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बढ़ते खर्च के लिए माता पिता जिम्मेदार

सीबीएसई यानी सैंट्रल बोर्ड औफ सैकंडरी एजुकेशन ने  देश के सारे निजी स्कूलों को अपने आर्थिक मामलों की विस्तृत जानकारी जनसाधारण के लिए नैट पर डालने का आदेश जारी किया है, जिस में अध्यापकों के वेतन, हर मद पर किया खर्च, बिल्डिंग के रखरखाव का खर्च आदि शामिल है. महंगी होती शिक्षा से परेशान पेरैंट्स बहुत हल्ला मचा रहे हैं कि शिक्षा व्यवसाय बन गई है और स्कूलों को व्यापार की तरह चला कर संचालक मालिक बन बैठे हैं.

यह बात सही है कि स्कूल अब धंधा बन गए हैं और इस धंधे में लगे लोगों ने एक माफिया बना लिया है, जिस में स्कूली शिक्षा से जुड़ी नौकरशाही पूरी तरह शामिल हो गई है और इस में राजनीति पूरी तरह घुस गई है. बहुत से नेताओं का व्यवसाय स्कूल ही हैं और वे अपनी राजनीति स्कूलों के दफ्तरों से चलाते हैं.

इन स्कूलों पर लगाम लगाने के लिए लगभग कोई संस्था नहीं है. सीबीएसई का मुख्य काम तो पाठ्यक्रम तय करना व परीक्षाएं करवाना है. स्कूल कैसे चलते हैं, यह देखना उस का काम नहीं है पर चूंकि कोई और रैग्युलेटर नहीं है, यह संस्था ही निर्देश जारी करती रहती है, जिन में से ज्यादातर अव्यावहारिक होते हैं और उन से न शिक्षा का स्तर सुधरा है और न ही मुनाफाखोरी बंद हुई है. कहने को तो शिक्षा देना व्यवसाय नहीं, जन सेवा का काम है और स्कूलों की आय पर कर नहीं लगता पर स्कूल अपना लाभ मालिकों या संचालकों में बांट भी नहीं सकते. स्कूलों को ज्यादातर सोसायटियां चलाती हैं पर हर सोसायटी पर परिवारों का कब्जा होता है और कभीकभार पेरैंट्स के दबाव में या नुकसान होने पर खरीदफरोख्त होती है.

स्कूलों का व्यावसायीकरण तो होना ही है, क्योंकि मातापिता खुद मांग करते हैं कि स्कूल में तरहतरह की सुविधाएं हों. आजकल एयरकंडीशंड कमरों की मांग होने लगी है. इनडोर स्विमिंग पूल मांगे जा रहे हैं. साल में एक विदेशी यात्रा हो. बसों का रखरखाव अच्छा हो. स्कूल लिपापुता हो. स्कूल में कौफीकैफे डे या मैक्डोनाल्ड खुला हो. जब इस तरह की शिक्षा से अलग मांगें की जाएंगी तो पैसे तो कोई देगा ही.

अगर स्कूल फटेहाल लगे तो बच्चे खुद को हीन समझते हैं. वे जोर डालते हैं कि ऐसे स्कूल में भेजा जाए जहां फीस ज्यादा हो. मातापिता सामाजिक प्रतिष्ठा पाने के लिए अपनी हैसीयत से बढ़ कर नाम वाले महंगे स्कूल में भेजते हैं. फिर कैसी खर्चों की जांच? कैसा स्पष्टीकरण? यदि आप फाइवस्टार स्कूल में जाएंगे तो क्व300 की चाय के प्याले का खर्च कैसे पूछ सकते हैं?

निजी स्कूल महंगे हैं तो मातापिता सरकारी स्कूलों में बच्चों को भेजने के लिए स्वतंत्र हैं जहां अच्छे शिक्षक हैं भले रखरखाव खराब हो. अगर मातापिता मिल कर स्कूलों की सेवा करें तो सरकारी स्कूल भी चमचमा उठें. स्कूलों के बढ़ते खर्च के लिए मातापिता जिम्मेदार हैं, सरकार नहीं. कानूनअदालतों को इस डिमांडसप्लाई से दूर रखें. मूर्ख पेरैंट्स यही डिजर्व करते हैं तो कोई बीच में दखल न दे.

बिना स्मार्टफोन के भी यूज कर सकते हैं पेटीएम

पेटीएम ने बुधवार को एक नए फीचर का ऐलान किया. इस फीचर के जरिए स्मार्टफोन के बिना भी पेटीएम वॉलेट का इस्तेमाल कर बिल भुगतान किया जा सकता है. हालांकि, पेटीएम अकाउंट बनाने और इसे अपने फोन नंबर से लिंक करने या वॉलेट रीचार्ज करने के लिए एक स्मार्टफोन या पीसी की जरूरत अभी भी होगी. लेकिन, हर रोज किए जाने वाले भुगतान के लिए आपको स्मार्टफोन या इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत नहीं होगी. इसके लिए आपके पास सिर्फ एक फोन का होना जरूरी है, भले ही यह एक फीचर फोन हो.

कैसे होगा बिना स्मार्टफोन के भुगतान?

– पेटीएम ने इस फीचर के इस्तेमाल के लिए एक टोल फ्री नंबर- 1800 1800 1234 लॉन्च किया है. पिन सेट करने के लिए आपको अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से इस टोल फ्री नंबर पर कॉल करना होगा. इस नंबर पर कॉल करने से आपको एक वॉयस मैसेज सुनाई देगा जिसमें पिन सेट करने के लिए आपको वापस कॉल किए जाने की बात होगी.

– इसके बाद, इस नंबर पर कॉल कर आप भुगतान कर सकते हैं. जिसे भी पैसे भेजने हैं उसका फोन नंबर टाइप कीजिए, इसके बाद अमाउंट डालिये और फिर अपना पिन डालकर भुगतान की पुष्टि कर दीजिए. इस फीचर को इस्तेमाल करने के लिए आपको किसी स्मार्टफोन या पेटीएम एप या इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत नहीं होगी. हालांकि, यह भुगतान करने का सबसे आसान तरीका नहीं है लेकिन कुछ परिस्थितियों में इस तरह का फीचर निश्चित तौर पर काम आ सकता है.

– उदाहरण के लिए, हमारे कई उम्रदराज रिश्तेदार अभी भी आसान इस्तेमाल के चलते फीचर फोन ही चलाना पसंद करते हैं. ऐसे यूजर जिन्हें, 500 और 1000 रुपये के नोट बंद होने के बाद डिजिटल भुगतान करने की जरूरत पड़ रही है, उनके लिए पेटीएम का टोल फ्री नंबर काम का साबित हो सकता है.

अब बिना झंझट करें ऑनलाइन ट्रांजैक्शन

नोटबैन के बाद लोगों को हो रही समस्याओं के मद्देनजर और देश में कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देने के लिए आरबीआई ने ऑनलाइन ट्रांजैक्शन में ढील दी है. रिजर्व बैंक ने 2 हजार रुपये तक के ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के लिए नियमों में ढील दी है. आरबीआई ने ऑनलाइन ट्रांजैक्शन के​ लिए जरूरी सत्यापन प्रक्रिया(जिसमें एकबारगी ओटीपी यानी वन टाइम पासवर्ड भी डालना होता है) के एक स्टेप को खत्म करने के लिए समाधान निकाला है.

एटीएम कार्ड जारी करने वाला बैंक अपने ग्राहकों के लिए अब वैकल्पिक तौर पर कार्ड नेटवर्क के पेमेंट वैरीफिकेशन सल्यूशन की पेशकश करेगा. अगर आप इस सुविधा का विकल्प चुनते हैं तो आपको बस एक बार रजिस्ट्रेशन कराना होगा. इसके बाद रजिस्टर्ड ग्राहकों को हर लेन-देन पर कार्ड का ब्योरा देने की जरूरत नहीं होगी.

अभी कई कंपनियों को पैमेंट करने के लिए होने वाले सत्यापन में ओटीपी डालना होता है. इसके लिए यूजर को मोबाइल पर ओटीपी आने तक का इंतजार करना होता है. लेकिन अगर यूजर अब कार्ड प्रोवाइडर बैंक के भुगतान सत्यापन समाधान का विकल्प चुनता है तो उसे भविष्य में ओटीपी डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी. वह सिर्फ अपने कार्ड का पासवर्ड एंटर करेगा और उसका पेमेंट हो जाएगा.

अब ‘‘रईस’’ भी 25 जनवरी को…!!

बौलीवुड में चर्चाएं गर्म हैं कि फिल्म ‘‘काबिल’’ के निर्देशक संजय गुप्ता ने शाहरुख खान को जो सलाह दी थी, वह उनके लिए ही उलटी पड़ गई है. बौलीवुड के बिचौलिए और शाहरुख खान के नजदीकी सूत्रों की माने तो अब शाहरुख खान अपनी फिल्म ‘‘रईस’’ को 25 जनवरी की सुबह ही रिलीज करने वाले हैं. यानी कि शाहरुख खान कैंप ने हर हाल में ‘‘काबिल’’ को टक्कर देने का मन बना लिया है.

वास्तव में संजय गुप्ता ने कुछ दिन पहले मुंबई के अंग्रेजी दैनिक में लंबा इंटरव्यू देते हुए शाहरुख खान को व्यंगात्मक सलाह दी थी कि वह अपनी फिल्म ‘‘रईस’’ को रितिक रोशन की फिल्म ‘‘काबिल’’ के साथ रिलीज न करें. उनकी रितिक रोशन से कोई प्रतिस्पर्धा नहीं बनती, क्योंकि रितिक रोशन उनसे दस वर्ष छोटे हैं. उसके बाद शाहरुख खान की तरफ से कोई प्रतिक्रिया आने से पहले ही संजय गुप्ता और राकेश रोशन ने फिल्म ‘‘काबिल’’ को 26 जनवरी की बजाय 25 जनवरी को शाम छह बजे से ही सिनेमाघरों में रिलीज करने की घोषणा कर दी थी.पर अब षाहरुख खान और एक्सेल इंटरटेनमेंट ने‘‘रईस’’को 26 जनवरी की बजाय 25 जनवरी को सुबह से ही सिनेमाघर में रिलीज कर देने का फैसला कर लिया है. यह एक अलग बात है कि अभी तक फिल्म ‘‘रईस’’ के निर्माताओं की तरफ से इस निर्णय की घोषणा नहीं की है.

बौलीवुड में चर्चाएं गर्म है कि फिल्म ‘डिअर जिंदगी’ ने जिस तरह से बाक्स आफिस पर अच्छा व्यापार किया है, उससे शाहरुख खान काफी उत्साहित हैं. इसलिए भी वह ‘काबिल’ से टकराने के मूड़ में हैं.

फिल्मों में देशभक्ति के तड़के पर बोले अनूप जलोटा

केंद्र में सरकार बदलने के साथ ही फिल्मकार की सोच कैसे बदलती है, इसका नमूना इन दिनों प्रदर्शित हो रही फिल्मों में नजर आ रहा है. जब से नई सरकार आयी है, तब से सारे फिल्मकार देशभक्त हो गए हैं. सब अपनी फिल्मों में देशभक्ति का तड़का डालने से नहीं चूक रहे. इस बदलाव पर जब भजन सम्राट और इन दिनों प्रसार भारती की कंटेंट कमेटी के चेयरमैन अनूप जलोटा से बात हुई तो उन्होंने कहा-‘‘ऐसा हो रहा है. क्योंकि लोगों को यह विश्वास हो गया है कि यह सरकार अब स्थायी/ परमानेंट सरकार हो गयी है. अब कांग्रेस तो खत्म हो चुकी है. बाकी दल भी धीरे धीरे समाप्त हो रहे हैं. तो सब यही सोचते हैं कि जो परमानेंट सरकार है, उसकी जो इच्छा है, उसका जो एजेंडा है, उसे हम थोड़ा थोड़ा फिल्मों में दिखाना शुरू करें. ऐसा कर वह सरकार की नजर में खुद को अच्छा साबित करना चाहते हैं. यानी कि सरकार की ‘गुड बुक’ में आने के लिए प्रयासरत हैं. इसी के चलते लोग फिल्म के अंदर मोदी की चाय की बात करने लगे हैं. हर फिल्म में मोदी फैक्टर आने लगा है. फिल्म ही क्यों सीरियल में भी यही हो रहा है. नोटबंदी भी सीरियलों में आ गया. यह सब महज इसीलिए हो रहा है, क्योंकि उन्हे लगता है कि यह स्थायी सरकार है. स्थायी सरकार के सभी मित्र बनना चाहते हैं.’’

हाउ टू डील

हमारे सर्किल में बहुत से ऐसे फ्रैंड्स होते हैं जो मजाक बनाने में माहिर होते हैं. कभी हमारे कपड़ों को देख कर मजाक बनाते हैं तो कभी हमारी बातों को मुद्दा बना कर हंसी उड़ाते हैं. उन्हें तो बस, दूसरों पर हंसना आता है, जिस से हमारे मन को ठेस पहुंचती है. ऐसे में हम उन से कटने की कोशिश करने लगते हैं, लेकिन बोल्ड बनने के लिए कटने की नहीं बल्कि उन का सामना करने की जरूरत है. आइए, जानें कैसे :

न लें दिल पर

जब कोई खाना खाते हुए आप का मजाक बनाए कि देखो तो जरा इसे कैसे खाना खाता है या फिर कहे कि देखो यह तो बिलकुल लड़कियों की तरह चलता है तो उस की इस बात को दिल पर न लें बल्कि मुंह पर जवाब दें कि हर इंसान में कुछ यूनीक क्वालिटीज होनी चाहिए, जो मुझ में हैं तभी तो तुम मुझे नोटिस करते हो. इस से वह दोबारा आप को कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाएगा.

मजाक उड़ाने वालों से कैसे निबटें

कमियां दूर करें

हर इंसान में कुछ न कुछ कमियां होती हैं. कुछ की कमियां उजागर नहीं होतीं तो कुछ की हो जाती हैं. ऐसे में अगर कोई आप की कमियों को गिनवा कर आप का मजाक बनाए तो रिऐक्ट न करें बल्कि उन्हें सुधारने की कोशिश करें. हो सकता है कि किसी के द्वारा आप का मजाक बनाना आप की पर्सनैलिटी में निखार ले आए.

अति हो तो सबक सिखाएं

कभीकभार मजाक करना अच्छा होता है, लेकिन जब कोई इसे रूटीन बना कर आप को हर्ट करता रहे तो उसे सबक सिखाना भी जरूरी हो जाता है. जैसे अगर कोई फ्रैंड आप का बातबात पर मजाक बनाए तो उसे सबक सिखाने के लिए उस की शर्ट के पीछे चुपके से ‘मैं बिकाऊ हूं’ का स्टीकर चिपका दें. इस से जब सब फ्रैंड्स उसे देखेंगे तो उस का अच्छाखासा मजाक बन जाएगा. तब उसे समझ आएगा कि किसी का मजाक बनाना क्या होता है.

रोएं नहीं

कहते हैं न कि जो डर गया सो मर गया. यही बात इस संदर्भ में भी लागू होती है. अगर कोई आप पर हंसे तो उस के सामने रोना सा मुंह ले कर न बैठ जाएं इस से उस की हिम्मत और बढ़ेगी. इस से अच्छा है कि ऐसे लोगों के बीच रह कर खुद को बोल्ड बनाएं.

एक लिमिट में रह कर बात करें

जब हम किसी को हद से ज्यादा लिमिट क्रौस करने की छूट दे देते हैं तो वह भी दूसरों को खुद का मजाक बनाने देने का एक बड़ा कारण होता है. इस कारण उस के मुंह में जो आता है वह लोगों के बीच हमारे लिए बोल देता है. इसलिए अगर आप खुद का मजाक बनवाने से बचना चाहते हैं तो न खुद लिमिट क्रौस करें और न ही दूसरों को करने दें.                                              

सरकारी दावों-वादों में फंसा कोढ़

बिहार के आरा रेलवे स्टेशन के पास ही एक छोटा सा इलाका बसा हुआ है अनाइठ. यह इलाका पटनामुगलसराय रेलवे लाइन के किनारे पर स्थित है और वहीं है कोढ़ के मरीजों की छोटी सी बस्ती ‘गांधी कुष्ठ आश्रम’. कहने को तो यह कोढ़ के मरीजों के लिए आश्रम है, पर हर ओर अंधेरा, बेबसी, गंदगी और बदबू का आलम है. आश्रम के अंदर जाने की बात तो दूर उस के आसपास तकरीबन 25-30 मीटर पहले ही नथुने बदबूदार हवा से भभक उठते हैं. बजबजाती गंदगी के बीच कोढ़ से पीडि़त 68 परिवार रहते हैं, जिन की आबादी 152 है. आश्रम के पास खड़े होने से यही महसूस होता है कि वहां तक सरकारी योजनाओं और दावोंवादों का रत्तीभर भी हिस्सा नहीं पहुंच सका है. बस्ती में गरीब कोढ़ के मरीजों को राहत और मदद देने की तमाम सरकारी योजनाओं और गैरसरकारी संस्थाओं की लूटखसोट की बानगी यहां साफ देखी जा सकती है. ऊपर से पोंगापंथ की वजह से भी मरीजों की हालत बद से बदतर होती जा रही है. देश में कोढ़ के मरीजों की तकरीबन 850 कालोनियां हैं, जहां वे समाज के भेदभाव को झेलते हुए अपनी जिंदगी काट रहे हैं. सरकारी सुविधाओं और इलाज के नाम पर वहां कुछ नहीं पहुंच पाता है, जिस से मरीज तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर हैं. सेहत, पढ़ाईलिखाई, रोजगार वगैरह का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं होने की वजह से कोढ़ के मरीज भीख मांग कर गुजारा करते हैं और धीरेधीरे उन के बच्चे भी भिखारी बन रहे हैं. कोढ़ के मरीजों के बारे में समाज में गलत बातें फैलाने की वजह से भी वे अलग रहने को मजबूर हैं. न तो उन को बेहतर इलाज और आम जिंदगी देने के उपाय किए जाते हैं और न ही समाज में उन के प्रति कोई जागरूकता फैलाने के लिए कदम उठाए जाते हैं.

कोढ़ को ले कर समाज में फैले कई तरह के अंधविश्वासों और अफवाहों की वजह से भी कोढ़ के मरीजों की हालत ऐसी है. इस के बारे में आम लोग यही कहते हैं कि गलत काम करने की वजह से यह बीमारी होती है. बहुत से तो यह भी कहते हैं कि यह बीमारी पिछले जन्म के पापों का नतीजा है. इसे ले कर समाज में पोंगापंथियों ने जम कर भरम फैला रखा है. बाबाओं ने यह प्रचार कर रखा है कि गलत काम करने, गलत संबंध बनाने, खून गंदा होने या सूखी मछली खाने से कोढ़ होता है, जबकि ऐसा कुछ नहीं है. इस सिलसिले में डाक्टर दिवाकर तेजस्वी कहते हैं कि जिस किसी को कोढ़ हो जाता है, उस मरीज को ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन ऐसा हो नहीं पाता है. परिवार और समाज उस से नफरत करने लगता है और उसे ठुकरा कर दरदर भटकने के लिए छोड़ देता है.

यह बीमारी एक से दूसरे इनसान में पुरानी माइक्रो बैक्टिरियल लेप्री से फैलती है. यह आमतौर पर चमड़ी पर असर डालती है और उंगलियां समेत कई अंग धीरेधीरे गलने लगते हैं. इस बीमारी का सही तरीके से इलाज किया जाए, तो यह पूरी तरह ठीक हो जाती है. साल 1991 में आई एमडीटी दवा के सेवन से यह बीमारी ठीक हो जाती है. भारत में तकरीबन 15 लाख से ज्यादा कोढ़ के मरीज हैं. इन मे  से 24 फीसदी बिहार में हैं. बिहार में ही ऐसे लोगों की 40 बस्तियां हैं. यहां प्रति 10 हजार की आबादी पर 1.12 लोग कोढ़ के मरीज हैं. बिहार के अलावा झारखंड, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और ओडिशा में सब से ज्यादा कोढ़ के मरीज हैं. बिहार अनुसूचित एवं पिछड़ी जाति संघर्ष मोरचा के संयोजक किशोरी दास कहते हैं कि गरीब और पिछड़ों के दर्द को सुनने और उसे दूर करने वाला कोई नहीं है. उन के नाम पर पटना से ले कर दिल्ली तक सत्ता की रोटियां सेंकी जाती रही हैं, पर उन के हालात में बदलाव नहीं हो सका है. कोढ़ को जड़ से मिटाने के लिए साल 1955 में राष्ट्रीय कुष्ठ नियंत्रण कार्यक्रम की शुरुआत की गई. उस के बाद साल 1983 में राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम शुरू किया गया और उसी साल मल्टी ड्रग थैरैपी की शुरुआत हुई. साल 2005 में नैशनल लैवल पर इस बीमारी को जड़ से मिटाने का काम शुरू किया गया. साल 2012 में देश के 16 राज्यों और संघीय क्षेत्रों में विशेष कार्य योजना चालू की गई थी.

भारत में कोढ़ के मरीजों की तादाद में इजाफा होने से यह साबित हो गया है कि देश में इस पर काबू पाने के तमाम उपाय नाकाम रहे हैं. अगर इसी कछुआ गति से इसे मिटाने की कवायद चलती रही, तो भारत से यह बीमारी खत्म करने में अभी भी 40 साल लगेंगे. सरकार ने साल 2005 में दावा किया था कि देश से कोढ़ को पूरी तरह से खत्म कर दिया गया है. इस के बावजूद कोढ़ के मरीजों की तादाद में इजाफा होता जा रहा है, जिस से सरकार के दावों की पोल खुल गई है. राष्ट्रीय कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम ही कहता है कि कोढ़ के एक लाख, 27 हजार, 595 मामले हर साल भारत में होते हैं. अकेले दिल्ली में पिछले साल कुल 23 सौ नए मामले सामने आए हैं. गांधी कुष्ठ आश्रम में रहने वाले बालेश्वर साव को उस के घर वालों ने घर से निकाल दिया. उसे कोढ़ हो गया था. गरीब होने की वजह से उस का समय पर इलाज नहीं हो सका. उस के जिस्म के कई हिस्सों में गहरे जख्म हो गए हैं, हाथपैरों की कई उंगलियां गल चुकी हैं. पिछले 20 सालों से वह सरकारी मदद के इंतजार में है, पर आज तक केवल भरोसे के अलावा उसे और कुछ नहीं मिल सका.

एनजीओ वाले कभीकभार बालेश्वर साव को खाने को कुछ अनाज और पहनने को कुछ कपड़े दे जाते हैं. इस से गुजारा नहीं चल पाता है. वह लकड़ी की गाड़ी पर बैठ कर दिनभर घूमता है. ‘माताबहन करिए दान, बाबू भइया करिए दान’ की गुहार लगालगा कर वह भीख मांगता है, तो दिनभर में 100-150 रुपए जमा हो जाते हैं. पटना की सड़कों पर भीख मांगने वाले कोढ़ी शिवलाल यादव के झोंपड़े के अंदर घुसने पर हर ओर अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है. अंधेरे के बीच कुछ चमकती आंखों को देख कर एहसास होता है कि झोंपड़े में कुछ और लोग भी रह रहे हैं. शिवलाल यादव बताता है कि उस के साथ 3 और कोढ़ी रहते हैं. वे भी दिनभर भीख मांगते हैं. कभीकभार जब तबीयत ज्यादा खराब हो जाती है, तो सौ रुपए कर्ज लेने पर 10 रुपए रोज के हिसाब से सूद चुकाना पड़ता है. वह आगे कहता है, ‘‘सुनते हैं कि कोढ़ के मरीजों और गरीब लाचारों के लिए सरकार ने बहुत सी योजनाएं बनाई हैं, पर आज तक उस के पास एक पैसा भी नहीं पहुंच सका है. सारा पैसा तो अफसरों और बाबुओं के पेट में चला जाता है.’’

शिवलाल यादव बड़ी ही मासूमियत से अफसरशाही के मुंह पर करारा तमाचा जड़ देता है और सरकारी योजनाओं की पोलपट्टी भी खोल देता है. झोंपड़ी में रहने वाले को बिजली का कनैक्शन लेने के लिए सरकारी बिजली महकमे के बजाय प्राइवेट जैनरेटर चलाने का धंधा करने वाले दबंगों की चिरौरी करनी पड़ती है. जैनरेटर के जरीए झोंपडि़यों में एक बल्ब का कनैक्शन देने पर हर महीने सौ रुपए वसूले जाते हैं. कनैक्शन लेने वालों की मरजी न भी हो, तब भी जबरन कनैक्शन दे दिया जाता है.

बालेश्वर, मुन्ना, सुदन, लाल बिहारी और प्रभु ने जैनरेटर का कनैक्शन लेने से इनकार कर दिया था, तो उन सब पर बिजली चोरी करने का आरोप लगा कर मुकदमे में फंसा दिया गया. पिछले 9 साल से वे लोग बिजली चोरी के आरोप में थाने और कोर्ट के चक्कर लगा रहे हैं. पटना के पास खगौल इलाके की रेलवे क्रौसिंग के पास बसी कोढ़ के मरीजों की बस्ती प्रेम नगर में रहने वाली कोढ़ से पीडि़त ललिता बेगम बताती हैं कि लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के राज में उन जैसे मरीजों के रहने के लिए थोड़ी सी जमीन मुहैया कराने के लिए अर्जी दी थी. उस के बाद नीतीश कुमार की सरकार बनने के बाद भी पिछले 8-9 साल में तकरीबन 50 बार से ज्यादा अर्जी दी जा चुकी है. मुखिया, बीडीओ, एसडीओ, डीएम, विधायक से ले कर मंत्री और मुख्यमंत्री को अर्जी दी गई, पर अभी तक कुछ भी नहीं हो सका है. हर कोई जमीन देने का भरोसा दे कर चलता कर देता है.

गंदी झोंपड़ी में रहने से और भी कई तरह की बीमारियां हो गई हैं. किसी को टीबी हो गई है, तो किसी की आंत में अल्सर हो गया है. किसी का लिवर खराब हो चुका है, तो किसी की आंखों की रोशनी ही चली गई है. कलोनी में हर झोंपड़ी के चारों ओर पूरे साल गंदा पानी भरा रहता है. बांस के टुकड़े, पौलीथिन, जूट के बोरे और फटेपुराने कपड़ों को जोड़ कर बनाई गई झोंपडि़यों की दीवारें हर समय गीली रहती हैं. भिनभिनाती मक्खियों के झुंड, बजबजाते कीचड़ में अपनी थूथन घुसेड़े सूअरों की फौज, बिलों से झांकते मोटेमोटे चूहे आश्रम को नरक बनाने में कोई कोरकसर नहीं छोड़ते हैं. एक मरीज प्रभु मुसहर कहता है कि आधी से ज्यादा जिंदगी तो इसी गंदगी में कट गई, बाकी जिंदगी भी कट जाएगी. समाज ने हम लोगों को ठुकरा दिया है. ऐसे में किस से मदद की उम्मीद करें?

समाजसेवी आलोक कुमार बताते हैं कि बिहार सरकार की नजर इस कुष्ठ आश्रम पर नहीं पड़ सकी है, पर जरमनी की लिबेल और लेप्रा की कोशिश से कुष्ठ रोगियों को थोड़ी ही सही, पर मदद मिल रही है. अच्छी बात यह है कि अनपढ़ मरीजों को पढ़ाने के लिए एक टीचर का इंतजाम किया गया है और सिलाई मशीनें दी गई हैं, जिस से काम सीख कर कोढ़ी भीख मांगने के बजाय दो वक्त की रोटी खाकमा सकें. भारत में इस समय दुनिया का सब से बड़ा कुष्ठ उन्मूलन कार्यक्रम चल रहा है. इस कार्यक्रम के तहत तकरीबन एक लाख, 20 हजार मरीजों के नए मामले दर्ज हुए हैं. गरीबी इस बीमारी के पनपने की सब से बड़ी वजह है. इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के अध्यक्ष रह चुके डाक्टर अजय कुमार कहते हैं कि आज मल्टी ड्रग थैरैपी के जरीए इस बीमारी का आसान इलाज मुमकिन है. पर समाज और परिवार द्वारा ठुकराए जाने की वजह से मरीज का इलाज नहीं हो पाता है और वे तिलतिल कर मरने के लिए मजबूर हो जाते हैं.

अगर कोढ़ का शुरुआती दौर में ही पता लग जाए और सही इलाज चालू कर दिया जाए, तो उस के असर को काफी हद तक कम किया जा सकता है और  अंगों को गलने से बचाया जा सकता है. सरकार, समाज और परिवार के साथसाथ कानून भी कोढ़ के मरीजों के साथ भेदभाव करता रहा है. राजस्थान, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में स्थानीय चुनावों में ऐसे मरीजों के हिस्सा लेने पर मनाही है. साल 1939 में ही कोढ़ के मरीजों को ड्राइविंग लाइसैंस देने और साल 1990 से उन के रेलगाडि़यों में सफर करने पर रोक लगा दी गई है. भारत में 16 ऐसे कानून हैं, जो कोढ़ के मरीजों के साथ भेदभाव करता है और उन्हें समाज की मुख्यधारा से दूर करता है. उस के बाद करेले पर नीम की तरह अंधविश्वास, कलंक वगैरह से इस बीमारी को जोड़ दिया गया है.        

कोढ़ पर काबू पाने के लिए बना टीका

भारत ने कोढ़ के इलाज के लिए दुनिया का पहला टीका ईजाद करने में कामयाबी हासिल की है. बिहार और गुजरात के 5 जिलों में इसे ट्रायल के तौर पर शुरू किया गया है.

डाक्टर विमल कारक कहते हैं कि भारत पहला देश है, जहां कोढ़ के लिए टीका लगाने के लिए कार्यक्रम शुरू किया जा रहा है. इस के टैस्ट में पाया गया है कि कोढ़ के मरीजों के करीब रहने वालों को यह टीका दिया जाए, तो 3 साल के अंदर ही कोढ़ के मामलों में 60 फीसदी तक की कमी आ सकती है. इतना ही नहीं, अगर कोढ़ की वजह से किसी की चमड़ी जख्मी हुई हो, तो यह टीका उस के ठीक होने की रफ्तार को बढ़ा देगा.

इस टीके को नैशनल इंस्टीट्यूट औफ इम्यूनोलौजी के फाउंडर डायरैक्टर जीपी तलवार ने ईजाद किया है. ड्रग कंट्रोलर जनरल औफ इंडिया और अमेरिका के एफडीए ने भी इसे मंजूरी दे दी है.

केंद्र सरकार ने देशभर के सब से ज्यादा कोढ़ के असर वाले 50 जिलों में घरघर जा कर मरीजों की पहचान करने और टीका लगाने का काम शुरू किया है. अब तक तकरीबन साढ़े 7 करोड़ लोगों की जांच की जा चुकी है और तकरीबन 6 हजार लोगों को कोढ़ होने का पता चला है.

मोती सा गांव चमकाती देहाती लड़कियां

52 साला लोकेश कुमार तोमर एक हुनरमंद माला कारीगर हैं. उन की बेटी नेहा ने हाल ही में ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है. लोकेश कुमार तोमर मेरठ, उत्तर प्रदेश से 24 किलोमीटर दूर मुडाली गांव में रहते हैं. उन की बेटी नेहा मोतियों की बहुत उम्दा कारीगर है. 12 साल की उम्र से ही नेहा मोती के कंगन व माला बनाने में अपने पिता की मदद करने लगी थी. आज वह रोज 3 सौ से 4 सौ रुपए तक कमा लेती है. लोकेश कुमार ऐसे अकेले शख्स नहीं हैं, जिन का पूरा परिवार इस कारोबार से जुड़ा है, बल्कि इस इलाके के 25 हजार लोगों में से 80 फीसदी आबादी मोतियों के काम में लगी हुई है. अब इस गांव को ‘मोती गांव’ के नाम से जाना जाने लगा है.

इसी इलाके की एक दबंग औरत निर्मल बालियान का कहना है, ‘‘इस इलाके की ज्यादातर औरतें व लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी हैं. ये औरतें खाली समय में काम कर के अपने परिवार की माली मदद करती हैं, जो पूरे दिन खेतों में मेहनतमशक्कत करते हैं.

‘‘गांवभर का चलन है कि लड़कियों को कम उम्र में ही काम करने के लिए बढ़ावा दिया जाता है, जो खुशीखुशी अपने परिवार की मदद करने लगती हैं.’’

20 सालों से माला बनाने में लगी बिमला का कहना है, ‘‘काम में मसरूफ रहने से नौजवान पीढ़ी  गलत बातों की ओर सोचती तक नहीं.’’

मुडाली गांव के काफी असरदार शख्स रोहिल अहमद का कारोबार काफी बड़ा है. वे पूरे देश में अपना माल भेजते हैं. उन का कहना है, ‘‘बहुत सी औरतें इस काम में जल्दी ही माहिर हो जाती हैं. उन्हें मोतियों को नायलोन के धागे में पिरोने में कोई खास दिक्कत नहीं होती.’’

कुछ गांव वाले बताते हैं कि 27 साल पहले मोहम्मद सबरंग मुडाली गांव में माला पिरोने के लिए कुछ मोती ले कर आए थे. पूरे दिन काम करने के बाद वे हर माला का 10 रुपए का भुगतान करते थे. वह रकम गांव वालों द्वारा चरखे पर बनाए गए सूत की मजदूरी से 4 सौ गुना ज्यादा थी. आज यही कारोबार 12 करोड़ रुपए का है. 

मोतीजेवरों के कारोबारी वकील अहमद दूरदराज के कई खरीदारों से ह्वाट्सऐप द्वारा मेलजोल बनाए रखते हैं. उन का कहना है, ‘‘हमारे मोतियों से बने गहने चेन्नई, बेंगलुरु, मुंबई के साथसाथ राजस्थान के कई शहरों में जाते हैं. हम उन्हें गहनों के नमूने के फोटो ह्वाट्सऐप पर ही मुहैया करा देते हैं.’’

वे आगे कहते हैं कि अगर सरकार ध्यान दे, तो यह कारोबार कई गुना ज्यादा बढ़ सकता है. क्योंकि नकद रकम का लेनदेन जोखिम भरा है, इसलिए ज्यादातर ग्राहक औनलाइन भुगतान करना चाहते हैं. बैंक की इस सुविधा की कमी में कच्चा माल खरीदने व समय पर बना माल पहुंचाने में कई मुश्किलें सामने आती हैं.                           

सुंदरियों का मेला

सुंदरता, बोल्डनैस और विचारों की ताकत का अपने देश का रिप्रैजैंटेशन है, ‘मिस इंटरनैशनल ब्यूटी कौंटैस्ट.’ जिस में विभिन्न देशों की सुंदरियां भाग लेती हैं. ये बालाएं दुनिया की अच्छीखासी जानकारी रखती हैं. सब के बीच रह कर न सिर्फ ये अपनी सुंदरता के बल पर मैजिक चलाने की कोशिश करती हैं बल्कि एक मंच पर विभिन्न देशों के लोगों के बीच प्यार और शांति का ऐसा संदेश देती हैं कि देखने वाले इन के कायल हुए बिना नहीं रह पाते.

कब हुआ पहला आयोजन

सब से पहले यह कौंटैस्ट 1960 में संयुक्त राज्य अमेरिका के कैलिफोर्निया शहर में आयोजित हुआ, जिसे खूब पसंद किया गया. इसी कारण यह सालों तक वहीं होता रहा. इस के प्रति लोगों की बढ़ती दीवानगी को देखते हुए 1968-70 में जापान में इस का आयोजन किया गया. फिर 2004 से प्रतिवर्ष यह प्रतियोगिता चीन या जापान में ही होने लगी.

मिस इंटरनैशनल 2016

56वां मिस इंटरनैशनल 2016 टोक्यो, जापान में 27 अक्तूबर, 2016 को इंटरनैशनल कल्चरर एसोसिएशन द्वारा आयोजित किया गया, जिस में दुनिया भर की 70 सुंदरियों ने भाग लिया.

इस में फिलीपींस की कैयलि वैरजोसा ने मिस इंटरनैशनल 2016 के ताज पर अपना कब्जा किया. उन्होंने अपने देश के लिए छठा ताज जीतने के लिए जीतोड़ मेहनत की. कैयलि को यह ताज 2015 की मिस इंटरनैशनल विजेता वैनेजुएला की एडमर मार्टींज ने पहनाया.

विजेता का चुनाव

कौंटैस्ट की शुरुआत राष्ट्रीय कौस्ट्यूम्स का प्रदर्शन करने के साथ हुई, जिस में प्रतिभागी अपने देश की संस्कृति के आधार पर बनाए गए फैशनेबल परिधानों को प्रदर्शित करने में सक्षम दिखे. इस आधार पर 15 सेमीफाइलिस्ट चुने गए. फिर उन्होंने अपने स्किल्स को दर्शाने के साथसाथ स्विमसूट कंपीटिशन के दौरान स्टेज पर अपना जलवा बिखेरा.       

इस के बाद एक राउंड ऐसा भी हुआ जिस में सभी प्रतिभागियों ने अपने देश के फैशन डिजाइनर द्वारा बनाए गए गाउंस में प्रैजैंटेशन दी और फिर औडियंस के सामने अपनी बुलंद आवाज में यह बताने की कोशिश की कि क्यों उन्हें ही मिस इंटरनैशनल 2016 का खिताब दिया जाए. इन्हीं सब के आधार पर विजेता घोषित किया गया.

कहने का तात्पर्य यह है कि इस में वही विनर बनता है जिस में अच्छा सैंस औफ ह्यूमर होने के साथसाथ बेहतर प्रैजैंटेशन देने की भी क्षमता हो. बोल्ड तो हो ही, साथ ही उस के चेहरे से कौन्फिडैंस भी झलके. विषम परिस्थिति में भी उस के चेहरे पर स्माइल हो यानी इस में ब्यूटी, टैलेंट, इनर व आउटर पर्सनैलिटी, कौस्ट्यूम्स, मौडलिंग आदि के आधार पर विनर घोषित किया जाता है.

शान बढ़ाने में ये भी नहीं रहीं पीछे

इस प्रतियोगिता में फिलीपींस की कैयलि वैरजोसा के नाम जहां मुख्य ताज रहा, वहीं फर्स्ट रनरअप मिस आस्ट्रेलिया अलैक्जेंडर ब्रिटन, सैकंड रनरअप और मिस बैस्ट ड्रैसर मिस इंडोनेशिया फैलिसिया ह्वैंग, थर्ड रनरअप और मिस नैशनल कौस्ट्यूम्स 2016 मिस निकारागुआ ब्रिन्नी चैपोरो व फोर्थ रनरअप बनीं मिस यूएसए कैटरेना लिंबैय.

मिस इंटरनैशनल एशिया 2016 का खिताब केलि यूक लाम चान, हौंगकौंग को, मिस इंटरनैशनल यूरोप 2016 मिलिसा शेरपेन, नीदरलैंड्स को, मिस इंटरनैशनल अमेरिका 2016 इवाना आबाद, इक्वाडोर को, मिस इंटरनैशनल अफ्रीका 2016 मैसेरे जैल्डा स्वैरि, सीरिया लिओन को, मिस इंटरनैशनल ओश्यिलिन 2016 गुनेवेरा डावेनपोर्ट, हवाई को व मिस परफैक्ट बौडी 2016 अलिना किरचियू, मालदोव को मिला.

इंटरनैशनल ब्यूटी कौंटैस्ट जीतने वाली 10 भारतीय सुंदरियां

निकोल फारिया

निकोल फारिया जो इंडियन सुपरमौडल और ऐक्ट्रैस हैं, पहली भारतीय युवती हैं जिन्होंने मिस अर्थ पेजैंट का खिताब जीता. यहां तक कि उन्होंने मुंबई में आयोजित पैंटालूंस फेमिना मिस इंडिया 2010 ब्यूटी कौंटैस्ट में मिस इंडिया अर्थ टाइटल भी अपने नाम किया.

दिया मिर्जा

अभिनेत्री दिया मिर्जा फेमिना मिस इंडिया, 2000 की सैकंड रनरअप होने के साथसाथ फिलीपींस में मिस एशिया पैसिफिक जीतने के साथ पहली भारतीय कंटैस्टैंट बनीं, जिन्होंने 27 साल की उम्र में यह खिताब जीता. इसी वर्ष उन्होंने मिस यूनिवर्स का खिताब जीत कर देश का नाम रोशन किया.

प्रियंका चोपड़ा

बौलीवुड की शान व जान प्रियंका चोपड़ा ने मिस वर्ल्ड का ताज भारत के नाम किया. अमेरिका में वे फेमिना मिस इंडिया प्रतियोगिता की दूसरी विजेता भी रहीं.

लारा दत्ता

ब्यूटी क्वीन, ऐक्ट्रैस व मौडल लारा दत्ता 2000 में मिस यूनिवर्स का खिताब जीतने वाली सुष्मिता सेन के बाद दूसरी भारतीय युवती बनीं.

युक्ता मुखी

लंदन के ओलिंपिक थिएटर में दिसंबर, 1999 में युक्ता मुखी ने मिस वर्ल्ड का ताज जीता.

डायना हेडन

मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता का खिताब जीतने वाली डायना हेडन तीसरी भारतीय तो बनी हीं साथ ही उन्होंने 1997 में फेमिना मिस इंडिया वर्ल्ड क्राउन भी अपने नाम किया.

ऐश्वर्या राय

मिस इंडिया प्रतियोगिता की फर्स्ट रनरअप होने के साथ ही ऐश्वर्या राय ने वर्ष 1994 में मिस वर्ल्ड पेजैंट का ताज भी जीता.

सुष्मिता सेन

सुष्मिता सेन ‘मिस यूनिवर्स’ का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय युवती बनीं.

जीनत अमान

 70 और 80 के दशक में हिंदी फिल्मों में जान डालने वाली अभिनेत्री जीनत अमान मिस एशिया पैसिफिक का ताज पहनने वाली पहली भारतीय युवती बनीं.

रीता फारिया

रीता फारिया मिस वर्ल्ड का खिताब जीतने वाली पहली भारतीय और एशियाई मूल की युवती हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय युवतियों ने देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी अपनी सुंदरता का परचम लहराया है.

आप को बता दें कि इंटरनैशनल कल्चरर ऐसोसिएशन, जो इस कौंटैस्ट को आयोजित करती है, की शुरुआत 1984 में हुई, जिस का उद्देश्य विभिन्न देशों से आईं विभिन्न जातियों और भाषाओं की सुंदरियों द्वारा प्रेम और शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत करने का संदेश देना है.                  

टोंड बौडी करे कमाल

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में अकसर हम तनावग्रस्त रहते हैं. वर्किंग आवर्स के नाइट ऐंड डे कल्चर ने लाइफस्टाइल को पूरी तरह बदल कर रख दिया है. ऐसे में अगर कोई सब से ज्यादा सफर करता है तो वह है हमारा शरीर. कामकाजी युवतियों के लिए यह बड़ी समस्या है, क्योंकि उन्हें घर और बाहर दोनों की ही जिम्मेदारियां निभानी पड़ती हैं, ऐसे में ब्यूटी और फिगर पर तो असर पड़ता ही है.

पर बदलते वक्त में युवतियों ने अपनी फिगर और ब्यूटी को पूरी तरह मैंटेन करने के उपाय ढूंढ़ लिए हैं. टोंड फिगर आप की ब्यूटी को और निखारती है. कहते हैं अगर बौडी तरोताजा हो तो उस का सीधा असर आप के चेहरे पर दिखता है. थकानरहित शरीर से आप का चेहरा दमक उठता है. इसलिए फेशियल के साथसाथ बौडी मसाज भी ब्यूटी थेरैपी का एक अहम हिस्सा है. हालांकि बहुत सी युवतियां इसे इग्नोर करती हैं. कुछ युवतियां कभीकभार ही फेशियल करवाती हैं, उन्हें बौडी मसाज समय की बरबादी लगती है, जबकि ऐसी धारणा सही नहीं है, अगर आप फिट रहेंगी और लुक भी अच्छा होगा, तो आप का कौन्फिडैंस भी बढ़ेगा, जो आज बहुत जरूरी है.

बौडी मसाज के फायदे

इनर ब्यूटी उभरती है

हम सब जानते हैं कि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन बसता है. रैगुलर बौडी मसाज आप की ब्यूटी को लंबे अरसे तक बनाए रखती है. नैचुरल औयल, गुलाब जल, अरोमा से बौडी स्मूद बनती है और यही रिलैक्सेशन आप की इनर ब्यूटी को उभारने का भी काम करती है.

ब्लड सर्कुलेशन व धमनियों को रखती है मैंटेन

रैगुलर बौडी मसाज से शरीर के रोमछिद्र व पोर्स खुल जाते हैं और खून का प्रवाह अच्छी तरह होने लगता है. औक्सीजन की भरपूर सप्लाई से शरीर में चुस्तीफुरती आती है. इस से आप के शरीर की सारी थकान मिटती है और शरीर में नई चमक व ऊर्जा का संचार होता है.

तनाव दूर करती है मसाज

थकावट और काम का ओवरलोड हमारे तनमन को मुरझा देता है. उस की चमक खो जाती है. ऐसे में रैगुलर बौडी मसाज आप को स्ट्रैंथ व पावर देती है. इस तरह मसाज आप की बौडी पर मैजिकल असर करती है. हफ्ते की एक दिन मसाज भी आप की बौडी को टोंड और चेहरे को खिलाखिला बना सकती है.     

क्या करें

– अपनी ब्यूटी अपौइंटमैंट के दौरान एक सैशन बौडी मसाज का भी रखें.

– किसी बौडी मसाजर की होम फैसिलिटी की सुविधा ले सकती हैं.

– क्वालिटी बौडी मसाज औयल का ही इस्तेमाल करें.

– अपनी स्किन के अनुसार ही अरोमा, स्प्रे, औयल या मसाज क्रीम का चुनाव करें.

– किसी ऐक्सपर्ट से ही मसाज सैशन लें.

इन्हें हमेशा ध्यान में रखें

– मसाज लेने वाली सीट कंफर्टेबल हो.

– लोकल व घटिया प्रोडक्ट्स से बचें.

– अनप्रोफैशनल मसाज प्रोवाइडर कभी हायर न करें.

– संभव हो तो माइल्ड म्यूजिक के साथ मसाज का मजा लें.

– मसाज हमेशा परफैक्ट पोश्चर में ही लें, आड़ेतिरछे लेट कर नहीं.

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