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पत्रकार के ट्वीट पर भज्जी ने कहा, मूर्ख इंसान को जवाब देने की जरुरत नहीं

भारतीय क्रिकेट टीम के खिलाड़ी हरभजन सिंह अक्सर विरोधियों को करारा जवाब देते नजर आते रहे हैं. इस बार भज्जी ने आस्ट्रेलियाई स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट के एक ट्वीट पर करारा जवाब दिया है. दरअसल आस्ट्रेलियाई पत्रकार ने एक ट्वीट में हरभजन सिंह को ‘खराब चुटकुले का लेखक’ बताया था. आस्ट्रेलियाई स्पोर्ट्स जर्नलिस्ट डेनिस स्वीपर ने इससे पहले पाकिस्तान और वर्ल्ड XI मैच के वक्त एक अन्य ट्वीट भी किया जो काफी वायरल हुआ था, इस ट्वीट में उन्होने भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली का अपमान करने की कोशिश की थी.

तब उनके इस ट्वीट में एक तस्वीर पोस्ट की गई थी जिसमें विराट कोहली एक स्टेडियम में सफाई करते हुए नजर आ रहे हैं. कप्तान कोहली का अपमान करते हुए तस्वीर को कैप्शन दिया गया था, ‘स्वीपर वर्ल्ड इलेवन, पाकिस्तान के मैच से पहले लाहौर के स्टेडियम में झाड़ू लगा रहे हैं. तब ट्विटर यूजर्स ने डेनिस स्वीपर के इस पोस्ट पर कड़ी नाराजगी जताई थी. ये ट्वीट हरभजन की प्रतिक्रिया से पहले किए गए थे.

बाद में हरजभन सिंह ने भी इस पोस्ट का जवाब देते हुए कहा कि उन्हें नहीं लगता कि कोहली को ऐसे मूर्ख शख्स को जवाब देने की जरूरत है जो कुत्ते की तरह भौंकते हैं.

हरभजन सिंह कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि विराट कोहली को हर किसी को जवाब देने की जरूरत हैं. क्योंकि ऐसे लोग कभी विराट की तरह नहीं बन सकते. विराट बहुत साधारण व्यक्तित्व वाले शख्स हैं. वैसे भी जब हाथी सड़क पर चलता है तो बहुत से कुत्ते भौंकते हैं. विराट कोहली हाथी हैं. इसलिए उन्हें सभी को जवाब देने की जरूरत नहीं है.

गौरतलब है कि हरजभन ने आस्ट्रेलियाई जर्नलिस्ट के इस ट्वीट के बारे में हिन्दी न्यूज चैनल के एक शो में बताया था कि किसी खिलाड़ी पर ऐसी टिप्पणी करने वाले शख्स को शर्म आनी चाहिए. ये उस व्यक्ति की बेहूदा हरकत है जिसने विराट कोहली के खिलाफ ऐसा लिखा. आपको गरिमा बनाए रखने के साथ यह समझना होगा कि हम किसके बारे में बात कर रहे हैं. आपको किसी को नीचा दिखाने की जरूरत नहीं है. आखिर आस्ट्रेलियाई, भारतीय और पाकिस्तानी नागरिक होने से पहले हम इंसान हैं. किसी को नीचा दिखाए बिना हम इस सच्चाई को स्वीकार करते हैं कि हम मानव हैं.

टोल प्लाजा पर जाम के झंझट से मुक्ति का ऐप

सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय राजमार्गों में सुधार के लिए जो कदम उठा रहा है उस का परिणाम देश के विभिन्न राजमार्गों में देखने को मिलने लगा है. राजमार्गों को 4-6 और 8 लेन बनाने की प्रक्रिया तेज हुई है और इस से राजमार्गों में लगने वाले जाम से आम लोगों को राहत मिली है.

राजमार्गों पर टोल प्लाजा अभी भी जाम का कारण बना हुआ है. इस से कई बार लोगों को काफी दिक्कतें होती हैं. इस के लिए औनलाइन भुगतान प्रक्रिया का सरलीकरण किया गया है. इस के तहत हाल में ही सरकार ने ‘माई फास्टैग’ तथा ‘फास्टैग पार्टनर’ 2 मोबाइल ऐप शुरू किए हैं. इन ऐप के शुरू होने से लोगों को टोल प्लाजा पर लंबी कतार में खड़े होने के बजाय सीधी अपनी लेन पर चल कर आगे निकलने की सुविधा होगी.

राजमार्गों का संचालन करने वाली सरकारी क्षेत्र की कंपनी राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी एनएचएआई का दावा है कि इस वर्ष अक्तूबर से लोगों को सभी राजमार्गों के टोल प्लाजा पर इलैक्ट्रौनिक टोलिंग की सुविधा मिल जाएगी.

देश में कुल 371 टोल प्लाजा हैं. अब तक 84 हजार किलोमीटर राजमार्गों यानी 365 टोल प्लाजा पर यह सुविधा उपलब्ध है. ‘माई फास्टैग’ को कोई भी व्यक्ति अब अपने मोबाइल पर खरीद कर डाउनलोड कर सकता है. अब तक इस की खरीद के लिए बैंकों का चक्कर लगाना पड़ता था लेकिन अब औनलाइन खरीद कर इसे औनलाइन रिचार्ज किया जा सकता है. इन सुविधाओं के बाद वाहनों को टोल प्लाजा पर रुकना नहीं पड़ेगा और सीधे अपनी लेन से आगे निकलने की सहूलियत मिलेगी.

सरकार पिछले 4 वर्षों से इस तरह की प्रणाली को विकसित करने की योजना पर काम कर रही थी. अब उस ने यह सुविधा हर हाथ तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था कर ली है. उम्मीद की जानी चाहिए कि इस तरह के प्रयासों से सड़कों पर जाम से मुक्ति मिलेगी.

15 अगस्त तक ईपीएफओ होगा पूरी तरह पेपरलैस

देश के करोड़ों कर्मचारियों की भविष्य निधि का संचालन करने वाले कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ तेजी से डिजिटल प्रक्रिया की तरफ बढ़ रहा है. कर्मचारियों की भविष्य निधि से जुड़ी योजनाओं का डिजिटीकरण किया जा चुका है और कर्मचारी अपने मोबाइल से अब जब व जहां चाहें सारी सूचनाएं अपनी निधि के बारे में हासिल कर सकते हैं.

संगठन का सब से अच्छा काम यह कहा जा सकता है कि उस ने नौकरी बदलने वाले लोगों के लिए एक ही खाता प्रणाली विकसित की है. पहले नए संगठन में जाने के बाद नया खाता खुलता था और पुराना खाता बंद करना पड़ता था. इस से कई लोग पैसा छोड़ देते थे या तरहतरह की बाबुओं द्वारा पैदा की गई दिक्कतों को बारबार ईपीएफओ के दफ्तर के चक्कर लगा कर झेलते रहते थे.

कर्मचारियों की इस समस्या का निदान हो गया है और अब वे जहां भी जाएं, उन का पैसा खुदबखुद उन के खाते में कंपनी जमा कर देगी. पैसा कितना जमा हुआ, कब जमा किया गया, इस का पूरा विवरण उन्हें अपने मोबाइल में मिल जाता है. संगठन के केंद्रीय आयुक्त वी पी जौय का कहना है कि अगले स्वतंत्रता दिवस तक संगठन की सभी सेवाओं का डिजिटीकरण हो जाएगा और ईपीएफओ 15 अगस्त, 2018 से पूरी तरह पेपरलैस हो जाएगा.

ईपीएफओ कर्मचारी भविष्य निधि योजना 1952, कर्मचारी जमा संबद्ध बीमा योजना 1976 तथा कर्मचारी पैंशन स्कीम 1995 को संचालित करता है. जौय का कहना है कि संगठन के पास 10 लाख करोड़ रुपए की जमाराशि है और समाप्त वित्त वर्ष में उस ने डेढ़ लाख करोड़ रुपए का निवेश भी किया था.

ईपीएफओ से हर दिन करोड़ों लोगों का वास्ता पड़ता है और इस संगठन में हो रहे ये सुधार निश्चितरूप से करोड़ों लोगों को ज्यादा सहूलियत प्रदान करने वाले साबित होंगे.

‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ में कुछ ऐसा है आमिर का लुक

बौलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट आमिर खान इन दिनों अपनी आगामी फिल्म ‘ठग्स औफ हिंदोस्तान’ की शूटिंग में बिजी हैं. इस फिल्म में पहली बार वो मेगास्टार अमिताभ बच्चन के साथ नजर आएंगे. अपने किरदार मे पूरी तरह से उतरने के लिए एक्टर को जाना जाता है. वो अपने हर किरदार को परफेक्शन के साथ करते हैं. यशराज बैनर की इस फिल्म के लिए एक्टर ने काफी वजन घटाया और पतले हो गए हैं.

आप जहां सोच रहे हैं कि इस फिल्म में आमिर खान दाढ़ी वाले लुक में नजर आएंगे वहीं सेट से लीक हुई उनकी हालिया तस्वीरों को देखकर आप चौंक जाएंगे. इन तस्वीरों में एक्टर को पहचान पाना मुश्किल है. इसमें वो जर्जर और फटे हुए कपड़े पहने नजर आ रहे हैं. लंबे बाल और दाढ़ी वाले लुक में आमिर खान काफी अलग अंदाज में नजर आ रहे हैं. इससे पहले ठग्स औफ हिंदोस्तान के लिए आमिर खान ने अपने नाक और कान छिदवाए थे.

विजय कृष्ण आचार्य के निर्देशन में बनने वाली इस फिल्म में एक्टर पाइरेट के तौर पर नजर आएंगे. सेट की तस्वीरों को आमिर के बहुत से फैन पेज ने सोशल मीडिया पर शेयर किया है. इस फिल्म के प्रति लोगों के मन में काफी उत्सुकता बनी हुई है.

आपको बता दें कि यशराज फिल्म्स ने ठग्स औफ हिंदोस्तान की रिलीज डेट की घोषणा कर दी है. उन्होंने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट पर लिखा, दो लीजेंड पहली बार अपने कभी ना देखे जाने वाले एक्शन एडवेंचर में नजर आएंगे. फिल्म में कैटरीना कैफ, फातिमा सना शेख भी नजर आएंगे. यह फिल्म 7 नवंबर 2018 को रिलीज होगी.

ठग्स औफ हिंदोस्तान से पहले भी आमिर अपनी फिल्मों में लुक के साथ एक्सपेरिमेंट कर चुके हैं. आमिर खान की फिल्मों में उनका अंदाज बिल्कुल हटकर होता है.

इन फिल्मों में भी बदला अपना लुक

दंगल

अपनी पिछली रिलीज दंगल के लिए आमिर खान ने जबरदस्त मेकओवर किया था. इस फिल्म ने वर्ल्ड वाइड करीब 2000 करोड़ रुपए का बिजनेस किया है. दंगल में आमिर का फिजिक देखकर सभी दंग रह गए थे.

पहलवान महावीर फोगट के किरदार के लिए आमिर ने 68 किलो से 93 किलो तक वजन बढ़ाया. इसका बुरा असर उनकी सेहत पर भी पड़ा था. फिल्म में आमिर खान युवा महावीर के रोल में पहले फिट और टफ बौडी के साथ दिखे. वहीं सीनियर महावीर फोगट के रोल के लिए उन्होंने काफी वजन बढ़ाया.

धूम 3

धूम 3 में आमिर खान ने अपने बालों के साथ एक्सपेरिमेंट किया था. शायद आमिर को लगा कि उनके काले बाल इस फिल्म में उनके कैरेक्टर के साथ बिल्कुल मेल नहीं खाएंगे. वैसे इस एक्शन फिल्म में आमिर का लुक एकदम सिंपल था. उन्होंने सिर पर टोपी कैरी की थी. फिल्म के लिए आमिर को अपनी बौडी भी बनानी पड़ी और उन्होंने टफ लुक लिया था.

पीके

पीके में आमिर खान स्‍कर्ट पहने, बाजा बजाते और पुलिस की ढीली ढाली वर्दी में नजर आए थे. पर्दे पर पहली बार वह बिल्कुल न्‍यूड लुक में दिखे. उन्होंने एलियन का किरदार निभाया था.

गजनी

फिल्म गजनी में आमिर ने छह लुक्स बदले थे. आमिर ने सिक्स पैक बनाए थे, इस फिल्म से आमिर की इमेज बदल गई थी.

सीक्रेट सुपरस्टार

जल्द ही आमिर खान की होम प्रोडक्शन फिल्म सीक्रेट सुपरस्टार रिलीज होने वाली है. फिल्म में आमिर कैमिओ करते नजर आएंगे. फिल्म में आमिर एक कूल सिंगर के रोल में दिखेंगे. इसमें आमिर स्पाइकी और कलर्ड हेयर फ्लान्ट करते नजर आएंगे.

बैंकों के विलय की प्रक्रिया तेज करेगी सरकार

सरकार देश में बैंकिंग व्यवस्था में सुधार के लिए बैंकों के एकीकरण की प्रक्रिया को तेज करेगी. उस के लिए सब से पहले बैंकों के बोर्डों की तरफ से सरकार को प्रस्ताव भेजा जाएगा. उन प्रस्तावों के मद्देनजर केंद्र सरकार विभिन्न मंत्रालयों का एक पैनल बनाएगी. पैनल के अध्यक्ष वित्त मंत्री अरुण जेटली होंगे.

वित्त मंत्री का दावा है कि इस से बैंकों में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, बैंकिंग प्रणाली ज्यादा मजबूत होगी और अर्थव्यवस्था को भी इस का फायदा होगा. उन्होंने आश्वस्त किया है कि इस प्रक्रिया में किसी कर्मचारी का अहित नहीं होगा.

सरकार का बैंकों के विलय का यह दूसरा प्रयास है. एक साल पहले देश के सब से बड़े स्टेट बैंक औफ इंडिया में 6 बैंकों का विलय किया गया था. इस विलय के बाद निश्चितरूप से सरकार का भरोसा बढ़ा है और उस ने राष्ट्रीकृत बैंकों को निजी हाथों में सौंपने के बजाय उन के एकीकरण की दिशा में काम करने का फैसला लिया है.

जानकार कहते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बैंकों का सरकारीकरण कर देश के बैंकिंग क्षेत्र में क्रांतिकारी पहल करने के बाद इस क्षेत्र में सुधार का दूसरा प्रयास पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव सरकार की उदार अर्थव्यवस्था वाली नीति के दौरान हुआ था. लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बैंकिंग सुधार की मिसाल बन कर देश में मजबूत बैंकिंग प्रणाली विकसित करना चाहते हैं. देश में सरकारी क्षेत्र का एसबीआई बहुत बड़ा बैंक बन गया है. वहीं, कुछ बैंक बहुत छोटे हो गए हैं. बैंकिंग व्यवस्था में प्रतिस्पर्धा लाने में यह अंतर बड़ी खामी बन रहा है, इसलिए सरकार का फैसला उचित है.

विशेषज्ञ मानते हैं कि बैंकों के एकीकरण से बैंकिंग तंत्र में सुधार आएगा और वे खुद ही अपनी जरूरत पूरी करने में सक्षम होंगे. वे हर जरूरत के लिए सरकार पर निर्भर नहीं रहेंगे. उन्हें भरोसा है कि बैंकों के विलय का सरकार का बैंकों के एकीकरण के अगले पड़ाव में मददगार बनेगा.

इंफोसिस का असर, शेयर गिरे फिर उठे भी

बौंबे स्टौक एक्सचेंज यानी बीएसई अगस्त के दूसरे पखवाड़े में देश की दूसरी सब से बड़ी सूचना तकनीकी कंपनी इंफोसिस के मुख्य कार्यकारी अधिकारी विशाल सिक्का के पद छोड़ने और फिर भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण (यूआईडीएआई) के प्रमुख रहे नंदन नीलेकणी के इस का नया सीईओ बनाए जाने के बीच झूलता रहा.

सिक्का के पद छोड़ते ही बाजार गिर गया और इंफोसिस के शेयर धड़ाम से गिरने लगे लेकिन जैसे ही नीलेकणी इस के नए प्रमुख बनाए गए, सूचकांक में जान आने लगी. वैश्विक संकेतों का भी बाजार पर अच्छा असर रहा और त्योहारों के माहौल के बीच बाजार में सकारात्मकता बनी रही.

नीलेकणी को इंफोसिस की जिम्मेदारी की खबर आते ही शेयर बाजार में रौनक लौट आई और 23 तथा 24 अगस्त को सूचकांक में 400 अंक तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई. नैशनल स्टौक एक्सचेंज में भी अच्छा कारोबार दर्ज किया गया.

इस बीच, सरकार ने बैंकिंग क्षेत्र में सुधार की घोषणा करते हुए सरकारी क्षेत्र के बैंकों की संख्या 10-12 तक रखने के लिए कदम उठाने की बात की. इस का भी बाजार पर सकारात्मक असर हुआ और सूचकांक में बढ़ोतरी दर्ज की गई.

निजता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का अदभुत फैसला

सर्वोच्च न्यायालय ने निजता के अधिकार पर फैसला देते हुए भगवा ब्रिगेड की ज्यादतियों का पूरा ध्यान रखा है, यह स्पष्ट है. जिन शब्दों में उस ने निजता के अधिकार को न केवल मौलिक अधिकार बताया है बल्कि उस को किसी भी संशोधन से कम करने के सरकार, तानाशाही संसद, कट्टरपंथी शासक, पार्टी के अधिकारों से परे रखा है, वे बेहद सख्त और स्पष्ट हैं.

सरकार के प्रधानमंत्री और उन के वित्त मंत्री, जो अपने को सार्वभौमिक मंत्री मानते हैं, आम नागरिक को अपनी कठपुतली मानने लगे हैं और उन के अनुसार, उन महापंडितों के आगे भक्तजनता केवल गुलाम सी है जिसे इसलामी देशों की तरह कायदों में ही रहना पड़ेगा. उन के शब्दों का लहजा और शब्द ऐसे हैं मानोकि वे इस भारत भूमि के शहंशाह हैं.

अटौर्नी जनरल ने तो निजता के अधिकार के मामले पर बहस में यह तक कह डाला था कि नागरिक का अपने शरीर पर कोई अधिकार नहीं है और सरकार ही उस की मालिक है.

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 19 ही नहीं, अन्य सभी अनुच्छेद जो मौलिक अधिकारों के संविधान के भाग 3 में हैं, कम नहीं किए जा सकते हैं. इन में निजता महत्त्वपूर्ण है और वह छाई हुई है.

सर्वोच्च न्यायालय की 9 जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से माना कि निजता का अधिकार मौलिक है और चाहे ये शब्द संविधान में लिखे न हों, कोई कानून इन का हनन सीमा से ज्यादा नहीं कर सकता.

सरकार की योजना है कि वह हर नागरिक को हर समय अपनी आंखों के सामने रखे और इसीलिए वह बारबार उसे अपना पैननंबर, आधारनंबर, राशनकार्ड, पते का पू्रफ, फोटो, वरिष्ठ अधिकारियों से पहचान आदि बताने के आदेश देती रहती है. कोई कैसे रहता है, क्या पहनता है, क्या खाता है, किस के साथ सोता है, कहां पैसे खर्च करता है, कहां जमा करता है, इन सब का ब्योरा सुरक्षा, आतंकवाद, कर चोरी, व्यवस्था, बेईमानी के नाम पर मांगा जा रहा है और हर रोज सरकार की मांग बढ़ रही है. नोटबंदी और गुड्स ऐंड सर्विसेज टैक्स की विवरणियां इस का सुबूत हैं जिन में व्यापारी से सिर्फ शौचालय जाने के अलावा हर चीज की जानकारी मांग ली गई है.

निजता के अधिकार का अर्थ है कि अगर कोई न चाहे तो वह बिना अपना कोई अवसर खोए सरकार को अपने फिंगर प्रिंट, आंखों के प्रिंट या फोटो देने से इनकार कर सकता है. सरकार से विशेष सुविधा चाहता है तो उस पर व्यावहारिक रोक लगती है वरना अतिरिक्त जानकारी नहीं ली जा सकती. पुलिस आप को अखबार निकालने की अनुमति देने के नाम पर दूसरों से जो पूछताछ करती है वह निश्चितरूप से निजता के अधिकार को भंग करती है.

निजता का अधिकार आज के युग में अनिवार्य हो गया है क्योंकि हरेक ने घरघर में कैमरे लगा रखे हैं. सरकार ने रेलवेस्टेशनों, हवाईअड्डों पर कैमरे लगा रखे हैं. कै्रडिट कार्ड, डैबिड कार्ड, इंटरनैट बैंकिंग में निजी जानकारी दी जाती है. इस के बाद सरकार के पास अधिकार हो कि ये सब जानकारियां उस के पास एकत्र हो जाएं, खतरनाक है. यह तो किसी भी विरोधी को कुचलने के लिए काफी है. सरकारी एजेंसियां हर किसी की 2-4 गलतियां तो ढूंढ़ ही लेंगी अगर उन के पास लोगों की पहाड़ सी जानकारी होगी.

यह निर्णय कोई क्रांति लाएगा, इस में संदेह है क्योंकि इस देश की जनता भीरू व अंधविश्वासी है और गुलामी उस के जैविक गुणों में प्रवेश कर चुकी है. उसे बंधे रह कर ही आनंद आता है. वह कुत्ते की तरह है जो अपनी रस्सी, मालिक को पकड़ाता है.

जीवन सरिता : समस्या छोटी हो या बड़ी सुलझाएं खुद को

समस्या छोटी हो या बड़ी, अगर सुलझाने बैठें तो पता चलता है कि इस का हल तो हमारे पास पहले ही था. उस वक्त लगता है कि काश, किसी ने पहले समझा दिया होता.

सब को बता कर ऊर्जा बरबाद न करें :  हर किसी दोस्त, रिश्तेदार से सलाह मांगना या शान जताने के लिए अपने लक्ष्य बताना नुकसानदायक हो सकता है. लक्ष्य पूरा हो गया तो यह आप की आदत हो जाएगी. पर जरा सोचिए, जब सबकुछ होना ही है तो, जब हो जाएगा, स्वयं ही पता चल जाएगा.

मूर्खता की हद तो अंशु के साथ हो गई. उस ने अपने इंटरव्यू की बात सब को बताई. परंतु जब कैंपस सैलेक्शन नहीं हुआ तो उसे लगा कि किसी की नजर लग गई.अब नौकरी के लिए कई जगह ट्राई करना ही पड़ता है. पंडितजी के चक्कर में पड़ गई. कभी सोमवार के व्रत रखती तो कभी किसी ग्रह के अनुसार अंगूठी पहनती.

समस्या साझा करने की बीमारी :  रिनी को समस्या होती नहीं कि सारे  जानने वालों को पता चल जाता है कि क्या हुआ है. पहले काफी गंभीर हो कर सलाह देते थे दोस्त. पर अब सब उस से कन्नी काटने लगे हैं. आप अपनी समस्या खास लोगों से ही साझा करें. रोने वालों का कोई साथ नहीं देता, यह एक सचाई है.

बातों का मतलब खोजने का फलसफा :  क्या आप भी उन महान लोगों में से हैं जो सीधी बात को भी बेहद गहरे अर्थ में ले लेते हैं? बात को पकड़ कर न बैठें. यह भी समझें कि कभीकभी लोग सही अर्थ में नहीं कहते. झूठ बोलना या थोड़ीबहुत फेंकना लोगों की आदत होती है. इसलिए किसी बात को बेहद तूल देना या अत्यधिक बहस करना बेकार ही है.

अपनी शक्लोसूरत पर गौर जरूर करें :  ‘आईने में शक्ल देखी है’, यह कहावत तो जरूर सुनी होगी. अपनी त्वचा, बाल और साफसफाई का विशेष खयाल करें. अनचाहे बाल, दागधब्बों से छुटकारा पाएं. विशेषकर, फिटनैस रूटीन को मेंटेन करें. फिट रहना शरीर और दिमाग दोनों की जरूरत है. इसे ले कर सतर्क व गंभीर रहें. जो व्यक्ति अपने शरीर की देखभाल नहीं कर सकता, वह दूसरी जिम्मेदारी भी पूरी नहीं कर पाएगा. अगर करेगा भी, तो रोधो कर.

लड़ाई कर लें पर बोलचाल बंद न करें :  किसी से कितनी भी बहस हो जाए लेकिन बोलचाल बंद नहीं करनी चाहिए. रचिता को उस के पंडितजी ने एक सलाह दी कि सब से बोलचाल रखो, कड़वा न बोलो, इस से ग्रह ठीक रहेंगे. पंडितजी को 21 सौ रुपए की दक्षिणा मिली. अरे भाई, यह व्यावहारिक  सलाह है. चूंकि पंडितजी ने अपनी झोली भरने के लिए कहा, इसलिए कीमती हो गई. खैर, किसी से भी झगड़ा करने में पहल न करें. कहीं पर जरूरी भी हो बहस कर लें, मगर बोलचाल बंद न करें.

प्रैक्टिस जरूर करें  :  कोई भी काम, चाहे वह छोटा ही क्यों न हो, करने से पहले होमवर्क जरूर करें. प्रैक्टिस से काम जल्दी पूरे होने के आसार होते हैं. जैसे, मोना ड्राइविंग लाइसैंस बनवाने से पहले कभी प्रैक्टिस कर के नहीं जाती थी. नतीजा, 5 बार टैस्ट देने के बाद ही पास हो पाई थी.

इसलिए इंटरव्यू हो या कोई और काम, थोड़ा समय पहले दे कर होमवर्क करने में कोई बुराई नहीं. सफल खिलाड़ी कितने ही सफल क्यों न हो जाएं, अपने प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी या तकनीक देखते हैं, चाहे वह कितना ही कमजोर या नया क्यों न हो.

हमेशा सकारात्मक नहीं रह सकते :  कोई भी हमेशा सकारात्मक नहीं रह सकता. निराशा और कुंठा के क्षण सभी के जीवन में आते हैं. चाहे कोई कितना भी सफल क्यों न हो. सफलतम आदमी भी निराश होता है. पर एक फर्क जरूर है. अकसर सफल व्यक्ति रोनेधोने के बजाय कुछ नया सीखने में वक्त देते हैं.

ओवर रिऐक्शन ठीक नहीं  :  प्रिया छोटीछोटी बातों को ले कर जल्दी चिड़चिड़ी हो जाती है. कामवाली हो, या ड्राइवर, वह जल्दी ही आपा खो देती है. कहते हैं, ज्यादा गुस्से वाले व्यक्ति का कोई मित्र नहीं होता. पूरी दुनिया आप के हिसाब से नहीं चल सकती.

ओवरइमोशंस को करें कंट्रोल  :  पल में बेहद खुश और मिलनसार लगी सोनम जब दीक्षा को दोबारा मिली तो उस से हायहैलो भी नहीं कहा. सोनम खुश भी जल्दी हो जाती, तो गुस्सा भी तुरंत हो जाती थी. पर सब से अजीब बात जो थी वह यह कि अगर किसी की तारीफ करती तो इतनी ज्यादा करती थी कि व्यक्ति स्वयं ही शरमा जाए. बुराई करती तो इतनी ज्यादा कि सुनने वाला परेशान हो जाए. और तो और, छोटी सी बात बुरी लग जाती तो पचासों बातें सुनाने से न चूकती. समाज में और सफलता के लिए यह रवैया ठीक नहीं है वरना आप नुकसान ही उठाते रहेंगे. खुश रहिए और खुश दिखिए भी.

सावधान रहें जब माशूका के साथ किसी होटल में रुकें

नोएडा के रहने वाले मंजू और अमित की शादी तय हो चुकी थी. दोनों के घर वालों ने उन की मंगनी कर दी थी जिस से उन्हें मिलनेजुलने और साथ घूमनेफिरने की आजादी मिल गई थी. अकसर दोनों दिल्ली घूमते,अपनी आने वाली जिंदगी के ख्वाब बुना करते और प्यारभरी बातें किया करते थे.

मामूली खातेपीते घरों के मंजू और अमित जब भी मिलते थे तो उन का दिल एकदूसरे से लिपटने का भी होता था. उन्हें लगता था कि वक्त थम जाए, दुनिया में कोई न हो और दोनों एकदूसरे की बांहों में लिपटे वहां पहुंच जाएं जहां पहुंचने में बस चंद दिन ही बाकी थे. अपनी यह ख्वाहिश दोनों एकदूसरे से जताने भी लगे थे और एकदूसरे को तसल्ली भी देते रहते थे कि बस, अब कुछ दिनों की बात और है, फिर तो…

जाहिर है इस ‘फिर तो’ का मतलब शादी के बाद सैक्स करना था. हर बार मिलने के दौरान एकदूसरे को छूने, सहलाने और चूमने से उन के मन में हमबिस्तर होने की चाहत जोर पकड़ने लगी थी. दोनों पढ़ेलिखे, समझदार थे और चूंकि मंगेतर थे, इसलिए इन बातों को गलत नहीं समझते थे. मन से तो दोनों एकदूसरे के हो ही चुके थे, अब तन से मिलने के लिए सुहागरात का इंतजार कर रहे थे. हालांकि अब और सब्र कर पाना दोनों के लिए ही मुश्किल हो चला था.

एक दिन दोनों की यह मुराद बिन मांगे ही पूरी हो गई जब मंजू के घर वालों ने उसे ग्वालियर जाने के लिए कहा. वहां एक नजदीकी रिश्तेदार के यहां घरेलू जलसा था. मंजू के घर वालों ने खुद  ही पहल करते हुए कहा कि वह अमित को भी साथ लेती जाए जिस से रिश्तेदारों से उस की जानपहचान हो जाए.

जैसे ही मंजू ने यह बात अमित को बताई और अमित के घर वालों ने भी उसे मंजू के साथ जाने की इजाजत दे दी तो वह उछल पड़ा. महबूबा को इतने नजदीक से महसूस करने का मौका जो उसे मिल रहा था.

दोनों 30 अप्रैल की रात को ट्रेन से दिल्ली से ग्वालियर के लिए रवाना हुए. मंजू के कहने पर अमित ने स्लीपर क्लास का रिजर्वेशन कराया था वरना अमित की ख्वाहिश यह थी कि होने वाली बीवी के साथ पहला सफर एसी में करे. कुछ पैसे बचाने की नीयत से मंजू ने स्लीपर क्लास में जाने का फैसला लिया था.

दिल्ली से ग्वालियर 5-6 घंटे का रास्ता है. दोनों स्लीपर कोच में अपनी बर्थ पर बैठे ऐसे एकदूसरे की बातों में खोए कि उन्हें भीषण गरमी का एहसास भी नहीं हुआ. ग्वालियर आतेआते दोनों चुंबक की तरह एकदूसरे से चिपके, बतियाते रहे और ढेरों फैसले जिंदगी के ले डाले.

और जब होटल में ठहरे तो

मुरैना स्टेशन आतेआते अमित ने मंजू को इस बाबत मना लिया कि रात दोनों किसी लौज में गुजारेंगे क्योंकि रिश्तेदार के यहां फंक्शन तो अगले दिन है. इसलिए क्यों उन के यहां एक दिन पहले से जाया जाए.

अमित का इशारा और मंशा समझ चुकी मंजू ने कोई खास एतराज इस पेशकश पर नहीं जताया क्योंकि खुद उस का दिल मिलन के लिए बेचैन हुआ जा रहा था.

ग्वालियर स्टेशन पर उतर कर दोनों होटल उत्तम पैलेस में चले गए जो कि उन के बजट में था. होटल के रजिस्टर में अपने नामपतों की ऐंट्री करा कर दोनों ने नियम के मुताबिक मैनेजर को फोटो आईडी भी दी और अपने कमरे में पहुंच गए.

कमरे में पहुंचते ही उतावले अमित ने मंजू को आगोश में भर लिया और उस रात दोनों ने उसी कमरे में सुहागरात मना डाली. शादी तय होने क बाद से इन्हें जिस एकांत की या मौके की तलाश थी, मिलने पर उसे उन्होंने गंवाया नहीं. रातभर जीभर कर जिस्मानी संबंध का सुख उठाया.

दूसरे दिन रिश्तेदार के यहां वे सुबहसुबह पहुंचे और रात होटल में गुजारने की बात छिपा गए जिसे बताने की न तो कोई जरूरत थी और न ही वजह थी. उसी शाम दोनों दिल्ली होते हुए वापस नोएडा आ गए और अपनेअपने घर जा कर फिर शादी की तैयारियों में जुट गए जिस के 2 ही महीने बचे थे.

बन गई थी ब्लू फिल्म

ग्वालियर के होटल की वह रात मंजू और अमित के लिए एक हसीन ख्वाब बन कर रह गई थी, जिसे याद कर दोनों अकसर तनहाई में भी मुसकरा दिया करते थे.

इस बात को कोई एक महीना गुजर चुका था. एक दिन मंजू ने अपने फेसबुक अकाउंट पर एक अंजान आदमी की फ्रैंड रिक्वैस्ट देखी पर उस पर ध्यान नहीं दिया क्योंकि आएदिन मनचले और आवारा किस्म के लड़के लड़कियों की प्रोफाइल देख उन्हें दोस्ती का न्योता देते हैं और वे कुबूल कर लें तो धीरेधीरे अश्लील और सैक्सी बातें करने लगते हैं.

दूसरे दिन मंजू ने उसी शख्स की फ्रैंड रिक्वैस्ट पर एक टैग लगा देखा

‘अ सीके्रट नाइट इन होटल’.

यह टैग देख कर उसे बरबस ही ग्वालियर के होटल में गुजारी रात याद हो आई. उस ने यह रिक्वैस्ट कुबलू कर ली पर उस वक्त उस के होश उड़ गए जब उस ने इस नए फेसबुक फ्रैंड का संदेश पढ़ा.

मैसेज में लिखा था, ‘मंजूजी, आप बहुत खूबसूरत और सैक्सी हैं, होटल में जिस तरह आप एक नौजवान के साथ सैक्स क्रियाएं कर रही हैं उस से मुझे जलन हो रही है. आप को यकीन न हो तो यह वीडियो देखें.’

मैसेज के साथ अटैच वीडियो जब मंजू ने खोला तो वह मारे डर और शर्म के पसीने से नहा उठी. इस वीडियो में होटल में गुजारी रात की पूरी शूटिंग थी. दोनों एकदूसरे से इस तरह से पेश आ रहे थे जैसे कि ब्लू फिल्मों के किरदार करते हैं.

घबराई मंजू ने तुरंत फोन कर अमित को बुलाया और वह वीडियो दिखाया तो उस के भी होश फाख्ता हो गए. क्योंकि यह वीडियो अगर वायरल हो जाता तो तय है इन की और घर वालों की खासी बदनामी होती.

अब दोनों के लिए यह जानना जरूरी हो गया था कि आखिर वीडियो फिल्म भेजने वाला चाहता क्या है. इस बाबत जब उन्होंने फेसबुक पर ही मैसेज कर उस से पूछा तो जवाब उम्मीद के मुताबिक आया कि ढाई लाख रुपए देदो, वरना यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया जाएगा.

जाहिर है, उन्हें ब्लैकमेल किया जा रहा था बावजूद इस के कि होटल में साथ ठहर कर इन दोनों ने कोई गलती या गुनाह नहीं किया था. ढाई लाख रुपए इन के पास नहीं थे और शादी सिर पर थी, इसलिए इन्होंने समझदारीभरा फैसला पुलिस की मदद लेने का लिया और घर वालों से बहाना बना कर सीधे ग्वालियर जा कर एसपी आशीष खरे से मिल सारी समस्या बताई.

पुलिस ने संजीदगी से इस मामले को लिया और योजना बना कर कार्यवाही कर होटल के मैनेजर 63 वर्षीय विमुक्तानंद और वेटर भूपेंद्र राय को पकड़ लिया. पकड़े जाने के बाद मुजरिमों ने कुबूला कि इस तरह कमरों के टीवी के औनऔफ स्विच में छोटे कैमरे लगा कर उन्होंने कइयों की वीडियो फिल्में बना कर उन्हें ब्लैकमेल करते हुए लाखों रुपए बनाए थे.

कैसे ढूंढें कैमरा

मंजू और अमित ने जल्दबाजी में इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि होटल के कमरे में छिपा कैमरा लगा हो सकता है. इस बाबत भूपेंद्र राय ने खुलासा किया कि नौकरी के बाद उसे होटल में आने वाले जोड़ों और ग्राहकों को देख कर समझ आ गया था कि अधिकतर लोग सैक्स और मौजमस्ती के लिए आते हैं. जल्द अमीर बन जाने के लिए उसे लगा कि क्यों न उन की फिल्में बना कर पैसा ऐंठा जाए क्योंकि कोई नहीं चाहता कि उन की प्राइवेसी की फिल्म दुनिया के सामने आए.

भूपेंद्र दिल्ली जा कर छोटे नाइटविजन कैमरे ले आया और टीवी के खटके में फिट कर दिए. ग्राहकों के जाने के बाद वह फिल्में देख कर शिकार फांसता था. मंजू और अमित की तरह कोई सोच भी नहीं पाता था कि टीवी के स्विच में भी कैमरे लगे हो सकते हैं.

इस मामले से एक बड़ी दिलचस्प बात यह भी सामने आई कि आजकल प्यार और सैक्स करने जगह की कमी हो चली है. ऐसे में आशिक और माशूका होटल में कमरा ले कर अपनी सैक्स की जरूरत पूरी करने लगे हैं. पर अब वहां भी कैमरों का खतरा मंडराने लगा है. इसलिए जब भी होटल में माशूका या मंगेतर को ले कर जाएं तो ये एहतियात जरूर बरतें ताकि किसी पचड़े या परेशानी में पड़ने से खुद को बचाया जा सके और राज भी उजागर न हो-

होटल के कमरे में या कहीं भी कैमरे की जांच के लिए आजकल कुछ ऐप भी आ गई हैं जिन्हें प्लेस्टोर से डाउनलोड किया जा सकता है. इन्हें चालू कर कैमरे की लोकेशन पता चल जाती है जिन्हें तुरंत होटल वालों को हड़का कर, हटवा लेना चाहिए. किसी होटल वाले को यह कानूनी हक नहीं कि वह आदमी की प्राइवेसी यों कैमरे में कैद करे.

कमरे में घुप अंधेरा कर बारीकी से देखें. अगर कहीं कोई हलकी लाइट नजर आए तो समझ लें कि वह कैमरा है. ये कैमरे बाथरूम में भी फिट किए जा सकते हैं. ऐप के जरिए भी ये पकड़ में आ जाते हैं. इन्हें ढक देना चाहिए फिर ये काम नहीं कर पाते.

अगर होटल के कमरे में या कहीं भी कैमरा छिपाया गया है तो वहां मोबाइल फोन का नैटवर्क काम नहीं करता, इसलिए कमरे में घूमघूम कर किसी से फोन पर बात करें, अगर बात करतेकरते नैटवर्क जाता है तो तय है वहां कैमरा है.

बिजली के स्विच, परदे की रौड, आईने के पीछे और दूसरे कोनों को नंगी आंखों से बारीकी से देखें. अगर कैमरा होगा तो दिख जाएगा.

इस के बाद भी कोई शूटिंग कर ले तो ब्लैकमेल न हों, बल्कि मंजू और अमित की तरह हिम्मत और समझदारी दिखाते हुए तुरंत पुलिस की मदद लें. इस में बदनामी नहीं होती और ब्लैकमेलर पकड़ा भी जाता है जैसा कि ग्वालियर में हुआ. मुजरिमों के पकड़े जाने के बाद यह बात भी सामने आई कि शहर के अधिकांश होटलों में इस तरह के नई तकनीक वाले कैमरे लगे हैं जो आसानी से नहीं दिखते.

भीड़भाड़ वाली जगहों बसस्टैंड या रेलवेस्टेशन के पास वाली लौज या होटल में न ठहरें. वहां रातभर लोग आतेजाते रहते हैं. उन में शराबी और आवारा लोग भी होते हैं. पुलिस वालों की नजर भी इन होटलों और लौजों पर रहती है, वे यहां चौबीसों घंटे गश्त लगाते हैं.

होटल में कमरा लेते वक्त बेवजह घबराएं नहीं. 2 बालिग लोग मरजी से सैक्स करें, यह उन का हक है, कोई जुर्म नहीं. डर दुनिया और समाज का रहता है कि कहीं देखे न जाएं तो एकांत में उन से डरने की कतई जरूरत नहीं.

अगर ठहरने के बाद अंजान लोग या पुलिस वाले पूछताछ करें तो भी न डरें और न ही घबराएं. कोई आप का कुछ नहीं बिगाड़ सकता. इन लोगों का मकसद आप के डर को भुना कर पैसे ऐंठने का रहता है.

यह भी ध्यान रखें कि सैक्स करते वक्त कमरे में अंधेरा कर दें. मुमकिन हो तो सैक्स दिन में करें क्योंकि रात को अकसर पुलिस वाले पैसा झटकने की गरज से होटलों में ठहरे लोगों को घेरा करते हैं. हालांकि, अगर कोई सख्ती से पेश आए तो पुलिस वाले चुपचाप खिसक भी लेते हैं. अगर वे कहें कि थाने चलो, तो नानुकुर न करें बल्कि तुरंत चल दें और उन से पूछें कि किस जुर्म में वे परेशान कर रहे हैं. इस के बाद भी वे न मानें तो आला अफसरों से शिकायत करने की और मीडिया में बात आम करने की धमकी दें. इस से वे बेवजह परेशान नहीं कर पाते हैं.

तीन तजरबे – तीन सबक

एक : भोपाल के कारोबारी इलाके एमपी नगर के एक होटल के मैनेजर का कहना है कि अकसर लड़के व लड़कियां मौजमस्ती करने के लिए होटलों में ठहरते हैं जिस से होटल वालों को कोई वास्ता नहीं होता. अगर पुलिस वाले मांगें तो ऐंट्री रजिस्टर उन्हें देना ही पड़ता है.

एक मामले का जिक्र करते हुए यह मैनजर बताता है कि सीहोर से आ कर उस के होटल में ठहरे लड़केलड़की ने खुद को भाईबहन लिखाया था. जब रात को पुलिसचैकिंग हुई तो बात छिपी नहीं रह सकी.

ऐसे मामलों में पुलिस वाले लड़कालड़की से अलगअलग पूछताछ कर एक से सवाल करते हैं, मसलन पिता और दादा का नाम क्या है. घर में कितने लोग हैं और होटल तक कैसे आए. चूंकि यह बात ठहरने वालों को पता नहीं रहती, इसलिए लड़कालड़की के जवाब अलगअलग होते हैं. सीहोर से आया जोेड़ा भी इसी तरह पकड़ा गया था. पुलिस वालों ने कार्यवाही तो नहीं की लेकिन उन का पूरा पैसा झटक लिया. बाद में मैनेजर ने उन्हें वापसी का किराया और खानेपीने के पैसे दिए.

दो : अकसर लड़कियां घर से झूठ बोल कर या बहाने बना कर लड़के के साथ होटल में आती हैं. इसलिए वे ज्यादा डरती हैं. ऐसे में कोई फसाद खड़ा हो जाए तो बात बिगड़ने में देर नहीं लगती.

होशंगाबाद का नवीन कुशवाह (बदला नाम) अपनी माशूका को ले कर भोपाल आया तो स्टेशन के पास हमीदिया रोड के एक होटल में ठहरा. वहां उस का झगड़ा एक शराबी से हो गया. इस पर मैनेजर ने पुलिस बुला ली. शराबी तो पकड़ा गया पर नवीन और उस की माशूका के घर वालों को भी पुलिस ने खबर कर दी जिस से दोनों की खूब खिंचाई हुई. मौजमस्ती का उन का मकसद झगड़े की वजह से पूरा नहीं हो पाया. इसलिए ऐसे वक्त में लड़ाईझगड़ों में नहीं पड़ना चाहिए.

तीन : विदिशा की रहने वाली रश्मि कोचिंग में ऐडमिशन के लिए इंदौर गई तो अपने आशिक विवेक को भी ले गई थी. मकसद हमबिस्तरी ही था, जिस का मौका विदिशा में नहीं मिलता था. दोनों इंदौर के बसस्टैंड के पास के एक होटल में रुके पर पता गलत लिखाया. रात को होटल पर छापा पड़ा तो कुछ कौलगर्ल्स और ग्राहक पकड़े गए. पुलिस ने रश्मि और विवेक को भी पकड़ लिया. दोनों घबरा गए और अपने निर्दोष होने की दुहाई देते रहे.

पुलिस ने उन के बताए पतों की छानबीन विदिशा कोतवाली से की तो वह गलत निकली. मौजमस्ती की रात दोनों को थाने में काटनी पड़ी. एक इंस्पैक्टर को इन की मासूमियत देख भरोसा हो गया कि वे दोनों इस गिरोह के नहीं हैं तो उस ने दया दिखाते हुए इन्हें भगा दिया. साथ ही, नसीहत भी दी कि अब कभी झूठा पता मत लिखाना, वरना कोर्टकचहरी के चक्कर लगाने पड़ेंगे.

अंधविश्वास बना परेशानी : मूर्तियों पर चढ़े रंग पर्यावरण के लिए खतरा

देश में मूर्तिपूजा बड़े पैमाने पर होती है. लोग मूर्ति की पूजा तब तक करते हैं जब तक वह अच्छी और सुंदर दिखती है. मूर्ति के टूटते, बदरंग होते या नई मूर्ति के आते ही पुरानी मूर्ति को पूजाघर से हटा दिया जाता है.

ज्यादातर मूर्तियां मिट्टी और प्लास्टर औफ पेरिस से तैयार की जाती हैं. इन को अलगअलग रंगों से रंग कर खूबसूरत बनाया जाता है. इन रंगों में खतरनाक रसायन मिले होते हैं. ये खतरनाक रसायन पर्यावरण के लिए खतरा बन गए हैं.

कुछ सालों से मिट्टी और प्लास्टर औफ पेरिस के साथ प्लास्टिक से बनी मूर्तियां भी बिकने लगी हैं. इन को कार और दूसरे वाहनों में लटकाया जाता है. ये भी समय के साथ बेकार हो जाती हैं. ऐसे में बेकार और टूटीफूटी मूर्तियों से लोगों का मोह भंग हो जाता है. और इन मूर्तियों को घर से बाहर फेंक दिया जाता है.

यह मामला अंधविश्वास और पाखंड से जुड़ा होता है. पंडों का आदेश है कि इन मूर्तियों का अपमान न किया जाए. इस कारण इन मूर्तियों को नदी के पानी में या फिर किसी पेड़ के नीचे जड़ों के पास रख दिया जाता है. मूर्तियों पर चढ़े रंग में खतरनाक रसायन मिला होता है. यह पानी में मिल कर इसे पीने वालों को नुकसान पहुंचाता है.

पेड़ के किनारे रखे जाने पर यह रसायन पेड़ की जड़ों में जा कर पेड़ को सुखाने का काम करता है. इस से यह पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है. आज के समय में कूड़ाकचरा, प्लास्टिक कचरा और ईकचरा को ठिकाने लगाना मुश्किल हो रहा है. ऐसे में टूटी हुई मूर्तियों को ठिकाने लगाने का काम भी मुश्किल हो गया है. यह बात अदालत तक ने महसूस की है. उस ने टूटी मूर्तियों को नदी के किनारे गड्ढा खोद कर उस में दबाने को कहा है. कई बार तो लोग मूर्तियों को नदी की रेलिंग पर या पुल पर लगी जाली पर लटका कर चले जाते हैं.

आज भी किसी न किसी तरह से लोग नदी में मूर्तियों को फेंकना सब से पुण्य का काम मानते हैं. वे मूर्तियां ही नहीं, पूजन का बाकी सामान भी वहां पर फेंक देते हैं. पुल के करीब कूड़ादान भी रखा जाने लगा है पर इस में मूर्तियां कोई नहीं डालता. लोगों को इस बात का डर बैठाया गया है कि कूड़ेदान में मूर्तियां डालने से उन का अहित होगा. अगर यह डर न बैठाया जाए तो भक्त कैसे अपनी गाढ़ी कमाई मंदिरों में बिना वजह मनमरजी से देंगे.

अंधविश्वास बना परेशानी

देवताओं की मूर्ति को बेकार होने और टूटने के बाद भी किसी भी जगह पर नहीं फेंका जा सकता, मूर्तियों को कूड़ाघर या नाली में नहीं फेंका जा सकता, ऐसा करने से भगवान नाराज हो सकते हैं. इस बात का डर लोगों के मन में बैठा दिया गया है. ऐसे में टूटी मूर्तियों को नदी या पेड़ के पास रख दिया जाता है.

इस मसले पर समाज सुधारक सुधाकर सिंह कहते हैं, ‘‘आज घरों में मूर्तियों की संख्या बढ़ गई है. मूर्तियों के पास देवताओं के फोटो, पेंटिंग्स और कलैंडर बड़ी संख्या में घरों में लगने लगे हैं. हर घर में छोटेबड़े मंदिर होते हैं. इन में 10 से 12 मूर्तियां होती ही हैं. बैडरूम से ले कर ड्राइंगरूम तक में मूर्तियां, फोटो और कलैंडर लगाए जाने लगे हैं. ऐसे में इन का निबटारा कठिन काम होने लगा है.’’

दीवाली के दिनों में ये मूर्तियां ज्यादा दिखती हैं. दीवाली या किसी त्योहार के मौके पर सफाई के समय मूर्तियों को घर से बाहर निकाला जाता है और उन को बाहर फेंक दिया जाता है. दीवाली में नई मूर्तियों के साथ पूजा करने का प्रावधान है. जब नई मूर्तियां घर में आती हैं तो पुरानी बाहर फेंक दी जाती हैं. ये बेकार मूर्तियां पर्यावरण का बड़ा खतरा बन रही हैं.

पहले ये मूर्तियां नैचुरल कलर से बनाई जाती थीं तो कम प्रभाव डालती थीं. अब ये कैमिकल कलर से बनाई जाती हैं तो ज्यादा प्रभाव डालने लगी हैं. कैमिकल रंग सेहत के लिए नुकसानदायक होते हैं.

इन कारणों से ही अदालत ने मूर्तियों के विसर्जन के लिए नदी के किनारे गड्ढे बनाने को कहा है. इस से भी पर्यावरण के होने वाले नुकसान को रोका नहीं जा सकता है.

प्रदूषण पर नहीं पाबंदी

नदी में फैलते प्रदूषण को रोकने के लिए तमाम तरह के प्रयास और कानून बन रहे हैं. इस के बाद भी नदियों में प्रदूषण कम नहीं हो पा रहा है. केवल मूर्तियां ही नहीं, मंदिर के फूल और दूसरी गंदगी भी फेंक दी जाती है. मंदिरों को नदी के प्रदूषण का जिम्मेदार नहीं माना जाता है जबकि सब से अधिक प्रभाव इन सब का ही पड़ता है.

मंदिरों के किनारे अब हर नदी में आरती का कार्यक्रम होने लगा है. असल में मंदिर के बाद नदियां इस तरह की आरती कमाई का नया जरिया हो गईर् हैं. इन पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं है. नदी के किनारे बड़ी संख्या में मंदिर बने होते हैं. यहां पूजापाठ से ही नहीं, भक्तों के स्नान करने से गंदगी फैलती है. इस पर जब तक पाबंदी नहीं लगेगी, नदियां साफ नहीं होंगी.

गंगा जैसी नदी, जिसे साफ करने में करोड़ों रुपए का बजट लगता है, का पानी भी पीने के लायक नहीं रह गया है. भक्त नदी का गंदा पानी पी कर देवीदेवताओं को खुश करने की कोशिश करते हैं. कई बार ऐसे लोग बीमारी का भी शिकार हो जाते हैं. इस के बाद भी वे यह स्वीकार नहीं करते क्योंकि उन को डर रहता है कि ऐसा करने से भगवान नाराज हो सकते हैं.

नदियों के प्रदूषण को रोकने के लिए उन के किनारे लगने वाली हर गंदगी को रोकना होगा चाहे वह मंदिर की हो या मंदिर के बाहर की. आज के समय में खतरनाक किस्म के कैमिकल का प्रयोग किया जाने लगा है. जो पानी को ज्यादा प्रदूषित करता है. ऐसे में टूटी

हुई मूर्तियों को नदी और पेड़ दोनों के किनारे से दूर रखना होगा, तभी पर्यावरण में सुधार हो सकेगा.

करोड़ों का है मूर्तियों का कारोबार

मूर्तियां पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा रही हैं, इस विषय पर  अदालत के आदेश के बाद से बहस भले ही शुरू हो गई हो पर अभी भी इस को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है. जरूरत इस बात की है कि इस परेशानी को भी गंभीरता से लिया जाए. लखनऊ जैसे शहर, जहां की आबादी करीब 50 लाख है, के करीब 10 लाख परिवारों में घरों के अंदर छोटे मंदिर हैं. एक घर में करीब 10 से 12 मूर्तियां होती हैं. ऐसे में हर साल 1 करोड़ 20 लाख मूर्तियां नई आती हैं. इतनी बड़ी संख्या में मूर्तियों का निबटारा सरल काम नहीं है. मूर्तियां बनाने में लगा खतरनाक रंग पर्यावरण के लिए खतरा बनता जा रहा है.

पर्यावरण के साथसाथ मूर्तियों का खरीदनाबेचना बड़ा आर्थिक कारोबार है. ऐसे में इस कारोबार से जिन को मुनाफा होता है वे इसे रोकने की राह में सब से बड़ा रोड़ा हैं. वे इस कारोबार को लगातार बढ़ाने में लगे हैं. जिस से पर्यावरण पर खतरा बढ़ता जा रहा है.

एक मूर्ति की कीमत करीब 50 रुपए से ले कर 1 हजार रुपए तक या इस से अधिक भी हो सकती है. ऐसे में आसानी से समझा जा सकता है कि 1 करोड़ 20 लाख मूर्तियों पर कितना पैसा खर्च होता होगा. इस के अलावा तमाम तरह की पूजा जैसे दुर्गापूजा, गणेश उत्सव और तमाम तरह के आयोजनों में मूर्तियां पहले लाई जाती हैं, फिर उन को हटाया जाता है. नदियों के किनारे या तालाब में इन को पानी में प्रवाहित किया जाता है.

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