.

“तेरे दादा और पापा को जेल की हवा खानी पड़ती. वह तो तेरी मां की मैडिकल जांच में नहीं निकला कि उस को मारा है किसी ने.” मिट्ठी चाहती थी कि बूआ और भी कुछ बोल दे. “आप तो तब फ्लैट पर ही थी बूआ. पूजा भी आप ने ही रखवाई थी और पंडित को भी आप ही ले कर गई थी. आप को तो सच पता था, फिर आप ने क्यों छिपाया यह सब.” बूआ आज़ पहली बार डर अपने चेहरे पर छिपा नहीं पाई.

“तुझे किस ने बताया यह सब?” मिट्ठी इसी सवाल का जवाब देना चाहती थी.

“आप के पंडित ने, उन सब लोगों ने जो पूजा में आए थे, पड़ोस वाले.” बूआ सीधे मिट्ठी के सामने आ कर खड़ी हो गई.

“इसीलिए मैं नहीं चाहती थी कि तू जाए वहां पर. यही सब कर के आई है वर्क फ्रौम होम के बहाने.” बूआ के हर शब्द से गुस्सा टपक रहा था.

“मम्मी, पापा आए हैं. थोड़ा ध्यान उन पर दो. अकेले बैठे हैं बैठक में.” गुरु बूआ को वहां से ले गया और मिट्ठी भी पीजी वापस जाने के लिए अपना सामान पैक करने चली गई. गुरु 2 साल से खाली घूम रहा था. छोटीमोटी नौकरी उसे समझ नहीं आती थी और बड़ी के लायक न तो उस में काबिलीयत थी और न ही उस ने कोशिश की. जैसेतैसे इंजीनियरिंग पास की थी.

“मां, मुझे उसी कंपनी में नौकरी मिल गई है जिस में मामा काम करते थे.” गुरु ने घोषणा की तो बूआ रसोई से लड्डू का डब्बा उठा कर ले आई. कुक्कू ने लड्डू खा कर डब्बा उन के हाथ से ले लिया.

“बूआ, तुम खा लो, फिर बैठक में ले जा रहा हूं और वहां से बच कर नहीं आएंगे.” बूआ रोकती रह गई पर कुक्कू डब्बा उठा कर भाग गया. मिट्ठी बिना कुछ कहे ही घर से निकल गई. बूआ ने रोकने की कोशिश नहीं की. पीजी में जाते ही बिस्तर पर लेट गई. हमेशा की तरह मां याद आ रही थी.

‘एक हफ्ता तुम्हारे बिना कैसे रहूंगी मां?’ मां पहली बार कुक्कू को ले कर नाना के घर गई तो मिट्ठी को पापा ने अपने पास ही रोक लिया था. रोतेरोते मुंह से निकल गया था मिट्ठी के. बाथरूम में चली गई मुंह धोने के लिए जिस से पीजी की बाकी लड़कियों को शक न हो. हर बार घर से आ कर एकदो दिन इसी तरह परेशान रहती थी मिट्ठी.

चार दिनों बाद ही पापा का फोन आया, देख कर मिट्ठी सोच में पड़ गई. पहली बार में तो फोन उठाना ही भूल गई. दूसरी बार जब आया तो उठाया, ‘बेटा, तुम्हारी भक्ति बूआ एक पूजा करवाना चाहती हैं. शिमला वाला फ्लैट तुम्हारी मां के जाने के बाद से बंद ही है. अब गुरु वहीं रहेगा, इसलिए पूजा कर के उसे पवित्र करवाना चाहती हैं. अगले रविवार को तुम भी थोड़ा समय निकाल लेना.”

“पापा, आप को पता है, मां जब से गई हैं, विश्वास उठ गया है मेरा पूजापाठ से.” मिट्ठी ने स्पष्ट किया.

“जानता हूं, बेटा. पर हो सकता है यह पूजा तुम्हारे टूटे विश्वास को जोड़ने में कामयाब हो जाए. ऐसा करते हैं, इस पूजा को तुम ही करवाओ. पंडितजी से तो मिल ही चुकी हो.” मिट्ठी समझ गई, वह मना नहीं कर पाएगी पापा को. तभी एक विचार उस के दिमाग में कौंधा.

“ठीक है पापा, कोशिश करती हूं. फ्राइडे तक आप को बताती हूं. भक्ति बूआ को बोलना अब उन के टैंशन के दिन गए. पंडितजी से मैं खुद ही बात कर लूंगी.”

 

पापा की खुशी फ़ोन पर ही फूट पड़ी. “अब उस का एहसान चुकाने का समय आ गया है. खुद को भुला कर उस ने हमारे घर को संभाला है. तुम ने यह ज़िम्मेदारी ले कर मेरे दिल का बोझ हलका कर दिया है.” पापा फ़ोन रखने ही वाले थे कि मिट्ठी ने कहा, “पापा, मैं चाहती हूं कि इस पूजा में नाना को भी बुलाऊं. मां के जाने के बाद नानी भी चली गईं. वे भी अकेले ही हैं. दादाजी भी गांव में चले गए हैं उस के बाद. प्लीज, उन दोनों को भी बुलाने दीजिए.”

कुछ देर तक पापा ने कुछ नहीं कहा लेकिन फ़ोन नहीं काटा. फिर यह कहते हुए फ़ोन रखा, “तुम कहती हो तो मना कैसे कर सकता हूं. बुला लो. भक्ति को मैं समझा लूंगा.”

मिट्ठी ने कमरे से बाहर आ कर आसमान की ओर देखा. उसे महसूस हुआ जैसे मां वहीं से मुसकरा कर कह रही है. “आखिर तुम ने रास्ता निकाल ही लिया सच से परदा उठाने का.” मिट्ठी केवल निर्देश दे रही थी और कुक्कू उस का पालन कर रहा था. पापा ने इस बार चौका लगाया था. “भक्ति दीदी, तुम इतने सालों से सब संभालती आ रही हो, अब मुझे भी कुछ करने का अवसर दो. इस बार पूजा की पूरी ज़िम्मेदारी मैं संभाल लूंगा. आजकल वैसे भी सब काम मोबाइल से हो जाते हैं. लंचटाइम में औफिस में बैठ कर सब प्रबंध कर दूंगा.”

भक्ति सकपका कर बोली, “गगन, क्या तू भी यही मानता है कि मेरी पूजा के कारण ही नीतू की जान गई?”

गगन ने दीदी का हाथ पकड़ लिया. “ऐसा कुछ नहीं है, दीदी. तुम ने मिट्ठी और कुक्कू के लिए कितनाकुछ किया है. मैं भी चाहता हूं कि गुरु को नौकरी मिलने और वहां सैट होने में मदद कर पाऊं. बस, इसीलिए आप को तनाव नहीं देना चाहता हूं.”

भक्ति का दिल भाई की बात मानने से इनकार कर रहा था लेकिन उसे मना भी नहीं कर सकती थी. “ठीक है, गगन. मुझे तो इस बात की खुशी है कि तू पूजा के लिए तैयार हो गया है. कितने साल हो गए, घर में कोई शुभ काम नहीं हुआ.”

“अब होगा दीदी और आप को परेशान भी नहीं होना पड़ेगा. बच्चे अब बड़े हो गए हैं. उन को भी ज़िम्मेदारी लेना सीखना चाहिए न. बस, इस बार उन की ही सहायता लूंगा.”

निश्चित तारीख पर सब लोग शिमला के उस फ्लैट में इकट्ठे  हो गए. दादाजी और नाना को कुक्कू ने मना लिया. सब काम तैयार हो गया तो मिट्ठी भी आ गई. पूजा शुरू हुई. पंडितजी ने हवन और आरती करने के बाद जैसे ही जाने को कहा, भक्ति बूआ ने आदतन उन्हें रोक लिया. “पंडितजी, गुरु की कुंडली देख कर बताइए कि क्या सावधानियां रखनी हैं और कुछ ऊंचनीच हो जाए तो क्या उपाय होगा?”

पंडितजी ने काफ़ी देर तक कुंडली को देख कर कुछ गणना की, फिर बोले, “गुरु मामा की छोड़ी हुई नौकरी पकड़ रहा है. उन्हीं के घर में रहेगा तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बहूरानी की आत्मा इन से संपर्क करे.” भक्ति बूआ ने तुरंत गुरु की कुंडली पंडितजी के हाथ से ले ली. लेकिन उन्होंने अपनी बात जारी रखी. “आज़ की पूजा में ही अगर कुछ मंत्र और पढ़ लिए जाएं और सच्चे दिल से बहूरानी को याद कर के उन से माफ़ी मांगी जाए तो बला टल सकती है.”

सब भक्ति बूआ की ओर देख रहे थे.

“तो जो सही है वो करो, मैं कौन सा मना कर रही हूं. इन बातों का कुछ मतलब थोड़े ही है.” बूआ उठ कर जाना चाहती थी लेकिन फूफाजी ने बिठा दिया.

“पंडितजी, जो बाकी है उस को भी पूरा कीजिए. बेटे को मुश्किल से रोज़गार मिला है, उस में कोई अड़चन न आए, उस का उपाय आप शुरू कीजिए.”

पंडितजी ने मंत्र पढ़ने शुरू किए. सबसे पहले नानाजी बोले. “नीतू बेटा, अगर तू सुन रही है तो मुझे माफ़ करना. मैं समय से तुम्हारी चिट्ठी नहीं पढ़ सका. तुम बच्चों को ले कर मेरे पास आना चाहती थीं लेकिन तुम्हारा खत मुझे तुम्हारे जाने के बाद मिला.”

अब पापा भी चुप नहीं रहे. पहली बार उन्होंने बच्चों के सामने अपनी पत्नी को ले कर कुछ कहा. “मैं भी खतावार हूं, नीतू. तुम्हारे मना करने पर भी मैं ने अपने बिजनैस के जनून के कारण नौकरी छोड़ी और तुम्हें तुम्हारे घर भी नहीं जाने दिया. मुझे डर था कि ससुराल में मेरी साख कम हो जाएगी.”

अब पंडितजी ने बोल कर सब को चौंका दिया. “हो सके तो माफ़ कर देना, बहूरानी. मैं नहीं जानता था कि तुम पूरे महीने व्रत कर रही थी. मैं ने ही भक्तिजी के कहने पर यह घोषणा की थी कि तुम्हारे कुंडली दोष के कारण ही गगन की नौकरी गई है और व्यवसाय भी शुरू नहीं हो पा रहा है. मुझे पता होता तो तुम्हें लगातार 3 दिन निर्जल, निराहार व्रत का उपाय न बताता.” सब की नजर भक्ति की ओर थी.

फूफाजी ने उन्हें कुछ बोलने के लिए हाथ से इशारा किया. भक्ति बूआ रोते हुए बोली, “नीतू, हो सके तो मुझे भी माफ़ करना. पंडितजी से बात कर के मैं ने ही वह पूजा रखी थी. मेरे कहने पर ही उन्होंने कुंडली देखी थी. दूध पीते बच्चे की मां ऐसी कठिन विधि नहीं अपना पाएगी यह जानते हुए भी मैं ने तुम पर दबाव बनाया.” बूआ बोल ही रही थी कि मिट्ठी बीच में बोल पड़ी.

“मां को 3 दिनों से उलटीदस्त हो रहे थे, फिर भी वे पूजा के काम में लगी रहीं और अपनी दवाई भी नहीं ले पाईं व्रत करने के कारण. अगर दवा लेतीं तो उन को हार्टअटैक न आता.”

आज़ पहली बार भक्ति बूआ ने मिट्ठी को घूर कर नहीं देखा.

नाना उठ कर खड़े हो गए. “बस, यही जानने के लिए मैं बेचैन था. अगर सही बात पता चल जाती तो मैं पुलिस के पास कभी न जाता. मेरी बेटी अचानक चली गई, अपनी नातियों से रिश्ता क्यों तोड़ता.”

कुक्कू ने नाना को पकड़ कर बिठा दिया और खुद भी उन के पास ही बैठ गया. फूफाजी ने भक्ति बूआ को वहां से उठा दिया और सामान ले कर चलने लगे. आज़ गगन ने उन्हें नहीं रोका.

बूआ खुद ही गगन के पास आई. “हो सके तो माफ़ कर देना, मेरे भाई. इसी एक गलती को सुधारने के लिए अपने घर नहीं गई.”

“पर मुझे तो सच बता देतीं, दीदी. जीनामरना अपने हाथ में नहीं है लेकिन मेरे विश्वास का कुछ तो मान रखतीं आप.”

भक्ति बूआ साड़ी के पल्लू में मुंह छिपा कर रो रही थी. फूफाजी ने आ कर पापा को सांत्वना दी.

“इस गलती की सज़ा अब मिलेगी इस को. अब यह तब तक तुम्हारे घर नहीं आएगी जब तक तुम बुलाओगे नहीं.” दादाजी उठने की कोशिश कर रहे थे लेकिन मिट्ठी ने उन्हें रोक दिया.

“भक्ति को विदा कर देता हूं, बेटा. शादी के 26 साल बाद ससुराल जा रही है. अब तो तू सब संभाल लेगी. उस को जाने दो.”

कुक्कू पंडितजी की ओर देख कर मुसकरा दिया. उन के प्रायश्चित्त पाठ ने वह कर दिखाया था जो सालों से कोई नहीं कर पाया था.

***

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