Download App

योगेश्वर ने खींचे हाथ, बजरंग सबसे महंगे पहलवान

स्टार पहलवान योगेश्वर दत्त पेशेवर कुश्ती लीग (पीडब्ल्यूएल) के दूसरे सत्र में हिस्सा नहीं लेंगे. उन्होंने नीलामी में शामिल नहीं होने का फैसला किया जिसमें बजरंग पूनिया भारत के सबसे महंगे खिलाड़ी बनकर उभरे. उन्हें दिल्ली की फ्रेंचाइजी ने 38 लाख रुपये में खरीदा.

रियो ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता जॉर्जिया के व्लादिमेर खिनचेगाशविली को पंजाब ने 48 लाख रुपये में खरीदा और वह प्रो रेस्लिंग-2 के सबसे महंगे खिलाड़ी साबित हुए.

दिल्ली ने मारिया स्टैडनिक पर 47 लाख रुपये खर्च किये और इस तरह से वह नीलामी में सबसे महंगी महिला पहलवान बनी जबकि भारतीय स्टार साक्षी मलिक को केवल 30 लाख रुपये ही मिले.

यहां तक कि साक्षी मलिक को 2016 की राष्ट्रमंडल चैंपियनशिप की स्वर्ण पदक विजेता रितु फोगाट ने भी पीछे छोड़ दिया. उन्हें नई फ्रेंचाइजी जयपुर ने 36 लाख रुपये में खरीदा और इस तरह से वह सबसे महंगी भारतीय महिला पहलवान रहीं. फोगाट बहनों गीता, बबिता, रितु और संगीता चारों को कुल 70 लाख रुपये की राशि मिली.

साक्षी हालांकि नीलामी में कम धनराशि मिलने के बावजूद खुश थी क्योंकि उनके मंगेतर सत्यव्रत कादियान को भी दिल्ली ने खरीदा है. रियो ओलंपिक की कांस्य पदक विजेता ने कहा, मुझे खुशी है कि मैं उसी टीम में हूं जिसमें सत्यव्रत है.

लंदन ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता और पिछले साल हरियाणा की फ्रेंचाइजी से खेलने वाले योगेश्वर ने पहले भी कहा था कि उनका लीग में खेलना संदिग्ध है क्योंकि 2 से 19 जनवरी के बीच होने वाले टूनार्मेंट के दौरान ही उनकी शादी भी होनी है.

योगेश्वर ने कहा कि मेरी शादी और शादी से जुड़े कार्यक्रम भी इस दौरान होंगे, इसलिए मैंने इस साल पीडब्ल्यूएल में नहीं खेलने का फैसला किया. भारत के लिए दो ओलंपिक पदक जीतने वाले सुशील कुमार पहले ही लीग का हिस्सा नहीं हैं और अब योगेश्वर के हटने से इसकी चमक निश्चित तौर पर फीकी पड़ेगी.

नीलामी में 2016 के विश्व चैंपियन रूस के मागोमद कुबार्नालीव को 47 लाख और तीन बार की विश्व चैंपियन स्वीडन की सोफिया मैटसन को 41.50 लाख रुपये में खरीदा गया. इन दोनों को हरियाणा ने खरीदा. मुंबई ने एरिका वीब और जॉर्जिया के जाबरायिल हसनोव दोनों को 43-43 लाख रुपये में खरीदा जबकि नाईजीरिया की महिला पहलवान ओडुनायो आडुकुरोये को पंजाब ने 32 लाख रुपये में अपनी टीम से जोड़ा.

लंदन ओलंपिक के स्वर्ण पदक विजेता अजरबेजान के तोग्रुल असगारोव को पंजाब ने 35 लाख रुपये में खरीदा. पेशेवर कुश्ती लीग के दूसरे सत्र के लिए हुई नीलामी में 200 से अधिक पहलवानों ने किस्मत आजमाई जिनके लिए छह फ्रेंचाइजियों ने बोली लगाई.

विख्यात नीलामीकर्ता बॉब हेटन ने नीलामी का संचालन किया. नीलामी के दौरान पूर्व और मौजूदा विश्व चैम्पियन और ओलंपियन के लिए काफी उत्साह दिखा और फ्रेंचाइजियां उन्हें अपने साथ जोड़ने के लिए अतिरिक्त पैसा खर्च करने से भी पीछे नहीं हटी. टूनार्मेंट के 2016-17 सत्र में पंजाब और दिल्ली के अलावा मुंबई, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और जयपुर की फ्रेंचाइजी हिस्सा लेंगी.

नौ सदस्यीय टीम तैयार करने के लिए प्रत्येक टीम के पास दो करोड़ रुपये की राशि थी. टीम में पांच पुरुष और चार महिला पहलवानों को चुना जाना है जिसमें पांच भारतीय और चार अंतरराष्ट्रीय पहलवान हो सकते हैं.

अब वाट्स ऐप पर सेंट मेसेज को करें एडिट

मैसेजिंग सर्विस वाट्स ऐप जल्द ही एक नया फीचर लाने जा रहा है. पर वाट्स ऐप एक ऐसा फीचर लाने जा रहा है जिससे आप भेजे हुए मैसेज को भी एडिट कर सकते हैं. अब तक ऐसा कोई फीचर वाट्स ऐप पर नहीं था.

व्हाट्‍स ऐप पर कई बार कुछ भेजना होता है पर जल्दबाजी में कुछ और सेंट हो जाता है. एक बार मैसेज चले जाने के बाद किसी भी परिस्थिती में उसे एडिट नहीं किया जा सकता. ऑटोकरेक्ट के कारण भी कई बार दोस्तों को गलत मैसेज सेंट हो जाता है. कई बार मैसेज किसी को भेजना होता है, लेकिन जल्दबाजी में वो किसी और के पास चला जाता है. ये स्थिति भी खतरनाक होती है. ऐसी स्थितियों के लिए यह फीचर काफी मददगार साबित होने वाला है.

एक रिपोर्ट के मुताबिक वाट्स ऐप में जल्द ही ये फीचर जुड़ने वाला है जिसकी मदद से यूजर्स अपने भेजे हुए मैसेज को एडिट (सुधार) कर पाएंगे. यानी अगर किसी यूजर से गलत मैसेज चला गया है तो वो उसे आसानी से रि-एडिट कर पाएगा. कंपनी ने इस फीचर की टेस्टिंग शुरू कर दी है. हालांकि ये फीचर कब से एक्टिव या शुरू होगा इसके बारे में किसी तरह की कोई जानकारी नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक व्हाट्‍सएप के इस फीचर का नाम 'रिवोक' या 'एडिट' हो सकता है.

ट्विटर पर अकाउंट WABetaInfo ने एक स्क्रीन शॉट शेयर करके इसकी जानकारी दी. इसके मुताबिक वाट्स ऐप की सुविधाओं में मैसेज को वापस लेने, एडिट करने के फीचर को बीटा टेस्टर्स के लिए एड किया गया है. 

संवादहीनता की शिकार संसद

राज्यसभा के बाद लोकसभा में भी दिव्यांगों के भले के लिए सर्वसम्मति से पारित निशक्त व्यक्ति अधिकार विधेयक को छोड़ दिया जाए, तो जाते हुए साल का आखिरी संसदीय शीत सत्र अपनी निष्फलता के लिए ही याद किया जाएगा. कहना चाहें तो कह सकते हैं कि नोटबंदी या विमुद्रीकरण का सबसे गहरा और प्रतिकूल असर महीने भर के शीतकालीन सत्र पर ही पड़ा, जहां गिनाने भर को भी विधायी कार्य नहीं हो पाए.

गौरतलब है कि नोटबंदी पर जहां राज्यसभा में बीते महीने 16 नवंबर को महज एक दिन तो अधूरी चर्चा हुई भी, लेकिन लोकसभा में इस पर चर्चा तक नहीं हो सकी. लोकसभा में विपक्ष इस बात पर जोर दे रहा था कि नोटबंदी पर चर्चा मतदान के प्रावधान वाले नियम के तहत की जानी चाहिए, जबकि राज्यसभा में विपक्ष चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री की मौजूदगी की मांग को लेकर अड़ा रहा. इस तरह सत्ता पक्ष और विपक्ष की तनातनी और पैंतरेबाजी ने ऐसा गुल खिलाया कि पूरे सत्र की 21 बैठकों में जहां लोकसभा में महज 19 घंटे कार्यवाही हुई, वहीं अड़ंगेबाजी के कारण 91 घंटे 59 मिनट का समय नष्ट हुआ.

राज्यसभा का भी कुछ ऐसा ही हाल रहा, वहां 22 घंटे से थोड़ा अधिक काम हुआ जबकि 86 घंटे से भी ज्यादा समय हंगामे की भेंट चढ़ गया. इसलिए बहुत स्वाभाविक ही है कि शुक्रवार को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित शीत सत्र के मद्देनजर लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति ने गहरी चिंता जताते हुए अपनी बात कही है. जहां लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने कहा कि इससे जनता में हमारी छवि धूमिल होती है, वहीं राज्यसभा में सभापति हामिद अंसारी ने नाखुशी जाहिर करते हुए सभी पक्षों से आत्मविश्लेषण का आह्वान किया है.

हताशा, निराशा और क्षुब्ध माहौल के बीच शोर शराबा और बहिर्गमन की भेंट चढ़े शीत सत्र में फिर भी अजीब संवाद हीनता देखने को मिली, जब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विपक्षी सांसद राहुल गांधी ने अलग-अलग कहा कि हमें संसद में बोलने नहीं दिया जा रहा है. इसके इतर राज्यसभा में सत्र को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने से पहले अपने पारंपरिक संबोधन में हामिद अंसारी ने व्यवधान पर गहरी निराशा जताते हुए कहा उम्मीद थी कि दिसंबर 2013 में 221वें सत्र के समापन पर उन्होंने जो टिप्पणी की थी, उसे दोहराने की जरूरत नहीं होगी. लेकिन उनकी उम्मीदें गलत साबित हुईं. व्यंग्यात्मक लहजे में दरअसल उन्होंने सबकुछ कह दिया, जो कहा जा सकता था. उन्होंने कहा कि नियमित और लगातार व्यवधान इस सत्र की खासियत रही. हंगामे के कारण सदस्यों को सवालों और लोक महत्व के विभिन्न मुद्दों के तहत कार्यपालिका को जवाबदेह बनाने का मौका नहीं मिल सका.

अंसारी ने कहा कि नारेबाजी, पोस्टर दिखाने और कार्यवाही को बाधित किए जाने से संबंधित नियमों की सदन के सभी पक्षों द्वारा लगातार अवहेलना की गई. सदन में शांति सिर्फ उसी समय रही, जब दिवंगत लोगों को श्रद्धांजलि दी जा रही थी. इससे ज्यादा कहा भी क्या जा सकता था. बहरहाल, यही उम्मीद की जानी चाहिए कि संसद का अगला सत्र संवादहीनता का शिकार न हो और फलदायी हो.

नोटबंदी : इन सवालों का जवाब दें मोदी

सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटबंदी को लेकर सरकार से जवाब तलब करना जरूरी हो गया था, एक महीने का लंबा वक्त गुजर जाने के बावजूद ग्रामीण स्तर से लेकर मेट्रो शहरों तक स्थिति सामान्य से परे मालूम पड़ रही है. किसी भी लोकतांत्रिक देश में पहली बार ऐसा हुआ होगा कि उस देश के नागरिक को अपने पैसे निकालने में इतनी दुश्वारियों का सामना करना पड़ रहा है. लोगों को एक महीने व्यतीत हो जाने के बावजूद नोटबंदी की समस्याओं से निजात नहीं मिल पाई है, जोकि नोटबंदी को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा उठाए जा रहे सवालात को बल प्रदान करते हैं. तीस दिनों का लेखा-जोखा देखा जाए तो काला धन प्रतिदिन निकलकर सामने आ रहा है, लेकिन जिस तरीके से छापेमारी के दौरान नई नोटों के बंडल बरामद हो रहे हैं, वह सरकार की नोटबंदी को लेकर सुनियोजित तैयारी न होने की दिशा में संकेत व्यक्त करते हैं.

दक्षिण के राज्यों में लगातार व्यापक स्तर पर काली कमाई का भंडाफोड़ हो रहा है, जिसमें अच्छे-खासे स्तर पर नई नोटों की खपत भी बरामद हो रही है. फिर इसे देखकर यही ख्याल आता है कि आखिर सरकार की खामी कहां रह गई कि इस कदर नई नोटों की खेप कालाबाजारी करने वालों तक पहुंच गई और आम जनता एक महीने बाद भी एटीएम और बैंकों की कतार में लगकर अपने पैसे के इंतजार में दिख रही है. जिस देश की आधी से अधिक जनता गांवों में निवास करती हो, और वहां पर शिक्षा और बिजली जैसी मूलभूत समस्याओं से दो-चार हो रही हो, वहां पर कैशलेस सिस्टम कैसे काम कर सकता है. यह सवाल अब भी विचार-विमर्श का मुद्दा बना हुआ है.

हमारे देश की शिक्षा पद्धति इतनी हाईटेक नहीं हुई है कि दूरदराज के गांव और कस्बों में निवास करने वाली जनता इन माध्यमों से रूबरू हो सके, जहां आज भी बिजली पानी का अभाव है, जिसकी वजह से संचार के उपयुक्त साधन भी उपलब्ध नहीं हैं कि वे आपने आप को इतना सजग कर सकें कि अगर वे कैशलेस इकोनमी सिस्टम से जुड़ जाएं तो उनका सुरक्षित लेन-देन हो सके. जब वे बैंकिंग सुविधा में जागरूकता के अभाव में गुमराह हो जाते हैं, फिर मोबाइल-वायलेट आदि से वे कैसे स्वच्छ तरीके से कैशलेस व्यवस्था में योगदान कर सकते हैं. नोटबंदी से छोटे उद्योग-धंधे और ग्रामीण क्षेत्रों के साथ शहरों के मध्यम वर्ग के कारोबारियों को अभी भी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि उनका कारोबार प्रतिदिन की नकद आमदनी पर निर्भर होता है.

सरकार ने अभी तक लगभग तीस बार नोटबंदी के कानून को लेकर फेरबदल किया, जो इस बात का गवाह है कि नोटबंदी को लेकर सरकार की तरफ से पहले से व्यापक पहल की सरासर कमी थी, जो एक महीने बाद भी जाहिर हो रही है. किसान और आम आदमी मुसीबतों से पीड़ित नजर आ रहा है और सरकार कुछ दिन और समस्याएं होने की बात कह रही है. सुप्रीम कोर्ट का इस मसले पर सरकार से जवाब तलब करना स्वस्थ लोकतंत्र को सूचित करता है, क्योंकि कुछ फीसद लोगों के चक्कर में पूरे देश की आबादी को परेशानी में नहीं रखा जा सकता है.

विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश में युवाओं की पीढ़ी भले देश की आबादी की लगभग 50 फीसदी हो, लेकिन देश में केवल 34 करोड़ लोग की पहुंच इंटरनेट तक है, विश्व में दूसरे स्थान पर स्मार्टफोन यूजर्स की संख्या होने के बावजूद इनमें से अधिकतर कभी-कभार इंटरनेट का उपयोग करते हैं. भारत में मोबाइल कनेक्शन धारकों की संख्या भले 2 करोड़ है, लेकिन इनमें से केवल लगभग पंद्रह फीसद के पास ब्राडॅबैंड की सुविधा उपलब्ध है. फिर स्वीडन, बेल्जियम और ब्रिटेन की बराबरी के लिए भारत को अभी व्यापक स्तर पर होमवर्क करने की जरूरत है.

अभी भारतीय अर्थव्यवस्था में दो फीसद डिजिटल भुगतान होता है, जिसे आगे बढ़ाने में काफी समय लग जाएगा. भारत में इंटरनेट के संजाल को और व्यापक स्तर से फैलाने की जरूरत है, देश के दूरदराज के क्षेत्र अभी भी इस अद्भुत खिलौने से वाकिफ नहीं हैं. 4जी का जमाना आ जाने के बावजूद भी इंटरनेट की धीमी गति गले की फांस बनी हुई है. विकसित देशों की तुलना में क्रेडिड कार्ड और डेबिट कार्ड की स्वैपिंग मशीनें भी भारत में काफी कम हैं, प्रति दस लाख जनसंख्या पर लगभग 850 मशीनें ही डिजिटल भुगतान के दौर में काफी सिद्ध नहीं हो सकती हैं.

अब चेक पर लिखें भारतीय भाषाओं में

सरकार ने चैकबुक को हिंदी और अंग्रेजी में छापने और ग्राहकों को भी चैकों को हिंदी या संबंधित क्षेत्रीय भाषा में लिखने का ऑपशन देने का प्रस्ताव रखा है. वित्त राज्यमंत्री संतोष कुमार गंगवार ने लोकसभा में विनोद लखमाशी चावड़ा और डी एस राठौड़ के प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा कि भारतीय रिजर्व बैंक ने ग्रामीण जनसंख्या को सरलता से समझाने के लिए अन्य बातों के साथ-साथ, बैंकिंग क्षेत्र में क्षेत्रीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा देने के कई निर्देश जारी किये हैं.

उन्होंनें कहा कि बैंकिग सुविधाएं देश की जनसंख्या के बड़े तबके तक पहुंचाने के लिए बैंकों को खाता खोलने वाले फॉर्म, जमा पर्ची, पासबुक समेत ग्राहकों द्वारा इस्तेमाल प्रिंटिड मैटिरियल को अंग्रेजी, हिंदी और संबंधित क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध कराना चाहिए. मंत्री ने कहा कि सभी चैक फॉर्म को हिंदी और अंग्रेजी में प्रिंट किया जाना चाहिए. ग्राहक चैकों को हिंदी, अंग्रेजी या संबंधित क्षेत्रीय भाषा में लिख सकते हैं.

अन्य निर्देशों में गंगवार ने बताया कि सभी पटलों पर अंग्रेजी, हिंदी के साथ-साथ कि ग्राहकों के साथ पत्राचार समेत ग्राहकों के साथ बैंकों द्वारा कारोबार करने में हिंदी और क्षेत्रीय संबंधित क्षेत्रीय भाषा में साइन बोर्ड को प्रदर्शन करना शामिल है. इसमें कहा गया भाषाओं का उपयोग किया जाएगा.

जी हां! एक खिलाड़ी से भी बनती है टीम

क्रिकेट इतिहास में शायद ही कभी ऐसा देखने को मिला होगा जब टीम के एक ही खिलाड़ी ने रन बनाए हों और बाकी सभी खिलाड़ी खाता भी न खोल पाए हों. साउथ-अफ्रीका के प्रिटोरिया में खेले जा रहे साउथ-अफ्रीका अंडर-19 महिला क्रिकेट टूर्नामेंट में ऐसा देखने को मिला. यहां टीम की एक खिलाड़ी ने 160 रन बनाए जबकि अन्य 9 बल्लेबाज शून्य रन पर यानी बिना खाता खोले मैदान से लौटे. बावजूद इसके टीम जीत दर्ज करने में सफल रही.

यह अद्भुत मैच पुमालंगा और ईस्‍टर्नस के बीच खेला गया. हुआ यूं कि पुमालंगा टीम की ओर से शानिया ली स्‍वार्ट ने 160 रन की पारी खेली. स्‍वार्ट ने अपनी पारी में 144 रन चौके और छक्‍कों से बनाए. उन्‍होंने नाबाद पारी में 86 गेंद का सामना किया और 18 चौके व 12 छक्‍के लगाए. लेकिन उनके अलावा पुमालंगा टीम की बाकी प्‍लेयर्स खाता भी नहीं खोल पाईं. टीम के स्‍कोर में नौ रन एक्‍स्‍ट्रा के रूप में जुड़े.

स्वार्ट क्रीज में मौजूद रहीं और उनके सामने साथी आठ बल्‍लेबाज जीरो पर वापस पवैलियन लौट गईं. पुमालंगा की ओर से सबसे बड़ी साझेदारी 10वें विकेट के लिए 61 रन की हुर्इ. स्‍वार्ट ने निकोलेट फिरी के साथ यह पार्टनरशिप की. इसमें फिरी ने तीन गेंद का सामना किया और वह भी नाबाद लौटीं.

पुमालंगा टीम की हालत इतनी खराब रही कि कोई भी बल्‍लेबाज 10 से ज्‍यादा गेंद का सामना ही नहीं कर पाईं. स्‍वार्ट ने 86 गेंद खेली और उनके बाद सी स्‍वानपूल ने 10 गेंदों का सामना किया. ईस्‍टर्न की ओर से कुल आठ गेंदबाजों ने बॉलिंग की. खोजा मासिंगीता ने चार ओवर में 15 रन दिए और पांच विकेट निकाले.

लक्ष्‍य का पीछा करने उतरी ईस्‍टर्न टीम की शुरुआत भी खराब रही. छह रन पर उसका पहला विकेट गिर गया. सी नजेल (63) ने एक छोर थामे रखा लेकिन दूसरे छोर से रन नहीं बने. बाकी खिलाड़ी क्रीज पर रूके तो सही लेकिन रन नहीं बने. नतीजा यह रहा किे 20 ओवर का कोटा पूरा हो गया और टीम जीत से महरूम रह गई.

किसी टीम के नौ बल्‍लेबाजों के एक भी रन ना बनाने के बावजूद जीत जाने का यह संभवत: पहला मामला है. हालांकि इस तरह के वाकये पहले हो चुके हैं जब टीम के सारे बल्‍लेबाज रन बनाने में नाकाम रहे हो लेकिन ऐसा होने पर उनकी टीमों को भी हार झेलनी पड़ी थी.

रईस का ट्रेलर देखा, अब देखिए फिल्म की पूरी कहानी

'रईस' का ट्रेलर लॉन्च होते ही हिट हो गया है. इस फिल्म की कहानी का प्लॉट भी लोगों को समझ में आ गया होगा. लेकिन जब रईस के ट्रेलर ऑडियो को फेमस टीवी शो Narcos के साथ बनाया गया, तो पूरी फिल्म का स्टाइल समझ आ गया. ये Mashup बड़ी तेज़ी से सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है. जिसे देख कर आपको भी लगेगा कि ये डायलॉग्स बिलकुल इस शो के ट्रेलर के लिए ही बने हैं.

वास्तव में धीरे धीरे यह राज खुल चुका है कि फिल्म ‘‘रईस’’ की कहानी गुजरात के शराब माफिया अब्दुल लतीफ के जीवन पर आधारित है. मूलतः गुजरात के अहमदाबाद शहर में अवैध शराब विक्रेता के रूप में बहुत बड़ा मुकाम हासिल कर लेने वाले अब्दुल लतीफ का राजनीतिक नेताओं के साथ संबंध थे. उसने टीनएजर युवकों के हाथ बोटल में शराब भरकर लोगों तक पहुंचाने का जाल बिछा रखा था. वह गरीब मुस्लिम परिवारों की आर्थिक मदद भी करता था. जुए के अड्डे भी चलाता था. बाद में वह दाउद इब्राहिम से जुड़ गया था और 1993 के मुंबई बम ब्लास्ट में भी वह आरोपी था.

गुजरात पुलिस ने 1995 में उसे दिल्ली से गिरफ्तार किया था. बाद में 1997 में जेल से भागते समय पुलिस ने उसका एनकाउंटर कर दिया था. उस वक्त गुजरात के मुख्यमंत्री शकर सिंह वाघेला थे. बाद में इसी गुस्से में अब्दुल लतीफ के बेटे शेख आरिफ अब्दुल लतीफ ने शंकर सिंह वाघेला के खिलाफ चुनाव भी लड़ा था. जब अब्दुल लतीफ के बेटों को पता चला कि फिल्म ‘रईस’ बन रही है, तो इसकी कहानी पता चलते ही अप्रैल 2016 में अब्दुल लतीफ के बेटे मुश्ताक लतीफ ने निर्माताओ के खिलाफ मानहानि का मुकदमा अदालत में दायर किया.

मुश्ताक अब्दुल लतीफ के वकील ने अदालत से कहा था-‘‘फिल्म ‘रईस’ में उनके मुवक्किल के पिता को गलत ढंग से चित्रित किया जा रहा है. उनके पिता ‘टाडा’ में आरोपी थे. वह बोटल में शराब भरकर बेचने के आरोपी थे. लेकिन उन्होंने कभी भी वेश्यागृह नहीं चलाए. अब्दुल लतीफ ने शराब की बिक्री में औरतों का उपयोग नहीं किया. बल्कि मुश्ताक के पिता अब्दुल लतीफ तो गरीबों पर पैसा लुटाया करते थे.’’

वैसे अब्दुल लतीफ पर पहले शरीक मिन्हाज ने ‘‘लतीफः द किंग आफ क्राइम’’ बना चुके हैं. यह फिल्म 6 जून 2014 को प्रदर्शित हुई थी. सूत्र बताते हैं कि उसके बाद ही राहुल ढोलकिया और शाहरुख खान ने ‘रईस’ की योजना बनायी.

सूत्रों के अनुसार 25 जनवरी 2017 को प्रदर्शित होने वाली फिल्म ‘‘रईस’’ की कहानी 80 के दशक के गुजरात की है. यह एक ऐसे इंसान की कहानी है, जिसने पूरे गुजरात में बोटलों में शराब भरकर बेचते हुए अपना बहुत बड़ा साम्राज्य खड़ा कर लिया था. कहानी उसके आगे बढ़ने और उन रिश्तों की है, जिसकी वजह से पूरे राज्य में एकछत्र राज्य कायम हुआ था. रईस को किसी गैंगस्टर की बजाय एक अतिखडूस व्यापारी की कथा कहा जाना ज्यादा उचित होगा. जिसे किसी से डर नहीं लगता.

रईस (शाहरुख खान) ने निडरता से इस तरह से व्यापार किया कि उसने शोहरत भी पायी. गलत ढंग से बहुत पैसा कमाया. पर लोगों के बीच अपने आपको स्वीकार भी करवाया. वह हमेशा व्यापार को लेकर नए नए आइडिया सोचता रहा. उसने अपने शराब के व्यापार में हर किसी का उपयोग किया.

तो देर क्यों, आप भी देखें ये शानदार Mashup.

करण पटेल का गुस्सा

‘‘स्टार प्लस’’ पर प्रसारित हो रहे सीरियल ‘‘यह कैसी है मोहब्बतें’’ में रमन भल्ला का किरदार निभा रहे अभिनेता करण पटेल को टीवी इंडस्ट्री का सर्वाधिक गुस्सैल इंसान माना जाता है. यह एक कटु सत्य है. जिस तरह सीरियल ‘‘यह कैसी है मोहब्ते’’ में रमन को बात बात में गुस्सा आता है, उसी तरह करण पटेल को निजी जिंदगी में गुस्सा आता है. कई बार तो करण पटेल को यही नहीं पता होता कि उनके गुस्से की वजह क्या है?

ऐसा कई बार हो चुका है. यदि एक वेबसाइट की खबर को सच माना जाए, तो सिर्फ करण पटेल ही नहीं बल्कि पूरी टीवी इंडस्ट्री पर कई तरह के सवाल खड़े हो चुके हैं? इस वेब साइट के अनुसार मुंबई में सपन्न ‘‘स्टार परिवार अवार्ड’’ में करण पटेल ने सैकड़ों लोगों की मौजूदगी में एक चैनल में कार्यरत लड़के की जमकर पिटायी कर दी.

सूत्र बताते हैं कि करण पटेल उस लड़के की पिटाई करते रहे और लोग मूक दर्शक की तरह तमाशा देखते रहे. किसी ने भी करण पटेल को रोकने की कोशिश नहीं की. कुछ समय बाद करण पटेल का गुस्सा ठंडा हुआ. तो उस लड़के ने करण पटेल से पूछा कि उसकी गलती क्या थी? इस पर करण पटेल बगले झांकने लगे. उन्हे खुद ही पता नहीं था कि उन्होंने उस लड़के की पिटाइ क्यों की.

खैर, करण पटेल ने बाद में उस लड़के से माफी मांग ली. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि अपने बेकाबू गुस्से की वजह से करण पटेल ने जो चोट उस लड़के को पहुंचाई, उसका क्या? इतना ही नहीं टीवी इंडस्ट्री से जुडे़ लोग कितने असंवेदनशील हो सकते हैं, इसका इस घटना से बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है.

कितनी अजीब बात है कि एक बेगुनाह लड़का एक स्टार कलाकार के हाथों पिटता रहा और लोग तमाशा देखते रहे? शायद उस वक्त वहां मौजूद लोग विवेक शून्य हो चुके थे. उनके अंदर का जमीर, ईमान, इंसानियत और भावनाएं मर चुकी थी. वह सभी तो सिर्फ पुतले मात्र थे.

अदालत का मानवीय फैसला

तलाक के एक मामले में जिस में पति ने पत्नी से छुटकारा पाने के लिए बेटी के डीएनए टैस्ट तक की मांग कर डाली थी कि वह उस की अपनी बेटी नहीं है, सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी से ज्यादा मानवीय फैसला कर के समस्या को सुलझा दिया. उच्च न्यायालय में भी पति ने पत्नी से अलगाव के बाद यह मामला उठाया था पर उच्च न्यायालय ने इनकार कर दिया था. सुप्रीम कोर्ट में भी इस मामले पर डीएनए टैस्ट की मांग को ठुकरा दिया गया पर पतिपत्नी का तलाक मंजूर कर लिया गया.

दोनों अब अपनीअपनी जिंदगी जिएंगे. न कोई गुजारा खर्च, न बेटी को पालने का खर्च, न पति को बेटी से मिलने का हक, न बेटी को पिता की संपत्ति में हक यानी संबंध पूरी तरह से अलग.

लड़तेझगड़ते पतिपत्नी का यह हल सब से सही है और चाहे किसी भी धर्म के पतिपत्नी हों, कानून ऐसा ही होना चाहिए और यह अलगाव देने का हक सब से निचली अदालत को हो और वहां से अपील का हक भी न हो.

अगर मामला अदालत में चला गया तो चाहे गलत कोई भी हो, दुनिया की कोई भी ताकत पतिपत्नी को फिर से एक बिस्तर पर एकदूसरे की बांहों में सोने को मजबूर नहीं कर सकती. बच्चों की खातिर अगर अदालतें तलाक देने में देर लगाएं या इनकार करें तो यह भी बच्चों पर अन्याय है. पिता या मां अगर किसी और को चाहने लगें या एकदूसरे से घृणा करने लगें तो पैसा या कानूनी हक बेकार हो जाता है. विवाद की चक्की में बच्चे पिसते हैं तो यह एक दुर्घटना समझा जाना चाहिए जिस में बैठे लोग न गाड़ी चला रहे थे न कोई गलत काम कर रहे थे. बच्चे मातापिता के गलत फैसलों के शिकार होते हैं तो होने दें, क्योंकि तलाक को रोक कर अदालतें बच्चों का भला नहीं कर सकतीं.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला तिहरे तलाक के मामले में भी आदर्श है. जब मुसलिम पति पत्नी को तलाक देना चाहता है तो कैसे दिया जाए, उस का क्या अर्थ रह जाता है?

धार्मिक कानून कुछ भी कहता रहे, तलाक तो होगा ही. तिहरा या ट्रिपल नहीं तो किसी और ढंग से. समान व्यक्तिगत कानून इस तलाक को नहीं रोक सकता. पतिपत्नी में झगड़ा हो तो काजी कुछ नहीं कर सकता. 2-3 पेशियों के बाद अदालत पहुंचे हर युगल को ही नहीं, हर पति या पत्नी को तलाक मिल जाना चाहिए. उस पतिपत्नी को सुप्रीम कोर्ट तक जाना पड़ा यही अफसोस की बात है.

 

     

साहसी बनें

महान जहाजी कोलंबस अपनी सारी सुविधाएं और बेहतर नौकरी छोड़ कर दुस्साहसिक यात्राओं पर निकल पड़ते थे. ह्वेनसांग और फाह्यान तो पैदल ही चीन से हिमालय के मुश्किल रास्तों व बाधाओं को लांघते हुए भारत पहुंचे थे. इस दौरान उन पर कई हमले हुए, उन्हें अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ी, लेकिन वे डिगे नहीं.

10वीं से 14वीं सदी के बीच जब खोजी यात्री अपने घरों से निकलते थे, तो उन की वापस जिंदा लौटने की उम्मीदें न के बराबर होती थीं. जब वे अपने वतन को लौटते, तो इसे उन का नया जन्म माना जाता था. उन की इसी साहसिक प्रवृत्ति ने लोगों को दुनिया के अनजाने देशों, जगहों, जंगलों और खतरों से रूबरू कराया. साहस जब ज्ञान और लोकोपयोग से जुड़ जाता है तो वह जीवन को बदलता है, नए प्रभाव डालता है.

साहसी बनो

अपने अधिकारों के लिए साहसी बनो, कमजोरों के लिए साहसी बनो, हार को सहने के लिए साहसी बनो, खुद को मजबूत करने के लिए साहसी बनो, उन्हें माफ करने के लिए साहसी बनो जिन्होंने तुम्हारे साथ गलत किया.

साहस जितना छोटा शब्द है, उतना ही करिश्माई भी है. साहस के सामने दुनिया की महाशक्तियां भी बौनी पड़ चुकी हैं. साहस ने युग बदले हैं. बड़ी से बड़ी ताकत के नशे में चूर सत्ताओं को इस ने धूल में मिलाया है. तानाशाहों की अकड़ ढीली की है. उन्हें नेस्तनाबूद किया है.

साहस का अन्याय और प्रतिकार से गजब का रिश्ता है. दुनिया के सभी शास्त्रों में साहस सभी मानवीय गुणों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है. पुराने जमाने में साहसी लोग समाज के नायक माने जाते थे. उन्हें खास सम्माननीय दर्जा मिलता था. यह साहस ही है, जिस ने इस धरती को बदला, सभ्यताओं के लिए रास्ते बनाए, बेहतर जीवनशैली और विचारों के लिए जगह बनाई.

साहस का इतिहास उतना ही पुराना है, जितना लंबा मानवीय इतिहास. हजारोंलाखों साल के मानवीय सफर में साहसी लोगों को दबाने की भी चेष्टाएं हुईं, लेकिन हर बार वे कुंदन की तरह तप कर सामने आए, हर बार उन्होंने अनूठी परिभाषा गढ़ी.

साहस का रिश्ता न तो लंबीचौड़ी कदकाठी से होता है और न धनदौलत और ताकत की अकड़ से. मोहनदास करमचंद गांधी दुबलेपतले थे. अपने साहस के बल पर उन्होंने अंगरेजी सत्ता को हिला दिया, जिस के बारे में कहा जाता था कि सूरज तो अस्त हो सकता है, लेकिन अंगरेजों के साम्राज्य का सूरज कभी अस्त नहीं हो सकता.

आंग सान सू की का बचपन और जवानी ऐशोआराम में बीती थी. म्यांमार में ही उन की पढ़ाईलिखाई हुई थी, लेकिन बाद में वे विदेश में बस गई थीं. जब वे अपने पिता के देश म्यांमार लौटीं तो न तो उन का मकसद वहां रुकने का था, न ही वहां की राजनीति में दिलचस्पी थी. वे 80 के दशक में वहां बीमार मां की देखभाल के लिए गई थीं. पिता को सेना कब का सत्ता से बेदखल कर चुकी थी. म्यांमार में उन्होंने जनता को परेशान हाल में पाया. सेना का दमनचक्र जारी था. इसलिए वहां आंदोलन और प्रदर्शन हो रहे थे.

ऐसे में सान की अंतरात्मा ने आवाज दी और वे आंदोलन में कूद पड़ीं. उन का अन्याय से लड़ने का साहस बढ़ता गया. उन्होंने चुनाव जीता, लेकिन सत्ता पर आसीन सैनिक शासकों ने उन्हें फरमान सुनाया कि या तो देश से बाहर चली जाओ या फिर ताजिंदगी घर में नजरबंद हो कर बिताओ. उन्होंने विदेश लौट कर आलीशान जिंदगी जीने के बजाय घर में नजरबंद रहना उचित समझा. वर्तमान में वे म्यांमार की स्टेट काउंसलर हैं.

इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जब हम किसी अच्छे उद्देश्य के लिए समाज की प्रचलित मान्यताओं और धारा के खिलाफ खड़े हो जाते हैं.

दरअसल, महान लक्ष्य हमेशा साहस देता है और तब बाधाएं तथा जीवन का भय छोटा लगने लगता है. समाज या देश में सच्चा नायक बनने की प्रवृत्ति भी साहस को कई गुना बढ़ा देती है.

जाहिर सी बात है कि साहस तभी आता है, जब आप के पास एक मकसद हो, जनून हो, लगन हो. कह सकते हैं कि साहस एक जिजीविषा है, इस का स्थान ज्यादा बड़ा इसलिए भी हो जाता है कि इस प्रवृत्ति से समाज और मानवता को लाभ पहुंचा है. साहस जब ज्ञान और लोकोपयोग से जुड़ जाता है तो वह जीवन को बदलता है, नए प्रभाव डालता है.

मध्यकाल में लौर्ड व्यवस्था को बदलना कोई आसान काम नहीं था. बड़े विद्रोह भी हुए. हजारों मजदूर, दास और किसान मारे गए, लेकिन इन्हीं लोगों के साहस ने मध्ययुग के अंधेरे को भी हराया.

मुट्ठीभर लोग ही ऐसा जीवट क्यों दिखाते हैं

हालत और समय जब भी कोई मुश्किल चुनौती पेश करते हैं और साहस की परीक्षा का समय आता है तो ज्यादातर लोग हिम्मत नहीं जुटा पाते. ऐसे मौके अकसर जिंदगी में आते हैं. ऐसे में यह सवाल लाजिमी है कि साहस कुछ मुट्ठीभर लोगों में ही क्यों होता है. इसे ले कर मनोवैज्ञानिकों की असली दिलचस्पी पिछली सदी के आखिर में जगी. कई किताबें लिखी गईं. मनोवैज्ञानिकों ने कई पहलुओं से इस पर काम किया. साल 2004 में क्रिस्टोर पैटरसन और मार्टिन सेलिगमन की किताब ‘चरित्र, क्षमता और नैतिक गुण’ प्रकाशित हुई, जिस में साहस के मनोविज्ञान पर खासतौर पर प्रकाश डाला गया है. उसे जीवन के उत्कृष्ट नैतिक गुणों से जोड़ा गया.

इन दोनों मनोवैज्ञानिकों ने साहस को 6 खास मानवीय गुणों के साथ जोड़ा, जो 6 खास मानवीय गुण उन्होंने मानव में देखे, वे हैं, विवेक, ज्ञान, साहस, मानवता, न्याय और संयम.

यूनिवर्सिटी औफ ब्रिटिश कोलंबिया के स्टेनली जे रेचमन ने 1970 में भय और साहस का अध्ययन किया. उन्होंने पाया कि पैराशूटर्स जब विमान से पहली बार कूदते हैं तो उन का व्यवहार हवा में कूदने से पहले 3 तरह का होता है, कुछ लोग बहुत ज्यादा डरते हैं और इस के चलते वे हिम्मत छोड़ देते हैं और कूदने से पहले पसीनापसीना हो जाते हैं. उन के हाथपैर सुन्न होने लगते हैं और चूंकि वे अभी विमान के बोर्ड पर ही होते हैं, लिहाजा, कूदने से मना कर देते हैं.

दूसरी तरह के लोग निर्भीक होते हैं, कोई डर नहीं दिखाते, न पसीने से तरबतर होते हैं, न उन की आवाज कंपकंपाती है. बड़ी शांति के साथ हवा में छलांग लगा देते हैं. उन्हें इस में कोई दिक्कत नहीं होती. तीसरी तरह के लोग हालांकि कूदने से पहले डरे जरूर होते हैं, लेकिन जब हवा में कूदने का समय आता है तो वे झिझकते नहीं हैं.

डा. रेचमन ने माना कि ये आखिरी तरह के लोग ही सब से साहसी होते हैं. जो डर महसूस करने के बाद भी काम को अंजाम देते हैं.

दार्शनिक और महान चिंतकों ने साहस के प्रदर्शन का सब से बेहतर स्थल युद्ध के मैदान को माना. उन्होंने हमेशा कहा कि असली साहस का प्रदर्शन वास्तव में एक सैनिक करता है, जो अपने दुश्मन से यह जानते हुए भिड़ने के लिए तैयार रहता है कि इस में उस की मौत भी हो सकती है. कुछ का कहना है कि बहादुर लोग वे होते हैं, जिन में भय लेशमात्र भी नहीं होता.

साहस का वैज्ञानिक पहलू

विज्ञान साहस को अलग तरह से देखता है. वैज्ञानिक लगातार यह प्रयोग करने में लगे हैं कि मनुष्यों में साहस, कायरता या जोखिम उठाने की प्रवृत्ति क्यों होती है? आखिर हम में चंद लोग कुछ खास क्षणों में किस तरह साहस का परिचय देते हैं.

इसराईल के वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क के उस हिस्से में होने वाली प्रक्रिया का पता लगाया, जहां मानवीय साहस और बहादुरी के तत्त्व होते हैं. उन के अनुसार, मनुष्य के मस्तिष्क में एक भाग होता है, जिसे सब जेनुअल एनटेरियर सिंगुलर कार्टेक्स कहा जाता है. यह तब सक्रिय होता है, जब व्यक्ति कोई साहस भरा काम करता है.

इस खोज से हो सकता है कि आने वाले समय में लोगों के भय को दूर करने में मदद मिले. वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि भय और साहस के क्षणों में हमारा ब्रेन सिकुड़ता और फैलता भी है. इस शोध के दौरान यह भी पता चला कि विभिन्न स्थितियों में अलगअलग तरह के मानवीय व्यवहार के दौरान मस्तिष्क किस तरह काम करता है.

वैज्ञानिक एक और अलग तरह के शोध पर भी काम कर रहे हैं. इस के जरिए वे यह जानने की कोशिश करेंगे कि कुछ लोग कुछ मौकों पर क्यों दूसरों की तुलना में ज्यादा साहसी और पराक्रमी साबित होते हैं. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जब बहुत से लोग आपदाओं, दुर्घटनाओं या भयभीत कर देने वाली घटनाओं के समय विचलित नहीं होते बल्कि ठंडे दिमाग से इन परिस्थितियों का सामना करते हुए इस से निकलने के बारे में सोचते हैं.

बहुत से लोग इसलिए महान बने, क्योंकि उन्हें डर से निबटना आता था, वे उस पर जीत हासिल करना जानते थे. यह तो तय है कि कुछ लोगों के शरीर और दिमाग में कुछ ऐसे तत्त्व होते हैं, जो उन्हें पैदा होते ही डर पर जीत हासिल करना सिखा देते हैं, ये तत्त्व जीन में भी हो सकते हैं. वैसे बच्चों में बहादुरी की भावना आमतौर पर ज्यादा होती है. ऐसे बहुत से उदाहरण हैं, जब बच्चों ने जान जोखिम में डाल कर दूसरों को बचाया.

साहस और सकारात्मकता

साहस का सकारात्मकता से बहुत गहरा रिश्ता है. यह सकारात्मकता ही तो थी जिस से कोपर्निकस, अरस्तु, सुकरात जैसे लोग बड़े उद्देश्य के लिए साहस का प्रदर्शन कर पाए. हमेशा आप के आसपास ऐसे ढेरों लोग होते हैं, जो अपनी नकारात्मकता से आप को भ्रमित या भयभीत कर सकते हैं. ऐसे लोग हर युग में हुए हैं, लेकिन सकारात्मक दृष्टिकोण लाते ही नकारात्मक पहलू कमजोर दिखाई देते हैं. हम बड़ेबड़े साहस के काम कर गुजरते हैं.

सकारात्मकता नैतिक साहस को बढ़ाती है. आमतौर पर युगों को बदलने वाले नायकों में ऐसे ही लक्षण देखने को मिलते हैं. प्लेटो ने कहा था कि साहस हमें डर से मुकाबला करना सिखाता है. साहस हम सभी के भीतर होता है, बस, जरूरत उसे बाहर लाने की होती है.   

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें