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Inspirational Story : गुंडागिरी

Inspirational Story :  तकरीबन 3 लाख लोगों की आबादी वाले उस शहर में गरीब परिवारों की एक बस्ती है. यहां पर ज्यादातर मिल या कारखानों में काम करने वाले मजदूरों के घर हैं. शहर में होने के बावजूद यह बस्ती शहर से बहुत दूर है. सुविधा के नाम पर किराने की 4 छोटीछोटी दुकानें हैं, जो घरों से ही चलती हैं और मजदूरों की उधारी पर टिकी हैं. बच्चों के लिए एक सरकारी स्कूल है, जो सुबह प्राइमरी तो दोपहर में मिडिल स्कूल हो जाता है. बस्ती के सभी बच्चे, चाहे वह लड़का हो या लड़की, इसी स्कूल में पढ़ते हैं. राजू भी इसी स्कूल में 5वीं जमात में पढ़ता है. राजू का घर एक कमरे और एक रसोई वाला है. घर में मम्मीपापा के अलावा कोई नहीं है. वह छोटा था, तभी उस के दादादादी की मौत हो गई थी.

हां, दूसरे शहर में नानानानी जरूर रहते थे. उन की माली हालत भी बदहाल ही थी और शायद इसी बात के चलते उस का मामा बचपन में ही घर छोड़ कर भाग गया था. रोजाना की तरह उस दिन भी राजू स्कूल गया था. पिताजी किसी कारखाने में काम करते थे और आज उन की छुट्टी थी. राजू के स्कूल जाने के बाद उस के मम्मीपापा खरीदारी करने के लिए अपनी मोपेड पर शहर चले गए.

राजू बाजार जाने के बाद अकसर कुछकुछ गैरजरूरी सामान खरीदने की जिद किया करता था, इसी के चलते उस के स्कूल जाने के बाद बाजार जाने का प्रोग्राम बनाया गया. वैसे, राजू है भी शरारती लड़का. क्लास के सभी बच्चे खासकर लड़कियां उस से बहुत ज्यादा ही परेशान रहती हैं. कुलमिला कर राजू की इमेज एक बिगड़े बच्चे की ही है. कुछ ही दिनों के बाद त्योहार आने वाले थे. इसी वजह से खरीदे गए सामान कुछ ज्यादा ही हो गए. राजू के मम्मीपापा मोपेड पर ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे थे, तभी सामने से तेज रफ्तार से आती हुई कार के सामने राजू के पापा अपनी गाड़ी को कंट्रोल नहीं कर सके और कार से भिड़ गए.

भयानक हादसा हुआ और राजू के मम्मीपापा दोनों ही इस दुनिया को छोड़ कर चले गए. रिश्तेदारी में ऐसा कोई था नहीं, जो राजू को ले जाता. उसे सहारा देता. सो, नानानानी ही उसे अपने साथ ले गए. पिछले 10 सालों में यह शहर काफी बदल चुका है. संकरी सी पतली गली में पक्की सड़क बन गई है. गली के दूसरे छोर पर पार्क बन गया है. कुछ बड़ी दुकानें भी खुल गई हैं. राजू भी अब 21 साल का हो चुका है. 4 महीने पहले उस के नाना की भी मौत हो गई है. नानी तो 5 साल पहले ही गुजर गई थीं. राजू ज्यादा पढ़ नहीं पाया था. किसी तरह 10वीं जमात तक तो पहुंचा, मगर पास नहीं हो पाया. नाना के मरने के बाद राजू वापस अपने शहर लौट आया. अपने पास जमा पैसों से घर के अहाते में ही उस ने पान की दुकान खोल ली. बढ़ी हुई दाढ़ी और डीलडौल के चलते राजू पहली नजर में गुंडों सा दिखता था.

रहीसही कसर उस के बोलने का अक्खड़ अंदाज पूरा कर देता था. उस के कारनामे थे ही ऐसे. अपने साथ प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाली सभी लड़कियों के नाम उसे अभी तक याद थे. उन में से अगर कोई लड़की उसे राह में अकेली मिल जाती, तो वह हाथ जोड़ कर बीच सड़क पर खड़ा हो जाता और पूरे दांत दिखा कर उस को नमस्कार कहता. कई बार लड़कियों ने इस की शिकायत अपने घर वालों से की, लेकिन महल्ले में बैठ कर कौन झगड़ा मोल ले? किसी ने भी कुछ कहने की हिम्मत न दिखाई. महल्ले वालों की सहनशीलता या बुजदिली को देख कर राजू की हिम्मत दिनोंदिन बढ़ने लगी. अब उस ने अपनी दुकान में एक बड़ा सा म्यूजिक सिस्टम भी लगवा लिया था. म्यूजिक सिस्टम पर लड़कियों को परेशान करने वाले गाने ही बजाए जाते थे. अब पिछले शुक्रवार की ही बात लीजिए, यह शर्माजी की लड़की, जो कभी राजू के ही साथ पढ़ती थी, लाल रंग का सलवारसूट पहन कर जा रही थी.

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तब राजू ने अपने म्यूजिक सिस्टम पर तेज आवाज में गाना लगा दिया, ‘लाल छड़ी मैदान खड़ी…’ ऐसे ही जब गुप्ताजी की लड़की किसी फंक्शन में जाने के लिए चमकदमक वाली ड्रैस पहनी हुई थी, तो साहब उस को देख कर गाना बजा रहे थे, ‘बदन पे सितारे लपेटे हुए ओ जाने तमन्ना किधर जा रही हो…’ कोई सीधेसादे कपड़ों में लड़की आती हुई दिखाई देती तो गाना बजता, ‘धूप में निकला न करो रूप की रानी…’ या ‘दिल के टुकड़ेटुकड़े कर के मुसकरा कर चल दिए…’ महल्ले की सभी लड़कियां परेशान हो चुकी थीं.

कई बार वे आपस में मिल भी चुकी थीं और राजू को चप्पलोंसैंडिलों से सबक सिखाने की भी सोच चुकी थीं. लेकिन वह दिन बातों के अलावा कभी नहीं आया. शर्माजी की लड़की दीप्ति एमएससी कर रही थी. क्लास होने के चलते कालेज से घर आने में लेट हो गई. कालेज घर से 5 किलोमीटर की दूरी पर था और दीप्ति अपनी साइकिल से कालेज रोज आतीजाती थी. दीप्ति अपनी एक और सहेली के साथ साइकिल से बाहर निकली ही थी कि उन दोनों को 2 मोटरसाइकिल पर बैठे 5 लड़कों ने घेर लिया. सभी लड़के दीप्ति और उस की सहेली पर लगातार छींटाकशी करते हुए उन्हें परेशान कर रहे थे.

दीप्ति और उस की सहेली को पसीना आ रहा था. हलका सा अंधेरा और सड़क का सूनापन लड़कों की हिम्मत बढ़ा रहा था. दोनों सहेलियों के तालू जैसे सूख गए थे. चीखनेचिल्लाने की हिम्मत ही नहीं थी उन में. 2 किलोमीटर के बाद वे दोनों मुख्य शहर में प्रवेश कर गईं. अब दोनों की जान में जान आई. दीप्ति की सहेली यहीं रहती थी, सो वह अब अलग रास्ते चली गई. ‘‘तुम्हारी ढिलाई के चलते एक लड़की तो हाथ से निकल गई. अब कम से कम इस लड़की को तो अपने साथ ले चलो,’’ पांचों में से शायद यह लड़का सब का सरदार था, जो गुस्सा होते हुए बोल रहा था. ‘‘अरे छोड़ो बौस, हमारे पास उसे बैठाने की जगह कहां थी. बस, अब इस चिडि़या को ले जा कर फुर्र हो जाते हैं,’’ दूसरा बदमाश बोला. दीप्ति को उन के इरादे अब समझ में आ गए थे. उस की धड़कनें एक बार फिर तेज चलने लगीं. आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा. उस ने हिम्मत कर के अपनी साइकिल की रफ्तार बढ़ा दी. किसी तरह दीप्ति अपनी गली के नुक्कड़ तक पहुंच ही गई. तेजी से साइकिल चलाने के कारण वह बुरी तरह से हांफने लगी थी.

 

घबराहट के चलते उसे चक्कर आ गया और वह वहीं गिर पड़ी. लड़के शायद इसी के इंतजार में थे. वे गिरी हुई दीप्ति को उठा कर अपनी मोटरसाइकिल से ले जाना चाहते थे. दीप्ति की हालत खिलाफत करने जैसी बिलकुल नहीं थी. राजू अपनी दुकान पर बैठा यह सब नजारा देख रहा था. वह समझ गया था कि दीप्ति मुसीबत में है और लड़कों के इरादे नेक नहीं हैं.

बिना एक पल की देरी किए उस ने अपनी दुकान में से मोटा सा लट्ठ निकाला, दौड़ कर दीप्ति के पास पहुंच गया और सरदार जैसे उस लड़के पर हमला कर दिया. उस ने अपने लट्ठ से उस लड़के के पैरों पर इतनी जोर का वार किया कि वह चीखते हुए गिर पड़ा. इस तरह हुए अचानक वार से बाकी लड़के घबरा गए. वे कुछ समझ पाते, इस के पहले ही राजू ने उसी जगह पर पूरी ताकत से दूसरा वार कर दिया. अब वह लड़का खड़ा होने की हालत में नहीं था.

अब राजू बाकी लड़कों को ललकारने लगा. अपने साथी की ऐसी हालत देख कर बचे हुए लड़कों ने वहां से भागने में ही अपनी खैरियत समझी. यह घटना देख कर आसपास कई लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी. सभी राजू की तारीफ ही कर रहे थे. अब तक वहां पर दीप्ति के साथ रहने वाली पासपड़ोस की लड़कियां भी पहुंच गईं. उन सभी लड़कियों को राजू की इस तरह तारीफ अखर रही थी, क्योंकि वे राजू की असलियत जानती थीं.

उन में से एक लड़की हिम्मत दिखाती हुई बोली, ‘‘राजू खुद कौन सा दूध का धुला है. वह खुद भी आतीजाती लड़कियों को देख कर भद्दे गाने लगा कर हमें शर्मसार करता रहता है. कौन जाने आज की घटना इसी गुंडे की चाल हो.’’

इस लड़की की बात सुन कर भीड़ में एकदम सन्नाटा छा गया. सभी राजू की तरफ सवालिया निगाहों से देखने लगे. राजू शायद इस सवाल के लिए तैयार ही था. वह 2 कदम आगे बढ़ा और उस लड़की के सामने जा कर खड़ा हो गया और बोला, ‘‘मुझे यह कहने में जरा भी झिझक नहीं है कि इस महल्ले में रहने वाली हर लड़की मेरी बहन है.

हां, मैं अपने म्यूजिक सिस्टम पर उस तरह के गाने जानबूझ कर ही बजाता था. वजह जानना चाहोगे आप लोग? ‘‘मैं चाहता था कि मेरे महल्ले में रहने वाली मेरी हर बहन इतनी हिम्मती बने कि वह हर बुरे हालात का सामना आसानी से कर पाए.

‘‘मैं इस तरह के गाने बजा कर और आप लोगों को सुना कर आप लोगों में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान जगाना चाहता था. मैं चाहता था, चाहे एक लड़की ही सही, पर कोई तो आ कर विरोध करे, लेकिन दुख की बात है कि कोई लड़की आगे नहीं आई. ‘‘याद रखिए, किसी भी इनसान का सम्मान उस के अपने घर से ही शुरू होता है. जब आप खुद अपना सम्मान नहीं करेंगी, तो बाहर वाले को क्या पड़ी है कि वह आप का सम्मान करेगा. ‘‘अगर आप लोगों ने मेरे कामों का विरोध पहले ही कर दिया होता, तो शायद आज इस तरह की घटना न घटती. ‘‘

और एक बात, अगर आप आज ही विरोध करोगे तो भविष्य में ‘मी टू’ कहने जैसे किसी आंदोलन की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. ‘‘मुझे खुशी है, इतनी भीड़ में, एक का ही सही आत्मविश्वास, आत्मसम्मान जागा तो. मुझे यकीन है, धीरेधीरे इस महल्ले की सभी लड़कियों में यह भावना आ जाएगी. आज मेरी गुंडागीरी कामयाब हुई.’’ ‘‘वाह, राजू जैसी सोच वाले गुंडे शहर के हर गलीचौराहे पर हों, तो हमारी औरतें, लड़कियां सुरक्षित कैसे न रहेंगी,’’ दीप्ति के पिता राजू की पीठ थपथपाते हुए कह रहे थे.

कमजोर कोर्ट रूम ड्रामा है Kirti Sanon की ‘दो पत्ती’  

Kirti Sanon’s Do Patti : वर्ष 2010 में आई अमिताभ बच्चन अभिनीत ‘तीन पत्ती’ जुआ के खेल पोकर से संबंधित थी, मगर नई फिल्म ‘दो पत्ती’ 2 बहनों की राइवलरी पर है. अकसर हम ने देखा है कि जिस घर में 2 किशोरी या युवा होती बेटियां होती हैं उन में आपस में नोकझोक होती रहती है. दोनों बहनों का स्वभाव अलग होता है, एक को मातापिता ज्यादा प्यार करते हैं तो दूसरी को इग्नोर किया जाता है. एक पढ़ाई में तेज होती है तो दूसरी बोर, एक तेजतर्रार होती है तो दूसरी फिसड्डी.

 

हाल ही में स्टार टीवी पर चल रहे एक सीरियल ‘एडवोकेट अंजलि अवस्थी’ में दोनों बहनों को राइवल दिखाया गया है. उन का पिता मृत्युशैया पर है परंतु बहुत अमीर घर में ब्याही बेटी न तो अपने बाप को पहचानती है, न ही पिता के इलाज के लिए अपनी बहन को पैसे देती है.

 

जब घर में 2 बहनें आपस में लगती झगड़ती हों तो यह चोट पूरे परिवार पर लगती है, परिवार तहसनहस हो जाता है. बहनों की इसी राइवलरी को मसालेदार पैकेजिंग में पेश कर प्रस्तुत किया गया है.

 

फिल्म की कहानी एक पहाड़ी इलाके देवीपुर की इंस्पैक्टर विद्या ज्योति (काजोल) से शुरू होती है. विद्या को एक फोनकौल आता है जिस में एक पतिपत्नी की मारपीट के बारे में बताया जाता है. विद्या तहकीकात करने निकल पड़ती है. पता चलता है कि यह तो 2 जुड़वां बहनों सौम्या (कृति सेनन) और शैली (कृति सेनन की दूसरी भूमिका) की कहानी है जो बहनें कम, दुश्मन ज्यादा हैं.

 

सौम्या शांत रहती है, वहीं शैली बिंदास है. सौम्या को एंग्जाइटी के अटैक पड़ते हैं, इसलिए उसे ज्यादा तवज्जुह दी जाती है. शैली से यह बरदाश्त नहीं होता. वह सौम्या के प्यार ध्रुव (शहीर शेख) को भी उस से छीन लेती है. मगर ध्रुव पत्नी के रूप में मौडर्न शैली के बजाय घरेलू सौम्या को चुनता है.

 

इधर शादी के बाद ध्रुव बातबात पर सौम्या को पीटता है और शैली के करीब आने लगता है. उधर अगले दिन सौम्या ध्रुव को पैराग्लाइडिंग पौइंट पर मिलती है. वह ध्रुव को अपने साथ पैराग्लाइडिंग पर चलने को कहती है. ध्रुव उस से कन्फैस करता है कि उसे अब लाइफ में सैटल होना है जबकि शैली उस से कहती है कि वह सौम्या से शादी न करे मगर उस की शादी सौम्या से हो जाती है. ध्रुव और शैली में अनबन होती रहती है.

 

तहकीकात करती विद्या जब वहां पहुंचती है तो उसे बताया जाता है कि शादी के 2-3 महीने बाद डोमैस्टिक वौयलैंस शुरू हो गया था. दरअसल शैली सौम्या की शादी को तुड़वाना चाहती थी. वह बहाने बना कर सौम्या के पति के साथ संबंध बनाना चाहती थी. विद्या उसे सलाह देती है कि जब तक वह कोई शिकायत नहीं करेगी, ऐक्शन नहीं लिया जाएगा.

 

एक रात ध्रुव सौम्या से इंटीमेट होने की कोशिश करता है तो वह कहती है कि वह उस के बच्चे की मां बनना चाहती है. सुबह ध्रुव सौम्या से माफी मांगता है. बच्चों की बात सुन कर ध्रुव को लगता है कि उस ने गलत बहन का चुनाव किया है. यहां फिर ध्रुव सौम्या को मारतापीटता है. सौम्या सीढि़यों से गिर जाती है. सौम्या किसी तरह उठती है और खुद ही डाक्टर को दिखा लाती है. तभी विद्या कौंस्टेबल को आदेश देती है कि पता लगाओ कि ध्रुव के खिलाफ कितने केस हैं.

 

दरअसल सौम्या डिप्रैशन की पेशेंट थी. थाने में सौम्या बताती है कि वह प्रैग्नैंट है. ध्रुव उस से माफी मांगता है और कहता है, कल से नई शुरुआत करेंगे. फाइनली सौम्या पुलिस को बता देती है कि ध्रुव ने पैराग्लाइडिंग करते वक्त उसे मारने की कोशिश की थी. ध्रुव को जेल में डाल दिया जाता है. कोर्ट में यह प्रूव हो जाता है कि सौम्या मानसिक रूप से बीमार है और उसे ऊंचाई से डर लगता है. केस सौल्व हो जाता है. शैली सौम्या की उबरने में मदद करती है.

 

इस कहानी की पटकथा रोचक है. कई ट्विस्ट्स और टर्न डाले गए हैं. कहानी धीरेधीरे खुलती जाती है, कोर्टरूम ड्रामा भी है जो कमजोर है. कहानी का आइडिया ऐक्ट्रैस कृति सेनन का है. शहीर शेख का काम अच्छा है. खूबसूरत वादियों में फिल्माई गई इस फिल्म की सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. पार्श्व संगीत अच्छा है. फिल्म बेटियों को संदेश देती है कि बहनें आपस में मिलजुल कर रहें, एकदूसरे का हक न मारें.

 

 

I want to talk : अमिताभ बच्‍चन ने थपथपाई बेटे अभिषेक की पीठ

Abhishek Bachchan :  ‘आई वांट टू टौक’ यानी मुझे बात करनी है. इंग्लिश के टाइटल वाली इस फिल्म को शुजित सरकार ने बनाया है और इस में एक अरसे बाद अभिषेक बच्चन को अभिनय करते देख अच्छा लगता है. शुजित सरकार ने 5 बेहतरीन फिल्में बनाई हैं. अगर आप ने उन फिल्मों को मिस कर दिया है तो अरेंज कर के उन्हें देख डालिए.

 

2012 में रिलीज हुई फिल्म ‘विकी डोनर’ एक कौमेडी ड्रामा थी जिसे बौक्सऔफिस पर खासी सफलता मिली. उस फिल्म का मूल विषय बांझपन और स्पर्म डोनेशन पर आधारित था. उस फिल्म से आयुष्मान खुराना ने डैब्यू किया था. फिल्म में उस के साथ यामी गौतम थी. आजकल यह फिल्म जियो प्राइम पर देखी जा सकती है.

 

 

भारतीय राजनीतिक रहस्यों पर आधारित 2013 में आई शुजित सरकार की दूसरी फिल्म थी ‘मद्रास कैफे’. यह फिल्म नैटफ्लिक्स पर अवेलेबल है. 2015 में अमिताभ बच्चन और दीपिका पादुकोण अभिनीत ‘पीकू’ में पितापुत्री के भावनात्मक रिश्ते को दिखाया गया था. यह फिल्म सोनी लिव पर उपलब्ध है. 2018 में शुजित सरकार के निर्देशन में बनी ‘अक्तूबर’ एक और बेहतर फिल्म है. यह अमेजन प्राइम पर देखी जा सकती है. इस के अलावा 2021 में आई ‘सरदार उधम सिंह’ शुजित सरकार की एक और उम्दा फिल्म है. यह फिल्म जियो सिनेमा पर उपलब्ध है.

 

अच्छा निर्देशक वही माना जाता है जिस की फिल्म का सब्जैक्ट उस की अन्य फिल्मों से एकदम अलग हो. यहां शुजित सरकार की पांचों फिल्मों के सब्जैक्ट अलगअलग हैं.

 

‘आई वांट टू टौक’ एकदम अलग विषय पर बनी फिल्म है जिस का नायक अर्जुन सेन (Abhishek Bachchan) कैलिफोर्निया में मार्केटिंग की दुनिया में धूम मचा रहा है. एक दिन उसे पता चलता है कि उसे गले का कैंसर है और उस की जिंदगी के महज 100 दिन बाकी हैं. वह जिंदगी से हार मान कर चुप नहीं बैठता, बल्कि मौत को ठेंगा दिखा कर जीवन जीतने के युद्ध में उतर पड़ता है. वह अपनी बेटी (अहिल्या बामरू) के साथ अपने रिश्ते को बेहतर बनाता है. इस सिलसिले में उस का एकाकीपन, नौकरी खोना, अस्पताल के लंबेलंबे बिल, सिर पर लटकती मौत की तलवार से भी जूझता है, मगर हिम्मत नहीं हारता, मौत को मात देता है और जिंदगी की जंग को जीतता है.

 

फिल्म की कहानी कहने का शुजित सरकार का अपना ढंग है. वे कहानी को जीवन की क्षणभंगुरता तक ले जाते हैं. उन्होंने अर्जुन सेन की 20 सर्जरियों को महिमामंडित नहीं किया है बल्कि उसे एक रूटीन की तरह ट्रीट किया है.

 

फिल्म का फर्स्टहाफ कुछ धीमा है, लेकिन सैकंडहाफ में फिल्म दौड़ने लगती है. निर्देशक ने डाक्टर (जयंत कृपलानी) के साथ मरीज अर्जुन सेन की रिलेशनशिप में कई हलकेफुलके पल जुटाए हैं.

 

फिल्म के संवाद चुटीले हैं. अभिषेक के प्रोस्थोटिक मेकअप पर मेहनत की गई है. फिल्म की कहानी में अभिषेक का पत्नी से तलाक होना दिखाया गया है. वह तलाक क्यों हुआ था, इस के बारे में भी बताया जाना चाहिए था.

 

अभिषेक बच्चन का अभिनय शानदार है. अभिषेक बच्चन अपनी भूमिका में कमाल कर गया है. अर्जुन सेन की बेटी की भूमिका में बाल कलाकार हो या युवा बेटी के रोल में अहिल्या बामरू, दोनों ने गजब की ऐक्टिंग की है. छोटी सी भूमिका में जौनी लीवर राहत पहुंचाता है.

 

फिल्म का निर्देशन काफी अच्छा है. फिल्म को देखने के बाद अमिताभ बच्चन ने बेटे की पीठ थपथपाई है. शुजित सरकार के साथ अभिषेक बच्चन ने पहली बार काम किया है. गीतसंगीत साधारण है. सिनेमेटोग्राफी अच्छी है. फिल्म की शूटिंग कैलिफोर्निया में की गई है.

 

‘The sabarmati Report’ : विवादित मुद्दे को भुनाने की नाकाम कोशिश

इसी साल जुलाई में गोधरा कांड पर एक फिल्म रिलीज हुई थी. फिल्म में बताया गया था कि गुजरात का बहुचर्चित गोधरा कांड एक हादसा था या साजिश. इसी विषय पर तहकीकात करती यह दूसरी फिल्म है. ये दोनों फिल्में एक एजेंडे के तहत बनाई गई हैं. वर्ष 2002 में गोधरा हादसे के वक्त नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. इस हादसे या साजिश के बाद पूरा गुजरात दंगों की आग में झुलस उठा था. प्रशासन आंखें मूंदे बैठा था. मुसलमानों का चुनचुन कर खात्मा किया गया था.

अब उसी विषय पर एक और फिल्म बनाने की आवश्यकता ही नहीं थी, मगर लगता है, एक ही समय पर दोनों फिल्मों के बनाने का निर्णय लिया गया. ‘द साबरमती रिपोर्ट’ भी विवादास्पद गोधरा कांड पर बनाई गई है. शायद ही कोई ऐसा हो जो गुजरात के गोधरा कांड के बारे में न जानता हो. इस ट्रेन अग्निकांड में 59 लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए थे. नानावती आयोग ने गोधरा कांड को हादसा नहीं, एक साजिश बताया था. यह फिल्म भी उस साजिश को परतदरपरत खोलती है.

‘द साबरमती रिपोर्ट’ की कहानी एक न्यूज चैनल में बतौर कैमरामैन काम करने वाले समर कुमार (विक्रांत मैसी) की है जो गोधरा के पास ट्रेन में लगी आग के मामले को रिपोर्ट करने गई एक वरिष्ठ रिपोर्टर मनिका राजपुरोहित (रिद्धि डोगरा) के साथ भेजा जाता है.

समर और मनिका राजपुरोहित दोनों गोधरा पहुंचते हैं. समर यहां सारी चीजें रिकौर्ड करता है. उसे पता चलता है कि यह आग जानबू?ा कर लगाई गई थी, जबकि मनिका राज इसे सिर्फ एक हादसा मान रही थी. मनिका राज के लौटने के बाद समर अस्पताल जा कर घायलों के बयान भी रिकौर्ड करता है. उस पर दंगाइयों ने हमला करने की भी कोशिश की, मगर वह बच कर भाग निकला और सीधे चैनल के डायरैक्टर को जा कर टेप सौंप दी.

अगले दिन समर हैरान रह गया. टीवी पर उस का टेप नहीं, मनिका राजपुरोहित द्वारा शूट किया गया टेप चलाया गया था, जिस में मनिका राज ने इसे सिर्फ एक हादसा बताया था. समर के एतराज करने पर उसे नौकरी से निकाल दिया गया और एक ?ाठे केस में जेल में डाल दिया गया, मगर उस की गर्लफ्रैंड ने उसे जेल से बाहर निकलवा दिया. अब उस का अपनी गर्लफ्रैंड के साथ ब्रेकअप हो चुका था.

अब समर रातदिन शराब के नशे में धुत रहने लगा. इसी तरह 5 साल बीत गए. कहानी 2007 में पहुंच जाती है, जहां दर्शक अमृता गिल (राशि खन्ना) को देखते हैं. वह एक टीवी चैनल ग्रुप को जौइन कर लेती है.

2007 में जब मुख्यमंत्री बदला तो केस एक बार फिर से खुला. न्यूज चैनल को सरकार ने गोधरा कांड पर फिर से रिपोर्ट तैयार करने को कहा. मनिका राज अमृता गिल से गोधरा कांड के विक्टिम्स के बारे में रिपोर्ट तैयार करने को कहती है. न्यूज चैनल के हैड मिश्राजी अमृता को वह टेप दे देते हैं जो समर ने शूट किया था और न्यूज चैनल के डायरैक्टर को सौंपा था. टेप को देखने के बाद अमृता सम?ा चुकी थी कि यह कोई हादसा नहीं बल्कि सोचीसम?ा साजिश है.

अमृता तुरंत समर के पास जाती है. पैसों के लालच में समर अमृता को सारी इन्फौर्मेशन देने को राजी हो जाता है. अगले दिन दोनों गोधरा पहुंचते हैं. वहां जा कर उन्हें गोधरा कांड की सचाई मालूम पड़ती है. दोनों साबरमती ट्रेन की जली बोगियों को भी देखने जाते हैं. पहले बनाई गई रिपोर्टों में विरोधाभास था. समर को यह बात नागवार लगी कि ट्रेन में खाना बनाया जा रहा था, जबकि ट्रेन में पैर रखने तक की जगह न थी.

इस सारी घटना के प्रमुख गवाह प्लेटफौर्म पर कार्यरत एक वेटर अरुण बर्धा को पुलिस द्वारा छिपाया जा रहा था. समर और अमृता एक वरिष्ठ अधिकारी का भेष बदल कर अरुण बर्धा तक पहुंच जाते हैं और उस से सारी सचाई उगलवाते हैं. उस के अनुसार एक सोचीसम?ा साजिश के तहत ट्रेन को जलाने की प्लानिंग एक दिन पहले ही हो गई थी. 20-20 लिटर केरोसिन टिन के पीपे पहले से ही ला कर रख दिए थे. समर अदालत को सारी सचाई बताता है और प्रूव करता है कि गोधरा कांड हादसा नहीं, साजिश थी. नानावती आयोग ने भी इसे साजिश माना था.

कहानी और उस का ट्रीटमैंट विषय के साथ न्याय नहीं करता. ‘द साबरमती रिपोर्ट’ ऐक्सिडैंट या कौंसपिरेसी इस संवेदनशील मुद्दे में कुछ ऐसा नहीं जोड़ पाती जो नया हो. पटकथा भी कमजोर है. फिल्म का पहला भाग उस भयावह हादसे को मीडिया पर छिपाने के लिए फोकस करता है, दूसरा इस सच की पड़ताल करता है. यह दूसरा भाग कमजोर है.

फिल्म में हिंदी बनाम इंग्लिश की जंग भी दिखाई गई है. कई बार फिल्म मुद्दे से हट कर 2 समुदायों की अनबन को दिखाने के साथसाथ कौमी एकता को भी दिखाती है. विक्रांत मैसी अपने किरदार में आसानी से ढल गए हैं. रिद्धि डोगरा ने अपना किरदार बखूबी निभाया है. राशि खन्ना का काम भी बढि़या है.

यह बात बारबार दोहराई गई है कि समर हिंदी का पत्रकार है. अमूमन हिंदी के पत्रकारों की कोई इज्जत नहीं होती. पत्रकार आखिर पत्रकार होता है, वह चाहे हिंदी का पत्रकार ही क्यों न हो. प्रैस इन्फौर्मेशन ब्यूरो उन के साथ दोगला व्यवहार नहीं कर सकता, सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए.

नानावती आयोग की रिपोर्ट, गुजरात हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उदाहरण देती इस फिल्म में दर्शकों को यही याद दिलाने की कोशिश की गई है कि अयोध्या से यज्ञ कर के लौट रहे 59 रामभक्तों को गोधरा में जिंदा जला दिया.

निर्देशक अनुराग कश्यप के सहायक रहे राजन पटेल ने फिल्म ‘द साबरबती रिपोर्ट’ निर्देशित की है. फिल्म में विक्रांत मैसी की शोहरत को भुनाने की कोशिश की गई है. रिद्धि डोगरा दबंग पत्रकार के रूप में जमी है. पार्श्व संगीत अच्छा है. सिनेमेटोग्राफी बढि़या है. एक खोजी पत्रकार का निराश हो कर नशे की लत में डूब जाना अखरता है. इस से पत्रकारों की प्रतिष्ठा पर आंच आती है.

 

 

Varicose veins के इलाज का बेहतर तरीका क्या है?

मेरी आयु 42 वर्ष की है. मुझे अपने पैरों में हो रही वैरिकोज वेन्स के लिए इलाज करवाना है. लेकिन मैं कन्फ्यूज हो रही हूं कि मुझे इस के लिए कौन सा इलाज करवाना चाहिए. एलोपैथिक, होम्योपैथिक या एक्यूप्रैशर? आप की क्या सलाह है?

 

आप ने यह नहीं लिखा कि आप की वैरिकोज वेन्स की स्थिति कितनी गंभीर है, क्योंकि इलाज के लिए कौन सा तरीका बेहतर रहेगा, उसी पर निर्भर करता है. वैसे एलोपैथिक इलाज वैरिकोज वेन्स के लिए सब से इफैक्टिव और फास्ट रिजल्ट देने वाला है. इस में दवाइयां, रक्लेरोथेरैपी, लेजर ट्रीटमैंट और गंभीर मामलों में सर्जरी शामिल हैं, यह एंडवास या सीवियर केसेस के लिए बैस्ट औप्शन है.

 

होम्पोपैथिक उपचार धीरेधीरे काम करता है और लक्षणों को कम करने के लिए प्राकृतिक तरीके अपनाता है. यह माइल्ड और अरली स्टेज के लिए ठीक रहता है.

 

एक्यूप्रैशर रक्तप्रवाह को सुधारने और दर्द को कम करने में मदद करता है. यह सपोर्टिव थेरैपी के लिए उपयोगी है लेकिन वैरिकोज वेन्स का पूर्ण इलाज नहीं कर सकता.

 

यदि समस्या गंभीर है तो एलोपैथिक इलाज करें. हलके मामलों में होम्योपैथी से मदद मिल सकती है. एक्यूप्रैशर को सहायक चिकित्सा के रूप में ही अपनाएं. सही इलाज के लिए डाक्टर से परामर्श करना बेहद जरूरी है.

 

आप भी अपनी समस्या हमें एसएमएस या व्हाट्सऐप के जरिए मैसेज/औडियो भी कर सकते हैं.

phone number : 08588843415

 

 

Bold Story : लव इन लौकडाउन

बेहद खूबसूरत, स्मार्ट, आधुनिक, एक मल्टीनेशनल कंपनी में उच्च पद पर मिहिका आजकल लौकडाउन के चलते वर्क फ्रोम होम ही कर रही थी.

मुंबई के अपने सुंदर से फ्लैट में वह अकेली रहती थी. 38 साल की अविवाहिता मिहिका लाइफ को अपनी शर्तों पर जी कर खुश थी, संतुष्ट थी. अपनी हेल्थ, फिगर का खूब ध्यान रखती, सुंदर थी ही. देखने में वह 25-30 साल की ही लगती. आजकल औफिस के काम के साथसाथ वह माइग्रेंट मजदूरों के लिए भी बहुतकुछ कर रही थी.

सिर्फ जरूरी चीजों की दुकानें ही खुली थीं. काफी सामानों की तो होम डिलीवरी हो ही रही थी.

एक दिन वह यों ही कार निकाल कर सोसाइटी से बाहर निकली. यह भी लग रहा था कि कार खड़ेखड़े बेकार ही न हो जाए.

सोसाइटी से कुछ दूर गांधी नगर था, जहां मजदूरों की बस्ती थी, वहीं आसपास उसे गरीब बच्चे मुंह लटकाए दिख गए.

 

स्वभाव से बेहद कोमल मिहिका उसी समय ग्रोसरी स्टोर गई, कई फूड पैकेट्स बनवाए और सीधे गांधी नगर पहुंच गई. बच्चों को आवाज दी, तो बच्चे भागे आए, उन के पीछेपीछे कई बड़े भी आ गए.

भूख, गरीबी से क्लांत चेहरे देख मिहिका ने उसी दिन से एक फैसला ले लिया. अब उस ने ग्रोसरी वाले को फोन किया, “नरेश भाई, जैसे पैकेट्स आज मैं ने लिए हैं, ऐसे रोज 50 पैकेट्स तैयार कर के मेरे फ्लैट पर पहुंचा देना.‘’

”जी मैडम, जरूर. बड़ी नेकी का काम करेंगी.”

अब यह रोज का नियम हो गया. औफिस का काम खत्म होने के बाद मिहिका कार निकालती, खुशीखुशी मजदूरों की बस्ती में जा कर खाना बांट कर आती. इस में उसे एक असीम खुशी मिलने लगी.

बस्ती में उस की कार का हौर्न सुन कर लोग रोड पर आ कर खड़े हो जाते, कभी उन के लिए खूब सब्जियां भी खरीद कर ले जाती. गरीबी, महामारी के सताए मजदूर काफी संख्या में तो मुंबई से जा चुके थे, पर ये जो रह गए थे, उन के लिए मिहिका काफीकुछ करने लगी थी. वैसे भी वह घर में अकेली ही रहती थी. आजकल उस की मेड भी नहीं आ रही थी. अपने काम करते हुए उस का दिन तो व्यस्त बीतता. शाम को वह गांधी नगर निकल जाती.

वह आजादखयाल लड़की थी. उस ने शादी की नहीं थी. खूब अच्छा खाती, कमाती, लाइफ को भरपूर एंजौय करने वाली थी.

उस दिन जैसे ही घर पहुंच कर नहा कर बाहर निकली, तभी रजत का फोन आ गया, ”कहां हो मिहिका? किधर गायब हो? कोई हालचाल नहीं, फोन नहीं ?”

 

”हां यार, थोड़ा बिजी हो गई.”

”कहां…?”

”ऐसे ही. बताओ, कब आ रहे हो? कल डिनर करो मेरे साथ.”

”नहीं यार, डिनर कहां कर सकता हूं, आजकल घर में ही तो बंद हैं, बाहर निकलूंगा तो सीमा पूछेगी कि कहां खा कर आए,” कहते हुए रजत हंसा, ”होटल भी बंद हैं, कोई बहाना नहीं चलने वाला.”

”यह तो है. आना है तो बहाना तो सोचना ही पड़ेगा.”

”ठीक है, यही बोल कर निकलूंगा कि थोड़ा टहल कर आता हूं. यह तो अच्छा है कि तुम्हारी बराबर की सोसाइटी में ही रहता हूं, पैदल भी आ सकता हूं.‘’

मिहिका ने हंसते हुए कहा, ”सीमा को किसी दिन पता चल जाए कि लौकडाउन में भी उस का पति अपनी गर्लफ्रेंड से मिलने गया है तो क्या होगा?”

”अरे यार, अच्छाअच्छा बोलो, आता हूं.”

रजत मिहिका का कलीग है. मिहिका और उस की दोस्ती 2 महीने पहले ही हुई थी. कोविड के चक्कर में जब सब वर्क फ्रोम होम कर रहे थे, तभी चैट करतेकरते दोनों खुलते चले गए.

मिहिका को हंसी आती कि वह तो अनमैरिड है, ये विवाहित पुरुषों को क्या हो जाता है कि उस के एक इशारे पर उस की तरफ खिंचे चले आते हैं, अच्छीभली पत्नियों के होते हुए उसे देख कर दीवाने बने घूमते हैं.

खैर, रजत पहला विवाहित पुरुष तो है नहीं, जो उस की जिंदगी में आया हो.

मिहिका अच्छी कुक थी, उस ने सोचा, रजत खाना तो खाएगा नहीं, बीवी को जवाब देना होगा. थोड़ा सा पास्ता बना लेती हूं, जब भी वह औफिस पास्ता बना कर ले गई है, रजत ने शौक से खाया है.

रजत तय समय पर आया. आते ही किसी दीवाने की तरह मिहिका को बांहों में भर उसे जी भर कर प्यार किया. मिहिका ने उस की बांहों में खुद को सौंप दिया. कुछ समय दोनों एकदूसरे में खोए रहे, फिर दोनों ने बेड पर ही लेटेलेटे ढेरों बातें की.

रजत ने कहा, “यार, जल्दी नहीं आ पाऊंगा. सीमा आज भी निकलने नहीं दे रही थी.”

”ठीक है, कोई दिक्कत नहीं.”

”मुझे याद करती हो?”

”हां, करती तो हूं.”

”आजकल घर में ही रहना हो रहा है, बोर होती हो?”

मिहिका हंसी, ”अरे नहीं, बोर तो मैं कभी नहीं होती.”

रजत हैरान हुआ, पर चुप रहा. थोड़ी देर में वह चला गया, तो मिहिका लेटेलेटे ही बहुत सी बातों के बारे में सोचने लगी. उसे सचमुच रजत से ऐसा लगाव नहीं था कि उस से मिलना नहीं हो पाएगा तो वह उदास हो जाएगी. रजत उसे अच्छा लगा था. शांत, हंसमुख सा रजत उसे पहली नजर में ही अच्छा लगा था और उस के खुद के चुम्बकीय व्यक्तित्व से बचना किसी पुरुष के लिए आसान नहीं होता. वह जानती है यह बात, इस बात को उस ने हमेशा एंजौय किया है.

पिछले साल इसी सोसाइटी की इसी बिल्डिंग में रहने वाले अनिल से उस की लिफ्ट में कई बार बातचीत हुई तो मिहिका उस से खुलने लगी. वह बैचलर था.

मिहिका ने उसे अपने फ्लैट में कौफी के लिए इनवाइट किया तो दोस्ती कुछ और बढ़ी थी, इतनी कि दोनों ने 6 महीने खुल कर एंजौय किया, साथसाथ खूब घूमे, कभी लोनावाला निकल जाते, कभी माथेरान, वीकेंड का मतलब ही मौजमस्ती हो गया था. फिर उस का ट्रांसफर दिल्ली हो गया. दोनों अच्छे दोस्तों की तरह प्यार से ही अलग हुए.
अब तो उस की शादी भी होने वाली थी. जब अनिल ने उसे फोन पर बताया कि वह पेरेंट्स की पसंद की लड़की से शादी कर रहा है, तो मिहिका बहुत हंसी थी और वह झेंपता रह गया था.

मिहिका का वही रूटीन शुरू हो गया था. औफिस और गांधी नगर जा कर मजदूरों के लिए कुछ करना. वह अपने जीवन से पूरी तरह संतुष्ट और सुखी थी.

एक दिन वह कार निकाल ही रही थी कि सोसाइटी के चेयरमैन जो वहीं वाचमैन को किसी बात पर डांट रहे थे, दिलकश मुसकराहट से मिहिका को हेलो बोलते हुए कह रहे थे, ”अरे, इस लौकडाउन में भी आप रोज कहां घूम रही हैं?”

मिहिका को चेयरमैन मिस्टर श्रीनिवासन हमेशा एक सौम्य पुरुष लगते, ऊपर से उन की स्माइल मिहिका को बहुत पसंद थी. उन की एक ही बेटी थी, जो बाहर पढ़ती थी. मिहिका ने कहा, ”गांधी नगर जाती हूं, मिस्टर श्रीनिवासन. आप चलना चाहेंगे वहां…”

”क्या करने…?”

”फ्री हों तो आइए, आप को घुमा कर लाती हूं.”

श्रीनिवासन ने सकुचाते हुए कहा, ”फिर कभी.”

मिहिका हंसते हुए चली गई. पर वह बहुत हैरान हुई, जब सोसाइटी के अंदर घुसते हुए उस ने देखा, श्रीनिवासन उस की बिल्डिंग के बाहर टहल रहे हैं. वह मन ही मन मुसकराई.

मिहिका ने जैसे ही कार पार्क की, श्रीनिवासन उस की ओर लपके, पूछने लगे, “आप को लौकडाउन में कोई परेशानी तो नहीं हो रही है?”

”जी नहीं, थैंक यू.”

श्रीनिवासन वहां खड़े रहे, तो मिहिका ने पूछा, “आप का भी आजकल वर्क फ्रोम होम चल रहा है?”

”हां, पर काफी बोर हो रहा हूं, लौकडाउन के समय मेरी पत्नी अपनी मां को देखने दिल्ली गई हुई थी, वह अब तक नहीं लौट पाई है.”

”ओह्ह, वैरी सैड. मैं आप के लिए कुछ कर सकती हूं?”

श्रीनिवासन मुसकराते हुए बोले, “फिलहाल एक कप चाय पिलाएंगी?”

”जरूर, बस मुझे इतना टाइम दीजिए कि मैं फ्रेश हो जाऊं. बाहर से आई हूं न.”

”हां… हां, मैं थोड़ी देर में आता हूं.”

मिहिका नहाधो कर जैसे ही फ्री हुई, उस की डोर बेल बजी. मिहिका ने उन का मुसकरा कर स्वागत किया. मिहिका ने एंट्री पर ही सैनिटाइजर रखा हुआ था. श्रीनिवासन ने हाथ सेनिटाइज किए. वे पहली बार उस के घर आए. घर पर एक नजर डालते हुए वे बोले, “वाह, आप ने तो घर को बहुत अच्छा रखा हुआ है. कमाल का साफसुथरा घर है, जबकि मेड भी नहीं है.”

”जी, थैंक्स.”

”आप मुझे श्री ही कहेंगी तो मुझे अच्छा लगेगा. मेरे दोस्त मुझे श्री ही कहते हैं. उन्हें मेरा नाम बड़ा लगता है,” कहते हुए वे प्यारी हंसी हंसे. मिहिका ने उन की काफी तारीफ सुनी थी. उसे वे पसंद थे. उम्र 40 से 45 के बीच ही होगी, पर काफी स्मार्ट और सभ्य थे.

मिहिका 2 कप चाय बना लाई. श्री को काफी नालेज थी. वे मिहिका की वहां रखी बुक्स के बारे में काफी बातें करते रहे. मिहिका को उन के पढ़ने के शौक पर खुशी हुई. वह खुद खूब पढ़ती थी.

श्री के साथ बैठेबैठे मिहिका को भी टाइम का पता ही नहीं चला. वे जाने लगे तो मिहिका ने उन्हें फिर आने के लिए कहा.

3-4 दिन में वह एक बार शाम को वहां आने लगे. चाय कभीकभी खाना भी खा कर जाने लगे और यह दोस्ती बढ़तेबढ़ते धीरेधीरे सारी सीमाएं भी पार कर ही गईं.

वैसे तो इस टाइम सोसाइटी में सब अपनेअपने घर में बंद थे. न कोई किसी से मिल रहा था, न एकदूसरे के घर जा रहा था. श्री सब से चोरीचोरी धीरेधीरे मिहिका के फ्लैट में चले जाते. दोनों इस नए बने रिश्ते में खोए ही थे कि धीरेधीरे फ्लाइट्स आनेजाने लगीं, तो एक दिन उन्होंने बताया, “मिहिका, अब मेरी पत्नी किसी दिन भी आने वाली है. इस तरह तो जल्दीजल्दी नहीं, पर मैं आता रहूंगा.”

”ठीक है, जब आप का मन करे, आ जाना.”

श्री अपनी पत्नी इंदु के आने के बाद भी चोरीचोरी 1-2 बार तो आए, पर एक ही सोसाइटी में ये दिल्लगी उन की गृहस्थी को नुकसान पहुंचा सकती थी, इसलिए बहुत कम तभी ही आ पाते, जब इंदु किसी काम से बाहर गई होती.

मिहिका का मजदूरों की बस्ती में जाना जारी था. ऐसे ही दिनों में वह एक दिन सो कर उठी, तो उस के पूरे शरीर में दर्द था, खूब तेज जुकाम और बुखार से उस की हालत खराब होने लगी, तो उस ने श्री को फोन किया. इस बार श्री उलझे से आए, बोले, “क्या हुआ?”

”मेरी तबियत काफी खराब हो रही है, श्री. मुझे डाक्टर के पास ले जा सकते हो?”

”हां, ठीक है, चलो. मैं बस इंदु को फोन कर के बता दूं.”

”क्या कहोगे उन्हें?”

”मैं सोसाइटी का चेयरमैन तो हूं ही. कह दूंगा कि इस टाइम मेरी ड्यूटी है तुम्हें ले जाना. तुम अकेली हो.”

मिहिका से उठा ही नहीं जा रहा था. बड़ी मुश्किल से वह श्री की कार तक गई. अस्पताल ज्यादा दूर नहीं था.

मिहिका को बुखार तेज था, इसलिए अस्पताल में एडमिट कर लिया गया. श्री मिहिका के ही कहने पर उसे अस्पताल छोड़ घर आ गए.

मिहिका ने ही वहीं कुछ दूर रहने वाली अपनी फ्रेंड आरती को आने के लिए कह दिया था. आरती और वह एक ही औफिस में थीं और अच्छी फ्रेंड्स भी थीं.

आरती के पति विजय और उस की एक बेटी मिंटी मिहिका को एक फैमिली मेंबर ही समझते थे.

आरती तुरंत अस्पताल पहुंच गई. मिहिका की हालत ठीक नहीं थी उसे दूसरे अस्पताल में शिफ्ट कर दिया गया. आरती लगातार उस के साथ थी, पर यहां वह रुक नहीं सकती थी. इस की अनुमति नहीं मिली तो वह बहुत परेशान हो गई.

मिहिका ने ही उसे समझाबुझा कर घर भेज दिया. यह अस्पताल भी अच्छा था. मिहिका की देखरेख अच्छी तरह से हो रही थी. उस का बुखार उतरा. आरती लगातार उस के टच में थी.

एक हफ्ते बाद मिहिका ने डाक्टर से कहा, ”मैं घर पर अकेली ही रहती हूं. अगर मेरी रिपोर्ट अब नेगेटिव आ जाए तो क्या मैं घर जा सकती हूं?”

”थोड़ा टाइम और लगेगा, फिर रिपोर्ट देख कर भेज देंगे.”

मिहिका ने रजत और श्री को भी मैसेज में अपनी हालत के बारे में बता दिया था. दोनों के यह सोच कर होश उड़ गए कि वे एक कोरोना पौजिटिव के साथ समय बिता कर आए हैं.

कुछ दिन और बीते. मिहिका काफी ठीक हुई, फिर कोविड का टेस्ट हुआ. इस बार रिपोर्ट नेगेटिव आई तो उसे डिस्चार्ज कर दिया गया.

आरती को मिहिका ने सख्ती से दूर रहने के लिए कहा हुआ था, फिर भी उस के बारबार मना करने पर भी आरती ही अपनी कार से उसे उस की बिल्डिंग के पास छोड़ कर गई.

मिहिका को घर आ कर भी क्वारंटीन रहना था. आरती ने उस की हर जरूरत की चीज के लिए होम डिलीवरी की व्यवस्था कर दी थी.

मिहिका बहुत ही हिम्मती थी. वह इन हालात में जरा भी नहीं घबराई. उस के पेरेंट्स उस के जौब लगते ही एक एक्सीडेंट में दुनिया छोड़ गए थे, तब से वह अकेली ही जी रही थी. वह खूब उतारचढ़ाव देख चुकी थी.

घर आ कर मिहिका बहुत कमजोरी का अनुभव कर रही थी. वह फ्रेश हो कर लेटी ही थी कि श्री का फोन आया. उस के हेलो कहते ही शुरू हो गया, ”मिहिका, क्या बताऊं, कोरोना तुम्हें हुआ है, नींद मेरी उड़ गई है. मैं ने तो तुम्हारे साथ बहुत टाइम बिताया है इधर. मुझे कहीं कुछ न हो जाए, मैं तो वैसे भी ब्लड प्रेशर का मरीज हूं, बहुत डर लग रहा है. क्या बताऊं, एक छींक भी आती है तो डर जाता हूं.”

मिहिका बड़े धैर्य से श्री का डर सुनती रही. उस ने बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी रोकी. हां, हूं कर के उस ने फोन रख दिया.

अगले दिन ही रजत का फोन आ गया. उस की भी हालत खराब थी, ”यार, क्या बताऊं, तुम्हें यह कैसे हो गया? डर लग रहा है कि कहीं मैं भी इस की चपेट में न आ जाऊं? तुम्हें कहां से हो गया होगा?”

”कुछ कह नहीं सकती… शायद माइग्रेंट मजदूरों की बस्ती में जा कर हुआ हो.’’

”क्या…? तुम वहां क्यों जा रही थी?”

”उन्हें कुछ देने.‘’

”तुम ने मुझे बताया नहीं.”

”जरूरत नहीं समझी. अरे, वैसे भी मैं हर जगह तो तुम्हें बता कर जाऊं, ऐसा तो कुछ नहीं हमारे बीच.”

रजत उस की साफगोई पर चुप रह गया. बस एक ठंडी सांस ले कर उस ने इतना ही कहा, “मिहिका, बहुत डर लग रहा है कि कहीं मैं भी कोरोना की चपेट में न आ जाऊं, घर में मां हैं, छोटे बच्चे हैं… क्या कर सकते हैं अब? खैर, टेक केयर.”

मिहिका का कोविड का केस सोसाइटी का पहला केस था. पूरी सोसाइटी को चिंता होने लगी. मिहिका की बिल्डिंग की एंट्री पर नगरपालिका वाले एक बैनर भी लटका गए कि इस बिल्डिंग में कोरोना का केस है, सब दूर रहें, ध्यान रखा जाए.

मिहिका ने सोसाइटी में ही टिफिन सर्विस वाली महिला से रिक्वेस्ट की थी कि वह उस के लिए खाना भिजवाती रहे. वैसे तो वह इस लौकडाउन में खुद ही बना रही थी, पर औफिस जाने के समय उस ने इस महिला से कई बार खाना मंगवाया था. आरती उस की चिंता में बराबर उस का हालचाल लेती रही.

मिहिका अब कुछ ठीक महसूस कर रही थी, पर जिस तरह से रजत और श्री डर रहे थे, वह आराम करती हुई यही सोच रही थी कि बेचारे, इन्हें मौजमस्ती महंगी न पड़ जाए. वह तो अब ठीक है, पर दोनों के डर से भरे मैसेज पढ़पढ़ कर उसे हंसी आ जाती. वे अपने इस डर का सच किसी से शेयर नहीं कर सकते थे. उसी से ही सुबहशाम अपनाअपना डर बांट रहे थे, डर का सच वही जानती थी और इस सच पर मुसकराए जा रही थी.

Inspirational Story : चेहरे पर पड़ी राख

 लेखिका- शालिनी गुप्‍ता 

क्लब में ताश खेलने में व्यस्त थी सु यानी सुजाता और उधर उस का मोबाइल लगातार बज रहा था.

‘‘सु, कितनी देर से तुम्हारा मोबाइल बज रहा है. हम डिस्टर्ब हो रहे हैं,’’ रे यानी रेवती ताश में नजरें गड़ाए ही बोली.

‘‘मैं इस नौनसैंस मोबाइल से तंग आ चुकी हूं,’’ सु गुस्से से बोली, ‘‘मैं जब भी बिजी होती हूं, यह तभी बजता है,’’ और फिर अपना मुलायम स्नैक लैदर वाला गुलाबी पर्स खोला, जो तरहतरह के सामान से भरा गोदाम बना था, उस में अपना मोबाइल ढूंढ़ने लगी.

थोड़ी मशक्कत के बाद उसे अपना मोबाइल मिल गया.

‘‘हैलो, कौन बोल रहा है,’’ सु ने मोबाइल पर बात करते हुए सिगरेट सुलगा ली.

‘‘जी, मैं आप की बेटी सोनाक्षी की क्लासटीचर बोल रही हूं. आजकल वह स्कूल बहुत बंक मार रही है.’’

‘‘व्हाट नौनसैंस, मेरी सो यानी सोनाक्षी ऐसी नहीं है,’’ सु अपनी सिगरेट की राख ऐशटे्र में डालते हुए बोली, ‘‘देखिए, आप तो जानती ही हैं कि आजकल बच्चों पर कितना बर्डन रहता है… वह तो स्कूल खत्म होने के बाद सीधे कोचिंग क्लास में चली जाती है… अगर कभी बच्चे स्कूल से बंक कर के थोड़ीबहुत मौजमस्ती कर लें, तो उस में क्या बुराई है?’’ और फिर सु ने फोन काट दिया और ताश खेलने में व्यस्त हो गई.

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वह जब रात को घर पहुंची तब तक सो घर नहीं आई थी.

‘‘मारिया, सो कहां है?’’ सु सोफे पर ढहती हुई बोली.

‘‘मैम, बेबी तो अब तक नहीं आया है,’’ मारिया नीबूपानी से भरा गिलास सु को थमाते हुए बोली, ‘‘बेबी, बोला था कि रात को 8 बजे तक आ जाएगा, पर अब तो 10 बज रहे हैं.’’

‘‘आ जाएगी, तुम चिंता मत करो,’’ सु अपने केशों को संवारती हुई बोली, ‘‘विवेक तो बाहर से ही खा कर आएंगे और शायद सो भी. इसलिए तुम मेरे लिए कुछ लो फैट बना दो.’’

‘‘मैम, हम कुछ कहना चाहते थे, आप को. बेबी का व्यवहार और उन के फ्रैंड्स…’’

‘‘व्हाट, तुम जिस थाली में खाती हो, उसी में छेद करती हो. चली जाओ यहां से. अपने काम से काम रखा करो,’’ सु गुस्से में बोली.

‘सभी लोग मेरी फूल सी बच्ची के दुश्मन बन गए हैं. पता नहीं मेरी सो सभी की आंखों में क्यों खटकने लगी है, यह सोचते हुए उस ने कपड़े बदले. झीनी गुलाबी नाइटी में वह पलंग पर लेट गई.

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‘‘क्या हुआ जान? बहुत थकी लग रही हो,’’ विवेक शराब का भरा गिलास लिए उस के पास बैठते हुए बोला.

‘‘हां, आज ताश खेलते हुए कुछ ज्यादा पी ली थी और फिर पता नहीं, रे ने किस नए ब्रैंड की सिगरेट थमा दी थी. कमबख्त ने मजा तो बहुत दिया पर शायद थोड़ी ज्यादा स्ट्रौंग थी,’’ सु करवट लेते हुए बोली, ‘‘पर तुम इस समय क्यों पी रहे हो?’’

‘‘अरे भई, माइंड रिलैक्स करने के लिए शराब से अच्छा कोई विकल्प नहीं और फिर सामने शबाब तैयार हो तो शराब की क्या बिसात?’’ कहते हुए विवेक ने अपना गिलास सु के होंठों से लगा दिया.

‘‘यू नौटी,’’ सु ने विवेक को गहरा किस किया और फिर कंधे से लगी शराब पीने लगी.

‘‘सोनाक्षी कहां है?’’ विवेक सु के केशों में उंगलियां फिराते हुए बोला.

‘‘होगी अपने दोस्तों के साथ. अब बच्चे इतने प्रैशर में रहते हैं तो थोड़ीबहुत मौजमस्ती तो जायज है,’’ और सु ने अपनी बांहें विवेक के गले में डाल दीं. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे में समाने लगे.

तभी सु का मोबाइल बज उठा, ‘‘व्हाट नौनसैंस, मैं जब भी अपनी जिंदगी के मजे लूटना शुरू करती हूं, यह तभी बज उठता है,’’

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सु विवेक को अपने से अलग कर मोबाइल उठाते हुए बोली. फोन पर सो की सहेली प्रज्ञा का नाम हाईलाइट हो रहा था.

पहले तो सु का मन किया कि वह अपना मोबाइल ही बंद कर दे और फिर से अपनी कामक्रीडा में लिप्त हो जाए, पर फिर उस का मन नहीं माना और अपना फोन औन कर दिया.

‘‘आंटी, सो ठीक नहीं है. वह मेरे सामने बेहोश पड़ी है,’’ प्रज्ञा रोते हुए बोली.

‘‘तुम मुझे जगह बताओ, मैं अभी वहां पहुंचती हूं,’’ कह कर सु ने तुरंत अपने कपड़े बदले और गाड़ी ले कर वहां चल दी.

वैसे वह विवेक को भी अपने साथ ले जाना चाहती थी, लेकिन वह सो चुका था. उसे ज्यादा चढ़ गई थी.

जब सु प्रज्ञा के बताए पते पर पहुंची तो हैरान रह गई. सारा हौल शराब की बदबू और सिगरेट के धुएं से भरा था. सो सामने बैठी नीबूपानी पी रही थी.

‘‘क्या हुआ तुम्हें?’’ सु के स्वर में चिंता थी.

‘‘ममा, अब तो ठीक हूं, बस आज कुछ ज्यादा हो गई थी,’’ सो अपना सिर हिलाते हुए बोली.

‘‘तुम ने ड्रिंक ली है?’’ सु ने चौंककर पूछा.

‘‘तो क्या हुआ ममा?’’

‘‘तुम ऐसा कैसे कर सकती हो?’’ सु परेशान हो उठी.

‘‘मैं तो पिछले 6 महीनों से ड्रिंक कर रही हूं, इस में क्या बुरा है?’’ सो लापरवाही से एक अश्लील गाना गुनगुनाते हुए बोली.

‘‘पर तुम तो कोचिंग क्लास जाने की बात कहती थीं और कहती थीं कि माइंड रिलैक्स करने के लिए तुम थोड़ाबहुत हंसीमजाक और डांस वगैरह कर लेती हो, पर यह शराब…’’

‘‘व्हाट नौनसैंस, अगर आप से कहती कि मैं शराब पीती हूं तो क्या आप इजाजत दे देतीं?’’

सु ने तब एक जोरदार थप्पड़ सो के गाल पर दे मारा.

‘‘ममा, मुझे टोकने से पहले खुद को कंट्रोल कीजिए. आप तो खुद रोज ढेरों गिलास गटक जाती हैं. अगर मैं ने थोड़ी सी पी ली तो क्या बुरा किया?’’ सो सिगरेट सुलगाती हुई बोली, ‘‘माइंड रिलैक्स करने के लिए बहुत बढि़या चीज है यह.’’

सो को सिगरेट पीते देख सु को इतना गुस्सा आया कि उस का पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा और तब गुस्से के अतिरेक में उठा उस का हाथ सो ने हवा में ही लपक लिया और हंसते हुए बोली, ‘‘ममा, मुझे सुधारने से पहले खुद को सुधारो. खुद तो क्लब की शान बनी बैठी हो और मुझ से किताबी कीड़ा बनने की उम्मीद रखती हो. ममा, मांबाप तो बच्चों के लिए सब से बड़े आदर्श होते हैं और फिर मैं तो आप के द्वारा अपनाए गए रास्ते पर चल कर आप का ही नाम रोशन कर रही हूं,’’ कह कर सिगरेट की राख ऐशट्रे में डाली और अपने दोस्तों के साथ विदेशी गाने की धुन पर थिरकने लगी.

तभी बाहर से हवा का एक तेज झोंका आया और उस से ऐशट्रे में पड़ी राख उड़ कर सु के मुंह पर आ गिरी. तब सु का सारा मुंह ऐसा काला हुआ मानो किसी ने अचानक आधुनिकता की काली स्याही उस के मुख पर पोत दी हो.

Sad Story : रिक्‍शा वाले की बेटी

लेखक-ब्रजेंद्र सिंह

सुबह का शांत समय था. कोमल खिड़की से बाहर देख रही थी. यह बरसात का महीना था. बाहर के लौन में घास हरीभरी और ताजी लग रही थी. हवा ठंडी और दिल खुश करने वाली गीली मिट्टी की महक लिए वातावरण को सुगंधित कर रही थी. कोमल को 30 साल पहले के ऐसे ही बारिश से भीगे हुए दिन की याद आई…

‘मुबारिक हो मैडम, बेटा हुआ है,’ नर्स ने कोमल से कहा.

यह सुन कर कोमल ने चैन की सांस ली. उस को बेहद डर था कि कहीं दुर्भाग्य से बेटी पैदा हुई तो पति के परिवार की नजरों में उस का दर्जा का गिर जाता. इस के दो कारण थे. पहला था कि लाखों और लोगों की तरह, उस के सासससुर के सिर अपने वंश को आगे बढ़ाने का भूत सवार था. दूसरा, कोमल से पहले घर में आने वाली बहू, उस के जेठ की पत्नी ने बेटा पैदा किया था.

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जल्द ही सारे खानदान में बेटा पैदा होने का शुभ समाचार फैल गया. सब से पहले कोमल के सासससुर अस्पताल पहुंचे. उसे बधाई देने के बाद उस के ससुर ने कहा ‘‘मुझे जैसे ही समाचार मिला, मैं ने यश को जरमनी फोन कर दिया. वह बेहद खुश था.’’

यश उन का बेटा और कोमल का पति था. वह उस समय, कारोबार के सिलसिले में यूरोप का दौरा कर रहा था.

उस के सासससुर के आने के कुछ ही देर पश्चात, एक के बाद एक, दोस्त और रिश्तेदार अस्पताल पहुंचने लगे. साथ में फूलों के गुलदस्ते, मिठाई, बच्चे के लिए कपड़े और खिलौने लाए. पर अस्पताल उच्च श्रेणी का था. उस के नियम बहुत कड़े थे. कोमल के सासससुर के अलावा एक समय पर केवल दो लोग ही उस के कमरे में जा सकते थे. और जितने तोहफे और फूल वगैरह आए थे, उन सब को अलग एक छोटे कमरे में रखवा दिया. कमरे का ताला लगा कर चाभी कोमल की सास को पकड़ा दी गई.

2 दिन बाद कोमल अपने बेटे को ले कर घर आई. यश भी उसी शाम को जरमनी से लौटा. फिर कई दिनों तक बच्चे के पैदा होने का जश्न मनाया गया.

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कोमल की ससुराल में बहुत बड़ा भव्य घर था, पर उस के ससुर को लगा कि एक ही दिन सारे रिश्तेदारों और सब के दोस्तों को बुलाना तो मेले की भीड़ की तरह होगा, किसी से खुल कर बातचीत भी न हो सकेगी. अत: हर दूसरे दिन पार्टी रखी गई. एक दिन उन के रिश्तेदारों को बुलाया गया. दो दिन बाद सुसर के व्यापारी मित्र आए थे. उस के बाद कोमल की सास की सहेलियां पार्टी में आईं. तब आया वह दिन, जब यश और कोमल के मित्रगण खुशी मनाने आए.

कोमल के बेटे के नामकरण पर बच्चे के दादाजी ने उस का नाम महावीर रखा. धीरेधीरे महावीर बड़ा हुआ. पढ़ाई में काफी तेज था और हमेशा अपनी कक्षा में पहले या दूसरे स्थान पर आता था. पर बचपन से ही वह काफी अड़ियल स्वभाव का था और अपनी मनमरजी के मुताबिक ही काम करता था.

10वीं कक्षा पास करने के बाद जब वह 11वीं में जा रहा था, तो उस के पिता यश ने चाहा कि वह कौमर्स और इकोनोमिक्स पढ़े, ताकि आगे जा कर कालेज में वह ‘सीए’ या ‘एमबीए’ कर सके और डिगरी हासिल करने के बाद महावीर उन के कपड़ों के निर्यात के कारोबार में उन का साथ दे.

पर, महावीर के कुछ और ही इरादे थे. वह एक शानदार फाइवस्टार होटल खोलना चाहता था. इस कारण उस ने 11वीं कक्षा में होम साइंस लिया, और 12वीं करने के बाद वह होटल मैनेजमेंट में चला गया.

लगभग 3 साल हो गए, तब महावीर की पढ़ाई और ट्रेनिंग पूरी होने वाली थी. एक शाम जब वह घर आया, तो बहुत प्रसन्न लग रहा था.

‘‘मम्मीजीपापाजी, मैं आप के लिए एक खुशखबरी लाया हूं.’’

‘‘क्या तुम अपने सालाना इम्तिहान में अव्वल नंबर पर आए हो?’’ कोमल ने पूछा.

‘‘नहीं मम्मी, यह इम्तिहान में नंबर जैसी छोटी चीज की बात नहीं है,’’ उस के बेटे ने जवाब दिया, ‘‘यह मेरे जीवन और भविष्य के बारे में बात है.’’

‘‘अब हमें और लटका कर मत रखो,’’ यश बोला, ‘‘बता ही दो क्या बात है.’’

‘‘तो सुनिए,’’ महावीर ने कहा, ‘‘मैं ने शादी के लिए एक लड़की चयन कर ली है. मैं ने उस से बात भी कर ली है और उस को यह रिश्ता मंजूर है.’’

यश और कोमल को जोर का झटका लगा. थोड़ी देर तक दोनों कुछ बोल नहीं सके. फिर बड़ी मुश्किल से यश ने अपनी आवाज पाई,
‘‘यह क्या कह रहे हो बेटा? तुम हमारे साथ मजाक तो नहीं कर रहे हो?’’

‘‘नहीं पापाजी. मैं आप लोगों के साथ भला ऐसा कैसे कर सकता हूं,’’ महावीर ने जवाब दिया.

‘‘यही लड़की कौन है? उस का बाप क्या करता है? क्या वह हमारी तरह राजपूत खानदान की है?’’ सवाल पर सवाल महावीर की तरफ फेंके गए.

‘‘उस लड़की का नाम पूनम है. वह मेरे साथ होटल मैंनेजमेंट सीख रही है. उस का पिता एक ओटोरिकशा चलाता है. उस की जात और खानदान के बारे में मैं ने कभी पूछा ही नहीं. शायद वह दलित है, पर इस से क्या फर्क पड़ता है.’’

महावीर का जवाब सुनते ही यश आगबबूला हो गया. ‘‘क्या यश राठौर जैसे करोड़पति का इकलौता बेटा एक रिकशा चलाने वाले की बेटी के साथ शादी करेगा?’’ वे गुस्सीले स्वर में चिल्लाए, ‘‘क्या एक राठौर खानदान का सुपुत्र एक दलित लड़की से रिश्ता जोड़ेगा? यह मैं कभी होने नहीं दूंगा. सारे समाज में हमारी नाक कट जाएगी. लोग हम पर हंसेंगे. स्वर्ग में हमारे पुरखों की शांति भंग हो जाएगी. तुम यह शादी नहीं कर सकते हो,’’ कह कर यश पैर पटकता हुआ उस कमरे से चला गया.

‘‘बेटा, तुम यह बहुत गलत काम कर रहे हो. उस दलित लड़की का खयाल छोड़ दो,’’ कह कर कोमल भी कमरा छोड़ कर चली गई.

महावीर की बचपन की पुरानी आदत अब भी थी कि वह अपने मन की मरजी करता था, चाहे उस के मातापिता कुछ भी कहें. उसे और पूनम को एक फाइवस्टार होटल में नौकरी का बुलावा मिल चुका था, जिस के बारे में उस ने डर के मारे अपने मातापिता को नहीं बताया था.

पूनम ने तो प्रस्ताव मिलते ही होटल को ‘हां’ कह दिया था. उस दिन मातापिता के विचारों को सुनने के बाद महावीर ने तय किया कि वह भी उसी होटल की नौकरी स्वीकार कर लेगा. फिर जल्दी ही वह एक छोटा सा मकान किराए पर ले लेगा.

अगला कदम भी उस के विचारों में था कि वह तब पूनम से कोर्ट में शादी कर के अपनी गृहस्थी बसाएगा.

पूनम को महावीर की योजना सही लगी, पर वह पहले अपने पिता से अनुमति लेना चाहती थी. जब पूनम के पिता को पता चला कि उस की बेटी किस से शादी करने जा रही है, तो शुरूशुरू में तो वह डर गया. उसे पता था कि यश राठौर बड़ा आदमी था और उस की जानपहचान शहर के वरिष्ठ पुलिस आईएएस अफसरों से थी. वह चाहते तो उस का लाइसेंस जब्त करवा सकते थे या उसे किसी बहाने जेल भिजवा सकते थे.

पर, महावीर ने उसे आश्वासन दिया कि उस का पिता गुस्सैल जरूर था, और उसे जब गुस्सा आ जाता है, तो वह कुछ भी कर सकता था, लेकिन महावीर सब स्थिति संभाल लेगा.

मुश्किल से पूनम के पिता शादी के लिए राजी हो गए. पहले दिन के झगड़े के बाद महावीर ने अपने पिता के सामने अपनी शादी की बात कभी नहीं उठाई, और न ही अपनी मां को कुछ बताया.

ट्रेनिंग खत्म होने के बाद पूनम और महावीर की नौकरी लग गई. अपनी योजना के अनुसार दोनों ने कोर्ट में नोटिस दे दिया कि वह शादी करना चाहते हैं. कानून के अनुसार पहला नोटिस देने के 3 महीने के बाद ही वह शादी कर सकते थे. कायदे के मुताबिक, उन की अर्जी कोर्ट के नोटिस बोर्ड पर लग गई. धीरेधीरे दिन गुजरने लगे.

लगभग एक महीने बाद अदालत के ही एक मुलाजिम ने कुछ पैसे ऐंठने की नीयत से कोमल का पता कर उस को फोन किया और बता दिया कि उस का बेटा कोर्ट में शादी करने जा रहा है.

महावीर की होने वाली शादी की खबर सुनते ही कोमल के होश उड़ गए. वह जानती थी कि उस के पति यश बेटे महावीर से पहले ही नाराज थे, क्योंकि उस ने उन के साथ काम करने से इनकार कर दिया था और उस की जगह एक होटल में नौकरी कर रहा था. इस के ऊपर अगर वह यह सुनेंगे कि उन का बेटा एक ओटोरिकशा चलाने वाले की लड़की से शादी कर रहा है, तो वह गुस्से में आ कर महावीर को अपनी जायदाद से वंचित कर सकते थे. कोमल किसी हालत में यह नहीं सह सकती थी. आखिर महावीर उस का एकलौता बेटा था.

कोमल सोचने लगी कि वह क्या करे, ताकि महावीर और पूनम अलग हो जाएं. वह चाहती थी कि उस का कारगर उपाय कुछ ऐसा हो कि वह दोनों इस शादी के बंधन में न उलझे रहे.

धीरेधीरे कोमल के दिमाग में एक उपाय सब से ऊंचा बन कर पांव जमाने लगा.
वह यश को इस उपाय में सांझी नहीं बनाना चाहती थी. वह नहीं चाहती थी कि यश का गुस्सा महावीर को सुधारने में और भी भड़क जाए. अकसर अपना कारोबार बढ़ाने के लिए सिलसिले में यश विदेशों के लंबे टूर पर जाते थे. एक ऐसे ही अवसर पर कोमल ने महावीर को फोन किया और कहा, ‘‘बेटे, तुम्हें देखने को मेरी आखें तरस गई हैं. कल शाम को चाय पर घर आ कर मुझ से कुछ देर बातें कर लो. तुम्हारे पिताजी इस समय हिंदुस्तान से बाहर हैं. इसलिए, जिस लडक़ी से तुम शादी करने की बात कर रहे थे, उस को भी साथ ले आओ. कम से कम मैं अपने बेटे की पसंद से मिल तो लूं.

वह मान गया कि कल शाम को पूनम को साथ ले कर आएगा.

अगले दिन सुबह अपनी योजना के अनुसार कोमल बाजार गई. ड्राइवर को कार पार्किंग में छोड़ वह खरीदारी करने पैदल निकल गई, ताकि किसी को कोई शक न पड़े कि वह असल में क्या लेने आई थी. उस ने एक जोड़ी चप्पल, कुछ रूमाल और एक पर्स खरीदा. फिर अपने मन में उठ रही योजना को पूरा करने के विचार से एक चीज खरीदी- चूहे मारने की दवा.

शाम को, कहने के मुताबिक, महावीर और पूनम उस से मिलने आए. कोमल ने उन से काफी बातचीत की, उस ने पूनम की प्रशंसा की और उस से मिल कर बहुत खुश होने का नाटक भी रचा. फिर नौकर से चाय मंगाई.
जब चाय आई, तो कोमल ने उसे अलग टेबल पर रखने को कहा, और खुद उठी चाय बनाने के लिए.

कोमल जानती थी कि उस की खरीदी हुई दवा, चूहों का खून पतला कर के उन को मारती थी. मनुष्यों को भी जब खून में थक्का आ जाने का डर होता, तो इसी तरह की दवा बहुत कम मात्रा में दी जाती थी, ताकि खून पतला हो जाए. यदि किसी इनसान को चूहे मारने वाली दवा काफी मात्रा में दी जाए तो उस का खून इतना पतला हो जाता है कि उस की मौत निश्चित थी. पर मौत आने में कुछ घंटे लगते हैं.

कोमल ने एक प्याले में चाय डाली, अपनी लाई हुई दवा की चार चुटकियां डाल दीं, फिर दूध और चीनी मिला कर प्याला पूनम के सामने रख दिया. वह दूसरे प्याले में चाय डाल ही रही थी कि दूसरे कमरे में फोन बजा. ‘‘मैं अभी आती हूं’’ कह कर वह दूसरे कमरे में फोन सुनने चली गई.

पूनम ने अपनी चाय का प्याला महावीर को पकड़ाया और उठ कर अपने लिए एक और प्याला बनाया. कोमल को आने में देर लग रही थी, तो दोनों ने अपनीअपनी चाय पीनी शुरू कर दी.

कोमल वापस आई तो देरी के लिए माफी मांगी और अपने लिए चाय बना कर पीने लगी. उस ने सोचा कि पूनम ने महावीर के लिए चाय बना दी होगी.

चाय खत्म होने के बाद पूनम और महावीर ने अपनेअपने घर जाने की इजाजत मांगी और निकल पड़े.

कोमल के मन में विचार उठा कि जल्दी ही उस का बेटा आजाद हो जाएगा. आकाश की तरफ उस ने निगाहें उठाईं तो देखा कि बादल घिर रहे थे पर लगता था कि अभी वर्षा शुरू होने में समय लगेगा.

रात हो गई. कोमल खाना खाने बैठी ही थी कि फोन की घंटी बजी. फोन पर पूनम थी. उस ने कहा कि वह अस्पताल से बोल रही थी. उस की आवाज कांप रही थी और लगता था कि वह किसी क्षण रोने लगेगी. उस ने बताया कि जब वह और महावीर कोमल को छोड़ कर निकले तो वह दोनों काफी देर तक शहर के एक बड़े पार्क में घूम रहे थे, गप्पें भी हांक रहे थे और भविष्य के लिए योजनाएं भी बना रहे थे. अचानक महावीर की तबीयत खराब हो गई. पूनम उसे टैक्सी में अस्पताल ले गई. वहां डाक्टरों ने कहा कि लगता था कि महावीर ने किसी किस्म का जहर खाया था. उस का बचना मुश्किल था.

यह सब सुन कर कोमल को जोर का झटका लगा. यह क्या अनर्थ हो गया था. उस ने सोचा कि जो जाल उस ने पूनम के लिए फैलाया था, उस जाल में उसी का बेटा फंस गया था. उस ने तुरंत ड्राइवर को बुलवाया और अपनी कार से अस्पताल के लिए रवाना हो गई.

रास्ते में बारिश शुरू हो गई और जल्दी ही घनघोर वर्षा होने लगी.

उस समय सड़कें वाहनों से खचाखच भरी हुई थीं. लम्बेलम्बे ट्रैफिक जाम थे. वर्षा के कारण जाम और जटिल हुए जा रहे थे. कोमल का मोबाइल उस के पर्स में था. रास्ते में उस का फोन 2-3 बार बजा, पर बाहर के शोर के कारण, कोमल ने नहीं सुना. कोमल को अस्पताल पहुंचने में लगभग एक घंटा लग गया. वहां उसे पूनम मिली. वह रो रही थी.

‘‘मांजी, महावीर हमें हमेशा के लिए छोड़ कर चले गए,’’ सिसकियों के बीच में उस ने कहा. कोमल वहीं पास में एक बेंच पर बैठ गई. उसे लगा कि उस ने अपने सपनों को स्वयं ध्वस्त कर दिया, वह क्या करना चाह रही थी, पर जाने क्यों मामला उलट गया. बड़ी हिम्मत कर के उस ने यश को फोन लगाया. कोमल की बात सुन कर उस का भी दिल बैठ गया. उस ने कहा कि वह अगली फ्लाइट से वापस आ रहा है.

अस्पताल के डाक्टर महावीर के शव का पोस्टमार्टम करना चाहते थे, पर कोमल ने मना कर दिया. वहांं के बड़े डाक्टर उस के पति यश को जानते थे. कोमल के दबाव में आ कर मौत का कारण उन्होंने ‘दिल का दौरा’ लिख दिया.
आखिर वह बड़े उद्योगपति की बीवी होने के अलावा मृतक की मां भी थी.

कोमल आज बरसात की सुबह खिड़की के पास बैठ कर सोच रही थी. महावीर को मरे हुए 7 साल हो गए थे. उस ने महावीर का पोस्टमार्टम रुकवा कर शायद अपनेआप को कई साल कानून के कारागार में कैद होने से बचा लिया था. उस ने यश को भी सचाई नहीं बताई थी. पर उसे अपने मन, खयालात और आत्मा की कैद से कौन बचा सकता था. आत्मग्लानि ने तो उसे आजीवन कैद की सजा सुना दी थी.

Indian Politics : भाजपाई मशीनरी vs कांग्रेस मशीनरी

महाराष्ट्र और उस से पहले हरियाणा के चुनावों ने एक बात साबित कर दी है कि जहां भारतीय जनता पार्टी की मशीनरी एक हार के बाद फिर से मेहनत करने पर लग जाती है वहीं कांग्रेस की मशीनरी एक जीत के बाद यह प्लानिंग करने लगती है कि अगली जीत के बाद कौन कैसा लाभ उठाएगा. कांग्रेस जब हार जाती है तो मुंह छिपा कर बैठ जाती है.

 

भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र और हरियाणा में ही नहीं, उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनावों में हार के बाद भी हार नहीं मानी और दोगुनेचौगुने जोश से काम किया. कांग्रेसी जश्न के नशे में डूबे रहे. भारतीय जनता पार्टी को यह गुण धार्मिक संगठनों से मिला है. हर धर्म की खासीयत यही होती है कि उस के अनुयायी हर अत्याचार और पराजय के बाद फिर लड़ने को तैयार हो जाते हैं. लगभग हर धर्म की किताब में ऐसी कहानियां हैं जिन में उन के भगवानों को एक हार मिली तो वे दूसरी लड़ाई के लिए तैयार हो गए.

 

राजाओं के साथ अकसर यह नहीं होता था. राजा एक युद्ध हारने के बाद अकसर किसी बीहड़ में खो जाता था. राजा राम, राजा युधिष्ठिर के साथ यही हुआ. उन का साथ देने वाला धर्म तो जिंदा रहा पर राजाओं के अवशेष नहीं बचे. कांग्रेस के साथ यही हो रहा है. कोई आंदोलन, कोई पार्टी अपनेआप नहीं चल सकती. यह ऐसी रेल है जिसे लगातार कोयला चाहिए चलाते रहने के लिए. एक बार गति पकड़ने के बाद लोको ड्राइवर डाइनिंग टेबल पर बैठ कर मजे नहीं ले सकता. उसे समय पर कोयला चाहिए होगा और समय पर इंजन के बौयलर में डालना होगा.

 

कांग्रेसियों ने ऐसे लोगों को पाल रखा है जो ट्विटर (अब एक्स) पर एक मैसेज रोज डाल कर या सप्ताह में एक बार किसी अखबार में कौलम लिख कर आराम से बैठ जाते हैं. भारतीय जनता पार्टी के पास हर मंदिर में और उस से पलते हुए लोगों की विशाल भीड़ है जो उस के लिए रातदिन काम करने को तैयार है.

 

2024 के लोकसभा चुनावों के पहले राहुल गांधी ने ‘भारत जोड़ो’ नारा दिया तो सोते-आराम फरमाते कांग्रेसियों को कुछ करनेधरने को मिला. 2024 में मिली आंशिक सफलता से उन्हें फिर लड्डू खाने की आदत पड़ गई, बिना यह सोचे कि ये लड्डू बनाएगा कौन? इंडिया ब्लौक की ज्यादातर पार्टियों का यही हाल है.

 

महाराष्ट्र में वैसे भारतीय जनता पार्टी जीती है तो शिवसेना शिंदे और अजित पवार के बलबूते पर. अगर ये दोनों अपनी राजनीति के अस्तित्व के लिए नहीं लड़ रहे होते तो देवेंद्र फडणवीस की हालत पेशवाओं जैसी होती जो अंगरेजों के रहमोकरम पर 100-150 साल रहे. 1818 में तीसरे युद्ध के बाद ब्राह्मण पेशवाओं ने राजकाज अंगरेजों को सौंप दिया था और जो राज कुर्मी-क्षत्रिय शिवाजी ने उन्हें दिया था, उसे नष्ट कर दिया. अब भी पेशवा देवेंद्र फडणवीस, मराठे शिंदे और अजित पवार के सहारे ही जीते हैं.

 

Property : ट्रस्ट नहीं, बेटेबेटियों के नाम करें संपत्ति

राजनीति हो या बिजनेस सही उत्तराधिकारी का चयन ही विरासत को आगे बढ़ाता है. यदि उत्तराधिकारी ढूंढने में समय लगता है तो परिणाम भविष्य में घातक भी साबित होते हैं.

‘पूत सपूत तो क्या धन संचय, पूत कपूत तो क्या धन संचय’ एक कहावत है. इस का मतलब है कि अगर आप का बेटा सपूत है, यानी योग्य, समझदार और जिम्मेदार है, तो उस के लिए धन संचय करने की जरूरत नहीं है. ऐसा बेटा अपनी मेहनत से धन कमा लेगा और जीवन में सफल होगा. दूसरी तरफ अगर आप का बेटा कपूत है, यानी गैरजिम्मेदार, आलसी या गलत रास्ते पर है तो भी धन संचय करने का कोई मतलब नहीं है. ऐसा बेटा संचय किए गए धन का सही इस्तेमाल नहीं करेगा और उसे बरबाद कर देगा.

आज समाज में स्टार्टअप करने वाले कई युवाओं के उदाहरण हैं. जिन के लिए मातापिता ने कोई कारोबार का खजाना नहीं छोड़ा, फिर भी अपनी योग्यता और क्षमता से सफल लोगों में गिने जाते हैं. आज इस कहावत पर चर्चा इसलिए क्योंकि अरबपति वारेन बफेट ने अपनी संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा ट्रस्ट को दिया और अपने बच्चों को उन की जरूरत भर का ही पैसा दिया. उन्होंने कहा कि बच्चों के लिए इतना ही पैसा नहीं छोड़ना चाहिए कि वह काम न करे और इतना कम भी नहीं छोड़ना चाहिए कि वह काम करने लायक ही न रहे.

सवाल उठता है कि क्या अपनी मेहनत की कमाई उन ट्रस्टों को देना चाहिए जिन का आप और आप की संपत्ति से कोई मानसिक लगाव नहीं है ? क्या ऐसे ट्रस्ट और उन के डायरैक्टर आप की भावना के अनुसार काम करेंगे ? अगर आप का पैसा आप की संतानों को जाएगा तो क्या वो आप की विरासत को आगे नहीं बढ़ाएगें ? भारत के समाज में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं. विदेशों में ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाते हैं. भारत में राजनीतिक दलों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां विरासत अपनी संतान को भी दी गई.

कौन है वारेन बफेट ?

फोर्ब्स की लिस्ट के अनुसार वारेन बफेट दुनिया के अमीरों की लिस्ट में छठें पायदान पर हैं. वारेन बफेट के पास 147.2 बिलियन डौलर से अधिक की संपत्ति है. वारेन बफेट ने अपने ही पिता से कारोबार करना सीखा और उन के काम से ही अपने कैरियर की शुरूआत की. 30 अगस्त 2024 को वारेन बफेट का 94वां जन्मदिन था. वारेन बफेट के पिता हौवर्ड बफेट स्टोक ब्रोकर थे. इस वजह से बचपन से ही वारेन बफेट की रुचि स्टोक में थी. सब से पहले वारेन ने वर्ष 1942 में अमेरिकी पेट्रोलियम कंपनी सिटीज सर्विस के 3 शेयर खरीदे थे. सिटीज सर्विस के 3 शेयर खरीदने के 4 महीने बाद उन्हें इन स्टोक से 5 डौलर का मुनाफा हुआ था.

इन शेयर की खरीद से ही उन के निवेश का सफर शुरू हुआ था. इस के बाद उन्होंने शेयर बाजार में निवेश करना शुरू किया. शेयर में निवेश कर के वारेन बफेट 56 साल की उम्र में अरबपति बन गए. वारेन बफेट ने 99 फीसदी संपत्ति 50 साल के उम्र के बाद कमाई है. लगातार निवेश कर के वारेन ने वर्ष 1944 में निवेश के जरिए 228 डौलर से ज्यादा की राशि कमाई थी. इसी तरह निवेश की दुनिया में अपना परचम लहराया. उन की कंपनी हैथवे के शेयर दुनिया के सब से महंगे शेयर हैं.

वारेन बफेट ने 1952 में सुसान थाम्पसन से शादी की थी. उन के 3 बच्चे सूसी, हावर्ड और पीटर है. जुलाई 2004 में सुसान की मौत हो गई. 2006 में बफेट ने एस्ट्रिड मेंक्स से दूसरी शादी कर ली. वारेन बफेट अपनी वसीयत को ले कर चर्चा में है. वारेन बफेट ने अपनी संपत्ति का 85 प्रतिशत बिल और मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन सहित 5 धर्मार्थ संगठनों को जाएगा. शेष 15 प्रतिशत में से कुछ उन के बच्चों को जाएगा. कुछ लोग इस फैसले की प्रशंसा कर रहे हैं पर असल में यह बहुत आदर्श नहीं है. वारेन को ट्रस्ट भी बनानी हो तो बनाए पर उसे चलाने की जिम्मेदारी अपनी जैविक संतानों को दे क्योंकि बाहरी लोग चाहे जितने नाम वाले हों वे कब बेईमानी करने लगें कहा नहीं जा सकता. सरकार को ट्रस्टी मान कर जनता खरबों रुपए टैक्स के रूप में देती है पर ऊपर से नीचे तक सभी, सभी देशों में, बेईमानी करते रहते हैं.

यूक्रेन में प्रेजिडेंट ने थोड़े दिन पहले कुछ रीजनल मिलिट्री जनरलों को हटाया था क्योंकि वे रिश्वत ले कर लोगों को देश छोड़ने का रास्ता दे रहे थे. देश को रूसी हमले से बचाने वाले भी रिश्वतखोरी से बाज नहीं आते तो आम सिविलियन का तो कहना क्या.

जीवित रहते पिता करे हिस्सेदारी की तैयारी

भारत में हिंदू विरासत कानूनों में समाज उत्तराधिकारी के रूप में संतान को ही मान्यता दी जाती है. ऐसे में जरूरी होता है कि पिता अपनी संपत्ति अपनी संतान को ही दे. यदि वह पूरा कंट्रोल किसी कारण नहीं देना चाहता तो ट्रस्ट बना कर संपत्ति उस के नाम करने से धन का उपयोग ट्रस्ट के डायरैक्टर के विवेक पर छोड़ना गलत होगा. यह हमारे यहां कम ही होता है.

वास्तव में ट्रस्टीयों का किसी और के कमाए धन से कोई भावनात्मक लगाव नहीं होता. इस कारण वह सही तरह से धन का इस्तेमाल नहीं करते हैं. ऐसे में जरूरी है कि पिता समय रहते अपनी संतानों को अपने कारोबार से परिचित कराए. उस को काम करना सिखाएं फिर समय आने पर उसे संतान के हवाले कर दे.

अगर बच्चे एक से अधिक हैं तो उन की योग्यता के हिसाब से बंटवारा करें और यह फैसला जीवित रहते बच्चों को सुनाएं और समझाएं.
कारोबारी परिवारों में संतान को ही अधिकार मिलते हैं. जिस के तहत वह संपत्ति का प्रयोग अपने हिसाब से करते हैं. अम्बानी परिवार में संपत्ति का बंटवारा मुकेश अंबानी और अनिल अंबानी को किया गया था. यह बात और है कि दोनों भाईयों ने अपनेअपने मुकाम तय किए. ऐसे में संपत्ति का बंटवारा संतानों के बीच हो और उन को पहले से ही इस जिम्मेदारी के लिए तैयार किया जाए. जिस से वह संपत्ति के बोझ में बिखर न जाए.

सामान्य बिजनेस परिवार इसी तरह से अपनी तैयारी करते हैं. पिता के साथ ही साथ बेटा कारोबार संभालने की कला में निपुण हो जाता है. ऐेसे में उस की विरासत बिखरने से बच जाती है. जहां पारिवारिक विवाद सही से सुलझाए नहीं जाते वहां पूरी विरासत बिखर जाती है.

भारत में ऐसे उदाहरण न के बराबर हैं. समाजिक उत्तराधिकार के मामले यहां जरूर दिखते हैं. जिन में उत्तराधिकारी विरासत नहीं संभाल पाएं.
बीकानेर के पूर्व राजघराने की अरबों की संपत्ति को ले कर महाराजा करणी सिंह की बेटी और अंतर्राष्ट्रीय शूटर राज्यश्री कुमारी, करणी सिंह के बेटे नरेंद्र सिंह की बेटी सिद्धि कुमारी के बीच विवाद है. दोनों प्रोपर्टी से जुड़े ट्रस्टों को ले कर अपनाअपना अधिकार जता रही हैं. सिद्धि कुमारी पर होटल चलाने वाली कंपनी ने यह मुकदमा दर्ज कराया है और दूसरा केस बुआ राज्यश्री पर सिद्धि कुमारी के ट्रस्ट की ओर से संपत्ति खुर्द-बुर्द को ले कर कराया गया है. यह सोचना भी सही नहीं है कि अगर संपत्ति ट्रस्ट के नाम कर दी जाएगी तो उस का सही उपयोग हो सकेगा.

राजनीति एक अच्छा उदहारण है जिस में विरासत अपनों को देने से किसी की बनाई पार्टी दशकों तक चल जाती है. कुछ मामलों में उदार बन कर पार्टी दूसरों को दे भी दी तो बिखर ही जाती है. लोग फिर भी बनाने वाले की संतानों के साथ काम करना ज्यादा पसंद करते हैं. परिवार के द्वारा चलाए जा रहे ऐसे दलों की संख्या तो है जिन के वारिस बहुत अच्छा नहीं कर पाए.

इस का बड़ा उदाहरण राष्ट्रीय लोकदल भी है. इस के प्रमुख चौधरी चरण सिंह ने 1929 जिला पंचायत सदस्य का चुनाव निर्विरोध जीत कर राजनीति में अपनी शुरूआत की थी. इस के बाद चौ. चरण सिंह ने छपरौली में अपनी सियासी जमीन तैयार की. छपरौली से चौ. चरण सिंह ने विधायक से ले कर प्रदेश के मुख्यमंत्री और देश के प्रधानमंत्री तक का सफर तय किया. 1986 में चौधरी चरण सिंह के बीमार होने पर चौधरी अजित सिंह आइबीएम कंपनी की कंप्यूटर इंजीनियरिंग की नौकरी छोड़ अमेरिका से भारत लौटे और राज्यसभा सदस्य बन सियासत में सक्रिय हो गए. अगले ही साल 1987 में चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद अजित सिंह ने पिता की राजनीतिक विरासत संभाली.

अजित सिंह अलगअलग केन्द्र सरकारों में मंत्री बनते रहे. वे अपना ठिकाना तो ढूंढ पाए पर किसानों का मुद्दा खो गए. अगर पार्टी किसी और के पास जाती तो इतनी भी नहीं बचती और उस का हाल कम्युनिस्ट पार्टी या प्रजा सोशलिस्ट पार्टी जैसा होता.
इस के विपरीत चौधरी चरण सिंह को अपना राजनीतिक गुरू मानने वाले मुलायम सिंह यादव न केवल खुद 3 बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने बल्कि केन्द्र में मंत्री भी रहे और अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनवाया. 2024 के लोकसभा चुनाव में 37 सीटें जीत कर मुलायम सिंह यादव की निजी सी समाजवादी पार्टी देश की तीसरे नम्बर की सब से बड़ी पार्टी बनी.

आज बहुत सारे राजनीतिक दल ऐसे हैं जो अपने अस्तित्व के लिए परिवार के लोगों को सामने ला रहे हैं. समाजवादी पार्टी में मुलायम सिह यादव ने अपने राजनीतिक जीवन में ही अपने बेटे अखिलेश को पार्टी की बागडोर सौंप दी. अगर 2012 में मुलायम सिंह यादव ने बेटे अखिलेश को राजनीतिक विरासत नहीं सौपी होती तो मुलायम के बाद पार्टी बिखर कर खत्म हो गई होती. बिहार में लालू प्रसाद यादव ने अपने जीवनकाल में ही पूरी पार्टी की बागडोर बेटीबेटों को सौंप दी.

बिहार में ही रामविलास पासवान अपने बेटे चिराग को पार्टी सौपने में देर की तो वहां पर पार्टी दो हिस्सों में बंट गई. रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस और बेटे चिराग पासवान के बीच झगड़ा है. जिस का प्रभाव पार्टी पर पड़ रहा है. वह भाजपा की पिछलग्गू बन कर रह गई है.

बहुजन समाज पार्टी अपने उत्तराधिकारी को तलाश रही है. दलित आन्दोलन से जन्म लेने वाली इस पार्टी के संस्थापक कांशीराम ने मायावती को अपना उत्तराधिकारी बनाया था. जिन का कोई पारिवारिक रिश्ता नहीं था. अब मायावती अपने भतीजे आकाश आनंद को ही राजनीतिक उत्तराधिकारी बना रही है.
कांग्रेस ने राहुल गांधी को उत्तराधिकार देने में मुलायम सिंह यादव वाली समझदारी नहीं दिखाई. अगर 2004 से 2014 के बीच जब केन्द्र में डाक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री थे उसी समय राहुल गांधी को सरकार में कोई बड़ा पद दे देती तो राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ जाती.

भारत का समाज और कानून जैविक उत्तराधिकारी यानि अपनी संतानों को ही संपत्ति देने की सलाह देता है. ऐसे में बेटेबेटियों को ही संपत्ति देने से झगड़े कम हो जाते हैं. अगर ऐसा नहीं हो तो विवाद बढ़ते ही जाते हैं. विवादों में ही संपत्ति बरबाद हो जाती है. राजनीतिक भी परिवार के विरासत जैसी ही हो गई है. जिस के कारण अब नेताओं के बच्चे ही उन के स्वाभाविक उत्तराधिकारी होते जा रहे हैं. सही उत्तराधिकारी ही विरासत को आगे ले कर जा पाता है.

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