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रियो ओलंपिक पर मंडरा रहा आईएस का खतरा

ब्राजील की राजधानी रियो डी जेनेरो में 5 अगस्त से शुरू हो रहे ओलंपिक गेम्स पर इस्लामिक स्टेट (आईएस) के हमला का खतरा मंडरा रहा है. इसके मद्देनजर यहां की सरकार ने रियो और आसपास के क्षेत्र में सुरक्षा इंतजाम पाबंद कर दिए हैं.

ब्राजील के सुरक्षाबल पिछले कई महीनों से अमेरिकी सेना से आतंकवादी हमलों का कड़ा जवाब देने के लिए प्रशिक्षण ले रहे हैं. ओलंपिक की सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए ब्राजील को अमेरिका और फ्रांस का साथ मिल रहा है. 

फ्रांस, जर्मनी और अन्य पश्चिमी देशों में लगातार हो रहे आईएस हमलों को देखते हुए ब्राजील में ओलंपिक गेम्स की सुरक्षा को कड़ा करने का काम पिछले कुछ महीनों से शुरू हो गया है. रियो के करीब और जहां-जहां एथलीट ठहरेंगे, उन होटलों व रेस्तराओं में सुरक्षा के कड़े प्रबंध कर दिए गए हैं.

ओलंपिक पर फिक्सिंग का खतरा

एक ब्रिटिश अखबार के मुताबिक ओलिंपिक में होने जा रहे मुक्केबाजी के कई मुकाबले फिक्स हो सकते हैं. 'गार्जियन' के मुताबिक, 'कई जज और रेफरी कथित तौर पर मुकाबलों से छेड़छाड़ करने को तैयार हैं', लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुक्केबाजी संघ (एआईबीए) ने इन खबरों को 'अफवाह' कहकर उड़ा दिया है.

VIDEO: हम तो लड़कियों को छेड़ेंगे, क्योंकि हम हैं भारतीय मर्द

लड़कियों पर अश्लील कमेंट करना या फब्ती कसना लड़कों का फैशन सा बन गया है. वो अक्सर लड़कियों पर इतने गंदे कमेंट करते हैं, कि कभी कभी तो लड़की उन्हें चांटा भी मार देती है, पर ये लड़के कभी अपनी हरकतों से बाज नहीं आते हैं क्योंकि उन्हें तो कमेंट करने की आदत पड़ी हुई होती है ना. तो इस लिए वो तो कमेंट करेंगे ही, चाहे कुछ भी हो जाए, पर कभी किसी ने सोचा है की ऐसे कमेंट से आप पर और उस लड़की पर कितना प्रभाव पड़ता है.

आपके एक कमेंट से उस लड़की को लड़कों से नफरत हो जाती है और वो लड़कों को देखना भी पसंद नहीं करती, क्योंकि जब भी वो इस बारे में सोचती है, तो आपके वो गंदे कमेंट उनको याद आते हैं और इसी वजह से वो लड़कों से नफरत करने लगती है.

सोशल मीडिया में भी महिलाओं पर वार

‘यार गुस्सा क्यों हो रही हो, केवल हंसी मजाक था’, अब इसका मतलब यह नहीं है कि मैं भी ऐसा ही सोचता हूं.’ वो शायद उसकी कोई परिचित महिला मित्र थी. लड़के ने किसी ग्रुप में किसी लड़की के बारे में कोई मजाक किया था. जो उसकी दोस्त को अच्छा नहीं लगा. लड़का सफाई भी दे रहा था और बीच-बीच में यह भी कहता ‘इतना तो चलता है’, ‘सब करते हैं’, ‘और सब भी तो कह रहे थे’, ‘तुम कुछ ज्यादा सोचती हो’.

हमारे आसपास हर रोज ऐस होता है. महिलाओं को टारगेट करते चुटकले, अभद्र शब्द, गालियां और अश्लील टिप्पिणियां बड़ी असानी से कह-सुन ली जाती हैं. सोशल मीडिया ने महिलाओं के प्रति ऑनलाइन हमलों को और तेज कर दिया है. अगर आप सेलिब्रिटी या नेता हैं, धर्म, राजनीति, समाज, खासकर महिलाओं के मुद्दों पर खुलकर राय रखती हैं, तो ऑनलाइन हमलों की आशंका बढ़ जाती है. पढ़े-लिखे कहे जाने वाले लोग महिलाओं को अपमानित करने वाले चुटकले, फोटो व संदेश फॉरवर्ड व शेयर करते चले जाते हैं. महिलाओं की वॉल पर अश्लील बातों से लेकर मार-पीट व यौन शोषण की धमकियां दी जाती हैं.

हाल में अनुष्का शर्मा और दिल्ली पुलिस ऑफिसर मोनिका भारद्वाज दोनों को सोशल मीडिया पर ऐसे ही हमले झेलने पड़े. क्रिकेट प्रेमी अनुष्का को विराट के लिए पनौती बताने में मस्त थे. वहीं मोनिका भारद्वाज का दोष इतना था कि उन्होंने एक डेंटिस्ट की हत्या करने वालों के धर्म के बारे झूठी अफवाहों का खंडन करते हुए मामले को सांप्रदायिक न बनाये जाने की अपील की. नरगिस फाखरी, बरखा दत्त, दीपिका पादूकोण, कविता कृष्णन, श्रुति सेठ, सोनिया गांधी, स्मृति ईरानी, सानिया मिर्जा, सायना नेहवाल, अरूंधति रॉय आदि महिलाओं की एक लंबी फेहरिस्त है, जो ऑनलाइन हमलों का शिकार हुई हैं. महिलाओं के विचार, पार्टी, धर्म, जाति, प्रतिष्ठा, रंग व देह का मजाक बनाते हुए लोग शालीनता की किसी भी तरह की सीमा को आसानी से लांघ जाते हैं. यह केवल गुस्सा, कुंठा, झुंझलाहट नहीं है, कहीं न कहीं इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द पुरुषवादी सोच और महिलाओं को कमजोर समझे जाने की मानसिकता का नतीजा हैं. और ऐसा केवल भारत में ही नहीं हो रहा.

कानून में क्या है प्रावधान

भारतीय दंड संहिता की धारा 509 में महिलाओं के शील व सम्मान को ठेस पहुंचाने वाले शब्द, संकेत या हरकत को दंडनीय माना गया है. जिसके लिए जुर्माना व जेल दोनों हो सकती हैं. इसी तरह धारा 354 डी में ऑनलाइन या ऑफलाइन किसी भी तरह से पीछा करना यानी स्टॉकिंग को अपराध माना है. हालांकि ऑनलाइन हमलों के मामलों में कई बार किसी एक की जिम्मेदारी तय करना मुश्किल होता है. खासकर सोशल मीडिया ने ऐसे लोगों को एक मंच दे दिया है, जिन्हें दूसरों को तंग करना, उकसाना, अनावश्यक बहस करना अच्छा लगता है. भले ही आप किसी को जानते हैं या नहीं. ऑनलाइन ट्रोलिंग एक तरह से इस साइबर अपराध को छोटा व सामान्य बना देने की शब्दावली है.

ऐसे में क्या महिलाओं को सोशल मीडिया से दूर रहना चाहिए? बिल्कुल नहीं. नजरअंदाज न करें, पर हर किसी पर चीखना-चिल्लाना भी जरूरी नहीं. जहां जरूरी हैं वहां प्रतिक्रिया भी दें और जरूरत पड़ने पर कानून की सहायता भी लें. आप साइबर सेल और पुलिस की मदद ले सकती हैं.

कोर्ट के विवादित आदेश

इटली की कोर्ट के एक फैसले ने देश में तहलका मचा दिया था. कोर्ट के फैसले के मुताबिक अब आप ऑफिस में महिला को जी भर कर छू सकते हैं. ऑफिस में महिला से छेड़खानी कर सकते हैं. अब यह सब कुछ अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा. कोर्ट का कहना है कि ऑफिस में यह सब लीगल है, बशर्तें आपके मन में उस महिला के साथ सेक्स करने का ख्‍याल न आए.

यह फैसला अदालत ने तब दिया जब ऑफिस में साथ काम करने वाले एक 65 वर्षीय आदमी ने अपनी महिला सहकर्मी को छेड़ा था. अदालत का कहना है कि अगर ऑफिस में कोई आदमी आपको मजाक के तौर पर छेड़ता है तो यह यौन हिंसा नहीं है.

इस नियम का इटली की महिलाओं ने विरोध किया. आकड़ों के मुताबिक यहां 16 से 70 साल के बीच हर महिला कभी न कभी शारीरिक और यौन शोषण का शिकार हो चुकी है. ताजा मामले में महिला का आरोप है कि ऑफिस के भीतर पुरुष सहकर्मी उसके साथ छोटे बच्चे की तरह व्यवहार करता है. कोर्ट में जमा दस्तावेजों में महिला ने लिखा है कि वह आदमी उसे पीछे से सहला रहा था.

महिला से छेड़खानी के मामले में कोर्ट ने कहा कि आपकी बातों पर हमें भरोसा है, लेकिन इसके बावजूद आरोपी आदमी को छोड़ दिया गया. कोर्ट ने कहा कि उस व्यक्ति ने महिला को मजाक में छेड़ा था न कि सेक्स संबंध बनाने के लिए. कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी पुरुष ने आफिस में महिला को सेक्स करने की नीयत से छुआ तो उसे सजा मिलेगी, लेकिन कोर्ट ने यह नहीं बताया कि इन स्थितियों में फर्क कैसे किया जाएगा.

इन नेताओं ने की महिलाओं पर अभद्र टिप्पणियां.. लिस्ट में हैं कई बड़े नाम

महिलाओं पर नेताओं की अभद्र टिप्पणियों का इतिहास बहुत पुराना है, चाहे वो हेमा मालिनी के गालों की तरह सड़क बनाने के वादा हो या फिर अभी अभी असम चुनाव जीतकर आई बीजेपी विधायक अंगूरलता पर रामगोपाल वर्मा की अभद्र टिप्पणी..

1. छत्तीसगढ़ के कांग्रेस विधायक अमरजीत भगत ने अंबिकापुर की कलेक्टर रीतू सेन पर अश्लील कमेंट किया था. विधायक ने कहा, ”कलेक्टर हीरोइन हैं, सुन्दर हैं लेकिन काम नहीं करतीं” लेकिन बाद में जब उनके इस कमेंट पर विवाद बढ़ा तो इस पर सफाई में उन्होंने कहा कि मैं तो कलेक्टर की तारीफ़ कर रहा था. अगर कोई मेल कलेक्टर होता तो मैं उसे हीरो कहता.

2. 2014 में कर्नाटक के राज्यमंत्री एमएच अम्बरीश ने मंड्या जिला पंचायत सीईओ रोहिनी सिंदूरी पर आपत्तिजनक कमेंट किया था. एक पब्लिक मीटिंग में उन्होंने कहा था, ”हमारे पास एक नई आईएएस अफसर है जो बहुत खूबसूरत और आकर्षक हैं.”

3. 2013 में यूपी के पूर्व मंत्री राजाराम पांडे ने आईएएस धनलक्ष्मी के लिए कहा, ”डीएम काफी सुंदर है, मीठी आवाज है, काम करने में भी माहिर है… उनका फिगर भी अच्छा है. इनके पहले कामिनी चौहान थीं, वो भी खूबसूरत थीं.”

4. तेलंगाना कैडर की आईएएस स्मिता सभरवाल भी सेक्सिट कमेंट का शिकार हो चुकी हैं. पिछले साल एक मैगजीन ने उनका कार्टून छापते हुए ‘आई कैंडी’ शब्द का इस्तेमाल किया था. लेडी आईएएस ने इस पर करारा जवाब दिया और मैगजीन को कानूनी नोटिस भी भेजा था. स्मिता सभरवाल फिलहाल मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के एडिशनल सेक्रेटरी के तौर पर तैनात हैं. उनका जन्म पश्चिम बंगाल में 19 जून 1977 को हुआ. 2001 में स्मिता ने सिविल सर्विस एग्जाम में चौथी रैंक हासिल की. तब उनकी उम्र महज 23 साल थी.

5. राज्‍यसभा में बीमा बिल पर चर्चा के दौरान शरद यादव ने साउथ की महिलाओं पर एक बेतुका कमेंट किया था. हालांकि यह पहली बार नहीं था कि शरद यादव ने महिलाओं पर ऐसा टिप्पणी की हो, इससे पहले भी कई बार शरद यादव महिलाओं पर अभद्र कमेंट पहले भी करते रहे हैं. इस बार उन्होंने कहा कि साउथ की महिला जितनी ज्‍यादा खूबसूरत होती है, जितना ज्‍यादा उसकी बॉडी. वह देखने में भी काफी सुंदर लगती है. वह नृत्‍य जानती है. शरद यादव के इस कमेंट पर अधि‍कतर सांसद चुटकिया बजा रहा थे.

6. सीपीएम के सीनियर नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मंत्री अनीसुर रहमान ने मर्यादा की सारी हदें तोड़ दी. उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से पूछा कि वह रेप के लिए कितना चार्ज लेंगी. हालांकि, इस पर बवाल होने के बाद उन्होंने माफी मांग ली और कहा कि भूलवश उन्होंने ऐसी बात कह दी.

7. टीएमसी विधायक चिरंजीवी ने रेप पर दिए गए बयान में कहा था कि ऎसी वारदात के लिए कुछ हद तक लड़कियां भी जिम्मेदार हैं क्योंकि हर रोज उनकी स्कर्ट छोटी हो रही हैं. फिल्म जगत से राजनीति में आए चिरंजीवी ने कहा, ‘लड़कियों से छेड़छाड़ कोई नई घटना नहीं है. प्राचीन समय से ही इस तरह की घटना हो रही है. यह मामूली घटना है. इस तरह की घटना नहीं होगी तो फिल्म कैसे चलेगी. फिल्म में खलनायक का होना जरूरी है. रामायण में रावण तो होगा न.’

8. कुपोषण पर इंटरव्यू के दौरान गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मिडिल क्‍लास परिवारों की लड़कियों को सेहत से ज्‍यादा खूबसूरत दिखने की फ्रिक होती है. उन्होंने कहा था कि अच्छे फिगर की चाहत में लड़कियां कम खाती हैं.

9. 2010 में मुलायम सिंह यादव ने कहा था कि महिला आरक्षण बिल पास होने से संसद ऐसी महिलाओं से भर जाएगी, जिन्हें देखकर लोग सीटियां बजाएंगे. वहीं एक दूसरे बयान में उन्होंने कहा था कि बड़े घर की लडकियां और महिलाएं ही ऊपर तक जा सकती हैं क्योंकि उनमें आकर्षण होता है. इसलिए महिला आरक्षण बिल से ग्रामीण महिलाओं को कोई फायदा नहीं होगा. समाजवादी पार्टी प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कहा था,  “जब लड़के और लड़कियों में कोई विवाद होता है तो लड़की बयान देती है कि लड़के ने मेरा बलात्कार किया. इसके बाद बेचारे लड़के को फांसी की सज़ा सुना दी जाती है. बलात्कार के लिए फांसी की सज़ा अनुचित है. लड़कों से गलती हो जाती है.”

10. हरियाणा प्रदेश कांग्रेस पार्टी के प्रवक्ता धर्मवीर गोयल ने रेप के लिए लड़कियों को ही दोषी ठहरा दिया था. उन्होंने कहा था कि नब्बे फीसदी मामलों में बलात्कार नहीं, बल्कि लड़कियां सहमति से संबंध बनाती हैं.

11. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे और कांग्रेस के सांसद अभिजीत मुखर्जी ने गैंग रेप के खिलाफ दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शन पर विवादित बयान देते हुए कहा था की  “हर मुद्दे पर कैंडल मार्च करने का फैशन चल पड़ा है. अभिजीत ने कहा कि लड़कियां दिन में सज-धज कर कैंडल मार्च निकालती हैं और रात में डिस्को जाती हैं.”

12. थाईलैंड के प्रधानमंत्री प्रयूत चान ओचा ने कम कपड़े पहनने वाली महिलाओं को टॉफी बताया था. पीएम ओचा ने इन महिलाओं पर तंज कसते हुए कहा था कि ये महिलाएं ऐसी टॉफी की तरह होती हैं, जिनका रैपर नहीं होता. पीएम ने आगे कहा कि ये टॉफियां खाना लोग पसंद नहीं करते है.

आइये हम आपको दिखाते हैं किस तरह भारत में लोग औरतों से बात करते हैं और जब उनसे पूछा जाता है, तो वे एकदम मुकर जाते हैं, पर उनकी सच्चाई जब लड़कियां बताती हैं, तो क्या होता है…

लिंक पर क्लिक कर देंखें ये वीडियो… यह देखने के बाद शायद सभी आदमियों के गाल गुस्से से लाल हो जाएंगे…

http://www.sarita.in/web-exclusive/after-seeing-this-video-you-will-come-to-know-how-indian-men-approach-women

 

सैक्स सलीके से पेश करें, फूहड़ता से नहीं: हिमानी शिवपुरी

देहरादून में जन्मी और रुद्रप्रयाग से पुश्तैनी संबंध रखने वाली  हिमानी ने अपने अभिनय का परचम तब लहराया जब परिवार में मनोरंजन के नाम पर सिर्फ राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन का ही बोलबाला था. हिमानी ने अपने टीवी कैरियर की शुरुआत दूरदर्शन के शो ‘हमराही’ से की थी. इस शो का निर्देशन कुंवर सिन्हा ने किया था. शो के किरदार ‘देवकी भौजाई’ ने उन्हें घरघर में पहुंचा दिया था. दून स्कूल, देहरादून से पढ़ाई करने वाली हिमानी स्कूली दिनों से ही अभिनय की दीवानी थीं. अभिनय के प्रति दीवानगी की वजह से ही उन्होंने नई दिल्ली के नैशनल स्कूल औफ ड्रामा  यानी एनएसडी में दाखिला ले कर ग्रेजुएशन किया और कई सालों तक एनएसडी के नाटकों से जुड़ी रहीं. उन्हें हिंदी सिनेमा में पहला मौका पंकज पाराशर की फिल्म ‘अब आएगा मजा’ से मिला. इस के बाद उन्होंने श्याम बेनेगल की ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ और ‘मम्मो’ फिल्म भी की.

हिंदी सिनेमा में उन्हें सब से बड़ा ब्रेक वर्ष 1999 में सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘हम आप के हैं कौन’ से मिला. वे हिंदी की कई सुपरहिट फिल्मों ‘कुछकुछ होता है’, ‘परदेस’, ‘दिल वाले दुलहनिया ले जाएंगे’, ‘अंजाम’, ‘कोयला’ में बतौर सहायक अभिनेत्री नजर आ चुकीं हैं. अभिनेता ज्ञान शिवपुरी से उन की शादी हुई थी जिन से उन का एक बेटा भी है. पति की जल्दी मृत्यु के बाद हिमानी ने अकेले ही बेटे की परवरिश और अपने कैरियर दोनों को संभाला. कई वर्षों तक यशराज बैनर, धर्मा प्रोडक्शंस, राजश्री प्रोडक्शंस की सुपरहिट फिल्मों में सहायक अभिनेत्री की भूमिकाएं अदा कीं. एक शो के इवैंट पर हिमानी से कुछ रोचक बातचीत हुई. पेश हैं खास अंश :

आप ने श्याम बेनेगल से ले कर सूरज बड़जात्या व यश चौपड़ा जैसे बड़े निर्देशकों के साथ काम किया है, सब से अच्छा अनुभव किस के साथ रहा है?

श्याम बाबू के साथ मैं ने ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ फिल्म की थी. वह मेरी पहली फिल्म थी, मैं ऐसा मानती हूं. क्योंकि इस से पहले 1984 में ‘अब आएगा मजा’ और उस के बाद एक अंगरेजी टीवी सीरीज में मैं ने काम किया था. दोनों ही में मेरा सामान्य किरदार था पर धर्मवीर भारती की कृति ‘सूरज का सातवां घोड़ा’ में श्याम बाबू ने मुझे अपने अभिनय को उभारने का भरपूर मौका दिया था. उन के साथ काम करने का मेरा सपना तब से था जब मैं एनएसडी में पढ़ती थी. मैं ने सब से ज्यादा फिल्में डेविड धवन के साथ की हैं. मुझे कमर्शियल फिल्मों में लाने का श्रेय सूरज बड़जात्या को जाता है. उन की फिल्म ‘हम आप के हैं कौन’ ने मेरे कैरियर को नई दिशा दी.

अभी भी थिएटर से जुड़ी हुई हैं?

अपनी पिछली फिल्म ‘वेडिंग पुलाव’ के बाद डेढ़ साल के ब्रेक के दौरान मैं ने थिएटर ही किए हैं. कई मराठी, गुजराती प्ले कर रही हूं. मुझे थिएटर के लिए संगीत नाटक अकादमी की ओर से 2015-2016 का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है.

उत्तर भारत में थिएटर का क्या भविष्य दिखता है?

यही तो दुख की बात है कि हमारे यहां थिएटर देखने की प्रवृत्ति नहीं है. लोग रामलीला देखने तो जाते हैं पर थिएटर के लिए आज भी दर्शकों का अभाव है. दर्शकों की इसी कमी ने थिएटर करने वालों का उत्साह कम कर दिया है. एक फिल्म के लिए मल्टीप्लैक्स में हजार रुपए खर्च करने वाला थिएटर में 100 रुपए खर्च करने से दूर भागता है. दर्शकों की इस कमी का एक और कारण है और वह है, यहां नई कहानियों का अभाव. अभी भी लोग कई सालों से पुरानी कहानियों का बारबार मंचन करते हैं. मुझे लगता है मोहन राकेश के बाद कोई नया राइटर थिएटर में आया ही नहीं. जबकि गुजरात और महाराष्ट्र इस में काफी आगे हैं. वहां के लोग थिएटर की इज्जत करते हैं. वहां समसामयिक नई कहानियों पर थिएटर किए जाते हैं. मेरा तो यही मानना है कि यहां एनएसडी होते हुए भी थिएटर का भविष्य उज्जवल नहीं है क्योंकि आज की महंगाई में जहां औडिटोरियम का किराया ही लाखों रुपए में हो, वहां फ्री में थिएटर दिखाना संभव नहीं है.

आज के नए कलाकारों में क्या अलग देखा है?

किसी के बारे में तो मैं बात नहीं करूंगी, अपने बारे में ही कहती हूं कि बिना मेहनत और सीखे बिना आप लंबी रेस की दौड़ में यहां शामिल नहीं हो सकते. यहां तो जो भी आता है, सुपरस्टार बनना चाहता है. सभी के आने का मकसद पैसा कमाना होता है और वे उस में सफल भी हो जाते हैं. 1-2 एंडोर्समैंट कर के लाखों रुपए कमा लेते हैं. उन का ऐक्ंिटग से कोई लेनादेना नहीं होता. मैं तो ऐसे भी नए कलाकारों से मिली हूं जिन को सही से डायलौग बोलना भी नहीं आता लेकिन एटीट्यूड के मामले में अपने को किसी स्टार से कम नहीं समझते.

उत्तराखंड की क्षेत्रीय कला को प्रोत्साहित करने के लिए आप कुछ कर रही हैं?

एनएसडी से निकलने के बाद मैं ने देहरादून जा कर वर्कशौप किया और वहां 2 नाटक किए. सहारनपुर में भी मैं ने कई स्कूली बच्चों को थिएटर की वर्कशौप दी है और जब से मेरे पिता की मृत्यु हुई है, मैं हर सितंबर महीने में अपने घर जाती हूं और अपने पापा की लिखी हुई कहानियों पर नाटक करवाती हूं. कई सारे छात्र, जो अभिनय के क्षेत्र में आना चाहते हैं, हर साल मेरे पास सीखने आते हैं.

आप ने टीवी सीरियल ‘हमराही’ में देवकी भौजाई का जो किरदार निभाया था, क्या फिर दोबारा वैसा किरदार लोगों को देखने को मिलेगा?

आप ने मेरे दिल की बात कह दी है. ‘हमराही’ शो मेरे कैरियर का माइलस्टोन था. उस शो से जो मुझे ख्याति मिली, आज तक वह दोबारा नहीं मिली. देखिए, किसी करैक्टर को गढ़ना तो राइटर के हाथ में होता है, अगर वैसा कोई रोल सामने आता है तो मैं अवश्य करूंगी. मेरा तो मानना है कि दूरदर्शन में जो क्वालिटी थी वह आज के सैटेलाइट चैनलों में नहीं है. आज के सभी चैनल्स भेड़चाल की तरह चलते हैं. एक चैनल में अगर नागनागिन शो हिट है तो सभी चैनलों में नागिन या फिर डायन वाले शो देखने को मिल जाएंगे. कभीकभी तो हम लोगों को भी हंसी आती है कि अब मुझे अगले एपिसोड में मक्खी बनना पड़ सकता है. दरअसल सालोंसाल चलने वाले इन सीरियलों में कहानी को इतना घुमाया जाता है कि कभी तो यह गले से नीचे नहीं उतरती. आजकल के किसी भी शो की सारी कहानी एपिसोड के साथसाथ ही लिखी जाती है और निर्देशक के दिमाग में कब, क्या आ जाए, आप सोच भी नहीं सकते हैं.

फिल्म ‘वेडिंग पुलाव’ में बिकनी वाली क्या बात हो गई थी?

चिंटूजी (ऋषि कपूर) के साथ मेरी पहली रोमांटिक फिल्म थी जिस में एक गाना बीच में शूट किया गया था. अब बीच पर सीन है तो पूरे कपड़ों के साथ तो वह शूट किया नहीं जा सकता. पहली बार मैं ने किसी फिल्म में बिकनी पहनी थी क्योंकि इस तरह के कौस्ट्यूम में मुझ को देखना मेरे बेटे को पसंद नहीं था. बेटे की सहमति होने पर ही मैं ने उस सीन के लिए हां किया था. इस फिल्म के लिए हम लोगों ने मेहनत बहुत की थी पर वह ज्यादा चली नहीं.

आप भी और लोगों की तरह प्रोडक्शन के क्षेत्र में आना चाहती हैं?

अभी तो ऐसा कोई विचार नहीं है पर बेटे के लिए कुछ न कुछ तो करना पड़ेगा. अगर बेटा प्रोडक्शन हाउस खोलना चाहेगा तो जरूर उस की पूरी मदद करूंगी. एक समय के बाद खुद को व्यस्त रखने और पैसे के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा.

आजकल टैलीविजन या फिल्मों में कौमेडी के नाम पर फूहड़ता परोसी जा रही है, इस पर आप क्या कहेंगी?

बहुत कठिन काम है. आज के समय में किसी को रुलाना तो आसान है क्योंकि हर व्यक्ति जिंदगी के किसी कोने में दुखी है. पर काम की आपाधापी में व्यस्त हुए इंसान के चेहरे पर मुसकराहट लाना सब से कठिन काम है. लेकिन आज जो कौमेडी के नाम पर सैक्स कौमेडी परोसी जा रही है वह मैं कभी नहीं कर सकती. मैं मानती हूं सैक्स जीवन का अहम हिस्सा है लेकिन इसे सलीके से पेश करना चाहिए, फूहड़ता के साथ नहीं.

आप चूंकि उत्तराखंड से संबंध रखती हैं, अगर आप को राजनीति में मौका मिले तो?

अगर मौका मिलता है तो जरूर आना चाहूंगी, क्योंकि अपने लोगों के लिए अगर राजनीति में आ कर कुछ अच्छा विकास कार्य कर पाऊं इस से अच्छी बात मेरे और मेरे राज्य के लोगों के लिए क्या होगी. उत्तराखंड में चुनाव भी आने वाले हैं, अगर किसी दल को लगता है मैं उस के साथ आ कर अच्छी तरह काम कर सकती हूं तो मैं उस दल का हिस्सा जरूर बनूंगी.

एक अच्छी ब्लौकबस्टर फिल्म के लिए क्या जरूरी होता है?

आज का ट्रैंड यह हो गया है कि हीरो ही स्टोरी है. फिल्म के हीरो को देख कर स्टोरी लिखी जाती है. दूसरा है फिल्म का प्रोमोशन. अगर फिल्म बहुत अच्छी बनी है लेकिन उस का प्रचारप्रसार सही ढंग से नहीं किया गया तो वह नहीं चलेगी. ‘तलवार’ फिल्म को ही देखिए, फिल्म अच्छी थी पर सीमित प्रचार के कारण वह दर्शकों को नहीं जुटा पाई. अगर रिलीज के पहले किसी फिल्म में कंट्रोवर्सी हो जाए तो उस फिल्म को मुफ्त में ही अच्छीखासी पब्लिसिटी मिल जाती है.                                                      

विवादों में रहीं हिमानी

हिमानी पर इंदौर के निर्माता मोहम्मद अली ने धोखाधड़ी का केस दर्ज करवाया है. अली का कहना है कि 5 लाख रुपए लेने के बाद भी हिमानी ने उन की फिल्म में काम नहीं किया और न ही पैसे लौटाए हैं. कोर्ट में अनुपस्थित रहने पर फरियादी ने हिमानी के पासपोर्ट को जब्त किए जाने की मांग भी की थी.

– जेएनयू आंदोलन के समय कन्हैया कुमार पर देश विरोधी नारे लगाने के आरोप लगाए जाने के बावजूद हिमानी ने उसे छोड़ दिए जाने का सुझाव दे डाला, जिस पर काफी विवाद हुआ था.

स्विमिंग सूट से परहेज क्यों

हिमानी शिवपुरी ने जब से फिल्मों में अपना कैरियर शुरू किया, कभी भी स्विमिंग सूट नहीं पहना. इस के पीछे एक खास वजह यह भी रही कि हिमानी के बेटे कात्यायन को यह पसंद नहीं था. हिमानी ने बताया कि जब वह 10 साल का था तो वे उसे ले कर गोआ घूमने गई थीं. वे बारबार बेटे से समंदर में चलने को कहती रहीं लेकिन वह मना करता रहा. आखिरकार हिमानी ने बेटे से प्यार से वजह पूछी तो उस ने बता दिया कि ठीक है मैं समंदर में जाऊंगा लेकिन आप स्विमिंग सूट नहीं पहनेंगी.

दबाव तले फिटनैस

बौलीवुड के कलाकारों को देख कर लगता है कि नाम और शोहरत कमाना कोई मुश्किल काम नहीं होता होगा. बस, जरा सा नाचगाना किया और फिल्म के हिट होते ही स्टार बन गए. लेकिन यह आसान नहीं है. एक कलाकार को फिल्मों में टिके रहने के लिए बहुत पापड़ बेलने पड़ते हैं. अभिनेत्री परिणीति चोपड़ा कहती हैं कि बौलीवुड में अपने अच्छे फिगर को बनाए रखने का दबाव रहता है. हालांकि फिटनैस कोई बुरी चीज नहीं है लेकिन जब आलोचना ही इसी बात पर होने लगे तो टैंशन होती है. परिणीति ने काफी आलोचनाएं सुनने के बाद अपना काफी वजन घटाया है. उन के मुताबिक, अब कई लोग मुझ से मेरे पतले होने का राज जानना चाहते हैं. वे कहती हैं कि ऐसा बनने में उन्हें करीब डेढ़ वर्ष लगा.

 

कमाई के खिलाड़ी

अभिनेता अक्षय कुमार एकमात्र ऐसे बौलीवुड कलाकार हैं जिन्हें कमाई के मामले में हिट मशीन कहा जाता है. कारण, उन की लगभग हर फिल्म सीमित बजट के चलते सब के लिए फायदे का सौदा रहती है. अक्षय कुमार की तरह शाहरुख खान फिल्में भले ही कम करते हों लेकिन विज्ञापन की दुनिया से वे मोटा पैसा बनाते हैं. ब्रैंड इंडोर्समैंट के चलते सब से ज्यादा अधिक कमाई करने वाली हस्तियों की लिस्ट में अक्षय कुमार और शाहरुख खान ने जगह बनाई है. जिन्होंने वर्ष 2016 में सर्वाधिक कमाई की उस में टौप पर अमेरिकी गायिका टेलर स्विफ्ट हैं जिन की कमाई 17 करोड़ डौलर रही. जबकि शाहरुख खान 3 करोड़ 30 लाख डौलर की कमाई के साथ इस सूची में 86वें स्थान पर हैं और अक्षय कुमार 3 करोड़ 15 लाख डौलर की कमाई के साथ 94वें स्थान पर रहे.

टीवी पर नई दस्तक

इन दिनों टैलीविजन भी लोकप्रियता के मामले में फिल्मों से कम नहीं है. आएदिन हर दूसरा सीरियल लौंच होता है और अपनी टीआरपी की कसौटी से तय करता है कि कितने दिन टैलीकास्ट होगा. सासबहू का रोनागाना और बेमतलब के ट्विस्ट से तर्कहीनता की सीमा पार करते सीरियल्स से नजात दिलाने का दावा कर रहे हैं निर्माता राजेश कुमार जैन. इन का नया सीरियल ‘बस थोड़े से अंजाने’ का प्रसारण हाल ही के शुरू हुआ है. धारावाहिक के निर्देशक भरत भाटिया व लेखक धनंजय सिंह मासूम हैं. देखते हैं यह धारावाहिक अन्य धारावाहिकों से कितना अलग साबित होता है. धारावाहिक में नताशा सिंह, अली हसन, श्याम मशकलकर और नीतू सिंह शीर्ष किरदार निभा रहे हैं.

हौकी का बदला बदला तेवर

लंदन में चैंपियंस ट्रौफी में रजत पदक जीतने के बाद भारतीय हौकी टीम ने रियो ओलिंपिक में उम्मीदें बढ़ा दी हैं. एक समय में भारतीय हौकी की तूती बोलती थी. पिछले कुछ वर्षों में हौकी की जो दुर्दशा हुई है, इस के लिए खेल से जुड़े अधिकारियों और सरकार की उदासीनता कहीं न कहीं जिम्मेदार है. चैंपियंस ट्रौफी जैसे कई बड़ेबड़े खेल हुए मगर भारतीय हौकी को हमेशा नाकामयाबी मिली. इस के लिए भारतीय हौकी की कई पीढि़यां खप गईं, बावजूद इस के वह शीर्ष पर पहुंच न सकी.

लंदन में जीत से आस बढ़ी है. सुरिंदर सिंह, पाल सिंह सोढ़ी, परगट सिंह, सुरजीत सिंह, मुहम्मद शाहिद और जफर इकबाल जैसे खिलाडि़यों ने जीतोड़ मेहनत की है. हालांकि अगस्त में होने वाले रियो ओलिंपिक के लिए भारतीय पुरुष टीम की कमान गोलकीपर पीआर श्रीजेश के हाथों में होगी.

लेकिन क्रिकेट की तूती बोलने वाले इस देश में भारतीय हौकी टीम के लिए कम चुनौती नहीं है क्योंकि एक समय में गलीनुक्कड़ों में हौकी के डंडे लिए बच्चों को खेलते देखा जाता था पर अब वह जगह क्रिकेट के बल्ले ने ले ली है.

इज्जत, शोहरत, चकाचौंध व पैसा अब केवल क्रिकेट में ही दिखाई पड़ता है. अब हर कोई क्रिकेट में ही अपना कैरियर तलाशता है. ऐसे में हौकी से संबंधित अधिकारियों के सामने सब से बड़ी चुनौती है कि वे इस खेल में कैरियर तलाशने वाले खिलाडि़यों को अच्छी सुविधा दें, अच्छी ट्रेनिंग की सुविधाएं उपलब्ध करवाएं, हौकी को दयनीय स्थिति से उबारें. क्रिकेट की ही तरह इसे भी लोकप्रिय बनाएं.

साथ ही, खिलाडि़यों को भी अपनी कमजोरी को दुरुस्त करना होगा. जिस तरह का आत्मविश्वास चैंपियंस ट्रौफी में खिलाडि़यों ने दिखाया उसे बरकरार रखना होगा, अपनी कुशलता, गति और दमखम की कसौटी पर खरा उतरना होगा तभी वे जरमनी, हौलैंड, आस्ट्रिया और ब्रिटेन जैसी ताकतवर टीमों को पछाड़ पाएंगे. भारतीय हौकी टीम की सब से बड़ी कमजोरी रही है उन का प्रतिद्वंद्वी टीमों की श्रेष्ठता और प्रतिष्ठा के सामने स्वयं को हलका मानने की भूल कर दबाव में आ जाना.

बहरहाल, वर्तमान टीम अब इस से उबरते हुए दिख रही है और हर मोरचे पर खम ठोंक रही है. अगर यही लय बनी रही तो फिर से हौकी के सुनहरे दिनों की वापसी हो सकती है.

फुटबौल और भारत

एक तरफ जहां फुटबौल यूरो कप में आश्चर्यजनक रूप से इतिहास रचते हुए पुर्तगाल के विजेता बनने से लाखोंकरोड़ों फुटबौल प्रेमियों में खुशी की लहर है तो वहीं दूसरी ओर लियोनेल मेसी के संन्यास और उन्हें टैक्स न चुकाने के एवज में सजा मिलने से मेसी के दीवानों में मायूसी है. वैसे 42 साल बाद पुर्तगाल ने फ्रांस को किसी मैच में हराया है. फुटबौल की लोकप्रियता इतनी है कि विश्वकप के दौरान लोग रातरातभर जाग कर देखते हैं. भारत में भी धीरेधीरे इस का क्रेज बढ़ रहा है और अब अंडर-17 टीम के फीफा विश्व कप की मेजबानी भी भारत को मिली है. जाहिर है इस से भारत में इस की लोकप्रियता बढ़ेगी.

हालांकि फीफा में भारत की टीम के न होने का मलाल हमेशा सालता है. इस के लिए भारत को काफी तैयारी करने की जरूरत है. इस गेम के लिए बेसिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और बेहतर कोचिंग की आवश्यकता है. स्कूल व कालेजों में प्रतिभाओं को तलाशना होगा. उन्हें अच्छी ट्रेनिंग देनी होगी. कई युवाओं का मानना है कि फुटबौल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी लोकप्रिय है. इस में ग्लैमर है, इज्जत, नाम, पैसा सबकुछ है. ऐसे में युवाओं का रुझान इस तरफ होगा ही बशर्ते कि प्रशासनिक और सरकारी स्तर पर सकारात्मक पहल हो और सुविधाएं मुहैया कराई जाएं.

इस की लोकप्रियता को देखते हुए कई विदेशी फुटबौल क्लब भी भारत में ट्रेनिंग के गुर सिखाने के लिए अकादमियां खोल रहे हैं. बावजूद इस के, फुटबौल की जमीनी हकीकत कुछ और ही है. फीफा रैंकिंग में भारत 164वें स्थान पर है. यहां तक कि नेपाल व बंगलादेश भारत से आगे हैं. इस से अंदाजा लगाया जा सकता है कि हम कहां हैं. यहां के युवा फुटबौल खेलना तो चाहते हैं पर विदेशी क्लबों में उन की रुचि ज्यादा है. पर विदेशी क्लबों में खेलना इतना आसान नहीं है. युवाओं को घरेलू फुटबौल में ही ज्यादा दिलचस्पी दिखानी होगी. यहां पंजाब और मुंबई में कुछ क्लब खुले भी लेकिन आर्थिक तंगी के कारण उन्हें बंद करना पड़ा. घरेलू फुटबौल टूर्नामैंट को न तो तरजीह दी जाती है और न ही दर्शक देखने के लिए आते हैं. ऐसे में क्लबों की कमाई होगी कैसे? यहां के खिलाडि़यों को अंतर्राष्ट्रीय लैवल में अधिक मैच खेलने को नहीं मिलते. ऐसे में उन को अनुभव कैसे होगा?

कई प्रतिभावान खिलाड़ी खेल को छोड़ कर दूसरे कामों में लग गए. आर्थिक तंगी ने उन्हें ऐसा करने को मजबूर कर रखा है. इस समस्या से संबंधित अधिकारियों को निबटना होगा, तभी फुटबौल के प्रति युवाओं का रुझान बढ़ेगा और विश्व में भारत का स्थान 164वें की जगह कुछ और ही होगा.

रिटायरमैंट प्लान ताकि बुढ़ापा आराम से गुजरे

महिलाओं की जिंदगी पुरुषों की तुलना में अधिक होती है. अध्ययन बताता है कि पति की तुलना में पत्नी अधिक उम्र तक जीती है. इस का मतलब पैंशन पर आश्रित जिंदगी, जीवनसाथी के साथ बिताई जाने वाली जिंदगी से लंबी होती है. इसलिए एक घरेलू महिला को अपने पति के रिटायरमैंट प्लान के बारे में जानना बेहद जरूरी है. यदि कोई रिटायरमैंट प्लान नहीं है तो उस के बारे में फैसला करने का यह सब से सही समय है. यदि आप के पति वैतनिक कर्मचारी हैं तो सभी की तरह उन का भी एक कर्मचारी भविष्य निधि यानी ईपीएफ खाता होगा. लेकिन अगर आप के पति यह सोचते हैं कि ईपीएफ उन के रिटायरमैंट के बाद की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है तो उन्हें दोबारा सोचने के लिए मजबूर करें.

सच यह भी है कि यदि कोई रिटायरमैंट की जरूरतों के लिए सिर्फ भविष्य निधि के सहारे है तो उसे रिटायरमैंट के बाद पैसों की कमी से जूझना पड़ सकता है.

ईपीएफ, यहां तक कि लोक भविष्य निधि भी, सौ फीसदी डेट आधारित होने की वजह से महंगाई का असर रोकने में कामयाब नहीं होते. इन पर मिलने वाला वास्तविक रिटर्न, महंगाई समायोजित रिटर्न से कम होता है. इस तरह ये महज बचत को संरक्षित रखने का काम कर पाते हैं. इस समय महंगाई दर 8-9 फीसदी के आसपास है, वहीं फिक्स्ड इनकम निवेश पर मिलने वाला रिटर्न 9 फीसदी के करीब है. डेट असेट यानी ऋण आधारित स्कीमें आप की पूंजी को संरक्षित करने का माध्यम हैं. इन का इस्तेमाल लघु या मध्यम अवधि के लक्ष्यों को पूरा करने में ही किया जा सकता है.

बेहतर विकल्प

लंबी अवधि के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए इक्विटी में निवेश आवश्यक है. इस के पीछे की धारणा यह है कि निवेश पर रिटर्न महंगाई की दर से 3-4 फीसदी अधिक होना चाहिए. रिटर्न में एक छोटा सा अंतर मैच्योरिटी पर मिलने वाली राशि पर बड़ा असर डालता है. लंबी अवधि के दौरान संपत्तियों के निर्माण में वास्तविक रिटर्न माने रखता है, न कि टोकन यानी सांकेतिक रिटर्न.

पहले के अध्ययन बताते हैं कि एक लंबी अवधि में इक्विटी अन्य साधनों जैसे सोना, डेट या रीयल एस्टेट की तुलना में अधिक रिटर्न देता है. यदि आप गौर करेंगे तो पता चलेगा कि पिछले 10-15-20 सालों में सैंसेक्स का संयोजित वार्षिक रिटर्न क्रमश: 17 फीसदी, 12 फीसदी, 11.23 फीसदी रहा है और रिटायरमैंट का लक्ष्य अकसर इतना ही लंबा होता है. ऐसे में इक्विटी एक सुरक्षित और बेहतर विकल्प हो सकता है.

म्यूचुअल फंड

रिटायरमैंट की जरूरतों को पूरा करने के लिए इक्विटी म्यूचुअल फंड एक बेहतर विकल्प है क्योंकि लंबी अवधि में अधिक रिटर्न के साथ यह महंगाई के असर को खत्म करने का माद्दा रखता है. लंबी अवधि का फायदा हासिल करने के लिए निवेश को लगातार बनाए रखना चाहिए. इस से भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे म्यूचुअल फंड का चुनाव करना चाहिए जिन का सौ फीसदी एक्सपोजर इक्विटी में हो और जो आगे चल कर आप को डेट फंड में स्विच करने का विकल्प प्रदान करें. इक्विटी और डेट में शिफ्ट होने की ऐसी अंतर्निहित विशेषता संपत्तियों के निर्माण में मददगार साबित होती है.

इन से रहें सतर्क

इक्विटी से मिलने वाला रिटर्न बेहद अस्थिरता भरा होता है क्योंकि यह बाजार के उतारचढ़ावों पर निर्भर करता है. बाजार विभिन्न आर्थिक व गैरआर्थिक कारणों से प्रभावित होता है. लघु अवधि में अस्थिरता ज्यादा होती है जबकि लंबी अवधि में यह कमोबेश पहले जैसी हो जाती है. इसलिए दिनप्रतिदिन होने वाली और गैरप्रासंगिक घटनाओं को अनदेखा कर निवेश को कायम रखना ही बेहतर होता है.     

क्या करें

संपत्तियों के निर्माण करने के लिए एसआईपी यानी सिस्टमैटिक इन्वैस्टमैंट प्लान का सहारा लें. एसआईपी के जरिए एक तय राशि नियमित अंतराल पर निवेश करें. ऐसा करने से बाजार में होने वाली घटबढ़ से बचा जा सकता है. परिणामस्वरूप लंबे समय तक आप के निवेश की एक औसत लागत बनी रहेगी.

एसआईपी का लब्बोलुआब यह है कि जब बाजार में गिरावट होती है तो आप को निवेश पर अधिक यूनिट मिल जाते हैं लेकिन जब बाजार चढ़ता है तो यूनिट कम मिलते हैं. रिटायरमैंट का समय नजदीक आने पर इक्विटी में संचित सारी निधि को डेट फंड में शिफ्ट कर दें ताकि पूंजी को संरक्षित किया जा सके. रिटायरमैंट के बाद जरूरत के हिसाब से फंड में से रकम निकालें और शेष राशि को बाजार में लगी रहने दें.

रिटायरमैंट के लिए बचत करना आप के जीवन में न सिर्फ अनुशासन लाता है, बल्कि रिटायरमैंट के बाद आप के स्वर्णिम वर्षों को बेहतर भी बनाता है.          

(लेखक बजाज कैपिटल के ग्रुप सीईओ और डायरैक्टर हैं)

ये कदम उठाएं

– 2-3 इक्विटी म्यूचुअल फंड का चुनाव करें और ऐसे रिटायरमैंट फोकस्ड फंड को प्राथमिकता दें जो सौ फीसदी इक्विटी में हों.

– निवेश को जारी रखें. बोनस, विंडफौल गेन आदि को उसी एसआईपी में फिर से निवेश करें.

– रिटायरमैंट का समय नजदीक आने पर एसआईपी की राशि को बढ़ा दें.

– रिटायरमैंट से 3 साल पहले अपने निवेश को जोखिम से दूर रखें.

– रिटायरमैंट के बाद एसडब्लूपी यानी सिस्टमैटिक विदड्रौल प्लान का विकल्प अपना कर पैंशन प्राप्त करना शुरू कर दें.

– फंड्स को रिटायरमैंट से जोड़ें.

– जल्दी शुरुआत करें.

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