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बदल गए रेल टिकट कैंसल करवाने के नियम

प्रधानमंत्री द्वारा 8 नवंबर को 500-1000 के नोट बंद करने की घोषणा के बाद आरक्षित रेल टिकटों की संख्या में अचानक से तेजी आ गई. यह तेजी महंगे टिकटों में ज्यादा देखी गई.

खबरें आईं कि लोग घर में पड़े कालेधन को सफेद करने के लिए इस प्रकार टिकट बुक करा रहे हैं ताकि टिकट कैंसल कराकर उसे व्हाइट कर लिया जाए. चालाक लोगों की इस हरकत के बाद रेलवे ने अपने नियमों तत्काल प्रभाव से बदलाव किए.

रेल मंत्रालय ने अपने एक बयान में बताया कि पीआरएस काउंटर से बुक कराए गए टिकटों के कैंसिल करने और पैसा रिफंड करने के नियमों में बदलाव किया गया है. मंत्रालय ने बयान में कहा कि 9-15 नवंबर के बीच 10000 रुपये या इससे अधिक रुपये की टिकट बुक करवाने और उन्हें पूरा या आंशिक रूप से कैंसिल करवाने वालों पर यह नियम लागू होगा. यह नियम 5000 रुपये से ज्यादा रिफंड मांगने वालों पर लागू होगा.

पीआरएस काउंटर से 9-15 नवंबर के बीच बुक कराए गए टिकटों और फिर 16-24 नवंबर के बीच उनके कैंसिलेशन के लिए एप्लाई करने वालों को नकद भुगतान नहीं होगा. ऐसे लोगों का पैसा उनके खाते में रिफंड किया जाएगा. रेलवे ने साफ कर दिया कि किसी भी सूरत में पैसे का नकद भुगतान नहीं होगा. रेल उनका पैसा ईसीएस या फिर चेक के जरिए ही देगा.

उल्लेखनीय है कि टीडीआर के लिए यह जरूरी है कि आरएसी और वेटिंग के टिकट के लिए ट्रेन के प्रस्थान के समय से दो घंटे पहले फाइल किया जाना चाहिए और कंफर्म टिकट पर यह ट्रेन के प्रस्थान के समय से करीब चार घंटे पहले किया जाना चाहिए. रेल मंत्रालय ने कहा कि बदले गए नियम के मुताबिक टीडीआर और बकाए किराए की वापसी केवल चेक और ईसीएस के जरिए ही की जाएगी.

अगले माह आ रही है दारा सिंह की जीवनी

स्व.रामानंद सागर निर्मित अति लोकप्रिय टीवी धारावाहिक ‘‘रामायण’’ में हनुमान का किरदार निभारक युवा पीढ़ी के बीच अपनी पैठ बना लेने वाले अभिनेता स्व.दारा सिंह बहुत बडे कुश्तीबाज थे. दारा सिंह कुश्ती के मैदान पर हर दंगल में अपनी जीत दर्ज कराते थे. उसके बाद उन्होंने बौलीवुड की सैकड़ो फिल्मों में अभिनय कर अपनी अलग पहचान व इज्जत कमायी थी. यही वजह है कि दारा सिंह द्वारा लिखित किताब ‘‘मेरी आत्मकथा’’ को हरियाणा के स्कूलों में पढ़ाया जाता है. तो वहीं अब दारा सिंह की जीवनी तैयार हो गयी है, जो कि अगले माह बाजार में आने वाली है.

19 नवंबर को दारा सिंह के जन्म दिन के अवसर पर उनके बेटे व अभिनेता विंदू ने अपने पिता को याद करते हुए जानकारी दी कि उनके पिता दारा सिंह की बायोग्राफी /जीवनी अंग्रेजी भाषा में लिखी गयी है, जो कि दिसंबर माह मे बाजार में आ जाएगी.

त्रासदी से सबक ले सरकार

रविवार की सुबह कानपुर के पास पटना-इंदौर एक्सप्रेस के दुर्घटनाग्रस्त हो जाने से सौ से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों यात्री घायल हैं. हादसे के कई घंटे बीत जाने के बावजूद रेल मंत्रालय और संबद्ध विभागों की तरफ से न तो दुर्घटना के कारणों के बारे में बताया गया है, और न ही मृतकों तथा घायलों की निश्चित संख्या और नामों की जानकारी दी गयी है.

इस त्रासदी ने भारतीय रेल प्रबंधन में व्याप्त कमियों को भयावह रूप से एक बार फिर उजागर किया है. कानपुर रेल प्रणाली का महत्वपूर्ण केंद्र होने के साथ देश के व्यस्ततम रेल मार्गों में भी एक है. इसके बावजूद घटना के तुरंत बाद राहत और बचाव न पहुंच पाना बेहद चिंताजनक है. घटनास्थल से मिल रही जानकारियों के अनुसार, यदि यात्रियों को समय पर मदद मिल जाती और आसपास चिकित्सा के बेहतर इंतजाम होते, तो अनेक जानें बचायी जा सकती थीं. रेल हमारे देश की सबसे बड़ी परिवहन प्रणाली है जिसमें रोजाना करोड़ों लोग यात्रा करते हैं और भारी मात्रा में सामानों की ढुलाई की जाती है. इस कारण इसके प्रबंधन, इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा पर अत्यधिक दबाव भी है. हर साल रेल बजट में बड़ी राशि इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाने, रख-रखाव को प्रभावी बनाने तथा परिचालन को सुरक्षित बनाने के लिए निर्धारित की जाती है.

लेकिन, जैसा कि रेल को बेहतर बनाने का सुझाव देने के लिए गठित बिबेक देबरॉय समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, खर्च और उसके उपयोग का समुचित हिसाब-किताब रखने में रेल का रिकॉर्ड बहुत खराब है. एक ताजा अध्ययन में बताया गया है कि यात्री गाड़ियों की औसत गति 36 किलोमीटर प्रति घंटे है, जबकि मालगाड़ियां 26 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती हैं.

वर्ष 2012 में प्रकाशित विश्व बैंक के एक अध्ययन के मुताबिक भारतीय रेल की उत्पादकता अंतरराष्ट्रीय स्तर से बहुत नीचे है. यात्री ट्रेनों के परिचालन का आर्थिक बोझ भी रेल की समस्याओं में से एक है, लेकिन पिछले दो सालों में किराये में प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से तेज बढ़ोतरी भी हुई है. सरकार ने लंबित परियोजनाओं को पूरा करने और पटरियों की संख्या बढ़ाने के काम पर ध्यान देने को अपनी प्राथमिकता बनाया है. ऐसे में मौजूदा मार्गों तथा गाड़ियों को सुरक्षित बनाने का मौका सरकार के पास था और है. पटना-इंदौर एक्सप्रेस जैसी अनेक दुर्घटनाओं की खबरें आती रही हैं.

परंतु उन पर लोगों का विशेष ध्यान इसलिए नहीं गया क्योंकि हताहतों की संख्या बहुत कम थी या फिर इनमें कई मालगाड़ियां थीं. जिस देबरॉय समिति की रिपोर्ट के आधार पर रेल मंत्रालय ने अनेक पहलें की हैं, उसमें यात्रियों की संरक्षा और सुरक्षा पर त्वरित ध्यान देने की बात प्रमुख नहीं है. भारतीय रेल की 458 लंबित परियोजनाओं का पांच लाख करोड़ के करीब है. सरकार की कोशिशों के बावजूद अपेक्षित निवेश नहीं हो पा रहा है.

पिछले कुछ समय से रेल मंत्रालय यात्री सुविधाओं को बढ़ाने और रेलवे स्टेशनों को बेहतर बनाने का दावा कर रहा है. बीच-बीच में सोशल मीडिया पर यात्रियों की गंभीर शिकायतों के शीर्ष स्तर से त्वरित समाधान की खबरें भी चर्चा में रहती हैं. यह सब स्वागतयोग्य है, पर दुर्घटना से बचने तथा दुर्घटना की स्थिति में राहत और बचाव के जरूरी कामों को हाशिये पर डाल दिया गया. पिछले बजट में रेल इंफ्रास्ट्रक्चर के आधुनिकीकरण में आगामी पांच सालों में 8.5 लाख करोड़ रुपये खर्च करने की घोषणा की गयी थी. रेल प्रणाली को डिजिटल बनाने को प्रमुख लक्ष्यों में रखा गया था. इस हादसे से सबक लेते हुए सरकार को खर्च की प्राथमिकता में जान-माल की सुरक्षा सबसे पहले रखना चाहिए.

नयी पटरियां बिछाना जरूरी है और इस दिशा में प्रगति भी संतोषजनक है, लेकिन अगर पुरानी पटरियों की मरम्मत और निगरानी में लापरवाही खतरनाक है. यदि रेल में डिजिटल तकनीक, नवोन्मेष और स्टार्ट अप को प्रोत्साहित किया जा रहा है, तो उसका बड़ा हिस्सा बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के काम में लगाया जाना चाहिए. इसी तरह से निवेश के समुचित भाग को भी संरक्षा और सुरक्षा जैसे मदों में खर्च किया जाना चाहिए. रेल भारतीय अर्थव्यवस्था और सकल घरेलू उत्पादन की जीवन रेखा है. सार्वजनिक क्षेत्र का उपक्रम होने के नाते उसे सिर्फ लाभ और हानि के वाणिज्यिक गणित से संचालित नहीं किया जा सकता है. रेल प्रबंधन कम किराया का तर्क देकर अपनी जिम्मेवारियों से मुक्त नहीं हो सकता है.

उसे अपने प्रबंधन और प्रशासन की खामियों का भी मूल्यांकन करना चाहिए तथा अपेक्षित सुधार का प्रयास करना चाहिए. भ्रष्टाचार, लापरवाही और गैरजरूरी खर्चों जैसी समस्याओं का निदान जरूरी है. कई बार देखा गया है कि विलंब से चलने के कारण ट्रेनों को बिना साफ-सफाई और कल-पूर्जों की जांच के फिर से रवाना कर दिया जाता है. पटरियों की नियमित निगरानी का काम भी लचर ढंग से किया जाता है. ऐसी गलतियों को सुधार कर दुर्घटनाओं में काफी कमी की जा सकती है. उम्मीद है कि रेल मंत्रालय और संबद्ध विभाग कानपुर की इस दुखद घटना से समुचित सबक लेंगे.

राशन की दुकान बन गई माइक्रो एटीएम

मोदी सरकार ने फैसला किया है कि अगले 2 साल में देश की 5 लाख राशन की दुकानों पर जो इलैक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल (EPOS) लगाए जाने हैं, वह माइक्रो एटीएम की तरह भी काम करेंगे. नोटबंदी के बाद पर्याप्त एटीएम नहीं होने के कारण ग्रामीण इलाकों में लोगों को जिस तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, उस लिहाज से यह कदम बेहद अहम माना जा है.

एक अंग्रेजी अखबार के मुताबिक फाइनैंस मिनिस्ट्री के डिपार्टमेंट ऑफ फाइनैंशल सर्विसेज ने इस सिलसिले में प्रधानमंत्री के नोटबंदी ऐलान से एक दिन पहले यानी 7 नवंबर को राज्यों को सर्कुलर भेजा था. इसमें राशन की दुकानों को इलैक्ट्रॉनिक पॉइंट ऑफ सेल के जरिए फाइनैंशल इन्क्लूजन को सपोर्ट करने और माइक्रो-एटीएम डबल करने की बात कही गई थी.

कई राज्य इन मशीनों को हासिल करने की प्रक्रिया में हैं, जिससे राशन दुकानों को आधार बायोमीट्रिक सिस्टम के जरिए ऑटोमेटिक तरीके से सब्सिडी का राशन देने में मदद मिलेगी. EPOS मशीनों को एक बार माइक्रो एटीएम की तरह काम करने लायक बनाने के बाद लोग अपने डेबिट या रूपे कार्ड्स से राशन दुकानों से पैसे निकालने के अलावा बाकी ट्रान्जैक्शंस भी कर सकते हैं.

देश में सिर्फ दो लाख एटीएम हैं और इनमें से कुछ ही ग्रामीण इलाकों में मौजूद हैं. नोटबंदी के मौजूदा अभियान के दौरान यह गड़बड़ी खुलकर सामने आई. गांवों के लोगों को अपने पुराने नोट बदलने या पैसा वापस लेने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. मौजूदा नोटबंदी अभियान में केंद्र सरकार ने बैंकों को ग्रामीण इलाकों में माइक्रो एटीएम और बैंक मित्र तैनात करने को कहा, ताकि घर-घर जाकर कैश निकासी में लोगों की मदद की जा सके.

बहरहाल, देश में 5.4 लाख से भी ज्यादा की राशन दुकानें हैं और इनमें से 1.6 लाख में पहले से ही EPOS सिस्टम से लैस हैं. बाकी दुकानों को 2019 तक इन मशीनों से लैस करने की बात है. 

असाध्य बीमारी का शिकार रेलवे

उत्तर प्रदेश में कानपुर देहात जिले के पुखरायां रेलवे स्टेशन के पास शनिवार-रविवार की भोर में जबकि ट्रेन यात्री नींद में थे, इंदौर से पटना सीधे जानेवाली इकलौती साप्ताहिक एक्सप्रेस गाड़ी इंदौर-पटना राजेंद्र नगर के भीषण हादसे का शिकार होने की जो रविवार की सुबह खबर आई, उसने अवकाश वाले दिन पर गोया दुख और शोक-संताप की एक चादर ही डाल दी. कहने की जरूरत नहीं कि साप्ताहिक एक्सप्रेस गाड़ी होने की वजह से जब यह इंदौर से चली थी, तब गाड़ी का हर डिब्बा मुसाफिरों से खचाखच भरा हुआ था. यहां तक कि यात्रियों की संख्या ज्यादा होने के चलते वातानुकूलित श्रेणी का इसमें एक अतिरिक्त डिब्बा लगाना पड़ा था. इसलिए भी इस भीषण दुर्घटना में मरने और घायल होने वालों की तादाद इतनी ज्यादा है.

गौरतलब है कि इंदौर से सीधे पटना जानेवाली राजेंद्र नगर एक्सप्रेस इकलौती रेलगाड़ी है, जो हर शनिवार को इंदौर से चलकर रविवार शाम पटना पहुंचती है. यही कारण है कि यूपी के पूर्वांचल और बिहार के विभिन्न जिलों के लोग इस ट्रेन से यात्रा करने को प्राथमिकता देते हैं. इंदौर और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों में यूपी के पूर्वांचल और बिहार के लोग बड़ी तादाद में चूंकि नौकरी करते हैं, सो वही आम तौर पर इस ट्रेन से सफर भी करते हैं.

हर मौसम में ही यात्रियों की काफी भीड़भाड़ वाली इस ट्रेन के 14 डिब्बे एक-दूसरे को जोरदार टक्कर देते हुए पटरी से उतरे, नतीजा यह हुआ कि शाम तक मरनेवालों की तादाद 115 से ज्यादा सामने आई, जबकि दो सौ से ज्यादा मुसाफिर घायल अवस्था में विभिन्न अस्पतालों में इलाज के लिए ले जाए गए, जिनमें आधे से ज्यादा की हालत गंभीर बताई गई है.

यों तो ट्रेन हादसे की खबर मिलते ही यात्रियों की खोज और बचाव से लेकर घायलों के उपचार तक में सेना, एनडीआरएफ और उत्तर प्रदेश पुलिस की मदद से रेलवे कर्मचारी अभियान में जुट गए. रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा और मंत्री सुरेश प्रभु ने भी दुर्घटना स्थल और हालात का जायजा लेने में कोई देर नहीं की. दुर्घटना के कारणों की जांच भी होगी ही. लेकिन यक्ष प्रश्न यही है कि रेल हादसे रुकने या कम होने का नाम क्यों नहीं ले रहे. कड़वी सच्चाई यही है कि सुरक्षित सफर के लिहाज से इतना विशाल तंत्र होने के बावजूद रेलवे लगातार निराश ही करता आ रहा है. कोई साल ऐसा नहीं, जबकि देश में कम से कम आधा दर्जन रेल दुर्घटनाएं न हुई हों. रेलवे का सुरक्षा तंत्र गोया किसी असाध्य बीमारी का शिकार हो.

रेल दुर्घटनाओं की सालाना कुंडली उठाकर देखें तो वह काफी लंबी है. बहुत पीछे और बहुत दूर न भी जाएं तो इसी साल कुछ महीने पहले ही यूपी के भदोही में एक भीषण हादसे में दस स्कूली बच्चों की दर्दनाक मौत हुई, जबकि 12 बच्चे घायल हो गए. हादसा मानव रहित क्रॉसिंग पर स्कूली वैन के ट्रेन से टकराने से हुआ. इस घटना ने करीब डेढ़ साल पहले यूपी के ही मऊ जिले में मानव रहित रेलवे क्रॉसिंग पर घटी दर्दनाक घटना का दर्द ताजा कर दिया था. उस घटना ने भी दर्जन भर से ज्यादा बच्चों की जिंदगी लील ली थी. इसी तरह तेलंगाना के मसाईपेट में भी पिछले वर्ष जुलाई में एक हादसे में भी 19 बच्चों की मौत हो गई थी. बहरहाल, दुर्घटनाओं के प्रकार अलग हो सकते हैं, लेकिन सवाल यही है कि इस अभिशाप से रेलवे को मुक्ति कब मिलेगी?

काजल और चिरंजीवी की जोड़ी क्या गुल खिलाएगी

अजय देवगन के साथ ‘‘सिंघम’’ के अलावा ‘‘स्पेशल छब्बीस’’ और‘‘दो लफ्जों की कहानी’’ जैसी हिंदी फिल्मों के अलावा दक्षिण भारत में करीबन 30 से अधिक फिल्मों में अभिनय कर चुकी मुंबई वासी काजल अग्रवाल पहली बार दक्षिण भारत के सुपर स्टार चिरंजीवी के साथ फिल्म ‘‘खिलाड़ी नंबर 150’’ में अभिनय कर रही हैं. खुद काजल अग्रवाल ने इस बात को चिंरजीवी के साथ अपनी फोटो को इंस्टाग्राम पर पोस्ट कर पूरी दुनिया को बताया है. यह फिल्म चिरंजीवी के करियर की 150वीं फिल्म है. जब से काजल अग्रवाल ने यह तस्वीर पोस्ट की है, तब से टौलीवुड के साथ साथ बौलीवुड में भी लोग इस जोड़ी को लेकर कई तरह की बातें कर रहे हैं. जिसकी अपनी खास वजहे हैं.

फिल्म ‘‘खिलाड़ी नंबर 150’’ का निर्माण ‘‘कोनीडेला प्रोडक्शन कंपनी’’ के तहत चिंरजीवी के बेटे व दक्षिण के स्टार कलाकार राम चरण कर रहे हैं. जबकि फिल्म के निर्देशक वी वी विनायक हैं. और दक्षिण भारत में राम चरण तथा काजल अग्रवाल की युवा रोमांटिक जोड़ी काफी चर्चित जोड़ी है. राम चरण व काजल अग्रवाल ने एक साथ कई सुपर हिट फिल्में दी हैं. मगर अब पहली बार काजल अग्रवाल, राम चरण के पिता चिरंजीवी के साथ रोमांटिक किरदार निभा रही है.

बहरहाल, फिल्म ‘‘खिलाड़ी नंबर 150’’ की एक तस्वीर इंटाग्राम पर पोस्ट कर काजल अग्रवाल ने हंगामा मचा दिया है. राम चरण के अलावा चिरंजीवी के फैन्स को भी यह जोड़ी काफी हॉट लग रही है. इस तस्वीर में दोनों का लुक और स्टाइल भी लोगों को भा रहा है. काजल अग्रवाल के प्रशंसक तो चिरंजीवी के साथ सिनेमा के परदे पर ‘आन स्क्रीन केमिस्ट्री’ देखने के लिए उतावले हो चुके हैं, पर उससे कहीं ज्यादा टौलीवुड के लोग चर्चा कर रहे हैं कि चिंरजीवी के साथ काजल अग्रवाल की जोड़ी सिनेमा के परदे पर क्या गुल खिलाएगी? इस बीच निर्देशक वी वी विनायक चिरंजीवी व काजल अग्रवाल पर यूरोप में कुछ रोमांटिक गाने फिल्माने में व्यस्त हैं.

संजय दत्त की दूसरी पारी फंसी

लगभग एक वर्ष हो गया, मगर संजय दत्त के अभिनय करियर की दूसरी पारी शुरू होने का नाम ही नहीं ले रही है. संजय दत्त के सारे प्रयास विफल हो गए. संजय दत्त के सभी दोस्तों ने उनको लेकर फिल्मों की घोषणाएं करने के बाद अपने अपने कदम पीछे खींच चुके हैं. करीबन आठ फिल्में हमेशा के लिए डिब्बे में बंद हो चुकी हैं. ऐसे मुकाम पर फिल्म ‘‘मैरी काम’’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके निर्देशक उमंग कुमार ने संदीप सिंह व टीसीरीज के भूषण के साथ मिलकर संजय दत्त के करियर की दूसरी पारी की शुरुआत करा संजय दत्त के अभिनय करियर की नैय्या को पार लगाने का बीड़ा उठाया है. यह पहला मौका होगा, जब संजय दत्त, उमंग कुमार के निर्देशन में अभिनय करेंगे.

जी हां! ‘‘टीसीरीज’’ और ‘‘लीजेंड स्टूडियो’’ द्वारा निर्मित की जाने वाली फिल्म ‘‘भूमि’’ का निर्देशन उमंग कुमार करेंगे, जिसमें संजय दत्त की मुख्य भूमिका होगी.

इस फिल्म को लेकर संजय दत्त काफी उत्साहित हैं. वह कहते हैं-‘‘मुझे ऐसी पटकथा की तलाश थी, जो कि मेरे सिनेमाई परदे के व्यक्तित्व से परे हो. मैं एक ऐसा सशक्त किरदार निभाना चाहता था, जिसे मैंने आज तक न निभाया हो. जब मेरे पास फिल्म ‘भूमि’ की पटकथा आयी, तो इसे पढ़ने के बाद मेरे अंतर्मन से आवाज आयी कि मुझे इसी की तलाश थी. एक पिता व उसकी पुत्री के बीच के रिश्ते को उकेरने वाली यह एक अति भावना प्रधान व संजीदा फिल्म है.’’

जबकि ‘‘भूमि’’ का निर्देशन करने वाले उमंग कुमार कहते हैं-‘‘यह एक ऐसी फिल्म है, जो कि दर्शकों को उनकी सीट पर बांध कर रखेगी. इस फिल्म में संजय दत्त के अभिनय का वह रूप नजर आएगा, जिसे अब तक किसी ने नहीं देखा है. यह एक भावना प्रधान मगर बदले की अति नाटकीय कहानी है. जो कि पिता व पुत्री के रिश्तों पर एक नई रोशनी डालेगी.’’

टीसीरीज के मालिक व फिल्म ‘‘भूमि’’ के निर्माण से जुड़े भूषण कुमार भी इस फिल्म को लेकर काफी उत्साहित हैं. जबकि फिल्म के अन्य निर्माता संदीप सिंह तो इस बात को लेकर कृतज्ञ हैं कि संजय दत्त ने उनकी इस फिल्म में अभिनय करने के लिए हामी भर दी. संदीप सिंह कहते हैं-‘‘इस फिल्म की पटकथा पढ़ते ही जिस तरह से संजय दत्त उत्साहित हुए, उसी ने हमें इस फिल्म के निर्माण काम को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया. हम इस बात से उत्साहित हैं कि संजय दत्त हमारी फिल्म ‘भूमि’ से अपने अभिनय करियर की वापसी करने वाले हैं.’’

हर फिल्म में इरोटिजम होता है : सना खान

‘‘टीसीरीज’’ निर्मित और विशाल पंड्या निर्देशित ईरोटिक फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ को लेकर सना खान काफी उत्साहित हैं. दक्षिण भारत में 16 फिल्मों में अभिनय कर चुकी सना खान यूं तो ‘जय हो’ में भी नजर आयी थीं, मगर पहली बार वह फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ से बालीवुड में हीरोईन बनकर आ रही हैं.

पेश हैं उनसे हुई बातचीत के कुछ अंश…

फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ एक इरोटिक फिल्म है. इरोटिक फिल्में करने को लेकर आपको संकोच नही हुआ?

– मेरी राय में तो हर फिल्म में इरोटिजम होता है. विशाल पंड्या ने खुद ही लिख दिया कि मेरी फिल्म इरोटिक फिल्म है. ऐसी कौन सी फिल्म है, जिसमें इरोटिजम नहीं है. किस फिल्म में किसिंग सीन नहीं होते हैं? इंटीमेसी के सीन नही होते हैं? बड़े से बड़ा स्टार भी किसिंग और इंटीमेसी के सीन करता है. क्योंकि इमोशन को दिखाने के लिए यह करना ही पड़ेगा. आज दर्शक भी फिल्म में रियलिटी देखना चाहता है. तो हमने अपनी फिल्म में उस हद तक इरोटिजम दिखाया है, जिस हद तक हमारे संस्कार और सेंसर बोर्ड इजाजत देता है.

हमने सामाजिक संस्कारों के खिलाफ कोई बात नही की है. अब जब शूटिंग होती है, तो सेट पर बहुत से लोग होते है? उसे कौन रोकेगा? इंटरनेट पर लोग जरूरत से ज्यादा इरोटिजम देख रहे हैं, उस पर कौन रोक लगाएगा? पर हम अपनी फिल्में संस्कारों से बंधकर काम कर रही हैं. इसलिए किसी को भी फिल्म ‘वजह तुम हो’ के इरोटिजम को लेकर हल्ला नही मचाना चाहिए. लोगों को मानकर चलना चाहिए कि एक निर्माता निर्देशक बेवकूफ नहीं है. वह सीन व कहानी की मांग के अनुसार ही फिल्म में इरोटिजम रखता है. वह अपनी फिल्म को बर्बाद करने के लिए इस तरह के सीन कभी नहीं रखेगा.

जब आप पटकथा पढ़ती हैं, तो इस तरह के दृश्यों के बारे में सोचती हैं या नहीं?

– मैं 25 सेकंड के इरोटिक सीन के लिए ढाई घंटे की फिल्म करने से मना नहीं कर सकती. मैं इतनी दब्बू किस्म की इंसान नही हूं, जो यह सोचे कि यह क्या हो रहा है? इरोटिक सीन हो या किसिंग सीन हों, वह मैं फिल्मों में अभिनय करने तक ही रखती हूं. इसलिए मैं इस बात पर ध्यान देती हूं कि पटकथा मुझे पसंद आ रही है या नहीं. बाकी के सीन तो 20-25 सेकंड के होते हैं. पर लोग ढाई घंटे की फिल्म देखते हैं. अब आप ढाई घंटे तो इरोटिजम नही दिखाएंगे. इसलिए मैं एक अच्छी फिल्म में काम करना पसंद करती हूं.

सच यह है कि फिल्म ‘वजह तुम हो’ के किंसिंग सीन के फिल्मांकन के दौरान मैं बहुत ज्यादा नर्वस हो जाती थी. तब निर्देशक विशाल पंड्या मेरा हाथ पकड़ लेते थे, अन्यथा शायद उस वक्त मैं गुरमीत को थप्पड़ जड़ देती.

आपकी मां ने ट्रेलर देखकर क्या कहा?

– बहुत आग बबूला हुई. बहुत गुस्से में हैं. हर दिन हमारे बीच तू तू मै मैं हो रही है. मैं उन्हे समझाने का प्रयास कर रही हूं कि मैंने जो किया, वह अभिनय है.

फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ में पटकथा पढ़ते समय आपको क्या खासियत नजर आयी?

– पूरी फिल्म की पटकथा ही खास है.

आपने यह बयान क्यों दिया कि आपको गुरमीत चैधरी के साथ इंटीमेसी सीन करने में तकलीफ थी?

– गुरमीत हो या कोई भी कलाकार हो, मुझे इंटीमेसी के सीन करने से परहेज है. देखिए, मैं शौक से इंटीमेसी सीन या इरोटिक सीन को अंजाम नहीं देना चाहती. इसलिए मैंने यह बात कही. पर इसके यह मायने नही हैं कि मैं कहानी या किरदार की मांग को पूरा नहीं करना चाहती. मेरा मानना है कि मैं फिल्मों में जो भी कर रही हूं, वह फिल्म में किरदार की मांग के अनुसार करती हूं. भविष्य में भी मैं किरदार की हर मांग को पूरा करूंगी. यदि मुझे वेश्या के किरदार को निभाने का मौका मिला, तो मैं वह भी निभाउंगी. फिल्म में वेश्या का किरदार निभाने का अर्थ यह नहीं होगा कि मैं निजी जिंदगी में भी मैं वेश्या कर्म करूंगी.

फिल्म ‘वजह तुम हो’ में मैंने वकील का किरदार निभाया है, इसका अर्थ यह नही है कि मैं हाई कोर्ट में जाकर किसी का केस लडूंगी. फिल्म में मैंने इरोटिक सीन किए, पर निजी जिंदगी में मैं उस तरह के इरोटिक काम नहीं करती. इंटीमेसी या इरोटिक चीजें बहुत निजी होती हैं, उन्हें करते हुए मुझे भी शर्म आती है. इस फर्क को मैं आम लोगों को बताना चाहती हूं. इसलिए मैंने ऐसा कहा.

इसके बाद क्या कर रही हैं?

– एक हास्य फिल्म ‘‘टाम डिक हैरी’’ कर रही हूं.

आपको हास्य से कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया है?

– लोगों को लगता है कि मैं कामेडी अच्छा कर लेती हूं. मैंने कपिल शर्मा के दो शो भी किए. अब कामेडी फिल्म कर रही हूं. कामेडी करना आसान नही है. लोगों को हंसाना बहुत कठिन होता है. उस इमोशन में जाना और सही टाइमिंग में अभिनय करना बहुत कठिन होता है. 

ओल्ड इज गोल्ड का फैशन ट्रेंड

क्या आप जानते हैं करीना कपूर यानि बेबो ने अपनी शादी में शर्मिला टैगोर का वही शरारा पहना था जो सैफ की मां शर्मिला टैगोर ने अपनी शादी के दिन पहना था और पटौदी परिवार की परंपरा को निभाया था. बालीवुड की इसी तर्ज पर चलते हुए आज की युवतियों को भी पुरानी साड़ियों और लहंगों को रीसाइकल करके नया रूप देना और उसे पहन कर फ्लौंट करना खासा भा रहा है. इससे भावनात्मक जुडाव तो झलकता ही है, साथ ही पुराना फैशन धरोहर के रूप में भी जीवित रहता है. अगर फैशन डिजाइनरों की मानें तो मां, दादी या सास के लहंगे को अपनी शादी में पहनने का चलन आजकल फैशन में है.

बचपन से आपको अपनी मम्मी दादी या नानी की बनारसी साड़ी या लहंगा पसंद था तो आप अपनी शादी में उन साड़ियों का रिवैम्प करा कर नया लुक देने के साथ साथ अपने रिश्तों के साथ भावनात्मक जुडाव को भी मजबूत कर सकती हैं.

लहंगों की  रीडिजाइनिंग

फैशन डिजाइनर मीनाक्षी सभरवाल का कहना है कि महिलाएं पुराने लहंगे को ही फिर से नए तरीके से तैयार करवा रही हैं. अगर फेब्रिक की बात करें तो ब्रॉकेड, टिशू, चंदेरी, शिफॉन व जार्जट के लहंगों पर बेहतरीन काम करवा कर उन्हें खूबसूरत बनाया जाता है. इन पर गोटा लेस, सोने, चांदी व कलर्ड स्टोंस को लगाकर खूबसूरत लुक दिया जाता है.

आइये जानते हैं  कुछ ऐसे टिप्स जिनसे आप आप अपनी माँ या दादी की पुरानी साड़ी या लहंगे को नया रूप दे सकती हैं –

·       लहंगे का बॉर्डर चेंज कर इसे नया लुक भी दे सकती हैं. जैसे मैचिंग चोली के बजाय पोंचू, शर्ट या कॉन्ट्रास्ट कलर ट्राय करें, इससे एजी लुक मिलेगा.

·       कांजीवरम और बनारसी साड़ियों से खूबसूरत अनारकली बनवा सकती हैं. इससे आपकी साड़ी को नया लुक भी मिलेगा और इसे पहनना भी आसान हो जाएगा.

·       आप अपनी मां या दादी की प्लेन सिल्क की साड़ी का गाउन भी बनवा सकती हैं और रिसेप्शन या संगीत में पहन सकती हैं.

·       अगर साड़ी का बॉर्डर घिस गया है या फट गया है तो उस पर नया बॉर्डर लगवाया जा सकता है  अगर आप दिल्ली में रहती हैं तो चांदनी चौक का किनारी बाज़ार स्टाइलिश बॉर्डर के लिए परफेक्ट हब है. बॉर्डर चेंज के बाद साड़ी का रूप बिलकुल निखर जाएगा, यानी साड़ी बिलकुल नई जैसी हो जायेगी और ऐसी साड़ी आपको बाज़ार में कहीं नहीं मिलेगी. अगर साड़ी का बीच का हिस्सा कट या फट गया है तो आप उस जगह पर कंट्रास्ट कलर का जोर्जर्ट या शिफोन का फेब्रिक लगवा सकती हैं इससे आपकी साड़ी डिजाइनर हो जायेगी.

एक्सपेरिमेंट करें : शादी के टाइम आप अपनी मां के लहंगे को क्रॉप टॉप या कॉर्सेट के साथ पहन कर इंडो वेस्टर्न लुक पा सकती हैं. आप चाहें तो लहंगे को  आप शीयर जैकेट के साथ भी पहन सकती हैं. इससे लहंगे को नया लुक मिलेगा.

लहंगे को बनाएं अनारकली :  आप अपनी मां के  लहंगे या चोली से अनारकली भी बनवा सकती हैं. इसके लिए मनपसंद फैब्रिक को लहंगे के घेरे के साथ सिलवा लें. ऐसे ही अगर आपके पास कोई पुरानी लेकिन स्टाइलिश चोली है तो आप उसके साथ मनचाहे फेब्रिक को जुड़वां कर अनारकली बनवा सकती हैं.

बनारसी साड़ी का हैवी दुपट्टा : आप अपनी मां की बनारसी साड़ी का हैवी दुपट्टा बनवा सकती हैं और प्लेन स्कर्ट या सलवार सूट के के साथ पेयर सकती हैं, ऐसा करने से आपके पैसे भी बचेंगे और नया व एक्सक्लूसिव लुक भी मिलेगा. दुपट्टे स्ट्रेट फिट वाले सूट, अनारकली, या फिर पटियाला सलवार-कमीज़  सभी के साथ बखूबी जंचते हैं.

लेटेस्ट कलर इन ट्रेंड : दुलहन यानी लाल रंग अब यह सोच  आउट ऑफ़ ट्रेंड हो गयी है. यानी लाल रंग की अब कोई बंदिश नहीं रह गई है, अब लड़कियां नए-नए रंग आजमा रही हैं. आज की दुल्हन पेस्टल रंग जैसे हल्के गुलाबी, सी ग्रीन , क्रीम रंग या गाढ़े नारंगी रंग भी कॉंफिडेंटली कैरी कर रही हैं .

लाइट वेट नेट लहंगे : भारी भरकम लहंगों की जगह अब लाइट वेट नेट और  वेलबेट  के लहंगों ने ले ली है. ये लाइट वेट होने से काफी पसंद किए जा रहे हैं. नेट लहंगे डार्क कलर और लाइट दोनों ही कलर कॉम्बिनेशन के साथ मौजूद हैं. लाइट पिंक, पर्पल, क्रीम के साथ यलो, ब्लू, ग्रीन रेड आदि कलर कॉम्बिनेशन के नेट के लहंगे युवतियों के आकर्षण का केंद्र हैं. ये स्टाइलिश लुक और डिजाइनर होने के कारण काफी खूबसूरत लुक और जुदा अंदाज देते हैं.

सुपर सीरीज खिताब जीतने का सपना हुआ सचः सिंधु

चाइना ओपन का खिताब जीतकर पहली बार कोई सुपर सीरीज प्रीमियर खिताब जीतने वाली ओलंपिक रजत पदक विजेता भारत की पीवी सिंधु बेहद खुश हैं. सिंधु का कहना है कि ये खिताब जीतना लंबे समय से उनका सपना था जो आखिरकार सच हो गया.

21 वर्षीय सिंधु ने टूर्नामेंट के महिला सिंगल्स फाइनल में चीन की सुन यू को कड़े मुकाबले में 21-11, 17-21, 21-11 से मात देकर मैच और खिताब जीता. सिंधु ने मैच के बाद कहा, 'ये लंबे समय से मेरा सपना था कि मैं एक सुपर सीरीज जीतूं. ओलंपिक के बाद सब मुझसे पूछ रहे थे कि आगे क्या? मेरे लिए सुपर सीरीज खिताब जीतना जरूरी था. ओलंपिक के बाद जिंदगी में काफी बदलाव आ गया है. लोगों ने सोचा था कि मैं वापस लौटने में लंबा समय लूंगी लेकिन मैंने कड़ी मेहनत की. ये मेरा पहला सुपर सीरीज खिताब है और मैं बहुत खुश हूं. इसे बयां करने के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं.'

स्टार भारतीय महिला खिलाड़ी साइना नेहवाल और पुरुष शटलर किदांबी श्रीकांत ने 2014 में चाइना ओपन का खिताब जीता था. सिंधु ने कहा कि उन्हें खुशी है कि वो पूर्व विश्व नंबर.1 (साइना नेहवाल) द्वारा दर्ज की गई सफलता को हासिल करने में सफल रहीं.

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