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निंबोली से रोजगार

हरेभरे नीम के पेड़ गांवदेहात से ले कर शहरों के गलीमहल्ले और बड़ी सड़क के किनारे से ले कर हर जगह देखने को मिल जाते?हैं. शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो नीम के पेड़ के बारे में न जानता हो. नीम के पेड़ की हर चीज फायदेमंद होती?है, चाहे वह पत्ती हो, छाल हो या फल निंबोली. नीम की इसी निंबोली को रोजगार का जरीया बनाया गुजरी, मध्य प्रदेश के किसान अभिषेक गर्ग ने. उन्होंने हजारों आदिवासियों को रोजगार भी दिया. गुजरी में उन्होंने नीम का तेल निकालने और खली पाउडर बनाने का प्लांट भी लगाया. ये दोनों ही उत्पाद जैविक खेती में कीटनाशक और पोषक तत्त्वों के रूप में काम आ रहे?हैं.

अभिषेक गर्ग ने बताया, ‘‘जब मैं ने इस काम की शुरुआत की थी, तो उस समय पूरी दुनिया की नजर भारत के नीम, बासमती चावल व हलदी पर लगी हुई?थी. हमारे क्षेत्र को निमाड़ क्षेत्र कहा जाता?है. निमाड़ का मतलब होता?है नीम की आड़. उस समय कृषि विशेषज्ञ डा. गुरपाल सिंह जरयाल ने मेरा ध्यान नीम की ओर दिलाया. जो निंबोली उस समय पानी में ऐसे ही बही जा रही थी, उसी निंबोली को इकट्ठा करने के लिए मैं ने अपने आसपास के क्षेत्रों के लोगों को जोड़ना शुरू किया. गांवों में जा कर लोगों से मिल कर उन्हें निंबोली इकट्ठा करने के लिए जागरूक किया, जिस का मुझे अच्छा परिणाम मिला.

‘‘आज मैं इन्हीं लोगों के जरीए गांवों से हर साल औसतन 1 हजार टन निंबोली इकट्ठा करता हूं. इस से आदिवासियों को तो काम मिला ही, स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला,

‘‘कृषि विशेषज्ञ डा. गुरपाल सिंह जरियाल और कृषक राम पाटीवार की मदद से साल 2010 में गुजरी गांव में ही निंबोली से तेल बनाने का प्लांट लगाया. आज हमें हर साल 1 हजार टन निंबोली मिल रही?है. इस से 10 हजार लीटर तेल तैयार हो रहा है और 5 हजार किलोग्राम खली पाउडर तैयार हो रहा?है.’’

कैसे बनाते हैं तेल

अभिषेक गर्ग बताते?हैं कि आदिवासियों से खरीद कर पकी निंबोली को पहले अच्छी तरह सुखाया जाता?है, ताकि उस में से पानी निकल सके. बाद में उस का छिलका और डंठल अलग किए जाते?हैं, फिर बीज को मशीन में डाला जाता है. तेल निकलने के बाद बची खली को सुखा कर उस का पाउडर तैयार किया जाता?है.

खली पाउडर का इस्तेमाल

रासायनिक उर्वरकों से खराब होती जा रही खेती की जमीन को बचाने के लिए आजकल जैविक खेती का प्रचलन तेजी से बढ़ता जा रहा है. जैविक खेती में ही निंबोली का तेल और खली दोनों का बहुतायत से इस्तेमाल हो रहा है. निंबोली का तेल कीटनाशक का काम भी करता?है और खली में खेती की जमीन के लिए जरूरी 16 पोषक तत्त्वों से ज्यादा तत्त्व होते?हैं. खली का पाउडर बना कर खेत में बिखेरा जाता है. 1 हेक्टेयर जमीन में 5 क्विंटल नीम खली पाउडर का इस्तेमाल होता है और कीटनाशक के तौर पर 3 लीटर नीम तेल में काम हो जाता है.

उपज व उत्पादन

आमतौर पर नीम का पेड़ 5-6 साल का होने के बाद ही फल देता है. औसतन एक पेड़ से 30-50 किलोग्राम निंबोली और 350 किलोग्राम पत्तियां हर साल मिल जाती?हैं. नीम का एक पेड़ तकरीबन 100 सालों तक फल देता है.

30 किलोग्राम निंबोली से 6 किलोग्राम नीम का तेल और 24 किलोग्राम खली आसानी से मिल जाती है. तेल निकालने के बाद बची खली बहुत ही असरदार कीटनाशक व खाद का काम करती?है.

कैसे करें इकट्ठा

जब निंबोली जम कर पीली होने लगे तो समझ जाना चाहिए कि अब आप इन्हें इकट्ठा कर सकते?हैं. निंबोली चूकि एकसाथ न पक कर धीरेधीरे महीनों तक पकती रहती है और पक कर अपनेआप गिरती रहती?है, इसलिए पेड़ के नीचे झाड़ू लगा कर साफसफाई रखें, जिस से निंबोली इकट्ठा करते समय जगह साफसुथरी हो. पेड़ की टहनियों को हिला कर भी निंबोली इकट्ठी की जा सकती?हैं. बांस आदि के डंडे से टहनियों को हिलाया जा सकता?है. निंबोली को 2-3 दिनों तक खुली हवा में छोड़ देना चाहिए, जिस से उन का गूदा मुलायम हो जाए.

अभिषेक गर्ग ने आगे बताया, ‘‘मैं तो मूल रूप से किसान हूं. मैं यह चाहता था कि बेकार जाने वाली निंबोली का इस्तेमाल कैसे हो और इस से लोगों को रोजगार भी मिले. मुझे इस काम में सफलता मिली और अब तो देशभर के कई लोग मुझ से इस काम की जानकारी लेने के लिए संपर्क भी कर रहे?हैं.

‘‘आज हम ने ‘श्री राम एग्रो प्रोडक्ट’ के नाम से नीम की इकाई भी लगा रखी है, जिस में नीम से बनने वाले जैविक और प्राकृतिक कृषि उत्पादों को बनाया जा रहा है.’’ निंबोली के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए आप अभिषेक गर्ग से उन के मोबाइल नंबर 09993441010 पर संपर्क कर सकते हैं.

देशी नस्ल की गायों का बढ़ेगा वजूद

भारत दूध के उत्पादन के मामले में हमेशा आगे रहा है, मगर उस की देशी गायों को मामलू ही माना जाता रहा है. जर्सी जैसी विदेशी गायों की बहुत ज्यादा दूध देने की कूवत के मुकाबले भारतीय गायें कहीं नहीं टिक पाती थीं, मगर अब हालात बदल रहे हैं. ग्लोबल वार्मिंग के खतरे ने दुनिया को हिला कर रख दिया है और तमाम मामले गड़बड़ा गए हैं. रोजाना इस्तेमाल किया जाने वाला दूध भी एक खास मुद्दा है. माहिरों का मानना है कि जलवायु में होने वाले बदलाव से दूध के उत्पादन में भारी कमी आएगी. वैज्ञानिकों का कहना है  दूध के उत्पादन में कमी होने के खतरे से गायों की देशी नस्लें ही बचा पाएंगी.

करनाल के ‘राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान’ (एनडीआरआई) में अब तक हुए कई शोधों के बाद यह नतीजा सामने आया है. पिछले 5 सालों से ‘नेशनल इनोवेशंस इन क्लाइमेट रेसीलिएंट एग्रीकल्चर’ (एनआईसीआरए) प्रोजेक्ट के तहत चल रहे शोध का नतीजा भी यही है कि ग्लोबल वार्मिंग के खतरे से देशी नस्ल की गायें ही बचा सकती हैं. शोध से यह बात सामने आई है कि विदेशी और संकर नस्ल के दुधारू पशुओं की तुलना में देशी गायों में ज्यादा तापमान झेलने की कूवत होती है, लिहाजा जलवायु में होने वाले बदलावों से वे कम प्रभावित होती हैं. दरअसल देशी गायों की खाल यानी चमड़ी गरमी सोखने में मददगार होती है. देशी गायों में कुछ ऐसे जीन भी पाए गए हैं, जो गरमी सहने की कूवत में इजाफा करते हैं.

एनडीआरआई के वैज्ञानिकों का कहना है कि गरमी और सर्दी में अधिकतम और न्यूनतम तापमान में जरा से फर्क का असर पशुओं के दूध देने की कूवत पर पड़ता है. तमाम खोजों से मालूम हुआ है कि गरमी में 40 डिगरी से ज्यादा और सर्दी में 20 डिगरी से कम तापमान होने पर दूध के उत्पादन में 30 फीसदी तक की कमी आ जाती है.

खोजों के मुताबिक तापमान ज्यादा होने से संकर नस्ल की गायों के दूध में 15-20 फीसदी तक की कमी हो सकती है, मगर देशी नस्ल की गायों पर ज्यादा तापमान का खास असर नहीं पड़ता है. यह खोज भारतीय यानी देशी नस्ल की गायों के लिहाज से अच्छी कही जा सकती है. देशी गायों को पालने वाले इस बात पर खुश हो सकते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक तापमान में होने वाला इजाफा यदि लंबे अरसे तक कायम रहता है, तो पशुओं के दूध देने की कूवत के साथसाथ ??उन की प्रजनन कूवत पर भी खराब असर पड़ता है. एनडीआरआई के निदेशक डा. एके श्रीवास्तव के मुताबिक भारत में कुल दूध उत्पादन का 51 फीसदी भैंसों से, 20 फीसदी देशी नस्ल की गायों से और 25 फीसदी विदेशी नस्ल की गायों से मिलता है. लेकिन जलवायु में होने वाले बदलाव से इन आंकड़ों पर काफी फर्क पड़ेगा. यह बात दूध के कारोबारियों से ले कर वैज्ञानिकों तक के लिए चिंता का विषय है.

बरेली के ‘पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ (आईवीआरआई) के प्रधान वैज्ञानिक डा. ज्ञानेंद्र गौड़ का कहना है कि तापमान में इजाफा होने पर संकर नस्ल के पशु बहुत ज्यादा बीमार पड़ते हैं. बीमारी की वजह से वे चारा खाना काफी कम कर देते हैं, नतीजतन उन का शरीर काफी कमजोर हो जाता है. शरीर की कमजोरी की वजह से उन का दूध भी बहुत घट जाता है. डा. ज्ञानेंद्र गौड़ ने आगे बताया कि तापमान में होने वाले इजाफे से देशी नस्ल के पशुओं पर ज्यादा असर नहीं पड़ता. वे तापमान बढ़ने पर आमतौर पर बीमार नहीं पड़ते हैं, लिहाजा उन के दूध देने की कूवत पर भी कोई खास फर्क नहीं पड़ता है. बरेली के ‘पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ में फिलहाल 250 दूध देने वाले पशु मौजूद हैं, जो करीब 2700 लीटर दूध देते हैं. मगर तापमान में इजाफा होने से यह मात्रा घट कर 2200 लीटर तक पहुंच गई है. अपने पशुओं के दूध के आधार पर ही वैज्ञानिक नतीजे निकाल पाते हैं.

एक ही गोत्र में प्रजनन ठीक नहीं

वैज्ञानिकों ने शोधों से यह नतीजा निकाला है कि गायों की नस्लों के लिहाज से एक ही गोत्र में प्रजनन कराना ठीक नहीं है. उन का कहना है कि समगोत्र प्रजनन से पशु वंशानुगत रूप से अप्रभावी हो जाते हैं.

जालंधर की ‘दिव्य ज्योति जागृति संस्थान नूरमहल’ ने गायों की गायब हो रही देशी नस्लों के सुधार के लिए कामधेनु मुहिम चला रखी है. वहां साहिवाल, थारपारकर, हरियाणा, कांक्रेज व गिर नस्ल की गायों को बचाने के लिए सगोत्र आंतरिक प्रजनन से परहेज बरता जाता है. संस्थान से जुड़े स्वामी चिन्मयानंद और स्वामी विशालानंद ने गायों के मूत्र और गोबर की अहमियत बताते हुए कहा कि 1 गाय से 30 एकड़ जमीन पर खेती की जा सकती है. नूरमहल में फिलहाल 700 साहिवाल गायें मौजूद हैं. संस्थान की दिल्ली शाखा में भी 250 गायें हैं. संस्थान ने साहिवाल गाय से 25 लीटर तक दूध निकालने में कामयाबी पाई है. वैसे देशी नस्ल की गिर गाय ने कुछ साल पहले ब्राजील में 62 लीटर दूध देने का रिकार्ड कायम किया था.

यों तो आगामी 5 सालों में दूध उत्पादन में 30 लाख टन की गिरावट का अंदाजा लगाया जा रहा है, मगर देशी नस्ल की गायों की खूबी पर फख्र किया जा सकता है. भारत में भैंसों की 13 और गायों की 39 प्रजातियां मौजूद हैं. हालात के मुताबिक देशी गायों का वजूद दिनबदिन बढ़ता जाएगा. यह देशी नस्ल की गायें पालने वालों के लिए खुशी की बात है. ठ्ठ

कपास के खास रोग और उन का इलाज

भारत में कपास के 25 से भी ज्यादा रोग अलगअलग कपास उगाने वाले राज्यों में पाए जाते?हैं. इन रोगों में खास हैं छोटी अवस्था में पौधों का मरना, जड़गलन, उकठा रोग और मूलग्रंथि सूत्रकृमि रोग.

पौध का मरना : जमीन में रहने वाली फफूंदों जैसे राईजोक्टोनिया, राइजोपस, ग्लोमेरेला व जीवाणु जेनथोमोनास के प्रकोप से कपास के बीज उगते ही नहीं हैं. अगर उग भी जाते?हैं, तो जमीन के बाहर निकलने के बाद छोटी अवस्था में ही मर जाते हैं, जिस से खेतों में पौधों की संख्या घट जाती है व कपास के उत्पादन में कमी आ जाती है.

रोकथाम

* अच्छे किस्म के बीज का इस्तेमाल करना चाहिए.

* बोआई से पहले फफूंदनाशी, थिराम, विटाबेक्स, कार्बंडाजिम व एंटीबायोटिक्स स्ट्रेप्टोसाइक्लिन से बीजों का उपचार करना चाहिए.

जड़गलन : यह रोग देशी कपास का भयंकर रोग है. आमतौर पर इस बीमारी से 2-3 फीसदी नुकसान हर साल होता है. यह रोग जमीन में रहने वाली राइजोक्टोनिया सोलेनाई व राइजोक्टोनिया बटाटीकोला नामक फफूंद से होता है. रोग लगे पौधे एकदम से सूखने लगते हैं और मर जाते?हैं. बीमार पौधों को आसानी से उखाड़ा जा सकता है. जड़ सड़ने लगती है व छाल फट जाती है. बुरी तरह से रोग लगे पौधे की जड़ अंदर से भूरी व काली हो जाती है. हवा में और जमीन में ज्यादा नमी व गरमी रहने से व सिंचाई से सही नमी का वातावरण मिलने पर बीमारी का असर बढ़ता है. बीमारी आमतौर पर पहली सिंचाई के बाद पौधों की 35 से 45 दिनों की उम्र में दिखना शुरू हो जाती है.

रोकथाम

* मई के पहले पखवाड़े में बोआई से बीमारी कम होती है. ज्योंज्यों पछेती बोआई करते?हैं, बीमारी बढ़ती है.

* बीजोपचार कार्बंडाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करना चाहिए.

* कपास और मोठ की मिलीजुली खेती से बीमारी का असर कम होता है.

* बीजोपचार बायोएजेंट ट्राइकोडर्मा

4 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से करने से रोग का असर कम होता?है.

* मिट्टी का उपचार जिंकसल्फेट

24 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से करने

से बीमारी में कमी आती?है.

* देसी कपास की आरजी 18 और सीए 9, 10 किस्मों में यह रोग कम लगता?है.

* ट्राइकोडर्मा विरिडी मित्र फफूंद 2.5 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर गोबर की खाद में मिला कर बोआई से पहले जमीन में देने से रोग में कमी आती?है.

उकठा : यह रोग भारत के मध्य पश्चिम इलाकों में पाया जाता?है. मध्य प्रदेश, कर्नाटक व दक्षिण गुजरात के काली मिट्टी वाले इलाकों में यह रोग बहुत होता है. रोग लगे पौधे छोटी अवस्था में मर जाते?हैं या छोटे रह जाते हैं. फूल छोटे लगते हैं व उन का रेशा कच्चा होता है. राजस्थान में देसी कपास में यह बीमारी श्रीगंगानगर व मेवाड़ कपास क्षेत्रों में

ज्यादा होती?है. यह रोग फ्यूजेरियम आक्सीस्योरम वाइन्फेटस नामक फफूंद से होता?है. रोगी पौधे को चीर कर देखने पर ऊतक काले दिखाई देते हैं.

रोकथाम

* जिन इलाकों में यह रोग होता है वहां गोसिपियम आरबोरियम की जगह पर गोसिपियम हिरसुटम कपास उगाएं.

* जड़ गलन की रोकथाम के लिए बीजोपचार कार्बंडाजिम से व भूमि उपचार जिंकसल्फेट से करना चाहिए. इस से यह रोग कम होता?है.

मूलग्रंथि रोग : यह रोग मिलाईरोगायनी नामक सूत्रकृमि के पौधों की जड़ों पर आक्रमण करने से पैदा होता है. इस रोग के कारण कपास की जड़ों की बढ़वार रुक जाती है व छोटीछोटी गांठें दिखाई देने लगती हैं. इस वजह से पौधा जमीन से पानी व दूसरे रासायनिक तत्त्वों का इस्तेमाल ठीक तरह से नहीं कर पाता है. पौधा छोटा रह जाता?है और पीला पड़ कर व सूख कर मर जाता है.

रोकथाम

* जिन खेतों में सूत्रकृमि का असर देखने को मिले उन में दोबारा कपास न बोएं.

* गरमी के मौसम में खेत में गहरी जुताई करें व खेतों को गहरी धूप में तपाएं, ताकि सूत्रकृमि मर जाएं.

* फसलचक्र में ज्वार, घासे, रीज्का की बोआई करें.

* बोआई से पहले रोग लगे खेतों का कार्बोफ्यूरान 3 जी से 45 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपचार करें.

कपास की पत्तियों पर

लगने वाले रोग

कपास की फसल में फफूंद, जीवाणु व वायरस के असर से पत्तियों पर कई बीमारियां लग जाती?हैं.

इन रोगों की वजह से पौधों की पत्तियां भोजन ठीक तरह से नहीं बना पातीं. कपास के डोडे सड़ जाते हैं, फल कम बनते?हैं व कपास के रेशे की किस्म अच्छी नहीं रहती है. पत्तियों की मुख्य बीमारियां हैं शाकाणु झुलसा, पत्तीधब्बा व लीफ कर्ल.

शाकाणु झुलसा : कपास का यह भयंकर रोग जेंथोमोनास एक्सोनोपोडिस मालवेसिएरम जीवाणु बैक्टीरिया द्वारा होता?है. यह पौधों के सब हिस्सों में लग सकता?है. इस रोग को कई नामों से जाना जाता है. रोग लगने पर बीज पत्तों पर गहरे हरे रंग के पारदर्शक धब्बे दिखाई देते?हैं.

ये शाकाणु धीरेधीरे नई पत्तियों की ओर फैलते?हैं और पौधा किशोरावस्था में ही मुरझा कर मर जाता?है. इस को सीडलिंग ब्लाइट

कहते?हैं. जब फसल करीब 6 हफ्ते की हो जाती है, तो पत्तियों पर छोटेछोटे पानी के धब्बे

बनने लगते हैं. ये धीरेधीरे बड़े हो कर कोणीय आकार लेने लगते?हैं. इसीलिए इसे कोणीय

पत्ती धब्बा रोग या एंगुलर लीफ स्पौट

कहते?हैं.

पत्तियों की नसों में भी यह रोग फैल जाता  है व उन के सहारे बढ़ता रहता?है. इसे बेनबलाइट कहते?हैं. रोग का जोर ज्यादा होने पर पत्तियां सूख कर गिरने लगती?हैं. जब रोग तने और शाखाओं पर आक्रमण करता है, तो काला कर देता?है.

रोगी भाग हवा चलने पर?टूट जाता है. डोडियों पर भी रोग का हमला हो सकता है. डोडियों पर नुकीले और तिकोने धब्बे हो जाते?हैं. धब्बों से सड़ा हुआ पानी सा निकलता?है. ज्यादा धब्बे होने पर रेशे की किस्म पर भी असर पड़ता?है.

* अमेरिकन कपास की बोआई 1 मई से 20 मई के बीच करनी चाहिए.

* कपास के बीजों को 8 से 10 घंटे तक स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या प्लांटोमाइसीन 100 पीपीएम घोल में डुबो कर उपचारित करना चाहिए. यदि डिलिटेंड बीज है, तो उसे केवल 2 घंटे ही भिगोना चाहिए.

* फसल पर रोग के लक्षण दिखाई देते ही स्ट्रेप्टोसाइक्लिन या प्लांटोमाइसीन 50 पीपीएम और कापरआक्सीक्लोराइड 0.3 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए. इसे 15 दिनों पर दोहराना चाहिए.

पत्ती धब्बा रोग : यह रोग कपास में आल्टरनेरिया, मायरोथिसियम, सरकोस्पोरा, हेल्मिन्थोस्पोरियम नामक फफूंदों से होता?है. रोग के लक्षण पत्तों पर धब्बों के रूप में दिखाई देते?हैं. धीरेधीरे धब्बे बड़े होने से पत्ती का पूरा भाग रोग ग्रसित हो जाता?है. नतीजतन कपास की पत्तियां गिरने लगती?हैं व उपज में कमी आ जाती है.

रोकथाम : बीज को बोने से पहले बीजोपचार करना चाहिए व फसल पर रोग के लक्षण दिखाई पड़ते ही कौपरआक्सीक्लोराइड या मेंकोजेब 0.2 फीसदी घोल का छिड़काव करना चाहिए.

पत्ती मुड़न लीफ कर्ल : कपास का पत्ती मुड़न रोग सब से पहले 1993 में श्रीगंगानगर में किसानों के खेतों में देखा गया था. अब यह रोग काफी फैल गया?है. कपास का लीफ कर्ल रोग जैमिनी वायरस से होता है व सफेद मक्खी से फैलता?है.

यह रोग बीज व भूमि जनित नहीं?है. रोग के लक्षण कपास की ऊपरी कोमल पत्तियों पर दिखाई पड़ते हैं. पत्तियों की नसें मोटी हो जाती हैं, तो पत्तियां ऊपर की तरफ या नीचे की तरफ मुड़ जाती हैं. पत्तियों के नीचे मुख्य नसों पर छोटीछोटी पत्तियों के आकार दिखाई पड़ते हैं. रोगी पौधों की बढ़वार रुक जाती है, कलियां

व डोडे झड़ने लगते हैं और उपज में कमी आ जाती हैं.

रोकथाम

* रोगरोधी किस्में आरएस 875, एलआर 2013, ए 5188, शंकर जीके 151, एलएचएच 144, आरजी 8, आरजी 18 की बोआई करनी चाहिए.

* खेतों से पीलीभुटी, भिंडी, होलीहाक व जीनिया वगैरह पौधे और खरपतवार निकाल देने चाहिए.

* रोग ग्रसित पौधों में रोग के लक्षण नजर आते ही उन्हें नष्ट कर देना चाहिए.

* समय पर सिस्टेमिक कीटनाशी से वायरस फैलाने वाले कीटों को नष्ट करना चाहिए ताकि रोग आगे नहीं फैल सके.

कुछ कहती हैं तसवीरें

खूबसूरत कछुआ चाल : आबोहवा बचाने में जितनी अहमियत पेड़ों की है, उतनी ही पानी और उस में रहने वाले जीवजंतुओं की भी है. अमेरिका के फ्लोरिडा के समुद्री तट पर जब समुद्री कछुओं को पानी में छोड़ा गया, तो वहां आए सैलानियों ने उन की तसवीरें खींच कर उस पल को यादगार बना दिया.

 

 

उपेक्षा से बेहाल गन्ना किसान

उत्तर प्रदेश का शामली जिला गन्ने की खेती के लिए पूरे देश में जाना जाता है. अपनी जमापूंजी लगा कर गन्ना पैदा करने वाले किसान जब मिलों में गन्ने को बेचने जाते हैं तो उन्हें समय पर भुगतान नहीं मिलता. आज किसान करोड़ों के भुगतान के लिए तरस रहे हैं. चीनी मिलें उन के करीब 300 करोड़ रुपए दबाए बैठी हैं. इसी जिले के कैराना में पलायन के मामले में एक तरफ जहां राजनीति गरमाई हुई है, वहीं किसानों की समस्या को सुनने वाला कोई नहीं है. किसान हताशा और परेशानी के शिकार हो रहे हैं.

गन्ना बैल्ट के लिए मशहूर शामली की कमाई गन्ने पर टिकी है. जनपद का कुल कृषि रकबा 1,60,997 हेक्टेयर है. 58000 हेक्टेयर रकबे में गन्ना उपजाया जाता है. इस के अलावा 19075 हेक्टेयर में धान, जबकि 49606 हेक्टेयर रकबे में गेहूं की खेती होती है.

गन्ना उत्पादन के मामले में पश्चिमी यूपी में शामली भले ही सब से आगे हो, लेकिन इस के बावजूद पिछले 3 साल में गन्ना किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. किसान पूरे साल मेहनत करता है. खास बात यह भी है कि प्रदेश में शामली जिला 2 साल से गन्ने के उत्पादन के मामले में पहले नंबर पर है. पूरे प्रदेश का औसत उत्पादन 665 क्विंटल प्रति हेक्टेयर का है, वहीं अकेले शामली जिले का औसत उत्पादन 807.76 क्विंटल प्रति हेक्टयेर रहा है. जिले में छोटीबड़ी जोत वाले करीब 76 हजार 500 किसान हैं. आगे होने के बावजूद गन्ना भुगतान के मामले में पिछड़े हैं. शामली की 3 चीनी मिलों पर किसानों का 297 करोड़ 13 लाख रुपए बकाया है.

सभी को इंतजार है कि कब गन्ना मिलें उन के गन्ने की कीमत चुकाएंगी. मिलों द्वारा भुगतान न किए जाने से इस का असर जिले की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है. आर्थिक तंगी ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी है.  किसान कर्जदार और ब्लडप्रेशर व शुगर जैसी बीमारियों के शिकार हो रहे हैं. इस का असर बाजारों पर भी है. पहले जहां दुकानों पर 15 से 20 हजार रुपए की बिक्री होती थी, अब 3 से 4 हजार रह गई  है. वेदपाल दुकानदार बताते हैं कि किसान आ कर भी क्या करें जब उन के पास पैसा ही नहीं है. तकाजे से भी वे बच रहे हैं. व्यापारी नेता घनश्यामदास गर्ग कहते हैं कि दुकानदारी  मंदी पड़ी है, लेकिन दुकानदार किसानों के दर्द को समझते हैं. सब से अच्छी बात तो यह है कि किसान ईमानदार हैं. जब उन के पास पैसा होगा, तो वे दुकानदारों का पैसा लौटा देंगे. इसी नाते उन को उधार सामान दे दिया जाता है.

जिले के सैकड़ों किसान हैं, जिन्होंने जीतोड़ मेहनत  से अपने खेतों में गन्ना उगाया. उन का गन्ना खेत से चीनी मिलों तक तो गया, लेकिन भुगतान आज तक नहीं मिला. इस के चक्कर में न वे कर्ज चुका पा रहे हैं, न ही परिवार चला पा रहे हैं. यही तकलीफ ज्यादातर किसानों के तनाव की वजह बनती जा रही है. बैंकों का कर्ज भी बढ़ता जा रहा है. 31 मार्च 2016 तक कुल 24 बैंकों का 2 हजार 2 सौ 24 करोड़ का कर्ज लोगों पर है, जिस में करीब 17 करोड़ रुपए का कर्ज केवल किसानों पर ही है. बैंक कर्ज वसूल नहीं पा रहे हैं और परेशान हैं, तो किसान चीनी मिलों के भुगतान को ले कर परेशान हैं.  इस के अलावा बैंकों से किसानों ने क्रेडिट कार्ड बनवाए हुए हैं, उन का ब्याज भी उन्हें देना पड़ेगा. यह बात अलग है कि गन्ना मिलों से उन के पैसे का कोई ब्याज नहीं मिलेगा.

किसान जगमेर सिंह के पास 300 बीघे जमीन है. जमीन पर उन्होंने 1 हजार 789 क्विंटल गन्ने का उत्पादन कर के पूरे प्रदेश में रिकार्ड बनाया, उस के लिए उन्हें 50 हजार रुपए का इनाम तो मिला, लेकिन गन्ने का भुगतान अभी तक नहीं मिल सकता है. उन्होंने करीब 22 लाख रुपए का गन्ना बेचा, लेकिन मिले केवल 5 लाख रुपए. किसान का बेटा किसान ही बने इस पर वे सोचने के लिए मजबूर हो रहे हैं. हालात को देख कर वे अपने बच्चों को खेती करने के बजाय पढ़लिख कर कामयाब होने की सलाह देते हैं.

जगमेर सिंह ऐसा सोच सकते हैं, लेकिन ऐसे किसान परिवार भी हैं जो इस बारे में नहीं सोच सकते. पैसे की तंगी का असर सीधे उन के बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है. जिले में करीब 20 पब्लिक स्कूल हैं, जिन में पढ़ने वाले 15 फीसदी बच्चे किसान परिवारों से हैं. कर्ज के बोझ तले दबे किसानों के लिए बच्चों को पढ़ाना मुश्किल हो गया है. कई किसानों ने कर्ज ले कर बच्चों का दाखिला स्कूलों में कराया है. कई किसान ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने बच्चों को पब्लिक स्कूलों से निकाल कर गांव के ही प्राइमरी स्कूलों में पढ़ाना शुरू कर दिया है.

सूर्यवीर सिंह बीएसएम स्कूल के चेयरमैन हैं. वे कहते हैं कि गन्ना किसानों के 10 से 15 फीसदी बच्चे पिछले कुछ सालों में स्कूल छोड़ चुके हैं. सूरजमल पब्लिक स्कूल के मैनेजर योगेंद्र मलिक बताते हैं कि वे किसानों की समस्या समझते हैं और जहां तक होता है उन की मदद भी करते हैं. उन का अभिभावकों पर करीब 26 लाख रुपए बकाया हैं. किसान यही कहते हैं कि गन्ने का भुगतान होने पर फीस चुका देंगे. ज्यादातर पब्लिक स्कूलों में यही हाल है.

हैरान करने की बात यह भी है कि 3 सालों से गन्ने का भाव नहीं बढ़ा है. चीनी मिलों का अपना तर्क है. मिलों के अधिकारी कहते हैं कि मिलें चीनी की बिक्री के बाद ही किसानों को भुगतान कर पाएंगी, लेकिन यह भुगतान कब और कितने समय में होगा इस की कोई गारंटी नहीं लेता. हालांकि पिछले कुछ समय समय में किसानों को 2 किश्तों में भुगतान किया भी गया, लेकिन वह बहुत कम था.

यों तो किसानों के नाम पर दर्जनों संगठन हैं, लेकिन ठोस हल किसी के पास नहीं दिखता. भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं कि मिलों को गन्ना भुगतान तो करना ही होगा, वे रणनीति बना कर ठोस कदम उठाएंगे. किसान नेता सतपाल सिंह कहते हैं कि मिल प्रबंधकों से बात होती है, लेकिन वे वादों से मुकर जाते हैं.                   

उम्मीद से कायम है हौसला

किसानों के गन्ना मिलों पर भले ही करोड़ों रुपए बकाया हैं, लेकिन उन की उम्मीद और हौसला दोनों कायम हैं. मेहनतकश किसान गन्ने की रिकार्ड फसल पैदा करना चाहते हैं. नतीजन उन के खेतों में गन्ने की फसलें लहलहा रही हैं. पिछले साल के मुकाबले गन्ने का रकबा भी बढ़ गया है. पिछले साल जहां 48 हजार हेक्टेयर में गन्ना बोया गया था, वहीं इस बार 52 हजार हेक्टेयर से अधिक रकबे में गन्ना उगाया गया है. यानी गन्ने का रकबा 5.87 फीसदी बढ़ा है.

गन्ना विभाग के आंकड़ों पर गौर करें, तो पता चलता है कि शामली जिले के 292 गांवों में से 198 गांवों में सर्वेक्षण का काम अभी तक पूरा किया गया है. इन गांवों में हुए सर्वे की रिपोर्ट में पिछले साल के मुकाबले 5.87 फीसदी गन्ना रकबे में बढ़ोतरी हुई है. खास बात यह है कि गन्ने की फसल के लिए जिले की जमीन उपजाऊ होने के साथसाथ जलवायु भी माफिक है. इस के अलावा कम व अधिक बारिश झेलने की क्षमता है, तो रोग लगने की संभावना भी कम होती है. कई किसान ऐसे भी हैं, जिन्होंने कर्ज ले कर इस उम्मीद में गन्ने की फसल उगाई है कि उन्हें अच्छा भुगतान हो जाएगा. किसान कहते हैं कि चीनी मिलें समय से उन को गन्ने का भुगतान करती रहें, तो गन्ने का रकबा और बढ़ जाएगा.

लजीज मिठाई रामकटोरी

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले से हो कर नेपाल को जाने वाली सड़क पर पड़ने वाले बाजार बर्डपुर में एक दुकान पर हर रोज हजारों की भीड़ देखने को मिलती है. यह भीड़ वहां की लोकप्रिय मिठाई रामकटोरी के चाहने वालों की होती है. यह मिठाई शुद्ध देशी घी और मैदे से बनाई जाती है. बर्डपुर की यह मिठाई इतनी लोकप्रिय है कि इस की मांग अरब देशों तक में है. बर्डपुर से पलटा देवी मार्ग पर पड़ने वाली गायत्री स्वीट्स नाम की दुकान पर सिर्फ रामकटोरी मिठाई ही मिलती है. इस मिठाई को बनाने की शुरुआत इस के मालिक विनोद मोदनवाल ने 1991-92 में की थी. पहले वे खोए से तमाम तरह की मिठाइयां बनाते थे, लेकिन उन्होंने एक ऐसी मिठाई बनाने की सोची जो स्वाद से भरपूर और बेहद सस्ती हो. फिर उन्होंने मैदा, देशी घी, खोए और गरी के बुरादे से रामकटोरी नाम की मिठाई बनाने की शुरुआत की. यह मिठाई छोटी कटोरी के आकार की होती है, जिस में खोया भरा जाता है. सिद्धार्थनगर जिले में नेपाल बौर्डर से 15 किलोमीटर दूर बर्डपुर ब्लाक रामकटोरी के लिए मशहूर है. यह मिठाई शुद्ध देशी घी व खोए से बनी होने के बावजूद सिर्फ 140 रुपए प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकती है.

विनोद मोदनवाल का पूरा परिवार पिछले 25 सालों से रामकटोरी बनाने के कारोबार में लगा हुआ है. इस मिठाई को बनाने में विनोद मोदनवाल गुणवत्ता व स्वाद का पूरा खयाल रखते हैं, जिस की वजह से आसपास के जिलों के अलावा विदेशों में भी इस की मांग बनी हुई है.

बनाना है बेहद आसान :

1 किलोग्राम रामकटोरी मिठाई तैयार करने के लिए 100 ग्राम देशी घी, 700 ग्राम मैदा, 290 ग्राम खोया, इच्छानुसार गरी का बुरादा, चीनी व तलने के लिए घी की जरूरत पड़ती है. इस के लिए पहले मैदे को घी में खस्ता किया जाता है और जब मैदा पूरी तरह खस्ता हो जाता है, तो इसे गूंध कर उस की छोटीछोटी गोलियां बना कर उन्हें चपटा कर के कटोरी का आकार दिया जाता है. फिर इसे हलकी आंच पर सुनहरा होने तक देशी घी में तला जाता है. जब कटोरी का आकार एकदम सुनहरी हो जाए तो इसे पहले से तैयार की गई चीनी की चाशनी में 5 मिनट के लिए डुबो कर बाहर निकाला जाता है. कटोरी से जब चीनी की चाशनी सूख जाती है, तो गरी के बुरादे व खोए को इस की खाली जगह में भर कर इसे ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है और खोया भरने के 10 मिनट बाद यह मिठाई खाने के लिए तैयार हो जाती है.

विनोद मोदनवाल का कहना है कि 1 किलोग्राम रामकटोरी को तैयार करने में 110 रुपए से 120 रुपए की लागत आती है. लेकिन आम लोगों तक इस मिठाई को पहुंचाने के लिए बेहद कम मुनाफे पर सालों से इन का परिवार लगा हुआ है. इस मिठाई का स्वाद और गुणवत्ता ही इस की पहचान है. जिले में कई लोगों ने इस मिठाई की नकल कर के इसे बना कर बेचने की कोशिश की, लेकिन वे विनोद मोदनवाल की बराबरी नहीं कर सके.

एक बार राम कटोरी मिठाई को जो भी चख ले, वह इस का मुरीद हो जाता है. इस मिठाई के बारे में ज्यादा जानकारी के लिए गायत्री स्वीट्स के मालिक विनोद मोदनवाल के मोबाइल नंबर 9935326532 पर संपर्क किया जा सकता है.       

पेप्सिको ने धोनी से तोड़ा करार

बेवरेजेज और स्नैक्स की दिग्गज कंपनी पेप्सिको ने वनडे और टी20 क्रिकेट टीम के कैप्टन महेंद्र सिंह धोनी के साथ 11 साल पुराना करार खत्म कर दिया है. धोनी देश के सबसे ज्यादा फीस लेने वाले खिलाड़ी हैं. पेप्सिको के इस फैसले से संकेत मिल रहा है कि ऐडवर्टाइजर्स के बीच शायद धोनी की चमक फीकी पड़ गई है.

35 साल के क्रिकेटर पेप्सी कोला और लेज चिप्स के विज्ञापनों में नजर आते थे. पेप्सिको के साथ धोनी का करार 2005 में हुआ था. कंपनी के कुछ सबसे बड़े कैंपेन 'ओह यस अभी' और 'चेंज द गेम' में भी धोनी शामिल थे. पेप्सिको के वाइस प्रेजिडेंट (बेवरेजेज) विपुल प्रकाश ने इस खबर की पुष्टि की. उन्होंने कहा, 'पेप्सिको में ऐडवर्टाइजिंग और मार्केटिंग का फोकस हमारे प्रॉडक्ट्स को हीरो बनाना और हीरो को सेलिब्रेट करना है. अगर कोई सिलेब्रिटी हमारे प्रॉडक्ट्स को सेलिब्रेट करने के आइडिया को सूट करता है तो हमें उसे लेने में बहुत खुशी होगी.'

फोर्ब्स मैगजीन की 2016 की लिस्टिंग मुताबिक, एंडोर्समेंट के लिए 2.7 करोड़ डॉलर लेने वाले धोनी का नाम दुनिया में सबसे ज्यादा फीस वसूलने वाले ऐथलीट में शुमार है. फोर्ब्स के अनुमान के मुताबिक, धोनी की सैलरी और प्रफेशनल अर्निंग्स 40 लाख डॉलर और एंडोर्समेंट से उनकी कमाई 2.70 करोड़ डॉलर है.

इंडस्ट्री के एक एक्सपर्ट का कहना है कि इंडियन क्रिकेट के पोस्टर बॉय धोनी की चमक ऐडवर्टाइजर्स के बीच फीकी पड़ रही है. विराट कोहली के बारे में इंडस्ट्री की राय है कि प्रति दिन फीस के मामले में उन्होंने धोनी को पीछे छोड़ दिया है. माना जा रहा है कि जहां कोहली एक दिन के लिए 2 करोड़ रुपये चार्ज कर रहे हैं, वहीं धोनी को फिलहाल हर दिन के लिए 1.5 करोड़ रुपये मिल रहे हैं.

भ्रामक विज्ञापनों पर सेलिब्रिटी को हो सकती है जेल

भ्रामक विज्ञापन करने वाली हस्तियों यानी सेलिब्रिटी पर जवाबदेही तय करने संबंधी एक नये मसौदा विधेयक पर विचार किया जाएगा. इस मसौदे के तहत भ्रामक विज्ञापन करने वाली हस्ती पर 50 लाख रुपये जुर्माने व पांच साल की जेल की सजा रखी जा सकती है.

सूत्रों ने बताया कि वित्तमंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता वाले मंत्री समूह की बैठक में मसौदा विधेयक को मंजूरी के लिए कैबिनेट के समक्ष पेश करने से पहले उपभोक्ता मंत्रालय विभाग द्वारा सुझाए गए प्रस्तावों पर विचार किया जाएगा. इस अनौपचारिक मंत्री समूह में जेटली के अलावा उपभोक्ता मामलों के मंत्री रामविलास पासवान, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा, परिवहन मंत्री नितिन गडकरी, कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, बिजली मंत्री पीयूष गोयल तथा वाणिज्य मंत्री निर्मला सीतारमण भी हैं.

सूत्रों ने कहा कि मंत्रालय ने भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के लिए कड़े प्रावधानों तथा ऐसे विज्ञापन करने वाली हस्तियों की जवाबदेही तय करने का प्रस्ताव किया है. सूत्रों ने कहा, 'पहली बार अपराध पर 10 लाख रुपये का जुर्माना व दो साल की सजा का प्रस्ताव है. वहीं अगर कोई सेलिब्रिटी या एंबैस्डर दूसरी बार या आगे और गलती करता है तो 50 लाख रुपये तक का जुर्माना या पांच साल की सजा हो सकती है.'

पी वी सिंधु बनेंगी CRPF कमांडेंट और ब्रांड एम्बैसडर

रियो ओलंपिक खेलों में सिल्वर मेडल जीतने वाली शटलर पी.वी. सिंधु के लिए एक और खुशखबरी है. देश के सबसे बड़े खेल सम्मान 'राजीव गांधी खेल रत्न' जीतने के बाद देश के सबसे बड़े अर्धसैनिक बल (सीआरपीएफ) सिंधु को अपना ब्रांड एम्बैसडर नियुक्त करने और उन्हें कमांडेंट की मानद रैंक देने का फैसला किया है.

आधिकारिक सूत्रों ने कहा कि सीआरपीएफ ने इस संबंध में गृह मंत्रालय को इस संबंध में एक आधिकारिक प्रस्ताव भी भेज दिया है और जरूरी मंजूरी मिलने के बाद सिंधु को एक समारोह में इस रैंक से सम्मानित किया जाएगा. उन्हें यह बैज सौंपा जाएगा जहां उन्हें सीआरपीएफ की वर्दी भी दी जाएगी.

खबरों की माने तो सिंधु को इस बारे में जानकारी दे दी गई है और इस संबंध में सीआरपीएफ ने उनकी सहमति ले ली है. सीआरपीएफ में कमांडेंट की रैंक पुलिस अधीक्षक के दर्जे के बराबर है और इस दर्जे का अधिकारी जब तैनात हो तो 1,000 सैनिकों की बटालियन को आदेश दे सकता है. कुछ साल पहले सीमा सुरक्षा बल बीएसएफ ने क्रिकेटर विराट कोहली को अपना ब्रांड एम्बैसडर नियुक्त किया था.

अब वापस ले सकते हैं किसी को भेजा हुआ ई-मेल

गूगल अपने यूजर्स की की शिकायत आने पर उसके हल की कोशिश करता रहता है. ऐसी ही एक समस्या को लेकर गूगल ने अपनी ईमेल सर्विस ‘जीमेल’ में एक नया फीचर जोड़ा है. इस नए फीचर के तहत अब आप निर्धारित समय के भीतर अपने भेजे हुए ईमेल को वापस ले सकते हैं.

कई बार ऐसा होता है कि आप किसी और के पास मेल भेजना चाहते हैं और ध्यान न देने या ईमेल आईडी गलत हो जाने की वजह से आपका मेल किसी और के पास चला जाता है. ऐसे में कई बार कोई गोपनीय जानकारी भी ऐसे व्यक्ति के पास जा सकती है, जिसे हम नहीं बताना चाहते. लेकिन, गलती हो जाने के बाद हमारे पास पछताने के आलावा कोई और चारा नहीं बचता है.

इसी समस्या के समाधान के लिए गूगल ने जीमेल में ‘अनडू सेन्ड’ विकल्प जोड़ा है. इस फीचर के अंतर्गत अब आप 5 सेकेंड से 30 सेकेंड के भीतर अपने द्वारा भेजे गए मेल को वापस ले सकते हैं. आपके द्वारा वापस लिया गया मेल आपके ड्राफ्ट बॉक्स में सेव हो जाएगा. इस फीचर का उपयोग करने के लिए आपको अपने जीमेल अकाउंट में इस फीचर को एक्टिवेट करना होगा. हम आपको बता रहे हैं कैसे आप ‘अनडू सेन्ड’ फीचर को अपने जीमेल अकाउंट में एक्टिवेट कर सकते हैं…

फीचर सक्रिय करने का तरीका

1. सबसे पहले अपने जीमेल खाते में लॉग-इन करें, फिर अपने इनबॉक्स के दाएं कोने पर स्थित सेटिंग आइकन पर जाएं और उसे क्लिक करें.

2. इसमें एक ड्रॉपडाउन लिस्ट खुलेगी, जिसमें सेटिंग का विकल्प दिखेगा, उस पर क्लिक करें.

3. नई विंडो खुलने पर आपको कई टैब्स दिखाई देंगे, इनमें से आपको ‘जनरल’ टैब पर क्लिक करना है.

4. अब आप अपने माउस को नीचे की ओर स्क्रॉल करें और ‘अनडू सेन्ड’ विकल्प के सामने दिए ‘इनेबल अनडू सेंड’ के चेकबॉक्स पर क्लिक करें. अब आपका ‘सेंड कैंसिलेशन पीरियड’ विकल्प सक्रिय हो जाएगा.

5. सेंड कैंसिलेशन पीरियड विकल्प में जाकर आप ड्रॉपडाउन लिस्ट में ‘अनडू मेल’ के लिए टाइम पीरियड सेट कर सकते हैं. इसमें आपके पास 5, 10, 20 और 30 सेंकेंड का ऑप्शन होगा. इसका मतलब आप मेल सेंड करने के कम से कम 5 सेकेण्ड और अधिकतम 30 सेकेण्ड के भीतर अपने भेजे गए मेल को वापस ले सकते हैं.

6. यह प्रक्रिया पूरी करने के बाद आप अपने माउस को नीचे की तरफ स्क्रॉल करें और ‘सेव चेंजेज’ टैब पर क्लिक करें. ‘सेव चेंजेज’ पर क्लिक करने के बाद ही आपका ‘अनडू मेल’ फीचर एक्टिवेट होगा.

ईमेल वापस करने का तरीका: ‘अनडू मेल’ फीचर एक्टिवेट करने के बाद जैसे ही आप कोई मेल भेजते हैं, तो इनबॉक्स टैब में ऊपर की ओर ‘योर मैसेज हैज बिन सेंड’ लिखकर आता है. अब वहां आपको ‘अनडू’ का ऑप्शन भी दिखाई देगा. आप इस ऑप्शन पर 5 से 30 सेकेंड के भीतर क्लिक करके अपना मेल वापस ले सकते हैं.

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