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Satire : थूक

केदारनाथ धाम में मुंबई के मेरे एक दोस्त पिछले दिनों केदारनाथ धाम आए थे. अपने आने की खबर उन्होंने मुझे पहले से दे दी थी. वे एक होटल में ठहरे थे.

उन से मुलाकात कर के मैं वापस लौट रहा था. रास्ते में देखा कि एक कोढ़ी खस्ता हालत में शिवलिंग के दर्शन के लिए गुजरात से आया था.

वह कोढ़ी पूरी शिद्दत से मंदिर के अंदर चला गया. सब लोग लाइन में खड़े थे, तभी उस कोढ़ी के पास एक पंडा आया. उस कोढ़ी ने जेब से 500 रुपए निकाल कर पंडे को दे दिए. पंडा उसे स्पैशल पूजा के रास्ते से मंदिर के भीतर ले गया.

पूजा के बाद पंडा तो खिसक गया, लेकिन उस कोढ़ी ने शिवलिंग को कस कर पकड़ते हुए कहा, ‘‘महाराज, मैं गुजरात से आया हूं. न जाने मैं ने पिछले जन्म में क्या पाप किया था, जो मैं कोढ़ी हो गया…’’

वह कोढ़ी शिवलिंग पर ऐसे चिपटा हुआ था, मानो उस का कोढ़ गायब हो जाएगा. वह शिवलिंग को छोड़ने के मूड में नहीं था, तभी वहां तमाम भक्तों की भीड़ लग गई. सभी दर्शनों के लिए बेचैन थे. दूसरे पंडे उसे शिवलिंग को छोड़ने के लिए लगातार कह रहे थे, पर वह उन की बात न सुन कर केवल रोए जा रहा था.

 

हार कर 4 पंडे और आए और उसे जबरन घसीट कर मंदिर से बाहर ले गए.

गुस्से में आगबबूला हो कर पंडे उसे गालियां देने लगे. कुछ पंडे उस पर लातें चला रहे थे, तो कई घूंसे जमा रहे थे.

थोड़ी देर बाद वह कोढ़ी लहूलुहान हो कर सीढ़ी के किनारे आ बैठा.

मैं ने उस की हालत देख कर कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मुझे कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए नागपुर जाना था. मैं ने स्टेशन पर पता किया कि नागपुर के लिए गाड़ी रात के 3 बजे मिलेगी. मैं रात के 12 बजे स्टेशन पहुंच गया. मैं ने सोचा कि 3 घंटे टहलतेटहलते कट जाएंगे.

मैं प्लेटफार्म नंबर 5 पर आया और एक लोहे की बैंच पर बैठ गया. मेरे बगल वाली बैंच पर धोतीकुरता पहने एक साहब गहरी नींद में सोए हुए थे.

मेरी दाईं तरफ एक साहब व उन की बीवी और 2 बच्चे एक बैंच पर बैठे थे. शायद वे भी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. उन के बच्चे बहुत नटखट नजर आ रहे थे. उन की मम्मी उन्हें बिट्टू व पिंटू नाम से पुकार रही थीं.

वे दोनों बच्चे मेरे बगल वाली बैंच पर सो रहे साहब को नाना पाटेकर कह रहे थे. एक भिखारी व एक भिखारिन को वे अनिल कपूर व जूही चावला कह रहे थे.

अचानक वे दोनों बच्चे मेरी बगल वाली बैंच पर सोए हुए साहब की बैंच पर बैठ गए और उन में से एक ने अपनी मम्मी से कहा, ‘‘मम्मी, हम नाना पाटेकर के साथ बैठे हैं.’’

उन की मम्मी मुसकराते हुए उन्हें चुप रहने का इशारा करने लगीं.

वे दोनों बच्चे उन साहब के नीचे रखे जूतों को इस तरह देख रहे थे, मानो जूतों की तहकीकात कर रहे हों. फिर उन दोनों ने जूतों में पेशाब करना शुरू कर दिया. वे पेशाब की धार की गिनती गिनने लगे. बिट्टू ने 50 की गिनती तक जूता भरा, जबकि पिंटू ने 30 की गिनती में ही जूता भर दिया. इस के बाद वे दोनों अपनी मम्मी के पास चले गए.

तभी एक पुलिस वाला आया. उसने सोए हुए आदमी को डंडा चुभा कर कहा, ‘‘अबे ओ घोंचू, घर में सोया है क्या?’’

उन साहब की नींद खुली और वे जूता पहनने लगे कि जूतों में भरे पेशाब ने वहां का फर्श गीला कर दिया.

‘‘अरे, यह क्या किया. जूतों में पेशाब कर के सो रहा था. प्रदूषण फैलाता है. तुझे सामने लिखा नहीं दिखाई दिया कि गंदगी फैलाने वाले से 500 रुपए जुर्माना वसूल किया जाएगा. चल थाने,’’ कह कर पुलिस वाला उसे थाने ले जाने लगा.

 

वे साहब चलतेचलते गिड़गिड़ाने लगे, ‘‘नहीं जनाब, मैं ने पेशाब नहीं किया…’’

पुलिस वाले ने उन की एक न सुनी. वह उन्हें प्लेटफार्म नंबर 4 की तरफ ले गया.

मैं ने उन दोनों बच्चों की तरफ देखा. वे भी सारा माजरा समझ गए थे. उन में से एक ने दूसरे से कहा, ‘‘अभी तो फिल्म का ट्रेलर चल रहा है, पिक्चर शुरू नहीं हुई.’’

मैं धीरे से कहने लगा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

राजस्थान की बस में मैं अजमेर में एक अखबार में सहायक संपादक था. प्रधान संपादक ने मुझे निजी काम से दिल्ली भेजा था. मैं अजमेर से दिल्ली के लिए सुबह बस से चला था. जयपुर से आगे एक छोटे शहर में बस का टायर पंचर हो गया. सभी सवारियां समय बिताने व कुछ खानेपीने के लिए आसपास की दुकानों में चली गईं.

मैं एक पेड़ की छाया में बैठ गया. बगल वाली गली में कुछ बच्चे खेल रहे थे, तभी वहां से एक गधा गुजरा. गधे को देख कर बच्चों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. 3 बच्चे गधे पर सवार हो गए और 2 बच्चे डंडे से पीटते हुए उसे दौड़ाने लगे. गधा ‘ढेंचूढेंचू’ करता हुआ दौड़ता जा रहा था.

सभी सवारियां यह तमाशा देख रही थीं. हमारी बस का ड्राइवर लंबी चोटी रखे हुए था. वे बच्चे ड्राइवर को चिढ़ाने लगे, ‘चोटी वाला साबुन क्या भाव है?’

 

ड्राइवर को गुस्सा आ गया. उस ने सड़क के किनारे पड़ा एक पुराना सैल उठाया और बच्चों की तरफ फेंक दिया. सैल एक बच्चे की खोपड़ी में जोर से लगा और उस की खोपड़ी से खून बहने लगा.

बस का टायर बदला जा चुका था. ड्राइवर ने हौर्न बजाया. सब सवारियां बस में बैठ गईं और बस दिल्ली की तरफ चल पड़ी.

रेवाड़ी पहुंचते ही पुलिस ने बस को घेर लिया और ड्राइवर को हथकड़ी पहना दी.

मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

मसजिद के बाहर बात मुरादाबाद की है. एक मसजिद के बाहर एक हिंदू दंपती ने अपना तकरीबन 15 साल का लड़का नंगा कर के जमीन पर बैठा रखा था. जो भी नमाज पढ़ने अंदर जाता, उस से लड़के का पिता गुजारिश करता कि बाहर आते समय लड़के के ऊपर थूक कर चले जाना, क्योंकि यह लड़का दुष्ट आत्मा का शिकार है.

मैं ने अपने दोस्त से पूछा कि यह क्या हो रहा है, तो उस ने बताया कि यह किसी जिन का चक्कर है.

हम दोनों मसजिद के सामने वाली दुकान पर अखबार पढ़ने के बहाने बैठ गए. मेरी नजर उसी लड़के पर टिकी थी. जो भी नमाजी बाहर आ रहा था,

वह लड़के पर थूक रहा था. कोई पान वाला लाल थूक डाल रहा था तो कोई सादा थूक.

नमाजियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. एक नमाजी नया सफेद पठानी सूट पहने था. भीड़ की वजह से उस की सलवार पर उस लड़के के बदन का थूक लग गया.

 

‘‘बेवकूफ, मेरी सलवार को कौन साफ करेगा? तेरा बाप…?’’ कहते हुए उस ने एक जोरदार लात लड़के के मुंह पर जमा दी. मैं ने देखा कि लड़के की दाईं आंख लात की चोट से बंद हो चुकी थी.

दुष्ट आत्मा तो थूकने या लात खाने से भले ही न निकली हो, पर उस लड़के को रिकशे पर लाद कर अस्पताल ले जाना पड़ा.

मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

Hindi Story : जज्‍बात का सौदागर

रोमा सारे घरों का काम जल्दीजल्दी निबटा कर तेज कदमों से भाग ही रही थी कि वनिता ने आवाज लगाई, ‘‘अरी ओ रोमा… नाश्ता तो करती जा. मैं ने तेरे लिए ही निकाल कर रखा है.’’‘‘रख दीजिए बीबीजी, मैं शाम को आ कर खा लूंगी. अभी बहुत जरूरी काम से जा रही हूं,’’ कहते हुए रोमा सरपट दौड़ गई. रोमा यहां सोसाइटी के कुछ घरों में झाड़ूपोंछा, बरतन, साफसफाई का काम करती थी. इस समय वह इतनी तेजी से अपने प्रेमी रौनी से मिलने जा रही थी. रौनी बगल वाली सोसाइटी में मिस्टर मेहरा के यहां ड्राइवर था.

पिछले 2 साल से रोमा और रौनी में गहरी जानपहचान हो गई थी. वे दोनों अगलबगल की सोसाइटी में काम करते थे और एक दिन आतेजाते उन की निगाहें टकरा गईं. फिर देखते ही देखते उन के बीच प्यार की शहनाई बज उठी.जवानी की दहलीज पर अभीअभी कदम रखने वाली रोमा पूर्णमासी के चांद की तरह बेहद ही खूबसूरत और मादक लगती थी. उस की हिरनी जैसी आंखें, सुराहीदार गरदन, पतली कमर और गदराया बदन देख कर हर कोई उसे रसभरी निगाहों से देखता था, लेकिन रोमा की जिंदगी का रस रौनी था, जिस से शादी कर के वह अपना घर बसाना चाहती थी. रौनी दिखने में बांका जवान था.

बिखरे बाल, आंखों पर चश्मा, शर्ट के सामने के 2 बटन हमेशा खुले, गले में चेन और कलाई में ब्रैसलेट… रौनी का यह स्टाइल किसी हीरो से कम नहीं था और रोमा उस के इसी स्टाइल पर मरमिटी थी.अकसर रोमा ही सारे घरों का काम निबटा कर रौनी को पास वाले पार्क में मिलने के लिए फोन किया करती थी, लेकिन आज पहली बार रौनी ने फोन कर के रोमा को ‘जरूरी काम है’ कह कर बुलाया था.रोमा भागीभागी पार्क में पहुंची, तो देखा कि रौनी वहां उस का इंतजार कर रहा था.

रोमा को सामने देखते ही रौनी ने उसे अपनी बांहों में दबोच लिया. रोमा खुद को छुड़ाते हुए बोली, ‘‘यही था तेरा जरूरी काम, जो तू ने मुझे यहां इतनी जल्दी में बुलाया… तुझे पता है कि मैं बनर्जी के घर का काम छोड़ कर आई हूं…

अब जल्दी से बोल कि यहां मुझे क्यों बुलाया?’’रोमा की कमर पर अपना हाथ डाल कर उसे अपनी ओर खींच कर करीब लाने के बाद उस के होंठों पर अपनी उंगली फेरते हुए रौनी बोला, ‘‘हमारी शादी के लिए रुपयों का जुगाड़ हो गया…’’यह सुनते ही रोमा उछल पड़ी और बोली, ‘‘अरे वाह… यह सब तू ने कैसे किया? तेरा मालिक तुझे रुपए उधार देने के लिए तैयार हो गया क्या?’’रोमा के ऐसा पूछने पर रौनी के चेहरे पर एक राजभरी मुसकान और आंखों पर एक अजीब सी शरारत तैर गई और वह रोमा का चेहरा अपने दोनों हाथों में ले कर उस के होंठों को चूमने लगा. रोमा झुंझला कर रौनी से अलग होते हुए बोली,

‘‘छोड़ मुझे… पहले यह बता कि रुपए कहां से आएंगे?’’अपने हाथों से अपने ही होंठों को पोंछते हुए रौनी बोला, ‘‘तुझे हमारे साहब के बच्चे को जन्म देना होगा.’’इतना सुनते ही रोमा चिढ़ गई और बोली, ‘‘तुझे शर्म नहीं आती, कैसी बेशर्मों जैसी बात करता है. मैं भला तेरे साहब के बच्चे की मां क्यों बनूंगी…’’

रोमा के ऐसा कहने पर रौनी हंसते हुए बोला, ‘‘अरे, तुझे साहब के बच्चे की मां नहीं बनना है, बच्चे की मां तो उन की बीवी ही रहेगी, तुझे तो बस उन के बच्चे को अपनी कोख में 9 महीने के लिए रखना है. इस के लिए साहब हमें 2 लाख रुपए देंगे, मकान किराए पर ले कर देंगे और खानापीना सब का खर्चा साहब ही उठाएंगे.’’पहले तो रोमा मानी नहीं, लेकिन जब रौनी ने उसे सरोगेसी मां के बारे में अच्छी तरह से समझाया, अपने प्यार का वास्ता दिया और जल्द ही शादी करने का वादा किया, तो 20 साल की भोलीभाली रोमा सरोगेसी मां बनने के लिए तैयार हो गई.

रोमा ने सारे घरों का काम छोड़ दिया. इतना ही नहीं, अपना घर भी छोड़ दिया. वैसे भी घर पर उस का अपना कोई था नहीं. बाप पूरा दिन शराब के नशे में पड़ा रहता. उसे अपना होश नहीं रहता था, तो वह अपनी बेटी की फिक्र कहां से करता. सौतेली मां के लिए रोमा बोझ ही थी. रोमा के आगेपीछे कोई नहीं था. जो था रौनी ही था, जिस पर उसे अंधा भरोसा था और वह रौनी पर जान छिड़कती थी.रौनी कोलकाता से रोमा को उत्तराखंड ले आया.

यहां आ कर रोमा को पता चला कि जहां वह रहने वाली है वह कोई घर नहीं, बल्कि एक आश्रम है, जहां उस के जैसी और भी बहुत सी लड़कियां और औरतें दिखाई दे रही थीं, जो मां बनने वाली थीं. आश्रम में कुछ जवान लड़कियां और बुजुर्ग औरतें भी थीं, जो साध्वी और सेवादार थीं. यह आश्रम एक जानेमाने आचार्य द्वारा चलाया जा रहा था, जिन का देशविदेश में हर दिन प्रवचन होता था और वे धर्म से जुड़ी कहानियां भक्तों से साझा करते थे.

रोमा को यह सब बहुत अटपटा लग रहा था, लेकिन वह रौनी का साथ पा कर इन सभी को नजरअंदाज कर रही थी. रोमा की दुनिया अब बदल गई थी. रौनी हर समय उस के साथ रहता, उस का पूरा खयाल रखता. एक महीने के भीतर डाक्टर की निगरानी में रोमा पेट से भी हो गई, लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आया कि यह सब हुआ कैसे? न रौनी के साहब यहां आए और न ही साहब की पत्नी.इस बीच रोमा ने न कभी आश्रम में रह रही किसी लड़की या औरत से कोई बात की और न ही यह जानने की कोशिश की कि वे सब कहां से आई हैं, उन के पति कहां हैं और वे इस आश्रम में कब से हैं.

एक रात अचानक खाना खाने के बाद रौनी कहीं जाने की तैयारी करने लगा. यह देख कर रोमा बोली, ‘‘रौनी, तू कहीं जा रहा है क्या?’’रोमा के ऐसा कहने पर रौनी बोला, ‘‘हां, काम पर तो लौटना होगा. शादी की तैयारी जो करनी है.’’यह सुन कर रोमा का चेहरा उतर गया. वह रोआंसी हो गई और रौनी के गले लगते हुए बोली, ‘‘तू मत जा, रौनी. मैं तेरे बगैर यहां नहीं रह पाऊंगी.

फिर अभी तो बच्चे के होने में पूरे 9 महीने हैं. मैं यहां अकेली तेरे बगैर कैसे रहूंगी… मैं भी तेरे साथ चलती हूं.’’रोमा को इस तरह रोते और साथ चलने की जिद करते देख रौनी उसे समझाते हुए बोला, ‘‘देख, साहब और मेमसाहब की पहली शर्त यही थी कि उन का बच्चा इसी आश्रम में पैदा हो, ताकि बच्चे में अच्छे गुण और संस्कार आएं, इसलिए तुझे यहीं रहना होगा और मुझे तो जाना ही होगा. ‘‘शादी के लिए और भी रुपयों की जरूरत पड़ेगी. तुझे दुखी होने की कोई जरूरत नहीं.

तू यहां अकेली कहां है. इस आश्रम में इतने सारे लोग हैं. सब तेरा ध्यान रखेंगे और मैं भी तो आताजाता ही रहूंगा,’’ ऐसा कह कर रौनी जाने लगा. रोमा उसे भारी मन से आश्रम के बाहर तक छोड़ने के लिए साथ चलने लगी. अभी वे दोनों आश्रम के मेन गेट से कुछ दूर ही पहुंचे थे कि एक लड़की दौड़ती हुई आई और रौनी से लिपट गई. यह देख कर रोमा हैरान थी, क्योंकि वह लड़की बारबार रौनी को अपने साथ ले चलने की बात कह रही थी.वह लड़की कह रही थी,

‘‘रौनी, यह आश्रम, आश्रम नहीं है. यहां लड़कियों की दलाली होती है. उन का शारीरिक शोषण होता है. जबरन उन्हें पेट से किया जाता है और उन से पैदा होने वाले बच्चों को उन पैसे वाले और विदेशी जोड़ों को बेच दिया जाता है, जिन के बच्चे नहीं हैं.’’उस लड़की की बातों को सुन कर रोमा को यह समझने में समय नहीं लगा कि उस के साथ छल हुआ है और वह भी उस लड़की की ही तरह रौनी के हाथों ठगी जा चुकी है. वह रौनी के किसी भी साहब या उन की पत्नी के लिए सरोगेसी मां नहीं बनाई जा रही है, बल्कि इस आश्रम में बच्चों का व्यापार होता है और उसे इसीलिए इस आश्रम में लाया गया है.

रोमा उस लड़की से कोई सवाल करती या फिर रौनी से पूछती कि उस ने उस के साथ यह छल क्यों किया, उस से पहले एक साध्वी तेज कदमों से वहां आई और उस लड़की के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ने के बाद उसे वहां से खींच कर ले जाने लगी. वह लड़की चीखचीख कर रौनी को पुकारती रही और उस से कहती रही, ‘‘रौनी, मुझे इस नरक से ले चलो…’’लेकिन रौनी उस लड़की को अनसुना और रोमा को अनदेखा कर आश्रम के गेट से बाहर अपने नए शिकार की तलाश में निकल गया. रोमा हैरान सी खड़ी रौनी को अपनी आंखों से ओझल होते हुए देखती रही.

sad love story : प्रेम की चिता

‘‘अरे बाबा, आजकल फसलों पर एक बड़ी मुसीबत आई है. सुना है कि 3-4 किलोमीटर लंबा एक टिड्डी दल किसी भी दिशा से आता है और लहलहाती फसलों पर बैठ कर कुछ ही समय में उन्हें चट कर जाता है. इन टिड्डियों के चलते किसानों में बड़ा डर फैला हुआ है. आजकल किसान खेतों में दिनरात पहरा दे रहे हैं,’’ केशव ने अपने बाबा त्रिकाली डोम से कहा.

‘‘हां… हो सकता है… पर इस खतरे से हमें न कल डर था और न आज ही कोई डर है,’’ केशव के बाबा आसमान में देखते हुए बोले. ‘‘हम तो भूमिविहीन ही पैदा हुए. और हमारे डोम समाज का काम चिता को सजाने से ले कर उसे पूरी तरह जलाने का था. इसलिए जमीन न होने के चलते फसल कभी उगाई नहीं और आज भी हमारे पास जमीन नहीं है, इसलिए टिड्डी दल का खतरा हो या न हो, हमें कोई असर नहीं पड़ता,’’ और फिर केशव का बाबा एक गाना गाने लगा था:

‘‘तिसना छूटी… माया छूटी, छूटी माटी, माटी रे… माटी का तन मिला माटी में… रह गई, माटी माटी… रे…’’ किसी जमाने में इस गांव में लाशें जलाने का काम करने वालों को डोमराजा कहा जाता था और वे समाज में अनदेखे रहते थे, पर धीरेधीरे जैसे इस गांव का विकास हुआ, वैसे ही इन लोगों की जिंदगी में भी सुधार हुआ. डोम लोगों की अगली पीढ़ी अब अपना पुश्तैनी काम न कर के पढ़ाई करना चाहती थी.

त्रिकाली डोम का पोता केशव भी शहर से पढ़ाईलिखाई कर के गांव में वापस आ गया था और उस ने गांव में ही कपड़े का कारोबार शुरू कर दिया था. केशव के अच्छे बरताव और मेहनत के चलते उस का काम भी चमक रहा था.

इस कसबे में एक तरफ ऊंची जाति के लोगों की बस्तियां थीं, तो दूसरी तरफ पिछड़ी जाति की. ऐसे तो ऊंचनीच के भेद को किसी भौगोलिक रेखा की जरूरत नहीं होती है, वह भेद तो हमेशा ही दोनों जातियों के मन में अपनी जगह बनाए रखता है. ऊंची जातियों में, ऊंचे होने का अहंकार रहता है, तो नीची जातियों में नीच कहलाए जाने का दर्द और एक अनजाना डर.

किसी जमाने में एक पिछड़ा गांव आज एक अच्छेखासे कसबे में तबदील हो गया था. इस गांव में मोबाइल और केबल टीवी से ले कर जरूरत की तकरीबन हर चीज मिलने लगी थी. पर यह गांव आज भी किसी जमाने में अपने ऊपर हुए जोरजुल्म की कहानी कहता है और यह बताता है कि जोरजुल्म की कोई जाति नहीं होती, माली तौर पर कमजोर किसी भी आदमी को सताया और दबाया जा सकता है, जिस का उदाहरण इसी गांव में रहने वाली 55 साल की एक औरत रूपाली देवी थी. वह जाति से ठाकुर थी, पर उस के पति से उस के देवर का जमीनी विवाद चला करता था. उस के पति ने कोर्टकचहरी कर के जमीन का कब्जा हासिल कर लिया था.

इस बात से गुस्साए देवर ने एक दिन दबंगों के साथ मिल कर रूपाली देवी का रेप कर डाला था. उस समय रूपाली देवी की उम्र महज 20 साल थी, अपने ऊपर हुए रेप की रिपोर्ट कराने गई रूपाली देवी की कोई भी सुनवाई नहीं हुई. उलटा उसे ही जलील हो कर थाने से बाहर निकाल दिया गया. इतने पर भी जब रूपाली देवी के देवर की सीने की आग ठंडी नहीं हुई. रेप के एक साल के अंदर ही रूपाली देवी ने एक चांद सी लड़की ‘मालती’ को जन्म दिया, तो उस बच्ची को रेप से पैदा हुई औलाद के रूप में भी खूब प्रचारित किया गया.

इस से दुखी हो कर रूपाली देवी और उस के पति ने कई बार गांव ही छोड़ देने और दूसरे गांव में जा बसने की योजना बनाई, पर जमीन से जुड़े होने के चलते और अपनी जमीन की सही कीमत न मिल पाने के चलते वे अपने मुंह को सी कर इसी गांव में रहते रहे.

मालती रेप के द्वारा पैदा हुई औलाद है, इस दुष्प्रचार का असर ये हुआ कि मालती से कोई भी लड़का शादी करने को राजी नहीं हो रहा था. यदि कहीं से रिश्ता बनता भी तो मालती की बदनामी पहले ही करा दी जाती. लिहाजा, यह रिश्ता टूट जाता और इसी तरह मालती की उम्र आज 35 साल की हो गई थी और वह अब भी कुंआरी थी.

मालती के घर में उस की मां, बाप और एक भाई थे. मालती ने अपनी बढ़ती उम्र के बीच खुद को बिजी रखने और रोजीरोटी के लिए खुद का काम करना शुरू कर दिया था. वह कसबे की दुकानों से कपड़ा खरीद कर उस पर बढि़या कढ़ाई करती और अपने भाई द्वारा उन्हें शहरों के बाजारों में बिकने भेज देती.

इस बार जब मालती कसबे के बाजार में कपड़ा खरीदने गई, तो अपनी दुकान पर बैठे केशव ने मालती को अच्छा ग्राहक जान कर उस से कहा, ‘‘कभी हमारी दुकान से भी कपड़ा खरीद कर देखो… क्वालिटी में सब से बेहतर ही पाएंगी.’’ ‘‘हां… पर, मैं तो यह काम चार पैसे कमाने के लिए करती हूं… अगर बाजार से कम कीमत लगाओ, तो मैं तुम से ही कपड़ा ले लिया करूंगी,’’ मालती ने कहा.

‘हां, तो फिर आओ… दुकान के अंदर आ आओ… एक से एक कपड़ा दिखाता हूं और वे भी सही कीमत के साथ, अगर पसंद आ जाए तो बता देना… घर तक पहुंचवा भी दूंगा,’’ केशव ने दुकान के अंदर आने का इशारा करते हुए कहा. मालती ने दुकान के अंदर जा कर अपनी पसंद के कपड़े लिए और अपने मुताबिक कीमत भी लगवाई.

‘‘एक बात कहूं… मैं तो सोचता था कि तुम ठकुराइन हो… मुझ डोम के यहां से कपड़ा खरीदने में गुरेज करोगी,’’ केशव ने मालती की आंखों में झांकते हुए कहा. ‘‘ये जातपांत वे मानें… जिन्हें वोट लेना हो… मैं ये ऊंचनीच, भेदभाव में यकीन नहीं रखती… और यह सब सोचने का मेरे पास टाइम भी नहीं है और न ही मेरी समझ,’’ यह कह कर मालती दुकान से बाहर निकल गई.

‘‘और… हां, वे पैसे मैं छोटे भाई से भिजवा दूंगी,’’ मालती ने कहा, जिस के बदले में केशव सिर्फ मुसकरा दिया. ‘‘कसबे की बाकी दुकानों से कपड़ा भी अच्छा है और दाम भी ठीक लगाए हैं केशव ने, अगली बार भी इसी के यहां से कपड़ा लूंगी,’’ केशव की दुकान से आए हुए कपड़े पर कढ़ाई करते हुए मालती मन ही मन बुदबुदा उठी थी.

फिर तो केशव की दुकान से कपड़ा खरीदने का सिलसिला शुरू हो गया, और एक ठाकुर जाति की लड़की और एक डोम जाति के लड़के में अपने धंधे को ले कर एक अच्छी समझ पैदा हो गई थी. केशव अब 30 साल का हो गया था और अपनी पढ़ाई और धंधा जमाने के चक्कर में ब्याह की सुध भी न रही, एकाध बार बाबूजी ने बोला भी तो केशव ने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा धंधापानी जम जाए तो कर लूंगा, पर अब उस के लिए रिश्ते आने बंद हो गए थे, क्योंकि डोम लोगों की प्रथा के मुताबिक उस की शादी करने की उम्र अब निकल चुकी थी.

मालती और केशव भले ही अलगअलग जाति के थे, पर एक  यही बात उन दोनों में समान थी कि  दोनों अभी तक कुंआरे थे. आसमान में कालेकाले बादल घिर आए थे और बहुत तेज बारिश होने की उम्मीद थी. बहुत देर से कोई ग्राहक न आता देख केशव ने दुकान का शटर बंद कर दिया और एक छाता ले कर अपने घर की तरफ चल पड़ा.

बारिश बहुत तेज हो गई थी. सड़कों पर सन्नाटा छा गया था. ऐसे में अचानक केशव की नजर एक कोने में खड़ी मालती पर गई, जो एक कोने में खड़ी हो कर बारिश से बचने की नाकाम कोशिश कर रही थी. ‘‘अरे… मालती… तुम… इतनी तेज बारिश में यहां क्या कर रही हो?’’ अपना छाता केशव ने मालती के सिर के ऊपर लगाते हुए कहा.

‘‘दरअसल, मैं तुम्हारे पास ही आ रही थी… मुझे कल ही इस लाल रंग का कपड़ा चाहिए… सोचा, तुम्हें और्डर दे दूं चल कर… पर रास्ते में ही बारिश आ गई… अब पता नहीं कब तक यह यों ही होती रहेगी,’’ मालती ने ऊंची आवाज में कहा. ‘‘कोई बात नहीं… वह सामने देखो… स्कूल की पुरानी बिल्डिंग है… आओ वहीं चल कर बारिश रुकने का इंतजार करते हैं,’’ केशव ने कहा और कह कर दोनों के कदम उस स्कूल की ओर बढ़ गए.

स्कूल की छत के नीचे दोनों खड़े हो गए, दोनों के शरीर गीले हो गए थे. मालती अपनी साड़ी के गीले पल्लू को निचोड़ने लगी और अपने भीगे हुए सिर के बालों को झटका दे कर सुखाने लगी थी कि तभी उस के सीने से उस का आंचल हट गया और उस के गोरे उभार उजागर हो गए.

केशव की नजर अब भी मालती के सीने पर ही लगी हुई थी. उसे अपने सीने को घूरता देख कर मालती ने उन्हें अपनी साड़ी के पल्लू से ढक लिया. मालती और केशव दोनों कुंआरे थे और आज जब दोनों के जिस्म पूरी तरह से पानी में भीग गए थे, तो उन की छुअन ने उन दोनों के अंदर दबी हवस की चिनगारी को भड़का दिया.

चारों तरफ सन्नाटा था. बस बारिश ही बारिश थी. केशव ने मालती का हाथ पकड़ लिया. मालती ने कोई विरोध नहीं किया, तो उस की हिम्मत बढ़ गई और उस ने मालती के गालों को चूम लिया और धीरेधीरे होंठों का रसपान करने लगा. मालती ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं और कोई विरोध नहीं किया. केशव की हिम्मत बढ़ गई थी. उस ने  मालती को अपनी मजबूत बांहों में भर लिया और बेतहाशा चूमने लगा.

मालती के जिस्म को भी जैसे किसी की बांहों में आने का ही इंतजार था.  वह भी अब केशव का साथ देने लगी  और दोनों देह मिलन की नौका पर  सवार हो कर किनारे पर लगने का सफर  करने लगे…कुछ देर बाद दोनों हांफते हुए एकदूसरे से अलग हो गए, बाहर अब भी बारिश तेज हो रही थी, पर दोनों जिस्मों के अंदर का तूफान शांत हो चुका था.

आज जातियों के सारे भेद मिट चुके थे, 2 जिस्मों की जरूरत ने आज ऊंचनीच की सभी दीवारें गिरा दी थीं. काम के सिलसिले में उन दोनों का जो एकदूसरे से मिलना शुरू हुआ था, उस ने इन दोनों कुंआरे दिलों को अपनी हवस मिटाने का रास्ता दिखा दिया था. मालती और केशव के बीच एक बार संबंध क्या बने, फिर तो दोनों काम के बहाने कम मिलते और अपने जिस्म की प्यास बुझाने के लिए ज्यादा, जिस का नतीजा यह हुआ कि मालती को बच्चा ठहर गया, जिस से वह बहुत घबरा गई थी.

‘‘केशव… हम से बहुत बड़ी भूल हो गई है… जवानी के जोश में हम ने बिना आगापीछा सोचे संबंध बनाए और अब मुझे बच्चा ठहर गया है… अब क्या होगा?’’ मालती घबराई हुई थी. ‘‘अरे, होना क्या है… अब हम और तुम शादी कर लेंगे,’’ केशव ने कहा.

‘‘शादी… पर क्या तुम जानते हो कि मेरी मां के साथ जो हुआ था…? और लोग मुझे रेप से पैदा हुई औलाद समझते हैं, इसीलिए मेरी शादी आज तक नहीं हुई… और फिर हमारी उम्र में भी फर्क है और हमारी जाति में भी,’’ मालती की आंखों में आंसू आ गए थे. ‘‘हां… मैं जानता हूं मालती कि तुम मुझ से पूरे 5 साल बड़ी हो… पर क्या उम्र का ये फैसला हमारे प्यार को कहीं से कम करता है क्या…? और फिर आज इनसान कहां से कहां पहुंच रहा है और हम ये दकियानूसी बातें ले कर कब तक बैठे रहेंगे? या फिर तुम्हारा मन मुझ से भर तो नहीं गया?’’ केशव ने पूछा.

‘ऐसी तो कोई बात नहीं… पर तुम भी जानते हो कि हमारी शादी इतनी आसानी से नहीं होगी.’’‘‘हां, हो सकता है कि राह में कुछ मुश्किलें आएं, पर हम बिना कोशिश करे तो हार नहीं मान सकते न… मेरे विचार में हमें अपने घरों में एक बार बात कर लेनी चाहिए,’’ केशव ने मालती को ढांढस देते हुए कहा.

मालती और केशव ने यही फैसला लिया कि आज वे दोनों अपने घर में बता देंगे कि वे दोनों शादी करना चाहते हैं. ‘‘क्या…? क्या 35 साल तक तुझे इसीलिए घर में बिठाए रखा कि एक दिन तू उस डोम से ब्याह रचा ले… जानती भी है कि उस लड़के के बापदादा क्या काम किया करते थे… लाशें फूंकते थे… लाशें… चिता जलाया करते थे वे सब… और हम लोगों की दी गई जूठन ही उन की रोजीरोटी का जरीया हुआ करती थी.

‘‘और हम लोग सुबहसुबह उन का नाम लेना भी अपशकुन समझते हैं… घर का पानी और खाना तो बहुत दूर की बात है,’’ मालती के पिता आपे से बाहर हो रहे थे.

‘‘पर पिताजी… वे मेरी सब बातें जानते हुए भी मुझ से ब्याह रचाने को तैयार हैं,’’ मालती ने डरते हुए कहा.

‘‘क्या… सबकुछ जानता है…? क्या सबकुछ…? यही न कि तुम्हारे अंदर एक ठाकुर का खून दौड़ रहा है… और कुछ नहीं जानता वह…

‘‘मालती, तुम नहीं जानती कि ये निचली जाति के लड़के एक साजिश के तहत अच्छे घर की लड़कियों को फंसाते हैं और फिर उन के घरपरिवार पर

अपना दबदबा भी जमाते हैं,’’ मालती के पिता ने कहा.

‘‘और हां दीदी… अगर तुम से अकेले नहीं रहा जा रहा था, तो कोई और लड़का ढूंढ़ लिया होता, तुम्हें वही लाशें जलाने वाला डोम ही मिला,’’ अब तक चुप मालती के भाई ने कहा.

मालती को अपने छोटे भाई के मुंह से ऐसी बातें सुनने की उम्मीद नहीं थी. वह अब और सुन पाने की हालत में नहीं थी. वह वहां से अपने कमरे में भाग गई थी.

जब केशव ने अपने घर में मालती से ब्याह रचाने की बात कही, तो उस के घर में भी वही हुआ, जिस की उम्मीद कभी उस ने नहीं की थी.

‘‘क्या…? पूरी बिरादरी में तुम्हें कोई और लड़की नहीं मिली, जो उस लड़की से शादी करोगे तुम…

‘‘अरे, तुम्हें पता भी है कि इतने सालों तक उस की शादी क्यों नहीं हुई… क्योंकि वह नाजायज… उस का असली बाप कौन है, किसी को नहीं पता,’’ केशव के पिताजी चीख रहे थे.

‘‘पता है न तुम्हें कि उस की मां का कई लोगों ने मिल कर रेप किया था  और उसी के बाद इस लड़की का जन्म हुआ है…

‘‘भले ही वह तुम से जाति में ऊंची है, पर उस से क्या… है तो वे नाजायज ही न,’’ केशव के पिता की आवाज में उस के सभी घर वालों की भी आवाज शामिल लग रही थी, क्योंकि सभी लोग केशव को नफरत भरी नजरों से देख रहे थे.

अगले ही दिन इन दोनों की बातें ही लोगों की जुबान पर थीं और सब लोग इसे एक बेमेल जोड़ी और समाज को तोड़ने वाली कोशिश बता रहे थे.

आननफानन ही ब्राह्मण सभा बुलाई गई और यह फैसला लिया गया कि किसी दलित द्वारा एक अबला सवर्ण लड़की के शील को भंग कर के उस से ब्याह रचा कर सारी ब्राह्मण कौम को बदनाम करने की साजिश है यह… उसे सजा तो जरूर मिलनी चाहिए.’’

कसबे में मीडिया की चहलपहल अचानक से बढ़ गई थी और चुनावी बारिश वाले नेता भी मैदान में उतर आए थे.

कसबे में अचानक ही एक अजीब सा तनाव वाला माहौल बन गया था. अगले ही दिन भरी दोपहर में केशव की दुकान धूधू कर के जलती हुई देखी जा सकती थी.

उधर मालती के घर में भी आपसी रिश्तों में आग लगी हुई थी और पूरा महल्ला मालती और उस के परिवार की थूथू कर रहा था.

‘‘क्या… मेरी यह सजा है कि मेरी मां के साथ रेप हुआ है. अब तक मैं ने रेप का दंश झेला और बदनामी सही. अब उस के बाद यह दंश मुझे भी दुख देता रहेगा.

अगर किसी औरत के साथ रेप होना गलत है, तो सजा उसे नहीं, बल्कि बलात्कारियों को मिलनी चाहिए, जिन्होंने यह घिनौना अपराध किया है. मालती अपने घर में चीख रही थी.

तभी उस के घर के दरवाजे पर दस्तक हुई. मालती के पिता ने दरवाजा खोला, सामने मुंह पर कपड़ा बांधे दो लंबेचौड़े लोग खड़े थे, वे किस जाति के थे, ये कहना मुश्किल था कि किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, सिर्फ उन की आंखें ही देखी जा सकती थीं. वे आंखें मालती को ढूंढ़ रही थीं. मालती ने खतरा भांप लिया और पीछे के दरवाजे से भाग निकली. वे दोनों लठैत उस के पीछे दौड़ रहे थे.

मालती दौड़तेदौड़ते बुरी तरह थक गई थी, अचानक उस के पैर से एक पत्थर टकराया और वह गिर गई. उस के पेट के निचले हिस्से से खून की धार फूट पड़ी थी. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाती, मालती के सिर पर लाठियां बरसने लगी थीं. उस की आंखें मुंद गई थीं. मालती की आंखें फिर कभी खुल नहीं सकीं.

 

Satire : मौर्निंग वौक

ममता मेहता हाय रे फूटी जिंदगी, आई खुशियां भी चली गईं. अच्छीभली सुबह कट रही थी. पत्नी से छिप कर मौर्निंग वाक में दोचार हसीनाओं को देख लिया, एकदो से हंस कर बात कर ली. लेकिन नहीं, तुम्हें तो मेरा खुश होना ही बरदाश्त नहीं, आखिर गलती ही क्या थी? डाक्टर से चैकअप करवा कर निकला तो तनाव दोपहर की धूप की तरह तनमन को झुलसा रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो गया. ऊपर से डाक्टर की बातें, ‘घबराने की कोई बात नहीं है मिस्टर शर्मा, इस उम्र में अकसर ऐसा हो ही जाता है. जरा प्रिकौशन लेंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’ इस उम्र में… क्या हुआ है मेरी उम्र को… आज के जमाने में 40 की उम्र कोई उम्र है. जितने भी महान लोग हुए हैं उन्हें महानता, सफलता 40 के बाद ही मिली है. और यह डाक्टर मेरी उम्र का बखान कर रहा है.

यह सब तो आजकल नौर्मल हो गया है. छोटे बच्चों को भी हो जाता है. इस में उम्र की क्या बात है. अब परहेज दुनिया भर के, रिस्ट्रिक्शंस दुनियाभर के, ऊपर से अब उबले, बिना नमक के, खाने की कल्पना मात्र से मु घझेबराहट होने लगी. घर पहुंचा तो सुमि सोफे पर ही बैठी थी. मुझे देखते ही मेरे हाथों से रिपोर्ट खींच कर बोली, ‘क्या हुआ करवा आए चैकअप, क्या कहा डाक्टर ने, सब ठीक तो है न?’ मैं ने कहा, ‘हां, सब ठीक है, बस, थोड़ा ब्लडप्रैशर और कोलैस्ट्रौल बढ़ा हुआ है.’ सुमि की प्रतिक्रिया वही थी जैसी मैं ने सोची थी, ‘हाई ब्लडप्रैशर! कोलैस्ट्रौल! मैं पहले से ही कह रही हूं कि थोड़ा खाने पर कंट्रोल करो, चटपटा खाना बंद करो. मगर नहीं… चटपटा, मसालेदार खाना देखते ही तो जबान चटकने लगती है और कुछ नहीं तो आदमी को अपनी उम्र का तो खयाल रखना ही चाहिए. अब कल से सब बंद.

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लौकी और कच्चे सलाद के अलावा कुछ नहीं.’ मैं चुप बैठा रहा. अपना तो यह निजी अनुभव रहा है कि बरखा, बौस और बीवी वजहबेवजह कभी भी बरस सकते हैं. यह 3 बी ‘बी’ की तरह ही काटने को हमेशा तत्पर रहते हैं. उन मधुमक्खियों से तो आप किसी तरह बच भी सकते हैं पर इन से बचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है. फिर भी मैं ने हलके से प्रतिरोध का असफल प्रयास किया, ‘अरे काहे इतना टैंशन ले रही हो. थोड़ा सा ही तो हाई है. डाक्टर ने कहा है, कभीकभी हो जाता है, परेशान होने की कोई जरूरत नहीं.’ सुमि ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया, ‘थोड़ेथोड़े में ही कब बड़ा हो जाता है, पता चलता है क्या आप को? पता भी है, वह शक्ति कालोनी वाले सीखी ऐसे ही ब्लडप्रैशर को ‘कुछ नहीं कुछ नहीं’ कहते रहे और यही कहतेकहते एक दिन लुढ़क गए. वे मेरे जामनगर वाले फूफाजी भी यही कहते रहे और कुछ नहीं कुछ नहीं में आम खातेखाते रवाना हो गए.

वे अपने…’ मैं ने बीच में टोका, ‘अब बस भी करो. मेरा ध्यान रख रही हो या डरा रही हो. यह गया वह गया, पर मैं कहीं जाने वाला नहीं हूं अभी, सम?ा. जाओ, चाय बनाओ.’ जातेजाते पलटी, ‘अब आप को कहीं जाना है या नहीं, वह मु?ो नहीं पता, पर अब रोज सवेरे घूमने जरूर जाएंगे, यह सम?ा लीजिए.’ मेरा माथा ठनका, ‘घूमने! सवेरे! दिमाग खराब है तुम्हारा. मैं कहीं नहीं जाने वाला और तुम भी मु?ो परेशान करने की कोशिश मत करना.’ सुमि लड़ने जैसे अंदाज में बोली, ‘हां, कुछ मत करो आप. बस, पड़े रहो और खाते रहो. बढ़ाओ अपना ब्लडप्रैशर, दवाइयों का खर्चा. सारा जमाना कसरत के पीछे पड़ा है, सारा जमाना मौर्निंग वाक के लिए जा रहा है, आप बैठे रहो ऐसे ही. ‘मु?ो पता है आप चाहते ही नहीं हो कि आप की तबीयत ठीक हो. आप बीमार ही पड़े रहना चाहते हैं, लोगों की सिंपैथी लेना चाहते हैं, लेकिन मैं कह देती हूं मैं ऐसा होने नहीं दूंगी. आप अब से पूरे प्रिकौशन लेंगे, मतलब लेंगे. उस में सब से पहले मौर्निंग वाक, सम?ो आप? कल सुबह मौर्निंग वाक पर जाएंगे, मतलब जाएंगे.’

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मैं ने सिर पकड़ लिया, ‘अब यह हिडिंबा मुझे मौर्निंग वाक पर भेजे बिना मानेगी नहीं. ठीक है एकदो दिन जाऊंगा, फिर कुछ न कुछ बहाना बना दूंगा.’ सुबह सुमि ने 5 बजे ही उठा दिया. बड़ी मुश्किल से आंखें मलता, सुस्ताता, अलसाता उठा. घिसटतेघिसटते टेकड़ी पर पहुंचा. वहां पहुंचते ही सारी इंद्रियां सचेत हो गईं. लगा कि फूलों की घाटी में आ पहुंचा हूं. जहां देखो वहां नजारे ही नजारे. जौगिंग करती बालाएं, कसरत करती सुंदरियां, वाक करती तितलियां… हाय, मैं इतने दिन पहले क्यों नहीं आया मौर्निंग वाक के लिए. लोग तो और भी कई थे, हर साइज, हर शेप, हर उम्र के. राष्ट्रीय एकता की ऐसी मिसाल कहीं और न थी. हर धर्म, हर जाति, हर आयु, हर वर्ग के लोग वहां मौजूद थे. पता नहीं सेहत सुधारने या आंखें सेंकने. उस टेकड़ी के गार्डन में तो मेरा दिल गार्डनगार्डन हो गया. एक बड़ी सुंदर बाला को देख कर मेरा दिल उस से बातें करने को मचलने लगा. मेरा हलकाफुलका मन तो तुरंत उछल कर उस के पास पहुंच गया और जब तक मैं अपने भारीभरकम शरीर को ठेलठाल कर उस के पास पहुंचाता,

वह अपने बौयफ्रैंड के साथ उड़नछू हो गई. मेरा हलका मन भी भारी हो गया. अब तो इस शरीर को हलका करना ही पड़ेगा, नहीं तो जब तक मैं किसी बाला से बात करने उस तक पहुंचूंगा वह 2 बच्चों की मां बन चुकी होगी. अब तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा. वजन कम करने के साथ अपने इस उजड़े चमन जैसे हुलिए को भी सुधारना पड़ेगा. मैं एकदम जाग गया जागरूक नागरिक की तरह. मेरी सारी संचेतना जागृत हो गई. अब पता चला चौबेजी, वर्माजी, बत्राजी, चोपड़ाजी, देशपांडेजी, देशमुखजी, जोशीजी क्यों सवेरेसवेरे मौर्निंग वाक के लिए आते थे. सेहत तो बहाना था नजरें जो मिलाना था और मैं मूर्ख आदमी इतने दिन तक सोता रहा. सोएसोए खोता रहा. जिंदगी की कितनी महत्त्वपूर्ण बातें तू ने मिस कर दीं,

अब तो संभल जा. मैं ने मन ही मन सुमि को धन्यवाद दिया और संभल गया. अब तो कोई बेवकूफ ही होगा जो मौर्निंग वाक के लिए मना करता. मैं भी सुमि के सामने ऊपर से नानुकुर करता, अंदर ही अंदर हुलसता मौर्निंग वाक करने के लिए. मन कुलबुलाने लगा. अपने रहनसहन पर ध्यान दिया. सब से पहले बालों को सुधारा. जहांतहां झांकती चांदी को ब्लैक मैटल में बदला. मूंछों पर सिलवर पेंट की जगह ब्लैक पेंट किया. नया ट्रैक सूट, नए जूते खरीदे जिस से कि मैं स्मार्ट नजर आऊं. एक हफ्ते में तो हुलिया ही बदल गया. चेहरा चमक गया, रौनक आ गई, मन प्रसन्न रहने लगा. अब तो हर वक्त गुनगुनाने का मन करता था. बस, तोंद थी जो बढ़ी हुई थी. पर मैं आशावादी था, मुझे आशा थी कि यह जल्दी ही कम हो जाएगी. गार्डन में मेरी कल्पनाओं के घोड़े भी उड़ान भरने लगे. पर… मुझे और घोड़ों को उड़ान भरते अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि एक दिन सुबह उठते ही सुमि ने कहा, ‘आज मैं भी चलूंगी आप के साथ वाक के लिए.’ मैं उठताउठता बैठ गया, ‘तुम क्या करोगी चल कर. तुम चलोगी तो यहां मेरा नाश्ताखाना कौन बनाएगा, मुझे औफिस जाना है भई.’

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उस ने लापरवाही से कहा, ‘उस की चिंता आप मत करो. मैं आ कर बना दूंगी.’ मरता क्या न करता. सुमि को चलना था तो वह चली ही. मेरी बिलकुल भी बिसात न थी कि उसे रोक पाता. हम चले. इतने दिनों में वहां काफी लोगों से पहचान हो गई थी. मुझे देखते ही सब की हायहैलो शुरू हो गई, उन में वे हसीनाएं भी थीं जो रोज मुझे देख कर मुसकराती थीं, हाथ हिलाती थीं, दोचार कोई बात भी कर जाती थीं. सुमि का चेहरा मौसम विभाग की भविष्यवाणी की तरह पलपल बदल रहा था, इसलिए हालफिलहाल कुछ भी अनुमान लगाना कठिन था कि सुहानी धूप खिली रहेगी, भारी वर्षा होगी, गरज के साथ छींटे पड़ेंगे या वर्षा के साथ ओले गिरेंगे. सबकुछ समय के हवाले कर मैं संभावित परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा. घर पहुंचे. सुमि कुछ नहीं बोली. चुपचाप नाश्ताखाना बनाने में लग गई. मुुुझे भी लगा, मैं बेकार ही टैंशन ले रहा हूं. कुछ नहीं है. इस सोच से मुझे बड़ी राहत मिली. मैं आराम से दफ्तर गया. आराम से दफ्तर के आवश्यक काम, जैसे गपशप, चर्चा, कैंटीन के चक्कर लगाना वगैरह निबटाया और आराम से घर आया. सुमि अभी भी कुछ नहीं बोली.

मैं ने रात्रिभोजन का स्वाद लिया, टीवी का आनंद लिया और सुबह की सुहानी कल्पना में डूबा अपने ट्रैक सूट वगैरह को संभालने लगा कि बम विस्फोट हुआ, ‘कल से आप मौर्निंग वाक के लिए नहीं जाएंगे.’ तो वह खतरा आ ही गया जिस की भाप मुझे सुबह से आ रही थी. मैं ने कारण जानना चाहा, ‘अरे, क्यों? अचानक क्या हो गया, अभी तक तो तुम ही पीछे पड़ी थीं कि मौर्निंग वाक जाओ मौर्निंग वाक जाओ, अब क्या हुआ?’ सुमि तल्खी से बोली, ‘हां, मैं ने मौर्निंग वाक के लिए कहा था, जौगर्स पार्क फिल्म का रिऐलिटी शो बनाने के लिए नहीं. अब पता चला मुझे नाना करने वाला बंदा एकाएक मौर्निंग वाक को ले कर इतना उत्साहित क्यों हो गया. 56 पकवानों से भरी थाली दिखेगी तो घर की दाल किसे भाएगी.’ मैं बौखला गया, ‘क्या बकवास कर रही हो. मैं वहां घूमने जाता हूं,

पकवान देखने नहीं.’ सुमि चादर निकालते बोली, ‘हां, वह तो मैं ने देखा ही है कितनी सैर हो रही थी और कितने सपाटे मैं चिढ़ गया, ‘तुम्हारा भी जवाब नहीं. पहले नहीं जा रहा तो लड़लड़ कर भेजा कि घूमने जाओ घूमने जाओ, अब जा रहा हूं तो कह रही हो मत जाओ. आखिर तुम चाहती क्या हो? फिक्र नहीं है तुम्हें मेरी सेहत की.’ सुमि बोली, ‘बहुत फिक्र है, तभी कह रही हूं. मैं ने आप को सेहत बनाने के लिए कहा था, मुझे को बेवकूफ बनाने के लिए नहीं. अब से आप मौर्निंग वाक नहीं, इवनिंग वाक पर जाएंगे और मैं भी आप के साथ चलूंगी, समझे और टेकड़ी पर नहीं, यों ही रोड पर घूमेंगे. सेहत भी बरकरार रहेगी और जौगर्स पार्क का रीमेक भी नहीं बनेगा. अब, सो जाओ.’ उस ने करवट बदल ली. मैं अपने सुहानेसुनहले टूटे सपनों की किरचें संभालने लगा, ‘जिंदगी देने वाले, जिंदगी लेने वाले… खुशी मेरी छीन के बता तुझे क्या मिला…’

Story : बाबुल का घर पराया

पुष्पा की सारी दलीलें 1-1 कर के व्यर्थ हो गई थीं. सुरेशजी अडिग थे कि उन्हें तो आश्रम जाना ही है, चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए.

‘‘अगर ऐसा ही है और तुम्हारा जाने का मन नहीं है तो मैं अकेला ही चला जाऊंगा,” अपना अंतिम हथियार फेंकते हुए उन्होंने कह ही दिया था.

पुष्पा फिर चुप रह गई. पति का स्वास्थ ठीक रहता नहीं है फिर अब उम्र भी ऐसी नहीं ही कि अकेले यात्रा कर सकें, तो फिर उन्हें अकेला कैसे भेज दें, वहां कुछ हो गया तो कौन संभालेगा इन्हें? आखिरकार, जब कुछ कहते नहीं बना तो उस ने साथ जाने की हामी भर ही दी थी.

‘‘ठीक है, अब तैयारी करो। मैं तो अपना सामान पहले ही जमा चुका हूं,’’ सुरेशजी ने फिर बात खत्म कर दी थी.

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पुष्पा की सारी दलीलें 1-1 कर के व्यर्थ हो गई थीं. सुरेशजी अडिग थे कि उन्हें तो आश्रम जाना ही है, चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए.

‘‘अगर ऐसा ही है और तुम्हारा जाने का मन नहीं है तो मैं अकेला ही चला जाऊंगा,” अपना अंतिम हथियार फेंकते हुए उन्होंने कह ही दिया था.

पुष्पा फिर चुप रह गई. पति का स्वास्थ ठीक रहता नहीं है फिर अब उम्र भी ऐसी नहीं ही कि अकेले यात्रा कर सकें, तो फिर उन्हें अकेला कैसे भेज दें, वहां कुछ हो गया तो कौन संभालेगा इन्हें? आखिरकार, जब कुछ कहते नहीं बना तो उस ने साथ जाने की हामी भर ही दी थी.

‘‘ठीक है, अब तैयारी करो। मैं तो अपना सामान पहले ही जमा चुका हूं,’’ सुरेशजी ने फिर बात खत्म कर दी थी.

 

ऐसा नहीं था कि पुष्पा पहली बार ही आश्रम में जा रही थी. वहां तो वे लोग पिछले कई सालों से जा रहे थे, पर इस बार सुरेशजी ने तय किया कि अब वहीं रहना है. आश्रम की आजन्म सदस्यता लेंगे वे और इस बात को कई बार कह भी चुके थे.

‘‘देखो, हम लोगों का गृहस्थाश्रम का समय अब पूरा हो गया. भगवान की कृपा से सारी जिम्मेदारियां भी पूरी हो गईं। बेटे अपने सैट हो गए, शादीब्याह कर दी, बेटी भी ब्याह दी, अब हमें…’’सुरेशजी वाक्य पूरा करते पर बेटी शब्द के बाद उन्होंने क्या कहा, पुष्पा के कान मानों सुन्न हो कर रह जाते, एक ही शब्द दिलोदिमाग तक ठकठक करता रहता…

बेटी…बेटी… हां, बेटी ही तो है नंदिता। नंदी… जिसे अब सब लोग नंदी के ही नाम से पुकारते हैं और बेटी का करुण, दयनीय चेहरा फिर आंखों के सामने घूमने लगता। देर तक वह उसे ओझल नहीं कर पाती। नंदी उन की बेटी, नाजो पली. दोनों बेटों के काफी समय बाद हुई थी तो वह अब तक नन्ही गुड़िया सी ही लगती थी. हां, अभी कम उम्र की ही तो थी, पर यहां भी सुरेशजी की ही जिद थी कि नौकरी से रिटायर्ड होने से पहले बेटी को ब्याह देना है. मुश्किल से तब हाईस्कूल ही तो पास कर पाई थी। पढ़ने में इतनी कुशाग्र, कितना मन था उस का आगे पढ़ने का. पिता के सामने तो उस की बोलती बंद हो जाती थी। बस, मां से ही जिद करती,”मां, बाबूजी से कहो न, मेरे ब्याह की इतनी जल्दी न करें। इतनी जल्दी तो तुम ने भैया लोगों के भी ब्याह नहीं किए. मुझे पढ़ने दो न…’’

कितना कहा था पुष्पा ने तब सुरेशजी से, पर वे उलटे उसी पर बिगड़ पङे थे,”तुम ने ही तो बेटी को सिर पर चढ़ा रखा है। अरे, इतनी बार कह चुका हूं कि नहीं है हैसियत मेरी लड़की को आगे पढ़ाने की और फिर 4 जमातें आगे पढ़ भी गई तो कौन सा तीर मार लेगी. आखिरकार, उसे ब्याह कर ससुराल ही तो जाना है फिर… अभी तो लड़के वालों के यहां से रिश्ते भी आ रहे हैं, फिर कहां मैं सब के दरवाजे हाथ जोड़ता जाऊंगा. आखिर मेरा भी तो कुछ खयाल करो कि गृहस्थी के जंजाल से मुक्त हो कर 2 घड़ी भगवान का नाम ले सकूं।”

गृहस्थी… जंजाल…बंधन… सुरेशजी के ये शब्द नए नहीं थे पुष्पा के लिए. अब तो खैर नौकरी से मुक्त हो चुके हैं, पर वह तो प्रारंभ से ही ऐसे शब्द उन के मुंह से सुनती आ रही थी और इस आश्रम की सदस्यता लेने का भी उन का निर्णय काफी समय पहले हो चुका था। खैर आननफानन में बिटिया ब्याह दी। वह तो बाद में पता चला था दामाद मयंक की बीमारी का.

‘‘अरे पीलिया ही तो है, कुछ भी कह लो, हेपेटाइसबी सही, पर ऐसी बीमारी कोई गंभीर रोग नहीं है…’’

पता नहीं कोई और गंभीर रोग था या नहीं, पर शादी के 6 महीने बाद ही बेटी विधवा हो गई. नंदी… पुष्पा का कलेजा फिर से मुंह को आने लगता. खबर सुनी थी तो उसी समय उसे गश आ गया था. बदहवास सी फिर बेटी की ससुराल भी गई. सफेद, विधवा और खुले केश में पथराई आंखों से उसे देखती नंदी उस के तो मानों आंसू भी सूख चुके थे. क्या यही उस की गुड़िया थी, नाजों में पली?

‘‘मां…’’

उस के गले से लग कर नंदी का वह चीत्कार भरा स्वर अभी भी दिल दहला जाता है. पता नहीं कैसे रहेगी बिटिया यहां, पर उस की सास ने तो दोटूक निर्णय उसी समय सुना दिया था,”अब यह इस घर की बहू है, जैसे भी हो, रहना तो यहीं है इसे…’’

2 महीने फिर रातदिन गिनगिन कर काटे थे पुष्पा ने. एक बार दबे स्वर में फोन किया था समधिन को,”न हो तो नंदिता को कुछ दिनों के लिए यहां भेद दें, थोड़ा चेंज हो जाएगा…’’ तो फिर समधिनजी फोन पर ही बिगड़ी थीं.

‘‘आप तो एक पारंपरिक परिवार से हैं। सारे रीतिरिवाज जानने वाली. सालभर से पहले तो नंदिता घर से बाहर जा ही नहीं सकती है। आप को पता होना चाहिए, फिर अब यह हमारी जिम्मेदारी है, आप परेशान न हों.’’

नंदी से तो फोन पर ढंग से बात भी नहीं हो पाती थी। मन ही नहीं माना तो पुष्पा ही एक दिन वहां पहुंच गई थी. 2-3 महीने में ही बेटी एकदम भटक गई थी. सफेद साड़ी में लिपटी, दिनभर घर के काम में उलझी। सास, जेठानी सब हुक्म चलाती रहतीं उस पर. बड़ी मुश्किल से दोपहर को थोड़ा सा समय निकाल कर मां से एकांत में मिल पाई थी.

‘‘मां, मुझे घर ले चलो…’’ सिसकियों के बीच इतना ही बोल पाई थी कि तभी टोह लेती हुई छोटी ननद वहां पहुंच गई. लौटते समय पूरे रास्ते आंसू बहते रहे थे पुष्पा के। सुरेशजी से कहा तो और बिगड़े ही थे उसी पर.

‘‘तुम्हें क्या आवश्यकता थी वहां जाने की… हम ने अब कन्यादान कर दिया है, बेटी ब्याह दी है, अब उस का सुखदुख उसी घर से बंधा है, समझी.’’

पुष्पा की आंखें और पथरा गई थीं,’कैसे बाप हैं? वहां बेटी तिलतिल कर मर रही है और इन्हें कोई दुख नहीं. बेटी ब्याह दी तो क्या सारे संबंध ही टूट गए उस से? ठीक है, वे लोग समर्थ हैं, अच्छा कमाखा रहे हैं, दूर भी हैं तो क्या उन की चिंता नहीं है हमें, बेटी भी सुख से रहती तो और बात थी पर यहां तो पहाड़ जैसा दुख टूट पड़ा है उस पर। अब हम उसे सहारा नहीं देंगे तो कौन देगा, फिर इन सब जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर हम आश्रम में कौन से भगवान को खोजने जाएंगे?’

“हां, सुबह 6 बजे की ही ट्रेन है। सोचा तो यही है कि अब लंबे समय तक वही रहा जाए, तैयारियां हो ही चुकी हैं,” सुरेशजी शायद फोन पर किसी से बात कर रहे थे. पुष्पा को याद आया कि तैयारी तो उसे भी करनी है. बेमन से कुछ कपड़े बैग में इकट्ठे किए. सुरेशजी तो अपनी आध्यात्मिक पुस्तकें साथ रखते थे, बस गाड़ी चली तो सामान निकाल लिया. पुष्पा चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी. पहाड़, पेड़, नदी सब के बीच उसे नंदी का करुण चेहरा ही दिखाई दे रहा था. जैसे बेटी चीखचीख कर कह रही हो,’मां, मुझे अपने पास बुला लो। मां कहां दूर भाग रही हो मुझ से, तुम ने तो जन्म दिया है मुझेे… फिर क्यों मेरा दुख तुम्हें छूता नहीं…’ घबरा कर आंखें मूंद ली उस ने.

‘‘इस प्रकार पीठ फेर लेने से जिम्मेदारियां थोड़े ही कम हो जाती हैं बहिनजी…’’ यही तो कहा था नंदी के स्कूल की हैड मिस्ट्रैस ने.

नंदी उन की प्रिय छात्रा रही थी। फिर उसे जल्दी ही ब्याह देने के निर्णय पर भी वे काफी नाराज हुई थीं. और इस दुखभरी घटना की खबर जब उन्हें मिली तो एक बार स्वयं जा कर भी नंदी से मिल आई थीं और तभी पुष्पा के पास आई थीं.

‘‘देखिए पुष्पाजी, आप अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकती हैं। नंदिता एक मेधावी छात्रा रही है। उसे यहां बुलाएं, मैं उस के आगे की पढ़ाई का प्रबंध करूंगी. उसे अपने पैरों पर खड़ा होने दीजिए। आप स्वयं सोचिए कि किस दुर्दशा में जी रही है वह…’’

उस दिन खुल कर पुष्पा ने सुरेशजी से कहा भी था,”आप के दोस्त हैं निर्मलजी, उन की बेटी की ससुराल में नहीं बनी तो यहां बुला लिया है। अब पढ़ालिखा रहे हैं पर हमारी नंदी तो… नीलिमाजी कह रही थी…’’

‘‘नीलिमाजी… नीलिमाजी, आखिर तुम्हें हो क्या गया है? हमारे यहां के रीतिरिवाज सब भूल गईं तुम…दूसरों की बात और है, पर हमारे यहां जब बेटी ससुराल जाती है तो फिर ताउम्र वहीं की होकर रहती है, समझीं तुम… अगर तुम भूल गई हो तो मैं याद दिलाऊं…’’ क्रोध में सुरेशजी की आवाज कांप रही थी. पुष्पा अपने आंसू पी कर रह गई.

इस आश्रम में तो पिछले वर्ष भी आई थी वह… तब सबकुछ कितना सुहावना लगा था. मंदिर में देवी की मूर्ति के सामने बैठी वह घंटों पूजा करती, पर आज तो देवी की मूर्ति देख कर उसे चिढ़ हो रही थी। वह सोचने लगी थी कि अगर देवी या भगवान होते तो क्या इतना पूजापाठ करने के बाद यही हश्र होता? यह सब एक अंधविश्वास ही तो है। उसे नंदी का करुण चेहरा दिख रहा था.

‘‘मां…’’

नंदी का आंसू भरा कांपता स्वर…
कुछ घबरा कर वह बाहर आ गई थी. आज मन पता नहीं क्याक्या हो रहा था. सुरेशजी तो शायद अपना आजन्म आश्रम की सदस्यता का फौर्म जमा करने गए होंगे. धीरेधीरे चल कर वह उस पिछवाड़े में बने छोटे से बगीचे की पत्थर की बैंच पर बैठ गई थी… आंखें सुदूर में पता नहीं क्या ताक रही थी.

‘‘पुष्पा…’’ तभी पीछे से सुरेशजी का स्वर सुनाई दिया। थकाहारा उदास सा।

‘‘क्या हुआ?”

सुरेशजी तब पास ही बैंच पर आ कर बैठ गए. इतने चुप तो कभी नहीं थे.

‘‘क्या हुआ…’’ पुष्पा ने फिर पूछा था.

‘‘कुछ नहीं, अभी जीजी का फोन आया था, मेरे मोबाइल पर। रामदादा की बेटी शिखा नहीं रही…’’

‘‘शिखा… रामदादा की बेटी…’’ एकदम से चौंक गई थी पुष्पा।

“हां, रात को नींद की गोलियां खा लीं उस ने. शायद आत्महत्या का मामला, जीजी कह रही थी कि हमें फौरन जबलपुर जाना होगा.

‘‘पर…’’

पुष्पा को याद आया कि शिखा अपने किसी सहपाठी से विवाह की इच्छुक थी पर रामदादा का और पूरे परिवार का जबरदस्त विरोध था. शायद…शायद सुरेशजी भी अब यही सोच रहे थे। बहुत देर बाद उन का धीमा स्वर सुनाई दिया पुष्पा को,”अब हम अपनी नंदी को भी अपने पास बुला लेंगे। आगे पढ़ाएंगे ताकि उस का भविष्य बन सके… मैं ने अपने आश्रम की सदस्यता का फौर्म वापस ले लिया है… पूजापाठ में भी भरोसा नहीं रहा। यह सब एक छलावा है…”

अब चकित हो कर पुष्पा सुरेशजी की तरफ देख रही थी. दूर घनी बदली के पीछे शायद आशा की कोई किरण चमक उठी थी.

ऐसा नहीं था कि पुष्पा पहली बार ही आश्रम में जा रही थी. वहां तो वे लोग पिछले कई सालों से जा रहे थे, पर इस बार सुरेशजी ने तय किया कि अब वहीं रहना है. आश्रम की आजन्म सदस्यता लेंगे वे और इस बात को कई बार कह भी चुके थे.

‘‘देखो, हम लोगों का गृहस्थाश्रम का समय अब पूरा हो गया. भगवान की कृपा से सारी जिम्मेदारियां भी पूरी हो गईं। बेटे अपने सैट हो गए, शादीब्याह कर दी, बेटी भी ब्याह दी, अब हमें…’’सुरेशजी वाक्य पूरा करते पर बेटी शब्द के बाद उन्होंने क्या कहा, पुष्पा के कान मानों सुन्न हो कर रह जाते, एक ही शब्द दिलोदिमाग तक ठकठक करता रहता…

बेटी…बेटी… हां, बेटी ही तो है नंदिता। नंदी… जिसे अब सब लोग नंदी के ही नाम से पुकारते हैं और बेटी का करुण, दयनीय चेहरा फिर आंखों के सामने घूमने लगता। देर तक वह उसे ओझल नहीं कर पाती। नंदी उन की बेटी, नाजो पली. दोनों बेटों के काफी समय बाद हुई थी तो वह अब तक नन्ही गुड़िया सी ही लगती थी. हां, अभी कम उम्र की ही तो थी, पर यहां भी सुरेशजी की ही जिद थी कि नौकरी से रिटायर्ड होने से पहले बेटी को ब्याह देना है. मुश्किल से तब हाईस्कूल ही तो पास कर पाई थी। पढ़ने में इतनी कुशाग्र, कितना मन था उस का आगे पढ़ने का. पिता के सामने तो उस की बोलती बंद हो जाती थी। बस, मां से ही जिद करती,”मां, बाबूजी से कहो न, मेरे ब्याह की इतनी जल्दी न करें। इतनी जल्दी तो तुम ने भैया लोगों के भी ब्याह नहीं किए. मुझे पढ़ने दो न…’’

कितना कहा था पुष्पा ने तब सुरेशजी से, पर वे उलटे उसी पर बिगड़ पङे थे,”तुम ने ही तो बेटी को सिर पर चढ़ा रखा है। अरे, इतनी बार कह चुका हूं कि नहीं है हैसियत मेरी लड़की को आगे पढ़ाने की और फिर 4 जमातें आगे पढ़ भी गई तो कौन सा तीर मार लेगी. आखिरकार, उसे ब्याह कर ससुराल ही तो जाना है फिर… अभी तो लड़के वालों के यहां से रिश्ते भी आ रहे हैं, फिर कहां मैं सब के दरवाजे हाथ जोड़ता जाऊंगा. आखिर मेरा भी तो कुछ खयाल करो कि गृहस्थी के जंजाल से मुक्त हो कर 2 घड़ी भगवान का नाम ले सकूं।”

गृहस्थी… जंजाल…बंधन… सुरेशजी के ये शब्द नए नहीं थे पुष्पा के लिए. अब तो खैर नौकरी से मुक्त हो चुके हैं, पर वह तो प्रारंभ से ही ऐसे शब्द उन के मुंह से सुनती आ रही थी और इस आश्रम की सदस्यता लेने का भी उन का निर्णय काफी समय पहले हो चुका था। खैर आननफानन में बिटिया ब्याह दी। वह तो बाद में पता चला था दामाद मयंक की बीमारी का.

‘‘अरे पीलिया ही तो है, कुछ भी कह लो, हेपेटाइसबी सही, पर ऐसी बीमारी कोई गंभीर रोग नहीं है…’’

पता नहीं कोई और गंभीर रोग था या नहीं, पर शादी के 6 महीने बाद ही बेटी विधवा हो गई. नंदी… पुष्पा का कलेजा फिर से मुंह को आने लगता. खबर सुनी थी तो उसी समय उसे गश आ गया था. बदहवास सी फिर बेटी की ससुराल भी गई. सफेद, विधवा और खुले केश में पथराई आंखों से उसे देखती नंदी उस के तो मानों आंसू भी सूख चुके थे. क्या यही उस की गुड़िया थी, नाजों में पली?

‘‘मां…’’

उस के गले से लग कर नंदी का वह चीत्कार भरा स्वर अभी भी दिल दहला जाता है. पता नहीं कैसे रहेगी बिटिया यहां, पर उस की सास ने तो दोटूक निर्णय उसी समय सुना दिया था,”अब यह इस घर की बहू है, जैसे भी हो, रहना तो यहीं है इसे…’’

2 महीने फिर रातदिन गिनगिन कर काटे थे पुष्पा ने. एक बार दबे स्वर में फोन किया था समधिन को,”न हो तो नंदिता को कुछ दिनों के लिए यहां भेद दें, थोड़ा चेंज हो जाएगा…’’ तो फिर समधिनजी फोन पर ही बिगड़ी थीं.

‘‘आप तो एक पारंपरिक परिवार से हैं। सारे रीतिरिवाज जानने वाली. सालभर से पहले तो नंदिता घर से बाहर जा ही नहीं सकती है। आप को पता होना चाहिए, फिर अब यह हमारी जिम्मेदारी है, आप परेशान न हों.’’

नंदी से तो फोन पर ढंग से बात भी नहीं हो पाती थी। मन ही नहीं माना तो पुष्पा ही एक दिन वहां पहुंच गई थी. 2-3 महीने में ही बेटी एकदम भटक गई थी. सफेद साड़ी में लिपटी, दिनभर घर के काम में उलझी। सास, जेठानी सब हुक्म चलाती रहतीं उस पर. बड़ी मुश्किल से दोपहर को थोड़ा सा समय निकाल कर मां से एकांत में मिल पाई थी.

‘‘मां, मुझे घर ले चलो…’’ सिसकियों के बीच इतना ही बोल पाई थी कि तभी टोह लेती हुई छोटी ननद वहां पहुंच गई. लौटते समय पूरे रास्ते आंसू बहते रहे थे पुष्पा के। सुरेशजी से कहा तो और बिगड़े ही थे उसी पर.

‘‘तुम्हें क्या आवश्यकता थी वहां जाने की… हम ने अब कन्यादान कर दिया है, बेटी ब्याह दी है, अब उस का सुखदुख उसी घर से बंधा है, समझी.’’

पुष्पा की आंखें और पथरा गई थीं,’कैसे बाप हैं? वहां बेटी तिलतिल कर मर रही है और इन्हें कोई दुख नहीं. बेटी ब्याह दी तो क्या सारे संबंध ही टूट गए उस से? ठीक है, वे लोग समर्थ हैं, अच्छा कमाखा रहे हैं, दूर भी हैं तो क्या उन की चिंता नहीं है हमें, बेटी भी सुख से रहती तो और बात थी पर यहां तो पहाड़ जैसा दुख टूट पड़ा है उस पर। अब हम उसे सहारा नहीं देंगे तो कौन देगा, फिर इन सब जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर हम आश्रम में कौन से भगवान को खोजने जाएंगे?’

“हां, सुबह 6 बजे की ही ट्रेन है। सोचा तो यही है कि अब लंबे समय तक वही रहा जाए, तैयारियां हो ही चुकी हैं,” सुरेशजी शायद फोन पर किसी से बात कर रहे थे. पुष्पा को याद आया कि तैयारी तो उसे भी करनी है. बेमन से कुछ कपड़े बैग में इकट्ठे किए. सुरेशजी तो अपनी आध्यात्मिक पुस्तकें साथ रखते थे, बस गाड़ी चली तो सामान निकाल लिया. पुष्पा चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी. पहाड़, पेड़, नदी सब के बीच उसे नंदी का करुण चेहरा ही दिखाई दे रहा था. जैसे बेटी चीखचीख कर कह रही हो,’मां, मुझे अपने पास बुला लो। मां कहां दूर भाग रही हो मुझ से, तुम ने तो जन्म दिया है मुझेे… फिर क्यों मेरा दुख तुम्हें छूता नहीं…’ घबरा कर आंखें मूंद ली उस ने.

‘‘इस प्रकार पीठ फेर लेने से जिम्मेदारियां थोड़े ही कम हो जाती हैं बहिनजी…’’ यही तो कहा था नंदी के स्कूल की हैड मिस्ट्रैस ने.

नंदी उन की प्रिय छात्रा रही थी। फिर उसे जल्दी ही ब्याह देने के निर्णय पर भी वे काफी नाराज हुई थीं. और इस दुखभरी घटना की खबर जब उन्हें मिली तो एक बार स्वयं जा कर भी नंदी से मिल आई थीं और तभी पुष्पा के पास आई थीं.

‘‘देखिए पुष्पाजी, आप अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकती हैं। नंदिता एक मेधावी छात्रा रही है। उसे यहां बुलाएं, मैं उस के आगे की पढ़ाई का प्रबंध करूंगी. उसे अपने पैरों पर खड़ा होने दीजिए। आप स्वयं सोचिए कि किस दुर्दशा में जी रही है वह…’’

उस दिन खुल कर पुष्पा ने सुरेशजी से कहा भी था,”आप के दोस्त हैं निर्मलजी, उन की बेटी की ससुराल में नहीं बनी तो यहां बुला लिया है। अब पढ़ालिखा रहे हैं पर हमारी नंदी तो… नीलिमाजी कह रही थी…’’

‘‘नीलिमाजी… नीलिमाजी, आखिर तुम्हें हो क्या गया है? हमारे यहां के रीतिरिवाज सब भूल गईं तुम…दूसरों की बात और है, पर हमारे यहां जब बेटी ससुराल जाती है तो फिर ताउम्र वहीं की होकर रहती है, समझीं तुम… अगर तुम भूल गई हो तो मैं याद दिलाऊं…’’ क्रोध में सुरेशजी की आवाज कांप रही थी. पुष्पा अपने आंसू पी कर रह गई.

इस आश्रम में तो पिछले वर्ष भी आई थी वह… तब सबकुछ कितना सुहावना लगा था. मंदिर में देवी की मूर्ति के सामने बैठी वह घंटों पूजा करती, पर आज तो देवी की मूर्ति देख कर उसे चिढ़ हो रही थी। वह सोचने लगी थी कि अगर देवी या भगवान होते तो क्या इतना पूजापाठ करने के बाद यही हश्र होता? यह सब एक अंधविश्वास ही तो है। उसे नंदी का करुण चेहरा दिख रहा था.

‘‘मां…’’

नंदी का आंसू भरा कांपता स्वर…
कुछ घबरा कर वह बाहर आ गई थी. आज मन पता नहीं क्याक्या हो रहा था. सुरेशजी तो शायद अपना आजन्म आश्रम की सदस्यता का फौर्म जमा करने गए होंगे. धीरेधीरे चल कर वह उस पिछवाड़े में बने छोटे से बगीचे की पत्थर की बैंच पर बैठ गई थी… आंखें सुदूर में पता नहीं क्या ताक रही थी.

‘‘पुष्पा…’’ तभी पीछे से सुरेशजी का स्वर सुनाई दिया। थकाहारा उदास सा।

‘‘क्या हुआ?”

सुरेशजी तब पास ही बैंच पर आ कर बैठ गए. इतने चुप तो कभी नहीं थे.

‘‘क्या हुआ…’’ पुष्पा ने फिर पूछा था.

‘‘कुछ नहीं, अभी जीजी का फोन आया था, मेरे मोबाइल पर। रामदादा की बेटी शिखा नहीं रही…’’

‘‘शिखा… रामदादा की बेटी…’’ एकदम से चौंक गई थी पुष्पा।

“हां, रात को नींद की गोलियां खा लीं उस ने. शायद आत्महत्या का मामला, जीजी कह रही थी कि हमें फौरन जबलपुर जाना होगा.

‘‘पर…’’

पुष्पा को याद आया कि शिखा अपने किसी सहपाठी से विवाह की इच्छुक थी पर रामदादा का और पूरे परिवार का जबरदस्त विरोध था. शायद…शायद सुरेशजी भी अब यही सोच रहे थे। बहुत देर बाद उन का धीमा स्वर सुनाई दिया पुष्पा को,”मैं ने अपने आश्रम की सदस्यता का फौर्म वापस ले लिया है… पूजापाठ में भी भरोसा नहीं रहा। यह सब एक छलावा है…”

अब चकित हो कर पुष्पा सुरेशजी की तरफ देख रही थी. दूर घनी बदली के पीछे शायद आशा की कोई किरण चमक उठी थी.

Inspirational Story : गुंडागिरी

Inspirational Story :  तकरीबन 3 लाख लोगों की आबादी वाले उस शहर में गरीब परिवारों की एक बस्ती है. यहां पर ज्यादातर मिल या कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के घर हैं. शहर में होने के बावजूद यह बस्ती शहर से बहुत दूर है. सुविधा के नाम पर किराने की 4 छोटीछोटी दुकानें हैं, जो घरों से ही चलती हैं और मजदूरों की उधारी पर टिकी हैं. बच्चों के लिए एक सरकारी स्कूल है, जो सुबह प्राइमरी तो दोपहर में मिडिल स्कूल हो जाता है. बस्ती के सभी बच्चे, चाहे वह लड़का हो या लड़की, इसी स्कूल में पढ़ते हैं. राजू भी इसी स्कूल में 5वीं जमात में पढ़ता है. राजू का घर एक कमरे और एक रसोई वाला है. घर में मम्मीपापा के अलावा कोई नहीं है. वह छोटा था, तभी उस के दादादादी की मौत हो गई थी.

हां, दूसरे शहर में नानानानी जरूर रहते थे. उन की माली हालत भी बदहाल ही थी और शायद इसी बात के चलते उस का मामा बचपन में ही घर छोड़ कर भाग गया था. रोजाना की तरह उस दिन भी राजू स्कूल गया था. पिताजी किसी कारखाने में काम करते थे और आज उन की छुट्टी थी. राजू के स्कूल जाने के बाद उस के मम्मीपापा खरीदारी करने के लिए अपनी मोपेड पर शहर चले गए.

राजू बाजार जाने के बाद अकसर कुछकुछ गैरजरूरी सामान खरीदने की जिद किया करता था, इसी के चलते उस के स्कूल जाने के बाद बाजार जाने का प्रोग्राम बनाया गया. वैसे, राजू है भी शरारती लड़का. क्लास के सभी बच्चे खासकर लड़कियां उस से बहुत ज्यादा ही परेशान रहती हैं. कुलमिला कर राजू की इमेज एक बिगड़े बच्चे की ही है. कुछ ही दिनों के बाद त्योहार आने वाले थे. इसी वजह से खरीदे गए सामान कुछ ज्यादा ही हो गए. राजू के मम्मीपापा मोपेड पर ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे थे, तभी सामने से तेज रफ्तार से आती हुई कार के सामने राजू के पापा अपनी गाड़ी को कंट्रोल नहीं कर सके और कार से भिड़ गए.

भयानक हादसा हुआ और राजू के मम्मीपापा दोनों ही इस दुनिया को छोड़ कर चले गए. रिश्तेदारी में ऐसा कोई था नहीं, जो राजू को ले जाता. उसे सहारा देता. सो, नानानानी ही उसे अपने साथ ले गए. पिछले 10 सालों में यह शहर काफी बदल चुका है. संकरी सी पतली गली में पक्की सड़क बन गई है. गली के दूसरे छोर पर पार्क बन गया है. कुछ बड़ी दुकानें भी खुल गई हैं. राजू भी अब 21 साल का हो चुका है. 4 महीने पहले उस के नाना की भी मौत हो गई है. नानी तो 5 साल पहले ही गुजर गई थीं. राजू ज्यादा पढ़ नहीं पाया था. किसी तरह 10वीं जमात तक तो पहुंचा, मगर पास नहीं हो पाया. नाना के मरने के बाद राजू वापस अपने शहर लौट आया. अपने पास जमा पैसों से घर के अहाते में ही उस ने पान की दुकान खोल ली. बढ़ी हुई दाढ़ी और डीलडौल के चलते राजू पहली नजर में गुंडों सा दिखता था.

रहीसही कसर उस के बोलने का अक्खड़ अंदाज पूरा कर देता था. उस के कारनामे थे ही ऐसे. अपने साथ प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाली सभी लड़कियों के नाम उसे अभी तक याद थे. उन में से अगर कोई लड़की उसे राह में अकेली मिल जाती, तो वह हाथ जोड़ कर बीच सड़क पर खड़ा हो जाता और पूरे दांत दिखा कर उस को नमस्कार कहता. कई बार लड़कियों ने इस की शिकायत अपने घर वालों से की, लेकिन महल्ले में बैठ कर कौन झगड़ा मोल ले? किसी ने भी कुछ कहने की हिम्मत न दिखाई. महल्ले वालों की सहनशीलता या बुजदिली को देख कर राजू की हिम्मत दिनोंदिन बढ़ने लगी. अब उस ने अपनी दुकान में एक बड़ा सा म्यूजिक सिस्टम भी लगवा लिया था. म्यूजिक सिस्टम पर लड़कियों को परेशान करने वाले गाने ही बजाए जाते थे. अब पिछले शुक्रवार की ही बात लीजिए, यह शर्माजी की लड़की, जो कभी राजू के ही साथ पढ़ती थी, लाल रंग का सलवारसूट पहन कर जा रही थी.

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तब राजू ने अपने म्यूजिक सिस्टम पर तेज आवाज में गाना लगा दिया, ‘लाल छड़ी मैदान खड़ी…’ ऐसे ही जब गुप्ताजी की लड़की किसी फंक्शन में जाने के लिए चमकदमक वाली ड्रैस पहनी हुई थी, तो साहब उस को देख कर गाना बजा रहे थे, ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए ओ जाने तमन्ना किधर जा रही हो…’ कोई सीधेसादे कपड़ों में लड़की आती हुई दिखाई देती तो गाना बजता, ‘धूप में निकला न करो रूप की रानी…’ या ‘दिल के टुकड़ेटुकड़े कर के मुसकरा कर चल दिए…’ महल्ले की सभी लड़कियां परेशान हो चुकी थीं.

कई बार वे आपस में मिल भी चुकी थीं और राजू को चप्पलोंसैंडिलों से सबक सिखाने की भी सोच चुकी थीं. लेकिन वह दिन बातों के अलावा कभी नहीं आया. शर्माजी की लड़की दीप्ति एमएससी कर रही थी. क्लास होने के चलते कालेज से घर आने में लेट हो गई. कालेज घर से 5 किलोमीटर की दूरी पर था और दीप्ति अपनी साइकिल से कालेज रोज आतीजाती थी. दीप्ति अपनी एक और सहेली के साथ साइकिल से बाहर निकली ही थी कि उन दोनों को 2 मोटरसाइकिल पर बैठे 5 लड़कों ने घेर लिया. सभी लड़के दीप्ति और उस की सहेली पर लगातार छींटाकशी करते हुए उन्हें परेशान कर रहे थे.

दीप्ति और उस की सहेली को पसीना आ रहा था. हलका सा अंधेरा और सड़क का सूनापन लड़कों की हिम्मत बढ़ा रहा था. दोनों सहेलियों के तालू जैसे सूख गए थे. चीखनेचिल्लाने की हिम्मत ही नहीं थी उन में. 2 किलोमीटर के बाद वे दोनों मुख्य शहर में प्रवेश कर गईं. अब दोनों की जान में जान आई. दीप्ति की सहेली यहीं रहती थी, सो वह अब अलग रास्ते चली गई. ‘‘तुम्हारी ढिलाई के चलते एक लड़की तो हाथ से निकल गई. अब कम से कम इस लड़की को तो अपने साथ ले चलो,’’ पांचों में से शायद यह लड़का सब का सरदार था, जो गुस्सा होते हुए बोल रहा था. ‘‘अरे छोड़ो बौस, हमारे पास उसे बैठाने की जगह कहां थी. बस, अब इस चिडि़या को ले जा कर फुर्र हो जाते हैं,’’ दूसरा बदमाश बोला. दीप्ति को उन के इरादे अब समझ में आ गए थे. उस की धड़कनें एक बार फिर तेज चलने लगीं. आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा. उस ने हिम्मत कर के अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ा दी. किसी तरह दीप्ति अपनी गली के नुक्कड़ तक पहुंच ही गई. तेजी से साइकिल चलाने के कारण वह बुरी तरह से हांफने लगी थी.

 

घबराहट के चलते उसे चक्कर आ गया और वह वहीं गिर पड़ी. लड़के शायद इसी के इंतजार में थे. वे गिरी हुई दीप्ति को उठा कर अपनी मोटरसाइकिल से ले जाना चाहते थे. दीप्ति की हालत खिलाफत करने जैसी बिलकुल नहीं थी. राजू अपनी दुकान पर बैठा यह सब नजारा देख रहा था. वह समझ गया था कि दीप्ति मुसीबत में है और लड़कों के इरादे नेक नहीं हैं.

बिना एक पल की देरी किए उस ने अपनी दुकान में से मोटा सा लट्ठ निकाला, दौड़ कर दीप्ति के पास पहुंच गया और सरदार जैसे उस लड़के पर हमला कर दिया. उस ने अपने लट्ठ से उस लड़के के पैरों पर इतनी जोर का वार किया कि वह चीखते हुए गिर पड़ा. इस तरह हुए अचानक वार से बाकी लड़के घबरा गए. वे कुछ समझ पाते, इस के पहले ही राजू ने उसी जगह पर पूरी ताकत से दूसरा वार कर दिया. अब वह लड़का खड़ा होने की हालत में नहीं था.

अब राजू बाकी लड़कों को ललकारने लगा. अपने साथी की ऐसी हालत देख कर बचे हुए लड़कों ने वहां से भागने में ही अपनी खैरियत समझी. यह घटना देख कर आसपास कई लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी. सभी राजू की तारीफ ही कर रहे थे. अब तक वहां पर दीप्ति के साथ रहने वाली पासपड़ोस की लड़कियां भी पहुंच गईं. उन सभी लड़कियों को राजू की इस तरह तारीफ अखर रही थी, क्योंकि वे राजू की असलियत जानती थीं.

उन में से एक लड़की हिम्मत दिखाती हुई बोली, ‘‘राजू खुद कौन सा दूध का धुला है. वह खुद भी आतीजाती लड़कियों को देख कर भद्दे गाने लगा कर हमें शर्मसार करता रहता है. कौन जाने आज की घटना इसी गुंडे की चाल हो.’’

इस लड़की की बात सुन कर भीड़ में एकदम सन्नाटा छा गया. सभी राजू की तरफ सवालिया निगाहों से देखने लगे. राजू शायद इस सवाल के लिए तैयार ही था. वह 2 कदम आगे बढ़ा और उस लड़की के सामने जा कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘मुझे यह कहने में जरा भी झिझक नहीं है कि इस महल्ले में रहने वाली हर लड़की मेरी बहन है.

हां, मैं अपने म्यूजिक सिस्टम पर उस तरह के गाने जानबूझ कर ही बजाता था. वजह जानना चाहोगे आप लोग? ‘‘मैं चाहता था कि मेरे महल्ले में रहने वाली मेरी हर बहन इतनी हिम्मती बने कि वह हर बुरे हालात का सामना आसानी से कर पाए.

‘‘मैं इस तरह के गाने बजा कर और आप लोगों को सुना कर आप लोगों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान जगाना चाहता था. मैं चाहता था, चाहे एक लड़की ही सही, पर कोई तो आ कर विरोध करे, लेकिन दुख की बात है कि कोई लड़की आगे नहीं आई. ‘‘याद रखिए, किसी भी इनसान का सम्मान उस के अपने घर से ही शुरू होता है. जब आप खुद अपना सम्मान नहीं करेंगी, तो बाहर वाले को क्या पड़ी है कि वह आप का सम्मान करेगा. ‘‘अगर आप लोगों ने मेरे कामों का विरोध पहले ही कर दिया होता, तो शायद आज इस तरह की घटना न घटती. ‘‘

और एक बात, अगर आप आज ही विरोध करोगे तो भविष्य में ‘मी टू’ कहने जैसे किसी आंदोलन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. ‘‘मुझे खुशी है, इतनी भीड़ में, एक का ही सही आत्मविश्वास, आत्मसम्मान जागा तो. मुझे यकीन है, धीरेधीरे इस महल्ले की सभी लड़कियों में यह भावना आ जाएगी. आज मेरी गुंडागीरी कामयाब हुई.’’ ‘‘वाह, राजू जैसी सोच वाले गुंडे शहर के हर गलीचौराहे पर हों, तो हमारी औरतें, लड़कियां सुरक्षित कैसे न रहेंगी,’’ दीप्ति के पिता राजू की पीठ थपथपाते हुए कह रहे थे.

कमजोर कोर्ट रूम ड्रामा है Kirti Sanon की ‘दो पत्ती’  

Kirti Sanon’s Do Patti : वर्ष 2010 में आई अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘तीन पत्ती’ जुआ के खेल पोकर से संबंधित थी, मगर नई फिल्म ‘दो पत्ती’ 2 बहनों की राइवलरी पर है. अकसर हम ने देखा है कि जिस घर में 2 किशोरी या युवा होती बेटियां होती हैं उन में आपस में नोकझोक होती रहती है. दोनों बहनों का स्वभाव अलग होता है, एक को मातापिता ज्यादा प्यार करते हैं तो दूसरी को इग्नोर किया जाता है. एक पढ़ाई में तेज होती है तो दूसरी बोर, एक तेजतर्रार होती है तो दूसरी फिसड्डी.

 

हाल ही में स्टार टीवी पर चल रहे एक सीरियल ‘एडवोकेट अंजलि अवस्थी’ में दोनों बहनों को राइवल दिखाया गया है. उन का पिता मृत्युशैया पर है परंतु बहुत अमीर घर में ब्याही बेटी न तो अपने बाप को पहचानती है, न ही पिता के इलाज के लिए अपनी बहन को पैसे देती है.

 

जब घर में 2 बहनें आपस में लगती झगड़ती हों तो यह चोट पूरे परिवार पर लगती है, परिवार तहसनहस हो जाता है. बहनों की इसी राइवलरी को मसालेदार पैकेजिंग में पेश कर प्रस्तुत किया गया है.

 

फिल्म की कहानी एक पहाड़ी इलाके देवीपुर की इंस्पैक्टर विद्या ज्योति (काजोल) से शुरू होती है. विद्या को एक फोनकौल आता है जिस में एक पतिपत्नी की मारपीट के बारे में बताया जाता है. विद्या तहकीकात करने निकल पड़ती है. पता चलता है कि यह तो 2 जुड़वां बहनों सौम्या (कृति सेनन) और शैली (कृति सेनन की दूसरी भूमिका) की कहानी है जो बहनें कम, दुश्मन ज्यादा हैं.

 

सौम्या शांत रहती है, वहीं शैली बिंदास है. सौम्या को एंग्जाइटी के अटैक पड़ते हैं, इसलिए उसे ज्यादा तवज्जुह दी जाती है. शैली से यह बरदाश्त नहीं होता. वह सौम्या के प्यार ध्रुव (शहीर शेख) को भी उस से छीन लेती है. मगर ध्रुव पत्नी के रूप में मौडर्न शैली के बजाय घरेलू सौम्या को चुनता है.

 

इधर शादी के बाद ध्रुव बातबात पर सौम्या को पीटता है और शैली के करीब आने लगता है. उधर अगले दिन सौम्या ध्रुव को पैराग्लाइडिंग पौइंट पर मिलती है. वह ध्रुव को अपने साथ पैराग्लाइडिंग पर चलने को कहती है. ध्रुव उस से कन्फैस करता है कि उसे अब लाइफ में सैटल होना है जबकि शैली उस से कहती है कि वह सौम्या से शादी न करे मगर उस की शादी सौम्या से हो जाती है. ध्रुव और शैली में अनबन होती रहती है.

 

तहकीकात करती विद्या जब वहां पहुंचती है तो उसे बताया जाता है कि शादी के 2-3 महीने बाद डोमैस्टिक वौयलैंस शुरू हो गया था. दरअसल शैली सौम्या की शादी को तुड़वाना चाहती थी. वह बहाने बना कर सौम्या के पति के साथ संबंध बनाना चाहती थी. विद्या उसे सलाह देती है कि जब तक वह कोई शिकायत नहीं करेगी, ऐक्शन नहीं लिया जाएगा.

 

एक रात ध्रुव सौम्या से इंटीमेट होने की कोशिश करता है तो वह कहती है कि वह उस के बच्चे की मां बनना चाहती है. सुबह ध्रुव सौम्या से माफी मांगता है. बच्चों की बात सुन कर ध्रुव को लगता है कि उस ने गलत बहन का चुनाव किया है. यहां फिर ध्रुव सौम्या को मारतापीटता है. सौम्या सीढि़यों से गिर जाती है. सौम्या किसी तरह उठती है और खुद ही डाक्टर को दिखा लाती है. तभी विद्या कौंस्टेबल को आदेश देती है कि पता लगाओ कि ध्रुव के खिलाफ कितने केस हैं.

 

दरअसल सौम्या डिप्रैशन की पेशेंट थी. थाने में सौम्या बताती है कि वह प्रैग्नैंट है. ध्रुव उस से माफी मांगता है और कहता है, कल से नई शुरुआत करेंगे. फाइनली सौम्या पुलिस को बता देती है कि ध्रुव ने पैराग्लाइडिंग करते वक्त उसे मारने की कोशिश की थी. ध्रुव को जेल में डाल दिया जाता है. कोर्ट में यह प्रूव हो जाता है कि सौम्या मानसिक रूप से बीमार है और उसे ऊंचाई से डर लगता है. केस सौल्व हो जाता है. शैली सौम्या की उबरने में मदद करती है.

 

इस कहानी की पटकथा रोचक है. कई ट्विस्ट्स और टर्न डाले गए हैं. कहानी धीरेधीरे खुलती जाती है, कोर्टरूम ड्रामा भी है जो कमजोर है. कहानी का आइडिया ऐक्ट्रैस कृति सेनन का है. शहीर शेख का काम अच्छा है. खूबसूरत वादियों में फिल्माई गई इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. पार्श्व संगीत अच्छा है. फिल्म बेटियों को संदेश देती है कि बहनें आपस में मिलजुल कर रहें, एकदूसरे का हक न मारें.

 

 

I want to talk : अमिताभ बच्‍चन ने थपथपाई बेटे अभिषेक की पीठ

Abhishek Bachchan :  ‘आई वांट टू टौक’ यानी मुझे बात करनी है. इंग्लिश के टाइटल वाली इस फिल्म को शुजित सरकार ने बनाया है और इस में एक अरसे बाद अभिषेक बच्चन को अभिनय करते देख अच्छा लगता है. शुजित सरकार ने 5 बेहतरीन फिल्में बनाई हैं. अगर आप ने उन फिल्मों को मिस कर दिया है तो अरेंज कर के उन्हें देख डालिए.

 

2012 में रिलीज हुई फिल्म ‘विकी डोनर’ एक कौमेडी ड्रामा थी जिसे बौक्सऔफिस पर खासी सफलता मिली. उस फिल्म का मूल विषय बांझपन और स्पर्म डोनेशन पर आधारित था. उस फिल्म से आयुष्मान खुराना ने डैब्यू किया था. फिल्म में उस के साथ यामी गौतम थी. आजकल यह फिल्म जियो प्राइम पर देखी जा सकती है.

 

 

भारतीय राजनीतिक रहस्यों पर आधारित 2013 में आई शुजित सरकार की दूसरी फिल्म थी ‘मद्रास कैफे’. यह फिल्म नैटफ्लिक्स पर अवेलेबल है. 2015 में अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण अभिनीत ‘पीकू’ में पितापुत्री के भावनात्मक रिश्ते को दिखाया गया था. यह फिल्म सोनी लिव पर उपलब्ध है. 2018 में शुजित सरकार के निर्देशन में बनी ‘अक्तूबर’ एक और बेहतर फिल्म है. यह अमेजन प्राइम पर देखी जा सकती है. इस के अलावा 2021 में आई ‘सरदार उधम सिंह’ शुजित सरकार की एक और उम्दा फिल्म है. यह फिल्म जियो सिनेमा पर उपलब्ध है.

 

अच्छा निर्देशक वही माना जाता है जिस की फिल्म का सब्जैक्ट उस की अन्य फिल्मों से एकदम अलग हो. यहां शुजित सरकार की पांचों फिल्मों के सब्जैक्ट अलगअलग हैं.

 

‘आई वांट टू टौक’ एकदम अलग विषय पर बनी फिल्म है जिस का नायक अर्जुन सेन (Abhishek Bachchan) कैलिफोर्निया में मार्केटिंग की दुनिया में धूम मचा रहा है. एक दिन उसे पता चलता है कि उसे गले का कैंसर है और उस की जिंदगी के महज 100 दिन बाकी हैं. वह जिंदगी से हार मान कर चुप नहीं बैठता, बल्कि मौत को ठेंगा दिखा कर जीवन जीतने के युद्ध में उतर पड़ता है. वह अपनी बेटी (अहिल्या बामरू) के साथ अपने रिश्ते को बेहतर बनाता है. इस सिलसिले में उस का एकाकीपन, नौकरी खोना, अस्पताल के लंबेलंबे बिल, सिर पर लटकती मौत की तलवार से भी जूझता है, मगर हिम्मत नहीं हारता, मौत को मात देता है और जिंदगी की जंग को जीतता है.

 

फिल्म की कहानी कहने का शुजित सरकार का अपना ढंग है. वे कहानी को जीवन की क्षणभंगुरता तक ले जाते हैं. उन्होंने अर्जुन सेन की 20 सर्जरियों को महिमामंडित नहीं किया है बल्कि उसे एक रूटीन की तरह ट्रीट किया है.

 

फिल्म का फर्स्टहाफ कुछ धीमा है, लेकिन सैकंडहाफ में फिल्म दौड़ने लगती है. निर्देशक ने डाक्टर (जयंत कृपलानी) के साथ मरीज अर्जुन सेन की रिलेशनशिप में कई हलकेफुलके पल जुटाए हैं.

 

फिल्म के संवाद चुटीले हैं. अभिषेक के प्रोस्थोटिक मेकअप पर मेहनत की गई है. फिल्म की कहानी में अभिषेक का पत्नी से तलाक होना दिखाया गया है. वह तलाक क्यों हुआ था, इस के बारे में भी बताया जाना चाहिए था.

 

अभिषेक बच्चन का अभिनय शानदार है. अभिषेक बच्चन अपनी भूमिका में कमाल कर गया है. अर्जुन सेन की बेटी की भूमिका में बाल कलाकार हो या युवा बेटी के रोल में अहिल्या बामरू, दोनों ने गजब की ऐक्टिंग की है. छोटी सी भूमिका में जौनी लीवर राहत पहुंचाता है.

 

फिल्म का निर्देशन काफी अच्छा है. फिल्म को देखने के बाद अमिताभ बच्चन ने बेटे की पीठ थपथपाई है. शुजित सरकार के साथ अभिषेक बच्चन ने पहली बार काम किया है. गीतसंगीत साधारण है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. फिल्म की शूटिंग कैलिफोर्निया में की गई है.

 

‘The sabarmati Report’ : विवादित मुद्दे को भुनाने की नाकाम कोशिश

इसी साल जुलाई में गोधरा कांड पर एक फिल्म रिलीज हुई थी. फिल्म में बताया गया था कि गुजरात का बहुचर्चित गोधरा कांड एक हादसा था या साजिश. इसी विषय पर तहकीकात करती यह दूसरी फिल्म है. ये दोनों फिल्में एक एजेंडे के तहत बनाई गई हैं. वर्ष 2002 में गोधरा हादसे के वक्त नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. इस हादसे या साजिश के बाद पूरा गुजरात दंगों की आग में झुलस उठा था. प्रशासन आंखें मूंदे बैठा था. मुसलमानों का चुनचुन कर खात्मा किया गया था.

अब उसी विषय पर एक और फिल्म बनाने की आवश्यकता ही नहीं थी, मगर लगता है, एक ही समय पर दोनों फिल्मों के बनाने का निर्णय लिया गया. ‘द साबरमती रिपोर्ट’ भी विवादास्पद गोधरा कांड पर बनाई गई है. शायद ही कोई ऐसा हो जो गुजरात के गोधरा कांड के बारे में न जानता हो. इस ट्रेन अग्निकांड में 59 लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे. नानावती आयोग ने गोधरा कांड को हादसा नहीं, एक साजिश बताया था. यह फिल्म भी उस साजिश को परतदरपरत खोलती है.

‘द साबरमती रिपोर्ट’ की कहानी एक न्यूज चैनल में बतौर कैमरामैन काम करने वाले समर कुमार (विक्रांत मैसी) की है जो गोधरा के पास ट्रेन में लगी आग के मामले को रिपोर्ट करने गई एक वरिष्ठ रिपोर्टर मनिका राजपुरोहित (रिद्धि डोगरा) के साथ भेजा जाता है.

समर और मनिका राजपुरोहित दोनों गोधरा पहुंचते हैं. समर यहां सारी चीजें रिकौर्ड करता है. उसे पता चलता है कि यह आग जानबू?ा कर लगाई गई थी, जबकि मनिका राज इसे सिर्फ एक हादसा मान रही थी. मनिका राज के लौटने के बाद समर अस्पताल जा कर घायलों के बयान भी रिकौर्ड करता है. उस पर दंगाइयों ने हमला करने की भी कोशिश की, मगर वह बच कर भाग निकला और सीधे चैनल के डायरैक्टर को जा कर टेप सौंप दी.

अगले दिन समर हैरान रह गया. टीवी पर उस का टेप नहीं, मनिका राजपुरोहित द्वारा शूट किया गया टेप चलाया गया था, जिस में मनिका राज ने इसे सिर्फ एक हादसा बताया था. समर के एतराज करने पर उसे नौकरी से निकाल दिया गया और एक ?ाठे केस में जेल में डाल दिया गया, मगर उस की गर्लफ्रैंड ने उसे जेल से बाहर निकलवा दिया. अब उस का अपनी गर्लफ्रैंड के साथ ब्रेकअप हो चुका था.

अब समर रातदिन शराब के नशे में धुत रहने लगा. इसी तरह 5 साल बीत गए. कहानी 2007 में पहुंच जाती है, जहां दर्शक अमृता गिल (राशि खन्ना) को देखते हैं. वह एक टीवी चैनल ग्रुप को जौइन कर लेती है.

2007 में जब मुख्यमंत्री बदला तो केस एक बार फिर से खुला. न्यूज चैनल को सरकार ने गोधरा कांड पर फिर से रिपोर्ट तैयार करने को कहा. मनिका राज अमृता गिल से गोधरा कांड के विक्टिम्स के बारे में रिपोर्ट तैयार करने को कहती है. न्यूज चैनल के हैड मिश्राजी अमृता को वह टेप दे देते हैं जो समर ने शूट किया था और न्यूज चैनल के डायरैक्टर को सौंपा था. टेप को देखने के बाद अमृता सम?ा चुकी थी कि यह कोई हादसा नहीं बल्कि सोचीसम?ा साजिश है.

अमृता तुरंत समर के पास जाती है. पैसों के लालच में समर अमृता को सारी इन्फौर्मेशन देने को राजी हो जाता है. अगले दिन दोनों गोधरा पहुंचते हैं. वहां जा कर उन्हें गोधरा कांड की सचाई मालूम पड़ती है. दोनों साबरमती ट्रेन की जली बोगियों को भी देखने जाते हैं. पहले बनाई गई रिपोर्टों में विरोधाभास था. समर को यह बात नागवार लगी कि ट्रेन में खाना बनाया जा रहा था, जबकि ट्रेन में पैर रखने तक की जगह न थी.

इस सारी घटना के प्रमुख गवाह प्लेटफौर्म पर कार्यरत एक वेटर अरुण बर्धा को पुलिस द्वारा छिपाया जा रहा था. समर और अमृता एक वरिष्ठ अधिकारी का भेष बदल कर अरुण बर्धा तक पहुंच जाते हैं और उस से सारी सचाई उगलवाते हैं. उस के अनुसार एक सोचीसम?ा साजिश के तहत ट्रेन को जलाने की प्लानिंग एक दिन पहले ही हो गई थी. 20-20 लिटर केरोसिन टिन के पीपे पहले से ही ला कर रख दिए थे. समर अदालत को सारी सचाई बताता है और प्रूव करता है कि गोधरा कांड हादसा नहीं, साजिश थी. नानावती आयोग ने भी इसे साजिश माना था.

कहानी और उस का ट्रीटमैंट विषय के साथ न्याय नहीं करता. ‘द साबरमती रिपोर्ट’ ऐक्सिडैंट या कौंसपिरेसी इस संवेदनशील मुद्दे में कुछ ऐसा नहीं जोड़ पाती जो नया हो. पटकथा भी कमजोर है. फिल्म का पहला भाग उस भयावह हादसे को मीडिया पर छिपाने के लिए फोकस करता है, दूसरा इस सच की पड़ताल करता है. यह दूसरा भाग कमजोर है.

फिल्म में हिंदी बनाम इंग्लिश की जंग भी दिखाई गई है. कई बार फिल्म मुद्दे से हट कर 2 समुदायों की अनबन को दिखाने के साथसाथ कौमी एकता को भी दिखाती है. विक्रांत मैसी अपने किरदार में आसानी से ढल गए हैं. रिद्धि डोगरा ने अपना किरदार बखूबी निभाया है. राशि खन्ना का काम भी बढि़या है.

यह बात बारबार दोहराई गई है कि समर हिंदी का पत्रकार है. अमूमन हिंदी के पत्रकारों की कोई इज्जत नहीं होती. पत्रकार आखिर पत्रकार होता है, वह चाहे हिंदी का पत्रकार ही क्यों न हो. प्रैस इन्फौर्मेशन ब्यूरो उन के साथ दोगला व्यवहार नहीं कर सकता, सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए.

नानावती आयोग की रिपोर्ट, गुजरात हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उदाहरण देती इस फिल्म में दर्शकों को यही याद दिलाने की कोशिश की गई है कि अयोध्या से यज्ञ कर के लौट रहे 59 रामभक्तों को गोधरा में जिंदा जला दिया.

निर्देशक अनुराग कश्यप के सहायक रहे राजन पटेल ने फिल्म ‘द साबरबती रिपोर्ट’ निर्देशित की है. फिल्म में विक्रांत मैसी की शोहरत को भुनाने की कोशिश की गई है. रिद्धि डोगरा दबंग पत्रकार के रूप में जमी है. पार्श्व संगीत अच्छा है. सिनेमेटोग्राफी बढि़या है. एक खोजी पत्रकार का निराश हो कर नशे की लत में डूब जाना अखरता है. इस से पत्रकारों की प्रतिष्ठा पर आंच आती है.

 

 

Varicose veins के इलाज का बेहतर तरीका क्या है?

मेरी आयु 42 वर्ष की है. मुझे अपने पैरों में हो रही वैरिकोज वेन्स के लिए इलाज करवाना है. लेकिन मैं कन्फ्यूज हो रही हूं कि मुझे इस के लिए कौन सा इलाज करवाना चाहिए. एलोपैथिक, होम्योपैथिक या एक्यूप्रैशर? आप की क्या सलाह है?

 

आप ने यह नहीं लिखा कि आप की वैरिकोज वेन्स की स्थिति कितनी गंभीर है, क्योंकि इलाज के लिए कौन सा तरीका बेहतर रहेगा, उसी पर निर्भर करता है. वैसे एलोपैथिक इलाज वैरिकोज वेन्स के लिए सब से इफैक्टिव और फास्ट रिजल्ट देने वाला है. इस में दवाइयां, रक्लेरोथेरैपी, लेजर ट्रीटमैंट और गंभीर मामलों में सर्जरी शामिल हैं, यह एंडवास या सीवियर केसेस के लिए बैस्ट औप्शन है.

 

होम्पोपैथिक उपचार धीरेधीरे काम करता है और लक्षणों को कम करने के लिए प्राकृतिक तरीके अपनाता है. यह माइल्ड और अरली स्टेज के लिए ठीक रहता है.

 

एक्यूप्रैशर रक्तप्रवाह को सुधारने और दर्द को कम करने में मदद करता है. यह सपोर्टिव थेरैपी के लिए उपयोगी है लेकिन वैरिकोज वेन्स का पूर्ण इलाज नहीं कर सकता.

 

यदि समस्या गंभीर है तो एलोपैथिक इलाज करें. हलके मामलों में होम्योपैथी से मदद मिल सकती है. एक्यूप्रैशर को सहायक चिकित्सा के रूप में ही अपनाएं. सही इलाज के लिए डाक्टर से परामर्श करना बेहद जरूरी है.

 

आप भी अपनी समस्या हमें एसएमएस या व्हाट्सऐप के जरिए मैसेज/औडियो भी कर सकते हैं.

phone number : 08588843415

 

 

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