Download App

Life Partner : कोहिनूर है जीवनसाथी, संभाल कर रखें

Life Partner : जीवनसाथी की मृत्यु के बाद उस से बिछुड़ना हो या तलाक के बाद अलग होना, दोनों ही स्थितियों में जीना मुश्किल हो जाता है, इसलिए समय रहते ही जीवनसाथीरूपी कोहिनूर की कद्र करें, ताकि उस के संग खुशहाल जीवन जी सकें.

साथी जो आप के जीवन का सब से महत्त्वपूर्ण हिस्सा था, दूर चला जाता है तो आप की दुनिया में रूखापन आ जाता है, समय रुक सा जाता है. हर जगह निराशा, अकेलापन और उदासी छा जाती है. ऐसे कठिन समय में खुद को संभालना और आगे बढ़ना एक बड़ी चुनौती हो सकती है. 60 वर्ष की उम्र के बीच में कोई अकेला रह जाए तो वह गम कभी भूलता नहीं है.

स्थिति तलाक की हो, विधवा होने की या फिर विधुर होने की हो, बच्चे मां के पास रह जाते हैं, तब पिता के लिए और दिक्कत. न तो कोई दूसरी लड़की मिलती है न ही कोई साथी. आज जो पतिपत्नी हैं वे एकदूसरे को संभाल कर रखें. दोनों एकदूसरे के लिए नायाब हैं. जिन के पास है वे यह समझें कि उन के पास कोहिनूर का हीरा है.

पता तो तब चलता है जब तलाक हो जाता है, साथी बिछुड़ जाता है, आप अकेले रह जाते हैं. बहुत कम लोग हैं जो बाद में जिंदगी अच्छी तरह बिता सकते हैं. लड़कियां फिर भी ज्यादा अच्छी तरह मैनेज कर लेती हैं क्योंकि उन के पास बच्चे होते हैं. उन के मांबाप सपोर्ट करते हैं. युवावस्था है तो फ्लर्टिंग करने वाला कोई न कोई मिल ही जाता है. लेकिन अकेले आदमी को कुछ नहीं मिलता, वह मारामारा फिरता है.

जितनी उम्र बढ़ेगी, समस्या उतनी ही बढ़ती जाएगी. किसी भी उम्र में आदमी के लिए खुद को और घर को संभालना मुश्किल होता है. इसलिए देर न करें और जो जैसा जीवनसाथी मिला है उस के साथ निभाना सीखें. उसे छोड़ने के बजाय आप खुद को ज्यादा बदलें, कुछ उसे बदलें. अगर संभव न हो तो जो जैसा है उसे वैसे ही स्वीकार कर आगे बढ़ें.

जिन का साथी बिछुड़ गया है उन से जानें इस का दर्द

जीवनसाथी शब्द से ही स्पष्ट है जीवनभर का साथी, जिसे सिर्फ मृत्यु ही अलग कर सकती है तो उस से अलग होने में दर्द तो महसूस होगा ही न. एक असहनीय पीड़ा होती है. जीवनसाथी से हमारा शारीरिक व मानसिक हर तरह का रिश्ता होता है जो साथ रहतेरहते इतना गहरा होता जाता कि वह हमारी सोच, हमारी कोशिकाओं, हमारे दिलोदिमाग में घर बना लेता है. जीवनसाथी के बिना जीना असंभव लगता है. हमारे जीवन में जो खुशी होती है वह जीवनसाथी के सुखदुख से ही जुड़ी होती है.

उदाहरण के तौर पर अगर आप के पति को औफिस से आने में एक दिन देर हो जाए तो आप के दिमाग में गलत खयाल आने लगते हैं, जैसे अरे कहां हैं ये, अभी तक आए क्यों नहीं? यह सब एक सामान्य स्थिति है लेकिन हमें यह भी सहन नहीं होता है.

फिर ऐसे में जिन का साथी कोरोना में या किसी और वजह से चला गया है उन से जानें यह दर्द. उन की जिंदगी कैसे पूरी तरह रुक गई है. वे आगे मूव औन करना भी चाहें तो कोई साथी नहीं मिलता. अकेले महिलाओं के लिए घर और बाहर संभालना मुश्किल हो जाता है. महिलाओं के लिए अचानक अपने पैरों पर खड़े होना बड़ी समस्या है. वे पहले से वर्किंग हैं तब तो ठीक है लेकिन अगर वर्किंग नहीं हैं तो नए सिरे से सब शुरू करना आसान नहीं होता. सिंगल पेरैंट की राह में भी कई परेशानियां आती हैं.

वहीं, एक बार को महिलाएं घरबाहर संभालना जल्दी सीख जाती हैं लेकिन पुरुषों के लिए घर संभालना असंभव सा हो जाता है. बच्चों की कैसे परवरिश करें, यह भी मुश्किल. महिलाओं को तो फिर भी जीवनसाथी मिल जाता है क्योंकि वे खुद को मेंटेन रखती हैं लेकिन पुरुष को जल्दी से कोई साथी नहीं मिलता. वह अकेले रहरह कर थक जाता है. लड़कियों को उन के मांबाप, भाईबहन फिर भी सपोर्ट कर देते हैं लेकिन लड़कों को कोई भाईबहन ज्यादा दिन सपोर्ट नहीं करता, क्योंकि वे छोटीछोटी अपनी जरूरतों के लिए भी दूसरों पर डिपैंड हो जाते हैं.

वहीं, लड़कियां खुद को और बच्चों के साथसाथ जिस के घर रह रही होती हैं उस का घर भी संभाल लेती हैं. इसलिए भाईबहनों और मांबाप के लिए उन्हें रखना ज्यादा आसान होता है. हालांकि परेशानी महिला या पुरुष दोनों को ही होती है लेकिन फिर भी कह सकते हैं पुरुष के लिए खुद को संभालना ज्यादा कठिन होता है.

तलाक के बाद पसरता अकेलापन

मैं 46 वर्षीया महिला हूं, मेरी जिंदगी में काम के अलावा कुछ नहीं है. पति से करीब एक साल पहले तलाक हो चुका है. मेरा 19 साल का बेटा अपने जीवन में बहुत व्यस्त है. पूरा दिन औफिस में कट तो जाता है लेकिन लाइफ में बहुत अकेलापन महसूस करने लगी हूं. मैं एक रिलेशन में थी भी लेकिन फिर मुझे लगा कि यह सिर्फ टैम्परेरी है और न तो समाज और न ही मेरा बेटा शायद मुझे अपनाएगा और मेरी इसी सोच ने मुझे वह रिश्ता खत्म करने पर मजबूर कर दिया.

अब लाइफ में फिर वही खालीपन और अकेलापन वापस आ गया है. काम से घर लौटती हूं तो बात करने वाला कोई नहीं है. मैं बहुत उदास और निराश महसूस कर रही हूं. इस अकेलेपन से कैसे बाहर आया जाए, कैसे अपनी जिंदगी में खुशियां लाऊं. अगर अपनी पिछली जिंदगी को याद करती हूं तो बहुत पछताती हूं. मेरे पति से मेरी बनती नहीं थी. लेकिन सारी गलती उन की नहीं थी. काश, थोड़ा सा एडजस्ट करने की कोशिश मैं ने भी की होती तो आज यह हालत न होती.

वाकई तलाक लेना आसान है लेकिन उस के बाद जीना मुश्किल है. यह बात तभी समझ में आती है जब हम साथी से दूर हो कर अकेलापन झेलते हैं. इसलिए समय रहते इस बात को समझें कि आप के साथी में कुछ बुराइयां भी हैं तो उस के साथ डील करना सीख लें क्योंकि उसे छोड़ने के बाद भी परिस्थितियां कुछ बहुत ज्यादा अच्छी नहीं होंगी बल्कि बदतर हो सकती हैं.

पुरुषों को महिलाओं की ज्यादा कद्र करनी चाहिए

अकसर देखा जाता है कि पुरुष महिलाओं को टेकेन फौर ग्रांटेड लेते हैं. उन्हें उन का हर काम समय पर किया हुआ मिल जाता है तो उन्हें उस काम की भी वैल्यू नहीं होती है. पुरुषों को लगता है कि मैं कमाने वाला हूं तो मेरी वैल्यू ज्यादा है. वे महिलाओं को ज्यादा तवज्जुह नहीं देते. लेकिन अगर महिलाएं वर्किंग हैं तो भी उन्हें लगता है घर का ज्यादातर काम महिलाएं ही करें.

अपने मांबाप के साथ एडजस्ट करने में भी वे अपने साथी को घर के ऐसे जंगल में छोड़ देते हैं जहां वे उन की मां के साथ एडजस्ट करने में अपनी पूरी जवानी लगा देती हैं. लेकिन उन्हें जब एहसास होता है तो अधेड़ उम्र में भी वे पति को छोड़ कर जाने से संकोच नहीं करतीं. फिर सम?ा आती है उस महिला की वैल्यू जिस की बातों पर कभी कान ही न धरे थे.

इसलिए बीवी की इज्जत समय रहते ही करें. उसे अगर आप की मां या किसी और रिश्ते से कोई परेशानी है तो उसे समझें और दूर करें. अलग घर में रहें. उस ने शादी आप के साथ की है, आप की मां को पूरी जिंदगी खुश करने का ठेका उस का नहीं है. इस बात को भी सम?ों कि अगर पत्नी छोड़ गई तो वह जैसेतैसे अपना गुजारा कर लेगी लेकिन आप को आप के घरवाले भी नहीं पूछेंगे. तब उसी पत्नी की बातें याद करकर के रोया करेंगे. इसलिए अभी भी समय है संभल जाएं और अपनी पत्नी की कद्र करें.

एक के बिछुड़ते ही दूसरा बूढ़ा लगने लगता है

एक साथी के जाते ही दूसरा बूढ़ा होने लगता है, फिर उम्र चाहे कोई भी हो उस की सोच साथी के साथ ही रुक जाती है. उस के सपने, उम्मीदें, उमंग, खुशी सबकुछ जीवनसाथी के साथ ही चला जाता है. महिलाओं को तो लगता है अब किस के लिए सजना, अब कौन है जो तारीफ करेगा. उन के चेहरे का नूर चला जाता है. उस पर साथी से बिछुड़ने के गम की परछाइयां ही नजर आती हैं. तनाव इतना हो जाता है कि कई हैल्थ इश्यूज हो जाते हैं. बीपी, शुगर जैसी कई बीमारियां अपनी चपेट में ले लेती हैं और उस पर घरबाहर संभालना व बच्चों की जिम्मेदारी समय से पहले बूढ़ा कर देती हैं. पूरा दिन भागदौड़ करने के बाद रात को बिस्तर पर मिलता अकेलापन न जीने देता है न मरने.

उम्र के हर पड़ाव पर जीवनसाथी चाहिए

कर्नाटक के मैसूर में रहने वाले 73 साल के बुजुर्ग ने शादी के लिए विज्ञापन दिया है. वे सरकारी टीचर की नौकरी से रिटायर हो चुके हैं और घर में अकेले रहते हैं. अकेलेपन से उन्हें अब डर लगता है. उन्हें अब एक जीवनसाथी की तलाश है.

ऐसे विज्ञापन अब आम हो चुके हैं. कई संस्थाएं भी हैं जो बुजुर्ग लोगों के विवाह कराने का काम भी कर रही हैं क्योंकि अब विवाह उम्र का मुहताज नहीं है. पहले जहां संयुक्त परिवार होते थे वहां किसी का साथी बिछुड़ भी जाता था तो भी घर में कई लोग होते थे उस अकेले की देखभाल करने के लिए, उसे संभालने के लिए. लेकिन अब एकल परिवार के दौर में साथी के जाने के बाद अकेले ही सब संभालना मुश्किल हो जाता है. नातेरिश्तेदार कुछ दिनों तक ही साथ निभाते हैं. इसलिए पूरी जिंदगी आगे कैसे कटे, यह सोच कर ही घबराहट होती है.

जीवनसाथी को दोस्त बनाएं

दोस्त से लड़ाई हो जाए तो तलाक नहीं होता. न ही वह आप को जज करता है. वह आप की अच्छाईबुराई समेत आप को स्वीकार करता है. पतिपत्नी के बीच ऐसा रिश्ता अकसर नहीं होता. पत्नी के लिए पति देवता है जिस में कोई कमजोरी या कमी वह देखना ही नहीं चाहती. पति के लिए पत्नी जिम्मेदारी होती है, ऐसी स्त्री जिस की वह इज्जत करता है पर हर बात उस से खुल कर साझा नहीं कर सकता क्योंकि वे 2 अलगअलग व्यक्तित्व हैं.

लेकिन अगर आप भी अपने लाइफपार्टनर को दोस्त बना लें और खुद उन के दोस्त बन जाएं तो लाइफ पूरी तरह चेंज हो जाती है. दोस्त बनाएंगे तो बराबरी का हक दे पाएंगे. रिश्ता कोई भी हो उस में बराबरी और सम्मान का होना बहुत जरूरी है. ऐसे में अगर जीवनसाथी दोस्त होगा तो पतिपत्नी वाली तकरार को सुलझाना आसान होगा. वहां बातचीत का रास्ता खुला होगा. एकदूसरे से जो परेशानियां हैं उन पर बात की जा सकेगी, उन्हें हल करने का प्रयास किया जा सकेगा.

ईगो, अकड़ सब छोड़ साथी के साथ एडजस्टमैंट करना सीखें

रचना कहती हैं, ‘‘पति से थोड़ी कहासुनी होने के बाद मैं मायके आ गई थी. कुछ ही दिनों के बाद वे मुझे मायके लेने आए थे, लेकिन तब कुछ झूठे रिश्तेदारों और कुछ मायके के लोगों की बातों में आ कर मैं साथ नहीं गई. उलटा, उन को दहेज के झूठे केस में धोखे से फंसा दिया पर अब 6 साल हो चुके हैं और मैं घर पर बैठी हूं. केस झूठे थे, कोर्ट में साबित नहीं हो सके और पति बरी हो गए. उन की दोबारा शादी हो गई. आज सोचती हूं, पति लेने आए तब ही उन के साथ चली जाती तो आज मेरे भी एकदो बच्चे होते और मैं भी अपनी सहेलियों की तरह खुश होती अपने पति संग.’’

इसलिए इस बात को समझें कि साथ कोई नहीं देगा, सलाह सब देंगे. आखिर में आप की ही जिंदगी तबाह होगी. अगर कहासुनी हो जाती है तो रिश्तों को खत्म करने से अच्छा है दोचार दिन रूठ जाएं, बस.

वास्तव में जीवन में ऐसे बहुत से पड़ाव आते हैं जहां हमें अहम निर्णय लेने पड़ते हैं. यदि हम अपना हित ध्यान में न रख कर रिश्तेदारों और दोस्तों के बहकावे में कुछ गलत निर्णय ले लेते हैं तो जीवनभर हमें उस का खमियाजा भुगतना पड़ता है. इसलिए ईगो, अकड़ सब छोड़ साथी को उस की कमियों के साथ दिल से स्वीकार करें. हर स्थिति में निभाना सीखें तब तो जिंदगी चलती रहेगी लेकिन अगर साथ छूटा तो जिंदगी और भी बदतर हो जाएगी. तब दूसरा साथी खोजेंगी तो पहले तो मिलेगा ही नहीं और अगर कई साल धक्के खाने के बाद मिल भी गया तो जितना पहले साथी के साथ एडजस्ट करने में कतरा रहे थे उस से कई गुना ज्यादा एडजस्ट करना पड़ेगा और अगर साथी न मिला तो पूरी जिंदगी अकेले काटना भी एक अभिशाप बन जाएगा.

Online Hindi Story : दैहिक भूख – शिल्पी ने संध्या को क्यों मारा

Online Hindi Story : आज मनोज बहुत खुश था और पहुंच गया यादों में. 4 साल पहले वह नौकरी की तलाश में मुंबई आया था. पढ़लिख कर गांव में रहने का कोई फायदा नहीं था. वहां तो कोई छोटीमोटी नौकरी मिलती या अपनी छोटी सी दुकान खोल कर बैठना पड़ता. इस के अलावा वहां और कुछ था भी नहीं, जिस पर अपनी गुजरबसर की जा सके. यही सोच कर मनोज ने मुंबई जाने वाली ट्रेन पकड़ ली थी. पहले कुछ दिन तो मनोज को एक लौज में रहना पड़ा, फिर धीरेधीरे उसे उस के गांव के लोग मिल गए, जो 3-4 के समूह में साथसाथ रहते थे. मनोज भी उन्हीं के साथ चाल में रहने लगा था.

चाल का मतलब है आधे कच्चेपक्के घरों की वे बस्तियां, जहां संकरी गलियों में छोटेछोटे कमरे होते हैं. पानी के लिए एक सरकारी नल का इंतजाम होता है, जहां बच्चेऔरतें और मर्द सुबह से ही अपनेअपने बरतन ले कर लाइन लगा देते हैं, ताकि वे पूरे दिन के लिए पीने व नहानेधोने का पानी भर सकें. अब मनोज बड़ी मेहनत से नौकरी कर के पैसा कमा रहा था और एकएक पैसा जोड़ रहा था, ताकि रहने के लिए अपना छोटा सा घर खरीद सके. आज मनोज इसीलिए खुश था, क्योंकि उस ने एक छोटा सा 8 बाई 8 फुट का कमरा खरीद लिया था. इधर उस के मातापिता भी काफी समय से जोर दे रहे थे कि शादी कर लो. रहने का ठिकाना हो गया था, सो अब मनोज ने भी इस के लिए हामी भर दी थी.

मां ने गांव में अपने ही रिश्ते में एक लड़की पसंद कर रखी थी, जिस का नाम शिल्पा था. शिल्पा भी राह देख रही थी कि कब मनोज आए और उसे ब्याह कर मुंबई ले जाए. मनोज गांव गया और फिर चट मंगनी पट ब्याह. वह एक महीने में शिल्पा को ले कर मुंबई आ गया. शिल्पा मुंबई के तौरतरीके सीख रही थी. वह भी रोज सुबह पानी की लाइन में लग जाती और वहां की मराठी औरतों के साथ बातें कर के थोड़ीथोड़ी मराठी भी सीखने लगी थी. जब शाम को मनोज दफ्तर से काम कर के खोली में लौटता और शिल्पा को अपनी बांहों में भर कर प्यार भरी बातें करता, तो वह कहती, ‘‘धीरे बोलिए, सब के कमरे आसपास हैं. खिड़की भी तो सड़क पर खुलती है. कोई सुन लेगा तो…’’

मनोज कहता, ‘‘सुन ले तो सुन ले, हम अपनी बीवी से बात कर रहे हैं, कोई चोरी थोड़े ही कर रहे हैं.’’ आसपास की जवान लड़कियां भी कभीकभार शिल्पा को छेड़ कर कहतीं, ‘भाभी, कल भैया से क्या बातें हो रही थीं? हम ने सुना था सबकुछ…’ शिल्पा जवाब में कहती, ‘‘कोई और काम नहीं है तुम्हारे पास, हमारी बातें सुनने के अलावा?’’

इस तरह 4 साल बीत गए और शिल्पा के 2 बच्चे भी हो गए. बड़ी बेटी संध्या और छोटा बेटा वीर. मनोज अपने परिवार में बहुत सुखी था. वह अब एक फ्लैट खरीदना चाहता था, ताकि जब उस के बच्चे बड़े हों तो थोड़े अच्छे माहौल में पलबढ़ सकें. इस के लिए वह एकएक पाई जोड़ रहा था. शिल्पा और मनोज सोने से पहले रोज नए फ्लैट के बारे में ही बात करते थे. मनोज कहता, ‘‘एक वन बैडरूम का फ्लैट हो जाए बस.’’ शिल्पा कहती, ‘‘हां, तुम नया घर लेने की तैयारी करो. हम उसे सजा देंगे और बाहर नेम प्लेट पर मेरा भी नाम लिखना. घर के दरवाजे पर हम लिख देंगे ‘आशियाना’.’’

मनोज हर छुट्टी के दिन ब्रोकर से मिल कर फ्लैट देख कर आता. कोई बहुत अंदर गली में होता, जहां से मेन रोड पर आने में ही आधा घंटा लग जाए, तो कोई बच्चों के स्कूल से बहुत दूर होता. कोई बहुत पुरानी बिल्डिंग होती, जिस में लीकेज की समस्या होती, तो कोई बहुत अंधेरी सी बिल्डिंग होती और कीमत पूछते ही मकान मालिक भी बड़ा सा मुंह खोल देते. कीमत बड़ी और फ्लैट का साइज छोटा. लोग 30 लाख रुपए तक मांगते. कहां से लाता मनोज इतने पैसे? सो, 20 लाख रुपए में अच्छी सी लोकेशन देख कर उस ने एक वन बैडरूम फ्लैट खरीद लिया, जिस के आसपास सारी सुविधाएं थीं और रेलवे स्टेशन भी नजदीक था. फ्लैट में रहने से शिल्पा और बच्चे भी मुंबई के रंग में रंगने लगे थे. मनोज की बेटी संध्या 13वें साल में थी. उस का शरीर अब गोलाई लेने लगा था और वह अब थोड़ा सजधज कर भी रहने लगी थी. ऊपर से टैलीविजन और मीडिया. आजकल के बच्चे वक्त से पहले ही सबकुछ समझने लग जाते हैं. फिर घर में जगह व एकांत की कमी. अब घर छोटा पड़ने लगा था.

मनोज अब बच्चों से नजरें बचा कर मौका ढूंढ़ता कि कब शिल्पा के करीब आए और उसे अपने आगोश में ले. वक्त तेजी से बीत रहा था. संध्या अब कालेज जाने लगी थी और रोजाना नए कपड़े, जूते, बैग वगैरह की मांग भी करने लगी थी. उस की ये सब जरूरतें पूरी करना मनोज के लिए मुश्किल होता जा रहा था. एक दिन संध्या बोली, ‘‘पापा, मेरी सारी सहेलियां नई फिल्म देखने जा रही हैं, मुझे भी जाना है. मां से कहिए न कि मुझे कुछ रुपए देंगी.’’

मनोज ने कहा, ‘‘देखो संध्या बेटी, तुम्हारी बात बिलकुल सही है. तुम्हें भी घूमनेफिरने की आजादी होनी चाहिए. लेकिन बेटी, हम इतने पैसे वाले नहीं हैं. अभी तुम्हारी पढ़ाईलिखाई के तमाम खर्च हैं और बाद में तुम्हारी शादी के. फिर तुम्हारा छोटा भाई भी तो है. उस के बारे में भी तो सोचना है. आज तो मैं तुम्हें पैसे दे रहा हूं, लेकिन रोजरोज जिद मत करना.’’

संध्या खुशीखुशी पैसे ले कर कालेज चली गई. शिल्पा मनोज से बोली, ‘‘कैसी बातें करते हैं आप. आज पैसे दिए तो क्या वह रोज नहीं मांगेगी? लड़की को इतनी छूट देना ठीक नहीं है.’’ मनोज बोला, ‘‘बच्चों के लिए करना पड़ता है शिल्पा. ये भी तो बाहर की दुनिया देखते हैं, तो इन का भी मन मचलता है. और अगर हम न दें, तो इन का हम पर से भरोसा उठ जाएगा.’’ अब संध्या तकरीबन हर रोज मनोज से पैसे मांगने लगी थी. कभीकभी मनोज मना कर देता, तो उस दिन संध्या मुंह फुला कर कालेज जाती. कालेज के बाद या कभीकभी कालेज से छुट्टी कर के लड़केलड़कियां हाथ में हाथ डाले मुंबई के बीच पर घूमते नजर आते. कई बार थोड़े अमीर परिवार के लड़के लड़कियों को अच्छे रैस्टोरैंट में ले जाते, तो कभी फिल्म दिखा कर भी लाते.

मनोज तो संध्या की जरूरत पूरी करने में नाकाम था, सो अब संध्या भी उन लड़कों के साथ घूमने लगी थी. किसी लड़की को बांहों में बांहें डाल कर घुमानाफिराना इस उम्र के लड़कों के लिए बड़े गर्व की बात होती है और लड़कियां सोचती हैं कि यह प्यार है और वह लड़का उन की खूबसूरती का दीवाना है. संध्या की दूसरी सहेलियां भी ऐसे ही लड़कों के साथ घूमती थीं. एक दिन सभी लड़के लड़कियां गोराई बीच चले गए. बोरीवली से छोटी नाव, जिसे ‘फेरी’ कहते हैं, चलती है, जो एक छोटी सी क्रीक को पार करा देती है और गोराई बीच आ जाता है. यह मछुआरों का गांव है. मछुआरे बहुत ही कम कीमत पर, यों समझिए 2 सौ, 3 सौ रुपयों में कमरे किराए पर दे देते हैं, ताकि लोग बीच से आ कर कपड़े बदल लें और आराम भी कर लें. सो, सारा ग्रुप पूरा दिन सैरसपाटा कर के आता और अलग अलग कमरों में बंद हो जाता. यह सारा खर्चा लड़के ही करते थे.

अब यह सब संध्या व उस की सहेलियों व लड़कों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया था. कभीकभी वे लड़के अपने दूसरे दोस्तों को भी वहां ले जाते और संध्या व उस की सहेलियां उन लड़कों से भी हिलमिल गईं. यही तो खास बात है इस उम्र की कि कुछ बुरा तो नजर आता ही नहीं. सब अच्छा ही अच्छा लगता है और अगर मातापिता कुछ कहें, तो उन की बातें दकियानूसी लगती हैं. लड़केलड़कियां एकदूसरे की सारी जरूरतें पूरी करते, दैहिक भूख व मौजमस्ती. कुछ महीनों तक ऐसा ही चलता रहा, लेकिन एक दिन वहां पर पुलिस की रेड पड़ गई, जिस में संध्या भी पकड़ी गई. फिर क्या था… सभी लड़केलड़कियों को पुलिस स्टेशन ले जाया गया और फोन कर के उन के मातापिता को भी वहां बुलाया गया.

मनोज के पास भी पुलिस स्टेशन से फोन आया. वह तो फोन सुनते ही हक्काबक्का रह गया. जल्दी से वह दफ्तर से आधे दिन की छुट्टी ले कर पुलिस स्टेशन पहुंचा. वहां संध्या को देखा और सारी बात मालूम होते ही उस की आंखों में खून उतर आया. खैर, पुलिस के हाथपैर जोड़ कर वह संध्या को वहां से ले कर घर आया. जब संध्या की मां ने सारी बात सुनी, तो उस ने संध्या को जोरदार तमाचा जड़ कर कहा, ‘‘शर्म नहीं आई तुझे उन लड़कों के साथ गुलछर्रे उड़ाते हुए?’’ संध्या कहां चुप रहने वाली थी. वह कहने लगी, ‘‘19 साल की हूं मैं और बालिग भी हूं. अगर आप और पापा सब कर सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं? कितनी बार देखा है मैं ने आप और पापा को…’’

इतना सुनते ही शिल्पा ने संध्या के गाल पर दूसरा तमाचा जड़ दिया और गुस्से में बोली, ‘‘अरे, हम तो पतिपत्नी हैं, पर तुम इस पढ़नेलिखने की उम्र में बिन ब्याहे ही…’’ संध्या ने सारी हदें पार कर दीं और बोली, ‘‘तो क्या हुआ जो शादी नहीं हुई तो. तुम लोगों को देख कर बदन में उमंग नहीं जागती? कैसे शांत करूं मैं उसे बिन ब्याहे? अगर वे लड़के मुझे घुमातेफिराते हैं, मेरी जरूरतों का खयाल रखते हैं, तो बुराई भी क्या है इस दैहिक संबंध में? पापा और आप भी तो शादी कर के यही कर रहे हो. सिर्फ एकदूसरे की जरूरतों को पूरा करना. तो क्या इस पर शादी की मुहर लगाना जरूरी है?

‘‘आप लोग तो मेरी जरूरतें पूरी कर नहीं पाते. सिर्फ मैं ही नहीं, आजकल तो अकसर सभी लड़कियां करती हैं यह सब. ‘‘मां, अब तुम लोग पुराने जमाने के हो गए हो. आजकल सब चलता है. कुदरत ने देह दी है, तो उस को इस्तेमाल करने में क्या बुराई है?’’ संध्या की ये बेशर्मी भरी बातें सुनी नहीं जा रही थीं. मनोज तो अपने कानों पर हाथ रख मुंह नीचे किए बैठा था और संध्या लगातार बोले जा रही थी. उस ने तो मौजमस्ती की चाह और अपनी दैहिक भूख को शांत करने के लिए सारी हदें पार कर ली थीं. नएनए लड़कों से दैहिक संबंध बनाने में उसे कोई बुराई नजर न आई. इस का कोई दुख या गिला भी न था उसे. शिल्पा कोने में दीवार पर सिर टिका कर आंसू बहाए जा रही थी. अब मनोज जुट गया था 2 कमरों का घर ढूंढ़ने में.

Hindi Kahani : भागी हुई लड़की – छबीली अपनी मां से क्या बोली

Hindi Kahani : सुबह का समय था. राजू सोया पड़ा था कि तभी किसी ने उसे झकझोर कर उठाया. सामने उस की मामी खड़ी थीं. मामी ने हांफते हुए कहा, ‘‘तुम्हें पता है कि रात को छबीली घूरे के साले के साथ भाग गई.’’ राजू ने आंखें मिचमिचा कर देखा कि कहीं वह सपना तो नहीं देख रहा है. उस ने मामी से पूछा, ‘‘आप को किस ने बताया?’’

मामी बोलीं, ‘‘कौन बताएगा… पूरे गांव को पता चल गया है.’’ राजू को हैरानी हो रही थी. जब रात को वह अपनी मौसी के देवर के छत वाले कमरे में था, तो छबीली घूरे के साले कलुआ के साथ इधर से उधर भाग रही थी. तब उस ने सोचा था कि कोई काम होगा, क्योंकि गांव में रामलीला चल रही थी. उस में छबीली के पिता रावण का रोल करते थे और भाई मेघनाद का. सारा घर रामलीला देख रहा था. इतने में छबीली कलुआ के साथ नौ दो ग्यारह हो गई. लेकिन राजू की समझ में एक बात नहीं आ रही थी कि छबीली ने कलुआ में ऐसा क्या देखा, जो उस कालेकलूटे के साथ भाग गई. छबीली गोरीचिट्टी, भरे बदन की थी. उसे देख कर कोई भी लड़का दिल दे बैठे. गोरे मुखड़े पर काली आंखें, गालों पर काला तिल, लंबी नाक उस पर गोल नथुनी. सुनहरे से बाल, जो कमर को छूते थे. फिर छबीली कलुआ के साथ क्यों भागी?

राजू फटाफट बिस्तर से उठा. छबीली और कलुआ के घर गली में थोड़ी दूरी पर थे, जो जहां हिंदुस्तानपाकिस्तान के बौर्डर जैसे हालात थे. कलुआ की बहन काली और छबीली की मां रामजनी के बीच शब्दों के गोले दागे जा रहे थे. काली कह रही थी, ‘‘अपनी बेटी को संभालो, तब मेरे भाई से कुछ कहना. जब लड़की दावत बांटती फिरे, तो लड़के खाएंगे ही. बड़ी आई कलुआ को बदनाम करने वाली.’’

इधर रामजनी का कहना था, ‘‘मेरी लड़की सीधीसादी है. उसे तो कलुआ ने बहका दिया होगा, वरना इतनी संस्कारी लड़की भाग क्यों जाती?’’ राजू को रामजनी की बात में दम लगा, क्योंकि छबीली को देख कर नहीं लगता था कि वह ऐसा कुछ कर डालेगी. राजू तो पहले से ही गुस्सा था, ऊपर से छबीली रिश्ते में उस की मौसी लगती थी. राजू को कलुआ पर ज्यादा गुस्सा था, इस वजह से वह छबीली के घर वालों के गुट में जा मिला. राजू ने छबीली के पिता को बताया कि रात को उस ने छबीली मौसी को कलुआ के साथ छत पर इधरउधर भागते हुए देखा था. छबीली का बाप मलूका पहले तो राजू पर गुस्सा हुआ, फिर बोला, ‘‘तू रात में नहीं बता सकता था? अगर रात में बता देता, तो इतनी नौबत ही न आती.’’

राजू बोला, ‘‘मुझे क्या पता था कि छबीली मौसी यह धमाका कर जाएंगी.’’ राजू को पता था कि कलुआ उस को उलटा पीट डालता, लेकिन मलूका की नजरों में इज्जत पाने के लिए उस ने ऐसा कहा था और ऐसा हुआ भी. मलूका नरम पड़ कर राजू से बोला, ‘‘अच्छा, जो हुआ उसे छोड़. अब यह बता कि कलुआ छबीली को ले कर कहां गया होगा?’’

राजू ने तुक्का लगाते हुए कहा, ‘‘मैं ने सुना था कि वह किसी दोस्त के यहां जाने की बात कर रहा था.’’ लेकिन एक बात फिर भी आ लटकी कि कलुआ कौन से दोस्त के यहां गया होगा और दोस्त रहता कहां होगा? अब राजू इस बात पर अपना तुक्का नहीं लगा सकता था. इस वजह से वह चुप रहा. सब लोग गाड़ी में बैठ कर कलुआ के गांव पहुंचे. वहां से कलुआ के एक दोस्त को पकड़ा, उसे दारू पिलाई, डरायाधमकाया, तब जा कर उस ने दोस्तों की डायरैक्टरी बता दी और घुमाने लगा दोस्तों के ठिकाने पर. एक जगह जा कर कलुआ का पता चला. एक दोस्त के कमरे में कलुआ छिपा बैठा था. छबीली उस की गोद में सिर रखे लेटी थी. दोनों अपनेअपने घर के लोगों की हालत पर सोच के घोड़े दौड़ा रहे थे. छबीली कह रही थी, ‘‘मेरी अम्मां तो मुझे सामने पा कर दो हिस्से कर डालेंगी.’’ वहीं उस की बात सुन कर कलुआ बोला, ‘‘मेरा जीजा मुझे देखे तो मेरा मुंह काले से लाल कर डालेगा.’’

तभी दरवाजा खटखटाने की आवाज हुई. दोनों बिजली के करंट लगे आदमी की तरह उठ खड़े हुए. बाहर से आवाज आई, ‘‘दरवाजा खोलो.’’ आवाज मलूका की थी, जिसे दोनों प्यार के पंछी अच्छे से समझ गए थे.

मलूका फिर बोला, ‘‘दरवाजा खोल दो, नहीं तो तोड़ डालूंगा.’’ यह सुन कर दोनों प्रेमियों के दिल कांप उठे और फिर तभी छबीली की आंखों में गुस्से की आग जल उठी. उस ने कलुआ के दोस्त का रखा देशी कट्टा निकाल लिया और कलुआ को अपने पीछे कर दरवाजा खोल दिया. लोग कमरे में घुसने ही वाले थे कि छबीली कट्टा तान कर बोली, ‘‘सब के सब भाग जाओ, नहीं तो जान से हाथ धो बैठोगे.’’

लोगों ने यह बात सुन कर अपने कदम पीछे खींच लिए, तभी छबीली का भाई गोबर आगे बढ़ा. उस ने सोचा कि इज्जत जाने से अच्छा है जान चली जाए. वह छबीली के सामने आ खड़ा हुआ और बोला, ‘‘चला गोली…’’ छबीली पर आज इश्क का भूत सवार था. उस ने कट्टे का निशाना गोबर के सीने पर लगाया और ट्रिगर दबा दिया. जैसे ही ट्रिगर दबा, लोगों ने आंखें बंद कर लीं. लेकिन यह क्या… कट्टे से गोली चली ही नहीं. होती जो चलती. मलूका ने आगे बढ़ कर छबीली के बाल पकड़ लिए और कमरे से घसीटते हुए बाहर ले आया. कलुआ की हालत पतली हुई. गोबर ने गुस्से में आ कर कलुआ के लातें बजा दीं. लोगों ने गोबर को समझाया कि यह मर गया, तो केस हो जाएगा. लड़की मिल गई, चलो अपने घर.

सभी लोग छबीली को ले घर आ गए. छबीली को देख उस की मां रामजनी उसे चप्पल से पीटने लगीं. महल्ले की औरतों ने जैसेतैसे छबीली को छुड़ाया. सब के शांत हो जाने के बाद तय हुआ कि छबीली की शादी तुरंत कर दी जाए. सारे रिश्तेदारों को खबर कर दी गई. लेकिन मुसीबत कहां थमने वाली थी. कोई भी अच्छा लड़का उस से शादी करने को तैयार नहीं होता था. लेकिन तभी एक रिश्तेदार ने खबर दी कि उन के महल्ले में एक लड़का है, जो छबीली से शादी कर सकता है. लेकिन लड़का मोटा था, साथ ही छबीली से ज्यादा उम्र का था. पर शादी तो करनी ही थी, दामन पर लगा दाग जो छुड़ाना था. बात पक्की हो गई. बड़ी मुश्किल से छबीली की शादी की रस्में पूरी हुईं. वह चुपचाप मंडप में बैठी रही. उसे शादी में मजा नहीं आ रहा था. उस की आंखें तो सिर्फ कलुआ की सूरत देखना चाहती थीं. शादी निबट चुकी थी. छबीली विदा होने को हुई, मां रामजनी का दिल भर आया. दोनों मांबेटी लिपट कर खूब रोईं.

मां रामजनी ने कसम दी और बोलीं, ‘‘बेटी, अब जैसा भी है, मंजूर करो. पुरानी बातें गलती समझ कर भुला डालो. शायद तुम्हारी शादी अच्छी जगह करते, लेकिन तुम्हें जमाने का हाल तो पता ही है. हम मजबूर हैं. हमें माफ करना. अब किसी को शिकायत का मौका न देना.’’

छबीली बोली, ‘‘मां, तुम्हें कभी दुख न दूंगी. अब ससुराल से केवल मर के ही वापस आऊंगी. तुम मेरी चिंता मत करना. भूल जाओ और मेरा कहासुना भी माफ करना.’’ मन के सारे दाग धुल चुके थे. राजू की आंखें भी नम थीं. सोचता था कि प्यार इनसान को कितना सुधार देता है और बिगाड़ भी सकता है. छबीली के बाप मलूका की आंखें भी बेटी को विदा होते देख नम थीं. छबीली अपनी ससुराल चली गई. कलुआ फिर कभी उस गांव में नहीं आया. छबीली भी शायद उसे भूलती जा रही थी. आज वह एक बच्चे की मां थी. आज सबकुछ शांत सा है, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

लेकिन इतिहास की कई परतें, कई कहानियां लिए मौजूद हैं, लेकिन उन्हें कुरेदे कौन. सब अपने में मसरूफ हैं. परंतु राजू के दिमाग में यह अभी भी वैसा ही है, जैसा तब था.

Hindi Story : काबुल से कैलिफोर्निया – अनीता कौन सी फिल्म देखकर आईं थी

Hindi Story : हम दिल्ली में रहते थे. मेरे पति केंद्रीय संस्थान में वरीय अधिकारी थे. हमारे 2 बच्चे हैं, एक बेटा और एक बेटी. मेरी बेटी अनीता छोटी है. उन दिनों अफगानिस्तान के पठान दिल्ली में अकसर आते थे. दिल्ली की कालोनियों और गलियों में घूमघूम कर ड्राईफूट्स, बादाम, अखरोट, अंजीर बेचा करते थे. साथ में अकसर शुद्ध प्राकृतिक हींग भी रखते थे. कभी महीने में एक बार तो कभी 2 महीने में एक बार आते थे. मैं एक पठान से ड्राईफूट्स और हींग लिया करती थी. अकसर खरीदते समय मेरे बेटी अनीता भी साथ होती. करीब 4 साल की थी वह उस समय. वह पठान कुछ ड्राईफू्रट्स मेरी बेटी के हाथ में जरूर रख देता था. वह पिछले 5 सालों से लगातार आ रहा था. अनीता को बहुत प्यार करता था. बीचबीच में वह काबुल भी जाया करता.

अनीता ने हाल ही में हम लोगों के साथ हिंदी फिल्म ‘काबुलीवाला’ देखी थी, इसलिए वह उस पठान को काबुलीवाले अंकल ही बोला करती थी. जब दूर से ही उस की आवाज सुनती, दौड़ कर ‘काबुलीवाला आया’ बोल कर दरवाजे पर जा कर खड़ी हो जाती और मुझे जोरजोर से आवाज दे कर बुलाती.

हालांकि उस ने अपना नाम अजहर बताया था, पर हम सब उसे काबुलीवाला या पठानभाई ही कहते थे. वह बोला करता कि काबुल में हिंदी फिल्में और हिंदी गाने काफी लोकप्रिय हैं. कुछ हिंदी फिल्मों के नाम भी बताए थे. ‘कुर्बानी’, ‘धर्मात्मा’, ‘धर्मवीर’, ‘शोले’ आदि जो फिल्में उस ने देखी थीं. उसे दिल्ली शहर भी बहुत पसंद था. 80 के दशक की शुरुआत तक तो काबुलीवाला आया करता था. उस के बाद उस का आना अचानक बंद हो गया.

फिर अचानक एक दिन 1984 के मध्य में हमारे घर पर वह आया. उस के साथ उस की 10 साल की बेटी जाहिरा भी थी. जाहिरा बहुत ही सुंदर लड़की थी. वह साथ में कुछ ड्राईफ्रूट्स भी लाया था. उस ने अनीता के बारे में पूछा, तो मैं ने उसे आवाज दे कर बुलाया. अनीता और जाहिरा दोनों लगभग हमउम्र ही थीं. अनीता ने आ कर कहा, ‘काबुलीवाले अंकल, इतने दिन आप कहां रह गए थे? आप काफी दिनों के बाद आ रहे हैं?’

मैं ने भी अनीता की बात दोहराई. पहले उस ने ड्राईफ्रूट्स अनीता को दिए. फिर कुछ ड्राईफ्रूट्स के पैकेट मुझे दिए. मैं ने कहा, ‘आजकल क्या रेट चल रहा है, मुझे पता नहीं, तुम बताओ कितने रुपए दे दूं, पठानभाई?’ तब वह बोला, ‘मुझे आप पुराने रेट से ही दे दो. आजकल तो मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है हम लोगों पर. हम आप के वतन में रिफ्यूजी बन कर आए हैं.’

मेरे, ऐसा क्या हो गया, पूछने पर उस ने कहा, ‘हमारे वतन में तो काफी दिनों से जंग चल रही है. जब से रूसी आए हैं, अमन छिन गया है. रोज गोलाबारूद, बम से न जाने कितनी जानें जा रही हैं. मुजाहिदीनों और रूसियों के बीच पिस कर रह गए हम लोग. हजारों लोग वतन छोड़ कर पाकिस्तान, ईरान, हिंदुस्तान भाग कर रिफ्यूजी कैंप में बसर कर रहे हैं. मैं तो आप के मुल्क से वाकिफ हूं, इसीलिए दिल्ली आ गया अपनी बीवी और बच्ची के साथ.’

इतना कहतेकहते वह बच्ची का हाथ पकड़ कर रोने लगा. मैं ने अनीता को कुछ स्नैक्स और मिठाई लाने को कहा और पूछा, ‘पठानभाई, बोलो क्या पिओगे ठंडा या गरम? तुम्हारी बेटी पहली बार आई है.’ इतना बोल कर मैं ने जाहिरा का हाथ पकड़ कर अपने पास खींचते हुए कहा, ‘बेटा, दिल्ली की लस्सी मशहूर है, पिओगी?’

उस ने कहा ‘हां, पिऊंगी. अब्बू भी बोलते हैं यहां की लस्सी बहुत उम्दा होती है.’

मैं पठान की ओर देख कर बोली, ‘अरे, यह तो हिंदी बोल लेती है.’

पठान बोला, ‘हम लोगों ने हिंदी सिनेमा देख कर हिंदी बोलना सीख लिया है.’

अनीता मिठाई, स्नैक्स और लस्सी ले कर आई. पठान और जाहिरा ने निसंकोच खाया भी. मैं ने उस से जब पूछा कि क्या अब वह दिल्ली में ही रहेगा तो उस ने कहा, ‘मेरा बड़ा भाई अमेरिका में है. वह मुझे, मेरी पत्नी और जाहिरा को स्पौंसर कर अमेरिका बुला रहा है.’

मैं ने जब कहा कि क्या इंडिया उसे अच्छा नहीं लगता कि इतनी दूर जा रहा है तो वह बोला, ‘आप का वतन तो बहुत प्यारा है. पर सुना था कि यहां सिर्फ 1 साल का ही वीजा मिलता है. फिर हर साल वीजा 1 साल और आगे बढ़ाना होगा. अमेरिका जा कर वहां मैं रिफ्यूजी होते हुए ग्रीनकार्ड की अर्जी दूंगा और जल्द ही ग्रीनकार्ड मिल भी जाएगा. हमारे वतन के बहुत लोग वहां पहले से ही गए हैं. हम लोग दिल्ली में अंगरेजी बोलना सीख रहे हैं.’ मैं ने जाहिरा के हाथ में 500 रुपए अलग से दे कर कहा कि इस से तुम एक इंडियन ड्रैस ले लेना. उस के बाद वह फिर 1985 के आरंभ में हमलोगों से मिलने आया. इस बार उस की पत्नी और बेटी भी साथ थी. उस ने बताया कि वे एक सप्ताह में अमेरिका जा रहे हैं. यह इंडिया में हमारी आखिरी मुलाकात थी. इस के बाद वर्षों बीत गए, लगभग 20 वर्ष. इस बीच दुनिया काफी बदल गई. कितनी जंगें हुईं-इराक, अफगानिस्तान, कारगिल न जाने कितने खूनखराबे, आतंकी घटनाएं हुईं. मैं कैलिफोर्निया की सिलिकौन वैली के एक शहर फ्रेमौंट में आई हूं. मेरे बच्चे यहीं सैटल्ड हैं. यहां अकसर आनाजाना लगा रहता है.

एक दिन मैं वालमार्ट गई थी शौपिंग के लिए. वहां पेमैंट लेन में मेरे आगे एक लड़की थी, उस के साथ एक बुजुर्ग महिला भी थी. लड़की तो रंगरूप, पहनावे से अमेरिकन लग रही थी. पर उस के साथ वाली महिला अपने सिर और गले में स्कार्फ बांधे थी, जैसा कि अकसर मुसलिम महिलाएं यहां बांधा करती हैं. लड़की का चेहरा जानापहचाना लगा, पर मैं ने संकोचवश उस से कुछ नहीं पूछा था. वह मेरे आगे लाइन में खड़ी थी. उस ने मुझे देखा था. अपने देश में होती तो जरूर पूछ लेती. इस के एक सप्ताह बाद मेरी बेटी ने पार्टटाइम ड्राइवर और डोमैस्टिक हैल्प के लिए विज्ञापन दिया था अपने मोबाइल नंबर के साथ. मेरी बेटी को एक लड़की ने फोन कर कहा कि वह काम के सिलसिले में मिलना चाहती है. बेटी उस समय औफिस में थी. बेटी ने उसे बताया कि मम्मी घर पर हैं, जा कर काम समझ कर बात कर ले. थोड़ी देर में घर की कौलबैल बजी. मैं ने दरवाजा खोला तो देखा कि वही लड़की सामने थी. कुछ पल के लिए दोनों एकदूसरे को देखते रहे थे.

फिर मैं ने पूछा, ‘‘कहीं तुम जाहिरा तो नहीं?’’

वह बोली, ‘‘और आप दिल्लीवाली आंटी?’’

मैं ने उसे अंदर आने को कहा और पूछा, ‘‘क्या कल तुम वालमार्ट में थी?’’ जाहिरा ने कहा, ‘‘हां, मैं और मम्मी दोनों थे. आप ने देखा था क्या?’’

मेरे हां कहते ही वह बोली, ‘‘अगर देखा तो आप ने बात क्यों नहीं की?’’

मैं ने कहा कि तुम तो बिलकुल अमेरिकन दिख रही थी और वैसे भी अमेरिका में बेवजह और बिना जानेपहचाने टोकना मुझे ठीक नहीं लगा था.

इस पर वह बोली, ‘‘यहां तो सभी एकदूसरे के नाम से ही पुकारते हैं, पर मैं तो उसी पुराने रिश्ते से आप को आंटी ही पुकारूंगी. आप को कोई एतराज तो नहीं है?’’

मैं ने कहा, ‘‘नहीं.’’

जाहिरा बोली, ‘‘मैं तो आप की बेटी के कहने पर यहां काम के लिए आई हूं.’’

वैसे तो मैं मुसलिम लड़की रखने में डरती थी, फिर भी उस के प्रति ऐसी भावना मेरे मन में नहीं आई. मैं बोली, ‘‘काम तुम्हें बाद में बताऊंगी, पहले तुम यह बताओ कि काबुल से कैलिफोर्निया तक कैसे आई और यहां तुम्हारे मम्मीपापा सब कैसे हैं? तुमअभी तक हिंदी अच्छी तरह बोल लेती हो.’’

वह बोली, ‘‘थैंक्स टू बौलीवुड, और हिंदी टीवी सीरियल्स हिंदी सिखाने के लिए. यहां घर में हमलोग फारसी में बात करते हैं और बाहर दूसरे लोगों से अंगरेजी में.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘यह तो बहुत अच्छी बात है कि तुम 3 भाषाएं जानती हो.’’

फिर उस ने बोलना शुरू किया, ‘‘मेरे बड़े चाचा काबुल में अमेरिकी एंबैसी में काम करते थे. वे बहुत पहले ही अमेरिका आ गए  थे. उन्होंने हम लोगों को स्पौंसर कर यहां का वीजा दिलाया. बाद में हम ने रिफ्यूजी होने के आधार पर ग्रीनकार्ड के लिए अप्लाई किया जो 6 महीने में ही मिल गया. फिर लगभग 5 साल के अंदर ही यहां की नागरिकता भी मिल गई.’’

मैं ने उस से पूछा, ‘‘और कितने लोग अफगानिस्तान से यहां आ कर शरण लिए हुए हैं?’’ उस ने बताया, ‘‘अफगान युद्ध के पहले बहुत ही कम अफगानी लोग अमेरिका में थे. लेकिन रूसी और मुजाहिदीनों के बीच लड़ाई के चलते बड़ी बरबादी हुई और लोग देश छोड़ कर भागने लगे थे. फिलहाल 1 लाख से थोड़े ही कम अफगानी लोग अमेरिका में हैं. इन में ज्यादातर लोग कैलिफोर्निया में हैं. उस में भी फ्रेमौंट शहर में सब से ज्यादा अफगानी शरणार्थी बसे हैं. इस के बाद दूसरे नंबर पर उत्तर वर्जीनिया है. अमेरिकी सरकार ने उन की काफी सहायता की है. सस्ते रैंट पर घर दिलवाए हैं?’’ फिर मैं ने पूछा, ‘‘उस का परिवार यहां क्या कर रहा है?’’ वह बोली, ‘‘मेरे चाचा तो अब बहुत बीमार रहते हैं. इस के अलावा उन की दिमागी हालत भी ठीक नहीं है जिस के चलते उन्हें हर वक्त किसी की देखरेख की जरूरत होती है. यह काम उस के पिता करते हैं और इस के लिए सरकार लगभग 2 हजार डौलर देती है. मम्मी एक स्टोर्स में पार्टटाइम काम करती हैं. मेरे पति एक कार शोरूम में काम करते हैं. मैं ने स्कूल की पढ़ाई पूरी कर ली है. आगे की पढ़ाई औनलाइन घर से ही कर रही हूं. फुलटाइम जौब तो कहीं नहीं मिली है, पार्टटाइम जो भी काम मिलता है, कर लेती हूं. अमेरिका में किसी भी काम को हेय दृष्टि से नहीं देखते हैं और यहां आप के पास भी काम के लिए ही आई हूं.’’

मैं ने एक दीर्घ सांस लेते हुए कहा, ‘‘मुझे अच्छा नहीं लग रहा तुम से घर के काम कराना.’’

‘‘आप के बच्चे इतने दिनों से अमेरिका में हैं और आप भी काफी दिनों से अमेरिका आतीजाती रही हैं, फिर आप ऐसा कैसे सोच सकती हैं. यहां कर्म ही धर्म है और हर काम करने वाले की समाज में उतनी ही प्रतिष्ठा है.

आप बेझिझक कहें, मैं भी निसंकोच खुशीखुशी अपना काम निभाऊंगी.’’

फिर उसे काम बताया कि दोपहर 4 घंटे सोमवार से शुक्रवार तुम्हें टाइम देना होगा. ढाई बजे बच्चों को स्कूल से पिक कर घर लाना है, उन्हें लंच करा कर थोड़ा आराम करने देना. इस बीच किचन के कुछ काम जैसे सब्जियां काटना, साफ बरतनों को डिशवाशर से निकाल उन की जगह पर लगाना, फिर बच्चों को अलगअलग क्लासेज में ले जाना. शाम को जब बच्चों को ले कर आना तो उन के रूम और कपड़े आदि ठीक करना. किसी दिन ज्यादा काम भी हो सकता है और कभी शनिवार या रविवार को भी काम पड़ सकता है.

जाहिरा बोली, ‘‘बस, अब आप निश्चिंत हो जाएं, सभी काम आप के मन लायक करूंगी.’’

मैं ने उस से पूछा, ‘‘क्या वह इंडियन डिशेज पकाना जानती है?’’ तो उस ने कहा, ‘‘सभी तो नहीं, पर कुछकुछ बना लेती हूं. हां, मेरी मां सबकुछ बना लेती हैं. पर आंटी, आप क्या मेरा बनाया खाएंगी? मुझे याद है कि जब हम दिल्ली में थे, ईद की सेवइयां देने अब्बू के साथ आई थी आप के घर. अब्बू ने आप को कच्ची सेवइयां दी थीं. मैं ने उन से वजह पूछी, तो उन्होंने बताया कि हमारे घर का पका खाना आप नहीं खाती हैं.’’

‘‘उस समय की बात और थी. अब तो अमेरिका में थोड़ा ऐडजस्ट नहीं करूंगी तो रहना मुश्किल हो जाएगा. ठीक है, कभी घर में पार्टी देनी होगी तो कुछ खास पकवान बिरयानी आदि घर पर ही बनवाना चाहती हूं. इसीलिए ऐसे मौकों के लिए पार्टटाइम इंडियन कुक खोज रही हूं. वैसे ज्यादा कुछ तो होटल से ही मंगवा लेते हैं. पर सुना है तुम लोग लाजवाब बिरयानी बनाते हो.’’

‘‘डोंट वरी, आंटी, ऐसी जरूरत हो तो एक दिन पहले बता देना, अम्मी आ कर बना देंगी. पर आप तो बिलकुल नहीं बदली हैं, वही साड़ी, सिंदूर और बिंदिया. आप को पता है, हमलोग भी अपनी पार्टी में लहंगेसाड़ी पहन कर इंडियन फिल्मी गानों पर डांस करते हैं. मुझे तो सुर्ख लाल रंग की सितारों वाली साड़ी बहुत अच्छी लगती है.’’

मैं ने कहा, ‘‘उसे 20 डौलर प्रति घंटे के रेट से पे करूंगी’’ इस बात पर वह जोर से हंसने लगी और बोली, ‘‘आप अगर 10 डौलर्स भी देंगी तो हम खुशी से कुबूल करेंगे.’’

मैं ने उस से कहा, ‘‘कल से ही काम पर आ जाए.’’

अगले दिन से जाहिरा काम पर आने लगी. सभी काम पूरे मन लगा कर हंसतेहंसते करती और मैं भी संतुष्ट थी. हर शुक्रवार की शाम को उस को वीकली पेमैंट कर देती जैसा कि यहां का पार्टटाइम वर्क पेमैंट का नौर्मल तरीका है. एक दिन जाहिरा अपनी मां को ले कर आई. दुआसलाम के बाद उस की मां ने कहा, ‘‘बहनजी, अगले सप्ताह से मैं ही काम किया करूंगी. बेटी को फुलटाइम काम मिल गया है. अभी सीजन है. अमेरिका में मौल्स और स्टोर्स में फैस्टिवल सीजन में बिक्री बहुत बढ़ जाती है, इसलिए 3-4 महीने अक्तूबर से दिसंबर या जनवरी तक उन्हें एक्स्ट्रा स्टाफ चाहिए होता है. जाहिरा ने मुझे सारे काम और जगहें, जहां जाना होता है, बता दिया है. आप को कोई एतराज तो नहीं?’’ मैं ने कहा, ‘‘नहीं, मुझे कोई एतराज नहीं है. मगर तुम भी तो कहीं काम करती हो?’’

‘‘हां, वह पार्टटाइम जौब है, सुबह 9 से 12 बजे तक का.’’

मैं ने उस का नाम पूछा तो उस ने कहा, ‘‘आबिदा.’’

अगले सप्ताह से आबिदा ही काम पर आती. मेरी बेटी अनीता तो उस के आने से ज्यादा ही खुश थी. कभीकभी किचन में एक्स्ट्रा हैल्प भी कर दिया करती थी. कुछ दिनों के बाद मेरे नाती का जन्मदिन था. जैसा कि अमेरिका में होता है, पार्टी छुट्टी के दिन इतवार को ही रखी गई थी. हालांकि घर पर उस का सही जन्मदिन 2 दिनों पहले ही मना लिया गया था. मैं ने आबिदा को इतवार को सपरिवार आने का निमंत्रण दिया. पार्टी तो शाम को थी पर मैं ने उसे जल्द ही आने को कहा क्योंकि किचन में उस की मदद की जरूरत थी. संडे को पार्टी में आबिदा और पठानभाई दोनों आए थे. मैं ने जाहिरा के नहीं आने का कारण पूछा तो उस ने कहा कि जाहिरा घर पर अपने बीमार चाचू की देखभाल कर रही है. आबिदा की बनाई बिरयानी और वेज कोरमे की सभी तारीफ कर रहे थे. उस दिन मेरा बेटा भी आया था. वह फ्रेमौंट के पास सैन होजे शहर में रहता है. उस का परिवार भी पठान परिवार से मिला.

अनीता पठानभाई से अलग से भी मिली और आदर के साथ दोनों हाथ जोड़ कर ‘नमस्ते काबुलीवाले अंकल’ भी कहा. फिर मैं ने नाती को बुला कर उसे नमस्कार करने को कहा. मेरा नाती झुक कर उस के पैर छूने जा रहा था तो उस ने नाती को बीच में ही रोक कर ढेर सारे आशीष दिए और गिफ्ट दे कर कहा, ‘‘यही तो खासीयत है हिंदुस्तान की तहजीब में, मेहमानों की इज्जत करना और बड़ों का आदर करना. आप का वतन और हिंदुस्तानी लोग बहुत अच्छे हैं, बहनजी.’’

जब आबिदा और पठानभाई जाने लगे तो हम सभी परिवार के लोग उन्हें दरवाजे तक विदा करने आए. उन्हें रिटर्न गिफ्ट दिए. जाहिरा के लिए अलग से 2 पैकेट दिए. एक में उस के लिए खाना था और दूसरे में जाहिरा के लिए लाल रंग की साड़ी. साड़ी देख कर दोनों बहुत खुश हुए और कहा, ‘‘आप ने जो इज्जत दी, उस के लिए शुक्रिया. आप की तहजीब को सलाम.’’ वे दोनों अपनी आंखों में खुशी के आंसू लिए भारतीय तरीके से हाथ जोड़ कर विदा हुए.

Best Hindi Story : जिंदगी एक बांसुरी है – अजय क्या काम करता था

Best Hindi Story : जोकी हाट का ब्लौक दफ्तर. एक गोरीचिट्टी, तेजतर्रार लड़की ने कुछ दिन पहले वहां जौइन किया था. उसे आमदनी, जाति, घर का प्रमाणपत्र बनाने का काम मिला था. वह अपनी ड्यूटी को मुस्तैदी से पूरा करने में लगी रहती थी. सुबह के 10 बजे से शाम के 4 बजे तक वह सब की अर्जियां लेने में लगी रहती थी.

आज उसे यहां 6 महीने होने को आए हैं. अब उस के चेहरे पर शिकन उभर आई है. होंठों से मुसकान गायब हो चुकी है. ऐसा क्या हो गया है?

अजय भी ठहरा जानामाना पत्रकार. खोजी पत्रकारिता उस का शगल है. अजय ने मामले की तह तक जाने का फैसला किया. पहले नाम और डेरे का पता लगाया.

नाम है सुमनलता मुंजाल और रहती है शिवपुरी कालोनी, अररिया में.

अजय ने फुरती से अपनी खटारा मोटरसाइकिल उठाई और चल पड़ा. पूछतेपूछते वहां पहुंचा. आज रविवार है, तो जरूर वह घर पर ही होगी.

डोर बैल बजाई. वह बाहर निकली. अजय अपना कार्ड दिखा कर बोला, ‘‘मैं एक छोटे से अखबार का प्रतिनिधि हूं मैडमजी. मैं आप से कुछ खास जानने आया हूं.’’

‘फुरसत नहीं है’ कह कर वह अंदर चली गई और अजय टका सा मुंह ले कर लौट आया.

अजय दूसरे उपाय सोचने में लग गया. 15 दिन की मशक्कत के बाद उसे सब पता चल गया. सुमनलता को किसी न किसी बहाने से उस के अफसर तंग करते थे.

अजय ने स्टोरी बना कर छपवा दी. फिर तो वह हंगामा हुआ कि क्या कहने. दोनों की बदली हो गई. अच्छी बात यह हुई कि सुमनलता के होंठों पर पुरानी मुसकान लौट आई.

एक दिन अजय कुछ काम से ब्लौक दफ्तर गया था. उस ने आवाज दे कर बुलाया. अजय चाहता तो अनसुना कर सकता था, पर फुरसत पा कर वह मिला. औपचारिक बातें हुईं. उस ने अजय को घर आने का न्योता दिया और उस का फोन नंबर लिया. बात आईगई हो गई.

3 दिन बाद रविवार था. शाम को अजय को फोन आया. अजनबी नंबर देख कर ‘हैलो’ कहा.

उधर से आवाज आई, ‘सर, मैं मिस मुंजाल बोल रही हूं. आप आए नहीं. मैं सुबह से आप का इंतजार कर रही हूं. अभी आइए प्लीज.’

मिस मुंजाल यानी ‘वह कुंआरी है’ सोच कर अजय तैयार हुआ और चल पड़ा. एक बुके व मिठाई ले ली. डोर बैल बजाते ही उस ने दरवाजा खोला.

साड़ी में वह बड़ी खूबसूरत लग रही थी. वह चहकते हुए बोली, ‘‘आइए, मैं आप का ही इंतजार कर रही थी.’’

अजय भीतर गया. वहां एक औरत बनीठनी बैठी थी. वह परिचय कराते हुए बोली, ‘‘ये मेरी मम्मी हैं. और मम्मी, ये महाशय पत्रकार हैं. मेरे बारे में इन्होंने ही छापा था.’’

अजय ने उन के पैर छू कर प्रणाम किया. वे उसे आशीर्वाद देते हुए बोलीं, ‘‘सदा आगे बढ़ो बेटा. आओ, बैठो.’’

तभी मिस मुंजाल बोलीं, ‘‘आप ने मुझे अभी तक अपना नाम तो बताया ही नहीं?’’

वह बोला, ‘‘मुझे अजय मोदी कहते हैं. आप सिर्फ मोदी भी कह सकती हैं.’’

‘‘मैं अभी आती हूं,’’ कह कर वह अंदर गई. पलभर में वह ट्रौली धकेलती हुई आई. उस पर केक सजा हुआ था. देख कर अजय को ताज्जुब हुआ.

उस ने खुलासा किया, ‘‘आज मेरा जन्मदिन है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘मेहमान कहां हैं?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘आप ही मेहमान हैं मिस्टर अजय मोदी.’’

‘‘ओह,’’ अजय ने इतना ही कहा.

मोमबत्ती बुझा कर उस ने केक काटा. पहला टुकड़ा अजय को खिलाया. अजय ने भी उसे और उस की मम्मी को केक खिलाया. फिर बुके व मिठाई के साथ बधाई दी और कहा, ‘‘मैं बस यही ले कर आया हूं. पहले पता होता, तो तैयारी के साथ आता.’’

उस ने इशारे से मना किया और बोली, ‘‘आज प्रोफैशनल नहीं पर्सनल मूमैंट को जीना है.’’

अजय चुप हो गया. रात के 8 बजे वह लौटा, तो वे दोनों अजनबी से एक गहरे दोस्त बन चुके थे.

2 महीने बाद अजय का प्रमोशन हो गया, तो सोचा कि उस के साथ ही सैलिबे्रट करे. फोन किया. उस ने बधाई दी. उस की आवाज में कंपन और उदासी थी.

अजय ने कहा, ‘‘आप आज शाम को तैयार रहना.’’

शाम में वह तैयार हो कर शिवपुरी पहुंचा. वह सजसंवर कर तैयार थी. दोनों मोटरसाइकिल पर बैठ कर चल पड़े.

अजय ने रास्ते में बताया कि वे दोनों पूर्णिया जा रहे हैं. वह कुछ नहीं बोली. होटल हर्ष में सीट बुक थी. खानेपीने का सामान उस की पसंद से और्डर किया. पनीर के पकौड़े, अदरक की चटनी कौफी…

अजय ने कहा, ‘‘मिस मुंजाल, आज हम लोग स्पैशल मूमैंट्स को जीएंगे.’’

वह गजब की मुसकान के साथ बोली, ‘‘जैसा आप कहें सर.’’

अजय ने प्यार से पूछा, ‘‘मिस मुंजाल, मुझे ‘सर’ कहना जरूरी है?’’

वह भी पलट कर बोली, ‘‘मुझे भी ‘मिस मुंजाल’ कहना जरूरी है?’’

अजय ने कहा, ‘‘ठीक है. आज से केवल अजय कहना या फिर मोदी.’’

वह बोली, ‘‘मुझे भी केवल सुमन या लता कहना.’’

फिर वह अपने बारे में बताने लगी कि वह हरियाणा के हिसार की है. नौकरी के सिलसिले में बिहार आ गई, पर अब मन नहीं लग रहा है. एलएलएम कर रही है. बहुत जल्द ही वह यहां से चली जाएगी. उसे वकील बनने की इच्छा है.

फिर अजय ने बताया, ‘‘मैं भी बहुत जल्द दिल्ली जौइन कर लूंगा. हैड औफिस बुलाया जा रहा है.’’

फिर उस ने मुझे एक छोटा सा गिफ्ट दिया. बहुत खूबसूरत ‘ब्रेसलेट’ था, जिस पर अंगरेजी का ‘ए’ व ‘एस’ खुदा था.

मैं ने भी एक सोने की पतली चेन दी. उस में एक लौकेट लगा था और एक तरफ ‘ए’ व दूसरी तरफ ‘एस’ खुदा था.

वह बहुत खुश हुई. ब्रेसलेट पहना कर उस ने अजय का हाथ चूम लिया और सहलाने लगी. वह भी थोड़ा जोश में आ गया. उस ने भी उसे चेन पहनाई और गरदन चूम ली. वह सिसकने लगी.

अजय ने वजह पूछी, तो बोली, ‘‘तुम पहले इनसान हो, जिस ने मेरी बिना किसी लालच के मदद की थी.’’

अजय ने कहा, ‘‘एलएलएम करने तक तुम यहीं रहो. कुछ गलत नहीं होगा. मैं हूं न.’’

उस ने ‘हां’ में सिर हिलाया. रात होतेहोते अजय ने उसे उस के डेरे पर छोड़ दिया. विदा लेने से पहले वे दोनों गले मिले.

अजय दूसरे ही दिन गुपचुप तरीके से बीडीओ साहब से मिला. अपने प्रभाव का इस्तेमाल किया और उस की ड्यूटी बदलवा दी.

इस बात को 10 साल गुजर गए. अजय अपने असिस्टैंट के साथ एक मशहूर मर्डर मिस्ट्री की सुनवाई कवर करने पटियाला हाउस कोर्ट गया था.  कोर्ट से बाहर निकल कर वह मुड़ा ही था कि कानों में आवाज सुनाई पड़ी, ‘‘मिस्टर मोदी, प्लीज रुकिए.’’

अजय ने देखा कि एक लड़की वकील की ड्रैस में हांफती हुई चली आ रही थी. पास आ कर उस ने पूछा, ‘‘ऐक्सक्यूज मी प्लीज, आर यू मिस्टर अजय मोदी?’’

अजय ने कहा, ‘‘यस. ऐंड यू?’’

उस ने कहा, ‘‘मैं रीना महिंद्रा. आप प्लीज मेरे साथ चलिए. मेरी सीनियर आप को बुला रही हैं.’’

अजय हैरान सा उस के साथ चल पड़ा. पार्किंग में एक लंबी नीली कार खड़ी थी. उस के अंदर एक औरत वकील की ड्रैस में बैठी थी.

अजय के वहां पहुंचते ही वह बाहर निकली और उस के गले लग गई.

अजय यह देख कर अचकचा गया. वह चहकते हुए बोली, ‘‘कहां खो गए मिस्टर मोदी? पहचाना नहीं क्या मुझे? मैं सुमनलता मुंजाल.’’

अजय बोला, ‘‘कैसी हैं आप?’’

वह बोली, ‘‘गाड़ी में बैठो. सब बताती हूं.’’

अजय ने अपने असिस्टैंट को जाने के लिए कहा और गाड़ी में बैठ गया. उस ने भी रीना को मैट्रो से जाने के लिए कहा और खुद ही गाड़ी ड्राइव करने लगी.

वह लक्ष्मी नगर के एक फ्लैट में ले आई. अजय को एक गिलास पानी ला कर दिया और खुद फ्रैश होने चली गई.

कुछ देर बाद टेबल पर नाश्ता था, जिसे उस ने खुद बनाया था. फिर वह अपनी जिंदगी की कहानी बताने लगी.

‘‘आप ने तो चुपचाप मेरी ड्यूटी बदलवा दी. कुछ दिन बाद ही मुझे पता चल गया. सभी ताने मारने लगे. मुझ से सभी आप का रिलेशन पूछने लगे, तो मैं ने ‘मंगेतर’ बता दिया.

‘‘काफी समय बीत जाने पर भी जब आप नहीं मिले और न ही फोन लगा, तो मैं परेशान हो गई. पता चला कि आप दिल्ली में हो और अखबार भी बंद हो गया है.

‘‘मैं समझ गई कि आप जद्दोजेहद कर रहे होंगे. इधर मेरी मां को लकवा मार गया. मेरी एलएलएम भी पूरी हो गई थी. उस नौकरी से मैं तंग आ ही चुकी थी.

‘‘मां के इलाज के बहाने मैं दिल्ली चली आई. एक महीने बाद मेरी मां चल बसीं. फिर मेरा संघर्ष भी शुरू हो गया. दिल्ली हाईकोर्ट जौइन कर लिया और धीरेधीरे मैं क्रिमिनल वकील के रूप में मशहूर हो गई.’’

अजय मुसकरा कर रह गया.

उस ने पूछा, ‘‘आप बताओ, कैसी कट रही है?’’

अजय ने बताया, ‘‘दिल्ली आने के कुछ महीनों बाद ही अखबार बंद हो गया. मैं ने हर छोटाबड़ा काम किया. ठेला तक चलाया. अखबार बेचा. फिर एक दिन एक रिपोर्टिंग कर एक अखबार को भेजी और उसी में मुझे काम मिल गया. आज तक उसी में हूं.’’

‘‘बीवीबच्चे कैसे हैं?’’

अजय ने हंसते हुए जवाब दिया, ‘‘मैडम मुंजाल, जब अपना पेट ही नहीं भर रहा हो, तो फिर वह सब कैसे?’’

वह मुसकराते हुए बोली, ‘‘तब तो ठीक है.’’

अजय बोला, ‘‘सच कहूं, तो तुम्हारी जैसी कोई मिली ही नहीं और न ही मिलेगी. जहां इतनी कट गई है, तो आगे भी कट ही जाएगी.’’

वह बोली, ‘‘अच्छी बात है.’’

अजय ने पूछा, ‘‘तुम्हारे बालबच्चे कहां और कैसे हैं?’’

वह फीकी मुसकान के साथ बोली, ‘‘एक भिखारी दूसरे भिखारी से पूछ रहा है, तुम ने कितना पैसा जमा किया है.’’

फिर वह चेन दिखाते हुए बोली, ‘‘याद है न… ये चेन आप ने ही पहनाई थी. मैं ने तब से ही इसे अपना ‘मंगलसूत्र’ मान लिया है. समझे…’’

‘‘और फिर मैं हरियाणवी हूं. पति के शहीद होने पर भी दूसरी शादी नहीं करते, यहां तो मेरा ‘खसम’ मोरचे पर गया था, शहीद थोड़े ही हुआ था.’’

अजय उस की प्यार वाली बात सुन कर फफकफफक कर रोने लगा. वह उस के आंसू पोंछते हुए बोली, ‘‘कितना झंडू ‘खसम’ हो आप मेरे? मर्द हो कर रोते हो?’’

अजय ‘खसम’ शब्द पर मुसकराते हुए बोला, ‘‘आई एम सौरी माई लव. यू आर ग्रेट ऐंड आई लव यू वैरी मच.’’

वह भी मुसकराते हुए बोली, ‘‘अच्छा, इसलिए पलट कर मेरी खबर तक नहीं ली.’’

इस के बाद अजय को अपनी बांहों में कसते हुए वह बोली, ‘‘मैं इस ‘अनोखे मंगलसूत्र’ को दिखादिखा कर थक चुकी हूं, मोदी डियर. अब सब के सामने मुझे स्वीकार भी कर लो प्लीज.’’

वे दोनों अगले हफ्ते ही एक भव्य समारोह में एकदूसरे के हो गए. कहा भी गया है कि जिंदगी एक बांसुरी की तरह होती है. अंदर से खोखली, बाहर से छेदों से भरी और कड़ी भी, फिर भी बजाने वाले इसे बजा कर ‘मीठी धुन’ निकाल ही लेते हैं.

Emotional Story : एहसानमंद – सुधा ने विवेक से ऑफिस जाते समय क्या कहा?

Emotional Story : घड़ी के अलार्म की घंटी बजी और डाक्टर विवेक जागा. साथ में सोती हुई उस की पत्नी सुधा भी उठ रही थी.

‘‘शादी की सालगिरह बहुतबहुत मुबारक हो, डार्लिंग,’’ विवेक ने उस का आलिंगन किया.

‘‘आप को भी बहुतबहुत मुबारक हो,’’ सुधा ने उत्तर दिया.

नहाधो कर जब विवेक नाश्ता खाने बैठा तो सुधा ने उस के सामने उस के मनपंसद गरमागरम बेसन के चीले और पुदीने की चटनी रखी. विवेक बहुत खुश हुआ.

‘‘पत्नी हो तो तुम्हारे जैसी,’’ उस ने सुधा से कहा, ‘‘बोलो, आज तुम्हारे लिए क्या उपहार लाऊं? जो जी चाहे मांग लो.’’

‘‘मुझे कोई उपहार नहीं चाहिए, बस, एक अनुरोध है,’’ सुधा ने कहा.

‘‘अनुरोध क्यों, आदेश दीजिए, डार्लिंग,’’ विवेक ने उदारतापूर्ण स्वर में कहा.

‘‘मैं सिर्फ इतना चाहती हूं कि कम से कम आज जल्दी घर आने की कोशिश कीजिएगा. आज हमारी शादी की दूसरी सालगिरह है. मैं आप के साथ कहीं बाहर, किसी अच्छे से रैस्टोरैंट में खाना खाने जाना चाहती हूं.’’

‘‘मैं पूरी कोशिश करूंगा,’’ विवेक ने उसे आश्वासन दिया, पर वह जानता था कि घर लौटने का समय उस के हाथ में नहीं था. और वह यह भी जानता था कि सुधा को भी इस बात का पूरी तरह पता था. आखिरकार, वह भी एक डाक्टर की बेटी थी और, पिछले 2 सालों से एक डाक्टर की पत्नी भी.

अस्पताल जाते हुए ट्रैफिक जाम में फंसा विवेक सोचने लगा कि डाक्टरों का जीवन भी कितना विचित्र होता है. अगर उन की जिम्मेदारी का कोई रोगी ठीक हो जाए तो वह और उस के संबंधी आमतौर से डाक्टर के एहसानमंद नहीं होते हैं.

वे सोचते हैं कि मेहनताना दे कर उन्होंने सारा कर्ज चुका दिया है. आखिरकार डाक्टर अपना काम ही तो कर रहा था. पर अगर किसी कारण से रोगी की हालत न सुधरे, उस का देहांत हो जाए, तो गलती हमेशा डाक्टर की ही होती है, चाहे कितनी ही बुरी हालत में रोगी को चिकित्सा के लिए लाया गया हो.

ऐसी स्थिति में मृतक के घर वाले और अन्य रिश्तेदार कई बार डाक्टर को दोष देते हुए मारामारी और तोड़फोड़ करना आरंभ कर देते हैं. और ऐसे हालात में कुछ लोग तो डाक्टर और अस्पताल पर रोगी की अवहेलना का मुकदमा भी ठोक देते हैं.

विवेक को उसी के अस्पताल में डेढ़ साल पहले हुए एक हादसे का खयाल आया. वह उस हादसे को भला कैसे भूल सकता था, जिस का बेहद गंभीर परिणाम निकला था.

एक अमीर घराने का नाबालिग लड़का अपनी 2 करोड़ रुपए की गाड़ी अंधाधुंध रफ्तार से चला रहा था. गाड़ी बेकाबू हो कर सड़क के बीच के डिवाइडर से टकराई. फिर पलट कर सड़क के दूसरी ओर जा गिरी.

उस तरफ एक युवक मोबाइल पर बात करते हुए अपने स्कूटर पर आ रहा था. कलाबाजी मारती हुई कार, उस के ऊपर गिरी. कार चलाने वाले लड़के की वहीं मौत हो गई. स्कूटर चालक बुरी तरह घायल था. जिस से वह बात कर रहा था, वह शायद कोई उस के घर वाला था, क्योंकि पुलिस के आने से पहले लड़के के रिश्तेदार उसे उठा कर विवेक के अस्पताल ले आए. इमरजैंसी वार्ड में विवेक उस समय ड्यूटी कर रहा था.

6-7 लोग घायल लड़के को ले कर अंदर घुस गए. कुछ विवेक को जल्दी करने को कह रहे थे, कुछ आपस में हादसे की बात कर रहे थे. विवेक ने लड़के की जांच की. वह मर चुका था. जब उस ने यह सच उस के रिश्तेदारों को बताना चाहा तो उन्होंने मानने से इनकार किया.

‘पर वह अभी तक तो जीवित था,’ एक ने बहस की, ‘वह एकदम मर कैसे सकता है, तुम उसे बचाने की कोशिश नहीं करना चाहते हो.’

बीच में एक और रिश्तेदार बोलने लगा, ‘आजकल के डाक्टर सब एकजैसे निकम्मे हैं. ये लोग भारी पगार चाहते हैं, पर पूरे कामचोर हैं.’

विवेक ने मुश्किल से अपने गुस्से को संभाला, ‘देखिए मिस्टर…’ तब तक एक नर्स उस के पास आई और बोली, ‘डाक्टर साहब, एक मरीज आया है, लगता है उसे दिल का दौरा पड़ा है. जरा जल्दी चलिए.’

विवेक उस के साथ जाने के लिए घूमा पर तभी लड़के के चाचा ने उस का हाथ पकड़ लिया, ‘पहले मेरे भतीजे की अच्छी तरह जांच करो, फिर तुम यहां से जा सकोगे. मुझे तो लगता है कि मेरा भतीजा अभी जिंदा है.’

एक नर्सिंग अरदली ने विवेक का हाथ छुड़ाने की कोशिश की. एक और डाक्टर और कुछ रिश्तेदार बीच में घुसे. देखते ही देखते हाथापाई शुरू हो गई. कई लोगों को चोट लगी. अस्पताल का सामान भी तोड़ा गया. सिक्योरिटी गार्ड बुलाए गए और उन्होंने सब को शांत किया. विवेक के माथे पर, जहां किसी की अंगूठी से चोट लगी थी, 5 टांके लगाए गए.

इस घटना के बाद विवेक के अस्पताल ने एक सख्त नियम बनाया. किसी भी मरीज के साथ 2 से अधिक साथवाले, अस्पताल के अंदर नहीं आ सकते, चाहे वे जो हों. इस नियम को कुछ लोगों ने कानूनी चुनौती दी थी और मामला अब भी अदालत में था.

गाडि़यों के जाम के खुलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी. विवेक की विचारधारा वर्तमान में लौट आई.

रहा डाक्टरों का निजी जीवन, वह भी काफी अनिश्चित होता है. कुछ पता नहीं कब किस रोगी की तबीयत अचानक बिगड़ जाए, या किसी हादसे में घायल हुए व्यक्ति को डाक्टर की जरूरत पड़े. ऐसी हालत में डाक्टर होने के नाते, उन्हें सबकुछ छोड़ कर, अपना कर्तव्य निभाने जाना पड़ता है, चाहे पत्नी के साथ सिनेमा देख रहे हों, या बच्चों के साथ उन का जन्मदिन मना रहे हों. डाक्टर बनने से पहले उन को ऐसा व्यवहार करने की प्रतिज्ञा लेनी पड़ती है.

जाम आखिर खुलने लगा और विवेक ने गाड़ी बढ़ाई. अस्पताल पहुंच कर विवेक ने डाक्टरों के लौकर में जा कर अपना सफेद कोट निकाल कर पहन लिया. फिर उस ने, हमेशा की तरह, उन 3 वार्डों के चक्कर लगाने लगा, जिन के मरीजों के रोगों के बारे में रिकौर्ड रखने के लिए वह जिम्मेदार था.

हर वार्ड में 10-12 मरीज थे. उन में हर एक की अपनी ही एक खास कहानी थी.

पहले वार्ड में उस की मरीज राधा नामक एक विधवा थी. वह पीलियाग्रस्त थी. तकरीबन 1 महीने से वह अस्पताल में पड़ी हुई थी. उस के साथ उस की 5 साल की बेटी भी भरती कराई गई थी क्योंकि घर पर उस की देखभाल करने वाला कोई नहीं था. लड़की का नाम मीनू था और वह डाक्टर विवेक की दोस्त बन गई थी.

मीनू रोज सुबह एक नर्स के साथ अस्पताल के बगीचे में घूमने जाती थी. और जब विवेक अपने राउंड पर आता, तो पहले मीनू उसे बताती थी कि उस ने बगीचे में क्या देखा, फिर उसे बाकी काम करने देती.

आज वह बहुत उत्तेजित लग रही थी, जैसे उस के पास कोई बड़ी खबर हो. विवेक को देखते ही वह बोलने लगी, ‘‘अंकल अंकल, आप कभी नहीं बता सकेंगे कि मैं ने आज क्या देखा. मैं ने तितली देखी. बड़ी सुंदर रंग वाली. वह इधरउधर उड़ रही थी जैसे कोई परी हो. मैं ने उस से बात करने की कोशिश की, पर वह चली गई. किसी दिन मैं एक तितली से दोस्ती करूंगी.’’

उस की मासूमियत देख कर विवेक ने सोचा, ‘काश, यह बच्ची जीवनभर ऐसी ही रह सकती. पर मतलबी दुनिया में यह संभव नहीं है.’

अगले वार्ड में, एक पलंग पर वृद्ध गेनू लेटा था. वह मौत के द्वार पर खड़ा था और वह यह जानता था कि वह अब केवल मशीनों के जरिए जी रहा है. उस के दोनों बेटे विदेश में बसे हुए थे. गेनू की पत्नी का देहांत कुछ साल पहले हो चुका था. 6 महीने पहले, गेनू को दिल का दौरा पड़ा.

उस का एक पड़ोसी उसे अस्पताल ले आया. जांच के बाद पता चला कि उस के दिल को भारी नुकसान पहुंचा है. उस की उम्र 70 वर्ष से ऊपर थी और वह बहुत कमजोर भी था. सो, डाक्टरों ने औपरेशन करना उचित नहीं समझा और उस के अधिक से अधिक एक साल और जीने की संभावना बताई.

उस के बेटों को जब उस की हालत का पता चला और उस के अस्पताल में भरती होने का समाचार मिला, तो वे विदेश से भागेभागे आए. उन्हें यहां आ कर यह मालूम हुआ कि पिताजी के बचने की कोई उम्मीद नहीं है और वे इस दुनिया में अब कुछ ही दिनों के मेहमान हैं.

दोनों ने आपस में बात की होगी कि पिताजी की मृत्यु तक वे रुकना नहीं चाहते. चूंकि अस्पताल का खर्चा बीमा कंपनी दे रही थी, उन्होंने साथ मिल कर सोचा कि पिताजी को अब पैसों की जरूरत नहीं होगी. सो, पिताजी को दोनों बेटों ने बताया कि उस के घर में काफी लंबीचौड़ी मरम्मत करवा कर उस को बिलकुल नया बनाना चाहते हैं.

काम के लिए काफी पैसे लगेंगे. इस बहाने उन्होंने कोरे कागज और कोरे चैक पर पिताजी के हस्ताक्षर ले लिए. फिर क्या कहना. चंद दिनों में उन्होंने घर भी बेच दिया और पिताजी का खाता भी खाली कर दिया. और तो और, उस के बाद पिताजी को बताए बिना वे विदेश लौट गए. उन की धांधली के बारे में पिताजी को तब पता चला, जब उस के पड़ोस में रहने वाला दोस्त उस से मिलने आया था.

अगले वार्ड में एक शराबी, मीनक पड़ा था. 2 हफ्ते पहले वह नशे की हालत में सीढि़यों से नीचे गिर कर बुरी तरह घायल हो गया था. अस्पताल में भरती होने के बाद वह रोज शाम को ऊंची आवाज में शराब मांगता था और शराब न मिलने पर काफी शोर मचाता था. पूरा स्टाफ उस से दुखी था. इसलिए सब बहुत खुश थे कि अब वह ठीक हो गया था और आज उसे अस्पताल से छुट्टी मिल रही थी.

पिछली शाम, जब यह खबर उस की पत्नी को दी गई, तो वह खुश होने के बजाय, घबरा गई. वह भागीभागी विवेक के पास गई. उस के सामने वह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘डाक्टर साहब, मुझ पर दया कीजिए. मेरे पति कुछ काम नहीं करते हैं. घर को चलाने का और 2 बच्चों को पढ़ाने का पूरा खर्चा मैं संभालती हूं. मेरी अच्छी नौकरी है पर फिर भी हमें पैसों की कमी हमेशा महसूस होती है. अभी महीने की शुरुआत है. मुझे हाल में वेतन मिला है. अगर आप कल मेरे पति को डिस्चार्ज कर देंगे, तो वह घर आ कर मुझे पीटपाट कर, सारे पैसे बैंक से निकलवाएगा. फिर सब पैसा शराब में उड़ा देगा.

‘‘अभी मुझे पिछले महीने का कर्ज भी चुकाना है. इस महीने का खर्च चलाना है. बच्चों की स्कूल की फीस भी देनी है. मैं कैसे काम चलाऊंगी. मैं आप से हाथ जोड़ कर विनती करती हूं, मेरे पति को कम से कम 4-5 दिन और अस्पताल में रख लीजिए.’’

‘‘माफ करना बहनजी,’’ विवेक ने जवाब दिया, ‘‘पर आप के पति को अस्पताल में रखना या न रखना मेरे हाथ में नहीं. वैसे भी, हम किसी रोगी को ठीक होने के बाद यहां रखना नहीं चाहते हैं क्योंकि बहुत और बीमार लोग हैं जो यहां बैड के खाली होने का इंतजार कर रहे हैं.’’

रोगियों की और रिश्तेदारों की कोईर् कमी नहीं थी. कहीं बेटी मां के बारे में चिंतित थी, कहीं चाचा भतीजे के बारे में. हर रोगी की रिपोर्ट जांचना और उस की आगे की चिकित्सा का आदेश देना आवश्यक था और ऊपर से उस को आश्वासन भी देना होता था कि डाक्टर पूरी कोशिश कर रहे हैं कि वह जल्द से जल्द पूरी तरह से स्वस्थ हो जाएगा.

विवेक मैटरनिटी वार्ड के सामने से निकल रहा था कि वार्ड का दरवाजा अचानक खुला और वरिष्ठ डाक्टर प्रशांत बाहर आए. वे काफी चिंतित लग रहे थे पर विवेक को देख कर उन का चेहरा खिल उठा.

‘‘डाक्टर विवेक,’’ वे बोले, ‘‘अच्छा हुआ कि तुम मिल गए. हमारे वार्ड में इस समय कोईर् खाली नहीं है, और एक जरूरी संदेश वेटिंगरूम तक पहुंचाना था. कृपा कर के, क्या तुम यह काम कर दोगे?’’

‘‘कर दूंगा, सर’’ विवेक ने उत्तर दिया, ‘‘संदेश क्या है और किस को पहुंचाना है?’’

‘‘वेटिंगरूम में एक मिस्टर विनोद होंगे,’’ डाक्टर प्रशांत ने कहा, ‘‘उन को यह बताना है कि उन की पत्नी को एक प्रिमैच्योर यानी उचित समय से पहले बच्चा हुआ है और वह लड़का है. हम पूरी कोशिश कर रहे हैं पर उसे बचाना काफी कठिन लग रहा है. और उन को यह भी कहना कि इस समय वे अपनी पत्नी और बच्चे से नहीं मिल सकेंगे. पर शायद 3-4 घंटे के बाद यह संभव होगा.’’

वेटिंगरूम की ओर जाते हुए विवेक सोचने लगा कि यह क्यों होता है कि बुरा समाचार देने के लिए हमेशा जूनियर डाक्टर को ही जिम्मेदारी दी जाती है. डरतेडरते विवेक ने बच्चे के बाप को अपना परिचय दिया और फिर संदेश सुनाया. बाप कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, ‘‘मैं जानता हूं कि आप लोग बच्चे को बचाने के लिए जीजान लगाएंगे.’’

विवेक ने वापस जा कर बच्चे की मां की फाइल निकाली और पढ़ कर उस को पता लगा कि उस औरत को इस से पहले 2 मिसकैरिज यानी गर्भपात हुए थे, और दोनों वक्त बच्चा मृतक पैदा हुआ था. यह उस औरत का तीसरा गर्भ था.

डाक्टरों ने बच्चे को बचाने की जितनी कोशिश कर सकते थे, उतनी की. बच्चा 5 दिन जीवित रहा. इस दौरान उस के बाप ने उस का नाम विजय रख दिया. चंद गिनेचुने रिश्तेदार भी उस से मिल सके. विवेक भी दिन में 2-3 बार जा कर बच्चे की हालत पता करता था.

पर 5वें दिन विजय का छोटा सा दिल हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गया. विवेक भी उन डाक्टरों में था जिन्होंने अस्पताल के दरवाजे के पास खामोश खड़ेखड़े उस के पिता को विजय का नन्हा मृतक शरीर अपनी छाती से लगा कर बाहर जाते देखा.

कुछ दिनों बाद डाक्टर विवेक के नाम अस्पताल में एक पत्र आया. उस ने लिफाफा खोला और पढ़ा, ‘डाक्टर विवेक, मैं यह पत्र आप को भेज रहा हूं, क्योंकि मुझे सिर्फ आप का नाम याद था, पर यह उन सब डाक्टरों के लिए है जिन्होंने मेरे बेटे विजय की देखभाल की थी.

‘आप लोगों ने उस को इतनी देर जीवित रखा ताकि हम उस को नाम दे सकें, उस को हम अपना प्यार दे सकें, उस के दादादादी और नानानानी उस से मिल सकें. दवाइयों ने उसे जिंदा नहीं रखा, बल्कि आप लोगों के प्यार ने उसे चंद दिनों की सांसें दीं. धन्यवाद डाक्टर साहब. मैं आप सब का एहसानमंद हूं.’ नीचे हस्ताक्षर की जगह लिखा था, ‘विजय का पिता.’

विवेक की आंखें भर आईं और उस के गाल गीले हो गए. पर उस ने अपने आंसुओं को रोकने की कोई कोशिश नहीं की.

Best Short Story : कुंठा – महेश क्यों घबराया हुआ था?

Best Short Story : महेश की नौकरी भारतीय वायु सेना में बतौर मैडिकल अटैंडैंट लगी थी. वायु सेना सिलैक्शन सैंटर के कमांडर ने कहा, ‘‘बधाई हो महेश, तुम्हें एक नोबेल ट्रेड मिला है. तुम नौकरी के साथसाथ इनसानियत के लिए भी काम कर सकोगे. किसी लाचार के काम आ सकोगे.’’ जो भी हो, महेश की समझ में तो यही आया कि उसे एक अच्छी नौकरी मिल गई है बस. अस्पताल में तकरीबन 3 महीने की ट्रेनिंग चल रही थी. सबकुछ करना था. मरीजों का टैंपरेचर, ब्लडप्रैशर, नाड़ी वगैरह के रिकौर्ड रखने से ले कर उन्हें बिस्तर पर सुलाने तक की जिम्मेदारी थी. हर बिस्तर तक जा कर मरीजों को दवा खिलानी पड़ती थी. लाचार मरीजों को स्पंज बाथ देना पड़ता था.

महेश तो एक पिछड़े इलाके से था, जहां के अस्पताल के नर्स से ले कर कंपाउंडर, डाक्टर तक मरीजों को डांटते रहते थे. एकएक इंजैक्शन लगाने के लिए नर्स फीस लेती थी. डाक्टरों से बात करने में डर लगता था कि कहीं डांटने न लगें. स्पंज बाथ का तो नाम भी नहीं सुना था. कभी कोई सगा अस्पताल में भरती हुआ, तो उसे एकएक रिलीफ के लिए दाम देते देखा था. पर यहां तो नर्सों का ‘इंटरनैशनल एथिक्स’ हम पर लागू था. हमें पहले ही ताकीद कर दी गई थी कि किसी मरीज से कभी भी चाय मत पीना, वरना कोर्ट मार्शल हो सकता है. पलपल यही खयाल रहता था कि कैसे नौकरी महफूज रखी जाए. एक दिन जब महेश अपनी शिफ्ट ड्यूटी पर गया, तो उस से पहले काम कर रहे साथी ने बताया, ‘‘एक मरीज भरती हुआ है. उस का आपरेशन होना है और उसे तैयार करना है.’’ यह कह कर वह साथी चला गया. महेश ने देखा, तो वह बवासीर का मरीज था. महेश ने उसे नुसखे के मुताबिक समझा दिया और दवा दे दी. पर एक बात के लिए महेश दुविधा में पड़ गया कि उस मरीज के गुप्त भाग की शेविंग करनी थी. उस की शेविंग कैसे की जाए? अब महेश को अफसोस होने लगा कि यह कैसी नौकरी में वह फंस गया. ड्यूटी उस की थी. उस से पूछा जाएगा.

महेश ने एक उपाय निकाला. मरीज को बुलाया. रेजर में ब्लेड लगा कर उस से कहा, ‘‘अंदर से दरवाजा बंद कर लो और पूरा समय ले कर शेविंग कर डालो.’’ उस मरीज ने हामी में सिर हिलाया और रेजर ले कर चला गया. महेश ने संतोष की सांस ली. दूसरे दिन जब उस मरीज को औपरेशन के लिए जाना था, तब महेश ही ड्यूटी पर था. वह सोच रहा था कि सब ठीक हो. उस के सीनियर ने उस से पूछा, ‘‘क्या मरीज का ‘प्रीऔपरेटिव’ केयर फालो हुआ?’’ महेश ने ‘हां’ में सिर हिला दिया.

उस सीनियर ने स्क्रीन पर लगा कर मरीज की जांच की. महेश के पास आ कर वह चिल्लाया, ‘‘यह क्या है? तुम ने तो मरीज का कोई केयर ही नहीं किया है?’’

यह सुन कर महेश के पैरों तले जमीन खिसक गई. वह बोला, ‘‘सर, मैं ने उसे समझा दिया था.’’ वह सीनियर महेश पर बिगड़ा, ‘‘तुम्हारी समझाने की ड्यूटी नहीं है. तुम्हें खुद करना है और यह तय करना है कि मरीज को तुम्हारी लापरवाही के चलते कोई इंफैक्शन न हो.’’ महेश की बोलती बंद हो गई. अगले ही महीने उसे छुट्टी पर घर जाना था. उसे बड़ी कुंठा होने लगी कि यही सब जा कर घर पर बताऊंगा. अब वह अपनेआप को बड़ा बेबस महसूस कर रहा था. वह पूरी तरह हार मान कर सीनियर के पास चला गया, ‘‘सर, मुझे तो अपनेआप को नंगा देखने में शर्म आती है और आप मुझ से उस के गुप्त भाग की शेविंग करने को कह रहे हैं.’’

वह सीनियर तुरंत मुड़ा और मरीज को आवाज दी. उस ने शेविंग का सामान उठाया और कमरे में चला गया. थोड़ी देर बाद वे दोनों बाहर आए.

सीनियर ने महेश से कहा, ‘‘मैं ने इस मरीज की शेविंग कर दी है. किसी लाचार की सेवा करना छोटा या घटिया काम नहीं होता. मैडिकल के प्रोफैशन में औरतमर्द या अंगगुप्तांग नहीं होता, बस एक मरीज होता है और उस का शरीर होता है. तो फिर इस शरीर की साफसफाई करने में किस बात की दिक्कत?’’ इतना कह कर सीनियर चला गया. कितनी आसानी से बिना किसी हीनभावना के उस ने सब कर दिया था. यह देख कर महेश को दुख होने लगा कि उस ने पहले ही ये सब क्यों नहीं किया? उस के अंदर कितनी कुंठा है. उस की नौकरी का असली माने तो यही था. यही तो उस का असली काम था, जिसे करने से वह चूक गया था.

Best Hindi Story : अपनी जमीं और अपना आसमां – खुली हवा में सांस लेती मांबेटी

Best Hindi Story : रश्मि आज फिर अपनी बेटी पाहुनी के साथ परेशान सी घर आई थी. रश्मि के विवाह को 12 वर्ष हो गए थे, मगर सत्यकांत के व्यवहार में जरा भी बदलाव नहीं आया था. वह पैसे को पानी की तरह बहाता था. आज फिर रश्मि को कहीं से पता चला कि उस ने अपना पैसा अपने दोस्त विराज की पत्नी, जिस का नाम पूजा है, के साथ औनलाइन बिजनैस में लगा रहा है.

रश्मि ने पूजा को पहले भी देख रखा था. गहरे मेकअप की परतें और भड़कीले कपड़ों में पूजा एक आइटम गर्ल अधिक, पढ़ीलिखी सभ्य महिला कम लगती थी.

रश्मि को अच्छे से पता था कि पूजा वो सारे हथकंडे अपनाती थी, जिस से वह सत्यकांत जैसे बेवकूफ पुरुष को काबू में रख सके. रातदिन ‘सत्यजी, सत्यजी’ कह कर वह सत्य की झूठी तारीफ करती थी. सत्य बेवकूफ की तरह पूजा की थीसिस भी लिख रहा था और अपने निजी फायदे के लिए पूजा का पति विराज मुंह में दही जमा कर बैठा हुआ था.

आज रश्मि के सिर के ऊपर से पानी गुजर गया था. इसलिए वह सलाह लेने अपने घर आ गई थी. छोटी बहन अंशु बोली, “आप पढ़ीलिखी हो, खुद कमाती हो, क्यों उस गलीच इनसान के साथ अपनी और पाहुनी की जिंदगी बरबाद कर रही हो?”

भैया बोले, “अरे, तेरा कमरा अभी भी खाली पड़ा है.”

वहीं भाभी बोलीं, “डाइवोर्स का केस फाइल करना बच्चू पर और जब एलमनी देनी पड़ेगी, दिन में तारे नजर आ जाएंगे.”

रश्मि ने पाहुनी के मुरझाए हुए चेहरे की तरफ देखा. पाहुनी सुबकते हुए कह रही थी, “पापा उतने भी बुरे नहीं हैं, जैसा आप सब बोल रहे हो.”

तभी रश्मि की मम्मी सुधा बोलीं, “बेटा, तेरे पापा ने तो हमारी बेटी की जिंदगी बरबाद कर दी है. 38 साल की उम्र में ही बूढ़ी लगने लगी है. मेरी बेटी महीने में लाख रुपए कमाती है. क्यों वह किसी आवारा के पीछे जिंदगी खराब करे?”

रश्मि ने घर आ कर बहुत देर तक घर छोड़ने के फैसले के बारे में सोचा. उसे लगा कि अगर आज वह पाहुनी के आंसू से पिघल जाएगी, तो कभी भी इस दलदल से बाहर नहीं निकल पाएगी. सत्यकांत रातदिन झूठ बोलता था. वह इतना झूठ बोलता था कि उसे खुद याद नहीं रहता था.

रात को सत्यकांत 11 बजे आया था. रश्मि ने सत्यकांत को अपने फैसले से अवगत करा दिया था. सत्यकांत ने बस इतना ही कहा, “सोचसमझ कर फैसला लेना. ऐसा ना हो कि कुएं से खाई में गिर जाओ. तुम्हारे घर वाले तुम्हारे पैसों के कारण रातदिन मेरे खिलाफ कान भरते हैं, मगर एक बात याद रखना कि ये केवल तुम्हारी गलतफहमी है कि मेरे और पूजा के बीच कुछ है.

रश्मि सत्यकांत के इन झूठे वादों से तंग आ चुकी थी. उस ने अपना और पाहुनी का सामान पैक कर लिया था. उसे लग रहा था कि कम से कम अपने घर वह तनावमुक्त तो रह पाएगी.

जब रश्मि पाहुनी के साथ अपने घर पहुंची, तो सब लोगों ने उस का खुले दिल से स्वागत किया. अपनी छोटी बहन अंशु और भाभी मंशा की मदद से वह अपने कपड़े और छोटेमोटे सामान कमरे में जमाने लगी.

रश्मि ने देखा कि उस के कमरे में एक अलमारी पुरानी चादरों से अटी पड़ी है. ठंडी सांस भरते हुए रश्मि ने सोचा कि अभी भी घर का वो ही हाल है. सब कुछ अस्तव्यस्त. मंशा भाभी भी घर के रंग में ही रंग गई थीं. मंशा भाभी बोलीं, “अरे दीदी, आप इस के ऊपर अपने महंगे कभीकभार पहनने वाले कपड़े रख दो. जल्द ही मैं ये सामान हटवा दूंगी.” तभी अंशु बोली, “अरे, मेरे कमरे में एक अलमारी पूरी खाली है. आप के कपड़े वहां रख देते हैं.”

रश्मि के सारे महंगे सूट और साड़ी अंशु अपने कमरे में ले गई थी. रश्मि पाहुनी के साथ उस कमरे को अपना घर बनाने की कोशिश कर रही थी कि तभी रश्मि को बाहर शोर सुनाई दिया. जब रश्मि बाहर निकली तो देखा कि अंशु उस की कांजीवरम सिल्क की साड़ी पहन कर मौडलिंग कर रही है.

रश्मि को देख कर अंशु बोली, “दीदी, इस बार औफिस में ट्रेडिशनल डे पर ये ही पहनूंगी.” तभी भैया के छोटे बेटे भव्य से उस साड़ी के ऊपर पानी गिर गया. रश्मि को ऐसा लगा मानो साड़ी पर उकेरे हुए मोर को किसी ने जबरदस्ती नहला दिया हो.

अंशु बोली, “सौरी दीदी, मैं इसे ड्राईक्लीन करवा दूंगी.” तभी रश्मि की मम्मी बोलीं, “अरे, मैं घर पर ही धो दूंगी.”

रश्मि को अंदर ही अंदर झुंझलाहट तो हुई, मगर वह चुप लगा गई थी. रात में जब रश्मि और पाहुनी डिनर के लिए बाहर आए, तो डायनिंग टेबल पर सजी क्रौकरी देख कर रश्मि की भूख ही मर गई थी. क्रौकरी का रंग पीला पड़ गया था और खाना भी बेहद बदमाजा बना हुआ था.

रश्मि ने देखा कि पाहुनी बस खाने से खेल रही थी. रात में रश्मि पाहुनी से बहुत देर तक बात करती रही थी. फिर तकरीबन 10 बजे रश्मि उठ कर रसोई में गई. वह पाहुनी को दूध देना चाहती थी. फ्रिज खोल कर देखा, तो बस एक गिलास ही दूध था. मम्मी रश्मि से बोलीं, “अरे रश्मि, तेरा भाई तो अकेला कमाने वाला है. अब तू आ गई है, तो थोड़ा उसे भी चैन मिल जाएगा.”

रश्मि मम्मी की बात सुन कर थोड़ी अचकचा गई थी, ‘क्या सत्यवान वास्तव में उस के परिवार के बारे में सही बोल रहा था?”

अगले दिन रश्मि सवेरे 5 बजे उठ कर नहा ली थी और अपने कपड़े भी धो कर डाल दिए थे. अब समस्या थी पाहुनी की, वह बिना दूध के आंख नहीं खोलती है.

रश्मि ने फिर खुद अपने पैसों से 4 लिटर दूध खरीद लिया. पाहुनी को दूध देने के बाद जब वह तैयार होने लगी, तो मम्मी बोलीं, “रश्मि आज बहुत बरसों बाद गाढ़ी दूध की चाय नसीब होगी.”

रश्मि जब नाश्ता ले कर अंदर आई तो पाहुनी अभी भी रात के कपड़ों में ही बैठी थी. रश्मि ने गुस्से में कहा, “तुम अब तक नहाई क्यों नहीं हो?”

पाहुनी रोआंसी सी बोली, “कोई बाथरूम खाली नहीं है.”

रश्मि ने प्यार से पाहुनी के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “चलो, फिर छुट्टी कर लेते हैं.”

पाहुनी बिदकते हुए बोली, “नहीं, बिलकुल नहीं.” फिर पाहुनी बस मुंहहाथ धो कर ही स्कूल के लिए तैयार हो गई थी. टिफिन में भी रश्मि बस ब्रेडजेम ही रख पाई थी.

दफ्तर में रश्मि दिनभर सोचती रही थी कि वह क्या करे? पाहुनी को वह ऐसे नहीं देख सकती थी.

वापसी में रश्मि ने पाहुनी की पसंद के स्नैक्स, ड्राईफ्रूट्स और भी ना जाने कितना सामान ले लिया था. मगर जब रश्मि घर पहुंची, तो शर्म के कारण उस ने पूरा सामान मम्मी के हाथों में पकड़ा दिया था. मम्मी गर्व से बोलीं, “ऐसी बेटी क्या कभी मायके पर बोझ होती है?”

भैया और भाभी के लिए रश्मि अब एक कमाई का जरीया थी. मम्मी संकेत में बहुत बार रश्मि को ये समझा चुकी थी कि छोटी बहन अंशु की शादी उस की और भैया की संयुक्त जिम्मेदारी है.

आज जैसे ही रश्मि औफिस से आई, तो उस ने देखा कि अंशु उस का सिल्क का सूट लथेड़ते हुए आ रही है.

रश्मि एकाएक चिल्ला कर बोली, “अंशु किस से पूछ कर तुम ये सूट पहन कर गई थी?”

अंशु खिसियाते हुए बोली, “दीदी आज औफिस में पार्टी थी. मैं ड्राईक्लीन करवा दूंगी.” तभी मम्मी तपाक से बोलीं, “अरे, जब 38 साल की उम्र में तुम्हें ही इतना शौक है तो वह तो बस अभी 24 साल की है. इस घर में मेरा और तेरा नहीं होता. ये हमारा घर है रश्मि. अब इस घर की जिम्मेदारी भी तेरी है.”

इसी तरह मन को समझाते हुए, समझौते करते हुए और घर की जिम्मेदारी उठाते हुए एक माह बीत गया था.

रश्मि ने एकाध बार सत्यकांत से बात करने की कोशिश भी की, मगर सत्यकांत को शायद ये अरेंजमेंट पसंद आ गया था.

जब रश्मि अपने बड़े भाई सुशांत के साथ वकील के यहां गई, तो वकील ने कहा कि तुम्हारे पति के खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस का केस कर सकते हैं, क्योंकि पैसे न कमाना, बाहर गर्लफ्रेंड होना, ऐसी बातों से कुछ नहीं होगा.

रश्मि बोली, “वकील साहब, शादी को 12 साल हो गए हैं. अब भी डोमेस्टिक वायलेंस का केस बन सकता है.”

वकील बोला, “क्यों नहीं. एक ऐसा रामबाण है मेरे पास, जो कभी खाली नहीं जाता है. बस तुम्हें थोड़ी हिम्मत रखनी पड़ेगी.”

फिर वकील ने जो बताया, उसे सुन कर रश्मि की रूह सिहर गई. वकील के अनुसार, रश्मि, पाहुनी के साथ वापस अपने घर जाए और जब सत्यकांत घर आए, उस की उपस्थिति में ही खुद को नुकसान पहुंचाए. तभी डोमेस्टिक वायलेंस का पक्का केस बनेगा. पूरा एक हफ्ता एलिमोनी की रकम तय करने में निकल गया था. मम्मी को एक करोड़ की रकम भी कम लग रही थी, तो अंशु और मंशा भाभी 60 लाख रुपए में समझौता करना चाहते थे.

रश्मि थोड़ा झिझकते हुए बोली, “भैया, क्या सत्यकांत से ऐसे पैसे लेना ठीक रहेगा?”

मम्मी तपाक से बोलीं, “हमें उस बात से कोई मतलब नहीं है. तेरी जिंदगी बरबाद कर दी है उस ने. उन पैसों को तेरे भैया के बिजनैस में लगा देंगे, अंशु की शादी भी थोड़ी ठीक से हो जाएगी.

रश्मि रोज इसी उधेड़बुन में लगी रहती थी. क्या हिंदू शादी में सिंदूर की कीमत वाकई इतनी महंगी है? क्या अपने घर आ कर उसे कोई चैन मिला था? यहां पर भी सब को उस के बस पैसों से मतलब था. एक हफ्ता इसी कशमकश में बीत गया.

पाहुनी रोज अपने मामा, मामी और बाकी घर वालों के मुंह से सत्यकांत को फंसाने के नएनए आइडिया सुनती थी और अपने ही आप में सिमट जाती थी. रात में कभी भी उठ कर पाहुनी डर के कारण चिल्लाने लगी थी.

पाहुनी अब रश्मि से खिंचीखिंची सी रहती थी. एक रात जब रश्मि ने पूछा, तो पाहुनी गुस्से में बोली, “मम्मी, तुम गंदी हो.”

रश्मि फिर उस रात के बाद से पाहुनी से नजर नहीं मिला पाई. फिर 15 दिन बाद सुशांत ही बोला, “रश्मि, पाहुनी को ले कर कब अपने घर जा रही हो. वकील साहब कह रहे हैं, जितना देर करोगी उतनी ही दिक्कत होगी.”

रश्मि ने कहा, “भैया कोई और उपाय नहीं है. पाहुनी बहुत डरी हुई है.”

मंशा भाभी आंखें तरेरते हुए बोलीं, “और कोई उपाय होता तो आप के भैया थोड़े ही ना आप से कहते और फिर ये पैसे हम सब के, आप के और पाहुनी के ही काम आएंगे.”

रश्मि धीमे स्वर में बोली, “भाभी आप ठीक कह रही हैं, मगर फिर भी मेरा मन नहीं मान रहा है.”

मम्मी रुखाई से बोलीं, “तुम्हारे मन के कारण ही तुम आज यहां खड़ी हो.”

उस रात बहुत देर तक रश्मि अपने कमरे में बिना लाइट जलाए बैठी रही, तभी मम्मी के मोबाइल की घंटी से रश्मि की तंद्रा टूटी. मम्मी किसी को अपने घुटने के औपरेशन का खर्चा बता रही थीं, “अरे, पूरे 6 लाख का खर्च है. अगर सत्यकांत ने 15 लाख भी दिए तो भी मैं करा लूंगी.

“रश्मि को धीरेधीरे सुशांत लौटा देगा, फिर कौन अपनी शादीशुदा बेटी को ऐसे सपोर्ट करता है जैसे हम कर रहे हैं. अंशु के लिए रिश्ता भी देख रहे हैं. अब तो रश्मि और सुशांत मिल कर सब देख लेंगे.

“अब देखो, रश्मि के पास पाहुनी है. उस की दूसरी शादी तो कैसे हो सकती है, हम लोगों के साथ रहेगी तो उस की जिंदगी भी कट जाएगी.”

रश्मि को लगा जैसे पहले सत्यकांत उस के साथ छल कर रहा था और अब उस के खुद के घर वाले, उस के टूटे रिश्ते पर अपनी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं.

रात में जब रश्मि ने अपनी मम्मी को खिचड़ी दी तो संयत स्वर में कहा, “मम्मी, अगले हफ्ते तक मैं और पाहुनी अपने घर चले जाएंगे.”

मम्मी ने खिले स्वर में कहा, “ये हुई ना मेरी बेटी वाली बात.”

शनिवार की शाम को रश्मि ने अपना सामान फिर पैक कर लिया था. सुशांत बोला कि चल, मैं तुझे छोड़ आता हूं.”

रश्मि बोली, “भैया, ये सफर मेरा है. तो रास्ता भी मुझे तय करने दीजिए.”

रश्मि का आटो जब एक छोटे से मकान के आगे रुका, तो पाहुनी बोली, “मम्मी, ये किस का घर है?”

रश्मि बोली, “ये हमारा घर है. जहां की हर ईंट में बस प्यार और अपनापन होगा. घर क्या था एक छोटी सी बरसाती थी, साथ में अटैच्ड टायलेट और रसोई भी थी. नीचे रश्मि की दोस्त निधि भी रहती थी और उस की बेटी ऊर्जा, पाहुनी की हमउम्र थी.

निधि ने रश्मि की समस्या सुन कर उसे बहुत कम किराए पर ये बरसाती दिलवा दी थी. सुरक्षा की दृष्टि से, हवा धूप के हिसाब से ये काफी अच्छा औप्शन था.

रश्मि ने वकील को फोन लगाया और कहा, “वकील साहब, मुझे बिना किसी झूठ के अपना केस लड़ना है. क्या आप लड़ पाएंगे?”

वकील बोला, “क्यों नहीं, मगर समय लगेगा. और बस वाजिब रकम ही मिल पाएगी.”

रश्मि हंसते हुए बोली, “बस वाजिब ही चाहिए.”

नीचे से पाहुनी की खुल कर हंसने की आवाज आ रही थी. रश्मि को ऐसा लगा, जैसे बहुत दिन बाद उस ने खुल कर हवा में सांस लिया हो, जहां पर थोड़ी सी जमीं उस की है और थोड़ा सा आसमां भी उस का ही है. वह अपनी जमीं पर पांव रख कर अपने सपनों को अपने ही आसमां में बुनने के लिए तैयार है. नई जिंदगी के लिए अब शायद रश्मि तैयार थी.

Emotional Story : बचपना – पति की चिट्ठी पाकर भी क्यों खुश नहीं थी सुधा?

Emotional Story : आज फिर वही चिट्ठी मनीआर्डर के साथ देखी, तो सुधा मन ही मन कसमसा कर रह गई. अपने पिया की चिट्ठी देख उसे जरा भी खुशी नहीं हुई. सुधा ने दुखी मन से फार्म पर दस्तखत कर के डाकिए से रुपए ले लिए और अपनी सास के पास चली आई और बोली ‘‘यह लीजिए अम्मां पैसा.’’

‘‘मुझे क्या करना है. अंदर रख दे जा कर,’’ कहते हुए सासू मां दरवाजे की चौखट से टिक कर खड़ी हो गईं. देखते ही देखते उन के चेहरे की उदासी गहरी होती चली गई.

सुधा उन के दिल का हाल अच्छी तरह समझ रही थी. वह जानती थी कि उस से कहीं ज्यादा दुख अम्मां को है. उस का तो सिर्फ पति ही उस से दूर है, पर अम्मां का तो बेटा दूर होने के साथसाथ उन की प्यारी बहू का पति भी उस से दूर है. यह पहला मौका है, जब सुधा का पति सालभर से घर नहीं आया. इस से पहले 4 नहीं, तो 6 महीने में एक बार तो वह जरूर चला आता था. इस बार आखिर क्या बात हो गई, जो उस ने इतने दिनों तक खबर नहीं ली?

अम्मां के मन में तरहतरह के खयाल आ रहे थे. कभी वे सोचतीं कि किसी लड़की के चक्कर में तो नहीं फंस गया वह? पर उन्हें भरोसा नहीं होता था.

हो न हो, पिछली बार की बहू की हरकत पर वह नाराज हो गया होगा. है भी तो नासमझ. अपने सिवा किसी और का लाड़ उस से देखा ही नहीं जाता. नालायक यह नहीं समझता, बहू भी तो उस के ही सहारे इस घर में आई है. उस बेचारी का कौन है यहां? सोचतेसोचते उन्हें वह सीन याद आ गया, जब बहू उन के प्यार पर अपना हक जता कर सूरज को चिढ़ा रही थी और वह मुंह फुलाए बैठा था  अगली बार डाकिए की आवाज सुन कर सुधा कमरे में से ही कहने लगी, ‘‘अम्मां, डाकिया आया है. पैसे और फार्म ले कर अंदर आ जाइए, दस्तखत कर दूंगी.’’ सुधा की बात सुन कर अम्मां चौंक पड़ीं. पहली बार ऐसा हुआ था कि डाकिए की आवाज सुन कर सुधा दौड़ीदौड़ी दरवाजे तक नहीं गई… तो क्या इतनी दुखी हो गई उन की बहू?

अम्मां डाकिए के पास गईं. इस बार उस ने चिट्ठी भी नहीं लिखी थी. पैसा बहू की तरफ बढ़ा कर अम्मां रोंआसी आवाज में कहने लगीं, ‘‘ले बहू, पैसा अंदर रख दे जा कर.’’

अम्मां की आवाज कानों में पड़ते ही सुधा बेचैन निगाहों से उन के हाथों को देखने लगी. वह अम्मां से चिट्ठी मांगने को हुई कि अम्मां कहने लगीं, ‘‘क्या देख रही है? अब की बार चिट्ठी भी नहीं डाली है उस ने.’’ सुधा मन ही मन तिलमिला कर रह गई. अगले ही पल उस ने मर जाने के लिए हिम्मत जुटा ली, पर पिया से मिलने की एक ख्वाहिश ने आज फिर उस के अरमानों पर पानी फेर दिया. अगले महीने भी सिर्फ मनीआर्डर आया, तो सुधा की रहीसही उम्मीद भी टूट गई. उसे अब न तो चिट्ठी आने का भरोसा रहा और न ही इंतजार. एक दिन अचानक दरवाजे पर दस्तक हुई. पहली बार तो सुधा को लगा, जैसे वह सपना देख रही हो, पर जब दोबारा किसी ने दरवाजा खटखटाया, तो वह दरवाजा खोलने चल दी.

दरवाजा खुलते ही जो खुशी मिली, उस ने सुधा को दीवाना बना दिया. वह चुपचाप खड़ी हो कर अपने साजन को ऐसे ताकती रह गई, मानो सपना समझ कर हमेशा के लिए उसे अपनी निगाहों में कैद कर लेना चाहती हो. सूरज घर के अंदर चला आया और सुधा आने वाले दिनों के लिए ढेर सारी खुशियां सहेजने को संभल भी न पाई थी कि अम्मां की चीखों ने उस के दिलोदिमाग में हलचल मचा दी. अम्मां गुस्सा होते हुए अपने बेटे पर चिल्लाए जा रही थीं, ‘‘क्यों आया है? तेरे बिना हम मर नहीं जाते.’’ ‘‘क्या बात है अम्मां?’’ सुधा को अपने पिया की आवाज सुनाई दी.

‘‘पैसा भेज कर एहसान कर रहा था हम पर? क्या हम पैसों के भूखे हैं?’’ अम्मां की आवाज में गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा था.

‘‘क्या बात हो गई?’’ आखिर सूरज गंभीर हो कर पूछ ही बैठा.

‘‘बहू, तेरा पति पूछ रहा है कि बात क्या हो गई. 2 महीने से बराबर खाली पैसा भेजता रहता है, अपनी खैरखबर की छोटी सी एक चिट्ठी भी लिखना इस के लिए सिर का बोझ बन गया और पूछता है कि क्या बात हो गई?’’

सूरज बिगड़ कर कहने लगा, ‘‘नहीं भेजी चिट्ठी तो कौन सी आफत आ गई? तुम्हारी लाड़ली तो तुम्हारे पास है, फिर मेरी फिक्र करने की क्या जरूरत पड़ी?’’ सुधा अपने पति के ये शब्द सुन कर चौंक गई. शब्द नए नहीं थे, नई थी उन के सहारे उस पर बरस पड़ी नफरत. वह नफरत, जिस के बारे में उस ने सपने में भी नहीं सोचा था. सुधा अच्छी तरह समझ गई कि यह सब उन अठखेलियों का ही नतीजा है, जिन में वह इन्हें अम्मां के प्यार पर अपना ज्यादा हक जता कर चिढ़ाती रही है, अपने पिया को सताती रही है.

इस में कुसूर सिर्फ सुधा का ही नहीं है, अम्मां का भी तो है, जिन्होंने उसे इतना प्यार किया. जब वे जानती थीं अपने बेटे को, तो क्यों किया उस से इतना प्यार? क्यों उसे इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वह इस घर की बेटी नहीं बहू है? अम्मां सुधा का पक्ष ले रही हैं, यह भी गनीमत ही है, वरना वे भी उस का साथ न दें, तो वह क्या कर लेगी. इस समय तो अम्मां का साथ देना ही बहुत जरूरी है. अम्मां अभी भी अपने बेटे से लड़े जा रही थीं, ‘‘तेरा दिमाग बहुत ज्यादा खराब हो गया है.’’ अम्मां की बात का जवाब सूरज की जबान पर आया ही था कि सुधा बीच में ही बोल पड़ी, ‘‘यह सब अच्छा लगता है क्या आप को? अम्मां के मुंह लगे चले जा रहे हैं. बड़े अच्छे लग रहे हैं न?’’

‘‘चुप, यह सब तेरा ही कियाधरा है. तुझे तो चैन मिल गया होगा, यह सब देख कर. न जाने कितने कान भर दिए कि अम्मां आते ही मुझ पर बरस पड़ीं,’’ थोड़ी देर रुक कर सूरज ने खुद पर काबू करना चाहा, फिर कहने लगा, ‘‘यह किसी ने पूछा कि मैं ने चिट्ठी क्यों नहीं भेजी? इस की फिक्र किसे है? अम्मां पर तो बस तेरा ही जादू चढ़ा है.’’ ‘‘हां, मेरा जादू चढ़ा तो है, पर मैं क्या करूं? मुझे मार डालो, तब ठीक रहेगा. मुझ से तुम्हें छुटकारा मिल जाएगा और मुझे तुम्हारे बिना जीने से.’’

अब जा कर अम्मां का माथा ठनका. आज उन के बच्चों की लड़ाई बच्चों का खेल नहीं थी. आज तो उन के बच्चों के बीच नफरत की बुनियाद पड़ती नजर आ रही थी. बहू का इस तरह बीच में बोल पड़ना उन्हें अच्छा नहीं लगा. वे अपनी बहू की सोच पर चौंकी थीं. वे तो सोच रही थीं कि उन के बेटे की सूरत देख कर बहू सारे गिलेशिकवे भूल गई होगी.

अम्मां की आवाज से गुस्सा अचानक काफूर गया. वे सूरज को बच्चे की तरह समझाने लगीं, ‘‘इस को पागल कुत्ते ने काटा है, जो तेरी खुशियां छीनेगी? तेरी हर खुशी पर तो तुझ से पहले खुश होने का हक इस का है. फिर क्यों करेगी वह ऐसा, बता? रही बात मेरी, तो बता कौन सा ऐसा दिन गुजरा, जब मैं ने तुझे लाड़ नहीं किया?’’ ‘‘आज ही देखो न, यह तो किसी ने पूछा नहीं कि हालचाल कैसा है? इतना कमजोर कैसे हो गया तू? तुम को इस की फिक्र ही कहां है. फिक्र तो इस बात की है कि मैं ने चिट्ठी क्यों नहीं डाली?’’ सूरज बोला.

अम्मां पर मानो आसमान फट पड़ा. आज उन की सारी ममता अपराधी बन कर उन के सामने खड़ी हो गई. आज यह हुआ क्या? उन की समझ में कुछ न आया. अम्मां चुपचाप सूरज का चेहरा निहारने लगीं, कुछ कह ही न सकीं, पर सुधा चुप न रही. उस ने दौड़ कर अपने सूरज का हाथ पकड़ लिया और पूछने लगी, ‘‘बोलो न, क्या हुआ? तुम बताते क्यों नहीं हो?’’ ‘‘मैं 2 महीने से बीमार था. लोगों से कह कर जैसेतैसे मनीआर्डर तो करा दिया, पर चिट्ठी नहीं भेज सका. बस, यही एक गुनाह हो गया.’’ सुधा की आंखों से निकले आंसू होंठों तक आ गए और मन में पागलपन का फुतूर भर उठा, ‘‘देखो अम्मां, सुना कैसे रहे हैं? इन से तो अच्छा दुश्मन भी होगा, मैं बच्ची नहीं हूं, अच्छी तरह जानती हूं कि भेजना चाहते, तो एक नहीं 10 चिट्ठियां भेज सकते थे. ‘‘नहीं भेजते तो किसी से बीमारी की खबर ही करा देते, पर क्यों करते ऐसा? तुम कितना ही पीछा छुड़ाओ, मैं तुम्हारा पीछा नहीं छोड़ने वाली.’’

अम्मां चौंक कर अपनी बहू की बौखलाहट देखती रह गईं, फिर बोलीं, ‘‘क्या पागल हो गई है बहू?’’ ‘‘पागल ही हो जाऊं अम्मां, तब भी तो ठीक है,’’ कहते हुए बिलख कर रो पड़ी सुधा और फिर कहने लगी, ‘‘पागल हो कर तो इन्हें अपने प्यार का एहसास कराना आसान होगा. किसी तरह से रो कर, गा कर और नाचनाच कर इन्हें अपने जाल में फंसा ही लूंगी. कम से कम मेरा समझदार होना तो आड़े नहीं आएगा,’’ कहतेकहते सुधा का गला भर आया. सूरज आज अपनी बीवी का नया रूप देख रहा था. अब गिलेशिकवे मिटाने की फुरसत किसे थी? सुधा पति के आने की खुशियां मनाने में जुट गई. अम्मां भी अपना सारा दर्द समेट कर फिर अपने बच्चों से प्यार करने के सपने संजोने लगी थीं.

Box Office : इतिहास का कारोबार – फिल्म ‘छावा’ का बज रहा डंका

Box Office : सिनेमा हौल में पीरियड फिल्म ‘छावा’ खूब चल रही है. फिल्म में दर्शाए दृश्य दर्शकों को उकसा और भ्रमित कर रहे हैं.

फरवरी माह का दूसरा सप्ताह बौलीवुड के लिए खुशियां ही खुशियां ले कर आया. फरवरी माह के दूसरे सप्ताह यानी 14 फरवरी को दिनेश विजन निर्मित और लक्ष्मण उतेकर निर्देशित फिल्म ‘छावा’ रिलीज हुई. जिसे बौक्स औफिस पर ठीकठाक सफलता मिली. फिल्म ‘छावा’ छत्रपति शिवाजी महाराज के पुत्र संभाजी महाराज की बायोपिक फिल्म है. जिन्हें मराठा साम्राज्य का दूसरा छत्रपति माना जाता है.

पूरे महाराष्ट्र और मराठा समुदाय में तो संभाजी की भगवान की तरह पूजा की जाती है. अब तक छत्रपति शिवाजी महाराज और संभाजी महाराज पर मराठी भाषा में कुछ फिल्में व कुछ टीवी सीरियल प्रसारित हो चुके हैं. लेकिन मराठी भाषियों के लिए यह गर्व की बात रही कि उन के भगवान की कहानी को बौलीवुड ने हिंदी में फिल्म बना कर पूरे देश तक पहुंचा दिया. इस फिल्म को प्रचारित करने में महाराष्ट्र राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस, एम पी अमाले कोल्हे, मनसे नेता राज ठाकरे सहित कई नेताओं ने बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया. जो इतिहास के पुनर्लेखन के सिलसिले का हिस्सा है.

लक्ष्मण उतेकर ने ‘छावा’ में कई गलतियां की, आधाअधूरा इतिहास परोसा, मगर मुगल शासक औरंगजेब ने छल से संभाजी को गिरफ्तार कर 40 दिन तक जिस तरह से दुखदाई यातनाएं दी थीं, फिल्म के निर्देशक ने सिर्फ इसी हिस्से को बहुत विभत्स तरीके से 40 मिनट तक फिल्माकर लोगों के अंदर इस भावना को जगाने में कामयाब रहे कि मुगलों ने किस तरह उन के राजा, उन के भगवान को यातना दी थी लेकिन कोई आठ सौ सालों बाद सच और झूठ को भी पूरे दावे से प्रदर्शित नहीं किया जा सकता.

इसी वजह से इस फिल्म ने निर्माताओं के अनुसार 7 दिन में 242 करोड़ रूपए बौक्स आफिस पर एकत्र कर लिए हैं. 19 फरवरी को छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती के निमित्त पूरे महाराष्ट्र में सार्वजनिक छुट्टी के साथ ही शिवाजी जयंती पर कई कार्यक्रम आयोजित किए गए. जिस के चलते केवल 19 फरवरी को ‘छावा’ ने बौक्स औफिस पर 36 करोड़ रूपए एकत्र किए, ऐसा दावा निर्माता की तरफ से किया गया.

उधर देवेंद्र फड़नवीस ने विक्कीपीडिया को नोटिस भेज कर संभाजी पर दी गई गलत जानकारी को हटाने के लिए कहा है. वहीं मध्य प्रदेश सरकार ने ‘छावा ’को टैक्स फ्री कर दिया है.

जिन फिल्म आलोचकों ने ‘छावा’ की समीक्षा करते हुए सही तथ्य देते हुए फिल्म को घटिया बताया था, उन्हें ट्रोल आर्मी ने कई तरह की धमकियां दी. उन्हें औरंगजेब की छठी या सातवीं औलाद की भी संज्ञा दी. संभाजी पर किताबें व उपन्यास लिख चुके इतिहासकार इस फिल्म को ले कर प्रतिक्रिया देने की बजाय मौन साधे हुए हैं. उन की खामोशी एक तरह से सामने आक्रामक तेवर लिए खड़ी भगवा गैंग के सामने एक मजबूरी सी लगती है.

संभाजी वीर थे. इस में कोई शक नहीं. उन्हें मुगल शासक औरंगजेब ने कठिन यातना दी और उन पर धर्म बदलने का भी दबाव बनाया, मुमकन है ऐसा न भी हो क्योंकि इस के कोई उपलब्ध एतिहासिक प्रमाण नहीं लेकिन कल्पनाओं को प्रमाणों की तरह परोसना भी एक फिल्मकार की खूबी होती है जिस से वे सच लगने लगती हैं. ठीक वैसे ही जैसे इन दिनों हर पौराणिक किस्सा पूरे अधिकार और आत्मविश्वास से सच और वास्तविक कहकर प्रकाशित प्रसारित किया जा रहा है.

फिल्मकार लक्ष्मण उतेकर ने जिस तरह से ‘छावा’ में कथा बयां की है, उस पर यदि हर दर्शक बिना इमोशनल हुए सोचेगा तो शायद उसे एहसास हो कि लक्ष्मण उतेकर ने संभाजी महाराज का कितना सम्मान या कितना अपमान किया है. हम उम्मीद करते हैं कि संभाजी की वीरता के कथित इतिहास को सामने लाने का प्रयास दूसरे फिल्मकार भी करेंगे. लेकिन उपलब्ध सभी एतिहासिक तथ्यों और प्रमाणों का उपयोग करेंगे.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें