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बंगलादेश की पहचान बंगाली या मुसलिम?

बंगलादेश का राष्ट्रीय गीत है ‘आमार सोनार बांग्ला…’ लेकिन पिछले कुछ समय से देश के इसलामी कट्टरपंथियों ने वहां जिस तरह खून की होली खेलनी शुरू की है उस के कारण अब आमार रक्तिम बांग्ला कहने की नौबत आ गई है. पिछले कई वर्षों से बंगलादेश में ब्लौगरों के लिए जीना मुश्किल हो गया था. अपने विचार व्यक्त करने के बदले इसलामी कट्टरपंथियों द्वारा मौत दी जा रही थी. लेकिन अब ब्लौगरों के बाद लेखक, अलपसंख्यक, सैकुलर और आम लोगों को भी निशाना बनाया जा रहा है. पिछले साल अक्तूबर से ऐसे आम लोगों को भी कट्टरपंथी अपना निशाना बनाने लगे हैं जिन की सोच इसलाम विरोधी नहीं थी और न ही वे नास्तिक थे. हत्या की इन घटनाओं ने दुनियाभर का ध्यान खींचा है. पिछले साल सितंबरअक्तूबर में जापान और

इटली के नागरिकों की हत्या कर दी गई. इन का अपराध इतना ही था कि ये विदेशी थे. ये लोग न तो नास्तिक थे और न ही इसलाम विरोधी. इस के अलावा हाल के महीनों में हुई हत्याओं ने बंगलादेश के लोगों को काफी हैरत में डाल दिया है. ढाका के जगन्नाथ विश्वविद्यालय के छात्र नजीमुद्दीन समद की भरे बाजार गला रेत कर हत्या कर दी गई. समद कोई इसलाम विरोधी ब्लौगर नहीं थे. इस के बाद  राजशाही विश्वविद्यालय के प्रोफैसर रजाउल करीम सिद्दीकी की सरेआम गला रेत कर हत्या कर दी गई. इस घटना के ठीक 2 दिनों बाद जुल्हास मन्नान और उन के मित्र तनय फहीम को मार डाला गया. मन्नान को बंगलादेश में समलैंगिकों के अधिकारों के बड़े समर्थक के तौर पर जाना जाता था. वे समलैंगिकों के समर्थन में ‘रूपबान’ नामक पत्रिका भी निकालते थे. उन के करीबियों के मुताबिक मन्नान ने कभी इसलाम का विरोध नहीं किया. वे सिर्फ देश में समलैंगिकों को उन के अधिकार दिलाने की मुहिम छेड़े हुए थे. इस के बाद मई में एक मुसलिम सूफी संत, एक बौद्ध भिक्षु, एक हिंदू व्यवसायी और एक ईसाई डाक्टर की हत्याएं की गईं. इन सभी हत्याओं की जिम्मेदारी इसलामिक स्टेट (आईएस) ने ली जिस की घोषणा संगठन से जुड़ी वैबसाइट ‘अमक न्यूज’ पर की गई.

इन हत्याओं की सूची बहुत लंबी है और इस की जड़ें धार्मिक कट्टरपंथ में छिपी हैं. बंगलादेश में कट्टरपंथी संगठन किसी भी धर्मनिरपेक्ष लेखक, ब्लौगर या प्रकाशक को बरदाश्त नहीं कर सकते.  कट्टरपंथी संगठनों का असर बढ़ने की वजह से हाल में ईसाई तबके के लोगों पर भी हमले किए जाने के मामले बढ़े हैं. वर्ष 2013 में अलकायदा के सहयोगी अंसारुल्लाह बांग्ला टीम नामक एक कट्टरपंथी संगठन ने 84 धर्मनिरपेक्ष ब्लौगरों की एक हिटलिस्ट प्रकाशित की थी. इस में उन सभी लोगों के नाम शामिल थे जो अपनी लेखनी के जरिए धार्मिक समानता, महिला अधिकार और अल्पसंख्यकों के मुद्दे उठाते रहते हैं.

ब्लौगरों की ताकत

सरकार को शक है कि तमाम ब्लौगरों की हत्याओं के पीछे इसी संगठन का हाथ है. बावजूद इस के, सरकार के साथसाथ तमाम राजनीतिक दलों ने भी इस मुद्दे पर चुप्पी साध रखी है. इसलामी चरमपंथियों के एक गुट ने फरवरी 2013 में राजीव हैदर नामक एक धर्मनिरपेक्ष ब्लौगर की उस के घर के सामने ही हत्या कर दी थी. पिछले साल मई माह में मानवाधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी से संबंधित ब्लौगर बिजौय दास की सरेराह नृशंस हत्या कर दी गई.  इस के पहले फरवरी में उन के सहयोगी ब्लौगर अविजीत राय का भी ऐसा ही हश्र किया गया था. जिहादियों ने सनसनी तो फैला दी लेकिन ब्लौगरों के लेखन पर वे रोक लगाने में कामयाब नहीं हुए क्योंकि ब्लौगर भी बंगलादेश में एक ताकत और एक आंदोलन बन चुके हैं.

इस की शुरुआत हुई थी फरवरी 2013 में, जब शाहबाग के प्रदर्शनकारियों ने बंगलादेश के इतिहास को एक नया मोड़ दिया था. ढाका का शाहबाग चौक.  बंगलादेश मुक्ति संघर्ष का पहला बलिदान स्थल. फरवरी 2013 में जब बंगलादेश में बंगला मुक्ति संघर्ष के युद्ध अपराधियों को सजा देने को ले कर आंदोलन हुआ था, तब ढाका की सड़कों पर एक जनसैलाब उमड़ा. बंगलादेश का झंडा फहराते, 1971 के मुक्ति युद्ध के नारे लगाते लाखों युवा.  ‘जौय बंगला.’ ‘तुमी के? आमी के? –बंगाली, बंगाली’, ‘आमादेर एक ही दाबी, रजाकार एर फाशी’. उन की मांगे थीं- एक, 1971 के युद्ध अपराधियों को फांसी दी जाए.  दो, जमाते इसलामी और उस के छात्र संगठन ‘इसलामी छात्र शिविर’ पर प्रतिबंध और तीसरा, बंगला मुक्ति युद्ध के मूल्यों पर बंगलादेश की भावी दिशा तय हो. बंगलादेश के शिक्षित युवा पाकिस्तानी सेना, जमात के गुर्गों और रजाकारों द्वारा की गई लाखों बंगालियों की हत्या व लाखों बलात्कारों को भूलने को तैयार नहीं थे.

स्वतंत्रता व न्याय की लड़ाई

वर्ष 2008 के चुनावों के दौरान अवामी लीग ने वादा किया था कि वह युद्ध अपराधियों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण का गठन करेगी और युद्ध अपराधियों के खिलाफ मुकदमे चलाएगी, जिस की मांग सालों से चली आ रही थी. फरवरी 2013 में युद्ध अपराधियों के खिलाफ सजा सुनाई गई.   5 फरवरी, 2013 को युद्ध अपराधों की सुनवाई कर रही अदालत में ‘मीरपुर का कसाई’ नाम से कुख्यात अब्दुल कादिर मुल्ला पर फैसला आना था. उस पर 344 बंगालियों की हत्या करने का आरोप था.  आरोप सिद्ध हो चुके थे. फरियादी मौत की सजा के ऐलान का इंतजार कर रहे थे.  लेकिन फैसले से उन्हें सदमा लगा.  सैकड़ों हत्याओं और बलात्कारों के आरोपी को अदालत ने केवल आजीवन कारावास की सजा सुनाई. इस के कुछ घंटों बाद शाहबाग चौक पर नौजवान इकट्ठा होने लगे. इन युवाओं का नेतृत्व कुछ आजादखयाल ब्लौगर कर रहे थे. 

आने वाले दिनों में यहां हजारों युवा उमड़ने लगे. सोशल मीडिया सूचनाओं के आदानप्रदान का माध्यम बना. धीरेधीरे शाहबाग चौक ने सारी दुनिया के मीडिया का ध्यान खींच लिया. खास बात यह थी कि इस आंदोलन को चलाने वाला बंगलादेश का सब से बड़ा समुदाय था–मध्यवर्गीय युवा.  इसी बीच, आंदोलन का नेतृत्व कर रहे ब्लौगर्स में से एक अहमद रजीब हैदर की 15 फरवरी को हत्या कर दी गई. हत्यारे जमाते इसलामी से संबंधित थे. रजीब के खून ने आंदोलन को और ताकत दी.  संसद ने अब्दुल कादिर मुल्ला के मामले में पुनर्विचार पर एकराय दी. 21 फरवरी को शाहबाग आंदोलन विसर्जित हुआ.   एक तरफ प्रधानमंत्री शेख हसीना 1971 की लड़ाई के शहीदों को इंसाफ दिलाने की जिद पर अड़ कर एक नई क्रांति की शुरुआत कर रही थीं, एक ऐसी क्रांति, जो बंगलादेश के सामाजिक, राजनीतिक परिदृश्य को नस्ल, भाषा और संस्कृति आधारित राष्ट्रवाद के रंग में रंग रही है. बारबार एक ही बात कही जा रही थी कि हम बंगलादेशी पहले बंगाली हैं, बाद में कुछ और. और वहीं दूसरी ओर धर्मनिरपेक्ष ब्लौगरों की हत्या कर के अपने जिंदा होने का सुबूत देता इसलामिक कट्टरपंथ बंगलादेश की आजादी की लड़ाई के मूल सिद्धांतों को ही धता बता रहा था. इस से सवाल उठ रहा है, क्या है बंगलादेश की पहचान–पहले बंगाली या या पहले मुसलिम?

यह ऐसी लड़ाई है जिस में युवा ब्लौगर स्वतंत्रता और न्याय की लड़ाई के प्रतीक बन गए हैं. वे अपनी जान गंवा कर, खून बहा कर भी इस अलख को जगाए हुए हैं. दूसरी तरफ बंगलादेश के एक बड़े वर्ग पर  इसलामी कट्टरपंथियों का खासा प्रभाव है. आज भी कट्टरपंथी शाहबाग आंदोलन के खिलाफ यह दुष्प्रचार कर रहे हैं कि यह आंदोलन नास्तिक युवाओं द्वारा चलाया जा रहा है जो इसलाम विरोधी है.  राजनीतिक मतभेदों के चलते बंगलादेश साफसाफ 2 ध्रुवों में बंट चुका है. बंगलादेश की राजनीति 2 दलों के इर्दगिर्द घूमती है–अवामी लीग और बंगलादेश नैशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी. इन दोनों पार्टियों की लगाम 2 बेगमों के हाथों में है. अवामी लीग की प्रमुख शेख हसीना हैं. वे आज प्रधानमंत्री हैं. बीएनपी की डोर खालिदा जिया के हाथ में है. मुख्य राजनीतिक पार्टियों के बीच लंबे समय से चल रहे कड़े रिश्तों ने यहां हिंसा और उग्र प्रतिक्रियाओं का रूप ले लिया है. दोनों ही बेगमें एकदूसरे को फूटी आंख देखना पसंद नहीं करतीं. जनवरी 2014 में हुए विवादास्पद चुनाव के विरोध में खालिदा जिया की पार्टी बीएनपी देशव्यापी विरोध करती रही है. बीएनपी के नेतृत्व वाले विपक्षी गठबंधन ने धांधली के आरोप लगाते हुए इन चुनावों का बहिष्कार किया था.

विपक्ष के बहिष्कार के बीच शेख हसीना और उन के समर्थकों ने लगभग सारी सीटें जीत लीं थीं. असल में चुनाव से पहले ही इस की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होने लगे थे क्योंकि मतदान से पहले ही बंगलादेश में संसद की 300 सीटों में से 153 उम्मीदवारों को निर्विरोध चुन लिया गया था.

मौत का खूनी खेल

राजनीतिक दलों के शत्रुतापूर्ण विरोध के कारण बंगाल की खाड़ी उबल रही है.  मुद्दा इसी पहचान का है. एक तरफ है, ‘आमार बंगला, सोनार बंगला’ तो दूसरी तरफ है–‘आमार सोबोई तालिबान, बंगला होबे अफगानिस्तान.’ यानी हम सभी हैं तालिबान बंगलादेश होगा अफगानिस्तान. एक तरफ मुजीबुर्रहमान की क्रांति है, तो दूसरी तरफ जनरल नियाजी की हैवानियत. बंगाली नववर्ष पर प्रधानमंत्री शेख हसीना वाजेद ने सरकार की नीति को स्पष्ट करते हुए उन ब्लौगरों को आड़े हाथों लिया जो इसलाम और पैगंबर की आलोचना करते हैं. उन्होंने कहा, ‘‘इन दिनों मुक्तचिंतन के नाम पर धर्म के बारे में कुछ लिखना फैशन बन गया है. लेकिन मैं मानती हूं कि यह लेखन मुक्तचिंतन नहीं, खराब शब्द हैं.’’

यह सही है कि कुछ ब्लौगरों की टिप्पणियां ऐसी होती हैं जिन में इसलाम के प्रति तर्क सहित टिप्पणी होती है, मगर औनलाइन बहसों में धर्म और उग्रवाद के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा ही होती है. असल में सत्तारूढ़ दल के कुछ नेताओं और मुल्लाओं को ये टिप्पणियां रास नहीं आतीं. सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के महत्त्वपूर्ण मसले से पल्ला झाड़ ले, यह तो कायरता है और आतंकवाद को बढ़ावा देना हुआ. सरकार एक उभरते उग्रवाद से लड़ रही है, जो 2011 से अपने करतब दिखा रहा है. पर सरकार इसे विपक्ष का मुखौटा बता कर प्रचारित कर रही है. इस तरह वह बताना चाहती है कि लोकतांत्रिक सहमति के लिए जगह कम होती जा रही है. इस के जरिए वह पश्चिमी देशों का समर्थन हासिल करना चाहती है. मजेदार बात यह है कि 2015 तक सरकार कहती रही कि इन उग्रवादियों के देश के बाहर लिंक हैं. लेकिन जब कहा जाता है कि अलकायदा और इसलामिक स्टेट जैसे संगठनों ने बंगलादेश में अपनी संगठनात्मक इकाइयां बना ली हैं तो सरकार का रुख बदल जाता है. वह कहती है कि अंतर्राष्ट्रीय आतंकी संगठनों का बंगलादेश में कोई वजूद नहीं है. वैसे, ऐसे विश्लेषकों की भी कमी नहीं है जो मानते हैं कि शायद सत्ताधारी आवामी लीग और प्रधानमंत्री हसीना के लिए ब्लौगरों की हिटलिस्ट और ब्लौगरों की मौत विपक्ष को खत्म करने का अच्छा राजनीतिक मौका है. सरकार उन की मौत का जिम्मेदार विपक्ष को बना कर अपना राजनीतिक मकसद पूरा कर रही है.

राजनीति के ये अंतर्विरोध अपनी जगह हैं ही, मगर इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि बंगलादेश आज वैचारिक दोराहे पर खड़ा है–उस की बंगाली पहचान बुनियादी है या मुसलिम पहचान. जब तक यह फैसला नहीं होता तब तक यह खूनी खेल जारी ही रहने वाला है. बंगलादेश का आज तक का इतिहास हमें यही बताता है.

पिछड़ी जातियों को भुनाते बाबा

2 जून को मथुरा के जवाहरबाग में उठी आग की भीषण लपटों ने एक बार फिर इस देश की धार्मिक, सामाजिक व्यवस्था के वीभत्स रूप को उजागर किया है. इस घटना से सदियों से हाशिए पर रही उन जातियों की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक ताकत पाने की लालसा व आक्रोश दिखाई दिया जो शोषित, वंचित रहते आए हैं. ये लोग वे हैं जो किसी बाबा, गुरु या नेता में अवतारी मसीहा का रूप देखते हैं और भेड़ों की तरह उन के द्वारा हांके जा रहे हैं.

धर्म, जाति की आड़ ले कर निचली, पिछड़ी जातियां रामवृक्ष यादव जैसे बाबा, नेताओं के ठगने के हथियार हैं. भारत की राजनीति में ही नहीं, धर्म का चोला धारण किए गुरुओं, बाबाओं के साम्राज्य भी जातियों के दम पर टिके हैं. देश में जातियों का हर जगह इस्तेमाल होता आया है. मथुरा मामले में यह बात फिर जाहिर हुई है. रामवृक्ष यादव जवाहरबाग में जमा लोगों को आजाद हिंद सरकार का सपना दिखा कर 1 रुपए में 60 लीटर डीजल, 40 लीटर पैट्रोल, 12 रुपए तोला सोना और गरीबों को कर्जमुक्ति दिलाने जैसे दावे करता था. यहां तक कि रामवृक्ष यादव स्वयंभू सम्राट के तौर पर दरबार लगाता. धीरेधीरे प्रशासन भी उस के आगे झुकने लगा क्योंकि राजनीतिक सत्ता की शह उसे मिल रही थी. जयगुरुदेव का उत्तराधिकारी बनने की कोशिश में नाकाम रहा रामवृक्ष यादव अपना अलग पंथ बनाने में सफल रहा क्योंकि हजारों लोग उस के पीछे जुट गए थे.

जवाहरबाग में किलेबंदी कर रहा रामवृक्ष यादव अकेला ही नहीं था. हरियाणा में कुछ दिनों पहले संत रामपाल भी सैकड़ों लोगों के साथ बरवाला में सतलोक आश्रम में रह रहा था. उस के खिलाफ भी पुलिस को बड़ी कार्यवाही करनी पड़ी थी. उस के आश्रम में भी बाकायदा हजारों लोगों के रहने, खानेपीने की व्यवस्था थी. यहां तक कि लाठियां, बंदूक जैसे हथियारों का जमावड़ा भी मिला. रामपाल भी लोगों को कष्ट निवारण के ख्वाब दिखाता था. इस तरह देश में जयगुरुदेव, गुरमीत रामरहीम, आसाराम, निरंकारी हरदेव बाबा, निर्मल बाबा जैसों का साम्राज्य चल रहा है. लाखों, करोड़ों लोग इन के पीछे भाग रहे हैं. खास बात यह है कि इन बाबाओं के पीछे निचली पिछड़ी जातियों के लोग हैं जिन्हें पूजापाठ, धार्मिक कर्मकांडों से हजारों साल दूर रखा गया था पर अब ये ही जातियां बढ़चढ़ कर उन्हीं धार्मिक पाखंडों में भाग ले रही हैं जो इन को नीचा दिखाती थीं.

एक तरफ जयगुरुदेव, आसाराम, निरंकारी बाबा, रामपाल, गुरमीत रामरहीम हैं जो निचली, वंचित जातियों के बल पर अपनी सत्ता चला रहे हैं, तो दूसरी ओर स्वामी नित्यानंद, श्रीश्रीरविशंकर, रामदेव जैसे घंटाल हैं जो ऊंची, अमीर जातियों को साध कर अपनी दुकानदारी चला रहे हैं. सवाल है कि जयगुरुदेव, रामपाल, रामवृक्ष यादव, निरंकारी बाबा, गुरमीत रामरहीम जैसों के पीछे निचली जातियां क्यों उमड़ रही हैं? यह साफ है कि इन के ज्यादातर अनुयायी निचली जातियों के ही हैं. ये लोग अपने लाखों चेलों के दम पर शासन, प्रशासन तक को चुनौती देते दिखाई पड़ते हैं. इन के साम्राज्य को हाथ लगाने पर ये देश में आग लगा देने तक की धमकियां देते हैं. रामपाल की ऐसी ही धमकियों के चलते सेना तक का इस्तेमाल करना पड़ा था. अगर इन बाबाओं के दावों को सही मानें तो आसाराम के 1.5 करोड़, रामपाल के 20 लाख, निर्मल बाबा के 30 लाख, गुरमीत रामरहीम के 50 लाख, रामदेव के 3 करोड़ श्रीश्री रविशंकर के 1 करोड़, सतपाल महाराज के 20 लाख, सुधांशु महाराज के 20 लाख शिष्य हैं.

इन सब के पीछे इन की अपनीअपनी जातियोंउपजातियों का गणित है. आइए, एक नजर देखते हैं किस बाबा के पीछे कौनकौन सी जातियां रही हैं–

आसाराम : सिंधी समुदाय, पटेल, कुनकी, राजपूत, छोटी व्यापारी उपजातियां, पिछड़ी जातियों का मध्यवर्ग, नामदेव, बघेल, पाटीदार, सिखी, लोध, पटवा, गढ़वी, लोढा.

जयगुरुदेव : कश्यप, निषाद, यादव, राजभर, कुम्हार, कहार, मांझी, धीमर, गुर्जर, अहीर, पाल, गड़रिया, गुसाई, सोनकर, मौर्य, शाक्य, कोइरी, महार, माली, खाती, नाई, साहू, कुशवाहा, राछी, चौरसिया.

निरंकारी हरदेव : रामदासिया, मजहबी सिख, सोढ़ी, वाल्मीकि, ओढ़ तथा पिछड़ों की उपजातियां जांगड़ा, सुनार.

रामरहीम : इन के पाले में हरियाणा, पंजाब की ज्यादातर दबीकुचली उपजातियां हैं. इन में कांबोज, कुचेरा, डाकौत, खाती, नाई, तेली, निषाद आदि शामिल हैं.

निर्मल बाबा : पिछड़ी पंजाबी, हिमाचली, हरियाणवी जातियां जो अब नौकरियों, छोटेमोटे व्यापार में आ गई हैं.

रामपाल : जेल में बंद रामपाल को मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड की निचली पिछड़ी जातियों की ताकत प्राप्त थी.

इन के अलावा श्रीश्री रविशंकर, स्वामी नित्यानंद, रामदेव जैसे बाबा के पास सवर्ण जातियां ब्राह्मण, बनिया हैं जो व्यापार, शासन, प्रशासन, कौर्पोरेट, बौलीवुड में सक्रिय हैं. ये जातियां क्यों इन ढोंगियों की पिछलग्गू बन रही हैं? इस के पीछे सामाजिक कारण रहे हैं. अतीत से ले कर आज तक इन जातियों की जो बदतर सामाजिक स्थिति है, इन्हें ढोंगियों की शरण में लाने पर मजबूर करती है. इन गुरुओं के पास निचली, पिछड़ी जातियां स्वयं को सहज, सुरक्षित महसूस करती हैं. इन के यहां इन्हें अपमान का भय, अकेले जाने का भय नहीं रहता.

ये गुरु जातपांत के भेदरहित इंसानियत की बात करते हैं. इन के यहां किसी से जाति नहीं पूछी जाती. हरेक को चेला मूंड कर पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक कष्ट निवारण का भरोसा दिया जाता है. इन जातियों, उपजातियों को और क्या चाहिए. सैकड़ों सालों से भेदभाव सहते आए ये लोग यहां धर्म और गुरुओं से जुड़ कर खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं. समाज से बहिष्कृत रही ये जातियां अब जाग्रत हो रही हैं. वे अपने लिए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक अधिकार पाना चाहती हैं, इसलिए इन्हें ऐसे किसी न किसी धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक नेता की तलाश होती है जो इन के कल्याण व इन के हक की बात करे और लड़ाई के लिए आगे रहे. रामवृक्ष जैसे आदमी की शरण में रह रहे गरीब, पिछड़े परिवारों, जातियों में अभी भी कबीलाई सोच कायम है. इन जातियों सहित इन के नेताओं में मानसम्मान, सत्ता पाने या सत्ता की ताकत पाने की छटपटाहट है. जातिभेद की शर्मनाक समस्या अभी भी व्यापक स्तर पर मौजूद है. हजारों दलित, पिछड़ी उपजातियां पिछले 4 दशकों में सामने आई हैं. देश की सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था ने जातिव्यवस्था को इस दौर में और मजबूत किया है, इसे बनाए रखने में प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष भूमिका निभाई है.

काका कालेलकर की अध्यक्षता में 1956 में बने पहले पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट में 2,339 जातियों की पहचान हुई थी. फिर 1978 के बी पी मंडल आयोग ने 3,743 जातियां बताईं जिन की आबादी कुल जनसंख्या का 52 प्रतिशत थी. इस के अलावा 22.5 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जाति, जनजातियों की थी. मंडल रिपोर्ट लागू होने के बाद पिछड़ी जातियों की संख्या बढ़ती जा रही है. सरकारी रिपोर्टों में 1,500 जातियां अनुसूचित, 1,000 अनुसूचित जनजातियों और पिछड़ी जातियों को मिला कर देश में इन की संख्या 6 हजार से अधिक बैठती है. ये सभी जातियां सामाजिक भेदभाव की शिकार रही हैं, कोई कम, कोई ज्यादा.

यह बात भी सही है कि ये सभी जातियां, उपजातियां छोटेबड़े की भावना से ग्रस्त हैं और सभी सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक ताकत पाने के लिए छटपटा रही हैं. पिछले 4-5 दशकों में इन वंचित जातियों में सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक न्याय के आंदोलनों के परिणामस्वरूप जो चेतना पैदा हुई वह इन्हें गुरुओं, आश्रमों, मठों, मंदिरों की ओर ले जाने में सहायक सिद्ध हो रही है. इन जातियों की बाड़ेबंदी के लिए जहां लालू यादव, शरद यादव, मुलायम सिंह, मायावती जैसे नेता उभरे तो इन्हीं जातियों के दम पर आसाराम, गुरमीत रामरहीम, जयगुरुदेव, रामपाल, रामवृक्ष यादव, निरंकारी हरदेव जैसे गुरु भी सामने आए. इन जातियों ने अपने आर्थिक, सामाजिक कष्टों से मुक्ति का काम अपने हाथों में नहीं लिया, इन गुरुओं पर छोड़ दिया और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा इन्हें दानदक्षिणा में देने लगीं.

गुलामी की शिकार जातियां

गुरुओं, बाबाओं से इन जातियों से सुरक्षा की गारंटी मिलती है. यह धारणा कबीलाई समाजों से होती हुई आज भी कायम है. मथुरा के जवाहरबाग में अपना स्वयंभू साम्राज्य चला रहा रामवृक्ष यादव हिंदू समाज की उसी सड़ीगली सामाजिक व्यवस्था की पैदाइश है. रामवृक्ष भी आजादी की बात करता था. यह आजादी असल में हिंदू समाज की भेदभाव वाली व्यवस्था से मांगी जा रही थी. धर्मगुरुओं से उम्मीद पाले लोगों की संख्या करोड़ों में है. 2 हजार साल के जातिगत शोषण और गुलामी को झेल रही ये जातियां इसीलिए गुरुओं के चरणों में हैं. आज देश में गलीगली में गुरुओं की जो तादाद बढ़ रही है वह इन जातियों की वजह से है. ये जातियां इन गुरुओं की ताकत बन रही हैं. असल में धर्म की सब से बड़ी हिफाजत जातीय पहचान के कायम रहने से हो रही है. ‘जाति हटाओ’ जैसा आज कोई आंदोलन नहीं है. धर्म, जाति के प्रचारक अपने पक्ष में तर्कों से कम, विरोधी के खतरों के डर को भुना कर विभिन्न जातियों को अपने बाड़ों में रोके रखने में कामयाब हो रहे हैं.

पर यह भी सच है कि इन बाबाओं के महल ताश के पत्तों के महल साबित हो रहे हैं. एकएक कर इन के साम्राज्य ढह रहे हैं. आसाराम, रामपाल, रामवृक्ष जैसे बाबाओं की पोल खुलती है और उन से जुड़े लोग ठगे से महसूस करते हैं. ये बाबा खुद आपस में एकदूसरे की आलोचना में दिनरात लीन रहते हैं. इन्हें हरदम खटका लगा रहता है कि कहीं दूसरा प्रतिद्वंद्वी उन की समर्थक उपजाति, जाति को अपने पाले में न कर ले. यह प्रतिद्वंद्विता रामरहीम, निरंकारी, आशुतोष महाराज, जयगुरुदेव, आसाराम जैसे बाबाओं के बीच चलती आई है. असल में इन जातियों में असली सामाजिक चेतना अभी तक नहीं आई है. ये मंदिरों में प्रवेश, गुरुओं की भक्ति, पूजापाठ, मंदिर निर्माण को ही तरक्की मान बैठे हैं. पैसा, शिक्षा आ जाने के बावजूद इन के बंद दिमाग अभी अंधेरों में ही भटक रहे हैं. इन जातियों को समझना होगा कि उन का वास्तविक उत्थान जयगुरुदेवों, आसारामों, रामवृक्षों, आशुतोष महाराजों, रामरहीमों, निरंकारी हरदेवों जैसे बाबाओं, गुरुओं में नहीं है. इन की शरण लेना तो फिर से गुलामी है, धर्म का शिकंजा है. इस तरह तो ये जातियां देश में बाबाओं, गुरुओं की फैक्टरियां तैयार कर रही हैं, उन की खुद की तरक्की कहां हो रही है?

जीवन सरिता: संघर्ष और स्फूर्ति के सूत्र

प्रेम और त्याग की प्रतीक नारी ने अपने संघर्ष से पुरुष समाज के साथ कदम से कदम मिला कर समाज में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया है. आज की सबल व प्रगतिशील नारी के पीछे उस के संघर्ष की लंबी दास्तान है जिस के बल पर उस ने यह मुकाम हासिल किया है.

– जीवन एक संघर्ष, एक चुनौती है जिसे हर इंसान को स्वीकारना पड़ता है. संघर्ष में न सिर्फ उसे ऊर्जस्विता मिलती है, बल्कि जीवन की विविध दिशाओं व दशाओं से उस का परिचय भी होता है. मानव समाज का इतिहास स्त्री को सत्ता, प्रभुत्व एवं शक्ति से दूर रखने का है.

– नारी की संघर्ष क्षमता और ऊर्जा में ही उस की अपनी पहचान बनाने और पाने की ताकत छिपी होती है. जब उस पर बन आती है तो वह अपने घरसंसार, बच्चों के लिए जिंदगी की सारी चुनौतियों से रूबरू होती है, उन्हें स्वीकारती है.

– अपनी ही बनाई हुई दीवारों में औरत बंदी हो जाती है, अपने भीतर के न्यायालय में स्वयं को वह निर्णय सुनाती है, कारावास का दंड भोगती है. जिस के मन में आग लगे वही उसे बुझाने के रास्ते ढूंढ़ने को आमादा रहता है. जब तक पानी हमारे पैरों तले से नहीं गुजरता, पांव गीले नहीं होते. अपनी समस्या का समाधान पाना अब नारी का ध्येय है. पुरुषप्रधान समाज में हालात से मुकाबला करने की दिशा में एक संघर्ष है जो लक्ष्य की ओर जाता है.

– बदलते जमाने में नारी पुरुष की जागीर नहीं, उस के साथ कंधे से कंधा मिला कर चलने में सक्षम है. आधुनिक नारी, पुरुष की संपत्ति मात्र न हो कर उस की सहभागिनी है. वह घर और बाहर की हर परिधि में अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपने परिवार से, अपने पति से सहकार की अपेक्षा रखती है.

– नारी अपने हौसलों को विराम नहीं देती. उस की संघर्ष क्षमता और ऊर्जा में ही उस की अपनी पहचान है. एक नन्हा दीपक घनघोर अंधकार में भी पराजय नहीं मानता, ऐसे में नारी अपनी लड़ाई खुद लड़ते हए उस चक्र से मुक्त होना चाहती है जहां उसे समाज कैदखाने की घुटन बख्शता है.

– सिंध की बागी शायरा अतिया दाऊद लिखती हैं –

‘मुझे गोश्त की थाली समझ कर

चील की तरह झपट पड़ते हो

उसे मैं प्यार समझूं?

इतनी भोली तो मैं भी नहीं

मुझ से तुम्हारा मोह ऐसा है

जैसा बिल्ली का छिछड़े से.’

– कलम आज तलवार की धार बन कर बेजबान की जबान बन गया है. शब्दों की स्याही में आज की औरत की एक ऐसी रूदाद है, एक ऐसी आपबीती है जिस की एकएक पंक्ति में औरत के दिल के भरभराते एहसासों और जज्बों की तसवीरें सांस लेती हुई महसूस होती हैं. अब उन की हर चाहत, खामोशी के परदों को चीर कर अतिया के उपरोक्त शब्दों की गहराइयों के माध्यम से अपने जज्बों की अभिव्यक्ति बन कर गूंजने लगी है.

– औरत ने संघर्ष स्वीकार लिया है, चट्टानों से टकराना जान लिया है. पूरी तरह से वर्तमान को जीना उस ने सीख लिया है और भविष्य को अपने हाथों से संवारने का संकल्प ले लिया है. नई सदी की नारी की दुनिया में सबकुछ है, उस का घर, परिवार, नातेरिश्ते, समाज, संसार आदि.

– आज के समाज के लिए बेहतर होगा कि वह नारी को अपना सहभागी, सहयोगी मान कर उसे आदरसम्मान दे, जिस की वह हकदार है. अपनी चाह का परचम लिए वह जिस राह पर जाती है, वहां संघर्ष करते हुए राह में आई हर चुनौती को स्वीकारती है. वह विमर्श की नई चुनौतियों से भिड़ती हुई नए आयाम पाने में सक्रिय हो रही है. वह एक बेहतर जिंदगी जीने का हक पा रही है. आज उस का बोया हुआ संघर्ष का बीज आने वाले कल में फलित होगा जो मर्द और औरत की सीमारेखाओं को उलांघते हुए उस के जीवन में बदलाव लाएगा.

– नारी अस्मिता और नारी के स्वतंत्र व्यक्तित्व को ले कर साहित्यिक रचनाएं उन के प्रयासों को परवाज के पंख देंगी.

शायरा अतिया दाऊद कुछ यों कहती हैं :

‘तुम इंसान के रूप में मर्द

मैं इंसान के रूप में औरत

लफ्ज एक है

मगर माने तुम ने कितने दे डाले

मेरे जिस्म की अलग पहचान के जुर्म में…’

– स्त्रीवाद लेखन अस्मिता का प्रमाण है, कोई मनोरंजन नहीं. स्वतंत्र रूप से अपने भीतर की संवेदना को, भावनाओं को निर्भीक और बेझिझक स्वर में वाणी दे पाने में नारी सक्षम हुई है. अपने अंदर की छटपटाहट को व्यक्त करना अब उस का ध्येय बन गया है.

– मन के सहरा में शायद नारी का सफर सदियों से जारी है. अपने मनरूपी ज्वालामुखी से पिघले हुए लावे की तरह अपने कलम से निकली धारा में वह निरंतर प्रताडि़त मन की भावाभिव्यक्ति कुछ यों करती है :

‘मुझे खादपानी चाहिए,

फलनेफूलने के लिए,

डाली के साथ मैं खुश हूं

सिर्फ ‘मैं’ होने में.’ –

अंतरदेशी शादियां: प्यार न देखे देश

वर और वधू भिन्न संस्कृति व अलगअलग देशों से होते हैं तो शादियों की महिमा अद्भुत होती है. ऐसी शादियों के कुछ दृश्य असाधारण होते हैं. ऐसी ही एक जोड़ी है अवनी और फबनी की. अवनी एक अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन समूह के परियोजना प्रबंधक हैं. नस्ल से वे आधे गुजराती और आधे उत्तर प्रदेशी हैं. फबनी जरमनी की उ-मी हैं. एक छात्र विनिमय कार्यक्रम के अंतर्गत इन दोनों की मुलाकात जरमनी के एक बिजनैस स्कूल में हुई थी. उस समय अवनी की उम्र

23 वर्ष थी. जब अवनी का शिक्षासत्र खत्म हुआ तो इन दोनों ने निरंतर एकदूसरे से मिलने का निर्णय लिया. कुछ ही समय में उन दोनों ने शादी के बंधन में बंधने का निर्णय भी ले लिया. इस निर्णय को अपने अभिभावकों के समक्ष रखने में दोनों के दिल तितली की तरह धड़क रहे थे. भले ही उन दोनों के कुछ दोस्त इसे गलत मान रहे थे लेकिन उन दोनों ने अपना निर्णय अपनेअपने अभिभावकों के समक्ष रख ही दिया.

उन दोनों के अभिभावक उन के निर्णय से खुश थे सिवा एक चीज के कि शादी किस तरीके से की जाए, जरमन तरीके से या भारतीय तरीके से. लेकिन यह दुविधा भी शीघ्र ही हल हो गई क्योंकि जैसे ही फबनी के मातापिता ने मीरा नायर की फिल्म ‘मानसून वैडिंग’ देखी तो उन्होंने स्वयं को भारतीय शादी के खुमार में ढलने की तैयारी शुरू कर दी. वैसे भी जरमन तरीके से शादी आसान नहीं थी. अवनी के परिवार वाले जरमन संस्कृति के बारे में कुछ भी नहीं जानते थे. वहां उन्हें एक जरमन पादरी मिल गया, उस ने विवाह संस्कारों को सफल बनाने में पूरा सहयोग दिया.

अवनी का कहना था कि विवाह समारोह स्वयं में हौलीवुड फिल्म की भांति था. मेहमानों के लिए काफी आमोदप्रमोद के साधन उपलब्ध थे. हम लगभग हर किसी के साथ नाचे और भरपूर आनंद लिया.

दोनों ही परिवार एकदूसरे की रीतिरिवाजों को अपनाने में किसी प्रकार का संकोच नहीं कर रहे थे. फबनी का कहना था, ‘मुझे भारतीय परंपरागत विवाह बहुत पसंद है और उस से भी अधिक पसंद हैं भारतीय व्यंजन जो काफी जायकेदार होते हैं.’

अवनी का कहना है कि 2 संस्कृतियों के मिलन का उन्माद विवाह के बाद भी जारी है. निसंदेह चुनौतियां भी कम नहीं हैं. लेकिन अगर आप दूसरों के रीतिरिवाजों व संस्कारों के प्रति आदरभाव रखते हैं तो निश्चित ही आप अपने पारिवारिक संबंधों में आपसी सामंजस्य बैठा सकते हैं. वैसे भी जरमन व भारतीय संस्कृति में काफी समानताएं हैं, जैसा कि अधिकतर जरमनीवासी दूसरों के घर जाने पर अपने जूते भारतीयों की भांति घर के बाहर उतार देते हैं.

बंधन निकिता और राहुल का

निकिता वू और राहुल नायर की जोड़ी भी ऐसी ही एक जोड़ी है. इन का विवाहबंधन में बंधना दिन में देखे गए सपने की तरह था. जैसे आप एकदम से चौंक कर उठते हो और सोचते हो, ‘काश, यह सच हो जाए.’ और कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिन की सोची बात साकार हो जाती है. निकिता की सोच भी साकार हो गई. निकिता ने एक दिन विचारों में जो अपना खुद का विवाहपत्र देखा जिस पर लिखा था, निकिता संग राहुल और विवाहस्थल था गोआ. मजे की बात यह थी कि वह राहुल नाम के किसी लड़के को नहीं जानती थी. लेकिन संयोग से उस के इस विचार के कुछ दिनों बाद ही उस की मुलाकात राहुल नामक एक युवक से होती है.

निकिता और राहुल अपने कौमन मित्रों के माध्यम से एक दिन मुंबई में मिले जहां राहुल पायलट थे. इतने बड़े मित्रों के झुंड में केवल वे दोनों ही ऐसे थे जो कि एकदूसरे से वार्त्तालाप कर रहे एकदूसरे का सहयोग कर रहे थे. वहां कोई रूमानी जगमगाहट नहीं थी लेकिन वह शाम उन दोनों के लिए बहुत ही यादगार साबित हुई.

राहुल अकसर अपने पायलट लाइसैंस के लिए दिल्ली जाता तो उसे निकिता के साथ समय बिताने का मौका मिल जाता था. दिल्ली में मजनू का टीला स्थित तिब्बत मार्केट के एक रेस्तरां में चाय की चुस्की लेते हुए बिताए गए क्षणों को वे अद्भुत क्षण मानते हैं. दूरदर्शन श्रृंखला के लिए विदेश नीति पर विमर्श हो या यात्रा व रोमांचकारी कार्य के प्रति आकर्षण, दोनों का ही नजरिया समान था.

निकिता के पिता चीनी व माता नेपाली थीं. इसी प्रकार राहुल के पिता मलयाली व माता महाराष्ट्रियन थीं. इसलिए उन के लिए भिन्न संस्कृति का होना कोई मुद्दा नहीं था. निकिता अकसर मजाक करते हुए कहती थी कि हमारे बच्चों में प्रत्येक संस्कृति का चौथाई हिस्सा रहेगा.

राहुल का कहना है कि हम दोनों साथसाथ यात्रा करते हैं और साथसाथ रोमांचक खेल स्कूवा डाइविंग और पैराग्लाइडिंग करते हैं.

अनूठा मेल लौरेन व अभिराम का

लौरेन व अभिराम भी इसी दुनिया के बाश्ंिदे हैं. वे दोनों इस संबंध को स्वप्नलोक में तय हुआ मानते हैं. अभिराम ने बताया कि दिसंबर 2012 में एक औनलाइन शाकाहारी संगठन का सदस्य बनने के कुछ मिनटों के बाद ही संगठन की साइट उपयोगकर्ता एक युवती ने मुझ से वार्त्तालाप करना शुरू कर दिया. वह थी फार्मेसी की छात्रा लौरेन जोकि अनदेखे और अनजाने ही मेरे प्रति जुड़ाव महसूस कर रही थी. हम चैटिंग करते रहे. हम दोनों ही महसूस करने लगे कि हम दोनों के बीच कोई अबूझ रिश्ता है. आप इसे पहली नजर का प्यार भी कह सकते हैं.

लौरेन इंगलैंड के बाथ शहर में थी और अभिराम अमेरिका के न्यूजर्सी शहर में नौकरी करता था. अभिराम मूलतया नागपुर, भारत का निवासी है. चंद दिनों की चैटिंग में ही इन दोनों के बीच अटूट संबंध बन चुके थे और आखिरकार इन दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया था. अभिराम ने अपनी नौकरी छोड़ कर अपने मातापिता को यह खबर सुनाने के लिए भारत के लिए फ्लाइट आरक्षित करवा ली. लेकिन बीच में उस ने लंदन में 10 घंटे का विराम लिया जहां जून 2013 में अपनी फार्मेसी की डिगरी पूरी कर चुकी लौरेन से उस की पहली मुलाकात हुई और आखिर लौरेन का भी टिकट बनवा कर वे दोनों भारत आ गए. यहां एक सप्ताह बाद ही उन दोनों ने शादी कर ली.

लौरेन ने अपने ब्लौग में ‘इंगलिश वाइफ इंडियन लाइफ’ नामक हैडलाइन के तहत लिखा है, ‘‘मुझे भारत में रहना बहुत अच्छा लगता है लेकिन आप की कल्पना के अनुरूप यह कोई कमल का फूल या गुड़ का पुआ नहीं है. पहले हम दोनों ने चोरीछिपे मंदिर में शादी की तथा उस के बाद अप्रैल 2014 में सैकड़ों मेहमानों की उपस्थिति में परंपरागत साड़ी पहन कर व मंगलसूत्र धारण कर सात फेरे लिए और इस प्रकार विवाह के बंधन में बंधे.

‘‘भारत में (अपने बुने हुए सपनों के विपरीत) भारीभरकम साड़ी और लहंगा, सगाई की अंगूठी, मंगलसूत्र, 50 के दशक का थैला और उस में लाए गए निमंत्रणपत्रों में से एक को पसंद करना, शादी की खरीदारी करने के लिए 14 घंटे का पुणे तक का स्लीपर बस में सफर करना. सबकुछ पूर्व योजना के उलट था.’’ उन्होंने आगे लिखा है, ‘‘मैं ने जो लहंगा पसंद किया था वह बहुत ही सुंदर था लेकिन उस का साइज मेरी कदकाठी से बड़ा था.’’ उस ने पीला रंग पसंद करना सीख लिया जिसे वह नापसंद करती थी क्योंकि भारतीय संस्कृति में पीले रंग को शादीब्याह में महत्त्व दिया जाता है.

शादी के बाद से अब तक लौरेन ने अपने ब्लौग में अनेक पोस्टें भारतीय जीवनशैली पर आधारित जारी की हैं. जिन में हिना लगाने के तरीके, औनलाइन प्रेम की खोज, दुनिया के अन्य हिस्सों की प्रेम कहानियां, सलाहकारी प्रकोष्ठ, भाभी की पीड़ा तथा दूसरों के लिए भारतीय जीवनशैली में ढलने की सलाह प्रमुख हैं.

इन्हें भी आजमाइए

– बरसात में धुले गीले कपड़ों में वातावरण की आर्द्रता की वजह से बदबू आ जाती है. इसलिए फोल्डिंग क्लौथ रैक पर कपड़े डालें और रैक पंखे के नीचे रखें. कपड़े धोने में फैब्रिक कंडीशनर का इस्तेमाल करें.

– जब एसी का टैम्परेचर काफी लो रहता है तो शरीर को अपना तापमान मेंटेन रखने के लिए अत्यधिक काम करना पड़ता है जिस वजह से शरीर में लगातार थकान बनी रहती है.

– बरसात के दिनों में पानी दूषित हो जाता है, इसलिए छोटे बच्चों को उबला पानी ठंडा कर के दें. मिल्क सप्लीमैंट उबले पानी से तैयार करें और पूरी तरह ढक कर रखें. इस से वे डायरिया जैसी बीमारी से बचे रहेंगे.

– अगर पैरों की बदबू एक गंभीर समस्या बन चुकी है, तो एक टब में गरम पानी में चायपत्ती या 3-4 टी बैग डालें. लगभग आधे घंटे के लिए अपने पैरों को इस गरम पानी में रहने दें.

– यदि आप के बाल गंदे और औइली हैं तो आप का चेहरा भी साफ और फ्रैश नहीं दिखेगा. इसलिए शैंपू कर के अपने बाल और सिर साफ रखें.

– बरसात के दिनों में अलमारी में कपूर की टिकिया रखें. यह वातावरण की नमी को सोखती है जिस से अलमारी में रखे कपड़े सुरक्षित रहते हैं.

कश्मीर की कसक

पिछले कई महीनों से राष्ट्रीयता की बहस और देशभक्ति के नाम पर किसी को भी बुरा भला कह देने या देशद्रोह के नाम पर किसी को भी महीनों तक जेल में रख देने का नतीजा गंभीर होना ही था. जब देश का काफी हिस्सा कभी जाट आंदोलन, कभी पाटीदार आंदोलन, कभी जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के विवाद और कभी हैदराबाद या वर्धमान विश्वविद्यालयों के विवाद से जैसेतैसे निबट रहा हो, ऐसे में कश्मीर जैसे नाजुक मामले में दूरदर्शिता का अभाव महंगा तो पड़ेगा ही. महबूबा मुफ्ती ने वैसे तो फूंक फूंक कर भारतीय जनता पार्टी के साथ समझौता कर सरकार बनाई पर कश्मीर की असंतुष्ट जनता को वे पसंद नहीं आएंगी, यह महबूबा को भी मालूम था और भाजपा को भी. भाजपा भी अपनी तरफ से मामले को चिंगारी देने से बच रही थी पर 23 वर्षीय बुरहान वानी की सुरक्षाबलों के हाथों मौत ने अलगाववादियों को एक नया नाम दे दिया.

भारत की कोई सरकार कश्मीर में अलगाववादियों को पनपने नहीं दे सकती. पर यह भी पक्का है कि कश्मीर को हर समय बंदूकों के साए में रखना आसान नहीं है. कश्मीर के हर विवाद पर भारत पर विश्वभर में आरोप लगने शुरू हो जाते हैं और अब रूस भी उस तरह भारत का साथ नहीं देता जैसा शीत युद्ध के समय देता था. बुरहान वानी का मामला कश्मीरी जनता के लिए एक नया बहाना हो गया है जिसे महबूबा मुफ्ती आसानी से नहीं सुलझा पाएंगी. 2014 में भारतीय जनता पार्टी ने विकास करने और भ्रष्टाचार रहित सरकार देने का वादा किया था पर जनता तक उस का असर नहीं पहुंचा. कश्मीर में भी न विकास हुआ, न भ्रष्टाचार खत्म हुआ. कश्मीरी जनता ने पहले मुफ्ती मोहम्मद सईद और फिर महबूबा मुफ्ती का शासन काफी धैर्य से स्वीकार लिया था हालांकि राख के नीचे अंगारे पनप रहे थे. पर देश के कट्टरवादियों ने जो माहौल बनाया उस से हर कोई संशय में है कि भारतीय जनता पार्टी का विकास का एजेंडा प्राथमिक है भी या नहीं. देश के अन्य युवाओं की तरह कश्मीर के युवा भी एक सुखद भविष्य चाहते हैं.

वहां तेजी से बढ़ते कोचिंग व्यवसाय और कश्मीरियों की नौकरियों व व्यवसायों की ललक से लग रहा था कि युवाओं को अपने भविष्य से ज्यादा प्रेम रहेगा न कि राज्य की राजनीति से. इस मामले को गलत तरीके से हैंडल करने के चलते यह लग रहा है कि कश्मीर को एक बार फिर असंतोष के कगार पर ला खड़ा कर दिया गया है. बुरहान वानी जैसे अलगाववादियों को पनपने न देने का फर्ज हर सरकार का है और सरकार को हर संभव कदम उठाना पड़ेगा, पर यह भी नहीं भूला जा सकता कि इसलामी जिहाद के खूनी पंजे अब और पैने व खूंखार हो गए हैं. इसलामिक स्टेट का असर दुनियाभर में महसूस किया जा रहा है और सुन्नी मुसलिम देश भी इस की वारदातों से अछूते नहीं हैं. ऐसे में बारूद में ऐसी आग न लग जाए कि हमारा विकास का सपना आंतरिक विवादों में धूधू कर के जलने लगे.

अब फेसबुक पर कर सकेंगे “सीक्रेट कॉन्वरसेशन”

सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट फेसबुक ने फेसबुक मेसेंजर में एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन जोड़ने की सुविधा को शुरू कर दिया है. इसमें दो लोगों के बीच हुई चैट को उनमें से कोई भी यूजर टाइमर लगा कर मिटा सकता है. एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन में सिर्फ दो लोगों के बीच हुई आपसी बातचीत उन्हीं दो लोगों तक सीमित रहती है. उसे कोई तीसरा नहीं पढ़ सकता, फेसबुक भी नहीं.

फेसबुक ने शुरुआती दौर में ये सुविधा सबके लिए नहीं रखी है. फेसबुक ने अपने ब्लॉग पर लिखा है, “एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन का ये फीचर दो लोगों की चैट जिस डिवाइस से हो रही है, ये सिर्फ उसी डिवाइस में दिखेगा. “

तेज टेक्नालॉजी में किसी भी बातचीत या जानकारी को अपने पास सुरक्षित रखना या शेयर करना आसान हो गया है. इस चीज से बचने के लिए फेसबुक ने अपने यूजर्स के लिए ये स्नैपचैट जैसी सेल्फ डिस्ट्रक्टिंग ऑप्शन की सुविधा की शुरुआत की है. कॉन्वर्सेशन से मैसेज को हटाने के लिए यूजर्स इसका इस्तेमाल कर सकते हैं.

एंड-टू-एंड एनक्रिप्शन मैसेज के लिए

यूजर को चैटबॉक्स में, जिस यूजर से बात करनी हो उसे चुन कर, ऊपर की तरफ लिखे सीक्रेट कॉन्वरसेशन का ऑप्शन सेलेक्ट करना होगा. जब यूजर इसे सिलेक्ट करेंगे तो साथ ही टाइमर भी खुल जाएगा. एनक्रिप्ट किए गए मैसेज को तुरंत मिटाने के लिए इस ऑप्शन को सेलेक्ट किया जा सकता है.

चैट एनक्रिप्शन को पक्का करने के लिए फेसबुक अपने यूजर्स के लिए Device key  की सुविधा भी दे रहा है. सीक्रेट कॉनवर्सेशन के दौरान दो लोग उस Device key  का इस्तेमाल कर के चेक कर सकते हैं कि मैसेज एनक्रिप्ट हुआ है या नहीं.

विश्व का सबसे इंटेलिजेंट स्मार्टफोन हुआ लांच

साउथ कोरियन कंपनी सैमसंग ने अपने लेटेस्ट फोन सैमसंग गैलेक्सी नोट7 को लॉन्च कर दिया है. कंपनी का दावा है कि यह फैबलेट 'विश्व का सबसे इंटेलिजेंट स्मार्टफोन' है. गैलेक्सी नोट 7 कंपनी की नोट सिरीज में कुछ नए फीचर्स के साथ आया है.

यह सैमसंग का पहला फैबलेट है जिसे IP68 सर्टिफिकेशन मिला है. यानी कि यह फोन वॉटर और डस्ट रेजिस्टेंट है. साथ ही इसमें आइरिश स्कैनर भी लगा हुआ है.

गैलेक्सी नोट 7 फैबलेट में ऑप्टिकल इमेज स्टेबलाइजेशन के साथ 12MP का ड्यूल पिक्सल रियर कैमरा और ड्यूल एलईडी फ्लैश दिया गया है. सेल्फी के शौकीनों के लिए 5MP का फ्रंट कैमरा दिया गया है.

इसमें 5.7 इंच का क्वाड-एचडी (2560 x 1440 पिक्सल) ड्यूल एज सुपर एमोलेड डिस्प्ले है. इसकी पिक्सल डेनसिटी 518 पीपीआई है. इस स्मार्टफोन में स्क्रीन पर कॉर्निंग गोरिल्ला ग्लास 5 प्रोटेक्शन दी गई है.

साथ ही इनबिल्ट स्टोरेज 64 GB है. 256 GB तक माइक्रोएसडी कार्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है.ऐंड्रॉयड 6.0.1 मार्शमैलो पर चलने वाले इस स्मार्टफोन में 64-बिट 14एनएम ऑक्टा-कोर प्रोसेसर दिया गया है.

यह स्मार्टफोन ब्लू कोरल, गोल्ड प्लेटिनम, सिल्वर टाइटेनियम और ब्लैक ऑनिक्स कलर वेरियंट्स में मिलेगा.

इस फोन में 3,500mAh की बैटरी फास्ट चार्जिंग टेक्नॉलजी के साथ दी गई है. फोन में फिंगरप्रिंट सेंसर और आइरिस स्कैनर भी दिया गया है.USB Type-C कनेक्टिविटी पोर्ट के साथ कंपनी ने नोट 7 के लिए गियर VR को भी इंट्रोड्यूस किया है.

फोन की कीमत के बारे में अभी कोई खुलासा नहीं किया गया है. सैमसंग गैलेक्सी नोट 7 को 19 अगस्त बीच मार्केट में आ सकता है.

गैलेक्सी नोट7 का डाइमेंशन 153.5×73.9×7.9 मिलीमीटर है और वजन 169 ग्राम है.

कनेक्टिविटी फ़ीचर की बात करें तो स्मार्टफोन में वाई-फाई 802.11 ए/बी/जी/एन/एसी, ब्लूटूथ वी4.2, एनएफसी और जीपीएस फीचर दिए गए हैं. S Pen में नए एयर कमांड फंक्शन्स दिए गए हैं.

कितनी बदल गई रंगोली

आज की फटाफट और भागदौड़ की जिंदगी के बीच रंगोली बनाने के तौर-तरीके भी काफी तेजी से बदल रहे हैं. रंगोली जमीन या कपड़े पर बनाई जाती है, पर आजकल कागज, प्लाई वुड, हार्ड बोर्ड, सनमाईका, कैनवास आदि पर भी बनाई जाने लगी हैं. पहले त्यौहारों के आने से पहले ही महिलाएं रंगोली बनाने की तैयारियों में जुट जाती थीं, लेकिन अब तो त्योहारों के मौके पर कागज और प्लास्टिक पेपर पर प्रिंटेड रंगोली भी धडल्ले से बिकती हैं. जिन्हें रंगोली बनाना नहीं आता या जिनके पास समय की कमी है, वे अपने घरों में रंगोली का स्टीकर चिपका कर ही उत्सवी माहौल बनाने की कोशिश करते हैं.

पटना में रंगोली के स्टीकरों का थोक कारोबार करने वाले विनीता सेल्स के उपेंद्र सिंह बताते हैं कि हर साल दीपावली के मौके पर करीब 3 करोड़ रूपए के रंगोली के स्टीकर बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश आदि राज्यों में बिक जाते हैं. खुदरा बाजार में एक स्टीकर साइज के हिसाब से 20 से 250 रूपए तक में बिकता है.

आमतौर पर रंगोली बनाने के लिए फूलों, रंगों, अबीर, चावल दानों और लेई आदि का इस्तेमाल किया जाता है. देखने में बिना किसी ताम-झाम वाले इस कला का अपना अलग आकर्षण, खूबसूरती और पहचान है. इसमें भारतीय कला की बुनियादी सोच छिपी हुई है. पटना के गुरूदेव पेंटिग क्लासेंज की कलाकार अनुपम कहती हैं कि हमारे देश में कभी भी कला के लिए कला वाली सोच नहीं मानी गई, यहां हर कला के पीछे कोई न कोई मकसद जरूर होता है. हर त्योहार, रस्म और विधि-विधान में कला का खूबसूरती से इस्तेमाल कर माहौल को रंगीन और उत्सवी बना दिया जाता रहा है.

रंगोली बनाने में ज्यादातर कमल और सूरजमुखी के फूल, शंख, दीपक, सूरज, पक्षी, मछली आदि के चित्रा उकेरे जाते हैं. खास बात यह है कि ज्यादातर रंगोली गोलाई में ही बनाई जाती हैं. इसे हाथ की उगंलियों, बांस के सींक, कपड़ों आदि से बनाया जाता है. रंगोली बनाने में सफेद रंग का ज्यादा इस्तेमाल किया जाता है, क्योंकि सफेद रंग को शांति का प्रतीक माना जाता है और जहां शांति का माहौल है, वहीं तरक्की आती है.

भारत की काफी पुरानी कला परंपरा में रंगोली शामिल है और भारतीय कला में इसे 64वें कला का नाम दिया गया है. त्योहारों और किसी नए काम की शुरुआत के मौके पर रंगोली से घरों की दीवारों, दरवाजों, सीढ़ियों आदि जगहों पर रंगोली बना कर त्योहारों में नया रंग और उमंग भरा जाता रहा है. दक्षिण भारत में रंगोली की परंपरा काफी मजबूत है. रंगोली की खूबसूरती और इसके मोहपाश आज के भाग-दौड़ के जीवन में भी कायम है. लोग खुद भले ही रंगोली न बना सकते हों पर बाजार में मौजूद रंगोलियों के स्टीकरों को चिपका कर अपनी संस्कृति से जुड़ाव को महसूस तो कर ही सकते हैं.

उड़ीसा के मशहूर कलाकार अनिल कुमार बल बताते हैं कि बिहार और मध्य प्रदेश में रंगोली के तरह-तरह के नमूने मशहूर हैं. बिहार के दरभंगा जिला में ‘धूली चित्रा’ के नाम से बनाई जाने वाली रंगोली चावल के घोल से बनाई जाती है. मध्य प्रदेश में मानसून के खत्म होने पर घरों के दरवाजों पर फूलों और पत्तियों से रंगोली बनाई जाती है. राजस्थान की रंगोली की सबसे खास बात यह है कि उसमें चटख रंगों का भरपूर इस्तेमाल किया जाता है.

केरल में ओणम के मौके पर बनाई जाने वाली रंगोली में फूलों का इस्तेमाल किया जाता है. फर्श पर रंगोली का चित्र बना कर खाली जगहों को गुलाब, गेंदा, सूरजमुखी, चमेली आदि फूलों की पंखुड़ियों को सलीके से भरा जाता है. हर राज्यों में रंगोली को अलग-अलग नाम से पुकारा जाता है. बिहार में इसे अरिपन तो उत्तर प्रदेश में चौक पूरना कहा जाता है. राजस्थान में इसे मांडना के नाम से पुकारा जाता है तो बंगाल में अल्पना कहा जाता है. कर्नाटक में रंगवल्ली तो तमिलनाडु में कोल्लम के नाम से पुकारा जाता है.

देहातों में पारंपरिक तरीके से रंगोली बनाई जाती है और उसे बनाने के लिए फूलों, चावल, आटा आदि का इस्तेमाल किया जाता है, पर शहरों में रंगोली बनाने के लिए जिंक औक्साइड, पोस्टर कलर, ब्रुश आदि का इस्तेमाल किया जाने लगा है. मार्बल और टाइलों के फर्श पर परंपरिक तरीके से रंगोली बनाना मुमकिन नहीं होता है, इसलिए आर्टिफिशियल रंगों का इस्तेमाल किया जाता है. तरह-तरह के रंगोली के डिजायनों के स्टीकर बाजार में मिलने लगे हैं. कागज और प्लास्टिक पेपर पर बने रंगोलियों के नमूनों को दरवाजों और कमरों में चिपका दिया जाता है. इससे तो साबित हो जाता है कि लोगों को भले ही रंगोली बनाना नहीं आता हो या उसे बनाने की फुर्सत नहीं हो लेकिन उसे घर-घर में आज भी पसंद किया जाता है.

इस ऐप से आप खुद लगा सकते हैं कैंसर का पता

कैंसर ऐसी बीमारी है जिसका पता अगर शुरूआत में चल जाए तो इसे पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है. स्किन कैंसर के साथ भी ऐसा ही है. स्किन कैंसर में शुरुआत से ही स्किन के किसी हिस्से में बदलाव दिखाई देने लगते हैं. कई बार मोल से भी इसकी शुरुआत हो जाती है. ऐसे में हम आपको बता रहे हैं SkinVision ऐप के बारे में जिसकी मदद से आपका स्मार्टफोन ही बता देगा कि आपको कैंसर है या नहीं.

क्या है SkinVision

SkinVision एक कैंसर अवेयरनेस मोबाइल ऐप्लिकेशन है. ये यूजर को स्किन में आ रहे चेंजेस या मोल को ट्रैक करने में मदद करता है. इस ऐप की मदद से अर्ली स्टेज में ही पता लगाकर इसे बढ़ने से रोका जा सकता है.

ऐप का एडवांस कैमरा हाई क्वालिटी पिक्चर्स लेने में मदद करता है. इन पिक्चर्स को एनालाइज करके कैंसर रिस्क के बारे में पता लगाता है और यूजर को रेकमेंडेशन्स भेजता है. हालांकि ये ऐप आपको सिर्फ कैंसर रिस्क के बारे में बता सकता है, ये डॉक्टर को रिप्लेस नहीं करता. बीमारी का पता लगने पर आपको डॉक्टर के पास जाना ही पड़ेगा.

ऐसे करें यूज

– ऐप ऑन करके फोन के कैमरा को मोल या स्किन के उस हिस्से पर ले जाएं जहां आपको चेंज नजर आ रहा है.

– ऐप अपने ऑटोमैटिक कैमरा सेटिंग में फोटो खींचेगा.

– इसके बाद फोटो को एनालाइज करके आपको रेकमेंडेशन भेजेगा.

– SkinVision ऐप आपको पिक्चर्स आर्काइव करने की भी सुविधा देता है.

– इससे आप स्किन में आ रहे चेंजेस की फोटोज आर्काइव करके डॉक्टर को दिखा सकते हैं.

किसके लिए है SkinVision

– कोई भी इस ऐप को यूज कर सकता है.

– ये यूजर की स्किन टाइप के हिसाब से रिस्क प्रोफाइल चेक करता है और अगर कैंसर नहीं है तो फ्यूचर में भी इससे बचे रहने के लिए टिप्स और सजेशन्स देता है.

कैसे करें साइन इन

ऐप यूज करने के लिए सबसे पहले इसे गूगल प्ले स्टोर या iTunes से डाउनलोड करें.

– इसके बाद ऐप ओपन होने पर 'I am new' ऑप्शन सिलेक्ट करें.

– इंस्ट्रक्शन्स फॉलो करें.

– अपने ई-मेल ऐड्रेस या फेसबुक अकाउंट से लॉगइन करें.

– skinvision.com से भी अपनी प्रोफाइल एक्सेस कर सकते हैं.

क्या ये साइंटिफिक तरीके से काम करता है?

– इस ऑनलाइन असेसमेंट (अल्गोरिद्म) को 2 साइंटिफिक स्टडीज में टेस्ट किया गया है.

– पहली स्टडी म्यूनिक के मैक्सिमेलियन यूनिवर्सिटी के डर्मिटोलॉजी क्लीनिक में 2013 में की गई थी.

– दूसरी स्टडी नीदलैंड्स के कैथरिन हॉस्पिटल में 2014 से 2016 तक की गई.

क्या है कॉस्ट?

– ऐप का एक महीने का ट्रायल वर्जन फ्री में डाउनलोड और यूज किया जा सकता है.

– इसके बाद आप इसके 3 सब्सक्रिप्शन प्लान हैं जिनमें से कोई भी आप ले सकते हैं.

– 1 महीने के लिए 499 यूरो (करीब 37285.12 रुपए)

– 3 महीने के लिए 999 यूरो (करीब 74644.96 रुपए)

– 12 महीने के लिए 24,99 यूरो (करीब 186724.48 रुपए)

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