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लॉन्च होने के दो दिन पहले ही शुरू हुई कार की बुकिंग

भारत की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने जुलाई 2015 में अपना प्रीमियम डीलरशिप नेटवर्क नेक्सा का शुभारंभ किया था. इस नेक्सा चेन के तहत अब मारुति सुजुकी की अगली बेची जाने वाली प्रीमियम कार मारुति सुजुकी Baleno RS को 3 मार्च को लॉन्च किया जाना है.

कंपनी की कुल बिक्री में Nexa कुल 18 प्रतिशत का योगदान देता है. साल 2016 के अंत तक Nexa डीलरशिप कंपनी की कार के केवल दो ही मॉडल बेचता था. अब 2017 में Nexa ने अपने और कंपनी के पोर्टफोलियो में चार और नये मॉडल जोड़ने के लिए योजना बनाई है.

मारुति सुजुकी ने 2 दिन पहले ही अपनी Baleno RS हैचबैक की ऑनलाइन बुकिंग शुरू कर दी है. इस बुकिंग के लिए आपको शुरुआत में 11 हजार रुपये चुकाने होंगे. Baleno RS को नेक्सा की बेबसाइट www.nexaexperience.com पर जाकर बुक किया जा सकता है.

बलेनो मारुति सुजुकी की हमेशा ही एक लोकप्रिय कार रही है. कार के इस नए वर्जन को केवल पेट्रोल इंजन के साथ ही उतारा जाएगा. 3 मार्च को लॉन्च होने वाली इस कार में 1 लीटर का बूस्टरजेट डायरेक्ट इंजेक्शन टर्बो पेट्रोल इंजन लगा होगा.

मारुति सुजुकी इंडिया के अनुसार इस कार में सेफ्टी फीचर्स का खासा ख्याल रखा गया है. इसमें डुबल एयरबैग्स दिए गए हैं. बैलेनो की पेट्रोल रेन्ज वाली सभी कार 5.28 लाख रुपये से शुरू होती हैं. 8 से 9 लाख रुपये के बीच इस कार की कीमत की उम्मीद लगाई जा रही है. हालांकि कंपनी इस कार का प्राइस लॉन्चिंग वाले दिन ही सबके सामने रखेगी. अभी मार्केट में मौजूद बेलेनो के पेट्रोल और डीजल कारों की कीमत 5.11 लाख से 8.16 लाख रुपये तक है. इस लिहाज से यह उम्मीद की जा रही है कि Baleno RS की कीमत इससे ज्यादा या आसपास हो सकती है.

कमेंट्री छोड़ बंगलुरु में रिक्शा चला रहे हैं क्लार्क

ऑस्ट्रेलियाई टीम के पूर्व कप्तान माइकल क्लार्क क्रिकेट के इतर एक खास वजह से सुर्खियों में बने हुए हैं. भारत दौरे पर बतौर कमेंटेटर आए क्लार्क यहां की गलियों में रिक्शा चला रहे हैं. क्लार्क ने इंस्टाग्राम पर एक वीडियो शेयर किया है, जिसमें वे रिक्शा चलाते नजर आ रहे हैं.

यह पहला मौका नहीं हैं जब कोई क्रिकेटर रिक्शा चला रहा हो. क्लार्क से पहले भी कई दिग्गज खिलाड़ी रिक्शा चला चुके हैं. 2015 में श्रीलंका दौरे पर विराट कोहली और स्टुअर्ट बिन्नी भी रिक्शा चला चुके हैं. आपको बता दें की क्लार्क ने अपना टेस्ट करियर बंगलुरु से ही शुरू किया था.

वीडियो के शुरूआत में क्लार्क को रिक्शा चलाने का टिप्स लेते हे देखा जा सकता है. इसके बाद उन्होंने अकले ही तेजी से रिक्शा चलाया.

क्लार्क द्वारा शेयर किया गया यह वीडियो सोशल नेटवर्किंग साइट्‍स पर धूम मचा रहा है. देखिए क्लार्क का यह वाइरल वीडियो.

कौन बनेगा ऊधम सिंह

रणवीर कपूर के सितारे गर्दिश से उबरने का नाम नहीं ले रहे हैं. कोई भी फिल्मकार उन्हें ले कर फिल्म शुरू नहीं करना चाहता. उन के सर्वाधिक चहेते फिल्मकार इम्तियाज अली और अयान मुखर्जी ने भी रणवीर कपूर के नाम पर चुप्पी साध रखी है. लंबे समय से चर्चा चल रही थी कि फिल्मकार सुजीत सरकार क्रांतिकारी ऊधम सिंह के नाम से बन रही फिल्म में ऊधम सिंह का किरदार निभाने के लिए रणवीर कपूर को फिल्म के साथ जोड़ रहे हैं, मगर अब उन्होंने ऐलान कर दिया है कि वे रणवीर कपूर को ऊधम सिंह नहीं बना रहे हैं.
सुजीत सरकार ने कहा है, ‘‘यह बात मेरी समझ से परे है कि इस तरह की बिना सिरपैर की खबरें कहां से उड़ रही हैं. मैं ऊधम सिंह के किरदार के लिए रणवीर कपूर के नाम पर विचार ही नहीं कर रहा हूं. इस संबंध में रणवीर कपूर से भी मेरी कोई बात नहीं हुई है.’’

शाहिद संग कंगना के कामुक सींस

बॉलीवुड अदाकारा कंगना राणावत ने माना है कि विशाल भारद्वाज निर्देशित फिल्म ‘रंगून’ में उन्होंने कुछ ऐसे सीन भी किए हैं जिन्हें कामुक कहा जा सकता है. फिल्म में शाहिद कपूर और कंगना राणावत के बीच बारिश के अलावा कीचड़ में चुंबन सीन नजर आते हैं. इस तरह के दृश्यों को करने में कंगना खुद को असहज महसूस करती थीं.
 
शाहिद कपूर की चर्चा करते हुए कंगना कहती हैं, ‘‘शाहिद कपूर का मूड हर दिन बदलता रहता है. कभी दोस्ताना स्वभाव, तो कभी शंकास्पद स्वभाव. वैसे भी, मुझे फिल्म में अंतरंग सीन पसंद नहीं हैं. इस तरह के सीन फिल्माना बहुत कठिन होता है. किसी के साथ आप के संबंध बहुत साधारण होते हैं, पर कुछ मिनटों के बाद आप उस के मुंह में अपना मुंह लगा रहे होते हैं, यह कैसे आसान हो सकता है. इतना ही नहीं, शाहिद कपूर की मूंछें भी बहुत परेशान करती थीं.’’
 
कुल मिला कर फिल्म ‘रंगून’ के सैट पर कंगना राणावत और शाहिद कपूर के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं थे, मगर कंगना ने इस तरह काम किया कि शाहिद के साथ उन के चुंबन व कामुक सींस देख कर कोई कह नहीं सकता कि उन के बीच संबंध अच्छे नहीं रहे हैं.

अनुकूल माहौल से उछला बाजार

वैश्विक स्तर पर शेयर बाजारों में तेजी के रुझान, दिसंबर में तीसरी तिमाही में कंपनियों के परिणाम, रुपए में लगातार मजबूती रहने तथा अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में तेजी आने के कारण शेयर बाजार का रुख बदला, इस में उत्साह आया और यह तेजी की तरफ रहा.

उतारचढ़ाव के बीच शेयर बाजार में इस दौरान स्थिति सकारात्मक रही और सूचकांक 28,000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर चला गया. इस अवधि में रुपए में तेजी का माहौल रहा और फरवरी के पहले सप्ताह में यह 3 माह के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया. इस से पहले सप्ताह में अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 7 मुसलिम देशों में आव्रजन वीजा पर रोक लगाने का जबरदस्त असर बाजार पर देखने को मिला.

बाजार के लिए राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियां उत्साहजनक साबित नहीं हो रही हैं

और इसी से घबरा कर उन की ताजपोशी केसमय दुनियाभर के शेयर बाजारों में गिरावट रही. इस के बाद बाजार में सुधार हुआ और अच्छे संकेतों के कारण सूचकांक 675 अंक की तेजी तक पहुंचा. इस दौरान स्टेट बैंक औफ इंडिया तथा अन्य प्रमुख सेवाओं के परिणाम अच्छे रहने का बाजार पर जोरदार असर रहा और सूचकांक तेजी पर बंद हुआ. साथ ही, चौतरफा अच्छे संकेतों के कारण बाजार मजबूती पर रहा.

केंद्रीय बजट : सड़े सेब पर सुनहरा लेप

हैडलाइनें जो देश के प्रमुख समाचारपत्रों के मुख्य पृष्ठों पर 2 फरवरी को प्रकाशित हुईं या 1 फरवरी को टीवी न्यूज चैनलों ने हल्ले में कहीं, बार बार कहीं और विशेषज्ञों के माध्यम से कहलवाईं, उन में जो कहा गया और बजट प्रस्तावों की सत्यता में कितना मेल है, जरा देखें और समझें :

टाइम्स औफ इंडिया : ‘वूविंग हैव-नौट्स’, हिटिंग हैव-नोट्स, यानी बजट ने उन्हें खुश किया जिन के पास कुछ नहीं है और उन पर प्रहार किया जिन के पास नोटों के भंडार हैं.

इंडियन ऐक्सप्रैस : ‘नो-नौनसैंस बजट’. यानी बिना खराबी वाला बजट.

इकोनौमिक टाइम्स : ‘नो फायरवर्क्स, एफएम शूट्स स्ट्रेट’. यानी आतिशबाजी नहीं, सीधा निशाना.

दैनिक जागरण : ‘सियासत में कालेधन पर चाबुक’, यानी नेताओं के कालेधन पर लगाम कसी और उन्हें पकड़ कर उन पर चाबुक चलेगा.

हिंदुस्तान टाइम्स :  ‘सेफ बजट, हाइक्स रूरल, इन्फ्रा स्पैंड’. यानी पूरी तरह से जनहित का सुरक्षित बजट.

नवभारत टाइम्स : ‘जेटली ने साधा टैक्स चोरों पर निशाना’, और ‘मितरो’… यानी अरुण जेटली इस बजट के जरिए टैक्सचोरों को निशाने पर ले रहे हैं और मितरो का मतलब तो हर कोई जानता है ही.

अमर उजाला : ‘जेब में आई उम्मीदें.’ यानी इस बजट से आम जनता की जेबें भर जाएंगी.

जी न्यूज : ‘युवाओं पर फोकस’. यानी रोजगार का खजाना निकलेगा और युवाओं के लिए रोजगार संबंधी ढेरों फायदे.

इंडिया टीवी और न्यूज 24 : ‘नया नोट नया बजट’. यानी इस बार बजट में जनता के लिए काफी कुछ नया है.

आज तक : ‘किसानों के लिए सरकार ने खोला पिटारा’. यानी बजट से अब किसानों की खस्ता हालत में सुधार होगा.

हिंदुस्तान : ‘जेटली का बजट दांव,  करोड़ों मतदाताओं पर करम’. यानी बजट के नाम पर आम जनता और राज्यों के चुनावों के करदाताओं पर कोई एहसान किया गया है.

हैडलाइन और खबर में फर्क

इन शीर्ष खबरों और बजट प्रस्तावों में क्या कोई तालमेल है? बिलकुल नहीं. कैसे? आइए जानते हैं. उदाहरण के तौर पर ‘वूविंग हैव-नौट्स’, हिटिंग हैव-नोट्स वाली हैडलाइन से लगता है कि उन्हें खुश किया जा रहा है जिन के पास पैसे नहीं हैं. यहां गरीबों की बात की जा रही है.

सवाल है कि इन के लिए बजट में ऐसी कौन सी घोषणा कर दी गई है जो आने वाले बजट साल यानी 2017-18 में इन लोगों को खुश कर देगी, जिन के पास पैसे नहीं हैं. यह एक तरह का फरेब है. वजह, इस अखबार ने जिस दिन यह खबर प्रकाशित की थी, उसी दिन घरेलू गैस यानी एलपीजी के 67 रुपए महंगी होने की खबर भी छपी थी. क्या इसी महंगाई से, जिन के पास कुछ नहीं है, उन्हें राहत मिल जाएगी?

बजट समाचार कुछ और ही सब्जबाग दिखा रहा है लेकिन बजट प्रस्तावना में गरीबों के लिए कोई खास तोहफा नहीं है. बजट भाषण या प्रस्तावों में वही बातें दोहराई गई हैं जो अरुण जेटली से पहले प्रणब मुखर्जी, मनमोहन सिंह, मोरारजी देसाई से ले कर पी चिदंबरम आदि कमबढ़ती दोहराते रहे हैं, जब वे देश के वित्त मंत्री थे.

अरुण जेटली ने 5 लाख रुपए सालाना तक की आय वाले करदाताओं के लिए कर की दर को मौजूदा 10 प्रतिशत से घटा कर 5 प्रतिशत कर दिया. यानी अब साढ़े 3 लाख रुपए के टैक्सयोग्य इनकम वाले व्यक्ति को सिर्फ 2,575 रुपए टैक्स देना होगा, जो पहले 5,150 रुपए देने पड़ते थे. यह तो ऊंट के मुंह में जीरा है.

एक तरफ एलपीजी महंगी कर दी गई और दूसरी तरफ केंद्र सरकार कहती है कि अगले वित्तवर्ष से राशन की दुकानों से बिकने वाली चीनी के लिए वह राज्यों को 18.50 रुपए प्रतिकिलो के हिसाब से सब्सिडी नहीं देगी. इस से जाहिर है कि चीनी के दाम बढ़ सकते हैं. यानी देश में राशन, पानी और गैस से ले कर हर सामान महंगा और टैक्स का बोझ डाल कर बेचा जाएगा. फिर भी बजट में जिन के पास नोट नहीं हैं, उन को खुश करने के झूठे दावे किए जा रहे हैं.

वित्त मंत्री इस गलतफहमी में हैं कि कैशलैस इकोनौमी से टैक्स की वसूली बढ़ेगी, लेकिन आखिर में यह भार आम जनता पर ही बढ़ेगा क्योंकि पहले आम लोग राशन की दुकानों से नकद माल खरीद कर जिस थोड़े से टैक्स से बचते थे अब उन्हें उस पर भी कई तरह के सर्विस व वैटनुमा टैक्स देने होंगे. इस से आम लोगों की जेब, जो पहले से ही खाली है, और खाली होगी. क्या सिर्फ टैक्स में 2,575 रुपए की राहत मिलने भर से इसे महान बजट बता कर इस का महिमामंडन करना जायज है?

यह बजट ‘नो-नौनसैंस’ कैसे हो सकता है? बजट में जिन योजनाओं व घोषणाओं को सौगात बता कर वित्त मंत्री और अखबार पेश कर रहे हैं, वे सौगातें क्या बजट साल 2017-18 के बीच जनता को मिल जाएंगी? बिलकुल नहीं. इस शीर्षक का मतलब निकालें,  तो आम बजट बहुत ही व्यावहारिक, अर्थपूर्ण व सटीक है. बजट की घोषणा के पहले दिन ही बिना किसी योजना के कार्यान्वयन के ढांचे या बजट में किए गए वादों की समयसीमा जाने बिना अखबार ने इसे रामायण की तर्ज पर संपूर्ण बजट होने के भरम की तरह रचा है.

शीर्षक ‘नौकरीपेशा की लौटरी’ और ‘युवाओं पर फोकस’ का ढोल बजा कर भ्रम फैलाया जा रहा है कि बजट की टैक्स नीतियों से रोजगार और नौकरियों के अवसर बढ़ेंगे, लेकिन ऐसा कुछ नहीं होने वाला. नरेंद्र मोदी सरकार की 2 दर्जन से अधिक योजनाएं रोजगार व आमदनी बढ़ाने में विफल रही हैं. हमारी अर्थव्यवस्था सिर्फ खपत के इंजन पर चल रही है, जिस में नई नौकरियां पैदा नहीं हो रहीं. देश में एकतिहाई लोग बेरोजगार हैं, जबकि वर्ष 2015 में सिर्फ 1.35 लाख नौकरियों का ही सृजन हुआ. मिलीं कितनों को, यह बाद की बात है. विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार, आटोमेशन (स्वचालन) की बदौलत भारत में 69 फीसदी नौकरियों पर तलवार लटक रही है. ऐसे में यह बजट देश के युवाओं को पर्याप्त रोजगार कैसे देगा?

एक करोड़ लोगों को रोजगार के हवाई सपने दिखा रहे इस बजट से क्या अगले साल तक इतने रोजगार मिलना संभव हैं? कहां से पैदा होंगी इतनी नौकरियां? वह भी तब जब भारतीय आईटी कंपनियों की 60 फीसदी आमदनी अमेरिका से होती है, जो नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की बेतुकी नीतियों की वजह से खतरे में हैं.

डिजिटल इकोनौमी से भारत में बेरोजगारी बढ़ने के साथ अमेरिकी इंटरनैट कंपनियों को अनुचित फायदा हो रहा है,  जिस के लिए बजट में समुचित प्रावधान नहीं किए गए. ऊपर से डोनाल्ड ट्रंप भारत में काम कर रही मल्टीनैशनल कंपनियों, जो माल यहां से बना कर अमेरिका भेजती हैं, पर भी चाबुक चलाने की फिराक में हैं. ऐसे में रोजगार के हालात बदतर ही होंगे. लेकिन बजट में सब हरा ही हरा बताया व दिखाया जा रहा है.

दावों की लौलीपौप

बजट प्रस्तावना में किसानों के लिए सिंचाई से ले कर तरहतरह के कर्ज और सुविधाओं के दावे हैं. ‘किसानों के लिए सरकार ने खोला पिटारा,’ ‘किसानों के लिए 10 लाख करोड़ रुपए का कर्ज’, ‘पूर्वोत्तर और जम्मूकश्मीर के किसानों को प्रमुखता’, ‘मनरेगा के लिए 48 हजार करोड़ रुपए का प्रावधान’, ‘गांवों में 10 लाख तालाब’, ‘कोऔपरेटिव बैंकों में सेवाओं को डिजिटल बनाने के लिए 3 साल में 1,900 करोड़ रुपए का प्रस्ताव’ जैसी बड़ीबड़ी बातें कही गई हैं. इस के अलावा ‘नाबार्ड के अंतर्गत डेयरी प्रोसैसिंग इन्फ्रा फंड के तहत 8,000 करोड़ रुपए का प्रावधान’ और ‘फसल बीमा योजना की रकम 5,500 करोड़ रुपए से बढ़ा कर 13 हजार करोड़ रुपए’ जैसे लुभावने वादे हैं. ऐसे वादे हर साल किए जाते हैं. हकीकत से उन का कोई लेनादेना नहीं है.

किसानों के लिए बजट का भला क्या महत्त्व है. 5 वर्षों में उन की आय दोगुनी होने के बजाय आधी रह जाएगी. उन की समस्या है उत्पादन का उचित दाम न मिलना, बिचौलियों के चलते उन की मेहनत किसी और की जेबों में चली जाती है.

‘गुजरात व झारखंड में 2 नए एम्स’ खोलने की घोषणा ऐसे की गई है मानो दोनों अस्पताल अगले ही साल बन कर जनता के इलाज के लिए खोल दिए जाएंगे. ‘लंबी सड़कों का निर्माण होगा’, ‘स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा’, ‘रोजगार के मौके आएंगे’, ‘देश का हर गांव बिजली से संपन्न होगा’, और ‘शिक्षा का स्तर सुधरेगा’ जैसे तमाम अच्छे दिनों की तर्ज पर गढ़े गए जुमले मोदी सरकार ने बजट की फर्जी दूरदर्शिता वाली स्कीम में फिट कर दिए हैं, जिन को मीडिया ने हाइलाइट किया है. लंबी सड़कें कब बनेंगी? कौन इन्हें नापने जाएगा कि कितनी सड़कें बनी हैं?

सरकार देशभर में पहले से मौजूद सरकारी अस्पतालों की हालत तो दुरुस्त कर नहीं सकी और बातें नए एम्स बनाने की कर रही है. देश की प्रगति के लिए व स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के लिए नए बड़े अस्पताल बनाना ठीक है, पर ऐसा होने में सालों लग जाएंगे. इस से अच्छी पहल तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में ‘मोहल्ला क्लिनिक’ बनाने की है, जो घोषणा करने के बाद न सिर्फ तुरंत बन गए, बल्कि राजधानी के तकरीबन हर मोहल्ले में सफलतापूर्वक चल भी रहे हैं. वहां मुफ्त इलाज और जांचें हो रही हैं. मरीज का हाथोंहाथ औनलाइन रिकौर्ड भी बन रहा है, ताकि अगली बार आने पर उस को ब्योरा दोबारा न देना पड़े और इलाज सुचारु रूप से चल सके.

सीधा निशाना किस पर?

‘नो फायर वर्क्स, एफएम शूट्स स्ट्रेट’ शीर्षक के हिसाब से जो सीधा निशाना साधा गया है, वह किस पर साधा गया है, पता नहीं. नोटबंदी के नाम पर कालेधन वालों को निशाना बताया गया लेकिन शिकार हो गया गरीब. जो चंद नोटों को बदलवाने के लिए हफ्तों बैंकों की लाइनों में धक्के खाता रहा. क्या ऐसा ही सीधा निशाना फिर से बजट के माध्यम से साधा गया है? अगर ऐसा है तो यह आम जनता के लिए चिंता की बात है. इस में टैक्स देने वाले लोग भी पिसे हैं.

वित्त मंत्री अरुण जेटली ने टैक्स देने वालों के आंकड़े पेश करते हुए बताया कि साल 2015-16 में कुल 3 करोड़, 70 लाख लोगों ने इनकम टैक्स रिटर्न फाइल किया. इन में से 99 लाख करदाताओं ने सालाना आय टैक्स छूट की लिमिट ढाई लाख रुपए से कम बताई. वहीं, 1 करोड़, 95 लाख लोगों ने अपनी इनकम ढाई लाख से 5 लाख रुपए सालाना घोषित की. 52 लाख करदाताओं ने 5 लाख से 10 लाख रुपए तक अपनी सालाना आमदनी बताई, जबकि महज 24 लाख लोगों ने अपनी सालाना आमदनी 10 लाख रुपए से ज्यादा घोषित की.

जब भी बजट पेश किया जाता है, तो टैक्स देने वालों से ज्यादा टैक्सचोरों की बात की जाती है कि वे किस तरह अपनी आमदनी कम दिखा कर सरकार को वाजिब टैक्स देने से बच जाते हैं. क्या सरकार ऐसे ‘टैक्स चोरों’ पर निशाना साधती है. लोगों की आमदनी, उपयोग और उन के टैक्स चुकाने में बड़ा अंतर है.

सवाल उठता है कि देश में ऐसे हालात ही क्यों बने हैं कि लोगों को टैक्स चोरी करनी पड़े? इस की सब से बड़ी वजह यह है कि खुद को मिलने वाली बुनियादी सुविधाओं की अनदेखी के चलते देश की आजादी के इतने साल बाद भी लोग टैक्स देने से बचते हैं या उन्हें अपनी मेहनत की आमदनी पर टैक्स वसूला जाना सरकार का डाका डालना लगता है.

उदाहरण के तौर पर एक खबर लेते हैं. देश की राजधानी दिल्ली से तकरीबन

50 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश राज्य में एक छोटा सा गांव मोतीपुर है. गांव में ‘मोती’ जैसा उजला शब्द जुड़ा होने के बावजूद इस गांव के लोग बिजली की राह देख रहे हैं. यकीन नहीं होता, लेकिन यहां के बाशिंदों का दावा है कि उन्होंने अपने गांव में पिछले तकरीबन 35 सालों से बिजली के दर्शन नहीं किए हैं. इतना ही नहीं, इस गांव में न कोई डिस्पैंसरी है, न स्कूल है और कई जगह तो रास्ता भी धूलभरा है.

मोतीपुर गांव के लिए बिजली की दिल्ली अभी दूर है, लेकिन भारत के दिल दिल्ली में कौन से हालात सुधर गए हैं. शर्म की बात है कि यहां की जितनी ट्रैफिक लाइटें हैं, वे सही माने में कभी भी दुरुस्त नहीं रहती हैं.

दिल्ली के भारी ट्रैफिक में ये लाइटें लोगों की जान और उन की गाडि़यों का ईंधन बचाने का काम करती हैं, पर हालात वही ढाक के तीन पात हैं. भारत की तमाम सरकारें जब बुनियादी सुविधाएं ही देने में नाकाम रही हैं, तो वे किस हक से लोगों से टैक्स की वसूली करना चाहती हैं?

‘अरुण जेटली का बजट दांव, करोड़ों मतदाताओं पर करम’ से साफ है कि अखबार ने बजट में पेश की गई राजनीति को सूंघ कर खबर लिखी कि वित्त मंत्री ने 21.47 लाख करोड़ रुपए का बजट पेश किया. यह रकम पिछले बजट से 1.69 लाख करोड़ रुपए ज्यादा है.

क्या कोई वक्त लिए बिना बता सकता है कि 21.47 लाख करोड़ रुपए में कितने जीरो होते हैं? सब से बड़ा एतराज तो इस बात का है कि इस बजट ने करोड़ों मतदाताओं पर करम कैसे कर दिया? करम तो कर्महीन पर किया जाता है. क्या सरकार बजट के नाम पर देने वाली सुविधाओं को जनता में खैरात के तौर पर बांटती है? बजट तोहफा है या टौर्चर, यह तो जनता को आने वाले समय में मालूम हो जाएगा. अखबारों द्वारा इसे तोहफा बताने की जल्दबाजी हजम नहीं होती.

नोटबंदी भी फेल

‘करदाताओं को नोटबंदी का तोहफा’ कहने वाले भूल गए हैं कि नोटबंदी के दौरान पेटीएम जैसी कंपनियां कमाई करती रहीं और आम आदमी डिजिटाइजेशन के नाम पर ठगा गया.

मीडिया अफोर्डेबल हाउसिंग सोसाइटी, रियल एस्टेट प्रोजैक्ट और लोगों को आशियाना मिलने में आसानी जैसे जुमले दोहराते हैं और यह भी बताते हैं कि प्रधानमंत्री आवास योजना की बजट राशि 15 हजार करोड़ रुपए से बढ़ा कर 23 हजार करोड़ रुपए कर दी गई है, लेकिन इन तथ्यों का कहीं जिक्र नहीं है कि विश्व श्रम संगठन (आईएलओ) की रिपोर्ट के अनुसार, तकरीबन सवा अरब की आबादी वाले हमारे देश में 91 करोड़ (73 फीसदी) लोग गरीबी के चंगुल में हैं, जिन में से 23 करोड़ लोग घोर गरीब हैं. सरकारी योजनाएं गरीबों को दो वक्त का खाना मुहैया कराने में विफल रही हैं, फिर 1 करोड़ मकानों का सपना कैसे साकार होगा? क्या आम जनता ने अपने सिर पर जो छतें बनाई हैं, उन में कभी भी सरकार का योगदान रहा है? ये लोगों की कड़ी मेहनत और पाई पाई के जोड़ से बनी हैं.

मनरेगा की बजट राशि में बढ़ोतरी कर अपनी पीठ थपथपाने वाली सरकार पिछले बजट की मनरेगा पर खर्च की गई राशि का हिसाब देने में तो बगलें झांकती है, ऐसे में इस बढ़ाई गई राशि की क्या परिणीति होगी, बताने की आवश्यकता नहीं है. मनरेगा के लिए पिछले बजट में 38,500 करोड़ रुपए का प्रावधान था, जबकि वास्तविक खर्च 58,000 करोड़ रुपए हुआ. ऐसे में बजट राशि, जो कि जनता की जेब काट कर वसूली जाएगी, बढ़ाने से अच्छा पुरानी राशि को पारदर्शिता से खर्चने पर काम किया गया होता, तो बेहतर होता. वैसे भी बजट में मनरेगा हेतु सिर्फ जिस राशि का आवंटन किया गया है, वह ग्रामीण भारत में इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए नाकाफी है.

‘सेफ्टी अमेनिटीज टू पुट रेलवेज बैक औन द ट्रैक’ का राग आलाप रहे मीडिया को भारतीय रेलवे से जुड़े न तो दयनीय आंकड़े याद आते हैं और न ही रेल की खस्ताहाल व्यवस्था. आए दिन रेल के हादसे, ट्रेनों की लेटलतीफी और यात्रियों को मिलता सड़ागला खाना जैसी दिक्कतें जस की तस कायम हैं.

बजट को ‘प्रो पुअर’ यानी गरीबों के हित का भला कैसे बताया जा सकता है? आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, साल 2001 से 2011 के दौरान 10 वर्षों में 8 करोड़ मजदूर गांवों से पलायन कर शहर आ गए हैं. देश में गरीबीरेखा से नीचे रहने वाले परिवारों की संख्या करीब साढ़े 5 करोड़ है. जबकि 23 करोड़ लोग घोर गरीबी का जीवन जी रहे हैं. उन वंचित वर्गों के अच्छे जीवन के लिए ढांचागत विकास हेतु बजट में पर्याप्त प्रावधान नहीं किए गए हैं.

कालेधन की गंगा

‘सियासत के कालेधन पर चाबुक’ कहने से कालेधन पर लगाम नहीं लगेगी. यह बात किसी से नहीं छिपी है कि कालेधन की गंगा निकलती कहां से है. अगर पिछले 70 वर्षों से राजनीतिक दलों की फंडिंग को पारदर्शी नहीं रखा गया, तो क्या इस में आम जनता की गलती है?

3 लाख रुपए से ज्यादा के लेनदेन पर नजर रखने का दावा करने से पहले यह किसी ने नहीं सोचा कि देश में ऐसे लेनदेन पर नजर रखना नामुमकिन है.

अगर कोई किसान किसी से ट्रैक्टर खरीदता है और सोना बेच कर लिए गए पैसे उस ट्रैक्टर मालिक को दे कर बिना कागजात ट्रांसफर किए उस गांव में उसे चलाता है तो भला इस लेनदेन की भनक सरकार को कैसे लगेगी? ऐसे कई लेनदेन सरकार की नाक के नीचे होते रहे हैं और होते रहेंगे.

कालेधन पर जो ‘डिजिटल नकेल’ कसने की बात की जा रही है, वह भी हवाहवाई लग रही है, क्योंकि डिजिटल तकनीक में साइबर क्राइम का खतरा बढ़ जाता है. ऐसा नहीं है कि कंप्यूटर इमरजैंसी रिस्पौंस टीम बनाने का प्रस्ताव पास नहीं हो सकता है, पर किसी भी सरकार ने अभी तक तो इस बारे में कोई गंभीर पहल नहीं की है.

सब से बड़ा सवाल तो यह है कि राजनीतिक दलों के पास पैसा कहां से आ रहा है, यह सवाल पूछने कौन जाएगा? आम आदमी तो सरकारी दफ्तर में घुसने तक से घबराता है कि कहीं किसी बात पर उस से घूस न मांग ली जाए. ऐसे में फिर कालेधन को चंदे के रूप में चबाने वाले राजनीतिक मगरमच्छों के तालाब में कौन उतरना चाहेगा?

मीडिया का दायित्व

बजट पेश करना सरकार का काम है. यह तो हर साल होता है. यह होता तो एक साल का है, पर सरकार की चतुराई और मीडिया के भरम से ऐसा दिखाया जाता है कि  आज से पहले ऐसा बजट मानो पहले कभी पेश ही नहीं किया गया, जबकि आम जनता तो महज इतना चाहती है कि उस की बुनियादी जरूरतें कैसे पूरी होंगी. इस के लिए ज्यादातर लोग तो सरकार का मुंह भी नहीं देखते हैं. लेकिन जब मीडिया बजट को संजीवनी बूटी की तरह पेश करता है तो देशवासी बजट को ही सबकुछ मान लेते हैं. क्या यही है मीडिया का दायित्व?

अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थौमस जेफरसन ने तो सरकार और अखबार में से अखबार चुनने की बात कही थी. मतलब सरकार का अस्तित्व भले ही न रहे, पर अखबार हमेशा जिंदा रहने चाहिए.

आमतौर पर इतने महत्त्वपूर्ण मीडिया को सरकार नियंत्रित नहीं करती, लेकिन क्या आज मीडिया सरकार और कौर्पोरेट जगत के स्वार्थ के लिए काम करता है? आखिर आम आदमी, खासकर ग्रामीण इलाकों के कमजोर तबकों के लोगों की आजीविका से जुड़े मुद्दे मीडिया में महत्त्वपूर्ण खबर क्यों नहीं बन पाते हैं? बजट को ले कर भी यह बात कही जा सकती है. मीडिया, आखिर, अपने नैतिक मूल्यों की जिम्मेदारियों से तो नहीं बच सकता. लेकिन आज वह इन सब की अवहेलना करता दिखता है, जो स्वस्थ समाज के लिए सही नहीं है.

क्या हुआ सस्ता

सोलर पैनल

इस्तेमाल होने वाले ग्लास

रेलवे ई टिकट

समूह बीमा

रक्षाकर्मियों के लिए

पीओएस मशीनें

आरओ

बायोमीट्रिक मशीन

क्या हुआ महंगा

एलईडी लैंप

मोबाइल

भारत में बने स्मार्टफोन

चांदी के सिक्के

सिगरेट

तलेभुने काजू

पानमसाला

हसीन सपने

शिक्षा : शिक्षा बजट बढ़ाने, औनलाइन कोर्स व डीटीएच चैनलों में जोड़ने मात्र से सालों से खस्ताहाल शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त नहीं होगी.

सस्ते मकान : अफोर्डेबल हाउसिंग स्कीम सालों से चल रही है लेकिन घर आज भी लोगों को खुद ही बनाने पड़ रहे हैं.

रेल सेफ्टी : सड़ागला खाना, बढ़ती रेल दुर्घटनाओं व लेटलतीफ ट्रेनों से कब मिलेगी राहत.

नकद चंदा : लेनदेन पर पारदर्शिता के लिए कोई कारगर प्रणाली नहीं है सरकार के पास.

कैश लेनदेन 3 लाख रुपए तक : खरीदफरोख्त पर सोनाचांदी के बदले अन्य सामानों के लेनदेन का गैरकागजी ब्योरा सरकार तक कैसे पहुंचेगा?

खस्ताहाल अस्पताल :  पहले बीमार सरकारी अस्पतालों को दुरुस्त करें. फिर नए एम्स की बात करते, तो समझ आता.

– सुनील शर्मा, राजेश कुमार

लोकतंत्र या वोटतंत्र

दुनियाभर में लोकतंत्र नहीं, वोटतंत्र फेल हो रहा है. वोटों से चुन कर आने वाले शासक देश, समाज, विश्व व जनता के लिए भले का काम करें, अब यह अनिवार्य नहीं रह गया है. एक समय पहले लोकतंत्र की पहली शर्त निष्पक्ष चुनाव थे जिस में हर व्यक्ति को अपनी इच्छा से वोट देने का हक हो. जिन देशों में यह हक जितना ज्यादा मजबूत था, उन्हें उतना ज्यादा लोकतांत्रिक, उदार, स्वतंत्र व भेदभाव रहित माना जाता था. अब ऐसा नहीं. अब कई देशों में लोकतंत्र से ऐसे नेता उभर रहे हैं जो न केवल अन्य देशों के लिए बल्कि अपने समर्थक वोटरों के लिए भी खतरा बन रहे हैं. अमेरिका का उदाहरण तो भयावह है जहां चुनावी प्रक्रिया जटिल है और शासकनेता को एक नहीं, कईकई चुनावी परेशानियों से गुजरना पड़ता है. वहां डोनाल्ड ट्रंप ने न केवल अपनी बकबक के बावजूद बाधाएं सफलता से पार कर लीं बल्कि चुनाव जीत कर राष्ट्रपति बनने के एक सप्ताह में ही अमेरिका की राजनीति, विदेश नीति, घरेलू नीति, स्वास्थ्य नीति, जौब नीति को भी उथलपुथल कर दिया. आने वाले समय में क्याक्या होगा, नहीं मालूम.

अमेरिकी संविधान में एक चुने राष्ट्रपति को हटाना आसान नहीं है और न ही उस की मनमानी को रोकना. इंगलैंड में वोट के सहारे हुए जनमत में ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ से निकलने का आत्मघाती फैसला ले लिया है. फ्रांस में मेरीन लेपे की नैशनल फ्रंट नामक अतिवादी पार्टी उभर रही है. रूस में ब्लादिमीर पुतिन वोटों के सहारे ही सत्ता में आए थे, उन्हें थोपा नहीं गया था. भारत में नरेंद्र मोदी को स्वच्छ सरकार, अच्छे दिन, कालाधनमुक्त भारत के लिए भारी बहुमत से चुना गया पर नरेंद्र मोदी ने केवल नोटबंदी जैसा गलत फैसला ही नहीं लिया, उन्होंने रिजर्व बैंक पर कब्जा भी कर लिया, लोकसभा को निरर्थक बना दिया, मंत्रिमंडल को नकार दिया. अपनी बात को मनवाने के लिए उन्होंने दूसरे दलों में तोड़फोड़ करवा दी. ऐसे में भारत में लोकतंत्र की चूलें हिलने लगी हैं. भारत में ऐसा पहले इंदिरा गांधी के जमाने में हुआ था. जब तक जयललिता तमिलनाडु में थीं, वे अपने को पुजवाती थीं. देश में नेताओं के जूते साफ करने वाले अफसरों की भी कमी नहीं है.

कुछ ऐसे देश हैं जो लोकतंत्र का मखौल बनाते हुए नकली चुनाव करा कर शासनसुख भोगते हैं. यहां बात उन की नहीं हो रही. यहां उन देशों के लोकतंत्रों की बात हो रही है जहां चुनावी लोकतंत्र गहरी जड़ें जमा चुका है पर अब उन जड़ों का खोखलापन दिखने लगा है. लोकतंत्र का अर्थ स्वतंत्र व्यापार, स्वतंत्र मीडिया, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र चुनावी प्रक्रिया है. पर इन सब को अब खरीदा जा रहा है. दुनिया की संपत्ति यानी शक्ति कुछ हाथों में संकुचित हो रही है और वे ही चुनावी फैसले करने लगे हैं, अपने देश में ही नहीं, हर उस देश में भी जहां उन्हें काम करना होता है. एक नए तरह का विश्वव्यापी साम्राज्य उत्पादनों और सेवाओं के नाम से शुरू हो गया है और माइक्रोसौफ्ट, आईबीएम, मौंट्रैनो, फेसबुक, गूगल, यूनीलीवर जैसे नामों की चीजों को इस्तेमाल करने वाले निरंतर अपने को खुद अलोकतंत्र के गड्ढे में धकेल रहे हैं. डोनाल्ड ट्रंप उन्हीं की देन हैं.

लोकतंत्र का अर्थ पूरे समाज के लिए बराबरी के अवसर मिलना, बराबरी के हक मिलना, बराबरी की चिकित्सा सुविधाएं मिलना, बराबरी का न्याय मिलना, बराबरी की शिक्षा मिलना है. उन्हें चुनावों के महंगे प्रचार, महंगी पार्टियों, पार्टियों में परिवारों के दखल,  शासन पर कौर्पोरेटों के कब्जों ने अब समाप्त कर दिया है. लोकतंत्र की भावना अब मरणासन्न स्थिति में है. लोकतंत्र  हमारे बीच में है पर एक पत्थर की मूर्ति की तरह जिस की पूजा की जाती है, जिस पर सिर नवाया जाता है लेकिन वह हमारे लिए कुछ नहीं कर सकता.

गब्बर आ जाएगा

जो उतर जाए या खत्म हो जाए वह कम से कम पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का तो गुस्सा हो ही नहीं सकता जो नोटबंदी के बाद से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से खार खाए बैठी हैं. पश्चिम बंगाल विधानसभा में अपने क्रोधप्रदर्शन का नवीनीकरण कराती ममता ने फिर मोदी की तुलना ऐतिहासिक फिल्मी किरदार ‘शोले’ फिल्म के खलनायक डाकू गब्बर सिंह से कर डाली कि वे उस की तरह डराने के काम आते हैं.

हिटलर मुसोलिनी और स्टालिन जैसे नामों के मुकाबले गब्बर आम जनमानस के ज्यादा नजदीक है, इसलिए लोगों को ममता की मंशा जल्द समझ आती है. सियासी रामगढ़ यानी दिल्ली जा कर क्या अखिलेश यादव और राहुल गांधी ममता के लिए जय और वीरू की तरह ठांयठांय कर पाएंगे, इस बाबत 11 मार्च का दिन अहम साबित  होगा.

सैल्फी विद डिंपल

अपने नेता में आस्था और निष्ठा जताने का सर्वोत्तम भारतीय तरीका उस के चरणस्पर्श करना है. चुनाव के दिनों में तो कार्यकर्ताओं की लाइन ठीक वैसे ही लगी नजर आती है जैसे नवरात्रि के समय में देवी के मंदिरों के सामने भक्त खड़े नजर आते हैं. जिन नेताओं की सभा को कामयाब बनाने के लिए कार्यकर्ता हाड़तोड़ मेहनत कर रहे हैं, अखिलेश यादव की सुंदर सांसद पत्नी डिंपल यादव उन में से एक हैं. इधर फर्क यह देखा गया कि नेता से नजदीकियां बतानेजताने का तरीका पैर पड़ना कम, उस के साथ सैल्फी लेना ज्यादा हो चला है.

स्वभाव से अंतर्मुखी डिंपल ने हाइटैक हो चली राजनीति व कार्यकर्ताओं की सैल्फी खींचने वाली मानसिकता को खूब प्रोत्साहन दिया. नतीजतन, उन की सभाओं में सपा कार्यकर्ता हाथ में झंडे कम, मोबाइल लिए ज्यादा दिखे. अब ये सैल्फियां अखिलेश अगर सत्ता में फिर से आए तो ड्राइंगरूम की दीवारों पर बड़ीबड़ी तसवीरों की शक्ल में नजर आएंगी और नहीं आ पाए तो डिलीट विकल्प की शिकार हो जाएंगी.

बहका मन

फागुन में मन कितना बहके

फागुन में मन कितना दहके

होंठों पे होंठों का चुंबन

कैसे हो बांहों का आलिंगन

देखो मन कितना तरसे

फागुन में तन कितना दहके

– रेनू श्रीवास्तव

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