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भोपाल जेल ब्रेक : मुठभेड़ या साजिश

‘जो लोग समाज में खलल डालते हैं, उन पर सख्त कार्यवाही करें. नक्सलवाद और सिमी के नैटवर्क को पूरी तरह खत्म करें. पर आतंकवाद के नए खतरे को सब से पहले देखना है, उस से निबटने की तैयारी कर लें. इनसानियत के दुश्मनों को हर हाल में खत्म करना है. जेलों की हिफाजत पर कड़ी नजर रखें.’

दीवाली के ठीक 4 दिन पहले 26 अक्तूबर, 2016 को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने ये लफ्ज खासतौर से बुलाई गई कलक्टर, एसपी कौंफ्रैंस में कहे थे. हां, उन्होंने यह नहीं बताया था कि आतंकवाद का नया खतरा क्या है और इस से कैसे निबटना है. लेकिन शिवराज सिंह चौहान को नजदीक से जाननेसमझने वाले अफसरों और लोगों के कान खड़े हो गए थे कि यह जरूर खतरे की घंटी है, जिस से होशियार रहने के लिए उन्हें नसीहत और मशवरा दिया जा रहा है.

इस के महज 5 दिन बाद ही भोपाल की सैंट्रल जेल में कैद सिमी यानी स्टूडैंट इसलामिक मूवमैंट औफ इंडिया के 8 कैदी जेल तोड़ कर भागे, तो सहज लगा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कलक्टर, एसपी कौंफ्रैंस में भाषण नहीं दिया था, बल्कि पेशेवर ज्योतिषियों की तरह एक होने वाली वारदात की भविष्यवाणी सी की थी.

इतमीनान से भागे

भोपाल की सैंट्रल जेल बहुत महफूज मानी जाती है, जिसे कई सर्टिफिकेट  भी मिले हुए हैं. हिफाजत के लिहाज से सिमी के कार्यकर्ताओं को यहां रखा गया था.

30 अक्तूबर, 2016 की देर रात कह लें या 31 अक्तूबर की अलसुबह वे आठों इस जेल को प्लास्टिक के मानिंद ढहा कर भाग निकले.

उन आठों कैदियों को जेल के हाई सिक्योरिटी वाले बी ब्लौक में रखा गया था. भागने के लिए उन्होंने पहले से ही योजना बना रखी थी, ऐसा कई वजहों के चलते लग नहीं रहा.

इस दिन रात को 2 बजे ड्यूटी की पाली बदली गई थी. दीवाली के त्योहार की खुमारी और थकान में डूबे मुलाजिमों को एहसास ही नहीं था कि बहुत जल्द जेल की साख पर बट्टा लगने वाला है.

मुलाजिमों को ड्यूटी संभाले अभी एक घंटा ही हुआ था कि वे कैदी मानो जादू के जोर से अपनेअपने बैरकों से बाहर आ गए. भागते हुए उन के रास्ते में जेल का गार्ड रमाशंकर यादव आड़े आया, तो उन्होंने उस की हत्या कर दी.

हत्या करने में उन्होंने जेल की थाली और गिलास तोड़ कर उन्हें हथियार की तरह इस्तेमाल किया.

रमाशंकर यादव की हत्या के बाद एक दूसरा गार्ड चंदर तिरंथे आया, तो उन्होंने उस के हाथपैर बांध दिए और उस की जेब में रखी सीटी तोड़ दी, जिस से वह किसी को उन के भागने के बाबत आगाह न कर सके. चंदर के मुंह में उन्होंने कपड़ा ठूंसते हुए उसे न चीखने की भी धौंस दी थी.

बैरकों के बाहर आ कर उन कैदियों ने जेल की 28 फुट ऊंची दीवार साथ लाई चादरों की सीढ़ी बना कर पार की और दूसरी तरफ एकएक कर कूद गए.

शिवराज सिंह चौहान को रात के 3 बजे इस वारदात की खबर दी गई. इस के पहले जेल और पुलिस महकमे के आला अफसर फुरती दिखाते हुए अपनेअपने बिस्तर छोड़ कर जेल और पुलिस हैडक्वार्टर की तरफ दौड़ लगा चुके थे.

भागने के बाद उन कैदियों ने जेल से आजादी तो हासिल कर ली, पर अब कहां जाना या भागना है, इस की योजना उन्होंने नहीं बनाई थी. अभी तक सारा कुछ फिल्मी स्टाइल में बड़ी आसानी से हुआ था, जिस में सिवा रमाशंकर यादव के कोई अड़चन पेश नहीं आई थी.

नीम अंधेरे में उन्होंने बजाय मेन रोड के कच्चा रास्ता भागने के लिए चुना, जिस से किसी की निगाह में न आ सकें और ऐसा हुआ भी. कोई 10 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद वे आठों एकसाथ मनीखेड़ी गांव की चट्टानों पर जा पहुंचे, जबकि वे और भी दूर तक भाग सकते थे, लेकिन क्यों नहीं भागे, इस सवाल का जवाब दूसरे कई दर्जनों सवालों की तरह मिलना बाकी है.

इधर भोपाल में खासा हड़कंप मच चुका था. लोग फोन कर के एकदूसरे को बता रहे थे कि क्या कुछ हो चुका है. पुलिस, एटीएस और एसटीएफ के अफसर जेल पहुंच चुके थे. मीटिंगों का दौर जारी था, जिन में 8 भगोड़े कैदियों को ढूंढ़ने और घेरने की प्लानिंग की जा रही थी.

4 घंटे पुलिस वाले और दूसरी एजेंसियां भागमभाग करती रहीं. खोजी कुत्तों की मदद ली गई, जिस से यह और पता चला कि कैदी जंगल की तरफ भागे हैं. लिहाजा, वहां के नजदीकी और गांधीनगर, गुनगा थाना इलाकों के गांवों में अलर्ट जारी कर दिया गया.

अभी तक पुलिस की तरफ से कोई करिश्मा नहीं हुआ था. सुबह तकरीबन 8 बजे खेजड़ादेव गांव के कुछ लोगों के जरीए कैदियों के मनीखेड़ी गांव के आसपास होने की खबर मिली, तो पुलिस की गाडि़यां वहां पहुंचने लगीं. जब इतमीनान हो गया कि फरार कैदी इन्हीं पहाडि़यों में छिपे हैं, तो 10 बजे तक पुलिस वालों ने पूरी पहाड़ी को चौतरफा घेर लिया.

अब तक आसपास के गांव वाले भी इकट्ठा हो चुके थे. उन्होंने पुलिस अफसरों को बताया था कि वे लोग यानी कैदी पुलिस वालों को गालियां दे रहे थे और पाकिस्तान के हक में नारे भी लगा रहे थे. खेजड़ादेव गांव के सरपंच मोहन सिंह मीणा की मानें, तो उन्होंने ही सब से पहले इन कैदियों को नदी पार करते देखा था.

यों हुआ ऐनकाउंटर

खुद को पुलिस वालों से घिरा देख  कैदियों को अपने अंजाम का अंदाजा हो गया था. लिहाजा, उन्होंने पुलिस टीमों की तरफ पत्थर बरसाना शुरू कर दिए. उस वक्त सुबह के 10 बज चुके थे और सिमी के कैदियों के फरार होने की खबर जंगल की आग की तरह देशभर में फैल चुकी थी.

मनीखेड़ी की पहाड़ी पर क्या हो रहा है, यह कम ही लोगों को मालूम था कि कैदी घेर लिए गए हैं, जहां गांव वालों सहित पुलिस और एटीएस के जवानों के समूह दिख रहे थे. ये लोग किसी भी अनहोनी और वारदात से निबटने के लिए पोजीशन ले चुके थे. पहाड़ी पर चढ़ कर कैदी लगातार पथराव कर रहे थे. कुछ जवानों को इस से चोटें भी आईं.

सुबह साढ़े 10 बजे भोपाल नौर्थ के एसपी अरविंद सक्सेना ने वायरलैस सैट पर पुलिस वालों को हुक्म दिया कि वे कैदियों को मार गिराएं. इस से पहले पुलिस ने कैदियों से हथियार डालने को कहा था, पर वे नहीं माने, तो पुलिस की तरफ से फायरिंग शुरू हो गई और एक घंटे में आठों कैदी ढेर हो गए. पुलिस द्वारा चलाई गई ज्यादातर गोलियां कैदियों के सीने में लगी थीं.

कठघरे में जेल प्रशासन

भागने से ले कर मार गिराए जाने के दरमियान सबकुछ ठीक वैसा था नहीं, जैसा कि बताया जा रहा था. कैदी भागे और फिर मारे गए, लेकिन भागने की बात पर हर किसी ने सवाल किए, जिन के मुकम्मल जवाब शायद ही कभी मिल पाएं और यही वे सवाल या वजहें हैं, जो इस मुठभेड़ के साजिश होने की तरफ भी इशारा कर रही हैं.

कैदियों ने अपनेअपने बैरकों के ताले तोड़े नहीं थे, बल्कि चाबियों से खोले थे, जबकि ये चाबियां बैरकों से तकरीबन सवा किलोमीटर दूर बने जेलर के केबिन में जस की तस रखी थीं.

इस सवाल का जवाब जेल प्रशासन द्वारा यह दिया गया कि कैदियों ने प्लास्टिक की चाबियों का इस्तेमाल किया था. उन्होंने टूथ ब्रश से हर एक ताले की चाबी बना ली थी.

पर दूसरे सवालों का जवाब शायद ही कभी मिले कि जेल के पास की निगरानी के लिए जेलर के दफ्तर के पास जो खासतौर से केबिन बनवाया गया था, उस पर ड्यूटी दे रहा सिपाही कहां था?

उन कैदियों की निगरानी के लिए ही खासतौर से एसएएफ के जिन 4 जवानों की ड्यूटी लगाई गई थी, वे कैदियों के भागने के वक्त कहां थे? भागने के लिए कैदियों को 3 दीवारों को फांदना पड़ा था. उन्हें पूरा रास्ता साफ कैसे मिला और क्यों मिला? ड्यूटी दे रहे जवान कहां गायब हो गए थे?

दीवाली के त्योहार के चलते जेल के आधे मुलाजिमों को छुट्टी दे देना और शक पैदा कर रहा है, क्योंकि जेल तोड़ने का अंदेशा आईबी (इंटैलीजैंस ब्यूरो) जैसी एजेंसी जता चुकी थी.

एक जेल अफसर ने चिट्ठी लिखते इस बाबत प्रशासन को आगाह किया था, पर उस पर कोई कार्यवाही या पहल नहीं की गई. एक और यह सवाल भी  शक पैदा करने वाला है कि जेल के सीसीटीवी कैमरे कब से और क्यों बंद थे.

बातें और सवाल यहीं खत्म नहीं होते. उन कैदियों के पास से हथियार बरामद किए गए थे, वे कहां से आए, यह भी कोई नहीं बता पाया. जब वे कैदी लाश में तबदील हुए, तब उन के बदन पर जींस व टीशर्ट थे, हाथ में घडि़यां थीं, नए जूते थे, उन की दाढ़ी बनी हुई थी. यह सब कैसे हुआ? ये सारे सवाल अब धीरेधीरे दम तोड़ रहे हैं.

यह बात जरूर फौरी तौर पर मान ली गई कि जरूर जेल के कुछ मुलाजिम उन कैदियों से मिले हुए थे.

ऐनकाउंटर की यह घटना बहुत तेजी से घटी, जिस के तहत एडीजी सुशोमन बनर्जी और डीआईजी जेल मंशाराम पटेल को सस्पैंड कर दिया गया.

राज्य सरकार ने तुरंत केंद्र सरकार से गुजारिश की कि पूरे मामले की जांच एनआईए (राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी) से कराई जाए और तुरंत जांच का जिम्मा रिटायर्ड डीजीपी नंदन दुबे को सौंप दिया गया. लेकिन 5 दिन बाद ही ये फैसले बदल दिए गए.

बवाल कम मचा, तो एनआईए से जांच की गुजारिश ही राज्य सरकार ने केंद्र को नहीं भेजी और नंदन दुबे को भी हटा कर जांच का जिम्मा एक न्यायिक आयोग को सौंपते हुए उस का मुखिया रिटायर्ड जज एसके पांडे को बना दिया.

सियासत और समाज

8 घंटे चले इस ड्रामे में जब पुलिस वालें का रोल खत्म हुआ, तो उन की जगह नेताओं ने ले ली. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगातार जानकारी ले रहे थे. उन की चिंता जायज थी कि अगर आतंकी वाकई दूर भाग जाते, तो उन की छीछालेदार होती. सुबह 9 बजे ही वे केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह को सारी जानकारी उन के मांगने पर दे चुके थे.

कांग्रेसी नेता दिग्विजय सिंह ने यह पूछते हुए की कि पहले खंडवा से आतंकी भागे, अब भोपाल सैंट्रल जेल से, जांच होनी चाहिए कि यह किस की मिलीभगत है? क्या वे किसी योजना के तहत भगाए गए?

आम चर्चा और सोशल मीडिया पर हर कोई दिग्विजय सिंह के इस बयान पर नाराज दिखा. यही इस ड्रामे का क्लाइमैक्स माना जाना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ. हर किसी ने उन्हें मुसलिमों और आतंकियों का हिमायती माना. रहीसही कसर असउद्दीन ओवैसी ने यह शक जताते हुए पूरी कर दी कि ये कैदी विचाराधीन यानी अंडर ट्रायल थे, उन्हें किस बिना पर मारा गया है.

इस के बाद कई नेताओं, जिन में बसपा प्रमुख मायावती भी शामिल हैं, ने भी इस ऐनकाउंटर पर एतराज जताया. लेकिन जनता की अदालत ने इस मुठभेड़ को गलत तरीके से किया गया अच्छा काम करार दे दिया था. शिवराज सिंह चौहान को हीरो बना दिया गया था, जो मारे गए हवलदार रमाशंकर यादव को शहीद का दर्जा देते हुए उस के घर वालों को हिम्मत बंधाने और उस की अर्थी को कंधा देने पहुंचे व इनाम की रकम भी बढ़ा दी थी.

इतना ही नहीं, मुठभेड़ में शामिल पुलिस वालों और गांव वालों को भी 40 लाख रुपए के नकद इनाम का ऐलान कर दिया गया, जो उन आतंकियों के सिर पर रखा गया था.

मुद्दे की बात पर गफलत

इस में कोई शक नहीं कि इस मुठभेड़ से शिवराज सिंह चौहान हीरो बन कर उभरे हैं और लोगों की सोच यहीं तक सिमट कर रह गई है कि आखिर इस में हर्ज क्या है? यानी लोग पुलिस की अदालत को मंजूरी दे रहे हैं, तो यह बात उन्हीं के भविष्य के लिहाज से खतरनाक भी साबित हो सकती है.

यह हिंदुत्व का करंट ही था कि मध्य प्रदेश के लोगों ने यह भी मान लिया कि चूंकि वे सिमी के कार्यकर्ता थे, मुसलिम थे, देश के दुश्मन थे, इसलिए उन्हें यों मारना नाजायज बात नहीं.

यह वक्ती तौर का जोश भर लगता है कि कल को पुलिस वाले अगर चौराहों पर इसी तर्ज पर इंसाफ करने लगेंगे, तो क्या उस पर भी हां की मुहर लोग लगाएंगे? और जब फैसला पुलिस को ही करना है, तो अदालतों की जरूरत क्या?

जाहिर है कि यह मुठभेड़ लोगों के जज्बातों और जोश की बलि चढ़ गई है, जो सरकार से सवाल नहीं पूछ रहे हैं, बल्कि समर्थन कर रहे हैं.

यह समाज और सियासत का वह दौर है जिस में आम लोग हिंदुत्व और राष्ट्रप्रेम में फर्क नहीं कर पा रहे हैं. अब व्यापम महाघोटाले की तरह सालोंसाल जांच चलती रहेगी. कुछेक और मुलाजिम, अफसर सस्पैंड होंगे, जिन्होंने इन कैदियों की मदद की, पर वे गद्दार करार नहीं दिए जा रहे हैं, क्योंकि उन से और उन जैसों से किसी को किसी किस्म का खतरा अभी महसूस नहीं हो रहा. देशभक्ति, हिंदुत्व का जुनून लोगों से काफीकुछ छीन रहा है, जिस के तहत दिग्विजय सिंह की यह दलील दम तोड़ चुकी है कि ये कैदी किसी साजिश के तहत भगाए तो नहीं गए थे.

आम लोगों की निगाह में ऐनकाउंटर का यह तरीका अगर कारगर है, तो बेहतर यह होगा कि देश की तमाम जिलों में बंद आतंकियों के अलावा दूसरे मुजरिमों को भी इसी तरह मार गिराने की मंजूरी दी जाए, जिस से चुटकियों में इंसाफ हो जाता है.                  

ये भी हैं शक की वजहें

बात भले ही अंत भला तो सब भला की तर्ज पर खत्म हो रही है, लेकिन शक को बढ़ावा देने और तमाम बातें अभी भी वजूद में हैं. मसलन, ऐनकाउंटर के बाद एक वीडियो वायरल हुआ, जिस में साफ दिख रहा है कि पुलिस वाले मरे हुए आतंकियों पर नजदीक से गोली दागते हुए कहते जा रहे हैं कि जल्दी मारो, एसपी साहब आने वाले हैं. यह वीडियो न्यूज चैनलों ने दिखाया, तो सरकार और पुलिस महकमे को कोई जवाब या सफाई नहीं सूझी.

दूसरा गड़बड़झाला तब सामने आया, जब एटीएस आईजी संजीव शमी ने यह कहा कि आतंकियों के पास हथियार नहीं थे, जबकि आईजी योगेश चौधरी ने साफसाफ कहा था कि आतंकियों ने46 राउंड फायर किए थे. बकौल योेगेश चौधरी, ‘‘आतंकियों ने फायरिंग की थी, जिस की जवाबी कार्यवाही में ऐनकाउंटर हो गया. आतंकियों के पास से कट्टों के अलावा धारदार हथियार भी बरामद हुए.’’

इन में से कोई एक तो गलत या झूठ बोला. क्यों बोला, इस की जांच भी जरूरी है, क्योंकि ये दोनों ही जिम्मेदार अफसर हैं.

एक और अहम वजह चंदर तिरंथे का दिया गया वह बयान है कि कैदियों द्वारा बांधने के तकरीबन 15 मिनट बाद जेल के दूसरे मुलाजिमों ने उसे खोल दिया था यानी महज 15 मिनट में यह कैदी जेल की दीवारें पार कर चुके थे, जो कतई मुमकिन नहीं.

सिमी और उस का नैटवर्क

सिमी यानी स्टूडैंट इसलामिक मूवमैंट औफ इंडिया  का गठन साल 1977 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था. इस का मकसद भारत में पसर रही पश्चिमी संस्कृति को खत्म करना और भारत को इसलामिक देश बनाना है. साल 2001 में पोटा कानून के तहत सिमी पर पाबंदी लगाई गई थी, जो अभी भी बरकरार है.

यों तो सिमी के तार और ताल्लुकात देशभर में फैले हुए हैं, पर उस काअसर और आतंक उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के बाद मध्य प्रदेश में सब से ज्यादा है. मध्य प्रदेश में सिमी के सब से ज्यादा कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए हैं.

संप्रग सरकार ने पोटा कानून खत्म कर दिया, लेकिन मध्य प्रदेश समेत गुजरात और महाराष्ट्र में राज्य सरकारों की गुजारिश पर इस पर पाबंदी जारी रही. सिमी का महासचिव सफार नागौरी इस वक्त अपने संगठन का मुखिया है और अभी भी जेल में बंद है.

पुलिस की मानें, तो साल 2001 में पुणे और कानपुर में हुए सांप्रदायिक दंगों और साबरमती ऐक्सप्रैस ट्रेन में हुए बम धमाकों में सिमी का ही हाथ था. ऐसे कई आरोप सिमी पर हैं. सिमी के तार तमाम अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी संगठनों से जुड़े हुए हैं, जिन में जमात ए इसलाम और हिजबुल मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठन भी शामिल हैं.

गुजरात में हुए साल 2002 के दंगों में पुलिस भी सिमी का हाथ बताती रही है. कई राज्यों की यूनिवर्सिटियों में सिमी की अच्छी पैठ है और उत्तर प्रदेश के कानपुर, अलीगढ़, लखनऊ, आजमगढ़, रामपुर और मुरादाबाद शहरों में उसे लोकल लोगों का समर्थन मिला हुआ है.

भोपाल की मुठभेड़ में जो आतंकी मारे गए, उन पर कई मुकदमे चल रहे थे.

अब्दुल मजीद- बम बनाने में माहिर अब्दुल मजीद उज्जैन के महिदपुर का बाशिंदा था और पेशे से इलैक्ट्रिशियन था. साल 2014 में उसे गिरफ्तार किया गया. अब्दुल मजीद बम बनाता था और सप्लाई भी करता था.

मोहम्मद अकील- खंडवा का रहने वाला मोहम्मद अकील साल 2012 में महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले से गिरफ्तार किया गया था.

मोहम्मद खालिद- महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के बाशिंदे मोहम्मद खालिद को साल 2013 के आखिर में मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले के सेंधवा कसबे से गिरफ्तार किया गया था.

खंडवा जेल से फरार मोहम्मद खालिद ने पूछताछ में माना था कि वह देश के उस समय के गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे और उन की बेटी के कत्ल की योजना बना रहा था.

मेहबूब गुड्डू- खंडवा का रहने वाला मेहबूब गुड्डू मध्य प्रदेश सिमी का चीफ था. साल 2009 में उसे एक तिहरे हत्याकांड का आरोपी बनाया गया था. वह साल 2010 में हुए अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट का भी आरोपी था. इलजाम यह भी है कि मेहबूब गुड्डू साल 2011 में रतलाम के एटीएस के हवलदार के कत्ल में भी शामिल था.

जाकिर हुसैन- जाकिर हुसैन खंडवा की झुग्गी बस्ती का बाशिंदा था. इस के दूसरे नाम विक्की डौन और विनय कुमार भी थे. जाकिर पर कई डकैतियों के आरोप थे. भोपाल में साल 2010 में हुई मणप्पुरम गोल्ड डकैती का भी वह आरोपी था.

जाकिर हुसैन को साल 2011 में मध्य प्रदेश एटीएस ने गिरफ्तार किया था. बाद में छूटने पर उस ने तेलंगाना में भारतीय स्टेट बैंक की करीमनगर शाखा से 46 लाख रुपए लूटे थे. इस के बाद उसे राउरकेला से गिरफ्तार किया गया था.

अमजद खान- खंडवा के रहने वाले अमजद खान के भी कई नाम थे. उस पर भाजपा नेता प्रमोद तिवारी पर जानलेवा हमला करने समेत कई बैंक डकैतियों के भी आरोप थे. उसे भी राउरकेला से गिरफ्तार किया गया था.

मोहम्मद सालिक- खंडवा के गुलशन नगर का रहने वाला मोहम्मद सालिक भी राउरकेला से गिरफ्तार किया गया था. उस पर भी कई तरह के आरोप दर्ज थे.

मुजीब शेख- मुजीब शेख पर साल 2008 के आजमगढ़ के बम ब्लास्ट में शामिल होने का आरोप था. उसे साल 2011 में जबलपुर से गिरफ्तार किया गया 

अंधविश्वास ही अंधविश्वास

चाहे कोई भी हो, यह मानने को कतई तैयार नहीं है कि वह अंधविश्वासी है. किसी को गाली देने से जैसे कोई शख्स दुखी और गुस्सा हो जाता है, वैसे ही किसी को अंधविश्वासी कहने से भी वह गुस्सा हो जाता है. अंधविश्वासी कहलाना कोई भी नहीं चाहता, पर अंधविश्वास हैं क्या क्या, यही उन्हें पता नहीं होता.

हालांकि यह सभी मानने को तैयार हैं कि अंधविश्वास और सामाजिक, सांस्कृतिक व धार्मिक बुराइयां, परंपरा, रस्मोरिवाज हमारी तरक्की में बहुत बड़ी रुकावट हैं.

देश में ‘अर्जक संघ’ समेत कई ऐसे संगठन हैं, जो अंधविश्वास के साथसाथ समाज में फैली बुराइयों को खत्म करने में जुटे हैं.

हम यहां कुछ अंधविश्वासों, परंपराओं व बुराइयों की ओर आप का ध्यान खींच रहे हैं:

* सुबह उठते ही अपनी दोनों हथेलियां देखना.

* अगर कोई काम नहीं हो सका, तो यह कहना कि न जाने हम किस का मुंह देख कर उठे थे.

* नहाधो कर सुबह एक लोटा पानी सूरज की ओर गिराना और कान ऐंठ कर प्रणाम करना.

* सुबहसवेरे नहाधो कर तुलसी के पौधे में पानी डालना.

* तथाकथित धर्मग्रंथ का पाठ कर के खुद और अपने परिवार का समय बरबाद करना.

* दिन के मुताबिक रंगीन कपड़ों को पहनना, भोजन करना वगैरह.

* घर के दरवाजे पर पुरानी चप्पल या जूता, सूप, नीबू, मिर्च वगैरह टांगना.

* बाहर निकलते समय घर के लोगों को दही, चीनी खाने को कहना और माथे पर टीका करना.

* बाहर निकलते समय अगर तेली जाति का शख्स दिख जाए, तो अशुभ मानना.

* अगर कोई छींक दे, तो अशुभ मान कर रुक जाना.

* रास्ते में अगर आगे से कोई बिल्ली चली जाए, तो वहीं रुक जाना.

* अगर बच्चा या कोई शख्स बीमार पड़ जाए, तो झाड़फूंक कराना.

* किसी को सांपबिच्छू काट ले, तो झाड़फूंक कराना.

* हाथ में गंडातावीज बांधना और काला टीका करना.

* बच्चे के जन्म के बाद उस के पास लोहे की चीज रखना.

* नवजात बच्चे को किसी को इसलिए नहीं दिखाना कि कहीं नजर न लग जाए.

* बच्चे के हाथपैर, कमर में काला धागा बांधना या काला टीका लगाना.

* जन्म के बाद किसी ब्राह्मण को बुला कर पत्री दिखाना और उस के कहने पर कर्मकांड करना.

* नाम रखने के लिए ब्राह्मण पर आश्रित रहना.

* पढ़ने की शुरुआत किसी खास दिन से करना और पुरोहित से पूछ कर स्कूल भेजना.

* कहीं बाहर जाने से पहले ब्राह्मण से पत्री दिखाना और उसी के मुताबिक चलना.

* नए घर जाने से पहले ब्राह्मण से पूछ कर तारीख तय करना.

* शादी के पहले ब्राह्मण से दिन दिखाना और उसी से शादी या श्राद्ध कराना.

* कोई भी कर्मकांड करने या त्योहार के बाद ब्राह्मण को दान देना.

* त्योहार के नाम पर पत्थर, मिट्टी की मूर्ति के सामने गिड़गिड़ाना.

* किसी चमत्कार के बाद उस की वजह को ढूंढ़ने के बजाय ईश्वरीय शक्ति मान बैठना.

* अपनी गरीबी, जोरजुल्म से लड़ने के बजाय तकदीर में लिखा है कह कर चुप बैठ जाना.

* शरीर से ठीकठाक होने के बावजूद घरघर घूमते साधुमहात्मा के नाम पर लोगों को दान देना.

* शादी के समय काला कपड़ा नहीं पहनना.

* शादी के समय किसी विधवा को नहीं रहने देना.

* मरने के बाद कर्मकांड करना, सिर मुंड़वाना, ब्रह्मभोज करना, दान देना.

* सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण लगने पर भोजन नहीं करना और ब्राह्मण को दान देना.

* वास्तुशास्त्र के मुताबिक ही मकान बनवाना.

* ज्योतिष से हाथ दिखाना, भविष्यफल देखना और उस के बताए उपाय करना.

* रविवार को हल नहीं चलाना.

* देवीदेवता की पूजा किए बगैर धान नहीं रोपना.

और भी ऐसी कई बातें हैं, जो अंधविश्वास मानी जाती हैं. लेकिन हैं बिलकुल अधार्मिक बातें.

हमें वैज्ञानिक सोच पैदा करने की जरूरत है, ताकि जिंदगी में तरक्की के रास्ते पर चल सकें. इस से एक फायदा यह भी होगा कि जो बगैर मेहनत किए अपना पेट पाल रहा है, वह मेहनत की अहमियत समझ कर और ज्यादा मेहनत करने लगेगा. देश और समाज तरक्की की ओर बढ़ सकेगा.

इन सब प्रपंचों से धर्म के दुकानदारों को पैसा मिलता है, जो चाहे मंदिरों, चर्चों, मसजिदों में इस्तेमाल हो या दूसरों का सिर फोड़ने के काम आए. अंधविश्वास सीधे पंडों की जेबों से जुड़े हैं.

लेखक : उपेंद्र कुमार       

उर्वशी का सेल्फी लेना पड़ा महंगा

खबर है कि डिज़ाइनर मनीष मल्होत्रा के बर्थडे पार्टी पर अभिनेत्री उर्वशी रौतेला को सेल्फी का इतना बुखार चढ़ा कि सारे लोग परेशान हो गए. वह जिस भी सेलिब्रिटी को देखती, उसके साथ सेल्फी लेती. अभिनेता अर्जुन रामपाल के साथ तो वह 3 बार सेल्फी ली, जिससे परेशान होकर अर्जुन ने अपने आप को एक कमरे में बंद कर लिया.

सारे गेस्ट उर्वशी के इस हाव-भाव से इतने परेशान हो गए थे कि वह पार्टी छोड़कर चले जाने की फिराक में थे. सही है उर्वशी सेल्फी की आड़ में अपनी पब्लिसिटी करना चाह रही थी. उर्वशी को ये समझना पड़ेगा कि नाम, काम से होता है सेल्फी लेने से नहीं.

इंसपेक्टर के हत्यारों की चाह

पंजाब के जिला मोहाली की तहसील खरड़ के गांव परच के एक साधारण किसान परिवार में 1 फरवरी, 1956 को सुच्चा सिंह का जन्म हुआ था. दसवीं पास करने के बाद वह चंडीगढ़ पुलिस में सिपाही के रूप में भरती हुए तो तरक्की करते हुए 31 अक्तूबर, 2008 को इंसपेक्टर के पद पर पहुंच गए थे.

चंडीगढ़ पुलिस की विभिन्न शाखाओं में काम करते हुए सुच्चा सिंह को विभाग की ओर से 37 प्रशस्तिपत्र तथा तमाम नकद पुरस्कार मिले थे. 15 अगस्त को उन्हें पुलिस मैडल से तो नवाजा ही गया था, 26 जनवरी, 2006 को गणतंत्र दिवस समारोह में उन्हें राष्ट्रपति सम्मान भी मिला था.

सुच्चा सिंह के परिवार में पत्नी रंजीत कौर के अलावा बेटी रूपिंदर कौर और बेटा परमिंदर सिंह था. बेटी का ब्याह हो चुका था, जबकि बेटा परमिंदर कनाडा में नौकरी करता था. उस की शादी की तैयारियां चल रही थीं. वह भारत आया था और 7 जून, 2013 को दिल्ली से उस की फ्लाइट थी.

सुच्चा सिंह उन दिनों ट्रैफिक विंग के इंसपेक्टर थे. 6 जून, 2013 को उन की नाइट ड्यूटी थी. हाथ में तकलीफ होने के बावजूद उन्होंने छुट्टी नहीं की थी. रात 11 बजे से सुबह 5 बजे तक उन्हें अपनी ड्यूटी करनी थी. बेटे परमिंदर को चंडीगढ़ हवाई अड्डे पर छोड़ कर वह इस सीधे अपनी ड्यूटी पर चले गए थे.

सरकारी गाड़ी पर उन के साथ केवल ड्राइवर जितेंद्र था. जल्दबाजी में उस दिन सुच्चा सिंह अपना सर्विस रिवौल्वर भी घर पर ही भूल आए थे. शहर की पैट्रोलिंग करते हुए वह रात 2 बजे के करीब सैक्टर-17 के बसअड्डे से होते हुए सैंट्रल पुलिस स्टेशन की ओर जा रहे थे, तभी पुरानी जिला अदालत के सामने उन्हें एक लड़का और एक लड़की दिखाई दी.

उन्होंने ड्राइवर से जिप्सी उन की ओर घुमवाया तो दोनों छिपने की कोशिश करने लगे, जिस की वजह से उन्हें उन पर शक हो गया. सुच्चा सिंह ने उन से उतनी रात को वहां होने की वजह पूछी तो उन्होंने बताया कि वे शिमला से आए हैं और उन्हें दिल्ली जाने वाली बस पकड़नी है, लेकिन अभी उस का समय नहीं हुआ है. इसलिए समय काटने के लिए घूमतेटहलते वे उधर आ गए.

जब सुच्चा सिंह ने उन के सामान वगैरह के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि उन का सामान बस स्टैंड पर ही रखा है. सुच्चा सिंह को उन की बातों पर यकीन नहीं हुआ, इसलिए थाने ले जा कर उन के बारे में पता करने के लिए उन्हें जिप्सी में बैठा लिया.

जितेंद्र गाड़ी चला रहा था, जिस के पीछे वाली सीट पर लड़की बैठ गई तो सुच्चा सिंह के पीछे वाली सीट पर लड़का बैठ गया था. थाने जाने के लिए जितेंद्र गाड़ी स्टार्ट करने लगा, लेकिन गाड़ी का इंजन स्टार्ट होता, उस के पहले ही ड्राइवर के पीछे बैठी लड़की उस के बालों को पकड़ कर उसे पीटने लगी. इसी के साथ उस के साथी लड़के ने चाकू निकाल कर सुच्चा सिंह पर हमला कर दिया. चाकू का पहला वार उन के सीने पर लगा. वह जिप्सी का दरवाजा खोल कर बाहर कूद गए. जितेंद्र ने भी ऐसा ही किया, लेकिन वे संभल पाते, उस के पहले ही वे दोनों भी बाहर आ गए और उन से मारपीट करने लगे.

लड़के के पास चाकू था, जबकि सुच्चा सिंह और ड्राइवर निहत्थे थे, इसलिए उस ने दोनों को बुरी तरह जख्मी कर दिया. दोनों को मरणासन्न हालत में छोड़ कर लड़का और लड़की सरकारी जिप्सी ले कर भाग गए. सुच्चा सिंह की हालत ज्यादा खराब थी. जितेंद्र की कुछ ठीक थी, इसलिए किसी तरह इस घटना की सूचना उस ने मोबाइल द्वारा कंट्रोल रूम को दी तो पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया.

चंडीगढ़ से बाहर जाने वाले सभी रास्ते सील कर के अपराधियों की तलाश शुरू कर दी गई. दोनों से की गई पूछताछ और सीसीटीवी कैमरों की फुटेज देखने से पता चला कि पुलिस की जो गाड़ी ले कर वे भागे थे, वह सैक्टर 16-17 और 9-10 के मटकाचौक से होती हुई पीजीआई अस्पताल के सामने से गांव धनास में दाखिल हुई थी. वहीं वे जिप्सी छोड़ कर पड़ोस के घने जंगल में घुस गए थे.

दोनों को पकड़ने के लिए पुलिस ने जंगल का कोनाकोना छान मारा, पर वे पुलिस के हाथ नहीं लगे. दूसरी ओर सुच्चा सिंह और उन के ड्राइवर जितेंद्र को उपचार के लिए पहले सैक्टर-16 के जनरल अस्पताल ले जाया गया. वहां शुरुआती इलाज करा कर उन्हें पीजीआई अस्पताल ले जाया गया. वहीं जितेंद्र से घटना के बारे में तहरीर से कर थाना सैंट्रल में अपराध क्रमांक 33 पर भादंवि की धाराओं 307, 332, 353, 397 एवं 34 के तहत अज्ञात अपराधियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

चंडीगढ़ पुलिस का मानना था कि पुलिस पर इस तरह हमला करने वाले आम अपराधी नहीं हो सकते. उन्होंने पुलिस पर तो हमला किया ही था, पुलिस की गाड़ी भी ले कर भागे थे. जितेंद्र ने अपने बयान में बताया था कि जब उस ने भी लड़की के बाल पकड़ने की कोशिश की थी तो उस ने अपने साथी को ‘बंटी’ कह कर पुकारा था.

इस से पुलिस को लगा कि हमलावर कहीं चंडीगढ़ पुलिस का कांस्टेबल बसंत कुमार तो नहीं, जो सोनीपत के एक गांव में अपनी प्रेमिका के पति और उस की मां का कत्ल कर के प्रेमिका सरिता को ले कर फरार था. उसे भी घर वाले बंटी कहते थे. उन की गिरफ्तारी के लिए सोनीपत पुलिस ने उन के फोटोग्राफ चंडीगढ़ पुलिस को भेजे थे. बसंत और उस की साथी लड़की सरिता के फोटो जितेंद्र को दिखाए गए तो उस ने एकदम से कहा, ‘‘जी हां, यही हैं वे दोनों.’’

जो आदमी 2 हत्याएं कर के और 2 लोगों को गंभीर रूप से घायल कर भाग रहा हो, उस के लिए इंसानी जिंदगी की कीमत क्या हो सकती है? खुद को बचाने के लिए वह कुछ भी कर सकता है. मामला बेहद गंभीर था. उस समय यह मामला और भी गंभीर हो गया, जब 8 जून, 2013 की सुबह 7 बजे पीजीआई अस्पताल में इंसपेक्टर सुच्चा सिंह की मौत हो गई. इस के बाद मुकदमे में धारा 302 जोड़ कर बसंत और सरिता को नामजद कर दिया गया.

चंडीगढ़ में इस दर्दनाक घटना ने सब को दुखी कर रखा था तो दूसरी ओर सोनीपत पुलिस की कोशिशों का नतीजा यह निकला कि 8 और 9 जून, 2013 की रात दिल्ली के पहाड़गंज स्थित होटल सिरसवाल से बसंत और सरिता को गिरफ्तार कर लिया गया. सोनीपत के थाना राई में अपराध संख्या 88 पर भादंवि की धाराओं 302, 307, 364, 449 व 34 के अलावा शस्त्र अधिनियम की धाराओं 25, 54 के अंतर्गत बसंत एवं उस के साथियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज था.

पहले सोनीपत पुलिस ने, उस के बाद चंडीगढ़ पुलिस ने बसंत और सरिता को रिमांड पर ले कर विस्तार से पूछताछ की. इस पूछताछ में दोनों ने पुलिस को जो कुछ बताया था, उस से प्रेमअपराध की जो कहानी सामने आई थी, वह कुछ इस तरह थी—

जिला सोनीपत के थाना खरखोदा के गांव गोरड़ के रहने वाले राजवीर सिंह का बेटा था बसंत उर्फ बंटी. बीए करने के बाद वह सन 2010 में सेना की जाट रेजिमेंट में भरती हो गया था. लेकिन 7 महीने बाद ही उस ने यह नौकरी छोड़ दी थी और फिर 3 जुलाई, 2011 को चंडीगढ़ पुलिस में बतौर सिपाही भरती हो गया था.

उसी के गांव में रहते थे रोहताश सिंह, जो उसी की जाति के थे. उन की 3 बेटियों और 1 बेटे में सरिता सब से बड़ी थी. लेकिन जब वह 2 साल की थी, तभी मातापिता ने उसे गांव भैंसरनखुर्द में रहने वाले उस के मामा के यहां भेज दिया था.

मामा के यहां रहते हुए सरिता बीचबीच में अपने गांव गोरड़ भी आती रहती थी. उस बीच वह देखती थी कि वह जब भी गांव आती है, गांव का बंटी उस के आगेपीछे घूमता है. धीरेधीरे सरिता भी उस की ओर आकर्षित होने लगी थी. दोनों की उम्र में केवल 8 महीने का अंतर था. बचपन की यह मोहब्बत समय के साथ बढ़ती ही गई.

सन 2010 में उन का यह प्यार उस समय चरम पर पहुंच गया, जब सरिता गोरड़ में ही मांबाप के पास रहने आ गई. जल्दी ही स्थिति यह बन गई कि दोनों साथसाथ जीनेमरने की कसमें खाने लगे.

इसी का नतीजा था कि जनवरी, 2013 में सरिता अचानक गांव से गायब हो गई. चूंकि बसंत भी गांव से गायब था, इसलिए शक किया गया कि उसे बसंत ही भगा कर ले गया है. सरिता के घर वालों ने बसंत के खिलाफ थाना खरखोदा में सरिता के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा दी, साथ ही वही नहीं, बसंत के घर वाले भी दोनों की तलाश करने लगे.

उन की मेहनत रंग लाई और फरवरी, 2013 के अंतिम सप्ताह में दोनों को अंबाला के एक मकान से ढूंढ निकाला गया. दोनों वहां किराए पर पति पत्नी की तरह रह रहे थे. मकान मालिक  को भी उन्होंने यही बताया था. दोनों को पकड़ कर थाना खरखोदा लाया गया, जहां पूछताछ में दोनों ने बताया कि 3 फरवरी, 2013 को उन्होंने अंबाला छावनी के आर्य समाज मंदिर में विवाह कर लिया है. विवाह का उन्हें प्रमाणपत्र भी मिल गया है.

पुलिस पूछताछ में सरिता ने पुलिस को लिखित बयान दिया था कि उस ने बसंत से अपनी मरजी व खुशी से विवाह किया है, इसलिए उस के खिलाफ दर्ज अपहरण का मुकदमा खारिज किया जाए.

गांव में किसी ने इस बात को पहले बहुत ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया था. सब ने सोचा था कि एक ही जाति और एक ही गांव के होने की वजह से बसंत और सरिता एक दूसरे का भाई बहन की तरह प्यार करते होंगे. लेकिन जब पता चला कि दोनों ने विवाह कर लिया है तो उन के बीच पंचायत आ गई. पुलिस ने तो मुकदमा खारिज कर दिया, लेकिन पंचायत ने सरिता और बसंत के इस विवाह को मानने से साफ मना कर दिया.

पंचायत ने साफ कहा कि वे पति पत्नी की तरह नहीं, भाई बहन की तरह रहेंगे. इस के बाद सरिता के पिता उसे घर लाने के बजाय उस के मामा अजीत सिंह के यहां भैंसरनखुर्द भेज दिया. अजीत सिंह सरिता को सगी बेटी की तरह मानते थे. उसे हर तरह की आजादी भी दी थी. लेकिन इस बार वह आई तो उस पर तमाम पाबंदियां लगा दी गईं.

लेकिन मार्च, 2013 में बसंत एक बार फिर सरिता को उस के मामा के यहां से भी भगा ले गया. इस बार वह चंडीगढ़ न जा कर दूसरे शहरों में घूमता रहा. इस के बावजूद 12 अप्रैल, 2013 को अजीत सिंह ने दोनों को फिर पकड़ लिया. उस ने बसंत को तो कुछ नहीं कहा, लेकिन आननफानन में अपने परिचित दयानंद के बेटे संदीप सिंह से सोनीपत की इंडस्ट्रियल एरिया में एक जगह सरिता का सादगी से विवाह कर दिया.

65 वर्षीय दयानंद जाट सोनीपत के गांव दीपलपुर के रहने वाले थे. वह भी पहले सेना में थे, नौकरी छोड़ कर वह खेतीबाड़ी कर रहे थे. उन के परिवार में पत्नी के अलावा एक बेटी और 3 बेटे थे. उन में संदीप मंझला था. सरिता से संदीप की शादी भले ही सादगी से हुई थी, लेकिन दयानंद ने गांव में बेटे की शादी का बहुत बड़ा जश्न किया था.

बसंत को इस शादी की खबर मिली तो किसी अपराधी को अदालत में पेश करने के बहाने उस ने चंडीगढ़ पुलिस के मालखाने से एक एसएलआर (सेल्फ लोडिंग राइफल) इश्यू कराई और मनीमाजरा के अपने परिचित ड्राइवर रविकुमार के साथ उस की टैक्सी से दोपहर करीब डेढ़ बजे गांव दीपलपुर जा पहुंचा. यह 18 अप्रैल, 2013 की बात है.

गांव में पूछते हुए वह संदीप के घर जा पहुंचा और घर के बाहर से ही पूरी ताकत से चिल्लाते हुए कहा, ‘‘सरिता, जल्दी से बाहर आ जा, मैं तुझे लेने आया हूं.’’

कोई कुछ समझ पाता, उस से पहले ही दुलहन के लिबास में सजीधजी सरिता दौड़ती हुई बाहर आई तो उसे अपनी बांहों में भर कर बेतहाशा चूमने के बाद बसंत ने कहा, ‘‘सरिता, अब मैं देखता हूं, तुम्हें कौन रोकता है.’’

इस के बाद एसएलआर से गोलियां चलाते हुए वह सरिता को ले कर चला गया. उस के गोली चलने से सरिता के पति संदीप सिंह और सास रोशनी देवी की मौत हो गई थी तो संदीप की बुआ प्रकाशी देवी बुरी तरह घायल हो गई थीं.

सरिता की ससुराल में खून की होली खेलने के बाद बसंत सरिता को ले कर पुलिस नाका पलड़ी और चौकी गढ़मैकर को पार कर के उत्तर प्रदेश की सीमा में प्रवेश कर गया. वह सरिता को साथ लिए हरिद्वार, ऋषिकेश, जयपुर और आगरा आदि शहरों में घूमता रहा. इस बीच कांधला कस्बे में ड्राइवर रविकुमार बसंत से डर कर बाथरूम जाने के बहाने भाग निकला और थाने जा कर आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस ने उसे अपराधी मानते हुए हिरासत में ले लिया.

बसंत जिस समय सरिता को ले कर भागा था, उस के पास 5 लाख रुपए थे. धीरे धीरे पैसे खत्म होने लगे तो उस ने हरिद्वार के एक टैक्सीस्टैंड में गाड़ी पार्क कर दी और बस से सरिता को ले कर शिमला चला गया. 6-7 जून की रात दोनों चंडीगढ़ आए और यहां से वे बस से दिल्ली जाना चाहते थे. दिल्ली से वे ट्रेन से मुंबई जाना चाहते थे. जहां भेष बदल कर छोटीमोटी नौकरी करते हुए जीवनयापन करने का उन का इरादा था.

लेकिन चंडीगढ़ पहुंच कर उन्हें पता चला कि दिल्ली जाने वाली बस तो कुछ देर पहले चली गई है, दूसरी बस सुबह 4 बजे जाएगी. उस समय बसअड्डे पर बहुत कम लोग थे. 2-3 पुलिस वाले गश्त कर रहे थे. अचानक एक दीवार पर बसंत की निगाह पड़ी तो वहां उस ने अपनी और सरिता की तस्वीर वाला पोस्टर लगा देखा. उस पर उन की गिरफ्तारी के लिए हरियाणा पुलिस की ओर से एक लाख रुपए के इनाम की घोषणा की गई थी.

उस स्थिति में बसंत और सरिता का बसस्टैंड पर ज्यादा देर रुकना खतरे से खाली नहीं था, सो वे दोनों वहां से निकल कर सुनसान जगह पर आ गए, जहां इन का सामना इंसपेक्टर सुच्चा सिंह से हो गया.

सुच्चा सिंह और उन के ड्राइवर जितेंद्र को मरणासन्न छोड़ कर दोनों पुलिस की जिप्सी से गांव धनास पहुंचे, जहां अंबेडकर कालोनी में गाड़ी छोड़ कर वे जंगल में चले गए. इस के बाद दूसरे रास्ते से लौट कर धनास और डीएम कालोनी की मेन रोड पर आ गए, जहां बौटेनिकल गार्डन में इन्होंने अपने कपड़ों पर लगा खून साफ किया.

मुंह हाथ भी धोए और वहीं रिहैबिलिटेशन कालोनी में जा कर एक खाली मकान में छिप गए. सुबह 4 बजे दोनों तोंगामुल्लापुर के खेतों के बीच से होते हुए गुरुद्वारा रतबाड़ा साहब पहुंचे और वहां से औटोरिक्शा पकड़ कर कराली चले गए. रास्ते में पड़ौल के जंगल के पास से जाते हुए औटो वाले की नजर बचा कर बसंत ने चाकू जंगल की ओर उछाल दिया.

कराली शहर के रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर दोनों दिल्ली पहुंच गए, जहां पहाड़गंज के होटल सिरसवाल में उन्होंने कमरा लिया और आराम करने लगे. वहीं से पुलिस ने दोनों को पकड़ लिया था. बसंत की निशानदेही पर पुलिस ने वारदात में प्रयुक्त चाकू के साथ हरिद्वार के एक टैक्सी स्टैंड में पार्क की गई रविकुमार की टैक्सी स्विफ्ट डिजाइयर व उस की डिग्गी में पड़ी एसएलआर बरामद कर ली थी.

चंडीगढ़ पुलिस ने फुरती दिखाते हुए बसंत और सरिता के खिलाफ 297 पृष्ठों की चार्जशीट अदालत में पेश कर दी थी, जिस में अभियोजन पक्ष के 43 गवाहों की सूची भी शामिल थी. 17 सितंबर, 2013 को दोनों के खिलाफ चार्ज फ्रेम होने के बाद 21 सितंबर को इस केस की रेग्युलर सुनवाई शुरू हो गई थी.

चंडीगढ़ के जिला एवं सत्र न्यायाधीश एस.के. अग्रवाल ने दोनों पक्षों को गौरपूर्वक सुना और सभी साक्ष्यों को गहराई से जांचापरखा. इस के बाद 31 अक्तूबर, 2013 को अभियोजन पक्ष की गवाहियां पूरी होने के बाद बचावपक्ष को भी ध्यान से सुना.

अपने बचाव में सरिता और बसंत ने अदालत को बताया था कि घटना वाले दिन वे चंडीगढ़ में थे ही नहीं. उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है. लेकिन वे ऐसे कोई सबूत नहीं दे सके कि वे चंडीगढ़ में नहीं थे. आखिर 3 दिसंबर, 2013 को माननीय जज साहब ने बसंत और सरिता को इंसपेक्टर सुच्चा सिंह के कत्ल का दोषी करार दे दिया.

फास्टट्रैक में चलने की वजह से इस हत्याकांड का फैसला महज 178 दिनों में आ गया था. 4 दिसंबर, 2013 को विद्वान एवं सक्षम जज श्री एस.के. अग्रवाल ने अभियुक्त बसंत और सरिता को उम्रकैद की सजा सुनाने के साथ बसंत पर 32 हजार तो सरिता पर 29 हजार रुपए का जुर्माना भी किया था.

उस समय सरिता को 8 महीने का गर्भ था. जाहिर था, यह बच्चा जेल में ही पैदा होना था. फैसले में सुप्रीम कोर्ट के एक डायरेक्शन के संबंध में इस बात का जिक्र भी किया गया था कि सरिता जेल में पैदा होने वाले बच्चे की 6 साल तक होने तक की सारी जिम्मेदारी जेल प्रबंधन की होगी.

इस के बाद हरियाणा की सोनीपत जिला अदालत में बसंत और सरिता पर डबल मर्डर का जो केस चल रहा था, उस के तहत 28 सितंबर, 2016 को सोनीपत की अतिरिक्त एवं जिला न्यायाधीश मैडम सुनीता ग्रोवर ने गांव दीपलपुर निवासी संदीप सिंह व रोशनी देवी की हत्या करने के साथ प्रकाशो देवी को जख्मी करने के आरोप में 3 दोषियों बसंत उर्फ बंटी, सरिता उर्फ निक्की एवं टैक्सी ड्राइवर रविकुमार को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी.

पुलिस का मानना था कि रविकुमार भी इस साजिश में शामिल था. चालान के साथ तमाम पुख्ता सबूत भी लगाए गए थे. अदालत ने उन सबूतों को पूरी तरह स्वीकार किया था. सक्षम जज सुनीता ग्रोवर ने बसंत, सरिता और रविकुमार को उम्रकैद की सजा सुनाने के अलावा 42-42 हजार रुपए का जुर्माना भी किया था. जिस के न देने पर 1-1 साल की अतिरिक्त सजा भुगतनी थी.

फिलहाल, आरोपी रविकुमार सोनीपत की जेल में है, जबकि बसंत और सरिता चंडीगढ़ की बुडै़ल जेल में सजा काट रहे हैं. इसी जेल में 2 साल पहले सरिता ने बेटे को जन्म दिया था. अभी जल्दी ही बसंत ने जेल प्रशासन को एक चिट्ठी लिखी है, जिस का आशय यह था कि उस ने जो जुर्म किया है, वह उस की बाकायदा सजा भोग रहा है. ऐसे में उस का बच्चा भी उस के साथ है, जबकि उस का कोई कसूर नहीं है. इसलिए उसे खुली हवा में सांस लेने का मौका मिलना चाहिए.

हर कैदी को महीने में एक चिट्ठी लिखने का मौका दिया जाता है. बसंत ने लगातार ये चिट्ठियां जेल प्रशासन को लिखीं. उस ने हर चिट्ठी में अपने बेटे को खुली हवा में घूमने के लिए लिखा. एक पत्र में उस ने लिखा था कि जेल की चारदीवारी उस के बेटे के बचपन को कुचल सकती है. इस पत्र में बसंत ने आर.डी. उपाध्याय की याचिका और उस के बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा जेल में रह रहे बच्चों के लिए जारी गाइडलाइंस का भी हवाला दिया था.

बसंत की चिट्ठी मिलने के बाद बुडै़ल जेल प्रशासन उस के 2 साल के बेटे और जेल में अपनी सजायाफ्ता मांओं के साथ रह रहे 3 अन्य छोटे बच्चों को हर हफ्ते चंडीगढ़ के पर्यटनस्थलों पर घुमाने ले जाने लगा है. सरिता की गुजारिश पर अब जेल में एक घंटा कार्टून चैनल भी चलते हैं. जेल की फीमेल वार्ड में एक खास टौयरूम भी बनाया गया है. हर महीने मैडिकल चैकअप के अलावा इन बच्चों को समयसमय पर पोलियो ड्रौप्स भी दिए जाते हैं.

लेखक : मनोहर शुक्ला

नोटबंदी के दौर में ऐसे करें कमाई

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पेटीएम, मोबीक्विक जैसी कंपनियां बढ़ते डिजिटल ट्रांजैक्शन को देखते हुए ऑफलाइन मर्चेंट नेटवर्क को बढ़ाने पर जोर दे रही है. इसके लिए पेटीएम जैसी कंपनियां एजेंट्स हायर करती है. ऐसे में आप भी ऐसी किसी कंपनी के साथ जुड़ सकते हैं. इन कंपनियों की टर्म्स और कंडीशिन्स अच्छे से पढ़कर किसी भी अच्छी कंपनी के मर्चेंट बनकर अच्छी कमाई करें.

3. सीएससी भी है अच्छा ऑप्शन

सीएससी (Common Services Centers) खोलने के लिए कम से कम 100 से 150 वर्ग फुट स्‍पेस होना चाहिए. स्पेस के अलावा आपके पास कम से कम एक कम्प्‍यूटर, एक प्रिंटर, डिजिटल/वेब कैमरा, जेनसेट या इन्वर्टर या सोलर पैनल, ऑपरेटिंग सिस्‍टम और एप्‍लिकेशन सॉफ्टवेयर, ब्रॉडबैंड कनेक्‍शन होना चाहिए. इंव्स्टमेंट थोड़ा ज्यादा है पर आपका फायदा डबल होगा.

कंगारुओं ने किया कीवियों का सफाया

सलामी बल्लेबाज डेविड वार्नर के लगातार दूसरे शतक से आस्ट्रेलिया ने तीसरे और अंतिम एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट मैच में न्यूजीलैंड को 117 रन से करारी शिकस्त देकर श्रृंखला में 3-0 से क्लीन स्वीप किया.

13 चौके और 4 छक्के की मदद से वार्नर ने 156 रन बनाए. उनकी इस जबर्दस्त पारी की बदौलत आस्ट्रेलिया ने शुरूआती झटकों के बावजूद आठ विकेट पर 264 रन का चुनौतीपूर्ण स्कोर खड़ा किया. न्यूजीलैंड के लिये हालांकि यह स्कोर ही पहाड़ जैसा बन गया और उसकी पूरी टीम वार्नर के कुल स्कोर तक भी पहुंचने में नाकाम रही.

न्यूजीलैंड के बल्लेबाजों ने फिर से निराश किया और उसकी टीम 36.1 ओवर में 147 रन पर ढेर हो गयी. आस्ट्रेलिया ने इस तरह से बड़ी शान से चैपल-हैडली ट्रॉफी जीती. कीवी टीम को सस्ते में समेटने में मिशेल स्टार्क ने अहम भूमिका निभायी. उन्होंने 34 रन देकर तीन विकेट लिये. पैट कमिन्स, जेम्स फाकनर और ट्रेविस हेड ने दो-दो विकेट लेकर उनका अच्छा साथ दिया.

न्यूजीलैंड की तरफ से मार्टिन गुप्टिल ने सर्वाधिक 34 रन बनाये. उनके अलावा टॉम लैथम (28) और कोलिन मुनरो (20) ही 20 रन की संख्या को छू पाये. पिछले मैच में भी शतक (119 रन) जड़ने वाले वार्नर को मैन आफ द मैच और मैन आफ द सीरीज चुना गया.

आस्ट्रेलियाई उप कप्तान वार्नर ने पारी के 38वें ओवर में मिशेल सैंटनर की गेंद पर फाइन लेग क्षेत्र में चौका जड़कर वनडे में अपना 11वां और इस साल सातवां शतक पूरा किया.

वॉर्नर ने इस साल 23 वनडे खेले हैं और 7 शतक लगाए हैं. वॉर्नर ने इस साल वनडे में 63.09 के शानदार औसत से 1388 रन अपने नाम कर लिए हैं और उनका स्ट्राइक रेट 105.47 रहा है. वॉर्नर का इस साल का टॉप स्कोर 177 रन रहा है. मतलब उन्होंने कई बड़ी पारियां खेली हैं.

जहां ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजों के बीच वह नंबर वन हैं, वहीं वर्ल्ड लेवल पर देखें, तो वनडे में एक साल में सबसे ज्यादा शतक लगाने के मामले में महान सचिन तेंदुलकर नंबर वन पर हैं, तो टीम इंडिया के सफलतम कप्तानों में से एक बाएं हाथ के बल्लेबाज सौरव गांगुली सूची में दूसरे नंबर पर हैं, जिसकी बराबरी वॉर्नर ने कर ली है.

सचिन तेंदुलकर ने यह उपलब्धि 1998 में हासिल की थी. हालांकि उन्होंने डेविड वॉर्नर से ज्यादा मैच खेले थे. सचिन ने 34 वनडे में नौ शतक लगाए थे, जबकि  सौरव गांगुली ने साल 2000 में 32 मैचों में सात शतक लगाए थे. साल में छह शतक लगाने वाले बल्लेबाजों की सूची में दक्षिण अफ्रीका के गैरी कर्स्टन और सचिन (1996) तथा भारत के ही राहुल द्रविड़ (1999) के नाम हैं.

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व और सफलतम कप्तानों में से एक रिकी पॉन्टिंग और ओपनर मैथ्यू हेडन ने साल में पांच शतक लगाए थे. रिकी पॉन्टिंग ने वनडे करियर में 2003 और 2007 में यह कारनामा किया था, जबकि हेडन ने 2007 में पांच शतक जड़े थे.

मैं एक ऐसे शख्स से प्यार करती हूं, जो कभी पिता नहीं बन सकता. कृपया बताएं मैं क्या करूं.

सवाल

मैं 22 साल की युवती हूं. मैं एक ऐसे शख्स से प्यार करती हूं, जो कभी पिता नहीं बन सकता. मैं उस से इतना प्यार करती हूं कि उस के बिना जीने की कल्पना भी नहीं कर सकती. मैं उस से शादी करना चाहती हूं पर घर वाले इस रिश्ते के खिलाफ हैं. वे हमें इस शादी के लिए अपनी रजामंदी कभी नहीं देंगे. हम कोर्ट मैरिज भी नहीं कर सकते, क्योंकि उस के सारे डौक्यूमैंट्स लड़की के नाम से बने हुए हैं. कृपया बताएं मैं क्या करूं?

जवाब

आप अभी इतनी मैच्योर नहीं हुई हैं कि शादी जैसे अहम फैसले ले सकें. इसीलिए इस तरह की बात कर रही हैं. आप को समझना चाहिए कि जिंदगी भावनाओं के सहारे नहीं चलती. इसलिए हकीकत को स्वीकारना सीखें. मां पिता की अनुभवी आंखें जो देख पा रही हैं उस से आप आंखें मूंदे हुए हैं. आप को समझना चाहिए कि माता पिता आप का भला ही चाहेंगे. इस लिए उन के विरुद्ध न जाएं.

 

अगर आप भी इस समस्या पर अपने सुझाव देना चाहते हैं, तो नीचे दिए गए कमेंट बॉक्स में जाकर कमेंट करें और अपनी राय हमारे पाठकों तक पहुंचाएं.

भाई के अपहरण में बहन भी शामिल

16 अक्तूबर, 2016 की दोपहर को यही कोई डेढ़ बजे पुर्निषा उर्फ गुड्डी मम्मी रेखा पालेचा के साथ एक्टिवा स्कूटी से जोधपुर शहर की मानसरोवर कालोनी में रहने वाले अपने मामा रितेश भंडारी के घर पहुंची. बहन और भांजी को देख कर वही नहीं, घर के सभी लोग खुश हो गए. नाश्तापानी और थोड़ी बातचीत के बाद पुर्निषा अपने 5 साल के ममेरे भाई युग को खिलाने लगी.

बेटे युग के अलावा रितेश की एक 10 साल की बेटी भी थी. पुर्निषा जब भी मामा के घर आती थी, अपने ममेरे भाईबहनों के साथ खेलने में मस्त हो जाती थी. वह दोनों को खूब प्यार करती थी. करीब आधे घंटे बाद पुर्निषा युग को अपनी स्कूटी पर बिठा कर चौकलेट दिलाने के लिए ले गई.

पुर्निषा जब भी मामा के यहां आती थी, युग को खानेपीने की चीजें दिलाने या स्कूटी पर घुमाने ले जाती थी. उस के साथ युग के जाने पर किसी को कोई शक वगैरह होने की गुंजाइश भी नहीं थी.

युग और पुर्निषा को घर से गए आधे घंटे से ज्यादा का वक्त हो गया और दोनों लौट कर नहीं आए तो घर वालों का ध्यान उन के ऊपर गया. प्यार से पुर्निषा को सभी गुड्डी कहते थे. घर वालों को चिंता हुई कि गुड्डी युग को ले कर कहां चली गई कि अभी तक लौट कर नहीं आई.

घर के सभी लोग इसी बात पर विचार कर रहे थे कि तभी रितेश के फोन की घंटी बजी. रितेश ने फोन की स्क्रीन देखी तो उस पर उन की भांजी गुड्डी का नंबर था. उन्होंने फोन रिसीव कर के पूछा, ‘‘हां गुड्डी, बताओ, इस समय तुम कहां हो? बहुत देर हो गई, अभी तक घर क्यों नहीं लौटी?’’

इस के बाद दूसरी तरफ से पुर्निषा की कांपती आवाज आई, ‘‘मामा, आप मामी से बात कराइए.’’

रितेश ने मोबाइल अपनी पत्नी को देते हुए कहा, ‘‘गुड्डी का फोन है, बात करो.’

कान पर फोन लगा कर युग की मम्मी बोलीं, ‘‘हां, गुड्डी बोलो, क्या बात है? तुम कहां हो?’’

पुर्निषा कांपती आवाज में बोली, ‘‘मामी, मेरा और युग का कुछ लोगों ने अपहरण कर लिया है. ये लोग 50 लाख रुपए फिरौती मांग रहे हैं. ये बड़े ही खतरनाक लोग लग रहे हैं, इसलिए प्लीज मामी, पुलिस को सूचना दिए बगैर आप 50 लाख रुपए ले कर जल्द आ जाइए, वरना ये लोग हमें मार देंगे.’’

गुड्डी के साथ उन के बेटे का भी अपहरण हुआ था, इसलिए इस खबर से वह एकदम से घबरा गईं. वह जल्दी से बोलीं, ‘‘गुड्डी, तुम हो कहां, युग कहां है? यह तो बताओ कि पैसे कहां पहुंचाने हैं?’’

‘‘मामी, हमें पता नहीं, यह कौन सी जगह है, लेकिन शहर के बाहर कोई बाग है. उसी बाग में इन्होंने हमें बंधक बना रखा है. अच्छा, वे लोग हमारी तरफ ही आ रहे हैं, आप जल्दी पैसों का इंतजाम कर लो. मैं बाद में फोन करूंगी.’’ कह कर पुर्निषा ने फोन काट दिया.

युग की मम्मी ‘हैलो…हैलो’ करती रह गईं, पर दूसरी ओर से फोन कट चुका था. युग का अपहरण और 50 लाख रुपए की फिरौती की बात बगल में खड़े रितेश भंडारी ने भी सुन ली थी. वह भी घबरा गए. उन्होंने हकलाते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, तुम इतनी परेशान क्यों हो? क्या कह रही थी गुड्डी, युग कहां है?’’

‘‘गुड्डी और युग का अपहरण हो गया है और अपहर्त्ता 50 लाख रुपए फिरौती मांग रहे हैं. पुलिस को सूचना देने पर उन्होंने जान से मारने की धमकी दी है,’’ कहते हुए उन की पत्नी की आंखों में आंसू छलक आए.

पत्नी के मुंह से यह सब सुन कर रितेश भंडारी कांप उठे. अपहर्त्ता फिरौती में जो 50 लाख रुपए मांग रहे थे, वह उन के पास नहीं थे. यह कोई मामूली रकम भी नहीं थी, जिस का इंतजाम वह जल्द कहीं से कर लेते. अपहर्त्ताओं ने पुलिस को खबर न करने की चेतावनी दी थी. उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि वह क्या करें.

बेटे के अपहरण से व्याकुल उन की पत्नी का रोरो कर बुरा हाल था. कुछ ही देर में आसपड़ोस में यह खबर फैल गई. लोगों का उन के घर आना शुरू हो गया. कुछ लोगों ने रितेश को सलाह दी कि वह इस की सूचना पुलिस को जरूर दें.

सभी लोगों के कहने पर रितेश पत्नी और कुछ रिश्तेदारों के साथ करीब पौने 3 बजे चौपासनी हाउसिंग बोर्ड थाने पहुंचे और थानाप्रभारी जब्बर सिंह चारण को अपने बेटे और भांजी के अपहरण की जानकारी दे दी. उन्होंने यह भी बताया कि फिरौती का फोन पुर्निषा के ही मोबाइल से आया था.

रितेश भंडारी की बात सुन कर थानाप्रभारी को मामला कुछ संदिग्ध लगा. उन्हें उन की भांजी पुर्निषा पर ही शक हो रहा था. उन्हें कारवाई तो करनी ही थी, इसलिए उन्होंने अज्ञात अपहर्त्ताओं के खिलाफ अपहरण की रिपोर्ट दर्ज करा कर इस की सूचना उच्चाधिकारियों को दे दी.

अधिकारियों के निर्देश पर जब्बर सिंह ने शहर के सभी प्रमुख मार्गों की नाकेबंदी करा दी. इस के बाद जोधपुर के डीसीपी (पश्चिम) समीर कुमार सिंह, एडिशनल डीसीपी विपिन शर्मा, एसीपी (प्रतापनगर) स्वाति शर्मा, एसीपी (केंद्रीय) पूजा यादव, एसीपी (पश्चिम) विक्रम सिंह थाना चौपासनी हाउसिंग बोर्ड पहुंच गए.

सभी ने पीडि़त परिवार से बात की. ऐसे मामले में पुलिस की यही कोशिश रहती है कि जिस का अपहरण हुआ है, उसे सुरक्षित तरीके से जल्द से जल्द बरामद किया जाए. इसलिए डीसीपी ने अपहर्त्ताओं तक जल्द पहुंचने के लिए एक पुलिस टीम बनाई, जिस में एसीपी (प्रतापनगर) स्वाति शर्मा, एसीपी (पश्चिम) विक्रम सिंह, एसीपी (केंद्रीय) पूजा यादव, थानाप्रभारी जब्बर सिंह चारण, थानाप्रभारी (शास्त्रीनगर) अमित सिहाग, तकनीकी विशेषज्ञ भागीरथ सिंघड़, स्वरूपराम, हरीराम, नरेंद्र सिंह, शकील खां, जबर सिंह व बजरंगलाल को शामिल किया गया. टीम का निर्देशन एडिशनल डीसीपी विपिन शर्मा को सौंपा गया.

पुर्निषा ने जब रितेश भंडारी को फोन किया था, बातचीत में चिडि़यों के चहचहाने की आवाजें आ रही थीं. रितेश ने यह बात पुलिस को भी बताई. इस पर पुलिस को लगा कि फोन किसी पार्क से किया गया था. 3-3 पुलिसकर्मियों को ग्रुप में बांट कर अपहर्त्ताओं की तलाश शुरू कर दी गई.

टीमों ने मंडोर उद्यान, नेहरू पार्क, पब्लिक पार्क व अन्य सुनसान जगहों पर खोजबीन की. रितेश भंडारी और उन की पत्नी भी पुलिस के साथ थीं. पुलिस ने रितेश के मोबाइल से पुर्निषा के मोबाइल पर फोन करवाया. फोन किसी युवक ने उठाया.

फोन उठाने वाले युवक ने कहा कि रुपए ले कर जल्द आ जाओ, वरना हम इन दोनों को मार देंगे. रितेश ने युग से बात कराने को कहा तो उस ने युग से उन की बात करा दी. युग ने कहा कि वह दीदी के साथ है और टौफी बिस्कुट खा रहा है. बेटे से बात कर के रितेश को तसल्ली हुई कि वह सकुशल है.

एक पुलिस टीम जब नेहरू उद्यान पहुंची तो वहां एक कोने में बैठी पुर्निषा और युग को रितेश ने पहचानते हुए कहा, ‘‘वो रहे युग और पुर्निषा.’’

पुलिस ने नजर दौड़ाई तो पुर्निषा और युग के पास झाड़ी की ओट में 2 युवक बैठे दिखाई दिए. पुलिस ने अनुमान लगाया कि वही अपहर्त्ता होंगे. भनक लगने पर अपहर्त्ता युग और पुर्निषा को नुकसान पहुंचा सकते थे, इसलिए पुलिस ने चालाकी दिखाते हुए फुरती से उन दोनों युवकों को दबोच कर पुर्निषा और युग को सुरक्षित अपने कब्जे में ले लिया.

सूचना पा कर अन्य पुलिस टीमें भी नेहरू उद्यान पहुंच गई थीं. पुलिस गिरफ्त में आते ही दोनों युवक कांपने लगे. यही हाल पुर्निषा का भी था. उन की निशानदेही पर पुलिस ने स्विफ्ट कार व पुर्निषा की एक्टिवा स्कूटी बरामद कर ली.

थाने ला कर जब दोनों युवकों से पूछताछ की गई तो उन्होंने अपने नाम मयंक मेहता व मयंक सिंदल बताए. उन्होंने बताया कि युग के अपहरण की मास्टरमाइंड पुर्निषा थी.

यह सुन कर रितेश और उन की पत्नी हैरान रह गई कि यह कैसे हो सकता है, भला वह अपने भाई का अपहरण क्यों करेगी? पर पुलिस पूछताछ में जब पुर्निषा ने मयंक की बात की पुष्टि कर दी तो रितेश और उन की पत्नी की आंखें खुली की खुली रह गईं. उन्होंने सोचा भी नहीं था कि जिस भांजी को वह इतना ज्यादा प्यार करते थे, वही उन का अहित कर सकती है.

अपहर्त्ताओं के गिरफ्तार होने की जानकारी डीसीपी (पश्चिम) समीर कुमार सिंह को मिली तो वह भी थाने पहुंच गए. उन के सामने अभियुक्तों से पूछताछ की गई तो युग के अपहरण की जो कहानी उभर कर सामने आई, वह इस प्रकार थी—

जोधपुर शहर की मानसरोवर कालोनी में रितेश भंडारी पत्नी शिवानी, एक बेटी व बेटा युग के साथ रहते थे. उन का सरदारपुरा, जोधपुर में फाइनैंस का कारोबार था, जिस से उन्हें बहुत अच्छी आमदनी होती थी. कभीकभी अपनी कमाई का लाखों रुपए वह अपनी सगी बहन रेखा पालेचा के पास रखते थे. वह सरदारपुरा में ही रहती थी. पुर्निषा रेखा की बेटी थी. वह मांबाप की लाडली थी. उस पर मांबाप आंख मूंद कर भरोसा करते थे. पुर्निषा पढ़ाई में होशियार थी. वह एमकौम कर रही थी. पढ़ाई के साथ वह एक निजी स्कूल में पढ़ाती भी थी.

पुर्निषा की एक साल पहले मयंक मेहता से दोस्ती हुई. थोड़े दिनों बाद यह दोस्ती प्यार में बदल गई. मयंक जोधपुर की चौपासनी हाउसिंग बोर्ड में रहता था. उस का एक दोस्त मयंक सिंदल था, वह भी वहीं रहता था. ये दोनों जोधपुर के जीत कालेज में कंप्यूटर साइंस के छात्र थे.

पुर्निषा व मयंक मेहता का प्रेमप्रसंग चल रहा था. दोनों घर वालों से छिपछिप कर मिलते थे. मोबाइल पर भी घंटों बातें किया करते थे. दोनों के सपने बहुत ऊंचे थे, मगर आर्थिक तंगी के कारण इन के शौक पूरे नहीं हो रहे थे. टीवी चैनल के क्राइम शो देख कर पुर्निषा के दिमाग में हलचल मच गई. उस ने एक दिन बातोंबातों में अपने प्रेमी मयंक मेहता से कहा कि अगर वह उस के मामा रितेश के बेटे युग का अपहरण कर ले तो कम से कम 50 लाख रुपए की फिरौती मिल सकती है.

पुर्निषा ने बताया था कि उस के मामा के पास हर समय लाखों रुपए रहते हैं. बस फिर क्या था, दोनों ने रुपयों का लालच दे कर मयंक सिंदल को भी अपनी योजना में शामिल कर लिया. पुर्निषा ने कहा था कि फिरौती के 50 लाख रुपए मिलने पर उस में से उसे 15 लाख रुपए दिए जाएंगे.

मयंक सिंदल झांसे में आ गया और उन की योजना में शामिल हो गया. पूरी योजना बनाने के बाद रविवार 16 अक्तूबर की दोपहर को पुर्निषा अपनी मम्मी के साथ मामा रितेश के घर जा पहुंची. युग को चौकलेट दिलाने के बहाने वह स्कूटी से घर से बाहर ले आई और अपने साथी मयंक मेहता और मयंक सिंदल को अपनी स्कूटी देते हुए कहा कि इसे कहीं सुनसान जगह खड़ी कर युग को ले कर नेहरू उद्यान आ जाओ.

पुर्निषा टौफी, बिस्कुट, कुरकुरे ले कर युग के साथ मयंक मेहता की स्विफ्ट कार में बैठ गई तो मयंक मेहता कार ले कर सीधे नेहरू उद्यान पहुंच गया. मयंक सिंदल इन से पहले वहां पहुंचा हुआ था. पार्क से ही पुर्निषा ने मामा रितेश को फोन कर के अपने और युग के अपहरण होने की बात कह कर 50 लाख रुपए फिरौती दे कर अपहर्त्ताओं से जल्द से जल्द युग और उसे छुड़ाने की बात कही. इस के बाद रितेश भंडारी अपनी पत्नी के साथ थाने पहुंचे और पुलिस को सूचना दी.

पुलिस ने मात्र ढाई घंटे में अपहर्त्ताओं को दबोच कर युग को सकुशल बरामद कर लिया था. पुर्निषा, मयंक मेहता व मयंक सिंदल के वे मोबाइल फोन भी पुलिस ने बरामद कर लिए थे, जिन से रितेश को फिरौती के लिए फोन किया गया था. आर्थिक तंगी के चलते पुर्निषा व मयंक मेहता ने अपहरण कर के फिरौती मांगने जैसा अमानवीय कृत्य किया था, जबकि तीनों ही गरीब परिवारों से नहीं थे, इन की महत्त्वाकांक्षा उन्हें ले डूबी थी.

पुलिस ने पूछताछ कर के 17 अक्तूबर, 2016 को पुर्निषा, मयंक मेहता और मयंक सिंदल को जोधपुर के कोर्ट नंबर-8 में न्यायाधीश वैदेही सिंह के समक्ष पेश किया, जहां से तीनों आरोपियों को केंद्रीय कारागार जोधपुर भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक इन की जमानतें नहीं हुई थीं.

लेखक : कुंवर कस्तूर सिंह भाटी

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

हमसफर का सफर पड़ेगा महंगा

जल्द ही आपको हमसफर ट्रेन से सफर करने का मौका मिलेगा. पर नोटबंदी के दौर में यह सफर आपको महंगा पड़ सकता है. रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने जानकारी दी है कि जल्द ही हमसफर ट्रेन का सफर शुरू हो जाएगा. दिल्ली के सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर खड़ी इस पहली ट्रेन का निरीक्षण करने के बाद रेल मंत्री ने कहा कि जल्द ही यह ट्रेन पैसेंजरों के लिए शुरू कर दी जाएगी. इस ट्रेन को गोरखपुर और आनंद विहार के बीच चलाया जाएगा.

पूरी तरह एसी थ्री टीयर कोच वाली यह ट्रेन अलग तरह की है. इस ट्रेन में नई सुविधाएं तो जोड़ी ही गई हैं, साथ ही इसका किराया भी अन्य सामान्य ट्रेनों से ज्यादा रखा जाएगा. रेलवे ने ट्रेन के किराए का ऐलान नहीं किया है. इस ट्रेन में सीसीटीवी से लेकर जीपीएस सिस्टम और पब्लिक अनाउंसमेंट सिस्टम भी लगाया गया है. इसके अलावा इस ट्रेन में फायर और स्मोक डिटेक्शन सिस्टम भी लगाया गया है. ट्रेन में पैसेंजरों के लिए सूप, चाय और काफी की मशीन के अलावा ओवन और फ्रिज भी है. इस ट्रेन में एलएचबी कोच हैं. जिसकी लागत लगभग 2.6 करोड़ रुपये है.

प्रेमचंद का वहशी प्रेम

21 अगस्त, 2016 की दोपहर को जिस तरह सुमन की 2 साल की बेटी सोनी घर के बाहर बरामदे से खेलते हुए गायब हुई थी, उसे देखते हुए घर वाले ही नहीं, पूरा गांव हैरान था. किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर छोटी सी बच्ची इस तरह कहां अचानक चली गई. घर में ही नहीं, उसे इधर उधर काफी खोजा गया, पर वह कहीं नहीं मिली. सोनी के न मिलने से सुमन ही नहीं, पूरा गांव परेशान था.

सोनी कहां गई, किसी की समझ में नहीं आ रहा था. बेटी के इस तरह गायब होने से सुमन का दिल बैठने लगा था. जल्दी ही यह खबर पूरे गांव में फैल गई थी. बेटी के न मिलने से सुमन का रो रो कर बुरा हाल था. सुमन की हालत देखते हुए उस के मां बाप, पड़ोसी प्रेमचंद और गांव के कुछ अन्य लोग उसे ले कर थाना फरेंदा पहुंचे और इंसपेक्टर संपूर्णानंद तिवारी को पूरी बात बताई तो उन्होंने लिखित शिकायत ले कर सोनी की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

इस के बाद थानाप्रभारी  ने सभी को सांत्वना दे कर घर भेज दिया कि वह बच्ची को ढुंढवाने की कोशिश करेंगे. मामला एक मासूम की गुमशुदगी का था, इसलिए संपूर्णानंद तिवारी ने मामले की जांच खुद संभालते हुए कारवाई शुरू कर दी.

गांव बाबू फरेंदा जा कर उन्होंने घर वालों से पूछताछ की तो पता चला कि सुमन के शादी से पहले गांव के पूर्व ग्रामप्रधान रामप्रीत के बेटे प्रेमचंद से प्रेमसंबंध थे. 2 दिन पहले वह सुमन से मिलने आया भी था. सुमन ने उसे झिड़क दिया था, तब उस ने खामियाजा भुगतने की धमकी दी थी. पुलिस के लिए इतनी जानकारी काफी थी.

संपूर्णानंद तिवारी ने सुमन और प्रेमचंद के प्रेमसंबंधों के बारे में विस्तार से पूछताछ की. इस के बाद प्रेमचंद पूरी तरह संदेह के दायरे में आ गया था. उन्होंने उस के बारे में पता किया तो जानकारी मिली कि वह थाने से लौटने के बाद से ही घर से गायब है. किसी को पता भी नहीं था कि वह कहां है.

प्रेमचंद के इस तरह घर से गायब होने पर पुलिस का संदेह और बढ़ गया. पुलिस खुद तो उस की खोज में जुट ही गई, मुखबिरों को भी उस की तलाश में लगा दिया. आखिरकार पुलिस ने मेहनत कर के प्रेमचंद को उसी के गांव के एक खंडहर पड़े मकान से गिरफ्तार कर लिया. थाने ला कर जब उस से पूछताछ की गई तो घाघ प्रेमचंद ने पुलिस को काफी छकाया. लेकिन अंत में उसे जुबान खोलनी ही पड़ी. अपना अपराध स्वीकार करते हुए उस ने बताया कि उसी ने सोनी का अपहरण कर उस की हत्या कर लाश को नदी में फेंक दी है.

इस घृणित कार्य को उस ने अकेले ही अंजाम दिया था. इस के बाद इस सिरफिरे आशिक ने सुमन से प्यार से ले कर सोनी की हत्या तक की जो कहानी सुनाई, उसे सुन कर पुलिस भी हैरान रह गई. वह पूरी कहानी कुछ इस प्रकार थी—

सुमन उत्तर प्रदेश के जिला महाराजगंज के गांव बाबू फरेंदा के रहने वाले सुखी और संपन्न किसान भगवानचंद की सब से बड़ी बेटी थी. वह काफी सूझबूझ वाली और खूबसूरत लड़की थी. इंटर पास करने के बाद वह आगे पढ़ना चाहती थी, लेकिन महाविद्यालय घर से दूर होने की वजह से वह आगे नहीं पढ़ सकी.

सुमन सयानी हुई तो भगवानचंद ने उस की शादी कानपुर के रहने वाले विशुनदेव से कर दी. ससुराल में भरापूरा परिवार तो था ही, सुखी और संपन्न भी था. ससुराल में उसे इतना प्यार मिला कि उसे मायके की कमी कभी नहीं खली. समय के साथ सुमन 2 बच्चों की मां बनी, जिन में बेटा विकास 5 साल का है तो बेटी सोनी 2 साल की थी.

सुमन समयसमय पर मायके आती रहती थी और 2-4 दिन रह कर ससुराल चली जाती थी. 10 अगस्त, 2016 को भी वह दोनों बच्चों को ले कर मायके आई थी. उस दिन दोपहर का समय था. सुमन घर में अकेली थी. उस समय उस के दोनों बच्चे सो रहे थे. वह कपड़े सहेज रही थी, तभी उसे अपने बाएं कंधे पर दबाव महसूस हुआ. उस ने पलट कर देखा तो पीछे गांव का ही प्रेमचंद खड़ा था. उसे देख कर उस ने हैरान हो कर कहा, ‘‘तुम…तुम ने तो मेरी जान ही निकाल दी.’’

‘‘तुम कब से मुझ से डरने लगी सुमन?’’ प्रेमचंद ने मुसकराते हुए कहा तो सुमन ने तुनक कर कहा, ‘‘मुझे इस तरह का मजाक बिलकुल पसंद नहीं. आज के बाद इस तरह का मजाक करना भी मत.’’

‘‘ठीक है बाबा, अब इस तरह कभी नहीं करूंगा. तुम बेकार ही डर गईं.’’

‘‘काम ही तुम ने ऐसा किया.’’

‘‘कैसी बातें करती हो सुमन, पहले तो तुम ने इस तरह का व्यवहार मुझ से कभी नहीं किया. सौरी, माफी मांग रहा हूं.’’ प्रेमचंद ने दोनों कान पकड़ कर कहा.

‘‘ठीक है, अब कभी ऐसा मत करना. और हां, अब जाओ, शाम को मम्मी पापा आ जाएंगे, तब शाम को मिलने आना. अगर अभी किसी ने तुम्हें यहां देख लिया तो न जाने क्या सोचेगा?’’ सुमन ने घबराते हुए कहा.

‘‘यार, मैं तुम से और तुम मुझ से प्यार करती हो, फिर इतना डर क्यों रही हो?’’

‘‘मैं तुम से प्यार जरूर करती थी, पर अब नहीं करती. मेरी शादी हो चुकी है. गृहस्थी बस चुकी है मेरी, 2 बच्चे हैं मेरे, प्यार करने वाला पति है. पहले जो हुआ, सो हुआ. अब उसे भूल जाओ. उन्हें मैं धोखा नहीं दे सकती.’’ सुमन ने कहा.

‘‘अचानक तुम्हें यह हो क्या गया सुमन, कैसी बहकी बहकी बातें कर रही हो तुम? अब बस भी करो और आओ मेरी बाहों में समा जाओ. तुम्हें आगोश में लेने के लिए मेरी ये बांहें कब से बेताब हैं.’’ कह कर प्रेमचंद ने सुमन को बांहों में भर लिया.

सुमन कसमसाते हुए उस की बाहों से आजाद होने के लिए तड़प उठी. और जब आजाद हुई तो गुस्से में बोली, ‘‘मैं ने कहा था न कि मेरी गृहस्थी बस चुकी है, परिवार हो चुका है मेरा. तुम जो चाहते हो, अब वह नहीं हो सकता. प्लीज, मेरी बसीबसाई गृहस्थी में आग मत लगाओ. मेरी बात को समझो और चुपचाप यहां से चले जाओ. कहो तो मैं तुम्हारे हाथ जोड़ लूं या पैर पकड़ लूं. पिछली बातों को भूल कर अब तुम मेरे ऊपर उपकार करो और यहां जाओ.’’

‘‘यह तुम क्या कर रही हो सुमन?’’ प्रेमचंद ने भर्राई आवाज में कहा, ‘‘मैं ने तो बस तुम से दिल्लगी की थी. मेरे सामने हाथ जोड़ने या पांव में पकड़ने की जरूत नहीं है. मेरी दुआएं हमेशा तुम्हारे साथ हैं और रहेंगी. भला मैं तुम्हारी गृहस्थी क्यों उजाड़ने लगा? ऐसी बात है तो आज के बाद मैं तुम्हारे सामने कभी नहीं आऊंगा. आज के बाद मैं तुम्हारी ओर देखूंगा भी नहीं. लेकिन आज मेरी इच्छा पूरी कर दो.’’ प्रेमचंद ने कहा.

लेकिन सुमन राजी नहीं हुई. प्रेमचंद ने उसे बहुत समझाया, पर सुमन ने उसे झिड़क दिया. जब किसी भी कीमतड्ड पर सुमन राजी नहीं हुई तो प्रेमचंद ने उसे धमकी देते हुए कहा, ‘‘मेरी बात न मान कर सुमन तुम ने बहुत बड़ी भूल की है. इस का खामियाजा तुम्हें भुगतना ही होगा.’’

25 साल का प्रेमचंद भी उसी के गांव का रहने वाला था. उस के पिता रामप्रीत गांव के प्रधान रहे थे. 4 भाईबहनों में प्रेमचंद दूसरे नंबर का बेटा था. इंटर पास कर के उस ने पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि आगे पढ़ने में उस का मन नहीं लगा.

पढ़ाई छोड़ने के बाद वह दिन भर आवारा दोस्तों के साथ घूमता रहता था. आतेजाते उस की नजर सुमन पर पड़ी तो उस के दिल की घंटी बज उठी. सुमन आंखों के रास्ते दिल में उतरी तो वह हर घड़ी उसी के बारे में सोचने ही नहीं लगा, बल्कि उसे एक नजर देखने के लिए उस के घर के चक्कर भी लगाने लगा. लेकिन अपने दिल की बात वह सुमन से कह नहीं सका.

दूसरी ओर सुमन भी कम नहीं थी. उस ने जल्दी ही प्रेमचंद के मन की बात भांप ली थी. पता नहीं क्यों, वह उस की ओर आकर्षित होने लगी. वह समझ नहीं पा रही थी कि ऐसा उस के साथ क्यों हो रहा है? ऐसे में जब प्रेमचंद ने हिम्मत कर के उस से दिल की बात कही तो उस ने भी अपने दिल की बात कह दी कि वह भी उस से प्यार करती है.

सुमन की स्वीकृति पर प्रेमचंद बहुत खुश हुआ. इस के बाद दोनों छिपछिपा कर मिलने लगे. संयोग से इस की भनक न तो सुमन के घर वालों को लगी और न ही प्रेमचंद के.

प्रेमचंद रोजीरोटी के चक्कर में चेन्नई चला गया तो कई सालों बाद गांव लौटा. उसी बीच सुमन की शादी ही नहीं हो गई, बल्कि वह 2 बच्चों की मां भी बन गई. इस बीच प्रेमचंद जब भी गांव आया, उस की मुलाकात सुमन से नहीं हो सकी.

संयोग से इस बार 20 अगस्त को प्रेमचंद गांव आया तो सुमन मायके आई हुई थी. सुमन के मायके में होने का उसे पता चला तो वह उस से मिलने उस के घर चला गया. लेकिन सुमन ने उसे लिफ्ट देने के बजाय झिड़क कर उस के अरमानों पर पानी फेर दिया. सुमन की बेवफाई ने प्रेमचंद को बेचैन कर दिया. उस पूरी रात वह सो नहीं सका. बिस्तर पर करवटें बदलते हुए यही सोचता रहा कि सुमन उस के साथ इस तरह बेवफाई कैसे कर सकती है?

भले ही वह अपनी मांग में किसी और के नाम का सिंदूर भर रही हो, पर प्यार तो उस ने उसी से किया था, इसलिए अब भी वह उसी की है. वह उस के बिना कैसे रह सकती है? और अगर रह सकती है तो उसे इस की सजा ऐसी मिलनी चाहिए कि जिंदगी भर दुख की धधकती आग में अपने आंसुओं को सुखाने की कोशिश करती रहे.

यही सब सोच कर उस ने सुमन को मजबूर करने के लिए एक खतरनाक षडयंत्र रच डाला. उस की योजना यह थी कि वह उस की मासूम बेटी सोनी का अपहरण कर लेगा और बदले में उस के जिस्म का सौदा करेगा. सुमन इस के लिए तैयार हुई तो ठीक, वरना वह उस की बेटी की हत्या कर देगा. बेटी को खोने के बाद वह सारी जिंदगी दर्द की आग में सुलगती रहेगी.

प्रेमचंद ने ठीक वैसा ही किया, जैसा उस ने योजना बनाई थी. योजना के अनुसार 21 अगस्त, 2016 की सुबह से ही वह सुमन और उस की मासूम बेटी पर नजर गड़ाए था. दोपहर को सोनी बरामदे में अकेली खेलती दिखाई दी तो वह चुपके से उस के पास पहुंचा और गोद में ले कर भाग गया.

उस समय सुमन घर के कामों में लगी थी. काम निपटा कर उसे बेटी की याद आई तो वह घर के बाहर आई. बरामदे में बेटी को न पा कर उस की तलाश में लग गई. काफी तलाशने के बाद भी जब उस का पता नहीं चला तो सभी ने उस के गायब होने की सूचना थाने में देने का मन बना लिया. सभी सोनी के गायब होने की सूचना देने थाने जाने लगे तो प्रेमचंद भी सब के साथ यह देखने थाने चला गया कि सोनी की गुमशुदगी में सुमन उस का नाम तो नहीं लिखवा रही है.

थाने से लौटते समय प्रेमचंद सब का साथ छोड़ कर गायब हो गया. अचानक बीच रास्ते से उस के गायब होने से सुमन को उस पर शक ही नहीं हुआ, बल्कि विश्वास हो गया कि सोनी के गायब होने के पीछे उसी का हाथ है. क्योंकि उस ने उस को धमकी दी थी कि अगर उस ने उस की बात नहीं मानी तो उसे इस का खामियाजा भुगतना होगा.

घर पहुंच कर सुमन ने प्रेमचंद की धमकी वाली बात मां बाप को बताई तो यह सब सुन कर वे सन्न रह गए. भगवानचंद ने तुरंत गांव वालों को इकट्ठा कर के पूरी बात उन्हें बताई. इस के बाद सभी रामप्रीत के घर पहुंचे और प्रेमचंद को सामने लाने और सोनी को सकुशल बरामद कराने को कहा.

प्रेमचंद का कुछ पता नहीं था. रामप्रीत ने उसे फोन कर के घर आने को कहा तो वह समझ गया कि पिता उसे घर आने को क्यों कह रहे हैं. उस ने घर आने से साफ मना कर दिया. जब उस से सोनी के बारे में पूछा गया तो उस ने पिता से भी साफसाफ कह दिया कि जब तक सुमन उस की बात नहीं मानेगी, तब तक वह सोनी को किसी भी कीमत पर नहीं लौटाएगा. साफ हो गया कि प्रेमचंद ने जो शर्तें रखी थीं, वह निहायत ही घटिया थीं. रामप्रीत बेटे की इस करतूत से गांव वालों के सामने लज्जित हो गए.

प्रेमचंद सुमन की देह के लिए पागल था. बात जब उस के पिता तक पहुंची तो उस का पागलपन सनक में बदल गया. उसे विश्वास हो गया कि सुमन अब उस की बात कभी नहीं मानेगी. फिर क्या था, उस ने मासूम सोनी का गला घोंट कर हत्या कर दी और लाश को नदी में फेंक दिया. इस के बाद गांव आ कर एक खंडहर पड़े मकान में छिप गया, जहां से पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया था.

अपना अपराध स्वीकार कर के मासूम की हत्या की कहानी सुनाते समय प्रेमचंद के चेहरे पर न कोई शिकन थी और न कोई पछतावा, बल्कि अपने किए पर वह खुश था. देखा जाए तो प्रेमचंद ने सुमन को ऐसा जख्म दिया था, जो वक्त के साथ भर तो जाएगा, लेकिन उस की कसक कभी नहीं जाएगी. सुमन ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिसे उस ने अपना सब कुछ सौंप दिया, वही उसे इस तरह का दर्द देगा.

कथा लिखे जाने तक प्रेमचंद जेल में था. बेटे की करतूतों से दुखी रामप्रीत ने उस के किए की सजा दिलाने के लिए उस की जमानत की भी कोशिश नहीं की थी. जब इस सब की जानकारी सुमन के पति को हुई तो उन्हें भी बहुत दुख हुआ. पर यह सोच कर उन्होंने पत्नी को माफ कर दिया कि वह बीता हुआ पल था. बीते हुए पल पर वर्तमान को हावी होने देना ठीक नहीं है. वह सुमन को ले कर कानपुर चले गए. पति के इस फैसले से सुमन के मन को थोड़ा तसल्ली जरूर मिली होगी.

लेखक : शैलेंद्र कुमार ‘शैल’

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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