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अब फेक खबरों पर होगी फेसबुक की नजर

फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया पर कई बार कुछ वायरल हो रहीं खबरें बाद में गलत साबित होती हैं. कई बार यूजर्स इन फेक न्यूज से भ्रमित हो जाते हैं लेकिन अब फेक खबरों से निपटने के लिए फेसबुक ने एक ठोस कदम उठाया है.

फेसबुक अब फेक स्टोरी पर यूजर्स को चेतावनी देगा. फेसबुक ने ऐसा फीचर्स डिजाइन किया है जिससे न्यूज फीड में शेयर की जा रहीं फेक न्यूज को रिपोर्ट करना आसान हो. अभी तक फेसबुक पर आपत्तिजनक सामग्री या स्पैम पर रिपोर्ट करने का विकल्प दिया जाता था.

फेसबुक खुद हर पोस्ट की सत्यता की जांच नहीं करेगा बल्कि फेसबुक के सीईओ जकरबर्ग ने कहा है कि फेसबुक इसके लिए तीसरी पार्टियों और कम्यूनिटी पर भरोसा करेगा. इसके लिए फेसबुक कुछ फैक्ट चेकिंग कंपनियों का सहारा लेगा. अगर किसी स्टोरी को फेसबुक की तरफ से गलत मार्क कर दिया गया तो जैसे ही उस स्टोरी को कोई यूजर शेयर करेगा उसे चेतावनी दी जाएगी.

अब फेक खबरों पर एक रेड लेबल होगा जो बताएगा कि उसे फैक्ट चेकर्स ने गलत मार्क किया है. यूजर्स क्लिक करके जान सकेंगे कि उस खबर को गलत या संदेहास्पद मानने की वजहें क्या हैं. "लर्न वाई दिस इज डिसप्युटेड" (learn why this is disputed) लिंक पर क्लिक करके यूजर्स इस बारे में ज्यादा डिटेल में जानकारी प्राप्त कर सकेंगे. फेसबुक के होमपेज पर न्यूज फीड में भी ऐसी फेक खबरें नीचे दिख सकती हैं.

फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया क्षेत्र में काम कर रहीं कंपनियां फर्जी खबरों के वायरल होने की घटनाओं से लगातार दवाब में हैं. अपने फायदे के लिए यूजर्स को धोखा देने या भ्रमित करने के लिए ऐसी फर्जी खबरें पोस्ट की जाती हैं.

ऐसा ही 2016 में अमेरिकी चुनाव को लेकर फेक न्यूज का एक उदाहरण सामने आया था जिसमें दावा किया गया था कि पोप फ्रैंसिस ने डॉनल्ड ट्रंप को समर्थन दिया है. फेसबुक के सीईओ जकरबर्ग ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि वह फेक न्यूज पर गंभीरता से विचार करेंगे और उनकी कंपनी इस दिशा में कदम उठाएगी.

इसके लिए फेसबुक फर्जी न्यूज को पहचाने के लिए कई सिग्नल्स का यूज करेगी. फेसबुक यह जानने की कोशिश करेगा कि कोई यूजर आर्टिकल पढ़ने के बाद उसे अपने दोस्तों के साथ शेयर नहीं करना चाहता है तो क्या खबर संदोहास्पद है. इसके अलावा फेसबुक ऐसी वेबसाइट्स पर भी पेनल्टी की योजना बना रहा है जो कई अन्य साइट्स की नकल करती हैं या रीडर्स को गुमराह करने की कोशिश करती हैं.

अगर कोई यूजर फेसबुक की चेतावनी के बावजूद भी किसी पोस्ट को शेयर करना चाहता है तो वह शेयर कर सकता है लेकिन इस तरह की पोस्ट्स को फेसबुक के ऐड टूल के जरिए प्रमोट नहीं किया जा सकेगा.

आप हो सकते हैं ‘लीजन’ का अगला निशाना

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और विजय माल्या का ट्विटर अकाउंट हैक करने वाले लीजन ग्रुप ने बताया है कि उसका अगला निशाना सरकारी अधिकारियों के मेल और डिजिटल पेमेंट गेटवे होंगे. एक  को दिए गए इंटरव्यू में लीजन ने ये बात कही.

लीजन ने खुलासा किया है कि उसका अगला निशाना sansad.nic.in हो सकता है. ये भारत की साइबर सिक्योरिटी पर बहुत बड़ा हमला होगा. इस वेबसाइट से कई बड़े लोगों के नाम जुड़े हैं.

लीजन ने खुद को अराजकतावादी बताया है जिसका राजनीति से कोई ताल्लुक नहीं है. ऐसे समय में जब सरकार हर सेक्टर में डिजिटल ट्रांजैक्शन को बढ़ावा दे रही है लीजन बैंक पेमेंट गेटवे के लिए बड़ा खतरा बन सकता है. अपने इंटरव्यू में लीजन ने बताया है कि बैंक फ्रॉड करना उनके लिए बेहद आसान है.

इंटरव्यू में लीजन ने भारत के डिजिटल सेक्यूरिटी सिस्टम पर तंज कसते हुए कहा- ‘क्या #DigitalIndia कदम सुरक्षित है, शायद मोदी को ये लॉन्च करने से पहले सोचना चाहिए था.’ लीजन से जब बीजेपी और पीएम नरेंद्र मोदी के अकाउंट की कड़ी सुरक्षा को लेकर सवाल किया गया तो उसने बोला कुछ भी आने वाले समय में सुरक्षित नहीं है. सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि आईटी मंत्रालय ने बैंक सुरक्षा को अधिक मजबूत बनाया है साथ ही इस पर कड़ी नजर रखे हुए हैं.

योगेश्वर ने खींचे हाथ, बजरंग सबसे महंगे पहलवान

स्टार पहलवान योगेश्वर दत्त पेशेवर कुश्ती लीग (पीडब्ल्यूएल) के दूसरे सत्र में हिस्सा नहीं लेंगे. उन्होंने नीलामी में शामिल नहीं होने का फैसला किया जिसमें बजरंग पूनिया भारत के सबसे महंगे खिलाड़ी बनकर उभरे. उन्हें दिल्ली की फ्रेंचाइजी ने 38 लाख रुपये में खरीदा.

रियो ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता जॉर्जिया के व्लादिमेर खिनचेगाशविली को पंजाब ने 48 लाख रुपये में खरीदा और वह प्रो रेस्लिंग-2 के सबसे महंगे खिलाड़ी साबित हुए.

दिल्ली ने मारिया स्टैडनिक पर 47 लाख रुपये खर्च किये और इस तरह से वह नीलामी में सबसे महंगी महिला पहलवान बनी जबकि भारतीय स्टार साक्षी मलिक को केवल 30 लाख रुपये ही मिले.

यहां तक कि साक्षी मलिक को 2016 की राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप की स्वर्ण पदक विजेता रितु फोगाट ने भी पीछे छोड़ दिया. उन्हें नई फ्रेंचाइजी जयपुर ने 36 लाख रुपये में खरीदा और इस तरह से वह सबसे महंगी भारतीय महिला पहलवान रहीं. फोगाट बहनों गीता, बबिता, रितु और संगीता चारों को कुल 70 लाख रुपये की राशि मिली.

साक्षी हालांकि नीलामी में कम धनराशि मिलने के बावजूद खुश थी क्योंकि उनके मंगेतर सत्यव्रत कादियान को भी दिल्ली ने खरीदा है. रियो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता ने कहा, मुझे खुशी है कि मैं उसी टीम में हूं जिसमें सत्यव्रत है.

लंदन ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता और पिछले साल हरियाणा की फ्रेंचाइजी से खेलने वाले योगेश्वर ने पहले भी कहा था कि उनका लीग में खेलना संदिग्ध है क्योंकि 2 से 19 जनवरी के बीच होने वाले टूनार्मेंट के दौरान ही उनकी शादी भी होनी है.

योगेश्वर ने कहा कि मेरी शादी और शादी से जुड़े कार्यक्रम भी इस दौरान होंगे, इसलिए मैंने इस साल पीडब्ल्यूएल में नहीं खेलने का फैसला किया. भारत के लिए दो ओलंपिक पदक जीतने वाले सुशील कुमार पहले ही लीग का हिस्सा नहीं हैं और अब योगेश्वर के हटने से इसकी चमक निश्चित तौर पर फीकी पड़ेगी.

नीलामी में 2016 के विश्व चैंपियन रूस के मागोमद कुबार्नालीव को 47 लाख और तीन बार की विश्व चैंपियन स्वीडन की सोफिया मैटसन को 41.50 लाख रुपये में खरीदा गया. इन दोनों को हरियाणा ने खरीदा. मुंबई ने एरिका वीब और जॉर्जिया के जाबरायिल हसनोव दोनों को 43-43 लाख रुपये में खरीदा जबकि नाईजीरिया की महिला पहलवान ओडुनायो आडुकुरोये को पंजाब ने 32 लाख रुपये में अपनी टीम से जोड़ा.

लंदन ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता अजरबेजान के तोग्रुल असगारोव को पंजाब ने 35 लाख रुपये में खरीदा. पेशेवर कुश्ती लीग के दूसरे सत्र के लिए हुई नीलामी में 200 से अधिक पहलवानों ने किस्मत आजमाई जिनके लिए छह फ्रेंचाइजियों ने बोली लगाई.

विख्यात नीलामीकर्ता बॉब हेटन ने नीलामी का संचालन किया. नीलामी के दौरान पूर्व और मौजूदा विश्व चैम्पियन और ओलंपियन के लिए काफी उत्साह दिखा और फ्रेंचाइजियां उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए अतिरिक्त पैसा खर्च करने से भी पीछे नहीं हटी. टूनार्मेंट के 2016-17 सत्र में पंजाब और दिल्ली के अलावा मुंबई, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और जयपुर की फ्रेंचाइजी हिस्सा लेंगी.

नौ सदस्यीय टीम तैयार करने के लिए प्रत्येक टीम के पास दो करोड़ रुपये की राशि थी. टीम में पांच पुरुष और चार महिला पहलवानों को चुना जाना है जिसमें पांच भारतीय और चार अंतरराष्ट्रीय पहलवान हो सकते हैं.

अब वाट्स ऐप पर सेंट मेसेज को करें एडिट

मैसेजिंग सर्विस वाट्स ऐप जल्द ही एक नया फीचर लाने जा रहा है. पर वाट्स ऐप एक ऐसा फीचर लाने जा रहा है जिससे आप भेजे हुए मैसेज को भी एडिट कर सकते हैं. अब तक ऐसा कोई फीचर वाट्स ऐप पर नहीं था.

व्हाट्‍स ऐप पर कई बार कुछ भेजना होता है पर जल्दबाजी में कुछ और सेंट हो जाता है. एक बार मैसेज चले जाने के बाद किसी भी परिस्थिती में उसे एडिट नहीं किया जा सकता. ऑटोकरेक्ट के कारण भी कई बार दोस्तों को गलत मैसेज सेंट हो जाता है. कई बार मैसेज किसी को भेजना होता है, लेकिन जल्दबाजी में वो किसी और के पास चला जाता है. ये स्थिति भी खतरनाक होती है. ऐसी स्थितियों के लिए यह फीचर काफी मददगार साबित होने वाला है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक वाट्स ऐप में जल्द ही ये फीचर जुड़ने वाला है जिसकी मदद से यूजर्स अपने भेजे हुए मैसेज को एडिट (सुधार) कर पाएंगे. यानी अगर किसी यूजर से गलत मैसेज चला गया है तो वो उसे आसानी से रि-एडिट कर पाएगा. कंपनी ने इस फीचर की टेस्टिंग शुरू कर दी है. हालांकि ये फीचर कब से एक्टिव या शुरू होगा इसके बारे में किसी तरह की कोई जानकारी नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक व्हाट्‍सएप के इस फीचर का नाम 'रिवोक' या 'एडिट' हो सकता है.

ट्विटर पर अकाउंट WABetaInfo ने एक स्क्रीन शॉट शेयर करके इसकी जानकारी दी. इसके मुताबिक वाट्स ऐप की सुविधाओं में मैसेज को वापस लेने, एडिट करने के फीचर को बीटा टेस्टर्स के लिए एड किया गया है. 

संवादहीनता की शिकार संसद

राज्यसभा के बाद लोकसभा में भी दिव्यांगों के भले के लिए सर्वसम्मति से पारित निशक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक को छोड़ दिया जाए, तो जाते हुए साल का आखिरी संसदीय शीत सत्र अपनी निष्फलता के लिए ही याद किया जाएगा. कहना चाहें तो कह सकते हैं कि नोटबंदी या विमुद्रीकरण का सबसे गहरा और प्रतिकूल असर महीने भर के शीतकालीन सत्र पर ही पड़ा, जहां गिनाने भर को भी विधायी कार्य नहीं हो पाए.

गौरतलब है कि नोटबंदी पर जहां राज्यसभा में बीते महीने 16 नवंबर को महज एक दिन तो अधूरी चर्चा हुई भी, लेकिन लोकसभा में इस पर चर्चा तक नहीं हो सकी. लोकसभा में विपक्ष इस बात पर जोर दे रहा था कि नोटबंदी पर चर्चा मतदान के प्रावधान वाले नियम के तहत की जानी चाहिए, जबकि राज्यसभा में विपक्ष चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री की मौजूदगी की मांग को लेकर अड़ा रहा. इस तरह सत्ता पक्ष और विपक्ष की तनातनी और पैंतरेबाजी ने ऐसा गुल खिलाया कि पूरे सत्र की 21 बैठकों में जहां लोकसभा में महज 19 घंटे कार्यवाही हुई, वहीं अड़ंगेबाजी के कारण 91 घंटे 59 मिनट का समय नष्ट हुआ.

राज्यसभा का भी कुछ ऐसा ही हाल रहा, वहां 22 घंटे से थोड़ा अधिक काम हुआ जबकि 86 घंटे से भी ज्यादा समय हंगामे की भेंट चढ़ गया. इसलिए बहुत स्वाभाविक ही है कि शुक्रवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित शीत सत्र के मद्देनजर लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने गहरी चिंता जताते हुए अपनी बात कही है. जहां लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि इससे जनता में हमारी छवि धूमिल होती है, वहीं राज्यसभा में सभापति हामिद अंसारी ने नाखुशी जाहिर करते हुए सभी पक्षों से आत्मविश्लेषण का आह्वान किया है.

हताशा, निराशा और क्षुब्ध माहौल के बीच शोर शराबा और बहिर्गमन की भेंट चढ़े शीत सत्र में फिर भी अजीब संवाद हीनता देखने को मिली, जब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्षी सांसद राहुल गांधी ने अलग-अलग कहा कि हमें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है. इसके इतर राज्यसभा में सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने से पहले अपने पारंपरिक संबोधन में हामिद अंसारी ने व्यवधान पर गहरी निराशा जताते हुए कहा उम्मीद थी कि दिसंबर 2013 में 221वें सत्र के समापन पर उन्होंने जो टिप्पणी की थी, उसे दोहराने की जरूरत नहीं होगी. लेकिन उनकी उम्मीदें गलत साबित हुईं. व्यंग्यात्मक लहजे में दरअसल उन्होंने सबकुछ कह दिया, जो कहा जा सकता था. उन्होंने कहा कि नियमित और लगातार व्यवधान इस सत्र की खासियत रही. हंगामे के कारण सदस्यों को सवालों और लोक महत्व के विभिन्न मुद्दों के तहत कार्यपालिका को जवाबदेह बनाने का मौका नहीं मिल सका.

अंसारी ने कहा कि नारेबाजी, पोस्टर दिखाने और कार्यवाही को बाधित किए जाने से संबंधित नियमों की सदन के सभी पक्षों द्वारा लगातार अवहेलना की गई. सदन में शांति सिर्फ उसी समय रही, जब दिवंगत लोगों को श्रद्धांजलि दी जा रही थी. इससे ज्यादा कहा भी क्या जा सकता था. बहरहाल, यही उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद का अगला सत्र संवादहीनता का शिकार न हो और फलदायी हो.

नोटबंदी : इन सवालों का जवाब दें मोदी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटबंदी को लेकर सरकार से जवाब तलब करना जरूरी हो गया था, एक महीने का लंबा वक्त गुजर जाने के बावजूद ग्रामीण स्तर से लेकर मेट्रो शहरों तक स्थिति सामान्य से परे मालूम पड़ रही है. किसी भी लोकतांत्रिक देश में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि उस देश के नागरिक को अपने पैसे निकालने में इतनी दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है. लोगों को एक महीने व्यतीत हो जाने के बावजूद नोटबंदी की समस्याओं से निजात नहीं मिल पाई है, जोकि नोटबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए जा रहे सवालात को बल प्रदान करते हैं. तीस दिनों का लेखा-जोखा देखा जाए तो काला धन प्रतिदिन निकलकर सामने आ रहा है, लेकिन जिस तरीके से छापेमारी के दौरान नई नोटों के बंडल बरामद हो रहे हैं, वह सरकार की नोटबंदी को लेकर सुनियोजित तैयारी न होने की दिशा में संकेत व्यक्त करते हैं.

दक्षिण के राज्यों में लगातार व्यापक स्तर पर काली कमाई का भंडाफोड़ हो रहा है, जिसमें अच्छे-खासे स्तर पर नई नोटों की खपत भी बरामद हो रही है. फिर इसे देखकर यही ख्याल आता है कि आखिर सरकार की खामी कहां रह गई कि इस कदर नई नोटों की खेप कालाबाजारी करने वालों तक पहुंच गई और आम जनता एक महीने बाद भी एटीएम और बैंकों की कतार में लगकर अपने पैसे के इंतजार में दिख रही है. जिस देश की आधी से अधिक जनता गांवों में निवास करती हो, और वहां पर शिक्षा और बिजली जैसी मूलभूत समस्याओं से दो-चार हो रही हो, वहां पर कैशलेस सिस्टम कैसे काम कर सकता है. यह सवाल अब भी विचार-विमर्श का मुद्दा बना हुआ है.

हमारे देश की शिक्षा पद्धति इतनी हाईटेक नहीं हुई है कि दूरदराज के गांव और कस्बों में निवास करने वाली जनता इन माध्यमों से रूबरू हो सके, जहां आज भी बिजली पानी का अभाव है, जिसकी वजह से संचार के उपयुक्त साधन भी उपलब्ध नहीं हैं कि वे आपने आप को इतना सजग कर सकें कि अगर वे कैशलेस इकोनमी सिस्टम से जुड़ जाएं तो उनका सुरक्षित लेन-देन हो सके. जब वे बैंकिंग सुविधा में जागरूकता के अभाव में गुमराह हो जाते हैं, फिर मोबाइल-वायलेट आदि से वे कैसे स्वच्छ तरीके से कैशलेस व्यवस्था में योगदान कर सकते हैं. नोटबंदी से छोटे उद्योग-धंधे और ग्रामीण क्षेत्रों के साथ शहरों के मध्यम वर्ग के कारोबारियों को अभी भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उनका कारोबार प्रतिदिन की नकद आमदनी पर निर्भर होता है.

सरकार ने अभी तक लगभग तीस बार नोटबंदी के कानून को लेकर फेरबदल किया, जो इस बात का गवाह है कि नोटबंदी को लेकर सरकार की तरफ से पहले से व्यापक पहल की सरासर कमी थी, जो एक महीने बाद भी जाहिर हो रही है. किसान और आम आदमी मुसीबतों से पीड़ित नजर आ रहा है और सरकार कुछ दिन और समस्याएं होने की बात कह रही है. सुप्रीम कोर्ट का इस मसले पर सरकार से जवाब तलब करना स्वस्थ लोकतंत्र को सूचित करता है, क्योंकि कुछ फीसद लोगों के चक्कर में पूरे देश की आबादी को परेशानी में नहीं रखा जा सकता है.

विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में युवाओं की पीढ़ी भले देश की आबादी की लगभग 50 फीसदी हो, लेकिन देश में केवल 34 करोड़ लोग की पहुंच इंटरनेट तक है, विश्व में दूसरे स्थान पर स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या होने के बावजूद इनमें से अधिकतर कभी-कभार इंटरनेट का उपयोग करते हैं. भारत में मोबाइल कनेक्शन धारकों की संख्या भले 2 करोड़ है, लेकिन इनमें से केवल लगभग पंद्रह फीसद के पास ब्राडॅबैंड की सुविधा उपलब्ध है. फिर स्वीडन, बेल्जियम और ब्रिटेन की बराबरी के लिए भारत को अभी व्यापक स्तर पर होमवर्क करने की जरूरत है.

अभी भारतीय अर्थव्यवस्था में दो फीसद डिजिटल भुगतान होता है, जिसे आगे बढ़ाने में काफी समय लग जाएगा. भारत में इंटरनेट के संजाल को और व्यापक स्तर से फैलाने की जरूरत है, देश के दूरदराज के क्षेत्र अभी भी इस अद्भुत खिलौने से वाकिफ नहीं हैं. 4जी का जमाना आ जाने के बावजूद भी इंटरनेट की धीमी गति गले की फांस बनी हुई है. विकसित देशों की तुलना में क्रेडिड कार्ड और डेबिट कार्ड की स्वैपिंग मशीनें भी भारत में काफी कम हैं, प्रति दस लाख जनसंख्या पर लगभग 850 मशीनें ही डिजिटल भुगतान के दौर में काफी सिद्ध नहीं हो सकती हैं.

अब चेक पर लिखें भारतीय भाषाओं में

सरकार ने चैकबुक को हिंदी और अंग्रेजी में छापने और ग्राहकों को भी चैकों को हिंदी या संबंधित क्षेत्रीय भाषा में लिखने का ऑपशन देने का प्रस्ताव रखा है. वित्त राज्यमंत्री संतोष कुमार गंगवार ने लोकसभा में विनोद लखमाशी चावड़ा और डी एस राठौड़ के प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक ने ग्रामीण जनसंख्या को सरलता से समझाने के लिए अन्य बातों के साथ-साथ, बैंकिंग क्षेत्र में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा देने के कई निर्देश जारी किये हैं.

उन्होंनें कहा कि बैंकिग सुविधाएं देश की जनसंख्या के बड़े तबके तक पहुंचाने के लिए बैंकों को खाता खोलने वाले फॉर्म, जमा पर्ची, पासबुक समेत ग्राहकों द्वारा इस्तेमाल प्रिंटिड मैटिरियल को अंग्रेजी, हिंदी और संबंधित क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध कराना चाहिए. मंत्री ने कहा कि सभी चैक फॉर्म को हिंदी और अंग्रेजी में प्रिंट किया जाना चाहिए. ग्राहक चैकों को हिंदी, अंग्रेजी या संबंधित क्षेत्रीय भाषा में लिख सकते हैं.

अन्य निर्देशों में गंगवार ने बताया कि सभी पटलों पर अंग्रेजी, हिंदी के साथ-साथ कि ग्राहकों के साथ पत्राचार समेत ग्राहकों के साथ बैंकों द्वारा कारोबार करने में हिंदी और क्षेत्रीय संबंधित क्षेत्रीय भाषा में साइन बोर्ड को प्रदर्शन करना शामिल है. इसमें कहा गया भाषाओं का उपयोग किया जाएगा.

जी हां! एक खिलाड़ी से भी बनती है टीम

क्रिकेट इतिहास में शायद ही कभी ऐसा देखने को मिला होगा जब टीम के एक ही खिलाड़ी ने रन बनाए हों और बाकी सभी खिलाड़ी खाता भी न खोल पाए हों. साउथ-अफ्रीका के प्रिटोरिया में खेले जा रहे साउथ-अफ्रीका अंडर-19 महिला क्रिकेट टूर्नामेंट में ऐसा देखने को मिला. यहां टीम की एक खिलाड़ी ने 160 रन बनाए जबकि अन्य 9 बल्लेबाज शून्य रन पर यानी बिना खाता खोले मैदान से लौटे. बावजूद इसके टीम जीत दर्ज करने में सफल रही.

यह अद्भुत मैच पुमालंगा और ईस्‍टर्नस के बीच खेला गया. हुआ यूं कि पुमालंगा टीम की ओर से शानिया ली स्‍वार्ट ने 160 रन की पारी खेली. स्‍वार्ट ने अपनी पारी में 144 रन चौके और छक्‍कों से बनाए. उन्‍होंने नाबाद पारी में 86 गेंद का सामना किया और 18 चौके व 12 छक्‍के लगाए. लेकिन उनके अलावा पुमालंगा टीम की बाकी प्‍लेयर्स खाता भी नहीं खोल पाईं. टीम के स्‍कोर में नौ रन एक्‍स्‍ट्रा के रूप में जुड़े.

स्वार्ट क्रीज में मौजूद रहीं और उनके सामने साथी आठ बल्‍लेबाज जीरो पर वापस पवैलियन लौट गईं. पुमालंगा की ओर से सबसे बड़ी साझेदारी 10वें विकेट के लिए 61 रन की हुर्इ. स्‍वार्ट ने निकोलेट फिरी के साथ यह पार्टनरशिप की. इसमें फिरी ने तीन गेंद का सामना किया और वह भी नाबाद लौटीं.

पुमालंगा टीम की हालत इतनी खराब रही कि कोई भी बल्‍लेबाज 10 से ज्‍यादा गेंद का सामना ही नहीं कर पाईं. स्‍वार्ट ने 86 गेंद खेली और उनके बाद सी स्‍वानपूल ने 10 गेंदों का सामना किया. ईस्‍टर्न की ओर से कुल आठ गेंदबाजों ने बॉलिंग की. खोजा मासिंगीता ने चार ओवर में 15 रन दिए और पांच विकेट निकाले.

लक्ष्‍य का पीछा करने उतरी ईस्‍टर्न टीम की शुरुआत भी खराब रही. छह रन पर उसका पहला विकेट गिर गया. सी नजेल (63) ने एक छोर थामे रखा लेकिन दूसरे छोर से रन नहीं बने. बाकी खिलाड़ी क्रीज पर रूके तो सही लेकिन रन नहीं बने. नतीजा यह रहा किे 20 ओवर का कोटा पूरा हो गया और टीम जीत से महरूम रह गई.

किसी टीम के नौ बल्‍लेबाजों के एक भी रन ना बनाने के बावजूद जीत जाने का यह संभवत: पहला मामला है. हालांकि इस तरह के वाकये पहले हो चुके हैं जब टीम के सारे बल्‍लेबाज रन बनाने में नाकाम रहे हो लेकिन ऐसा होने पर उनकी टीमों को भी हार झेलनी पड़ी थी.

रईस का ट्रेलर देखा, अब देखिए फिल्म की पूरी कहानी

'रईस' का ट्रेलर लॉन्च होते ही हिट हो गया है. इस फिल्म की कहानी का प्लॉट भी लोगों को समझ में आ गया होगा. लेकिन जब रईस के ट्रेलर ऑडियो को फेमस टीवी शो Narcos के साथ बनाया गया, तो पूरी फिल्म का स्टाइल समझ आ गया. ये Mashup बड़ी तेज़ी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. जिसे देख कर आपको भी लगेगा कि ये डायलॉग्स बिलकुल इस शो के ट्रेलर के लिए ही बने हैं.

वास्तव में धीरे धीरे यह राज खुल चुका है कि फिल्म ‘‘रईस’’ की कहानी गुजरात के शराब माफिया अब्दुल लतीफ के जीवन पर आधारित है. मूलतः गुजरात के अहमदाबाद शहर में अवैध शराब विक्रेता के रूप में बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर लेने वाले अब्दुल लतीफ का राजनीतिक नेताओं के साथ संबंध थे. उसने टीनएजर युवकों के हाथ बोटल में शराब भरकर लोगों तक पहुंचाने का जाल बिछा रखा था. वह गरीब मुस्लिम परिवारों की आर्थिक मदद भी करता था. जुए के अड्डे भी चलाता था. बाद में वह दाउद इब्राहिम से जुड़ गया था और 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट में भी वह आरोपी था.

गुजरात पुलिस ने 1995 में उसे दिल्ली से गिरफ्तार किया था. बाद में 1997 में जेल से भागते समय पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर दिया था. उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री शकर सिंह वाघेला थे. बाद में इसी गुस्से में अब्दुल लतीफ के बेटे शेख आरिफ अब्दुल लतीफ ने शंकर सिंह वाघेला के खिलाफ चुनाव भी लड़ा था. जब अब्दुल लतीफ के बेटों को पता चला कि फिल्म ‘रईस’ बन रही है, तो इसकी कहानी पता चलते ही अप्रैल 2016 में अब्दुल लतीफ के बेटे मुश्ताक लतीफ ने निर्माताओ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा अदालत में दायर किया.

मुश्ताक अब्दुल लतीफ के वकील ने अदालत से कहा था-‘‘फिल्म ‘रईस’ में उनके मुवक्किल के पिता को गलत ढंग से चित्रित किया जा रहा है. उनके पिता ‘टाडा’ में आरोपी थे. वह बोटल में शराब भरकर बेचने के आरोपी थे. लेकिन उन्होंने कभी भी वेश्यागृह नहीं चलाए. अब्दुल लतीफ ने शराब की बिक्री में औरतों का उपयोग नहीं किया. बल्कि मुश्ताक के पिता अब्दुल लतीफ तो गरीबों पर पैसा लुटाया करते थे.’’

वैसे अब्दुल लतीफ पर पहले शरीक मिन्हाज ने ‘‘लतीफः द किंग आफ क्राइम’’ बना चुके हैं. यह फिल्म 6 जून 2014 को प्रदर्शित हुई थी. सूत्र बताते हैं कि उसके बाद ही राहुल ढोलकिया और शाहरुख खान ने ‘रईस’ की योजना बनायी.

सूत्रों के अनुसार 25 जनवरी 2017 को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘रईस’’ की कहानी 80 के दशक के गुजरात की है. यह एक ऐसे इंसान की कहानी है, जिसने पूरे गुजरात में बोटलों में शराब भरकर बेचते हुए अपना बहुत बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया था. कहानी उसके आगे बढ़ने और उन रिश्तों की है, जिसकी वजह से पूरे राज्य में एकछत्र राज्य कायम हुआ था. रईस को किसी गैंगस्टर की बजाय एक अतिखडूस व्यापारी की कथा कहा जाना ज्यादा उचित होगा. जिसे किसी से डर नहीं लगता.

रईस (शाहरुख खान) ने निडरता से इस तरह से व्यापार किया कि उसने शोहरत भी पायी. गलत ढंग से बहुत पैसा कमाया. पर लोगों के बीच अपने आपको स्वीकार भी करवाया. वह हमेशा व्यापार को लेकर नए नए आइडिया सोचता रहा. उसने अपने शराब के व्यापार में हर किसी का उपयोग किया.

तो देर क्यों, आप भी देखें ये शानदार Mashup.

करण पटेल का गुस्सा

‘‘स्टार प्लस’’ पर प्रसारित हो रहे सीरियल ‘‘यह कैसी है मोहब्बतें’’ में रमन भल्ला का किरदार निभा रहे अभिनेता करण पटेल को टीवी इंडस्ट्री का सर्वाधिक गुस्सैल इंसान माना जाता है. यह एक कटु सत्य है. जिस तरह सीरियल ‘‘यह कैसी है मोहब्ते’’ में रमन को बात बात में गुस्सा आता है, उसी तरह करण पटेल को निजी जिंदगी में गुस्सा आता है. कई बार तो करण पटेल को यही नहीं पता होता कि उनके गुस्से की वजह क्या है?

ऐसा कई बार हो चुका है. यदि एक वेबसाइट की खबर को सच माना जाए, तो सिर्फ करण पटेल ही नहीं बल्कि पूरी टीवी इंडस्ट्री पर कई तरह के सवाल खड़े हो चुके हैं? इस वेब साइट के अनुसार मुंबई में सपन्न ‘‘स्टार परिवार अवार्ड’’ में करण पटेल ने सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में एक चैनल में कार्यरत लड़के की जमकर पिटायी कर दी.

सूत्र बताते हैं कि करण पटेल उस लड़के की पिटाई करते रहे और लोग मूक दर्शक की तरह तमाशा देखते रहे. किसी ने भी करण पटेल को रोकने की कोशिश नहीं की. कुछ समय बाद करण पटेल का गुस्सा ठंडा हुआ. तो उस लड़के ने करण पटेल से पूछा कि उसकी गलती क्या थी? इस पर करण पटेल बगले झांकने लगे. उन्हे खुद ही पता नहीं था कि उन्होंने उस लड़के की पिटाइ क्यों की.

खैर, करण पटेल ने बाद में उस लड़के से माफी मांग ली. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि अपने बेकाबू गुस्से की वजह से करण पटेल ने जो चोट उस लड़के को पहुंचाई, उसका क्या? इतना ही नहीं टीवी इंडस्ट्री से जुडे़ लोग कितने असंवेदनशील हो सकते हैं, इसका इस घटना से बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है.

कितनी अजीब बात है कि एक बेगुनाह लड़का एक स्टार कलाकार के हाथों पिटता रहा और लोग तमाशा देखते रहे? शायद उस वक्त वहां मौजूद लोग विवेक शून्य हो चुके थे. उनके अंदर का जमीर, ईमान, इंसानियत और भावनाएं मर चुकी थी. वह सभी तो सिर्फ पुतले मात्र थे.

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