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Syria : तानाशाह बशर अल असद की तख्‍तापलट की नींव रखी मासूम बच्‍चों ने

तानाशाही ज्यादा दिन चलती नहीं है और तानाशाहों का अंत बहुत दर्दनाक होता है. हिटलर हों, स्टालिन हों, ईदी अमीन हों, फ्रांसिस्को फ्रैंको हों या सद्दाम हुसैन, सबका अंत दर्दनाक था. इतने उदाहरणों के बाद भी दुनिया यह नहीं समझ रही कि लोकतांत्रिक तरीके से देश को चलाना ही शासन का बेहतर तरीका है.

सीरिया में इस्लामिक विद्रोहियों ने 24 वर्षों से चले आ रहे राष्ट्रपति बशर अल-असद के शासन को उखाड़ फेंका. बीते पांच दशकों से एक ही परिवार के केंद्र में रही सत्ता की परिपाटी बदल गई और सीरिया में भी तानाशाही का दौर ख़त्म हुआ. सीरिया में बशर अल-असद शासन का खात्मा ऐसे समय में हुआ है जब माना जा रहा था कि उन्होंने सालों से जारी विद्रोह पर काबू पा लिया है.

सीरिया एक समय अरब संस्कृति का समृद्ध केंद्र था, पर बीते एक दशक से वह दुनिया के सबसे खतरनाक युद्ध क्षेत्रों में से एक बना हुआ था. साल 2011 में राष्ट्रपति बशर अल-असद की तानाशाही के खिलाफ शुरू हुआ आंदोलन गृहयुद्ध में तब्दील होकर मल्टी-फ्रंट वॉर में बदल चुका था. करीब 2 करोड़ की आबादी वाले सीरिया में पिछले 13 सालों में 5 लाख से ज्यादा लोगों की जाने जा चुकी हैं. लाखों लोग विस्थापित हुए हैं और अनेक देशों में शरणार्थियों के रूप में त्रासदी से भरी जिंदगी जी रहे हैं. सोशल मीडिया पर ऐसे अनेक विज्ञापन देखे जा रहे थे जहां माँ बाप अपने बच्चों को गोद देने के लिए बेचैन थे. वे नहीं चाहते थे कि उनके बच्चे सीरिया में रह कर युद्ध की विभीषिका या भुखमरी झेलें अथवा माँ बाप की आकस्मिक मौत के बाद लावारिस हालत में भटकें क्योंकि सीरिया के हालात इतने खराब हो चुके थे कि कोई भी अपने को सुरक्षित नहीं समझ रहा था.

दुनिया के अधिकांश इस्लामिक देश तानाशाहों के नेतृत्व में बर्बाद हुए हैं और जहां जहां तानाशाही जारी है वहां वहां जनता बदहाल है. औरतें और बच्चे असुरक्षा और भुखमरी का शिकार हैं. अशिक्षित युवाओं के हाथों में बंदूकें हैं और निशाने पर निर्दोष लोग हैं. ट्यूनेशिया, बेहरीन, लीबिया, लेबनान. सीरिया जैसे देश सदियों से जल रहे हैं. जनता में आक्रोश है. आक्रोश विद्रोह में बदल रहा है. जगह जगह गृहयुद्ध छिड़े हुए हैं.

सीरिया की बात करें तो तानाशाही की शुरुआत वहां सत्तर के दशक में हुई थी. बात 13 नवंबर 1970 की है. हाफिज अल असद सीरियाई एयरफोर्स के चीफ थे. सेना में उनकी अच्छी पकड़ थी. इसी का फायदा उठाते हुए 13 नवंबर 1970 को हाफिज असद ने तब की सरकार को गिरा कर तख्तापलट करते हुए खुद को सीरिया का राष्ट्रपति डिक्लेयर कर दिया. हालांकि तब लोगों को उम्मीद नहीं थी की हाफिज ज्यादा दिनों तक तानाशाह रह पाएंगे. उसकी वजह यह थी की सीरिया शुरू से सुन्नियों की आबादी वाला देश रहा है.

सीरिया में सुन्नियों की आबादी करीब 74 फीसदी है. जबकि शियाओं की आबादी 16 फीसदी है. हाफिज असद शिया थे. उन्हें भी पता था कि सुन्नी कभी भी विरोध कर सकते हैं. इसलिए तख्तापलट करने के बाद से ही हाफिज असद ने सुन्नियों को कुचलना शुरू कर दिया. उन्होंने नौकरी, सेना और दूसरी पॉलिसी में शियाओं को फेवर दिया और सुन्नियों को निकाल बाहर किया. इससे सुन्नियों में गुस्सा तो पैदा हुआ, मगर फौज पर चूंकि असद की पकड़ काफी मजबूत थी लिहाजा उनकी सत्ता बनी रही.

करीब 30 साल तक सीरिया पर हुकुमत करने के बाद साल 2000 में हाफिज अल-असद की मौत हो गई. उनके बाद उनके बेटे बशीर अल-असद बतौर राष्ट्रपति सीरिया की गद्दी पर बैठ गए. अगले 10 सालों तक पिता की पॉलिसी और हथकंडों के चलते बशर अल-असद भी हर विरोध को दबाते रहे. बाप-बेटे ने मिलकर विपक्ष खत्म कर दिया था. साल 2006 से 2010 तक सीरिया में कम बारिश की वजह से सूखा पड़ गया. लोग भूखे मरने लगे.
सरकार ने जनता की कोई मदद नहीं की. जनता को लगने लगा कि तानाशाही ना होती तो शायद उनकी जिंदगी बेहतर होती. पहली बार बशर के खिलाफ लोगों का गुस्सा फूटा और लोग सड़कों पर उतरे. इत्तेफाक से ठीक इसी वक्त अरब में एक आंदोलन शुरू हो गया, जिसे अरब स्प्रिंग नाम से जाना जाता है. ये आंदोलन उन देशों में शुरू हुआ, जहां लंबे वक्त से तानाशाही थी. देखते ही देखते ट्यूनीशिया, लीबिया, इजिप्ट, लेबनान, जॉर्डन में लोग सड़कों पर उतर आए. इस आक्रोश और विद्रोह का नतीजा दुनिया के लिए हैरान करने वाला था.

पहला अरब स्प्रिंग सरकार विरोधी प्रदर्शनों, विद्रोहों और सशस्त्र विद्रोहों की एक श्रृंखला थी जो 2010 के दशक की शुरुआत में अरब दुनिया के अधिकांश हिस्सों में फैल गयी. यह भ्रष्टाचार और आर्थिक स्थिरता के जवाब में ट्यूनीशिया में शुरू था. ट्यूनीशिया से शुरू हुआ विरोध प्रदर्शन पाँच अन्य देशों लीबिया, मिस्र, यमन, सीरिया और बहरीन में फैल गया. शासकों को पदच्युत कर दिया गया. 2011 में ट्यूनीशिया के ज़ीन एल अबिदिन बेन अली, 2011 में लीबिया के मुअम्मर गद्दाफी, 2011 में मिस्र के होस्नी मुबारक और 2012 में यमन के अली अब्दुल्ला सालेह का तख्तापलट हो गया. 23 साल से ट्यूनीशिया की सत्ता पर काबिज बेन अली को देश छोड़कर भागना पड़ा. लीबिया में कर्नल गद्दाफी को जनता ने मार दिया. 30 साल तक इजिप्ट के तानाशाह रहे हुस्नी मुबारक को भी देश छोड़कर भागना पड़ा.

कई जगह बड़े विद्रोह और दंगे हुए. कुछ देशों में गृहयुद्ध या उग्रवाद सहित सामाजिक हिंसा हुई. मोरक्को, इराक, अल्जीरिया, लेबनान, जॉर्डन, कुवैत, ओमान और सूडान में लगातार सड़क पर जनता ने उग्र प्रदर्शन किया. जिबूती, मॉरिटानिया, फिलिस्तीन, सऊदी अरब और पश्चिमी सहारा में छोटे-मोटे विरोध प्रदर्शन हुए. अरब दुनिया में प्रदर्शनकारियों का एक प्रमुख नारा था – अश-शा’ब युरीद इस्कात अन-नियाम यानी लोग शासन को गिराना चाहते हैं.

अब चूंकि ये सब कुछ सीरिया के इर्द-गिर्द हो रहा था. इसलिए पहली बार बशर अल असद को भी इस खतरे का अहसास हुआ. उनको लगा कि सीरिया में भी लोग बगावत ना कर दें. असद डरे हुए थे. उसी वक्त उन्होंने अपनी सेना को यह हुक्म दिया कि पूरे सीरिया पर पैनी नजर रखी जाए. जो भी सरकार के खिलाफ आवाज उठाए उसे कुचल दिया जाए. हालांकि तब तक सीरिया शांत था.

14 साल के एक बच्चे ने दीवार लिखा – अब तुम्हारी बारी है डॉक्टर!

साल 2010 खत्म होते होते असद को लगा कि अब सब कुछ ठीक है, लेकिन तभी 14 साल के एक बच्चे ने कुछ ऐसा कर दिया कि सीरिया में विद्रोह की ऐसी चिंगारी फूट पड़ी जिसने अंततः 13 साल बाद बशर अल असद को सीरिया छोड़कर भागने के लिए मजबूर कर दिया.

26 फरवरी 2011 को उत्तरी सीरिया के दारा में 14 साल के एक बच्चे मुआविया सियास ने अपने स्कूल की दीवार पर लिखा – ”अब तुम्हारी बारी है डॉक्टर…” चूंकी बशर अल-असद को उनके करीबी डॉक्टर भी बुलाते थे, इसलिए दारा शहर में जिसने भी ये लाइन पढ़ी वो इसका मतलब समझ चुका था.

तानाशाही सरकार की बच्चे से दरिंदगी

अरब देशों के कई तानाशाहों के खात्मे के बाद बच्चे द्वारा लिखी इस लाइन का साफ मतलब यही था कि अब बारी बशर अल-असद सरकार की है. जैसे ही दारा के लोगों ने दीवार पर यह लाइन पढ़ी सभी डर गए. मुआविया के पिता ने तो अपने बेटे को ही छुपा दिया. लेकिन दारा के सिक्योरिटी चीफ को दीवार पर लिखे इस लाइन के बारे में जानकारी मिल गई. अगले ही दिन यानी 27 फरवरी 2011 को स्कूल के कुल 15 बच्चों को असद की आर्मी ने उठा लिया. इनमें मुआविया भी था. इसके बाद इन बच्चों पर जो जुल्म ढाए गए उसकी कोई इंतिहा नहीं थी. उनके नाखून नोच दिए गए. मासूम बच्चों को पानी से भिगोकर करंट दिए गए.

कई बच्चों को उल्टा लटकाया गया. इन बच्चों की रिहाई की मांग को लेकर दारा के लोगों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन किया. सरकार से बच्चों को छोड़ने की अपील की लेकिन बच्चों को नहीं छोड़ा गया. उल्टे असद की सेना ने बच्चों के मां-बाप से एलानिया यह कह दिया कि अपने बच्चों को भूल जाओ. दूसरे बच्चे पैदा करो और नहीं कर सकते तो अपनी औरतों को हमारे पास छोड़ जाओ.

बच्चों पर हो रहे जुल्म, दीवार पर लिखी वो लाइनें, दारा से निकलकर सीरिया के अलग-अलग शहरों में भी पहुंच चुकी थी. चूंकि बच्चे छोटे थे इसलिए हर एक को हमदर्दी थी. फिर क्या था देखते ही देखते पूरे सीरिया में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया. जो कि बहुत जल्द बड़ा होता गया.

बशर अल असद को तब पहली बार अहसास हुआ कि इस विरोध प्रदर्शन को रोकना जरूरी है. आखिरकार पूरे 45 दिन बाद अप्रैल 2011 में सभी बच्चों को छोड़ दिया गया. लेकिन यहीं से कहानी पलट गई. जब बच्चे कैद से बाहर आये तो उनके साथ उन पर ढाए गए जुल्मों की निशानियां और कहानियां भी सामने आईं. मासूम बच्चों पर सेना की हिंसा के चिन्ह देख कर और उनकी जुबान से हिंसा की दर्दनाक दास्तां सुनकर आंदोलन रुकने की बजाय और तेज हो गया. बच्चों की रिहाई के अगले ही शुक्रवार यानि 22 अप्रैल 2011 को दारा की एक मस्जिद में नमाज के बाद खुलकर असद के खिलाफ नारेबाजी हुई. इस शोर को कुचलने के लिए आर्मी ने लोगों पर गोलियां चलाईं जिसमें दो लोग मारे गए और अनेक घायल हुए. फिर तो मामला और गर्म हो गया और इसने विद्रोह का रूप ले लिया.

मारे गए दोनों लोगों के जनाजे के साथ लोग सड़कों पर उतर आये. असद की आर्मी ने फिर हिंसा का नंगा नाच किया और असद सरकार ने अपनी ही जनता को कुचलने के लिए सड़कों पर टैंक उतार दिए. आसमान में हेलीकॉप्टर से गोलियां बरसाई जाने लगीं. यह पहली बार था जब सीरिया में एक साथ दर्जनों लोग मारे गए. दारा की कहानी अब सीरिया के शहर शहर की कहानी बन चुकी थी. हर शहर हिंसा की चपेट में था. सीरिया के लोग असद की सेना की गोलियों का सामना डंडों और पत्थरों से कर रहे थे. हर दिन लाशों की तादाद बढ़ती ही जा रही थी. हालात ऐसे हो गए थे कि असद की सेना में भी बगावत शुरू हो गयी.

तानाशाह की क्रूरता देख कर हजारों सैनिक सरकार का साथ छोड़कर आम लोगों से जा मिले. असद के ऐसे ही सैनिकों को अपने साथ लेकर सीरिया की जनता ने सेना का मुकाबला करने के लिए अपनी सेना बनाने का फैसला किया. आखिरकार 29 जुलाई 2011 को फ्री सीरियन आर्मी की बुनियाद रखी गई. इसमें ऐसे हजारों अलग अलग छोटे छोटे गुट आ मिले जो असद के खिलाफ थे. सीरिया के पड़ोसी सुन्नी देशों ने भी फ्री सीरियन आर्मा की मदद करनी शुरू कर दी. यह वही दौर था जब बहती गंगा में बगदादी ने भी हाथ साफ करने की ठानी थी. बगदादी की आईएसआई भी फ्री सीरियन आर्मी की मदद के लिए ईराक से सीरिया पहुंच गयी.

अभी तक जो आईएसआई यानि इस्लामिक स्टेर ऑफ ईराक था वो अब ISIS यानि इस्लामिक स्टेट ऑफ ईराक एंड सीरिया बन गया. सीरिया में एक बड़ी आबाद कुर्द की भी है. खासकर नॉर्थ ईस्ट सीरिया में. फ्री सीरियन आर्मी की तर्ज पर अब कुर्द ने भी असद सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. असल में कुर्दों की मांग एक अलग देश की थी. यानि अब सूरत-ए-हाल कुछ यूं था कि सीरिया के अंदर एक साथ चार मोर्चे खुल गए थे. एक असद की सरकार का. एक बगदादी की आईएसआई का. फ्री सीरियन आर्मी की और कुर्द फोर्स का. अब सीरिया सचमुच गृहयुद्ध की आग में झुलस रहा था.

हुआ तख्तापलट, भागने पर मजबूर हुए बशर अल-असद

देखते ही देखते अब बाहरी देश भी अपने अपने फायदे के लिए सीरिया के अखाड़े में कूदने लगे. कई अरब देश सीधे फ्री सीरियन आर्मी की मदद के लिए आगे आये. वजह ये थी कि वो सीरिया में सुन्नियों को सपोर्ट करना चाहते थे. यह देख ईरान भी इस लड़ाई में कूद पड़ा. लेकिन असद के विरोधियों का साथ देने के लिए नहीं बल्कि असद सरकार को बचाने के लिए, क्योंकि ईरान शियाओं का सबसे बड़ा देश है. उधर रूस को इस इलाके में एक दोस्त चाहिए था. पुतिन को असद के रूप में एक दोस्त नजर आया, तो रूस भी असद की ढाल बनकर सामने आ गया. अब जहां रूस होगा तो उसके खिलाफ अमेरिका को तो आना ही था.

अमेरिका ने भी सीरिया में असद सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. कुल मिलाकर सीरिया अब एक बड़ा अखाड़ा बन चुका था जहां कई देश दंगल खेल रहे थे. मगर अब भी किसी तरह असद अपनी सरकार बचाए हुए थे. सीरियाई सेना के खिलाफ लड़ाई जारी थी, फिर हुआ यूं कि असद जिस ईरान और पुतिन के भरोसे बैठे थे, उन दोनों देशों की स्थिति भी काफी डगमगा गयी. रूसी राष्ट्रपति पुतिन का सारा ध्यान यूक्रेन में जंग की तरफ था. यूक्रेन के साथ जंग में उन्हें भारी क्षति हो रही थी. दूसरी तरफ ईरान भी हिज्बुल्लाह के चक्कर में इजरायल से उलझा हुआ था. ऐसे वक्त में पुतिन और ईरान दोनों ने ही असद की और मदद करने से इंकार कर दिया. हालत ऐसी हो गयी कि असद की सेना के पास सिर्फ तीन दिन का राशन बचा था. फिर क्या था असद को अपने अंजाम का अहसास हो गया. और वह बच निकलने की योजना बनाने लगे.

11 दिन पहले सीरिया में फिर से विद्रोह ने जोर पकड़ा. सीरियाई सैनिक चौकी, पोस्ट छोड़-छोड़ कर भागने लगे. देखते ही देखते इन्हीं 11 दिनों में असद के हाथों से सीरिया की राजधानी दमिश्क समेत 5 बड़े शहर अलेप्पो, हमा, होम्स और वह दारा भी निकल गया जहां से इस क्रांति की शुरुआत हुई थी. 8 दिसंबर को बशर अल-असद सीरिया पर 20 साल हुकुमत करने के बाद दमिश्क से एक प्लेन में बैठ कर चुपचाप रूस चले गए. अपने परिवार को वह पहले ही वहां शिफ्ट कर चुके थे. पुतिन ने भी अपनी दोस्ती निभाई और असद को अपने घर में पनाह दी. मगर कब तक. पुतिन जिस तरह यूक्रेन को लेकर जंग छेड़े हुए हैं उससे उनकी भी आतंरिक हालत खस्ता है. कब पुतिन का सितारा अस्त हो जाए और रूस भी तानाशाही की गुलामी से आजाद हो जाए कहा नहीं जा सकता है. मगर जल्दी ही यह होना है. क्योंकि तानाशाही ज्यादा दिन चलती नहीं है और तानाशाहों का अंत बहुत दर्दनाक होता है. हिटलर हों, स्टालिन हों, ईदी अमीन हों, फ्रांसिस्को फ्रैंको हों या सद्दाम हुसैन, सबका अंत दर्दनाक था. इतने उदाहरणों के बाद भी दुनिया यह नहीं समझ रही कि लोकतंत्र ही शासन का सबसे बेहतर तरीका है.

भले लोकतंत्र बहुत मजबूत ना हो, भले उसमें कमीबेशी हो, भले भ्रष्टाचार हो मगर जनता द्वारा चलाया जाने वाला शासन ही जनता की जरूरतों को समझता है और जनता को भी समझ में आता है. भारत हो, नेपाल हो, पाकिस्तान हो या बांग्लादेश यहां उस तरह के हालात नहीं हैं जैसे तानाशाही हुकूमत वाले देशों के हैं. यहां लचर लोकतंत्र ही सही मगर उसने देश को बर्बाद होने से बचाया हुआ है.

 

अरब स्प्रिंग या जैस्मिन क्रांति के 13 साल में मिट गया तानाशाहों का राज

साल 2011 अरब जगत के देशों के लिए भारी उथल-पुथल भरा था. ट्यूनीशिया में एक सब्जी बेचने वाले के आत्मदाह से भड़की आग में इस क्षेत्र के कई देश झुलस गए. आलम ये था कि ट्यूनीशिया से निकली विद्रोह की ये चिंगारी मिस्र, लीबिया, यमन और सीरिया कई देशों तक फैली. विद्रोह की इस चिंगारी को जैस्मीन क्रांति या फिर अरब स्प्रिंग भी कहा गया. इस क्रांति ने कई तानाशाहों की चूल्हें हिला दी और उन्हें गद्दी से उतार फेंका.

इस फेहरिस्त में पहला नाम मिस्र के तानाशाह होस्नी मुबारक का है. होस्नी मुबारक 1981 में अनवर सदत की हत्या के बाद मिस्र के राष्ट्रपति बने थे. वह 1981 से 2011 तक मिस्र में एकछत्र राज करते रहे. लेकिन
2011 में ट्यूनीशिया से निकली विद्रोह की चिंगारी में उन्हें गद्दी से उतरना पड़ा.

जनवरी 2011 में मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर स्क्वायर में हजारों की संख्या में प्रदर्शनकारी इकट्ठा हुए, जिन्होंने राजनीतिक सुधारों और मुबारक के इस्तीफे की मांग की. सोशल मीडिया और इंटरनेट के जरिए आंदोलन को व्यापक समर्थन मिला, जिसने सरकार के दमन के प्रयासों को चुनौती दी.

होस्नी मुबारक सरकार ने शुरुआत में इन विरोधों को दबाने की कोशिश की लेकिन जनता के भारी समर्थन और वैश्विक दबाव के सामने उनकी रणनीति असफल रही. पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने अपनी मांगों को जारी रखा. लेकिन 18 दिनों तक हुए हिंसक प्रदर्शन के बाद होस्नी मुबारक को अपना पद छोड़ना पड़ा, और सत्ता सेना के हाथ में चली गई. यह पहली बार था जब मिडिल ईस्ट में सोशल मीडिया से शुरू होकर सड़क तक पहुंचे एक आंदोलन ने किसी निरंकुश शासक को सत्ता से उखाड़ फेंका था. इस प्रोटेस्ट में 239 प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी.

क्रूर कर्नल गद्दाफी का खौफनाक अंत

जैस्मिन क्रांति की आग में ही लीबिया के क्रूर तानाशाह मुअम्मर अल गद्दाफी की गद्दी भी जल गई थी. 2011 में विद्रोही लड़ाकों ने राजधानी त्रिपोली में गद्दाफी के बाब अल-अजीजिया पर कब्जा कर लिया था. इस दौरान गद्दाफी की मूर्तियां ढहा दी गईं. 25 एकड़ में फैले गद्दाफी के महल में घुसकर विद्रोहियों ने जमकर लूटपाट की. इसके बाद गद्दाफी को पकड़ लिया गया.

मुअम्मर अल गद्दाफी ने लीबिया पर 42 सालों तक राज किया था. उन्होंने मात्र 27 साल की उम्र में तख्तापलट कर दिया था. 7 जून 1942 को लीबिया के सिर्ते शहर में जन्मा गद्दाफी हमेशा से अरब राष्ट्रवाद से प्रभावित रहा और मिस्र के नेता गमाल अब्देल नासिर का प्रशंसक रहा.

गद्दाफी बेहद क्रूर था. उसे लोग सनकी तक कहते थे. विद्रोहियों ने राजधानी त्रिपोली पर कब्जा कर लिया. जून 2011 में मामला अंतरराष्ट्रीय अपराध अदालत पहुंचा. यहां अत्याचार करने के लिए गद्दाफी, उसके बेटे सैफ अल इस्लाम और उसके बहनोई के खिलाफ वारंट जारी किया गया. जुलाई में दुनिया के 30 देशों ने लीबिया में विद्रोहियों की सरकार को मान्यता दे दी. 20 अक्टूबर 2011 को गद्दाफी को उसके गृहनगर सिर्ते में मार गिराया गया. हालांकि मौत कैसे हुई इस पर संशय रहा.

कई रिपोर्ट्स के मुताबिक, जब विद्रोही गद्दाफी को मार रहे थे तो वह उनसे गुहार लगा रहा था कि उसे गोली न मारी जाए. मारे जाने के बाद गद्दाफी की कई तस्वीरें सामने आई थीं. उनके मरने की खबर सुनने के बाद लीबिया में लोगों ने जमकर जश्न मनाया था.

बता दें कि ट्यूनीशियाई क्रांति 28 दिन तक चलने वाला एक विद्रोह था. नागरिकों के इस विरोध के कारण जनवरी 2011 में लंबे समय तक राष्ट्रपति पद पर रहे जीन अल आबिदीन बेन अली को पद से हटने लिए मजबूर होना पड़ा. इसके बाद देश में लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई.

बशर अल असद का तख्तापलट

इस फेहरिस्त में नया नाम बशर अल असद का है. कई मोर्चों पर जंग के बीच सीरिया पर विद्रोहियों का कब्जा हो चुका है. राष्ट्रपति बशर अल असद ने अपने परिवार सहित रूस में राजनीतिक शरण ले ली है. इस बीच सीरिया से ऐसी कई तस्वीरें और वीडियो सामने आए, जिसमें लोगों को राष्ट्रपति भवन के भीतर लूटपाट करते और हुड़दंग मचाते देखा गया. इसी तरह की लूटपाट श्रीलंका के राष्ट्रपति भवन, बांग्लादेश के बंगभवन और काबुल से भी देखने को मिली थी.

एक हफ्ते में विद्रोहियों ने राजधानी दमिश्क के अलावा सीरिया के चार बड़े शहरों पर कब्जा कर लिया है, अब सवाल ये है कि सीरिया में अब आगे क्या होगा? विद्रोहियों की जीत के साथ ही सीरिया में बशर अल-असद के 24 साल के शासन और देश में 13 साल से चल रहे गृह युद्ध का अंत हो गया है. अब सीरिया की राजधानी दमिश पर हयात अल-शाम का कब्जा है.

सीरियाई शरणार्थियों की घर वापसी

सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद के सत्ताच्युत होने और देश छोड़ने के बाद से जॉर्डन और लेबनान समेत तमाम देशों से सीरियाई शरणार्थी अपने मुल्क वापस लौट रहे हैं. यूनाइटेड नेशन्स के डेटा के अनुसार, दुनियाभर में सबसे ज्यादा शरणार्थियों में एक सीरियाई रिफ्यूजी हैं. साल 2011 में सीरिया में गृह युद्ध शुरू हुआ. लड़ाई विद्रोही समूहों और असद सरकार के बीच थी. सरकार विरोधी गुटों का कहना था कि वे महंगाई, हिंसा और भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं. पहले सड़कों पर आंदोलन शुरू हुआ, जिसे अरब स्प्रिंग कहा गया. जल्द ही इसमें मिलिटेंट्स शामिल हो गए, जिन्हें विदेशी ताकतों का सपोर्ट था. हालात बिगड़ने लगे. पहले तो सीरियाई नागरिक अपने ही देश में विस्थापित होने लगे. जल्द ही वहां भी असुरक्षा बढ़ने पर वे पड़ोसी देशों की शरण लेने लगे. और फिर वे यूरोप और अमेरिका तक चले गए. पांच सालों से ज्यादा चली लड़ाई में शरणार्थियों ने देश लौट सकने की उम्मीद खो दी थी लेकिन अब असद सरकार के गिरने के साथ वे दोबारा लौट रहे हैं.

यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीज की मानें तो सीरिया के भीतर ही 7 मिलियन से ज्यादा नागरिक विस्थापित हैं, जबकि लगभग इतने ही लोग दूसरे देशों में शरण ले चुके. इनमें से तुर्की में सबसे ज्यादा लगभग साढ़े तीन करोड़ सीरियाई शरणार्थी हैं. इसके बाद लेबनान, जॉर्डन, जर्मनी और फिर ईराक है. इनमें से लगभग सारे ही मिडिल ईस्टर्न देश लगातार सीरिया के मामले में मध्यस्थता करने की कोशिश करते रहे ताकि उनके अपने देश से रिफ्यूजियों की आबादी घट सके. अब पड़ोसी देशों से उनकी वापसी शुरू हो चुकी है.

ज्यादातर देशों में सीरिया के शरणार्थियों को लेबर मार्केट में औपचारिक एंट्री नहीं है. वे काम तो कर रहे हैं लेकिन छुटपुट या फिर थर्ड पार्टी के जरिए. सरकारी कामों या बड़े कामों से योग्यता के बाद भी उन्हें दूर रखा जाता है. अगर वे लेबर फोर्स में शामिल होना चाहें तो इसकी सजा भी है. मसलन लेबनान वैसे तो सीरिया का मददगार है लेकिन अपने यहां शरण देने वालों के सामने उसने शर्त रख दी कि वे तभी अपना शरणार्थी स्टेटस रिन्यू करवा सकते हैं, जब वे वर्कफोर्स से दूर रहें. द गार्जियन की रिपोर्ट के अनुसार, इसके लिए उनसे बाकायदा दस्तखत करवाया जाता है.

शरणार्थियों के लिए फंड की कमी

इन देशों के पास शरणार्थियों को देने के लिए कुछ खास नहीं है. आमतौर पर यूनाइटेड नेशन्स की तरफ से इनके लिए कई प्रोग्राम चलते हैं. सीरिया को भी मदद मिल रही है. लेकिन ये समस्या एक दशक से भी ज्यादा लंबे समय तक खिंच गई और रिफ्यूजियों की आबादी भी काफी ज्यादा है. ऐसे में यूएनएचसीआर को भी फंडर्स की कमी होने लगी. कुछ साल पहले जब वर्ल्ड फूड प्रोग्राम ने हजारों शरणार्थियों को खाना पहुंचाने से इनकार कर दिया था, तब इस बात पर पहली बार ध्यान गया था. इसी के बाद कैंप्स से निकलकर रिफ्यूजी बाहर घूमने लगे और स्थानीय लोगों और उनके बीच तनाव बढ़ने लगा.

ज्यादातर देशों में सीरियाई रिफ्यूजियों के लिए मेडिकल सुविधाएं भी काफी नहीं. जैसे जॉर्डन में बहुत से लोगों के पास फ्री हेल्थकेयर नहीं है, खासकर वयस्कों के लिए. स्वास्थ्य सुविधाओं के अलावा, उनके बच्चों के पास फॉर्मल एजुकेशन की भी गुंजाइश कम है. इंटरनेशनल सपोर्ट के बगैर शरण दे चुके देश सीधे-सीधे उन्हें हटा नहीं रहे थे, लेकिन उन्होंने शरणार्थियों पर तमाम ऐसी बंदिशें लाद दी थीं कि वे खुद ही देश छोड़ना चाहें. ऐसे में असद सरकार के जाते ही रिफ्यूजी, खासकर पड़ोसी देशों में बसे लोग घर वापसी कर रहे हैं.

Sad Hindi Story : यह कैसी मां

माया को देखते ही बाबा ने रोना शुरू कर दिया था और मां चिल्लाना शुरू हो गई थीं. मां बोलीं, ‘‘बाप ने बुला लिया और बेटी दौड़ी चली आई. अरे, हम मियांबीवी के बीच में पड़ने का हक किसी को भी नहीं है. आज हम झगड़ रहे हैं तो कल प्यार भी करेंगे. 55 साल हम ने साथ गुजारे हैं. मैं अपने बीच में किसी को भी नहीं आने दूंगी.’’

‘‘मैं इस के साथ नहीं रहूंगा. तुम मुझे अपने साथ ले चलो,’’ कहते हुए बाबा बच्चों की तरह फूटफूट कर रो पड़े.

‘‘मैं तुम को छोड़ने वाली नहीं हूं. तुम जहां भी जाओगे मैं भी साथ चलूंगी,’’ मां बोलीं.

‘‘तुम दोनों आपस का झगड़ा बंद करो और मुझे बताओ क्या बात है?’’

‘‘यह मुझे नोचती है. नोचनोच कर पूछती है कि नीना के साथ मेरे क्या संबंध थे? जब मैं बताता हूं तो विश्वास नहीं करती और नोचना शुरू कर देती है.’’

‘‘अच्छाअच्छा, दिखाओ तो कहां नोचा है? झूठ बोलते हो. नोचती हूं तो कहीं तो निशान होंगे.’’

‘‘बाबा, दिखाओ तो कहां नोचा है?’’

बाबा फिर रोने लगे. बोले, ‘‘तेरी मां पागल हो गई है. इसे डाक्टर के पास ले जाओ,’’ इतना कहते हुए उन्होंने अपना पाजामा उतारना शुरू किया.

मां तुरंत बोलीं, ‘‘अरे, पाजामा क्यों उतार रहे हो. अब बेटी के सामने भी नंगे हो जाओगे. तुम्हें तो नंगे होने की आदत है.’’

बाबा ने पाजामा नीचे कर के दिखाया. उन की जांघों और नितंबों पर कई जगह नील पड़े हुए थे. कई दाग तो जख्म में बदलने लगे थे. वह बोले, ‘‘देख, तेरी मां मुझे यहां नोचती है ताकि मैं किसी को दिखा भी न पाऊं. पीछे मुड़ कर दवा भी न लगा सकूं.’’

‘‘हांहां, मैं नोचूंगी. जितना कष्ट तुम ने मुझे दिया है उतना ही कष्ट मैं भी दूंगी,’’ इतना कहते हुए मां उठीं और एक बार जोर से बाबा की जांघ पर फिर चूंटी काट दी. बाबा दर्द से तिलमिला उठे और माया के पैरों पर गिर कर बोले, ‘‘बेटी, मुझे इस नरक से निकाल ले. मेरा अंत भी नहीं आता है. मुझे कोई दवा दे दे ताकि मैं हमेशा के लिए सो जाऊं.’’

‘‘अरे, ऐसे कैसे मरोगे. तड़पतड़प कर मरोगे. तुम्हारे शरीर में कीड़े पड़ेंगे,’’ मां चीखीं.

24 घंटे पहले ही माया का फोन बजा था.

सुबह के 9 बज चुके थे, पर माया अभी तक सो रही थी. उस के सोने का समय सुबह 4 बजे से शुरू होता और फिर 9-10 बजे तक सोती रहती.

माया के पति मोहन मर्चेंट नेवी में थे इसलिए अधिकतर समय उसे अकेले ही बिताना पड़ता था. अकेले उसे बहुत डर लगता था इसलिए सो नहीं पाती थी. सारी रात उस का टेलीविजन चलता था. उसे लगता था कि बाहर वालों को ऐसा लगना चाहिए कि इस घर में तो रात को भी रौनक रहती है.

सुबह 4 बजे जब दूध की लारी बाहर सड़क पर आ जाती और लोगों की चहलपहल शुरू हो जाती तो वह टेलीविजन बंद कर के नींद के आगोश में चली जाती थी. काम वाली बाई भी 11 बजे के बाद ही आ कर घंटी बजाती थी.

उस ने फोन की घंटी सुनी तो भी वह उठने के मूड में नहीं थी, उसे लगा था कि यह आधी रात को कौन उसे जगा रहा है. पर एक बार कट कर फिर घंटी बजनी शुरू हुई तो बजती ही चली गई.

अब उस ने फोन उठाया तो उधर से बाबा की आवाज सुनाई दी, ‘‘हैलो, मन्नू, तेरी मां मुझे मारती है,’’ कह कर उन के रोने की आवाज आनी शुरू हो गई. माया एकदम परेशान हो उठी.

उस के पिता उसे प्यार से मन्नू ही बुलाते थे. 80 साल के पिता फोन पर उसे बता रहे थे कि 70 साल की मां उन्हें मारती है. यह कैसे संभव हो सकता है.

‘‘आप रो क्यों रहे हो? मां कहां हैं? उन्हें फोन दो.’’

‘‘मैं बाहर से बोल रहा हूं. घर में उस के सामने मैं उस की शिकायत नहीं कर सकता,’’ इतना कह कर वह फिर रोने लगे थे.

‘‘क्यों मारती हैं मां?’’

‘‘कहती हैं कि नीना राव से मेरा इश्क था.’’

‘‘कौन नीना राव, बाबा?’’

‘‘वही हीरोइन जिस को मैं ने प्रमोट किया था.’’

‘‘पर इस बात को तो 40 साल हो गए होंगे.’’

‘‘हां, 40 से भी ज्यादा.’’

‘‘आज मां को वह सब कैसे याद आ रहा है?’’

‘‘मैं नहीं जानता. मुझे लगता है कि वह पागल हो गई है. मैं घर नहीं जाऊंगा. वह मुझे नोचती है. नोचनोच कर खून निकाल देती है,’’ बाबा ने कहा और फिर रोने लगे.

‘‘आप अभी तो घर जाओ. मैं मां से बात करूंगी.’’

‘‘नहीं, उस से कुछ मत पूछना, वह मुझे और मारेगी.’’

‘‘अच्छा, नहीं पूछती. आप घर जाओ, नहीं तो वह परेशान हो जाएंगी.’’

‘‘अच्छा, जाता हूं पर तू आ कर मुझे ले जा. मैं इस के साथ नहीं रह सकता.’’

‘‘जल्दी ही आऊंगी, आप अभी तो घर जाओ.’’

बाबा ने फोन रख दिया था. माया ने भी फोन रखा और अपनी शून्य हुई चेतना को वापस ला कर सोचना शुरू किया. पहला विचार यही आया कि मां को पागल बनाने वाली यह नीना राव कौन थी और वह 40 साल पहले वाले जमाने में पहुंच गई.

तब वह 12 साल की रही होगी और 7वीं कक्षा में पढ़ती होगी. तब उस के बाबा एक प्रसिद्ध फिल्मी पत्रिका के संपादक थे.

बाबा और मां का उठनाबैठना लगातार फिल्मी हस्तियों के साथ ही होता था. दोनों लगातार सोशल लाइफ में ही व्यस्त रहते थे. अपने बच्चों के लिए भी उन के पास समय नहीं था. उन की दादी- मां ही उन्हें पाल रही थीं. रात भर पार्टियों में पीने के बाद दोनों जब घर लौटते तो आधी रात हो चुकी होती थी. सुबह जब माया और राजा स्कूल जाते तब वे दोनों गहरी नींद में होते थे. जब माया और राजा स्कूल से घर लौटते तो बाबा अपने काम से और मां किटी और ताश पार्टी के लिए निकल चुकी होतीं.

स्कूल में भी सब को पता था कि उस के पिता फिल्मी लोगों के साथ ही घूमते हैं इसलिए जब भी कोई अफवाह किसी हीरोहीरोइन के बारे में उड़ती तो उस की सहेलियां उसे घेर लेती थीं और पूछतीं, ‘क्या सच में राजेंद्र कुमार तलाक दे कर मीना कुमारी से शादी कर रहा है?’ दूसरी पूछती, ‘क्या देवआनंद अभी भी सुरैया के घर के चक्कर लगाता है?’ तीसरी पूछती, ‘सच बता, क्या तू ने नूतन को देखा है? सुना है देखने में वह उतनी सुंदर नहीं है जितनी परदे पर दिखती है?’

ऐसे अनेक प्रश्नों का उत्तर माया के पास नहीं होता था, क्योंकि उस की दादीमां बच्चों को फिल्मी दुनिया की खबरों से दूर ही रखती थीं. पर एक बार ऐसा जरूर हुआ जब मां उसे अपने साथ ले गई थीं. कार किनारे खड़ी कर के उन्होंने कहा था, ‘देखो, उस घर में जाओ. बाबा वहां हैं. तुम थोड़ी देर वहां बैठना और सुनना नीना और बाबा क्या बातें कर रहे हैं और कैसे बैठे हैं.’

वह पहला अवसर था जब वह किसी हीरोइन के घर जा रही थी. उस ने अपनी फ्राक को ठीक किया था, बालों को संवारा था और कमरे के अंदर चली गई थी. उस ने बस इतना सुना था कि कोई नई हीरोइन है और अगले ही महीने एक प्रसिद्ध हीरो के साथ एक फिल्म में आने वाली है.

नमस्ते कह कर वह बैठ गई थी. बाबा ने पूछा था, ‘कैसे आई हो? मां कहां हैं?’

उस ने उत्तर दिया था, ‘मां बाजार गई हैं. अभी थोड़ी देर में आ जाएंगी.’

बाबा ने बैठने का इशारा किया था और फिर नीना से बातें करने में व्यस्त हो गए थे. माया के कान खड़े थे. मां ने कहा था कि सब बातें ध्यान से सुनना और फिर उसे यह भी देखना था कि बाबा और नीना कैसे बैठे हुए हैं. उस ने ध्यान से देखा था कि नीना ने बहुत सुंदर स्कर्ट ब्लाउज पहना हुआ था और वह आराम से सोफे पर बैठी थी. उस के हाथ में एक सिगरेट थी जिसे वह थोड़ीथोड़ी देर में पी रही थी. बाबा पास ही एक कुरसी पर बैठे थे और दोनों लगातार फिल्म पब्लिसिटी की ही बात कर रहे थे.

किसी भी नए हीरो या हीरोइन को प्रमोट करने के काम के लिए बाबा को काफी रुपए मिलते थे और मां को ऐसे धन की आदत पड़ गई थी. उन का जीवन ऐशोआराम से भरा था. आएदिन नए शहरों में जाना, पांचसितारा होटलों में रुकना, रंगीन पार्टियों का मजा लेना उन की आदत में शुमार हो गया था. तब उन्होंने भी यह उड़ती सी खबर सुनी थी कि बाबा उस हीरोइन पर ज्यादा ही मेहरबान हैं, पर उस के द्वारा जो धन की वर्षा हो रही थी उस ने मां के दिमाग को बेकार बना दिया था.

मां को तो बस, भरे हुए पर्स से मतलब था. जब मां को तनाव होना चाहिए था तब तो कुछ नहीं हुआ, पर कुछ साल बीत जाने के बाद उन्होंने बाबा को कुरेदना शुरू किया था. वह कहतीं, ‘अच्छा, सचसच बताना नीना को तुम प्यार करने लगे थे क्या?’

बाबा बोलते, ‘तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. तुम्हें पता है कि पब्लिसिटी के लिए क्याक्या कहानियां बनानी पड़ती हैं. तुम तो लगातार मेरे साथ थीं फिर अब क्यों पूछ रही हो?’

अब तक बाबा का काम कम हो गया था. बाजार में और भी कई फिल्मी पत्रिकाएं आ चुकी थीं. जवान और चालाक सेके्रटरी हीरोहीरोइनों को संभालने के लिए आ चुके थे. ऐसे भी कभीकभी ही थोड़ा सा काम मिलता था. पैसे की भी काफी तंगी हो गई थी. जवानी में बाबा ने पैसा बचाया नहीं और अब पुरानी आदतें छूट नहीं पा रही थीं इसलिए मां और बाबा में भी आपस में कहासुनी होनी शुरू हो गई थी.

 

अब तक माया विवाह योग्य हो चुकी थी और उस ने अपना जीवनसाथी स्वयं ही चुन लिया था. राजा भी काम की तलाश में अमेरिका पहुंच गया था. बुरी आदतें और अनियमित दिनचर्या के कारण बाबा की सेहत भी डगमगाने लगी थी. चारों तरफ से दबाव ही दबाव था. अब मां के गहने बिकने शुरू हो गए थे. ऐसे में जब भी मां का कोई गहना बिकता, अपना गुस्सा इसी प्रकार से बाबा से प्रश्न कर के निकालतीं.

कभी पूछतीं, ‘अच्छा उस साल दीवाली पर तुम ने रात नीना के घर गुजारी थी न? घर में और भी कोई था या तुम दोनों अकेले थे?’

बाबा जो भी उत्तर देते, उस पर उन्हें विश्वास नहीं होता. ढलती उम्र, बालों में फैलती सफेदी और कमजोर होते अंगप्रत्यंग उन्हें अत्यंत शंकालु बनाते जा रहे थे. तब तक केवल मां की जबान ही चलती थी. फिर माया का विवाह हो गया और वह विदेश चली गई. उस के पति की नौकरी अच्छी थी इसलिए वह हर महीने मां और बाबा के लिए भी पैसे भेजती थी. घर उन का अपना था इसलिए आधा घर किराए पर दे दिया था. वहां से भी हर महीने पैसा मिल जाता था. इस प्रकार दोनों का गुजारा भली प्रकार से चल रहा था.

बीचबीच में माया का चक्कर मुंबई का लगता रहता था पर तब उस ने कभी इस बात की ओर ध्यान नहीं दिया था कि दोनों का आपस में झगड़ा किस बात को ले कर होता है. मां कभीकभी उसे भी जलीकटी सुना देती थीं, बोलतीं, ‘अरे, बाबा ने जवानी में बहुत मस्ती मारी है. अभी वैसा नहीं है इसलिए झुंझलाए रहते हैं. अब इस बूढ़े को कौन मुंह लगाएगा.’

‘मां, चुप हो जाओ. बाबा के लिए ऐसे कैसे बोलती हो? तुम भी तो मस्ती मारती थीं.’

‘नहींनहीं, मैं तो सिर्फ ताश खेलती थी, इन की मस्तियां तो हाड़मांस की होती थीं.’

माया डांट कर मां को चुप करा देती थी. उस ने तो दोनों को जवानी में मौजमस्ती करते ही देखा था. अगर दादी नहीं होतीं तो उन दोनों भाईबहनों का बचपन पता नहीं कैसे बीतता.

कुछ सालों बाद माया भारत लौट आई थी. उस ने अपने बच्चों की शिक्षा के लिए चेन्नई को चुना था. माया के पति साल में 2 ही बार छुट्टी पर चेन्नई आते थे. अब साल में एक बार वह भी मांबाबा को बुला लेती थी. एक माह बिताने के बाद वे मुंबई लौट जाते थे. जितने दिन बेटी के पास रहते बहुत सुखसुविधा में रहते पर उन की जड़ें तो मुंबई में थीं इसलिए उन्हें वहां लौटने की भी जल्दी होती थी.

जितने दिन वे दोनों बेटी के पास होते उतने दिन उन में झगड़ा नहीं होता था. पर माया ने देखा था कि मां का व्यवहार थोड़ा अजीब होता जा रहा है. बाबा को दुखी देख कर उन्हें बहुत अच्छा लगता था. यदि बाबा को कोई चोट लग जाती तो वह तालियां बजाने लगती थीं. उन की इस बचकानी हरकत पर माया को बहुत गुस्सा आता था और वह मां को डांट भी देती थी.

लेकिन आज के फोन ने माया को हिला कर रख दिया था. इतने बूढ़े पिता को उन की जीवनसंगिनी ही मार रही है और वह किसी से शिकायत भी नहीं कर सकते हैं. उस ने कुछ सोचा और मुंबई अपने मामा को फोन मिलाया. वह फोन पर बोली, ‘‘मामा, मां और बाबा कैसे हैं? इधर आप का चक्कर उन के घर का लगा था?’’

‘‘नहीं, मैं एक महीने से उन के घर नहीं गया हूं. मेरे घुटनों में बहुत दर्द रहता है. मैं कहीं भी आताजाता नहीं हूं. क्यों, क्या बात है? उन का हालचाल जानने के लिए उन को फोन करो.’’

‘‘सुबह बाबा का फोन आया था. रो रहे थे. मुझे बुला रहे हैं. आप जरा देख कर आइए क्या बात है? इतनी दूर से आना आसान नहीं है.’’

‘‘तुम कहती हो तो आज ही दोपहर को चला जाता हूं. तुम मुझ से वहीं बात कर लेना.’’

‘‘ठीक है, मैं 2 बजे फोन करूंगी,’’ कह कर माया ने फोन रख दिया.

अब किसी भी काम में माया का दिल नहीं लग रहा था. समय बिताने के लिए उस ने पुराना अलबम उठा लिया. उस के बाबा और मां की फोटो हर हीरोहीरोइन के साथ थी. नीना राव के साथ एक फोटो में उस ने मांबाबा को देखा. नीना राव कितनी खूबसूरत थी. माया ने तो उसे पास से भी देखा था. उस की गुलाबी रंगत देखते ही बनती थी. नीना राव की सुंदरता के आगे मां फीकी लग रही थीं. इस फोटो में बाबा ने दोनों औरतों के गले में बांहें डाली हुई थीं.

नीना की सुंदरता देख कर माया ने सोचा तब मां को जरूर हीन भावना होती होगी, पर बाबा का काम ही ऐसा था कि वह उन के काम में बाधा नहीं डाल सकती थीं. जब नीना को प्रमोट किया जा रहा था तब बाबा का अधिक से अधिक समय उस के साथ ही बीतता था. तब मां अपनी किटी पार्टियों में व्यस्त रहती थीं. हर जगह वह बाबा के साथ नहीं जा सकती थीं. तब का मन में दबाया हुआ आक्रोश अब मानसिक विकृति बन कर उजागर हो रहा था. वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि मानसिक अवसाद कितना घिनौना रूप ले सकता है.

2 बजते ही माया ने मुंबई फोन मिलाया. मामा ने फोन उठाया और बोले, ‘‘तुम जल्दी आ जाओ. यहां के हालात ठीक नहीं हैं. मैं तुम्हें फोन पर कुछ भी नहीं बता सकता हूं.’’

फोन रखते ही माया ने शाम की फ्लाइट पकड़ी और रात के 10 बजे तक  घर पहुंच गई थी.

उन दोनों की हालत देख कर माया भी रो पड़ी. अकेले वह दोनों को नहीं संभाल सकती थी. उस ने अपने बड़े बेटे को फोन कर के बंगलौर से बुला लिया. उस ने भी दोनों की हालत देखी और दुखी हो गया. दोनों मांबेटे ने बहुत दिमाग लगाया और इस फैसले पर पहुंचे कि मां और बाबा को अलगअलग रखा जाए, माया बाबा को अपने साथ ले गई और मां को एक नर्स और एक नौकरानी के सहारे छोड़ दिया.

मां को बहुत समझाया और साथ ही धमकी भी दे डाली, ‘‘सुधर जाओ, नहीं तो मैंटल हास्पिटल में डाल देंगे. तुम्हारा बुढ़ापा बिगड़ जाएगा.’’

एक छोटे बच्चे की तरह बाबा माया का हाथ पकड़ कर घर से बाहर निकले और तेजी से जा कर कार में बैठ गए. उस अप्रत्याशित मोड़ ने मां को स्तंभित कर दिया था. वह शांत हो कर अपने बिस्तर पर बैठी रहीं और नर्स ने उन्हें नींद की गोली दे कर लिटा दिया. कल से ही उन का इलाज शुरू होगा.

 

Comedy : शादीलाल की शरारती सालियां

लेखक – अजीत श्रीवास्‍तव 

शादीलाल जैसा सामान धरती पर कम ही मिलता है. साढ़े 4 फुट की उस चीज का पेट आगे निकला हुआ था और गंजे सिर पर गिनने लायक बाल थे. मुझे यकीन था कि उस की शादी नामुमकिन है, पर शायद वह अपने माथे पर कुछ और ही लिखा कर लाया था.

पिछले साल ही तो शादीलाल की शादी हुई थी. कुदरत ने उस के साथ मजाक नहीं किया, क्योंकि कोई भी यह नहीं कह सकता था कि ‘राम मिलाए जोड़ी, एक अंधा एक कोढ़ी’.

जी हां, जैसा हमारा प्यारा दोस्त शादीलाल था, ठीक वैसी ही उस की बीवी यानी मेरी भाभी आई थीं. वे भी करीब 37 साल की होंगी. शादीलाल की कदकाठी से ले कर मोटापा, लंबाई, ऊंचाई, निचाई, चौड़ाई सभी में जबरदस्त टक्कर देने वाली थीं.

मेरी भाभी का नाम पहले कुमारी सुंदरी था, पर अब श्रीमती सुंदरी देवी हो गया था.

पर भाभी का सुंदरी होना तो दूर, वे सुंदरी का ‘सु’ भी नहीं थीं, मगर ससुराल के नाम से बिदकने वाला मेरा यार गजब की तकदीर पाए हुए था. उस के 7 सगी सालियां थीं और सातों एक से बढ़ कर एक.

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मैं भी शादी में गया था. सच कहता हूं कि मेरा ईमान भूचाल में जैसे धरती डोलती है, वैसे डोल गया था. अगर मेरी नकेल पहले से न कसी होती, तो मैं शादीलाल की सालियों के साथ इश्क कर डालता.

शादी में शादीलाल की सालियों ने उस की इतनी खिंचाई की थी कि वह ससुराल का नाम लेना ही भूल गया. शादी में उस से जूतों की पूजा कराई गई. धोखे में डाल कर सुंदरी देवी के पैर छुआए गए. सुंदरी देवी के नाम से झूठी चिट्ठी भेज कर उसे जनवासे से 7 फर्लांग दूर बुलवाया गया.

खैर, होनी को कौन टाल सकता था. आज शादीलाल की शादी को एक साल हो गया. सुंदरी देवी अपने मायके में थीं. वे न जाने कितनी बार वहां हो आईं, पर मेरे यार ने कभी वहां की यात्रा का नाम नहीं लिया.

वहां से ससुर साहब की चिट्ठी आई कि आप शादी के बाद से ससुराल नहीं आए. अब सुंदरी की विदाई तभी होगी जब आप खुद आएंगे, वरना नहीं.

यह वाकिआ मुझे तब पता चला, जब औफिस की बड़े बाबू वाली कुरसी पर शादीलाल को गमगीन बैठे देखा.

‘‘मेरे यार, क्या कहीं से कोई तार वगैरह आया है या गमी हो गई?’’ मैं ने घबरा कर पूछा.

शादीलाल ने अपना मुंह नहीं खोला. अलबत्ता, नाक पर मक्खी बैठ जाने पर भैंस जैसे सिर हिलाती है, वैसे न में सिर हिला दिया.

तब मैं ने पूछा, ‘‘क्या आप को सुंदरी देवी की तरफ से तलाक का नोटिस आया है? क्या वे बीमार हैं या सासससुर गुजर गए?’’

अब शादीलाल ने जो सिर उठाया, तो मेरा दिल बैठ गया. लाललाल आंखें आंसुओं से भरी थीं. चेहरा गधे सा मुरझाया था.

मैं ने उस के हाथ पर हाथ रखा, तो शादीलाल रो उठा और बोला, ‘‘देखो एकलौता राम, तुम मेरे खास दोस्त हो, तुम से क्या छिपाना. चिट्ठी आई है.’’

‘‘क्या कोई बुरी खबर है या कोई अनहोनी घटना घट गई?’’

‘‘नहीं, ससुरजी ने मुझे बुलाया है. इस बार वे साले के साथ सुंदरी को नहीं भेज रहे हैं. अब तो मुझे जाना ही होगा.’’

‘‘अरे, तो इस में घबराने की क्या बात है. ससुराल से बुलावा तो अच्छे लोगों को ही मिलता है. तुम तो

7 सालियों के आधे घरवाले हो, तुम जरूर जाओ.’’

‘‘नहीं यार, यही तो मुसीबत है. मैं उन सातों के मुंह में तिनके की तरह समा जाता हूं.’’

‘‘शादीलाल, तुम्हें क्या हो गया है? घबराओ मत, मैं तुम्हारे साथ हूं,’’ मैं ने उसे हौसला बंधाया.

‘‘एकलौता राम, मुझे तुम्हीं पर भरोसा है. इस संसार में मेरा साथ देने वाले यार तुम्हीं हो. क्या तुम मेरे ऊपर एक एहसान करोगे?’’

‘‘कहो यार, मैं तो यारों का एकलौता राम हूं.’’

‘‘तुम को मेरे साथ मेरी ससुराल चलना होगा, वरना मेरी शैतान सालियां मुझे सतासता कर काढ़ा बना कर पी जाएंगी.’’

मैं ने शादीलाल को समझाना चाहा, पर वह मुझे अपनी ससुराल ले ही गया. इस तरह अब शादीलाल की ससुराल यात्रा और साथ में एकलौता राम की यादगार यात्रा शुरू हो गई.

87 किलोमीटर दूर ससुराल में पहुंचे, तो हमारी खूब खातिरदारी हुई. फिर सातों शैतान सालियों के कारनामे शुरू हो गए, जिन का हमें डर था.

थका होने की वजह से शादीलाल शाम 7 बजे से ही खर्राटे लेने में मस्त हो गया. तभी वे सातों आईं. उन्होंने मुंह पर उंगली रख चुप रहने का इशारा किया तो मैं समझ गया कि शादीलाल अब तो गया काम से.

मैं शादीलाल को जगाने के चक्कर में था कि 27 साला एक साली ने कहा, ‘‘आप खामोश रहिए, वरना आप की हजामत जीजा से भी बढ़ कर होगी.’’

मैं ने रजाई तानी और उस में झरोखा बना कर नजारा देखने लगा. शादीलाल के हाथों में एक साली ने नीली स्याही का पोता फेरा. दूसरी साली ने उस की नाक में कागज की सींक बना कर घुसा दी. नतीजतन, शादीलाल का हाथ नाक पर पहुंच गया और स्याही चेहरे पर ‘मौडर्न आर्ट’ बनाती गई.

मैं लिहाफ के अंदर हंसी नहीं रोक पा रहा था. आखिर में 6 सालियां बाहर चली गईं, केवल 7 साल की सुनीता बची, तो उस ने अपने जीजा के हाथों में उसी की हवाई चप्पलें उलटी कर के फंसी दीं और फिर उस के कानों में सींक घुमा कर भाग गई.

सींक से बेचैन हो कर शादीलाल ने अपने कानों पर हाथ मारे, तो चप्पलें गालों पर चटाक से बोलीं.

मैं ने किसी तरह झरोखा बंद किया. हंसहंस कर मेरा पेट हिल रहा था, पर कान आहट ले रहे थे.

मेरा यार उठा. चप्पलें फेंकने की आवाज आई, फिर उस ने मेरी रजाई उठा दी. मैं तब भी हंस रहा था.

शादीलाल बरस पड़ा, ‘‘एकलौता राम, तू कर गया न गद्दारी. मेरी यह हालत किस ने की?’’

मैं ने आंख मलने का नाटक किया और पूछा, ‘‘क्या बात है यार?’’

‘‘बनो मत, मेरी हालत पर तुम हंस रहे थे.’’

‘‘क्या बात करते हो यार… मैं तो सपने में हंस रहा था. अरे, तुम्हारे चेहरे पर रामलीला का मेकअप किस ने किया?’’

‘‘उठ यार, मैं यहां पलभर भी नहीं ठहर सकता. वही कमबख्त सालियां होंगी,’’ उस ने आईने में अपना चेहरा देखते हुए कहा.

 

‘‘चलो ससुरजी के पास, मैं उन सब की शिकायत करता हूं,’’ मैं ने कहा.

‘‘पर यार, ससुरजी ऐसा टैक्नीकलर दामाद देखेंगे तो क्या कहेंगे? आखिर मैं क्या करूं? मैं इसीलिए यहां नहीं आता हूं. तुझे बचाव के लिए लाया था, पर तू भी बेकार रहा.’’

‘‘शादीलाल, क्या मैं रातभर जाग कर तुम्हारी खाट के चक्कर लगाऊंगा? तुम भी तो घोड़े बेच कर सो गए. वहां जग में पानी रखा है, मुंह धो डालो.’’

बेचारा शादीलाल मुंह धो कर लेट गया. मैं सोने की कोशिश में था कि तभी पायल की आवाज सुन कर चौंका.

जीरो पावर का बल्ब जल रहा था.

मैं ने देखा, वह भारीभरकम औरत शायद श्रीमती शादीलाल थीं. मैं ज्यादा रात तक जागने पर मन

ही मन झल्लाया और करवट बदल कर लेटा रहा. मुझे आवाजें सुनाई पड़ रही थीं.

‘‘अरे तुम, देखो हल्ला नहीं करना. मेरा यार एकलौता राम सोया हुआ है. तुम खुद नहीं आ सकती थीं. तुम्हारी बहनों ने मेरा मजाक बना दिया.’’

ठीक तभी बिजली जलने की आवाज सुनाई दी और सामूहिक ठहाके भी. मैं ने फौरन हड़बड़ा कर रजाई फेंकी. देखा तो दंग रह गया. शादीलाल की 6 सालियां खड़ी थीं. बेचारा शादीलाल उन्हें टुकुरटुकुर देख रहा था.

साली नंबर 5 गद्दा, तकिया व साड़ी फेंक कर फ्राक में खड़ी हो गई और बोली, ‘‘हम सातों को जीजाजी शैतान कह रहे थे.’’

‘‘अरे, मैं तो पहले ही समझ गया था. मैं तो नाटक कर रहा था,’’ शादीलाल ने झेंपते हुए साली नंबर 5 को देखा.

इस मजाक के बाद अगला मजाक सुबह ही हुआ. मैं और मेरा यार जब कमरे से बाहर आए, तो आंगन में सालियों से दुआसलाम हुई.

तभी एक साली ने कहा, ‘‘जीजाजी, क्या आप रात को बड़ी दीदी के कमरे में गए थे?’’

‘‘नहीं सालीजी, तुम्हारे होते हुए मैं वहां क्यों जाता?’’ कह कर शादीलाल ने उसे गोद में उठा लिया.

‘‘पर जीजाजी, आप बड़ी दीदी की चप्पलें पहने हैं और आप की चप्पलें तो दीदी के कमरे में पड़ी हैं.’’

शादीलाल ने घबरा कर पैरों की ओर देखा. पैरों में लेडीज चप्पलें ही थीं.

शादीलाल के हाथ से साली छूट गई, पर मैं ने उसे संभाल लिया. फिर ठहाका लगा, तो शादीलाल की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई.

सब से ज्यादा मजा उस समय आया, जब शादीलाल पेट हलका करने शौचालय में घुसा. तब मैं आंगन में खड़ाखड़ा ब्रश कर रहा था. सालियों ने जो टूथपेस्ट दिया था, उस का स्वाद कड़वा सा था और उस से बेहद झाग भी निकल रहा था.

तभी शौचालय के अंदर के नल का कनैक्शन, जिस से पानी जाता था, एक साली ने बाहर से बंद कर दिया.

मैं ने सोचा कि शादीलाल तो गया काम से. इधर मैं थूकतेथूकते परेशान था कि शादीलाल की सास ने कहा, ‘‘बेटा, तुम कुल्ला कर लो. इन शैतानों ने टूथपेस्ट की जगह तुम्हें ‘शेविंग क्रीम’ दे दी थी.’’

मेरे तो मानो होश ही उड़ गए. जल्दीजल्दी थूक कर भागा और सालियों के जबरदस्त ठहाके सुनता रहा.

शादीलाल एक घंटे बाद जब बिना पानी के ‘शौचालय’ से बाहर आया तो छोटी साली नाक दबा कर आई और बोली, ‘‘जीजाजी, फिर से अंदर जाइए. अब नल चालू कर दिया है.’’

शादीलाल दोबारा अंदर घुसा, फिर निकल कर नहाने घुस गया. उस का लगातार मजाक बनाया जा रहा था, पर वह ऐसा चिकना घड़ा था कि उस पर कोई बात रुकती नहीं थी.

2 दिन ऐसे ही सालियों की मुहब्बत भरी छेड़खानी में गुजरे. जब जाने का नंबर आया तो मेरे सीधेसादे यार शादीलाल ने सालियों से ऐसा मजाक किया कि सातों सालियां ही शर्म से पानीपानी हो गईं.

हुआ यों कि जब हमारे जाने का समय आया और रोनेधोने के बाद तांगे में सामान रख दिया गया, तब सालियां, उन की सहेलियां और महल्ले वालों की भीड़ जमा थी.

तभी शादीलाल ने कहा, ‘‘देखो सातों सालियो, मुझे यह बताओ कि कुंआरी लड़की को क्या पसंद है?’’

सातों सालियों ने न में सिर हिलाया. सब लोगों को यह जानने की बेताबी थी कि शादीलाल अब क्या कहेंगे. तभी शादीलाल ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘अरे, तुम लोगों को नहीं पता कि कुंआरी लड़कियों को क्या पसंद है?’’

‘नहीं,’ सातों सालियों ने एकसाथ फिर से वही जवाब दिया.

‘‘मुझे पहले ही तुम लोगों पर शक था,’’ शादीलाल ने नाटकीय लहजे में कहा.

उस समय सातों सालियों पर घड़ों पानी पड़ गया, जब उन की एक सहेली ने कहा, ‘‘तुम लोगों को जीजाजी ने बेवकूफ बना दिया. उन्हें तुम्हारे कुंआरे होने पर शक है. उन्होंने तुम सभी को शादीशुदा बना दिया है, क्योंकि तुम लोगों को कुंआरी लड़कियों की पसंद नहीं मालूम है.’’

और फिर तो सातों सालियों पर इतने जबरदस्त ठहाके लगे कि सभी दुपट्टे में मुंह छिपा कर अंदर भाग गईं.

 

Funny Story : बालम बकरा बनने से बच गए

बालम, कलकत्ता और गोरी का बहुत ही गहरा रिश्ता है. गोरी परेशान है. उस की रातों की नींद और दिन का चैन उड़ा हुआ है… यह सोचसोच कर कि बालम का काम बारबार कलकत्ता में ही क्यों होता है? चलो मान लिया काम होता भी है तो पूरे दफ्तर में अकेले उसी के बालम रह गए हैं क्या, जिन्हें बारबार कलकत्ता भेज दिया जाता है? बालमजी भी इतना खुश हो कर कलकत्ता ही क्यों जाते हैं जबकि देश

के मानचित्र पर अनेक शहर हैं. फिर कलकत्ता में ऐसी कौन सी डोर बंधी है जो गोरी के बालम को खींच रही है और बालम भी गोरी के लटकेझटके, नाजनखरे, प्यारमुहब्बत सब बिसार कर उधर ही खिंचे चले जाते हैं?

गोरी विरह की आग में जल रही है, ऊपर से बरसात उस की इस आग को ठीक उसी तरह भड़काने का काम कर रही है जैसे होम में घी करता है. गोरी के दिल से फिल्मी गाने के ये बोल निकल रहे हैं, ‘हायहाय ये मजबूरी, ये मौसम और ये दूरी…’

पर न तो कोई गोरी की हालत समझ रहा है, न ही उस का गीत सुन रहा है. गोरी के दिल का बोझ बढ़ता गया और आखिरकार उस ने अपनी पीड़ा हमउम्र सखियों को बताई. उस की पीड़ा सुन कर सखियां भी उदास हो गईं. एक बोली, ‘‘रे सखी, कहीं तेरे बालम का दिल वहां की किसी सांवलीसलोनी पर तो नहीं आ गया है?’’

‘‘ऐसा नहीं हो सकता. हमारी इतनी प्यारी सखी को छोड़ कहीं नहीं जाएगा जीजा,’’ दूसरी सखी डपटते हुए बोली. तभी तीसरी सखी बोली, ‘‘अरी, हम ने तो सुना है कि वहां की औरतें काला जादू जानती हैं और मर्दों को अपने बस में कर लेती हैं?’’

‘‘हां री, मैं ने भी बचपन में अपनी दादी से यही सुना था कि जो भी मरद कलकत्ता गए वे कभी न लौटे. फिर वहां की लुगाइयां मर्दों को भेड़बकरा या तोता कुछ भी बना डालती हैं जादू से और अपने यहां पालती हैं. उन की लुगाइयां बेचारी ऐसी ही जिंदगीभर इंतजार करती हैं उन का,’’ एक सखी ने उस में जोड़ा. ‘‘हां री, मैं ने भी सुना है यह तो… कलकत्ता गए मर्द कभी न आते वापस.’’

‘‘ऐसा हुआ तो हम कहां जाएंगे?’’ गोरी का कलेजा बैठने लगा, बहुत कोशिश कर के भी खुद को रोक न पाई और बुक्का फाड़ कर रो पड़ी, ‘‘हाय रे, मैं क्या करूं, कहां जाऊंगी मैं. कहीं वे भेड़बकरा बन गए तो मेरे किस काम के रह जाएंगे… एक तो पहले ही शक्ल बकरे जैसी थी, ऊपर से जादू से बकरा बना ही दिया तो कहां रखूंगी मैं उन्हें.’’ सारी सखियां उस की बातों पर हंसने लगीं. सभी सखियां मिल कर गोरी को चुप कराने लगीं, ‘अरी, रो मत. हम तो तुझ से मजाक कर रही थीं… यह सच नहीं है. ऐसा कुछ नहीं होता… जीजा बहुत जल्द आ जाएंगे,’ और उसे समझाबुझा कर घर भेज दिया.

गोरी घर तो आ गई, पर उस के मन का बोझ कई गुना बढ़ गया था. वह मन ही मन समझ रही थी कि जो बातें सखियों ने कहीं, वे झूठ नहीं थीं, क्योंकि उस ने भी वैसी बातें सुन रखी थीं… पर उस का बालम तो नहीं सुनता. इस बार तो कई महीनों से वापस नहीं आया. उसे अचानक याद आया कि उस का बालम कई बार कह भी चुका है कि कलकत्ता की लुगाइयां बड़ी सलोनी होती हैं.

वह पहले क्यों न समझी. गोरी की रातों की नींद और दिन का चैन छिन गया. पर यह बालम भी कैसा बेदर्द है. वह एक फोन तक नहीं कर रहा उस से बात करने को… बताओ, उस फिल्मी हीरोइन के बालम ने तो रंगून से भी फोन किया था कि तुम्हारी याद सताती है… और यह मेरा बालम है जो कलकत्ता से भी फोन नहीं कर रहा.

ऊपर से दिनभर सास के ताने सुनने को मिलते हैं, ‘‘ये आजकल की लड़कियां भी बिना खसम के रह ही न सकें, जाने काहे की आग लगी है? हम भी तो कभी जवान थे. हमारे वे तो 6-6 महीने के लिए परदेश जाते थे कमाने को… हम ने तो यों आंसू न बहाए थे… पूरे घर के काम और करे थे. ‘‘मर्द और बैल कभी खूंटा से बांध के रखे जाते हैं भला. उन्हें तो काम करना ही पड़ेगा तभी तो पेट भरेंगे सब का.’’

गोरी बेचारी चुपचाप ताने सुनसुन कर घर के काम कर रही थी. वैसे भी हमारी बहुओं में चुप रहने की आदत होती है. उस ने ठान लिया था कि इस बार बालम बस वापस आ जाएं, फिर उन्हें कहीं भी जाने देगी, पर कलकत्ता नहीं जाने देगी, चाहे कुछ भी हो जाए. वह अपने पति के रास्ते को वैसे ही रोकेगी जैसे गोपियों ने उद्धव का रथ रोका था जब वे कान्हा को ले कर मथुरा जा रहे थे.

उस दिन सुबहसुबह सचमुच आहट हुई और दरवाजे पर बालम को देख गोरी खुशी में पति से ऐसे लिपट गई मानो चंदन के पेड़ पर सांप लिपटे हों. वह तो ऐसे ही लिपटी रहती अगर सास ने सुमधुर आवाज में उस के पूरे खानदान की आरती न उतारी होती. गालियों की बौछारों ने उस के अंदर से फूटे प्रेम के झरने को बहने से तुरंत रोक दिया.

गोरी ने अपनी भावनाओं को रोका और चुपचाप अपने कामों में जुट गई. भले ही उस की आंखें बालम पर टिकी थीं. आखिरकार इंतजार की घडि़यां खत्म हुईं और गोरी का बालम से मिलन हुआ. पर यह मिलन स्थायी तो नहीं था… गोरी के दिल में हरदम डर लगा रहता, बालम फिर से न कहें कलकत्ता जाने की. गोरी अपने बालम की हर इच्छा का खयाल रखती ताकि उसे जाने की याद न आए. वह प्यारमनुहार से बालम के दिल को टटोलने की कोशिश कर रही थी जिस की डोर का एक सिरा कलकत्ता में बंधा तो है, पर किस से? पर अब तक कामयाब न हो सकी. सो बालम के प्रेम में मगन हो गई.

अभी कुछ ही दिन प्रेम की नदी में डुबकियां लगाते बीते थे कि बालमजी ने फिर कलकत्ता का राग अलापा. इधर उन का अलाप शुरू हुआ… उधर गोरी ने ऐसा रुदन शुरू किया कि बालम के स्वर हिलने लगे. गोरी जमीन में लोटपोट हो कर दहाड़ें मार रही थी… बालम बेचारा हैरानपरेशान उसे जितना चुप कराने की कोशिश करता, गोरी उतनी ही तेज आवाज में अपना रोना शुरू कर देती. सारा घर, सारा महल्ला इकट्ठा हो गया.

सासू ने भी अपने चिरपरिचित अंदाज में गोरी को चुप होने का आदेश दिया, पर आज तो गोरी ने उन की भी न सुनी. उस का रैकौर्डर एक ही जगह फंस गया था कि इस बार बालम को कलकत्ता नहीं जाने दूंगी. जितने लोग उतने उपाय. कोई कहे इस पर भूतनी आ गई है, इसे तांत्रिक बाबा के पास ले चलो… कोई चप्पल सुंघाने की सलाह दे रहा था… कोई कह रहा था कि इस के खसम का किसी कलकत्ते वाली से टांका भिड़ा है. उस के बारे में गोरी को पता लग गया है इसलिए इतना फैल रही है. बालम बेचारा अपने माथे पर हाथ धर के बैठ गया. सब मिल कर गोरी से जानने की कोशिश कर रहे थे कि ऐसी क्या वजह है कि वह अपने बालम को कलकत्ता नहीं जाने देना चाहती.

पर गोरी पर तो जैसे सच्ची में भूत सवार था. वह दहाड़ें मारमार कर रोए जा रही थी और कलकत्ता पर गालियां बरसा रही थी. यह नाटक और कई घंटे चलता, पर इतने में किसी ने पुलिस को फोन कर दिया. कुछ देर तक तो पुलिस के सामने भी यह नाटक चालू रहा, पर फिर दरोगाजी ने डंडा फटकार कर कहा, ‘‘इस को, इस की सास को और पति को ले चलो और जेल में डाल दो. सारा सच सामने आ जाएगा…’’

जेल का नाम सुनते ही गोरी के रोने पर झटके से ब्रेक लग गया. वह एक सांस में बोली, ‘‘हमें न भेजना अपने बालम को कलकत्ता, वहां की औरतें काला जादू जानती हैं, इसे जादू से बकरा बना कर अपने घर में बांध लेंगी, फिर हमारा क्या होगा?’’ और गोरी फिर से रोने लगी.

गोरी की बात सुन कर बाकी लोग हंसने लगे. गोरी रोना बंद कर मुंहबाए सब को देखने लगी… उस ने देखा कि बालम भी हंस रहा है… ‘‘धत पगली, ऐसा किस ने कह दिया तुम से. इस जमाने में ऐसी कहानी कहां से सुन ली…’’ बालम ने उसे मीठी फटकार लगाई.

‘‘मैं ने बचपन में सुना था ऐसा, जो भी बालम कलकत्ता जाते, कभी वापस नहीं आते और मेरी सब सखियों ने भी तो ऐसा ही कहा,’’ गोरी ने बताया. अब सासूजी बोलीं, ‘‘ये कौन सी सखियां हैं तेरी… मुझे बता, मैं खबर लूं उन की. बताओ छोरी का दिमाग खराब कर के धर दिया… कोई भी लुगाई यह सुनेगी, उस बेचारी का कलेजा तो धसक ही जाएगा…

‘‘चल, अब तू भीतर चल. कहीं न जाएगा तेरा बालम… और तुम सब भी अपनेअपने घर को जाओ. यहां कोई मेला थोड़े ही न लगा है.’’ सब अपने रास्ते चल दिए और दारोगाजी भी हंसते हुए वापस चले गए. आखिर गोरी की जीत जो हो गई थी. उस के बालम बकरा बनने से बच जो गए थे.

 

love Story : आप की शिवानी

प्रोफैसर महेश ने कढ़ा हुआ रूमाल उठाया. उन्होंने रूमाल को पहचानने की कोशिश की. यह वही रूमाल था जो शिवानी उन्हें देने के लिए उस दिन उन के कमरे में आई थी. उन की आंखें आंसुओं से भर गईं. कहानी द् तिनसुखिया मेल के एसी कोच में बैठे प्रोफैसर महेश एक पुस्तक पढ़ने में मशगूल थे. वे एक सैमिनार में भाग लेने गुवाहाटी जा रहे थे.

पास की एक सीट पर बैठी प्रौढ़ महिला बारबार प्रोफैसर महेश को देख रही थी. वह शायद उन्हें पहचानने का प्रयास कर रही थी. जब वह पूरी तरह आश्वस्त हो गई तो उठ कर उन की सीट के पास गई और शिष्टतापूर्वक पूछा, ‘‘सर, क्या आप प्रोफैसर महेश हैं?’’ यह अप्रत्याशित सा प्रश्न सुन कर प्रोफैसर महेश असमंजस में पड़ गए. उन्होंने महिला की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मैं ने आप को पहचाना नहीं, मैडम.’’ ‘‘मेरा नाम माधवी है. मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर हूं.

मेरी एक सहेली थी प्रोफैसर शिवानी,’’ वह महिला बोली. ‘‘थी… से आप का क्या मतलब है?’’ प्रोफैसर महेश ने उस की ओर देखते हुए पूछा. ‘‘वह अब इस दुनिया में नहीं है. उस ने किसी को अपनी किडनी डोनेट की थी. उसी दौरान शरीर में सैप्टिक फैल जाने के कारण उस की मृत्यु हो गई थी,’’ महिला ने कहा. ‘‘क्या?’’ प्रोफैसर महेश का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया था. ‘‘जी सर. उसे शायद अपनी मृत्यु का एहसास पहले ही हो गया था. मरने से 2 दिन पहले उस ने मुझे यह रूमाल और एक पत्र आप को देने के लिए कहा था. उस के द्वारा दिए पते पर मैं आप से मिलने दिल्ली कई बार गई. मगर आप शायद वहां से कहीं और शिफ्ट हो गए थे.’’ यह कह कर उस महिला ने वह रूमाल और पत्र प्रोफैसर को दे दिया. वह महिला जा कर अपनी सीट पर बैठ गई. प्रोफैसर महेश बुत बने अपनी सीट पर बैठे थे. तिनसुखिया मेल अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी और उस से भी तेज रफ्तार से अतीत की स्मृतियां प्रोफैसर महेश के मानसपटल पर दौड़ रही थीं. आज से 25 वर्ष पूर्व उन की तैनाती एक कसबे के डिग्री कालेज में प्रोफैसर के रूप में हुई थी.

कालेज कसबे से दोढाई किलोमीटर दूर था. कालेज में छात्रछात्राएं दोनों पढ़ते थे. कालेज का अधिकांश स्टाफ कसबे में ही रहता था. प्रोफैसर महेश का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था और उन के पढ़ाने का ढंग बहुत प्रभावी. इसलिए छात्रछात्राएं उन का बड़ा सम्मान करते थे. वे बड़े मिलनसार और सहयोगी स्वभाव के थे. इसलिए स्टाफ में भी उन के सब से बड़े मधुर संबंध थे.

एक दिन वे क्लास में पढ़ा रहे थे, तभी चपरासी उन के पास आया और बोला, ‘सर, प्रिंसिपल सर आप को अपने औफिस में बुला रहे हैं.’ प्रोफैसर महेश सोच में पड़ गए. फिर वे प्रिंसिपल रूम की ओर चल दिए. उन्हें देख कर प्रिंसिपल साहब बोले, ‘प्रोफैसर महेश, बीए सैकंड ईयर की छात्रा शिवानी अचानक क्लास में बेहोश हो गई है. उसे किसी तरह होश तो आ गया है मगर अभी उस की तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं है. आप ऐसा करिए, उसे अपने स्कूटर से उस के घर छोड़ आइए.’ उस समय स्टाफ के 2-3 लोगों के पास ही स्कूटर था.

शायद इसी कारण प्राचार्यजी ने उन्हें यह कार्य सौंपा था. वे शिवानी को स्कूटर पर बैठा कर कसबे की ओर चल दिए. वे कसबे में पहुंचने ही वाले थे कि सड़क के किनारे खड़े बरगद के पेड़ के पास शिवानी ने कहा, ‘सर, स्कूटर रोक दीजिए.’ प्रोफैसर महेश ने स्कूटर रोक दिया और शिवानी से पूछा, ‘‘क्या बात है शिवानी, क्या तुम्हें फिर चक्कर आ रहा है?’ ‘मुझे कुछ नहीं हुआ सर, मैं तो आप से एकांत में बात करना चाहती थी, इसलिए मैं ने कालेज में बेहोश होने का नाटक किया था,’

उस ने बड़े भोलेपन से कहा. ‘क्या?’ प्रोफैसर ने हैरानी से उस की ओर देखा. फिर पूछा, ‘आखिर, तुम ने ऐसा क्यों किया और तुम मुझ से क्या बात करना चाहती हो?’ ‘सर, मैं आप से प्यार करती हूं और आप को यही बात बताने के लिए मैं ने यह नाटक किया था,’ वह प्रोफैसर की ओर देख कर मुसकरा रही थी.

प्रोफैसर हतप्रभ खड़े थे. उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे उस से क्या कहें. काफी देर तक वे चुप रहे. फिर बोले, ‘यह तुम्हारी पढ़ने की उम्र है, प्यार करने की नहीं. अभी तो तुम प्यार का मतलब भी नहीं जानतीं.’ ‘आप ठीक कह रहे हैं, सर. मगर मैं अपने इस दिल का क्या करूं, यह तो आप से प्यार कर बैठा है,’ वह प्रोफैसर की ओर देख कर मुसकराते हुए बोली. ‘तुम्हें मालूम है कि मैं शादीशुदा हूं और मेरे 2 बच्चे हैं. और मेरी तथा तुम्हारी उम्र में कम से कम 20 साल का अंतर है,’ प्रोफैसर ने उसे समझते हुए कहा. ‘मुझे इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता, सर. मैं तो केवल एक ही बात जानती हूं कि मैं आप से प्यार करती हूं, बेपनाह प्यार,’ वह दार्शनिक अंदाज में बोली. प्रोफैसर ने उसे समझने का हरसंभव प्रयास किया. मगर उस पर कोई असर नहीं हुआ.

तो उन्होंने यह कह कर कि, अब तुम ठीक हो इसलिए यहां से अपने घर पैदल चली जाना, वे कालेज लौट गए. प्रोफैसर महेश ने इस बात को उस का बचपना समझ और गंभीरता से नहीं लिया. शिवानी किसी न किसी बहाने से उन के करीब आने और उन से बात करने का प्रयास करती रहती. परंतु वह उन के जितना करीब आने का प्रयास करती, वे उतना ही उस से दूर भागते. वे नहीं चाहते थे कि कालेज में यह बात चर्चा का विषय बने. कसबे में छोटे बच्चों का कोई कौन्वैंट स्कूल नहीं था, इसलिए वे यहां अकेले ही किराए के मकान में रहते थे. उन की पत्नी और बच्चे उन के मम्मीपापा के साथ रहते थे. एक दिन शाम का समय था. प्रोफैसर कमरे में अकेले बैठे एक किताब पढ़ रहे थे. तभी दरवाजे पर खटखट हुई. उन्होंने दरवाजा खोला. सामने शिवानी खड़ी थी. उसे इस प्रकार अकेले अपने घर पर देख वे असमंजस में पड़ गए. इस से पहले कि वे कुछ कहते, वह कमरे में आ कर एक कुरसी पर बैठ गई.

आज पहली बार प्रोफैसर ने शिवानी को ध्यान से देखा. 20-21 वर्ष की उम्र, लंबा व छरहरा बदन, गोराचिट्टा रंग और आकर्षक नैननक्श. उस के लंबे घने बाल उस की कमर को छू रहे थे. सादे कपड़ों में भी वह बेहद सुंदर लग रही थी. कमरे के एकांत में एक बेहद सुंदर नवयुवती प्रोफैसर के सामने बैठी थी और वह उन से प्यार करती है, यह सोच कर प्रोफैसर के मन में गुदगुदी सी होने लगी. उन्होंने अपने मन को संयत करने का बहुत प्रयास किया मगर वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने में असफल रहे. उन के मन में तरहतरह की हसीन कल्पनाएं उठने लगीं, चेहरे का रंग पलपल बदलने लगा. इस सब से बेखबर शिवानी कुरसी पर शांत और निश्चल बैठी थी. उस के एक हाथ में सफेद रंग का रूमाल था.

प्रोफैसर उठ कर उस के पास गए और उस के गालों को थपथपाते हुए पूछा, ‘शिवानी, तुम यहां अकेले क्या करने आई हो?’ उस ने प्रोफैसर की आंखों में झंक कर देखा, पता नहीं उसे उन की आंखों में क्या दिखाई दिया, वह झटके के साथ कुरसी से उठ कर खड़ी हो गई. उस के चेहरे के भाव एकाएक बदल गए थे. प्रोफैसर के हाथों को अपने गालों से झटके के साथ हटाते हुए वह बोली, ‘प्लीज, डोंट टच मी. आई डोंट लाइक दिस.’ प्रोफैसर के ऊपर पड़ा बुद्धिजीवी का लबादा फट कर तारतार हो चुका था. शिवानी का यह व्यवहार उन के लिए अप्रत्याशित था. उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि वे उस से क्या कहें. ‘तुम तो कहती हो कि तुम मुझ से बहुत प्यार करती हो,’ प्रोफैसर महेश ने शिवानी की ओर देखते हुए कहा. ‘हां सर, मैं आप को बहुत प्यार करती हूं. मगर मेरा प्यार गंगाजल की तरह निर्मल और कंचन की तरह खरा है,’ उस ने दृढ़ स्वर में कहा. ‘ये सब फिल्मी डायलौग हैं,’ प्रोफैसर ने खिसियानी हंसी हंसते हुए कहा. ‘सर, जरूरत पड़ने पर मैं यह सबित कर दूंगी कि आप के प्रति मेरा प्यार कितना गहरा है,’ यह कह कर वह कमरे से चली गई थी. काफी देर तक प्रोफैसर अवाक खड़े रहे थे, फिर अपने काम में लग गए थे. इस के बाद शिवानी ने उन से बात करने या मिलने का प्रयास नहीं किया.

वे भी धीरेधीरे उसे भूल गए. कुछ समय बाद उन का उस कालेज से स्थानांतरण हो गया. सरकारी सेवा होने के कारण कई जगह स्थानांतरण हुए और आखिर में वे दिल्ली में सैटल्ड हो गए. 2 साल पहले प्रोफैसर को किडनी प्रौब्लम हो गई. कई महीने तक तो डाइलिसिस पर रहे, फिर डाक्टरों ने कहा कि अब किडनी ट्रांसप्लांट के अलावा कोई चारा नहीं है. तब प्रोफैसर ने अपने परिवार में इस संबंध में सब से बातचीत की. उन की पत्नी, दोनों बेटों और बेटी ने राय दी कि पहले किडनी के लिए विज्ञापन देना चाहिए. हो सकता है कि कोई जरूरतमंद पैसे के लिए अपनी किडनी डोनेट करने के लिए तैयार हो जाए. अगर 2-3 बार विज्ञापन देने के बाद भी कोई डोनर नहीं मिलता है तो हम लोग फिर इस बारे में बातचीत करेंगे. बेटे ने राजधानी के सभी अखबारों में किडनी डोनेट करने वाले को 20 लाख रुपए देने का विज्ञापन छपवाया. विज्ञापन में प्रोफैसर का नाम, पूरा पता दिया गया. विज्ञापन दिए एक महीना हो गया था.

जिस अस्पताल में प्रोफैसर महेश का इलाज चल रहा था. एक दिन वहां से फोन आया. ‘सर, आप के लिए गुड न्यूज है. आप को किडनी देने के लिए एक डोनर मिल गई है. उस की उम्र 45 साल के करीब है और वह आप को किडनी डोनेट करने के लिए तैयार है. मगर उस की एक शर्त है कि, किडनी ट्रांसप्लांट होने से पहले उस का नाम व पता किसी को न बताया जाए.’

मुझे यह जान कर हैरानी हुई कि डोनर अपना नाम, पता क्यों नहीं बताना चाहती. फिर हम सब ने सोचा कि शायद उस की कोई मजबूरी होगी. ट्रांसप्लांट की सारी फौर्मैलिटीज पूरी कर ली गईं और नियत तारीख पर उन की किडनी का ट्रांसप्लांटेशन हो गया, जो पूरी तरह से सफल रहा. इस के कई दिनों बाद जब प्रोफैसर महेश अपने को काफी सहज अनुभव करने लगे तो उन्होंने एक दिन डाक्टर साहब से पूछा कि ‘डाक्टर साहब, वे लेडी कैसी हैं जिन्होंने उन्हें अपनी किडनी डोनेट की थी.’ कुछ देर तक डाक्टर साहब खामोश रहे, फिर बोले कि वह लेडी तो परसों बिना किसी को कुछ बताए अस्पताल से चली गई.

हैरानी की बात यह है कि वह अपनी डोनेशन फीस भी नहीं ले गई. ‘क्या..?’ प्रोफैसर का मुंह विस्मय से खुला का खुला रह गया था. जब उन्होंने यह बात अपने परिवार के लोगों को बताई तो उन सब को बड़ी हैरानी हुई. सभी को यह बात समझ ही नहीं आ रही थी कि आज के इस आपाधापी के दौर में 20 लाख रुपए ठुकरा देने वाली यह लेडी आखिर कौन थी.

काफी दिनों तक प्रोफैसर इसी उधेड़बुन में रहे. उन्होंने उस लेडी का पता लगाने की हरसंभव कोशिश की, मगर इस के बारे में कुछ पता नहीं चला. ‘‘आप को कहां तक जाना है, सर,’’ अचानक टीटीई ने आ कर प्रोफैसर महेश की तंद्रा को भंग कर दिया. वे अतीत से वर्तमान में लौट आए. टिकट चैक करने के बाद टीटीई चला गया. प्रोफैसर महेश ने वह रूमाल उठाया जो शिवानी ने उन्हें देने के लिए प्रोफैसर माधवी को दिया था. उन्होंने रूमाल को पहचानने की कोशिश की. यह शायद वही कढ़ा हुआ रूमाल था जो शिवानी उन्हें देने उन के कमरे पर आई थी.

सफेद रंग के उस रूमाल के एक कोने में सुनहरे रंग से इंग्लिश का अक्षर एस कढ़ा हुआ था. एस यानी शिवानी के नाम का पहला अक्षर. अब प्रोफैसर महेश को डोनर की सारी पहेली समझ में आ गई थी. उन्होंने रूमाल में रखे हुए मुड़ेतुड़े पत्र को खोल कर पढ़ा, लिखा था- ‘‘प्रोफैसर साहब, ‘‘आप का जीवन मेरे लिए बहुत बहुमूल्य है, इसलिए मैं ने अपने जीवन को संकट में डाल कर आप की जान को बचाया. मगर मैं ने ऐसा कर के आप पर कोई एहसान नहीं किया. मुझे तो इस बात की खुशी है कि मैं जिसे हृदय की गहराइयों से प्यार करती थी, उस के किसी काम आ सकी. ‘‘आप की शिवानी.’’ पत्र पढ़ कर प्रोफैसर महेश का मन गहरी वेदना से भर उठा. शिवानी का यह निस्वार्थ प्यार देख कर उन की आंखों से आंसू बहने लगे. उन्होंने शिवानी का दिया हुआ रूमाल उठाया और उस से अपने आंसुओं को पोंछने लगे. ऐसा कर के शायद उन्होंने शिवानी के सच्चे अमर प्रेम को स्वीकार कर लिया था.

Satire : थूक

केदारनाथ धाम में मुंबई के मेरे एक दोस्त पिछले दिनों केदारनाथ धाम आए थे. अपने आने की खबर उन्होंने मुझे पहले से दे दी थी. वे एक होटल में ठहरे थे.

उन से मुलाकात कर के मैं वापस लौट रहा था. रास्ते में देखा कि एक कोढ़ी खस्ता हालत में शिवलिंग के दर्शन के लिए गुजरात से आया था.

वह कोढ़ी पूरी शिद्दत से मंदिर के अंदर चला गया. सब लोग लाइन में खड़े थे, तभी उस कोढ़ी के पास एक पंडा आया. उस कोढ़ी ने जेब से 500 रुपए निकाल कर पंडे को दे दिए. पंडा उसे स्पैशल पूजा के रास्ते से मंदिर के भीतर ले गया.

पूजा के बाद पंडा तो खिसक गया, लेकिन उस कोढ़ी ने शिवलिंग को कस कर पकड़ते हुए कहा, ‘‘महाराज, मैं गुजरात से आया हूं. न जाने मैं ने पिछले जन्म में क्या पाप किया था, जो मैं कोढ़ी हो गया…’’

वह कोढ़ी शिवलिंग पर ऐसे चिपटा हुआ था, मानो उस का कोढ़ गायब हो जाएगा. वह शिवलिंग को छोड़ने के मूड में नहीं था, तभी वहां तमाम भक्तों की भीड़ लग गई. सभी दर्शनों के लिए बेचैन थे. दूसरे पंडे उसे शिवलिंग को छोड़ने के लिए लगातार कह रहे थे, पर वह उन की बात न सुन कर केवल रोए जा रहा था.

 

हार कर 4 पंडे और आए और उसे जबरन घसीट कर मंदिर से बाहर ले गए.

गुस्से में आगबबूला हो कर पंडे उसे गालियां देने लगे. कुछ पंडे उस पर लातें चला रहे थे, तो कई घूंसे जमा रहे थे.

थोड़ी देर बाद वह कोढ़ी लहूलुहान हो कर सीढ़ी के किनारे आ बैठा.

मैं ने उस की हालत देख कर कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

दिल्ली रेलवे स्टेशन पर मुझे कवि सम्मेलन में भाग लेने के लिए नागपुर जाना था. मैं ने स्टेशन पर पता किया कि नागपुर के लिए गाड़ी रात के 3 बजे मिलेगी. मैं रात के 12 बजे स्टेशन पहुंच गया. मैं ने सोचा कि 3 घंटे टहलतेटहलते कट जाएंगे.

मैं प्लेटफार्म नंबर 5 पर आया और एक लोहे की बैंच पर बैठ गया. मेरे बगल वाली बैंच पर धोतीकुरता पहने एक साहब गहरी नींद में सोए हुए थे.

मेरी दाईं तरफ एक साहब व उन की बीवी और 2 बच्चे एक बैंच पर बैठे थे. शायद वे भी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे. उन के बच्चे बहुत नटखट नजर आ रहे थे. उन की मम्मी उन्हें बिट्टू व पिंटू नाम से पुकार रही थीं.

वे दोनों बच्चे मेरे बगल वाली बैंच पर सो रहे साहब को नाना पाटेकर कह रहे थे. एक भिखारी व एक भिखारिन को वे अनिल कपूर व जूही चावला कह रहे थे.

अचानक वे दोनों बच्चे मेरी बगल वाली बैंच पर सोए हुए साहब की बैंच पर बैठ गए और उन में से एक ने अपनी मम्मी से कहा, ‘‘मम्मी, हम नाना पाटेकर के साथ बैठे हैं.’’

उन की मम्मी मुसकराते हुए उन्हें चुप रहने का इशारा करने लगीं.

वे दोनों बच्चे उन साहब के नीचे रखे जूतों को इस तरह देख रहे थे, मानो जूतों की तहकीकात कर रहे हों. फिर उन दोनों ने जूतों में पेशाब करना शुरू कर दिया. वे पेशाब की धार की गिनती गिनने लगे. बिट्टू ने 50 की गिनती तक जूता भरा, जबकि पिंटू ने 30 की गिनती में ही जूता भर दिया. इस के बाद वे दोनों अपनी मम्मी के पास चले गए.

तभी एक पुलिस वाला आया. उसने सोए हुए आदमी को डंडा चुभा कर कहा, ‘‘अबे ओ घोंचू, घर में सोया है क्या?’’

उन साहब की नींद खुली और वे जूता पहनने लगे कि जूतों में भरे पेशाब ने वहां का फर्श गीला कर दिया.

‘‘अरे, यह क्या किया. जूतों में पेशाब कर के सो रहा था. प्रदूषण फैलाता है. तुझे सामने लिखा नहीं दिखाई दिया कि गंदगी फैलाने वाले से 500 रुपए जुर्माना वसूल किया जाएगा. चल थाने,’’ कह कर पुलिस वाला उसे थाने ले जाने लगा.

 

वे साहब चलतेचलते गिड़गिड़ाने लगे, ‘‘नहीं जनाब, मैं ने पेशाब नहीं किया…’’

पुलिस वाले ने उन की एक न सुनी. वह उन्हें प्लेटफार्म नंबर 4 की तरफ ले गया.

मैं ने उन दोनों बच्चों की तरफ देखा. वे भी सारा माजरा समझ गए थे. उन में से एक ने दूसरे से कहा, ‘‘अभी तो फिल्म का ट्रेलर चल रहा है, पिक्चर शुरू नहीं हुई.’’

मैं धीरे से कहने लगा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

राजस्थान की बस में मैं अजमेर में एक अखबार में सहायक संपादक था. प्रधान संपादक ने मुझे निजी काम से दिल्ली भेजा था. मैं अजमेर से दिल्ली के लिए सुबह बस से चला था. जयपुर से आगे एक छोटे शहर में बस का टायर पंचर हो गया. सभी सवारियां समय बिताने व कुछ खानेपीने के लिए आसपास की दुकानों में चली गईं.

मैं एक पेड़ की छाया में बैठ गया. बगल वाली गली में कुछ बच्चे खेल रहे थे, तभी वहां से एक गधा गुजरा. गधे को देख कर बच्चों ने हल्ला मचाना शुरू कर दिया. 3 बच्चे गधे पर सवार हो गए और 2 बच्चे डंडे से पीटते हुए उसे दौड़ाने लगे. गधा ‘ढेंचूढेंचू’ करता हुआ दौड़ता जा रहा था.

सभी सवारियां यह तमाशा देख रही थीं. हमारी बस का ड्राइवर लंबी चोटी रखे हुए था. वे बच्चे ड्राइवर को चिढ़ाने लगे, ‘चोटी वाला साबुन क्या भाव है?’

 

ड्राइवर को गुस्सा आ गया. उस ने सड़क के किनारे पड़ा एक पुराना सैल उठाया और बच्चों की तरफ फेंक दिया. सैल एक बच्चे की खोपड़ी में जोर से लगा और उस की खोपड़ी से खून बहने लगा.

बस का टायर बदला जा चुका था. ड्राइवर ने हौर्न बजाया. सब सवारियां बस में बैठ गईं और बस दिल्ली की तरफ चल पड़ी.

रेवाड़ी पहुंचते ही पुलिस ने बस को घेर लिया और ड्राइवर को हथकड़ी पहना दी.

मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

मसजिद के बाहर बात मुरादाबाद की है. एक मसजिद के बाहर एक हिंदू दंपती ने अपना तकरीबन 15 साल का लड़का नंगा कर के जमीन पर बैठा रखा था. जो भी नमाज पढ़ने अंदर जाता, उस से लड़के का पिता गुजारिश करता कि बाहर आते समय लड़के के ऊपर थूक कर चले जाना, क्योंकि यह लड़का दुष्ट आत्मा का शिकार है.

मैं ने अपने दोस्त से पूछा कि यह क्या हो रहा है, तो उस ने बताया कि यह किसी जिन का चक्कर है.

हम दोनों मसजिद के सामने वाली दुकान पर अखबार पढ़ने के बहाने बैठ गए. मेरी नजर उसी लड़के पर टिकी थी. जो भी नमाजी बाहर आ रहा था,

वह लड़के पर थूक रहा था. कोई पान वाला लाल थूक डाल रहा था तो कोई सादा थूक.

नमाजियों की भीड़ बढ़ती जा रही थी. एक नमाजी नया सफेद पठानी सूट पहने था. भीड़ की वजह से उस की सलवार पर उस लड़के के बदन का थूक लग गया.

 

‘‘बेवकूफ, मेरी सलवार को कौन साफ करेगा? तेरा बाप…?’’ कहते हुए उस ने एक जोरदार लात लड़के के मुंह पर जमा दी. मैं ने देखा कि लड़के की दाईं आंख लात की चोट से बंद हो चुकी थी.

दुष्ट आत्मा तो थूकने या लात खाने से भले ही न निकली हो, पर उस लड़के को रिकशे पर लाद कर अस्पताल ले जाना पड़ा.

मैं ने कहा, ‘‘अरे, यह क्या कर दिया?’’

Hindi Story : जज्‍बात का सौदागर

रोमा सारे घरों का काम जल्दीजल्दी निबटा कर तेज कदमों से भाग ही रही थी कि वनिता ने आवाज लगाई, ‘‘अरी ओ रोमा… नाश्ता तो करती जा. मैं ने तेरे लिए ही निकाल कर रखा है.’’‘‘रख दीजिए बीबीजी, मैं शाम को आ कर खा लूंगी. अभी बहुत जरूरी काम से जा रही हूं,’’ कहते हुए रोमा सरपट दौड़ गई. रोमा यहां सोसाइटी के कुछ घरों में झाड़ूपोंछा, बरतन, साफसफाई का काम करती थी. इस समय वह इतनी तेजी से अपने प्रेमी रौनी से मिलने जा रही थी. रौनी बगल वाली सोसाइटी में मिस्टर मेहरा के यहां ड्राइवर था.

पिछले 2 साल से रोमा और रौनी में गहरी जानपहचान हो गई थी. वे दोनों अगलबगल की सोसाइटी में काम करते थे और एक दिन आतेजाते उन की निगाहें टकरा गईं. फिर देखते ही देखते उन के बीच प्यार की शहनाई बज उठी.जवानी की दहलीज पर अभीअभी कदम रखने वाली रोमा पूर्णमासी के चांद की तरह बेहद ही खूबसूरत और मादक लगती थी. उस की हिरनी जैसी आंखें, सुराहीदार गरदन, पतली कमर और गदराया बदन देख कर हर कोई उसे रसभरी निगाहों से देखता था, लेकिन रोमा की जिंदगी का रस रौनी था, जिस से शादी कर के वह अपना घर बसाना चाहती थी. रौनी दिखने में बांका जवान था.

बिखरे बाल, आंखों पर चश्मा, शर्ट के सामने के 2 बटन हमेशा खुले, गले में चेन और कलाई में ब्रैसलेट… रौनी का यह स्टाइल किसी हीरो से कम नहीं था और रोमा उस के इसी स्टाइल पर मरमिटी थी.अकसर रोमा ही सारे घरों का काम निबटा कर रौनी को पास वाले पार्क में मिलने के लिए फोन किया करती थी, लेकिन आज पहली बार रौनी ने फोन कर के रोमा को ‘जरूरी काम है’ कह कर बुलाया था.रोमा भागीभागी पार्क में पहुंची, तो देखा कि रौनी वहां उस का इंतजार कर रहा था.

रोमा को सामने देखते ही रौनी ने उसे अपनी बांहों में दबोच लिया. रोमा खुद को छुड़ाते हुए बोली, ‘‘यही था तेरा जरूरी काम, जो तू ने मुझे यहां इतनी जल्दी में बुलाया… तुझे पता है कि मैं बनर्जी के घर का काम छोड़ कर आई हूं…

अब जल्दी से बोल कि यहां मुझे क्यों बुलाया?’’रोमा की कमर पर अपना हाथ डाल कर उसे अपनी ओर खींच कर करीब लाने के बाद उस के होंठों पर अपनी उंगली फेरते हुए रौनी बोला, ‘‘हमारी शादी के लिए रुपयों का जुगाड़ हो गया…’’यह सुनते ही रोमा उछल पड़ी और बोली, ‘‘अरे वाह… यह सब तू ने कैसे किया? तेरा मालिक तुझे रुपए उधार देने के लिए तैयार हो गया क्या?’’रोमा के ऐसा पूछने पर रौनी के चेहरे पर एक राजभरी मुसकान और आंखों पर एक अजीब सी शरारत तैर गई और वह रोमा का चेहरा अपने दोनों हाथों में ले कर उस के होंठों को चूमने लगा. रोमा झुंझला कर रौनी से अलग होते हुए बोली,

‘‘छोड़ मुझे… पहले यह बता कि रुपए कहां से आएंगे?’’अपने हाथों से अपने ही होंठों को पोंछते हुए रौनी बोला, ‘‘तुझे हमारे साहब के बच्चे को जन्म देना होगा.’’इतना सुनते ही रोमा चिढ़ गई और बोली, ‘‘तुझे शर्म नहीं आती, कैसी बेशर्मों जैसी बात करता है. मैं भला तेरे साहब के बच्चे की मां क्यों बनूंगी…’’

रोमा के ऐसा कहने पर रौनी हंसते हुए बोला, ‘‘अरे, तुझे साहब के बच्चे की मां नहीं बनना है, बच्चे की मां तो उन की बीवी ही रहेगी, तुझे तो बस उन के बच्चे को अपनी कोख में 9 महीने के लिए रखना है. इस के लिए साहब हमें 2 लाख रुपए देंगे, मकान किराए पर ले कर देंगे और खानापीना सब का खर्चा साहब ही उठाएंगे.’’पहले तो रोमा मानी नहीं, लेकिन जब रौनी ने उसे सरोगेसी मां के बारे में अच्छी तरह से समझाया, अपने प्यार का वास्ता दिया और जल्द ही शादी करने का वादा किया, तो 20 साल की भोलीभाली रोमा सरोगेसी मां बनने के लिए तैयार हो गई.

रोमा ने सारे घरों का काम छोड़ दिया. इतना ही नहीं, अपना घर भी छोड़ दिया. वैसे भी घर पर उस का अपना कोई था नहीं. बाप पूरा दिन शराब के नशे में पड़ा रहता. उसे अपना होश नहीं रहता था, तो वह अपनी बेटी की फिक्र कहां से करता. सौतेली मां के लिए रोमा बोझ ही थी. रोमा के आगेपीछे कोई नहीं था. जो था रौनी ही था, जिस पर उसे अंधा भरोसा था और वह रौनी पर जान छिड़कती थी.रौनी कोलकाता से रोमा को उत्तराखंड ले आया.

यहां आ कर रोमा को पता चला कि जहां वह रहने वाली है वह कोई घर नहीं, बल्कि एक आश्रम है, जहां उस के जैसी और भी बहुत सी लड़कियां और औरतें दिखाई दे रही थीं, जो मां बनने वाली थीं. आश्रम में कुछ जवान लड़कियां और बुजुर्ग औरतें भी थीं, जो साध्वी और सेवादार थीं. यह आश्रम एक जानेमाने आचार्य द्वारा चलाया जा रहा था, जिन का देशविदेश में हर दिन प्रवचन होता था और वे धर्म से जुड़ी कहानियां भक्तों से साझा करते थे.

रोमा को यह सब बहुत अटपटा लग रहा था, लेकिन वह रौनी का साथ पा कर इन सभी को नजरअंदाज कर रही थी. रोमा की दुनिया अब बदल गई थी. रौनी हर समय उस के साथ रहता, उस का पूरा खयाल रखता. एक महीने के भीतर डाक्टर की निगरानी में रोमा पेट से भी हो गई, लेकिन उसे कुछ समझ नहीं आया कि यह सब हुआ कैसे? न रौनी के साहब यहां आए और न ही साहब की पत्नी.इस बीच रोमा ने न कभी आश्रम में रह रही किसी लड़की या औरत से कोई बात की और न ही यह जानने की कोशिश की कि वे सब कहां से आई हैं, उन के पति कहां हैं और वे इस आश्रम में कब से हैं.

एक रात अचानक खाना खाने के बाद रौनी कहीं जाने की तैयारी करने लगा. यह देख कर रोमा बोली, ‘‘रौनी, तू कहीं जा रहा है क्या?’’रोमा के ऐसा कहने पर रौनी बोला, ‘‘हां, काम पर तो लौटना होगा. शादी की तैयारी जो करनी है.’’यह सुन कर रोमा का चेहरा उतर गया. वह रोआंसी हो गई और रौनी के गले लगते हुए बोली, ‘‘तू मत जा, रौनी. मैं तेरे बगैर यहां नहीं रह पाऊंगी.

फिर अभी तो बच्चे के होने में पूरे 9 महीने हैं. मैं यहां अकेली तेरे बगैर कैसे रहूंगी… मैं भी तेरे साथ चलती हूं.’’रोमा को इस तरह रोते और साथ चलने की जिद करते देख रौनी उसे समझाते हुए बोला, ‘‘देख, साहब और मेमसाहब की पहली शर्त यही थी कि उन का बच्चा इसी आश्रम में पैदा हो, ताकि बच्चे में अच्छे गुण और संस्कार आएं, इसलिए तुझे यहीं रहना होगा और मुझे तो जाना ही होगा. ‘‘शादी के लिए और भी रुपयों की जरूरत पड़ेगी. तुझे दुखी होने की कोई जरूरत नहीं.

तू यहां अकेली कहां है. इस आश्रम में इतने सारे लोग हैं. सब तेरा ध्यान रखेंगे और मैं भी तो आताजाता ही रहूंगा,’’ ऐसा कह कर रौनी जाने लगा. रोमा उसे भारी मन से आश्रम के बाहर तक छोड़ने के लिए साथ चलने लगी. अभी वे दोनों आश्रम के मेन गेट से कुछ दूर ही पहुंचे थे कि एक लड़की दौड़ती हुई आई और रौनी से लिपट गई. यह देख कर रोमा हैरान थी, क्योंकि वह लड़की बारबार रौनी को अपने साथ ले चलने की बात कह रही थी.वह लड़की कह रही थी,

‘‘रौनी, यह आश्रम, आश्रम नहीं है. यहां लड़कियों की दलाली होती है. उन का शारीरिक शोषण होता है. जबरन उन्हें पेट से किया जाता है और उन से पैदा होने वाले बच्चों को उन पैसे वाले और विदेशी जोड़ों को बेच दिया जाता है, जिन के बच्चे नहीं हैं.’’उस लड़की की बातों को सुन कर रोमा को यह समझने में समय नहीं लगा कि उस के साथ छल हुआ है और वह भी उस लड़की की ही तरह रौनी के हाथों ठगी जा चुकी है. वह रौनी के किसी भी साहब या उन की पत्नी के लिए सरोगेसी मां नहीं बनाई जा रही है, बल्कि इस आश्रम में बच्चों का व्यापार होता है और उसे इसीलिए इस आश्रम में लाया गया है.

रोमा उस लड़की से कोई सवाल करती या फिर रौनी से पूछती कि उस ने उस के साथ यह छल क्यों किया, उस से पहले एक साध्वी तेज कदमों से वहां आई और उस लड़की के गाल पर जोरदार तमाचा जड़ने के बाद उसे वहां से खींच कर ले जाने लगी. वह लड़की चीखचीख कर रौनी को पुकारती रही और उस से कहती रही, ‘‘रौनी, मुझे इस नरक से ले चलो…’’लेकिन रौनी उस लड़की को अनसुना और रोमा को अनदेखा कर आश्रम के गेट से बाहर अपने नए शिकार की तलाश में निकल गया. रोमा हैरान सी खड़ी रौनी को अपनी आंखों से ओझल होते हुए देखती रही.

sad love story : प्रेम की चिता

‘‘अरे बाबा, आजकल फसलों पर एक बड़ी मुसीबत आई है. सुना है कि 3-4 किलोमीटर लंबा एक टिड्डी दल किसी भी दिशा से आता है और लहलहाती फसलों पर बैठ कर कुछ ही समय में उन्हें चट कर जाता है. इन टिड्डियों के चलते किसानों में बड़ा डर फैला हुआ है. आजकल किसान खेतों में दिनरात पहरा दे रहे हैं,’’ केशव ने अपने बाबा त्रिकाली डोम से कहा.

‘‘हां… हो सकता है… पर इस खतरे से हमें न कल डर था और न आज ही कोई डर है,’’ केशव के बाबा आसमान में देखते हुए बोले. ‘‘हम तो भूमिविहीन ही पैदा हुए. और हमारे डोम समाज का काम चिता को सजाने से ले कर उसे पूरी तरह जलाने का था. इसलिए जमीन न होने के चलते फसल कभी उगाई नहीं और आज भी हमारे पास जमीन नहीं है, इसलिए टिड्डी दल का खतरा हो या न हो, हमें कोई असर नहीं पड़ता,’’ और फिर केशव का बाबा एक गाना गाने लगा था:

‘‘तिसना छूटी… माया छूटी, छूटी माटी, माटी रे… माटी का तन मिला माटी में… रह गई, माटी माटी… रे…’’ किसी जमाने में इस गांव में लाशें जलाने का काम करने वालों को डोमराजा कहा जाता था और वे समाज में अनदेखे रहते थे, पर धीरेधीरे जैसे इस गांव का विकास हुआ, वैसे ही इन लोगों की जिंदगी में भी सुधार हुआ. डोम लोगों की अगली पीढ़ी अब अपना पुश्तैनी काम न कर के पढ़ाई करना चाहती थी.

त्रिकाली डोम का पोता केशव भी शहर से पढ़ाईलिखाई कर के गांव में वापस आ गया था और उस ने गांव में ही कपड़े का कारोबार शुरू कर दिया था. केशव के अच्छे बरताव और मेहनत के चलते उस का काम भी चमक रहा था.

इस कसबे में एक तरफ ऊंची जाति के लोगों की बस्तियां थीं, तो दूसरी तरफ पिछड़ी जाति की. ऐसे तो ऊंचनीच के भेद को किसी भौगोलिक रेखा की जरूरत नहीं होती है, वह भेद तो हमेशा ही दोनों जातियों के मन में अपनी जगह बनाए रखता है. ऊंची जातियों में, ऊंचे होने का अहंकार रहता है, तो नीची जातियों में नीच कहलाए जाने का दर्द और एक अनजाना डर.

किसी जमाने में एक पिछड़ा गांव आज एक अच्छेखासे कसबे में तबदील हो गया था. इस गांव में मोबाइल और केबल टीवी से ले कर जरूरत की तकरीबन हर चीज मिलने लगी थी. पर यह गांव आज भी किसी जमाने में अपने ऊपर हुए जोरजुल्म की कहानी कहता है और यह बताता है कि जोरजुल्म की कोई जाति नहीं होती, माली तौर पर कमजोर किसी भी आदमी को सताया और दबाया जा सकता है, जिस का उदाहरण इसी गांव में रहने वाली 55 साल की एक औरत रूपाली देवी थी. वह जाति से ठाकुर थी, पर उस के पति से उस के देवर का जमीनी विवाद चला करता था. उस के पति ने कोर्टकचहरी कर के जमीन का कब्जा हासिल कर लिया था.

इस बात से गुस्साए देवर ने एक दिन दबंगों के साथ मिल कर रूपाली देवी का रेप कर डाला था. उस समय रूपाली देवी की उम्र महज 20 साल थी, अपने ऊपर हुए रेप की रिपोर्ट कराने गई रूपाली देवी की कोई भी सुनवाई नहीं हुई. उलटा उसे ही जलील हो कर थाने से बाहर निकाल दिया गया. इतने पर भी जब रूपाली देवी के देवर की सीने की आग ठंडी नहीं हुई. रेप के एक साल के अंदर ही रूपाली देवी ने एक चांद सी लड़की ‘मालती’ को जन्म दिया, तो उस बच्ची को रेप से पैदा हुई औलाद के रूप में भी खूब प्रचारित किया गया.

इस से दुखी हो कर रूपाली देवी और उस के पति ने कई बार गांव ही छोड़ देने और दूसरे गांव में जा बसने की योजना बनाई, पर जमीन से जुड़े होने के चलते और अपनी जमीन की सही कीमत न मिल पाने के चलते वे अपने मुंह को सी कर इसी गांव में रहते रहे.

मालती रेप के द्वारा पैदा हुई औलाद है, इस दुष्प्रचार का असर ये हुआ कि मालती से कोई भी लड़का शादी करने को राजी नहीं हो रहा था. यदि कहीं से रिश्ता बनता भी तो मालती की बदनामी पहले ही करा दी जाती. लिहाजा, यह रिश्ता टूट जाता और इसी तरह मालती की उम्र आज 35 साल की हो गई थी और वह अब भी कुंआरी थी.

मालती के घर में उस की मां, बाप और एक भाई थे. मालती ने अपनी बढ़ती उम्र के बीच खुद को बिजी रखने और रोजीरोटी के लिए खुद का काम करना शुरू कर दिया था. वह कसबे की दुकानों से कपड़ा खरीद कर उस पर बढि़या कढ़ाई करती और अपने भाई द्वारा उन्हें शहरों के बाजारों में बिकने भेज देती.

इस बार जब मालती कसबे के बाजार में कपड़ा खरीदने गई, तो अपनी दुकान पर बैठे केशव ने मालती को अच्छा ग्राहक जान कर उस से कहा, ‘‘कभी हमारी दुकान से भी कपड़ा खरीद कर देखो… क्वालिटी में सब से बेहतर ही पाएंगी.’’ ‘‘हां… पर, मैं तो यह काम चार पैसे कमाने के लिए करती हूं… अगर बाजार से कम कीमत लगाओ, तो मैं तुम से ही कपड़ा ले लिया करूंगी,’’ मालती ने कहा.

‘हां, तो फिर आओ… दुकान के अंदर आ आओ… एक से एक कपड़ा दिखाता हूं और वे भी सही कीमत के साथ, अगर पसंद आ जाए तो बता देना… घर तक पहुंचवा भी दूंगा,’’ केशव ने दुकान के अंदर आने का इशारा करते हुए कहा. मालती ने दुकान के अंदर जा कर अपनी पसंद के कपड़े लिए और अपने मुताबिक कीमत भी लगवाई.

‘‘एक बात कहूं… मैं तो सोचता था कि तुम ठकुराइन हो… मुझ डोम के यहां से कपड़ा खरीदने में गुरेज करोगी,’’ केशव ने मालती की आंखों में झांकते हुए कहा. ‘‘ये जातपांत वे मानें… जिन्हें वोट लेना हो… मैं ये ऊंचनीच, भेदभाव में यकीन नहीं रखती… और यह सब सोचने का मेरे पास टाइम भी नहीं है और न ही मेरी समझ,’’ यह कह कर मालती दुकान से बाहर निकल गई.

‘‘और… हां, वे पैसे मैं छोटे भाई से भिजवा दूंगी,’’ मालती ने कहा, जिस के बदले में केशव सिर्फ मुसकरा दिया. ‘‘कसबे की बाकी दुकानों से कपड़ा भी अच्छा है और दाम भी ठीक लगाए हैं केशव ने, अगली बार भी इसी के यहां से कपड़ा लूंगी,’’ केशव की दुकान से आए हुए कपड़े पर कढ़ाई करते हुए मालती मन ही मन बुदबुदा उठी थी.

फिर तो केशव की दुकान से कपड़ा खरीदने का सिलसिला शुरू हो गया, और एक ठाकुर जाति की लड़की और एक डोम जाति के लड़के में अपने धंधे को ले कर एक अच्छी समझ पैदा हो गई थी. केशव अब 30 साल का हो गया था और अपनी पढ़ाई और धंधा जमाने के चक्कर में ब्याह की सुध भी न रही, एकाध बार बाबूजी ने बोला भी तो केशव ने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा धंधापानी जम जाए तो कर लूंगा, पर अब उस के लिए रिश्ते आने बंद हो गए थे, क्योंकि डोम लोगों की प्रथा के मुताबिक उस की शादी करने की उम्र अब निकल चुकी थी.

मालती और केशव भले ही अलगअलग जाति के थे, पर एक  यही बात उन दोनों में समान थी कि  दोनों अभी तक कुंआरे थे. आसमान में कालेकाले बादल घिर आए थे और बहुत तेज बारिश होने की उम्मीद थी. बहुत देर से कोई ग्राहक न आता देख केशव ने दुकान का शटर बंद कर दिया और एक छाता ले कर अपने घर की तरफ चल पड़ा.

बारिश बहुत तेज हो गई थी. सड़कों पर सन्नाटा छा गया था. ऐसे में अचानक केशव की नजर एक कोने में खड़ी मालती पर गई, जो एक कोने में खड़ी हो कर बारिश से बचने की नाकाम कोशिश कर रही थी. ‘‘अरे… मालती… तुम… इतनी तेज बारिश में यहां क्या कर रही हो?’’ अपना छाता केशव ने मालती के सिर के ऊपर लगाते हुए कहा.

‘‘दरअसल, मैं तुम्हारे पास ही आ रही थी… मुझे कल ही इस लाल रंग का कपड़ा चाहिए… सोचा, तुम्हें और्डर दे दूं चल कर… पर रास्ते में ही बारिश आ गई… अब पता नहीं कब तक यह यों ही होती रहेगी,’’ मालती ने ऊंची आवाज में कहा. ‘‘कोई बात नहीं… वह सामने देखो… स्कूल की पुरानी बिल्डिंग है… आओ वहीं चल कर बारिश रुकने का इंतजार करते हैं,’’ केशव ने कहा और कह कर दोनों के कदम उस स्कूल की ओर बढ़ गए.

स्कूल की छत के नीचे दोनों खड़े हो गए, दोनों के शरीर गीले हो गए थे. मालती अपनी साड़ी के गीले पल्लू को निचोड़ने लगी और अपने भीगे हुए सिर के बालों को झटका दे कर सुखाने लगी थी कि तभी उस के सीने से उस का आंचल हट गया और उस के गोरे उभार उजागर हो गए.

केशव की नजर अब भी मालती के सीने पर ही लगी हुई थी. उसे अपने सीने को घूरता देख कर मालती ने उन्हें अपनी साड़ी के पल्लू से ढक लिया. मालती और केशव दोनों कुंआरे थे और आज जब दोनों के जिस्म पूरी तरह से पानी में भीग गए थे, तो उन की छुअन ने उन दोनों के अंदर दबी हवस की चिनगारी को भड़का दिया.

चारों तरफ सन्नाटा था. बस बारिश ही बारिश थी. केशव ने मालती का हाथ पकड़ लिया. मालती ने कोई विरोध नहीं किया, तो उस की हिम्मत बढ़ गई और उस ने मालती के गालों को चूम लिया और धीरेधीरे होंठों का रसपान करने लगा. मालती ने अपनी दोनों आंखें बंद कर लीं और कोई विरोध नहीं किया. केशव की हिम्मत बढ़ गई थी. उस ने  मालती को अपनी मजबूत बांहों में भर लिया और बेतहाशा चूमने लगा.

मालती के जिस्म को भी जैसे किसी की बांहों में आने का ही इंतजार था.  वह भी अब केशव का साथ देने लगी  और दोनों देह मिलन की नौका पर  सवार हो कर किनारे पर लगने का सफर  करने लगे…कुछ देर बाद दोनों हांफते हुए एकदूसरे से अलग हो गए, बाहर अब भी बारिश तेज हो रही थी, पर दोनों जिस्मों के अंदर का तूफान शांत हो चुका था.

आज जातियों के सारे भेद मिट चुके थे, 2 जिस्मों की जरूरत ने आज ऊंचनीच की सभी दीवारें गिरा दी थीं. काम के सिलसिले में उन दोनों का जो एकदूसरे से मिलना शुरू हुआ था, उस ने इन दोनों कुंआरे दिलों को अपनी हवस मिटाने का रास्ता दिखा दिया था. मालती और केशव के बीच एक बार संबंध क्या बने, फिर तो दोनों काम के बहाने कम मिलते और अपने जिस्म की प्यास बुझाने के लिए ज्यादा, जिस का नतीजा यह हुआ कि मालती को बच्चा ठहर गया, जिस से वह बहुत घबरा गई थी.

‘‘केशव… हम से बहुत बड़ी भूल हो गई है… जवानी के जोश में हम ने बिना आगापीछा सोचे संबंध बनाए और अब मुझे बच्चा ठहर गया है… अब क्या होगा?’’ मालती घबराई हुई थी. ‘‘अरे, होना क्या है… अब हम और तुम शादी कर लेंगे,’’ केशव ने कहा.

‘‘शादी… पर क्या तुम जानते हो कि मेरी मां के साथ जो हुआ था…? और लोग मुझे रेप से पैदा हुई औलाद समझते हैं, इसीलिए मेरी शादी आज तक नहीं हुई… और फिर हमारी उम्र में भी फर्क है और हमारी जाति में भी,’’ मालती की आंखों में आंसू आ गए थे. ‘‘हां… मैं जानता हूं मालती कि तुम मुझ से पूरे 5 साल बड़ी हो… पर क्या उम्र का ये फैसला हमारे प्यार को कहीं से कम करता है क्या…? और फिर आज इनसान कहां से कहां पहुंच रहा है और हम ये दकियानूसी बातें ले कर कब तक बैठे रहेंगे? या फिर तुम्हारा मन मुझ से भर तो नहीं गया?’’ केशव ने पूछा.

‘ऐसी तो कोई बात नहीं… पर तुम भी जानते हो कि हमारी शादी इतनी आसानी से नहीं होगी.’’‘‘हां, हो सकता है कि राह में कुछ मुश्किलें आएं, पर हम बिना कोशिश करे तो हार नहीं मान सकते न… मेरे विचार में हमें अपने घरों में एक बार बात कर लेनी चाहिए,’’ केशव ने मालती को ढांढस देते हुए कहा.

मालती और केशव ने यही फैसला लिया कि आज वे दोनों अपने घर में बता देंगे कि वे दोनों शादी करना चाहते हैं. ‘‘क्या…? क्या 35 साल तक तुझे इसीलिए घर में बिठाए रखा कि एक दिन तू उस डोम से ब्याह रचा ले… जानती भी है कि उस लड़के के बापदादा क्या काम किया करते थे… लाशें फूंकते थे… लाशें… चिता जलाया करते थे वे सब… और हम लोगों की दी गई जूठन ही उन की रोजीरोटी का जरीया हुआ करती थी.

‘‘और हम लोग सुबहसुबह उन का नाम लेना भी अपशकुन समझते हैं… घर का पानी और खाना तो बहुत दूर की बात है,’’ मालती के पिता आपे से बाहर हो रहे थे.

‘‘पर पिताजी… वे मेरी सब बातें जानते हुए भी मुझ से ब्याह रचाने को तैयार हैं,’’ मालती ने डरते हुए कहा.

‘‘क्या… सबकुछ जानता है…? क्या सबकुछ…? यही न कि तुम्हारे अंदर एक ठाकुर का खून दौड़ रहा है… और कुछ नहीं जानता वह…

‘‘मालती, तुम नहीं जानती कि ये निचली जाति के लड़के एक साजिश के तहत अच्छे घर की लड़कियों को फंसाते हैं और फिर उन के घरपरिवार पर

अपना दबदबा भी जमाते हैं,’’ मालती के पिता ने कहा.

‘‘और हां दीदी… अगर तुम से अकेले नहीं रहा जा रहा था, तो कोई और लड़का ढूंढ़ लिया होता, तुम्हें वही लाशें जलाने वाला डोम ही मिला,’’ अब तक चुप मालती के भाई ने कहा.

मालती को अपने छोटे भाई के मुंह से ऐसी बातें सुनने की उम्मीद नहीं थी. वह अब और सुन पाने की हालत में नहीं थी. वह वहां से अपने कमरे में भाग गई थी.

जब केशव ने अपने घर में मालती से ब्याह रचाने की बात कही, तो उस के घर में भी वही हुआ, जिस की उम्मीद कभी उस ने नहीं की थी.

‘‘क्या…? पूरी बिरादरी में तुम्हें कोई और लड़की नहीं मिली, जो उस लड़की से शादी करोगे तुम…

‘‘अरे, तुम्हें पता भी है कि इतने सालों तक उस की शादी क्यों नहीं हुई… क्योंकि वह नाजायज… उस का असली बाप कौन है, किसी को नहीं पता,’’ केशव के पिताजी चीख रहे थे.

‘‘पता है न तुम्हें कि उस की मां का कई लोगों ने मिल कर रेप किया था  और उसी के बाद इस लड़की का जन्म हुआ है…

‘‘भले ही वह तुम से जाति में ऊंची है, पर उस से क्या… है तो वे नाजायज ही न,’’ केशव के पिता की आवाज में उस के सभी घर वालों की भी आवाज शामिल लग रही थी, क्योंकि सभी लोग केशव को नफरत भरी नजरों से देख रहे थे.

अगले ही दिन इन दोनों की बातें ही लोगों की जुबान पर थीं और सब लोग इसे एक बेमेल जोड़ी और समाज को तोड़ने वाली कोशिश बता रहे थे.

आननफानन ही ब्राह्मण सभा बुलाई गई और यह फैसला लिया गया कि किसी दलित द्वारा एक अबला सवर्ण लड़की के शील को भंग कर के उस से ब्याह रचा कर सारी ब्राह्मण कौम को बदनाम करने की साजिश है यह… उसे सजा तो जरूर मिलनी चाहिए.’’

कसबे में मीडिया की चहलपहल अचानक से बढ़ गई थी और चुनावी बारिश वाले नेता भी मैदान में उतर आए थे.

कसबे में अचानक ही एक अजीब सा तनाव वाला माहौल बन गया था. अगले ही दिन भरी दोपहर में केशव की दुकान धूधू कर के जलती हुई देखी जा सकती थी.

उधर मालती के घर में भी आपसी रिश्तों में आग लगी हुई थी और पूरा महल्ला मालती और उस के परिवार की थूथू कर रहा था.

‘‘क्या… मेरी यह सजा है कि मेरी मां के साथ रेप हुआ है. अब तक मैं ने रेप का दंश झेला और बदनामी सही. अब उस के बाद यह दंश मुझे भी दुख देता रहेगा.

अगर किसी औरत के साथ रेप होना गलत है, तो सजा उसे नहीं, बल्कि बलात्कारियों को मिलनी चाहिए, जिन्होंने यह घिनौना अपराध किया है. मालती अपने घर में चीख रही थी.

तभी उस के घर के दरवाजे पर दस्तक हुई. मालती के पिता ने दरवाजा खोला, सामने मुंह पर कपड़ा बांधे दो लंबेचौड़े लोग खड़े थे, वे किस जाति के थे, ये कहना मुश्किल था कि किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था, सिर्फ उन की आंखें ही देखी जा सकती थीं. वे आंखें मालती को ढूंढ़ रही थीं. मालती ने खतरा भांप लिया और पीछे के दरवाजे से भाग निकली. वे दोनों लठैत उस के पीछे दौड़ रहे थे.

मालती दौड़तेदौड़ते बुरी तरह थक गई थी, अचानक उस के पैर से एक पत्थर टकराया और वह गिर गई. उस के पेट के निचले हिस्से से खून की धार फूट पड़ी थी. इस से पहले कि वह कुछ समझ पाती, मालती के सिर पर लाठियां बरसने लगी थीं. उस की आंखें मुंद गई थीं. मालती की आंखें फिर कभी खुल नहीं सकीं.

 

Satire : मौर्निंग वौक

ममता मेहता हाय रे फूटी जिंदगी, आई खुशियां भी चली गईं. अच्छीभली सुबह कट रही थी. पत्नी से छिप कर मौर्निंग वाक में दोचार हसीनाओं को देख लिया, एकदो से हंस कर बात कर ली. लेकिन नहीं, तुम्हें तो मेरा खुश होना ही बरदाश्त नहीं, आखिर गलती ही क्या थी? डाक्टर से चैकअप करवा कर निकला तो तनाव दोपहर की धूप की तरह तनमन को झुलसा रहा था. समझ में नहीं आ रहा था कि ऐसा कैसे हो गया. ऊपर से डाक्टर की बातें, ‘घबराने की कोई बात नहीं है मिस्टर शर्मा, इस उम्र में अकसर ऐसा हो ही जाता है. जरा प्रिकौशन लेंगे तो सब ठीक हो जाएगा.’ इस उम्र में… क्या हुआ है मेरी उम्र को… आज के जमाने में 40 की उम्र कोई उम्र है. जितने भी महान लोग हुए हैं उन्हें महानता, सफलता 40 के बाद ही मिली है. और यह डाक्टर मेरी उम्र का बखान कर रहा है.

यह सब तो आजकल नौर्मल हो गया है. छोटे बच्चों को भी हो जाता है. इस में उम्र की क्या बात है. अब परहेज दुनिया भर के, रिस्ट्रिक्शंस दुनियाभर के, ऊपर से अब उबले, बिना नमक के, खाने की कल्पना मात्र से मु घझेबराहट होने लगी. घर पहुंचा तो सुमि सोफे पर ही बैठी थी. मुझे देखते ही मेरे हाथों से रिपोर्ट खींच कर बोली, ‘क्या हुआ करवा आए चैकअप, क्या कहा डाक्टर ने, सब ठीक तो है न?’ मैं ने कहा, ‘हां, सब ठीक है, बस, थोड़ा ब्लडप्रैशर और कोलैस्ट्रौल बढ़ा हुआ है.’ सुमि की प्रतिक्रिया वही थी जैसी मैं ने सोची थी, ‘हाई ब्लडप्रैशर! कोलैस्ट्रौल! मैं पहले से ही कह रही हूं कि थोड़ा खाने पर कंट्रोल करो, चटपटा खाना बंद करो. मगर नहीं… चटपटा, मसालेदार खाना देखते ही तो जबान चटकने लगती है और कुछ नहीं तो आदमी को अपनी उम्र का तो खयाल रखना ही चाहिए. अब कल से सब बंद.

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लौकी और कच्चे सलाद के अलावा कुछ नहीं.’ मैं चुप बैठा रहा. अपना तो यह निजी अनुभव रहा है कि बरखा, बौस और बीवी वजहबेवजह कभी भी बरस सकते हैं. यह 3 बी ‘बी’ की तरह ही काटने को हमेशा तत्पर रहते हैं. उन मधुमक्खियों से तो आप किसी तरह बच भी सकते हैं पर इन से बचना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है. फिर भी मैं ने हलके से प्रतिरोध का असफल प्रयास किया, ‘अरे काहे इतना टैंशन ले रही हो. थोड़ा सा ही तो हाई है. डाक्टर ने कहा है, कभीकभी हो जाता है, परेशान होने की कोई जरूरत नहीं.’ सुमि ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया, ‘थोड़ेथोड़े में ही कब बड़ा हो जाता है, पता चलता है क्या आप को? पता भी है, वह शक्ति कालोनी वाले सीखी ऐसे ही ब्लडप्रैशर को ‘कुछ नहीं कुछ नहीं’ कहते रहे और यही कहतेकहते एक दिन लुढ़क गए. वे मेरे जामनगर वाले फूफाजी भी यही कहते रहे और कुछ नहीं कुछ नहीं में आम खातेखाते रवाना हो गए.

वे अपने…’ मैं ने बीच में टोका, ‘अब बस भी करो. मेरा ध्यान रख रही हो या डरा रही हो. यह गया वह गया, पर मैं कहीं जाने वाला नहीं हूं अभी, सम?ा. जाओ, चाय बनाओ.’ जातेजाते पलटी, ‘अब आप को कहीं जाना है या नहीं, वह मु?ो नहीं पता, पर अब रोज सवेरे घूमने जरूर जाएंगे, यह सम?ा लीजिए.’ मेरा माथा ठनका, ‘घूमने! सवेरे! दिमाग खराब है तुम्हारा. मैं कहीं नहीं जाने वाला और तुम भी मु?ो परेशान करने की कोशिश मत करना.’ सुमि लड़ने जैसे अंदाज में बोली, ‘हां, कुछ मत करो आप. बस, पड़े रहो और खाते रहो. बढ़ाओ अपना ब्लडप्रैशर, दवाइयों का खर्चा. सारा जमाना कसरत के पीछे पड़ा है, सारा जमाना मौर्निंग वाक के लिए जा रहा है, आप बैठे रहो ऐसे ही. ‘मु?ो पता है आप चाहते ही नहीं हो कि आप की तबीयत ठीक हो. आप बीमार ही पड़े रहना चाहते हैं, लोगों की सिंपैथी लेना चाहते हैं, लेकिन मैं कह देती हूं मैं ऐसा होने नहीं दूंगी. आप अब से पूरे प्रिकौशन लेंगे, मतलब लेंगे. उस में सब से पहले मौर्निंग वाक, सम?ो आप? कल सुबह मौर्निंग वाक पर जाएंगे, मतलब जाएंगे.’

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मैं ने सिर पकड़ लिया, ‘अब यह हिडिंबा मुझे मौर्निंग वाक पर भेजे बिना मानेगी नहीं. ठीक है एकदो दिन जाऊंगा, फिर कुछ न कुछ बहाना बना दूंगा.’ सुबह सुमि ने 5 बजे ही उठा दिया. बड़ी मुश्किल से आंखें मलता, सुस्ताता, अलसाता उठा. घिसटतेघिसटते टेकड़ी पर पहुंचा. वहां पहुंचते ही सारी इंद्रियां सचेत हो गईं. लगा कि फूलों की घाटी में आ पहुंचा हूं. जहां देखो वहां नजारे ही नजारे. जौगिंग करती बालाएं, कसरत करती सुंदरियां, वाक करती तितलियां… हाय, मैं इतने दिन पहले क्यों नहीं आया मौर्निंग वाक के लिए. लोग तो और भी कई थे, हर साइज, हर शेप, हर उम्र के. राष्ट्रीय एकता की ऐसी मिसाल कहीं और न थी. हर धर्म, हर जाति, हर आयु, हर वर्ग के लोग वहां मौजूद थे. पता नहीं सेहत सुधारने या आंखें सेंकने. उस टेकड़ी के गार्डन में तो मेरा दिल गार्डनगार्डन हो गया. एक बड़ी सुंदर बाला को देख कर मेरा दिल उस से बातें करने को मचलने लगा. मेरा हलकाफुलका मन तो तुरंत उछल कर उस के पास पहुंच गया और जब तक मैं अपने भारीभरकम शरीर को ठेलठाल कर उस के पास पहुंचाता,

वह अपने बौयफ्रैंड के साथ उड़नछू हो गई. मेरा हलका मन भी भारी हो गया. अब तो इस शरीर को हलका करना ही पड़ेगा, नहीं तो जब तक मैं किसी बाला से बात करने उस तक पहुंचूंगा वह 2 बच्चों की मां बन चुकी होगी. अब तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा. वजन कम करने के साथ अपने इस उजड़े चमन जैसे हुलिए को भी सुधारना पड़ेगा. मैं एकदम जाग गया जागरूक नागरिक की तरह. मेरी सारी संचेतना जागृत हो गई. अब पता चला चौबेजी, वर्माजी, बत्राजी, चोपड़ाजी, देशपांडेजी, देशमुखजी, जोशीजी क्यों सवेरेसवेरे मौर्निंग वाक के लिए आते थे. सेहत तो बहाना था नजरें जो मिलाना था और मैं मूर्ख आदमी इतने दिन तक सोता रहा. सोएसोए खोता रहा. जिंदगी की कितनी महत्त्वपूर्ण बातें तू ने मिस कर दीं,

अब तो संभल जा. मैं ने मन ही मन सुमि को धन्यवाद दिया और संभल गया. अब तो कोई बेवकूफ ही होगा जो मौर्निंग वाक के लिए मना करता. मैं भी सुमि के सामने ऊपर से नानुकुर करता, अंदर ही अंदर हुलसता मौर्निंग वाक करने के लिए. मन कुलबुलाने लगा. अपने रहनसहन पर ध्यान दिया. सब से पहले बालों को सुधारा. जहांतहां झांकती चांदी को ब्लैक मैटल में बदला. मूंछों पर सिलवर पेंट की जगह ब्लैक पेंट किया. नया ट्रैक सूट, नए जूते खरीदे जिस से कि मैं स्मार्ट नजर आऊं. एक हफ्ते में तो हुलिया ही बदल गया. चेहरा चमक गया, रौनक आ गई, मन प्रसन्न रहने लगा. अब तो हर वक्त गुनगुनाने का मन करता था. बस, तोंद थी जो बढ़ी हुई थी. पर मैं आशावादी था, मुझे आशा थी कि यह जल्दी ही कम हो जाएगी. गार्डन में मेरी कल्पनाओं के घोड़े भी उड़ान भरने लगे. पर… मुझे और घोड़ों को उड़ान भरते अभी एक महीना भी नहीं हुआ था कि एक दिन सुबह उठते ही सुमि ने कहा, ‘आज मैं भी चलूंगी आप के साथ वाक के लिए.’ मैं उठताउठता बैठ गया, ‘तुम क्या करोगी चल कर. तुम चलोगी तो यहां मेरा नाश्ताखाना कौन बनाएगा, मुझे औफिस जाना है भई.’

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उस ने लापरवाही से कहा, ‘उस की चिंता आप मत करो. मैं आ कर बना दूंगी.’ मरता क्या न करता. सुमि को चलना था तो वह चली ही. मेरी बिलकुल भी बिसात न थी कि उसे रोक पाता. हम चले. इतने दिनों में वहां काफी लोगों से पहचान हो गई थी. मुझे देखते ही सब की हायहैलो शुरू हो गई, उन में वे हसीनाएं भी थीं जो रोज मुझे देख कर मुसकराती थीं, हाथ हिलाती थीं, दोचार कोई बात भी कर जाती थीं. सुमि का चेहरा मौसम विभाग की भविष्यवाणी की तरह पलपल बदल रहा था, इसलिए हालफिलहाल कुछ भी अनुमान लगाना कठिन था कि सुहानी धूप खिली रहेगी, भारी वर्षा होगी, गरज के साथ छींटे पड़ेंगे या वर्षा के साथ ओले गिरेंगे. सबकुछ समय के हवाले कर मैं संभावित परिणाम की प्रतीक्षा करने लगा. घर पहुंचे. सुमि कुछ नहीं बोली. चुपचाप नाश्ताखाना बनाने में लग गई. मुुुझे भी लगा, मैं बेकार ही टैंशन ले रहा हूं. कुछ नहीं है. इस सोच से मुझे बड़ी राहत मिली. मैं आराम से दफ्तर गया. आराम से दफ्तर के आवश्यक काम, जैसे गपशप, चर्चा, कैंटीन के चक्कर लगाना वगैरह निबटाया और आराम से घर आया. सुमि अभी भी कुछ नहीं बोली.

मैं ने रात्रिभोजन का स्वाद लिया, टीवी का आनंद लिया और सुबह की सुहानी कल्पना में डूबा अपने ट्रैक सूट वगैरह को संभालने लगा कि बम विस्फोट हुआ, ‘कल से आप मौर्निंग वाक के लिए नहीं जाएंगे.’ तो वह खतरा आ ही गया जिस की भाप मुझे सुबह से आ रही थी. मैं ने कारण जानना चाहा, ‘अरे, क्यों? अचानक क्या हो गया, अभी तक तो तुम ही पीछे पड़ी थीं कि मौर्निंग वाक जाओ मौर्निंग वाक जाओ, अब क्या हुआ?’ सुमि तल्खी से बोली, ‘हां, मैं ने मौर्निंग वाक के लिए कहा था, जौगर्स पार्क फिल्म का रिऐलिटी शो बनाने के लिए नहीं. अब पता चला मुझे नाना करने वाला बंदा एकाएक मौर्निंग वाक को ले कर इतना उत्साहित क्यों हो गया. 56 पकवानों से भरी थाली दिखेगी तो घर की दाल किसे भाएगी.’ मैं बौखला गया, ‘क्या बकवास कर रही हो. मैं वहां घूमने जाता हूं,

पकवान देखने नहीं.’ सुमि चादर निकालते बोली, ‘हां, वह तो मैं ने देखा ही है कितनी सैर हो रही थी और कितने सपाटे मैं चिढ़ गया, ‘तुम्हारा भी जवाब नहीं. पहले नहीं जा रहा तो लड़लड़ कर भेजा कि घूमने जाओ घूमने जाओ, अब जा रहा हूं तो कह रही हो मत जाओ. आखिर तुम चाहती क्या हो? फिक्र नहीं है तुम्हें मेरी सेहत की.’ सुमि बोली, ‘बहुत फिक्र है, तभी कह रही हूं. मैं ने आप को सेहत बनाने के लिए कहा था, मुझे को बेवकूफ बनाने के लिए नहीं. अब से आप मौर्निंग वाक नहीं, इवनिंग वाक पर जाएंगे और मैं भी आप के साथ चलूंगी, समझे और टेकड़ी पर नहीं, यों ही रोड पर घूमेंगे. सेहत भी बरकरार रहेगी और जौगर्स पार्क का रीमेक भी नहीं बनेगा. अब, सो जाओ.’ उस ने करवट बदल ली. मैं अपने सुहानेसुनहले टूटे सपनों की किरचें संभालने लगा, ‘जिंदगी देने वाले, जिंदगी लेने वाले… खुशी मेरी छीन के बता तुझे क्या मिला…’

Story : बाबुल का घर पराया

पुष्पा की सारी दलीलें 1-1 कर के व्यर्थ हो गई थीं. सुरेशजी अडिग थे कि उन्हें तो आश्रम जाना ही है, चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए.

‘‘अगर ऐसा ही है और तुम्हारा जाने का मन नहीं है तो मैं अकेला ही चला जाऊंगा,” अपना अंतिम हथियार फेंकते हुए उन्होंने कह ही दिया था.

पुष्पा फिर चुप रह गई. पति का स्वास्थ ठीक रहता नहीं है फिर अब उम्र भी ऐसी नहीं ही कि अकेले यात्रा कर सकें, तो फिर उन्हें अकेला कैसे भेज दें, वहां कुछ हो गया तो कौन संभालेगा इन्हें? आखिरकार, जब कुछ कहते नहीं बना तो उस ने साथ जाने की हामी भर ही दी थी.

‘‘ठीक है, अब तैयारी करो। मैं तो अपना सामान पहले ही जमा चुका हूं,’’ सुरेशजी ने फिर बात खत्म कर दी थी.

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पुष्पा की सारी दलीलें 1-1 कर के व्यर्थ हो गई थीं. सुरेशजी अडिग थे कि उन्हें तो आश्रम जाना ही है, चाहे कुछ भी क्यों न हो जाए.

‘‘अगर ऐसा ही है और तुम्हारा जाने का मन नहीं है तो मैं अकेला ही चला जाऊंगा,” अपना अंतिम हथियार फेंकते हुए उन्होंने कह ही दिया था.

पुष्पा फिर चुप रह गई. पति का स्वास्थ ठीक रहता नहीं है फिर अब उम्र भी ऐसी नहीं ही कि अकेले यात्रा कर सकें, तो फिर उन्हें अकेला कैसे भेज दें, वहां कुछ हो गया तो कौन संभालेगा इन्हें? आखिरकार, जब कुछ कहते नहीं बना तो उस ने साथ जाने की हामी भर ही दी थी.

‘‘ठीक है, अब तैयारी करो। मैं तो अपना सामान पहले ही जमा चुका हूं,’’ सुरेशजी ने फिर बात खत्म कर दी थी.

 

ऐसा नहीं था कि पुष्पा पहली बार ही आश्रम में जा रही थी. वहां तो वे लोग पिछले कई सालों से जा रहे थे, पर इस बार सुरेशजी ने तय किया कि अब वहीं रहना है. आश्रम की आजन्म सदस्यता लेंगे वे और इस बात को कई बार कह भी चुके थे.

‘‘देखो, हम लोगों का गृहस्थाश्रम का समय अब पूरा हो गया. भगवान की कृपा से सारी जिम्मेदारियां भी पूरी हो गईं। बेटे अपने सैट हो गए, शादीब्याह कर दी, बेटी भी ब्याह दी, अब हमें…’’सुरेशजी वाक्य पूरा करते पर बेटी शब्द के बाद उन्होंने क्या कहा, पुष्पा के कान मानों सुन्न हो कर रह जाते, एक ही शब्द दिलोदिमाग तक ठकठक करता रहता…

बेटी…बेटी… हां, बेटी ही तो है नंदिता। नंदी… जिसे अब सब लोग नंदी के ही नाम से पुकारते हैं और बेटी का करुण, दयनीय चेहरा फिर आंखों के सामने घूमने लगता। देर तक वह उसे ओझल नहीं कर पाती। नंदी उन की बेटी, नाजो पली. दोनों बेटों के काफी समय बाद हुई थी तो वह अब तक नन्ही गुड़िया सी ही लगती थी. हां, अभी कम उम्र की ही तो थी, पर यहां भी सुरेशजी की ही जिद थी कि नौकरी से रिटायर्ड होने से पहले बेटी को ब्याह देना है. मुश्किल से तब हाईस्कूल ही तो पास कर पाई थी। पढ़ने में इतनी कुशाग्र, कितना मन था उस का आगे पढ़ने का. पिता के सामने तो उस की बोलती बंद हो जाती थी। बस, मां से ही जिद करती,”मां, बाबूजी से कहो न, मेरे ब्याह की इतनी जल्दी न करें। इतनी जल्दी तो तुम ने भैया लोगों के भी ब्याह नहीं किए. मुझे पढ़ने दो न…’’

कितना कहा था पुष्पा ने तब सुरेशजी से, पर वे उलटे उसी पर बिगड़ पङे थे,”तुम ने ही तो बेटी को सिर पर चढ़ा रखा है। अरे, इतनी बार कह चुका हूं कि नहीं है हैसियत मेरी लड़की को आगे पढ़ाने की और फिर 4 जमातें आगे पढ़ भी गई तो कौन सा तीर मार लेगी. आखिरकार, उसे ब्याह कर ससुराल ही तो जाना है फिर… अभी तो लड़के वालों के यहां से रिश्ते भी आ रहे हैं, फिर कहां मैं सब के दरवाजे हाथ जोड़ता जाऊंगा. आखिर मेरा भी तो कुछ खयाल करो कि गृहस्थी के जंजाल से मुक्त हो कर 2 घड़ी भगवान का नाम ले सकूं।”

गृहस्थी… जंजाल…बंधन… सुरेशजी के ये शब्द नए नहीं थे पुष्पा के लिए. अब तो खैर नौकरी से मुक्त हो चुके हैं, पर वह तो प्रारंभ से ही ऐसे शब्द उन के मुंह से सुनती आ रही थी और इस आश्रम की सदस्यता लेने का भी उन का निर्णय काफी समय पहले हो चुका था। खैर आननफानन में बिटिया ब्याह दी। वह तो बाद में पता चला था दामाद मयंक की बीमारी का.

‘‘अरे पीलिया ही तो है, कुछ भी कह लो, हेपेटाइसबी सही, पर ऐसी बीमारी कोई गंभीर रोग नहीं है…’’

पता नहीं कोई और गंभीर रोग था या नहीं, पर शादी के 6 महीने बाद ही बेटी विधवा हो गई. नंदी… पुष्पा का कलेजा फिर से मुंह को आने लगता. खबर सुनी थी तो उसी समय उसे गश आ गया था. बदहवास सी फिर बेटी की ससुराल भी गई. सफेद, विधवा और खुले केश में पथराई आंखों से उसे देखती नंदी उस के तो मानों आंसू भी सूख चुके थे. क्या यही उस की गुड़िया थी, नाजों में पली?

‘‘मां…’’

उस के गले से लग कर नंदी का वह चीत्कार भरा स्वर अभी भी दिल दहला जाता है. पता नहीं कैसे रहेगी बिटिया यहां, पर उस की सास ने तो दोटूक निर्णय उसी समय सुना दिया था,”अब यह इस घर की बहू है, जैसे भी हो, रहना तो यहीं है इसे…’’

2 महीने फिर रातदिन गिनगिन कर काटे थे पुष्पा ने. एक बार दबे स्वर में फोन किया था समधिन को,”न हो तो नंदिता को कुछ दिनों के लिए यहां भेद दें, थोड़ा चेंज हो जाएगा…’’ तो फिर समधिनजी फोन पर ही बिगड़ी थीं.

‘‘आप तो एक पारंपरिक परिवार से हैं। सारे रीतिरिवाज जानने वाली. सालभर से पहले तो नंदिता घर से बाहर जा ही नहीं सकती है। आप को पता होना चाहिए, फिर अब यह हमारी जिम्मेदारी है, आप परेशान न हों.’’

नंदी से तो फोन पर ढंग से बात भी नहीं हो पाती थी। मन ही नहीं माना तो पुष्पा ही एक दिन वहां पहुंच गई थी. 2-3 महीने में ही बेटी एकदम भटक गई थी. सफेद साड़ी में लिपटी, दिनभर घर के काम में उलझी। सास, जेठानी सब हुक्म चलाती रहतीं उस पर. बड़ी मुश्किल से दोपहर को थोड़ा सा समय निकाल कर मां से एकांत में मिल पाई थी.

‘‘मां, मुझे घर ले चलो…’’ सिसकियों के बीच इतना ही बोल पाई थी कि तभी टोह लेती हुई छोटी ननद वहां पहुंच गई. लौटते समय पूरे रास्ते आंसू बहते रहे थे पुष्पा के। सुरेशजी से कहा तो और बिगड़े ही थे उसी पर.

‘‘तुम्हें क्या आवश्यकता थी वहां जाने की… हम ने अब कन्यादान कर दिया है, बेटी ब्याह दी है, अब उस का सुखदुख उसी घर से बंधा है, समझी.’’

पुष्पा की आंखें और पथरा गई थीं,’कैसे बाप हैं? वहां बेटी तिलतिल कर मर रही है और इन्हें कोई दुख नहीं. बेटी ब्याह दी तो क्या सारे संबंध ही टूट गए उस से? ठीक है, वे लोग समर्थ हैं, अच्छा कमाखा रहे हैं, दूर भी हैं तो क्या उन की चिंता नहीं है हमें, बेटी भी सुख से रहती तो और बात थी पर यहां तो पहाड़ जैसा दुख टूट पड़ा है उस पर। अब हम उसे सहारा नहीं देंगे तो कौन देगा, फिर इन सब जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर हम आश्रम में कौन से भगवान को खोजने जाएंगे?’

“हां, सुबह 6 बजे की ही ट्रेन है। सोचा तो यही है कि अब लंबे समय तक वही रहा जाए, तैयारियां हो ही चुकी हैं,” सुरेशजी शायद फोन पर किसी से बात कर रहे थे. पुष्पा को याद आया कि तैयारी तो उसे भी करनी है. बेमन से कुछ कपड़े बैग में इकट्ठे किए. सुरेशजी तो अपनी आध्यात्मिक पुस्तकें साथ रखते थे, बस गाड़ी चली तो सामान निकाल लिया. पुष्पा चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी. पहाड़, पेड़, नदी सब के बीच उसे नंदी का करुण चेहरा ही दिखाई दे रहा था. जैसे बेटी चीखचीख कर कह रही हो,’मां, मुझे अपने पास बुला लो। मां कहां दूर भाग रही हो मुझ से, तुम ने तो जन्म दिया है मुझेे… फिर क्यों मेरा दुख तुम्हें छूता नहीं…’ घबरा कर आंखें मूंद ली उस ने.

‘‘इस प्रकार पीठ फेर लेने से जिम्मेदारियां थोड़े ही कम हो जाती हैं बहिनजी…’’ यही तो कहा था नंदी के स्कूल की हैड मिस्ट्रैस ने.

नंदी उन की प्रिय छात्रा रही थी। फिर उसे जल्दी ही ब्याह देने के निर्णय पर भी वे काफी नाराज हुई थीं. और इस दुखभरी घटना की खबर जब उन्हें मिली तो एक बार स्वयं जा कर भी नंदी से मिल आई थीं और तभी पुष्पा के पास आई थीं.

‘‘देखिए पुष्पाजी, आप अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकती हैं। नंदिता एक मेधावी छात्रा रही है। उसे यहां बुलाएं, मैं उस के आगे की पढ़ाई का प्रबंध करूंगी. उसे अपने पैरों पर खड़ा होने दीजिए। आप स्वयं सोचिए कि किस दुर्दशा में जी रही है वह…’’

उस दिन खुल कर पुष्पा ने सुरेशजी से कहा भी था,”आप के दोस्त हैं निर्मलजी, उन की बेटी की ससुराल में नहीं बनी तो यहां बुला लिया है। अब पढ़ालिखा रहे हैं पर हमारी नंदी तो… नीलिमाजी कह रही थी…’’

‘‘नीलिमाजी… नीलिमाजी, आखिर तुम्हें हो क्या गया है? हमारे यहां के रीतिरिवाज सब भूल गईं तुम…दूसरों की बात और है, पर हमारे यहां जब बेटी ससुराल जाती है तो फिर ताउम्र वहीं की होकर रहती है, समझीं तुम… अगर तुम भूल गई हो तो मैं याद दिलाऊं…’’ क्रोध में सुरेशजी की आवाज कांप रही थी. पुष्पा अपने आंसू पी कर रह गई.

इस आश्रम में तो पिछले वर्ष भी आई थी वह… तब सबकुछ कितना सुहावना लगा था. मंदिर में देवी की मूर्ति के सामने बैठी वह घंटों पूजा करती, पर आज तो देवी की मूर्ति देख कर उसे चिढ़ हो रही थी। वह सोचने लगी थी कि अगर देवी या भगवान होते तो क्या इतना पूजापाठ करने के बाद यही हश्र होता? यह सब एक अंधविश्वास ही तो है। उसे नंदी का करुण चेहरा दिख रहा था.

‘‘मां…’’

नंदी का आंसू भरा कांपता स्वर…
कुछ घबरा कर वह बाहर आ गई थी. आज मन पता नहीं क्याक्या हो रहा था. सुरेशजी तो शायद अपना आजन्म आश्रम की सदस्यता का फौर्म जमा करने गए होंगे. धीरेधीरे चल कर वह उस पिछवाड़े में बने छोटे से बगीचे की पत्थर की बैंच पर बैठ गई थी… आंखें सुदूर में पता नहीं क्या ताक रही थी.

‘‘पुष्पा…’’ तभी पीछे से सुरेशजी का स्वर सुनाई दिया। थकाहारा उदास सा।

‘‘क्या हुआ?”

सुरेशजी तब पास ही बैंच पर आ कर बैठ गए. इतने चुप तो कभी नहीं थे.

‘‘क्या हुआ…’’ पुष्पा ने फिर पूछा था.

‘‘कुछ नहीं, अभी जीजी का फोन आया था, मेरे मोबाइल पर। रामदादा की बेटी शिखा नहीं रही…’’

‘‘शिखा… रामदादा की बेटी…’’ एकदम से चौंक गई थी पुष्पा।

“हां, रात को नींद की गोलियां खा लीं उस ने. शायद आत्महत्या का मामला, जीजी कह रही थी कि हमें फौरन जबलपुर जाना होगा.

‘‘पर…’’

पुष्पा को याद आया कि शिखा अपने किसी सहपाठी से विवाह की इच्छुक थी पर रामदादा का और पूरे परिवार का जबरदस्त विरोध था. शायद…शायद सुरेशजी भी अब यही सोच रहे थे। बहुत देर बाद उन का धीमा स्वर सुनाई दिया पुष्पा को,”अब हम अपनी नंदी को भी अपने पास बुला लेंगे। आगे पढ़ाएंगे ताकि उस का भविष्य बन सके… मैं ने अपने आश्रम की सदस्यता का फौर्म वापस ले लिया है… पूजापाठ में भी भरोसा नहीं रहा। यह सब एक छलावा है…”

अब चकित हो कर पुष्पा सुरेशजी की तरफ देख रही थी. दूर घनी बदली के पीछे शायद आशा की कोई किरण चमक उठी थी.

ऐसा नहीं था कि पुष्पा पहली बार ही आश्रम में जा रही थी. वहां तो वे लोग पिछले कई सालों से जा रहे थे, पर इस बार सुरेशजी ने तय किया कि अब वहीं रहना है. आश्रम की आजन्म सदस्यता लेंगे वे और इस बात को कई बार कह भी चुके थे.

‘‘देखो, हम लोगों का गृहस्थाश्रम का समय अब पूरा हो गया. भगवान की कृपा से सारी जिम्मेदारियां भी पूरी हो गईं। बेटे अपने सैट हो गए, शादीब्याह कर दी, बेटी भी ब्याह दी, अब हमें…’’सुरेशजी वाक्य पूरा करते पर बेटी शब्द के बाद उन्होंने क्या कहा, पुष्पा के कान मानों सुन्न हो कर रह जाते, एक ही शब्द दिलोदिमाग तक ठकठक करता रहता…

बेटी…बेटी… हां, बेटी ही तो है नंदिता। नंदी… जिसे अब सब लोग नंदी के ही नाम से पुकारते हैं और बेटी का करुण, दयनीय चेहरा फिर आंखों के सामने घूमने लगता। देर तक वह उसे ओझल नहीं कर पाती। नंदी उन की बेटी, नाजो पली. दोनों बेटों के काफी समय बाद हुई थी तो वह अब तक नन्ही गुड़िया सी ही लगती थी. हां, अभी कम उम्र की ही तो थी, पर यहां भी सुरेशजी की ही जिद थी कि नौकरी से रिटायर्ड होने से पहले बेटी को ब्याह देना है. मुश्किल से तब हाईस्कूल ही तो पास कर पाई थी। पढ़ने में इतनी कुशाग्र, कितना मन था उस का आगे पढ़ने का. पिता के सामने तो उस की बोलती बंद हो जाती थी। बस, मां से ही जिद करती,”मां, बाबूजी से कहो न, मेरे ब्याह की इतनी जल्दी न करें। इतनी जल्दी तो तुम ने भैया लोगों के भी ब्याह नहीं किए. मुझे पढ़ने दो न…’’

कितना कहा था पुष्पा ने तब सुरेशजी से, पर वे उलटे उसी पर बिगड़ पङे थे,”तुम ने ही तो बेटी को सिर पर चढ़ा रखा है। अरे, इतनी बार कह चुका हूं कि नहीं है हैसियत मेरी लड़की को आगे पढ़ाने की और फिर 4 जमातें आगे पढ़ भी गई तो कौन सा तीर मार लेगी. आखिरकार, उसे ब्याह कर ससुराल ही तो जाना है फिर… अभी तो लड़के वालों के यहां से रिश्ते भी आ रहे हैं, फिर कहां मैं सब के दरवाजे हाथ जोड़ता जाऊंगा. आखिर मेरा भी तो कुछ खयाल करो कि गृहस्थी के जंजाल से मुक्त हो कर 2 घड़ी भगवान का नाम ले सकूं।”

गृहस्थी… जंजाल…बंधन… सुरेशजी के ये शब्द नए नहीं थे पुष्पा के लिए. अब तो खैर नौकरी से मुक्त हो चुके हैं, पर वह तो प्रारंभ से ही ऐसे शब्द उन के मुंह से सुनती आ रही थी और इस आश्रम की सदस्यता लेने का भी उन का निर्णय काफी समय पहले हो चुका था। खैर आननफानन में बिटिया ब्याह दी। वह तो बाद में पता चला था दामाद मयंक की बीमारी का.

‘‘अरे पीलिया ही तो है, कुछ भी कह लो, हेपेटाइसबी सही, पर ऐसी बीमारी कोई गंभीर रोग नहीं है…’’

पता नहीं कोई और गंभीर रोग था या नहीं, पर शादी के 6 महीने बाद ही बेटी विधवा हो गई. नंदी… पुष्पा का कलेजा फिर से मुंह को आने लगता. खबर सुनी थी तो उसी समय उसे गश आ गया था. बदहवास सी फिर बेटी की ससुराल भी गई. सफेद, विधवा और खुले केश में पथराई आंखों से उसे देखती नंदी उस के तो मानों आंसू भी सूख चुके थे. क्या यही उस की गुड़िया थी, नाजों में पली?

‘‘मां…’’

उस के गले से लग कर नंदी का वह चीत्कार भरा स्वर अभी भी दिल दहला जाता है. पता नहीं कैसे रहेगी बिटिया यहां, पर उस की सास ने तो दोटूक निर्णय उसी समय सुना दिया था,”अब यह इस घर की बहू है, जैसे भी हो, रहना तो यहीं है इसे…’’

2 महीने फिर रातदिन गिनगिन कर काटे थे पुष्पा ने. एक बार दबे स्वर में फोन किया था समधिन को,”न हो तो नंदिता को कुछ दिनों के लिए यहां भेद दें, थोड़ा चेंज हो जाएगा…’’ तो फिर समधिनजी फोन पर ही बिगड़ी थीं.

‘‘आप तो एक पारंपरिक परिवार से हैं। सारे रीतिरिवाज जानने वाली. सालभर से पहले तो नंदिता घर से बाहर जा ही नहीं सकती है। आप को पता होना चाहिए, फिर अब यह हमारी जिम्मेदारी है, आप परेशान न हों.’’

नंदी से तो फोन पर ढंग से बात भी नहीं हो पाती थी। मन ही नहीं माना तो पुष्पा ही एक दिन वहां पहुंच गई थी. 2-3 महीने में ही बेटी एकदम भटक गई थी. सफेद साड़ी में लिपटी, दिनभर घर के काम में उलझी। सास, जेठानी सब हुक्म चलाती रहतीं उस पर. बड़ी मुश्किल से दोपहर को थोड़ा सा समय निकाल कर मां से एकांत में मिल पाई थी.

‘‘मां, मुझे घर ले चलो…’’ सिसकियों के बीच इतना ही बोल पाई थी कि तभी टोह लेती हुई छोटी ननद वहां पहुंच गई. लौटते समय पूरे रास्ते आंसू बहते रहे थे पुष्पा के। सुरेशजी से कहा तो और बिगड़े ही थे उसी पर.

‘‘तुम्हें क्या आवश्यकता थी वहां जाने की… हम ने अब कन्यादान कर दिया है, बेटी ब्याह दी है, अब उस का सुखदुख उसी घर से बंधा है, समझी.’’

पुष्पा की आंखें और पथरा गई थीं,’कैसे बाप हैं? वहां बेटी तिलतिल कर मर रही है और इन्हें कोई दुख नहीं. बेटी ब्याह दी तो क्या सारे संबंध ही टूट गए उस से? ठीक है, वे लोग समर्थ हैं, अच्छा कमाखा रहे हैं, दूर भी हैं तो क्या उन की चिंता नहीं है हमें, बेटी भी सुख से रहती तो और बात थी पर यहां तो पहाड़ जैसा दुख टूट पड़ा है उस पर। अब हम उसे सहारा नहीं देंगे तो कौन देगा, फिर इन सब जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर हम आश्रम में कौन से भगवान को खोजने जाएंगे?’

“हां, सुबह 6 बजे की ही ट्रेन है। सोचा तो यही है कि अब लंबे समय तक वही रहा जाए, तैयारियां हो ही चुकी हैं,” सुरेशजी शायद फोन पर किसी से बात कर रहे थे. पुष्पा को याद आया कि तैयारी तो उसे भी करनी है. बेमन से कुछ कपड़े बैग में इकट्ठे किए. सुरेशजी तो अपनी आध्यात्मिक पुस्तकें साथ रखते थे, बस गाड़ी चली तो सामान निकाल लिया. पुष्पा चुपचाप खिड़की से बाहर देख रही थी. पहाड़, पेड़, नदी सब के बीच उसे नंदी का करुण चेहरा ही दिखाई दे रहा था. जैसे बेटी चीखचीख कर कह रही हो,’मां, मुझे अपने पास बुला लो। मां कहां दूर भाग रही हो मुझ से, तुम ने तो जन्म दिया है मुझेे… फिर क्यों मेरा दुख तुम्हें छूता नहीं…’ घबरा कर आंखें मूंद ली उस ने.

‘‘इस प्रकार पीठ फेर लेने से जिम्मेदारियां थोड़े ही कम हो जाती हैं बहिनजी…’’ यही तो कहा था नंदी के स्कूल की हैड मिस्ट्रैस ने.

नंदी उन की प्रिय छात्रा रही थी। फिर उसे जल्दी ही ब्याह देने के निर्णय पर भी वे काफी नाराज हुई थीं. और इस दुखभरी घटना की खबर जब उन्हें मिली तो एक बार स्वयं जा कर भी नंदी से मिल आई थीं और तभी पुष्पा के पास आई थीं.

‘‘देखिए पुष्पाजी, आप अपने दायित्व से मुंह नहीं मोड़ सकती हैं। नंदिता एक मेधावी छात्रा रही है। उसे यहां बुलाएं, मैं उस के आगे की पढ़ाई का प्रबंध करूंगी. उसे अपने पैरों पर खड़ा होने दीजिए। आप स्वयं सोचिए कि किस दुर्दशा में जी रही है वह…’’

उस दिन खुल कर पुष्पा ने सुरेशजी से कहा भी था,”आप के दोस्त हैं निर्मलजी, उन की बेटी की ससुराल में नहीं बनी तो यहां बुला लिया है। अब पढ़ालिखा रहे हैं पर हमारी नंदी तो… नीलिमाजी कह रही थी…’’

‘‘नीलिमाजी… नीलिमाजी, आखिर तुम्हें हो क्या गया है? हमारे यहां के रीतिरिवाज सब भूल गईं तुम…दूसरों की बात और है, पर हमारे यहां जब बेटी ससुराल जाती है तो फिर ताउम्र वहीं की होकर रहती है, समझीं तुम… अगर तुम भूल गई हो तो मैं याद दिलाऊं…’’ क्रोध में सुरेशजी की आवाज कांप रही थी. पुष्पा अपने आंसू पी कर रह गई.

इस आश्रम में तो पिछले वर्ष भी आई थी वह… तब सबकुछ कितना सुहावना लगा था. मंदिर में देवी की मूर्ति के सामने बैठी वह घंटों पूजा करती, पर आज तो देवी की मूर्ति देख कर उसे चिढ़ हो रही थी। वह सोचने लगी थी कि अगर देवी या भगवान होते तो क्या इतना पूजापाठ करने के बाद यही हश्र होता? यह सब एक अंधविश्वास ही तो है। उसे नंदी का करुण चेहरा दिख रहा था.

‘‘मां…’’

नंदी का आंसू भरा कांपता स्वर…
कुछ घबरा कर वह बाहर आ गई थी. आज मन पता नहीं क्याक्या हो रहा था. सुरेशजी तो शायद अपना आजन्म आश्रम की सदस्यता का फौर्म जमा करने गए होंगे. धीरेधीरे चल कर वह उस पिछवाड़े में बने छोटे से बगीचे की पत्थर की बैंच पर बैठ गई थी… आंखें सुदूर में पता नहीं क्या ताक रही थी.

‘‘पुष्पा…’’ तभी पीछे से सुरेशजी का स्वर सुनाई दिया। थकाहारा उदास सा।

‘‘क्या हुआ?”

सुरेशजी तब पास ही बैंच पर आ कर बैठ गए. इतने चुप तो कभी नहीं थे.

‘‘क्या हुआ…’’ पुष्पा ने फिर पूछा था.

‘‘कुछ नहीं, अभी जीजी का फोन आया था, मेरे मोबाइल पर। रामदादा की बेटी शिखा नहीं रही…’’

‘‘शिखा… रामदादा की बेटी…’’ एकदम से चौंक गई थी पुष्पा।

“हां, रात को नींद की गोलियां खा लीं उस ने. शायद आत्महत्या का मामला, जीजी कह रही थी कि हमें फौरन जबलपुर जाना होगा.

‘‘पर…’’

पुष्पा को याद आया कि शिखा अपने किसी सहपाठी से विवाह की इच्छुक थी पर रामदादा का और पूरे परिवार का जबरदस्त विरोध था. शायद…शायद सुरेशजी भी अब यही सोच रहे थे। बहुत देर बाद उन का धीमा स्वर सुनाई दिया पुष्पा को,”मैं ने अपने आश्रम की सदस्यता का फौर्म वापस ले लिया है… पूजापाठ में भी भरोसा नहीं रहा। यह सब एक छलावा है…”

अब चकित हो कर पुष्पा सुरेशजी की तरफ देख रही थी. दूर घनी बदली के पीछे शायद आशा की कोई किरण चमक उठी थी.

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