त्योहारों में मूक व असहाय जानवरों की बलि चढ़ाने का रिवाज है. इन दिनों कसाइखानों से ले कर मंदिरों की चौखट में खून ही खून बिखरा नजर आता है. ‘अहिंसा परमो धर्म’ के विचाराधारा वाले इस देश में धर्म का सिर्फ एक ही काम है, वह है खून बहाना. कभी पूजापाठ की पीठ पर सवार हो कर तो कभी आतंकवाद की शक्ल में धर्म ने मानवता को खून से लथपथ कर दिया है.

देश में सभी धर्मों के अनुयायी अपनेअपने धर्म को अहिंसक बताने से थकते नहीं हैं. मगर कटु सत्य यह है कि धर्म की वजह से धर्मभीरू लोग जम कर हिंसात्मक तरीके से कहीं अपना तो कहीं दूसरे का खून बहा रहे हैं. मामला धर्म से जुड़ा होने के कारण शासनप्रशासन हाथ पर हाथ धरे बैठा नजर आता है. वहीं, दूसरी ओर देश में अनेक रोगी खून के अभाव में दम तोड़ दे रहे हैं.

धर्म की वजह से चल रहे अनेक दकियानूसी कामों में प्रतिवर्ष कहीं स्वयं के खून को चढ़ावे में देने, मातम करने के नाम पर खून बहाने, महिलाओं को भूतही, डायन, टोनही बता कर जान से मार देने एवं स्वयं लाखों निरीह पशु, पक्षियों, जंतुओं की बर्बरतापूर्वक हत्याएं कर दी जा रही हैं. हैरत की बात यह है कि सदियों से चले आ रहे इन जघन्य अपराधों को 21वीं सदी की उच्च शिक्षित पीढ़ी भी खुशी से अपना रही है.

केस-1 : उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में बासगांव कसबा स्थित दुर्गा मंदिर से जुड़ी एक परंपरा है. वहां प्रतिवर्ष चैत्र नवरात्रि के 9वें दिन श्रीनेत राजपूतों के विवाहित व्यक्ति शरीर के 9 स्थानों से देवी को खून चढ़ाते हैं जबकि अविवाहित शरीर के एक स्थान से खून निकाल कर चढ़ाते हैं.

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