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चुनावी जुमला साबित हुई मोदी की सीख

परिवारवाद पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सीख चुनावी जुमला साबित हुई. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सांसदो से अपने करीबी रिश्तेदारों को चुनावी टिकट दिलाने की पैरवी करने से मना किया था. प्रधानमंत्री ने इस बहाने पार्टी में परिवारवाद को रोकने का दिखावा किया था.

भाजपा जैसे जैसे उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों के नाम फाइनल करती जा रही है परिवारवाद की नई परिभाषा सामने आती जा रही है.

भाजपा ने केवल अपने ही दल के नेताओं और उनके परिवार वालों को ही टिकट नहीं दिया बल्कि दलबदल करने वाले नेताओं के परिवार वालों को भी टिकट दे दिया है. राजनीतिक शुचिता, ईमानदारी और पार्टी विद डिफरेंस का दावा करने वाली भाजपा चुनावी हमाम में दूसर दलों से भी बदत्तर साबित हुई है. पार्टी जिस तरह से अपने वसूलों और सिद्धान्तों की दुहाई देती रही है वह इस चुनाव में तारतार नजर आ रहे हैं.

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मलिहाबाद सीट से भाजपा से मोहनलालगंज लोकसभा सीट के सांसद कौशल किशोर की पत्नी जय देवी को टिकट दिया है. कौशल किशोर कम्यूनिस्ट विचारधारा के नेता हैं. वह उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे थे. लोकसभा चुनाव में कौशल किशोर भाजपा में शामिल हुये. अब वह मोहनलालगंज लोकसभा से सांसद हैं उनकी पत्नी जय देवी को भाजपा ने मलिहाबाद विधानसभा से टिकट दे कर विधानसभा चुनाव में उतार दिया है. कौशल किशोर तो लोकसभा चुनाव में भाजपा में शामिल हुये थे. विधानसभा चुनाव में बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हुये स्वामी प्रसाद मौर्य को भाजपा ने पडरौना से उनके पुत्र उत्कर्ष मौर्य का ऊंचाहार सीट से टिकट दिया है.

उत्तराखंड में भी भाजपा ने यही किया है. कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आये यशपाल आर्य के बेटे संजीव को नैनीताल से और विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ को सितारगंज से टिकट दिया गया है.

यह तो केवल नजीर भर है. इसके अलावा भाजपा के कई बड़े नेताओं के पुत्रों को भी टिकट दिया गया. इन बड़े नेताओं में राजनाथ सिंह के पुत्र पंकज सिंह, कल्याण सिंह के पौत्र संदीप सिंह, प्रेमलता कटियार की बेटी नीलिमा कटियार, हुकुम सिंह की बेटी मृगांका सिंह, ब्रहमदत्त द्विवेदी के बेटे मेजर सुनील दत्त द्विवेदी, लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन और भुवनचन्द्र खंडूरी की बेटी रितु यमकेश्वर के नाम प्रमुख हैं.

भाजपा परिवारवाद के नाम पर दूसरे दलों की हमेशा से ही आलोचना करती रही है. इसके बाद भी जिस तरह से परिवार के लोगों को टिकट दिया गया है उससे उसका चेहरा उजागर हो गया है. राजनीतिक समीक्षक योगेश श्रीवास्तव कहते हैं, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में भाजपा मोदी के चेहरे को आगे कर वोट लेना चाहती थी. इस कारण ही उसने मुख्यमंत्री का अपना कोई चेहरा सामने नहीं किया. चुनाव के करीब आने और सपा-कांग्रेस के गठजोड़ के बाद भाजपा को अपने बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद नहीं दिख रही. ऐसे में वह हर तरह के समझौते कर रही है.

लेखक और समीक्षक नागेन्द्र बहादुर सिंह चैहान कहते हैं, भाजपा ने पहली बार अपने कैडर के नेताओं की उपेक्षा की है. पार्टी में पूरी तरह से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के स्तर पर फैसले हो रहे हैं. प्रदेश स्तर पर किसी बड़े नेता की राय का कोई महत्व नहीं रह गया है. परिवारवाद के अलावा सबसे अधिक दलबदलू नेताओं को टिकट दिया गया है. इससे भाजपा को चुनाव में भीतरघात का प्रबल खतरा दिख रहा है’.

बुजुर्गों को मिला बजट से पहले तोहफा

बजट को लेकर आम जनता में और टी वी चैनलों पर भी गहमागहमी जारी है. इस बार का बजट ऐतिहासिक होगा, क्योंकि इस बार 1 फरवरी को ही बजट पेश कर दिया जाएगा. नोटबंदी के बाद से ही जनता की भी धड़कने बढ़ी हुई हैं कि न जाने बजट के पिटारे में से कौन कौन से चौंकाने वाले तोहफें निकल आए.

पर बजट आने से पहले वरिष्ठ नागरिकों के लिए एक खुशखबरी मिली है. कैबिनेट ने एक अहम फैसला लेते हुए 'वरिष्ठ नागरिक पेंशन योजना 2017' को मंजूरी दे दी है. इसके अंतर्गत बीमा कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) गारंटी के साथ 10 साल के लिए 8 प्रतिशत रिटर्न उपलब्ध कराएगी.

इस योजना के तहत पेंशन के लिए मासिक, तिमाही, छमाही व सालाना आधार पर भुगतान का विकल्प चुना जा सकता है. मौजूदा वित्त वर्ष में इस योजना का कार्यान्वयन एलआईसी करेगी. इस योजना का लक्ष्य 60 साल व अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध कराना है. इसके जरिए उन्हें बाजार की अनिश्चित परिस्थितियों के विरुद्ध सुरक्षा दी जायेगी.

इस योजना को कैबिनेट से मंजूरी मिल गई है. पर अभी इसे लागू करने का दिन तय नहीं किया गया है. सरकार ने यह पूरी तरह साफ कर दिया है कि यह स्कीम निवेश के लिए सिर्फ एक साल तक ही खुली रहेगी. यानी जब से यह स्कीम लागू होगी उससे सिर्फ एक साल के भीतर तक बुजुर्ग इस स्कीम में निवेश कर सकते हैं.

मैच खेले बिना ही ‘मैन ऑफ द मैच’ बन गए थे ये खिलाड़ी

क्या आप सोच सकते हैं किसी प्लेयर को बिना मैच खेले मैन ऑफ द मैच का अवार्ड मिल सकता है? नहीं ना, लेकिन ऐसा ही हुआ है 1993 में, जब साउथ अफ्रीकी क्रिकेटर जॉन्टी रोड्स को वेस्टइंडीज के खिलाफ मैच में ये अवॉर्ड मिला था.

1993-94 में वेस्टइंडीज-साउथ अफ्रीका के बीच ब्रेबॉर्न स्टेडियम, मुंबई में हो रहा था. हीरो कप के इस मैच में जोन्टी रोड्स अफ्रीकी टीम की प्लेइंग इलेवन में शामिल नहीं थे. साउथ अफ्रीका ने पहले बैटिंग करते हुए 40 ओवर में 180 रन बनाए. वेस्ट इंडीज के दिग्गजों के कारण अफ्रीकी टीम की हार तय लग रही थी, लेकिन रोड्स ने मैच का पासा पलट दिया.

डेरेल कुलीनन के चोटिल होने के कारण तब रोड्स फील्डिंग करने मैदान पर उतरे. आते ही रोड्स ने अपनी करिश्माई फील्डिंग से एक के बाद एक दिग्ग्ज वेस्ट इंडियन क्रिकेटर्स को पवेलिन लौटा दिया. उस मैच में 5 शानदार कैच लेने के कारण अफ्रीकी टीम 41 रन से मैच जीत गई थी और रोड्स मैन ऑफ द मैच बने थें.

“पाबन्दी बगावत की शुरुआत होती है”

पिता की एडवरटाइजिंग कंपनी से अपने कैरियर की शुरुआत करने वाले निर्माता, निर्देशक, पटकथा लेखक राहुल ढोलकिया ने कई डॉक्यूमेंट्री और कमर्शियल फिल्में बनायीं. फिल्मों की बारीकियां सीखने के लिए वे साल 1990 में न्यूयार्क इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी गए. वे हमेशा सच्ची घटनाओं पर आधारित फिल्में बनाने के शौकीन हैं. इस कड़ी में गुजरात दंगे पर आधारित फिल्म ‘परजानिया’ काफी पोपुलर रही. कई पुरस्कारों के अलावा उन्हें दर्शकों ने भी उसे खूब पसंद किया.

राहुल हर फिल्म को बनाने में काफी समय लेते हैं जिसकी वजह उनका फिल्म के विषय पर अधिक रिसर्च का करना है. ‘रईस’ का प्रमोशन करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही इसे बनाने में 5 साल लगे ,पर दर्शक इसे खूब पसंद करेंगे. उनसे मिलकर बात करना रोचक था पेश है बातचीत के अंश.

प्र. ‘रईस’ फिल्म की कांसेप्ट कहां से मिली?

जब मैं अमेरिका में था, तो मेरे दोस्तों ने ‘लिकर बैन’ पर कुछ बनाने का सुझाव दिया था. मुझे स्टोरीलाइन अच्छी लगी थी. उस समय बैन सिर्फ गुजरात में था. अब तो बिहार में भी बैन है. फिर मैंने इस पर काम करना शुरू किया. तो मैंने रिसर्च कर पाया कि अपराध करना कभी भी सही नहीं होता, चाहे अपराध कैसा भी हो. रईस का अर्थ केवल अधिक पैसे का होना नहीं है, आप दिल से भी रईस हो सकते हैं.

प्र. ‘लिकर बैन’ को आप किस तरह से देखते हैं?

मेरे हिसाब से बैन कभी भी सही नहीं होता. किसी भी बात की पाबन्दी नहीं होनी चाहिये, क्योंकि पाबन्दी बगावत की शुरुआत होती है.

प्र. फिल्म को अच्छा बनाने में टीम का कितना सहयोग होता है?

हर व्यक्ति के लिए काम विभाजित होता है, जिसमें सबको जिम्मेदारी दी जाती है अगर किसी ने भी अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई, तो इसका खामियाजा पूरी टीम को भुगतना पड़ता है. ठीक से काम तभी हो सकता है जब आपको अपना काम पसंद आये. भले ही कितनी मेहनत हो, चाहे कितनी भी देर तक आपको काम करना पड़े, पर हर दिन आप अपने काम को करने के बाद ही आपको सुकून मिलता है. किसी भी निर्माता, निर्देशक को हमेशा इस बात का ध्यान रखना है कि आपके टीम के सदस्य किसी भी चीज को आपसे भी बेहतर समझ सकते हैं.

प्र. शाहरुख खान को ‘रईस’ को लेने की खास वजह क्या है? माहिरा को लेकर फिल्म विवादों में भी घिरी है, इसके बारे में आपका क्या कहना है?

शाहरुख खान इस चरित्र के लिए परफेक्ट थे इसलिए उन्हें फिल्म में लिया गया. अपने अभिनय को सजीव बनाने के लिए वे बहुत मेहनत करते हैं और अलग अलग विषयों पर अपनी राय भी देते हैं. उनके साथ काम करने में आसानी होती है. उनकी फैन फोलोविंग बहुत है और वे हमेशा शाहरुख में कुछ नया देखना चाहते हैं. इसलिए शाहरुख हमेशा कुछ नया लेकर आते हैं. विवादें फिल्मों के लिए आती और जाती हैं इसे अधिक महत्व नहीं देनी चाहिए. सबको पिक्चर बनानी है, यही सबका विजन होता है. उस पर फोकस्ड रहना ही ठीक होता है.

प्र. फिल्मों पर ‘स्टार फैक्टर’ कितना हावी होता है?

एक ‘स्टार’ फिल्म को आगे बढ़ाने में काफी सहायक होता है. शाहरुख खान के साथ तो कमर्शियल लेवल पर ये कुछ अधिक ही होता है. शाहरुख अपने किरदार में इस तरह घुसते हैं कि फिल्म का अंदाज ही बदल जाता है. इसके अलावा नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अतुल कुलकर्णी आदि जब एक साथ मिलकर आते हैं तो एक स्कूल बन जाता है. ऐसे कलाकार फिल्म वर्ल्ड के अंदर पूरी तरह फिट बैठ जाते हैं.

यह हमेशा ही लाभदायक होता है. अगर मुझे स्टार के साथ-साथ उसके आस-पास के चरित्र भी सही मिलते हैं, तो यही सिनेमा है. आज दर्शक भी अलग-अलग हैं. उन्हें हर तरह की फिल्में देखना पसंद है. बड़ी बजट की फिल्मों के लिए स्टार्स बहुत जरुरी है.

प्र. पुराने जमाने के संवाद और एक्शन को फिर से एक बार बड़े पर्दे पर लाने की वजह क्या है?

बचपन से ही हमने संवाद सुने है और ये फिल्म के रिलीज के बाद भी लोगों की जुबान पर होते हैं. दीवार, शोले, काला पत्थर आदि सब ऐसी ही फिल्में थी. जब इस कहानी को लिखा गया, तो अनायास ही संवाद आते गए, जैसे ‘बैटरी नहीं बोलने का’, ’बनिए का दिमाग मियां भाई की डेअरिंग’ आदि कुछ पंचेज आते गए. इसके अलावा गुजरात में लोग किसी को संबोधन के लिए अधिकतर ‘पार्टी’ शब्द का प्रयोग करते हैं और ये सब लिखने में मजा आया. फिर सबने बैठकर बातचीत की और जो जहां फिट होता गया, उसे वहां कलाकारों ने सहजता से प्रयोग किया. एक्शन तो है ही जिसे बहुत ही सुंदर तरीके से फिल्माया गया है.

प्र. फिल्म की सफलता का ताज कलाकारों को पहना दिया जाता है, जबकि असफलता का ठीकरा निर्देशक के माथे पर फोड़ दिया जाता है, आप इसके लिए कितना तैयार रहते हैं?

मेरे लिए मेरी जर्नी ‘फिल्म मेकिंग’ है, एक ‘फ्राइडे’ के लिए मैं इसे छोड़ नहीं सकता. इस फिल्म को बनाने में मैंने 5 साल का समय लिया. मैंने अगर मेहनत की है, तो जो भी ‘आउटकम’ हो, सोचना नहीं चाहिए. मैंने इस प्रोसेस को एन्जॉय किया है. पर इतना सही है कि फिल्म असफल होने पर कलाकारों को भी बहुत दुःख होता है, क्योंकि उन्होंने भी अपना समय दिया है और मेहनत की है.

प्र. क्या आगे कुछ खास फिल्म बनाने की इच्छा है?

मैं 5 साल में इस फिल्म को बनाया. अब इससे निकलकर अवश्य कुछ बनाऊंगा. मैं ने सबसे पहले एक स्टोरी लिखी थी. जो मेरी पहली स्क्रिप्ट थी, जिसे मैंने ‘इल्लीगल इम्मीग्रेशन’ के ऊपर लिखी थी. वह भी एक सच्ची कहानी है, उसे भी बनाना चाहता हूं.

प्र. आप इतना कम फिल्म क्यों बनाते हैं?

फिल्म बनाने में समय लगता है, ओरिजिनल स्क्रिप्ट है, इसलिए रिसर्च बहुत करना पड़ता है, इसलिए समय लगता है. कुछ कारण कई बार अलग से हो जाते हैं, इस फिल्म के दौरान शाहरुख खान को काफी चोंटे आई थी, जिससे काम को रोकना पड़ा.

प्र. इतने सालों में आप इंडस्ट्री में कितना बदलाव महसूस करते हैं और इसकी दिशा कितनी सकारात्मक है या कितनी नकारात्मक?

नई तकनीक के आने की वजह से आज कई तरह की फिल्में बन रही है. जो पहले हम नहीं बना सकते थे. न तो पैसा था और ना ही साधन. अब तो लोग फोन पर भी फिल्म बना सकते हैं. अन्तर्राष्ट्रीय एक्सपोजर होने की वजह से लोग अलग-अलग फिल्म बना सकते हैं और उसे कही भी, चाहे यू-ट्यूब हो या वेब साईट पर रिलीज कर सकते है. ये अच्छी बात है. खराबी ये हुई है कि लोगो में ‘सेल्फ सेंसरशिप’ अधिक बढ़ी है.

रईस: नई बोतल पुरानी शराब

यदि आप सत्तर के दशक की अमिताभ बच्चन वाली एंग्री यंग मैन वाली अथवा सत्तर के दशक की गैंगस्टर फिल्म देखने के शौकीन हैं, तो शायद आपको फिल्म ‘रईस’ पसंद आ जाए. लेकिन कथानक के स्तर पर ‘नई बोतल पुरानी शराब’ वाला मसला है. इसी के साथ कहानी सुनाते हुए निर्देशक दर्शक को बांध कर नहीं रख पाते.

फिल्म ‘रईस’ खत्म होने के बाद दिमाग में पहला सवाल यही उठता है कि आज शाहरुख खान,  फरहान अख्तर व राहुल ढोलकिया को अचानक गैंगस्टर को महिमा मंडित करने वाली कहानी पर फिल्म बनाने की जरुरत क्यों महसूस हुई, जबकि सत्तर के दशक में इस तरह की तमाम फिल्में पहले ही बन चुकी हैं. यदि निर्माता दावा करते कि वह गुजरात के शराब माफिया लतीफ की बायोग्राफी को पेश कर रह हैं, तब तो बात हजम की जा सकती थी. मगर फिल्म की शुरुआत में ही घोषणा की गयी है कि यह काल्पनिक कहानी है. पर फिल्मकार भूल गए कि आज 2017 में सत्तर के दशक की कहानी का ताना बाना अपने आप में बेमानी और अप्रसांगिक है.

रईस (शाहरुख खान) अपनी मां (शीबा चड्ढा) के साथ गुजरात के फतेपुर में रहता है. बचपन में उसे दिखायी नहीं देता. डॉक्टर उसे चश्मा लगाने की सलाह देता है. मगर रईस की मां के पास चश्मे की कीमत देने के पैसे नही हैं. तो वह अपने मित्र सादिक के साथ मिलकर गांधी जी की मूर्ति से चश्मा चुरा लाता है. पर वह सिर्फ फ्रेम होता है, उसके बाद डॉक्टर उसे मुफ्त में चश्मा दे देता है. वह हर साल मुहर्रम में मातम मनाने निकालता है.

एक दिन अपनी मां के मुंह से एक वाक्य सुन लेता है, ‘कोई भी धंधा छोटा या बड़ा नहीं होता. धंधे का कोई धर्म नही होता.’ बस वही तकिया कलाम सबके सामने गुनगुनाता रहता है. एक दिन रईस व सादिक पर शराब माफिया जयराज (अतुल कुलकर्णी) की निगाह पड़ती है. जयराज इन दोनों को अपने यहां अवैध शराब के धंधे में काम करने का अवसर दे देता है. दोनों बड़े हो जाते हैं.

बड़े होने के बाद रईस (शाहरुख खान) अपने मित्र सादिक (मोहम्मद जीशान) से कहता है कि वह जयराज की नौकरी छोड़कर खुद का व्यापार शुरू करेंगें, जिसके चलते जयराज से उनकी दुश्मनी हो जाती है. पर रईस को मुंबई के गैंगस्टर मूसा (नरेंद्र झा) का साथ मिल जाता है. रईस को किसी से डर नहीं लगता. रईस (शाहरुख खान) निडरता से व्यापार करते हए शोहरत व बहुत पैसा कमाता है. पर लोगों के बीच अपने आपको स्वीकार भी करवाता है. वह हमेशा व्यापार को लेकर नयी नयी आइडिया सोचता रहता है. वह अपने अवैध शराब के व्यापार में विद्यार्थियों व औरतों सहित हर किसी का उपयोग करता है. तो वहीं वह आसिया (माहिरा खान) संग प्रेम विवाह भी करता है. मूसा ही जयराज को खत्म करने की सुपारी रईस को देता है.

इसी बीच फतेपुर में पुलिस अफसर मजुमदार (नवाजुद्दीन सिद्दकी) आता है. गुजरात से अवैध शराब के धंधे व अपराध को खत्म करने का बीड़ा उठाता है. रईस व मजुमदार के बीच चूहे बिल्ली का खेल शुरू हो जाता है. तभी रईस को राज्य के मुख्यमंत्री का साथ मिल जाता है तथा पुलिस अफसर मजुमदार का तबादला हो जाता है. अब अपराध व राजनीति का अजीबोगरीब गठबंधन का खेल चलता रहता है. जबकि मजुमदार अभी भी रईस को खत्म करने की सोच रहा है. समय के साथ राजनीति बदलती है. फिर मुख्यमंत्री के आदेश से मजुमदार एस पी क्राइम बनकर आते हैं. उधर मूसा की ही चाल का शिकार होकर रईस ऐसा अपराध कर जाता है कि अंततः मजजुमदार उसका इनकाउंटर कर देता है.

फिल्म निर्देशक राहुल ढोलकिया ने इमानदारी के संग एक टिपिकिल मुंबइया मसाला फिल्म बनाने का प्रयास किया है. पर कथानक व शाहरुख खान की ईमेज संवारने के चक्कर में वह इस कदर दुविधा में फंसे कि फिल्म का सत्यानाश हो गया. फिल्म की शुरूआत उम्मीदें बंधाती है, मगर धीरे धीरे वह अपना आकर्षण खोती जाती है. इंटरवल से पहले फिल्म पूरी तरह से गैंगस्टर के कारनामों से भरपूर फिल्म है. इंटरवल के बाद राजनीति का समावेश होने के बाद फिल्म की गति धीमी होने के साथ ही बिखरने लगती है.

वास्तव में कहानी का प्लॉट व दायरा अति कमजोर है. कहानीकार व निर्देशक दोनों ही गैंगस्टर के साथ राजनीति को कहानी बेहतर तरीके से समायोजित करने में बुरी तरह से विफल रहे हैं. फिल्म में रोमांस भी उभर नहीं पाया. इमोशन की तो भारी कमी हैं. गैंगस्टर का उदय व उत्थान दिखाने के बाद उसका पतन दिखाते हुए निर्देशक बुरी तरह से असफल हो गए. रईस का जेल से चुनाव जीतना और आतंकवाद तथा बम विस्फोट के दृष्य तो ऐसे रचे गए हैं, जैसे कि कोई मजाक हो रहा है. यह फिल्म कहीं से भी यह संकेत नहीं देती पुरस्कृत फिल्म ‘परजानिया’ के निर्देशक राहुल ढोलकिया ने ही ‘रईस’ का लेखन व निर्देशन किया है.

फिल्म के संवाद काफी अच्छे बन पड़े हैं. इसके लिए संवाद लेखक बधाई के पात्र हैं. सनी लियोनी का डांस नंबर ‘लैला ओ लैला’ भी सराहनीय है. कैमरामैन के यू मोहनन की भी तारीफ करनी पड़ेगी. फिल्म का गीत संगीत कहानी के साथ मेल नहीं खाता है.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो चेहरे पर दाढ़ी उगाने, वजन घटाने के बावजूद शाहरुख खान की उम्र का अहसास उनके चेहरे पर नजर आता है. शाहरुख खान का अभिनय प्रभावित नही करता. जिस दृष्य में नवाजुद्दीन सिद्दिकी और शाहरुख खान आमने सामने होते हैं, उन दृष्यों में नवाजुद्दीन के सामने वह एकदम फीके पड़ जाते हैं. नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने इस फिल्म में जबरदस्त परफॉर्मेंस दी है. नरेंद्र झा ने इस फिलम मे ठीक ठाक काम किया है. अतुल कुलकर्णी तो बेहतरीन अभिनेता हैं, यह बात इस फिल्म में भी उन्होंने साबित किया है. मगर निर्देशक उनकी प्रतिभा का उपयोग फिल्म में नहीं कर पाए. माहिरा खान पूरी फिल्म में खूबसूरत नजर आयी हैं. रोमांस व इमोशन दृष्यों के अभाव के चलते माहिरा खान के हिस्से कुछ खास करने को रहा नहीं. पर्दे पर माहिरा खान व शाहरुख खान के बीच केमिस्ट्री का घोर अभाव है. मो. जीशान अयूब ने क्यों अपनी प्रतिभा को जाया होने दिया, यह वही जानें.

दो घंटे 22 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘रईस’ का निर्माण शाहरुख खान की कंपनी ‘रेड चिल्ली इंटरटेनमेंट’ के साथ ही फरहान अख्तर व रितेश सिद्धवानी की कंपनी ‘एक्सेल इंटरटेनमेंट’ ने की है. फिल्म के निर्देशक राहुल ढोलकिया, लेखक राहुल ढोलकिया, हरित मेहता, अशीष वाशी व नीरज शुक्ला, संगीतकार राम संपत हैं. शाहरुख खान, माहिरा खान, नवाजुद्दीन सिद्दिकी, अतुल कुलकर्णी, मो. जीशान अयूब, नरेंद्र झा, शीबा चड्ढा व अन्य इसके कलाकार हैं.

कंगना ने मजीद मजीदी की फिल्म को कहा ‘ना’

इन दिनों मशहूर ईरानी फिल्मकार मजीद मजीदी अपनी नई फिल्म ‘बियॉन्ड द क्लाउड्स’ की शूटिंग करने भारत आए हुए हैं. भाई बहन की कहानी पर आधारित इस फिल्म में मजीद मजीदी ने अभिनेता शाहिद कपूर के छोटे भाई ईशान खट्टर को अभिनय करने का मौका दिया है. इस फिल्म में बहन का किरदार निभाने के लिए मजीद मजीदी ने कंगना रानौत से संपर्क किया था, मगर कंगना ने पटकथा सुनने व मजीद मजीदी से लंबी बातचीत करने के बाद इस फिल्म का हिस्सा बनने से साफ इंकार कर दिया.

सूत्रों का दावा है कि अमरीका से पटकथा का कोर्स कर चुकी कंगना रानौत को इस फिल्म की पटकथा और अपना किरदार कमजोर लगा. कंगना को लगा कि फिल्म में बहन के किरदार को कम अहमियत दी गयी है. सूत्रों का दावा है कि फिल्मकार मजीद मजीदी के प्रति इज्जत का भाव रखने वाली कंगना ने बड़ी विनम्रता के साथ उनसे कुछ बदलाव करने के लिए कहा. मगर मजीद मजीदी ने साफ कर दिया कि वह किसी भी सूरत में कोई बदलाव नहीं करेंगे. उनके अनुसार उनकी फिल्म के हर पात्र को उन्होंने अहमियत दी है. उसके बाद कंगना ने खुद को इस फिल्म से दूर कर लिया.

जबकि बॉलीवुड के अन्य सूत्र का दावा है कि शाहिद कपूर और कंगना रानौत ने विशाल भारद्वाज के निर्देशन में फिल्म ‘रंगून’ की है. इस फिल्म की शूटिंग के दौरान शाहिद कपूर और कंगना रानौत के बीच संबंध काफी बिगड़ गए. कंगना ने इसके लिए शाहिद कपूर को अभी तक माफ नहीं किया है. ऐसे में जब कंगना को पता चला कि मजीद मजीदी की इस फिल्म से शाहिद कपूर के भाई ईशान खट्टर अपना अभिनय करियर शुरू करने वाले हैं, तो भविष्य में कोई विवाद पैदा हो, उससे पहले ही उन्होंने खुद को इस फिल्म से दूर कर लिया.

‘लिकर’ तस्करी पर बनी फिल्म ‘रईस’

‘धर्म पर मैं धंधा नहीं करता’, ‘बनिए का दिमाग और मियां भाई की डेयरिंग’, ‘कोई धंधा छोटा नहीं होता और धंधे से बड़ा कोई धर्म नहीं होता, जिससे किसी का बुरा न हो’ आदि कई अलग-अलग संवादों से सजी हुई एक्शन, क्राइम, थ्रिलर फिल्म है ‘रईस’. इस फिल्म को निर्देशक राहुल ढोलकिया ने 5 साल की रिसर्च के बाद बनाया है, जिसमें शाहरुख खान ने फिर से एक नए अवतार के रूप में आने की कोशिश की है.

पूरी फिल्म में शाहरुख शुरू से लेकर अंत तक हावी रहे, उनका बार-बार पर्दे पर आना अच्छा लगा, उनका गेटअप और संवादों का आदान-प्रदान काफी सहज था, जिससे फिल्म रोचक लगी. हालांकि ये कहानी गुजरात के क्रिमिनल अब्दुल लतीफ के जीवन से प्रभावित दिखी, पर निर्देशक ने अपने इंटरव्यू में इसे एक फिक्शन स्टोरी बताया.

बात जो भी हो इसमें साल 1970 और 80 के दशक को दिखाया गया है. जब गुजरात में ‘लिकर बैन’ कर दिया जाता है. इसके लिए निर्देशक ने गुजरात के दृश्य को उस समय के हिसाब से फिल्माया है. जो अच्छा रहा. फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दीकी कुछ खास प्रभाव नहीं जमा पाए. ऐसा लगा कि उन्हें उभर कर आने का मौका नहीं मिला. चोर-पुलिस का खेल अंत तक चलता रहा. शाहरुख खान के दोस्त के रूप में मोहम्मद जीशान अय्यूब ने काफी अच्छा काम किया. महिरा खान फिल्म में न के बराबर थी. शाहरुख खान के साथ उनकी केमिस्ट्री एकदम सही नहीं बैठ पायी.

फिल्म की कहानी

रईस (शाहरुख खान) गुजरात के फतेहपुरा में अपनी मां (शीबा चड्ढा) के साथ बहुत मुश्किल में गुजर- बसर करता है. दिमाग से तेज रईस बचपन से ही जयराज (अतुल कुलकर्णी) के लिए ‘लिकर’ का आदान-प्रदान कर पैसा कमाता है, इसमें साथ देता है उसका दोस्त सादिक (मोहम्मद जिशान) जो हर वक्त किसी भी परिस्थिति में उसका साथ देता है.

धीरे-धीरे रईस को लगने लगता है कि उसे अब अपना व्यवसाय कर, अपनी प्रेमिका आशिया (महिरा खान) के साथ घर बसाना है. इसके बाद वह बड़ा ‘लिकर’ तस्कर व्यवसायी मूसा भाई (नरेन्द्र झा) से मिलकर जयराज को खत्म करने की साजिश रचता है. आई पी एस ऑफिसर मजमुदार (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) इस काम में उसे रंगे हाथ पकड़ने की जी-जान से कोशिश करता है, लेकिन उसकी कोशिश हमेशा नाकामयाब होती है. रईस कभी उसके हाथ नहीं आता, बल्कि वह राजनेता का सहारा लेकर मजमुदार का ट्रान्सफर करवा देता है. फिर भी मजमुदार अपनी जिद नहीं छोड़ता और हर मोड़ पर रईस की ‘लिकर’ की तस्करी के आड़े आता है. इस प्रकार कई एक्शन, फाइट और मर्डर के बाद कहानी अंजाम तक पहुंच कर यह बताने की कोशिश करती है कि गलत काम का फल कभी सही नहीं होता.

फिल्म को राहुल ढोलकिया ने मसाला फिल्म बनाने की कोशिश की है, पर वे थोड़े उसमें कम नजर आये. फिल्म की शुरूआती भाग से दूसरे भाग में फिल्म की पकड़ अच्छी रही. फिल्म का गाना ‘उरी-उरी जाये….’ सिचुएशन के हिसाब से था. बहरहाल फिल्म एक बार देखने लायक है. इस फिल्म को शाहरुख खान की एक अच्छी और अलग फिल्म की लिस्ट में शामिल की जा सकती है. इसे थ्री स्टार दिया जा सकता है.

क्यूआर कोड के साथ आएगा पैन कार्ड

1 जनवरी 2017 से क्रेंद्र सरकार ने देश में नई डिजाइन वाले पैन कार्ड का वितरण शुरु कर दिया है. आयकर विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने जानकारी देते हुए बताया कि नए डिजाइन वाले पैन कार्ड में अतिरिक्त सुरक्षा खूबियां जोड़ी गई है, जिससे कार्ड के साथ किसी भी तरह की कोई छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है. नए दिखने वाले पैन कार्ड को नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिट्री लिमिटेड (एनएसडीएल) एवं इंफ्रास्ट्रक्चर टेक्नोलॉजी एंड सर्विसेज लिमिटेड ने संयुक्त रूप से इसे डिजाइन किया है. हालांकी यह नई डिजाइन वाला कार्ड, नए पैन कार्ड के लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों को ही मिलेगा.

पैन कार्ड से छेड़छाड़ की बढ़ती घटनाओं के कारण टैंपरप्रूफ पैन कार्ड जारी किया गया है, इससे अब पैन कार्ड के साथ किसी भी तरह की छेड़छाड़ नहीं की जा सकती है. नए डिजाइन के पैन कार्ड में हिन्दी और अंग्रजी दोनों भाषाओं में जानकारी दी गई है. नए पैन कार्ड में क्विक रेस्पोंस कोड जैसे नए फिचर्स भी जोड़े गए हैं.

वर्तमान में कर चोरी की घटनाओं को देखते हुए सरकार ने बैंक खाताधारकों को पैन कार्ड की जानकारी देना अनिवार्य कर दिया है, लोगों को इसके लिए 28 फरवरी 2017 तक का समय दिया गया है. इस तारीख तक सभी खाताधारकों को अपने बैंकों में पैन कार्ड संख्या दर्ज कराना अनिवार्य है. जिन लोगों के पास पैन कार्ड नहीं है, उन्हें बैकों में फॉर्म 60 जमा करना अनिवार्य है.

क्या आपने देखा ट्रंप का ये रेसलिंग वीडियो

अमेरिकी राष्ट्रपति पद की शपथ ले चुके डोनाल्ड ट्रंप एक बिजनेसमैन से अब अमेरिका के 45वें राष्ट्रपति बन चुके हैं. बहुत कम लोग ये बात जानते हैं कि नए राष्ट्रपति ट्रंप रेसलिंग जैसे खेल के सबसे बड़े ईवेन्ट यानि WWE के मंच पर मार भी खा चुके हैं. ये बात है 2007 की जब ट्रंप एक बार रेसलमेनिया जा पहुंचे थे. दरअसल साल 2007 के रेसलमेनिया में “खरबपतियों की जंग” नाम से मशहूर इस WWE  ईवेन्ट में ट्रंप WWE के के ही चेयरमैन विंस मैक मोहन के खिलाफ खड़े थे. यह मैच इंटरकॉन्टिनेंटल चैम्पियनशिप के लिए खिलाड़ियों ओगामा और इंटरकॉन्टिनेंटल चैम्पियन बॉबी रैशली के बीच खेला जा रहा था. इस मैच में रैशली ट्रंप की तरफ से और ओगामा मैक मोहन की तरफ से लड़ रहे थे और स्टोन कोल्ड स्टीव ऑस्टिन थे इस मेच के गैस्ट रैफरी.

मैच के दौरान डोनाल्ड ने कई बार मैक मोहन पर हमला भी किया. पूरे मैच में स्टोन कोल्ड स्टीव ने रैशली का साथ दिया और रैशली और ट्रंप ये मैच जीत गए. यह WWE का एक विवादास्पद मैच भी कहा जाता है क्योंकि अपनी इस जीत के बाद ट्रंप और रैशली जश्न के मूड में आ गए और मैक मोहन को गंजा कर दिया गया.  स्टोन कोल्ड भी खुश नजर आ रहे थे पर जैसे उनके दिमाग में तो कुछ और ही चल रहा था. स्टोन कोल्ड ने बियर मांगाया और ट्रंप और रैशली को दिया जैसे वे हर मैच जीतने के बाद किया करते हैं. इसके बाद अचानक ही स्टोन कोल्ड ने अपना सिगनेचर मूव स्टोन कोल्ड स्टनर ट्रंप के सर पर दे मारा और ट्रंप वहीं पस्त होकर गिर पड़े. इसके बाद स्टोन कोल्ड हंसते हुए बाहर निकल गए.

अपने बेबाक बयानों के चलते चर्चा में रहने वाले और अब अमेरिका के राष्ट्रपति बन चुके ट्रंप का ये मार खाने वाला वीडियो अब उनके विरोधियों द्वारा खूब शेयर किया जा रहा है.

फुटबॉल स्टार रोनाल्डो के बारे में जानें ये खास बातें

क्रिकेट में हमारे देश की जान बसती है और क्रिकेट स्टार्स में धड़कन. हमारे देश का राष्ट्रीय खेल क्या है, इस पर भी बहस होती रहती है, पर नतीजा कुछ नहीं निकलता. देश के अधिकतर लोग क्रिकेट के ही दीवाने हैं. पर देश में और भी बहुत से लोकप्रिय खेल हैं. जैसे फुटबॉल, हॉकी, कबड्डी.

आज पढ़े फुटबॉल स्टार रोनाल्डो के बारे में कुछ दिलचस्प बातें. रोनाल्डो रियल मैड्रीड के खिलाड़ी हैं.

1. 14 साल की उम्र में ही स्कूल से निकाले गए

रोनाल्डो को 14 साल की उम्र में ही स्कूल टीचर पर चेयर फेंक के मारने के कारण स्कूल से निकाल दिया गया था. रोनाल्डो के अनुसार टीचर ने उनका अनादर किया था. उनकी पढ़ाई छूट गई, पर उनका सारा ध्यान सौकर पर केंद्रित कर दिया.

2. 2003 में मात्र 17 साल की उम्र में ही उन्होंने 12 मीलियन पौंड में मेंचेस्टेर यूनाइटेड के साथ डील साइन की.

3. सर ऐलेक्स फर्गसन ने रोनाल्डो को जरसी नंबर 7 दिया. 18 साल की उम्र में यह एक बड़ी उपलब्धी थी.

4. रोनाल्डो चौथे ऐसे फुटबॉलर हैं जिनकी प्रतिमा मैडम तुस्साद्स, लंदन में लगाई गई है.

5. पुर्तगाल में उनके नाम पर एक म्यूजियम भी है, जहां उनकी ट्रॉफियां, बचपन की तस्वीरें आदि रखी गई हैं.

6. 2012 में उन्होंने अपनी ‘गोल्डन बुट’ बेच दी और उससे प्राप्त पैसों को बच्चों की शिक्षा के लिए डोनेट कर दिया.

7. एक ट्रेनिंग सैशन में वे 23,055 किलो वजन उठा लेते हैं.

8. रोनाल्डो ने अपने शरीर पर कोई टैटू नहीं बनवाया, क्योंकि वे नियमित ब्लड डोनेट करते हैं. पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने शराब भी छोड़ दी थी.

9. उनके पिता ने उनका नाम अमरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन के नाम पर रखा.

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