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आस्था की आड़ में गुलाम बनती नारी

जन्म से ले कर मृत्यु तक न जाने कितनी बार पंडेपुजारियों द्वारा मानव को स्वर्ग और नर्क के रास्ते दिखाए जाते हैं. ‘ऐसा करोगे तो स्वर्ग में जाओगे’, ‘वैसा करोगे तो नर्क मिलेगा.’ जिन लोगों ने ये भ्रांतियां फैलाई हैं उन्हें खुद नहीं मालूम है कि वे कहां जाने वाले हैं आज अंधविश्वासों, मिथकों और छद्म वैज्ञानिक तथ्यों में अत्यधिक बढ़ोतरी हो रही है. आज जो मिथ्या परंपरागत रीतिरिवाज हमारी आवश्यकता के अनुकूल नहीं हैं, उन्हें भी मात्र परंपरा के नाम पर बढ़ावा दिया जा रहा है. जैसेजैसे लड़की बड़ी होती है अकसर बड़ों को कहते सुनते हैं कि फलां व्रत करने से अच्छा पति मिलेगा. यदि व्रत, पूजापाठ से ही मनभावन जीवनसाथी मिलता तो सब का जीवन सुखशांतिपूर्ण होता. हमारे देश में अंधविश्वास अन्य देशों की तुलना में कुछ अधिक ही है, जोकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण की गैरमौजूदगी को दर्शाता है, इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण भारत की तात्कालिक आवश्यकता है. यदि हम अपने दैनिक जीवन में वैज्ञानिक दृष्टिकोण रखेंगे तो हम व्यक्तिगत एवं सामाजिक घटनाओं के तर्कसंगत कारणों को जान सकेंगे, जिस से असुरक्षा की भावना और निरर्थक भय से छुटकारा प्राप्त हो सकेगा.

शकुनअपशकुन की मान्यताएं

हमारे समाज में अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली कथाओं से ले कर शकुनअपशकुन की अनगिनत मान्यताएं कौओं से जुड़ी हैं. यों भारतीय समाज में कौओं को धूर्त पक्षी मानते हैं पर श्राद्धपक्ष में उन की खूब आवभगत होती है. कौआ मुंडेर पर बैठे तो मेहमान आने का संकेत माना जाता है, पर महंगाई के इस युग में अतिथि आ जाए, यह कौन चाहेगा  अब अंधविश्वास के विरोधी माने जाने वाले सिद्धारमैया को ही देख लें, कार पर कौआ बैठा तो उन के लिए वह शुभ ही सिद्ध हुआ, नई महंगी कार जो आ गई. सूचना क्रांति के दौर में हम भले ही अंतरिक्ष और चांद पर बस्ती बसाने की सोच रहे हों, लेकिन अंधविश्वास अब भी हमारा पीछा नहीं छोड़ रहा है. वैज्ञानिक युग के बढ़ते प्रभाव के बावजूद अंधविश्वास की जड़ें समाज से नहीं उखड़ रही हैं. अंधविश्वास को दूर करने के लिए कुछ लोग वर्षों से प्रयासरत हैं, लेकिन इन प्रयासों का अब तक कोई सार्थक परिणाम नहीं निकल पाया है. निकले भी कैसे  यहां तो सब मौकापरस्त हैं. अपने पाले में गेंद आते ही दूसरे के लिए उछाल दी जाती है.

सरकारें चुप हैं और मीडिया ऐसे ढोंगियों के प्रसार का सहयोगी. आज घरघर में टीवी तो मिल जाएगा पर ज्ञान देने वाली पत्रिकाओं का अभाव होगा. अंधविश्वास फैलाने वालों का बड़ा नैटवर्क इंटरनैट पर छाया हुआ है. लोग डाक्टर से ज्यादा ऐसे ढोंगी तांत्रिकों पर यकीन करने लगे हैं. इन बहुरुपियों की शिकार ज्यादातर महिलाएं हो रही हैं और महिलाओं के जरीए पुरुष भी इन के शिकार बन रहे हैं. विडंबना तो यह है कि जिस जादूटोने को विज्ञान मानने से इनकार करता रहा है आज उसी वैज्ञानिक तकनीक के सहारे तंत्रमंत्र का जाल बिछा हुआ है. लोगों की महत्त्वकांक्षाएं बढ़ी हैं तो फर्जी लोगों का जाल भी बढ़ रहा है. चूंकि हर हाथ में फोन है और इंटरनैट की पहुंच भी बढ़ रही है तो अंधविश्वास का कारोबार भी इसी के जरीए आप तक पहुंच रहा है.

गलत परंपरा

हालत यह है कि चाहे सफर हो, बाजार हो हर तरफ इस तरह के विज्ञापन और साइटें नजर आ रही हैं, जो एक क्लिक के साथ जीवन को खुशियों से भरने का दावा कर रही हैं. अंधविश्वास लोगों के उत्पीड़न, हत्याओं का कारण बनता जा रहा है. इस की शुरुआत ढोंगी ओझाओं और तांत्रिकों की बदनीयती और गलत सलाह से शुरू होती है. कई जगह कुछ गलत परंपराएं भी आग में घी का काम करती हैं. देखने में आया है कि जब कभी अंधविश्वास से संबंधित घटनाओं का भंडाफोड़ किया जाता है, तो सभी दुख अवश्य प्रकट करते हैं, लेकिन जब कभी अंधविश्वास पर चोट करते हुए सवाल खड़े किए जाते हैं तो सब कन्नी काट जाते हैं.

लोग ‘हम नहीं जानते’ वाले इस नजरिए को उम्र भर जीते हैं. हमारा नजरिया, हमारी सोच सब पहले से तय होता है और इस अंधविश्वास की जड़ें सब से गहरी औरतों में ही होती हैं, हालांकि पुरुष भी इस से अछूते नहीं. इस मामले में कुछ महिलाएं इन बातों पर चर्चा करना पसंद नहीं करतीं, क्योंकि उन्हें लगता है कि दूसरों पर उंगली उठाना सही नहीं है. जबकि कुछ महिलाएं मौका मिलते ही कह देती हैं, ‘‘हमारे हिसाब से यह दुनिया की सब से बड़ी बेवकूफी है कि आस्था पर तर्क किए जाएं चाहे वह आस्था विज्ञान को ले कर ही हो.’’ वहीं इन से इतर कुछ महिलाएं जिन के दिमाग में क्या चलता रहता है, यह समझना मुश्किल हो जाता है. इसीलिए वे कभीकभी कंफ्यूज हो कह बैठती हैं, ‘‘यह बहुत अच्छा है कि साइंस के जरीए आप रूढिवादी सोच को आगे बढ़ने से रोकने का प्रयास कर रहे हैं.’’

धर्म के धंधेबाज

ज्यादातर महिलाएं धार्मिक मुद्दों पर चुप रहना अथवा बिना टिप्पणी किए निकल जाना बेहतर समझती हैं, भले ही वे समाज में महिलाओं की स्थिति के प्रति चिंता व्यक्त करती रहती हों, उन्हें विषय बना कर कविताएं और कहानियां लिखती रहती हों. महिलाएं इस बात को समझने में असमर्थ हैं कि अंधविश्वास उन्हें बंधनों में बांध कर रखने का एक कारगर अस्त्र है. अंधविश्वास से जूझे बिना हम पूरी तरह से सफल नहीं हो सकते हैं. दरअसल, औरतों के पास अंधविश्वास से जूझने का वास्तविक हौसला नहीं है. महिलाओं में बचपन से धार्मिक भावनाएं ज्यादा ठूंस दी जाती हैं और वे उद्देश्यों की तुलना में अंधविश्वास को ज्यादा महत्त्व देती हैं. धर्म वैसे भी नारी की गुलामी का सब से प्राचीन दस्तावेज है. धर्म से मुक्ति स्त्री मुक्ति की पूर्वपीठिका है. धर्म पर विश्वास और अंधविश्वास में कोई फर्क नहीं है. जहां विश्वास का आधार एकतरफा श्रद्धा है.

वहां यह अंध ही हो सकता है. धर्म के धंधेबाजों ने औरतों को बड़ी चालाकी से अंधविश्वासों में उलझा रखा है ताकि उन को दानदक्षिणा मिलती रहे. धार्मिक अंधविश्वास ही महिला अधिकारों की राह में सब से बड़े रोड़े हैं. इन से जूझे बिना नारी की आजादी असंभव है. बिल्ली, कुत्ते, चांद, सूरज आदि से जुड़े कई अंधविश्वास हैं, जो आम हैं पर छोटीमोटी और भी कई अंधविश्वासी बातें हैं जिन से हम स्वयं ही जुड़ जाते हैं व कभीकभी लेने के देने पड़ जाते हैं.

सोच बदलने की जरूरत

इन में से कुछ हैं- सब्जी वाला झूठी तारीफ करेगा कि हम ने उस से सब्जी ली तो उस की खूब बिक्री हुई तो हम खुश हो कर रोज सब्जी लेंगे या आज फलां रंग के कपड़े पहने तो मेरा दिन अच्छा गया. कुछ औरतें गर्भावस्था में काली वस्तु का सेवन इसलिए नहीं करतीं कि कहीं बच्चा काला न हो जाए. ये सब दकियानूसी बातें अंधविश्वास का ही तो एक रूप हैं जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती हैं. यह अंध नजरिया ले कर कोई मां के गर्भ से पैदा नहीं होता. स्त्री को शोषित करने वाला समाज भी स्त्री के द्वारा ही बनाया जाता है. अकसर लोग यह कहते हैं कि सोच बदलो तो समाज बदलेगा. पर क्या सच में ऐसा हो सकता है  जब उन में से किसी पर कोई बात आती है तो वही मुंह छिपाने लगता है. भारतीय स्त्रियां धार्मिक मान्यताओं के नाम पर तमाम ऐसी रूढियों को सहर्ष गले लगा कर बैठी रहती हैं जो उन के विरुद्ध ही रची गई हैं. यह निश्चित है कि किसी बीमार को जितनी चिंता अपने इलाज की स्वयं होगी, किसी अन्य को नहीं होगी, पर क्या यह चिंता वाकई रोगनिवारण के लिए है या रोगी के लिए

दोषी नारी ही क्यों

धर्म ने तो स्त्रियों के लिए पति के चरणों को ही स्वर्ग की संज्ञा दी है और पति उस स्वर्ग का देवता. कितना अजीब सा लगता है कि आदमी के लिए कोई तय मानक नहीं. जिंदगी भर एक सुरक्षाकवच ओढ़े रहता है. कभी मां के नाम का तो कभी पत्नी के नाम का. मतलब यह कि शादी से पहले उस की लंबी आयु के लिए पहले मां पूजापाठ करती है, तो बाद में पत्नी. ऐसे में कोई अनहोनी हो जाए तो सारा दोष उस स्त्री का. कन्या भ्रूण हत्याओं का ठीकरा भी स्त्रियों के ही सिर फोड़ा जाता है, क्योंकि उन्हीं को बेटा चाहिए होता है. क्यों चाहिए होता है स्त्री को बेटा  क्यों वह अपनी ही कोख में अपनी बेटी के मार दिए जाने की पीड़ा बयां नहीं कर सकती  क्यों उस ने समझ लिया है कि बेटी को जन्म दे कर वह अपना बचाखुचा वजूद भी खो देगी  उस का सम्मान, उस का गौरव, उस के अधिकार सब एक बेटे के जन्म पर आश्रित हैं, इसलिए वह बेटे की कामना करती है, जिस का दंश भी उसी को ही सहना पड़ता है. यह काला समाज है. स्त्री के लिए न कोई अधिकार है यहां, न सुरक्षा, न जीने लायक जीवन. मीडिया में, सेना में, मैडिकल में, बैंक में, बिजनैस में जाने वाली लड़कियों की बाहर की दुनिया तो बदली, लेकिन घरेलू संघर्ष नहीं बदले. ये संघर्ष धर्म की देन हैं पर औरतों में इतनी हिम्मत नहीं कि वे दकियानूसी बेडि़यों को उतार फेंकें.

कैसे निकलें शिकंजे से

एक ऐसी स्त्री जो सुपरवूमन है. जो घर से बाहर तक, क्लब से बिस्तर तक सब हंसते हुए संभाल लेती है, जो सब को समझ लेती है, सब के काम फुरती से निबटा लेती है, जो भले ही नाइटक्लब में जाती हो, लेकिन मंगलसूत्र और करवाचौथ से विमुख नहीं होती. इस समाजरूपी रेलगाड़ी के हर डब्बे में वही बिक रहा है, जिस की इजाजत समाज ने दी है. यात्रियों को आजादी तो पूरी है, लेकिन अपनेअपने डब्बे के भीतर भर. आसमान देखा तो जा सकता है, लेकिन पूरा नहीं और इस बात का इल्म भी नहीं होने देना है कि अपनी जिंदगी से हम ही मिसिंग हैं. धर्म और धर्म की बनाई मान्यताओं की जड़ें हमारे जेहन में गहरी होती जा रही हैं. धर्म की खाने वालों ने स्त्रियों को अपने स्वार्थ के लिए शिकंजे में फंसा रखा है. स्त्रियों को आजादी, तरक्की के लिए खुद धर्म के जंजाल को काट फेंकना होगा.

खुद बनें अपने प्रेरक

खुद को प्रेरणा देना, खुद को सलाह देना बहुत सुंदर परिकल्पना है. कैसी भी स्थिति आ जाए खुद को राय देना और अपनेआप से मशविरा करना बहुत सकारात्मक रिजल्ट दिलवा देता है. आप को बता दें कि हवा जब दीपक की लौ से टकराती है तब वह लौ चाहे छोटी सी भी क्यों न हो, हवा से संवाद करती है. हवा को आगे जाने को कहती है. फिर और अधिक प्रकाश के साथ जगमगाने लगती है. कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति मनुष्य रूप देती ही इसलिए है ताकि इंसान हजारों बाधाओं को पार कर जीवन में अपने लिए एक मुकाम हासिल कर सके.

एक दार्शनिक का यह मत है कि जीवन में कभी भी, कहीं भी प्रेरणा की कमी नहीं होती. बात तो तब अनूठी होगी जब इंसान अपने ऊपर फेंके गए पत्थरों से एक खूबसूरत इमारत बना ले और उस को भी प्रेरक रूप दे दे.

एक कवि ने कल्पना की है,

‘ढूंढ़ सकते हैं रत्न समंदर की अथाह गहराई से,
खोज सकते हैं नए सितारे इस अबूझे अंतरिक्ष में,
आखिर मुश्किल क्या है उस के लिए जो,
हर बात में अपने लिए प्रेरणा का दर्शन करता है.’

यह घटना सुप्रसिद्ध विचारक लुईस पाश्चर ने लिखी है कि एक बार एक गरीब किसान महात्मा गांधी के पास आया और उस ने उन्हें बताया कि वह बिहार के चंपारण गांव से आया है जहां काश्तकारों को अंगरेज जमींदारों ने बहुत दुखी कर रखा है. गांधीजी बड़े अचंभे में पड़ गए कि यह निर्धन किसान अपना कामधंधा, खेतीबाड़ी छोड़ कर चंपारण से यहां इतनी दूर आश्रम में उन के पास आया. गांधीजी ने उस से कुछ बातचीत की तो पता लगा कि वह अपने मन की राह पर चल कर यहां तक आया. उस की सरलता महात्मा गांधी को भीतर तक छू गई थी. गांधीजी उस के साथ चल पड़े. वहां जा कर उस के लिए, उस के साथियों के लिए न्याय मिलने तक संघर्ष करते रहे.

विद्वानों का कहना है कि इस जगत में ऐसा कुछ भी नहीं है जिस के लिए खुद को प्रेरणा नहीं दी जा सके. याद कीजिए वह क्षण, जब प्रेम के एक खूबसूरत प्रतीक ताजमहल का निर्माण करने की प्रेरणा शाहजहां के मन में जागी होगी. इस से ऐसी बेहतरीन कृति, उभर कर आई कि आज तक लाखोंकरोड़ों के लिए प्रेरणा का सबब बनी हुई है. कहने का तात्पर्य है कि पराजित वह होता है जो स्वयं से संवाद करना बंद कर देता है. माना कि जीवन की जद्दोजेहद बहुत सारी हैं और उन का कोई रूप हमें दिखाई भी नहीं दे रहा है पर अपने अंतर्मन से राय ले कर देखें, तमाम जटिलताएं सुलझ जाएंगी.

– पूनम पांडे

मूंगफली : जाड़े का मेवा

मूंगफली को गरीबों का बादाम कहा जाता है, कारण है मूंगफली के दानों में बादाम सी पौष्टिकता होना. बादाम जहां बहुत महंगा मेवा है, वहीं मूंगफली सस्ती व सर्वसुलभ होती है. अब तो मूंगफली के भुने हुए दानों के पैकेट अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों ने भी बेचने शुरू कर दिए हैं. दालमोठ, मिठाई व गुड़पट्टी में तो इसे मिला कर पहले से ही बनाया जा रहा है. मूंगफली की खेती बहुत पहले पेरु में की जाती थी. पेरु से ब्राजील, पुर्तगाल व स्पेन होते हुए यह चीन पहुंची और चीन से भारत के बंगाल में आ कर लहराने लगी, इसलिए बंगाल में मूंगफली को चीनी बादाम कहा जाता है. दक्षिणभारत में मूंगफली के बीज फिलीपींस से आए इसलिए वहां इसे मनीलाकोटि के नाम से जाना जाता है.

पेरु की राजधानी लिमा के पास एक शहर है, पकाका मैक. यहां सैकड़ों साल पहले एक अधिकारी, कुछ कब्रें खुदवा रहा था कि अचानक एक बरतन में लंबे, टेढ़ेमेढ़े बीज दिखाई दिए, जिन्हें देखते ही वह चीख पड़ा. बाद में इन बीजों को बालुई मिट्टी में बोया गया तो कुछ समय बाद हरेहरे बेलनुमा पौधे लहरा उठे. इस तरह पेरु में मूंगफली का जन्म हुआ. कोलंबस ने जब नई दुनिया की खोज की तब तक मूंगफली की खेती पेरु के अलावा ब्राजील में भी होने लगी थी. 1513-14 तक मूंगफली की खेती स्पेन, पुर्तगाल, ऊरुग्वे, बोलेविया, अर्जेंटीना, पेरागुवे तक फैल चुकी थी. स्पेन व पुर्तगाल के सौदागर इसे पूरी दुनिया में पहुंचाने में लगे थे. जावा, सुमात्रा, जापान, चीन से होते हुए मूंगफली भारत आई. भारत में मूंगफली का आगमन 16वीं शताब्दी में हुआ.

वनस्पति शास्त्रियों के अनुसार मूंगफली दलहनी वंश का लैग्यूमिनेसी श्रेणी का अरेचीस हायपोजिया जैसे उपयोगी तेल पदार्थ वाला पौधा है. मूंगफली के पौधे, बालुई मिट्टी में हरेभरे रहते हैं. जूनजुलाई में जैसे ही पहली बरसात होती है किसान इस के बीज बो देते हैं. इस के लिए ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती. अगस्तसितंबर में छोटेछोटे पीले रंग के फूल पौधों पर आते हैं, जो धीरेधीरे जमीन के अंदर समा जाते हैं. बाद में मूंगफली के फल मिट्टी के अंदर जड़ों में लगते हैं, जिन्हें पकने पर आलू की तरह जड़ों से खोद कर निकाल लिया जाता है. सितंबरअक्तूबर में मूंगफली की फसल की खुदाई होने लगती है और फिर गरम बालू में भून कर मूंगफली बाजार में बिकने लगती है. इस के दाने छिलकों के अंदर रहते हैं. दानों पर लाल रंग की झिल्ली चढ़ी होती है. आज भारत मूंगफली का एक प्रमुख उत्पादक व निर्यातक देश है. भारत यूरोप व जापान आदि देशों को मूंगफली निर्यात करता है. करीब 100 करोड़ रुपए का व्यवसाय विदेशों से प्रतिवर्ष होता है. बिस्कुट, दवाएं, खा- तेल, वनस्पति घी बनाने में आज मूंगफली का प्रयोग आम है.

शादी के लिए पहले प्यार होना जरूरी : अमृता राव

भोलीभाली सूरत की वजह से फैंस के दिलों में खास जगह बनाने वाली अमृता ने अपने 14 साल के फिल्मी कैरियर में कुल 24 फिल्में की हैं. उन का नाम उन के दादाजी अमृत के नाम पर रखा गया है, जिन्होंने सुभाषचंद्र बोस के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया था. मौडलिंग से अपना कैरियर शुरू करने वाली अमृता को पहला ब्रेक महज 17 साल की उम्र में मिला था. एक फेयरनैस क्रीम की मौडलिंग के लिए 60 मौडल्स में से उन्हें चुना गया था. करीब 35 से ज्यादा कमर्शियल ऐड करने के बाद उन्हें बौलीवुड में ऐंट्री 2002 में राजकुंवर की फिल्म ‘अब के बरस’ से मिली. इस फिल्म में उन्होंने लीड रोल निभाया. उन के अपोजिट राज बब्बर के बेटे आर्य बब्बर थे. संगीत की शौकीन अमृता की असली पहचान सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘विवाह’ से मिली. 2011 में मोस्ट डिजायरेबल ऐक्ट्रैस की लिस्ट में शामिल हुईं अमृता ने बौलीवुड में कोई खास मुकाम हासिल न होने पर छोटे परदे का रूख कर लिया है. पिछले दिनों मैट्रोमोनिअल साइट्स ‘लव विवाह’ के लौंच पर पहुंचीं अमृता ने अपनी शादी और छोटे परदे के अनुभवों को साझा किया. पेश हैं, कुछ चुनिंदा अंश:

आप की शादी बहुत सीक्रेट रही

ऐसा तो मेरा कोई सीक्रेट नहीं है, जो आप लोगों से छिपा हो. मैं और अनमोल पिछले 7 सालों से एकदूसरे को जानते थे. जब हमें लगा कि हमें अपने रिश्तों को नाम देना चाहिए तब घर वालों की मरजी से हम ने शादी कर ली. लोग कहते हैं कि शादी के बाद जीवन बदल जाता है, लेकिन मुझे तो अपनी लाइफ में कोई बदलाव नजर नहीं आता. जैसा पहले थी वैसी ही आज हूं, वही लाइफस्टाइल, वही सोच किसी में भी चेंज नहीं आया.

किसी भी शादी में प्यार का होना कितना जरूरी है

प्यार में पड़े बगैर शादी सफल नहीं हो सकती फिर चाहे वह लव मैरिज हो या अरेंज्ड मैरिज. लव मैरिज में तो मैं मानती हूं कि दोनों एकदूसरे की पसंदनापसंद के बारे में पहले से जानते हैं. पर अरेंज्ड मैरिज में तो दोनों एकदूसरे से तब तक अनजान रहते हैं जब तक एकदूसरे को पर्याप्त समय नहीं देते.

मैं सभी अभिभावकों से कहना चाहती हूं कि अगर आप का बेटा या बेटी आप की पसंद के अनुसार शादी करने जा रही है तो शादी के समय को ले कर उस पर दबाव न डालें, बल्कि दोनों को एकदूसरे को समझने का समय दें ताकि वे समझ सकें कि उस के साथ जिंदगी की गाड़ी आसानी से दौड़ाई जा सकती है या नहीं.

शादी में मैट्रोमोनिअल साइट्स कितनी सहायक हैं

पहले शादी एकदूसरे के बताने पर ही हो जाती थी, पर अब समय बदल गया है.  कैरियर की तलाश में लोगों ने अपने आशियाने अलगअलग जगह बना लिए हैं. समय की कमी सभी के पास है. इसी के चलते ये वैवाहिक साइट्स बहुत फायदेमंद साबित हो रही हैं. इन में आप अपनी अपेक्षाओं के अनुसार रिश्ते की तलाश कर सकते हैं.

फिल्म ‘सत्याग्रह’ के बाद लंबे ब्रेक की क्या वजह है

फिल्मों से दूरी जरूर हो गई थी लेकिन मैं ने ऐक्ंिटग से दूरी बिलकुल नहीं बनाई. ‘सत्याग्रह’ फिल्म करने के बाद मैं फिल्मों के रूटीन से उकता गई थी. मेरी बहन प्रतिभा जो छोटे परदे की अच्छी कलाकार हैं, ने कहा कि चेंज के लिए छोटा परदा मेरे लिए बिलकुल सही जगह है. उसी समय ऐंड टीवी का शो ‘मेरी आवाज ही पहचान है’ का औफर मेरे पास आया. जब मैं ने शो की कास्ट पर नजर डाली तो दीप्ति नवल से ले कर जरीना बहाव, सलमा आगा सभी इस शो का हिस्सा थीं. मैं ने जब इतने लोगों को देखा तो तुरंत काम करने को हां कह दी.

छोटे परदे का कैसा अनुभव रहा

जितना मैं सोच कर आई थी उस से बढ़ कर यहां सीखने को मिला. टीवी का शैड्यल फिल्मों से बिलकुल अलग होता है. यहां आप को ज्यादा समय अपनेआप को साबित करने के लिए दिया जाता है. आप लाखों दर्शकों के सामने रोज आते हैं. मेरा भी शो ‘डेली सोप’ था, जिस में काम कर के मुझे बहुत मजा आया. सच मानिए, छोटे परदे पर आना मेरे किसी सपने के सच होने के बराबर है.

आज के टीवी शो में क्या अभाव खलता है

अच्छे कंटैंट का अभाव आज भी टैलीविजन शोज में देखने के मिलता है. अगर अच्छा कंटैंट हो तो शो यादगार बन जाता है. दूरदर्शन पर समाप्त होने वाला शो ‘बुनियाद’ इतने साल बीत जाने पर भी लोगों के दिलोदिमाग में बसा है. कुछ सालों से बौलीवुड के कलाकार भी छोटे परदे का रूख करने लगे हैं. इस जुगलबंदी की शुरुआत अमितजी ने बहुत पहले कर दी थी. उस के बाद कई कलाकारों ने छोटे परदे का रूख किया. क्योंकि सभी जानते हैं कि अगर दर्शकों के जेहन में जिंदा रहना है तो टीवी पर आना ही होगा. इस में सब से बड़ा योगदान टैक्नोलौजी और पब्लिसिटी का भी है. आज के टीवी शोज के बजट और निर्माण की प्रक्रिया किसी भी हाल में एक फिल्म के बजट से कम नहीं है.

आप ने हमेशा सीधीसादी घरेलू लड़की का किरदार निभाया है. क्या वास्तव में अमृता ऐसी ही हैं

हां, मुझे ज्यादा तड़कभड़क पसंद नहीं है. निजी जिंदगी में भी मैं ऐसी ही घरेलू टाइप लड़की हूं. एक शौक जो मुझे बचपन से रहा है वह है गाने का. मेरे घर वाले फिल्मों में आने से पहले मेरे बारे में यही जानते थे कि मैं बड़ी हो कर सिंगर बनूंगी. मेरा फिल्मों में आना मेरे घर वालों को मेरा हैरान करने वाला निर्णय था. मैं जितने भी गाने गाती हूं अपने मन से गाती हूं. मुझे भावपूर्ण गाने बहुत पसंद हैं.

सूरज के साथ एक सफल फिल्म के बाद आप ने उन की दूसरी फिल्म के लिए मना क्यों कर दिया

यह सच है कि सूरज बड़जात्या की फिल्म ‘विवाह’ से मुझे काफी लोकप्रियता मिली थी. उन की 2015 में आई फिल्म ‘प्रेम रतन धन पायो’ में जो किरदार मुझे औफर हुआ था उस के लिए मना किया था. फिल्म के लिए कभी मना नहीं किया था. मुझे सलमान खान की बहन बनने को कहा गया था, जिस में नैगेटिव और कई अलगअलग किरदार की परतें थीं. मैं अभी इतनी जल्दी नैगेटिव भूमिकाएं नहीं करना चाहती हूं.  

अमृता यों रहीं चर्चा में

– फिल्म ‘जब वी मेट’ की शूटिंग के दौरान शाहिद कपूर और करीना कपूर के बीच हुए ब्रेकअप की वजह अमृता को बताया गया. हालांकि अमृता ने इस बात से इनकार करते हुए कहा कि यह सिर्फ अफवाह है.

– 2015 में जयपुर में एक ज्वैलरी के उद्घाटन से लौटते समय अमृता की वैनिटी वैन से किसी ने 7 लाख की डायमंड ज्वैलरी चुरा ली थी. इस के बाद भी अमृता ने किसी के खिलाफ पुलिस में मामला दर्ज नहीं कराया था.

– अमृता ऐक्ट्रैस और मौडल के अलावा एक बेहतर सिंगर भी हैं. शाहिदअमृता का इश्क एक समय सुर्खियों में था. बौलीवुड ऐक्टर शाहिद कपूर के साथ फिल्मी स्क्रीन शेयर करने के बाद फैंस ने इन की जोड़ी शाहिद के साथ बना दी. इस के बाद अमृता की ज्यादातर फिल्में शाहिद के साथ आईं और वे बौक्स औफिस पर सुपरहिट भी साबित हुईं. लेकिन शाहिद के साथ अपनी रिलेशनशिप पर चुप्पी तोड़ते हुए अमृता ने कहा कि उन्होंने शाहिद को कभी डेट नहीं किया. वे शाहिद की सिर्फ एक अच्छी दोस्त और उन की कोस्टार है.

– 2009 में प्रियंका चोपड़ा और हरमन बावेजा के ब्रेकअप की वजह भी अमृता राव को बताया गया, जिस पर अमृता का कहना था कि दोनों का ब्रेकअप उन की अपनी मिसअंडरस्टैंडिंग की वजह से हुआ, न कि उन की वजह से.

भाजपा-शिवसेना की दोस्ती में दरार

महाराष्ट्र में बाइस साल पुराना बीजेपी और शिवसेना का गठबंधन टूट गया.  शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इसका एलान कर कर दिया. अब सवाल ये है कि क्या बीजेपी शरद पवार की पार्टी से गठबंधन करेगी?

कल एक रैली को संबोधित करते हुए उद्धव ठाकरे ने कहा, “अगर आप मुझे वचन दोगे तो मैं अभी आपको मेरा फैसला बता रहा हूं, इसके आगे शिवसेना अकेली महाराष्ट्र में लड़ेगी. गठबंधन के लिये मैं किसी के भी आगे कटोरा ले कर खड़ा नही रहूंगा. इसके आगे जो भी रहेगा वो मेरा और मेरे शिवसेना का रहेगा. किसी से भी भीख नही मागूंगा.” रैली में उद्धव ठाकरे ने सिर्फ गठबंधन तोड़ने का ही एलान नहीं किया बल्कि बीजेपी पर भी जमकर बरसे.

उद्धव ठाकरे के बयान पर बीजेपी की तरफ से खुद सीएम ने जवाब दिया. फडणविस ने ट्वीट किया, ”सत्ता यह साध्य नही, साधन है विकास का! जो आए उसके साथ, जो ना आए उसके बिना…परिवर्तन तो होकर ही रहेगा !”

क्या बीजेपी एनसीपी के साथ गठबंधन करेगी?

इस बात में दम इसलिए लगता है क्योंकि हाल के दिनों में शरद पवार और बीजेपी के बीच नजदीकी बढ़ी है. दो दिन पहले ही शरद पवार को पद्म विभूषण का सम्मान भी देने का एलान किया गया. उद्दव ठाकरे ने रैली में इस पर नाम लिए बिना कटाक्ष भी किया. उद्धव ने कहा कि कल जो पद्म पुरस्कार दिए गए उनमें एक पुरस्कार गुरुदक्षिणा में भी दिया गया. शरद पवार और बीजेपी की दोस्ती को लेकर चर्चा गरम है लेकिन फिलहाल पवार अपने पत्ते नहीं खोल रहे.

बीएमसी चुनाव दूसरा मौका है जब बीजेपी-शिवसेना अलग अलग चुनाव लड़ेंगी. इससे पहले पिछला विधानसभा चुनाव भी दोनों अलग अलग ही लड़े थे. चुनाव बाद गठबंधन हुआ था और दोनों पार्टियों ने मिलकर सरकार बनाई थी, फिलहाल महाराष्ट्र के साथ साथ केंद्र की मोदी सरकार में भी शिवसेना बीजेपी के साथ है.

उद्धव ठाकरे कह रहे हैं कि अब आगे कभी गठबंधन के लिए किसी के दरवाजे पर नहीं जाएंगे. इससे एक और सवाल खड़ा हो गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में क्या होगा? अभी केंद्र सरकार में शिवसेना बीजेपी के साथ सहयोगी है.

क्या है विधानसभा का गणित?

बीएमसी चुनाव से पहले शिवसेना ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ दिया है, अब सवाल है कि क्या महाराष्ट्र की सरकार से भी शिवसेना समर्थन वापस लेगी. अगर ऐसा होगा तो क्या होगा, आंकड़ों के जरिए आपको पूरा गणित समझाते हैं. महाराष्ट्र विधानसभा में कुल 288 सीटें हैं इनमें बीजेपी के पास 122, शिवसेना के पास 63 कांग्रेस के पास 42, एनसीपी के पास 41 और 20 सीटें अन्य के पास हैं.

288 सीटों की विधानसभा में बहुमत के लिए 145 सीटें चाहिए. अभी बीजेपी और शिवेसना को मिलाकर कुल 185 सीटें हैं यानी बहुमत है. अब अगर शिवसेना अपना समर्थन वापस ले ले तो क्या होगा. बीजेपी के पास सिर्फ 122 सीटें बचेंगी जो की बहुमत से 23 सीट कम है. ऐसे में अगर एनसीपी बीजेपी को समर्थन दे तो बात बन जाएगी. बीजेपी के 122 और एनसीपी के 41 विधायक मिलकर कुल संख्या हो जाएगी 163 यानी बहुमत हो जाएगा.

क्या है पूरा मामला

गठबंधन की बातचीत में गतिरोध तब आया जब शिवसेना ने बीएमसी की कुल 227 सीटों में से 114 सीटों पर बीजेपी के दावे के विपरीत उसे महज 60 सीटों की पेशकश की. बीजेपी नीत केंद्र सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए शिवसेना प्रमुख ने आरोप लगाया कि देश में आज डर का माहौल है और सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ जो भी बोलता है, उसे राष्ट्रविरोधी बताया जाता है. BMC के साथ नासिक, पुणे, कोल्हापुर और नागपुर समेत राज्य के 10 नगर निगमों के लिए चुनाव 21 फरवरी को होने हैं. राज्य की 25 जिला परिषदों के लिए चुनाव दो चरणों में 16 और 21 फरवरी को होगा.

जिस्म की चाहत में जुर्म: भाग 2

इस से अवसाद में था. पुलिस ने दिव्य के मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया तो उस की लोकेशन देर रात तक बड़े तालाब के आसपास की मिलती रही.

पुलिस रात भर उस की तलाश करती रही, पर उस का कुछ पता नहीं चला. अगले दिन यानी 2 दिसंबर की सुबह वह उदयपुर शहर की फतेहपुरा पुलिस चौकी पर पहुंचा और वहां बताया कि उस का नाम दिव्य कोठारी है. चौकी पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर थाना सुखेर पहुंचा दिया.

थाने में दिव्य से पूछताछ की जाने लगी तो कभी वह रोने लगता तो कभी हंसने लगता. उस का कहना था कि वह रुचिता को मां की तरह मानता था. पत्र के बारे में उस का कहना था कि पूछताछ से डर कर उस ने पुलिस को वह पत्र लिखा था. दिन भर की पूछताछ में पुलिस को दिव्य से ऐसी कोई बात पता नहीं चली, जिस से हत्या के बारे में कुछ पता चलता.

पुलिस कृष्णवल्लभ से भी पूछताछ कर रही थी. अपराध स्वीकार करने के लिए पुलिस उस पर काफी दबाव बना रही थी. एक बार तो पुलिस ने हवा भी फैला दी कि कृष्णवल्लभ ने पत्नी की हत्या का अपना अपराध स्वीकार भी कर लिया है, लेकिन शाम को ही एसपी राजेंद्र प्रसाद गोयल ने कहा कि अभी ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, मामले की जांच चल रही है.

अगले दिन रुचिता का मोबाइल उदयपुर के सायरा के एक मजदूर के पास से मिल गया. उसे वह मोबाइल सड़क पर पड़ा मिला था. पुलिस ने रुचिता के मोबाइल नंबर की काल डिटेल्स खंगाली, लेकिन उस से भी कोई सबूत नहीं मिला. पोस्टमार्टम के बाद रुचिता की लाश उस के मायके वाले अजमेर ले कर चले गए और वहीं उस का अंतिम संस्कार कर दिया. पुलिस हिरासत में होने की वजह से कृष्णवल्लभ पत्नी के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हो सका.

3 दिसंबर को आखिर पुलिस ने रुचिता हत्याकांड का खुलासा कर दिया. एसपी राजेंद्र प्रसाद गोयल ने प्रेस कौन्फ्रैंस में बताया कि रुचिता की हत्या दिव्य ने की थी. वह साइकोसिस का मरीज है. उस ने यह हत्या इसी बीमारी के दौरे के दौरान की थी. यह ऐसी बीमारी है, जिस का दौरा आने पर वह अपनी मां की भी हत्या कर सकता था.

थाने में जब दिव्य के घर वालों को बुलवाया गया तो वह मां से मिलने के बाद उस की गोद में सो गया था. दिव्य ने पुलिस को यह भी बताया था कि अब तक वह 8 बार खुदकुशी की कोशिश कर चुका है.

लेकिन अगले दिन 4 दिसंबर को पुलिस द्वारा दिव्य को साइकोसिस बताने पर जांच पर सवाल उठ खड़े हुए. इस के बाद पुलिस ने कहा कि दिव्य पागल नहीं है, बल्कि पागल होने का नाटक कर रहा था. अगर वह पागल होता तो सीए की पढ़ाई कैसे करता. पुलिस ने दिव्य को उसी दिन अदालत में पेश कर के 8 दिसंबर तक के पुलिस रिमांड पर ले लिया.

5 दिसंबर को उदयपुर बार एसोसिएशन के निवर्तमान अध्यक्ष भरत जोशी और उपाध्यक्ष गोपाल सिंह चौहान के नेतृत्व में वकीलों का एक समूह एसपी राजेंद्र प्रसाद गोयल से मिला और उन से कहा कि महिला अधिवक्ता रुचिता की हत्या जैसे संवेदनशील मामले में जिस तरह हत्यारे को साइकोसिस बता दिया गया. इस पर सवाल उठे तो पुलिस अब कह रही है कि दिव्य पागल नहीं था, वह तो नाटक कर रहा था. पुलिस इस मामले की जांच योग्य अधिकारियों से कराई जाए, वरना अदालत में केस की सुनवाई के दौरान हत्यारा इस का अनुचित लाभ उठा सकता है.

2 दिनों में पुलिस द्वारा दिए गए अलगअलग बयानों की वीडियो क्लिपें बना कर लोगों ने वायरल कर दिया है. बगैर मैडिकल जांच के हत्या के अभियुक्त को मानसिक रोगी बता देना पुलिस की बहुत बड़ी संवेदनहीनता और लापरवाही है.

यहां सवाल यह उठता है कि आखिर दिव्य ने रुचिता की हत्या क्यों की थी? पुलिस द्वारा दिव्य से की गई पूछताछ में इस हत्याकांड की जो कहानी उभर कर सामने आई है, वह इस प्रकार थी—

कृष्णवल्लभ गुप्ता कोटा के रामपुरा के रहने वाले एस.आर. गुप्ता के बेटे थे तो रुचिता उर्फ अनु अजमेर के केसरगंज के रहने वाले दुलीचंद जैन की बेटी थी. रुचिता और कृष्णवल्लभ ने सन 2003 में प्रेम विवाह किया था. शादी के बाद दोनों उदयपुर में किराए का मकान ले कर रहने लगे थे.

गुजरबसर के लिए कृष्णवल्लभ एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगा था. इस के अलावा वह बीएसएनएल में ठेकेदारी के साथसाथ एकाउंट्स का काम भी करता था. बहुधंधी होने की वजह से वह ठीकठाक कमाई कर लेता था. शादी के बाद बेटी हुई तो उस का नाम रखा गया अविशी उर्फ तनु, जो इस समय 9 साल की है. इस के साल भर बाद ही बेटा अरनव उर्फ मिशु हो गया.

कृष्णवल्लभ के पास पैसा आया तो उदयपुर के न्यू भूपालपुरा में लक्ष्मण वाटिका के पास आर्बिट-1 अपार्टमेंट में उन्होंने अपना एक फ्लैट खरीद लिया, जो 8वीं मंजिल पर था. उन्हीं के फ्लैट के सामने अरविंद कोठारी रहते थे, दिव्य कोठी उन्हीं का बेटा है. आमनेसामने रहने की वजह से दोनों परिवारों का एकदूसरे के यहां आनाजाना ही नहीं था, बल्कि अच्छा मेलजोल भी था.

एक साल पहले कृष्णवल्लभ ने 8वीं मंजिल वाला अपना फ्लैट बेच कर 7वीं मंजिल पर फ्लैट खरीद लिया. इस के अलावा उन्होंने विश्वविद्यालय रोड पर एक भूखंड भी खरीद लिया. एक मंजिल नीचे आने के बाद भी कोठारी और उन में मेलजोल बना रहा. दिव्य लगभग रोज रुचिता के यहां आता था. वह उन्हें आंटी कहता था.

रुचिता की उम्र करीब 35 साल थी, लेकिन कदकाठी ऐसी थी कि अभी भी उन में गजब का आकर्षण था. शायद यही वजह थी कि दिव्य उन की ओर आकर्षित हो गया. वह मन ही मन उन्हें प्यार करते हुए उन्हें हासिल करने के बारे में सोचने लगा.

वह रुचिता के साथ डांडिया, बैडमिंटन खेलता और जब वह योगा करतीं तो उन्हें चाहतभरी नजरों से ताकता रहता. अब वह अकसर उन के घर में पल रहे कछुए से खेलने के बहाने आने लगा.

पहली दिसंबर की सुबह साढ़े 8 बजे के करीब कृष्णवल्लभ कालेज के लिए फ्लैट से निकले तो दिव्य ने स्कूटर से कुछ दूरी तक उन का पीछा किया, ताकि पता चल सके कि वह कहां जा रहे हैं. जब उस ने देखा कि वह कालेज गए हैं तो वह लौट आया. पौने 9 बजे दूधवाला आया तो उसी समय दिव्य दूसरी लिफ्ट से 7वीं मंजिल पर पहुंचा और रुचिता के फ्लैट का दरवाजा खुला देख कर अंदर चला गया.

रुचिता उस समय किचन में गैस चूल्हे पर दूध गर्म कर रही थी. दिव्य रुचिता से थोड़ी बातचीत कर के बैडरूम में चला गया और वहां घूम रहे कछुए की फोटो खींचने लगा. इस के बाद तेज आवाज में टीवी चला कर उस ने रसोई में जा कर रुचिता को पीछे से पकड़ लिया और उस के साथ जबरदस्ती की कोशिश करने लगा. दिव्य की इस हरकत से रुचिता चौंकी. उस ने कहा, ‘‘बेटा, यह क्या कर रहे हो?’’

लेकिन दिव्य नहीं माना और रुचिता के आगे के कपड़े फाड़ दिए. दुष्कर्म में सफल न होने पर वहां रखे टूल बौक्स से एक पाना निकाल कर वह रुचिता पर वार करने लगा. इस के अलावा रुचिता के बाल पकड़ कर उस का सिर दीवार पर दे मारा, जिस से रुचिता गिर पड़ी. इस के बाद वह उसे घसीट कर स्टोररूम में ले गया और उसी पाने से उसे तब तक मारता रहा, जब तक वह मर नहीं गई.

रुचिता की हत्या करने के दौरान दिव्य के कपड़ों पर खून लग गया था, जिसे उस ने बाथरूम में जा कर साफ किया और शावर लिया. रुचिता का मोबाइल ले कर वह बालकनी में आया. उस ने देखा कि कोई पड़ोसी उसे देख तो नहीं रहा. बाहर कोई नहीं दिखा तो रिमोट से टीवी बंद कर के वह अपने फ्लैट पर चला गया.

कुछ देर अपने फ्लैट पर रुक कर वह कार से बाहर चला गया. लौटा तो रुचिता की हत्या की सूचना पा कर पुलिस आ गई थी. कुछ देर वह पुलिस की काररवाई पर नजर रखता रहा. उस के बाद अपने फ्लैट पर गया और पत्र लिख कर एक बैग में कुछ कपड़े तथा अन्य सामान के साथ रुचिता का मोबाइल रख कर मोटरसाइकिल से चला गया.

घर से निकलने के बाद वह इधरउधर घूमता रहा. उस का बैग कोने में फटा था, जिस से अंबेरी के पास स्पीड ब्रेकर पर मोटरसाइकिल उछली तो रुचिता का मोबाइल गिर गया, जो एक मजदूर को मिला था. 2 दिसंबर को पुलिस ने सर्विलांस के माध्यम से उसे बरामद कर लिया था.

पुलिस ने 5 दिनों की रिमांड अवधि पूरी होने के बाद दिव्य को अदालत में पेश किया, जहां जांच अधिकारी ने अदालत को बताया कि अभी अभियुक्त पर भादंवि की धाराएं 302 एवं 201 के तहत मुकदमा दर्ज है. अभी इस में दुष्कर्म के प्रयास की धाराएं जोड़ी जानी है. इस के बाद अदालत ने दिव्य को 3 दिनों के और पुलिस रिमांड पर दे दिया.

पुलिस ने रुचिता की हत्या में प्रयुक्त पाना, खून लगे कपड़े बरामद कर लिए थे. दिव्य की कार, स्कूटर और मोटरसाइकिल के साथ मोबाइल भी जब्त कर लिया गया था.

रुचिता जिस पड़ोसी लड़के को बेटा मानती थी, उसी ने उस की इज्जत पर हाथ डालने की ही नहीं सोची, बल्कि विरोध करने पर जान भी ले ली. आखिर इस में रुचिता की क्या गलती थी? एक लड़के की कुंठा से एक हंसताखेलता परिवार उजड़ गया, 2 मासूम बच्चे बिना मां के हो गए. रुचिता के बच्चे नानानानी के पास हैं.

– कथा पुलिस सूत्रों एवं अन्य रिपोर्ट्स पर आधारित

काबिलः रितिक व यामी की बेहतरीन परफार्मेंस

पुराने कथानक पर नेत्रहीन किरदारों को फिट कर बनायी गयी फिल्म ‘‘काबिल’’. रितिक रोशन व यामी गौतम की बेहतरीन परफार्मेंस के चलते लोग इस रोमांचक फिल्म को पसंद कर सकते हैं. फिल्म‘‘काबिल’’ की कहानी दो नेत्रहीनों रोहन भटनागर (रितिक रोशन)और सुप्रिया शर्मा(यामी गौतम) से शुरु होती है. रोहन एक अच्छे वायस डबिंग आर्टिस्ट और सुप्रिया बेहतरीन पियानो वादक हैं. नेत्रहीन होने के बावजूद जिंदगी के प्रति दोनों का रवैया सकारात्मक है. दोनों पहली मुलाकात में एक दूसरे से कहते हैं कि उन्हें शादी नहीं करनी है. पर धीरे धीरे दोनों में प्यार हो जाता है और दोनों शादी कर एक दूसरे के सहारा बन जाते हैं.

लेकिन एक दिन शहर का एक गुंडा अमित शेलार (रोहित राय) और उसका साथी शकील (सहीदुर रहमान) ,सुप्रिया का बलात्कार कर देते हैं. वसीम एक कसाई (अखिलेंद्र मिश्रा) का बेटा है. जिसे वसीम व अमित की दोस्ती पसंद नहीं. पर बेटा अपने पिता की नहीं सुनता है. सुप्रिया के साथ हुई दुर्घटना के बाद रोहन की जिंदगी में अंधेरा छा जाता है. पर वह हार नहीं मानता. वह अपनी पत्नी सुप्रिया के साथ हुए अपराध के लिए बदला लेने की ठान लेता है.

उधर अमित शेलार को चिंता नहीं है. उसका भाई माधवराव शेलार (रोनित राय) नगर सेवक है. भ्रष्ट पुलिस अफसर बलात्कार के केस की सही जांच नही होने देते. इस बीच सुप्रिया फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेती है. जब रोहन को एहसास होता है कि पुलिस के भरोसे उसे न्याय नहीं मिल पाएगा, तो वह खुद बदला लेने की ठान लेता है.

रोहन पुलिस से कहता है कि वह बदला लेगा, पर पुलिस उसे देख नहीं पाएगी, सबूत नही मिलेंगे. उसके बाद फिल्म में कुछ रोमांचक घटनाएं घटित होती हैं. अपनी डबिंग की खूबी का उपयोग कर रोहन लोगों को फोन कर आपस में लड़वाता है. फिर एक एक को मारने की योजना बनाकर पहले शकील, फिर अमित शेलार की हत्या कर देता है. बाद में माधव शेलार भी मारा जाता है.

फिल्म देखकर निर्देशक संजय गुप्ता को बदला लेने की कहानियों से ज्यादा ही लगाव नजर आता है. वह अतीत में ‘जज्बा’ जैसी कई बदले की भावना पर आधारित फिल्में निर्देशित कर चुके हैं, जो कि बॉक्स ऑफिस पर असफल रही हैं. ‘‘काबिल’’ में कहानी के स्तर पर कुछ नयापन नहीं है. यह फिल्म संदेश देती है कि बदला अंधा होता है.

सवाल यह है कि आखिर फिल्म निर्माता राकेश रोशन ओर निर्देशक संजय गुप्ता दर्शकों को समझाना क्या चाहते हैं? क्या वे ये बताना चाहते हैं कि दर्शकों को अपने साथ हुए हर अन्याय के लिए बदला लेना चाहिए? यानी कि खून के बदले खून…? इस तरह के संदेश को परोसकर आखिर फिल्मकार किस तरह का समाज व देश रचना चाहते हैं? इस तरह के कथानक पर कई फिल्में हौलीवुड में और बौलीवुड में भी कई फिल्में बन चुकी हैं. फिल्म ‘‘काबिल’’ देखते समय कई पुरानी फिल्में याद आती रहती हैं.

डॉर्क और अति हिंसात्मक दृष्यों से भरपूर फिल्म ‘‘काबिल’’ इंटरवल से पहले काफी धीमी गति से आगे बढ़ती है. फिल्म की कमजोर कड़ी इसका वीएफएक्स और रोहित राय व रोनित राय का अभिनय है. इंटरवल के बाद के तमाम संवाद प्रभावित करने की बजाय जबरन थोपे हुए लगते हैं. फिल्म में ह्यूमर की कमी है. एक्शन सामान्य दर्जे का है. रोमांस व इमोशन की भी कमी है. रितिक रोशन व यामी गौतम ने बेहतरीन अभिनय किया है. रितिक रोशन के प्रशंसकों को यह फिल्म जरुर पसंद आएगी.

2 घंटे 19 मिनट की अवधि वाली फिल्म ‘‘काबिल’’ के निर्माता राकेश रोशन, निर्देशक संजय गुप्ता, संगीतकार राजेश रोशन, लेखक संजय मासूम और विजय मिश्रा, कैमरामैन सुदीप चटर्जी व अयंका बोस तथा कलकार हैं रितिक रोशन, यामी गौतम, रोहित राय, रोनित राय, अखिलेंद्र मिश्रा व अन्य.

तलाक से पहले फाइनेंशियल जानकारी

अरबों डालर की संपत्ति का सुख उठा रही जे.के. रौलिंग ने अपनी पुस्तक ‘हेरी पौटर’ की सीरीज लिखने से पहले जब अपने पुर्तगाली पति से तलाक लिया था तो उन की आर्थिक स्थिति बिलकुल खराब थी. वे एडिनबर्ग में रहने वाली वे गरीब महिला थीं, जिन के जीने का एक मात्र सहारा उन की बेटी थी. अपनी खराब स्थिति के कारण वे अवसाद में चली गईं और उन्होंने आत्महत्या का विचार बनाया, लेकिन चिकित्सकों की मदद से वे उस स्थिति से बाहर आईं और फिर जो कुछ हुआ वह जगजाहिर है. रौलिंग तो अपनी अर्थिक स्थिति मजबूत बना गईं लेकिन उन आम तलाकशुदा पत्नियों की सोचिए, जो रौलिंग जैसी स्थिति का सामना करते हुए थक जाती हैं और निराशा के गर्त में गिरती जाती हैं. अगर समय पर तलाक से पहले पत्नी को अपनी और अपने पति की फाइनेंशियल जानकारी हो तो वह काफी हद तक इस निराशा से बच सकती है.

चूंकि  विपरीत परिस्थितियों में अकेलेपन से समस्याएं बढ़ती हैं, उस पर हाथ तंग हो तो मुश्किलें बढ़ती ही हैं. एडवोकेट कविता कपिल इस संबंध में कहती हैं, ‘‘अकसर देखने में आता है कि तलाक के बाद महिलाएं भावनात्मक रूप से टूट जाती हैं और जब तक संभल पाती हैं उन के बैंक के संयुक्त खाते में एक पैसा भी नहीं बचता. लिहाजा, उन्हें मुआवजे से मिली रकम पर निर्भर होना पड़ता है या फिर गुजारेभत्ते की छोटी सी रकम को अपनी आय का साधन बनाना पड़ता है. उस पर अगर बच्चे की जिम्मेदारी हो तो परिस्थितियां और विषम बन जाती हैं.’’

तलाक होने से पहले

मैरिज काउंसलर डा. गीतांजलि शर्मा के अनुसार, ‘‘परिवार में किसी भी परिस्थिति से निबटने के लिए महिलाओं का आर्थिक रूप से सक्षम और आत्मनिर्भर होना जरूरी है. आमतौर पर महिलाएं अपने छोटे से छोटे काम के लिए भी अपने पतियों पर निर्भर होती हैं, जिस से उन्हें वित्तीय प्रबंधन का जरा भी ज्ञान नहीं होता. वे बैंक, बीमा या दूसरे आर्थिक क्षेत्रों में अपने पति या घर के दूसरे पुरुषों के ऊपर निर्भर रहती हैं.  ‘‘ऐसे में उन्हें इतनी जानकारी भी नहीं होती है कि बैंक डिपोजिट किस के नाम है और उस में कितना पैसा है? अगर मकान है तो वह उन के नाम है या नहीं? बैंक का कौन सा खाता संयुक्त है? पौलिसी में नौमिनी कौन है? प्रीमियम की नियत तारीख क्या है? म्यूचुअल फंड यदि लिया गया है तो फंड में मिलने वाला रिटर्न किस के खाते में जा रहा है?’’ ऐसी परिस्थिति में अगर तलाक की गाज महिला के ऊपर गिरती है, तो वह इस भावनात्मक और आर्थिक दुर्घटना से एकसाथ जूझने से खुद को अक्षम पाती है.

एडवोकेट कविता कपिल कहती हैं, ‘‘जीवन की आपाधापी में तिल का ताड़ बन जाने वाले घरेलू मुद्दों के कारण लोग दांपत्य जीवन में परस्पर तालमेल बैठाने के बजाय अलगाव या विवाहविच्छेद का रास्ता अपनाने लगे हैं. जहां शादी के पहले साल में ही तलाक की अर्जियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है वहीं पिछले दिनों 70 वर्षीय बुजुर्ग ने पत्नी से छुटकारा पाने के लिए दिल्ली की एक अदालत में तलाक की अर्जी डाल कर सब को हैरत में डाल दिया.’’ तलाक लेने से पहले यह विचार आवश्यक बन जाता है कि तलाक के बाद वह अपना भरणपोषण किस प्रकार करेगी? यदि वह तलाक के बाद बच्चे की कस्टडी लेना चाहती है तो क्या वह भलीभांति बच्चे का पालनपोषण कर सकेगी? अगर तलाक पाने की इच्छुक महिला नौकरीशुदा है तो क्या उस की आय इतनी है, जिस से वह अपने और अपने बच्चे के पालनपोषण की जिम्मेदारी उठा सकेगी? जिस शिक्षण संस्थान में बच्चा शिक्षा ले रहा है उस की फीस भरना क्या उस के लिए आसान होगा? तलाक चाहने वाली महिला को अपना और अपने बच्चे का भविष्य देखते हुए फाइनेंशियल पोजिशन जरूर चेक करनी चाहिए.’’

तलाक की प्रक्रिया के दौरान

मैरिज काउंसलर डा. गीतांजलि कहती हैं कि तलाक की पिटिशन डालने से पहले ही पतिपत्नी के संबंध खासे खराब हो जाते हैं, जिस के कारण दोनों अलगअलग रहते हैं. गैरनौकरीशुदा महिला के लिए यह समय भी भारी पड़ सकता है. अत: इस ओर पहले से वह ध्यान दे तो बेहतर होगा. फिर तलाक प्रक्रिया आगे बढ़ाने के लिए पत्नी अपना वकील तय करती है, जिस की फीस की व्यवस्था उसे स्वयं करनी होगी. चूंकि परिवार न्यायालय भी अपेक्षा करता है कि तलाक होने से पहले एक बार फिर पतिपत्नी अपने संबंधों पर गौर फरमाएं, इसलिए वह कुछ समय के लिए तलाक देने पर अपना निर्णय विचाराधीन रखता है. बिना मुआवजे और भरणपोषण भत्ते के यह समय बिताना भी आय का साधन न होने पर महिला को भारी पड़ता है. इन स्थितियों में आने से पहले समझदारी इसी में है कि एक बजट बनाया जाए, जिस में कुल खर्च का हिसाब बना कर यह आकलन किया जाए कि क्या तलाक की इच्छुक महिला की आय उस खर्च के हिसाब से है?

तलाक होने की दशा में

यदि तलाक होना निश्चित हो ही गया हो तो पहले ये महत्त्वपूर्ण कदम होने चाहिए :

– संयुक्त बैंक खातों पर पूर्व पतिपत्नी की सहमति से निर्णय.

– संयुक्त बीमा पौलिसी संबंधी निर्णय.

– प्रोविडेंट फंड, भूमि, भवन और अन्य संपत्तियों में नामांकन परिवर्तन.

तीनों कदम ही आवश्यक और महत्त्वपूर्ण कदम हैं. एडवोकेट कविता कपिल के मुताबिक, ‘‘तलाक के बाद यदि बैंक खाते में पति का नाम नामांकित है तो जल्दी से जल्दी उसे बदलवा देना आवश्यक है, क्योंकि कई बार जब तक महिला तलाक  के दर्द से उबरती है उस का पूर्व पति संयुक्त बैंक खाते में जमा रकम गायब कर चुका होता है. नौकरीशुदा महिला अपनी बीमा पौलिसियों, प्रोविडेंट फंड आदि के कागजातों में नामांकित पूर्व पति का नाम समय पर हटवा कर कई परेशानियों से बच सकती है.’’

‘‘अगर आर्थिक रूप से तलाकशुदा महिला मुआवजे और गुजारेभत्ते पर ही निर्भर हो तो उसे उस रकम को सुनियोजित निवेश करने की योजना बना लेनी चाहिए और शौर्टटर्म पौलिसी में निवेश कर के निश्चित अंतराल में थोड़ाथोड़ा धन मिलते रहने से आर्थिक सुरक्षा मिल सकती है. यदि तलाक की तैयारी करते समय ही ऐसी बचत योजनाओं में पैसा लगाया जाए, जिन में पति न नौमिनी हो, न संयुक्त दावेदार तो तलाक के बाद महिला को पैसों का मुहताज नहीं होना पड़ेगा.’’

खुद रखें हिसाबकिताब

एडवोकेट कविता कपिल के मुताबिक,  ‘‘आज के दौर में हर महिला को अपने वित्तीय फैसले खुद लेने चाहिए. कहां कितना पैसा बचाना है और कहां लगाना है, इस का हिसाब खुद भी रखना चाहिए. चूंकि महिलाएं अपने वित्तीय फैसले भावनात्मक आधार पर लेती हैं, इसलिए पीछे रह जाती हैं, जबकि पुरुष भावनात्मक आधार पर वित्तीय फैसले कम लेते हैं. इसलिए अच्छे इनवेस्टमेंट प्लानर होते हैं. ‘‘दूसरी ओर यह भी देखने में आता है कि जो महिलाएं दिखावे में पड़ कर अनापशनाप खर्च करती हैं वे भी वित्त संबंधी निवेशों से अनजान रहती हैं, जबकि इन सब से बचे पैसे को वे समझदारी से निवेश कर के परेशानी से बच सकती हैं. ‘‘यदि तलाक के बाद जीवन निर्वाह करने की बात आती है तो मुआवजे से मिलने वाली जमापूंजी को खर्च न कर उसे उन वित्तीय निवेशों में निवेश करना चाहिए, जिन से मिलने वाले ब्याज से उन का काम आसानी से चल सकता है.’’

बर्थडे स्पेशलः क्रिकेट खेल नहीं पूजा है

रोहित शर्मा, विराट कोहली और केएल राहुल जैसे एग्रेसिव बैट्समैन के बावजूद टीम इंडिया की टेस्‍ट टीम की कल्‍पना चेतेश्‍वर पुजारा के बिना करना मुश्किल है. गुजरात के इस बल्‍लेबाज की लंगर डालकर बैटिंग करने की शैली क्रिकेट प्रेमियों को आश्‍वस्‍त करती है. टीम इंडिया के ‘मिस्टर धैर्यवान’, चेतेश्वर पुजारा आज अपना 29वां जन्मदिन मना रहे हैं.

मौजूदा टीम इंडिया में पुजारा के अलावा मुरली विजय ही ऐसे बल्‍लेबाज हैं जो एक छोर को सील करके बल्‍लेबाजी पसंद करते हैं. अपनी बल्‍लेबाजी से ये न केवल टीम को सम्‍मानजनक स्‍कोर तक पहुंचाने में भूमिका निभाते हैं बल्कि आक्रामक अंदाज वाले खिलाड़ि‍यों को खुलकर खेलने की आजादी भी देते हैं.

दूसरे शब्‍दों में कहें तो 29 साल के पुजारा की भारतीय टेस्‍ट टीम में भूमिका वही है जो एक समय राहुल द्रविड़ की हुआ करती थी. आप उन्‍हें टीम इंडिया की 'दूसरी दीवार' कह सकते हैं. जिस तरह से सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, वीरेंद्र सहवाग और वीवीएस लक्ष्‍मण जैसे बल्‍लेबाजों की मौजूदगी के बाद भी द्रविड़ के उपयोगिता हमेशा रही, लगभग ऐसा ही मौजूदा टीम में चेतेश्‍वर पुजारा के साथ है.

टेस्ट क्रिकेट के लिए आदर्श बल्लेबाज

पुजारा की बल्‍लेबाजी की शैली टेस्‍ट क्रिकेट के लिहाज से आदर्श है. राजकोट के इस बल्‍लेबाज ने अब तक 43 टेस्‍ट की 72 पारियों में 49.33 के औसत से 3256 रन बनाए हैं जिसमें 10 शतक शामिल हैं. भारतीय उपमहाद्वीप के बाहर के विकेटों पर जहां गेंद न केवल काफी उछाल लेती है बल्कि स्विंग भी होती है, चेतेश्‍वर पुजारा पहले क्रम पर बल्‍लेबाजी के लिए आकर अकसर गेंदबाजों के लिए परेशानी का कारण बनते हैं.

करियर में पिता का अहम योगदान

25 जनवरी 1988 को गुजरात के राजकोट शहर में जन्‍मे पुजारा को क्रिकेटर बनाने में पिता अरविंद पुजारा का महत्‍वपूर्ण योगदान रहा है. उच्‍च स्‍तर का क्रिकेट खेल चुके अरविंद की अनुशासित कोचिंग ने चेतेश्‍वर को धैर्यवान बल्‍लेबाज बनाया है.

पुजारा ने एक बार कहा था कि मां मुझे देश के लिए खेलते देखना चाहती थीं. मेरी मां ने जहां इस बात का ध्यान रखा कि मैं एक अच्छा इंसान बनूं, वहीं मेरे पिता ने मुझे खिलाड़ी बनाने का काम संभाला. पुजारा ने कहा कि मेरे पिता बेहद अनुशासित और सख्त कोच हैं. हम आज भी फोन पर खेल के तकनीकी पक्षों की चर्चा करते हैं.

मां का सपना पूरा करना एकमात्र लक्ष्य

आपको बता दें कि रानी पुजारा को कैंसर था और जब 2005 में अंडर-19 का मैच खेल कर लौटे तो उन्हें पता चला कि मां अब इस दुनिया में नहीं हैं. बस उसके बाद से ही पुजारा की लाइफ का एक ही मकसद था, मां के सपने को पूरा करना और वो सपना मां की मौत के बाद पांच साल बाद पूरा हुआ. इसलिए पुजारा के लिए क्रिकेट केवल एक खेल नहीं बल्कि एक पूजा है.

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‘सॉकरेटिक’ में इंजीनियरों के प्रमुख श्रेयांस भंसाली ने कहा, ‘हम विद्यार्थियों के समक्ष गणित विषय को लेकर आने वाली समस्याओं के बारे में अक्सर सुनते हैं. हर छात्र कुछ साल के लिए गणित लेता ही है और ऐसे में माता-पिता और दोस्तों के लिए भी उनकी मदद कर पाना काफी मुश्किल हो जाता है.’

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