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सिद्धू और आप के बीच संविधान

उम्मीद की जा रही थी कि भाजपा और राज्यसभा की सदस्यता छोड़ने के बाद नवजोत सिंह सिद्धू सीधे आम आदमी पार्टी मे चले जाएंगे और आप उन्हें पंजाब का मुख्यमंत्री पेश कर देगी, लेकिन बहुत कम समय में सियासी सौदेबाजी में माहिर हो गए अरविंद केजरीवाल पूरी सब्र से काम लेते सिद्धू के कसवल और ढीले होने का इंतजार कर रहे हैं. उन्हें एहसास है कि सिद्धू की हालत त्रिशंकु सरीखी हो गई है.

नवजोत सिंह की दम तोड़ती ख़्वाहिश यह है कि आप उन्हें और  उनकी पत्नी को भी विधानसभा चुनाव का टिकिट दे दे, पर केजरीवाल पार्टी के संविधान का हवाला देते हुए इस मांग पर राजी नहीं हो रहे. दरअसल में आप का भी एक संविधान है जिसमे साफ साफ लिखा है कि एक ही परिवार के 2 सदस्य एक साथ चुनाव नहीं लड़ सकते, दूसरे सिद्धू एक मामले में अदालत से दोषी करार दिये जा चुके हैं इसलिए भी उन्हे सीएम पेश करना घाटे का सौदा आप के लिए साबित होगा, क्योंकि यह बात नैतिकता और कानून के लिहाज से भी अड़ंगा है, लिहाजा बात बनती नजर नहीं आ रही.

उधर कांग्रेस भी सिद्धू पर नजरें गड़ाए बैठी है और डोरे भी डाल रही है, उसके साथ समस्या अपने संविधान की कम पार्टी के महत्वाकांक्षी नेताओं की ज्यादा है, जो सिद्धू को अपने वजूद और सेवाओं की शर्त पर बर्दाश्त करने तैयार नहीं. सिद्धू के पास अब एक विकल्प अपनी खुद की पार्टी बनाकर चुनावी जंग में उतरने का है, लेकिन इसकी हिम्मत हाल फिलहाल वे नहीं जुटा पा रहे. जैसे जैसे वक्त गुजरता जा रहा है वैसे वैसे उनकी परेशानियां भी बढ़ती जा रहीं हैं, क्योंकि उनके इर्द गिर्द जमा भीड़ छटने लगी है, मुमकिन है वे तटस्थ ही रहें और तेल की धार देखते कोई फैसला लें.

एक हफ्ते पहले ही सिद्धू केजरीवाल से मिले थे, लेकिन केजरीवाल ने आप के संविधान का हवाला देते उन्हें विनम्रतापूर्वक टरका दिया और बयान यह दे डाला कि वे सिद्धू का सम्मान करते हैं, जबकि सिद्धू को सम्मान से ज्यादा कुर्सी की जरूरत है, सम्मान तो उन्हे कपिल शर्मा के कामेडी शो से भी  मिल रहा है, लेकिन कुर्सी के लाले पड़ रहे हैं. इसे कहते हैं माया मिली न राम.

दलित नेता बदलें समाज नहीं

पिछले 20-25 सालों में देश में दलित राजनीति करने वाले नेताओं के हालात बदल गए हैं. दलित नेताओं के साथसाथ दलित अफसरों के हालात भी बदले हैं. इस के बाद भी आम दलितों के हालात में कोई बदलाव नहीं आया है. ज्यादातर दलित आज भी गरीबी की रेखा के नीचे जी रहे हैं. उन के पास खानेकमाने का कोई जरीया नहीं है. सेहत के मामले में भी वे सब से खराब हालात में हैं. ज्यादातर दलितों के बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं. वे बचपन से ही मेहनतमजदूरी करने लगते हैं. बड़ी तादाद में दलितों के तन पर पूरे कपड़े नहीं दिखते हैं. इस से साफ लगता है कि देश भले ही तरक्की की राह पर हो, पर सामाजिक सुधारों की दिशा में दलित अभी भी बहुत पीछे हैं.

आंकड़ों को देखें, तो यह बात साफ हो जाती है. साल 2009 से साल 2014 के बीच दलितों के प्रति अपराध के मामलों में 40 फीसदी इजाफा हुआ है. देश में तकरीबन 32 करोड़ दलित आबादी है. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के लिए देश में कानून है, इस के बावजूद भी उन के प्रति अपराध बढ़े हैं. आमतौर पर जहां पढ़ाईलिखाई होती है, वहां अपराध भी कम ही होते हैं, सामाजिकता ज्यादा होती है. पर दलित अत्याचार के मामलों में यह बात लागू नहीं होती है. केरल साक्षरता दर में देश का सब से अव्वल राज्य है. आबादी के हिसाब से देखें, तो केरल में दलितों के प्रति अपराध की दर सब से ज्यादा है. साल 2014 में देशभर में अनुसूचित जाति के 704 लोगों की हत्या और 2233 औरतों के साथ बलात्कार के मामले सामने आए. साथ ही, इसी दौरान अनुसूचित जनजाति के 157 लोगों की हत्या और 925 औरतों के साथ बलात्कार की वारदातें दर्ज हुईं.

अपराध के बाद सजा मिलने के आंकड़ों को देखें, तो पता चलता है कि भारतीय दंड संहिता यानी आईपीसी के तहत कुसूवारों को सजा मिलने की दर 45 फीसदी है. दलितों के मामलों में यह दर महज 28 फीसदी रह जाती है. अपराध के आंकड़ों में समाज की तसवीर दिखती है. दलितों के ये हालात तब हैं, जब राजनीति में दलित तबके के नेता मुख्यधारा में हैं. दलितों के गठजोड़ के बिना किसी भी तरह के चुनाव को जीतने की कल्पना नहीं की जा सकती है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जब कांग्रेस से मुकाबला करना था, तब उस का सब से ज्यादा फोकस दलित जातियों पर था. भाजपा ने बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में दलित जाति के कद्दावर नेताओं को अपने साथ मिलाया था. कई प्रदेशों में दलित नेता मजबूत हालात में हैं. यही नहीं, दलित नेताओं के साथसाथ दलित अफसर भी बेहतर हालात में हैं.

कानून, संविधान का अधिकार पा कर दलित समाज का एक तबका भले ही आगे बढ़ गया हो, पर समाज का एक बड़ा हिस्सा  बेहद खराब हालत में जी रहा है. इस से एक बात साफ समझ में आ रही है कि राजनीतिक सत्ता पाने से भी दलित समाज का फायदा नहीं होने वाला है.

समाज सुधार से दूर

अंबेडकर से ले कर कांशीराम तक सभी दलित महापुरुषों की यह सोच थी कि राजनीतिक सत्ता से सामाजिक व्यवस्था बदलेगी. इस बात को ठोस धरातल पर देखें, तो यह बात खरी नहीं उतरती है. मिसाल के तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र जैसे प्रदेशों को देखा जा सकता है. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी का बहुत बड़ा जनाधार बना. साल 1993 के बाद साल 2012 तक 20 साल में 5 बार बहुजन समाज पार्टी सत्ता में रही. 4 बार बसपा की प्रमुख मायावती मुख्यमंत्री रहीं. साल 2007 से ले कर साल 2012 तक बहुमत की सरकार चलाने के बाद भी बसपा दलितों को प्रदेश में सम्मानजनक हक नहीं दिला पाई. सत्ता हासिल करने के लिए बसपा ने दलितब्राह्मण गठजोड़ बनाया. आज भी उत्तर प्रदेश की राजनीति में बसपा सब से मजबूत दल के रूप में गिनी जाती है.

यह बात केवल उत्तर प्रदेश की नहीं है. महाराष्ट्र में दलित राजनीति का जन्म हुआ. कई राजनीतिक दल यहां दलित राजनीति करते हैं. आरपीआई के रामदास अठावले कद्दावर नेता हैं. वे सत्ता पाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के साथ खडे़ हुए. राज्यसभा के जरीए केंद्र सरकार में मंत्री पद हासिल किया. बिहार में रामविलास पासवान दलित वर्ग के बड़े नेता गिने जाते हैं. सत्ता के लिए उन को भी भाजपा के साथ गठजोड़ करने को मजबूर होना पड़ा. भाजपा के सहयोग से वे भी केंद्र सरकार में मंत्री हैं. मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान लंबे समय से सरकार में हैं. वे दलित और पिछड़ा वर्ग से आते हैं, इस के बाद भी मध्य प्रदेश में दलितों के हालात जस के तस बने हुए हैं. दलितों से जुड़े मामलों के जानकार समाजसेवी रामचंद्र कटियार कहते हैं, ‘‘दलित महापुरुषों की राजनीतिक सत्ता से सामाजिक व्यवस्था बदलने की सोच काफी हद तक सही थी. परेशानी का सबब यह बन गया कि दलित नेताओं ने सत्ता पाते ही समाजिक सुधार के मुद्दों को पीछे छोड़ दिया. उस दिशा में कोई पहल नहीं हो सकी.

‘‘दलित नेता और उन की अगुआई में बने दल कोई ऐसा काम नहीं कर सके, जो गैरदलित नेता ने न किया हो. ऐसे में दलित बिरादरी को अपने जाति के नेताओं से कुछ हासिल नहीं हुआ.

‘‘अगर दलित नेता समाज को सुधारने की दिशा में काम करते, तो निश्चित ही राजनीतिक सत्ता से सामाजिक व्यवस्था बदलती. वोट के लिए जिस तरह से गैरदलित दल दलितों को हाशिए पर रख कर वोट लेते रहे, वही काम सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर दलित दल करने लगे. ऐसे में दलित समाज के लिए इस बात का कोई मतलब नहीं रह गया कि सत्ता में कौन है? वह जस का तस ही पड़ा रह गया.’’

मायावती से बड़ा आसरा

दलित समाज को बसपा नेता मायावती से बहुत उम्मीदें थीं. उत्तर प्रदेश एक मौडल के रूप में आगे बढ़ सकता था, जिस से यह साफ हो जाता कि राजनीतिक सत्ता से सामाजिक व्यवस्था बदली जा सकती है. मायावती के पास बेहतर मौके थे. जब बसपा बहुमत की सरकार में थी, उस समय वह ऐसे सामाजिक सुधारों को आगे बढ़ा सकती, जो पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन सकते थे. लेकिन सत्ता में आने के बाद मायावती ने ऐसा एक भी उदाहरण पेश नहीं किया. उलटे मायावती और उन के नेताओं पर भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगे. दलितों के नाम पर सत्ता हासिल करने वाली बसपा में मायावती ने अनुशासन बनाए रखने के नाम पर तानाशाही अख्तियार कर ली. ऐसे में दलित आंदोलन के साथ जुड़े कई नेता पार्टी से लगातार बाहर होते गए. इस का नतीजा यह हुआ कि उत्तर प्रदेश से बाहर बसपा का जनाधार नहीं बन सका.

नतीजतन, उत्तर प्रदेश में बसपा सत्ता से बाहर हो गई. साल 2012 के विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी ने बसपा को बुरी तरह से हरा कर सत्ता हासिल की. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा पूरी तरह से प्रदेश से साफ हो गई. साल 2017 के विधानसभा चुनावों में बसपा को मजबूत खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा था, पर जिस तरह से बसपा के नेता ही मायावती के खिलाफ आरोप लगा कर पार्टी से बाहर हो रहे हैं, उस से बसपा का मनोबल गिरा है. बसपा से निकले स्वामी प्रसाद मौर्य, आरके चौधरी जैसे नेता भले ही अपना भला न कर सके, पर बसपा का नुकसान करने में जरूर कामयाब होंगे. आल इंडिया पीपुल्स फ्रंट के राष्ट्रीय प्रवक्ता एसआर दारापुरी कहते हैं, ‘‘मायावती को जो मौका मिला था, उस का उन्होंने दलित समाज के हित में कोई इस्तेमाल नहीं किया. मायावती पर भ्रष्टाचार के तमाम आरोप पहले भी लगे हैं. इन में टिकट बेचने जैसे गंभीर आरोप भी शामिल रहे हैं.

‘‘अब बसपा से निकले नेता जिस तरह से इस बात को कह रहे हैं, उस से साफ लगता है कि वे आरोप गलत नहीं थे. दलित आंदोलन की फसल मायावती ने जरूर काटी, पर उस का कोई फायदा समाज को नहीं दिया.’’

भाजपा का चक्रव्यूह

सामाजिक रूप से दलित और पिछड़ा तबका एकसाथ रहने में परेशानी महसूस करते हैं. उत्तर प्रदेश के हालात को देखें, तो यह बात समझ सकते हैं. साल 1992 में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने एकसाथ मिल कर चुनाव लड़ा था और सरकार बनाई थी. उस समय प्रदेश में हिंदूवाद का नारा जोरों पर था. तब सपा और बसपा ने मिल कर एक नारा दिया था कि ‘मिले मुलायम, कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’. सपा और बसपा का गठबंधन जल्दी ही टूट गया. इस के बाद मायावती भाजपा की मदद से 3 बार मुख्यमंत्री बनीं. मुख्यमंत्री बनने के बाद से ही मायावती का दलित सुधारों पर काम बंद हो गया. वे मूर्तियां लगवाने, पार्क बनवाने जैसे कामों में लग गईं. जिस दलित आंदोलन की नींव ही मूर्तिपूजा के विरोध में पड़ी थी, उस की मुखिया का यह काम दलित आंदोलन को कमजोर करता गया.  

बसपा सरकार के समय में दलितों के सुधार के लिए काम करने वाले संगठनों को दबाने का काम शुरू किया गया. ये संगठन इस बात को मानते हैं कि बसपा सरकार का कार्यकाल उन के लिए सब से खराब दौर था. विश्व शूद्र महासभा के प्रमुख और शोषित समाज दल के प्रदेश अध्यक्ष जगदीश पटेल कहते हैं, ‘‘मायावती दलितों की एकमात्र नेता बनना चाहती थीं. इस के चलते दूसरे संगठनों को हाशिए पर रखने का काम किया गया. इस से दलित राजनीति कमजोर हुई. दलित नेता जब तक सामाजिक सुधारों की दिशा में काम नहीं करेंगे, तब तक दलित समाज का फायदा नहीं होगा.’’ सत्ता में आने के बाद भाजपा ने दलित तबके को मुख्य समाज के साथ जोड़ने का काम शुरू किया है. इस के तहत भाजपा में दलित नेताओं को अहमियत दी जा रही है.

साथ ही, बसपा के विद्रोही नेताओं को भी भड़काने का काम भाजपा ने शुरू किया है, जिस से उत्तर प्रदेश में बसपा को मिली बढ़त कमजोर होने लगी. यह सच है कि मनुवादी विचारों पर चल कर भाजपा दलितों का उपयोग करेगी, जैसे कांग्रेस ने किया. दलितों के सुधार की दिशा में वह कोई बड़ा काम नहीं करेगी. इस के बाद भी राजनीतिक सचाई यह है कि भाजपा अकेली पार्टी है, जो दलितों के लिए कुछ काम कर रही है. दलित बिरादरी की सब से बड़ी परेशानी यह है कि आगे बढ़ चुके लोग खुद को अगड़ी जमात में शामिल कर बाकी समाज को भूल जाते हैं. अगड़ी जमात में शामिल होने की होड़ में दलित धार्मिक कुचक्रों में भी फंसते जा रहे हैं, जो उन के लिए खतरे की घंटी है.   

दलित सुधार के लिए हों ये काम

* समाज में हर बच्चे को तालीम दी जाए. उसे अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए छोटेछोटे रोजगार के मौके मुहैया कराए जाएं.

* लड़कियों की शादियां समय पर हों. बचपन में शादियों के चलन को बंद किया जाए. परिवार नियोजन की जानकारी दी जाए. उन के लिए अच्छी सेहत और पढ़ाईलिखाई सब से जरूरी है.

* नशाखोरी रोकी जाए. इस से समाज कई तरह की बुराइयों में उलझ जाता है, जिस से आगे नहीं बढ़ पाता है.

* इस समाज को कुरीतियों से बचाया जाए. धर्म के आडंबर में फंस कर यह मनुवादी साजिश में फंसता है और अपने समाज का भला नहीं कर पाता.

* दलितों को यह समझना चाहिए कि उन का भला कैसे हो सकता है. ऐसे में लिखनेपढ़ने की आदत डालनी होगी. पढ़ाई केवल स्कूली ज्ञान के लिए ही जरूरी नहीं होती, यह सामाजिक ज्ञान के लिए भी जरूरी है.

धर्म का चश्मा बढ़ाए अंधी सोच

धर्म का चश्मा पहन कर सोच भी अंधी हो जाती है. रायपुर (भाटापाड़ा) के गांव टेहका में 3 आंखें, 2 नाभि व सिर पर एक मांस के पिंड के साथ बच्चे का जन्म हुआ. उसे देखने के लिए सैकड़ों लोग वहां जा पहुंचे और खूब चढ़ावा चढ़ा, क्योंकि गणेश पक्ष की समाप्ति व पितृ पक्ष के लगते ही बच्चे का जन्म उसे देवता की श्रेणी में ले आया था. इस में कुदरत की चूक पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.

इस मसले पर मनोवैज्ञानिक डाक्टर विचित्रा दर्शन आनंद कहती हैं, ‘‘सवाल न करने की सोच ही इनसान की शख्सीयत उभारने में सब से बड़ी बाधक होती है और इसे जन्म देता है वह माहौल, जिस में कोई शख्स पलताबढ़ता है.

‘‘तभी तो आज भी काला जादू से बीमारी ठीक करने की बात पर विश्वास किया जाता है. मिसाल के तौर पर तिलक हजारिका (जादूगर) ने एक शख्स की पीठ पर थाली चिपका दी और उस की तकलीफ दूर करने का दावा किया.’’

तर्कशास्त्री सीवी देवगन ने काला जादू होने की बात को नकारा है. इसे एक चालबाजी बताया है.

कुछ महीने पहले टैलीविजन पर एक शख्स लटकन बाबा ने भविष्यफल व अचूक उपाय बताने के नाम पर अपनी किस्मत चमका ली. उस बाबा ने कहा कि शंकरजी पर चढ़ा बेलपत्र ले कर उस पर भभूत लगाएं और उस का तावीज बना कर गले में डाल लें. आप के सारे रुके काम पूरे हो जाएंगे.

इस से ज्यादा मजाकिया बात और क्या होगी? फिर भी लोग पाखंड के कामों से जुड़े रहते हैं. अपने दिमाग का छोटा सा हिस्सा भी इस्तेमाल में नहीं लाते, तभी तो ऐसे बाबाओं की तादाद में लगातार बढ़ोतरी हो रही है.

भक्ति या भरमजाल

कुछ समय पहले ‘राधे मां’ का बिगुल बजा था. लाखों भक्तों ने ‘राधे मां’ नामक औरत को देवी का दर्जा दे कर उस की पूजा की. एक से बढ़ कर एक विवादों से घिरी यह ‘राधे मां’ हाथ में त्रिशूल, माथे पर बड़ा लाल टीका, नाक में नथनी पहन कर भक्तों के आकर्षण का केंद्र बन गई.

क्या है असलियत

पंजाब में गुरुदासपुर की सुखविंदर कौर शादी के बाद घर चलाने के लिए कपड़े सिलती थी. 21 साल की उम्र में सुखविंदर कौर गुरु की शरण में जा पहुंची. वहां उस का नामकरण ‘राधे मां’ हुआ और ‘राधे मां’ के भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी. इन में सिनेमा जगत व दूसरी हस्तियां भी शामिल हो गईं.

यह ‘राधे मां’ कभी भक्तों के बीच झूमती और भक्ति के जोश में किसी भक्त की गोद में चढ़ जाती. आशीर्वाद दे कर उस भक्त की मनोकामना पूरी करती.

आस्था के मायाजाल में लिपटी जनता ‘राधे मां’ के जयकारे लगाते कई बार देखी गई. कभी यही ‘राधे मां’, लाल मिनी स्कर्ट में कहर बरपाती देखी गई. इस का अपना दरबार सजता था.

वकील फाल्गुनी ब्रह्मभट्ट ने विरोध किया कि यह औरत धर्म के नाम पर लोगों को ठग रही है.

एक और बाबा

‘सारथी बाबा’, जिस की करोड़ों की जायदाद है. गंजाम, ओडिशा में वह साधुगीरी कर धनदौलत के नशे में डूबा हुआ है.

‘सारथी बाबा’ का असली नाम संतोष राउल है. घर से भाग कर 7 साल भटकने के बाद साल 1992 में केंद्रपाड़ा, ओडिशा में अपना आश्रम खोला. यह बाबा प्रवचन देने के बजाय रंगरलियां मनाता रहा और बीयर बेचता रहा. बाद में पुलिस ने इसे गिरफ्तार किया और अब इस पर केस चल रहा है.

‘हीलिंग बाबा’ के नाम से मशहूर सैबेश्चियन मार्टिन मुंबई के ठाणे इलाके में एक ‘आशीर्वाद प्रार्थना केंद्र’ चला रहा था. यह बाबा मरीज को अपने सामने खड़ा करता है और अपने दोनों हाथों को ऊपर उठा कर कुछ बुदबुदाता है. कुछ ही देर में वह मरीज खड़ेखड़े ही गिर जाता है, मतलब उस की बीमारी दूर हो गई.

इस ‘हीलिंग बाबा’ ने जन्म से अंधी एक लड़की की आंखें ठीक करने का दावा किया. इस के अलावा पुष्पा नाम की औरत की दोनों खराब किडनी को ‘जीसस’ की दुहाई दे कर ‘हीलिंग बाबा’ ने ठीक करने का दावा किया.

पिछले 10 साल से यह केंद्र चल रहा है, पर अब पुलिस ने इस केंद्र के 2 लोगों को गिरफ्तार किया है और ‘हीलिंग बाबा’ खुद एक अस्पताल में भरती हो गया.

अब सोचने वाली बात यह है कि जो आदमी किडनी ठीक कर सकता है, आंखों में रोशनी ला सकता है, वह अपना इलाज क्यों नहीं कर पाया?

जानलेवा प्रथा

3 सौ सालों से चल रहा 2 गांवों के बीच खुलेआम मौत का खूनी खेल ‘गोटमार उत्सव’ बड़े ही जोश के साथ मनाया जाता है. कहा जाता है कि छिंदवाड़ा के पांडुरना गांव का एक लड़का और सांवर गांव की एक लड़की भाग कर नदी पार कर रहे थे, तभी गांव वालों ने देख लिया और दोनों को पत्थर मारमार कर मार डाला.

तभी से यह ‘गोटमार उत्सव’ के रूप में भादों मास के कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है. इस में हर साल काफी लोग घायल होते हैं और कुछ की मौत भी हो जाती है.

प्रशासन इसे रोकने में नाकाम रहा है. इस के लिए धारा 144 भी लगाई गई, लोगों के खिलाफ रबड़ की गोलियां भी चलाई गईं, पर यह उत्सव न रुक पाया.

अब उत्सव वाले दिन प्रशासन की तरफ से एंबुलैंस वहां रहती है, जो घायलों को अस्पताल ले जाने का काम करती है.

अभी हाल ही में सिंहस्थ, उज्जैन में कुंभ मेले में साधुसंतों में गोलीबारी और तलवारबाजी हुई. कई साधुसंन्यासी तो चोटिल हो कर अस्पताल पहुंच गए.

सोचने की बात यह है कि साधुसंत मोहमाया से दूर रहने की बात करते हैं, पर खुद गुटबाजी में लिप्त हैं और लड़मर रहे हैं.

उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर में भी चढ़ावे के बंटवारे के चक्कर में वहां के पंडों को हाथापाई करते देखा गया था.

ऐसी घटनाएं देखसुन कर भी जनता की आंखें क्यों नहीं खुलतीं? ऐसी सोच पर दुख होता है. धर्म की आड़ में धर्म के ठेकेदार जनता को यों ही बहलातेफुसलाते रहेंगे, पर जनता कब तक दिमाग की खिड़की बंद किए उन के पीछेपीछे चलती रहेगी?             

जाति से बाहर शादी पर बवाल

हमारे देश में इंटरकास्ट लवमैरिज यानी जाति से बाहर शादी करने वालों की तादाद आज भी महज 5 फीसदी ही है. 95 फीसदी लोग अपनी जाति में ही शादी करते हैं. नैशनल काउंसिल औफ एप्लाइड इकोनौमिक रिसर्च और यूनिवर्सिटी औफ मैरीलैंड की एक हालिया स्टडी से पता चलता है कि भारत में 95 फीसदी शादियां अपनी जाति के अंदर होती हैं. यह स्टडी 2011-12 में इंडियन ह्यूमन डवलपमैंट द्वारा कराए गए सर्वे पर आधारित है. इस सर्वे में 33 राज्यों व केंद्रशासित शहरी व गंवई इलाकों में बने 41,554 घरों को शामिल किया गया था. जब इन घरों की औरतों से पूछा गया कि क्या आप की इंटरकास्ट मैरिज हुई थी, तो महज 5 फीसदी औरतों ने ही हां में जवाब दिया. गंवई इलाकों की तुलना में कसबों के हालात थोड़ा बेहतर हैं. अपनी ही जाति में शादी करने वालों में मध्य प्रदेश के लोगों की तादाद सब से ज्यादा यानी 99 फीसदी रही, जबकि हिमाचल प्रदेश और छत्तीसगढ़ में यह तादाद 98 फीसदी थी.

भारत में कानूनी तौर पर जाति से बाहर शादी करने को मान्यता मिली हुई है. इंटरकास्ट मैरिज को ले कर 50 साल पहले ही कानून पास किया जा चुका है, फिर भी लोग ऐसा करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते हैं. इस की अहम वजह यह है कि ऐसा करने पर अपने ही समुदाय के लोग इन लोगों का जीना मुश्किल कर देते हैं. झारखंड की रहने वाली काजल के घर वालों के साथ महज इस वजह से मारपीट की गई, क्योंकि काजल ने दूसरी जाति के सुबोध कुमार नामक लड़के से लवमैरिज की थी.

इस बात को 2 साल हो चुके हैं. शादी के वक्त दोनों बालिग थे और इस रिश्ते को उन के परिवार वालों की हामी भी मिली हुई थी, फिर भी यह बात उन के समुदाय के दूसरे लोगों को हजम नहीं हो रही थी. गांव के कुछ दबंगों द्वारा उन्हें धमकियां दी जाती थीं. जुर्माने के तौर पर उन्होंने रुपयों की भी मांग रखी थी. 16 मई, 2016 को समाज का गुस्सा इतना उबला कि 4-5 लोग लाठियां ले कर काजल के पिता एस. प्रजापति के घर पहुंच गए. काजल के मांबाप और दोनों भाइयों को पहले बंधक बनाया गया और फिर उन की जम कर पिटाई की गई. घायल परिवार रोताबिलखता थाने पहुंचा. दिल की आवाज सुनने का यह हश्र सिर्फ काजल का ही नहीं हुआ है, बल्कि ऐसे हजारों नौजवान जोड़े हैं, जिन्हें अपनी जाति से बाहर शादी करने की सजा भुगतनी पड़ी है. उन्हें जिस्मानी व दिमागी रूप से इतना सताया जाता है कि कई दफा थकहार कर वे खुदकुशी तक कर लेते हैं और यह सब करने वाले आमतौर पर उन के घर वाले नहीं, बल्कि उन की जाति और गांव के लोग होते हैं. जरा सोचिए, भारत में तकरीबन 3 हजार जातियां और 25 हजार उपजातियां हैं. शादी के वक्त न सिर्फ जाति, बल्कि उपजाति का भी खयाल रखना पड़ता है. इस के बाद जाहिर है कि हर इनसान की अपनी खास पसंद होती है. उसे खास भाषा, माली हालत, प्रोफैशन, उम्र, सामाजिक बैकग्राउंड वगैरह भी देखना होता है. जाहिर है, इन सब के बीच अपने जीवनसाथी का चुनाव करना बहुत  ही मुश्किल हो जाता है. इस का नतीजा यह निकलता है कि डिमांड और सप्लाई  का सिद्धांत काम करने लगता है और शादी के बाजार में लड़कों की कीमत आसमान छूने लगती है. यहीं से दूसरी सामाजिक बुराइयां भी पनपने लगती हैं.

मेहनत के दम पर हीरे सी चमकी हीरामणि

कामयाबी किसी की मुहताज नहीं होती है. अगर किसी काम को लगन और मेहनत से किया जाए, तो कामयाबी जरूर कदम चूमेगी. इसी बात को सच साबित किया एक औरत ने. यह औरत बिहार में पटना के न्यू पुलिस लाइन इलाके में ठेले पर अपने पूरे परिवार के साथ पकौड़ों की दुकान चलाती है. इस औरत का नाम हीरामणि देवी है, जो क्रिश्चियन कालोनी में एक छोटी सी झोंपड़ी में अपने पूरे परिवार के साथ रहती है. हीरामणि देवी बचपन से ही गरीबी में पलीबढ़ी थी. उस का पति एक होटल में सुबह 5 बजे से रात के 10 बजे तक काम किया करता था. तब हीरामणि देवी गांव में रहती थी. शादी के 3 साल बाद वह पति के साथ पटना आ गई और किराए के मकान में रहने लगी.

धीरेधीरे हीरामणि देवी की दोस्ती चना छीलने वाली कुछ औरतों से हो गई. वह भी चना छीलने का काम करने लगी. चना छीलने के दौरान ही हीरामणि देवी के मन में आया कि क्यों न पकौड़ों की दुकान खोली जाए. हीरामणि देवी ने ऐसा ही किया. कुछ दिनों के बाद उस का कारोबार रफ्तार पकड़ने लगा. धीरेधीरे उस की दुकान पर लोगों की भीड़ लगने लगी, जिसे संभाल पाना मुश्किल हो रहा था. पति ने हीरामणि देवी की मसरूफियत देख कर उस की पूरी मदद की. दोनों मिल कर दुकान चलाने लगे. उन्होंने आलू के पकौड़ों से शुरुआत की थी, लेकिन बाद में ब्रैड, आलू, चना, बैंगन, गोभी के पकौड़ों को भी शामिल किया गया. हीरामणि देवी ने अपनी जिंदगी में खूब जद्दोजेहद की है. आज वह बहुत खुश है और अपने 3 बच्चों को अच्छी तालीम दे रही है. उस का एक बेटा गौरव इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है. उस ने दीघा में पक्का मकान भी बनाया है.

इंटरनैट विनाश का जरिया

दुनिया ने पिछले 25 साल में बहुत तरक्की की है. इंटरनैट ने जिंदगी बदल डाली. हर तरह की जानकारी सैकंड में मिल जाती है. सारी दुनिया एक धागे में बंध गई. क्या वाकई दुनिया ने ‘पा’ के सफेद ग्लोब जैसा एक ग्लोब बना डाला है जिस में देशों की लाइनें ही नहीं थीं? क्या वाकई हम ग्लोबल विलेज बन रहे हैं? शायद नहीं. यह ठीक है कि 18वीं, 19वीं और 20वीं सदी की तरह की लड़ाइयां अब नहीं हो रही हैं पर अब उस से ज्यादा दहशत का माहौल है. यह दहशत बढ़ रही है, इंटरनैट के फैलाव की तरह. लगता है जैसेजैसे इंटरनैट बढ़ रहा है, उस का असर गहरा हो रहा है, दुनिया की समस्याएं बढ़ रही हैं, लोगों में खाई बढ़ रही है.

अमेरिका में पुलिस वालों को मारा जाने लगा है. अमेरिकी पुलिस कालों को जन्मजात अपराधी मान कर उन्हें कभी भी बंदूक का निशाना बना डालती है. सीरिया और उत्तरी अफ्रीका के झगड़ों से परेशान लाखों परिवार सुरक्षा व रोजीरोटी की तलाश में जान जोखिम में डाल कर यूरोप में जबरन घुस रहे हैं, नंगे पांव, बिना खाना साथ लिए, छोटे बच्चों और बूढ़े बाप के साथ. भारत कौन सा बचा है. कश्मीर फिर उबल रहा है. आरक्षण के पक्ष व विपक्ष की लाइनें उभरने लगी हैं. गौ सेवकों ने इसलामिक स्टेट जैसा संगठन बनाने की तैयारी कर ली है. माओवादी किसी भी तरह काबू में नहीं आ रहे.

इन सब को आपस में कौन जोड़ रहा है? वही इंटरनैट जिस ने दुनिया के देशों की नक्शे पर खिंची लाइनें मिटा दी हैं. कोई भी किशोर सैकंडों में फ्रांस के नीस शहर में 9 टन के ट्रक की चपेट में आए 80 लोगों का ट्रक द्वारा कुचले जाने वाला वीडियो देख सकता है पर क्या यह उन्हें वायलैंस के खिलाफ तैयार कर रहा है या वायलैंस पू्रफ बना रहा है. इसलामिक स्टेट का फैलाव भी इंटरनैट और सैटेलाइट फोन के जरिए हुआ है. उस से मौत का संदेश उसी तरह फैला है जैसे यूरोप की फैक्ट्रियों की चिमनियों का धुआं और गाडि़यों का प्रदूषण एशियाअफ्रीका तक फैला है.

इंटरनैट आशा का संदेश ले कर आया था पर अब विध्वंसक बन गया है. हर किशोर के हाथ में अब खिलौना बेकार की बातों या हिंसक वीडियो खेलों से भरा है. इंटरनैट उत्पादन की बात नहीं कर रहा, शांति का दूत नहीं है, प्रेरक नहीं है, सफलता की कहानियां नहीं कहता. यह तो एक जरिया बन गया है विनाश का  किशोरों, युवाओं या दफ्तरों से इसे अब छीना नहीं जा सकता. इस पर कंट्रोल नहीं हो सकता. लेकिन यह तो कहा जा सकता है कि खबरदार, यहां इंटरनैट चालू है. खतरा है.

कृति खरबंदा को किसिंग सीन से कोई ऐतराज नहीं

‘राज रीबूट’ जो विशेष फिल्म्स की फिल्म ‘राज’ की सिक्वल है, उसकी डेब्यू करने वाली पंजाबी गर्ल कृति खरबंदा को दक्षिण की फिल्मों के साथ-साथ एक बड़ा मौका इस फिल्म में अभिनय का मिला है, वह बहुत खुश हैं और बड़ी तैयारी के साथ उन्होंने इसमें काम किया है.

उन्होंने फिल्म में इमरान हाशमी और गौरव अरोरा के साथ दो किसिंग सीन किये है. फिल्म में किसिंग सीन करने में वह कोई मुश्किल नहीं समझती. प्यार में ‘किस’ का होना आम मानती हैं. लेकिन उनके कुछ अपने बनाये हुए मापदंड हैं, जिसके अंतर्गत वह बिकिनी नहीं पहन सकती, क्योंकि उनकी बॉडी टाइप ऐसी नहीं है.

फिल्में भी वह अपने हिसाब से चुनती हैं. वह कहती हैं कि साऊथ में भी मैंने अपने शर्तों पर काम किया है. यहां भी करुँगी. आने वाले समय में ही पता चलेगा कि कृति अपनी बातों पर कितनी खरी उतर पाती हैं.

2 लड़कों ने मुझे किसी के साथ हमबिस्तरी करते हुए देख लिया था. अब वे मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे हैं. मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 11वीं क्लास में पढ़ती हूं. मैं ने कई बार कई लड़कों के साथ हमबिस्तरी की है. एक बार 2 लड़कों ने मुझे किसी के साथ हमबिस्तरी करते हुए देख लिया था. अब वे मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश कर रहे हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

जब आप कई लड़कों के साथ हमबिस्तरी कर चुकी हैं, तो 2 लड़के और सही, आप को क्या फर्क पड़ता है? वैसे, 16-17 साल की कच्ची उम्र में आप को यह खेल खेलना महंगा पड़ सकता है. बेहतर तो यही होगा कि आप किसी भी लड़के के साथ हमबिस्तरी करना फौरन बंद कर दें और उन 2 लड़कों को भी कभी अकेले में मिलने का मौका न दें. कहीं पेट से हो गईं, तो मुसीबत हो जाएगी.

 

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बेचारे रोहित शेट्टी, क्या ‘गोलमाल 4’ बनेगी?

'‘दिलवाले’’ की असफलता अभी भी निर्देशक रोहित शेट्टी का पीछा किए हुए है. इसी के चलते रोहित शेट्टी की 2016 में शुरू होने वाल सभी फिल्में हमेशा के लिए डिब्बे में बंद हो चुकी हैं. सभी दरवाजे बंद होने के बाद ही रोहित शेट्टी ने अजय देवगन के साथ पुनः हाथ मिलाया और ‘‘गोलमाल 4’’ की योजना पर काम शुरू किया. मगर सिर मुंड़ाते ओले पडे़ वाली हालत हुई. रोहित शेट्टी ने जैसे ही घोषणा की कि वह करीना कपूर व अजय देवगन के साथ फिल्म ‘‘गोलमाल 4’’ शुरू करने जा रहे हैं, वैसे ही करीना कपूर के गर्भवती होने की खबर आ गयी.

फिर करीना इस फिल्म से बाहर हो गयी. उसके बाद इस फिल्म के साथ जुड़ने के लिए कई अभिनेत्रियों के नाम चर्चा में आए. पिछले दो माह से चर्चा रही है कि दीपिका पादुकोण और आलिया भट्ट दोनो रोहित शेट्टी के साथ ‘गोलमाल 4’ करना चाहती हैं. मगर अब खुद रोहित शेट्टी ने ही साफ कर दिया है कि ‘गोलमाल 4’ में आलिया भट्ट और दीपिका पादुकोण दोनों नही हैं. रोहित शेट्टी का दावा है कि दीपिका पादुकोण के साथ उन्हे ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ जैसी फिल्म बनानी पड़ेगी, इसलिए फिलहाल वह दीपिका के साथ कोई फिल्म नहीं कर रहे हैं.

उधर रोहित शेट्टी का दावा है कि आलिया भट्ट उनके साथ काम करना चाहती हैं, मगर जिस वक्त वह ‘गोलमाल 4’ की शूटिंग करना चाहते हैं, उस वक्त आलिया भट्ट व्यस्त हैं. अब सवाल यह है कि आलिया भट्ट या रोहित शेट्टी शूटिंग की तारीखें आगे पीछे करने को तैयार क्यो नही हैं?

उधर अब ‘गोलमाल 4’ के साथ नया संकट आ गया है. रोहित शेट्टी अपनी फिल्म ‘‘गोलमाल 4’’ को दीवाली 2017 में रिलीज करने की बात कर रहे हैं. तो वहीं अब गौरंग दोषी ने अमिताभ बच्चन वाली अपनी फिल्म ‘आंखें 2’ को दिवाली 2017 में रिलीज करने का ऐलान कर दिया है. यानी कि दिवाली 2017 में ‘गोलमाल 4’ और ‘आंखे 2’ की टक्कर होगी? इस टक्कर को सहने के लिए क्या रोहित शेट्टी तैयार हैं?

इस पर रोहित शेट्टी गोलमाल बात करते हुए कहते हैं-‘‘अभी इस साल की दिवाली होने दीजिए. इस दिवाली पर करण जोहर की फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ और अजय देवगन की फिल्म ‘शिवाय’ की टक्कर होनी है. इस दिवाली को क्या होता है, वह देखते हैं. पर मैं ‘गोलमाल 4’ बना रहा हूं.’’ रोहित शेट्टी अभी भी यह बताने की स्थिति में नही हैं कि उनकी फिल्म ‘गोलमाल 4’ में हीरोइन कौन होगी.

उधर बौलावुड के सूत्रों की माने तो ‘गोलमाल 4’ के निर्माता खुद इस फिल्म को लेकर संशय की स्थिति में हैं. खुद रोहित शेट्टी और अजय देवगन अभी तक पूरी तरह से ‘गोलमाल 4’ पर काम करने को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रहे हैं. बौलीवुड का एक तबका मानता है कि अजय देवगन के साथ साथ रोहित शेट्टी को भी अजय देवगन निर्देशित फिल्म ‘‘शिवाय’’ के प्रदर्शन का इंतजार है. दोनों यह देखना चाहते हैं कि दर्शक उनकी फिल्म ‘शिवाय’ को किस तरह से पसंद करते हैं. उसके बाद ही अजय देवगन व रोहित शेट्टी ‘गोलमाल 4’ पर अंतिम फैसला लेंगे. वास्तव में अजय देवगन की भी पिछली फिल्में बाक्स आफिस पर कमाल नहीं दिखा पायी हैं.

वैसे रोहित शेट्टी की हालात सुधरने का नाम नही ले रही है. अपनी इस स्थिति को सुधारने के लिए ही रोहित शेट्टी इन दिनों रणवीर सिंह व तमन्ना के साथ बनायी गयी ‘‘कैपिटल फूड्स’’ की विज्ञापन फिल्म ‘‘रणवीर चिंग रिटर्न’’ को प्रचारित करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रखा है. ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी फिल्मकार व कलाकार ने विज्ञापन फिल्म दिखाने के लिए थिएटर बुक किया हो और पत्रकारों को बुलाया हो तथा पांच मिनट की विज्ञापन फिल्म दिखाने के बाद एक पांच सितारा होटल में पत्रकारों से उस विज्ञापन फिल्म को लेकर चर्चा की हो.

पर रोहित शेट्टी व रणवीर सिंह दोनों ने ऐसा कारनामा 19 अगस्त को मुंबई में किया. वास्तव में इस तरह की चर्चा  करने के पीछे रोहित शेट्टी और रणवीर सिंह दोनों का एकमात्र मकसद खुद को सुर्खियों में लाना ही हो सकता है. जिससे उनका करियर आगे बढ सके. अन्यथा दोनों का ही करियर ठहर गया है. सूत्रों का दावा है कि रोहित शेट्टी और रणवीर सिंह दोनों के पास एक भी फिल्म नहीं है.

अब देखना है कि इस विज्ञापन फिल्म के बाद दोनों के करियर की दिशा कितनी बदलती है?

विज्ञापन फिल्म ने पूरी की रणवीर सिंह की इच्छा

रणवीर सिंह का दावा है कि रोहित शेट्टी के निर्देशन में काम करने की उनकी बड़े दिनों की इच्छा अब जाकर कैपिटल फूड्स’ के लिए बनी विज्ञापन फिल्म ‘‘रणवीर चिंग रिटर्न’’ से पूरी हुई है. रोहित शेट्टी और रणवीर सिंह ने कैपिटल गुड के लिए एक पांच मिनट की विज्ञापन फिल्म की है, जिसमें देसी चाइनीज की बात की गयी है. इसमें रणवीर सिंह तथा तमन्ना भाटिया ने अभिनय किया है. यह फिल्म अब हर सिनेमाघर में दिखायी जाएगी.

इस विज्ञापन फिल्म को पत्रकारों को दिखाने के बाद रणवीर सिंह ने कहा-‘‘मैं लंबे समय से रोहित शेट्टी के साथ काम करना चाहता था. मुझे लगता है कि मेरी वह इच्छा अब पूरी हुई है. यह विज्ञापन फिल्म ‘रणवीर चिंग रिर्टन’ से बेहतर शुरूआत हो ही नहीं सकती थी. यह एक ब्लाक बस्टर फिल्म है. इसमें परिवार के मनोरंजन के सारे मसाले हैं. इसमें एक्शन, इमोशन, रोमांस, ड्रामा, कामेडी, नाच गाना सब कुछ है. इसी के साथ इसमें देसी चाइनीज का मजा है. रोहित शेट्टी की टीम के साथ काम करने का अपना आनंद रहा. मैं तो आगे भी रोहित शेट्टी के साथ काम करना चाहूंगा.’’

जबकि कैपिटल फूड्स’ के मैनेंजिंग डायरेक्टर अजय गुप्ता ने कहा-‘‘चिंग हमेशा अपने खोजपूर्ण प्रोडक्ट, मार्केटिंग व पैकिंग के लिए जाना जाता रहा है. हमने पहली प्रचार फिल्म रणवीर चिंग बनायी थी. अब यह दूसरी फिल्म है-रणवीर चिंग रिटर्न’.

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