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सबसे बड़ा ‘सेक्स सिंबल’ कहा जाना पसंद है: रणवीर सिंह

एनर्जेटिक और हंसमुख रणवीर सिंह मुंबई के हैं. अभिनय उनका पैशन है, लेकिन कोलेज के दिनों में कई बार उन्हें लगा था कि अभिनय का ख्याल करना उनके लिए ठीक नहीं. इसलिए वे लेखन के क्षेत्र में उतरे. जब विदेश में वे अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए गए, तो एक बार फिर अभिनय की ओर आकर्षित हुए, जहां उन्होंने कई नाटकों में काम किया और खूब प्रसंशा पाई. इसके बाद वे भारत आये और अभिनय की ओर रुख किया. कई जगहों पर ऑडिशन देने के बाद उन्हें यशराज की फिल्म ‘बैंड बाजा बारात’ मिली. यहीं से उनके अभिनय की शुरुआत हुई. उन्होंने कई हिट फिल्में तो कई फ्लॉप फिल्में भी दी ,लेकिन ‘बाजीराव मस्तानी’ उनकी एक यादगार फिल्म है, जिसमें उन्होंने बाजीराव की भूमिका बखूबी निभाई. उन्हें सबसे बड़ा ‘सेक्स सिंबल’ कहा जाना पसंद है. इस समय उनकी फिल्म ‘बेफिक्रे’ रिलीज़ पर है. जिसे वे ‘लाइट मूड’ की फिल्म कहते हैं, जिसकी शूटिंग पेरिस में हुई. उनसे बात करना रोचक था, पेश है अंश.

प्र. इस फिल्म को करने की वजह क्या है? किसी फिल्म को चुनते समय किस बात का ध्यान रखते हैं?

मैं हमेशा निर्देशक को ही देखता हूं. स्क्रिप्ट की सेंस अभी मुझे अधिक नहीं है. मैं थोड़ी ‘सेफ गेम’ खेलना चाहता हूं, इसलिए जिनकी फिल्में देखी हैं, उन्ही निर्देशक के साथ फिल्में करना चाहता हूं. इससे मुझे उनके काम के स्टाइल के बारे में थोड़ी जानकारी मिलती है और अभिनय करना आसान हो जाता है. कास्टिंग में मैं कभी नहीं घुसता. इसलिए मेरी को-स्टार कौन है, इस पर मैं कोई राय नहीं देता. आजतक प्राय: सभी फिल्मों में मैंने ही सबसे पहले फिल्म को साइन किया है.

प्र. फिल्म ‘बेफिक्रे’ के किरदार से अपने आप को कैसे ‘रिलेट’ करते हैं?

बेफिक्रे एक फिलोस्फी है, जिसका अर्थ यह है कि अधिक सोचना नहीं. वर्तमान में जीना है. मेरे हिसाब से लाइफ एक गिफ्ट है, जिसे पूरी तरह जिया जाना चाहिए. किसी काम को मैं हमेशा पूरे दिल से करता हूं. मैं जब फिल्में करता हूं या दोस्तों, परिवार वालों से मिलता हूं, तो पूरे तरीके से उनके साथ रहता हूं. इसके अलावा जो दिल में आये उसे करना पसंद करता हूं. पहले मैं डरता था कि ये काम सही कर रहा हूं या नहीं. अब तो बिलकुल भी नहीं डरता, जिससे मुझे खुशी मिले वह करता हूं. दर्शको को खुश करना ही मेरा मकसद होता है.

प्र. आप अपनी सफलता को कैसे देखते हैं?

मैंने कई सफल फिल्में और ब्रांड इंडोर्समेंट किये हैं. सफलता की परिभाषा मेरे लिए अलग है. मैंने औरो के लिए क्या किया, समाज को क्या वापस किया, कितनी अच्छाई आप चारों ओर बिखेर रहे हैं? ये सब देखता हूं. इसके अलावा क्या मैं अपनी शर्तों पर काम कर सकता हूं? मेरी सफलता छोटी है. अपने टर्म पर जो लाइफ को जिए, वही इंसान सफल है. मुझे नहीं लगता कि मैं सफल हूं. हालांकि कई फिल्में सफल हुई हैं. पर मैं लार्जर विज़न से दूर हूं. अभी भी कुछ चीजों से मैं बंधा हुआ हूं.

प्र. पेरिस की शूटिंग का अनुभव कैसा था?

वहां मेरे लिए निर्देशक ने एक आलीशान अपार्टमेंट खरीद दिया था. बहुत ही अच्छा अनुभव था. जगह बहुत ही खुबसूरत है. वहां के लोग भी बहुत अच्छे हैं. वहां का खाना, वहां की बोली अदभुत है. फिर ये एक हैप्पी फिल्म है. मूड भी वैसा ही था. इसलिए सबको सेट पर खुश होकर आने के लिए कहा गया था, ताकि वह खुशी पर्दे पर भी नज़र आये. मैं किसी भी चरित्र में हमेशा घुस जाने की कोशिश करता हूं, अगर दृश्य गुस्से का है, तो पूरा दिन मैं उसमें रहने की कोशिश करता हूं और ये बात मैं अपने टीम मेम्बर को पहले ही बता देता हूं ताकि वे मेरे किसी बात का बुरा ना माने. इस फिल्म में पूरा मनोरंजन का है. पूरी फिल्म मैंने विदेश में की और मेरा सपना कुछ हद तक पूरा हो चुका है.

प्र. फिल्म का प्रमोशन कितना जरूरी है? इसका फायदा और नुकसान कितना होता है?

फिल्म के लिए पहले ट्रेलर, फिर गाने जरुरी हैं. इससे फिल्म का फ्लेवर पता चलता है. अगर दर्शकों को ये दो चीजें पसंद नहीं आई है, तो आप कितना भी ढिंढोरा पीट लो, प्रमोशन कर लो, फिल्म नहीं चलती. कई बार बड़ी फिल्म भी प्रमोशन करने के बाद नहीं चलती, जबकि छोटी फिल्म बिना प्रमोशन के चल जाती हैं. दक्षिण में फिल्मों का प्रमोशन केवल एक सप्ताह में होता है, जिससे फिल्म के प्रति लोगो की रूचि बनी रहती है. वहीं प्रमोशन अगर हम एक दो महीने से करते हैं तो बार-बार एक बात रिपीट होती रहती है. आजकल प्रमोशन एक इंटरप्राईज हो चुका है, जहां लोग एक दूसरे की प्रॉफिट को देखने लगे हैं.

प्र. क्या आपको स्टारडम खत्म हो जाने का डर कभी सताता है? आप अपने आप को कैसे ‘कूल’ रखते हैं?

अभी तक सोचा नहीं है. मैं हमेशा चाहता हूं कि मुझे काम मिलता रहे. ‘मनी’ और ‘फेम’ मुझे कभी भी आकर्षित नहीं करती. मुझे पैसा पसंद है जिससे मुझे हर तरह के ऐशोआराम मिल रहा है. पर मैं यह जानता हूं कि यह हमेशा नहीं रहेगा. ये सही है कि जितना अधिक पैसा और प्रसिद्धी आपके पास रहेगी, जिंदगी उतनी ही कठिन होगी, जिसमें आपके खुद का व्यक्तित्व प्रभावित होता है. मैं इसे संतुलित करने के लिए काम के साथ-साथ अपने माता-पिता, बहन के अलावा अपने मित्रों को भी समय देता हूं. नहीं तो आप प्रसिद्दी और पैसे के पीछे भागते-भागते अपने परिवार और दोस्तों को खो देंगे, ऐसे में निश्चित ही आप अकेले रह जायेंगे. इसलिए जब मैं अपने परिवार और दोस्तों के बीच में होता हूं तो अपना मोबाइल बंद कर देता हूं, ताकि उस पल को मैं पूरी तरह उनके साथ रहूं. सेलिब्रिटी स्टेटस जितना बढ़ेगा, उतना ही मेरा सामाजिक दायरा कम होता जायेगा. मैं इससे डरता हूं और अभी से सब रिश्तों को सम्हाल रहा हूं.

मैं बहुत गुस्से वाला हूं, पर अपने आपको शांत रखने की हमेशा कोशिश करता हूं. अभिनय करने से पहले मैं मेडिटेट करता हूं. सही खाना, वर्कआउट और नींद ठीक होने पर मैं खुश रहता हूं. इससे मेरा तनाव भी कम होता है. मैं ‘आउटब्रस्ट’ नहीं होता और अपने आप को कंट्रोल करना जानता हूं. कई बार ऐसा हुआ है कि मैंने कोई बात कह दी और बाद में मुझे पछताना पड़ा.

प्र. पहली फिल्म से लेकर अब तक की फिल्म के दौरान अपने आप में क्या बदलाव महसूस करते हैं?

पहली फिल्म में मै कुछ नहीं जानता था. किसी को पहचानता नहीं था. मुझे वैनिटी वैन में बैठने के लिए कहा गया. मैं वहां बैठकर ‘रेस्टलेस’ होकर बुलाये जाने की अपेक्षा करता रहा. इस तरह आदित्य चोपड़ा ने मुझे हीरो बनाया. मैं समझता हूं कि वही मेरा सबसे ईमानदार परफोर्मेंस था. अभी तो सबकुछ पता है. इसका श्रेय आदित्य चोपड़ा को जाता है. इसलिए मैं उन्हें हमेशा प्राउड फील करवाना चाहता हूं. मुझे याद आता है कि पहली फिल्म के दौरान मैं बहुत इमोशनल भी हो गया था, क्योंकि इससे पहले उन्होंने केवल शाहरुख खान को लीड रोल में लिया था. संजय लीला भंसाली और आदित्य चोपड़ा मेरे लिए खास निर्देशक हैं.

प्र. आप अपनी कंट्रोवर्सी को कैसे लेते हैं?

कंट्रोवर्सी तो आती हैं, पर उसे मैं अधिक महत्व नहीं देता. हमेशा सोच समझ कर हर काम करने की कोशिश करता हूं, पर अगर कुछ गलत हो भी जाय तो माफी भी मांग लेता हूं.

प्र. क्या नोट बंदी का आपकी फिल्म पर कुछ असर पड़ेगा?

नहीं, फिल्म अच्छी है, असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि मनोरंजन भी डेली लाइफ का एक पार्ट है और लोग अवश्य मैनेज कर लेंगे. मुझे लगता है कि ये सबकी समस्या है जो थोड़े दिनों बाद ठीक हो जाएगी. 

जानलेवा फेसबुक फ्रैंडशिप

आजकल तकरीबन हर कोई सोशल मीडिया खासतौर से फेसबुक, ट्विटर और वाट्सऐप पर मौजूद है. कई लोगों के लिए इन साइटों पर रहना जरूरत की बात है, तो ज्यादातर लोग इन के जरीए अपना वक्त काटते हैं. हैरानी की बात है कि अब तेजी से लड़कियां भी फेसबुक पर दिख रही हैं. बड़े शहरों की लड़कियों को पछाड़ते हुए अब देहातों और कसबों की लड़कियां भी फेसबुक पर अकाउंट खोल कर दोस्त बनाने लगी हैं और उन से चैट यानी लिखित में बातचीत करने लगी हैं. फेसबुक पर दोस्त बना कर उन से चैट करने पर घर वालों को कोई खास एतराज नहीं होता, क्योंकि उन्हें स्मार्टफोन और कंप्यूटर की ज्यादा जानकारी नहीं होती, इसलिए लड़कियां बेखौफ हो कर अपने बौयफ्रैंड से बातें करती हैं.

ये बातें कभीकभी ऐसे जुर्म की भी वजह बन जाती हैं, जिस से नादान लड़कियां मुसीबत में पड़ जाती हैं, इसलिए अब जरूरी हो चला है कि फेसबुक का इस्तेमाल सोचसमझ कर और एहतियात बरतते हुए किया जाए, नहीं तो हालात मध्य प्रदेश के इंदौर की प्रिया जैसे भी हो सकते हैं.

आशिक बना कातिल

17 साला प्रिया इंदौर के गीता नगर इलाके के कृष्णा नगर अपार्टमैंट्स में तीसरी मंजिल पर रहती थी. हाईस्कूल में पढ़ रही प्रिया पढ़ाई की अहमियत समझती थी, इसलिए इंजीनियर बनने की अपनी ख्वाहिश पूरी करने के लिए उस ने अभी से आईआईटी की भी तैयारी शुरू कर दी थी और कोचिंग क्लास में  जाती थी. प्रिया के पिता श्याम बिहारी रावत एक कोचिंग इंस्टीट्यूट में काम करते हैं और मां किरण पेशे से ब्यूटीशियन हैं. हालांकि ये लोग कोई बहुत बड़े रईस नहीं हैं, लेकिन इज्जत से गुजारे लायक कमाई आराम से हो जाती थी. पूजा इन दोनों की एकलौती लड़की थी. दूसरी लड़कियों की तरह पूजा भी फेसबुक का इस्तेमाल करती थी और उस के कई दोस्त भी बन गए थे.

प्रिया जानती थी कि फेसबुक पर लड़कों या अनजान लोगों से दोस्ती करना अब खतरे से खाली बात नहीं, इसलिए वह ऐसी फ्रैंड रिक्वैस्ट मंजूर नहीं करती थी, जिन में सामने वाला जानपहचान का न हो. एक दिन पूजा को प्रियांशी नाम की लड़की ने फ्रैंड रिक्वैस्ट भेजी, तो उस ने इसे मंजूर कर लिया, क्योंकि प्रियांशी लड़की थी और उस की प्रोफाइल भी प्रिया को ठीकठाक लगी थी. धीरेधीरे प्रिया और प्रियांशी की फेसबुक पर दोस्ती गहराने लगी और दोनों चैटिंग करने लगीं. इस दौरान प्रिया ने प्रियांशी से कई दिली बातें कीं और अपना और अपनी मम्मी का मोबाइल नंबर भी उसे दे दिया. लेकिन एक दिन प्रियांशी की हकीकत प्रिया के सामने खुल ही गई कि वह लड़की नहीं, बल्कि लड़का है. उस का असली नाम अमित यादव है. वह

24 साल का है और पेशे से सौफ्टवेयर इंजीनियर है अमित ने असलियत बताते हुए प्रिया से मुहब्बत का इजहार किया, तो धोखा खाई प्रिया तिलमिला उठी और उस ने अमित का अकाउंट ब्लौक कर दिया. गूजरखेड़ी गांव का रहने वाला अमित अब तक प्रिया, उस के घर और स्वभाव के बारे में चैट के जरीए प्रिया से ही काफीकुछ जानकारी हासिल कर चुका था, इसलिए उस ने प्रिया के मोबाइल पर फोन कर उस से अपनी मुहब्बत का इजहार किया. तब भी प्रिया ने उसे झिड़क दिया. जब प्रिया ने अमित का फोन रिसीव करना बंद कर दिया, तो एकतरफा प्यार में पागल इस सिरफिरे आशिक ने मैसेज भेजने शुरू कर दिए. प्रिया को अब समझ आ गया था कि धोखे या गलती से ही सही, वह एक गलत और झक्की नौजवान से फेसबुक पर दोस्ती कर के फंस चुकी है, तो उस ने पीछा छुड़ाने के लिए उस पर ध्यान देना ही बंद कर दिया. इस अनदेखी और बेरुखी से अमित और भी तिलमिला गया, जो यह मान कर चल रहा था कि चूंकि वह प्रिया से प्यार करता है, इसलिए यह उस की जिम्मेदारी है कि वह भी उसे प्यार करे. हालांकि उसे मन में कहीं न कहीं एहसास होने लगा था कि प्रिया सख्तमिजाज और उसूलों वाली लड़की है.

हिम्मत न हारते हुए अमित ने प्रिया की मां किरण को फोन किया और सारी बात बताई. इस पर किरण ने प्रिया से पूछा, तो उस ने मां को साफसाफ बता दिया कि अमित एक धोखेबाज लड़का है, जिस ने लड़की बन कर फेसबुक पर उस से दोस्ती की और अब जबरदस्ती प्यारमुहब्बत की बातें कर रहा है.

बेरहमी आशिक की

मां किरण ने आजकल के जमाने को देख शुरू में तो बेटी की तरह ही अमित को झिड़क दिया. यह देख कर अमित गिड़गिड़ाया, ‘‘आंटी, मुझे बस एक बार प्रिया से बात कर लेने दें, फिर मैं कभी फोन नहीं करूंगा.’’ दुनिया देख चुकीं किरण यहीं गच्चा खा गईं. उन्होंने सोचा था कि लड़का एकतरफा प्यार में पागल हो गया है और कहीं ऐसा न हो कि गुस्से में आ कर बेटी को कोई नुकसान पहुंचा दे, इसलिए जब 27 सितंबर, 2016 की सुबह उस का दोबारा फोन आय , तो उन्होंने उसे घर आने की इजाजत दे दी, लेकिन इस शर्त पर कि बात दरवाजे के बाहर से ही होगी. अमित तो मानो इसी फिराक में था, इसलिए वह किरण की हर बात मानता गया और सुबह के तकरीबन 10 बजे उन के घर पहुंच गया.

जब किरण ने उसे दरवाजे से ही टरकाना चाहा, तो वह फिर दुखी होने की ऐक्टिंग करते हुए बोला, ‘‘यहां बाहर खड़ेखड़े क्या बात होगी. अंदर आने दें तो इतमीनान से बात कर लूंगा.’’

किरण ने उसे अंदर आने दिया. अंदर आ कर अमित ने बाथरूम जाने की बात कही और बाथरूम में चला भी गया. अंदर कमरे में प्रिया स्कूल जाने के लिए अपना बैग लगा रही थी कि अमित ने बगैर कुछ कहे या मौका दिए पीछे से चाकू निकाल कर उस पर जानलेवा हमला कर दिया. प्रिया हमले से घबराई और चीखी तो किरण उस के कमरे की तरफ भागीं, पर जब तक अमित प्रिया पर चाकू के दर्जनभर वार कर चुका था, जो पीठ के अलावा पेट, सीने और चेहरे पर लगे थे. बदहवास सी किरण बेटी को बचाने बीच में आईं, तो अमित ने उन पर भी हमला बोल दिया. मौका पा कर प्रिया बाथरूम में जा घुसी और डर के मारे भीतर से दरवाजा बंद कर लिया. शोर सुन कर अपार्टमैंट्स के कई लोग किरण के फ्लैट की तरफ भागे, तो उन्होंने हाथ में चाकू लिए एक नौजवान यानी अमित को भागते देखा. दूसरी मंजिल पर आ कर उस ने भीड़ देखी, तो अपने बचाव के लिए वह नीचे कूद गया.

इधर लोग किरण के घर में गए और हालात देख कर बाथरूम का दरवाजा तोड़ा. वहां प्रिया बेहोश पड़ी थी. लोगों ने तुरंत पुलिस को खबर की और प्रिया को कार में डाल कर अस्पताल की तरफ भागे, पर इलाज के दौरान ही प्रिया ने दम तोड़ दिया.

अमित नीचे कूद तो गया, लेकिन उस के हाथपैर की हड्डियां टूट गईं, इसलिए भाग नहीं सका और गिरफ्तार हो गया. उसे जेल वार्ड में रखा गया. अमित अपने बयानों में पुलिस को यह कहते हुए बरगलाने की कोशिश करने लगा कि प्रिया उस पर जबरदस्ती करने का झूठा इलजाम लगा रही थी और उसी ने 100 नंबर पर फोन कर पुलिस को बुलाया था. पर यह बहानेबाजी ज्यादा नहीं चली और जल्दी ही एकतरफा प्यार में पगलाए इस आशिक का जुर्म सामने आ गया. प्रिया के पिता श्याम बिहारी ने जब बेटी की हत्या की खबर सुनी, तो सदमे के चलते वे बेहोश हो गए और होश में आते ही हत्यारे अमित को फांसी की सजा देने की मांग करने लगे.       

एहतियात बरतना है जरूरी

जिस ने भी इस अपराध के बारे में सुना, वह सन्न रह गया और फेसबुक जैसी साइट को कोसता नजर आया कि आजकल यह जुर्म का नया जरीया बन गया है, इसलिए लड़कियों को जरा संभल कर रहना चाहिए. बात सच भी है, क्योंकि लड़कियां फेसबुक पर ज्यादा से ज्यादा फ्रैंड्स बनाना अपनी शान की बात समझती हैं. हालांकि प्रिया ने अमित को लड़की समझ कर उस से दोस्ती की थी, पर इस हादसे से लगता है कि फेसबुक का इस्तेमाल करते समय लड़कियों को कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए, नहीं तो वे भी प्रिया की तरह किसी हादसे या जुर्म का शिकार हो सकती हैं:

* यह जरूरी नहीं कि जो फ्रैंड रिक्वैस्ट भेज रही है, ये हकीकत में लड़की हो, इसलिए उसे प्रोफाइल की बारीकी से जांच कर लेनी चाहिए कि फैमिली फोटो डाले गए हैं या नहीं.  कितने फ्रैंड्स कौमन हैं. अगर कौमन फ्रैंड्स न हों या कम हों, तो भी फ्रैंड रिक्वैस्ट कबूल नहीं करनी चाहिए.

* किसी भी अनजान शख्स की फ्रैंड रिक्वैस्ट कबूल न करें.

* अपने प्रोफाइल में मोबाइल नंबर नहीं डालना चाहिए, न ही चैटिंग में किसी को देना चाहिए.

* अगर सामने वाली लड़की ज्यादा अपनापन दिखाए, तो चौकन्ना हो जाएं. अकसर जब 2 अनजान लड़कियां दोस्त बनती हैं, तो एकदूसरे से यह जरूर पूछती हैं कि तुम्हारा कोई बौयफ्रैंड है क्या? तुम ने कभी सैक्स किया है क्या? ऐसी बातें करने वाली लड़की को भाव नहीं देना चाहिए.

* घर का पता किसी को न दें.

* फेसबुक का पासवर्ड भी किसी को न दें.

* फ्रैंड कहीं बाहर होटल या पार्क वगैरह में मिलने बुलाए, तो सख्ती दिखाते हुए मना कर देना चाहिए. आजकल लोग गिरोह बना कर भी फेसबुक पर भोलीभाली लड़कियों को फांसने लगे हैं.

* अगर यह पता चल जाए कि सामने जो लड़की थी, वह असल में लड़का है, तो उस से धीरेधीरे कन्नी काटनी चाहिए. ब्लौक कर देने या भड़कने से गुस्से में आ कर लड़का कोई भी खतरनाक कदम उठा सकता है.

* इस के बाद भी बात न बने, तो मांबाप या घर के बड़ों को भरोसे में लेते हुए सारी बात बता देनी चाहिए.

बिहटा: जमीन दबाने और गंवाने का खेल

बिहार में पटना से सटे बिहटा ब्लौक के इलाकों में जमीन खरीदने, बेचने और गैरकानूनी तरीके से सरकारी जमीनों पर कब्जा करने की होड़ मची हुई है. बिहटा में आईआईटी बनने के बाद वहां कई रिएल ऐस्टेट कंपनियों ने भी अपने पैर जमा लिए हैं और कम कीमत पर जमीन खरीद कर अपार्टमैंट्स बनाने का धंधा चालू कर दिया है. इस से बिहटा में जमीन की कीमतों में कई गुना ज्यादा इजाफा होने से जमीन को ले कर कई तरह की तिकड़मबाजी चल रही है. हालत यह है कि सूखी नदी की जमीन पर कब्जा जमाने की होड़ मची हुई है.

वहीं दूसरी ओर अपनी मरजी से सरकारी योजना के लिए जमीन देने वाले किसान मुआवजा पाने के लिए पिछले 5 सालों से लड़ाई लड़ रहे हैं. बिहटा में दनवा नदी के सूखने के बाद पहले तो दबंगों ने उस की खाली जमीन पर कब्जा जमाया और अब उसे बेचने की साजिशें भी शुरू हो चुकी हैं. कई जमीनें बिक भी गई हैं. अब उन पर पक्के मकान भी बनने शुरू हो गए हैं. इतना होने के बाद भी प्रशासन की नींद नहीं खुल सकी है. जमीन को खरीदने वाले भी दबंग ही हैं और जमीन लेने के तुरंत बाद जेसीबी मशीन लगा कर जमीन पर मिट्टी भराने का काम शुरू कर दिया है. वहीं के बाशिंदों ने जब इस मामले के बारे में थाने को जानकारी दी, तो थाने ने टका सा जवाब दे दिया कि इस मामले में उसे कोई शिकायत नहीं मिली है.

बिहटाखगौल सड़क के किनारे बहने वाली दनवा बरसाती नदी है और वह पिछले कई सालों से सूखी पड़ी है. इस वजह से कई दबंगों और जमीन माफिया की नजरें उस पर गड़ी हुई हैं. पहले उस में बांस, फूस और खपरैल की झोंपडि़यां बनाई गईं और अब उस पर कानूनन कब्जा जमाने के लिए उस की खरीदफरोख्त का काम भी शुरू कर दिया गया है. बिहटा पटना शहर से 35 किलोमीटर की दूरी पर बसा है. पटना शहर के बढ़ने से बिहटा में जमीन की कीमतें काफी बढ़ गई हैं और वहां जमीन खरीदने की होड़ सी मची हुई है. कई छोटीबड़ी रिएल ऐस्टेट कंपनियों ने वहां काम चालू कर रखा है. बिहटा के अम्हारा गांव के पास 5 सौ एकड़ जमीन में आईआईटी बनने के बाद वहां की जमीन की कीमतों में काफी उछाल आया है. पटना एयरपोर्ट को भी  फुलवारीशरीफ से हटा कर बिहटा में ले जाने की तैयारी चल रही है.

गौरतलब है कि बिहटा में एयरफोर्स बेस स्टेशन भी है. इन सब वजह से वहां की जमीन अचानक ही कई गुना ज्यादा महंगी हो गई है. 5 साल पहले एक लाख रुपए में एक बीघा यानी 20 कट्ठा के भाग से बिकने वाली बिहटा की जमीनों की कीमत आज 20 लाख रुपए प्रति कट्ठा हो चुकी है. जमीन की कीमतें बढ़ने के बाद अब सूखी नदी की जमीन को बेचने और खरीदने की आपाधापी मची हुई है. इस आपाधापी का फायदा जमीन माफिया जम कर उठा रहे हैं और लोगों को जमीन बेच कर बेवकूफ बना रहे हैं. अब जमीन बेचने और खरीदने की होड़ के बीच दबंग जमीन माफिया ने सालों से सूखी पड़ी दनवा नदी की खाली पड़ी जमीन को बेचना चालू कर दिया है. कम कीमत में जमीन खरीदने की मारामारी के बीच लोगों की आंखें इस कदर बंद हैं कि जमीन खरीदने के पहले उस के बारे में छानबीन भी नहीं ले रहे हैं. कई लोग तो जमीन की घेराबंदी कर उस पर मकान बनाना शुरू कर चुके हैं. दिनरात कई टै्रक्टर तो जमीन को मिट्टी से भरने के काम में लगे हुए हैं.

बिहटा के श्रीचंद्रपुर से ले कर महमूदपुर मुसहरी तक के गांवों के आसपास नदी की जमीन को बेचने का काम धड़ल्ले से चल रहा है. जगहजगह जेसीबी मशीनों और ट्रैक्टरों को लगा कर मिट्टी की कटाई और भराई का काम बड़े पैमाने पर चल रहा है और प्रशासन को इस की खबर तक नहीं लग पा रही है. श्रीचंद्रपुर गांव के रहने वाले किसान मधुसूदन यादव कहते हैं कि दनवा नदी का तो वजूद ही खत्म कर दिया गया है.  लगता ही नहीं कि वहां पर कभी कोई नदी थी. किसी ने 4 कट्ठा जमीन खरीदी, पर 10 कट्ठा में बाउंड्री कर ली है. कुछ लोगों को तो धोखे में रख कर जमीन बेची जा रही है, तो कई ऐसे लोग भी हैं, जो सबकुछ जानने के बाद भी जमीन खरीद रहे हैं. ऐसे लोगों की सोच है कि जब एक बार सरकारी जमीन पर कब्जा कर पक्का मकान बना लिया जाएगा, तो फिर सरकार के साथ सालों तक केसमुकदमा चलेगा और उस के बाद हार कर सरकार कुछ रुपए ले कर जमीन की रजिस्ट्री करने का आदेश जारी कर ही देगी.

दबंगों की देखादेखी आसपास के इलाकों के दलित परिवारों ने भी नदी की जमीन पर झोंपडि़यां बनानी शुरू कर दी हैं. डेढ़ सौ से ज्यादा झोंपडि़यां बन कर तैयार हो गई हैं और उन में लोग रहने भी लगे हैं. दनवा नदी बिहटा के ही अम्हारा गांव से निकलती है. उस के बाद वह बिहटा और मनेर होते हुए दानापुर कैंट के पास गंगा नदी में जा कर गिरती है. यह बरसाती नदी है, पर पिछले कई सालों से बिहटा के किसानों के लिए जीवनरेखा बनी हुई थी. सिंचाई के काम में नदी के पानी का बेहतर इस्तेमाल किया जाता था. हजारों एकड़ में खरीफ की फसल की बोआई में इस नदी के पानी का इस्तेमाल होता था. इस के साथ ही साथ नदी के पानी से उस इलाके में जमीनी पानी लैवल को भी ठीक रखने में मदद मिलती थी. इस गैरकानूनी कब्जे के मामले के तूल पकड़ने के बाद प्रशासन की नींद खुली और सर्किल अफसर रघुवीर प्रसाद ने मामले की जांच कराई है.

शुरुआती जांच में पता चला है कि 80 लोगों ने नदी की जमीन पर कब्जा जमा रखा है. कइयों ने पक्के घर भी बना लिए हैं. वहीं महमूदपुर और अहियापुर मुसहरी के महादलितों ने 60 से ज्यादा छोटीबड़ी झोंपडि़यां बना ली हैं. वहीं दूसरी ओर सरकारी योजनाओं के लिए अपनी मरजी से जमीन देने वाले किसान पिछले 10 सालों से मुआवजे के लिए अफसरों के पास चक्कर लगा रहे हैं. बिहटा में आंदोलन के दौरान बीमार हुए किसान कौशल किशोर पांडे की तकरीबन साढ़े 32 एकड़ जमीन का अधिग्रहण साल 2007 में किया गया था. वाजिब मुआवजे की मांग करतेकरते थक जाने के बाद वे आमरण अनशन पर बैठ गए. उसी दौरान उन की तबीयत खराब होने के बाद मौत हो गई. कौशल किशोर पांडेय की बीवी शांति देवी बताती हैं कि जमीन का अधिग्रहण होने और पूरा मुआवजा नहीं मिलने से उन के पति समेत पूरा परिवार परेशान था. एक तो खेती की जमीन छिन गई और दूसरा उन्हें सही मुआवजा नहीं दिया गया. ऐसे में किसानों के सामने जान देने के अलावा और कोई रास्ता ही नहीं बच गया है. गौरतलब है कि बिहटा में बिहटा लैंड बैंक, मैगा औद्योगिक पार्क और बिहटा औद्योगिक क्षेत्र के लिए 1280 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया गया है.

सरकारी अफसरों और बाबुओं की लापरवाही का आलम तो यह है कि आईआईटी की इमारत बनाने के लिए सरकार ने 11.5 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया और उस पर इमारत बना भी दी. इस के बाद भी अफसरों को पता नहीं है कि उस 11.5 एकड़ जमीन का अधिग्रहण हुआ है या नहीं? पिछले दिनों जब जिला भूअर्जन पदाधिकारी एनामुलहक सिद्दीकी किसानों की समस्या को सुनने अम्हारा गांव पहुंचे, तो किसानों ने उन्हें इस मामले की जानकारी दी. किसान आनंद, रामनाथ शर्मा, पंचानन शर्मा, राधेश्याम शर्मा वगैरह किसानों ने उन्हें बताया कि प्रशासन की ओर से अधिग्रहण की कोई सूचना उन्हें नहीं मिली है. खाता नंबर – 149, 478, 664 समेत कई भूखंड को मिला कर 11.5 एकड़ जमीन होती है. भूअर्जन पदाधिकारी ने जब अपने रिकौर्ड की जांच की, तो पता चला कि उन किसानों की जमीन अधिग्रहण सूची में शामिल ही नहीं है.

बिहटा के किसानों का दर्द केवल वाजिब मुआवजे का मिलना ही नहीं है, बल्कि उन्हें सब से ज्यादा दुख इस बात का है कि सरकार और उस के बाबुओं ने उन के साथ ठीक रवैया नहीं अपनाया. साल 2007-08 में जब पश्चिम बंगाल में सिंगूर जल रहा था, तो बिहटा के किसानों ने राज्य की तरक्की के लिए अपनी मरजी से जमीन सरकार को सौंप दी थी. सरकार के प्रस्ताव के बाद किसानों ने सरकार को राजीखुशी जमीन सौंप कर मिसाल पेश की थी. किसानों को हीरो करार देने के बदले सरकारी कुनबे ने अब उन्हें विलेन बना डाला. बिहटा में आईआईटी, एनआईटी, ईएसआईसी अस्पताल समेत कई बड़ी कपड़ा और साइकिल कंपनी के प्लांट लगने थे. किसानों ने सोचा था कि बड़ेबड़े संस्थान और कंपनियों के आने से बिहटा समेत समूचे बिहार का भला होगा, पर जमीन सौंपने के 9-10 साल के बाद ही मामला उलट गया. आज बिहटा के किसान सरकारी तंत्र की अनदेखी से नाराज हैं और समूचा बिहटा उबल रहा है. किसान संजय मिश्रा बताता है, ‘‘हम लोगों ने बिना किसी सरकारी दबाव के अपनी मरजी से जमीन सरकार को दी थी. किसी भी किसान ने रत्तीभर विरोध नहीं किया.

‘‘बिहटा के किसान इस बात से खुश थे कि बड़े कालेज और कंपनी के खुलने से बेरोजगार नौजवानों को काम मिलेगा और पूरे इलाके की परेशानियां दूर हो जाएंगी. ‘‘शुरू में तो सबकुछ ठीकठाक था, पर बाद में बाबुओं की करतूतों के चलते किसानों को जमीन का मुआवजा पाने के लिए हल्लाहंगामा करना पड़ा, सड़कों पर उतरना पड़ा और इन सब चक्कर में 3 किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ गई.’’ सरकारी सिस्टम से परेशान और हताश होने के बाद बिहटा के किसानों ने साल 2013 में आंदोलन चालू कर दिया. पहली दफा 13 दिनों तक उपवास पर रहने के बाद सरकार की नींद खुली, तो आननफानन मुआवजा देने का ऐलान कर दिया गया. उस के बाद 2 सालों तक किसान मुआवजे के इंतजार में रहे, पर कुछ नहीं मिल सका.

किसानों का कहना है कि साल 2007 में अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू हुई थी और भूअर्जन नीति के मुताबिक एक साल के अंदर अधिग्रहण की सारी खानापूरी करने के बाद किसानों को पूरा मुआवजा दे देना था. सरकारी सुस्ती और बाबुओं की करतूतों की वजह से किसानों को पूरा मुआवजा नहीं मिल सका. किसानों का आरोप है कि सरकार ने उन से कौडि़यों के भाव जमीन ले कर कई बड़ी कंपनियों को ऊंची कीमत पर बेच दिया है. बिहार के राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री नरेंद्र नारायण यादव का दावा है कि 3 परियोजनाओं के लिए जमीन देने वाले किसानों को मुआवजा देने का काम शुरू हो गया है. आंदोलन के दौरान मरे कौशल किशोर पांडे के परिवार को मुआवजा दिया गया. 15 जून, 2016 को कुल 16 किसानों के बीच एक करोड़, 69 लाख, 32 हजार 847 रुपए का मुआवजा बांटा गया. भूअर्जन से जिन किसानों के बैंक खाते में मुआवजा भेजने का पत्र प्रमाणित हो कर कोषागार में पहुंचेगा, उन को मुआवजे की रकम दे दी जाएगी.

जिंदगी नशे की भेंट मत चढ़ाइए

नशे की लत वह भयंकर बीमारी है, जो न केवल उस शख्स को, बल्कि उस के पूरे परिवार को खोखला कर देती है. इस की भयावहता का अंदाजा उस परिवार को देख कर आसानी से लगाया जा सकता है, जिस का मुखिया ही नशे की गिरफ्त में हो. नशेड़ी बेरोजगार हो जाता है और तरहतरह की बीमारियों का शिकार हो जाता है. उस के परिवार की हालत दरदर भटकते भिखारी जैसी हो जाती है और उस की समाज में इज्जत वगैरह सब खत्म हो जाती है. नशेड़ी 2 तरह के होते हैं. एक वे, जो नशा करने को बुरा नहीं मानते हैं. दूसरे वे, जो इसे बुरा मानते हैं, पर लत से मजबूर हैं. जो बुरा नहीं मानते हैं, उन को कुछ भी समझाओ, उन के पास जवाब पहले से हाजिर होते हैं. आओ उन के जवाब देखते हैं :

सवाल : अरे भैया, देखो तो नशे से तुम्हारा शरीर कैसा हो गया है?

नशेड़ी : कैसा हो गया है. एक दिन तो सब का शरीर मिट्टी में मिलना ही है.

सवाल : पर उस दिन के आने से पहले ही क्यों मरना चाहते हो?

नशेड़ी : आप को पता है क्या, मौत कब आएगी? मौत तो जब आनी है, तब आएगी.

सवाल : देखो कितना पैसा इस में लग जाता है. सही कहा न?

नशेड़ी : मैं अपने पैसे की पीता हूं, आप से मांगने तो नहीं आता?

सवाल : तुम्हारी पत्नी, मांबाप, बच्चे सब दुखी होंगे?

नशेड़ी : उन की चिंता मुझे करनी है. आप अपने काम से काम रखो.

इस दर्जे के नशेडि़यों से नशा नहीं छुड़ा सकते. नशा छुड़ाने के लिए इन्हें ‘नशा मुक्ति केंद्र’ में ले जाना ही उचित रहेगा. दूसरे नशेड़ी वे हैं, जो नशे को बुरा मानते हैं. वे इसे छोड़ना भी चाहते हैं, पर लत से मजबूर हैं. ऐसे नशेड़ी अगर कोशिश करें, तो नशा छोड़ सकते हैं. कुछ सुझाव पेश हैं:

बुरी संगत से दूर रहें

नशा देखादेखी का शौक है. अगर ऐसे लोगों से दूर रहें जो नशा करते हैं, तो आप की इच्छा नहीं होगी या इच्छा होगी भी, तो आप दबा पाएंगे. ऐसे लोगों को आप को बताना भी नहीं चाहिए कि आप ने नशा करना छोड़ दिया है, वरना वे आप को जबरदस्ती उस जगह ले जाएंगे और तरहतरह से आप को फुसलाएंगे. फिर आप खुद को रोक नहीं पाएंगे, इसलिए ठीक यही है कि ऐसे लोगों की संगत से दूर रहें.

अपनी सेहत पर ध्यान दें

कभी जिम में जाना शुरू करें, सुबह घूमने जाना शुरू करें. हर रोज आईने में देखें और अपनेआप से कहें कि अब चेहरा कितना सुंदर होता जा रहा है. अच्छे कपड़े पहनें और बनठन कर रहना शुरू करें.

परिवार के साथ रहें

आमतौर पर नशे की तलब एक खास समय पर होती है. उस समय अपने परिवार के साथ बिताएं. परिवार को भी चाहिए कि उस समय नशे करने वाले सदस्य को जितना हो सके, बिजी रखें. प्यार भरा बरताव करें और किसी भी बात पर उन्हें गुस्सा न दिलाएं.

जेब में पैसे न रखें

जहां तक हो सके, जेब में पैसे ही न रखें या बहुत ही कम रखें. जब जेब में पैसे ही नहीं होंगे, तो आप नशा खरीद नहीं पाएंगे और तलब का समय निकल जाएगा.

ऐसी जगह से बचें

आनेजाने का रास्ता बदल लें, जहां आप नशा करते थे. कितनी भी तलब उठे, उस जगह न जाएं. इसी तरह से शादी या दूसरे कार्यक्रमों में जहां नशे की पार्टी चल रही हो, वहां न जाएं. आप खुद को शाबाशी दें कि आप में कितनी मजबूती है. इस से तलब धीरेधीरे कम हो जाएगी. शुरू में ज्यादा तलब होगी, पर अगर आप मन को मजबूत रखेंगे और नशा नहीं करेंगे, तो जैसेजैसे दिन बीतते जाएंगे, आप की तलब कम होती जाएगी और धीरेधीरे खत्म हो जाएगी.

शपथ ले लीजिए

आप शपथ भी ले सकते हैं कि चाहे कोई मुझ पर कितना भी दबाव डाले, मैं  प्रतिज्ञा करता हूं कि अब किसी तरह का नशा नहीं करूंगा.

इसे रोजाना 3 बार बोलिए. जब भी आप को नशे की तलब उठे, तो मन को मजबूत बनाए रखें. कुलमिला कर आप को हर हाल में अपने मन की मजबूती बनाए रखनी है. न तो यह सोचें कि आज नशा कर लेते हैं, कल से नहीं लेंगे. बहादुर बनिए. गम का डट कर सामना कीजिए. इस बात पर भरोसा रखिए कि समय के साथसाथ सब ठीक हो जाता है. पहले भी आप की जिंदगी में कितने ही गम आए होंगे, पर आज वे बीती बात बन गए हैं. इसी तरह से ये भी आने वाले समय में बीती बात बन जाएंगे. आप इस दुनिया में नशेड़ी बनने के लिए नहीं आए हैं. आप की जिंदगी बहुत कीमती है. यह दोबारा नहीं मिलेगी. इसे नशे की भेंट न चढ़ाइए.

आदार जैन की हीरोईन होगी अन्या सिंह

सबसे पहले ‘‘सरिता’’ पत्रिका ने 16 अक्टूबर को सूचना दी थी कि ‘‘यशराज फिल्मस’’ ने अपनी नई फिल्म से पाकिस्तानी कलाकार अली  जफर के भाई दान्याल जफर को हटाकर रणबीर कपूर के कजिन आदार जैन को हीरो के रूप में चुना है. लगभग दो माह बाद ‘‘यशराज फिल्मस’’ ने इस खबर की पुष्टि कर दी है. इतना ही नही लेखक निर्देशक हबीब फैजल की इस फिल्म में आदार जैन के साथ हीरोइन होंगी दिल्ली की लड़की अन्या सिंह, जिन्हे कई आडीशन के बाद चुना गया है.

‘‘यशराज फिल्मस’’ की कास्टिंग निर्देशक शानू मेहरा कहती हैं-‘‘हमने हबीब फैजल की पटकथा को ध्यान में रखते हुए अभिनेत्री की तलाश शुरू की थी. फिल्म के निर्माता आदित्य चोपड़ा चाहते थे कि किसी नए चेहरे को इस फिल्म में मौका दिया जाए. तो हमने दिल्ली व चंडीगढ़ जाकर सौ से अधिक लड़कियों के आडीशन लिए, पर बात बन नही रही थी. अंततः हमने अन्या सिंह को चुना. अन्या सिंह से हमारी पहली मुलाकात दो वर्ष पहले दिल्ली में एक काफी शॉप में हुई थी. फिर एक साल पहले हमारी दूसरी मुलाकात भी दिल्ली के एक काफी शॉप में ही हुई. मुझे उससे बात करने में आनंद आया था. तो फिर मैने उससे बात की और आडीशन के कई राउंड के बाद उसे चुना गया.’’

आदार जैन इन दिनों बहुत खुश हैं. सूत्रों की माने तो ‘‘यशराज फिल्मस’’ भी आदार जैन को लक्की मान रहा है. वास्तव में कुछ समय पहले तक बौलीवुड में चर्चाएं हो रही थी कि हबीब फैजल की यह कहानी और ‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’ द्वारा बनायी जाने वाली लेखक निर्देशक निखिल अडवाणी की फिल्म ‘‘लखनउ सेंट्रल’’ की कहानी एक ही है. शायद ऐसा ही था, इसीलिए हबीब फैजल की इस फिल्म को लेकर ‘यशराज फिल्मस’ बहुत धीमी गति से आगे बढ़ रहा था. सूत्रों का दावा है कि जैसे ही ‘यशराज फिल्मस’ ने अपनी फिल्म के साथ आदार जैन को जोड़ा, वैसे ही खबर आयी कि फिल्म ‘‘लखनउ सेंट्रल’’ हमेशा के लिए डिब्बे में बंद कर दी गयी. उसके बाद ‘यशराज फिल्मस’ में हरकतें तेज हुई.

बहरहाल, हबीब फैजल का दावा है कि वह जनवरी 2017 में फिल्म की शूटिंग शुरू करने वाले हैं. हबीब फैजल ने अन्या सिंह को लेकर कहा-‘‘जब मैने उसकी तस्वीर देखी, तो वह मुझे बच्ची लगी और यह बात मेरी फिल्म की कहानी के लिए फायदेमंद साबित होगी.’’

हीरो की इमेज बदल रही है: इरफान खान

फिल्म कलाकार इरफान खान की पिछली फिल्म ‘मदारी’ भले ही पिट गई हो, लेकिन हमेशा की तरह वे अपनी दिलकश और दमदार अदाकारी से वाहवाही बटोर ले गए. टैलीविजन से ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाले इरफान खान हिंदी और हौलीवुड की कई फिल्मों में अपनी उम्दा ऐक्टिंग के जलवे दिखा चुके हैं. साल 2012 में फिल्म ‘पान सिंह तोमर’ के लिए इरफान खान बैस्ट ऐक्टर का नैशनल अवार्ड जीत चुके हैं.  हौलीवुड की फिल्म ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन और ‘जुरासिक वर्ल्ड’ ने उन्हें इंटरनैशनल फिल्मों के फलक पर पहुंचा दिया है. 7 जनवरी, 1967 को जयपुर में जनमे इरफान खान कहते हैं कि उन्हें लीक से हट कर काम करने में काफी मजा आता है. वे हीरो की परिभाषा बदलने की कोशिश में लगे हुए हैं. हीरो की बनीबनाई इमेज से बाहर निकल कर कुछ अलग करने में उन्हें कामयाबी मिलने लगी है और जनता भी उन्हें पसंद करने लगी है.

‘बिल्लू’, ‘मकबूल’, ‘हासिल’, ‘द नेमसेक’,  ‘पान सिंह तोमर’, ‘तलवार’, ‘पीकू’, ‘जज्बा’ जैसी फिल्मों ने उन्हें हीरो की घिसीपिटी इमेज को तोड़ने में काफी मदद की है. इन फिल्मों ने उन्हें कामयाबी के साथसाथ स्टारडम भी दिलाई है.

इरफान खान का मानना है कि ऐक्टर ही नहीं, बल्कि किसी भी प्रोफैशन में काम से ही पहचान और इज्जत मिलती है. जिस काम में आप का मन लगे, उसे ही अपना धर्म बना लेना चाहिए. नाम के चक्कर में नहीं फंसना चाहिए. काम बेहतर और अलहदा होगा, तो नाम खुद ही हो जाएगा. उस के साथ पैसा भी आने लगेगा. कलाकार को पैसे के पीछे भागने के बजाय अच्छे काम की ओर भागने की जरूरत है. उन का मानना है कि फिल्मों का इंटरनैट पर लीक होना गलत बात है. भारत सरकार को फिल्म इंडस्ट्री 4 हजार करोड़ रुपए का सालाना टैक्स देती है. सरकार को इस मामले में सख्ती से निबटना चाहिए. किसी भी फिल्म में करोड़ों रुपए और सैकड़ों लोगों का भविष्य दांव पर लगा होता है, ऐसे में फिल्म के इंटरनैट पर लीक होने से एकसाथ सैकड़ों लोगों को झटका लगता है. साल 1988 में ‘सलाम बौंबे’ से फिल्मों में अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाले इरफान खान बदलते दौर के सिनेमा के बारे में कहते हैं कि आज फिल्मों में जम कर नए प्रयोग किए जा रहे हैं. नौजवानों को खूब मौका दिया जा रहा है. नईनई कहानियां सामने आने लगी हैं. हार्डकोर ऐक्टर और डायरैक्टर का जमाना है. कामर्शियल और आर्ट फिल्म के बीच का फर्क काफी हद तक खत्म हो चला है. जनता भी इन सारी चीजों को पसंद कर रही है. अब फिल्में केवल डांस और गाने की वजह से नहीं चलती हैं.

इरफान खान बताते हैं कि एक समय ऐसा था कि उन के पास फिल्म ‘जुरासिक पार्क’ देखने के लिए पैसे नहीं थे और आज का समय है कि उन्होंने फिल्म ‘जुरासिक वर्ल्ड’ में ऐक्टिंग की है.  मुंबई फिल्म इंडस्ट्री से निकल कर इरफान खान ने हौलीवुड में भी अपनी एक अलग जगह बना ली है. ‘स्लमडौग मिलिनेयर’, ‘द अमेजिंग स्पाइडरमैन’ और ‘जुरासिक वर्ल्ड’ के जरीए वे हौलीवुड में भी अपनी बेहतरीन ऐक्टिंग की छाप छोड़ चुके हैं. इरफान खान कहते हैं कि किसी फिल्म को चुनने से पहले वे कहानी, पटकथा, डायरैक्टर वगैरह को ठोंकबजा कर देखते हैं और अपनी पसंद के रोल ही चुनते हैं. वे जोर दे कर कहते हैं कि वे आम आदमी के हीरो बनना चाहते हैं. उन की हालिया फिल्म ‘मदारी’ में भी आम आदमी की कहानी बयान की गई थी. आम आदमी जमूरा बन कर पूरा खेल बदल देता है. टैलीविजन से अपने ऐक्टिंग कैरियर की शुरुआत करने वाले इरफान खान बताते हैं कि कई साल तक उन्होंने टैलीविजन के लिए काम किया. ‘भारत एक खोज’, ‘चाणक्य’, ‘चंद्रकांता’ जैसे कई टैलीविजन सीरियलों में काम कर के उन्होंने बड़े फिल्मकारों का ध्यान अपनी ओर खींचा.

माइक हसी बन सकते हैं ऑस्ट्रेलिया के अंतरिम कोच

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व बल्लेबाज माइक हसी श्रीलंका के खिलाफ होने वाली टी-20 सीरीज के लिए अपनी राष्ट्रीय टीम के अंतरिम कोच का पदभार संभाल सकते हैं. क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने कहा है कि उन्हें तीन मैचों की श्रृंखला के लिए केयरटेकर कोच की जरूरत है क्योंकि मुख्य कोच डैरेन लैहमन फरवरी में होने वाले भारत दौरे पर भी टीम के साथ रहेंगे.

हसी इससे पहले साल की शुरुआत में भारत में हुए टी-20 टूर्नामेंट में ऑस्ट्रेलिया के बल्लेबाजी सलाहकार के तौर पर काम कर चुके हैं. साथ ही वह ऑस्ट्रेलिया-ए टीम के सहायक कोच भी रह चुके हैं. हसी ने कहा है, 'मेरी पहले से ही कोचिंग में दिलचस्पी थी, लेकिन मैं नहीं जानता कि मैं पूरी क्षमता से यह काम कर पाउंगा क्योंकि जब आप अंतर्राष्ट्रीय टीम के साथ होते हैं, तो आपको एक साल में कम से कम 10 महीने टीम के साथ रहना पड़ता है और इसी कारण मैंने संन्यास लिया था.'

आगे उन्होंने कहा, 'ऐसा नहीं है कि फुल टाइम कोच के लिए मैं छोटे कार्यकाल के साथ शुरुआत करना चाहता हूं, लेकिन भविष्य में सलाहकार के तौर पर कुछ सप्ताह काम करना रोचक होगा.'

हसी ने इसी साल मार्च में कहा था कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की जरूरतों को देखते हुए वह फुल टाइम कोचिंग में दिलचस्पी नहीं रखते हैं.

..तो मिलेगा अच्छा बैटरी बैकअप

आजकल गैजेट्स हमारी जिंदगी से ऐसे जुड़ चुके हैं कि कभी-कभी उनका ना होना हमें अधूरेपन का एहसास कराने लगता है. चाहे वो हमारा स्मार्टफोन हो, टैबलेट हो या फिर हमारा लैपटॉप, ये सभी हमारी जिंदगी का एक जरूरी हिस्सा बन चुके हैं. लेकिन ऐसे में जब काम के वक्त इनकी बैटरी हमें धोखा दे जाए तो फिर परेशान होना लाजमी है. अक्सर हमें अपने गैजेट की बैटरी डाउन होने की वजह से कई परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं. लेकिन हम आपको कुछ ऐसे टिप्स देंगे जिससे आप अपने गैजेट की बैटरी लाइफ को बढ़ा सकते हैं.

आमतौर पर स्मार्टफोन , टैबलेट और लैपटॉप की बैटरी एक साल के बाद जल्दी डिस्चार्ज होने लगती है ऐसे में या तो आप नई बैटरी लेने की सोचेंगे या फिर कुछ ऐसे टिप्स अपनाएंगे जिससे आपके गैजेट की बैटरी अच्छा बैकअप दे. ऐसे में नीचे दिए गए टिप्स शायद आपके काम आ सकते हैं.

1. आसपास के तापमान का बैटरी पर असर

जी हां, ये सुनकर आपको थोड़ा आश्चर्य हो सकता है लेकिन ये सच है कि आपके आसपास के तापमान का असर आपकी बैटरी लाइफ पर पड़ता है. अगर आप 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर या 0 डिग्री सेल्सियस से नीचे के इलाके में रहते हैं तो आपकी बैटरी जल्दी डिस्चार्ज होगी. ऐसे में आप अपने फोन या टैबलेट को सूरज की सीधी रोशनी से बचाएं. बैटरी के लिए जरूरत से ज्यादा गर्मी और जरूरत से ज्यादा ठंड दोनों ही खतरनाक हैं.

2. फुल डिस्चार्ज Vs आधा डिस्चार्ज

कई यूजर का ये मानना है कि किसी भी गैजेट को 100 फीसदी चार्ज होने के बाद ही चार्ज से हटाया जाए. लेकिन ऐसा करना बैटरी के परफॉर्मेंस के लिए घातक है. अगर आप बैटरी बैकअप को ठीक रखना चाहते हैं तो ना तो उसे कभी फुल चार्ज करें और ना ही पूरा डिस्चार्ज होने दें. कोशिश करें कि जब आपकी बैटरी 80 फीसदी तक चार्ज हो जाए तो उसे चार्ज से हटा दें और जैसे ही गैजेट में 40 फीसदी बैटरी बची हो उसे दोबारा से चार्ज में लगा दें. हां अगर आप कहीं ऐसे जगह जाने वाले हैं जहां चार्जिंग की सुविधा नहीं है तो ऐसे में अपने गैजेट को फुल चार्ज कर लें.

3. ओवर चार्जिंग से बचें

अपने गैजेट की कभी भी ओवर चार्ज ना करें. जैसे ही आपका डिवाइस 100 फीसदी चार्ज हो जाए वैसे ही उसे अनप्लग कर दें. क्योंकि आजकल इस तरह के गैजेट्स में लीथीयम बैटरी का इस्तेमाल हो रहा है, जिसे ओवर चार्ज करने से आपके डिवाइस को नुकसान पहुंच सकता है. अपने लैपटॉप का इस्तेमाल कभी भी चार्जिंग में लगा कर ना करें, ऐसा करने से आपके लैपटॉप की बैटरी ज्यादा बैकअप नहीं देगी.

4. अल्ट्रा-फास्ट चार्जर के इस्तेमाल से बचें

जितना हो सके अल्ट्रा-फास्ट चार्जर के इस्तेमाल से बचें. ऐसे चार्जर्स आपकी बैटरी के परफॉर्मेंस पर बुरा असर डालती हैं. सिर्फ और सिर्फ अपने गैजेट के चार्जर का ही इस्तेमाल करें.

5. नकली चार्जर के इस्तेमाल से बचें

अगर आपके डिवाइस का ओरिजनल चार्जर खराब हो जाए ट्रैफिक सिगनल पर बिकने वाले नकली और सस्ते चार्जर को खरीदने की सोचें भी ना. ऐसे चार्जर्स आपके बैटरी के साथ-साथ आपके गैजेट के लिए भी खतरनाक हैं.

तो अगर आप अपने गैजेट की बैटरी बैकअप बढ़ाना चाहते हैं तो अभी से ही इन टिप्स को अपनाएं, यकीनन आपको फायदा जरूर दिखेगा.

गौरव गिल ने इंडियन रैली जीत रचा इतिहास

भारत के रेसर गौरव गिल ने एफआईए एशिया पसिफिक रैली चैंपियनशिप (एपीआरसी) के अंतिम राउंड में कॉफी डे इंडिया रैली का खिताब अपने नाम कर इतिहास रचा है. गौरव का यह एपीआरसी के इस सत्र में लगातार छठा खिताब है. इससे पहले वह न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, चीन, जापान और मलेशिया में जीत हासिल कर चुके हैं. वह एफआईए चैंपियनशिप में सभी राउंड जीतने वाले पहले रेसर बन गए हैं.

गिल ने 17 स्टेज पार करते हुए तीन घंटे 39 मिनट 37.9 सेकेंड में जीत हासिल की. गिल ने यह रेस एमआरएफ स्कोडा फैबिया आर 5 से जीती. वह इस बात से काफी खुश हैं कि वह अपने देश में यह खिताब जीतने में सफल रहे.

गिल ने कहा, 'निश्चित ही यह मेरे लिए सबसे अच्छी जीत है क्योंकि मैं अपने घर में इसे हासिल करने में सफल रहा. मैं इस रैली में पांच जीत के साथ उतरा था. मेरे ऊपर दवाब था और मुझसे काफी उम्मीदें थीं. सबसे महत्वपूर्ण, मुझे उम्मीद है कि मेरी जीत और रिकॉर्ड इस देश में मोटरस्पोर्ट को बढ़ावा देंगे.'

गिल के मुताबिक यह काफी मुश्किल और तकनीकी रैली थी क्योंकि इसका रास्ता बेहद जटिल और सिकुड़ा था. गिल के साथी ग्लैन मैक्नेल ने सहायक ड्राइवर का खिताब अपने नाम किया. वहीं एमआरएफ ने टीम चैंपियनशिप का खिताब जीता. स्कोडा को सर्वश्रेष्ठ उत्पादक का खिताब मिला है.

बिना इंटरनेट भेजे पैसे

विमुद्रीकरण के बाद से देश में कैशलेस लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए सरकार के साथ ही बैंक और कई कंपनियां भी तेजी से काम कर रहा हैं. एसबीआई जल्द ही बिना इंटरनेट के फोन पर चलने वाला वॉलेट लाने की तैयारी कर रहा है.

नोट बैन के बाद देश को कैशलेस बनाने के लिए बिना इंटरनेट वाले बेसिक फोन पर मोबाइल बैंकिंग एक बड़ी कामयाबी होगी. देश में 90 करोड़ मोबाइल फोन मौजूद हैं, लेकिन इसमें 60 से 65 करोड़ बेसिक फीचर फोन हैं, जबिक शेष स्मार्टफोन हैं.  

इन बेसिक हैंडसेट से बैंकिंग की शुरुआत से नकदी रहित लेन-देन तेज हो सकेगा.

यह चैनल बैंकिंग के लिए बैंकिंग संदेश पहुंचाने का काम करता है. जिसके बाद ही मोबाइल से बैंकिंग संभव है. दरअसल अभी यूएसएसडी (अनस्ट्रक्चर्ड सप्लीमेंटरी सर्विस डाटा) चैनल के जरिए भी मोबाइल बैंकिंग कर सकते हैं, लेकिन इसका विस्तार कर इसे बेसिक फीचर फोन के लिए तैयार किया जा रहा है.

स्टेट बैंक की चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य ने कहा कि 15 दिसंबर तक वॉलेट की सुविधा लोगों को मिलने लगेगी. इसके बाद इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन का आधार तेजी से बढ़ेगा. हालांकि वॉलेट का नाम तय नहीं है. 13 भाषाओं में स्टेट बैंक का बडी वॉलेट उपलब्ध है. 60-65 करोड़ फीचर फोन हैं, जिनपर इंटरनेट नहीं चल सकता. इसलिए ये योजना काफी कारगर साबित होगी.

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