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युद्ध का हौआ

देश में वोटों की खातिर युद्ध का जो हौआ खड़ा किया जा रहा है वह राजनीतिबाजों के लिए चाहे अच्छा हो, देश की युवा पीढ़ी के लिए खतरनाक है. अमेरिका ने न्यूयौर्क के वर्ल्ड ट्रेड सैंटर पर आतंकवादी हमले के बाद देश भर में इतना शोर नहीं मचाया था जितना हमारे यहां उड़ी पर हमले और जवाबी सर्जिकल स्ट्राइक को ले कर मचाया जा रहा है. इस हौए को खड़ा कर बेकारी, शिक्षा में बरबादी, बलात्कार, औरतों के हकों, तार्किक सोच आदि की बातों को बारूद से उड़ाने की कोशिश की जा रही है मानो ये समस्याएं हमारी नसों की नहीं बाहर कहीं सीमा पार से आ रही हैं.

देश की रक्षा जरूरी है पर देश क्या इतना कमजोर है कि 4 आतंकवादियों की शर्मनाक कार्यवाही के बाद पगला जाए और खून का बदला खून से की मांग करने लगे. उड़ी पर विपक्ष ने जो शोर मचाया था वह नरेंद्र मोदी के एक और खोखले चुनाव की पोल खोलने के लिए था. इसे पाकिस्तान से युद्ध के लिए उकसाना नहीं कह सकते. देश की रक्षा के लिए देश की मजबूती जरूरी होती है. लड़ाइयां तो अफ्रीका में भी बहुत हो रही हैं, जहां की जनता भुखमरी की शिकार है, लड़ाइयां पश्चिम एशिया में हो रही हैं जिन के कारण बच्चे, युवा, बूढ़े यहां तक कि अपाहिज भी अपना पुश्तैनी घर छोड़ने को मजबूर हैं और सैकड़ों मील चल कर यूरोप की विधर्मी जमीन पर बसने को तैयार हैं. उन्हें अपने देश की नहीं अपने बच्चों के भविष्य की चिंता है. उन के अपने देश एक सुखद और सुरक्षित भविष्य की गारंटी नहीं दे रहे.

हम भारत में भी यही कर रहे हैं. यहां भी बजाय अपने जन्मस्थान पर नौकरियां, काम के अवसर, मनोरंजन की जगह, जीवन सुखद बनाने के लिए घर, सड़कें, सीवर सफाई का इंतजाम न कर के हाय बिल्ला कर रहे हैं धर्म, देश या जाति के नाम की और अब उसे वोटों के लिए भुना भी रहे हैं.

पाकिस्तान को उड़ी और पठानकोट के लिए सबक नहीं सिखाया जा सकता, यह अमेरिका ने अफगानिस्तान व इराक पर हमला कर के देख लिया है. हम कितनी ही कोशिश कर लें पाकिस्तान के सरकार से बाहर के कट्टरवादी तत्त्वों को सैनिक हमलों से नष्ट नहीं कर सकते. अमेरिका के ड्रोन अफगानिस्तान व पाकिस्तान के पश्चिमी इलाकों में सर्जिकल स्ट्राइक से कहीं ज्यादा बरबादी करने वाले औपरेशन रोज करते हैं पर उन का जिक्र अमेरिकी मीडिया में लेशमात्र भी नहीं होता. केवल ओसामा बिन लादेन को मारने की घटना पर बराक ओबामा ने खुद देश को बताया था पर उस के बाद डैमोक्रैटिक पार्टी ने देश भर में विजय जुलूस नहीं निकाले थे.

देश को प्रायरटी फिक्स करनी होगी. देश की युवा जनता पहले आती है. उस के भविष्य की सुरक्षा सीमा की सुरक्षा की तरह महत्त्वपूर्ण है.

मुलायम सिंह यादव, ताकत बनी कमजोरी

मुलायम सिंह यादव की ताकत ही थी कि आज उन के परिवार के सदस्य लोकसभा, राज्यसभा, विधानसभा, विधानपरिषद और पंचायत लैवल तक अहम जगहों पर काबिज हैं. उन के बेटे अखिलेश यादव देश के सब से बड़े प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं. वे उत्तर प्रदेश के सब से कम उम्र के मुख्यमंत्री बने हैं. इस के बावजूद आज 25 साल पूरे कर रही यह पार्टी टूटने के कगार पर खड़ी है. समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह का परिवार उन की सब से बड़ी ताकत थी, जो अब उन की सब से बड़ी कमजोरी बन गई है.

विरासत का झगड़ा

बेटे अखिलेश यादव के साथ शुरू हुए झगड़े से परिवार और पार्टी दोनों ही 2 धड़ों में बंट गए हैं. हालात ये हो गए हैं कि मुलायम सिंह यादव को कहना पड़ा, ‘जो बाप का नहीं हुआ, वह बात का क्या होगा?’  बात केवल उन के कहने भर की नहीं है, क्योंकि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी कहा था, ‘स्कूल में मैं ने अपना नाम खुद रखा था.’ अखिलेश यादव की इस बात से यह पता चलता है कि मुलायम सिंह यादव ने बचपन में उन की कितनी परवाह की थी. इस से परिवार में खटास पैदा होने की खबरों की तसदीक होती है. मुलायम सिंह और अखिलेश यादव के बीच की दूरी अखिलेश के बचपन से ही बनी हुई थी. अखिलेश यादव मुलायम सिंह की पहली पत्नी मालती देवी के बेटे हैं. अखिलेश को पिता का वह साथ नहीं मिला, जो एक बेटे को मिलना चाहिए. यही वजह है कि अखिलेश यादव का लालनपालन चाचा शिवपाल यादव और परिवार के दूसरे लोगों की मदद से हुआ.

शुरुआती पढ़ाई के बाद अखिलेश यादव राजस्थानके मिलिटरी स्कूल में चले गए. वहां से वे कर्नाटक और आस्ट्रेलिया पढ़ाई करने गए. दरअसल, पितापुत्र के बीच रिश्तों में सहज भाव की शुरू से ही कमी रही है. यह कमी इस हद तक थी कि अखिलेश यादव अपने पिता को बचपन से ही ‘नेताजी’ कह कर बुलाते थे. यह दूरी उस समय और ज्यादा बढ़ गई, जब मुलायम सिंह की जिंदगी में साधना गुप्ता आईं. साधना गुप्ता के साथ उन के रिश्ते बहुत दिनों तक समाज के सामने नहीं आए. साल 1998 के बाद खुद साधना गुप्ता ने इस बात की पहल शुरू की, जिस से उन के और मुलायम सिंह के रिश्ते समाज के सामने आ सके.

इस बीच अखिलेश यादव की शादी डिंपल के साथ हो गई. इस शादी के लिए पहले मुलायम सिंह यादव राजी नहीं थे, पर बाद में वे तैयार हो गए. यहां से पितापुत्र के बीच रिश्ते सहज होने लगे थे. साधना गुप्ता को कामयाबी तब मिली, जब साल 2003 में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और वे उन के सरकारी आवास में रहने लगीं. कुछ समय के बाद जब मुलायम सिंह की पहली पत्नी मालती देवी की मौत हुई, तो साधना गुप्ता और उन के परिवार का दखल बढ़ने लगा. साधना गुप्ता से हुआ बेटा प्रतीक यादव भी बड़ा हो रहा था. मुलायम सिंह यादव के खिलाफ जब आमदनी से ज्यादा जायदाद का मामला सामने आया, तो पहली बार जनता को पता चला कि प्रतीक यादव मुलायम सिंह यादव के दूसरे बेटे हैं. प्रतीक यादवकी शादी अपर्णा यादव से हुई. तब समाजवादी पार्टी के कुछ नेताओं ने प्रतीक यादव को राजनीति में लाने की कोशिश की, पर उन्होंने कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. लेकिन कुछ समय के बाद प्रतीक की पत्नी अपर्णा यादव ने राजनीति में कदम रखने की इच्छा जताई, तो मुलायम सिंह ने उन को लखनऊ कैंट विधानसभा क्षेत्र से टिकट दे कर चुनाव की तैयारी करने को कहा. ऐसे में यह साफ हो गया कि मुलायम सिंह के दूसरे बेटे की पत्नी भी राजनीति में आएंगी. इस से परिवार में नई तरह का धुव्रीकरण शुरू हो गया.

अमर सिंह के दोबारा पार्टी में आने से साधना, शिवपाल और अमर सिंह के गुट ने मुलायम सिंह को दबाव में ले लिया. इस के बाद पिता मुलायम और पुत्र अखिलेश के बीच दूरी बढ़ने लगी. अभी तक हर तरह के समझौते करते आ रहे अखिलेश यादव के लिए हालात सहन करना मुश्किल हो गया और वह बगावत के रूप में सामने आ गया. अखिलेश यादव की बगावत को मुलायम सिंह यादव के ही भाई रामगोपाल यादव ने समर्थन दिया. अब मुलायमशिवपाल का एक गुट सामने आया, तो अखिलेशरामगोपाल दूसरे गुट में खड़े हो गए. अखिलेश यादव ने साफ ऐलान कर दिया कि जो अमर सिंह के साथ खड़ा होगा, वे उस के साथ नहीं होंगे. दूसरी तरफ मुलायमशिवपाल ने अमर सिंह की गलती मानने से इनकार कर दिया.

मुलायम सिंह ने साफ कर दिया कि वे अमर और शिवपाल को नहीं छोड़ सकते. अमर सिंह उन के भाई जैसे हैं. मुसीबत में अमर सिंह ने उन की बहुत मदद की थी. ऐसे में अखिलेश और शिवपाल  आमनेसामने खड़े हो गए. दोनों ही एकदूसरे को पार्टी और सरकार से बाहर का रास्ता दिखाने में जुट गए. परेशान हो कर मुलायम सिंह ने दोनों के बीच सुलह कराने की कोशिश की, तो बात बनतेबनते बिगड़ गई. तब मुलायम सिंह यादव ने चुप हो जाना ही बेहतर समझा. उन की कोशिश यह है कि साल 2017 के विधानसभा चुनावों तक समाजवादी पार्टी में टूटफूट न हो, जिस से पार्टी को दोनों गुटों का फायदा मिल सके.  

पार्टी के 25 साल पूरे होने पर जिस रजत जयंती समारोह के बाद समाजवादी पार्टी को नए आभामंडल को छूना था, उस समय पार्टी टूटती नजर आ रही है. इस के बाद भी मुलायम सिंह ने हार नहीं मानी और बिना किसी भेदभाव के वे अखिलेश और शिवपाल दोनों को ही समान नजर से देख रहे हैं. यह बात और है कि दोनों को ही यह नजर आ रहा है कि मुलायम सिंह उन की बात का मान नहीं रख रहे. यह मुलायम सिंह की ताकत ही है कि इतने विरोध के बाद भी हर किसी को उन की जरूरत है. इसी वजह से शिवपाल और अखिलेश दोनों कह रहे हैं कि ‘नेताजी ही हमारे नेता हैं’. 

जमीनी नेता हैं मुलायम सिंह

मुलायम सिंह अपने 5 भाईबहनों में रतन सिंह से छोटे और अभयराम सिंह, शिवपाल सिंह, रामगोपाल और कमला देवी से बड़े हैं.

मुलायम सिंह यादव को बचपन से ही पहलवानी का शौक था. जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र में हुई कुश्ती प्रतियोगिता में उन्होंने नत्थू सिंह को प्रभावित किया था. जसवंतनगर नत्थू सिंह की विधानसभा सीट थी. उन्होंने मुलायम सिंह यादव को राजनीति की तरफ बढ़ने को कहा.

इस के बाद मुलायम सिंह यादव ने राजनीति और पढ़ाई दोनों एकसाथ शुरू कीं. आगरा यूनिवर्सिटी से एमए और जैन इंटर कालेज, करहल, मैनपुरी से बीटीसी करने के बाद मुलायम सिंह ने कुछ समय के लिए स्कूल में पढ़ाने का काम भी किया. यहां से ही वे राजनीति की तरफ बढे़ और डाक्टर राममनोहर लोहिया और चौधरी चरण सिंह का साथ देने लगे.

मुलायम सिंह को पहली कामयाबी तब मिली, जब साल 1977 में वे पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा में विधायक बने थे. यहीं वे पहली बार जनता पार्टी सरकार में सहकारिता मंत्री भी बने थे. इस के बाद मुलायम सिंह ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा और वे 3 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और एक बार केंद्र सरकार में रक्षा मंत्री रहे.

रहे सांप्रदायिक विरोधी

90 के दशक में जब देश में मंडल कमीशन लागू हुआ, तो मुलायम सिंह यादव पिछड़ा वर्ग के प्रमुख नेता के रूप में उभरे थे. इस के साथ ही साथ वे भारतीय जनता पार्टी की सांप्रदायिक राजनीति के विरोध में खडे़ हुए थे. भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर बनाने को ले कर आंदोलन शुरू किया, तो मुलायम सिंह यादव ने सब से पहले उस का विरोध किया था. इस के चलते कट्टरवादी ताकतों ने मुलायम सिंह को ‘मुल्ला मुलायम’ की उपाधि दे दी थी. साल 1992 में अयोध्या में विवादित ढांचा ढहने के बाद प्रदेश की कल्याण सिंह सरकार बरखास्त हो गई थी. इस के बाद हुए विधानसभा चुनावों में मुलायम सिंह ने बहुजन समाज पार्टी के नेता कांशीराम के साथ गठजोड़ कर के सरकार बनाई. सांप्रदायिक ताकतों का विरोध करते हुए जनता ने उस समय नारा दिया था ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’. 

उत्तर प्रदेश एक नए सामाजिक ढांचे पर खड़ा था. अगड़ी जातियों के हाथ से सत्ता चली गई थी. उस पर दलितपिछड़ों का कब्जा हो चुका था. मायावती  राजनीति में अपना एक अलग मुकाम हासिल करना चाहती थीं. भाजपा ने मायावती की इसी इच्छा को पूरा करने का सपना दिखा कर मुलायम सिंह के दलितपिछड़ा गठजोड़ को तोड़ दिया, जिस के बाद मुलायम  और मायावती के बीच ऐसी दरार बनी, जो आज तक खत्म नहीं हो सकी है.

हार नहीं मानते मुलायम

1990 के बाद राजनीति में तोड़फोड़, दलबदल और पैसे का दबदबा बढ़ने लगा. इस के बाद भी मुलायम सिंह ने कभी हार नहीं मानी. 2003 में वे तब मुख्यमंत्री बने, जब भाजपा से टूट कर कल्याण सिंह और लोकदल नेता अजित सिंह उन के साथ खडे़ हुए थे. साल 2007 तक मुलायम सिंह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. इस के बाद 2012 में समाजवादी पार्टी सत्ता में पूरे बहुमत से आई, तो उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री की कुरसी पर बिठा कर उन को अपना सियासी वारिस ऐलान किया. साल 1993 में जब बसपा नेता कांशीराम और मायावती ने मुलायम को अपमानित कर गठबंधन तोड़ने का काम किया, तब उन्होंने किसी दल से गठजोड़ न करने का मन बना लिया. यहीं से मुलायम सिंह यादव ने अपने परिवार को राजनीति में लाना शुरू किया.

मुलायम सिंह को लगता था कि परिवार के लोग रहेंगे, तो उन से खतरा नहीं होगा. इस सोच के साथ मुलायम ने समाजवादी पार्टी में अपने भाई शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव को आगे किया. इस के बाद बेटे अखिलेश यादव और उन की पत्नी डिंपल यादव के लिए संसद में जाने का रास्ता तैयार किया.  यह सिलसिला रुका नहीं. 2014 के लोकसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी से केवल मुलायम के परिवार के लोग ही संसद सदस्य बन सके. इस समय तक लोकसभा में मुलायम परिवार के तेज प्रताप सिंह यादव, अक्षय यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव और खुद मुलायम सिंह यादव लोकसभा के सदस्य बने. भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा के सदस्य बने. परिवार में मचे घमासान के बाद भी मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को कुछ न कहा और न भाई शिवपाल को. दोनों को समझाया और एक को सरकार की बागडोर दे दी, दूसरे को संगठन की, जिस से परिवार में होने वाली टूटन बच गई. आने वाले दिनों में अलगाव की जो गांठ परिवार में पड़ी है, उस का फंस जाना मुसीबत खड़ी कर सकता है. इस का खमियाजा समाजवादी पार्टी को ही नहीं, पूरे उत्तर प्रदेश को भुगतना पड़ सकता है.

परिवार के विवाद का नुकसान सपा को उठाना पड़ रहा है. नेताओं के आपसी विवाद से कार्यकर्ता समझ नहीं पा रहे हैं कि वे किस का साथ दें.            

अखिलेशमुलायम में वार पलटवार

– अखिलेश यादव ने सब से पहले कैबिनेट मंत्री गायत्री प्रजापति और मुख्य सचिव दीपक सिंघल को हटा दिया.

– जवाब में नाराज मुलायम सिंह ने अखिलेश यादव को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया.

– मुलायम सिंह के कहने पर शिवपाल यादव प्रदेश अध्यक्ष बने.

– शिवपाल यादव ने मुलायम सिंह के खिलाफ नारेबाजी करने वाले अखिलेश समर्थक नौजवान नेताओं को हटा दिया.

– अखिलेश ने अपने समर्थकों को सपा दफ्तर से अलग लोहिया ट्रस्ट में बैठने को कहा.

– अखिलेश ने कहा कि जब तक अमर सिंह पार्टी में हैं, समझौता नहीं होगा.

– मुलायम सिंह ने कहा कि अमर सिंह उन के भाई जैसे हैं, वे पार्टी में रहेंगे.

– अखिलेश ने शिवपाल यादव को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया.

– जवाब में शिवपाल ने अखिलेश का समर्थन कर रहे प्रोफैसर रामगोपाल यादव को बाहर कर दिया.

– अखिलेश ने शिवपाल और अमर सिंह पर फर्जी खबर छपवा कर उन को ‘औरंगजेब’ कह कर बदनाम करने का आरोप लगाया.

– नाराज शिवपाल ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को झूठा कहा और अपना सरकारी आवास खाली कर दिया.

अमर सिंह से नाराजगी क्यों

अमर सिंह के साथ अखिलेश यादव की तल्खी का राज मुलायम सिंह के घर में ही छिपा है. अखिलेश यादव का कहना है कि अमर सिंह परिवार में साजिश रच कर उन की सरकार को गिराना चाहते हैं.

अमर सिंह मुलायम सिंह यादव के साथसाथ शिवपाल यादव और मुलायम की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता के साथ खड़े हो जाते हैं. अमर सिंह के दोबारा पार्टी में आने के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई शुरू हुई. ऐसे में इस का जिम्मेदार अमर सिंह को ही माना जा रहा है.

अखिलेश यादव यह तो कहते हैं कि बाहरी लोग झगड़ा करा रहे हैं, पर झगड़ा कौन करा रहा है, इस पर चुप हो जाते हैं.

शिवपाल यादव 2012 में ही खुद को मुख्यमंत्री की रेस से बाहर मान चुके थे. वे अखिलेश के अधीन सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे. ऐसे में शिवपाल यादव मुख्यमंत्री पद के लिए झगड़ा नहीं कर सकते. 

मुलायम सिंह यादव खुद ही मुख्यमंत्री की कुरसी छोड़ चुके हैं, ऐसे में वे भी मुख्यमंत्री की रेस में नहीं हैं. विवाद की वजह क्या है, यह बात अखिलेश यादव नहीं बता रहे हैं.

तब यह बात सामने आती है कि विवाद की वजह मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता और उन का परिवार है. अखिलेश यादव इस बात को सामने नहीं लाना चाहते. ऐसे में वे बारबार अमर सिंह का नाम सामने ला कर मसले को हल करना चाहते हैं. अखिलेश यादव के करीबी लोगों ने अमर सिंह का पुतला फूंकते हुए आरोप लगाए हैं कि अमर सिंह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के इशारे पर सपा में विवाद करा कर पार्टी को कमजोर करना चाहते हैं. शिवपाल गुट भी यही आरोप रामगोपाल यादव पर लगाता है कि भाजपा की मिलीभगत से वे पार्टी को तोड़ना चाहते हैं.

क्या गुरमीत और देबलीना हर दिन झगड़ते हैं?

सीरियल ‘‘रामायण’’ में राम का किरदार निभाकर चर्चा में आए गुरमीत चौधरी बाद में ‘‘गीत’’ और ‘‘पुनर्विवाह’’ जैसे सीरियलों में भी अभिनय करते हुए नजर आए थे. पर इन दिनों वह विशाल पंड्या निर्देशित  ईरोटिक फिल्म ‘‘वजह तुम हो’’ को लेकर चर्चा में हैं. वैसे उनके करियर की पहली फिल्म ‘‘खामोशियां’’ भी ईरोटिक फिल्म ही थी.

गुरमीत चैधरी और उनकी पत्नी दोनो ही अभिनय से जुड़े हुए हैं, इसके बावजूद निजी जिंदगी में उनके बीच आम इंसानों की ही तरह झगड़े व तू तू मैं मैं होती रहती है. एक मुलाकात में इस बात को स्वीकार करते हुए खुद गुरमीत चौधरी ने कहा-‘‘टीवी या फिल्म में जो कहानी आती हैं, उनमें सच्चाई होती है. मैं कलाकार हूं. मेरी पत्नी भी कलाकार हैं. इसके मायने यह नहीं हैं कि हमारे बीच झगडे़ नहीं होते. पानी के लिए भी हमारे बीच झगड़े होते हैं. कई बार मैंने चिल्लाकर पानी का गिलास भी फेंका है. पर लोगों की नजर में कलाकार भगवान की तरह होता है. जब मैं कलाकार नहीं बना था, तो मेरे लिए अमिताभ बच्चन भगवान थे. वैसे मैं आज भी उनका बहुत बड़ा फैन हूं. हम कलाकारों की निजी जिंदगी में भी वही सब होता है, जो आम इंसान की जिंदगी में होता है.

हमारी जिंदगी की कोई घटना मीडिया में आती है,तो उसका बहुत बड़ा हौव्वा बन जाता है. ‘पुनर्विवाह’ में बहुत सारी घटनाएं थी. मुझे लगता है कि ज्यादातर घटनाएं मेरे जीवन में घटित हो चुकी हैं. सीरियल में मेरी पत्नी आरती जब नाराज होती, तो मैं गाना गाकर मनाता था. निजी जिंदगी में भी मुझे अपनी पत्नी देबलीना को मनाने के लिए यह सब करना पड़ता है. किसी ने मुझसे पूछा कि आप देबलीना के साथ कब फिल्म कर रहे हो? तो मैंने उससे कहा कि उनके साथ तो मैं हर रोज फिल्म करता हूं. फिल्म में जो नाच गाना वगैरह होता है, वह मेरे घर में हर रोज होता है.’’

नोटबंदी में नदारद भाजपा मार्गदर्शक मंडल

केन्द्र सरकार का नोटबंदी का फैसला भारतीय जनता पार्टी के लिये परेशानी भरा सबब हो सकता है. यह बात केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को भलीभांति पता चल चुकी है. केन्द्र सरकार नोटबंदी के प्रभाव को देखते हुये 10 दिन के अंदर अपने ही कई फैसले अलटपलट रही है. हालात यह है कि जनता की परेशानियों को देखते हुये सुप्रीम कोर्ट को सरकार के कामकाज पर टिप्पणी करने के लिये मजबूर होना पडा.

सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार से पूछा कि क्या केन्द्र दंगों का इंतजार कर रहा है ? सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केन्द्र सरकार ने कहा था कि जनता को राहत मिलेगी इसके बाद 4500 रूपये बदलने की सीमा को घटाकर 2000 कर दिया गया. सुप्रीम कोर्ट की ही तरह से कोलकत्ता हाईकोर्ट ने नोटबंदी पर कहा कि सरकार रोजरोज नये फैसले ले रही है. इससे साफ है कि केन्द्र सरकार ने नोटबंदी के फैसले को लागू करने से पहले कोई होमवर्क नहीं किया. जिससे लोगों को परेशानी हो रही है.

नोटबंदी से अधिक उसके तरीके पर सवाल उठ रहे हैं. विरोधी दलों को भाजपा ने अपने खिलाफ बताकर उनकी बात को हल्का करने की कोशिश की. दूसरे आलोचकों को भी कालाधन समर्थक बताने का अभियान चला. अब अदालत की टिप्पणी के बाद केन्द्र सरकार बैकफुट पर है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा के सांसदों से कहा है कि वह शनिवार-रविवार को अपने संसदीय क्षेत्र में रहें और नोटबंदी पर लोगों को समझाये.

भाजपा की परेशानी यह है कि जनता से लेकर नेता तक नोटबंदी का पक्ष लेते हुये भी इसके तरीके और जनता की परेशानियों पर केन्द्र सरकार को घेर रहे हैं. पुराने नोट बदलने को लेकर कभी समय सीमा बढी, तो कभी इसके तौर तरीके बदले. जिससे जनता को बेहद परेशानी का सामना करना पड़ा. कालेधन से अधिक परेशान मेहनत से कमाने वाले सफेद धन रखने वाले लोग हुये. 8 नवम्बर से 18 नवम्बर के बीच 10 दिन में केन्द्र सरकार के नये नये कदम उठाने से साफ होने लगा कि केन्द्र सरकार ने नोटबंदी का फैसला सही ढंग से फैसले से लागू नहीं किया गया.

भाजपा एक बडी पार्टी है. लोकतांत्रिक पार्टी है. केन्द्र सरकार ने अपने फैसले को लागू करने के पहले अपनी पार्टी में कोई सलाह नहीं ली. भाजपा में बड़े मामलों में मार्गदर्शन के लिये एक मार्गदर्शक मंडल का गठन हुआ था. जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी के साथ प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह शामिल हैं. मार्गदर्शक मंडल में शामिल अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी 1977 की जनता पार्टी सरकार के करीबी जानकारों में शामिल थे.

नोटबंदी को लेकर उस समय देश के सामने जैसे हालात पैदा हुये थे वह उनको पता था. अगर भाजपा की केन्द्र सरकार ने अपने मार्गदर्शक मंडल के अनुभवों का लाभ लिया होता, तो नोटबंदी के क्रियान्वयन में इतनी परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता. नोटबंदी को लेकर उसके क्रियान्वयन पर ही सवाल उठ रहे हैं, जिससे साफ है कि केन्द्र सरकार ने पुराने नेताओं के अनुभवों का लाभ नहीं लिया.                  

यामी गौतम का गुणगान करते रितिक रोशन

वक्त बड़ी तेजी से बदलता है. जब से राकेश रोशन निर्मित और संजय गुप्ता निर्देशित फिल्म ‘‘काबिल’’ का ट्रेलर बाजार में आया है, तब से रितिक रोशन की जुबान पर फिल्म ‘‘काबिल’’ की उनकी हीरोईन यामी गौतम का ही नाम चढ़ा हुआ है. रितिक रोशन, यामी गौतम की परफार्मेंस और यामी के साथ अपनी ऑन स्क्रीन केमिस्ट्री की तारीफें करते हुए नहीं थक रहे हैं.

रितिक रोशन का मानना है कि इस फिल्म में उन्होंने यामी गौतम के साथ ही चुनौतीपूर्ण किरदार निभाया है और इस तरह के चुनौतीपूर्ण किरदारों को निभाने में दोनों एक दूसरे के पूरक साबित हुए हैं. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर रितिक रोशन को इतनी यामी की तारीफें करने की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है, जबकि यामी गौतम ने तो चुप्पी साध रखी है.

क्यों पछता रही हैं प्राची

एकता कपूर के सीरियल ‘‘कसम से’’ में अभिनय कर रातों रात स्टार अदाकारा बनने के बाद प्राची देसाई ने फरहान अख्तर के साथ 2008 में फिल्म ‘‘रॉक ऑन’’ से बौलीवुड में कदम रखा था. उसके बाद से अब तक वह कई फिल्मों में नजर आयी, मगर एक अदाकारा के रूप में उन्हे शोहरत नहीं मिल पायी. यहां तक कि ‘कसम से’ में अभिनय कर उन्होंने जो शोहरत बटोरी थी, वह भी अब धीरे धीरे धूमिल हो चुकी है.

इस बात का अहसास ‘‘रॉक ऑन 2’’ के बाक्स आफिस पर बुरी तरह से पिटने के बाद प्राची देसाई को भी हो चुका है. अब वह पछता रही हैं कि उन्होंने फरहान अख्तर के साथ फिल्म ‘‘रॉक ऑन’’ में ‘नेक्स्ट डोर गर्ल’ का किरदार निभाते हुए करियर क्यों शुरू किया था. वह अब तक अपनी इस ईमेज को तोड़ नहीं पायी हैं.. प्राची देसाई को अब अहसास हो रहा है कि उन्हें बड़े बजट की फिल्मों में ग्लैमरस किरदार निभाने चाहिए . बहरहाल, अब वह प्रेम कहानी प्रधान फिल्मों में अभिनय करना चाहती हैं.

जी हां! यह कटु सत्य है. हाल ही में मीडिया से बात करते हुए प्राची देसाई ने कहा है- ‘‘मैं टीवी से फिल्मों में आयी थी. मुझे पता नहीं था कि पहली फिल्म में जो किरदार निभाएंगे, वह चिपक कर रह जाएगा. 2008 में 19 वर्ष की उम्र में मैंने फिल्म ‘रॉक ऑन’ में एक मीठी सी नेक्स्ट डोर गर्ल का किरदार निभाया था. उसके बाद हर फिल्म में मुझे उसी तरह के किरदार निभाने के मौके मिले. मैं उस ईमेज से बाहर नहीं निकल पायी. किसी फिल्मकार ने मुझे बड़ी फिल्म में ग्लैमरस किरदार निभाने का आफर नहीं दिया. आज भी मेरे पास संजीदा, सीधी सादी लड़की के ही किरदारों के आफर आ रहे हैं. जबकि निजी जिंदगी में मैं इसके विपरीत हूं. गैर फिल्मी परिवार की होने की वजह से फिल्म उद्योग की कार्यशैली से अनभिज्ञ रही हूं. मैं महसूस कर रही हूं कि विद्या बालन की तरह ‘परिणीता’ या कंगना रानौट की तरह ‘गैंगस्टर’ जैसी फिल्में या उस तरह की सशक्त पटकथा वाली फिल्में पाना आसान नहीं है.’

प्राची देसाई ने आगे कहा है-‘‘अब मैं पूर्णरुपेण एक प्रेम कहानी वाली फिल्म का हिस्सा बनना चाहती हूं. अब मैं कुछ अलग तरह के रोचक किरदार निभाना चाहती हंू.’’

प्राची देसाई ने जो कुछ कहा है वह महज उनका पछतावा है या  मगरमच्छी आंसू हैं? बौलीवुड और टीवी इंडस्ट्री में सभी जानते हैं कि प्राची देसाई बिना एकता कपूर की सलाह लिए किसी फिल्म से नहीं जुड़ती हैं. एकता कपूर के ही कहने पर प्राची देसाई ने आंख मूंदकर फिल्म ‘रॉक ऑन’ की थी, जिसके निर्देशक एकता कपूर के कजिन अभिषेक कपूर थे. एकता कपूर निर्मित फिल्म ‘वंस अपान ए टाइम इन मुंबई’ भी की. इतना ही नहीं एकता कपूर निर्मित व मोहित सूरी निर्देशित  फिल्म ‘‘एक विलेन’’ में अपने आपको अति ग्लमैरस दिखाने के लिए अति बोल्ड आइटम नंबर भी किया था. जिसका उन्हे कोई फायदा नहीं मिला था. उसके बाद प्राची देसाई ने एकता कपूर निर्मित असफल फिल्म ‘अजहर’ भी की. इसके अलावा भी जो फिल्में प्राची देसाई ने की, वह सभी एकता कपूर के करीबियों की ही रही हैं. तो क्या यह माना जाए कि एकता कपूर के कैंप के अलावा कोई दूसरा फिल्मकार प्राची देसाई को अपनी फिल्म से नहीं जोड़ना चाहता या प्राची देसाई खुद ही एकता कपूर की मर्जी के बिना किसी फिल्म से नहीं जुड़ती?

इससे यह बात साफ होती है कि फिल्मकारों की कहीं कोई गलती नही है. सारी गलती प्राची देसाई की है. और अब वह बेवजह पछतावे का ढोंग कर रही हैं? सच यह है कि प्राची देसाई खूबसूरत हैं. मगर महज खूबसूरती के बल पर अभिनय की उंचाईयों को नहीं छुआ जा सकता…..

100 मीटर का रिकॉर्ड तोड़ना 200 मीटर से आसान

जमैका के धावक असाफा पॉवेल के मुताबिक धुरंधर हमवतन एथलीट उसेन बोल्ट के 200 मीटर दौड़ के विश्व रिकॉर्ड को तोड़ने से आसान उनके 100 मीटर रिकॉर्ड को तोड़ना होगा.

दिल्ली हाफ मैराथन के ब्रांड एम्बेस्डर के रूप में भारत आए पॉवेल एक समय पर 100 मीटर दौड़ का विश्व रिकॉर्ड दर्ज कर चुके हैं लेकिन बोल्ट ने 9.58 सेकेंड का समय निकालकर पॉवेल के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया था.

हालांकि पॉवेल का कहना है कि बोल्ट के दोनों व्यक्तिगत विश्व रिकॉर्ड तोड़ना किसी के लिए भी आसान नहीं होने वाला. उनके मुताबिक 9.58 सेकेंड का 100 मीटर का रिकॉर्ड एक बार टूट भी जाए लेकिन 19.19 सेकेंड का 200 मीटर का विश्व रिकॉर्ड तोड़ना किसी के लिए भी आसान नहीं होगा.

बर्बाद कर सकता है वॉट्सऐप वीडियो कॉलिंग इनवाइट

वॉट्सऐप ने इसी हफ्ते अपने यूजर्स के लिए वीडियो कॉलिंग की सुविधा शुरू की थी. अब महज तीन दिन के भीतर ही स्‍पैमर्स ने इसके जरिए लोगों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है. इसके लिए उन्‍होंने एक स्‍पैम वेबसाइट तैयार की है.

दरअसल, 15 नवंबर को वॉट्सऐप की यह सुविधा शुरू होने के बाद से ही यूजर्स को इससे जुड़े इन्विटेशन लिंक आने शुरू हो गए थे. जब कोई यूजर इस लिंक पर क्लिक करता है तो वह एक वेबपेज पर पहुंच जाता है और यहां से इस नए फीचर को ऐक्टिव किया जा सकता है.

अब इस फीचर की आड़ में जो स्‍पैम मेसेज भेजे जा रहे हैं, उनमें ऐसा कहा जाता है- 'आपको वॉट्सऐप वीडियो कॉलिंग फीचर ट्राई करने के लिए इनवाइट किया जाता है. इस फीचर को सिर्फ वही लोग ऐक्टिव कर सकते हैं, जिन्‍हें इन्विटेशन मिला है.' जैसे ही कोई यूजर इस लिंक पर क्लिक करता है, वह एक वेबसाइट पर पहुंच जाता है जो स्‍पैम होने के बावजूद उसके जैसे नहीं दिखती.

इस पूरी वेबसाइट को इस तरह डिजाइन किया गया है कि अच्‍छे से अच्‍छे लोग धोखा खा जाएं. जैसे ही आप इस फीचर को इनेबल (शुरू करने) करने वाले लिंक पर क्लिक करते हैं तो आप एक नए पेज पर पहुंच जाते हैं जहां यूजर वेरिफिकेशन की जरूरत होती है. यहां पर आपसे कहा जाता है कि इस फीचर को इनेबल करने के लिए आपको अपने चार और दोस्‍तों से इस लिंक को शेयर करना होगा और उन्‍हें इन्वाइट करना होगा. जैसे-जैसे आप इस लिंक पर आगे क्लिक करते जाते हैं, आप स्‍पैम के दायरे में आते जाते हैं और यह आपको हैकिंग का शिकार बना सकता है.

बस किजिए, और कितना चूना लगाएंगे मोदी जी

अपने देश और देशवासियों को मूर्ख बनाने वाली सरकार की जय हो! यह आपको कहना पड़ेगा. ऐसा न करने पर देशद्रोही बना दिये जाने का खतरा है. हिरासत में लिये जाने और न्यायालय परिसर में सार्वजनिक रूप से कन्हैया कुमार की तरह, गुण्डों से पिटना पड़ेगा, एनडीटीवी जैसी हालत भी हो सकती है. और क्या हो सकता है? की जानकारी के लिये मोदी जी और मोदी सरकार समर्थकों, संघी और भाजपायी से आप पूछ लें. पूछताछ केंद्र से निःशुल्क अनुभव भी मिल सकता है.

ऐसा कहा किसी ने नहीं, ना ही सरकारी फरमान है, लकिन सभी ‘देशभक्त‘ और ‘स्वयं सेवक‘ है, इसलिए ऐसी संभावनाओं का बनना स्वाभाविक है. वे शुल्क लेते नहीं, सभी उजले लोग हैं. भ्रष्टाचार मुक्त लोग हैं. नोट छूते हैं, मगर स्वच्छ करके. मोदी जी नोट बदलवा और छपवा कर अजब-गजब काम कर रहे हैं. लोगों का भेजा फेर रहे हैं.

हम भारत की मुद्रा व्यवस्था और उसके इतिहास का जिक्र नहीं करेंगे, मगर आजादी के बाद जो मुद्रा व्यवस्था बनायी गयी, वह कांग्रेस की सरकार ने किया. कई बार मुद्रा बदले गये, नयी मुद्राओं का चलन शुरू हुआ. यहां मोदी जी 2000 का नोट पहली बार छपवा रहे हैं, और 500 तथा 1000 रुपये के नोटों को बदल रहे हैं. दिखा ऐसे रहे हैं जैसे नोट पहली बार छप और बदल रहे हैं.

मोदी सरकार सब कुछ कमाल करने के तरीके से करती है. लोगों को जो नहीं है, उसे दिखाने और जो है, उसे छुपाने के इरादे से करती है. कह सकते हैं- खुलेआम धोखा देती है. हम धोखे में हैं, और मजा आ रहा है.

देश की आम जनता की मानसिकता मोदी के पक्ष में ऐसे बनायी जा रही है, कि ‘एक नेता‘ के फॉसिस्ट सपनों को पंख लग जाये. और उड़ान ऐसी हो कि एक दल और राष्ट्र का सपना अपने आप पूरा होता चला जाये. एकाधिकारवाद को आम जनता के कंधे पर लाद कर लाया जा रहा है.

मोदी जी नोट बंद करने और नोट छपवाने के दस फायदे गिना रहे हैं. और मोदी समर्थक लिक्खाड़ और मीडिया उसकी बुनावटें दिखा रहे हैं. वैसे तो फायदा के आगे सवाल ही सवाल है मगर हम फायदा के आगे एक-एक सवाल रख रहे हैं.

जवाब के आगे सवाल

– नकली नोट प्रचलन से बाहर हो जायेगा.

जब तक नेटवर्क है, क्या ‘डाई‘ बदल कर काम नहीं चल जायेगा?

–  काले धन पर रोक लगेगा.

क्या काला धन सिर्फ नोटों की शक्ल में है? स्विस बैंक से लेकर टैक्स हैवन और पनामा पेपर लिक्स का किस्सा यही है?

– हवाला कारोबार पर लगाम कसेगा.

यदि पांच सौ, हजार के नोट जरिया हैं, तो आप 2000 का नोट क्यों थमा रहे हैं?

– आतंकवाद के वित्तीय स्त्रोत पर चोट.

विश्व आतंकवाद का जनक अमेरिका और उसके मित्र देशों को आप नोट बदल कर रोक लेंगे?

– शैडो बैंकिंग का कारोबार बंद होगा.

बाजारवादी सट्टेबाज अर्थव्यवस्था को बढ़ाते हुए?

–  राजनीति में कालाधन का प्रभाव घटेगा.

कैसे? वित्तीय ताकतों के बिना राजसत्ता तो दूर रहा, राजनीति के अखाड़े का धूल चाटना ही नसीब होगा. जिनके पास अकूत धन सम्पदा और काले धन पर टिकी अर्थव्यवस्था है.

– भ्रष्टाचार पर काबू पाने में मदद मिलेगी.

आपने तो साल भर पहले ही भारत को भ्रष्टाचार मुक्त घोषित किया है, फिर काबू आप किस पर पायेंगे?

– महंगाई को काबू में करना आसान होगा.

क्या 2000 का नोट देने पर बाजार मे ढ़ाई हजार का सामान मिलेगा? कि यह नोट आपकी इजाद है?

– देश के आर्थिक विकास दर को रफ्तार मिलेगी.

खयाल पालें. अच्छा है. फायदा किसको मिलेगा?

– रियल स्टेट पर असर पड़ेगा. फ्लैटों के दाम घटेंगे.

समझ के बाहर है भाई, जो सस्ते में अपना बुखार नहीं देते, वो फ्लैट क्यों देंगे?

क्या नोटों के बदलने से रूपये की औकात बदल जायेगी? छोड़िये मोदी जी नोटों के बदलने से उनकी औकात नहीं बदलेगी. नंगा कपड़े पहन कर नंगई करेगा या नहीं? यह तो आप भी नहीं बता सकते. आपने उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के लिये सर्जिकल स्ट्राइक किया है. देखते हैं क्या होता है? वैसे छुपी हुई बात है, मगर है कि आपने हमारे ही जेब से हमारे अपने ही पैसे निकाल कर बैंकों में पूंजी के प्रवाह को बना लिया, ताकि पूंजीपतियों को बैंकों से पूंजी का सहयोग मिलता रहे.

एक आग्रह- झूठ का प्रचार तो आप करेंगे, सच में कुछ हो तो बताईयेगा. यह भी बताईयेगा कि इस सनक में कितने हजार करोड़ का चूना आपने देश को लगाया? देश प्रधानमंत्री का नहीं, देशवासियों का होता है, यह तो आपको मालूम है न?   

घर बैठे मंगाएं जियो सिम

रिलायंस जियो का सिम पाने की जद्दोजहद में लगे लोगों के‍ लिए राहत भरी खबर है. अब रिलायंस आपके घर पर जियो के सिम डिलिवर करेगी. यह सुविधा दिल्‍ली और एनसीआर सहित देश के चुनिंदा शहरों में ही उपलब्‍ध होगी.

एक अंग्रेजी मैगजीन के मुताबिक कंपनी ने कहा है कि रिलायंस जियो के सिम की डोर स्‍टेप डिलिवरी की व्‍यवस्‍था की गई है. होम डिलिवरी के लिए एप्‍लाई करने वाले कस्‍टमर्स के पास अगले कुछ हफ्ते में डिलिवरी भी शुरू कर दी जाएगी.

फिलहाल ये सुविधा सभी यूजर्स को नहीं मिलेगी. कंपनी चयनित शहरों के यूजर्स की आईपी के अनुसार उनके पास पॉपअप या फिर मैसेज के माध्‍यम से इस सुविधा का लाभ उठाने के लिए सूचित करेगी.

इन शहरों में मिलेगी डोरस्‍टेप डिलिवरी

एक अंग्रेजी अखबार ​की रिपोर्ट के अनुसार रिलायंस जियो सिम की होम डिलीवरी सर्विस की सुविधा दिल्ली-एनसीआर, मुंबई और बंगलुरू में उपलब्ध होगी. मुंबई में इस सुविधा को अक्‍टूबर महीने में पायलट प्रोजेक्‍ट के रूप में शुरू किया गया था. इसे 16 नवंबर से दिल्‍ली एवं अन्‍य शहरों में भी शुरू कर दिया गया है.

कैसे मिलेगी ये सुविधा

– इसके लिए उपभोक्ताओं को रिलायंस जियो की ऑफिशियल वेबसाइट पर जाना होगा.

– आपको होम डिलीवरी सर्विस के बारे में ऑटोमेटिक पॉप-अप नोटिफिकेशन प्राप्त होगा.

– हालांकि रिपोर्ट के अनुसार यह नोटिफिकेशन सभी उपभोक्ताओं को प्राप्त नहीं होगा.

– कंपनी ने तीन शहरों में ही सीमित आईपी एड्रेस के लिए यह सुविधा उपलब्‍ध कराई है.

– Reliance Jio सिम की होम डिलीवरी के लिए आपको अपना ऑर्डर रजिस्टर करना होगा.

– Reliance Jio एक्जिक्यूटिव ईकेवाईसी डिवाइस के साथ आपके घर आएगा.

– आपको 4G स्मार्टफोन में MyJio एप्स को इंस्टॉल और वेलकम ऑफर कोड जनरेट करना होगा.

– घर आने वाली एक्जिक्यूटिव आपसे आधार कार्ड की जानकारी और फिंगरप्रिंट लेगा.

– Reliance Jio वेलकम ऑफर कोड सब्मिट करने बाद आपकी सिम 15 मिनट में एक्टिवेट हो जाएगी.

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