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नरबलि का यह कैसा अंधविश्वास

22 सितंबर को उत्तर प्रदेश के हाथरस से नरबलि की हैरान करने वाली घटना सामने आई, जहां सहपऊ क्षेत्र के गांव रसगवां के एक स्कूल में 8 साल के मासूम बच्चे कृतार्थ कुशवाह, जो उसी स्कूल में दूसरी कक्षा में पढ़ता था, की स्कूल प्रबंधकों ने बंधक बना कर हत्या कर दी.

पुलिस जांच में स्कूल के पीछे लगाए गए नलकूप से तंत्रमंत्र का सामान मिला, जिस से पुष्टि भी हुई कि स्कूल में काफी समय से तंत्रमंत्र की प्रैक्टिस की जाती थी. और इसी संबंध में कृतार्थ की बलि देने का प्लान भी बनाया गया था. स्कूल प्रबंधक का मानना था कि नरबलि देने से उन के स्कूल की तरक्की होगी. इस मामले में 5 लोगों को आरोपी बनाया गया, जिन में स्कूल संचालक शामिल है.

हम विश्वगुरु बनने का ढोल पीट रहे हैं जबकि देश की बड़ी आबादी अंधविश्वास, तंत्रमंत्र और टोनाटोटका से बाहर नहीं निकल पा‌ रही. समाज में यों तो तरहतरह के अंधविश्वास फैले हुए हैं मगर किसी अंधविश्वास के कारण यदि किसी की जान ले ली जाए तो इसे न्यायोचित कतई नहीं कहा जा सकता. अंधविश्वास के शिकार केवल पिछड़े और कम पढ़ेलिखे लोग ही नहीं, बल्कि पढ़ेलिखे लोग भी हो रहे हैं. तंत्र, मंत्र, साधना से रुपए बनाने का लालच दे कर एक नौजवान की नरबलि देने का एक ताजा मामला हाल ही में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले में देखने को मिला है.

मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के सिमरिया गांव में रहने वाला 22 साल का नौजवान अंकित कौरव किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित था. डाक्टरी इलाज के साथ वह गांव में झाड़फूंक करने वाले एक तांत्रिक के झांसे में आ गया. नागपुर में इलाज कराने के साथ ही वह झाड़फूंक का सहारा ले रहा था. जब वह बीमारी से ठीक हो गया तो उसे लगा कि तांत्रिक की झाड़फूंक ने उसे ठीक कर दिया है. इसी बीच, अंकित के बहनोई भी बीमारी से पीड़ित हो कर महीनों अस्पताल में भरती रहे जिस से काफी रुपए इलाज में खर्च हो गए. पैसों की तंगी से जूझ रहे इस नौजवान के पिता एक किसान हैं.

अंकित कौरव ने जब इस बात का जिक्र गांव में रहने वाले तांत्रिक सुरेंद्र कुशवाहा से किया तो तांत्रिक ने भरोसा दिलाया कि वह तंत्र साधना से रुपए बना सकता है. इस के लिए तांत्रिक अनुष्ठान में उसे हाथ की उंगली काट कर बलि चढ़ाना पड़ेगी. रुपयों की जरूरत के चलते अंकित कौरव उस पूजापाठ के लिए राजी हो गया. सुरेंद्र कुशवाहा ने अपने चचेरे भाई रम्मू कुशवाहा के साथ मिल कर तंत्रमंत्र के जरिए पैसा बनाने के लिए परिवार के इकलौते लड़के अंकित कौरव की नरबलि देने का षड्यंत्र रचा.

3 नवंबर, 2023 की शाम 7:30 बजे सुरेंद्र कुशवाहा और रम्मू कुशवाहा अंकित कौरव को ले कर गांव से बाहर आए. सीहोरा पुलिस चौकी क्षेत्र के टेकापार तिराहा पर गन्ना के एक खेत में आए. मौका पा कर सुरेंद्र कुशवाहा ने प्रसाद में नींद की गोलियां मिलाईं और पूजापाठ के दौरान अंकित कौरव को प्रसाद खाने को दिया. इस से अंकित कौरव बेहोश हो गया. मौका पा कर सुरेंद्र कुशवाहा और रम्मू कुशवाहा ने अपने साथ लाए बका से बेहोश पड़े अंकित कौरव की गरदन काट दी. इस के बाद दाहिने हाथ की उंगली भी काट कर अंकित कौरव के सिर के पास रख दी. इस से अंकित कौरव की मौके पर ही मृत्यु हो गई.

ऐसी अंधविश्वासी प्रथाएं हमारे धर्मग्रंथों में लिखी गईं कपोलकल्पित कथाओं के कारण भी जन्म लेती हैं. एक ऐसी ही श्रीकृष्ण से जुड़ी कहानी महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद की है, जिस में अर्जुन के अहंकार को तोड़ने व राजा मोरध्वज की परीक्षा लेने श्रीकृष्ण और अर्जुन साधु का चोला पहन कर जंगल से एक शेर को पकड़ कर ले गए. कहा जाता है कि राजा मोरध्वज विष्णु के परमभक्त और दानदक्षिणा देने वाले राजा थे.

वे अपने घर पर आए किसी को भी खाली हाथ और बिना भोजन के जाने नहीं देते थे. जब श्रीकृष्ण और अर्जुन को साधुओं की वेशभूषा में एक सिंह के साथ अपने घर पर देखा तो राजा नंगेपांव दौड़ कर द्वार पर गए और मेहमानों को उन का आतिथ्य स्वीकार करने के लिए कहा.

दोनों साधुओं ने मोरध्वज के सामने एक अजीब सी शर्त रखी कि हम तो ब्राह्मण हैं, कुछ भी खिला देना पर यह सिंह नरभक्षी है, तुम अगर अपने इकलौते बेटे को अपने हाथों से मार कर इसे खिला सको तो ही हम तुम्हारा आतिथ्य स्वीकार करेंगे. भला हो ऐसे भगवान का, जिस में भक्त को लेने के देने पड़ जाएं. साधुओं की शर्त सुन मोरध्वज स्तब्ध हो गए. फिर भी राजा अपना आतिथ्य धर्म नहीं छोड़ना चाहता था, इसलिए साधुओं को प्रसन्न करने और अपनी दानदक्षिणा वाली छवि को चमकाने के लिए राजा ने यह शर्त स्वीकार कर ली.

राजा ने जब सारा हाल पत्नी को बताया तो रानी की आंखों से अश्रु बह निकले. मगर पति को परमेश्वर मानने वाली रानी भी इस के लिए राजी हो ग‌ई. राजा और रानी ने खुद ही अपने 3 साल के पुत्र रतन कंवर को हाथों में आरी ले कर उस के 2 टुकड़े कर दिए और सिंह को परोस दिया. साधुओं ने छप्पन भोग का स्वाद चखा.

पर जब रानी ने पुत्र का आधा शरीर देखा तो वह अपने आंसू रोक न पाई. साधु इस बात पर गुस्सा हो गए कि लड़के का एक फाड़ कैसे बच गया. वे नाराज हो कर जाने लगे तो राजा और रानी उन से रुकने की मिन्नतें करने लगे. इतना सब देख कर अर्जुन का घमंड चूरचूर हो गया. अर्जुन के कहने पर श्रीकृष्ण ने राजारानी को क्षमा कर दिया. साधुओं की आज्ञा मान कर रानी ने पुत्र रतन कंवर को आवाज लगाई. कुछ ही क्षणों में उन का पुत्र जीवित हो गया.

इस तरह की कहानियां लोगों को धार्मिक भावनाओं में डुबो कर उन्हें अंधविश्वासी बनाती हैं. लोगों को लगता है कि किसी इंसान की बलि देने से देवीदेवता प्रसन्न हो जाएंगे और उन के मन की मुराद पूरी हो जाएगी.

दिसंबर 2021 की एक घटना मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले की है, जब एक पिता पर अंधविश्वास इस कदर हावी हो गया कि उस ने अपने 5 साल के मासूम बेटे की कुल्हाड़ी से काट कर निर्मम हत्या कर दी. पिता दिनेश दावर के अनुसार उसे गुरुमाता ने कहा था कि बेटा उस के घर के लिए अपशकुन है. इस अंधविश्वास पर भरोसा कर पिता ने ऐसा क्रूर कदम उठाया. हत्या करने के बाद बाप ने बच्चे को कई टुकड़ों में काटा और खेत में दफना दिया.

पिता को इस बात का शक था उस के बेटे पर भूतप्रेत का साया है. उस को लगता था कि उस के बेटे में कोई बुरी आत्मा का वास है जिस के चलते उस के घर में परेशानियां और अशांति रहती है. परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए उस ने अपने ही जिगर के टुकड़े को मार डाला.

अपने जिगर के टुकड़े को मारने की यह घटना ऋषि जमदग्नि के पुत्र परशुराम से प्रेरित लगती है, जिन्होंने अपने पिता की आज्ञा मान कर अपनी माता का सिर फरसे से काट दिया था. उन की माता रेणुका की ग़लती इतनी भर थी कि उन के पति ऋषि जमदग्नि ने उन्हें सरोवर से हवन के लिए जल लाने को भेजा था. रेणुका हवन के लिए जल लेने नदी तट पर गईं, तो वहां राजा गंधर्वराज चित्ररथ को अप्सराओं के साथ जलविहार करते देख वे इतनी मग्न हो गईं कि उन्हें याद ही नहीं रहा कि अपने पति की हवनपूजा के लिए जल ले कर जाना है. जब वे देरी से पहुंचीं तो उन के पति क्रोधित हो गए और उन्होंने अपने पुत्रों को अपनी मां को मारने का आदेश दिया.

परशुराम के 3 बड़े भाइयों ने पिता के बेहूदा आदेश को मानने से इनकार कर दिया. परशुराम सब से छोटे थे, उन्होंने आव‌ देखा न ताव और पिता की आज्ञा मान कर अपनी जन्म देने वाली मां का सिर काट दिया. पिता ने प्रसन्न हो कर परशुराम से 3 वरदान मांगने को कहा तो परशुराम ने अपनी मां को जीवित करने के अलावा 2 वरदान और मांग लिए. परशुराम की यह कहानी भी यही सीख देती है कि सहीग़लत का भेद किए बिना किसी की बलि चढ़ा देने से बिगड़े काम भी बन‌ जाते हैं.

नरबलि की ये घटनाएं बताती हैं कि आज भी हम किसी रोग के इलाज के लिए डाक्टर के बजाय तांत्रिकों पर भरोसा कर रहे हैं. इस तरह की मानसिकता के लिए काफी हद तक सरकार भी जिम्मेदार है. सब से ज्यादा पाखंड तो नेताओं ने ही समाज में फैला रखा है, उन्हीं का अनुकरण जनता करती रहती है.

तरहतरह के अंधविश्वास

हमारे देश ने आज वैज्ञानिक तरक्की के जरिए चंद्रयान भेज कर भले ही दुनियाभर में अपनी मजबूत पहचान बना ली है लेकिन 21वीं सदी में भारत में अंधविश्वास का बोलबाला है. मध्य प्रदेश के उज्जैन में आस्था के नाम पर अंधविश्वास का खेल चल रहा है. यहां लोग खुद को गायों के पैर तले रौंदवाते हैं वह भी खुशीखुशी. उज्जैन के बड़नगर में वर्षों पुरानी यह खतरनाक परंपरा निभाई जा रही है. दीपावली के बाद गोवर्धन पूजा के दिन मौत का यह खेल होता है.

इसी तरह मध्य प्रदेश के बैतूल में अंधविश्वास के चलते अपने बच्चों को गोबर में फेंकने की खतरनाक परंपरा है. हर साल गोवर्धन पूजा के दिन बैतूल के कृष्णपुरा वार्ड में गोवर्धन पूजा के बाद बच्चों को गोबर में इस विश्वास के साथ डाला जाता है कि वे सालभर तंदुरुस्त रहेंगे. पौराणिक कहानियों के मुताबिक, कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठा कर ग्वालों की रक्षा की थी, तभी से इस समाज में मान्यता हो गई कि गोवर्धन उन की रक्षा करते हैं और इसीलिए बच्चों को गोबर में डाला जाता है.

दीपावली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा होती है और इस के लिए काफी पहले से तैयारी की जाती है. ग्वाला समाज के लोग गोबर एकत्रित करते हैं और उस से बड़े आकार में गोवर्धन बनाए जाते हैं, फिर उस की सामूहिक पूजा की जाती है. पुरुष और महिलाएं नाचतेगाते हुए विधिविधान से पूजा करते हैं, उस के बाद बच्चों को गोबर से बने गोवर्धन में डाला जाता है. गोबर के बीच रोतेबिलखते मासूम बच्चों को देख कर किसी का भी दिल भर आए, पर उन के मांबाप को ही उन पर दया नहीं आती.

जब से देश में संचार के अत्याधुनिक साधनों का इस्तेमाल बढ़ा है, तो अंधविश्वास के नएनए तरीके भी ईजाद हो गए हैं. पीलिया रोग होने पर हम डाक्टर को दिखाने के बजाय तांत्रिकों की झाड़फूंक में जान गंवा देते हैं. आंख आने (कंजंक्टिवाइटिस रोग होने) पर अब मोबाइल फोन पर झाड़फूंक होने लगी है, तो सांपबिच्छू के काटने पर अस्पताल जाने के बजाय गुनियाओझा के पास पहुंच कर उपचार तलाशते हैं. टैलीविजन चैनलों के माध्यम से मनोकामना पूर्ण करने वाले महंगे यंत्रतंत्र और रत्नजड़ित अंगूठी के विज्ञापन और ज्योतिष बताने वाले कार्यक्रम भी यही सिद्ध करते हैं कि अंधविश्वास और चमत्कारों के पीछे भागने वाले पागल लोगों की भीड़ में मध्यवर्गीय शिक्षित और सम्मानजनक पेशे से जुड़े उच्च अधिकारी, नेताओं, मंत्रियों की तादाद अधिक है.

टोनाटोटका भी जोरों पर

देश ने चाहे कितनी प्रगति कर ली हो और शिक्षितों की आबादी भले ही तेजी से बढ़ रही हो पर अंधविश्वास की काली साया से वह अब तक मुक्त नहीं हो पाया है. लोगों को अंधविश्वास की काली कोठरी से निकालने के लिए की गईं सारी कवायदें बेअसर साबित हुई हैं. जनवरी 2023 में बलरामपुर जिले में आधा दर्जन लोगों ने मिल कर 54 वर्षीय लाली कोरवा को पीटपीट कर मार डाला. आरोपी मंगलसाय, बंधन, भगतू, बलसा, सकेंद्रा को शक था कि लाली जादूटोना करती है. फरवरी 2023 में धमतरी में एक युवक ने अपने ही तांत्रिक गुरु की हत्या कर उन का खून पिया और फिर लाश को जलाने की नाकाम कोशिश की. उसे बताया गया था कि गुरु को मार कर उस का खून पी लेने से उस की सभी शक्तियां उसे मिल जाएंगी.

मार्च 2023 में छत्तीसगढ़ में एक मां द्वारा अपने दुधमुंहे शिशु की बलि दी गई थी. महिला का पति शराब पी कर उसे परेशान करता था. इस वजह से उस का दिमागी संतुलन बिगड़ गया. इलाज के लिए उसे तांत्रिक के पास ले जाया गया तो तांत्रिक ने कहा कि किसी छोटे बच्चे की बलि देने से उस की समस्या हल हो सकती है. तांत्रिक के कहने पर उस ने अपने 6 माह के बच्चे को गांव के तालाब में आधी रात में फेंक दिया था और पुलिस को गुमराह करने के लिए बच्चे के लापता होने की झूठी रिपोर्ट पुलिस में दर्ज करा दी.

अंधविश्वास, टोनाटोटका और तंत्रमंत्र के नाम पर हत्या की यह कोई पहली घटना नहीं है. इस से कुछ ही दिनों पहले दुर्ग जिले के करहीडीह गांव में पतिपत्नी ने मिल कर अपनी भाभी पर टोनही होने का आरोप लगाया. इस के बाद उसे एक तांत्रिक के पास ले जाया गया जिस ने उसे बुरी तरह पीटा, उसे कीलों और अंगारों पर चलाया. वह इतना जख्मी हो गई कि उसे अस्पताल में भरती कराना पड़ा. 24 मार्च, 2023 को कांकेर जिले के कोयलीबेड़ा की वनोपज सहकारी समिति के अध्यक्ष सोनसाय दुग्गा की हत्या पीटपीट कर कर दी गई. आरोपियों का कहना था कि सोनसाय उन की पत्नियों पर जादूटोना करता है जिस के कारण वे बीमार रहती हैं.

पाखंड की जड़ है धर्म

देशभर में होने वाली इन पाखंडी घटनाओं की जड़ हमारे धर्म में है. हमारे धर्मग्रंथ हमें तार्किक बनाने के बजाय अंधविश्वास सिखाते हैं.

अंधविश्वास की जड़ों में मठा डालने का काम धर्म के ठेकेदार कथावाचक, पंडापुजारियों, मौलवियों द्वारा बखूबी किया जा रहा है.

पद्मपुराण, अग्निपुराण में भी नरबलि का उल्लेख मिलता है. अग्निपुराण में कहा गया है कि युद्ध में विजय प्राप्त करने के लिए नग्न हो कर, शिखा खोल कर दक्षिण की ओर मुख कर के रात में श्मशान में लकड़ी के लट्ठों से प्रज्वलित अग्नि में मानव मांस, रक्त और विष, अनाज के भूसे, हड्डी के टुकड़े मिला कर शत्रु का नाम 108 बार बोल कर आहुति देना चाहिए.

अग्निपुराण में कहा गया है कि ‘देवी सिगरा (त्वरिता) की पूजा कपड़े पर या छवि में या वेदी पर की जानी चाहिए. मंत्र के जाप के साथ आहुति के लिए सौ, हजार या दस हजार की गिनती होती है. इस प्रकार दोहराने के बाद भैंस, बकरी या मनुष्य के शरीर की चरबी और मांस से एक लाख बार आहुति देनी चाहिए.” वामन पुराण में उल्लेख है कि एक धर्मात्मा राजा गय ने सैकड़ोंहजारों बार नरबलि दी.

हमारे धर्मग्रंथों और तथाकथित धर्मगुरुओं ने लोगों के मन में पापपुण्य को ले कर ऐसी बातें भर दी हैं कि चाहे जितने भी पाप करो, मगर नदियों में डुबकी लगा कर देवीदेवताओं की पूजा और पंडितों को दानदक्षिणा दोगे तो सीधे स्वर्ग (यदि कहीं है तो) का टिकट हासिल हो जाएगा. स्वर्गलोक या कहें कल्पनालोक जाने की इसी कामना में अंधभक्त कथापुराण का आयोजन कराते हैं, पंडितों को दानदक्षिणा दे कर बड़ेबड़े भंडारा कराते हैं.

धार्मिक कथाकहानियों को सुन कर जयपुर में आमेर किले के भव्य मंदिर में विराजमान महिषासुरमर्दिनी अष्ठभुजी माता शिला देवी बरसों पहले नवरात्रों की सप्तमी और अष्ठमी की मध्य रात्रि में निशा पूजन के बाद बकरों और भैंसों की बलि दी जाती थी. आमेर नरेश मानसिंह के बारे में किंवदंती है कि उन्होंने देवी को नरबलि भी दी थी. असम के कामाख्या देवी मंदिर और छत्तीसगढ़ के दंतेश्वरी देवी के मंदिरों में नरबलि देने की घटनाएं समाचारों की सुर्खियां बनती रहती हैं.

शासनप्रशासन की मदद से फलफूल रहा अंधविश्वास

देश में सरकारी तंत्र अंधविश्वास रोकने के बजाय फैलाने में अहम भूमिका निभा रहा है. पांढुरना का गोटमार मेला हो या हिंगोट युद्ध, सभी में पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बन कर इन‌ दकियानूसी परंपराओं को खादपानी देने का काम कर रहा है. कोविड 19 वायरस को भगाने के लिए जब दीपक जला कर ताली और घंटेघड़ियाल बजाने का टोटका देश के प्रधानमंत्री खुद ही जनता को बताते हों, उस देश में वैज्ञानिक सोच भला कैसे विकसित होगी.

देश के नागरिकों की बुनियादी आवश्यकता शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और सड़क की है. इस के लिए सरकार को इंजीनियरिंग और मैडिकल कालेज खोलने के साथ साफ पानी और भरपूर बिजली के साथ कहीं भी आनेजाने के लिए अच्छी सड़कें मुहैया कराने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए, मगर विडंबना यह है कि सरकार इन सब को छोड़ कर बड़ीबड़ी मूर्तियां और मंदिर बनाने पर तुली हुई है.

धार्मिक रंग में पूरी तरह रंगी सरकार की सोच यह है कि देश के पढ़ेलिखे नौजवानों को नौकरी के बजाय धार्मिक रैली, जुलूस, कांवड़यात्रा, भंडारे और आरती में उलझा कर उन्हें तार्किक न बनने दिया जाए. यही वजह है कि आज भी देश में अंधविश्वास और दकियानूसी परंपराओं का बोलबाला है.

उज्जैन में अघौरी बाबाओं द्वारा की जाने वाली तंत्र साधना और टीवी चैनलों द्वारा किया जाने वाला सीधा प्रसारण समाज में अंधविश्वास और पाखंड को फलनेफूलने में खादबीज का काम कर रहा है. चंद्रगृहण और सूर्यगृहण को आज भी लोग खगोलीय घटना न मान कर धर्म और आस्था से जोड़ कर अपनी अंधभक्ति का प्रमाण दे रहे हैं. अखबारों में रोज राशिफल देखने वाले और जन्मकुंडली में गृहदशा सुधारने के लिए ज्योतिषियों के चक्कर लगाने वाले लोग विज्ञान और आधुनिक टैक्नोलौजी पर बड़ीबड़ी तार्किक बातें तो करते हैं लेकिन अंधविश्वास और पाखंड के चक्रव्यूह गहरे फंसे हुए हैं.

समाचारपत्रों में तांत्रिकों द्वारा बच्चों की बलि देने या महिलाओं का यौनशोषण करने, डायन होने का आरोप लगा कर महिलाओं की हत्या करने तथा झाड़फूंक, जादूटोना और गंडा-ताबीज द्वारा लोगों को ठगने की खबरें अकसर आती रहती हैं. अखबारों में बंगाली बाबा, तांत्रिक, चमत्कारी पुरुष, ज्योतिषाचार्य के विज्ञापन तो छपते ही हैं.

अंधविश्वास को बढ़ावा देने में कट्टरपंथी हिंदुत्ववादियों का रोल काफी अहम है. अंधविश्वास और धार्मिक पाखंडों का यदि कोई विरोध करने का प्रयास करता है, तो ये कट्टरपंथी उन पर हमला कर उन की जान लेने पर आमादा हो जाते हैं. पिछले कुछ सालों में अंधविश्वासों के विरुद्ध अभियान चलाने वाली गौरी लंकेश की कर्नाटक में तथा गोविंद पंसारे व नरेंद्र दाभोलकर की महाराष्ट्र में हत्या कर दी गई. जांच करने पर यह पाया गया कि इन के हत्यारे दक्षिणपंथी तथाकथित हिंदुत्ववादियों के समर्थक थे. कई स्थानों पर कट्टर इसलाम के प्रचारकों ने भी अंधविश्वासों के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाने वालों पर हमले किए. जैसे, अफगानिस्तान में तालिबानियों ने पोलियो के विरुद्ध चलाए गए अभियान के विरुद्ध दुष्प्रचार किया व दवा पिलाने वालों की हत्या तक कर दी थी.

महाराष्ट्र में बना है अंधविश्वास रोकने का कानून

आज भी समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो झूठे चमत्कार दिखा कर लोगों को ठगते हैं. अधिकांश लोगों ने अपने जीवन में कभी न कभी इस तरह के चमत्कारों के फेर में पड़ कर धोखा खाया है. अंधविश्वास रोकने के लिए कानून पूरे भारत में केवल महाराष्ट्र में लागू किया गया है. इस कानून को लागू करवाने में अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष श्याम मानव ने बड़ी मेहनत से काम किया है और इस के लिए उन्हें पूर्व न्यायाधीश बी जी कोलसे पाटिल और पी बी सावंत का समर्थन भी मिला है.

यह कानून कई वर्षों के कठिन संघर्ष के बाद बनाया गया है. महाराष्ट्र की तरह यह कानून देश के बाकी राज्यों में लागू होना चाहिए, ताकि लोगों को धोखा देने वाले पाखंडी बाबा और तांत्रिकों को सबक सिखाया जा सके.

महाराष्ट्र में 2013 से जादूटोना विरोधी कानून बना हुआ है. इस जादूटोना विरोधी कानून में कुल 12 धाराएं हैं. ये 12 धाराएं इस पूरे कानून की प्रकृति बताती हैं कि कानून तोड़ने के लिए क्या किया जाता है और कानून तोड़ने की सजा क्या है. इस अधिनियम के साथ एक अनुसूची दी गई है. अनुसूची में उल्लिखित 12 विषयों में से 12 का उल्लंघन करने पर कम से कम 6 महीने की सजा और 5,000 रुपए का जुर्माना व अधिकतम 7 साल और 50,000 रुपए का जुर्माना हो सकता है. साथ ही, यह अपराध संज्ञेय और गैरजमानती है. इसलिए आरोपी को थाने से जमानत नहीं मिल सकती. उसे अदालत से जमानत लेनी होगी और दोषी पाए जाने पर आरोपी को कारावास और आर्थिक दंड दोनों का सामना करना पड़ेगा. मानव बलि और अन्य अमानवीय, घृणित और अवांछनीय प्रथाओं व जादूटोना पर वितरण, प्रकाशन, प्रेरणा और सहयोग करना कानून के तहत एक अपराध है. यह अफवाह फैलाना भी अपराध है कि कुछ जगहों पर चमत्कार हो रहे हैं.

अंधविश्वास के चलते हुई ये घटनाएं यह साबित करती हैं कि अंधविश्वास हमारे आसपास चारों ओर बिखरा पड़ा है. इन में बिल्ली का रास्ता काटना, रास्ते में खाली घड़ा दिखाई देना, शुभकार्य के दौरान विधवा या बांझ के दर्शन होना, पूजापाठ के दौरान दीपक का बुझ जाना, घाव में कीड़े पड़ना, कुत्ते का रोना, दरवाजे पर नीबूमिर्च, काला कंगन, लाल रिबन या काला पुतला टांगना, दूल्हे को लोहा पकड़ाना, खाट या चप्पलों का उलटा पड़ा होना, बरतनों का टकराना, दूध का फटना, टूटे हुए आईने में शक्ल देखना, कछुआ या कछुए की मूर्ति घर में रखना आदि भी अंधविश्वास की श्रेणी में आते हैं. इन का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. विज्ञान पढ़नेपढ़ाने मात्र से कुछ नहीं होता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण पैदा करना जरूरी है.

मौर्निंग सैक्स के फायदे

प्यार करने वालों को कहां पता होता है कि प्यार करने का भी कोई वक्त होता है, उन्हें तो बस प्यार करने से मतलब होता है. आजकल के कपल्स सैक्स को सिर्फ एक प्रोसेस न समझ कर सैक्स को अच्छे से ऐंजौय और पूरी फील के साथ करने में विश्वास रखते हैं और इस के लिए कुछ कपल्स तो पूरी रिसर्च करते हैं कि सैक्स को किस तरफ से ऐंजौय किया जा सकता है.

मौर्निंग सैक्स के हैं बहुत फायदे

कुछ लोगों को ऐसा लगता है कि सैक्स का वक्त सिर्फ रात का होता है और सोने से पहले सैक्स करना चाहिए पर यह बात पूरी तरह से गलत है. सैक्स को सुबह भी ऐंजौय कर सकते हैं.

पूरे दिन के थके हुए हम जब औफिस या अपने काम से घर आते हैं और खाना खाने के बाद सैक्स करने लगते हैं तो हमारी बौडी में पूरी तरह से ऐनर्जी नहीं रहती कि हम अपने पूरे पोटेंशियल से सैक्स कर पाएं.

तो ज्यादा देर तक कर पाएंगे सैक्स

ऐसे में अगर हम मौर्निंग में उठ कर सैक्स करते हैं तो हमारी बौडी पूरी तरह से चार्ज्ड होती है और हम अपनी पूरी ऐनर्जी के साथ सैक्स कर पाते हैं. रात के अकौर्डिंग सुबह हम देर तक सैक्स कर पाते हैं जिस से कि हमारी सैक्स लाइफ और भी ज्यादा मजेदार बन जाती है.

मौर्निंग सैक्स हमारी बौडी के लिए एक तरह से वर्कआउट का भी काम करता है क्योंकि सैक्स करते समय हम काफी ऐनर्जैटिक होते हैं तो ऐसे में हमारी बौडी का एक अच्छा वर्कआउट भी हो जाता है.

जवान रहने के लिए

नाइट सैक्स की तुलना में मौर्निंग सैक्स एक अच्छा स्ट्रैस रिलीवर माना गया है यानि कि सुबह सैक्स करने से हमारे दिमाग का स्ट्रैस गायब हो जाता है और पूरा दिन खुशहाल रहता है. और तो और मौर्निंग सैक्स हमें ज्यादा समय तक जवान रखता है.

स्टडीज बताती हैं कि मौर्निंग सैक्स हमें जवान दिखने में मदद करता है और इस से हमारा इम्यून सिस्टम भी बूस्ट होता है.

बिस्तर छोड़ने से पहले पत्नी को लें बांहों में

अगर आप ने अभी तक मौर्निंग सैक्स ट्राई नहीं किया है तो आप बहुत कुछ मिस कर रहे हैं. आप को मौर्निंग सैक्स जरूर ट्राई करना चाहिए और सुबर बिस्तर से उठने से पहले अपनी पत्नी को अपनी बांहों में भर लेना चाहिए जिस से कि आप दोनों सैक्स का एक अलग ही आनंद ले पाएं.

बीवी मुझ से ज्यादा कमाती है और आएदिन मुझ पर रोब जमाती है

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मैं और मेरी बीवी दोनों एकदूसरे के काफी अच्छे दोस्त हुआ करते थे. हम दोनों एक ही कंपनी में जौब करते थे और वहीं हमारी पहली मुलाकात हुई थी. देखते ही देखते हम कब एकदूसरे को दिल दे बैठे, नहीं जानते. हम दोनों की एकजैसी पोस्ट होने के कारण एकदूसरे को अच्छी तरह समझने लगे थे. फिर हम ने शादी कर ली. शादी के बाद कुछ समय तो बिलकुल ठीक गुजरा लेकिल हाल ही में मेरी पत्नी को एक मल्टीनैशनल कंपनी से बहुत अच्छा औफर आया जिस में उस को काफी अच्छी सैलेरी मिल रही है. ऐसे में कुछ दिनों से उस का व्यवहार काफी बदलाबदला सा लग रहा है. उस की सैलरी मुझ से अधिक है तो मुझे ऐसा लग रहा है कि वह मुझ पर पैसों का रोब जमाने लगी है. मुझे क्या करना चाहिए ?

जवाब –

जैसाकि आप ने बताया कि आप की बीवी को हाल ही में एक मल्टीनैशनल कंपनी से औफर आया जिसे उन्होनें ऐक्सैप्ट कर लिया तो हो सकता है कि उस जगह काम का काफी प्रेशर रहता हो जिस वजह से वह चिड़चिड़ी रहने लगी हो और आप को ऐसा लग रहा है कि वह आप के ऊपर रोब जमा रही है.

नई जगह काम करना, नए लोगों से मिलना और नए काम को समझने में थोड़ा समय तो लगता ही है। ऐसे में, उन को थोड़ा स्पेस दीजिए और वक्त भी.

अगर आप की बीवी औफिस के साथसाथ घर का भी काम करती है तो ऐसे में तो वह और भी ज्यादा परेशान हो जाती होगी क्योंकि अगर औफिस में ज्यादा काम है और घर आ कर भी काम करती है तो ऐसे में आप को घर के कामों में बीवी की मदद करनी चाहिए.

अगर आप भी अपने काम में बिजी रहते हैं तो आप अपने घर में कामवाली भी लगा सकते हैं जो घर के कामों में बीवी की मदद कर सकें.

अगर फिर भी आप को लगे कि आप की बीवी आप के ऊपर रोब जमा रही है और ठीक से बात नहीं कर रही तो घर के खर्चे आप को उठाने चाहिए जैसेकि इलैक्ट्रिसिटी बिल, बच्चों की पढ़ाई और अपने पेरैंट्स और उन के पैरेंट्स की भी जिम्मेदारी आप उठाएं. आप की बीवी को यह न लगे कि सब खर्चे वह उठा रही है.

अगर आप सारी जिम्मेदारी खुद उठाएंगे तो आप की बीवी आप के ऊपर रोब जमाने से पहले सोचेगी कि आप के घर का खर्चा उन की सैलेरी से नहीं चल रहा.

हो सके तो आप भी अपनी जौब बदल कर किसी अच्छी कंपनी में ट्राई करें जहा आप को भी एक अच्छा पैकेज मिल पाए. दोनों पतिपत्नी अच्छा कमाएंगे तभी इस महंगाई में ठीक से रह पाएंगे.

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सामाजिक असमानता के लिए धर्म जिम्मेदार

धर्म बारबार यह समझाता है कि दान देने वाला बड़ा होता है. दान देते समय यह भी देखा जाता है कि किस ने कितना दिया है. दान देने वाला भी दिखावा करता है. वह चाहता है कि उस के नाम का पत्थर वहां लग जाए जिस से जब तक निर्माण रहे उस का नाम बना रहे. किसी भी मंदिर में ऐसे पत्थरों के शिलापट लिखे देखे जा सकते हैं. जितना बड़ा दान उतना बड़ा नाम लिखा होता है. जो छोटा दान करता है मंदिर वाले उस का नाम तो लिखते ही नहीं, वह खुद भी वहां रखे बौक्स में चुपचाप पैसे दान कर के चला आता है. वहीं ज्यादा दान करने वाला पूरा दिखावा करता है. यहीं सामाजिक असमानता का भाव आना शुरू हो जाता है. आज के समाज में आदमी का बड़प्पन उस के कामों से, सामजिक योगदान से नहीं बल्कि दान से जाना जाता है.

मंदिरों से चल कर यह समाज में, दफ्तरों में, बाजारों में और घरों के अंदर तक आ जाता है. जो घर वालों के लिए महंगे उपहार लाता है उस की कद्र ज्यादा होती है. बड़े बेटे और छोटे बेटे में भेदभाव होता है. घर में रहने वाले और शहर में रहने वाले के बीच अंतर होता है.

क्यों बराबर नहीं होता हर भक्त

कहते हैं कि भगवान के घर भेदभाव नहीं होता, हर भक्त बराबर होता है. बात दान की रकम में इनकम टैक्स से छूट की हो या फिर वीआईपी दर्शन की, यह भेदभाव-असमानता हर जगह पर दिखाई देता है. ऐसे में दिखावा करने वाले लोग अपनी क्षमता से अधिक खर्च करते हैं. मंदिरों में वीआईपी दर्शन की एक नई संस्कृति का उदय हो चुका है. वीआईपी दर्शन उन लोगों के लिए है जो लोग एक विशेष शुल्क देते हैं.

भगवान के दरबार में भी 2 तरह की व्यवस्थाएं हो गईं. एक, आम जनता के लिए और एक, उन लोगों के लिए जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं. यहां भी असमानता आ गई.

एक आम आदमी जो घंटों लाइन में लगने के बाद मंदिर के अंदर प्रवेश करता है, उसे बाहर से ही दर्शन करने के लिए बाध्य किया जाता है जैसे वह कोई अछूत हो. दूसरी ओर कुछ वीआईपी लोग बड़े आराम से मंदिर के गर्भगृह में दर्शन लाभ करते हुए नजर आते हैं. एक आम आदमी इसी में खुश हो जाता है कि भले वह अछूत की तरह मंदिर से बाहर निकाल दिया जाता है लेकिन उस ने दूर से ही सही दर्शन तो कर ही लिया.

भारत के लोग सदियों से गुलाम रहे हैं. इन के डीएनए में ही गुलामी करने की मानसिकता भर गई है. इन में स्वाभिमान नाम की कोई चीज बची ही नहीं है. सोचने वाली बात है कि क्या भगवान वीआईपी दर्शन करने वालों पर विशेष कृपा बरसाएंगे? यह दोयम दर्जे का व्यवहार कदापि स्वीकार नहीं करना चाहिए. हमारे देश के लोगों की मानसिकता में कुछ पाने की लालसा भरी होती है. इस कारण वह कभी भी लालच के दलदल से बाहर ही नहीं आ पाता है. यही लालच उस के शोषण का सब से बड़ा कारण होता है. मंदिर में अपने लालच के कारण ही लोग शोषित होते हैं.

मंदिर में दान के नाम पर भेदभाव होता है जो सामाजिक असमानता का प्रतीक है. यह सामजिक असमानता जीवन के हर हिस्से में घुन की तरह घुस चुकी है. जो दान नहीं कर सके वे अपने को हीन समझते हैं और बजाय अतिरिक्त परिश्रम के, जीवन सुधारने के, पूजापाठ में घंटों और ज्यादा लगाते हैं. जो लोग इस गुत्थी को समझ चुके हैं वे मेहनत करते हैं, रातदिन लगते हैं और जीवनस्तर सुधार लेते हैं.

कर्मक्षेत्र में सामाजिक असमानता

धर्म के बाद कर्मक्षेत्र में भी असमानता देखने को मिलती है. यहां असमानता का आलम यह है कि जिस से लाभ होता है उस का खयाल ज्यादा रखा जाता है. सरकार ने अपने कर्मचारियों को जनता का दामाद बना डाला है, उन्हें ही सारी सुविधाएं दे दी हैं.

एक प्राइवेट प्राइमरी स्कूल में टीचर को 12 से 15 हजार रुपए महीना नौकरी जौइन करने के समय मिलता है. वहीं सरकारी प्राइमरी स्कूल के टीचर की सैलरी 54 हजार रुपए से शुरू होती है. निजी कंपनी में काम करने वाले क्लर्क की सैलरी शुरुआत में 10 से 12 हजार रुपए होती है. सरकारी नौकर 55 हजार रुपए से नौकरी शुरू करता है. एक सरकारी डिग्री कालेज में प्रिंसिपल रिटायरमैंट तक 2 लाख 30 हजार रुपए की सैलरी पाने लगता है. रिटायर होने के बाद उस की पैंशन 80 हजार रुपए से ऊपर होती है. कर्मक्षेत्र में इस तरह की असमानता के अनगिनत उदाहरण हैं. इस असमानता के कारण समाज में बराबरी का दर्जा नहीं मिलता है. यह सरकार द्वारा थोपी गई असमानता है. सरकारी कर्मचारी देश को बंधक बनाए रख रहे हैं.

श्रम का भेदभावपूर्ण बंटवारा सामाजिक असमानता का कारण होता है. आज समाज में जाति के साथसाथ पैसे का भी प्रभाव है. अगर आप के पास पैसा है तो आप अपना रहनसहन बेहतर कर सकते हैं. जाति से कितने ही बड़े क्यों न हों, अगर गरीब हैं तो आप की औकात नाली में रहने वाले कीड़े से अधिक नहीं है. हां, नाली में रहने वाले अपने जैसे दूसरों से आप जाति के कारण श्रेष्ठ हैं, असमान हैं, खास हैं. गरीब को जाति के बावजूद न तो मंदिर में वीवीआईपी दर्शन मिल पाएगा, न ही वह अपने लिए अच्छा घर बना पाएगा और न ही वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दे पाएगा कि जिस से वे अगली पीढ़ी में बेहतर बन सकें. शिक्षा का वर्गीकरण कर दिया गया है. असमानता लाने के लिए तकनीकी शिक्षा केवल पैसों वाले बच्चों को मिल पा रही जो फिर और ज्यादा पैसा कमा रहे हैं.

आईफोन 16 के लिए लगी लंबीलंबी लाइनों में वे लोग खड़े हैं जिन की जेब में 1 लाख रुपए से अधिक का खर्च करने की औकात है. इतने लोग आखिर कहां से आ गए? शायद विदेशी उत्पादकों को अंदाजा नहीं था कि भारत में आसमानता कितनी गहरी है. आईफोन की सब से कम कीमत 50 हजार रुपए और सब से अधिक कीमत 1 लाख 84 हजार रुपए है.

इसी तरह सामान्य मोटरबाइक, जिस की कीमत 1 लाख रुपए के करीब है, असमानता की प्रतीक है. रीवोल्ट आरवीवन 84,990 रुपए, टीवीएस रेडर 125 97,180 रुपए, हीरो एक्सट्रीम 125 97,484 रुपए, बजाज फ्रीडम 95,055 रुपए, सुजूकी बर्गमैन स्ट्रीट 125 96,827 रुपए, सुजूकी एवेनिस 125 94,786 रुपए, बेनलिंग औरा 91,667 रुपए से शुरु होती है. घर तक पंहुचने में इन सभी की कीमत 1 लाख रुपए से ऊपर पहुंच जाती है. ये लोग आम बस में चलने वालों के मुकाबले खास हैं.

फिर भी इन बाइक वालों को उस समाज की नजर से कभी अच्छा नहीं माना जाता है जो कार को महत्त्व देते हैं. घरपरिवार, नातेरिश्तेदार के घर जब तीजत्योहार, शादीविवाह में मोटरबाइक से जाते हैं तो उन को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता. सामाजिक असमानता का भाव यहां साफ दिखता है. कार से आने वाले के प्रति एक अलग भाव होता है और मोटरबाइक से आने वाले के प्रति अलग भाव होता है भले ही कार से आने वाला कितना ही बड़ा भ्रष्टाचार कर के आया हो. बहुत से बाइक वाले इसलिए टैक्सी कर के शादीब्याह में जाते हैं.

दूर की जाए अमीरगरीब की खाई

देश में धन का सही तरह से बंटवारा न होने से यह हालत हो गई है. अमीरगरीब के बीच की खाई गहरा गई है. आज जमीन के साथ शेयर बाजार और सत्ता असमानता फैला रही है.

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने कहा था कि उन की सरकार आएगी तो आर्थिक सर्वे करा कर संपत्ति का बंटवारा होगा. यह कैसा होगा और कैसे होगा, यह अभी नहीं मालूम पर हो सकेगा, इस पर संदेह है. यह सिर्फ चुनावी स्टंट भर है. हां, आज आर्थिक सर्वे और समान आर्थिक बंटवारे की देश को जरूरत अवश्य है. पूंजी देश के गिनेचुने हाथों में पहुंच गई है. क्या सामाजिक असमानता दूर करने के लिए अमीरों से पूंजी ले कर गरीबों को देनी चाहिए जैसे जमींदार उन्मूलन के समय जमीने दे कर किया गया था. राहुल गांधी जीतेंगे और यह कर पाएंगे, पहले तो इस में संदेह है, पर अगर कर भी लिया तो जो चतुर हैं, वे फिर मुफ्त का पाने वालों से फीस लेंगे. ऐसा पहले कई बार हो चुका है.

देश में एक तरफ 1 से 2 करोड़ रुपए की कार से चलने वाले लोग हैं तो दूसरी तरफ सही तरह की साइकिल भी नहीं है. इस असमानता का कारण देश की आर्थिक नीतियां हैं, हाथ की लकीरें नहीं. मेहनत करने वाला मजदूर केवल दूसरों के लिए घर बनाता रह जा रहा है. उस के पास अपना घर बनाने लायक पैसा नहीं है. पूंजीपति केवल गरीब का शोषण करता है बल्कि उस की मेहनत का पूरा हक भी नहीं देता है. मुनाफाखोरी की असीमित इच्छा के कारण ही असमानता है. इस को दूर करना जरूरी है.

जाति नहीं ‘बिलियनायर राज’

घर बनाने या व्यापार शुरू करने के लिए बैंक जब लोन देता है तो यह देखता है कि आप की लोन अदा करने की क्षमता कितनी है. कम वेतन और लगातार वेतन न पाने वाले को वह लोन नहीं देता. सरकार बिना गारंटी के लोन लेने की स्कीम की कितनी भी योजनाएं चला ले, बैंक बिना गारंटी के लोन नहीं देता है. दूसरी तरफ बड़ीबड़ी कंपनियां लोन ले कर भी बच जाती हैं. इस तरह की सरकारी नीतियों के कारण ही सामाजिक असमानता बढ़ रही है. सामाजिक असमानता का सब से बड़ा कारण आर्थिक असमानता है और गरीबअमीर के बीच बढ़ती खाई है.

वर्ल्ड इनइक्वैलिटी लैब के मुताबिक, वर्ष 2022-23 में देश की कुल आय में टौप एक फीसदी अमीर आबादी की हिस्सेदारी बढ़ कर 22 फीसदी हो गई है. आंकड़े बताते हैं कि देश में अमीरों और गरीबों के बीच खाई काफी बढ़ गई है. साल 2000 के दशक की शुरुआत से यह लगातार बढ़ती जा रही है. इस के मुताबिक, देश की कुल आबादी अगर 100 रुपए कमाती है, तो इस में 22 रुपए केवल एक फीसदी अमीर लोगों के पास है. देश की कुल संपत्ति में इन एक फीसदी अमीर आबादी की हिस्सेदारी बढ़ कर 40.1 फीसदी हो गई है.

आर्थिक असमानता के मामले में भारत अमेरिका, साउथ अफ्रीका और ब्राजील से भी आगे है. अन्य देशों की बात करें तो अमेरिका में टौप एक फीसदी अमीर आबादी की आय में हिस्सेदारी 20.9 फीसदी है. ब्राजील के मामले में यह आंकड़ा 19.7 फीसदी, साउथ अफ्रीका में 19.3 फीसदी, चीन में 15.7 फीसदी है. इनइक्वैलिटी लैब की रिपोर्ट बताती है कि 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद अमीरगरीब के बीच असमानता की खाई तेजी से बढ़ी है.

1975 तक भारत और चीन के लोगों की औसत आय लगभग बराबर थी. लेकिन वर्ष 2000 तक इस मामले में चीन हम से 35 फीसदी आगे बढ़ गया. 21वीं सदी में चीन की रफ्तार और तेज हुई और अब चीन में प्रतिव्यक्ति आय हम से ढाई गुना ज्यादा हो गई है. परेशानी की बात यह है कि पूंजीवादी लोग भारत में जातीय असमानता की बात करते हैं जिस से आर्थिक असमानता का मुद्दा दबा रहे, जमींदारी उन्मूलन जैसे फैसले लेने की दिशा में सरकार सोच न सके.

आज देश पर जातीय व्यवस्था का नहीं आर्थिक व्यवस्था का राज है. आर्थिक व्यवस्था में चुनावी चंदा दे कर राजनीतिक दलों को मजबूर किया जाता है कि वे गरीबी के लिए जातीय व्यवस्था को कोसते रहें. चुनाव जीतने के लिए नेता और राजनीतिक दलों की सब से बडी जरूरत पैसा होता है. इस से गरीबों को और गरीब रखने की योजनाएं चलाई जाती हैं. पूंजीपतियों के लिए ऐक्सप्रैसवे, मौल्स और गोदाम बनाने के लिए सड़क, बिजली, पानी दिया जा रहा है. कृषि कानूनों का उद्देश्य भी यही था, किसानों की जमीन अमीरों को दी जा सके.

देश में सामाजिक असमानता को दूर करने के लिए पहले आर्थिक असमानता को दूर करना होगा. सिद्धांत के रूप में यह स्वीकार करना होगा कि देश में अमीरों का राज है. उस के हिसाब से गरीबों को हक देना होगा. जब तक इस को स्वीकार कर के योजनाएं नहीं बनेंगी तब तक अमीर केवल ऐप्स बना कर देश की जनता को गरीब करते जाएंगे. जनता को मुफ्त का राशन दे कर मेहनतमजदूरी करने से दूर रख कर लाचार बना दिया जाएगा. इस के बाद वह वोट दे कर मुफ्त का चंदन घिसती रहेगी, इस से आर्थिक असमानता बढ़ती रहेगी.

गर्लफ्रैंड के साथ सैक्स करने को मन करता है, कैसे मनाऊं ?

अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें..

सवाल –

मेरी उम्र 19 साल है और मैं ने हाल ही में स्कूल पास करके कालेज में ऐडमिशन लिया है. शुरुआत से ही मुझे कालेज जाने का बहुत शौक था क्योंकि कालेज नाम सुनते ही मेरे मन में बहुत सी हसीन चीजें आती थीं जैसेकि कालेज में लोग खुलेआम अपनी गर्लफ्रैंड्स के साथ घूमते हैं, साथ में ट्रिप्स पर जाते हैं, रोमांस करते हैं और अपनी जिंदगी के हसीन पल जीते हैं. कालेज के पहले दिन से ही मेरे कई सारे दोस्त बने और जैसा मैं ने सोचा था वैसा ही हुआ. हम सब पूरा दिन साथ रहते और खूब घूमते. इसी दौरान मेरी एक गर्लफ्रैंड भी बनीं जोकि मेरी लाइफ की पहली गर्लफ्रैंड है. मैं उसे बहुत प्यार करता हूं और वह भी मेरा बहुत खयाल रखती है. हम दोनों में कई बार रोमांस भी हुआ है लेकिन वह कभी मुझे किसिंग से आगे बढ़ने ही नहीं देती. मैं ने उसे कई बार समझाया है कि रिलेशनशिप में यह सब चलता है पर वह नहीं मानती. मुझे उस के साथ सैक्स करने का बहुत मन करता है और ऐसे में मैं ने उसे कई बार अपने साथ होटल जाने को भी कहा पर वह तैयार नहीं होती. मैं क्या करूं ?

जवाब –

इस उम्र में ऐसे खयाल आना स्वभाविक हैं. बौलीवुड फिल्म्स और आजकल की वैब सीरिज ने लोगों के मन में कालेज की एक अलग ही इमेज सैट की हुई है जो कि बिलकुल गलत है. कालेज में मौजमस्ती करना अच्छी बात होती है लेकिन मौजमस्ती और ऐयाशी में काफी अंतर होता है जोकि हमें समझना चाहिए. हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हम कालेज में सिर्फ मौजमस्ती या ऐयाशी करने नहीं, बल्कि पढ़ने भी गए हैं.

आप ने कालेज में अपनी लाइफ में पहली गर्लफ्रैंड बनाई है तो जाहिर है कि आप को इस से पहले रिलेशनशिप का ज्यादा अनुभव नहीं है, तभी आप इतनी जल्दबाजी कर रहे हैं.

सैक्स लड़कियों के लिए कोई छोटी चीज नहीं होती और सैक्स करने के लिए दोनों की ही रजामंदी जरूरी है.

आप को पहले उस लड़की का विश्वास जीतना चाहिए. उस के साथ अच्छे पल बिताने चाहिए. अगर सच में आप उस लड़की से प्यार करते हैं तो उस की फीलिंग्स की रिस्पैक्ट करें.

अगर आप उस ल़ड़की को दिल से रिस्पैक्ट करेंगे और उन्हें प्यार करेंगे तो हो सकता है वस आप के साथ सैक्स करने को मान जाए पर याद रहे कि आप को अपनी गर्लफ्रैंड के साथ किसी तरह की कोई जबरदस्ती नहीं करनी है.

सैक्स हमेशा दोनों की रजामंदी से किया जाता है. अगर आप अपनी गर्लफ्रैंड से शादी करना चाहते हैं तो उस के बारे में अपने घर वालों को भी बताएं ताकि आप की गर्लफ्रैंड को आप के ऊपर विश्वास होने लगे.

जैसाकि आपने बताया कि आप के मन में कालेज को ले कर एक अलग ही खुमार था तो ऐसे में यह खुमार पढ़ाई के लिए को बिलकुल नहीं था. आप शुरुआत से ही कालेज में मौजमस्ती करने गए हैं जोकि गलत है. आप को कालेज में मौजमस्ती के साथसाथ पढ़ाई पर भी ध्यान देना चाहिए.

यह समय आप की पढ़ाई का है और फिर लौट कर नहीं आएगा. बाद में पछताने से अच्छा है आप साथसाथ पढ़ाई पर भी उतना ही ध्यान दें.

अलबत्ता, पहले कैरियर बना लें और फिर सैक्स और शादी के बारे में सोचें. हां, सैक्स कुदरत का दिया एक अनमोल तोहफा है. अगर आप की गर्लफ्रैंड इस के लिए तैयार है तो सैक्स करने में बुराई नहीं, मगर फिलहाल आप दोनों ही अपनी पढ़ाई और कैरियर पर फोकस करें.

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डिंक कपल्स, डबल कमाई और लाइफ के अंतिम पड़ाव में अकेलेपन की खाई

बेंगलुरु के एक DINK कपल (डबल इनकम नो किड्स) के दोनों पार्टनर्स सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं. उन की टैक्स पे करने के बाद मंथली इनकम 7 लाख रुपए है. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि सारे खर्चों के बाद अपने बचे 3 लाख रुपए को कहां खर्च करें तो उन्होंने एक इंडियन प्रोफैशनल प्लेटफौर्म ग्रेपवाइन ऐप पर पोस्ट शेयर कर के कम्युनिटी से सजेशन मांगा कि वे बचे हुए पैसे का क्या करें.

ग्रेपवाइन ऐप पर शेयर की गई उन की पोस्ट वायरल हो गई और पोस्ट पर करीब 200 कमैंट्स भी आए और कुछ यूजर ने मजाक उड़ाते हुए सुझाव दिया कि दंपती उन्हें गोद ले लें. कहीं आप भी DINK कपल बनने की राह पर तो नहीं हैं?

DINK कपल्स की सोच

पिछले कुछ सालों में DINK कपल्स ट्रैंड काफी देखने में आ रहा है और सोशल मीडिया पर इस की बहुत चर्चा हो रही है. DINK कपल्स वो होते हैं जो शादी के बाद बेबी प्लानिंग में जल्दी नहीं करते और यहां तक कि बिना बच्चों के ही जिंदगी गुजारना चाहते हैं. उन का सारा फोकस पैसे कमाने और अच्छी लाइफस्टाइल पर होता है. ऐसे कपल्स ज्यादा से ज्यादा पैसे कमाने, घूमनेफिरने, अपने कैरियर और रिश्ते को मज़बूत बनाने पर ध्यान देते हैं. वे बच्चों के पालनपोषण की ज़िम्मेदारी से फ्री रहने, आजाद जीवनशैली का आनंद लेने और अपनी लाइफ को भरपूर से जीने में यकीन रखते हैं, वे बच्चों की जिम्मेदारी ले कर अपनी रातों की नींद खराब करने में यकीन नहीं रखते.

DINK कपल्स मानते हैं कि बच्चे को दुनिया में लाना एक बड़ा फैसला और निजी मामला है और अपने बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए बच्चा पैदा करने में खुद को निवेश करने को वे सही फैसला नहीं मानते.

रिसर्चगेट की एक स्टडी के मुताबिक, भारत में अब धीरेधीरे DINK कपल्स की संख्या बढ़ती जा रही है और यह देखा गया है कि लगभग 65 फीसदी न्यूली वैडेड कपल बच्चे नहीं करना चाहते हैं. काम के बाद बचा हुआ समय वे अपने पार्टनर और दोस्तों के साथ पार्टी व ट्रैवल कर के बिताते हैं. ये कपल्स परिवार के बजाय अपने निजी जीवन, अपनी खुशी और कैरियर को ज़्यादा अहमियत देते हैं.

DINK कपल्स सोसाइटी के लिए एक चैलेंज

पिछले दिनों एक मार्केटिंग फर्म द्वारा किए गए सर्वे में यह बात भी सामने आई कि भारत में डिंक यानी डबल इनकम नो किड ग्रुप की संख्या हर साल 30 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है. महिलाएं कम बच्चों को जन्म दे रही हैं. भारत में फर्टिलिटी रेट भी तेजी से घट रही है. साल 1950 में जो फर्टिलिटी रेट 6.2 फीसदी थी वह अब घट कर 2 फीसदी रह गई है.

आगे क्या होगा?

माना कि इस ट्रैंड को फौलो करने वाले कपल्स के बच्चे नहीं होने की वजह से उन की फाइनैंशियल सिचुएशन अच्छी रहती है, खुद के लिए समय मिलने, अपनी चाहतों को पूरा करने के अलावा वे एकदूसरे को क्वालिटी टाइम दे पाते हैं, एकदूसरे को समझने का समय मिलता है, वे अपने सपनों और लक्ष्यों पर फोकस कर पाते हैं. लेकिन यह सोच रखने वाले लोगों को इस बात का एहसास नहीं है कि वे कब तक नौकरियां कर पाएंगे, इस बात की कोई गारंटी नहीं. एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब उन्हें रिटायर्ड जीवन बिताना होगा और तब वे फिजिकली इतने ऐक्टिव भी नहीं होंगे कि रोज कहीं घूमने जा सकें, दोस्तों के साथ पार्टियां कर सकें. तब, क्या होगा?

अकेलेपन की खाई

खाओपियो मौज उड़ाओ की स्वार्थी सोच वाले इन कपल्स को एक समय के बाद अपनी लाइफ में कई नुकसान भी उठाने पड़ते हैं. ऐसे कपल्स को समाज, परिवार से सपोर्ट नहीं मिलता. वे सब से अलगथलग हो जाते हैं और एक समय के बाद ऐसे कपल्स अकेलेपन को महसूस करते हैं.

डगमग फाइनैंशियल प्लानिंग

बच्चे न होना आर्थिक रूप से किसी भी कपल को आजादी का एहसास दे सकता है क्योंकि आप को उन की शिक्षा या अन्य जरूरतों के लिए सेविंग करने की चिंता नहीं करनी पड़ती लेकिन अधिकांश केसेज में देखा गया है कि फाइनैंशियल गोल नहीं होने से डिंक कपल्स बिना सोचेसमझे खर्च करते हैं और उन की फाइनैंशियल प्लानिंग गड़बड़ा जाती है. एसोसिएटेड चैंबर औफ कौमर्स एंड इंडस्ट्री औफ इंडिया द्वारा किए गए एक सर्वे से भी पता चला है कि DINK कपल्स बहुत ज्यादा खर्च करने वाले लोग होते हैं. वे ज्यादातर बाहर खाते हैं और एंटरटेन्मेंट व वैकेशन पर बहुत ज्यादा खर्च करते हैं.

DINK कपल्स में से 60 फीसदी लोग हर दो महीने में कुछ दिनों के लिए छुट्टियों पर जाते हैं. 45 प्रतिशत लोग अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा EMI चुकाने में खर्च करते हैं जो मासिक 20 हजार रुपए से अधिक हो सकती है. 45 फीसदी लोग गैरजरूरी वस्तुओं पर 5,000-10,000 रुपए खर्च करते हैं.

कहीं देर न हो जाए

डिंक कपल्स पहले तो अपनी ज़िंदगी जीने की चाहत में बच्चा अपनी जिंदगी में नहीं चाहते लेकिन जब वे अपने साथी कपल्स को पेरैंट्स बनते देखते हैं और अपने ग्रुप में अकेले पड़ जाते हैं तो फिर अपनी लाइफ में बच्चा चाहते हैं लेकिन तब उन की उम्र आड़े आती है और नौर्मल प्रैग्नैंसी की उम्र निकल चुकी होती है और अनेक तरह की परेशानियां सामने आती हैं.

अपना सकते हैं निम्न उपाय

• सोशल वर्क करें. इस से अकेलापन और स्ट्रैस कम होता है और नया सोशल सर्कल और नए दोस्त भी बनते हैं व जुड़ाव बढ़ता है.

• करीबी कपल्स से दोस्ती बढ़ाएं, उन से कनेक्टेड रहें, उन के साथ पार्टी प्लान करें, साथ में ट्रैवल प्लान करें. इस से अकेलापन दूर होगा और उन के साथ नजदीकी भी बढ़ेगी.

• क्रिएटिव एक्टिविटीज में इन्वौल्व हों. अपनी हौबीज पर काम करें. अपने शहर के कल्चरल प्रोग्राम का हिस्सा बनें चाहे बोरियत ही क्यों न हो.

• अकेलेपन को दूर करने के लिए भूल कर भी धर्म के चक्कर में न पड़ें. धर्म आप का समय बरबाद करने के अलावा दानदक्षिणा के चंगुल में फंसा कर आप की सेविंग्स भी लूट लेगा.

• DINK कपल्स की लाइफ में बच्चों के न होने से उन के पास समय की कमी नहीं होती तो वे पौलिटिक्स भी जौइन कर सकते हैं.

इकलौते बच्चे को जरूरत से ज्यादा प्रोटैक्ट करना ठीक नहीं

सारंग की पत्नी का देहांत शादी के 10 साल बाद हो गया. अचानक आए तेज बुखार ने एक हफ्ते में उस की इहलीला समाप्त कर दी. तब सारंग का बेटा अनुज मात्र 7 साल का था. पत्नी की अचानक मौत से सारंग टूट गया था. घर में उस के बूढ़े बीमार मांबाप, नन्हा सा बच्चा और अकेला सारंग जिसे इन तीनों की जिम्मेदारी उठानी थी. पत्नी का ग़म धीरेधीरे कम हुआ तो सारंग ने फिर से नौकरी पर जाना शुरू किया.

वह एक स्कूल में टीचर था. पहले उस का बेटा जिस स्कूल में पढ़ रहा था, वहां से उस को निकाल कर सारंग ने उस का एडमिशन अपने ही स्कूल में करवा लिया ताकि वह उस के साथ ही स्कूल आएजाए. पहले उस की पत्नी ही बच्चे का खयाल रखती थी. उस को स्कूल लाना, ले जाना, पेरैंटटीचर मीटिंग अटेंड करना, बच्चे की जरूरत का सामान खरीदना सारी जिम्मेदारी पत्नी की थी. मगर अब सुबह बच्चे को उठाना, तैयार करना, उस को नाश्ता कराना, उस का बैग पैक करना, लंच बनाना, मातापिता को नाश्ता देना और उन के लिए लंच तैयार कर के जाना सब काम अकेले सारंग के जिम्मे आ गया था.

बच्चे को ले कर सारंग बहुत प्रोटैक्टिव हो गया था. वह उसे हर वक्त अपने साथ रखता था. उस को अकेले घर से बाहर नहीं जाने देता था. सामने पार्क में शाम को अनेक बच्चे खेलते थे मगर सारंग अपने बेटे को नहीं भेजता था. दरअसल, पत्नी की अचानक मौत ने सारंग को डरा दिया था. वह नहीं चाहता था कि उस के बेटे को कोई खरोंच भी आए.

अनुज भी मां के जाने के बाद अपने पिता के बहुत निकट आ गया था. वह बड़ा हो रहा था मगर फिर भी रात में वह पिता से ही लिपट कर सोता था. हर बात अपने पिता सारंग से पूछ कर करता था. जिस उम्र में बच्चे अपनी साइकिल ले कर पूरा शहर नाप आते हैं, अनुज अपने पिता की बाइक पर उन के पीछे बैठ कर हर जगह जाता था. हालांकि उस के पास साइकिल थी, मगर वह साइकिल उस ने बस अपनी गली में ही चलाई. बाहर सड़क पर नहीं. सारंग ही कभी उस को अकेले निकलने नहीं देता. यहां तक कि सामने की दुकान से ब्रेड भी लानी हो तो सारंग खुद ही लाता कि कहीं सड़क पार करते समय कोई दुर्घटना न हो जाए.

अनुज को ले कर सारंग बहुत प्रोटैक्टिव रहा. बापबेटे में प्रेम तो बहुत था मगर इस प्रेम के कारण अनुज चूंकि बाहरी दुनिया के लोगों से घुलमिल नहीं पाया, लिहाजा आज 18 साल की उम्र में जब वह इंटरमीडिएट में आ चुका है, बहुत इंट्रोवर्ट नैचर का हो गया है. क्लास में उस का कोई दोस्त नहीं है. वह चुपचाप एक कोने में बैठता है. किसी ने खुद आगे बढ़ कर बात कर ली, तो जवाब दे देता है मगर खुद किसी से बात करने की कोई चाहत नहीं होती. उस के क्लास के लड़कों की स्कूल की लड़कियों से दोस्ती है, कुछ की तो बाकायदा गर्लफ्रैंड हैं, मगर अनुज लड़कियों की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता.

अनुज के न तो कालेज में कोई दोस्त हैं न महल्ले में. वह अकेला रहना पसंद करता है. अपनी ख्वाहिशों और जरूरतों को बताने में झिझकता है. बाजार से कुछ सामान लाना हो तो दुकानदार से मोलतोल नहीं कर पाता. अब उस के इस नैचर से सारंग को बहुत परेशानी होती है. वह हर वक्त शिकायत करता है कि अनुज को बाहर का काम करना पसंद नहीं है, सारे काम मुझे अकेले ही करने पड़ते हैं, हर वक्त वह अपने कमरे में ही बंद रहना चाहता है, किसी से बात नहीं करता, कोई मेहमान घर में आ जाए तो सामने आ कर उस को नमस्ते तक करने में इस को परेशानी है, आगे भविष्य में क्या करना है, क्या बनना है उस के बारे में कोई सोच ही नहीं है आदिआदि.

दरअसल, सारंग के अत्यधिक प्रोटैक्शन ने ही अनुज को अकेला कर दिया है. हर वक़्त बाप से चिपके रहने के कारण जिस उम्र में उस के अच्छे दोस्त बनने चाहिए थे, वे नहीं बने. दोस्तों के साथ बच्चे बाहर घूमते हैं, मिल कर पढ़ाई करते हैं तो कंपीटिशन की भावना जागती है. वे अपने भविष्य और कैरियर के बारे में सोचने लगते हैं. दोस्तों के साथ बहुत सारे अच्छबुरे एक्सपीरियंस होते हैं, जो इंसान को बेहतर जिंदगी की तरफ धकेलते हैं. मगर यहां तो सारंग ने अनुज को कभी दूसरे बच्चों के साथ घुलनेमिलने ही नहीं दिया. इतने सालों हर वक्त उसे अपने से ही चिपटाए रखा. तो, अब उस की गलती नहीं है अगर उसे अकेला रहना ही अच्छा लगने लगा है.

कुछ ऐसी ही कहानी कल्पना बनर्जी और उन की बेटी मधुलिका की है. कल्पना बनर्जी एक बैंक में काम करती हैं. उन के पति का देहांत शादी के 3 साल बाद ही हो गया था. उन का संयुक्त परिवार है. लिहाजा कल्पना बनर्जी अपनी ससुराल में ही रहीं. उन के एक जेठ और दो देवरों के भी अपनेअपने परिवार हैं, पत्नी और बच्चे हैं जो एक ही बिल्डिंग में अलगअलग फ्लोर पर रहते हुए भी आपस में घुलेमिले हैं. सब का सब के घर आनाजाना है. त्योहारों पर पूरा परिवार इकट्ठा हो कर त्योहार मनाता है. पति की मौत के बाद कल्पना अपने फ्लैट में बिलकुल अकेली रह गईं. तब किसी ने उन को सलाह दी कि वे बच्चा गोद ले लें. पहाड़ सी जिंदगी अकेले कैसे काटेंगी. उन को बात जम गई. उन्होंने बच्चा गोद लेने के लिए सरकारी एजेंसी में अप्लाई किया और सरकारी अनाथाश्रम से सालभर के भीतर उन्हें एक डेढ़ साल की बच्ची गोद मिल गई जिस का नाम उन्होंने मधुलिका रखा.

बच्ची के आ जाने से कल्पना जैसे जीवित हो उठीं. बच्ची उन की खुशियों का केंद्र बन गई. वे उसे सुबह तैयार कर के अपने साथ औफिस ले जातीं. औफिस में उन की सहकर्मियों ने भी उन की काफी मदद की और बेटी धीरेधीरे बड़ी होने लगी. कल्पना को डर था कि कहीं कोई उन की बेटी को यह न बता दे कि वह उन की नहीं बल्कि गोद ली हुई बच्ची है. इस डर से कल्पना अपने देवर या जेठ के फ्लैट में मधुलिका को अकेले नहीं जाने देती थी और न ही उन के बच्चों से ज्यादा घुलनेमिलने देती थी. मधुलिका को ले कर कल्पना बनर्जी इतनी प्रोटैक्टेड थीं कि उन्होंने कभी उस को दोस्तों के साथ भी कहीं अकेले नहीं जाने दिया.

मांबेटी एकदूसरे के साथ हमेशा रहीं और दोनों में अथाह प्रेम रहा. मगर 20 साल की उम्र में जब कल्पना ने बेटी के हाथ पीले किए और उस को ससुराल विदा किया तो मधुलिका पति के साथ एक महीना भी नहीं रह पाई. उस को मां की कमी परेशान करती थी. मां ने खाना खाया कि नहीं, मां ने दवाई खाई कि नहीं, मां अपनी आर्थराइटिस के इलाज के लिए डाक्टर के पास गईं या नहीं, मां अकेले राशन कैसे लाई होंगी जैसी बातें करकर के उस ने पति को परेशान कर डाला. आखिरकार एक महीने बाद वह अपने घर लौट आई और अब साल पूरा होने को आ रहा है, वह ससुराल वापस जाने को तैयार ही नहीं है. उस की जिद है कि उस का पति अगर उस के और उस की मां के साथ उन के फ्लैट में आ कर रह सकता है तो ठीक, वरना तलाक ले ले.

यह देखा गया है कि जिन परिवारों में इकलौता बच्चा होता है वे परिवार बच्चे की सुरक्षा के प्रति बहुत सजग रहते हैं. आखिर वही एक उन का वंश जो आगे बढ़ाएगा, लिहाजा उस को कहीं कुछ न हो, इस डर से हर वक्त उस को अपनी निगरानी में रखते हैं. उस की हर जरूरत तुरंत पूरी करते हैं. उसे इतना लाड़प्यार करते हैं कि बच्चा भी अपने परिवार से इतर देख नहीं पाता. लेकिन यह निगरानी और इतना लाड़प्यार उस के भविष्य और कैरियर के लिए ठीक नहीं है. कहते हैं, ठोकर खाए बिना अक्ल नहीं आती. मगर ठोकर तो तब मिलेगी जब बच्चे अकेले घर से बाहर निकलेंगे और दुनिया का सामना करेंगे.

जिन परिवारों में ज्यादा बच्चे होते हैं, वहां अकसर मांबाप उन्हें खुला छोड़ देते हैं, उन पर सौदा वगैरह लाने की जिम्मेदारी भी डालते हैं, घर की सफाई, बड़ों की देखभाल और छोटे भाईबहन का खयाल रखने का काम भी उन के जिम्मे होता है. ऐसे में वे जीवन के संघर्ष को सीखते हैं. कैसे आपस में लड़भिड़ कर एकदूसरे से आगे निकलने की कोशिश में लगे रहते हैं. स्कूलकालेज में भी दूसरे छात्रों से कंपीटिशन करते हैं, लड़तेभिड़ते हैं और इस से उन में जोश जागता है, कौन्फिडेंस आता है, जिंदगी के तौरतरीके सीखने का मौका मिलता है. वे समझने लगते हैं कि कहां प्यार से काम लेना है और कहां चालाकी से.

ऐसे बच्चे डल या इंट्रोवर्ट हो ही नहीं सकते जिन्होंने बचपन से अपने निर्णय खुद लिए हों. डल और इंट्रोवर्ट वही बच्चे होते हैं जिन्हें बचपन में बहुत प्रोटैक्ट कर रखा गया हो. तो अगर आप अपने बच्चे को जोशीला और तेजतर्रार बनाना चाहते हैं तो उसे अकेले घर से बाहर निकलने दीजिए, उस के कंधों पर जिम्मेदारी डालिए, उस से घर का सामान मंगवाइए, स्कूलकालेज के बच्चों के साथ पिकनिक पर जाने दीजिए. हर वक्त उन की चौकीदारी करेंगे तो वह आप की कैद को ही जिंदगी समझने लगेगा और फिर आप शिकायत करेंगे कि ये दूसरे बच्चों जैसा नहीं है.

औस्कर के लिए “लापता लेडीज” फिल्म का चयन, आखिर विवादों में क्यों घिरी

औस्कर के लिए आधिकारिक भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के रूप में किरण राव निर्देशित और आमीर खान निर्मित फिल्म ‘लापता लेडीज’ के चयन की सोमवार, 23 सितंबर को ‘फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ द्वारा घोशणा की गई, जिस ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं से प्रस्तुत 29 से अधिक फीचर फिल्मों को पछाड़ दिया. लेकिन उसी के साथ ही देश, खासकर सरकारी गलियारों में तहलका मच गया.

सूत्र बताते हैं कि सरकारी तंत्र के बीच चर्चा शुरू हो गई कि जिस किरण राव ने कभी कहा था कि उन्हें भारत में डर लगता है, उसी की फिल्म क्यों चुनी गई? कुछ लोगों को ‘लापता लेडीज’ का चयन राष्ट्रवाद पर हमला लगा. तभी तो महज 20 घंटे के अंदर ही मंगलवार को ‘एन आई न्यूज एजंसी’ ने बताया कि औस्कर के लिए भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के तौर पर रणदीप हुडा की फिल्म ‘‘स्वातंत्रय वीर सावरकर’ का चयन किया गया है. तो वहीं फिल्म वीर सावरकर’ के निर्माता आनंद पंडित ने इंस्टाग्राम पर फिल्म ‘वीर सावरकर’ का पोस्टर साझा करते हुए लिखा, ‘‘सम्मानित और विनम्र. हमारी फिल्म स्वातंत्र्यवीर सावरकर को आधिकारिक तौर पर औस्कर के लिए प्रस्तुत किया गया है. इस उल्लेखनीय सराहना के लिए भारतीय फिल्म महासंघ को धन्यवाद. यह यात्रा अविश्वसनीय रही है और हम उन सभी के बहुत आभारी हैं जिन्होंने इस रास्ते में हमारा समर्थन किया है.’’

इस के मायने यह हुआ कि भारत की तरफ से एक नहीं दो फिल्में औस्कर के लिए भेजी जाएंगी. जो कि संभव नहीं है. क्योंकि नियम के अनुसार एक देश से एक ही फिल्म आधिकारिक तौर पर ‘औस्कर’ के लिए भेजी जा सकती है. इसलिए ‘वीर सावरकर’ के भी चयन की घेषणा के साथ ही ‘भारतीय फिल्म फेडरेशन’ और औस्कर के लिए फिल्मकार जानू बारूआ की अध्यक्षता में गठित फिल्म चयन करने वाली ज्यूरी के दीमागी दिवालयापन की चर्चांएं होने लगीं.

मंगलवार को फिल्म इंडस्ट्री कई भागों में विभाजित नजर आने लगी. हर किसी के अंदर बैठे डर के चलते कोई बयान देने को तैयार न था, मगर सब इसे सरकार का भारतीय सिनेमा के लिए पतन का गड्ढा खेादने व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा की फजीहत कराना करार दे रहे थे. फिर मंगलवार, 24 सितंबर को ही लगभग 4 घंटे बाद ही फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ के अध्यक्ष रवि कोट्टाकारा ने स्पष्ट किया कि एफएफआई, रणदीप हुडा की स्वातंत्र्य वीर सावरकर द्वारा की गई घोषणा में शामिल नहीं है. ऐसा लगता है कि रणदीप हुडा द्वारा निर्देशित बायोपिक स्वातंत्र्य वीर सावरकर और इस के औस्कर के लिए प्रस्तुतीकरण को ले कर भ्रम की स्थिति है. मतलब यह हुआ कि ‘फिल्म फेडरेशन’ के अध्यक्ष के अनुसार औस्कर में भारत की तरफ से आधिकारिक फिल्म के रूप में केवल ‘लापता लेडीज’ ही जा रही है.

फिर मंगलवार रात 11 बजे न्यूज एजंसी ‘एएनआई’ ने अपनी वेबसाइट से ‘वीर सावरकर’ से जुड़ी खबर को हटा दिया. मगर आनंद पंडित के इंस्टाग्राम पर सब कुछ ज्यों का त्यों बुधवार, दोपहर 2 बजे तक मौजूद है. लेकिन फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया’ के अध्यक्ष रवि कोट्टाकारा के स्पष्टीकरण के बाद से रणदीप हुड्डा और आनंद पंडित के फोन बंद चल रहे हैं. कुछ लोग मान रहे हैं कि राष्ट्रवाद के नाम पर थूथू करवाने के बाद ‘एएनआई’ पर से वीर सावरकर की खबर हटवाई गई. पर सवाल उठ रहे हैं कि 24 घंटे के अंदर जो घटनाक्रम घटित हुए, उस की सचाई क्या है? क्या यह किसी साजिश के तहत किया गया? क्या इस में सूचना प्रसारण मंत्रालय की कोई भूमिका रही है या नहीं रही? इन सारे सवालों की जांच कराई जानी चाहिए क्योंकि इस घटनाक्रम से भारतीय सिनेमा के साथसाथ भारत देश की प्रतिष्ठा पर भी आंच आई है.

‘लापता लेडीज’ का चयन कितना सही, कितना गलत

अकादमी पुरस्कार, वैश्विक सिनेमा में सब से प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक, सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म सहित कई श्रेणियों में फिल्म निर्माण में उत्कृष्टता का सम्मान करता है. हर साल, दुनिया भर के देश प्रतिष्ठित नामांकन हासिल करने की उम्मीद में अपनी सर्वश्रेष्ठ फिल्में जमा करते हैं. औस्कर 2025 के लिए, भारत की आधिकारिक प्रविष्टि किरण राव के निर्देशन में बनी लापता लेडीज है, जो एक ऐसी फिल्म है जो अत्यधिक प्रतिस्पर्धी सर्वश्रेष्ठ अंतर्राष्ट्रीय फीचर फिल्म श्रेणी में देश का प्रतिनिधित्व करेगी. सोमवार को, फिल्म फेडरेशन औफ इंडिया ने आधिकारिक तौर पर लापता लेडीज के चयन की घोषणा की, जिस ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं से प्रस्तुत 29 से अधिक फीचर फिल्मों को पछाड़ दिया.

‘लापता लेडीज’ के साथ ही 29 फिल्में जूरी के सामने आई थी, जिन में रणबीर कपूर की एनिमल, प्रभास की ‘कल्कि 2898 एडी’, मराठी की ‘घात’, पायल कपाड़िया की कान्स में पुरस्कृत फिल्म ‘औल वी इमेजिन ऐज लाइट’, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘आटम’, मलयालम फिल्म ‘महाराजा’, अजय देवगन की स्पोर्ट्स ड्रामा ‘मैदान’, कार्तिक आर्यन की फिल्म ‘चंदू चैंपियन’, आर्टिकल 370, वीर सावरकार, श्रीकांत, सैम बहादुर माणेकाशा, मनोज बाजपेई अभिनीत जोरम, किल, तेलुगु फिल्म ‘हनु मान’ और गुड लक जैसी फिल्में रहीं. आखिरकार इन नामों में चयन कर ‘लापता लेडीज’ पर मुहर लगाई.

ज्यूरी का मानना है कि किरण राव की लापता लेडीज, ग्रामीण भारत की पृष्ठभूमि पर स्थापित पितृसत्ता की व्यंग्यपूर्ण परीक्षा, वैश्विक दर्शकों के साथ जुड़ने की क्षमता रखती है. लेकिन जोनू बरूआ की जूरी द्वारा ‘लापता लेडीज’ को ‘औस्कर के लिए भारतीय प्रतिनिधि फिल्म के तौर पर भेजने के निर्णय को सही नहीं कहा जा सकता. क्योंकि यह पूरी तरह से नियमों का उल्लंघन है. औस्कर के नियम के अनुसार मौलिक फिल्म ही भेजी जानी चाहिए. लेकिन ‘लापता लेडीज’ पर तो चोरी का इल्जाम है.

‘लापता लेडीज’ के सिनमाघरों में प्रदर्शित हेाते ही फिल्म लेखक, निर्देशक, निर्माता व अभिनेता अनंत महादेवन ने आरोप लगाया था कि ‘लापात लेडीज’ की कहानी उन की 1999 में प्रदर्शित फिल्म ‘‘घूंघट के पट खोल’ से चोरी की गई है. यह फिल्म दूरदर्शन पर भी प्रसारित हो चुकी है और जब अनंत महादेवन ने आरोप लगाया था, उस वक्त यह फिल्म ‘यूट्यूब’ पर भी मौजूद थी. अंनंत महादेन ने तो यह भी आरोप लगाया था कि ‘लापता लेडीज’ की निर्देशक ने तो उन की फिल्म के कुछ दृष्य व कुछ संवाद तक ज्यों का त्यों चुराए हैं. मगर आमीर खान के दबाव में किसी ने भी अनंत महादेवन का साथ नहीं दिया और दो दिन बाद यूट्यूब ने भी ‘घूंघट के पट खोल’ को अपने चैनल से हटा दिया था.

मगर इस ज्यूरी के सदस्यों से यही उम्मीद की जा सकती है. इस ज्यूरी के सदस्यों में एक नाम निर्माता बौबी बेदी का है, जिन्होंने कभी आमीर खान की फिल्म ‘मंगल पांडे’ का निर्माण किया था. ऐसे में वह आमीर खान का साथ नहीं देंगें तो कौन देगा. ज्यूरी अध्यक्ष व असमिया फिल्मकार जोनू बरूआ की गिनती अलग तरह के फिल्मकारों में होती है. वे हिंदी में ‘मैं ने गांधी को नहीं मारा’ जैसी फिल्म का निर्देशन कर चुके हैं. ज्यूरी के सदस्य व फिल्मकार रवि जाधव विवादास्वद माने जाते हैं. उन की फिल्म ‘‘न्यूड’’ को इफी के पैनोरमा सैक्शन से अंतिम वक्त हटाया गया था.

भारत के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बताया कि फिल्म पूरी नहीं थी और इसलिए उस के पास सेंसरशिप प्रमाणपत्र नहीं था. जबकि निर्देशक उस वक्त रवि जाधव ने दावा किया था कि उन्होंने एक ईमानदार फिल्म बनाई है. केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) ने फिल्म देखने के लिए अभिनेत्री विद्या बालन की अध्यक्षता में एक विशेष जूरी का गठन किया. फिर इसे बिना किसी कटौती के पारित कर दिया गया और ए प्रमाणन दिया गया था. पर बाद में वह पाला बदल चुके थे.

रवि जाधव की फिल्म न्यूड को आगामी भारतीय अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (आईएफएफआई) के भारतीय पैनोरमा खंड से हटा दिया गया था. भारत के सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने बताया कि फिल्म पूरी नहीं थी और इसलिए उस के पास सेंसरशिप प्रमाणपत्र नहीं था. उस के बाद रवि जाधव अचानक बदल गए और कुछ समय पहले उन्होंने अटल बिहारी बाजपेयी की बायोपिक फिल्म ‘‘मैं अटल हूं’’ का निर्देशन किया था, जिसे दर्शक नहीं मिले. रवि जाधव के पास इतना अनुभव नहीं है कि वह औस्कर के लिए फिल्म का चयन कर सकें. ज्यूरी के अन्य सदस्य ऐसे हैं जिन से मैं स्वं परिचित नहीं हूं. ऐसे में हमें लगता है कि इस बार ज्यूरी सही नहीं बनाई गई है.

क्या ‘लापता लेडीज’ औस्कर लेकर आएगी?

जी नहीं..‘‘लापता लेडीज’’ भारत के लिए औस्कर ले कर आएगी, इस की संभावनाएं कम ही नजर आती हैं. पर आमीर खान व किरण राव को निजी तौर पर फायदा जरुर हो सकता है. ‘लापता लेडीज’ अंमिम 5 में पहुंचेगी, ऐसा हमें नहीं लगता. जबकि आमीर खान की फिल्म ‘लगान’ 2001 में अंतिम 5 तक पहुंच गई थी. पर तब इस फिल्म को ले कर एक माहौल बना हुआ था. जबकि ‘लापता लेडीज’ के साथ ऐसा नहीं है. ‘लापता लेडीज’ ने भारत में भी बौक्स औफिस पर कुछ खास कमाई नहीं की. दूसरी बात फिल्म पर चोरी के जो इल्जाम लगे हैं, उन से ‘औस्कर’ की ज्यूरी के लोग अनभिज्ञ हों, ऐसा नहीं हो सकता.

तीसरी बात ‘औस्कर’ में विजेता बनने के लिए निर्माता को ज्यूरी के हर सदस्य तक अपनी फिल्म पहुंचाने के साथ ही यह आश्वस्त करना होता है कि ज्यूरी के हर सदस्य उन की फिल्म को कोर मेरिट के आधार पर अपना वोट दे. जबकि ज्यूरी का सदस्य फिल्म को वेाट करने के लिए बाध्य नहीं होता है. ऐसे में अमरीका जा कर एकएक ज्यूरी के सदस्य से मिलना और उन्हें फिल्म दिखाना, उन से फेवर पाना आसान नहीं है.

वर्तामन समय में किसी फिल्म को ‘औस्कर’ अवार्ड देने के लिए साढ़े 9 हजार सदस्य वोट डालते हैं. क्या आमीर खान की टीम इतने लोगों तक पहुंच कर उन्हें अपने पक्ष में कर सकती है? हमें इस की उम्मीद कम ही नजर आती है.

लेकिन आमीर खान की फिल्म ‘लापता लेडीज’ औस्कर में गई है, इस का प्रचार होने पर जो ‘हाइप’ बनेगी, उस का फायदा आमीर खान अपनी आगामी प्रदर्शित होने वाली फिल्मों के लिए उठा सकते हैं.

हमें तो यही लगता है कि ‘औस्कर’ के लिए ‘लापता लेडीज’ का चयन कर ज्यूरी ने देश के बारे में नहीं सोचा. अन्यथा वह कांस में पुरस्कृत व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित पायल कपाड़िया की फिल्म ‘औल वी इमेजिन ऐज़ लाइट’ अथवा तीन राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म ‘आटम’ या मलयालम फिल्म ‘महाराजा’ का चयन किया जा सकता था.

फिल्म ‘महाराजा’ ने तो बौक्स औफिस पर सफलता के जबरदसत रिकार्ड बनाए हैं. इतना ही नहीं अब तो यह फिल्म नेटफ्लिक्स पर भी है. इतना ही नहीं ज्यूरी के पास मराठी फिल्म ‘‘घात’’ को भी चुनने का विकल्प मौजूद था. घात मराठी की फिल्म होते हुए भी ‘बर्लिन’ सहित 15 इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में धूम मचा चुकी है. ‘घात; वह फिल्म है, जिसे दर्शकों की मांग पर बर्लिन के तीन बड़े सिनेमाघरों में भी प्रदर्शित किया गया था. इस के अलावा इस फिल्म की विषयवस्तु रोचक है. फिल्म की कहानी महाराष्ट् के आदिवासी इलाके के जंगलों में नक्सलाइट और पुलिस बल के बीच पिस रहे आदिवासी इंसानों की कहानी बयां करती है.

सैक्स बिफोर मैरिज एंजौय करना नहीं इतना आसान

आज की जनरेशन, जिसे जूमर्स या पोस्टमिलेनियल्स के नाम से भी जाना जाता है, के लिए सैक्स सब से पहले है.

एक अध्ययन के अनुसार, भारत में प्रीमैरिटल सैक्स में जबरदस्त उछाल देखने में आ रहा है. ‘लव विल फौलो: व्हाई द इंडियन मैरिज इज बर्निंग’ की राइटर ने अपनी किताब में लिखा है कि एक अनुमान के मुताबिक, अर्बन इंडिया में 18 से 24 वर्ष के एज ब्रैकेट में 75 फ़ीसदी लोगों ने शादी से पूर्व सैक्स का अनुभव किया है.

वर्तमान में गर्लफ्रैंडबौयफ्रैंड के बीच शादी से पहले सैक्स करना कोई हैरानी की बात नहीं है. आंकड़ों की मानें तो भारत में 75 फीसदी लोग शादी से पहले संबंध बना चुके होते हैं और इस में भी पुरुषों की संख्या अधिक है.

चूंकि आज के समय में शादी की उम्र दिनोंदिन बढ़ती जा रही है, इसलिए लड़कालड़की के प्रीमैरिटल सैक्स करने की संभावना भी बढ़ जाती है.

प्रीमैरिटल सैक्स के हैं अपने रिस्क

मौडर्न होते जमाने में युवाओं के बीच कैजुअल सैक्स एक आम बात हो गई है. लेकिन इस के अपने रिस्क हैं. यही वजह है कि हर कोई इस से दूरी बनाए रहने की सलाह देता है. उन के लिए प्रीमैरिटल सैक्स करना आसान भी नहीं है. लड़के और लड़की को अनेक चैलेंजेस का सामना करना पड़ता है.

प्री मैरिटल सैक्स की राह नहीं आसान

• प्रीमैरिटल सैक्स करने वालों को परिवार और जानने वालों से बच कर व छिप कर सैक्स करने के लिए सेफ और सही जगह की तलाश करना भी एक टेढ़ा काम होता है.

• प्रीमैरिटल सैक्स में जब 2 लोगों को एकदूसरे की आदत हो जाती है और अगर उन के बीच किसी वजह से ब्रेकअप हो जाए तो ब्रेकअप के बाद मूवऔन करना मुश्किल हो जाता है और किसी और के साथ रिलेशन बनाने में परेशानी होती है.

• प्रीमैरिटल सैक्स करने वालों को अकसर इस बात का भी डर सताता रहता है कि कहीं सामने वाला उन्हें धोखा न दे.

• कोई भी कंट्रासैप्टिव मैथड 100 फीसदी सेफ नहीं होता. कई बार लड़के और लड़की के बीच प्रीमैरिटल सैक्स के दौरान कंडोम भी प्रैग्नैंसी के केस में 100 फीसदी प्रोटैक्टशन की गारंटी नहीं होते. ऐसे में लड़कियों को इस बात का हमेशा डर बना रहता है कि कहीं वे प्रैग्नैंट न हो जाएं और प्रैग्नैंट होने का मतलब होता है लाइफ में भूचाल का आ जाना. यानी, प्रैग्नैंसी से बचने के लिए उलटीसीधी पिल्स खाना, गाइनी के पास चक्कर लगाना, अबौर्शन की मुसीबत.

वैसे भी, लड़कियां कंडोम के यूज पर तभी ज़्यादा अड़ती हैं जब वे एक ही बौयफ्रैंड के साथ रैगुलर सैक्स संबंध बनाती हैं क्योंकि तब उन के पास प्लानिंग करने का टाइम होता है. लेकिन जब वे अचानक किसी कैजुअल पार्टनर के साथ सैक्स करती हैं तो इस बात की बहुत ज़्यादा संभावना होती है कि वे कंडोम का इस्तेमाल न करें. ऐसे में अनसेफ सैक्स की आशंका बहुत बढ़ जाती है.

• प्रीमैरिटल सैक्स को ले कर सोसाइटी भी अपने डबल स्टैंडर्ड दिखाने से पीछे नहीं हटती है. लड़कों के प्रीमैरिटल रिलेशनशिप्स को सोसाइटी उस नज़र से नहीं देखती जिन नज़रों से वह लड़कियों को देखती है. सोसाइटी की सोच के मुताबिक इन सब से लड़कों को कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन वही सोसाइटी एक लड़की की जिंदगीभर की इज़्ज़त को उस की वर्जिनिटी से जोड़ कर देखती है इसलिए अगर शादी से पहले पता चल जाए कि लड़की प्री मैरिटल सैक्स में इन्वौल्व थी तो सोसाइटी की नज़रों में उस लड़की से ज़्यादा बेशर्म कोई नहीं होता है. लड़की के ऊपर लांछन लगाया जाता है कि लड़की ने बेचारे लड़के को अपने ‘जाल’ में ‘फंसा’ लिया. इस तरह लड़की का ही चरित्रहनन होता है.

• अगर किसी लड़के या लड़की के कईयों के साथ प्रीमैरिटल सैक्शुअल रिलेशन हैं तो उस का सब से बड़ा नुकसान यह हो सकता है कि उन्हें सैक्शुअली ट्रांसमिटेड डीसीज हो जाए.

• कई बार कुछ लोगों को जो शादी से पहले किसी के साथ सैक्शुअल रिलेशन बना लेते हैं और फिर उस से शादी नहीं कर पाते तो उन्हें जीवनभर डर रहता है कि कहीं पति को शादी से पहले के संबंधों के बारे में पता न चल जाए. कुछ केसेज में कई बार लड़कियों को अपने पति से पहली बार संबंध बनाते समय मन में गिल्टी फीलिंग भी आ सकती है.

• भारतीय समाज शादी से पहले संबंध बनाने वालों को गलत नज़रों से देखता है और उन से घृणा करता है. अगर सोसाइटी में यह बात पता चल जाए कि लड़की ने शादी से पहले प्रीमैरिटल सैक्स किया है तो उस की शादी में अड़चनें आ सकती हैं. भारतीय समाज और परिवारों में प्रीमैरिटल सैक्स अभी भी वह लक्ष्मणरेखा है जिसे पार करते ही कोई भी, खासकर लड़की, फैमिली के नाम पर बेलिहाज़, बदनुमा दाग में तबदील हो जाता है.

• कई केसेज में प्रीमैरिटल सैक्स करने वाले में से किसी एक को बाद में दूसरे से ब्लैकमेलिंग का सामना भी करना पड़ सकता है.

• अगर कोई 2 लोग लंबे समय से एकदूसरे को डेट कर रहे हैं और शादी से पहले सैक्स कर रहे हों तो एक समय के बाद उन की सैक्सलाइफ बोरियत भरी हो जाती है.

• प्रीमैरिटल सैक्स के चक्कर में अपनी एजुकेशन पर ध्यान न दे पाने के कारण उस का असर कैरियर पर भी पड़ सकता है.

• कई बार एक बार हुए कैजुअल सैक्स में लड़के या लड़की द्वारा उसे जारी रखने का अनकहा प्रैशर शुरू हो सकता है.

कुलमिला कर प्रीमैरिटल सैक्स यूथ की पर्सनल चौइस है लेकिन इस के अपने फायदेनुकसान हैं. हर चीज की कीमत तो अदा करनी ही पड़ती है. कुछ चीज़ों का फायदानुकसान फौरन नजर आ जाता है, तो कुछ का भविष्य में नजर आ जाता है.

धर्म की दुकानदारी और राजनीति का ही हिस्सा है प्रसाद पर फसाद

देश भर के शराबी शराब पीने से पहले शराब में अंगुलिया डुबो कर उस की कुछ बूंदें जमीन पर छिड़कते हैं. वे ऐसा क्यों करते हैं यह उन्हें भी नहीं मालूम. कुछ मदिरा प्रेमी श्रुति और स्मृति की बिना पर जो बता पाते हैं उस का सार यही निकलता है कि यह रिवाज सदियों से चला आ रहा है जिस के पीछे मूल भावना तेरा तुझ को अर्पण वाली है. यानी यह एक रूढ़ि है जिस का पालन शराब पीने में भी ईमानदारी से किया जाता है. ऐसा करने से वे सीधे भगवान से जुड़ जाते हैं.

हालांकि देश के कुछ मंदिरों में शराब प्रसाद की शक्ल में भी चढ़ाई जाती है. इन में उज्जैन का काल भैरव और असम का कामख्या देवी का मंदिर प्रमुख है जहां शराब का प्रसाद चढ़ाने के भक्त बाकायदा इस प्रसाद को ग्रहण भी करते हैं. कामख्या देवी के मंदिर में तो शाकाहारी के साथ मांसाहारी प्रसाद जैसे मछली और बकरी का मांस चढ़ाए जाने का भी रिवाज है. यानी भगवान का प्रसाद चाहे मांस हो या मदिरा हो या लड्डू हों पवित्र माना जा कर खायापिया जाता है.

इस से किसी सनातनी की भावनाएं आहत नहीं होतीं और न ही किसी को किसी तरह का पाप लगता है. शराब को धरती माता को अर्पित की जाने वाली बूंदों की तरह ही प्रसाद का रिवाज है जिस के बारे में मोटे तौर पर लोग यही जानते और मानते हैं कि इस से भगवान प्रसन्न होते हैं और मनोकामनाएं पूरी करते हैं. वे फिर यह नहीं देखते कि भक्त ने क्या चढ़ाया है. भगवान भाव का भूखा होता है प्रसाद का नहीं, यह बात इन उदहारणों से साबित भी होती है गीता में ( अध्याय 9 श्लोक 26 ) जरुर एक जगह श्रीकृष्ण ने कहा है कि – ‘जो भक्त मुझे पत्र पुष्प फल और जल आदि वस्तु भक्तिपूर्वक देता है उस भक्त के द्वारा भक्तिपूर्वक अर्पण किए हुए वे पत्र पुष्पादि मैं स्वयं ग्रहण करता हूं.’

साफ जाहिर है कि कृष्ण शुद्ध अंतःकरण पर जोर देते हैं, खाध साम्रगी पर नहीं फिर भगवान को अन्न, मिष्ठान और धन वगैरह चढ़ाने की रूढ़ि या परंपरा कहां से शुरू हुई और किस ने की यह किसी को नहीं मालूम. लगता ऐसा है कि यह पंडेपुजारियों ने ही शुरू की होगी जिस से उन्हें फोकट में पकवान खाने को मिलते रहें और पैसा बरसता रहे जिस के लिए वे मंदिर में बैठते हैं.

ओशो यानी रजनीश ने कहा भी है कि अगर भक्त मंदिर में सिर्फ फूल ले कर जाएंगे तो वहां पुजारी भी नहीं टिकेगा. यानी भक्त श्रुति और स्मृति की आधार पर ही प्रसाद चढ़ाए जा रहे हैं. धर्म की इस भेड़चाल का ही नतीजा है हालिया तिरुपति का प्रसादम विवाद जिस में कथित रूप से लड्डुओं में चर्बी मछली वगैरह पाए गए.

मीडिया कोई भी हो गागा कर बता रहा है कि तिरुपति के लड्डुओं में चर्बी का पाया जाना हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ है जिस की सजा दोषियों को मिलनी ही चाहिए. सोशल मीडिया के जरिये बहुत से विवरण के साथ लोगों को यह ज्ञान भी प्राप्त हो गया है कि यह सब पूर्व मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी का किया धरा है जो इसाई हैं. उन्होंने देवस्थानम बोर्ड में पहले अपने चहेतों को ठूंसा और फिर चर्बी वाले टेंडर पास हो गए नहीं तो आजकल कल के ज़माने में कहां 300 – 350 रुपए किलो शुद्ध घी मिलता है.

यहां इन बातों के कोई ख़ास माने नहीं कि पहले कौन सी कम्पनी घी सप्लाई कर रही थी और अब कौन सी कर रही है और कैसे इस कथित साजिश का खुलासा हुआ. माने सिर्फ इतने हैं कि भाजपा के सहयोगी मौजूदा मुख्यमंत्री चंद्र बाबू नायडू की पहल और तत्परता के चलते इस साजिश का भांडाफोड़ हो पाया नहीं तो इस खानदानी इसाई मुख्यमंत्री ने तो हमारा धर्म भृष्ट करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

दूसरी तरफ रेड्डी भी नायडू पर आरोप लगा रहे हैं कि वे सरासर झूठ बोल रहे हैं. उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर इस प्रसाद कांड की जांच की मांग भी की है. आंध्र प्रदेश के उप मुख्यमंत्री दुखी हो कर 11 दिन के प्रायश्चित पर बैठ गए हैं लेकिन यह किसी को समझ नहीं आ रहा कि जब यह पाप उन्होंने नहीं किया तो वे प्रायश्चित किस बात का या किस के हिस्से का कर रहे हैं.

देश भर के सनातनियों की भावनाएं चर्बी वाले प्रसाद से ज्यादा इस बात से आहत हैं कि इसाई भी हमारा धर्म नष्ट भ्रष्ट करना चाहते हैं. मुसलमान तो यदाकदा खानेपीने की चीजों में थूकते और पेशाब भर करते हैं लेकिन इस बंदे ने तो थोक में करोड़ों को चर्बी खिलवा दी. यह विवाद गणेश के दूध पीने की अफवाह की तरह फैल भी सकता है. ताज़ी खबर यह है कि मुंबई के सिद्धि विनायक मंदिर के प्रसाद में भी चूहों की मिलावट होती है.

प्रसाद पर फसाद मचाने में धर्म गुरुओं का रोल और स्वार्थ भी अहम है. आर्ट औफ लिविंग वाले श्रीश्री रविशंकर ने कहा है कि यह ऐसी चीज है जिसे माफ नहीं किया जा सकता. यह दुर्भावनापूर्ण है और इस प्रक्रिया में शामिल लोगों के लालच की पराकाष्ठा है. इसलिए उन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए. उन की सारी सम्पत्ति जब्त कर लेनी चाहिए और दोषियों को जेल में डाल देना चाहिए. इस के बाद उन्होंने मुद्दे की बात यह कही कि सरकार और प्रशासन नहीं भक्तगण मंदिरों का संचालन करें. उन्होंने 1857 के विद्रोह का भी हवाला दिया. मंदिर प्रबंधन में साधु संतों की एक कमेटी होनी चाहिए जो इस पर निगरानी रख सके.

बात कैसे प्रसाद से मुड़ कर मंदिरों के मैनेजमेंट और मालिकाना हक झटकने पर आ रही है इसे एक और नामी वैष्णव संत रामभद्राचार्य के बयान से भी समझा जा सकता है जिन्होंने रविशंकर की हां में हां मिलाते कहा है कि 1857 में जो स्थिति मंगल पांडे की थी वही स्थिति हमारी है. अब हम किसी न किसी परिणाम पर पहुंचेंगे. इसलिए हम कह रहे हैं कि मंदिरों का सरकारी अधिग्रहण नहीं होना चाहिए सरकार हमारा अधिग्रहण बंद करे.

छोटेबड़े सभी साधु संत लट्ठ ले कर पीछे पड़ गए हैं कि मंदिर हमे सौंप दो जिस से हम बैठे बिठाए करोड़ों अरबों खरबों के मालिक बन जाएं. प्रसाद मिलावट से भगवान के इन दलालों का सरोकार क्रमश कम होता जा रहा है.

कब से तिरुपति के प्रसाद में यह कथित मिलावट की जा रही थी यह तो सीबीआई जांच के बाद ही उजागर होगा लेकिन इस मियाद में जिन हिंदूओं का धर्म भ्रष्ट हो चुका है उन का क्या होगा? क्या वे अब हिंदू नहीं रहे? क्या उन का शुद्धिकरण भी तिरुपति के मंदिर की तरह किया जाएगा?

इन सवालों पर सभी साधुसंत खामोश हैं सिवाय एक शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्द के जिन्होंने अयोध्या से कहा कि भक्त पंचगव्य का प्राशन करें इस से शरीर के भीतर छिपा हुआ पाप नष्ट हो जाता है. उन्होंने भक्तों को यह भी कहा कि अनजाने में ऐसा हो जाए जैसा कि हुआ तो भी पाप नहीं लगता है. इसलिए हिंदू किसी अपराधबोध से ग्रस्त न हों. उन्हें किसी प्रायश्चित की जरूरत नहीं. फिर भी जिन्हें ज्यादा गिल्ट फील हो रहा है वे पंचगव्य का सेवन कर लें. गौरतलब है कि अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के वक्त तिरुपति से आए कोई एक लाख लड्डू भक्तों को बांटे गए थे.

कम ही लोग समझ पा रहे हैं कि तिरुपति प्रसाद मुद्दे पर साधु संत एक बार फिर दो फाड़ ( शैव और वैष्णव ) हो गए हैं. अविमुक्तेश्वरानन्द अयोध्या तो गए लेकिन उन्होंने रामलला की मूर्ति के दर्शन नहीं किए. उन के मुताबिक यह मंदिर दोषपूर्ण तरीके से बना है और सरकार गायों की हिफाजत के बजाय गौमांस का कारोबार कर रही है. वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर भी जम कर बरसे कि उन्हें सनातन धर्म से ज्यादा कुर्सी से प्रेम है. इतना ही नहीं उन्होंने असुद्दीन ओबेसी को भी वोट देने की बात कह डाली. बकौल अविमुक्तेश्वरानन्द जो लोग सब से ज्यादा गौरक्षा की बात करते थे वही गौमांस का निर्यात कर रहे हैं.

गाय को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए यात्रा पर निकले इन शंकराचार्य ने वैष्णव संतों की तरह मंदिरों पर नियंत्रण की बात नहीं की लेकिन प्रसाद में मिलावट के आरोपियों को सजा दिलाने का राग वे भी अलापते रहे. जाहिर है आरोपियों को सजा भगवान नहीं बल्कि कानून देगा क्योंकि मूर्तियां प्रसाद या कुछ और भी नहीं खातीपीतीं इसलिए यह कथित अपराध भी भगवान के बजाय भक्तों के प्रति है.

मुद्दे की बात जगन मोहन रेड्डी का इसाई होना है, इसलिए हिंदू उन्हें ही एडवांस में दोषी मान चुके हैं ( गौरतलब है कि कोई दलित आदिवासी या ओबीसी हिंदू इस पर आपत्ति नहीं कर रहा क्योंकि तिरुपति, अयोध्या, वैष्णोदेवी, रामेश्वरम जैसे बड़े मंदिरों में जाने की उस की न तो हैसियत है और न ही उसे इस की इजाजत है). जबकि यह मामला बड़ा रहस्मय है जिस पर राजनीति भी जम कर हो रही है, न हो रही होती तो जरुर लगता कि यह भारत की ही बात है या कहीं और की है.

अगर रेड्डी की जगह कोई हिंदू मुख्यमंत्री होता तो क्या हिंदुओं की भावनाएं आहत नहीं होतीं? इस सवाल का जवाब यही मिलता कि तो भी होतीं फिर इसाई होने पर ही एतराज क्यों और अविमुक्तेश्वरानन्द के बीफ के सरकारी कारोबार के आरोप पर चुप्पी क्यों? क्या हिंदू इस बात पर सहमत हैं कि ऐसा अपराध फिर चाहे वह प्रसाद में मांस की मिलावट का हो या गौमांस के कारोबार का अगर वह हिंदूवादी सरकार करे तो यह जुर्म माफ़ी के काबिल है.

और वैसे भी धार्मिक भावनाएं होने का फसाद कुछ धार्मिक और राजनीतिक दुकानदार ही कर रहे हैं नहीं तो मामला उजागर होने के बाद भी 4 दिन में 14 लाख रुपए के लड्डू तिरुपति मंदिर में बिकना यह बताता है कि इस का कोई असर भक्तों या उन की भावनाओं पर नहीं पड़ा है. ठीक वैसे ही जैसे मिलावट के रोजमर्राई मामलों से नहीं पड़ता है. मिलावट को लोगों ने सहज स्वीकार लिया है और तिरुपति में विवाद के बाद भी रिकौर्ड लड्डुओं को बिक्री यह बताती है कि लोग डरते तभी जब इन्हें खा कर कोई बीमार पड़ा होता या लोग मरे होते. इस से इन भक्तों की भावना और आस्था ही प्रगट होती है कि आप लाख हल्ला मचा लो, प्रसाद चढ़ाने की परंपरा को कोस लो कि इस से गंद फैलती है, इन में तरहतरह की मिलावट होती है और यह बेवजह पैसों की बरबादी है उन की अन्धास्था पर कोई फर्क नहीं पड़ता. और जब तक यह अंधी आस्था है तब तक शराब की बूंदों की तरह प्रसाद चढ़ता रहेगा.

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