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हमारी बेडि़यां

हम लोग पढ़लिख कर अपने को काफी मौडर्न समझने लगते हैं. विकास की बातें करते नहीं अघाते, मगर जहां धर्म, कर्म, लोकपरलोक की बातें पंडेपुरोहितों द्वारा की जाती हैं वहां हम चारों खाने चित पड़ जाते हैं. पंडेपुरोहित हमारे सामने धर्मकर्म व सामाजिकता के नाम पर ऐसा जाल बुनते हैं कि हम उस में फंसते जाते हैं. उस समय हमारा सारा मौडर्निज्म कहीं चला जाता है.

पिछले साल हमारे एक रिश्तेदार की मृत्यु हो गई. उन की दसवीं व तेरहवीं के दिन पंडेपुरोहितों ने अन्न, कपड़ा व रुपए इतने ज्यादा उगाहे कि उन के परिवार सालभर बिना किसी मेहनत के मौज करेंगे. ये लोग धर्म के नाम पर हमें इतना भीरु बना देते हैं कि जो कुछ मांगते जाते हैं, हम देते चले जाते हैं. इस में अपनी बड़ाई के लिए?भी कुछ लोग अंधाधुंध खर्च करते हैं. पता नहीं कब हम इन

के चंगुल से नजात पाएंगे क्योंकि हमारे दिलोदिमाग पर अंधविश्वास डेरा डाले है.
कैलाश राम (उ.प्र.)

बहनोई की मौत के चलते हमें जनवरी में दिल्ली जाना पड़ा था. कड़ाके की ठंड पड़ रही थी और मेरी बहन के घर कई और रिश्तेदार जमा थे. हम वैसे दिल्ली अकसर जाते रहते हैं और हमेशा अपनी बेटी के पास ही रहते हैं पर इस बार अफसोस का मामला था, इसलिए हम ने उस को मना कर दिया और सोचा कि जो भी होगा देखा जाएगा, बहन के पास ही ठहरते हैं. पर बेटीदामाद को कहां चैन, वे हमें आराम देना चाहते थे.

उन्हीं दिनों हमारी समधन यानी हमारी बेटी की सास भोपाल से उन के पास आई हुई थीं. अपने बेटेबहू को परेशान देख कर हमारी समधन ने उन से परेशानी का कारण पूछा. कारण पता लगने पर उन्होंने एकदम ही हल भी सुझा दिया और बोलीं, ‘‘इस में क्या है, उन को बोलो, सीधे यहीं आ जाएं और फिर नहानेधोने के बाद चले जाएं तो कोई बात नहीं है.’’ हमारे मना करने पर भी वे लोग नहीं माने और हमें अपने घर ले गए. मेरी बहन के घर पर भी हमारी बेटी ने अच्छी तरह समझा दिया था ताकि उन्हें बुरा न लगे.

हम दिल्ली 4 दिन रहे. रोज सबेरे तैयार हो कर दिनभर के लिए बहन के पास चले जाते और शाम को वापस आ जाते थे. बेटी, दामाद और समधन की सूझबूझ से हम ठंड से भी बचे रहे, बीमार भी नहीं पड़े और अफसोस में भी शामिल रहे. यह सही बात है कि पुरानी बातों को डर या अंधविश्वास की वजह से हम ने ही उन्हें बेडि़यां बना रखा है, चाहें तो उन्हें उतार फेंक सकते हैं और एक अच्छा प्रैक्टिकल जीवन व्यतीत कर सकते हैं.
ओ डी सिंह, वडोदरा (गुजरात)

मेरे पापा

जीवन का मेरा हर वह पल सुनहरा हो जाता है जिस में पापा मेरे साथ होते हैं. मध्यवर्गीय परिवार से होते हुए भी उन्होंने मेरी हर मांग को पूरा किया.
15 वर्ष की छोटी सी उम्र में मु झे किडनी की बीमारी हो गई जिस कारण मैं शारीरिक रूप से कमजोर हो गया और मेरी पढ़ाई रुक गई.

मैं बुरी तरह से मानसिक अवसाद से घिर गया. तब पापा ने ही मु झे अवसाद से बाहर निकाला और अपनी बीमारी से लड़ने के लिए व फिर से पढ़ाई शुरू करने के लिए प्रोत्साहित किया. उन के इन शब्दों, ‘बेटा, हर इंसान के जीवन में संघर्ष होता है. शायद तुम्हारे जीवन में कुछ ज्यादा ही संघर्ष हो पर उन से घबराना नहीं बल्कि डट कर मुकाबला करना. तुम्हें अपनेआप को साबित करना है.’ ने मेरा मनोबल बढ़ाया. उन्हीं के कारण मैं ने अपनी बीमारी को सकारात्मक रूप में लेते हुए अपनी पढ़ाई शुरू की. हाईस्कूल, इंटर और फिर गे्रजुएशन कंप्लीट किया.

पर गे्रजुएशन के बाद मेरी हालत और बिगड़ी व आगे जीवित रहने के लिए डाक्टर ने ‘किडनी प्रत्यारोपण’ की सलाह दी. तब पापा ने ही 57 वर्ष की उम्र व उच्च रक्तचाप होते हुए भी अपनी एक किडनी दे कर मु झे फिर एक नया जीवनदान दिया.

औपरेशन के ठीक 1 माह बाद जब मैं पापा से मिला व हमारी नजरें एकदूसरे से मिलीं तब उमड़ते भावों, छलकते आंसू, असीम सुख की अनुभूति, सच्चे आनंद का जो एहसास हुआ उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता.
तब पापा ने मु झे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने की सलाह दी ताकि मैं किसी पर बो झ न बनूं. मैं कैरियर संवारने में लग गया और पापा मेरा आत्मविश्वास बढ़ाते रहते.
आज मैं पापा के प्यार, उन की सलाह, नसीहतों के साथ जीवन की नई चुनौतियों को पार करने व कैरियर बनाने में जुटा हूं.
सौरभ श्रीवास्तव, लखनऊ (उ.प्र.)

मेरे पिताजी, जिन को हम अब्बा कहा करते थे, का सब काम अनुशासित था. वे समय के पाबंद थे. सब काम समय पर करो, यही उन का कहना रहता था. हम सब भाईबहन उन के ऋणी हैं कि उन्होंने हम सब को आत्मनिर्भर बनाया.

उन की सीख थी कि अपने से किसी को भी दुखपीड़ा न पहुंचाओ. हमेशा सच बोलो, अपनी गलती स्वीकार करो, बड़ों का आदर करो, दूसरों की यथासंभव मदद करो,  झूठ का सहारा मत लो. हमें अपने पापा की सीख पर गर्व है.

आज हम सब उन्हीं की प्रेरणा से आत्मनिर्भर हैं. अब हमारे बीच पापा नहीं हैं, फिर भी कोई दिन, कोई पल ऐसा नहीं जाता कि उन की याद न सताए.

कुसुम देव, सागर (म.प्र.)

आप के पत्र

सरित प्रवाह, मई (प्रथम) 2013

संपादकीय टिप्पणी ‘मोदी मिशन का सच’ अत्यंत रोचक, सामाजिक, सामयिक व हकीकत से लबरेज लगी. आप का यह कहना बिलकुल सही है कि चुनाव अगर भाषण से जीते जाते तो अटल बिहारी वाजपेयी 1971 में ही प्रधानमंत्री बन जाते और उन्हें 2004 की हार न देखनी पड़ती. उस समय ‘अतुल्य भारत’ का नारा भाजपा के सिर चढ़ कर बोल रहा था. पार्टी विश्वास से पूरी तरह लबरेज थी कि जीत उसी की होगी, मगर हुआ उलटा. कांगे्रस पार्टी भारी बहुमत से तो जीत हासिल नहीं कर सकी पर पिछले 9 सालों से कांग्रेस ही सरकार चला रही है, भले ही गठबंधन की सरकार हो.

भाजपा के नेता व गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया है और विकास का अपना नजरिया पेश कर रहे हैं. मोदी के विकास के हवाई प्रवचनों में जादू की कहानियां हैं. भाजपा की रामलीला में अभी तक तय ही नहीं हो पाया, राम कौन बनेगा. रामनाम जपने वाली इस पार्टी में राम के लिए महाभारत का माहौल दिख रहा है. दावेदार कई हैं पर वनवास के लिए नहीं, राजतिलक कराने के लिए आतुर हैं. लक्ष्मण, भरत, हनुमान बनने को कोई तैयार नहीं, अलबत्ता तवज्जुह न मिलने पर विभीषण और बातबात पर श्राप देने वाले व संन्यास की धमकी देने वाले जरूर दिखते हैं. प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की बेचैनी साफ देखी जा सकती है.

केवल भाषणों से लोगों का पेट नहीं भरता. देश चलाने के लिए चुनौतियों का सामना करने के लिए जज्बा चाहिए और नया नजरिया होना चाहिए. मोदी के दामन पर सांप्रदायिक नरसंहार के दाग हैं.

दिल्ली में मार्च व अप्रैल के भाषणों में मोदी ने कहीं भी इस बात पर अफसोस तक नहीं जताया कि उन के मुख्यमंत्री होने और अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री होने के बावजूद सरकार की शह पर मुसलमान औरतों और बच्चों तक को मारा जाता रहा. नरेंद्र मोदी जिस विकास की बात कर रहे हैं उस का लाभ पहले उद्योगपतियों को मिलेगा. बरतन में अगर कहीं जला दूध बचा तो वह आम लोगों को मिलेगा.
कैलाश राम गुप्ता, इलाहाबाद (उ.प्र.)

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सरित प्रवाह के तहत प्रकाशित संपादकीय टिप्पणियां ‘मोदी मिशन का सच’ और ‘साडा हक’ समाज को सच से अवगत कराती हैं. लोगों की आंखें कड़वे सच को जान कर खुल जानी चाहिए. वास्तव में देश के कर्णधार कहलाए जाने वालों की मंशा सिर्फ सत्ता में बने रहना है और वे विकास के मसीहा बन कर लोगों को चिकनीचुपड़ी बातों से बहलाए रखते हैं.

‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी, रजनीश का भ्रमजाल’ और ‘राष्ट्रीय शिक्षा अभियान : अरबों स्वाहा, नतीजा सिफर’ लेख बहुत सटीक व तथ्यों पर आधारित हैं. सर्व शिक्षा अभियान ने तो स्कूली छात्रों का बेड़ा गर्क कर दिया है. भले ही सरकारी आंकड़े संपूर्ण साक्षरता का दावा कागजों में करते हों, हालत यह है कि कुछ बच्चों को साधारण गुणा, भाग या जमा के सवालों के साथ किताब भी पढ़नी नहीं आती है. शिक्षकों पर काम का बो झ इतना है कि वे बच्चों को समय नहीं दे पाते हैं. ऐसे में भावी राष्ट्र के निर्माता कहलाए जाने वाले छात्रों का भविष्य क्या होगा?
प्रदीप गुप्ता, बिलासपुर (हि.प्र.)

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‘मृत्युदंड और समाज’ शीर्षक से प्रकाशित आप के विचार पढ़े, जो आपराधिक तत्त्वों को दिए जाने वाले दंड ‘मृत्युदंड’ के विरुद्ध ठीक उसी तरह लगे जैसे कोई मानवाधिकारी इस दंड के विरुद्ध सजायाफ्ता की वकालत कर रहा हो. दया याचिकाओं पर राष्ट्रपति द्वारा बिना विलंब के निस्तारण तक पर आप ने सवाल उठा दिया कि इसी कारण इस दंड की मांग बढ़ने लगी है जबकि आप और हम सभी यह भलीभांति जानते हैं कि ‘मृत्युदंड’ राष्ट्रपति नहीं, बल्कि देश की अदालतें लंबीलंबी सुनवाइयों, प्र्रस्तुत किए जाने वाले साक्ष्यों, अपराधियों व आरोपियों तक की दलीलें सुनने के बाद भी गंभीर चिंतनमनन के उपरांत अपराध की गंभीरता को देखते हुए देती हैं. माननीय राष्ट्रपति तो उस के बाद ही संबंधित राज्य व मंत्रिमंडल की संस्तुति पर मोहर लगाते हैं.

वैसे तो यह एक शाश्वत सत्य ही है कि ‘जो तत्त्व बेगुनाहों को मारने पर ‘डांस’ तक कर के खुशी का इजहार करते हों या जिन्हें मरने वाले निर्दोषों पर दरिंदगी बरपाते या शांतिप्रिय जनता का नाजायज खून बहाने पर जरा भी रहम न आता हो, उन पर आखिर दया की भी जाए तो क्यों?’

आप का कहना कि समाज और सरकार अपराध तो रोक नहीं पाते, बल्कि वे मृत्युदंड दे कर अपनी खीज ही निकालते हैं, क्या ऐसे शैतान अब आप का यह संपादकीय पढ़ कर साधु बन पाएंगे? क्योंकि जिन जेलों में उन्हें सुधार हेतु भेजा जाता है वहां वे तत्त्व ‘कुत्ते की दुम’ समान इतने सीधे हो जाते हैं कि कालकोठरियों में बैठेबैठे ही ब्लेडबाजी, रंगदारी, हत्याएं करने या करवाने के षड्यंत्र या सुपारी किलरों तक के शर्मनाक कार्यों तक को और भी ज्यादा दुस्साहसिक तरीकों से अंजाम देने में जुट जाते हैं. इस पर भी अगर आप के मतानुसार उन्हें ‘फांसी के फंदों’ पर न लटकाया जाए तो आप, समाज, न्याय व देश के प्रशंसक उन्हें ‘फूलमालाओं’ से लाद कर देख लें. जवाब शायद तब भी यही मिलेगा-‘हम नहीं सुधरेंगे.’ क्योंकि कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं होती है.
ताराचंद देव रैगर, श्रीनिवासपुरी (न.दि.)

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संपादकीय टिप्पणी ‘शिक्षा का आधार’ में शिक्षण संबंधी जिन समस्याओं और उन के समाधान का जो आप ने जिक्र किया

है वे उपयोगी और बढि़या समाज की स्थापना करने वाला है. प्राइमरी शिक्षा का बराबरीकरण करना बेहतरीन सुझाव है. लेकिन देश में एक वर्ग ऐसा भी है जो उन्हें लागू नहीं करना चाहेगा क्योंकि इस से उस का स्वार्थ नहीं सधेगा. लिहाजा, ऊंचनीच का भेदभाव हमेशा के लिए बना रहेगा.

भले ही मुसलमान 700 साल और अंगरेज, फ्रांसीसी व पुर्तगाली 300 साल तक?भारत को कदमों तले दबाए रहे लेकिन बिना मेहनत के देश के अंदर दूसरी जातियों से?श्रेष्ठ बने रहने का फार्मूला न खोने पाए.

बच्चे बचपन में धर्म, जाति, भाषा और पैसों का भेदभाव न सीखें, इस से बेहतर और क्या हो सकता है? काश,?भारत ऐसे समाज की स्थापना करता.
माताचरण पासी, वाराणसी (उ.प्र.)

प्रधानमंत्री कौन

मई (प्रथम) अंक में प्रकाशित लेख ‘मोदी और राहुल : खोखले दावों के सौदागर’ में लेखक ने दोनों को प्रधानमंत्री बनने योग्य नहीं माना है. यह सच भी है कि दोनों नेताओं की पार्टियों के पास अब नरसिम्हा राव, अटल बिहारी वाजपेयी सरीखे दिग्गज, अनुभवी और कूटनीतिज्ञ नेता नहीं हैं. इसलिए प्रधानमंत्री पद के दोनों दावेदारों को सही दिशा और कूटनीति की सूझ नहीं मिल रही है.

आज की युवापीढ़ी को हिंदुत्व और मंदिरमसजिद की धर्मांधता से कुछ लेनादेना नहीं है. उसे तो ईमानदार प्रशासन और विकास चाहिए जिस से राजनीतिक व्यवस्था में हर तरह से बदलाव आ सके. देश में अगर कोई ज्यादा उपेक्षित, शोषित और ठगी का शिकार है तो वह है इस देश का आम नागरिक जिस से उस का वोट भी झूठे वादों के जरिए लूट लिया जाता है.

देश में राजनीति व्यापार बन गई है. सत्ता में शामिल सभी लूटमार में लगे हैं. नतीजा आज सामने है कि सत्ता छिन्नभिन्न है.

ऐसे बिगड़े माहौल में प्रधानमंत्री पद का कोई दावेदार देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, आतंकवाद व कौर्पोरेट की लूट जैसे ज्वलंत मुद्दों पर दबंगई के साथ सामने आ कर देश की जनता का विश्वास जीतता है तो उसे देश का प्रधानमंत्री बनाया जा सकता है. वहीं, देश का प्रधानमंत्री कोई महिला न हो क्योंकि उसे सुनाई तो सब देता है परंतु समझ में कुछ नहीं आता.
विजय यादव, जबलपुर (म.प्र.)

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अंधभक्ति

मई (प्रथम) में ‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ की परत दर परत, सचाई लेख में उजागर की गई है. इसे पढ़ कर तथाकथित भगवानों के भक्तों की

आंखें खुलनी चाहिए. जो इन स्वार्थलोलुप, धनलोलुप ही नहीं बल्कि नारीलोलुप इंसानों तक को अपनी अंधभक्ति से न केवल देवता मानते हैं बल्कि उन को भगवान तक बना कर पूजने लगते हैं. मगर जो अतिविश्वास से पीडि़त हो कर ढोंगी भगवानों की भक्ति में लीन हो कर, अपने आगेपीछे की सोचनेसम झने की शक्ति तक खो देते हों, उन धर्मांध तत्त्वों की आंखें खुलेंगी कैसे? जिन इंसानों की मति ही मारी गई हो उन्हें तो शायद ही कोई सम झा पाए.

तथाकथित भगवानों के जिन भक्तों तक को सुबह के नाश्ते में कोई सुंदरी, लंच के बाद कोई दूसरी स्त्री और डिनर के साथ नई भोग्या (नारी) की चाहत हो, उन के पथप्रदर्शक की क्याक्या मांग या मंशा होती होगी? जो भगवान अपने भक्तों को भटका कर योग के नाम पर भोग में, प्रफुल्लता के बहाने नशे में  झोंक रहा हो और मौजमस्ती के स्वांग रच कर सामूहिक सैक्स हेतु प्रेरित कर रहा हो वह भगवान होगा कि शैतान? आश्चर्य तो तब होता है जब ऐसी गंभीर रिपोर्टों या शर्मनाक आरोपों का परदाफाश होने पर भी इन अंधभक्तों की आंखें नहीं खुलतीं.
टीसीडी गाडेगावलिया, करोल बाग (न.दि.)

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‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ लेख एकतरफा और सचाई से कोसों दूर लगा. वास्तव में जो लोग ओशो के विचारों से गहराई से परिचित नहीं हैं वे ही बेतुकी बातें लिखते हैं.

ओशो का जीवन संदेश, ध्यान और उन का जीवन उद्देश्य था मानव चेतना का उत्थान. उन्होंने कभी शिष्य बनाने की चेष्टा नहीं की. वे तो स्पष्ट रूप से कहते थे, मेरे विचार अच्छे लगें तो सुनो वरना यहां से खुशी से जा सकते हो. मु झे शिष्यों की भीड़ इकट्ठा करने का शौक नहीं है. आखिर में जो लिखा है वह उन के शिष्यों के आजूबाजू वालों की पहचान है उन की नहीं. उन की किताबों को अब भी पूरी तरह से सम झने वाले फालतू बातों पर ध्यान नहीं देते.
परेश अंतानी, राजकोट (गुज.)

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मई अंक पढ़ा. बकवास था. ओशो के बारे में अभी भी समाज में भ्रम है. ऐसे ही न छापें, पहले वास्तविकता जानें. आनंद शीला के ही स्टेटमैंट के आधार पर आप ने लेख छापा. और भी तो हैं, जिन से जानकारी ले सकते हैं. अगली बार आप चैतन्य कीर्ति, मां योग नीलम, मां अमृत साधना के स्टेटमैंट छापिए. वरना बात अधूरी ही रहेगी. सिक्के के दो पहलू होते हैं तो आप अब दूसरा पहलू भी छापिए.
चेतन संदीप

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लेख ‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ बड़ा ही मनोरंजक और हास्यास्पद लगा. आश्चर्यजनक प्रसन्नता हुई कि ओशो आज भी जनमानस को इतना  झक झोर रहे हैं. शायद ओशो के विषय में लेखक ने जो पासपड़ोस में सुना है, उस के आधार पर अपने लेख की रचना कर डाली और मां आनंद शीला की लिखी एक पुस्तक के छिटपुट अंश इंटरनैट इत्यादि माध्यम से पढ़ कर वाक्यों और उद्धरणों का चुनाव कर लिया जबकि उन के लेख में ही दिए गए मां शीला के ही साक्षात्कार तक में कोई भी निंदा भाव नहीं दिखाई पड़ता.

शायद इस लेख के लेखक इतने तिलमिलाए हुए मूड में लेखरचना करने बैठे थे कि उन्होंने ‘प्रौपर होमवर्क’ भी नहीं किया. मैं उन से यह जरूर जानना चाहूंगा कि वे कितनी बार ओशो से मिले थे या वे कितनी बार पूना कम्यून या अमेरिका कम्यून में रहे थे, या कम से कम किसी ‘मैडिटेशन कैंप’ में सम्मिलित हुए हैं, जिस से उन्हें इन तथाकथित ‘सनसनीखेज खुलासों’ का पता चल गया या फिर कम से कम यही पता चले कि ओशो की उन्होंने कितनी किताबें पढ़ी हैं या प्रवचन सुने हैं या वीडियो ही देखे हैं.
आशीष, भदोही (उ.प्र.) द्य

नैतिकता का पतन

लेख ‘तथाकथित ब्रह्मज्ञानी रजनीश का भ्रमजाल’ पढ़ा. बेबाक, निडर प्रकाशन के लिए बधाई. हम भारतीय किस हद तक अंधविश्वासी होते हैं, इस लेख से अनुमान लगाया जा सकता है. एक सामान्य व्यक्ति को हम भगवान की संज्ञा भी दे सकते हैं. उस के गुणोंअवगुणों का आकलन किए बिना, उसे गुरु मान लेना, हम लोगों की या भारतीय समाज की मान्यता जैसी रही है. इस सत्यकथा से हम सब लोगों को सबक लेना चाहिए. मु झे किसी विद्वान ने बताया कि यौनरोग (सिफलिस) जैसी विदेशी बीमारी, ऐसे ही बहुत से अरबपति साधुसंन्यासियों की कृपा से ही भारत में हुई है.
सत्यभान सारस्वत,  देहरादून (उत्तराखंड)

रणदीप की ‘हाइवे’ पार्टी

बौलीवुड अभिनेता रणदीप हुड्डा अपनी व्यस्तताओं के चलते फरीदाबाद में रह रहे अपने पिता से लंबे समय से नहीं मिले थे. जबकि वे पिता से मिलने के लिए काफी समय से कोशिश कर ही रहे थे. आखिरकार फिल्म ‘हाइवे’ ने उन्हें अपने पिता से मिलने का मौका दे दिया. दरअसल, ‘हाइवे’ की शूटिंग फरीदाबाद में हो रही है. सोने पर सुहागा यह हुआ कि इसी बीच उन के पिता का 66वां जन्मदिन भी पड़ा. फिर तो रणदीप ने यह जन्मदिन अपने पिता के साथ बड़े ही यादगार तरीके से मनाया. वाह रणदीप, यह मौका तो अच्छा रहा. इसी बहाने कम से कम घर तो आना हुआ.

विद्या के कपड़ों की नीलामी

फिल्म निर्देशक राजकुमार गुप्ता की कौमेडी फिल्म ‘घनचक्कर’ में विद्या बालन ने पंजाबी पत्नी का किरदार निभाया है. फिल्म की निर्माता कंपनी ‘यूटीवी’ और विद्या ने निर्णय लिया है कि फिल्म ‘घनचक्कर’ के प्रदर्शन के बाद फिल्म में विद्या बालन द्वारा पहने गए कौस्ट्यूम व पोशाकों की नीलामी कर के जो रकम हासिल होगी वह दान कर दी जाएगी. बीते साल डर्टी पिक्चर, कहानी और अब इस साल के कान फिल्म समारोह में जूरी मैंबर की हैसियत से शामिल होने वाली विद्या का यह चैरिटी अंदाज भी काफी अनोखा है.

 

बिग बी का तोहफा

बौलीवुड में अमिताभ बच्चन बहुत कम लोगों को ही गुलदस्ता वगैरह भेजते हैं. पिछले दिनों फिल्म ‘इशकजादे’ के लिए अभिनेत्री परिणिति चोपड़ा को स्पैशल ज्यूरी का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, तो अमिताभ बच्चन ने अपने हाथ से लिखा हुआ बधाई संदेश और एक गुलदस्ता परिणिति को भिजवाया. इसे पा कर परिणिति की खुशी का ठिकाना न रहा.

 

हौलीवुड की खुमारी

प्रियंका चोपड़ा हौलीवुड की फिल्म से जुड़ गई हैं. हालांकि वे अभिनय बल्कि डिजनी निर्मित व क्ले हाल निर्देशित एनीमेशन फिल्म ‘प्लेन्स’ में इशनी के पात्र को अपनी आवाज दे रही हैं. यह फिल्म बहुत जल्द पूरे विश्व  में अंगरेजी के अलावा हिंदी सहित 5 भाषाओं में प्रदर्शित होगी.

फिल्म के निर्देशक क्ले हाल कहते हैं, ‘‘हम ने अपनी फिल्म को भारत में रिलीज करने का मन बनाया है. मुझे भारत की सभ्यता व संस्कृति से लगाव है. इस के अलावा मैं ने प्रियंका चोपड़ा की फिल्म ‘दोस्ताना’ देखी थी. मुझे प्रियंका का काम पसंद आया था.’’ चलिए, फिल्म दोस्ताना से किसी का तो भला हुआ.

 

लखन का ऐक्शन

वर्ष 2003 में प्रदर्शित फिल्म ‘कलकत्ता मेल’ में ऐक्शन प्रधान किरदार निभाने के बाद अपने लखन यानी अनिल कपूर रोमांटिक या दूसरे किस्म के ही किरदारों में नजर आते रहे हैं. मगर अब तकरीबन 10 साल बाद अनिल कपूर ने भी ऐक्शन में वापसी की है. वे संजय गुप्ता व एकता कपूर निर्मित और संजय गुप्ता निर्देशित फिल्म ‘शूटआउट ऐट वडाला’ में जौन अब्राहम के साथ ऐक्शन करते हुए नजर आएंगे.

 

श्री

यह फिल्म हर किसी की समझ में आने वाली नहीं है. इस फिल्म में टाइम मशीन की कल्पना की गई है और कहा गया है कि इंसान चाहे तो समय से 1 या 2 दिन आगे चल सकता है. इसे समझाने के लिए निर्देशक ने टाइम ट्रैवल रिसर्च की बात की है कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है और खुद भी अपनी धुरी पर घूमती है, जिस से समय का पता चलता है. लेकिन जब कभी भूकंप आता है या सूनामी आती है तो समय का यह चक्र टूटता है. इस से समय के चक्र में कुछ सैकंड का अंतर आ जाता है. यही अंतर सालों बाद बढ़तेबढ़ते 12 घंटे तक का हो जाता है. यदि कोई व्यक्ति इस टाइम टूटने के दौरान पैदा हुआ हो तो वह टाइम ट्रैवल कर के 1 या 2 दिन आगे जा सकता है, उसे आगे होने वाली घटनाओं के बारे में पता चल जाता है.

भविष्य में झांकने की कल्पना करना सुनने में तो अच्छा लगता है लेकिन यह असंभव है. बौलीवुड में टाइम ट्रैवल पर कई फिल्में बन चुकी हैं. ‘श्री’ उन फिल्मों से बहुत पीछे है.

कहानी श्री (हुसैन कुवाजेरवाला) नाम के एक नौजवान की है जो एक टैलीकौम कंपनी में अकाउंटैंट है. एक दिन कंपनी का मालिक उसे एक औफर देता है जिस के बदले उसे 20 लाख रुपए देने तय होते हैं. बदले में उसे 12 घंटे देने हैं. वह तैयार हो जाता है. उसे कौफी में बेहोशी की दवा मिला कर पिलाई जाती है. जब उसे होश आता है तो देखता है कि उसे एक व्यक्ति ने कैद किया हुआ है. वह भाग निकलता है. तभी उसे पता चल जाता है कि कंपनी के मालिक ने उसे एक तकनीक के सहारे समय से 2 दिन आगे भेज दिया है. अब श्री के साथ समय की 2-2 घटनाएं, एक वर्तमान की और एक 2 दिन आगे की, चलने लगती हैं. उसे पता चल जाता है कि पुलिस कमिश्नर और वैज्ञानिक की हत्याएं होने वाली हैं. वह न सिर्फ आगे होने वाली घटनाओं को रोकता है बल्कि वापस वर्तमान में आ कर असली अपराधी को भी पकड़वाता है.

फिल्म की इस कहानी में काफी कन्फ्यूजन है. 2-2 कहानियां एकसाथ चलती हैं. एक श्री, जो वास्तव में है, दूसरा श्री जो 2 दिन आगे ट्रैवल कर रहा है. कौन असली है, कौन फ्यूचर वाला है, इसी में दर्शक उलझ जाते हैं. फिल्म भले ही तेज रफ्तार वाली है लेकिन फिल्म का नायक इस की सब से बड़ी कमजोरी है. फिल्म का निर्देशन साधारण है. मध्यांतर तक दर्शक इसी उलझन में रहते हैं कि आखिर श्री के साथ हुआ क्या है.

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