Download App

अब रेस्तरां में नहीं देना होगा सर्विस चार्ज

रेस्तरां में ग्राहकों से ज्यादा वैट वसूलने के मामले में कानूनी विवाद और गहराने के आसार हैं, लेकिन जानकारों का कहना है कि विवाद की जड़ में टिप के नाम पर वसूला जाने वाला 10% सर्विस चार्ज (सर्विस टैक्स नहीं) है, जिसका कोई कानूनी आधार नहीं है. अब कोर्ट की निगाह में आने से इस बात के आसार बढ़ गए हैं कि सेवा के नाम पर लिया जाने वाला यह चार्ज हाशिए पर आ जाए. वैट विभाग ने साफ किया है कि वह कुल बिल पर वैट चार्ज करता है, जिसमें सर्विस चार्ज शामिल होता है, न कि सर्विस टैक्स. सर्विस टैक्स कुल बिल के 40% हिस्से पर लगता है, जो केंद्र को जाता है.

दिल्ली हाई कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पिछले दिनों वैट विभाग को नोटिस जारी किया था कि वह सर्विस कंपोनेंट पर भी टैक्स क्यों ले रहा है. इस पर एक अधिकारी ने बताया, 'रेस्तरां में वैट खानपान के मूल्य और सर्विस चार्ज पर लगता है. इसे सर्विस टैक्स सहित कुल बिल न समझा जाए. अगर कोई चार्ज करता है तो वह इल्लीगल है. लेकिन सर्विस चार्ज के नाम पर हो रही वसूली पर वैट लगाने को अगर चुनौती दी गई है, तो हम अपनी बात रखने को तैयार हैं.'

दिल्ली सेल्स टैक्स बार असोसिएशन के एक सदस्य ने बताया, 'अगर किसी रेस्तरां ने मील प्लस सर्विस चार्ज प्लस सर्विस टैक्स यानी 1166 पर वैट चार्ज किया और विभाग ने स्वीकार किया तो दोनों फंसेंगे. लेकिन ऐसा नहीं होता. मामला सर्विस चार्ज पर वैट का है. ग्राहक की नजर से देखें तो परचेज तो सिर्फ खाना किया गया है, ऐसे में सर्विस नाम के किसी चार्ज पर वह वैट क्यों दे.'

दूसरी ओर, रेस्तरां इंडस्ट्री सर्विस चार्जेज का बचाव करती नजर आ रही है. नेशनल रेस्तरां असोसिएशन ऑफ इंडिया के सेक्रेटरी जनरल प्रकुल कुमार ने कहा, 'रेस्तरां उन्हीं हेड्स के तहत वैट चार्ज कर रहे हैं, जिस पर विभाग ने सहमति जताई है. अगर सरकार टैक्सेबल रकम से सर्विस चार्ज को बाहर रखती है तो हमें क्यों ऐतराज होगा. लेकिन जहां तक सवाल इस चार्ज का है तो यह एक तरह की टिप है, जो पूरे स्टाफ में बांटी जाती है. इसे सर्विस टैक्स के साथ मत जोड़िए.'

दानिश की मदद क्यों नहीं कर रहा पाक क्रिकेट बोर्ड

लाइफटाइम बैन का सामना कर रहे पाकिस्तानी क्रिकेटर दानिश कनेरिया की नवाज शरीफ सरकार इसलिए मदद नहीं कर रही क्योंकि वे हिंदू हैं. पाकिस्तान की पार्लियामेंट यानी नेशनल असेंबली की एक कमेटी के मेंबर्स ने ही यह खुलासा किया है.

बता दें कि कनेरिया पर मई 2010 में इंग्लैंड के काउंटी क्रिकेट में स्पॉट फिक्सिंग का आरोप लगा था. इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड ने जून 2012 में उन पर बैन लगाया. इस फैसले पर पहले पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड और फिर आईसीसी ने मुहर लगा दी. तब से उन पर लाइफटाइम बैन है. वे बीसीसीआई से भी मदद की अपील कर चुके हैं.

क्या कहना है इस कमेटी का

पाकिस्तान मुस्लिम लीग के सांसद रमेश कुमार वंकवानी ने इंटर स्टेट को-ऑर्डिनेशन से जुड़ी नेशनल असेंबली की स्टैंडिंग कमेटी की मीटिंग में कहा कि "पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड दानिश प्रभाशंकर कनेरिया को फाइनेंशियल और कानूनी मदद नहीं दे रहा है, क्योंकि वे हिंदू कम्युनिटी से हैं."

इस कमेटी के चेयरमैन पख्तूनख्वा मिल्ली अवामी पार्टी के अब्दुल कहार खान वदान हैं. उनकी बुलाई मीटिंग में पीसीबी के फाइनेंशियल मामलों और नेशनल क्रिकेट टीम की परफॉर्मेंस समेत कई मुद्दों पर चर्चा की गई.

सांसद रमेश ने कहा कि "कनेरिया की मदद देश के दूसरे क्रिकेटर की तरह नहीं की जा रही है."

कमेटी के एक और मेंबर इकबाल मुहम्मद अली ने भी कहा कि "कनेरिया के पास पैसे नहीं हैं और वे खुद अपना केस नहीं लड़ सकता है. ऐसे में, पीसीबी को मदद करनी चाहिए."

पीसीबी ने कहा, हम कुछ नहीं कर सकते

पीसीबी के चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर सुभान अहमद ने कहा "आईसीसी के एंटी करप्शन कोड के तहत पीसीबी कनेरिया को किसी भी तरह से मदद नहीं दे सकती. अगर किसी बोर्ड ने किसी प्लेयर पर बैन लगाया है तो आईसीसी के नियमों के मुताबिक सभी बोर्ड को यह मानना पड़ता है. पीसीबी भी ऐसा ही कर रहा है."

कनेरिया का क्या कहना है?

स्पॉट फिक्सिंग के ऐसे ही एक मामले में फास्ट बॉलर मोहम्मद आमिर पर भी लाइफटाइम बैन लगा था. 5 साल क्रिकेट से दूर रहने के बाद आमिर की इंटरनेशनल क्रिकेट में वापसी हो गई.

इस जनवरी में कनेरिया ने कहा था, ''देखिए, पीसीबी खुद आमिर का केस देख रही है और मुझे पूछ भी नहीं रही. मेरे बारे में क्या? क्या होगा मेरा और मेरे परिवार का? यह सरासर गलत है."

बाद में कनेरिया ने बीसीसीआई से इस मामले में दखल देने की अपील की थी. उन्होंने कहा था कि "सचिव अनुराग ठाकुर मेरे बैन को लेकर प्रेसिडेंट शशांक मनोहर से बात करें और मेरी मदद करें.''

दानिश कनेरिया का क्रिकेट करियर

फॉर्मेट  मैच   विकेट  बेस्ट बॉलिंग

टेस्ट   61           261         7/77

वनडे   18           15           3/31

VIDEO: हम भी मर्द हैं, आखिर लड़की को ऐसे ही थोड़े छोड़ देंगे

दिल्ली की एक सुनसान रात. एक ढाबे पर बैठ लूडो खेलते दो कैब ड्राइवर. एक के हाथ पर नाखूनों के खरोंच. दूसरे का ध्यान लूडो से हटकर खरोंच पर. सवारी मैडम के बारे में सवाल: छाती कहां तक दिख रही थी… स्कर्ट कितनी छोटी थी… खूब मजा किए बेटा!!!

दूसरे कैब ड्राइवर ने भी कहानी बतानी शुरू की. मस्त और उत्तेजक स्टाइल में. 'हम लौंडिया थोड़े ही हैं बे! हमारा भी 'स्पार्क प्लग' काम करता है. तो क्या सही में दूसरे कैब ड्राइवर ने उस रात एक और वारदात को अंजाम दिया था या…जानने के लिए देखें वीडियो…

वीडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें

 

हम भी मर्द हैं, आखिर लड़की को ऐसे ही थोड़े छोड़ देंगे

कब बंद होगी कैब में छेड़छाड़? कहीं चलती कार में रेप, कभी चूमने की कोशिश

देश की सरकार महिलाओं सशक्तिकरण की बात करती है, लेकिन क्या वाकई महिलाए सशक्त है. महिलाओं के साथ आए दिन होने वाली छेड़छाड़ और रेप की घटनाएं कुछ और ही दास्तां बंया करती है. देश की राजधानी दिल्ली में हाल सबसे बुरा है. राजधानी में कैब में लड़कियों और महिलाओं से छेड़छाड़ के मामले रुकने का नाम नहीं ले रहे हैं. कुछ समय पहले ऊबर कैब के ड्राइवर ने चलती कार में युवती का रेप कर दिया था. इस मामले ने दिल्ली समेत पूरे देश हाहाकर मचा दिया था. उस समय बात उठी क्या अब महिलाएं कैब में भी सुरक्षित नहीं है. तो क्या वो रात को काम करना और बाहर निकलना छोड़ दें.

काफी समय तक इसको लेकर चर्चाएं रहीं, सरकार ने सुरक्षा के तमाम दावे किए, पर एक प्रश्न जो आज भी जस का तस बना हुआ है कि क्या आज महिलाएं सेफ हैं. हाल ही में विदेशी महिला के साथ ओला कैब ड्राइवर की ओर से की गई छेड़खानी तो किसी ओर ही तरह इशारा करती हैं. आइए हम आपको बताते कैब से जुड़े अपराध की घटनाओं के बारे में.

सुषमा स्वराज ने की एलजी से बात

शनिवार 7 मई 2016 को एप आधारित टैक्सी सेवा ओला से सफर कर रही एक विदेशी महिला से कैब चालक ने छेड़छाड़ की. विरोध करने पर उसने विदेशी महिला को बीच रास्ते ही उतारकर फरार हो गया. पुलिस ने महिला की शिकायत पर आरोपी कैब ड्राइवर को गिरफ्तार उसे 14 दिन की पुलिस हिरासत में भेज दिया गया है. इस पूरे मामले पर संज्ञान लेते हुए विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग से बात की. चित्तरंजन पार्क थाने मे दर्ज एफआईआर के मुताबिक 23 साल की बेल्जियम की रहने वाली युवती ने गुरुग्राम से दिल्ली के चित्तरंजन पार्क आने के लिए ओला कैब बुक की थी.

बहाने से बगल वाली सीट में बैठाकर की चुमने की कोशिश

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक ट्रांसलेटर का काम करने वाली पीड़िता की स्थानीय दोस्त के  मुताबिक, उसकी दोस्त सफर के दौरान जीपीएस के जरिए रास्ते पर नजर रखे हुए थी लेकिन हौजखास इलाके के बाद कैब ड्राइवर गलत रास्ते पर जाने लगा. मेरी दोस्त ने मुझे कई बार फोन भी किया लेकिन ड्राइवर भरोसा दिलाता रहा कि वो उसे सही जगह पहुंचा देगा. इस बीच ड्राइवर ने अपना जीपीएस बंद होने का बहाना बनाकर मेरी दोस्त को आगे की सीट पर बैठने के लिए मजबूर किया और आगे की सीट पर बिठाने के बाद चूमने और छेड़छाड़ की कोशिश की.

मोबाइल फोन छीन कर डिलीट की बुकिंग

ड्राइवर ने मेरी दोस्त का फोन छीनकर ओला कैब की बुकिंग से जुड़ी जानकारियां भी मिटा दी. लड़की ने जब इसका ज्यादा विरोध किया तो आरोपी ड्राइवर लडक़ी को बीच रास्ते में ही उतारकर फरार हो गया. जैसे तैसे महिला पुलिस थाने पहुंची और आरोपी के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया. पुलिस ने  आरोपी ड्राइवर राजसिंह को गिरफ्तार करने के साथ साथ हरियाणा नंबर की ओला कैब को भी बरामद कर लिया है. वहीं इस मामले में ओला ने सफाई दी है कि हमने कथित ड्राइवर को ओला प्लेटफॉर्म से हटा दिया है. हम जांच अधिकारियों से इस मामले से जुड़ी हर जरूरी जानकारी साझा कर रहे है.

दिल्ली और भोपाल में पहले भी हुई शर्मनाक घटना

वहीं दिल्ली में 15 दिसंबर 2014 की रात उबेर कैब के ड्राइवर ने भी चलती कार में महिला के साथ शर्मनाक हरकत को अंजाम दिया. गुड़गांव में काम करने वाली एक लड़की ने वसंत विहार से नॉर्थ दिल्ली के इंद्रलोक स्थित अपने घर जाने के लिए मोबाइल ऐप के जरिए उबेर कैब से टैक्सी बुक कराई थी. पीड़िता ने अपने बयान में कहा था कि कैब में बैठने के बाद उसे नींद आ गई थी. कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ कि कैब ड्राइवर शिवकुमार उसके साथ छेड़छाड़ कर रहा है.

चिल्लाने पर सरिया घुसाने की दी धमकी

पीड़िता ने बाहर निकलने की कोशिश की लेकिन कार लॉक्ड थी. शिवकुमार ने उसके साथ मारपीट की. धमकी दी कि अगर वह चिल्लाई तो वह उसके अंदर सरिया घुसा देगा. इसके बाद उसने रेप किया और बाद में फरार हो गया. घटना के दो दिन बाद 7 दिसंबर 2014 को यूपी के मथुरा से उसे अरेस्ट किया गया. इस मामले में तीस हजारी कोर्ट ने आरोपी ड्राइवर को उम्रकैद की सजा सुनाई. आरोपी तिहाड़ जेल में उम्र कैद की सजा काट रहा है.

पुलिस ने ड्राइवर को किया गिरफ्तार

वहीं 30 जनवरी 2016 को भोपाल में ओला कैब में एक महिला के साथ रेप का मामला सामने आया था. 30 साल की महिला ने ओला कैब के ड्राइवर को फोन करके बुलाया और ड्राइवर उसे एयरपोर्ट के रास्ते ले गया और उसने कैब खड़ी करके महिला के साथ ज्यादती की. महिला के शिकायत करने के कुछ दिन बाद ही पुलिस ने ड्राइवर को गिरफ्तार कर लिया गया.

बेर को किया था बैन

वहीं इस घटना के बाद कैब संचालक कंपनी उबेर को देश के कई राज्यों में बैन कर दिया गया था. जिसे कुछ माह दोबारा अपनी सवाएं देने के लिए अनुमति दी गई.

एंड्रायड के सामने फेल हुआ ऐप्पल!

बात जब विश्वसनीयता और परफॉर्मेंस की आती है तो ऐप्पल के आईफोन और आईपैड एंड्रायड स्मार्टफोन के मुकाबले कहीं ज्यादा खराब होते हैं. एक अध्ययन से यह खुलासा हुआ है. वैश्विक डेटा सुरक्षा कंपनी बलांक्को टेक्नॉलजी समूह के मुताबिक आईओएस (ऐप्पल) पर आधारित डिवाइस की खराब होने की दर साल 2016 की दूसरी तिमाही में 58 फीसदी रही, जबकि एंड्रायड के स्मार्टफोन की विफलता दर इस दौरान 35 फीसदी रही.

सॉफ्टपीडिया डॉट कॉम ने इस अध्यन के हवाले से कहा कि पहली बार ऐप्पल के डिवाइसों का परफॉमेंस एंड्रायड से कमतर देखा गया है. आईफोन 6 की खराब होने की दर सबसे अधिक 29 फीसदी है, जिसके बाद आईफोन 6s और आईफोन 6s प्लस की बारी है. इस अध्ययन में ऑपरेटिंग सिस्टम, निर्माता, मॉडल और क्षेत्र के आधार पर विफलता दर निकाली गई.

साल 2016 की पहली तिमाही में एंड्रायड डिवाइसों की विफलता दर 44 फीसदी रही. इस अध्ययन में बताया गया, “सैमसंग, लेनोवो और लीटीवी के फोन सबसे ज्यादा विफल रहे. सैमसंग की विफलता दर 26 फीसदी थी तो मोटोरोला की विफलता दर केवल 11 फीसदी थी.”

आईओएस के डिवाइस सबसे ज्यादा नार्थ अमेरिका और एशिया में विफल पाए गए. इन देशों में बेचे गए फोन की गुणवत्ता भी इसका एक प्रमुख कारण हो सकता है. आईओएस के साथ सबसे प्रमुख समस्या वाई-फाई नेटवर्क से कनेक्ट नहीं होना, कनेक्शन कट जाना, कम स्पीड और गलत पासवर्ड का बार-बार संकेत देना रहा.

वहीं, एंड्रायड फोन में कैमरा की खराबी, बैटरी चार्जिग की खराबी, टचस्क्रीन की खराबी और एप का क्रैश होना प्रमुख विफलता रही.इस अध्यययन के निष्कर्षों के मुताबिक, आईओएस के 50 फीसदी एप्लिकेशन क्रैश हुए जबकि एंड्रायड के महज 23 फीसदी एप ही क्रैश हुए.

आईओएस डिवाइसों में सबसे ज्यादा फेसबुक, इंस्टाग्राम और स्नैपचैट एप में खराबी आई.

योगेश्वर की हो गई चांदी!

रियो ओलंपिक से भले ही पहलवान योगेश्वर दत्त को खाली हाथ लौटना पड़ा हो. लेकिन उनके लिए एक बेहद ही अच्छी खबर आई है. भारत के इस स्टार पहलवान ने 2012 लंदन ओलंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीता था, वो अब सिल्वर में अपग्रेड हो सकता है.

लंदन ओलंपिक में पहलवान योगेश्वर दत्त तीसरे नंबर पर रहे थे. जिसकी वजह से उन्हें ब्रॉन्ज मेडल मिला था. जिस रूसी पहलवान को लंदन ओलंपिक में सिल्वर मिला था, उनका डोप टेस्ट पॉजिटिव पाया गया है, ऐसे में अब उनका मेडल वापस लिया जाएगा, और तीसरे नंबर रहे योगेश्वर को मेडल अपग्रेड कर सिल्वर मेडल दिया जाएगा.

2012 लंदन ओलंपिक में जीता था ब्रॉन्ज मेडल

लंदन ओलंपिक में फ्रीस्टाइल के 60 किलोग्राम वर्ग में रूसी पहलवान बेसिक कुदुखोल ने सिल्वर मेडल पर कब्जा जमाया था, और इसी इवेंट में योगेश्वर को ब्रॉन्ज मेडल से संतोष करना पड़ा था. लेकिन रूसी पहलवान बेसिक कुदुखोल चार साल बाद डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए. जिसके चलते उनका सिल्वर मेडल योगेश्वर को मिलने वाला है. योगेश्वर का ब्रॉन्ज चौथे नंबर पर रहे खिलाड़ी को दिया जाएगा. कुदुखोव की सिर्फ 27 साल की उम्र में साल 2013 में एक कार दुर्घटना में मौत हो चुकी है.

रूसी पहलवान डोप टेस्ट में पॉजिटिव पाए गए

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने लंदन ओलंपिक के दौरान इक्ठ्ठा किए सैंपलों का फिर से परीक्षण किया था. ये एक स्टैंडर्ड प्रैक्टिस के तौर पर किया जाता है और ऐसे सैंपलों को 10 साल तक सुरक्षित रखा जाता है. ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि कोई आधुनिक दावाओं के इस्तेमाल से डोप टेस्ट में बाच गया है, तो उसे पकड़ा जा सके. ये टेस्ट बेहद एडवांस्ड तरीकों से जाते हैं.

सिल्वर मेडल की नहीं हुई है पुष्टि

योगेश्वर को सिल्वर मिलने की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन डोप टेस्ट में बेसिक कुदुखोव के फेल होने के बाद ये तय माना जा रहा है कि, अपग्रेड की घोषणा होने के बाद योगेश्‍वर भी लंदन में सिल्‍वर मेडल विजेता माने जाएंगे. लंदन ओलंपिक में पहलवान सुशील कुमार और शूटर विजय कुमार ने सिल्वर मेडल जीता था.

विवाह कानून में परिवर्तन हो, पर व्यावहारिक नजरिए से

यह खेद की बात है कि भारतीय जनता पार्टी की सरकार समान व्यक्तिगत कानून पर विचार करने को तैयार नहीं है. भगवा मंडली का यह पुराना एजेंडा है कि व्यक्तिगत कानून एकजैसे हों ताकि वे मुसलमानों से तलाक, मेहर व 4 पत्नियां रखने तक का हक छीन सकें. लेकिन इन कट्टरपंथियों को यह नहीं मालूम कि समान व्यक्तिगत कानून में हिंदू विवाह कानून और हिंदू संयुक्त परिवार भी पिस जाएंगे.

आज हिंदू विवाह पाखंडों का एक बड़ा जखीरा है. शुभ मुहूर्त, साए, कुंडली, पंडितों की घंटों की पूजा, अग्नि पूजा, देवताओं का आह्वान, फेरे, छोटीमोटी रस्में आदि हिंदू विवाह का हिस्सा हैं और कुछ कानून के दायरे में आती हैं, कुछ नहीं. यदि समान विवाह कानून विरासत, गोद बने तो सारी पंडिताई धराशाई हो सकती है.

भाजपा को सरकार में आने के बाद जब कानून का मसौदा तैयार करना पड़ा तो उसे यह एहसास हो गया होगा कि पार्टी के आधार, धर्म को यह समान कानून निरर्थक कर देगा.

समान विवाह कानून का अर्थ होगा कि सभी धर्मों के लोग आपस में बिना लागलपेट विवाह कर सकेंगे और विवाह या तो अदालतों में होंगे या फिर किसी कानून के अंतर्गत नियुक्त पब्लिक नोटरी टाइप लोगों के द्वारा. कुंडली देख कर पंडितों को विवाह कराने के जो मोटे पैसे मिलते हैं और रात भर लोगों से फेरों में जगने की जो जबरदस्ती की जाती है, वह बंद हो जाएगी.

मुसलिम कानून में जो परिवर्तन होंगे वे उतने महत्त्व के न होंगे, जितने हिंदू कानूनों में होंगे, क्योंकि मुसलिम व्यक्तिगत कानून कुछ हद तक औरत की रजामंदी पर निर्भर है, जबकि हिंदू विवाह कानून में उसे वर को दान के रूप में दिया जाता है.

मुसलिम विवाह कानून परिवर्तन मांगता है पर जो हौआ दिखाया जाता है कि वे 5 के 25 हो रहे हैं, गलत है. यह भी गलत है कि हर मुसलिम पुरुष 4 पत्नियां रखता है, क्योंकि फिर औरतों की जनसंख्या में पुरुष व महिला का अनुपात 1:4 का होता होगा यानी 4 गुना औरतें उपलब्ध होनी चाहिए.

समान व्यक्तिगत कानून का हौआ केवल चुनावी जुमला है, जैसा अच्छे दिन आने या 15 लाख प्रति व्यक्ति काला धन विदेश से लाने पर देने का. विवाह कानूनों में परिवर्तन हो पर उसे राजनीतिक चश्मे से न देख कर व्यावहारिक रूप दिया जाए. हिंदूमुसलिम दोनों समाजों में व्यक्तिगत कानूनों में बहुत परिवर्तनों की आवश्यकता है ताकि औरतों को अदालतों के गलियारों में वर्षों चप्पलें न घिसनी पड़ें.          

गर्भ मेरा मरजी मेरी

बलात्कार की शिकार एक गरीब औरत को 20 सप्ताह की कानूनी इजाजत की हद के बाहर 24वें सप्ताह में गर्भपात कराने के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा. गनीमत है कि उस का मामला हजारों मामलों की तरह दबा नहीं रह गया और 2 दिन में ही फैसला हो गया, जिस से उसे अनचाहे गर्भ से छुटकारा मिल गया.

पर देश की हजारों औरतें हर साल इस तरह से पीडि़त होती हैं. बलात्कार या मरजी से हुए गर्भ को गिराने का फैसला अबोध किशोरियां व युवतियां हफ्तों तक नहीं ले पातीं. कुछ को तो मालूम ही नहीं होता कि सैक्स के कारण वे गर्भवती हो गई हैं. जब तक घर वालों को पता चलता है, तब तक देर हो चुकी होती है और डाक्टर गर्भपात करने से मना कर देते हैं. ऐसे में मोटी फीस दे कर चुपचाप गर्भपात कराना होता है या फिर नौसिखियों के हवाले खुद को छोड़ देना होता है.

कुछ औरतें बारबार गर्भपात कराती हैं, क्योंकि या तो वे खुद उन्मुक्त सैक्स चाहती हैं या फिर बिंदास हो चुकी होती हैं और गर्भपात को मासिक क्रम सा समझने लगती हैं.

गनीमत है कि भारत उन देशों में से है, जहां गर्भपात का कानून काफी उदार है. अमेरिका आज भी आधुनिक होते हुए गर्भपात पर नाकभौं चढ़ाता रहता है और वहां का शक्तिशाली चर्च प्रोलाइफ यानी गर्भ के बच्चे के जीवन के हक की बात जोरशोर से सड़कों, विधान सभाओं और अदालतों में करता रहता है.

गर्भ में जो है उस की मालकिन औरत और सिर्फ औरत है. उस गर्भ पर न तो धर्म, न समाज न सरकार और न ही उस पुरुष की जिस की वजह से गर्भ हुआ, कोई हक है. यह फैसला उस औरत का अपना है चाहे जो भी जोखिम हो. गर्भ में पल रहे भू्रण का कानूनी दर्जा क्या है या लिंग क्या है, यह जानने का भी उसे ही हक है और जब तक वह खुली हवा में सांस नहीं ले लेता उस औरत की संपत्ति है, उस युवती का फैसला है.

सुप्रीम कोर्ट के पास तो अवसर था कि बजाय डाक्टरों का पैनल बनवाने के वह आदेश देती कि हर मामले में फैसला केवल औरत और उस के डाक्टरों का होगा और डाक्टर अपनी सुविधा के लिए अल्ट्रासाउंड मशीनें लगाएं या सक्शन मशीन, यह उन की अपनी मरजी है. डाक्टर को गलती के लिए दोषी ठहराया जा सकता है, गर्भपात करने या गर्भ में भू्रण के लिंग को पहचानने के लिए नहीं. औरतों ने नाहक ही धर्म या मानवता की आड़ में अपने हक कमजोर कराए हैं.

आईफोन 7 का इंतजार अब होगा खत्म

कई महीनों तक चले अटकलों के दौर के बाद ऐप्पल ने आखिरकार अपना नया आईफोन लाने का ऐलान कर दिया है. कंपनी ने 7 सितंबर के एक इवेंट के इनवाइट भेजे हैं, जिसमें आईफोन 7 से पर्दा उठाएगा जाएगा. इस इवेंट में नई ऐप्पल वॉच भी लॉन्च की जा सकती है.

इनवाइट में लिखा है, 'आपसे 7 तारीख को मिलते हैं. कृपया 7 सितंबर, बुधवार सुबह 10 बजे सैन फ्रैंसिस्को के बिल ग्राहम सिविक ऑडिटोरियम में इन्विटेशन-ओनली इवेंट में शिरकत करें.' इस इनवाइट में ब्लैक बैकग्राउंड में ऐप्पल का लोगो बनाया गया है.

जैसा कि इस इनवाइट से साफ है, यह इवेंट बिल ग्राहम सिविक ऑडिटोरियम में होगा. इसी जगह से ऐप्पल अपने महत्वपूर्ण प्रॉडक्ट्स को लॉन्च करता रहा है. कंपनी ने यहीं पर अपनी इस साल की वर्ल्ड वाइड डिवेलपर्स कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की थी, जिसमें उसने अपने ऑपरेटिंग सिस्टम iOS 10, macOS Sierra और watchOS2 लॉन्च किए थे.

अब तक आईफोन 7 को लेकर कई लीक्स सामने आ चुके हैं. कयास लग रहे हैं कि इसमें 3.5mm जैक नहीं होगा और लाइटनिंग कनेक्टर के जरिए ऑडियो आउटपुट मिलेगी. माना जा रहा है कि इससे अगला आईफोन और पतला हो सकता है.

चुनाव और अपने ब्रांड की मार्केटिंग

कांग्रेस मुक्त भारत के बयान से भाजपा पलट गयी है. वजह है, और दोनों ही वजह जायज हैं. सोनिया गांधी का रोड-शो सफल रहा. उम्मीद से ज्यादा सफल रहा. और राज्य सभा ने जीएसटी विधेयक को पारित कर दिया, जहां कांग्रेस के बिना संविधान में संशोधन का प्रस्ताव पारित नहीं हो सकता था.

भाजपा ने किस पर इनायत की और किस पर रहम किया? यह बाद में समझ में आयेगा. आयेगा जरूर. यदि मैडम गांधी बनारस में बीमार पड़ने के बजाये कुछ बोल पातीं तो अच्छा होता.

2 अगस्त 2016 का ‘रोड-शो‘ बनारस में अब तक का सबसे बड़ा और सबसे सफल रोड-शो नजर आया. कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी छा गईं. नरेन्द्र मोदी का रचा हुआ मोहजाल अब इकलौता नहीं है. 32 साल बाद सत्ता में वापस होने की उम्मीदों ने कांग्रेसियों को एकजुट किया या नहीं? लेकिन संघ और भजपा के आक्रामक तेवर ने दलितों एवं अल्पसंख्यकों में जितनी असुरक्षा की भावना भर दी है, उसकी वजह से कांग्रेस उन्हें भाजपा से बेहतर नजर आने लगी है. वैसे अपने संसदीय क्षेत्र में मोदी जी ने इतना फेंका है, कि लोगों ने लपेटना ही बंद कर दिया. अब चारों ओर योजनाओं और वायदों के मोदी छाप धागे बिखरे पड़े हैं.

वैसे पतंग अभी कटी नहीं है, ना ही भरम पूरी तरह टूटा है, धर्म एवं जातीय समीकरण के आधार पर भाजपा का वोट बैंक अभी है, लेकिन ‘265 प्लस‘ और सरकार बनाने का सवाल है. सपा अंधेरे में है, और बसपा अपने खिसकते आधार को बचाने में है. परिदृश्य यही है, और गलत मुद्दे उछल रहे हैं. दीवारों पर लिखे भाजपा के नारे मुंह चिढ़ा रहे हैं. अभद्र और गलत बयानी प्रदर्शन, दबिश, हिरासत और अदालतों का चक्कर लगा रहे हैं. किसी को खास अफसोस नहीं है, ना ही लिहाज या खयाल है. वाम और वैकल्पिक मोर्चे का पता-ठिकाना नहीं है.

‘मिशन 2017‘ उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव, भाजपा का बहुप्रचारित मिशन है, जिस पर 2014-15 से ही काम चल रहा है. भाजपा के तेवर और तैयारियां दोनों ही आक्रामक हैं, कुछ ऐसा कि ‘जीत तो हमारी ही होगी‘, सपा के सिर पर ठीकरा फोडेंगे, बसपा का जनाधार खिसकेगा और कांग्रेस को उसने दौड़ से बाहर मान लिया था. बिहार की मात का असर नहीं होगा. धर्म, सम्प्रदाय और जाति का मुद्दा है ही. हवा देना है, तो मीडिया जेब में है. मोदी का क्रेज बरकरार रहेगा.

मिशन-2017 भाजपा के लिये चाहे जो महत्व रखता हो, लेकिन उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की वापसी हो रही है. 2014 के लोकसभा चुनाव में, जिस प्रशांत किशोर ने नरेंद्र मोदी को पीएम मोदी बनाया, उसी प्रशांत किशोर ने 2017 में कांग्रेस के रणनीतिकार की भूमिका संभाल ली है. आगाज देख कर कहा जा सकता है, कि भारतीय चुनावी समर में उनके टक्कर का रणनीतिकार कोई नहीं है. भाजपा के खिलाफ बिहार चुनाव में उन्होंने लालू-नीतीश की जीत को सुनिश्चित किया. धंधा चल पड़ा है. चुनाव अपने ब्राण्ड की मार्केटिंग है. खुले तौर पर अपने ब्राण्ड के लिये बाजार में जगह बनाना है.

भाजपा बड़ी मुश्किल से सरकार बनी है, इसलिये चाहती है, कि राजनीति के बाजार में उनके अलावा कोई न बचे. मोनोपोली का व्यापार ही उसे सुरक्षित लग रहा है. सोच फासिस्ट है इसलिये रवैया भी गैर लोकतांत्रिक होता जा रहा है. लोकतांत्रिक तहजीब भाजपा की विवशता है. ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ के सपने को गहरा झटका लगा है. यह पक्षाघात है? दिल का दौरा है? या कुछ और है? संघ और भाजपा के नामी-गिरामी चिंतकों, नीति निर्धारकों और मोदी-शाह की जोड़ी को तय करने दें. बाहरहाल कांग्रेस के 9 घंटे का बनारस रोड-शो भले ही 8 घंटा चला, कांग्रेस अध्यक्ष बीमार हो गयी, मगर कांग्रेस फायदा बटोर रही है. कांग्रेस के मरियल दावे में दम आ गया है. यह मानी हुई बात है, कि यदि कांग्रेस के दावे में दम आता है, अल्पसंख्यकों और दलितों के वोटों का प्रोलाईजेशन होता है, तो सपा और बसपा को ही नहीं भाजपा को भी भारी नुकसान होगा. वैसे इतना तय है, कि लोकसभा चुनाव में जो करिश्मा भाजपा दिखा चुकी है, उसे दोहराना अब संभव नहीं है.

यदि भाजपा यह समझ गयी कि भारतीय लोकतंत्र में ‘कांग्रेस मुक्त भारत‘ का खयाल खयाली पुलाव है, तो वह यह भी समझ जायेगी कि आने वाला कल चुनाव के नाम पर दो दलों का खेल और खिलवाड़ है. इसलिये भाजपा है, तो कांग्रेस जरूरी है, और कांग्रेस है, तो भाजपा जरूरी है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो वह विकल्प उभर आयेगा, जिसे न भाजपा पसंद करती है, ना ही कांग्रेस को खास पसंद है. जिसके उभरने की संभावनायें भारतीय राजनीति में अभी कम हैं. चुनाव में अपने ब्राण्ड की मार्केटिंग राजनीति का व्यावसायिकरण है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें