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Online Hindi Story : देवरानी की मुहिम

Online Hindi Story : संयुक्त परिवार की छोटी बहू बने हुए रचना को एक महीना ही हुआ था कि उस ने घर के माहौल में अजीब सा तनाव महसूस किया. कुछ दिन तो विवाह की रस्मों व हनीमून में हंसीखुशी बीत गए पर अब नियमित दिनचर्या शुरू हो गई थी. निखिल औफिस जाने लगा था. सासूमां राधिका, ससुर उमेश, जेठ अनिल, जेठानी रेखा और उन की बेटी मानसी का पूरा रुटीन अब रचना को समझ आ गया था. अनिल घर पर ही रहते थे. रचना को बताया गया था कि वे क्रौनिक डिप्रैशन के मरीज हैं. इस के चलते वे कहीं कुछ काम कर ही नहीं पाते थे. उन्हें अकेला नहीं छोड़ा जा सकता था. यह बीमारी उन्हें कहां, कब और कैसे लगी, किसी को नहीं पता था.वे घंटों चुपचाप अपने कमरे में अकेले लेटे रहते थे.

जेठानी रेखा के लिए रचना के दिल में बहुत सम्मान व स्नेह था. दोनों का आपसी प्यार बहनों की तरह हो गया था. सासूमां का व्यवहार रेखा के साथ बहुत रुखासूखा था. वे हर वक्त रेखा को कुछ न कुछ बुराभला कहती रहती थीं. रेखा चुपचाप सब सुनती रहती थी. रचना को यह बहुत नागवार गुजरता. बाकी कसर सासूमां की छोटी बहन सीता आ कर पूरा कर देती थी. रचना हैरान रह गई थी जब एक दिन सीता मौसी ने उस के कान में कहा, ‘‘निखिल को अपनी मुट्ठी में रखना. इस रेखा ने तो उसे हमेशा अपने जाल में ही फंसा कर रखा है. कोई काम उस का भाभी के बिना पूरा नहीं होता. तुम मुझे सीधी लग रही हो पर अब जरा अपने पति पर लगाम कस कर रखना. हम ने अपने पंडितजी से कई बार कहा कि रेखा के चक्कर से बचाने के लिए कुछ मंतर पढ़ दें पर निखिल माना ही नहीं. पूजा पर बैठने से साफ मना कर देता है.’’ रचना को हंसी आ गई थी, ‘‘मौसी, पति हैं मेरे, कोई घोड़ा नहीं जिस पर लगाम कसनी पड़े और इस मामले में पंडित की क्या जरूरत थी?’’

इस बात पर तो वहां बैठी सासूमां को भी हंसी आ गई थी, पर उन्होंने भी बहन की हां में हां मिलाई थी, ‘‘सीता ठीक कह रही है. बहुत नाच लिया निखिल अपनी भाभी के इशारों पर, अब तुम उस का ध्यान रेखा से हटाना.’’ रचना हैरान सी दोनों बहनों का मुंह देखती रही थी. एक मां ही अपनी बड़ी बहू और छोटे बेटे के रिश्ते के बारे में गलत बातें कर रही है, वह भी घर में आई नईनवेली बहू से. फिर वह अचानक हंस दी तो सासूमां ने हैरान होते हुए कहा, ‘‘तुम्हें किस बात पर हंसी आ रही है?’’

‘‘आप की बातों पर, मां.’’

सीता ने डपटा, ‘‘हम कोई मजाक कर रहे हैं क्या? हम तुम्हारे बड़े हैं. तुम्हारे हित की ही बात कर रहे हैं, रेखा से दूर ही रहना.’’ सीता बहुत देर तक उसे पता नहीं कबकब के किस्से सुनाने लगी. रेखा रसोई से निकल कर वहां आई तो सब की बातों पर बे्रक लगा. रचना ने भी अपना औफिस जौइन कर लिया था. उस की भी छुट्टियां खत्म हो गई थीं. निखिल और रचना साथ ही निकलते थे. लौटते कभी साथ थे, कभी अलग. सुबह तो रचना व्यस्त रहती थी. शाम को आ कर रेखा की मदद करने के लिए तैयार होती तो रेखा उसे स्नेह से दुलार देती, ‘‘रहने दो रचना, औफिस से आई हो, आराम कर लो.’’

‘‘नहीं भाभी, सारा काम आप ही करती रहती हैं, मुझे अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘कोई बात नहीं रचना, मुझे आदत है. काम में लगी रहती हूं तो मन लगा रहता है वरना तो पता नहीं क्याक्या टैंशन होती रहेगी खाली बैठने पर.’’ रचना उन का दर्द समझती थी. पति की बीमारी के कारण उस का जीवन कितना एकाकी था. मानसी की भी चाची से बहुत बनती थी. रचना उस की पढ़ाई में भी उस की मदद कर देती थी. 6 महीने बीत गए थे. एक शनिवार को सुबहसुबह रेखा की भाभी का फोन आया. रेखा के मामा की तबीयत खराब थी. रेखा सुनते ही परेशान हो गई. इन्हीं मामा ने रेखा को पालपोस कर बड़ा किया था. रचना ने कहा, ‘‘भाभी, आप परेशान मत हों, जा कर देख आइए.’’

‘‘पर मानसी की परीक्षाएं हैं सोमवार से.’’

‘‘मैं देख लूंगी सब, आप आराम से जाइए.’’

सासूमां ने उखड़े स्वर में कहा, ‘‘आज चली जाओ बस से, कल शाम तक वापस आ जाना.’’

रेखा ने ‘जी’ कह कर सिर हिला दिया था. उस का मामामामी के सिवा कोई और था ही नहीं. मामामामी भी निसंतान थे. रचना ने कहा, ‘‘नहीं भाभी, मैं निखिल को जगाती हूं. उन के साथ कार में आराम से जाइए. यहां मेरठ से सहारनपुर तक बस के सफर में समय बहुत ज्यादा लग जाएगा. जबकि इन के साथ जाने से आप लोगों को भी सहारा रहेगा.’’ सासूमां का मुंह खुला रह गया. कुछ बोल ही नहीं पाईं. पैर पटकते हुए इधर से उधर घूमती रहीं, ‘‘क्या जमाना आ गया है, सब अपनी मरजी करने लगे हैं.’’ वहीं बैठे ससुर ने कहा, ‘‘रचना ठीक तो कह रही है. जाने दो उसे निखिल के साथ.’’ राधिका को और गुस्सा आ गया, ‘‘आप चुप ही रहें तो अच्छा होगा. पहले ही आप ने दोनों बहुओं को सिर पर चढ़ा रखा है.’’ निखिल पूरी बात जानने के बाद तुरंत तैयार हो कर आ गया था, ‘‘चलिए भाभी, मैं औफिस से छुट्टी ले लूंगा, जब तक मामाजी ठीक नहीं होते हम वहीं रहेंगे.’’ रचना ने दोनों को नाश्ता करवाया और फिर प्रेमपूर्वक विदा किया. अनिल बैठे तो वहीं थे पर उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी. दोनों चले गए तो वे भी अपने बैडरूम में चले गए. शनिवार था, रचना की छुट्टी थी. वह मेड अंजू के साथ मिल कर घर के काम निबटाने लगी.

शाम तक सीता मौसी फिर आ गई थीं. उन के पति की मृत्यु हो चुकी थी और अपने बेटेबहू से उन की बिलकुल नहीं बनती थी इसलिए घर में उन का आनाजाना लगा ही रहता था. उन का घर दो गली ही दूर था. दोनों बहनें एकजैसी थीं, एकजैसा व्यवहार, एकजैसी सोच. सीता ने आराम से बैठते हुए रचना से कहा, ‘‘तुम्हें समझाया था न अपने पति को जेठानी से दूर रखो?’’

 

रचना मुसकराई, ‘‘हां मौसी, आप ने समझाया तो था.’’

‘‘फिर निखिल को उस के साथ क्यों भेज दिया?’’

‘‘वहां अस्पताल में मामीजी और भाभी को कोई भी जरूरत पड़ सकती है न.’’

सीता ने माथे पर हाथ मारते हुए कहा, ‘‘दीदी, छोटी बहू को तो जरा भी अक्ल नहीं है.’’

राधिका ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, ‘‘क्या करूं अब? कुछ भी समझा लो, जरा भी असर नहीं है इस पर. बस, मुसकरा कर चल देती है.’’ रचना घर का काम खत्म कर सुस्ताने के लिए लेटी तो सीता मौसी वहीं आ गईं. रचना उठ कर बैठ गई और बोली, ‘‘आओ, मौसी.’’ आराम से बैठते हुए सीता ने पूछा, ‘‘तुम कब सुना रही हो खुशखबरी?’’

‘‘पता नहीं, मौसी.’’

‘‘क्या मतलब, पता नहीं?’’

‘‘मतलब, अभी सोचा नहीं.’’

‘‘देर मत करो, औलाद पैदा हो जाएगी तो निखिल उस में व्यस्त रहेगा. कुछ तो भाभी का भूत उतरेगा सिर से और आज तुम्हें एक राज की बात बताऊं?’’

‘‘हां बताइए.’’

‘‘मैं ने सुना है मानसी निखिल की ही संतान है. अनिल के हाल तो पता ही हैं सब को.’’ रचना भौचक्की सी सीता का मुंह देखती रह गई, ‘‘क्या कह रही हो, मौसी?’’

‘‘हां, बहू, सब रिश्तेदार, पड़ोसी यही कहते हैं.’’ रचना पलभर कुछ सोचती रही, फिर सहजता से बोली, ‘‘छोडि़ए मौसी, कोई और बात करते हैं. अच्छा, चाय पीने का मूड बन गया है. चाय बना कर लाती हूं.’’ सीता हैरानी से रचना को जाते देखती रही. इतने में राधिका भी वहीं आ गई. सीता को हैरान देख बोली, ‘‘क्या हुआ?’’

‘‘अरे, यह तुम्हारी छोटी बहू कैसी है? इसे कुछ भी कह लो, अपनी धुन में ही रहती है.’’ राधिका ने ठंडी सांस लेते हुए कहा, ‘‘हां, धोखा खाएगी किसी दिन, अपनी आंखों से देख लेगी तो आंखें खुलेंगी. हम बड़े अनुभवी लोगों की कौन सुनता है आजकल.’’ रचना ने टीवी देख रहे ससुरजी को एक कप चाय दी, फिर जा कर रेखा के बैडरूम में देखा, अनिल गहरी नींद में था. फिर राधिका और सीता के साथ चाय पीनी शुरू ही की थी कि रचना का मोबाइल बज उठा. निखिल का फोन था. बात करने के बाद रचना ने कहा, ‘‘मां, भाभी के मामाजी को 3-4 दिन अस्पताल में ही रहना पड़ेगा. ये छुट्टी ले लेंगे, भाभी को साथ ले कर ही आएंगे.

‘‘मैं ने भी यही कहा है वहां आप दोनों देख लो, यहां तो हम सब हैं ही.’’ राधिका ने डपटा, ‘‘तुम्हें समझ क्यों नहीं आ रहा. जो रेखा चाहती है निखिल वही करता है. तुम से कहा था न निखिल को उस से दूर रखो.’’

‘‘आप चिंता न करें, मां. मैं देख लूंगी. अच्छा, मानसी आने वाली है, मैं उस के लिए कुछ नाश्ता बना लेती हूं और मैं भाभी के आने तक छुट्टी ले लूंगी जिस से घर में किसी को परेशानी न हो.’’ दोनों को हैरान छोड़ रचना काम में व्यस्त हो गई.

सीता ने कहा, ‘‘इस की निश्चिंतता का आखिर राज क्या है, दीदी? क्यों इस पर किसी बात का असर नहीं होता?’’

‘‘कुछ समझ नहीं आ रहा है, सीता.’’ निखिल और रेखा लौट आए थे. रेखा और रचना स्नेहपूर्वक लिपट गईं. उमेश वहां के हालचाल पूछते रहे. अनिल ने सब चुपचाप सुना, कहा कुछ नहीं. उन का अधिकतर समय दवाइयों के असर में सोते हुए ही बीतता था. उन्हें अजीब से डिप्रैशन के दौरे पड़ते थे जिस में वे कभी चीखतेचिल्लाते थे तो कभी घर से बाहर भागने की कोशिश करते थे. सासूमां को रेखा फूटी आंख नहीं सुहाती थी जबकि वे खुद ही उसे बहू बना कर लाई थीं. बेटे की अस्वस्थता का सारा आक्रोश रेखा पर ही निकाल देती थीं. घर का सारा खर्च निखिल और रचना ही उठाते थे. उमेश रिटायर्ड थे और अनिल तो कभी कोई काम कर ही नहीं पाए थे. उन की पढ़ाई भी बहुत कम ही हुई थी. 3 साल बीत गए, रचना ने एक स्वस्थ व सुंदर पुत्र को जन्म दिया तो पूरे घर में उत्सव का माहौल बन गया. नन्हे यश को सब जीभर कर गोद में खिलाते. रेखा ने ही यश की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली थी. रचना के औफिस जाने पर रेखा ही यश को संभालती थी. कई पड़ोसरिश्तेदार यश को देखने आते रहते और रचना के कानों में मक्कारी से घुमाफिरा कर निखिल और रेखा के अवैध संबंधों की जानकारी का जहर उड़ेलते चले जाते. कुछ औरतें तो यहां तक मजाक में कह देतीं, ‘‘चलो, अब निखिल 2 बच्चों का बाप बन गया.’’

रचना के कानों पर जूं न रेंगती देख सब हैरान हो, चुप हो जाते. रेखा और रचना के बीच स्नेह दिन पर दिन बढ़ता ही गया था. रचना जब भी बाहर घूमने, डिनर पर जाती, रेखा और मानसी को भी जरूर ले जाती. रचना के कानों में सीता मौसी का कथापुराण चलता रहता था, ‘‘देख, तू पछताएगी. अभी भी संभल जा, सब लोग तुम्हारा ही मजाक बना रहे हैं.’’ पर रचना की सपाट प्रतिक्रिया पर राधिका और सीता हैरान हुए बिना भी न रहतीं. वे दोनों कई बार सोचतीं, यह क्या राज है, यह कैसी

औरत है, कौन सी औरत इन बातों पर मुसकरा कर रह जाती है, समझदार है, पढ़ीलिखी है. आखिर राज क्या है उस की इस निश्ंिचतता का? एक साल और बीत रहा था कि एक अनहोनी घट गई. मानसी के स्कूल से फोन आया. मानसी बेहोश हो गई थी. निखिल और रचना तो अपने आौफिस में थे. यश को राधिका के पास छोड़ रेखा तुरंत स्कूल भागी. निखिल और रचना को उस ने रास्ते में ही फोन कर दिया था. मानसी को डाक्टर देख चुके थे. उन्होंने उसे ऐडमिट कर कुछ टैस्ट करवाने की सलाह दी. रेखा निखिल के कहने पर मानसी को सीधा अस्पताल ही ले गई. स्कूल में फर्स्ट ऐड मिलने के बाद वह होश में तो थी पर बहुत सुस्त और कमजोर लग रही थी. निखिल और रचना भी अस्पताल पहुंच गए थे. निखिल ने घर पर फोन कर के सारी स्थिति बता दी थी.

मानसी ने बताया था, सुबह से ही वह असुविधा महसूस कर रही थी. अचानक उसे चक्कर आने लगे थे और वह शायद फिर बेहोश हो गई थी. हैरान तो सब तब और हुए जब उस ने कहा, ‘‘कई बार ऐसा लगता है सिर घूम रहा है, कभी अचानक अजीब सा डिप्रैशन लगने लगता है.’’ रेखा इस बात पर बुरी तरह चौंक गई, रोते हुए बोली, ‘‘रचना, यह क्या हो रहा है मानसी को. अनिल की भी तो ऐसे ही तबीयत खराब होनी शुरू हुई थी. क्या मानसी भी…’’

‘‘अरे नहीं, भाभी, पढ़ाई का दबाव  होगा. कितना तनाव रहता है आजकल बच्चों को. आप परेशान न हों. हम सब हैं न,’’ रचना ने रेखा को तसल्ली दी. मानसी के सब टैस्ट हुए. राधिका और उमेश भी यश को ले कर अस्पताल पहुंच गए थे. सीता मौसी अनिल की देखरेख के लिए घर पर ही रुक गई थीं. रात को निखिल ने सब को घर भेज दिया था. अगले दिन रचना अनिल को अपने साथ ही सुबह अस्पताल ले गई. वहां वे थोड़ी देर मानसी के पास बैठे रहे. फिर असहज से, बेचैनी से उठनेबैठने लगे तो रचना उन्हें वहां से वापस घर ले आई. रेखा मानसी के पास ही थी.

राधिका ने रचना को डपटा, ‘‘अनिल को क्यों ले गई थी?’’

‘‘मां, मानसी की बीमारी का पता लगाने के लिए भैया का डीएनए टैस्ट होना था,’’ कह कर रचना किचन में चली गई. रचना ने थोड़ी देर बाद देखा राधिका और सीता की आवाजें मानसी के कमरे से आ रही थीं. सीता जब भी आती थीं, मानसी के कमरे में ही सोती थीं. रचना दरवाजे तक जा कर रुक गई. सीता कह रही थीं, ‘‘अब पोल खुलने वाली है. रिपोर्ट में सच सामने आ जाएगा. बड़े आए हर समय भाभीभाभी की रट लगाने वाले, आंखें खुलेंगी अब, कब से सब कह रहे हैं पति को संभाल कर रखे. निखिल पिता की तरह ही तो डटा है अस्पताल में.’’ राधिका ने भी हां में हां मिलाई, ‘‘मुझे भी देखना है अब रेखा का क्या होगा. निखिल मेरी भी इतनी नहीं सुनता है जितनी रेखा की सुनता है. इसी बात पर गुस्सा आता रहता है मुझे तो. जब से रेखा आई है, निखिल ने मेरी सुनना ही बंद कर दिया है.’’ बाहर खड़ी रचना का खून खौल उठा. घर की बच्ची की तबीयत खराब है और ये दोनों इस समय भी इतनी घटिया बातें कर रही हैं. अगले दिन मानसी की सब रिपोर्ट्स आ गई थीं. सब सामान्य था. बस, उस का बीपी लो हो गया था.

डाक्टर ने मानसी की अस्वस्थता का कारण पढ़ाई का दबाव ही बताया था. शाम तक डिस्चार्ज होना था, निखिल और रेखा अस्पताल में ही रुके. रचना घर पहुंची तो सीता ने झूठी चिंता दिखाते हुए कहा, ‘‘सब ठीक है न? वह जो डीएनए टैस्ट होता है उस में क्या निकला?’’ यह पूछतेपूछते भी सीता की आंखों में मक्कारी दिखाई दे रही थी. रचना ने आसपास देखा. उमेश कुछ सामान लेने बाजार गए हुए थे. अनिल अपने रूम में थे. रचना ने बहुत ही गंभीर स्वर में बात शुरू की, ‘‘मां, मौसी, मैं थक गई हूं आप दोनों की झूठी बातों से, तानों से. मां, आप कैसे निखिल और भाभी के बारे में गलत बातें कर सकती हैं? आप दोनों हैरान होती हैं न कि मुझ पर आप की किसी बात का असर क्यों नहीं होता? वह इसलिए कि विवाह की पहली रात को ही निखिल ने मुझे बता दिया था कि वे हर हालत में भाभी और मानसी की देखभाल करते हैं और हमेशा करेंगे. उन्होंने मुझे सब बताया था कि आप ने जानबूझ कर अपने मानसिक रूप से अस्वस्थ बेटे का विवाह एक अनाथ, गरीब लड़की से करवाया जिस से वह आजीवन आप के रौब में दबी रहे. निखिल ने आप को किसी लड़की का जीवन बरबाद न करने की सलाह भी दी थी, पर आप तो पंडितों की सलाहों के चक्कर में पड़ी थीं कि यह ग्रहों का प्रकोप है जो विवाह बाद दूर हो जाएगा.

‘‘आप की इस हरकत पर निखिल हमेशा शर्मिंदा और दुखी रहे. भाभी का जीवन आप ने बरबाद किया है. निखिल अपनी देखरेख और स्नेह से आप की इस गलती की भरपाई ही करने की कोशिश  करते रहते हैं. वे ही नहीं, मैं भी भाभी की हर परेशानी में उन का साथ दूंगी और रिपोर्ट से पता चल गया है कि अनिल ही मानसी के पिता हैं. मौसी, आप की बस इसी रिपोर्ट में रुचि थी न? आगे से कभी आप मुझ से ऐसी बातें मत करना वरना मैं और निखिल भाभी को ले कर अलग हो जाएंगे. और इस अच्छेभले घर को तोड़ने की जिम्मेदार आप दोनों ही होगी. हमें शांति से स्नेह और सम्मान के साथ एकदूसरे के साथ रहने दें तो अच्छा रहेगा,’’ कह कर रचना अपने बैडरूम में चली गई. यश उस की गोद में ही सो चुका था. उसे बिस्तर पर लिटा कर वह खुद भी लेट गई. आज उसे राहत महसूस हो रही थी. उस ने अपने मन में ठान लिया था कि वह दोनों को सीधा कर के ही रहेगी. उन के रोजरोज के व्यंग्यों से वह थक गई थी और डीएनए टैस्ट तो हुआ भी नहीं था. उसे इन दोनों का मुंह बंद करना था, इसलिए वह अनिल को यों ही अस्पताल ले गई थी. उसे इस बात को हमेशा के लिए खत्म करना था. वह कान की कच्ची बन कर निखिल पर अविश्वास नहीं कर सकती थी. हर परिस्थिति में अपना धैर्य, संयम रख कर हर मुश्किल से निबटना आता था उसे. लेटेलेटे उसे राधिका की आवाज सुनाई दी, ‘‘अरे, तुम कहां चली, सीता?’’

‘‘कहीं नहीं, दीदी, जरा घर का एक चक्कर काट लूं. फिर आऊंगी और आज तो तुम्हारी बहू की निश्‍चिंतता का राज भी पता चल गया. एक बेटा तुम्हारा बीमार है, दूसरा कुछ ज्यादा ही समझदार है, पहले दिन से ही सबकुछ बता रखा है बीवी को.’’ कहती हुई सीता के पैर पटकने की आवाज रचना को अपने कमरे में भी सुनाई दी तो उसे हंसी आ गई. पूरे प्रकरण की जानकारी देने के लिए उस ने मुसकराते हुए निखिल को फोन मिला दिया था.

 

चंडीगढ़ में चर्चित रहा गृहशोभा एम्पावर हर इवेंट

कलाग्राम चंडीगढ़ में 7 दिसम्बर 2024 को दिन में 11 बजे से दिल्ली प्रेस पब्लिकेशन की तरफ से ‘ गृहशोभा एम्पावर हर ‘ इवेंट शानदार आगाज हुआ. प्रतिभागी  महिलाएं बहुत उत्साह में नजर आ रही थीं. हों भी क्यों न गृहशोभा के साथ जुड़ कर उन्हें प्रेरित होने, सीखने और सशक्त बनने का मौका जो मिल रहा था.

गृहशोभा के द्वारा कराए जा रहे ‘ गृहशोभा एम्पावर हर ‘  इवेंट्स का उद्देश्य महिलाओं को स्वास्थ्य, सौंदर्य और फाइनेंसियल प्लानिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ने में मदद करना है. स्किनकेयर और हेल्थ टिप्स से लेकर स्मार्ट सेविंग आइडियाज से परिचित कराना है. यह कार्यक्रम महिलाओं को अपना सर्वश्रेष्ठ जीवन जीने के लिए सशक्त बनाने के लिए डिज़ाइन किया गया . दिल्ली, मुंबई, अहमदाबाद, लखनऊ और बैंगलोर , लुधियाना जैसे शहरों के बाद यह इवेंट चंडीगढ़ में आयोजित किया गया.

इस इवेंट के सहयोगी प्रायोजक डाबर खजूर प्राश, ब्यूटी पार्टनर ग्रीन लीफ ब्रिहंस , स्किन केयर पार्टनर ला शील्ड और होम्योपैथी पार्टनर SBL होम्योपैथी थे. इवेंट के दौरान इन के द्वारा  कई तरह के सेशन और गेम्स आयोजित किए गए जिन में प्रतिभागियों को गिफ्ट हैंपर्स भी मिले. .

12 बजे तक पूरा हाल भर गया था. महिलाओं का स्वागत स्नैक्स और चाय के साथ हुआ. इसके बाद कार्यक्रम की शुरुआत वंदना ने अपने खूबसूरत अंदाज में किया और पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा से दर्शकों को रूबरू कराया.

फर्स्ट सेशन : वुमन हेल्थ और वेलनेस

सबसे पहले डाबर खजूर प्राश द्वारा लाया गया वुमन हेल्थ और वेलनेस सेशन की शुरुआत हुई. इस के तहत डा. मधु गुप्ता ने महिलाओं में आयरन की कमी पर विस्तार से बात की. महिलाओं में आयरन की कमी एक आम लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली स्वास्थ्य समस्या है. डा. मधु गुप्ता  20 वर्षों से अधिक समय से एक अत्यधिक अनुभवी आयुर्वेदिक डौक्टर हैं जो वर्तमान में शक्ति भवन, पंचकुला में कार्यरत हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश के आरजीजीपीजीए कौलेज से काया चिकित्सा (चिकित्सा) में एमडी और श्री धनवंतरी आयुर्वेदिक कौलेज, चंडीगढ़ से आयुर्वेदिक चिकित्सा में स्नातक की डिग्री हासिल की है. वह जीवनशैली संबंधी बीमारियों और आटोइम्यून बीमारियों के इलाज में माहिर हैं। उन्होंने महिलाओं में आयरन की कमी की समस्या पर बात की और इसे दूर करने के उपाय भी बताए.

महिलाओं के लिए फाइनेंशियल प्लानिंग और इन्वेस्टमेंट सेशन

इस सेशन में एक्सपर्ट थे देवेंद्र गोस्वामी जिन्हें मनी मैनेजमेंट और फाइनेंसियल प्लानिंग में  21 से अधिक वर्षों का अनुभव है. उन के पास SCD गवर्नमेंट कॉलेज से स्नातक की डिग्री और PCTE से फाइनेंसियल प्लानिंग में मास्टर डिग्री है. उन्होंने शीर्ष बैंकों और बड़ी कंपनियों के साथ काम किया है. वे ब्लूरॉक वेल्थ प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक हैं.

उन्होंने बताया कि महिलाओं के लिए पैसे कमाना और उसे मैनेज करना करना सीखना क्यों जरूरी है. अपनी सैलरी का एक हिस्सा बचाना और उसे सही जगह निवेश करना आर्थिक स्वतंत्रता की ओर एक महत्वपूर्ण कदम है. निवेश के लिए ‘म्यूचुअल फंड’ में सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान एसआईपी के माध्यम से हर महीने एक छोटी राशि का निवेश किया जा सकता है.  इसके साथ ही साथ जीवन बीमा और चिकित्सा बीमा का महत्व समझाया. इस तरह महिलाएं आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त कर सकती हैं और अपने जीवन को बेहतर बना सकती हैं.
एसबीएल सेशन

होम्योपैथी के क्षेत्र में पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से बीएचएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट और ग्रीस से विशेषज्ञता के साथ होम्योपैथी में एमडी पूरा करने वाली डॉ. श्वेता गोयल 5 वर्षों से अधिक समय से होम्योपैथी के माध्यम से पुरानी बीमारियों के रोगियों का इलाज कर रही हैं और बीमारियों को जड़ से ठीक करने पर ध्यान केंद्रित कर रही हैं। वह पंजाब में दो क्लीनिक चलाती हैं. डॉ श्वेता ने महिलाओं को रजोनिवृत्ति यानी मेनोपॉज से जुड़ी महत्वपूर्ण स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारियां दीं और बताया कि इस दौरान आने वाली समस्याओं में होम्योपैथी किस तरह कारगर है.

ला शील्ड द्वारा ब्यूटी और स्किन केयर सेशन

इस सेशन के लिए ब्यूटी और स्किन केयर के क्षेत्र में एक्सपर्ट डॉ. बेट्टी नांगिया( बेट्टी होलिस्टिक और स्किन केयर की संस्थापक) ने महिलाओं को जरुरी जानकारियां दीं। डॉ. बेट्टी ने प्राकृतिक रूप से चमकदार, स्वस्थ त्वचा पाने के टिप्स दिए.

इस के साथ इवेंट अपने अंतिम चरण में पहुँच गया. महिलाओं ने भोजन का आनंद लेने के बाद पंजीकरण डेस्क से अपने गुडी बैग लिए और शानदार दिन बिता कर अपने घरों को चली गई .

Story in Hindi : क्यों, आखिर क्यों

Story in Hindi : आज लगातार 7वें दिन भी जब मालती काम पर नहीं आई तो मेरा गुस्सा सातवां आसमान छू गया, खुद से बड़बड़ाती हुई बोली, ‘क्या समझती है वह अपनेआप को? उसे नौकरानी नहीं, घर की सदस्य समझा है. शायद इसीलिए वह मुझे नजरअंदाज कर रही है…आने दो उसे…इस बार मैं फैसला कर के ही रहूंगी…यदि वह काम करना चाहे तो सही ढंग से करे वरना…’ अधिक गुस्से के चलते मैं सही ढंग से सोच भी नहीं पा रही थी.

मालती बेहद विश्वासपात्र औरत है. उस के भरोसे घर छोड़ कर आंख मूंद कर मैं कहीं भी आजा सकती हूं. मेरी बच्चियों का अपनी औलाद की तरह ही वह खयाल रखती है. फिर यह सोच कर मेरा हृदय उस के प्रति थोड़ा पसीजा कि कोई न कोई उस की मजबूरी जरूर रही होगी वरना इस से पहले उस ने बिना सूचित किए कभी लंबी छुट्टी नहीं ली.

मेरे मन ने मुझे उलाहना दिया, ‘राधिका, ज्यादा उदार मत बन. तू भी तो नौकरी करती है. घर और दफ्तर के कार्यों के बीच सामंजस्य बनाए रखने की हरसंभव कोशिश करती है. कई बार मजबूरियां तेरे भी पांव में बेडि़यां डाल कर तेरे कर्तव्य की राह को रोकती हैं…पर तू तो अपनी मजबूरियों की दुहाई दे कर दफ्तर के कार्य की अवहेलना कभी नहीं करती?’

दफ्तर से याद आया कि मालती के कारण मेरी भी 7 दिन की छुट्टी हो गई है. बौस क्या सोचेंगे? पहले 2 दिन, फिर 4 और अब 7 दिन के अवकाश की अरजी भेज कर क्या मैं अपनी निर्णय न ले पाने की कमजोरी जाहिर नहीं कर रही हूं?

तभी धड़ाम की आवाज के साथ ऋचा की चीख सुन कर मैं चौंक गई. मैं बेडरूम की ओर भागी. डेढ़ साल की ऋचा बिस्तर से औंधेमुंह जमीन पर गिर पड़ी थी. मैं ने जल्दीजल्दी उसे बांहों में उठाया और डे्रसिंग टेबल की ओर लपकी. जमीन से टकरा कर ऋचा के माथे की कोमल त्वचा पर गुमड़ उभर आया था. दर्द से रो रही ऋचा के घाव पर मरहम लगाया और उसे चुप कराने के लिए अपनी छाती से लगा लिया. मां की ममता के रसपान से सराबोर हो कर धीरेधीरे वह नींद के आगोश में समा गई.

फिर मुझे मालती की याद आ गई जिस की सीख की वजह से ही तो मैं अपनी दोनों बेटियों को स्तनपान का अधिकार दे पाई थी वरना मैं ने तो अपना फिगर बनाए रखने की दीवानगी में बच्चियों को अपनी छाती से लगाया ही न होता…सोच कर मेरी आंखों से 2 बूंदें कब फिसल पड़ीं, मैं जान न पाई.

ऋचा को बिस्तर पर लिटा कर मैं अपने काम में उलझ गई. हाथों के बीच तालमेल बनाती हुई मेरी विचारधारा भी तेजी से आगे बढ़ने लगी.

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मां से ही जाना था कि जब मेरा जन्म हुआ था तब मां के सिर पर कहर टूट पड़ा था. रंग से तनिक सांवली थीं. अत: दादीजी को जब पता चला कि बेटी पैदा हुई है तो यह कह कर देखने नहीं गईं कि लड़की भी अपनी मां जैसी काली होगी, उसे क्या देखना? चाचीजी ने जा कर दादी को बताया, ‘मांजी, बच्ची एकदम गोरीचिट्टी, बहुत ही सुंदर है, बिलकुल आप पर गई है…सच…आप उसे देखेंगी तो अपनेआप को भूल जाएंगी.’

‘फिर भी वह है तो लड़की की जात…घर आएगी तब देख लूंगी,’ दादी ने घोषणा की थी.

मेरे भैया उम्र में मुझ से 3 साल बड़े थे…सांवले थे तो क्या? आगे चल कर वंश का नाम बढ़ाने वाले थे…अत: उन का सांवला होना क्षम्य था.

ज्योंज्यों मैं बड़ी होती गई, त्योंत्यों मेरी और भैया की परवरिश में भेदभाव किया जाने लगा. उन के लिए दूध, फल, मेवा, मिठाई सबकुछ और मेरे लिए सिर्फ दालचावल. यह दादी की सख्त हिदायत थी. वह मानती थीं कि लड़कियां बड़ी सख्त जान होती हैं, ऐसे ही बड़ी हो जाती हैं. लड़के नाजुक होते हैं, उन की परवरिश में कोई कमी नहीं होनी चाहिए. आखिर वही हमारे परिवार की शान में चार चांद लगाते हैं. बेटियां तो पराया धन होती हैं… कितना भी खिलाओपिलाओ, पढ़ाओ- लिखाओ…दूसरे घर की शोभा और वंश को आगे बढ़ाती हैं.

मम्मी और चाचीजी दोनों ही गांव की उच्चतर माध्यमिक पाठशाला में शिक्षिका थीं. वे सुबह 11 बजे जातीं और शाम साढ़े 6 बजे लौटतीं. मेरी देखभाल के लिए कल्याणी को नियुक्त किया गया था, लेकिन दादी उस से घर का काम करवातीं. बहुत छोटी थी तब भी मुझे एक कोने में पड़ा रहने दिया जाता. कई बार कपड़े गीले होते…पर कल्याणी को काम से इतनी फुर्सत ही नहीं मिलती कि वह मेरे गीले कपड़े बदल दे. एक बार इसी वजह से मैं गंभीर रूप से बीमार भी हो गई थी. बुखार का दिमाग पर असर हो गया था. मौत के मुंह से मुश्किल से बहार आई थी.

इस हादसे की बदौलत ही मम्मी को पता चला था कि दादी के राज में मेरे साथ क्या अन्याय किया जा रहा था. तब मां दादी से नजरें बचा कर एक कोने में छिप कर खूब रोई थीं…पापा 1 महीने के दौरे पर से जब लौटे तब मां ने उन्हें सबकुछ बता दिया. अपनी बच्ची के प्रति मां द्वारा किए गए अन्याय ने उन्हें बहुत दुख पहुंचाया था किंतु मम्मीपापा के संस्कारों ने उन्हें दादी के खिलाफ कुछ भी करने की इजाजत नहीं दी.

कुछ समय बाद पता चला कि मां ने सूरत के केंद्रीय विद्यालय में अर्जी दी थी. साक्षात्कार के बाद उन का चयन हो जाने पर पापा ने भी अपना तबादला सूरत करवा लिया. मैं मम्मी के साथ उन के स्कूल जाने लगी और भैया अन्य स्कूल में.

दादी मां द्वारा खींची गई बेटेबेटी की भेद रेखा ने मुझे इतना विद्रोही बना दिया था कि मैं अपने को लड़का ही समझने लगी थी. शहर में आ कर मैं ने मर्दाना पहनावा अपना लिया. मेरी मित्रता भी लड़कों से अधिक रही.

मम्मी कहतीं, ‘बेटी, तुम लड़की बन कर इस संसार में पैदा हुई हो और चाह कर भी इस हकीकत को झुठला नहीं सकतीं. मेरी बच्ची, इस भ्रम से बाहर आओ और दुनिया को एक औरत की नजर से देखो. तुम्हें पता चल जाएगा कि दुनिया कितनी सुंदर है. सच, दादी की उस एक गलती की सजा तुम अपनेआप को न दो, अभी तो ठीक है, लेकिन शादी के बाद तुम्हारे यही रंगढंग रहे तो मुझे डर है कि पुन: तुम्हें कहीं मायका न अपनाना पड़े.’

मम्मी के लाख समझाने के बावजूद मैं चाह कर भी अपनेआप को बदल नहीं पाती. सौभाग्य से मुझे वेदांत मिले जिन्हें सिर्फ मुझ से प्यार है, मेरी जिद से उन्हें कोई सरोकार नहीं. उन्होंने कभी मेरे लाइफ स्टाइल पर एतराज जाहिर नहीं किया.

टेलीफोन की घंटी कानों में पड़ते ही मैं फिर वर्तमान में आ पहुंची. दूसरी तरफ अंजलि भाभी थीं. उन्होंने बताया कि तेजस लोकल टे्रन से गिर गया था. इलाज के लिए उसे अस्पताल में दाखिल करवाया गया है. मैं ने उसी वक्त वेदांत को एवं आलोक भैया को फोन द्वारा सूचित तो कर दिया लेकिन मैं अजीब उलझन में पड़ गई. न तो मैं ऋचा को अकेली छोड़ कर जा सकती थी और न ही उसे अस्पताल ले जाना मेरे लिए ठीक रहता. अब क्या करूं…एक बार फिर मुझे मालती की याद आ गई…उफ, इस औरत का मैं क्या करूं?

डोरबेल बजने पर जब मैं ने दरवाजा खोला तो दरवाजे के बाहर मालती को खड़ा पाया. उसे सामने देख कर मेरा सारा गुस्सा हवा हो गया क्योंकि उस की सूजी हुई आंखें और चेहरे पर उंगलियों के निशान देख कर मैं समझ गई कि वह फिर अपने पति के जुल्म का शिकार हुई होगी.

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‘‘क्या हुआ, मालती? तुम्हारे चेहरे पर हवाइयां क्यों उड़ रही हैं?’’ लगातार रो रही मालती उत्तर देने की स्थिति में कहां थी. मैं ने भी उसे रोने दिया.

मालती ने रोना बंद कर बताना शुरू किया, ‘‘भाभी, मैं तुम से माफी मांगती हूं. बंसी ने मुझे इतना पीटा कि मैं 3 दिन तक बिस्तर से उठ नहीं पाई.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ मुझे रहरह कर उस के पति पर गुस्सा आ रहा था. मन कर रहा था कि उसे पुलिस के हवाले कर दूं. पर अभी तो अस्पताल जाना ज्यादा जरूरी है.

‘‘मालती, मेरे खयाल से तुम काफी थकी हुई लग रही हो. थोड़ी देर आराम कर लो. मुझे अभी अस्पताल जाना है,’’ मैं ने उसे संक्षेप में सब बता दिया और बोली, ‘‘मेरे लौटने तक तुम्हें यहीं रुकना पड़ेगा. हम बाद में बात करेंगे…करिश्मा स्कूल से आए तो उस के लिए नाश्ता बना देना.’’

मैं अस्पताल पहुंची. मुझे देखते ही अंजलि मेरे कंधे से लग कर बेतहाशा रोने लगी. मेरी भी आंखें छलछला आईं. मेडिकल कालिज का मेधावी छात्र, लेकिन पिछले 6 महीनों से दूरदर्शन के एक मशहूर धारावाहिक में प्रमुख किरदार निभा रहा था. अभी तो उस के कैरियर की शुरुआत हुई थी, लोग उसे जानने, पहचानने और सराहने लगे थे कि शूटिंग से लौटते वक्त लोकल टे्रन से गिर कर ब्रेन हैमरेज का शिकार

हो गया. मां, पिताजी और मैं भाभी

को संभालतेसंभालते खुद भी हिम्मत हारने लगे थे. सभी एकदूसरे को

ढाढ़स बंधाने का असफल प्रयास कर रहे थे.

काफी रात हो चुकी थी. बच्चोें के कारण मुझे बेमन से घर जाना पड़ा. मालती की गोद में ऋचा तथा होम वर्क के दिए गए गणित के समीकरण को सुलझाने का प्रयास करती हुई करिश्मा को देख मेरी आंखें भर आईं.

मैं निढाल सी सोफे पर लेट गई. मेरे दिल और दिमाग पर तेजस की घटना की गहरी छाप पड़ी थी. थोड़े समय बाद जब कुछ सामान्य हुई तो यह सोच कर कि आज जितने हादसों से साक्षात्कार हो जाए अच्छा होगा, कम से कम, कल का सूरज आशाओं की कुछ किरणें हमारे उदास आंचल में डालने को आ जाए. यही सोच कर मैं ने मालती से उस की दर्दनाक व्यथा सुनी.

‘‘भाभी, मैं चौथी बार पेट से हूं. बंसी मेरे पीछे पड़ गया है कि मैं जांच करवा लूं और लड़की हो तो गर्भपात करा दूं. मैं इस के लिए तैयार नहीं हूं, इस बात पर वह मुझे मारतापीटता और धमकाता है कि अगर इस बार लड़की हुई तो मुझे घर से निकाल देगा, वह जबरदस्ती मुझे सरकारी अस्पताल भी ले गया था लेकिन डाक्टर ने उसे खूब डांटा, धमकाया कि औरत पर जुल्म करेगा, जांच के लिए जबरदस्ती करेगा तो पुलिस में सौंप दूंगी क्योंकि गर्भपरीक्षण कानूनी अपराध होता है. मैं ने तो उसे साफ बोल दिया कि वह मुझे मार भी डालेगा तो भी मैं गर्भपात नहीं कराऊंगी.’’

‘‘तो क्या तुम यों ही मार खाती रहोगी? इस तरह तो तुम मर जाओगी.’’

‘‘नहीं, भाभी, मैं ने उस को बोल दिया कि बेटा हुआ तो तुम्हारा नसीब वरना मैं अपनी चारों बच्चियों को ले कर कहीं चली जाऊंगी. हाथपैर सलामत रहे तो काम कहीं भी मिलेगा, वैसे भी बंसी तो सिर्फ नाम का पति है, वह कहां बाप होने का धर्म निभाता है? उस को भी तो मैं ही पालती हूं. मैं मां हूं और मां की नजर सिर्फ अपने बच्चे को देखती है, बेटी, बेटे का भेद नहीं. फिर लड़का या लड़की पैदा करना क्या मेरे हाथ में है?’’

कितनी कड़वी मगर सच्ची बात कह दी इस अनपढ़ औरत ने. एक मां अपने बच्चे के लिए बड़ी से बड़ी कुरबानी दे सकती है पर शायद यह पुरुष प्रधान भारतीय समाज की मानसिकता है कि वंश को आगे बढ़ाने के लिए और अर्थी को कांधा देने के लिए बेटे की जरूरत होती है…अत: अगर परिवार में बेटा न हो तो परिवार को अधूरा माना जाता है.

मेरी दादी मां क्यों औरत की कदर करना नहीं जानतीं? वह क्यों भूल गईं कि वह खुद भी एक औरत ही हैं? दादी की याद आते ही मेरा हृदय कड़वाहट से भर उठा. लेकिन अगले ही पल मेरे मन ने मुझे टोका कि तू खुद भी संकुचित मानसिकता में दादी मां से कम है क्या? अगर मालती चौथी बार मां बनने वाली है तो तेरे उदर में भी तो तीसरा बच्चा पल रहा है. तीसरी बार गर्भधारण के पीछे तेरा कौन सा गणित काम कर रहा है…? 2 बेटियों की मां बन कर तू खुश नहीं? क्या जानेअनजाने तेरे मन में भी बेटा पाने की लालसा नहीं पनप रही?

मैं सिर से पैर तक कांप उठी. यह मैं क्या करने जा रही हूं? दादी को कोसने से मेरा यह अपराधबोध क्या कम हो जाएगा? नहीं, कदापि नहीं. उसी वक्त मैं ने फैसला ले लिया कि तीसरे बच्चे के बाद मैं आपरेशन करवा लूंगी. यह फैसला करते ही मेरे दिमाग की तंग नसें धीरेधीरे सामान्य होती चली गईं.

चैन से सो रही मालती के चेहरे पर निर्दोष मुसकान खेल रही थी. जल्द ही मैं भी नींद के आगोश में समा गई. सुबह जब आंख खुली तब मैं अपने को हलका महसूस कर रही थी.

मालती पहले ही उठ कर घर के कामों को पूरा कर रही थी. उस ने करिश्मा को नाश्ता बना कर दे दिया था और वह स्कूल जाने को तैयार थी.

मैं ने करिश्मा के कपोल चूमते हुए उसे विश किया तो लगा कि वह कुछ बुझीबुझी सी थी.

‘‘क्यों बेटी, क्या आप की तबीयत ठीक नहीं?’’

‘‘नहीं मम्मी, ऐसी कोई बात नहीं.’’

‘‘मम्मी आप के चेहरे की हर रेखा पढ़ सकती है, बेटा, जरूर कोई बात है… मुझ से नहीं कहोगी?’’ सोफे पर बैठ कर मैं ने उसे अपनी गोद में खींच लिया.

ममता भरा स्पर्श पा कर उस की आंखें भर आईं. मैं ने सोचा शायद पढ़ाई में कोई मुश्किल सवाल रहा होगा, जिस का हल वह नहीं ढूंढ़ पा रही होगी.

‘‘बेटा, क्या मैं आप की कोई मदद कर सकती हूं?’’

‘‘नो, थैंक्स मम्मा,’’ उस के शब्द गले में ही अटक गए.

‘‘चलो, मैं प्रियंका को फोन कर देती हूं. वह आप की समस्या का कोई हल ढूंढ़ पाएगी, क्या उस से झगड़ा हुआ है?’’ मैं फोन की ओर बढ़ी, ‘‘उसे मैं कह देती हूं कि वह जल्दी आ जाए ताकि मैं आप दोनों को स्कूल में ड्राप कर दूं.’’

‘‘मम्मा,’’ वह चीख उठी, ‘‘प्रियंका अभी नहीं आ सकेगी.’’

‘‘क्यों…?’’ मुझे धक्का लगा.

‘‘सौरी, मम्मा,’’ वह धीरे से बोली, ‘‘प्रियंका लाइफ लाइन अस्पताल में है.’’

आश्चर्य का इतना तेज झटका मैं ने महसूस किया कि मैं संभल नहीं पाई, ‘‘क्या हुआ है उसे?’’

हमारे पड़ोस में ही निर्मल परिवार रहता है जिन की बड़ी बेटी प्रियंका  करिश्मा की खास सहेली है. दोनों एकसाथ 7वीं कक्षा में पढ़ती हैं.

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पता चला कि प्रियंका ने मिट्टी का तेल छिड़क कर खुद को जलाने की कोशिश की थी जिस में उस का 80 प्रतिशत बदन आग की लपेट में आ गया था. मेरा दिमाग सुन्न हो गया. मेरी नजरों के सामने प्रियंका का चेहरा उभर आया. इतनी कम उम्र और इतना भयानक कदम…? इतना सारा साहस उस फू ल सी बच्ची ने कहां से पाया होगा? न जाने किस पीड़ादायी अनुभव से वह गुजर रही होगी जिस से छुटकारा पाने के लिए उस ने यह अंतिम कदम उठाया होगा? लगातार रोए जा रही करिश्मा को बड़ी मुश्किल से चुप करा कर उसे स्कूल के गेट तक छोड़ दिया. फिर मैं प्रियंका को देखने अस्पताल के लिए चल पड़ी.

अस्पताल के गेट पर ही मुझे मेरी एक अन्य पड़ोसिन ईराजी मिल गईं. उन से जो हकीकत पता चली उसे जान कर तो मेरे रोंगटे खड़े हो गए, कल्पना से परे एक हकीकत जिसे सुन कर पत्थर दिल इनसान का भी कलेजा फट जाएगा.

प्रियंका की मम्मी को एक के बाद एक कर के 4 बेटियां हुईं. जाहिर है, इस के पीछे बेटा पाने की भारतीय मानसिकता काम कर रही होगी. धिक्कार है ऐसी घटिया सोच के साथ जीने वाले लोगों को…मेरे समग्र बदन में नफरत की तेज लहर दौड़ गई.

उन की आर्थिक स्थिति कुछ ठीक नहीं चल रही थी. इस महंगाई के दौर में 4 बेटियां और आने वाली 5वीं संतान की, सही ढंग से परवरिश कर पाना उन के लिए मुश्किल था. ऐसे में राजनजी के किसी मित्र ने उन की चौथी बेटी सोनिया को गोद लेने का प्रस्ताव रखा, जिसे उन्होंने मान लिया. क्या सोच कर उन्होंने ऐसा निर्णय किया यह तो वही जानें लेकिन प्रियंका इस बात के लिए हरगिज तैयार नहीं थी. उस ने साफ शब्दों में मम्मीपापा से कह दिया था कि यदि उन्होंने सोनिया को किसी और को सौंपने की बात सोची भी  तो वह उन्हें माफ नहीं करेगी.

प्रियंका बेहद समझदार और संवेदनशील बच्ची थी. वह उम्र से कुछ पहले ही पुख्ता हो चुकी थी. घर के उदासीन माहौल ने उसे कुछ अधिक ही संजीदा बना दिया था. बचपन की अल्हड़ता और मासूमियत, जो इस उम्र में आमतौर पर पाई जाती है, उस के वजूद से कब की गायब हो चुकी थी.

अपने को आग की लपटों के हवाले करने से पहले उस ने अपने हृदय की सारी पीड़ा शब्दों के माध्यम से बेजान कागज के पन्ने पर उड़ेल दी थी, अपने खून से लिखी उस चिट्ठी ने सब का दिल दहला दिया :

‘‘श्रद्धेय मम्मीपापा, अब मुझे माफ कर दीजिए, मैं आप सब को छोड़ कर जा रही हूं. वैसे मैं आप के कंधों से अपनी जिम्मेदारी का कुछ बोझ हलका किए जा रही हूं ताकि आप के कमजोर कंधे सोनिया का बोझ उठाने में सक्षम बन सकें. अपनी तीनों बहनों को मैं अपनी जान से भी ज्यादा चाहती हूं. किसी को भी परिवार से अलग होते हुए मैं नहीं देख पाऊंगी. सोनिया न रहे उस से अच्छा है कि मैं ही न रहूं…अलविदा.’’

आप की लाड़ली बेटी,

प्रियंका.’’

4 दिन तक जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करती हुई प्रियंका आखिर हार गई और जिंदगी का दामन छोड़ कर वह मौत के आगोश में हमेशा के लिए समा गई पर वह मर कर भी एक मिसाल बन गई. उस की कुरबानी ने हमारे परंपरागत, दकियानूसी समाज पर हमेशा के लिए कलंक का टीका लगा दिया, जिसे अपने खून से भी हम कभी न मिटा पाएंगे.

प्रियंका की मौत के ठीक एक हफ्ते बाद मेरे भतीजे तेजस ने भी बेहोशी की हालत में ही दम तोड़ दिया. तेजस हमारे परिवार का एकमात्र जीवन ज्योति था, जो अपनी उज्ज्वल कीर्ति द्वारा हमारे परिवार को समृद्धि के उच्च शिखर पर पहुंचाता. हमारे समाज के फलक पर रोशन होने वाला सूर्य अचानक ही अस्त हो गया फिर कभी उदित न होने के लिए.

दिनरात मेरी नजर के सामने उन दोनों के हंसते हुए मासूम चेहरे छाए रहते. हर पल अपनेआप से मैं एक ही सवाल करती, क्यों? आखिर क्यों ऐसा होता है जिसे हम चाह कर भी स्वीकार नहीं कर पाते? उन की मौत क्या हमारे समाज के लिए संशोधन का विषय नहीं?

दादीमां की पीढ़ी से ले कर प्रियंका के बीच कितने सालों का अंतराल है? दादीमां 85 वर्ष की हो चली हैं. तेजस सिर्फ 20 वसंत ही देख पाया और प्रियंका सिर्फ 12. इस लंबे अंतराल में क्या परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं थी?

दादीमां औरत थीं फिर भी मानती थीं कि संसार पुरुष से ही चलता है. हर नीतिनियम, रीतिरिवाज सिर्फ पुरुष के दम से है फिर मालती का पति तो पुरुष है. उस का यह मानना लाजमी ही था कि जो पुरुष बेटा न पैदा कर पाए वह नामर्द होता है. प्रियंका के मातापिता भी तो इसी मानसिकता का शिकार हैं कि वंश की शान और नाम आगे बढ़ाने के लिए बेटा जरूरी है. क्या सोनिया की जगह अगर उन्होंने बेटा पैदा किया होता तो उसे किसी और की गोद में डालने की बात सोच सकते थे? या उस के बाद और बच्चा पैदा करने की जरूरत को स्वीकार कर पाते? नहीं, कभी नहीं….

भला हो मालती का जिस ने मेरी आंखें खोल दीं वरना जानेअनजाने मैं भी इन तमाम लोगों की तरह ही सोचती रह जाती. अपनी कुंठित मान्यताओं के भंवर से बाहर निकालने वाली मालती का मैं जितना शुक्रिया अदा करूं कम ही है.

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तेजस की अकाल मौत ने दादी मां को यह सोचने पर मजबूर किया कि जिस कुलदीपक की चाह में उन्होंने अतीत में एक मासूम बच्ची के साथ अन्याय किया था उस कुलदीपक की जीवन ज्योति को अकाल ही बुझा कर नियति ने उन की करनी की सजा दी थी.

प्रियंका भी पुकारपुकार कर पूछ रही है, हर नारी और हर पुरुष यही सोचे और चाहे कि उन के घर बेटा ही पैदा हो तो भविष्य में कहां से लाएंगे हम वह कोख जो बेटे को पैदा करती है?

Hindi Story : कैसी दूरियां

Hindi Story :  आधी रात का गहरा सन्नाटा. दूर कहीं थोड़ीथोड़ी देर में कुत्तों के भूंकने की आवाजें उस सन्नाटे को चीर रही थीं. ऐसे में भी सभी लोग नींद के आगोश में बेसुध सो रहे थे.

अगर कोई जाग रहा था, तो वह शीला थी. उसे चाह कर भी नींद नहीं आ रही थी. पास में ही रवि सो रहे थे.

शीला को रहरह कर रवि पर गुस्सा आ रहा था. वह जाग रही थी, मगर वे चादर तान कर सो रहे थे. रवि के साथ शीला की शादी के15 साल गुजर गए थे. वह एक बेटे और एक बेटी की मां बन चुकी थी.

शादी के शुरुआती दिन भी क्या दिन थे. वे सर्द रातों में एक ही रजाई में एकदूसरे से चिपक कर सोते थे. न किसी का डर था, न कोई कहने वाला. सच, उस समय तो नौजवान दिलों में खिंचाव हुआ करता था.

शीला ने तब रवि के बारे में सुना था कि जब वे कुंआरे थे, तब आधीआधी रात तक दोस्तों के साथ गपशप किया करते थे.

तब रवि की मां हर रोज दरवाजा खोल कर डांटते हुए कहती थीं, ‘रोजरोज देर से आ कर सोने भी नहीं देता. अब शादी कर ले, फिर तेरी घरवाली ही दरवाजा खोलेगी.’रवि जवाब देने के बजाय हंस कर मां को चिढ़ाया करते थे.

जैसे ही रवि के साथ शीला की शादी हुई, दोस्तों से दोस्ती टूट गई. जैसे ही रात होती, रवि चले आते उस के पास और उस के शरीर के गुलाम बन जाते. भंवरे की तरह उस पर टूट पड़ते. उन दिनों वह भी तो फूल थी. मगर शादी के सालभर बाद जब बेटा हो गया, तब खिंचाव कम जरूर पड़ गया.

धीरेधीरे शरीर का यह खिंचाव खत्म तो नहीं हुआ, मगर मन में एक अजीब सा डर समाया रहता था कि कहीं पास सोए बच्चे जाग न जाएं. बच्चे जब बड़े हो गए, तब वे अपनी दादी के पाससोने लगे.

अब भी बच्चे दादी के पास ही सो रहे हैं, फिर भी रवि का शीला के प्रति वह खिंचाव नहीं रहा, जो पहले हुआ करता था. माना कि रवि उम्र के ढलते पायदान पर है, लेकिन आदमी की उम्र जब 40 साल की हो जाती है, तो वह बूढ़ा तो नहीं कहलाता है.

बिस्तर पर पड़ेपड़े शीला सोच रही थी, ‘इस रात में हम दोनों के बीच में कोई भी तो नहीं है, फिर भी इन की तरफ से हलचल क्यों नहीं होती है? मैं बिस्तर पर लेटीलेटी छटपटा रही हूं, मगर ये जनाब तो मेरी इच्छा को समझ ही नहीं पा रहे हैं.

‘उन दिनों जब मेरी इच्छा नहीं होती थी, तब ये जबरदस्ती किया करते थे. आज तो हम पतिपत्नी के बीच कोई दीवार नहीं है, फिर भी क्यों नहीं पास आते हैं?’

कैसी दूरियां शीला ने सुन ही नहीं रखा है, बल्कि ऐसे भी तमाम उदाहरण देखे हैं कि जिस आदमी से औरत की ख्वाहिश पूरी नहीं होती है, तब वह औरत दूसरे मर्द के ऊपर डोरे डालती है और अपने खूबसूरत अंगों से उन्हें पिघला देती है. फिर रवि के भीतर का मर्द क्यों मर गया है?

मगर शीला भी उन के पास जाने की हिम्मत क्यों नहीं कर पा रही है? वह क्यों उन की चादर में घुस नहीं जाती है? उन के बीच ऐसा कौन सा परदा है, जिस के पार वह नहीं जा सकती है?

तभी शीला ने कुछ ठाना और वह रवि की चादर में जबरदस्ती घुस गई. थोड़ी देर में उसे गरमाहट जरूर आ गई, मगर रवि अभी भी बेफिक्र हो कर सो रहे थे. वे इतनी गहरी नींद में हैं कि कोई चिंता ही नहीं.

शीला ने धीरे से रवि को हिलाया. अधकचरी नींद में रवि बोले, ‘‘शीला, प्लीज सोने दो.’’

‘‘मुझे नींद नहीं आ रही है,’’ शीला शिकायत करते हुए बोली.

‘‘मुझे तो सोने दो. तुम सोने की कोशिश करो. नींद आ जाएगी तुम्हें,’’ रवि नींद में ही बड़बड़ाते हुए बोले और करवट बदल कर फिर सो गए.

शीला ने उन्हें जगाने की कोशिश की, मगर वे नहीं जागे. फिर शीला गुस्से में अपनी चादर में आ कर लेट गई, मगर नींद उस की आंखों से कोसों दूर जा चुकी थी.

सुबह जब सूरज ऊपर चढ़ चुका था, तब तक शीला सो कर नहीं उठी थी. उस की सास भी घबरा गईं. सब से ज्यादा घबराए रवि.

मां रवि के पास आ कर बोलीं, ‘‘देख रवि, बहू अभी तक सो कर नहीं उठी. कहीं उस की तबीयत तो खराब नहीं हो गई?’’

रवि बैडरूम की तरफ लपके. देखा कि शीला बेसुध सो रही थी. वे उसे झकझोरते हुए बोले, ‘‘शीला उठो.’’

‘‘सोने दो न, क्यों परेशान करते हो?’’ शीला नींद में ही बड़बड़ाई.

रवि को गुस्सा आ गया और उन्होंने पानी का एक गिलास भर कर उस के मुंह पर डाल दिया.शीला घबराते हुए उठी और गुस्से से बोली, ‘‘सोने क्यों नहीं दिया मुझे? रातभर नींद नहीं आई. सुबह होते ही नींद आई और आप ने उठा दिया.’’

‘‘देखो कितनी सुबह हो गई?’’ रवि चिल्ला कर बोले, तब आंखें मसल कर उठते हुए शीला बोली, ‘‘खुद तो ऐसे सोते हो कि रात को उठाया तो भी न उठे और मुझे उठा दिया,’’ इतना कह कर वह बाथरूम में घुस गई.यह एक रात की बात नहीं थी. तकरीबन हर रात की बात थी.मगर रवि में पहले जैसा खिंचाव क्यों नहीं रहा? या उस से उन का मन भर गया? ऐसा सुना भी है कि जिस मर्द का अपनी औरत से मन भर जाता है, फिर उस का खिंचाव दूसरी तरफ हो जाता है. कहीं रवि भी… नहीं उन के रवि ऐसे नहीं हैं.

सुना है कि महल्ले के ही जमना प्रसाद की पत्नी माधुरी का चक्कर उन के ही पड़ोसी अरुण के साथ चल रहा है. यह बात पूरे महल्ले में फैल चुकी थी. जमना प्रसाद को भी पता थी, मगर वे चुप रहा करते थे.

रात का सन्नाटा पसर चुका था. रवि और शीला बिस्तर में थे. उन्होंने चादर ओढ़ रखी थी.रवि बोले, ‘‘आज मुझे थोड़ी ठंड सी लग रही है.’’

‘‘मगर, इस ठंड में भी आप तो घोडे़ बेच कर सोते रहते हो, मैं कितनी बार आप को जगाती हूं, फिर भी कहां जागते हो. ऐसे में कोई चोर भी घुस जाए तो पता नहीं चले. इतनी गहरी नींद क्यों आती है आप को?’’

‘‘अब बुढ़ापा आ रहा है शीला.’’

‘‘बुढ़ापा आ रहा है या मुझ से अब आप का मन भर गया है?’’

‘‘कैसी बात करती हो?’’

‘‘ठीक कहती हूं. आजकल आपको न जाने क्या हो गया,’’ यह कहते हुए शीला की आंखों में वासना दिख रही थी. रवि जवाब न दे कर शीला का मुंह ताकते रहे.

शीला बोली, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हो? कभी देखा नहीं है क्या?’’

‘‘अरे, जब से शादी हुई है, तब से देख रहा हूं. मगर आज मेरी शीला कुछ अलग ही दिख रही है,’’ शरारत करते हुए रवि बोले.

‘‘कैसी दिख रही हूं? मैं तो वैसी ही हूं, जैसी तुम ब्याह कर लाए थे,’’ कह कर शीला ने ब्लाउज के बटन खोल दिए, ‘‘हां, आप अब वैसे नहीं रहे, जैसे पहले थे.’’

‘‘क्यों भला मुझ में बदलाव कैसे आ गया?’’ अचरज से रवि बोले.

‘‘मेरा इशारा अब भी नहीं समझ रहे हो. कहीं ऐसा न हो कि मैं भी जमना प्रसाद की पत्नी माधुरी बन जाऊं.’’

‘‘अरे शीला, जमना प्रसाद तो ढीले हैं, मगर मैं नहीं हूं,’’ कह कर रवि ने शीला को अपनी बांहों में भर कर उस के कई चुंबन ले लिए.

 

Hindi Story : पति-पत्नी और अक्‍लमंद औरत

मैं एक मल्टीनैशनल कंपनी में नौकरी कर रही थी. अभी मुझे 2 साल भी नहीं हुए थे. कंपनी का एक बड़ा प्रोजैक्ट पूरा होने की खुशी में शनिवार को फाइव स्टार होटल में एक पार्टी थी. मुझे भी वहां जाना था. मेरे मैनेजर ने मुझे बुला कर खासतौर पर कहा, ‘‘प्रीति, तुम इस प्रोजैक्ट में शुरू से जुड़ी थीं, तुम्हारे काम से मैं बहुत खुश हूं. पार्टी में जरूर आना… वहां और सीनियर लोगों से भी तुम्हें इंट्रोड्यूज कराऊंगा जो तुम्हारे फ्यूचर के लिए अच्छा होगा.’’

‘‘थैंक्यू,’’ मैं ने कहा.

सागर मेरा मैनेजर है. लंबा कद, गोरा, क्लीन शेव्ड, बहुत हैंडसम ऐंड सौफ्ट स्पोकन. उस का व्यक्तित्व हर किसी को उस की ओर देखने को मजबूर करता. सुना है वाइस प्रैसिडैंट का दाहिना हाथ है… वे कंपनी के लिए नए प्रोजैक्ट लाने के लिए कस्टमर्स के पास सागर को ही भेजते. सागर अभी तक इस में सफल रहा था, इसलिए मैनेजमैंट उस से बहुत खुश है.

मैं ने अपनी एक कुलीग से पूछा कि वह भी पार्टी में आ रही है या नहीं तो उस ने कहा, ‘‘अरे वह हैंडसम बुलाए और हम न जाएं, ऐसा कैसे हो सकता है. बड़ा रंगीन और मस्तमौला लड़का है सागर.’’

‘‘वह शादीशुदा नहीं है क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘एचआर वाली मैम तो बोल रही थीं शादीशुदा है, पर बीवी कहीं और जौब करती है. सुना है अकसर यहां किसी न किसी फ्रैशर के साथ उस का कुछ चक्कर रहा है. यों समझ लो मियांबीवी के बीच कोई तीसरी वो. पर बंदे की पर्सनैलिटी में दम है. उस के साथ के लिए औफिस की दर्जनों लड़कियां तरसती हैं. मेरी शादी के पहले मुझ पर भी डोरे डाल रहा था. मेरी तो अभी शादी भी नहीं हुई है, सिर्फ सगाई ही हुई है… एक शाम उस के नाम सही.’’

‘‘मतलब तेरा भी चक्कर रहा है सागर के साथ… पगली शादीशुदा हो कर ऐसी बातें करती है. खैर ये सब बातें छोड़ और बता तू आ रही है न पार्टी में?’’

‘‘हंड्रेड परसैंट आ रही हूं?’’

मैं शनिवार रात पार्टी में गई. मैं ने पार्टी के लिए अलग से मेकअप नहीं किया था. बस वही जो नौर्मल करती थी औपिस जाने के लिए. सिंपल नेवी ब्लू कलर के लौंग फ्रौक में जरा देर से पहुंची. देखा कि सागर के आसपास 4-5 लड़कियां पहले से बैठी थीं.

मुझे देख कर वह फौरन मेरे पास आ कर बोला, ‘‘वाऊ प्रीति, यू आर लुकिंग गौर्जियस. कम जौइन अस.’’

पहले सागर ने मेरा हाथ पकड़ कर मुझे वाइस प्रैसिडैंट के पास ले जा कर उन से मिलवाया.

उन्होंने कहा, ‘‘यू आर लुकिंग ग्रेट. सागर तुम्हारी बहुत तारीफ करता है. तुम्हारे रिपोर्ट्स भी ऐक्सीलैंट हैं.’’

मैंने उन्हें थैंक्स कहा. फिर अपनी कुलिग्स की टेबल पर आ गई. सागर भी वहीं आ गया. हाल में हलकी रंगीन रोशनी थी और सौफ्ट म्यूजिक चल रहा था. कुछ स्नैक्स और ड्रिंक्स का दौर चल रहा था.

सागर ने मुझ से भी पूछा, ‘‘तुम क्या लोगी?’’

‘‘मैं… मैं… कोल्डड्रिंक लूंगी.’’

सागर के साथ कुछ अन्य लड़कियां भी हंस पड़ीं.

‘‘ओह, कम औन, कम से कम बीयर तो ले लो. देखो तुम्हारे सभी कुलीग्स कुछ न कुछ ले ही रहे हैं. कह कर उस ने मेरे गिलास में बीयर डाली और फिर मेरे और अन्य लड़कियों के साथ गिलास टकरा कर चीयर्स कहा.

पहले तो मैं ने 1-2 घूंट ही लिए. फिर धीरेधीरे आधा गिलास पी लिया. डांस के लिए फास्ट म्यूजिक शुरू हुआ. सागर मुझ से रिक्वैस्ट कर मेरा हाथ पकड़ कर डांसिंग फ्लोर पर ले गया. पहले तो सिर्फ दोनों यों ही आमने-सामने खड़े शेक कर रहे थे, फिर सागर ने मेरी कमर को एक हाथ से पकड़ कर कहा, ‘‘लैट अस डांस प्रीति,’’ और फिर दूसर हाथ मेरे कंधे पर रख कर मुझ से भी मेरा हाथ पकड़ ऐसा ही करने को कहा.

म्यूजिक तो फास्ट था, फिर भी उस ने मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा, ‘‘मुझे स्लो स्टैप्स ही अच्छे लगते हैं. ज्यादा देर तक सामीप्य बना रहता है, कुछ मीठी बातें करने का मौका भी मिल जाता है और थकावट भी नहीं होती है.’’ मैं सिर्फ मुसकरा कर रह गई. वह मेरे बहुत करीब था. उस की सांसें मैं महसूस कर रही थी और शायद वह भी मेरी सांसें महसूस कर रहा था. उस ने धीरे से कहा, ‘‘अभी तुम्हारी शादी नहीं हुई है न?’’

‘‘नहीं, शादी अभी नहीं हुई है, पर 6 महीने बाद होनी है. समरेश मेरा बौयफ्रैंड ऐंड वुड बी हब्बी फौरन असाइनमैंट पर अमेरिका में है.’’

‘‘वैरी गुड,’’ कह उस ने मेरे कंधे और गाल पर झूलते बालों को अपने हाथ से पीछे हटा दिया, ‘‘अरे यह सुंदर चेहरा छिपाने की चीज नहीं है.’’

फिर उस ने अपनी उंगली से मेरे गालों को छू कर होंठों को छूना चाहा तो मैं ‘नो’ कह कर उस से अलग हो गई. मुझे अपनी सहेली का कहा याद आ गया था. उसके बाद हम दोनों 2 महीने तक औफिस में नौर्मल अपना काम करते रहे.

एक दिन सागर ने कहा, हमें एक प्रोजैक्ट के लिए हौंगकौंग जाना होगा.’’

‘‘हमें मतलब मुझे भी?’’

‘‘औफकोर्स, तुम्हें भी.’’

‘‘नहीं सागर, किसी और को साथ ले लो इस प्रोजैक्ट में.’’

‘‘तुम यह न समझना कि यह मेरा फैसला है… बौस का और्डर है यह. तुम चाहो तो उन से बात कर सकती हो.’’

मैं ने वाइस प्रैसिडैंट से भी रिक्वैस्ट की पर उन्होंने कहा, ‘‘प्रीति, बाकी सभी अपनेअपने प्रोजैक्ट में व्यस्त हैं. 2 और मेरी नजर में थीं, उन से पूछा भी था, पर दोनों अपनी प्रैगनैंसी के चलते दूर नहीं जाना चाहती हैं… मेरे पास तुम्हारे सिवा और कोई औप्शन नहीं है.’’

मैं सागर के साथ हौंगकौंग गई. वहां 1 सप्ताह का प्रोग्राम था. काफी भागदौड़ भरा सप्ताह रहा. मगर 1 सप्ताह में हमारा काम पूरा न हो सका. अपना स्टे और 3 दिन के लिए बढ़ाना पड़ा. हम दोनों थक कर चूर हो गए थे. बीच में 2 दिन वीकैंड में छुट्टी थी.

हौंगकौंग के क्लाइंट ने कहा, ‘‘इसी होटल में स्पा, मसाज की सुविधा है. मसाज करा लें तो थकावट दूर हो जाएगी और अगर ऐंजौय करना है तो कोव्लून चले जाएं.’’

‘‘मैं तो वहां जा चुका हूं. तुम कहो तो चलते हैं. थोड़ा चेंज हो जाएगा,’’ सागर ने कहा.

हम दोनों हौंगकौंग के उत्तर में कोव्लून द्वीप गए. थोड़े सैरसपाटे के बाद सागर बोला, ‘‘तुम होटल के मसाज पार्लर में जा कर फुल बौडी मसाज ले लो. पूरी थकावट दूर हो जाएगी.’’

मै स्पा गई. स्पा मैनेजर ने पूछा, ‘‘आप ने अपौइंटमैंट में थेरैपिस्ट की चौइस नहीं बताई है. अभी पुरुष और महिला दोनों थेरैपिस्ट हैं मेरे पास. अगर डीप प्रैशर मसाज चाहिए तो मेरे खयाल से पुरुष थेरैपिस्ट बेहतर होगा. वैसे आप की मरजी?’’

मैंने महिला थेरैपिस्ट के लिए कहा और अंदर मसाजरूम में चली गई.

बहुत खुशनुमा माहौल था. पहले तो मुझे ग्रीन टी पीने को मिली. कैंडल लाइट की धीमी रोशनी थी, जिस से लैवेंडर की भीनीभीनी खुशबू आ रही थी. लाइट म्यूजिक बज रहा था. थेरैपिस्ट ने मुझे कपड़े खोलने को कहा. फिर मेरे बदन को एक हरे सौफ्ट लिनेन से कवर कर पैरों से मसाज शुरू की. वह बीचबीच में धीरेधीरे मधुर बातें कर रही थी. फिर थेरैपिस्ट ने पूछा, ‘‘आप को सिर्फ मसाज करानी है या कुछ ऐक्स्ट्रा सर्विस विद ऐक्स्ट्रा कौस्ट… पर इस टेबल पर नो सैक्स?’’

‘‘मुझे आश्चर्य हुआ कि उसे ऐसा कहने की क्या जरूरत थी. मैं ने महसूस किया कि मेरी बगल में भी एक मसाज चैंबर था. दोनों के बीच एक अस्थायी पार्टीशन वाल थी. जैसेजैसे मसाज ऊपर की ओर होती गई मैं बहुत रिलैक्स्ड फील कर रही थी. करीब 90 मिनट तक वह मेरी मसाज करती रही. महिला थेरैपिस्ट होने से मैं भी सहज थी और उसे भी मेरे अंगों को छूने में संकोच नहीं था. उस के हाथों खासकर उंगलियों के स्पर्श में एक जादू था और एक अजीब सा एहसास भी. पर धीरेधीरे उस के नो सैक्स कहने का अर्थ मुझे समझ में आने लगा था. मैं अराउज्ड यानी उत्तेजना फील करने लगी. मुझे लगा. मेरे अंदर कामवासना जाग्रत हो रही है.’’

तभी थेरैपिस्ट ने ‘‘मसाज हो गई,’’ कहा और बीच की अस्थायी पार्टीशन वाल हटा दी. अभी मैं ने पूरी ड्रैस भी नहीं पहनी थी कि देखा दूसरे चैंबर में सागर की भी मसाज पूरी हो चुकी थी. वह भी अभी पूरे कपड़े नहीं पहन पाया था. दूसरी थेरैपिस्ट गर्ल ने मुसकराते हुए कहा ‘‘देखने से आप दोनों का एक ही हाल लगता है, अब आप दोनों चाहें तो ऐंजौय कर सकते हैं.’’

मुझे सुन कर कुछ अजीब लगा, पर बुरा नहीं लगा. हम दोनों पार्लर से निकले. मुझे अभी तक बिना पीए मदहोशी लग रही थी. सागर मेरा हाथ पकड़ कर अपने रूम में ले गया. मैं भी मदहोश सी उस के साथ चल पड़ी. उस ने रूम में घुसते ही लाइट औफ कर दी.

सागर मुझ से सट कर खड़ा था. मेरी कमर में हाथ डाल कर अपनी ओर खींच रहा था और मैं उसे रोकना भी नहीं चाहती थी. वह अपनी उंगली से मेरे होंठों को सहला रहा था. मैं भी उस के सीने से लग गई थी. फिर उस ने मुझे किस किया तो ऐसा लगा सारे बदन में करंट दौड़ गया. उस ने मुझे बैड पर लिटा दिया और कहा, ‘‘जस्ट टू मिनट्स, मैं वाशरूम से अभी आया.’’

सागर ने अपनी पैंट खोल बैड के पास सोफे पर रख दी और टौवेल लपेट वह बाथरूम में गया. मैं ने देखा कि पैंट की बैक पौकेट से उस का पर्स निकल कर गिर पड़ा और खुल गया. मैं ने लाइट औन कर उस का पर्स उठाया. पर्स में एक औरत और एक बच्चे की तसवीर लगी थी.

मैं ने उस फोटो को नजदीक ला कर गौर से देखा. उसे पहचानने में कोई दिक्कत नहीं हुई. मैं ने मन में सोचा यह तो मेरी नीरू दी हैं. कालेज के दिनों में मैं जब फ्रैशर थी सीनियर लड़के और लड़कियां दोनों मुझे रैगिंग कर परेशान कर रहे थे. मैं रोने लगी थी. तभी नीरू दी ने आ कर उन सभी को डांट लगाई थी और उन्हें सस्पैंड करा देने की वार्निंग दी थी. नीरू दी बीएससी फाइनल में थीं. इस के बाद मेरी पढ़ाई में भी उन्होंने मेरी मदद की थी. तभी से उन के प्रति मेरे दिल में श्रद्धा है. आज एक बार फिर नीरू दी स्वयं तो यहां न थीं, पर उन के फोटो ने मुझे गलत रास्ते पर जाने से बचा लिया. मेरी मदहोशी अब फुर्र हो चली थी.

सागर बाथरूम से निकल कर बैड पर आया तो मैं उठ खड़ी हुई. उस ने मुझे बैड पर बैठने को कहा, ‘‘लाइट क्यों औन कर दी? अभी तो कुछ ऐंजौय किया ही नहीं.’’

‘‘ये आप की पत्नी और साथ में आप का बेटा है?’’

‘‘हां, तो क्या हुआ? वह दूसरे शहर में नौकरी कर रही है?’’

‘‘नहीं, वे मेरी नीरू दीदी भी हैं… मैं गलती करने से बच गई,’’ इतना बोल कर मैं उस के कमरे से निकल गई.

जहां एक ओर मुझे कुछ आत्मग्लानि हुई तो वहीं दूसरी ओर साफ बच निकलने का सुकून भी था. वरना तो मैं जिंदगीभर नीरू दी से आंख नहीं मिला पाती. हालांकि सागर ने कभी मेरे साथ कोई जबरदस्ती करने की कोशिश नहीं की.

इस के बाद 3 दिन और हौंगकौंग में हम दोनों साथ रहे… बिलकुल प्रोफैशनल की तरह

अपनेअपने काम से मतलब. चौथे दिन मैं और सागर इंडिया लौट आए. मैं ने नीरू दी का पता लगाया और उन्हें फोन किया. मैं बोली, ‘‘मैं प्रीति बोल रही हूं नीरू दी, आप ने मुझे पहचाना? कालेज में आप ने मुझे रैगिंग…’’

‘‘ओ प्रीति तुम? कहां हो आजकल और कैसी हो? कालेज के बाद तो हमारा संपर्क ही टूट गया था.’’

‘‘मैं यहीं सागर की जूनियर हूं. आप यहीं क्यों नहीं जौब कर रही हैं?’’

‘‘मैं भी इस के लिए कोशिश कर रही हूं. उम्मीद है जल्द ही वहां ट्रांसफर हो जाएगा.’’

‘‘हां दी, जल्दी आ जाइए, मेरा भी मन लग जाएगा,’’ और मैं ने फोन बंद कर दिया. हौंगकौंग के उस कमजोर पल की याद फिर आ गई, जिस से मैं बालबाल बच गई थी और वह भी सिर्फ एक तसवीर के चलते वरना अनजाने में ही पति-पत्नी के बीच मैं ‘वो’ बन गई होती.

Bollywood : कौर्पोरेट के चंगुल में फंसता सिनेमा, क्रिएटिव लोगों ने किया विरोध

क्या बिना सिनेमाई समझ से सिनेमा से मुनाफा कमाया जा सकता है? कौर्पोरेट जगत की फिल्म इंडस्ट्री में बढ़ती हिस्सेदारी ने इस सवाल को हवा दी है. सिनेमा पर बढ़ते कौर्पोरेटाइजेशन ने सिनेमा पर कैसा असर छोड़ा है, जानें.

बौलीवुड के बहुचर्चित निर्माता व निर्देशक करण जौहर की फिल्म निर्माण कंपनी धर्मा प्रोडक्शंस लंबे समय से घाटे में चल रही थी. 2012 में फिल्म ‘स्टूडैंट औफ द ईयर’ के बाद से जौहर की प्रोडक्शन कंपनी ने जितनी फिल्में बनाईं, सभी ने काफी नुकसान पहुंचाया. 2024 की शुरुआत से ही चर्चा थी कि करण जौहर अपने पिता द्वारा 1979 में स्थापित धर्मा प्रोडक्शंस को बेचना चाहते हैं. आखिरकार अक्तूबर माह में करण जौहर ने धर्मा प्रोडक्शंस की 50 प्रतिशत हिस्सेदारी पुणे के सीरम इंस्टिट्यूट के मालिक अदार पूनावाला को 1,000 करोड़ रुपए में बेच दी. तब से बौलीवुड के अंदर एक नई बहस शुरू हो गई है कि क्या फिल्म प्रोडक्शंस में कौर्पोरेट के इंवैस्टमैंट या जुड़ाव से सिनेमा का विकास होगा या सिनेमा की बरबादी? इस तरह के सवाल उठाने वालों का यकीन है कि ‘सिनेमा सिर्फ व्यवसाय नहीं बल्कि कला भी है.
मशहूर फिल्मकार विनोद पांडे इस संबंध में साफसाफ कहते कहते हैं, ‘‘सिनेमा केवल नाचगाना, मनोरंजन या ऐक्शन नहीं है. फिल्मकार अपनी कहानी के जरिए कुछ न कुछ कहता है. इस बात को कौर्पोरेट नहीं समझ सकता क्योंकि कौर्पोरेट तो उत्पादक पदार्थों को बेचना व लाभ कमाना जानता है.’’ मगर जब से करण जौहर ने अपनी कंपनी में कौर्पोरेट को हिस्सेदार बनाया है, तब से कई कौर्पोरेट कंपनियां फिल्म उद्योग से जुड़ने को इच्छुक नजर आ रही हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो फरहान अख्तर और रितेश सिद्धवानी भी अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी एक्सेल इंटरटेनमैंट की हिस्सेदारी बेचने के लिए प्रयासरत हैं. तो वहीँ खबर गरम है कि विद्या बालन के पति और फिल्म निर्माता सिद्धार्थ रौय कपूर भी अपनी फिल्म प्रोडक्शंस कंपनी रौय कपूर फिल्म्स की हिस्सेदारी बेच रहे हैं. इसी के साथ बौलीवुड के कौर्पोरेटाइजेशन को ले कर भी कई तरह की बातें की जा रही हैं. तमाम क्रिएटिव/रचनात्मक लोग इस का विरोध कर रहे हैं. उन की राय में इस से रचनात्मकता पर अंकुश लग रहा है.

बौलीवुड यानी कि सिनेमा में कौर्पोरेट कंपनियों के इंवैस्टमैंट की घटना कोई नई नहीं है. यह सिलसिला तो भारतीय सिनेमा के जनक कहे जाने वाले दादा साहेब फालके के जमाने से ही शुरू हो गया था और अब तक कई कौर्पोरेट घराने फिल्म निर्माण से जुड़ कर अपने हाथ जला कर तोबा भी कर चुके हैं. जी हां, यह कटु सत्य है.

पहला कौर्पोरेट जो फिल्मों से जुड़ा

1917 में दादा साहेब फालके की स्वदेशी फिल्मों से प्रभावित हो कर लोकमान्य तिलक के प्रयास किए जाने पर उस वक्त के उद्योगपति रतनजी सेठ यानी कि जे आर डी टाटा के पिता और मनमोहनजी ने मिल कर दादा साहेब फालके को 5 लाख रुपए का औफर देते हुए कहा था कि दादा साहेब फालके एक लिमिटेड कंपनी बनाएं. पर इस औफर को दादा साहेब फालके ने ठुकरा दिया था. लेकिन कुछ समय बाद उन्होंने खुद कुछ कौर्पोरेट को जोड़ते हुए हिंदुस्तान फिल्म कंपनी बनाई. उस कंपनी में उन के साथ बी ए साहब, गोकुलदास व माधो भागीदार थे. वह कंपनी शेयर बाजार में लिस्टेड थी या नहीं, इस की पुख्ता जानकारी तो नहीं मिल पा रही है लेकिन गोकुलदास व माधो दोनों शेयर बाजार से जुड़े हुए थे.

हिमांशु राय और देविका रानी ने 1954 में कौर्पोरेट कंपनी ‘बौम्बे टौकीज’’ बनाई, जो कि शेयर बाजर में लिस्टेड कंपनी थी. 1960 में उद्योगपति शापूर पालेनजी ने फिल्म ‘मुगल ए आजम’ के निर्माण में पैसा लगाया था. इस फिल्म के बाद उन्होंने खुद को फिल्मों से दूर कर लिया था. बताया जाता है कि जब के आसिफ ने शापूर पालेनजी से कहा कि वे कुछ धन लगाएं जिस से कि ‘मुगल ए आजम’ को रंगीन किया जा सके, तो शापूर पालेनजी ने साफसाफ कह दिया था कि वे फिल्म उद्योग से दूर रहना चाहते हैं.

लेकिन सिनेमा का असली कौर्पोरेटाइजेशन करने के मकसद से 1978 में वर्किंग ग्रुप औफ नैशनल फिल्म पौलिसी का गठन कन्नड़ साहित्यकार डा. के शिवराम करण की अध्यक्षता में हुआ था. इस ने 1980 में सुझाव दिया था कि फिल्म इंडस्ट्री को उद्योग का दर्जा दिया जाना चाहिए और फिल्मकार को इंस्टिट्यूशनल फाइनैंस यानी कि बैंक से कर्ज मिलना चाहिए. इस के अलावा डिस्ट्रीब्यूशन सैक्टर को आर्गेनाइज करने की भी सलाह दी थी.
पहली पहल करते हुए सुभाष घई ने 1982 में अपनी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी मुक्ता आर्टस प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई. 2000 में यह कंपनी शेयर बाजार में लिस्ट हुई थी. बाहर से जो कर्ज लिया जाता है, वह काफी महंगा होता था. इस तरह सुभाष घई ने पहली बार कौर्पोरेटाइजेशन की तरफ कदम बढ़ाया था. सुभाष घई ने अपनी इस कंपनी को शेयर बाजार में लिस्ट कर आम जनता से धन उगाही कर क्या किया, इस को ले कर कई तरह की कहानियां चर्चा में रही हैं.


बौलीवुड में कौर्पोरेटाइजेशन का श्रेय नितिन केनी को

बौलीवुड के कौर्पोरेटाइजेशन के लिए असली श्रेय नितिन केनी को जाता है. यह 2001 की बात है. उस वक्त नितिन केनी जी टीवी के साथ जुड़े हुए थे और उन्होंने कौर्पोरेट कल्चर के तहत काम करते हुए बौलीवुड की चिरपरिचित कार्यशैली के विपरीत पूरी तरह से कौर्पोरेट कल्चर को अपनाते हुए अनिल शर्मा के निर्देशन में 19 करोड़ रुपए की लागत से फिल्म ‘गदरः एक प्रेमकथा’ का निर्माण किया था, जिस ने बौक्सऔफिस पर 78 करोड़ रुपए कमाए थे.
इस के बाद बौलीवुड में कौर्पोरेट कपंनियों के जुड़ने का एक बूम आ गया था. इस बूम के चलते इन कौर्पोरेट कंपनियों ने 10 रुपए की औकात रखने वाले कलाकार को 200 रुपए दे कर जो नुकसान फिल्म उद्योग को पहुंचाया, उस के लिए इन्हें कभी भी माफ नहीं किया जाना चाहिए.

सब से पहले उद्योगपति मुकेश अंबानी के भाई अनिल अंबानी ने रिलायंस इंटरटेनमैंट की शुरुआत कर खुलेहाथों कलाकारों को पैसा बांटा. इन्हें लगा कि बड़े से बड़े कलाकार को अनापशनाप धन दे कर वे अपनी फिल्मों को बौक्सऔफिस पर हिट करा कर खूब धन कमाएंगे. पर हुआ इस के उलटा.
इसी तरह कई उद्योगपति बौलीवुड से जुड़े और खुद को बरबाद कर वापस लौट गए. जे आर डी टाटा तो एक टीवी सीरियल ‘हमराही’ के निर्माण से भी जुड़े थे, पर फिर वे वापस लौट गए. यहां तक कि नितिन केनी जो कारनामा कर दिखाया था, उसी से प्रभावित हो कर 2004 में टाटा ग्रुप के रतन टाटा, जिन का हाल ही में निधन हुआ है, ने भी 2004 में अमिताभ बच्चन, जौन अब्राहम और बिपाशा बसु को ले कर रोमांटिक सायकोलौजिकल फिल्म ‘एतबार’ का निर्माण टाटा इंफोमीडिया के बैनर तले किया था. 10 करोड़ रुपए की लागत से बनी इस फिल्म की बौक्सऔफिस पर दुर्गति हुई थी. यह फिल्म बौक्सऔफिस पर महज 4 करोड़ 25 लाख रुपए ही एकत्र कर सकी थी, जिस में से निर्माता के हाथ में महज डेढ़ करोड़ रुपए ही आए थे और फिर रतन टाटा ने हमेशा के लिए बौलीवुड से दूरी बना ली थी.

अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस इंटरटनेमैंट ने भी आखिरकार घुटने टेक दिए. अनुराग कश्यप, विकास बहल, माटवणे ने मिल कर एक कंपनी फैंटम बनाई थी, जिस के तहत फिल्में बना रहे थे, पर वह कंपनी बिखर गई. शेखर कपूर व रामगोपाल वर्मा ने मिल कर एक कंपनी बनाई थी, जिस के तहत उन्होंने फिल्म ‘दिल से’ बनाई, पर फिर दूसरी फिल्म नहीं बनी. उद्योगपति ढिलिन मेहता की कंपनी अष्टविनायक फिल्म्स ने भी परेश रावल व सुनील शेट्टी को ले कर ‘महारथी’ के अलावा कोई फिल्म नहीं बनाई. इसी तरह कौर्पोरेट पृष्ठभूमि की कई कंपनियां आईं और एकदो फिल्में बना कर डब्बागोल हो गईं.

बौलीवुड में कौर्पोरेट क्यों असफल होता रहा?

फिल्म/सिनेमा के निर्माण में कौर्पोरेट/उद्योगपतियों के असफल होने की मूलतया 2 वजहें हैं. पहली वजह तो यह है कि फिल्म निर्माण में कुछ इनोवेशन या उत्पादकता नहीं है. फिल्म के नाम पर ऐसा कोई पदार्थ नहीं बनता जिस के बारे में पहले से ही आकलन कर दावा किया जा सके कि इसे बेचने के बाद इतनी कमाई हो सकती है. कहने का अर्थ यह कि फिल्में यूनिवर्सल प्रोडक्ट नहीं हैं. मसलन, पारले कंपनी के बिस्कुट को लें. तो यहां पर कंपनी को पता है कि ब्रिटानिया या अन्य कंपनी के बिस्कुट के साथ प्रतियोगिता करते हुए गुणवत्ता के आधार पर कीमत रख कर कितनी कमाई की जा सकती है.
फिल्मों के साथ ऐसा नहीं है. करण जौहर की फिल्म की तुलना में रोहित शेट्टी या संजय लीला भंसाली या राहुल ढोलकिया की फिल्मों को ले कर ऐसा नहीं कहा जा सकता. यहां तक कि करण जौहर या संजय लीला भंसाली निर्मित फिल्म की तुलना भी नहीं की जा सकती. फिल्म की कहानी, कलाकार व निर्देशक और जौनर बदलने के साथ ही उस फिल्म के चलने या न चलने को ले कर खुद संजय लीला भंसाली या करण जौहर भी बतौर निर्माता कोई दावा नहीं कर सकते.

कोई भी बैंक या फायनैंशियल इंस्टिट्यूशन या कौर्पोरेट कंपनी में बैठे दिग्गज एमबीए पास भी फिल्म की सफलता को ले कर कोई आश्वासन नहीं दे सकते. ये सभी अपनीअपनी कंपनी में मोटी रकम, सैलरी के तौर पर, लेते हुए केवल कंपनी को डुबोने का काम कर रहे हैं. कभीकभी आरोप लगते रहते हैं कि ये लोग अपनी जेब भरने के लिए किसी के भी नाम पर कोई भी रकम लगा देते हैं. वास्तव में कार या साबुन बेचने वाला कला व क्रिएटिविटी को नहीं समझ सकता.

बौलीवुड में हर शुक्रवार कलाकार का भविष्य बदलता है. किसी वक्त अक्षय कुमार को फिल्म की सफलता की गारंटी माना जाता था पर पिछले 4 वर्षों में अक्षय कुमार की करीबन 14 फिल्में बौक्सऔफिस पर अपनी लागत वसूल नहीं पाईं. इस के बावजूद आज भी कौर्पोरेट कंपनियों की शह पर वे प्रति फिल्म 135 करोड़ रुपए पारिश्रमिक राशि लेते हैं. जब अक्षय की फिल्म बौक्सऔफिस पर 10 करोड़़ नहीं कमा पा रही तो आप उसे 135 करोड़ रुपए क्यों दे रहे हो? कौर्पोरेट में क्रिएटिविटी के स्तर पर दिवालियापन है.

दूसरी वजह बौलीवुड की कार्यशैली है, जिस के चलते बौलीवुड को कौर्पोरेटाइज नहीं करना चाहिए. यहां पर 90 प्रतिशत लेनदेन नकद में होता है. इस की कई वजहें हो सकती हैं. छोटे डेली वेजेस व छोटेमोटे तकनीशियन को निर्माता पर यकीन नहीं होता कि निर्माता ने चैक दिया और बाउंस हो गया तो. तीसरी वजह ब्लैक मनी का चलन भी है. नकद लेनदेन को एक्सटर्नल और इंटरनल औडीटर मान्य नहीं करते. चौथी वजह एक फिल्म के निर्माण में कई स्तर पर कई तरह की क्रिएटिव योग्यता वाले लोग जुड़े होते हैं, इन के बीच एक प्रतिशत का भी तालमेल गड़बड़ा जाए, तो फिल्म बौक्सऔफिस पर ढेर हो जाती है.

तालमेल गड़बड़ाने के पीछे भी कई वजहें होती हैं और यह तालमेल फिल्म निर्माण के दौरान कभी भी गड़बड़ा सकता है. इसी वजह से कन्नड़ साहित्यकार डा. के शिवराम करण की अध्यक्षता में गठित कमेटी की सिफारिशें बेकार साबित हुईं.

सब से बड़ी वजह यह है कि कौर्पोरेट जगत में एमबीए पास जो लोग बैठे हैं उन्हें साहित्य, कला की समझ नहीं है. वे सिर्फ व्यवसाय करना जानते हैं. वे लाभहानि का खाका कागज पर बनाने में माहिर होते हैं. उन्हें तो यह भी नहीं पता कि मुंशी प्रेमचंद कौन थे. एक बार ‘शोले’ सहित कई सफलतम व लोकप्रिय फिल्मों के निर्देशक रमेश सिप्पी मुंशी प्रेमचंद की एक कहानी पर फिल्म बनाने का प्रस्ताव ले कर एक कौर्पोरेट कंपनी के पास गए, तो 4 दिनों बाद उस कौर्पोरेट कपंनी से एक एमबीए पास युवक का रमेश सिप्पी के पास फोन आया कि मुंशी प्रेमचंद का बायेाडाटा भेजिए, तो हमें समझ में आए कि उन की कहानी कैसी हो सकती है. उस की बात सुन कर रमेश सिप्पी ने अपना माथा पीट लिया और वे दोबारा उस कौर्पोरेट के पास नहीं गए.

जी हां, कौर्पोरेट में जो इंसान फिल्म बनाने का निर्णय लेता है उस का अपना पैसा या दिमाग कुछ भी इंवैस्ट नहीं हो रहा होता है. जिस के चलते सिनेमा की रचनात्मकता से उन का कोई लगाव नहीं रहता. मगर मजबूरी ऐसी कि वर्तमान समय में निजी निर्माता अपनी फिल्म को रिलीज करने के लिए कौर्पोरेट के पास ही जा रहे हैं. फिर चाहे वह धर्मा हो या संजय लीला भंसाली हो या दिनेश वीजन. ये सभी कौर्पोरेट के साथ मिल कर ही काम कर रहे हैं. इसे आप यों कह सकते हैं कि फिल्म बनाने के आर्थिक बोझ को साझा किया जा रहा है. सिनेमा से कालाधन गायब होने की मूल वजह कौर्पोरेट का आना ही है.

‘तिरंगा’, ‘क्रांतिवीर’ जैसी 40 से अधिक सफलतम फिल्मों के निर्माता व निर्देशक मेहुल कुमार कहते हैं, ‘‘सिनेमा को बाजारू बनाने, सिनेमा के अंदर क्रिएटिविटी खत्म करने के साथ ही सिनेमा को डुबोने में कौर्पोरेट का 100 प्रतिशत योगदान है. आज की तारीख में फिल्म का बजट कहां से कहां पहुंचा दिया गया है. इन कौर्पोरेट कंपनियों ने 20 लाख रुपए कीमत लेने वाले कलाकार को 50 लाख रुपए देना शुरू कर दिया. 50 लाख रुपए वालों को एक से 5 करोड़ रुपए मिलने लगा. जो हीरोइनें टौप पर होते हुए भी 25 लाख रुपए ले रही थीं, उन्हें इन्होंने 50 लाख रुपए देना शुरू कर दिया.

“आज तो कलाकारों को करोड़ों रुपए पारिश्रमिक राशि के रूप में दिए जा रहे हैं, कहानी पर ध्यान नहीं. इसलिए फिल्में असफल हो रही हैं. यदि आज भी कलाकारों की पारिश्रमिक राशि रीजनेबल हो जाए, फिल्म का बजट रीजनेबल हो जाए, तो फिल्में सफल हो सकती हैं. फिल्मों का बिजनैस आज भी अच्छा हो सकता है.

“दूसरी बात, पहले कलाकार केवल अभिनय पर ध्यान देते थे, पर अब कलाकार को फिल्म की कमाई में भी भागीदारी चाहिए. भागीदारी होते ही उन की दखलंदाजी बढ़ जाती है. ऐसे में निर्माता या निर्देशक के हाथ बंध जाते हैं. पहले सभी निर्णय निर्माता व निर्देशक ही लेते थे, पर अब ऐसा नहीं रहा.

“इतना ही नहीं, कौर्पोरेट/स्टूडियो की दखलंदाजी के चलते एक ही फिल्म में चारचार संगीतकार होते हैं, जिस के चलते संगीत भी डूब रहा है. यही नहीं, अब संगीत कंपनियां किसी का भी गाना खरीद कर अपनी लाइब्रेरी में रख लेती हैं. फिर वे निर्देशक से कहती हैं कि इन 25 गानों में से चुन कर फिल्म में डाल दो. अब जिन गानों का कहानी से संबंध ही नहीं है, उन्हें फिल्म में डालेंगे, तो क्या होगा? तभी आज की फिल्मों में गानों का कहानी से कोई लेनादेना नहीं होता. मैं फिल्म ‘तिरंगा’ की बात करना चाहूंगा. मैं ने संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को लिया. उन्होंने कहा कि इस फिल्म के गीत कई देशभक्ति वाले गाने लिख चुके संतोषजी से लिखवाया जाए. मैं ने कहा कि वेह लिखेंगे? लक्ष्मीजी ने कहा कि बात कीजिए. उन दिनों वे लखनऊ में थे.

“मैं ने संतोषजी को लखनऊ फोन किया. उन्होंने बताया कि अब वे गीत लिखना बंद कर चुके हैं. मैं ने उन से कहा कि, ‘हमारी फिल्म ‘तिरंगा’ की कहानी ऐसी है कि आप को गीत लिखना चाहिए.’ उन्हें संक्षेप में कहानी के बारे में बताया. फिर वे 8 दिन के लिए मुंबई आए और फिल्म ‘तिरंगा’ के गाने लिख कर वापस लखनऊ चले गए थे. मैं ने हसरत जयपुरी, आनंद बख्शी, इंदीवर से भी गाने लिखवाए. ये सभी गीतकार पहले फिल्म की पूरी कहनी सुनते थे, उस के बाद गाने लिखते थे. इसलिए उन के गानों में कहानी नजर आती थी, जो कि आज के गानों में नहीं मिलता.

“इतना ही नहीं, अब तो कलाकार की दखलंदाजी इस कदर हो गई है कि वह तय करता है कि फिल्म में कैमरामैन कौन होगा. इसी चलते 90 प्रतिशत पुराने फिल्मकार फिल्में नहीं बना रहे हैं. मैं ने कभी भी कलाकार या कौर्पोरेट के आगे सरैंडर हो कर फिल्म नहीं बनाई. इसलिए मैं ने ‘जागो’ के बाद कोई फिल्म नहीं बनाई. मैं जिस तरह की बातें सुनता हूं, उन्हें सुन कर सोचता हूं कि लोग कैसे फिल्म बना लेते हैं.’’
मेहुल कुमार की बातों में काफी सचाई है. कौर्पोरेट पैसा कमाने के साथ डौमिनेट करने की कोशिश करता है. वह धीरेधीरे ऐसा गहरा नियंत्रण कर लेता है कि फिर क्रिएटिव लोगों की सीमा अतिसीमित हो जाती है. पैसा ही असली खेल कराता है.

अभिनेत्रियां रेखा व शबाना आजमी के साथ कई सफलतम फिल्में बना चुके विनोद पांडे ने पिछले दिनों कौर्पोरेट के साथ काम करने के अपने अनुभवों पर रोशनी डालते हुए आरोप लगाया कि कौर्पोरेटाइजेशन से गहरी बात कहने वाले फिल्मकार गर्त में समाते गए. अब सिनेमा में क्रिएटिविटी नहीं रही.

विनोद पांडे ने कहा है, ‘‘मैं ने राजपाल यादव को हीरो ले कर अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस इंटरटेनमैंट के साथ एक फिल्म ‘चालू मूवी’ बनाई थी. आप यकीन नहीं करेंगे, वे इस फिल्म को बीच अधर में छोड़ देना चाहते थे. क्योंकि राज पाल यादव का भाव अचानक कम हो गया था. राजपाल यादव की ओपनिंग फिल्म के दर्शक महज 5 प्रतिशत रह गए थे. सो, वे इस फिल्म को बंद कर देना चाहते थे. मैं केवल लेखक व निर्देशक था, तो मैं ने अपनी इंस्टौलमैंट छोड़ कर किसी तरह इस फिल्म को पूरा किया था. पर उन्होंने तकनीशियन को पैसे नहीं दिए और रिलीज करने से इनकार कर दिया था.

“कौर्पोरेट जगत से आने वाले लोग मोटी सैलरी लेते हैं, पर इन्हें सिनेमा की समझ नहीं होती. कार या हेयर ड्रैसर या गोरा बनाने वाली क्रीम बेचने वाले लोग सिनेमा को समझ ही नहीं सकते. सिनेमा की अपनी एक आत्मा होती है. कौर्पोरेट वालों की वजह से उस आत्मा वाला सिनेमा गायब हो गया. उसे वपस लाने की जरूरत है. कौर्पोरेट का पैसा, कौर्पोरेट की पूंजी अर्थपूर्ण सिनेमा का सब से बड़ा दुश्मन है.’’

इस कटु सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि सिनेमा मूलतया कला है, जिस पर कौर्पोरेट जगत अपने इंवैस्टमैंट को वसूलने के चक्कर में बाजार को थोप रहा है. जब कौर्पोरेट वाले शेयर बाजार के माध्यम से आम जनता का पैसा ले कर सिनेमा में लगाते हैं तो वे फिल्म इंडस्ट्री या यों कहें कि सिनेमा को भी बाजारू बनाने पर उतारू हैं. जब फिल्म से कला खत्म हो जाए तो आप यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि ‘बावर्ची’, ‘मुगल ए आजम’, ‘जुगनू’, ‘गाइड’ या ‘अछूत कन्या’ जैसी फिल्में बनें.

समस्या यह है कि यह कौर्पोरेट, जिन्हें सिनेमा व कला की समझ नहीं है, वे बिना फिल्म देखे, उस को समझे बगैर ब्लूबर्ड पर अंधाधुध पैसा लगाते हैं. कुछ समय पहले प्रदर्शित आलिया भट्ट की फिल्म ‘जिगरा’ को देख लें. कौर्पोरेट में बैठे सभी को पता था कि इसी कहानी पर टीसीरीज की फिल्म ‘सावी’ असफल हो चुकी है. लेकिन आलिया भट्ट व करण जौहर का नाम देख कर कौर्पोरेट यानी कि मुकेश अंबानी की कंपनी जियो स्टूडियो ने पैसा लगा दिया और आलिया भट्ट के अभिनय से सजी फिल्म ‘जिगरा’ की बौक्सऔफिस पर दुर्गति हुई.

सरकारी स्तर पर गलत निर्णय

कन्नड़ साहित्यकार डा. के शिवराम करण की अध्यक्षता वाली कमेटी की सिफारिश पर आधाअधूरा अमल करते हुए सरकार ने फिल्म निर्माण में मदद के लिए राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम और चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी का गठन किया. पर सरकार की तरफ से फिल्मों के प्रदर्शन को ले कर कोई ठोस कदम आज तक नहीं उठाया गया. राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम और चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी द्वारा दिए गए धन से कई फिल्में आज तक सिनेमाघरों में नहीं पहुंचीं. अब तो सराकर ने इन सभी का एक तरह से विलय कर सिनेमा के विकास पर अंतिम कील ठोक दी है.

इस सच से इनकार नहीं किया जा सकता कि कौर्पोरेट नुकसान नहीं सहना चाहता. इसलिए वह चाहता है कि उस का ब्रैंड लोगों तक पहुंचे. लेकिन एमबीए पास लोग कला की समझ न रखने के कारण अच्छे लेखक व अच्छे निर्देशक के पास जाने के बजाय सोशल मीडिया पर झूठे व नकली फौलोअर्स के बल पर अपना कद बड़ा साबित करने वाले कलाकारों के पीछे भागते हुए इन कलाकारों को इन की औकात से कई गुणा ज्यादा रकम बांट रहे हैं. कौर्पोरेट अभी तक नहीं समझ सका कि सिनेमा की असली शक्ति निर्देशक के पास होती है.

कौर्पोरेट जगत में बैठे एमबीए पास लोगों को सब से पहले यह समझने की जरूरत है कि सिनेमा/फिल्म एक ऐसा क्षेत्र है जहां कोई यूनिवर्सल प्रोडक्ट नहीं बनता, कोई नया इनोवेशन नहीं होता है. यह ‘कला’ है, मगर अतिखर्चीला है. इस वजह से जो भी कौर्पोरेट सिनेमा से या किसी फिल्म प्रोडक्शन कंपनी का हिस्सेदार बनेगा, उसे नुकसान होना स्वाभाविक है.

‘झुकेगा नहीं साला’ का जादू : Allu Arjun की Pushpa 2 की कमाई 1000 करोड़ पार

इस बार दिसंबर माह के पहले सप्ताह की शुरूआत 6 दिसंबर,शुक्रवार की बजाय 5 दिसंबर, गुरूवार को ही हो गई, जब अल्लू अर्जुन अभिनीत तेलुगु भाषा की फिल्म ‘पुष्पा 2ः द रूल’ 5 दिसंबर को ही रिलीज कर दी गई. इसे मूल तेलुगु फिल्म के ही साथ हिंदी,तमिल ,मलयालम, कन्नड़ व बांगला भाषा में डब कर एक साथ रिलीज किया गया.

यह फिल्म 2021 में प्रदर्शित सफलतम फिल्म ‘पुष्पा द राइज’ का ही सीक्वल है.पिछले एक वर्ष से इस फिल्म की प्रतीक्षा दर्शकों को थी. इसलिए यह अनुमान लगाया जा रहा था कि फिल्म ‘पुष्पा 2ः द रूल’ बौक्स औफिस पर सफलता के झंडे गाड़ेगी. लेकिन इस फिल्म ने जिस कदर बंपर कमाई की है, उस की उम्मीद किसी ने नहीं की थी.

पहले दिन से ही ‘पुष्पा 2ः द रूल’ ने शाहरुख खान की ‘पठान’ व ‘जवान’ के अलावा रोहित शेट्टी की ‘सिघम अगेन’,कार्तिक आर्यन की फिल्म ‘भूल भुलैया 3’ और श्रद्धा कपूर व राज कुमार राव की फिल्म ‘स्त्री- 2’ की कमाई के रिकौर्ड तोड़ने शुरू कर दिए थे.‘पठान’ ‘जवान’, ‘सिंघम अगेन’, ‘जिगरा’,’ स्त्री -2 ‘और ‘भूल भुलैया 3’ यह वह हिंदी की फिल्में हैं, जिन पर कारपोरेट बुकिंग, फैंस बुकिंग,बल्क बुकिंग के साथ ही फेक आंकड़े बताने के आरोप लग चुके है. मगर ‘पुष्पा 2ः द रूल’ पर अब तक इस तरह के कोई आरोप नहीं लगे.

अब तक हर फिल्म के निर्माता द्वारा दिए जाने वाले बौक्स औफिस आंकड़े और ट्रेंड पंडितों के आंकड़ों में जमीनआसमान का अंतर हुआ करता था. थिएटर अंदर से खाली होेते थे पर निर्माता बताता था कि हाउस फुल था. पर ‘पुष्पा 2ः द रूल’ के वक्त कई वर्षों बाद ब्लैक में टिकटें बिकी हैं. दर्शक सिनेमाघर से टिकट न मिलने पर निराश हो कर घर लौटा है. पर यह भी सच है कि ‘जवान’,’पठान’, ‘सिंघम अगेन’,स्त्री- 2’ और ‘भूलभुलैया 3’ की तर्ज पर ‘पुष्पा 2ः द रूल’ के निर्माताओं ने भी पहले चार दिन टिकटों के दाम 30 से 40 प्रतिशत बढ़ाए थे.

आंध्र प्रदेश व तेलंगाना सहित दक्षिण के राज्यों में फिल्म की टिकट दरें बढ़ाने के लिए वहां की सरकारों से इजाजत लेनी पड़ती है. तो इस बार तेलुगु भाषी तेलंगाना और आंध्र प्रदेश की सरकार ने 4 दिन यानी कि 5 दिसंबर से 8 दिसंबर तक के लिए टिकट के दाम 150 रुपए की बजाय 600 रुपए तक बढ़ाने की इजाजत दे दी थी. इतना ही नहीं 2023 में हैदराबाद में हुए एक हादसे के बाद से सरकार ने आंध्र प्रदेश में हर सिनेमाघर में सुबह 11 बजे से रात 8 बजे तक ही शो चलाने का नियम बना दिया था.मगर राज्य सरकार ने तेलुगु अस्मिता के नाम पर फिल्म ‘पुष्पा 2: द रूल’ के लिए पुनः नियम तोड़ कर सुबह 9 बजे पहला शुरू करने की इजाजत दे दी. मुंबई व अन्य शहरों के कुछ थिएटरो में तो चौबिसों घंटे शो चलते रहे.

‘पुष्पा 2 द रूल’ ने दिसंबर के पहले एक्सटेंडेड वीक  में विश्वभर में 1067 करोड़ रुपए ग्रौस रकम इकट्ठा, जबकि सिर्फ भारत में इस फिल्म की नेट कमाई 726 करोड़ रही. सिर्फ हिंदी भाषा मे इस फिल्म ने पूरे आठ दिवसीय सप्ताह में 436 करोड़ 50 लाख रुपए कमाए. इस तरह ‘पुष्पा 2 द रूल’ ने सिर्फ बौलीवुड ही नहीं तेलुगु,तमिल,मलयालम व कन्नड़ भाषा की हर फिल्म की कमाई के रिकौर्ड को तोड़ कर ऐसा नया रिकौर्ड  बना डाला है, जिसे तोड़ना अब किसी भी फिल्म के लिए टेढ़ी खीर हो गया है.

पता नहीं कब इस फिल्म के कमाई के रिकौर्ड तोड़ने के लिए कोई फिल्म आएगी या नहीं. ‘पुष्पा 2 द रूल’ की सिर्फ हिंदी भाषा मे प्रदर्शन से की गई कमाई की बात की जाए तो इस फिल्म ने पहले ही दिन हिंदी में 72 करोड़़ रुपए कमा कर बौलीवुड की सभी फिल्मों की कमाई के सारे रिकौर्ड घ्वस्त कर दिए थे. उस के बाद दूसरे दिन शुक्रवार को 59 करोड़, तीसरे दिन शनिवार को 74 करोड़, चौथे दिन रविवार को 86 करोड़, पांचवे दिन सोमवार को 48 करोड़, छठे दिन मंगलवार को 36 करोड़, सातवें दिन बुधवार को 31 करोड़ 50 लाख, आठवे दिन गुरूवार को 27 करोड़ पचास लाख रुपए कमाए.

Story : घर आ जाओ

‘‘मैं अब और इस घर में नहीं रह सकती. रोजरोज के झगड़े भी अब बरदाश्त के बाहर हैं. मैं रक्षा को ले कर अपनी मां के पास जा रही हूं. आप ज्यादा पैसा कमाने की कोशिश करें और जब कमाने लगें, तब मुझे बुला लेना,’’ पत्नी सुनीता का यह रूप देख कर नरेश सहम गया.

नरेश बोला, ‘‘देखो, तुम्हारा इस तरह से मुझे अकेले छोड़ कर जाना समस्या का हल नहीं है. तुम्हारे जाने से सबकुछ डिस्टर्ब हो जाएगा.’’

‘‘तो हो जाने दो. कम से कम आप को अक्ल तो आएगी,’’ सुनीता बोली. ‘‘मैं कोशिश कर तो रहा हूं. तुम थोड़ी हिम्मत नहीं रख सकतीं. मैं ने अपनेआप से बहुत समझौता किया है,’’ नरेश बोला.

‘‘मैं ने भी बहुत सहा है और आप के मुंह से यह सुनतेसुनते तो मेरे कान पक गए हैं. आप बस कहते रहते हैं, कुछ करतेधरते तो हैं नहीं.’’

‘‘मैं क्या कर रहा हूं, कहांकहां बात कर रहा हूं, क्या तुम्हें पता नहीं…’’

‘‘मुझे रिजल्ट चाहिए. आप यह नौकरी बदलें और जब ज्यादा तनख्वाह वाली दूसरी नौकरी करने लगें, तब हमें बुला लेना. तब तक के लिए मैं जा रही हूं,’’ यह कहते हुए सुनीता अपने सामान से भरा बैग ले कर बेटी रक्षा के साथ पैर पटकते हुए चली गई.

नरेश ठगा सा देखता रह गया. दरअसल, जब से उस ने नौकरी बदली है और उसे थोड़ी कम तनख्वाह वाली नौकरी करनी पड़ी है, तब से घर की गाड़ी ठीक से नहीं चल रही है. वह परेशान था, लेकिन कुछ कर नहीं पा रहा था.

घर में झगड़े की वजह से अगले दिन नरेश का दफ्तर के काम में मन नहीं लगा. उस ने सारा काम बेमन से निबटाया. छात्राओं के दाखिले का समय होने से काम यों भी बहुत ज्यादा था. यह सब सुनीता नहीं समझती थी. उस के इस नादानी भरे कदम से नरेश चिढ़ गया था.

नरेश ने भी तय कर लिया था कि अब वह सुनीता को बुलाने नहीं जाएगा. वह अपनी मरजी से गई है, अपनी मरजी से ही उसे आना होगा. रात के 10 बज रहे थे. नरेश नींद के इंतजार में बिस्तर पर करवटें बदल रहा था. इतने में मोबाइल फोन की घंटी बजी. उसे लगा, कहीं सुनीता का तो फोन नहीं. शायद उसे गलती का एहसास हुआ हो, पर नंबर देखा तो किसी और का था.

‘‘कौन?’’ नरेश ने पूछा.

‘सौरी सर, इस समय आप को डिस्टर्ब करना पड़ रहा है,’ नरेश को फोन पर आई उस औरत की आवाज कुछ पहचानी सी लगी.

‘‘कोई बात नहीं, आप बोलें?’’ नरेश ने कहा.

‘नमस्ते, पहचाना… मैं अंजू… ट्रेनिंग में दाखिले को ले कर 1-2 बार आप से पहले भी बात हो चुकी है.’

‘‘ओह हां, अंजू. तो तुम हो. कहो, इस वक्त कैसे फोन किया तुम ने?’’

‘सर, आज दिन में जब आप को फोन किया था, तो आप ने ही कहा था कि अभी मैं बिजी हूं, शाम को बात करना.’

‘‘पर इस वक्त तो रात है.’’

‘सर, मैं कब से ट्राई कर रही हूं. नैटवर्क ही नहीं मिल रहा था. अब जा कर मिला है.’

‘‘ठीक है. कहो, क्या कहना है?’’

‘सर, उस प्रोफैशनल कोर्स के लिए मेरा दाखिला तो हो जाएगा न?’

‘‘देखो, इन्क्वायरी काफी आ रही हैं. मुश्किल तो पडे़गी.’’

‘सर, दाखिले का काम आप देख रहे हैं. आप चाहें तो मेरा एडमिशन पक्का हो सकता है. मैं 2 साल से ट्राई कर रही हूं. आप नए आए हैं, पर आप के पहले जो सर थे, वे तो कुछ सुनते ही नहीं थे,’ उस की आवाज में चिरौरी थी.

‘‘आप की परिवारिक हालत कैसी है? आप ने बताया था कि आप की माली हालत ठीक नहीं है?’’ नरेश ने कहा.

‘आप को यह बात याद रह गई. देखिए, मैं शादीशुदा हूं. मेरे पति प्राइवेट नौकरी में हैं. उन की तनख्वाह तो वैसे ही कम है, ऊपर से वे शराब भी पीते हैं. वे मुझ पर बेवजह शक करते हैं. मुझे मारतेपीटते रहते हैं. मैं ऐसे आदमी के साथ रहतेरहते तंग आ गई हूं. मेरी एक बच्ची भी है.

‘मैं हायर सैकेंडरी तक पढ़ी हूं. मेरी सहेली ने ही मुझे आप के यहां के इंस्टीट्यूट के बारे में बताया था. अगर आप की मदद से मेरा ट्रेनिंग में दाखिला हो जाएगा, तो मैं आप का बड़ा उपकार मानूंगी,’ अंजू जैसे भावनाओं में बह कर सबकुछ कह गई.

‘‘देखो, इस वक्त रात काफी हो गई है. अभी दाखिले में समय है. आप 1-2 दिन बाद मुझ से बात करें.’’

‘ठीक है. थैक्यू. गुडनाइट,’ और फोन कट गया.

अगले दिन अंजू का दिन में ही फोन आ गया. बात लंबी होती थी, सो नरेश को कहना पड़ा कि वह रात को उसी समय फोन करे, तो ठीक रहेगा. रात के 9 बजे अंजू का फोन आ गया. उस ने बताया कि उस के पति के नशे में धुत्त सोते समय ही वह बात कर सकती है. नरेश अंजू के दुख से अपने दुख की तुलना करने लगा. वह अपनी पत्नी से दुखी था, तो वह अपने पति से परेशान थी.

धीरेधीरे अंजू नरेश से खुलने लगी थी. नरेश ने भी अपने अंदर उस के प्रति लगाव को महसूस किया था. उसे लगा कि वह औरत नेक है और जरूरतमंद भी. उस की मदद करनी चाहिए.

अंजू ने फोन पर कहा, ‘आप की बदौलत अगर यह काम हो गया, तो मैं अपने शराबी पति को छोड़ दूंगी और अपनी बच्ची के साथ एक स्वाभिमानी जिंदगी जीऊंगी.’

नरेश ने उस से कहा, ‘‘जब इंटरव्यू होगा, तो मैं तुम्हें कुछ टिप्स दूंगा.’’

अब उन दोनों में तकरीबन रोजाना फोन पर बातें होने लगी थीं. एक बार जब अंजू ने नरेश से उस के परिवार के बारे में पूछा, तो वह शादी की बात छिपा गया. नरेश के अंदर एक चोर आ गया था. अनजाने में ही वह अंजू के साथ जिंदगी बिताने के सपने देखने लगा था. शायद ऐसा सुनीता की बेरुखी से भी होने लगा था. अंजू ने एक बार नरेश से पूछा था कि जब वह ट्रेनिंग के लिए उस के शहर आएगी, तो वह उसे अपने घर ले जाएगा या नहीं? शौपिंग पर ले जाएगा या नहीं?

नरेश ने उस से कहा, ‘‘पहले दाखिला तो हो जाए, फिर यह भी देख लेंगे.’’

दाखिले का समय निकट आने लगा था. नरेश ने सोचा कि अब अंजू का काम होने तक तो यहां रुकना ही पड़ेगा. रहा सवाल सुनीता का तो और रह लेने दो उसे अपने मातापिता के पास.

अंजू के फार्म वगैरह सब जमा हो गए थे. इंटरव्यू की तारीख तय हो गई थी. नरेश ने अंजू को फोन पर ही इंटरव्यू की तारीख बता दी. वह बहुत खुश हुई और बताने लगी कि फीस के पैसे का सारा इंतजाम हो गया है. कुछ उधार लेना पड़ा है. एक बार ट्रेनिंग हो जाए, फिर वह सब का उधार चुकता कर देगी.

फोन पर हुई बात लंबी चली. बीच में 3-4 ‘बीप’ की आवाज का ध्यान ही नहीं रहा. देखा तो सुनीता के मिस्ड काल थे. इतने समय बाद, वे भी अभी…

उसे फोन करने की क्या सूझी? इतने में फिर सुनीता का फोन आया. वह शक करने लगी कि वह किस से इतनी लंबी बातें कर रहा था. नरेश ने झूठ कहा कि स्कूल के जमाने का दोस्त था. सुनीता ने खबरदार किया कि वह किसी औरत के फेर में न पड़े और आजादी का गलत फायदा न उठाए, वरना उस के लिए ठीक नहीं होगा.

नरेश ने कहा, ‘‘मुझ पर इतना ही हक जमा रही हो, तो मुझे छोड़ कर गई ही क्यों?’’

सुनीता ने बात को बदलते हुए नरेश को नई नौकरी की याद दिलाई. नरेश ने भी इधरउधर की बातें कर के फोन काट दिया. अभी तक अंजू से सारी बातें फोन पर ही होती रही थीं. फार्म भरा तो उस में अंजू का फोटो था. फोटो में वह अच्छीखासी लगी थी, मानो अभी तक कुंआरी ही हो. अब जब आमनासामना होगा, तो कैसा लगेगा, यह सोच कर ही नरेश को झुरझुरी सी होने लगी थी.

जैसेजैसे दिन कम होने लगे थे, वैसेवैसे अंजू के फोन भी कम आने लगे थे. शायद नरेश को अंजू के बैलैंस की फिक्र थी कि जब मिलना हो रहा है, तो फिर फोन का फुजूल खर्च क्यों? आखिरी दिनों में अंजू ने आनेजाने और ठहरने संबंधी सभी जानकारी ले ली थी.

आखिर वह दिन आ ही गया. नरेश ने अपना घर साफसुथरा कर लिया कि वह उसे घर लाएगा. सभी प्रवेशार्थी इकट्ठा होने लगे थे. सभी की हाजिरी ली जा रही थी कि कहीं कोई बाकी तो नहीं रह गया. लेकिन यह क्या, अंजू की हाजिरी नहीं थी.

नरेश तड़प उठा. जिस का दाखिला कराने के लिए इतने जतन किए, उसी का पता नहीं. यह औरत है कि क्या है. कुछ फिक्र है कि नहीं. अगर कोई रुकावट है, तो बताना तो चाहिए था न फोन पर.

नरेश ने अंजू को फोन किया, लेकिन यह क्या फोन भी बंद था. यह तो हद हो गई. इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था. मुमकिन हो कि ट्रेन लेट हो गई हो. स्टेशन भी फोन लगा लिया, तो मालूम पड़ा कि ट्रेन तो समय पर आ गई थी. अब हो सकता है कि टिकट कंफर्म न होने से वह बस से आ रही हो.

इंटरव्यू हो गए और सभी सीटों की लिस्ट देर शाम तक लगा दी गई. अब कुछ नहीं हो सकता. अंजू तो गई काम से. अच्छाभला काम हो रहा था कि यह क्या हो गया. जरूर कोई अनहोनी हुई होगी उस के साथ, वरना वह आती.

नरेश अगले 2-3 दिन लगातार फोन मिलाता रहा, पर वह बंद ही मिला. हार कर उस ने कोशिश छोड़ दी. 5वें दिन अचानक दफ्तर का समय खत्म होने से कुछ पहले अंजू का फोन आया.

‘हैलो..’ अंजू की आवाज में डर था.

नरेश उबला, ‘‘अरे अंजू, तुम्हारा दिमाग तो ठीक है. यह क्या किया तुम ने? तुम को आना चाहिए था न. मैं इंटरव्यू वाले दिन से तुम्हें लगातार फोन लगा रहा हूं और तुम्हारा फोन बंद आ रहा है. आखिर बात क्या है,’’ वह एक सांस में सबकुछ कह जाना चाहता था वह.

‘मैं आप की हालत समझ सकती हूं, पर मुझे माफ कर दें…’

‘‘आखिर बात क्या हुई? कुछ तो कहो? कहीं तुम्हारा वह शराबी पति…’’

‘दरअसल, मैं आप के यहां के लिए निकलने के पहले अपनी बेटी निशा को अपनी मम्मी के यहां गांव छोड़ने जाने के लिए सवारी गाड़ी में बैठी थी. गाड़ी जरूरत से ज्यादा भर ली गई थी.

‘ड्राइवर तेज रफ्तार से गाड़ी दौड़ा रहा था. इतने में सामने से आ रहे ट्रक से बचने के लिए ड्राइवर ने कच्चे में गाड़ी उतारी और ऐसा करते समय गाड़ी पलट गई…’

‘‘ओह, फिर…’’ आगे के हालात जानने के लिए जैसे नरेश बेसब्र हो उठा था.

‘गाड़ी पलटने से सभी सवारियां एकदूसरे पर गिरने से दबने लगीं. चीखपुकार मच गई. निशा बच्ची थी. वह भी चीखने लगी. मैं निशा के ऊपर गिर गई थी.

‘तभी कुछ मददगार लोग आ गए. थोड़ी देर और हो जाती, तो कुछ भी हो सकता था. उन लोगों ने हमें बांह पकड़ कर खींचा.

‘निशा बेहोश हो गई थी और मुझे भी चोटें आई थीं. कई सारे लोग घायल हुए थे. सभी को अस्पताल पहुंचाया गया. निशा को दूसरे दिन आईसीयू में होश आया. उस की कमर की हड्डी टूट गई थी. हम दोनों के इलाज में फीस के जोड़े पैसे ही काम आ रहे थे.

‘हम अभी भी अस्पताल में ही हैं. मैं थोड़ी ठीक हुई हूं और निशा के पापा दवा लेने बाहर गए हैं, तभी आप से बात कर पा रही हूं. ‘मुझे लग रहा था कि आप नाराज हो रहे होंगे. मुझे आप की फिक्र थी. आप ने सचमुच मेरा कितना साथ दिया. मैं आप को कभी भूल नही पाऊंगी. जब सबकुछ ठीक हो रहा था, तो यह अनहोनी हो गई. सारा पैसा खत्म होने को है. अब मेरा आना न होगा कभी. मुझे अब हालात से समझौता करना पड़ेगा.

‘लेकिन, मैं एक अच्छी बात बताने से अपनेआप को रोक नहीं पा रही हूं कि निशा के पापा अस्पताल में हमारी फिक्र कर रहे हैं. उन्हें ट्रेनिंग को ले कर, फीस को ले कर मेरी कोशिश के बारे में सबकुछ मालूम हुआ, तो वे दुखी हुए.

‘रात में उन्होंने मेरे माथे पर हाथ फेर कर सुबकते हुए कहा कि बहुत हुआ, संभालो अपनेआप को. मैं नशा करना छोड़ दूंगा. अब सब ठीक हो जाएगा.

‘इन के मुंह से ऐसा सुन कर तो जैसे मैं निहाल हो गई हूं. ऐसा लगता है, जैसे वे अब सुधर जाएंगे.’ फोन पर यह सब सुन कर तो जैसे नरेश धड़ाम से गिरा. सारे सपने झटके में चूरचूर हो गए.

आखिर में अंजू ने कहा, ‘अच्छा, अब ज्यादा बातें नहीं हो पाएंगी. रखती हूं. गुडबाय’.

नरेश ने अपना सिर पकड़ लिया. क्या सोचा था, क्या हो गया. कैसेकैसे सपने अंजू को ले कर बुन डाले थे, पर आखिर वही होता है जो होना होता है. यह सब एक याद बन कर रह जाएगा.

दफ्तर का समय पूरा हो चुका था. नरेश घर की ओर बोझिल कदमों से निकल पड़ा. घर पहुंचा तो देखा कि सुनीता बैग पकड़े रक्षा का हाथ थामे दरवाजे पर खड़ी थी.

नरेश को देख कर सुनीता ने एक मुसकान फेंकी, पर उस का भावहीन चेहरा देख कर बोली, ‘‘क्या बात है, हमें देख कर आप को खुशी नहीं हुई?’’ तब तक रक्षा नरेश के नजदीक आ चुकी थी. उस ने रक्षा को प्यार से उठा कर चूमा और नीचे खड़ा कर जेब से चाबी निकाल कर बोला, ‘‘अपनी मरजी से आई हो या पिताजी ने समझाया?’’

‘‘पिताजी ने तो समझाया ही. मुझे भी लगा कि अच्छी तनख्वाह वाली नौकरी के लिए आप की कोशिश में हमारे घर लौटने से ही तेजी आएगी.’’

‘‘सुनीता, रबड़ को उतना ही खींचो कि वह टूटे नहीं.’’

‘‘इसलिए तो चली आई जनाब.’’

दरवाजा खुल चुका था. तीनों अंदर आ गए.

‘‘अरे वाह, घर इतना साफसुथरा… कहीं कोई…’’ सुनीता ने आंखें तरेरीं.

‘‘सुनीता, अब बस भी करो. फुजूल के वहम ठीक नहीं हैं.’’

‘‘आप का आएदिन फोन बिजी होना शक पैदा करने लगा था. आप मर्दों का क्या…’’

‘‘बोल चुकीं? क्या हम सब तुम्हारे लौटने की खुशी मना सकते हैं?’’

‘‘क्यों नहीं. मैं सब से पहले चाय बनाती हूं,’’ कहते हुए सुनीता रसोईघर में चली गई. रक्षा ने टैलीविजन चलाया और नरेश फै्रश होने बाथरूम में घुस गया.

सुनीता के आने से अंजू के मामले में नरेश का सिर भारी होने से बच गया. आमतौर पर नरेश शाम को नहीं नहाता था, पर न जाने क्यों आज नहाने की इच्छा हो गई और वह बाथरूम में घुस गया.

Short Story : पत्‍नी का चुनाव

 

गाड़ी की रफ्तार धीरेधीरे कम हो रही थी. सुधीर ने झांक कर देखा, स्टेशन आ गया था. गाड़ी प्लेटफार्म पर आ कर खड़ी हो गई थी. प्रथम श्रेणी का कूपा था, इसलिए यात्रियों को चढ़नेउतरने की जल्दी नहीं हो रही थी.

सुधीर इत्मीनान से अटैची ले कर दरवाजे की ओर बढ़ा. तभी उस ने देखा कि गाड़ी के दरवाजे पर सुनहरे फ्रेम का चश्मा लगाए व सूटबूट पहने एक आदमी आरक्षण सूची में अपना नाम देख रहा था.

उस आदमी को अपना नाम दिखाई दिया तो उस ने पीछे खड़े कुली से सामान अंदर रखने को कहा.

सुधीर को उस की आकृति कुछ पहचानी सी लगी. पर चेहरा तिरछा था इसलिए दिखाई नहीं दिया. जब उस ने मुंह घुमाया तो दोनों की नजरें मिलीं. क्षणांश में ही दोनों दोस्त गले लग गए. सुधीर के कालेज के दिनों का साथी विनय था. दोनों एक ही छात्रावास में कई साल साथ रहे थे.

सुधीर ने पूछा, ‘‘आजकल कहां हो? क्या कर रहे हो?’’

विनय बोला, ‘‘यहीं दिल्ली में अपनी फैक्टरी है. तुम कहां हो?’’

‘‘सरकारी नौकरी में उच्च अधिकारी हूं. दौरे पर बाहर गया था. मैं भी यहीं दिल्ली में ही हूं.’’

वे बातें कर ही रहे थे कि गाड़ी की सीटी ने व्यवधान डाला. एक गाड़ी से उतर रहा था, दूसरा चढ़ रहा था. दोनों ने अपनेअपने विजिटिंग कार्ड निकाल कर एकदूसरे को दिए. सुधीर गाड़ी से उतर गया. दोनों मित्र एकदूसरे की ओर देखते हुए हाथ हिलाते रहे. जब गाड़ी आंखों से ओझल हो गई तो सुधीर के पांव घर की ओर बढ़ने लगे.

टैक्सी चल रही थी, पर सुधीर का मन विनय में रमा था. विनय और वह छात्रावास के एक ही कमरे में रहते थे. विनय का मन खेलकूद में ही लगा रहता था, जबकि सुधीर की आकांक्षा थी कि किसी प्रतियोगिता में चुना जाए और उच्च अधिकारी बने. इसलिए हर समय पढ़ता रहता था.

जबतब विनय उसे टोकता था, ‘क्यों किताबी कीड़ा बना रहता है, जिंदगी में और भी चीजें हैं, उन की ओर भी देख.’

‘मेरे कुछ सपने हैं कि उच्च अफसर बनूं, कार हो, बंगला हो, इसलिए मेरी मां मेरे सपने को पूरा करने के लिए जेवर बेच कर मेरी फीस भर रही है.’

उस की सब तमन्नाएं पूरी हो गई थीं. पर विनय से मिलने के बाद उसे ताज्जुब हो रहा था कि वह भी उसी की तरह गरीब परिवार से था. उस का यह कायापलट कैसे हो गया? एक फैक्टरी का मालिक कैसे बन गया? इसी उधेड़बुन में वह घर पहुंचा.

नौकर रामू ने कार का दरवाजा खोला. घर के अंदर मेज पर मां की बीमारी का तार पड़ा था. पड़ोसिन चाची ने बुलाया था.

रामू ने बताया, ‘‘मेम साहब अपनी सहेलियों के साथ घूमने गई हैं.’’

सुनते ही सुधीर को गुस्सा आ गया. वह सोच रहा था कि जब मां का तार आ गया था तो रश्मि को उन के पास जाना चाहिए था. वह उलटे पांव बस अड्डे की ओर चल दिया. वह रहरह कर रश्मि पर खीज रहा था कि उसे मां की बीमारी की जरा भी परवा नहीं है.

मां बेटे को देख प्रसन्न हो उठीं. पड़ोसिन चाची ने बताया, ‘‘तेरी मां को तेज बुखार था. हम तो घबरा गए. इसीलिए तुझे तार दे दिया. रश्मि को क्यों नहीं लाया?’’

‘‘वह अपनी मां के पास गई है. घर होती तो अवश्य आती.’’

सुधीर जानता था कि गांव के माहौल में मां के साथ रहना रश्मि को गवारा नहीं है. मां भी उस की आदतें जानती थीं, इसीलिए उन्होंने अधिक कुछ नहीं कहा.

दूसरे दिन सुधीर लौट आया था. रश्मि ने मां की बीमारी के बारे में ज्यादा पूछताछ नहीं की थी.

अगली सुबह वह अभी दफ्तर पहुंचा ही था कि रश्मि का फोन आ गया, ‘‘आज घर में पार्टी है, नौकर नहीं आया है, तुम दफ्तर के किसी आदमी को थोड़ी देर के लिए भेज दो.’’

सुधीर कुढ़ गया, पर कुछ सोचते हुए बेरुखी से बोला, ‘‘ठीक है, भेज दूंगा.’’

शाम को वह घर पहुंचा. सोचा था कि थोड़ी देर आराम करेगा और कौफी पी कर थकान मिटाएगा. वह रश्मि के पास पहुंचा. वह लेटी हुई पुस्तक पढ़ रही थी.

सुधीर को देख कर बोली, ‘‘आज मैं तो बहुत थक गई. नौकर भी नहीं आया. अब तो उठा भी नहीं जा रहा है. पर किटी पार्टी बहुत अच्छी रही. रमी में बारबार हारती ही रही, इसलिए थोड़ा जी खट्टा हो गया. आज तो रात का खाना बाहर ही खाना पड़ेगा.’’

रश्मि की बातें सुन सुधीर की कौफी पीने की इच्छा मर गई. वह पलंग पर लेट गया और सोचने लगा, ‘रश्मि का समय या तो घूमने में व्यतीत होता है या सखियों के साथ ताश खेलने में. घर के कामों में तो उस का मन ही नहीं लगता है, इसीलिए मोटी और भद्दी होती जा रही है. जब कभी मैं राय देता हूं कि घर के कामों में मन नहीं लगता है तो मत करो, लेकिन घूमने या रमी खेलने के बजाय कुछ रचनात्मक कार्य करो तो चिढ़ उठती है.’

सोचतेसोचते सुधीर सो गया. 9 बजे रश्मि ने जगाया, ‘‘चलिए, किसी होटल में खाना खाते हैं.’’

न चाहते हुए भी सुधीर को उस के साथ जाना पड़ा.

सुबह सुधीर दफ्तर जाने लगा तो रश्मि बोल उठी, ‘‘दफ्तर पहुंच कर ड्राइवर से कहिएगा कि कार घर ले आए. कुछ खरीदारी करनी है.’’

‘‘कल ही तो इतना सामान खरीद कर लाई हो, आज फिर कौन सी ऐसी जरूरत पड़ गई. अपने दोनों बच्चे मसूरी में पढ़ रहे हैं. उन का खर्चा भी है. इस तरह तो तनख्वाह में गुजारा होना मुश्किल है. ऊपरी आमदनी भी कम है, लोग पैसा देते हैं तो 10 काम भी निकालते हैं.’’

सुनते ही रश्मि के माथे पर बल पड़ गए, ‘‘बड़े भैया भी इसी पद पर हैं लेकिन उन की सुबह तो तोहफों से शुरू होती है और रात नोट गिनते हुए व्यतीत होती है. वह तो कभी टोकाटाकी नहीं करते.’’

‘‘आजकल जमाना खराब है, बहुत सोचसमझ कर कदम बढ़ाना पड़ता है. अगर कहीं छानबीन हो गई तो सारी इज्जत खाक में मिल जाएगी,’’ सुधीर बोला.

रश्मि रोंआसी हो गई, ‘‘कार क्या मांगी, पचास बातें सुननी पड़ीं.’’

सुधीर रश्मि के आंसू नहीं देख सकता था. माफी मांग कर उस के आंसू पोंछने के लिए रूमाल निकाला तो जेब से एक कार्ड गिर पड़ा.

कार्ड देख कर विनय का ध्यान आ गया, ‘‘मेरे कालेज के दिनों का मित्र इसी शहर में रह रहा है, मुझे पता ही नहीं चला. अब किसी दिन उस के घर चलेंगे.’’

रश्मि को गाड़ी भेजने का वादा कर के ही वह दफ्तर जा पाया. दफ्तर से विनय को फोन किया. दूसरे दिन छुट्टी थी. विनय ने दोनों को खाने पर आने का न्योता दे दिया.

दूसरे दिन सुधीर और रश्मि गाड़ी से विनय के घर की ओर चल पड़े. आलीशान कोठी के गेट पर दरबान पहरा दे रहा था. पोर्टिको में विदेशी गाड़ी खड़ी थी. लौन में बैठा विनय उन का इंतजार कर रहा था. उस ने मित्र को गले लगा लिया. फिर रश्मि को ‘नमस्ते’ कह कर उन्हें बैठक में ले गया.

सुधीर ने देखा कि बैठक विदेशी और कीमती सामानों से सजी हुई है. सभी सोफे पर बैठ गए. नौकर ठंडा पानी ले कर आया. रश्मि ने इधरउधर देख कर पूछा, ‘‘भाभीजी दिखाई नहीं दे रही हैं?’’

‘‘जरूरी काम पड़ गया था इसलिए फैक्टरी जाना पड़ा. आती ही होंगी,’’ विनय ने उत्तर दिया.

थोड़ी देर बाद क्षमा आती हुई दिखाई दी.

सुधीर ने देखा, इकहरे शरीर व सांवले रंगरूप वाली क्षमा सीधी चोटी और कायदे से बंधी साड़ी में भली और शालीन लग रही थी.

मेहमानों को अभिवादन कर के वह बैठ गई.

सुधीर को लगा कि इसे कहीं देखा है, पर याद नहीं आया. वह सोच रहा था, ‘रश्मि इस से सुंदर है, पर मोटापे के कारण कितनी भद्दी लग रही है.’

तभी 2 बच्चों की ‘नमस्ते’ से उस का ध्यान टूटा. दोनों बच्चे मां के पास बैठ गए थे. सुधीर ने देखा, बच्चे भी मांबाप के प्रतिरूप हैं. शीघ्र ही मां से खेलने जाने की आज्ञा मांगी तो क्षमा ने कहा, ‘‘जाओ, खेल आओ, परंतु खाने के समय आ जाना.’’

फिर वह रश्मि से बोली, ‘‘आप बच्चों को क्यों नहीं लाईं?’’

रश्मि के चेहरे पर गर्वीली मुसकान छा गई. कटे हुए बालों को झटक कर कहा, ‘‘दोनों बच्चे मसूरी में पढ़ते हैं, घर में ठीक से पढ़ाई नहीं हो पाती है.’’

क्षमा ने बच्चों को स्नेह से देखा, जो बाहर खेलने जा रहे थे, ‘‘मैं तो इन के बिना रह ही नहीं सकती.’’

विनय और सुधीर अपने कालेज के दिनों की बातें कर रहे थे, जैसे कई साल पीछे पहुंच गए हों.

क्षमा को देख कर विनय बोला, ‘‘यह तो हमेशा पढ़ाई में लगा रहता था, लेकिन मैं खेलने में मस्त रहता था. परीक्षा के दिनों में यह मेरे पीछे पड़ा रहता कि किसी तरह से कुछ याद कर लूं. तब मैं इस का मजाक उड़ाता था. आज यह अपनी मेहनत और लगन से ही उच्च ओहदे पर पहुंचा है.’’

सुधीर ने हंसते हुए कहा, ‘‘भाभीजी, झगड़ा यह करता था, निबटाने मैं पहुंचता था.’’

दोनों दोस्त बातों में मगन थे कि फोन की घंटी बजी. विनय कुछ देर बात करने के बाद पत्नी से बोला, ‘‘बाहर से कुछ लोग आए हैं, वे व्यापार के सिलसिले में हम से बात करना चाहते हैं. तुम्हारे पास कब समय है? वही समय उन्हें बता दूं. जरूरी मीटिंग है, हम दोनों को जाना होगा.’’

क्षमा ने घड़ी देख कर कहा, ‘‘कल की मीटिंग रख लीजिए, मैं फैक्टरी पहुंच जाऊंगी.’’

देखने में साधारण व घरेलू लगने वाली महिला क्या मीटिंग में बोल पाएगी? कैसे व्यापार संबंधी बातचीत करती होगी? सुधीर क्षमा को ताज्जुब से देख रहा था.

उस की शंका का समाधान विनय ने किया, ‘‘क्षमा बहुत होशियार हैं, कुशाग्रबुद्धि और मेहनती हैं. इन्हीं की असाधारण प्रतिभा और मेहनत के कारण ही छोटी सी दुकान से शुरू कर के आज हम फैक्टरी के मालिक बन गए हैं.’’

क्षमा ने बातों का रुख बदलते हुए कहा, ‘‘चलिए, खाना लग गया है.’’

सभी भोजनकक्ष में आ गए तो क्षमा ने बच्चों को भी बुला लिया. खाने की मेज पर कुछ भारतीय तो कुछ विदेशी व्यंजन दिखाई दे रहे थे.

रश्मि ने कहा, ‘‘आप को तो घर का काम देखने की फुरसत ही नहीं मिलती होगी क्योंकि फैक्टरी में जो व्यस्त रहती हैं.’’

विनय ने पत्नी की ओर प्रशंसाभरी नजरों से देखते हुए कहा, ‘‘यही तो इन की खूबी है, खाना अपने तरीके से बनवाती हैं. जिस दिन ये रसोई में नहीं जातीं तो बच्चों का और मेरा पेट ही नहीं भरता.’’

बच्चे खाना खा कर अपने कमरे में जा चुके थे. उन के हंसनेबोलने की आवाजें आ रही थीं. सारा माहौल अत्यंत खुशनुमा प्रतीत हो रहा था, जबकि सुधीर को अपना सूना घर कभीकभी अखर जाता था. वह तो चाहता था कि बच्चे घर पर ही पढ़ें. पर इस से रश्मि की आजादी में खलल पड़ता था. दूसरे, जिस तरह का जीवन रश्मि जी रही थी, उस माहौल में बच्चे पढ़ ही नहीं सकते थे. इसीलिए उन्हें मसूरी भेज दिया था.

जाड़ों की धूप का अलग ही आनंद होता है. खाना खा कर सभी धूप में बैठ कर गपशप करने लगे. गरमागरम कौफी भी आ गई. विनय ने पूछा, ‘‘मां कैसी हैं? मुझे तो उन्होंने बहुत प्यार दिया है.’’

‘‘वे रुड़की से आना ही नहीं चाहतीं. हम लोग तो बहुत चाहते हैं कि वे यहीं रहें,’’ सुधीर ने उदास स्वर में उत्तर दिया.

विनय ने बताया, ‘‘क्षमा का मायका भी रुड़की में ही है. इस तरह तो तू उस का भाई हुआ और मेरा साला भी बन गया. दोस्त और साला यानी पक्का रिश्ता हो गया.’’

विनय हंसा तो साथ में सभी हंस पड़े. अब सुधीर को सारी कहानी समझ में आ गई थी कि क्षमा को कहां और कब देखा था? उस की पढ़ाई समाप्त हो चुकी थी. मनमाफिक नौकरी मिल चुकी थी. दिलोदिमाग पर अफसरी की शान छाई थी. शादी के लिए हर तरह के रिश्ते आ रहे थे. लेकिन उस के दिमाग में ऐसी लड़की की तसवीर बन गई थी जो जिंदगी की गाड़ी तेजी से दौड़ा सके, जिस की रफ्तार धीमी न हो.

मां ने क्षमा की फोटो दिखाई थी. एक दिन वह उस को देखने उस के घर जा पहुंचा था. साधारण वेशभूषा में दुबलीपतली सांवले रंगरूप वाली क्षमा ने आ कर नमस्कार किया था.

तब सुधीर ने सोचा कि अगर इस साधारण सी लड़की से शादी की तो जिंदगी में कुछ चमकदमक नहीं होगी और न ही कोई नवीनता, वही पुरानी घिसीपिटी धीमी गति से गाड़ी हिचकोले खाती रहेगी.

उस का ध्यान दीनानाथ की बातों से टूटा था, ‘क्षमा बहुत कुशाग्रबुद्धि है, हमेशा प्रथम आई है. खाना तो बहुत ही अच्छा बनाती है. यह गुलाबजामुन इसी के बनाए हुए हैं.’

सुधीर यह कह कर लौट आया था कि मां से सलाह कर के जवाब देगा. रश्मि सुधीर के एक मित्र की बहन थी. जब वह आधुनिक पोशाक में उस के सामने आई तो सौंदर्य के साथसाथ उस की शोखी और चपलता भी सुधीर को भा गई.

उस ने सोचा, ‘यही लड़की मेरे लिए ठीक रहेगी. कहां क्षमा जैसी सीधीसादी लड़की और कहां यह तेजतर्रार आधुनिका…दोनों की कोई तुलना नहीं.’

सुधीर ने मां को फैसला सुना दिया और रश्मि उस की सहचरी बन गई.

अब उसे लग रहा था कि वास्तव में क्षमा की रफ्तार ही तेज है. रश्मि तो फिसड्डी और घिसीपिटी निकली, जिस में न कुछ करने की उमंग है, न लगन.

Jagdeep Dhankar : धनखड़ के खिलाफ क्‍यों एकजुट है विपक्ष

संसद में शीत सत्र चल रहा है लेकिन भीतर का माहौल बिलकुल गरम है. राज्यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ इस की धुरी बन गए हैं.

“मैं ने हमेशा कहा है कि राष्ट्र की एकता और अखंडता के लिए हमें एकजुट रहना होगा. जो लोग देश की एकता और अखंडता के खिलाफ बोलते हैं, वे देशद्रोही हैं.”  जगदीप धनखड़, सभापति, राज्यसभा, उपराष्ट्रपति. यह उद्धरण जगदीप धनखड़ की चाटुकारिता और सरकार के प्रति अनुकूलता को दर्शाता है. दरअसल, वे सरकार के प्रति अत्यधिक अनुकूल हैं और आलोचना को बर्दाश्त नहीं करते हैं. उन के कार्यकाल में राज्यसभा में लिए गए कुछ फैसले भी उन के विपक्ष के प्रति सोच को उजागर करते हैं.

इन में से कुछ प्रमुख फैसले हैं :

– विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को खारिज करना : जगदीप धनखड़ ने विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव को खारिज कर दिया, जिसे विपक्ष ने उन के खिलाफ पेश किया था.
– विपक्षी सांसदों को निलंबित करना : जगदीप धनखड़ ने विपक्षी सांसदों को निलंबित करने का फैसला किया, जिसे विपक्ष ने उन के खिलाफ प्रदर्शन के रूप में देखा.
– संसदीय नियमों का पालन न करना : जगदीप धनखड़ पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने संसदीय नियमों का पालन नहीं किया और विपक्ष को बोलने का मौका नहीं दिया.
– विपक्ष की याचिकाओं को खारिज करना : जगदीप धनखड़ ने विपक्ष की कई याचिकाओं को खारिज कर दिया, जिन में सरकार की नीतियों की आलोचना की गई थी.
– संसदीय समितियों की रिपोर्टों को दबाना : जगदीप धनखड़ पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने संसदीय समितियों की रिपोर्टों को दबाने का प्रयास किया, जिन में सरकार की नीतियों की आलोचना की गई थी.

एक बार फिर उपराष्ट्रपति के पद पर रहते हुए जगदीप धनखड़ ने अपनी बात को कुछ उलटपुलट कर के दोहराया है. 2014 के पश्चात नरेंद्र मोदी की सरकार के दरमियान जबजब प्रधानमंत्री गृहमंत्री या सरकार के किसी बड़े चेहरे पर कोई सवाल उठता है तो कहा जाने लगा है कि यह तो भारत की छवि खराब करने का प्रयास किया जा रहा है. ऐसा पहले कांग्रेस की सरकार या अन्य किसी सरकार के दरमियान कभी नहीं हुआ. यह एक ऐसी बारीक रेखा है जिसे आम आदमी नहीं समझ सकता.

दरअसल 5 वर्षों के लिए इस देश को विकास के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए देश की जनता द्वारा सरकार चुनी जाती है. वह कोई देश नहीं होती है यह स्पष्ट है मगर यह खेल हमारे देश मंि चल रहा है कि इन दिनों जब सरकार पर कोई सवाल खड़ा होता है तो कहा जाता है कि देश की छवि खराब की जा रही है और इस तरह अपनेआप को बचाया जाता रहा है.

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के बयानों पर विवाद की स्थिति है, वे अपनेआप को भारत समझते हैं, यह अतिशयोक्ति पूर्ण है. दरअसल विपक्ष के सवालों का जवाब देना और संवाद में शामिल होना लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

उपराष्ट्रपति पद की गरिमा और संवैधानिक भूमिका को ध्यान में रखना चाहिए. वे सवालों से बच नहीं सकते हैं और न ही अखंडता के सवाल को उठा सकते हैं. संविधान के मुताबिक लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है, और उन्हें सरकार और उस के अधिकारियों के कार्यों की आलोचना करने का अधिकार है. उपराष्ट्रपति को भी इस आलोचना का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए और इस का जवाब देना चाहिए. जब विपक्ष को अधिकार है तो फिर संप्रभुता और अखंडता कहां से आ गई, यह एक जटिल मुद्दा बन कर सामने है.

दरअसल, संप्रभुता और अखंडता दो अलगअलग अवधारणाएं हैं जो एकदूसरे से जुड़ी हुई हैं. संप्रभुता का अर्थ है किसी भौगोलिक क्षेत्र या जन समूह पर सत्ता या प्रभुत्व का सम्पूर्ण नियंत्रण. अखंडता का अर्थ है किसी देश या राज्य की एकता और अखंडता को बनाए रखना.
जब विपक्ष को अधिकार है, तो उन के सवाल और व्यवहार देश की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित नहीं करता है. विपक्ष का अधिकार संविधान द्वारा प्रदान किया गया है, और यह अधिकार विपक्ष को सरकार की नीतियों और कार्यों की आलोचना करने और उन्हें सुधारने के लिए प्रेरित करने के लिए दिया गया है.

यह महत्वपूर्ण है कि विपक्ष अपने अधिकार का उपयोग संविधान के अनुसार करे और सरकार की नीतियों और कार्यों की आलोचना करने के लिए प्रेरित करे, न कि उन्हें बाधित करने की कोशिश करे. उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के बयानों पर चर्चा का माहौल बन सकता है, विपक्ष के सवालों का जवाब देना और संवाद में शामिल होना सरकार सत्ता का दायित्व है यह लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.

यहां उल्लेखनीय है कि उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के कुछ बयानों पर पहले भी विवाद हुआ है

– राज्यसभा में विपक्ष के सदस्यों द्वारा उन के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने पर उन्होंने कहा था कि यह देश की अखंडता और भारत की बात करने का समय है.
यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि उपराष्ट्रपति को पद की गरिमा और संवैधानिक भूमिका को ध्यान में रखना चाहिए. और व्यवहार मर्यादित रखना चाहिए.
मजेदार है कि भाजपा शासन काल में कई घटनाएं घटित हुई हैं जब प्रधानमंत्री, गृहमंत्री या उपराष्ट्रपति की आलोचना को देश और अखंडता का सवाल बना दिया गया है.

जबजब प्रधानमंत्री की आलोचना

जब विपक्षी दल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की आलोचना करते हैं, तो अकसर उन्हें देशद्रोही या राष्ट्र-विरोधी बता दिया जाता है. जब विपक्षी दल गृहमंत्री अमित शाह की नीतियों की आलोचना करते हैं, तो अकसर उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बता दिया जाता है. जब विपक्षी दल उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ की नीतियों की आलोचना करते हैं, तो अकसर उन्हें संविधान की अवहेलना करने वाला बता दिया जाता है. इन उदाहरणों से पता चलता है कि भाजपा शासन काल में आलोचना को अकसर देश और अखंडता का सवाल बना दिया जाता है, जो लोकतंत्र के मूल्यों के विरुद्ध है.

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