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फेसबुक ने लांच किया नया एप, एक साथ 8 यूजर्स कर सकेंगे वीडियो चैट

सोशल मीडिया वेबसाइट फेसबुक ने अपने यूजर्स के लिए कई बार नए-नए फीचर्स और एप लान्च किया है. इस बार फेसबुक एक और नया ऐप लेकर आ रहा है, जिसका नाम है बोनफायर एप. आपको बता दें कि यह एक ग्रुप वीडियो चैट एप है, जिसके जरिये एक साथ 8 लोग वीडियो काल की सुविधा ले सकेंगे. इसे जल्द ही वैश्विक बाजार में लान्च किया जाएगा.

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इसे फिलहाल दानिश एप स्टोर पर जारी कर दिया गया है. अभी के लिए इस एप को केवल डेनमार्क में लान्च किया गया है और जल्द ही इसे वैश्विक तौर पर पेश किया जाएगा.

आइये जानते हैं क्या है बोनफायर एप और कैसे काम करती है?

जैसा कि आपको पहले ही बता दिया गया है, बोनफायर 8 यूजर्स को एक साथ वीडियो चैट करने की सुविधा देती है. इस एप में रियल टाइम स्पेशल इफेक्ट्स और फिल्टर्स दिए गए हैं. यह इफेक्ट्स और फिल्टर्स इंस्टाग्राम और स्नैपचैट की ही तरह हैं. यह एप फेसबुक मैसेंजर के जरिए यूजर्स को सीधे वीडियो चैट से कनेक्ट होने का मौका देती है. इसके लिए आपको अलग से बोनफायर एप इंस्टाल करने की जरुरत नहीं है.

क्या है अलग?

इसे खासतौर पर उन लोगों के लिए तैयार किया गया है जो अपने दोस्तों या परिवार के सदस्यों से एक साथ वीडियो चैट करना चाहते हैं. चैट के दौरान आप स्क्रीनशाट लेकर उसे फेसबुक, इंस्टाग्राम और मैसेंजर पर शेयर भी कर सकते हैं. ऐसा करने के लिए आपको चैट को खत्म करने की भी जरुरत नहीं है. साथ ही इस दौरान पिक्चर-इन-पिक्चर मोड भी काम करेगा.

स्काइप (Skype) और टम्बलर (Tumblr) को देगी टक्कर

हाल ही में स्काइप ने ग्रुप चैट को बेहतर बनाने के लिए अपने एप को अपडेट कर कई नए फीचर्स को जोड़ा है. यही नहीं, आईमैसेज आधारित फेम ने भी कुछ समय पहले मार्किट में कदम रखा था. ग्रुप वीडियो चैट सेगमेंट में पहले ही हाउसपार्टी (Houseparty), एयरटाइस (Airtime), माइक्रोपोलो (Marco Polo) समेत कई एप्स उपलब्ध हैं. वहीं, टम्बलर भी यूजर्स के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है. ऐसे में माना जा रहा है कि बोनफायर एप इन सभी को कड़ी टक्कर दे सकती है.

आप भी जानिए आखिर कितना कमाते हैं आपके चहेते रेसलर

दुनिया भर में मशहूर हो चुकी डब्ल्यूडब्ल्यूई की फाइट को आज हिंदुस्तान का बच्चा बच्चा देखता है. वहीं इसके सितारे भी बौलीवुड एक्टर्स की ही तरह हिंदुस्तान समेत पूरी दुनिया में अपनी गजब की फैन फौलोइंग रखते हैं. रेसलिंग की दुनिया के सितारे भी करोड़ों की कमाई करके शान ओ शौकत की जिंदगी जीते हैं.

आपके दिमाग में हमेशा ये सवाल आता होगा की डब्ल्यूडब्ल्यूई में कौन सबसे ज़्यादा पैसे कमाता है. क्या वर्ल्ड हैवीवेट टाइटल जीतने वाले रेसलर की सैलरी ज़्यादा होती है.  हम आपको अपनी खबर में ऐसे ही कुछ चुनिंदा रेसलर के बारे में बताएंगे जो कमाई के मामले में किसी बौलीवुड सितारे से कम नहीं हैं. जानिए कितना कमाते हैं रेसलिंग की दुनिया के ये किंग.

ब्राक लेसनर (12 Million)

ब्राक लेसनर कालेज के टाईम से ही रेसलर रह चुके हैं. जिन्होनें कौलेज खत्म होने के बाद ही डब्ल्यूडब्ल्यूई में एंट्री कर ली थी. ब्रौक 4 बार डब्ल्यूडब्ल्यूई का हेवीवेट चैम्पियनशीप जीत चुके है. लेसनर की सालाना कमाई 12 मिलियन डौलर है.

जौन सीना (8 Million)

2005 में जौन सीना डब्ल्यूडब्ल्यूई के एक जाने माने चेहरे थे इस दौरान उन्होंने हर मैच जीता था. वह डब्ल्यूडब्ल्यूई के बेहद ही प्रसिद्ध रेस्लर हैं जिन्होंने दो दर्जन से भी ज्यादा खिताब अपने नाम किए हैं. डब्ल्यूडब्ल्यूई में उन्होंने अपनी मौजूदगी को बरकरार रखा है. जौन सीना सालाना 8 मिलियन डौलर कमाते हैं. इनका पूरा नाम जौन फेलिक्स एनथौनी सीना जूनियार है. ये 15 बार विश्व चैम्पियन रह चुके हैं.

ट्रिपल एच (3.8 Million)

ट्रिपल एच का नाम पौल माइकल है ये जाने माने रेसलर है. ट्रिपल एच का जन्म 27 जुलाई 1969 मे हुआ था. इन्होने 25 अक्टूबर 2013 को स्टेपनी मिकमैन से शादी की थी जो डब्ल्यूडब्ल्यूई के चेयरमैन और सीईओ विंस मिकमैन की बेटी हैं. इनकी सालाना कमाई 3.8 मिलियन डौलर है.

रोमन रेंस (3.5 Million)

रोमन रेंस ने एफसीडब्ल्यू से बतौर रेसलर अपने करियर की शुरुआत की थी. रोमन रेंस को एनएक्सटी और मेन रोस्टर में शील्ड के सदस्य के तौर पर काफी वाहवाही मिली. शील्ड के दिनों में रोमन रेंस का सभी जगह से तारीफ मिलती थी. लोग उनमें भविष्य के डब्ल्यूडब्ल्यूई फेस को देखने लगे थे. रोमन तीन बार डब्ल्यूडब्ल्यूई वर्ल्ड हेवीवेट चैंपियन रह चुके हैं और अभी डब्ल्यूडब्ल्यूई यूनाइटेड स्टेट्स चैंपियन हैं. और इनकी सालाना कमाई 3.5 मिलियन डौलर है.

 डीन एम्ब्रोज़ (2.7 Million)

डीन एम्ब्रोज़ उन रैसलर्स में शामिल है जिन्हें डब्ल्यूडब्ल्यूई में आज के समय में काफी पसंद किया जाता है. एम्ब्रोज़ मौजूदा समय में स्मैकडाउन लाइव का हिस्सा है. डीन एम्ब्रोज़ पिछले 5 सालों से डब्ल्यूडब्ल्यूई में है. अपनी बढ़ती लोकप्रियता की वजह से वो डब्ल्यूडब्ल्यूई में सबसे ज्यादा कमाई करने वालों में टौप 10 रैसलर्स में शामिल हैं. फोर्ब्स की रिपोर्ट के मुताबिक डीन सालभर में 2.7 मिलियन कमाते है.

एजे स्टाइल्स (2.4 Million)

एलन नील जोन्स को डब्ल्यूडब्ल्यूई के रिंग में एजे स्टाइल्स के नाम से जाना जाता है. एजे अमेरिकन रेसलर हैं जिन्हें डब्ल्यूडब्ल्यूई के रिंग में स्मैक डाउन खेलने के लिए साईन किया गया है. एजे दुनिया के मशहुर सबसे प्रोफेशनल रेसलर में जाने जाते है. फोर्ब्स के मुताबिक एजे की सालाना कमाई 2.4 मिलियन डौलर है.

शेन मैकमोहन (2.2 Million)

डब्ल्यूडब्ल्यूई में जब से शेन मैकमोहन की वापसी हुई है दर्शको का इन्ट्रेस्ट इस गेम में बढ़ गया है, वैसे तो शेन पहले सिर्फ रेसल्मानिया के लिए आये थे. डब्ल्यूडब्ल्यूई रौ में शेन मिकमैन को अथौरिटी को हटा उसकी जगह दी और शेन ने 3-4 डब्ल्यूडब्ल्यूई रौ को संभाला, शेन के निगरानी में जितनी भी रौ खेली गयी उन सब में डब्ल्यूडब्ल्यूई प्रसंशको के अंदर एक अलग ही रोमांच देखने को मिला और सभी रौ हिट गये. इसी के चलते शेन की सालाना कमाई 2.2 मिलियन डौलर तक पहुंच गई.

अंडरटेकर (2.0 Million)

वैसे तो अंडरटेकर ने अभी भी डब्ल्यूडब्ल्यूई से संन्यास नहीं लिया है. वह रेस्लिंग के दुनिया के सबसे पुराने खिलाड़ियों में से एक है, और आज भी इससे जुड़े हैं. अंडरटेकर का असली नाम मार्क कैलावे है और यह शुरुआत से लेकर अब तक के सबसे प्रसिद्ध रेस्लर है. यह एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसकी दी हुई सलाह को सभी लोग अपनाना पसंद करते है. अंडरटेकर प्रतिवर्ष 2.0 मिलियन डौलर कमाते हैं.

सेठ रोलिंस (2.0 Million)

सेठ रोलिंस का असली नाम कौल्बी डेनियल लोपेज है. 28 मई 1986 अमेरिका में जन्में सेठ रोलिंस एक प्रोफशनल रेसलर है जिन्होनें हाल ही में डब्ल्यूडब्ल्यूई को रौ ब्रांड के लिए साइन किया है. फोर्ब्स के मुताबिक रोलिंस सालभर में 2.0 मिलियन डौलर कमाते है.

रेंडी ओर्टन (1.9 Million)

रेंडी ओर्टन डब्ल्यूडब्ल्यूई में 2002 में आए थे. आपने देखा होगा कि बहुत से लोग रेस्लिंग में अपने असली नाम का प्रयोग नहीं करते है लेकिन रेंडी ओर्टन ने अपने परिवार के रिवाज को तोड़ा नहीं और अपना नाम असली ही रखा है. इन्होंने वर्ल्ड हाईवेट चैम्पियन को 4 बार जीता है और डब्ल्यूडब्ल्यूई चैम्पियनशिप को 8 बार जीता है. रेंडी ओर्टन प्रतिवर्ष 1.9 मिलियन डौलर कमाते हैं.

डौलरों में खेलती अमेरिकन कामवालियां

अमेरिका सहित सारे पश्चिमी देशों में डिग्निटी औफ लेबर यानी श्रम की प्रतिष्ठा है. यहां किसी भी काम को छोटा नहीं माना जाता है. ज्यादातर काम मशीनों द्वारा संपन्न होते हैं. फिर भी कुछ काम ऐसे हैं जिन का हाथों द्वारा श्रम किए बिना संपन्न होना संभव नहीं है. ऐसे काम करने वालों की यहां अच्छी मांग है लेकिन ये महंगे बहुत हैं.

भारत में हमें महरी, धोबी, माली, कुक आदि आसानी से मिल जाते हैं. अमेरिका में ज्यादातर परिवारों में पतिपत्नी दोनों ही नौकरी करते हैं. भारतीय परिवारों में भी यही स्थिति है. ऐसे लोगों को अपने घर की सफाई के लिए दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता है. यहां हम कामवाली, जिसे मेड कहते हैं की चर्चा कर रहे हैं.

भारत की तरह रोज कामवाली को बुलाना यहां असंभव है. वर्षों पहले मैं पहली बार अमेरिका आई तो बड़ा अटपटा सा लगता था. बुढ़ापे में भी खाना खुद बनाना होता है. बरतन तो डिशवाशर में धुल कर सुखा दिए जाते हैं, पर मशीन में डालने के पहले उन्हें पानी से हाथों से साफ करना होता है. उसी तरह गंदे कपड़े वाश्ंिगमशीन में धुल जाते हैं और ड्रायर उन्हें पूरी तरह सुखा देता है. पर साधारण सूती कपड़ों का तो बुरा हाल हो जाता है ड्रायर में. यहां तक कि सिंथैटिक साडि़यों को इतनी बुरी तरह मरोड़ देता है कि उन्हें सीधा कर तह करना बड़ी बात है.

मैं यहां कैलिफोर्निया के सिलिकौन वैली, जो बे एरिया भी कहलाता है, आई थी. दुनिया की मशहूर सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियां यहीं स्थित हैं. यहां आने पर मैं ने देखा बड़ीबड़ी गाडि़यों पर बड़ेबड़े अक्षरों में मेड लिखा होता और उस में एक या 2-4 लड़की या औरत होती थीं. उन की कार पर उन के फोन नंबर और ईमेल लिखे होते थे. मैं ने एक का नंबर नोट कर लिया था. मैं ने बेटे से कहा, ‘‘मैं बूढ़ी हो चली हूं, डोमैस्टिक हैल्प तो लेनी ही होगी.’’ बेटे ने कहा, ‘‘मैं उसे बुला कर काम के लिए बोल देता हूं. मगर ध्यान रहे ज्यादा से ज्यादा सप्ताह में एक दिन बुला सकता हूं और यह भी काफी महंगा है. आप खुद देख लेना.’’

बेटे ने आगे बताया, ‘‘यहां कामवालियां शनिवार और रविवार को नहीं आती हैं. वर्किंग डे में मुझे खुद उन से निबटना होगा.’’ अमेरिका में खासकर भारतीय घरों में अकसर कामवालियां आती हैं. कोई सप्ताह में 1 दिन तो कोई 2 सप्ताह में 1 दिन बुलाता है.

वैसे, यहां धूल न के बराबर होती है, मकड़े के जाले भी बहुत कम पाए जाते हैं. ज्यादातर ऐसे काम मैक्सिको से आए लोग, जो ग्रीनकार्ड धारक हैं या अमेरिकन नागरिक बन चुके हैं, करते हैं. कुछ चीनी या वियतनामी भी यह काम करते हैं. इन से पहले से अपौइंटमैंट लेना होता है.

होती हैं पेशेवर

एक दिन मैं ने एक कामवाली को बुलाया. एक बड़ी गाड़ी में 3 महिलाएं आईं. तीनों मैक्सिकन थीं. उन में से एक जो 25-30 वर्ष के बीच में होगी अंगरेजी जानती थी. वही लीडर होगी. बाकी दोनों कम उम्र की लड़कियां थीं जो सिर्फ स्पैनिश ही समझती थीं. मुझे पूरा काम, जो अंगरेजी जानती थी, उसी को समझाना था. वही आपस में काम का बंटवारा करती थी.

मैं ने उस को पूरा काम बताया. किचन, बैडरूम, लिविंग, ड्राइंगरूम और बाथरूम की सफाई करनी है. साथ में, जितने फ्लोर्स और शीशे के दरवाजे व खिड़कियां हैं, उन की भी सफाई करनी होगी. उन की लीडर ने एक बार पूरा घर घूम कर देखा. घर डुप्लैक्स था, जो करीब 3,000 वर्ग फुट में था. फिर उस ने कहा कि यह काम हम तीनों मिल कर लगभग 3 घंटों में कर लेंगी. चूंकि मेरे यहां पहली बार आई थीं, सफाई का काम भी कुछ ज्यादा था. इस के लिए उन्होंने 250 डौलर्स मांगे. फिर कहा कि अगर प्रति सप्ताह बुलाएंगे तो उन्हें 100 डौलर्स देने होंगे और 2 सप्ताहों पर बुलाने पर 150 डौलर्स लगेंगे. ये कामवाली सफाई के काम आने वाले सभी सामान और उपकरण अपने साथ गाड़ी में ले कर चलती हैं- ब्रश, वैक्यूम क्लीनर और क्लीनिंग लिक्विड्स आदि.

मैं ने थोड़ा तोलमोल कर पहली बार के लिए 230 डौलर्स पर तैयार कर लिया और आगे से 2 सप्ताहों में एक बार आने पर 140 डौलर्स पर. मैं ने इन्हें रुपए में बदल कर देखा तो दंग रह गई.

इस के अतिरिक्त हमें सप्ताह में एक दिन माली को भी बुलाना होता है. यह काम भी ज्यादातर मैक्सिकन ही करते हैं. इस के लिए सप्ताह में 1 दिन, 2 आदमी आते हैं. ये भी बड़ी गाड़ी में सभी उपकरणों के साथ आते हैं और सिर्फ आधे घंटे में आगे के लौन और पीछे के बैकयार्ड की सफाई करते हैं. साथ में, बढ़ी हुई घास और पौधों की जरूरत पड़ने पर कटाईछंटाई करते हैं. इस के लिए ये 40 डौलर्स प्रति सप्ताह लेते हैं. अगर कोईर् बड़ा पेड़ काटना हो या कोई नया पौधा लगाना हो तो उस के लिए अतिरिक्त डौलर्स देने होते हैं.

दरअसल, मैं भारतीय मानसिकता की हूं. भारत में कामवाली से सुबहशाम दोनों वक्त झाड़ू, सफाई, बरतन, कपड़ों की धुलाई वगैरह कई काम कराए जाते हैं. इस के अलावा, भारत में कामवालियों को भुगतान बहुत कम ही किया जाता है. लेकिन अमेरिका में तो वे महीने में अच्छेखासे डौलर कमा लेती हैं.

यह भी खूब रही

हम एक संस्था में मेरे द्वारा लिखे एक नाटक का रिहर्सल कर रहे थे. नाटक में मैं बहू की भूमिका में थी. दृश्य में मेरे सासससुर मेरे पास आते हैं तो मुझे और मेरे पति को उन के पैर छूने थे.

नाटक में ससुर की भूमिका निभाने वाली महिला की तबीयत खराब हो जाने की वजह से वह भूमिका एक नई महिला को दे दी गई. उसे बताया गया कि जब बेटेबहू पैर छुएंगे तब उन्हें अपने मन से कुछ भी अशीष देना है और उस के बाद आगे स्क्रिप्ट में लिखा डायलौग बोलना है.

चूंकि उन महिला को वह भूमिका अचानक से दी गई थी और आशीष बोलने वाली पहली लाइन को अपने मन से बोलने को कहा गया, तो वह हड़बड़ा सी गई. सो जब मैं ने झुक कर उन के पैर छुए तो ममेरी बलाएं लिए बोली, ‘नहाओ धोओ, नहाओ धोओ.’

मैं अचंभित सी खड़ी उन का मुंह देखने लगी कि यह क्या बोल रही  है? अगले ही पल एक जोरदार ठहाका कमरे में गूंज उठा. सब हंसहंस कर लोटपोट हो गए क्योंकि समझ में आ गया था कि दरअसल वह कहना क्या चाह रही थी. वह महिला मुझे ‘दूधो नहाओ पूतो फलो’ बोलना चाह रही थीं पर हड़बड़ी में उस के मुंह से ‘नहाओ धोओ, नहाओ धोओ’ निकल गया था. शन्नो श्रीवास्तव

मैं खंडवा से अकोला ट्रेन से सफर कर रहा था. ज्यादा भीड़ न होने से सामने वाली खिड़की के पास बैठी महिला से पहचान हुई. वह मुझ से खुल कर बातें करने लगी. थोड़ी देर में एक छोटे से स्टेशन में गाड़ी रुकी. अपने दोनों हाथों में दूध की कैन लिए एक बड़े मूंछ वाले भैया हमारे सामने, खाली जगह देख कर बैठ गए. उस महिला ने चेहरे पर घूंघट ओढ़ लिया और वह चुपचाप बैठी रही.

अगले स्टेशन पर वे सज्जन कैन ले कर नीचे उतर गए मानो उन का स्टेशन आया था. उस महिला ने तुरंत अपना घूंघट उतार लिया और मेरे साथ खुल्लमखुल्ला बातें करने लगी. उत्कंठावश मैं ने उस महिला से पूछा, ‘‘बहनजी, वे सज्जन आप के रिश्तेदार थे जो आप ने घूंघट ओढ़ लिया था?’’ महिला ने जवाब दिया, ‘‘हम मर्दों के सामने अपना घूंघट नहीं उतारते.’’

मैं हिचकिचा कर रह गया. वे सज्जन मर्द हैं तो मैं …? अब मुझे मेरी मूंछें हो कर भी न के बराबर होने का एहसास होने लगा.

लक्ष्मण कुन्हेकर

बच्चों के मुख से

मेरा 6 वर्षीय छोटा भाई आकाश बहुत ही हाजिरजवाब है. हम लोग मम्मी के साथ नानी के घर गए थे. वहीं से हमें एक शादी में जाना था. कुछ देर वहां रह कर हम लोग जाने लगे तो नानी हम लोगों को बसस्टैंड तक छोड़ने आईं.

रास्ते में न जाने कैसे आकाश नाली में गिर गया. अब शादी में गंदे कपड़े पहन कर कैसे जाता, इसलिए नानी ने उस को नए कपड़े दिलवा दिए.

कुछ दूर चलने के बाद वह मुझ से बोला, ‘‘दीदी, इस बार तुम नाली में गिर जाना. नानी, तुम्हें भी नए कपड़े दिला देंगी.’’ यह सुनते ही हम सब को हंसी आ गई.

स्वाति अरोरा

*

मेरा धेवता अनव घर में टीवी देख रहा था. उस के दादाजी भी आ कर टीवी देखने लगे.

दादाजी बारबार समाचार चैनलों को बदलबदल कर देख रहे थे. थोड़ी देर तक वह चुप बैठा देखता रहा. फिर अचानक पूछ बैठा, ‘‘दादाजी, क्या कल आप को इन चैनलों का कोई इम्तिहान देना है?’’ पहले तो वे समझ ही नहीं पाए, फिर जब समझे तब हंसी के मारे कुछ कह ही नहीं पाए. बस, हंसते रहे.

मंजू गोयल

*

मैं ट्यूशन पढ़ा रही थी. मेरे घर में गैस्ट आ गए. मैं ने बच्चों से कहा, ‘‘आप अब जाओ, मेरे घर में गैस्ट आए हैं. अब कल आना.’’

मैं ने 6 वर्षीय अंकित से पूछा, ‘‘अपने घर जा कर क्या कहोगे?’’

वह मासूमियत से बोला, ‘‘मैं कह दूंगा कि दीदी के घर में गैस वाले आए हैं.’’

यह सुन कर हम सभी हंसे बिना न रह सके.

अलका शर्मा

*

बात पुरानी है जब मेरा बेटा 3 साल का था. वह गायिका अनुराधा पौडवाल को बहुत पसंद करता था. उन्हीं दिनों वे उज्जैन आईं तो जगहजगह पर उन की तसवीरें लगी थीं. एक दिन बेटे ने आ कर कहा, ‘‘मां, फुटबौल आंटी आ रही हैं.’’ हमें कुछ समझ नहीं आया तो उस ने उन की तसवीर दिखाई तो हम सभी को हंसी आ गई.

उसे पौडवाल बोलना नहीं आया तो उस ने उसे फुटबौल बोल दिया था. आज भी जब यह बात याद आती है तो होंठों पर मुसकान आ जाती है.

बीना भार्गव

दिन दहाड़े

मैं शाम को रिकशे से घर लौट रही थी. 4 थैले कपड़े के और एक लैदरबैग ले कर रिकशे पर चढ़ने लगी. रिकशे वाले ने थैला थामते हुए कहा कि बहनजी, आप पहले रिकशे पर चढ़ जाइए, मैं तब आप को सामान पकड़ा दूंगा.

मैं ने भी उसे सभी बैग पकड़ा दिए. लेकिन उस ने एक कपड़े के झोले को कब हटा दिया, इस पर मेरा ध्यान न पड़ा. मेरे बैठने के बाद उस ने थैले मुझे थमा दिए.

जिस झोले में मेरे 12 सिले कपड़े रखे थे, घर पहुंच कर जब देखा तो वही नहीं था. घर से बाहर निकल कर काफी दूर तक मैं ने रिकशे वाले का पता लगाया लेकिन वह आंखों से ओझल हो चुका था. वह मेरा कीमती सामान ले कर चंपत हो गया था.

माया रानी श्रीवास्तव

*

दोपहर में दरवाजे पर एक व्यक्ति आया. उस ने बताया कि वह धोबी है. महल्ले में नया आया है. लोगों के कपड़े धोने व इस्तिरी करने का काम करता है. उस ने मुझे विश्वास दिलाया और कहा कि चाहें तो चल कर देख लें.

उस के पास कपड़ों की कई गठरियां भी थीं. पूछने पर उस ने कहा कि ये सभी कपड़े उस ने आसपास के घरों से लिए हैं. मेरा धोबी करीब 15 दिनों से बीमार था और मुझे शादी में जाने के लिए कपड़े इस्तिरी कराने थे सो, उसे कपड़े दे दिए.

2 दिन बीत जाने पर भी वह नहीं आया तो मेरा माथा ठनका. मैं ने आसपास के घरों में पता किया तो उन लोगों ने बताया कि ऐसा तो कोई व्यक्ति उन के घर नहीं आया था.

अंजुला अग्रवाल

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हम लोग पर्यटन टूर पर केरल घूम रहे थे. हम सभी एक गार्डन में बैठे थे. करीब 35 वर्षीया महिला हमारे पास आई और मराठी भाषा में कहने लगी कि उस का पर्स, जिस में एटीएम कार्ड भी था, चोरी हो गया है.

होटल का बिल अदा न करने से होटल मालिक ने उस का सामान बाहर निकाल दिया है. उस की आंखों में आंसू थे. वह कह रही थी कि वह पुणे से यहां घूमने आई है. और यहां मराठी जानने वाला कोई नहीं है. उस ने हम से पुणे पहुंचने तक के लिए आर्थिक मदद की गुहार लगाई.

उस की परेशानी देख कर हमारे ग्रुप के लोगों ने 8,000 रुपए जमा किए और उसे सांत्वना देते हुए कहा कि वह इस 8,000 रुपए से होटल का बिल अदा करे और पुणे का टिकट खरीदे.

उस महिला ने कहा कि वह पुणे जाते ही यह राशि हमारे बैंक खाते में जमा कर देगी. 1 वर्ष बीत गया, लेकिन अभी तक न उस महिला का फोन आया, न कोई राशि खाते में आई.

श्रीराम बनसोड

इन्हें आजमाइए

– किसी भी बिजनैस को शुरू करने से कुछ महीने पहले ही आप को उस बिजनैस के तौरतरीके मालूम कर लेने चाहिए और यह समझ लेना चाहिए कि कौन सा बिजनैस आप कर सकते हैं और कौन सा बिजनैस आप नहीं कर सकते.

– आप को 3 बार खाना खाने के अलावा भी हमेशा कुछ न कुछ खाने की आदत है, तो अपनी इस आदत को बदल दीजिए क्योंकि हमेशा कुछ न कुछ खाने वालों का वजन कभी कम नहीं हो सकता.

– आप जब भी किसी से मिलें, तो अपने व्यवहार को संतुलित रखें. न तो किसी से अपने दिल की हर बात बोल दें और न ही रहस्यमयी व्यक्ति की तरह व्यवहार करें.

– पैट्रोलियम बेस्ड लिप बाम लंबे समय तक होंठों के लिए अच्छे नहीं होते इसलिए ग्लिसरीन, बादाम का तेल, विटामिन ई बेस्ड लिप बाम का उपयोग करें.

– अगर आप को रूसी, लीखें या जुओं की समस्या हो तो नीम का तेल सिर में नियमित लगाने से इस समस्या से मुक्ति मिल जाएगी.

– साइक्लिंग या ब्रिस्क वाक करने से भी बै्रस्ट का आकार प्राकृतिक तरीके से कम होता है.

अगर आप ले रहें हैं नया आइफोन तो पहले उसे चलाना सीखें

एप्पल की 10वीं सालगिरह पर आखिरकार आइफोन 8 और आइफोन X को लौन्च कर दिया गया है. इन फोन की बात की जाए तो आइफोन 8 और  7 का अपग्रेडेड वैरिएंट है. जबकि आइफोन X स्मार्टफोन का भविष्य बताया जा रहा है.

इस फोन में औल स्क्रीन डिजाइन दिया गया है. इसमें से होम बटन को रिमूव कर दिया गया है. लेकिन होम बटन से औपरेट होने वाले सभी फीचर्स अभी भी इस्तेमाल किए जा सकते हैं.  इस फोन में फिंगरप्रिंट सेंसर को अब इस्तेमाल नहीं किया जा सकेगा. अपने इवेंट के दौरान एप्पल ने इस बात पर जोर दिया कि बिना होम बटन के अलग अलग फीचर्स को औपरेट करना बेहद आसान है. लेकिन अगर आप पिछले काफी समय से आईफोन इस्तेमाल कर रहे हैं तो यह बिल्कुल भी आसान नहीं होगा.

इस पोस्ट में हम आपको ऐसे कुछ फीचर्स के बारे में बताने जा रहे हैं जो बिना होम बटन के औपरेट करना थोड़ा मुश्किल साबित हो सकता है.

स्क्रीन को अनलौक करना

आईफोन में होम बटन को प्रेस कर लौक स्क्रीन आती थी. लेकिन आइफोन X में ऐसा नहीं किया जा सकता है. इसमें आपको हैंडसेट की स्क्रीन पर टैप करना होगा और उसके बाद फेस आईडी का इस्तेमाल कर फोन अनलौक करना होगा. ऐसे में अगर आप ब्रैंड न्यू फोन लेने के बारे में सोच रहे हैं तो आपको  बटन इस्तेमाल करने की आदत को छोड़ना होगा.

होम पर जाना

किसी भी एप या सेटिंग से सीधे बाहर यानि होम पर जाने के लिए होम बटन का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन आइफोन X के साथ ऐसा नहीं किया जा सकता है. आइफोन X में होम पर जाने के लिए आपको फोन के निचले हिस्से को ऊपर की तरफ स्वाइप करना होगा.

मल्टीटास्किंग

पहले होम बटन पर डबल टैप करने से आपके फोन में जितनी एप ओपन होती हैं, उनकी लिस्ट आ जाती थी. यहां से आप इन्हें बंद कर सकते हैं. लेकिन आइफोन X में इसके लिए निचले हिस्से को ऊपर की तरफ स्वाइप कर कुछ देर होल्ड करके रखना होगा. इससे बैकग्राउंड में चल रही एप को बंद किया जा सकेगा.

कंट्रोल सेंटर

पहले कंट्रोल सेंटर के लिए आपको नीचे से ऊपर की तरफ स्वाइप करना होता था. लेकिन आइफोन X के साथ ऐसा नहीं है. इसमें आपको कंट्रोल सेंटर के लिए ऊपर से नीचे की ओर स्वाइप करना होगा.

सिरी को कैसे करेंगे इस्तेमाल

सिरी इस्तेमाल करने के तरीके में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. जहां पहले आपको होम बटन को प्रेस करके रखना पड़ता था. वहीं, अब फोन के साइड में दिए गए स्टैंडबाय बटन को होल्ड करके रखना होगा.

एप्पल पे

एप्पल पे का इस्तेमाल करने के लिए आपको साइड बटन पर क्लिक करना होगा. इससे आप एप्पल पे पेमेंट कर पाएंगे. इस पर आपको डबल क्लिक करना होगा.

सेलिना ने कराया ट्रांसप्लांट, इस जिगरी दोस्त ने दी अपनी किडनी

25 वर्षीय हालीवुड सिंगर सेलिना गोमेज काफी वक्त से लाइमलाइट से दूर हैं. सेलिना का नया एल्बम रिलीज को तैयार है, लेकिन वे इसे प्रमोट नहीं कर पा रही हैं, जिसके बारे में उनके फैन्स लगातार उनसे सोशल मीडिया पर मैसेज के जरिए सवाल पर सवाल कर रहे थे, जिसके बाद उन्होंने इसकी एक चौंकाने वाली वजह इंस्टाग्राम पर शेयर की है. जिसमें वह अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई हैं.

फोटो में सेलिना के साथ उनकी एक जिगरी दोस्त फ्रेंसिया रेसा भी नजर आ रही हैं, जिन्होंने उन्हें अपनी किडनी डोनेट की है.

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सेलिना ने इंस्टाग्राम पर बताया कि उन्होंने हाल ही में किडनी ट्रांसप्लांट करवाई है. जिस वजह से वह बेड रेस्ट पर है. उन्होने इंस्टाग्राम पर लिखा- मुझे पता है कि मेरे फैन्स इस बात को नोटिस कर रहे हैं कि मैं इन दिनों दिखाई क्यों नहीं दे रही हूं और मेरी नई म्यूजिक एलबम आने वाली है जिसका मैं प्रमोशन भी नहीं कर रही हूं. मेरे फैन्स इस बारे में जानना चाहते हैं. तो बता दूं, कि मेरा हाल ही में किडनी ट्रांसप्लांट हुआ है. फिलहाल मैं धीरे-धीरे रिकवर कर रही हूं.”

वह आगे लिखती हैं, “ईमानदारी से कहूं, तो इस ट्रांसप्लांट के दौरान मेरी फैमिली और मेरे डाक्टर्स की टीम ने मेरा बहुत खयाल रखा है. मैं उन्हें दिल से शुक्रिया कहना चाहती हूं.”

सेलिना शायद फ्रेंसिया का ठीक से धन्यवाद नहीं कर पाई थीं. इसी वजह से उन्होंने इंस्टाग्राम पर अपनी फ्रेंड को एक हार्टवार्मिंग मैसेज भी दिया है. इस पोस्ट के जरिए वह अपनी जिगरी दोस्त फ्रेंसिया रेसा को बहुत-बहुत धन्यवाद दे रही हैं. इस बारे में वह लिखती हैं- “और आखिर में मैं कहना चाहूंगी, मेरी खूबसूरत दोस्त को बहुत बहुत शुक्रिया. मेरी इस दोस्त ने मुझे अल्टिमेट गिफ्ट दिया है. इसने मेरे लिए अपनी किडनी का बलिदान दिया है. मैं बहुत ही ज्यादा खुशकिस्मत हूं कि मुझे फ्रेंसिया रेसा जैसी दोस्त मिली. आई लव यू सिस्टर.”

अरविंद केजरीवाल : बवाना से मिला बोलने का बहाना

राष्ट्रीय राजनीति का यह वह दौर है जिस में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी दिनोंदिन मजबूत होती जा रही है. आजादी के बाद भारतीय लोकतंत्र में ऐसा पहली बार हो रहा है कि कोई गैरकांग्रेसी दल कांग्रेस से भी बड़ा हो रहा है. बिलाशक यह भगवा भाजपा खेमे के लिए खुशी और जश्न मनाने वाली बात है. लोकतंत्र की बारीकियों और उस के सही माने समझने वाले इस बात को ले कर चिंतित हैं कि विपक्ष इतना कमजोर भी नहीं होना चाहिए कि सत्तारूढ़ पार्टी मनमानी पर उतारू हो आए और कोई कुछ बोल भी न सके.

दिल्ली में नगर निगम चुनावों में मिली भारी सफलता के चलते न केवल भाजपा बल्कि हर कोई यह मान कर चल रहा था कि अरविंद केजरीवाल और आम आदमी पार्टी अब खारिज हो रहे हैं. लेकिन यह मिथक दिल्ली की बवाना विधानसभा सीट के उपचुनाव से टूटा जिस पर सभी की निगाहें थीं. इस प्रतिष्ठित और अहम चुनाव में केजरीवाल की साख दांव पर लगी थी तो दूसरी तरफ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की चाणक्य वाली छवि और दिल्ली भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी की काबिलीयत का इम्तिहान भी था. नतीजा आया, तो सभी हतप्रभ रह गए. आप के उम्मीदवार रामचंद्र ने भाजपा के वेद प्रकाश को

24 हजार से भी ज्यादा वोटों से धूल चटा कर आम आदमी पार्टी और केजरीवाल का परचम फिर से लहरा कर तमाम कयासों पर विराम लगा दिया.

बवाना के उपचुनाव में कोई मुद्दा नहीं था और था तो बस इतना कि क्या भाजपा वाकई इतनी मजबूत और लोकप्रिय हो गई है कि आप के ही विधायक वेद प्रकाश को तोड़ कर अपने खेमे में लाए और आसानी से जिता ले जाए. और, क्या आप इतनी दयनीय हालत में आ गई है कि कभी दिल्ली की 70 में से 67 सीटें जीतने का रिकौर्ड बनाने के बाद एक उपचुनाव भी न जीत पाए. इन राजनीतिक कयासों से परे अरविंद केजरीवाल ने प्रचार में अपनी सरकार द्वारा किए जा रहे विकास और जनहित के कार्यों को जनता के सामने रखा और जनता ने उन पर मुहर लगा दी.

केजरीवाल ने इस रोनेगाने में यकीन नहीं किया कि भाजपा उन के ही एक विधायक को तोड़ कर ले गई और उन की आम आदमी पार्टी को कमजोर कर रही है. उन्होंने दिल्ली के विकास की बात पर बात वोट मांगा, जो उन्हें मिला भी. केजरीवाल को यह एहसास हो चला है कि वे एक परिस्थितिजन्य नेता हैं जिन से जनता ने कई उम्मीदें लगा रखी हैं और उन्हें पेशेवर राजनेताओं जैसे बयानों व वक्तव्यों से यथासंभव परहेज करना है.

बवाना के नतीजे के माने बेहद अहम और चेतावनी भरे हैं कि लोग बेवजह के होहल्ले से दूर, विकास पर वोट करने लगे हैं, सियासी ड्रामेबाजी से वे उकताने लगे हैं. यह बात केजरीवाल ने वक्त रहते समझ ली और अब खुद को एक परिपक्व नेता के तौर पर प्रस्तुत भी कर रहे हैं. अब उन्हें मीडिया की शोबाजी की जरूरत महसूस नहीं हो रही है.

बवाना की जीत के बाद भी केजरीवाल ने कोई बड़बोलापन नहीं दिखाया और मनीष सिसोदिया के जरिए कार्यकर्ताओं को धन्यवाद ज्ञापित कर यह जता दिया कि वे अब सिर्फ काम करेंगे, बोलेंगे तभी जब बोलना अनिवार्य हो जाएगा.

मीडिया से परहेज

बीते दिनों बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जब महागठबंधन को तोड़ने का ऐलान कर चुके थे तब तिलमिलाए राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने एक पत्रकारवार्त्ता में तुक की इकलौती बात यह कही कि मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ते भाजपापरस्त होता जा रहा है. मुसीबत के वक्त में ही सही, लालू यादव को मीडिया की मंशा पर और उस के कामों पर उंगली उठानी पड़ी तो तय है वे मीडिया की अहमियत की तरफ ही इशारा कर रहे थे.

मीडिया भाजपापरस्त हो कर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी की तारीफों में कसीदे गढ़े, इस से ज्यादा चिंता की बात उस का, बोलने वाले नेताओं के मुंह पर भी मुश्कें बांधना है जिस के एक शिकार आम आदमी पार्टी यानी आप के मुखिया व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी हैं.

खामोशी पर भी ताने

अब जबकि अरविंद केजरीवाल ने बिना वजह  तो दूर, मुकम्मल वजह होने पर भी बोलना छोड़ दिया है, तब भी लोग सकते में हैं और उन्हें तरहतरह से उकसाने की कोशिश कर रहे हैं. उन की खामोशी के राज मनगढ़ंत तरीके से ढूंढ़े जा रहे हैं. कोई पंजाब और गोवा विधानसभा चुनावों में आप को मिली हार का सदमा इसे बता रहा है तो कोई उन की चुप्पी को कपिल मिश्रा और फिर दिल्ली नगर निगम में मिली आप को करारी हार से जोड़ कर देख रहा है.

जीएसटी जैसे अहम मुद्दे पर तो अरविंद केजरीवाल प्रतिक्रियाहीन रहे ही, जून में किसान आंदोलन के दौरान मध्य प्रदेश के 6 किसानों की पुलिस फायरिंग में मौत पर वे कुछ नहीं बोले तो लोगों को बहुत हैरानी हुई थी. रामनाथ कोविंद को एनडीए ने राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया तब भी वे चुप रहे और उजागर तौर पर अपनी पार्टी के विधायकों के लिए यूपीए की उम्मीदवार मीरा कुमार के पक्ष में वोट डालने का व्हिप जारी नहीं किया.

बिहार में नीतीश कुमार के पलटी खाने पर भी अरविंद केजरीवाल ने मुंह सिला रखा और अरुण जेटली द्वारा उन के खिलाफ दायर मानहानि के मामले में भी वे उस वक्त चुप रहे जब उन के वकील रामजेठमलानी ने यह कहा कि जेटली के खिलाफ अपशब्द बोलने को केजरीवाल ने ही उन से कहा था.

ऐसी कोई दर्जनभर घटनाओं पर लोग और मीडिया अरविंद केजरीवाल के बोल सुनने को कान लगाए बैठे रहे पर वे अपने मौनव्रत पर कायम रहे, तो इसी को ले कर उन पर ताने कसे जाने लगे जिन में से एक सोशल मीडिया पर बड़े शर्मनाम और घटिया तरीके से यह था कि घर का कुत्ता भी कुछ देर न भौंके तो चिंता होने लगती है, यह दिल्ली वाले क्या कर रहे हैं.

यह भड़ास नहीं, बल्कि अरविंद केजरीवाल के प्रति पूर्वाग्रह है जिन की दलीलों और एतराज की आड़ ले कर मीडिया मुद्दे की बात को भी गोलमाल कर यों ही हवा में उड़ा देता था जिस से आम लोगों का ध्यान इस तरह से हट जाता था कि दरअसल हो क्या रहा है और इस का अंजाम क्या होगा.

ध्यान दिल्ली की तरफ

जिन हालात में अरविंद केजरीवाल को दिल्ली वालों ने कमान सौंपी थी वे किसी सुबूत के मुहताज नहीं कि दिल्ली के लोग कांग्रेस के कुशासन से आजिज आ चुके थे और भाजपा पर भरोसा नहीं कर रहे थे. ऐसे में आप और अरविंद केजरीवाल ही उन्हें बेहतर विकल्प लगे तो उन की समझ पर शक नहीं किया जा सकता. अरविंद केजरीवाल गैरपेशेवर राजनेता हैं जिन्हें किसी संघ या संगठन से राजनीतिक संस्कार नहीं मिले हैं.

राष्ट्रीय और विवादित मुद्दों पर दोटूक बोलने वाले अरविंद केजरीवाल को वक्त रहते शायद समझ आ गया है कि उस माहौल में बोलने से कोई फायदा नहीं जिस में बात को सुना और समझा कम जाता है, उस का मजाक ज्यादा बनाया जाता है. हालांकि, उन के न बोलने के नतीजे भी तुरंत देखने में आए. राष्ट्रपति चुनाव में मीडिया यह आशंका जता रहा था कि आप के कई विधायक क्रौस वोटिंग कर सकते हैं पर महज 2 विधायकों ने ही ऐसा किया तो अंदाजों पर दावे ठोकने वाला मीडिया और सन्नाटे में आ गया.

रामजेठमलानी जैसे धाकड़ और वरिष्ठ वकील के बारे में भी आमराय यह बनी कि वे 2 करोड़ रुपए की अपनी भारीभरकम फीस के लिए अरविंद केजरीवाल को बदनाम कर रहे हैं. वजह, जेठमलानी कोई दूध पीते या स्कूल जाते बच्चे नहीं हैं जो अपना तजरबा और कानूनी ज्ञान छोड़ कर मुवक्किल के मशवरे पर एक बचकानी बात करें जो न तो वकालत के उसूलों से मेल खाती और न ही उन के मिजाज से.

ऐसा भी नहीं कि अरविंद केजरीवाल कुछ नहीं कर या बोल रहे हों. फर्क सिर्फ इतना भर आया है कि उन की गैरत जिंदा हो उठी है और यह भी उन्हें समझ आ गया है कि मीडिया या कोई दूसरा विपक्षी दल उन के साथ नहीं है. सभी या तो खुद की परेशानियों से जूझ रहे हैं या फिर धीरेधीरे भाजपा की पनाह ले रहे हैं. हालात 70 के दशक सरीखे हो चले हैं जब चारों तरफ इंदिरा गांधी और कांग्रेस ही दिखती थी.

इन हालात और दूसरी कई राजनीतिक वजहों के चलते अगर उन्होंने अपना ध्यान दिल्ली पर लगा दिया है तो बात हर्ज की नहीं. लेकिन राष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से जरूर चिंता की बात है कि जब कोई बोलने वाला ही नहीं बचेगा तो लोकतंत्र के माने क्या रह जाएंगे. दूसरी तरफ अरविंद केजरीवाल की खामोशी साफतौर पर शायद यही कह रही है कि, ‘आप मेरे बोलने का मजाक बनाओगे तो मैं क्यों बोलूं.’

खामोशी के दौरान दिल्ली को ले कर अरविंद केजरीवाल ने कई अहम फैसले लिए. मसलन, दिल्लीवासियों को जीवनरक्षक शल्य चिकित्सा के लिए सरकारी अस्पतालों में ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ेगा. अब वे सर्जरी दिल्ली सरकार के खर्चे पर प्राइवेट अस्पतालों में भी करवा सकते हैं. बकौल केजरीवाल, ‘हम यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि लोगों की आर्थिक स्थिति चाहे कैसी भी हो, उन्हें बेहतर चिकित्सा और शिक्षा सुविधाएं मिलनी चाहिए.’

2 वर्षों में दिल्ली परिवहन विश्व स्तरीय बनाने का वादा करते अरविंद केजरीवाल ने डीटीसी कर्मचारियों के लिए भी 7वें वेतनमान आयोग की सिफारिशें लागू करने का फैसला ले लिया. हर इतवार को अपने विधानसभा क्षेत्र में जा कर आम लोगों से बगैर समय लिए वे मिलते हैं. और इस का फायदा उन्हें बवाना के उपचुनाव में मिला भी.

इसलिए गुनहगार हैं

इन बातों का जिक्र महज इसलिए कि दिल्ली सरकार के इस तरह के फैसलों का कोई मजाक नहीं बनाता. यानी एक खास वर्ग के लोगों की तकलीफ का नाम अरविंद केजरीवाल था. दिल्ली के मुख्यमंत्री से कोई शिकायत किसी को नहीं.

अरविंद केजरीवाल ने राष्ट्रीय मुद्दों पर बोलना छोड़ दिया, तो कम हैरत की बात नहीं कि कोई राष्ट्रीय नेता चाहे वह भाजपा का हो या कांग्रेस का, वह उन के बारे में कुछ नहीं बोला.

लिंचिंग जैसे संवेदनशील मुद्दों पर उन की चुप्पी हैरान कर देने वाली है. भाजपा, कांग्रेस और मीडिया तीनों मिल कर अगर अरविंद केजरीवाल को दिल्ली तक समेटने में कामयाब रहे हैं तो इसे दूसरी दृष्टि से भी देखा जाना चाहिए कि क्या वाकई अरविंद केजरीवाल और उन की लोकप्रियता नरेंद्र मोदी व राहुल गांधी के लिए खतरा बनती जा रही थी जो उन्हें इस तरह खामोश रखने के लिए टोटके किए गए.

अब कोई नहीं कहता कि नरेंद्र मोदी के गहरे संबंध फलां उद्योगपतियों से हैं, कोई किसी की डिगरियों के बाबत सवाल नहीं पूछता. ये बातें खासतौर से भजपा को राहत देने वाली हैं जो उस के खिलाफ बोलने वालों के मुंह या तो सिल देती है या फिर खरीद लेती है. जब अरविंद केजरीवाल इन दोनों तरीकों से नहीं माने तो मीडिया के जरिए इतना मजाक उन का बना दिया गया कि उन्हें खामोश रहने में ही बेहतरी लगने लगी.

लोकतंत्र में जानबूझ कर चुप रहने वाला भी कम गुनाहगार नहीं. इस लिहाज से जरूर अरविंद केजरीवाल शक के दायरे में हैं. जनता हर बात पर उन का समर्थन करे, यह कतई जरूरी नहीं. लेकिन हास्यास्पद विरोध कोई भी स्वाभिमानी नेता बरदाश्त नहीं कर सकता, फिर भले ही उस से जनता का ही नुकसान हो रहा हो.

देश में लोग जिस नेता को चाहने लगते हैं उसे देवता बना देते हैं और सालों बाद उसी को कोसते हैं लेकिन तब तक उन के पास कुछ नहीं रह जाता. जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी इस की मिसाल हैं. उस वक्त अगर निडर हो कर बोलने वाला कोई नेता होता तो तय है कि कश्मीर समस्या इतनी विकराल न होती और न ही इमरजैंसी के हालात बनते.

अपनी खामोशी को ले कर भी कठघरे में खड़े अरविंद केजरीवाल को आज नहीं तो कल, जवाब देना ही पड़ेगा. फिर चाहे वह किसी धमाके की शक्ल में हो या इस स्वीकारोक्ति के रूप में कि भेदभाव के चलते लेगों के लिए क्या बोलूं और क्यों बोलूं.

बोले भी तो… 

मुद्दत बाद अरविंद केजरीवाल गौर करने लायक बोले तो वह शब्द बड़ा प्रचलित है ‘सौरी’. हुआ यों था कि कांग्रेस के पूर्व सांसद अवतार सिंह भड़ाना ने भी उन पर मानहानि का एक दावा दायर कर रखा था. जनवरी 2014 में केजरीवाल ने भड़ाना को देश के सब से भ्रष्ट व्यक्तियों में से एक बताया था. इस से दुखी भड़ाना ने उन्हें कानूनी नोटिस भेज कर अपना यह बयान वापस लेने की चेतावनी देने के साथसाथ एक करोड़ रुपए की क्षतिपूर्ति राशि मांगी थी. 21 अगस्त को केजरीवाल ने सब को चौंकाते हुए भड़ाना से माफी मांग ली.

दिलचस्प बात यह है कि माफी मांगने के लिए भी उन्होंने मुंह नहीं खोला बल्कि लिखित में माफीनामा कोर्ट को सौंप दिया. अब साबित होने लगा है कि केजरीवाल में राजनेताओं जैसे गुण और लक्षण आ गए हैं.

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