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संस्कृति या कुसंस्कृति

हम अपने देश की महान संस्कृति का राग आलापते थकते नहीं हैं. हम छाती पीटते रहते हैं कि पश्चिम की गलीसड़ी, अनैतिक संस्कृति से भारतीय पुरातन संस्कृति की महानता नष्ट हो रही है. पर एक ही दिन, 7 सितंबर का समाचारपत्र देखिए तो हमारी संस्कृति की पोल खुल जाती है.

मुख्य समाचार, संस्कृति के दावेदारों गौरक्षकों के बारे में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है जिस में अदालत ने राज्यों को निर्देश दिया है कि वे हर जिले में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की नियुक्ति करें जो गौरक्षकों के आपराधिक, हिंसात्मक कृत्यों पर नजर रखें जो गौ संस्कृति के नाम पर आम लोगों को पीटने, मारने व वाहन जलाने का तथाकथित सांस्कृतिक अधिकार रखते हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने तो केंद्र सरकार से यह तक पूछा है कि उन (संस्कृति के रक्षक) राज्यों का क्या किया जा सकता है जो आदेश न मानें. शायद सुप्रीम कोर्ट को एहसास है कि संस्कृति रक्षकों को सुप्रीम कोर्ट असांस्कृतिक लगता है. सड़क पर गौमाता को ले जाने वालों को मार डालना कौन सी व कैसी संस्कृति है.

दूसरा समाचार है कि हमारी संस्कृति ऐसी है कि सरकार को चिंता हो रही है कि जिस रेल के डब्बों की छतों पर सोलर पैनल लगाए गए हैं उन्हें रास्ते में चोरी न कर लिया जाए. शायद, मारनेपीटने के साथ चोरी करना भी हमारी संस्कृति में शामिल है. यह ट्रेन दिल्ली से चल कर हरियाणा के फारूख नगर तक चलेगी पर रेल अधिकारी महान संस्कृति की निशानी से चिंतित हैं. जिस देश में सरकार की सार्वजनिक संपत्तिसुरक्षित न हो, वह संस्कृति का गुणगान कैसे कर सकता है?

एक समाचार है दिल्ली के निजी स्कूलों द्वारा अत्यधिक फीस लेने का. उच्च न्यायालय ने 98 स्कूलों को आदेश दिया है कि वे 75 फीसदी अतिरिक्त फीस वापस करें. जहां शिक्षा में घोटाले में हो, जहां गुरु व उन को नियुक्त करने वाले छात्रों को लूटते हों वहां कौन सी संस्कृति है और कैसी संस्कृति है.

बेंगलुरु में गौरी लंकेश की निर्मम हत्या किए जाने के बाद एक संस्कृति रक्षक निखिल दधीचि ने जो शब्द उन के लिए अपने ट्वीटर में इस्तेमाल किए हैं वे पोल खोलते हैं कि हम किस तरह की भाषा बोलते हैं. इस ट्वीटर को प्रधानमंत्री कार्यालय व मंत्री तक फौलो करते हैं.

संस्कृति का हाल यह है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ के चुनाव में छात्र नेताओं ने सारे शहर को पोस्टरों व अपने नामों से गंदा कर दिया. छात्र इस आयु में झूठ बोलना सीख चुके हैं और वे पोस्टरों में अपने नाम की गलत स्पैलिंग लिखते हैं ताकि बाद में दीवारों को गंदा करने के अपराध से वे बच सकें. यह झूठ की संस्कृति पहले ही दिन से पढ़ाई जा रही है क्या?

यौन मामलों में हम अपनी संस्कृति का गुणगान कुछ ज्यादा करते हैं और पश्चिम की खुली हवा को जी भर के गालियां देते हैं पर हर रोज हमारे देश में ऐसे मामले सामने आ रहे हैं जिन में 10 से 13 वर्ष की बलात्कार की शिकार लड़कियां अदालतों के दरवाजे खटखटा रही होती हैं. अगर हमारी यौन संवेदना इतनी अच्छी है तो बच्चियों के साथ तो यौन संबंध बनने ही नहीं चाहिए. एक समाचार मुंबई के उच्च न्यायालय का इसी बारे में है.

संस्कृति का राग निरर्थक है. हर समाज में अपराधी होंगे ही. उन के लिए पुलिस, अदालतें, जेलें बनेंगी ही. हर समाज में कुछ ऐसे होंगे जो बहुमत के रीतिरिवाजों के खिलाफ होंगे. संस्कृति का नाम ले कर उन की भर्त्सना न करें. जिसे सजा देनी है दें, बाकी सहन करें. हर कोई रैजीमैंटेड नहीं हो सकता. हर कोई तथाकथित संस्कृति का गुलाम नहीं हो सकता. संस्कृति का राग कमजोर आलापते हैं जिन के पास अपनी उपलब्धियां न हों.

खिलाड़ी बनेंगे राजपत्रित अधिकारी

 

देश व राज्यों की सरकारें खिलाडि़यों  पर तब मेहरबान होती हैं जब कोई खिलाड़ी राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता में पदक जीतता है, खिलाडि़यों पर धनवर्षा के साथसाथ नौकरी औफर की जाती है. ऐसा अकसर होता है. पर उत्तर प्रदेश में पिछले कुछ वर्षों से खिलाडि़यों के लिए यह सबकुछ बंद था. अब प्रदेश सरकार खेलों व खिलाडि़यों को बढ़ावा देने के लिए खिलाडि़यों को नौकरी देने की बात करती है.

उत्तर प्रदेश के खेलमंत्री चेतन चौहान ने कहा है कि प्रदेश का कोई भी खिलाड़ी ओलिंपिक, एशियाई खेलों या किसी भी विश्वस्तरीय खेल प्रतियोगिता में कोई भी पदक जीतता है तो उसे प्रदेश सरकार द्वितीय श्रेणी के राजपत्रित अधिकारी के पद पर नियुक्ति देगी. इस के लिए उस खिलाड़ी को स्नातक होना अनिवार्य है. यदि कोई पुरुष खिलाड़ी या महिला खिलाड़ी स्नातक नहीं है तो उस से स्नातक करने के लिए कहा जाएगा, तभी वह इस नौकरी का हकदार होगा.

इस तरह के लौलीपौप देने से क्या खेलों में सुधार हो जाएगा? शायद नहीं. क्योंकि खेलों को आगे बढ़ाने के लिए बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करने की जरूरत है. सरकारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती हैं और खिलाडि़यों को वे सुविधाएं मिल नहीं पातीं जिन के वे हकदार हैं.

वैसे भी कोई भी खेल अब सस्ता नहीं रहा. हर खेल की ट्रेनिंग के लिए अब लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं. अभी भी मातापिता अपने बच्चों की पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देते हैं. सभी मातापिता चाहते हैं कि बच्चा पढ़लिख कर आगे बढ़े. मातापिता एक बार जरूर सोचते हैं कि खेल में यदि बच्चा फेल हो गया तो क्या होगा. इसलिए वे किसी भी तरह का रिस्क नहीं लेना चाहते.

रही बात सरकार की, तो सब से पहले खेल संघों में व्याप्त राजनीति को खत्म करना होगा क्योंकि अब हर खेल संघ में राजनीति हावी हो चुकी है. राजनीति मुक्त खेल संघ अब रहा नहीं और जहां खेल में राजनीति हावी हुई तो निश्चित ही वहां खेलों का सत्यानाश होना तय है.

सरकारें खिलाडि़यों को पदक जीतने के बाद नौकरी देने की बात करती हैं. यदि पदक जीतने से पहले खिलाडि़यों को तराशने का काम करें तो शायद खेलों के अच्छे दिन आ सकते हैं. खिलाडि़यों की कमी नहीं है. बस, उन्हें ढूंढ़ने और उन्हें सही ट्रेनिंग की व्यवस्थाभर कर देने से खिलाडि़यों और खेलों के दिन फिर सकते हैं.

पद्म भूषण पुरस्कार के लिए धौनी का नाम

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई ने भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धौनी का नाम देश के तीसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान यानी पद्म भूषण पुरस्कार के लिए भेजा है. वैसे खेल मंत्रालय ने बैडमिंटन की स्टार खिलाड़ी पी वी सिंधु के नाम की भी सिफारिश की है.

महेंद्र सिंह धौनी की कप्तानी में टीम ने 2 विश्वकप जीते हैं जिन में 2007 में टी-20 विश्वकप और 2011 का एकदिवसीय विश्वकप शामिल हैं.

एक वक्त ऐसा भी था जब धौनी की किरकिरी हो रही थी और कहा जा रहा था कि धौनी को रिटायर हो जाना चाहिए. इस में पूर्व क्रिकेटर और अंडर 19 क्रिकेट टीम के कोच राहुल द्रविड़ भी शामिल थे. पर समयसमय पर धौनी अपनी सूझबूझ व बल्ले के कमाल से आलोचकों का मुंह बंद करते रहे.

श्रीलंका दौरे के समय धौनी पर दबाव भी था कि यदि वे सही परफौर्मेंस नहीं देते हैं तो अगले विश्वकप में उन का खेलना संदिग्ध था पर धौनी ने श्रीलंका के खिलाफ तीसरे एकदिवसीय मैच में भुवनेश्वर कुमार के साथ रिकौर्ड साझेदारी से टीम को जीत दिलाई. श्रीलंका के खिलाफ 5 एकदिवसीय मैचों में 4 पारियों में वे नौटआउट रहे. आस्टे्रलिया के खिलाफ भी उन का प्रदर्शन अच्छा रहा. कप्तान विराट कोहली भी मैदान में धौनी से सलाहमशवरा करते नजर आते हैं.

सिर्फ बल्लेबाज ही नहीं, बल्कि वे विकेटकीपर भी अच्छे हैं. वे स्टंपिंग कर अच्छेअच्छे बल्लेबाजों को पवेलियन का रास्ता दिखा चुके हैं. उन का इन आउट करने का कौशल भी गजब का है.

36 वर्षीय धौनी के नाम अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 16 शतक, जिन में एकदिवसीय मैचों में 10 और टैस्ट मैचों में 6 शतक शामिल हैं. उन्होंने 302 एकदिवसीय अंतर्राष्ट्रीय मैचों में 9,737 रन बनाए हैं जबकि 90 टैस्ट मैचों में 4,876 रन उन की झोली में हैं.

कप्तानी छोड़ने के बाद धौनी ने जिस तरह से अपनी परफौर्मैंस दिखाई है उस से नहीं लगता कि वे कहीं से भी अनफिट हैं. वे अगले विश्वकप में खेलने के लिए बिलकुल फिट हैं और अपने बल्ले से रन बटोरने में भी माहिर हैं. हां, यदि वे खेल संघों की राजनीति के शिकार हो जाएं तो अलग बात है.

सिलैंडर पर सवार पुण्य

‘खानेपकाने के लिए और कुछ हो न हो, हर गरीब के घर में एलपीजी गैस सिलैंडर जरूर होना चाहिए’ के नेक मकसद से सरकार अब उज्ज्वला प्लस योजना पेश करने जा रही है जिस का नाम अगर पुण्य प्लस रखा जाता तो जरूर ज्यादा सफलता मिलती. योजना बेहद स्पष्ट है कि जेब में अगर पैसा है तो महज 1,600 रुपए का गैस सिलैंडर आप किसी गरीब को गिफ्ट कर स्वर्ग में भी और सरकारी खाते में भी पुण्य वाली सीट आरक्षित कर सकते हैं.

गैरधार्मिक दानपुण्य को प्रोत्साहित करने का यह आइडिया कितना चलेगा, यह तो वक्त बताएगा लेकिन बात कुछकुछ ऐसी है कि हर जगह शौचालयजरूर होने चाहिए जिन के होने भर से स्वच्छता का संदेश बदबू के रूप में प्रसारित होता रहता है. फिर भले ही लोगों के पेट में निष्कासन के लिए कुछ हो न हो. लोगों की जेबें ढीली करवाने के विशेषज्ञ होते जा रहे नरेंद्र मोदी को अब पुण्यपुरुष कहने में भी हर्ज नहीं.

माया का धर्म

बसपा प्रमुख मायावती अब फ्लैशबैक में जाने लगी हैं, उन्हें याद आ रहा है कि बसपा को सत्ता, विकास के नाम पर नहीं, बल्कि वर्ण व्यवस्था के विरोध के चलते मिली थी. इधर अपने अच्छे दिनों के उत्तरार्ध में वे कुछ पंडों की गिरफ्त में

आ कर पूजापाठ और मूर्तिवाद में उलझ गई थीं. यह चूक वे कर बैठी थीं तो बाइज्जत उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में ऐतिहासिक दुर्गति का शिकार भी हुईं.

मायावती ने नई धमकी गुजरात विधानसभा चुनावप्रचार की शुरुआत करते वड़ोदरा से दी कि अगर आरएसएस सहित हिंदू धार्मिक नेता यानी शंकराचार्य वगैरा दलितों के प्रति अपना रवैया नहीं बदलेंगे तो वे अपने समर्थकों (अनुयायियों नहीं) सहित बौद्ध धर्म अपना लेंगी. इस धौंस का कोई तात्कालिक या दीर्घकालिक महत्त्व नहीं है. वजह साफ है कि भाजपा भी दलितों को हिंदूवादी फीलिंग कराते ही सत्ता पर काबिज हुई है. बेहतर होता मायावती भी देश छोड़ने की धमकी देतीं तो बात कुछ बनती.

जेटली की बुलेट

हिंदी के प्रति देशवासी जिज्ञासु हैं और पूर्वाग्रही भी. जब तक उन्हें किसी भी संज्ञा या क्रिया का हिंदी शब्द नहीं मिल जाए तब तक वे उस का अस्तित्व ही नहीं स्वीकारते. ऐसा ही कुछ दिल्ली के एक सैमिनार में हुआ जहां वित्त मंत्री अरुण जेटली बुलेट ट्रेन पर मीडिया की अज्ञानता पर बोले तो एक देसी आदमी ने प्रतिप्रश्न दाग दिया कि, बताइए कि बुलेट ट्रेन को हिंदी में क्या कहते हैं?

इस अप्रत्याशित जवाबी हमले से जेटली लड़खड़ा गए और गिरने से बचने के लिए प्रश्नकर्ता को ही झाड़ दिया. पर बुलेट ट्रेन के हिंदीकरण पर शोध शुरू हो गया है. इस प्रहसन प्रसंग से बरबस ही 1960 में गठित एक आयोग की याद हो आई जिस के अध्यक्ष जानेमाने वैज्ञानिक दौलतचंद कोठारी थे. इस आयोग ने कई शब्दों यथा मीटर, लिटर, इंजन, रेडियो और मशीन आदि को यथावत रखा था. ऐसे में बुलेट ट्रेन की हिंदी भी बुलेट ट्रेन ही मान लेनी समझदारी की बात है.

 

ऐसा भी होता है

मेरा बेटा 3 महीने का था. वह इतना रोता था कि मैं घर का कोई काम नहीं कर पाती थी, यहां तक कि टाइम पर खाना भी नहीं खा पाती थी. किसी प्रकार पति को टिफिन बना कर दे देती थी. उन के जाने के बाद तो मैं बेटे को ही ले कर बैठी रहती थी.

बेटे के रोने की वजह से मैं बहुत परेशान रहती. डाक्टर को दिखा चुकी थी. फिर भी उस का रोना बंद नहीं हुआ. मेरे पड़ोस में एक वृद्ध महिला रहने आईं. उन की उम्र लगभग 70 वर्ष की रही होगी. लेकिन वे बहुत सेहतमंद थीं. वे अकेली रहती थीं. वे दूसरों के घर खाना पकाने जाया करती थीं और भी कई काम करती थीं.

मुझे परेशान देख कर वे मेरे काम में भी मदद कर देतीं, यहां तक कि वे मेरे खानेपीने का भी खयाल रखती थीं. कभीकभी वे मेरे बेटे को खिलातींबुलातीं जिस से मैं घर का काम निबटा सकूं. कुछ समय बाद वे अपनी बेटी के घर चली गईं किंतु उन का निस्वार्थ प्रेम हमें याद आता रहता है.

शीला देवी विश्वकर्मा

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मेरी तबीयत अचानक बहुत खराब हो गईर् थी, जिस के कारण मुझे नर्सिंग होम में रहना पड़ा. इस दौरान मुझे देखने व हालचाल पूछने के लिए परिवार के लोग तथा अन्य परिचित वहां आते थे. एक दिन हमारी जानपहचान की एक महिला वहां आईं. कमजोरी के कारण मेरी आंखें बंद थीं जिस से उन को लगा कि मैं सो रही हूं. तब उन्होंने पास बैठी मेरी बहू से बातचीत करनी शुरू कर दी.

इसी क्रम में उन्होंने मेरी उम्र पूछी. जब बहू ने बताया कि मैं 71 वर्ष की हूं, तो वे बोल पड़ीं, ‘‘अरे, फिर तो ये अपनी पूरी उम्र जी लीं और और कितना जिएंगी? अपनी आंखों के सामने सबकुछ देखसुन चुकी हैं. इंसान को और क्या चाहिए. बीमार हो कर बिस्तर पर पड़ जाओ, क्या अच्छा है. इन्हें तो अब घर ले जाओ, डाक्टरों और अस्पताल का चक्कर छोड़ दो. अब इन्हें घर में ही इस जीवन से मुक्ति मिले.’’

उन की यह बात सुन कर मुझे बहुत दुख हुआ और मैं सोचने लगी कि क्या ऐसा भी होता है कि बीमार के स्वस्थ होने की कामना के बजाय उस की मृत्यु की कामना की जाए.

सुभाषिनी अग्रवाल

जीवन की मुसकान

4 माह पूर्व दिल्ली में एक मशहूर कंपनी में मेरी सौफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर नियुक्ति हुई. मैं नौकरी जौइन करने गई तो मेरे साथ मेरे मम्मीडैडी भी गए. वहां पहुंच कर मैं अपनी सहेली के फ्लैट पर रुकी.

10 दिनों बाद हम सभी का विचार मौल घूमने का बना. मौल घूमने के बाद आवश्यक वस्तुओं की खरीदारी की. इस दौरान डैडी अलग खड़े रहे. पता नहीं डैडी को अचानक कब चक्कर आया और वे गिर पड़े, हम लोग खरीदारी में मशगूल थे.

कोई गिर गया, कोई गिर गया की आवाज सुन कर वहां भीड़ लगनी शुरू हो गई थी. वहां जा कर मेरी निगाह डैडी पर पड़ी. मैं घबरा गई. तभी एक सज्जन भीड़ को हटा कर वहां पहुंचे. बेहोशी मिटाने

के लिए तुरंत पानी के छींटे मारे. तकरीबन 10 मिनट बाद डैडी ने आंखें खोलीं. मैं उन सज्जन को पहचान गई. वे हमारे महल्ले के डाक्टर चांडकजी थे. उन्होंने भी मुझे पहचान लिया और बोले, ‘‘बेटी, चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा.’’

होश आने पर उन्होंने मेरे डैडी से पूछा. डैडी ने कहा, ‘‘मैं खुद नहीं जानता कि कब गिर पड़ा, पर अब ठीक हूं.’’ हम चांडकजी की मदद को ताउम्र नहीं भूल पाएंगे. दीपिका श्रीवास्तव

मैंदादाजी के साथ ट्रेन से गेहूं ले कर आ रहा था. बनारस स्टेशन पर हमें उतरना था. 4 बोरे होने के कारण मैं ने 4 कुली किए. एक कुली दादाजी के साथ स्टेशन के बाहर गया, बाकी 3 कुलियों की जिम्मेदारी मुझ पर थी.

मैं ने उन तीनों को एकसाथ चलने की हिदायत देते हुए खुद भी उन के साथसाथ चलने लगा. लेकिन एक बोरे का वजन अत्यधिक होने के कारण एक कुली बोरा रख कर कहीं चला गया.

मेरे समझ में नहीं आ रहा था कि उन दोनों कुलियों के साथ जाऊं या इस बोरे को देखूं. लेकिन वहां पर 2 लड़कों को  खड़ा देख मैं ने कहा, ‘‘जरा इस बोरे को देखिएगा. उन दोनों के भरोसे छोड़ कर मैं चला गया. कुछ समय बाद उन दोनों बोरों को छोड़ कर लौटा तो देखा, मेरे बोरे के पास काफी भीड़ है.

कुली व उन दोनों लड़कों के बीच बहस चल रही है. लड़के बोले, ‘‘देखो, ये तुम्हारा बोरा उठा रहा था.’’ मुझे बहुत खुशी हुई तथा मैं ने उन का धन्यवाद करते हुए कहा, ‘‘ये मेरा ही कुली है.’’ आज भी उन लड़कों की याद आती है तो बहुत अच्छा लगता है.  एक पाठक

 

पुश्तैनी धंधे की जगह नौकरी

कहने को तो यह एक कमउम्र छात्र द्वारा पढा़ई में नाकाम रहने पर खुदकुशी जैसा बुजदिलीभरा कदम उठाने की नादानी है लेकिन इस में एक छटपटाहट और अहम संदेश भी है जिसे अगर वक्त रहते नहीं समझा गया तो कई और हर्ष बदलाव की राह में यों ही भटके नजर आ सकते हैं.

भोपाल के 52 क्वार्टर्स, पंचशील नगर में रहने वाले 15 वर्षीय  हर्ष ने 20 जून को खुदकुशी कर ली. वजह थी 9वीं की कक्षा में लगातार फेल होना. इस पर उस के मांबाप आएदिन उसे नसीहत दिया करते थे जो उन का हक भी था और जिम्मेदारी भी. हालांकि इस बात का उन्हें कतई अंदाजा नहीं था कि हर्ष उन की डांटफटकार और समझाइश को इस तरह लेगा.

हर्ष के पिता सुनील कुमार पेशे से ड्राइवर हैं. उन्हें परिवार के गुजारे लायक ही आमदनी हो पाती है. सुनील की ख्वाहिश थी कि उन के बेटे पढ़लिख कर अच्छी पगार वाली नौकरी कर इज्जत की जिंदगी जिएं. इस के लिए वे बेटों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ते थे. अपनी यह ख्वाहिश वे बेटों पर जाहिर भी कर चुके थे कि उन्हें ड्राइवरी जैसा छोटा काम नहीं करना है जस में न इज्जत है न खास पैसा.

यह बात सुनील को वक्त रहते समझ आ गई थी कि अगर बेटों की जिंदगी बनानी है तो उन्हें बेहतर शिक्षा दिलानी जरूरी है. खुद पर जो गुजरी, उस के शिकार बेटे न हों, इस बाबत वे अकसर तीनों बेटों को पढ़ाईलिखाई की अहमियत बताया करते थे. पर सुनील को यह अंदाजा नहीं था कि मंझला बेटा हर्ष उन की उम्मीदों और नसीहतों के बोझ तले दब कर मर जाएगा.

छटपटाहट छुटकारे की

सामाजिक बदलाव का यह वह दौर है जिस में ब्राह्मणों द्वारा बनाई वर्ण व्यवस्था खत्म नहीं हो रही, बल्कि नईनई शक्लों में सामने आ रही हैं. समाज और देश में ऊंची जाति वालों की पूछपरख और दबदबा बरकरार है लेकिन छोटी जाति वालों को भी थोड़ाबहुत पूछापरखा जाता है जब वे पढ़लिख कर पैसा कमाने लगते हैं और अच्छी पगार वाली नौकरी हासिल कर लेते हैं.

इन छोटी जाति वालों में पिछड़ों की तादाद ज्यादा है. वे अब तक पुश्तैनी धंधों के सहारे पेट पाल रहे थे, मसलन बढ़ई या लोहार यानी लकड़ी या लोहे का काम. नाई जाति के लोगों का हजामत का काम करना था. कुशवाहा या काछी जमीन वालों के खेतबगीचों में नौकरी करते थे. धोबी कपड़े धो रहे थे और यादव दूध व मवेशियों का धंधा कर रहे थे.

हाल के समय तक हर काम जाति के हिसाब से ही हो रहा था जिस में नई पीढ़ी, पुश्तैनी धंधा कर गुजर कर रही थी. इस दौरान इकलौती बात यह हुई कि हर स्तर पर पढ़ाईलिखाई ने जोर पड़ा. नतीजतन, थोक में बच्चे स्कूल की तरफ भेजे जाने लगे. जो पढ़ गए वे मिसाल बन गए यानी नौकरी में लग कर ऐशोआराम की जिंदगी जीने लगे. जो नहीं पढ़ पाए वे वापस अपने पुश्तैनी धंधों में लग गए.

इस बदलाव में अच्छी बात यह भी हुई कि जाति की बिना पर चलते पुश्तैनी धंधों की तरफ लौटने वालों की तादाद काफी कम रही. अधिकतर नौजवानों ने पढ़ाईलिखाई को तवज्जुह दी क्योंकि यह उन्हें दिखने भी लगा था और समझ भी आने लगा था कि उन के बापदादों की कोई खास इज्जत नहीं थी जो हाड़तोड़ मेहनत कर गुजारे लायक कमा पाते थे.

यह तबका, दरअसल, पिछड़ी जातियों का है जो आजादी के बाद तक पुश्तैनी धंधा ही करता रहा था. इन जातियों के लोगों से दलितों की तरह छुआछूत या जाति की बिना पर ज्यादा अत्याचार नहीं किया जाता था. इन्हें अछूत जाति वालों की तरह दुत्कारा व लतियाआ नहीं जाता था. लेकिन इस का यह मतलब भी नहीं कि इन्हें इज्जत देते हुए बराबरी से ऊंची जाति वाले अपने साथ में बैठालते थे.

चूंकि इन का पुश्तैनी धंधा मैला ढोने या चमड़े के सामान बनाने का नहीं था, इसलिए इन्हें मंदिरों में जाने से भी नहीं रोका जाता था. इस की दूसरीअहम वजह यह थी कि इन के पास देवीदेवताओं की मूर्तियों के सामने चढ़ावे लायक पैसा होता था. इतना जरूर था कि गांवदेहातों में ये अगड़ों की बराबरी से मकान बना कर नहीं रह सकते थे. फिर भी हर तरह से इन की हैसियत थी शूद्रों जैसी ही.

इस बदहाली को इस तबके की हर पीढ़ी ने समझा और धीरेधीरे पुश्तैनी ध्ांधों से किनारा करना शुरू कर दिया. 60-70 के दशक तक पिछड़ी जातियों के बच्चे 5वीं-8वीं तक पढ़ कर छोटीमोटी सरकारी नौकरियों में आने लगे थे पर इन की तादाद बहुत ज्यादा नहीं थी. लेकिन जितनी भी थी उस से दूसरों ने यह सबक तो ले ही लिया कि अगर थोड़ी और मेहनत कर ऊंची जाति वालों के बराबर पढ़ लिया जाए तो ग्रेजुएट हो कर गाड़ी और साहबी वाली नहीं, तो क्लर्की तो मिल ही सकती है. इस वक्त में इन जातियों की गिनती आरक्षण की हैसियत से सामान्य जाति में ही होती थी.

जाहिर है इन की टक्कर सामान्य जाति के छात्रों से थी जिन के पास पढ़ाईलिखाई का अच्छा घरेलू और सामाजिक माहौल होने के अलावा दूसरी तमाम सहूलियतें थीं. सियासी लिहाज से समझें तो मुलायम सिंह और लालू प्रसाद यादव जैसे पिछड़े पढ़लिख कर राजनीति में अच्छे मुकाम तक आए. इसी तरह 70 के दशक के बाद सरकारी नौकरियों में पिछड़ी जाति वालों की तादाद बढ़ी.

उठाया जोखिम, हुए कामयाब

पिछड़े तबके के छात्रों को दोहरी मेहनत करनी पड़ती थी. बच्चे पढ़ें, इस बात पर घर के बड़ेबूढ़ों को खास एतराज नहीं था पर उन पर पुश्तैनी धंधे में हाथ बंटाने का दबाव रहता था. कुछ तो पुश्तैनी धंधे से लगाव और कुछ नौकरी की गारंटी न होने का जोखिम इस की वजहें थीं.

पीढ़ीदरपीढ़ी और दशकदरदशक पिछडे़ तबके के लोगों को नौकरियां रास आने लगीं. इसे कई मामलों से आसानी से समझा जा सकता है. विदिशा के तोपपुरा महल्ले में रहने वाले नारायण सेन की हजामत की दुकान बजरिया इलाके में थी. उन के तीनों बेटे स्कूल गए पर सुबहशाम उन्हें पिता के साथ दुकान पर ग्राहकों की दाढ़ी बनानी पड़ती थी. इस से उन्हें पढ़ने का वक्त कम मिलता था.

इस के बाद भी 2 बेटे ग्रेजुएट हो गए, एक को नौकरी मिल गई. दूसरे को नहीं मिली तो उस ने अपनी दुकान में कुछ पैसा लगा कर उसे चमका दिया और हेयर कटिंग सैलून का बोर्ड लगा दिया. सीताराम नाम के जिस बेटे ने दुकान संभाली उस की पढ़ेलखे होने के चलते पूछपरख भी थी. लिहाजा, उस ने पिता  से ज्यादा पैसा कमाना शुरू कर दिया.

दूसरे बेटे ओमप्रकाश को सरकारी नौकरी मिली तो वह रिश्तेदारी और समाज में साहब कहलाने लगा. उस ने अपने दोनों बच्चों को कौन्वैंट स्कूल में दाखिला दिलाया जिस से वे और पढ़लिख कर उस से भी अच्छी नौकरी हासिल करें. छोटे भाई की देखादेखी सीताराम ने भी तय कर लिया कि वह अपने बच्चों से यह पुश्तैनी धंधा नहीं करवाएगा, बल्कि पढ़ालिखा कर बड़ा आदमी बनाएगा.

इस की वजह यह थी कि नौकरी में इज्जत और पैसा दोनों हैं. खुद ओमप्रकाश मानता है कि जब उस ने सरकारी दफ्तर में नौकरी करनी शुरू की तो कुछ साथी मजाक में और कुछ सचमुच में नाई जाति का होने को ले कर ताना मारा करते थे, लेकिन धीरेधीरे सब ठीक हो गया.

अब इन दोनों के चारों बच्चे जिन में एक लड़की भी है, इंजीनियर हैं. इन बच्चों को नहीं मालूम कि उन के दादा ने कैसी जिंदगी जी और हाथ में लोगों की दाढ़ी के कटे बाल ले कर घर चलाया. ओमप्रकाश कहता है कि जब मैं अपने बच्चों को बताता हूं कि कैसे हजामत बनाबना कर और फिर पढ़ कर हम एक बेहतर मुकाम तक पहुंचे तो उन्हें हैरानी होती है. ओमप्रकाश अब 55 साल का हो कर साहब हो गया है और उस के पास ठीकठाक पैसा व जायदाद है जिसे वह अपनी पूछपरख की बड़ी वजह मानता है.

अब इन दोनों भाइयों को एक नई चिंता यह लग गई है कि अब मुकम्मल पढ़ाईलिखाई के बाद भी नातीपोतों को अच्छी नौकरी नहीं मिलना क्योंकि पिछड़ी जातियों के आरक्षित कोटे का कट औफ सामान्य जाति के बराबर जाने लगा है. नई पीढ़ी उन की तरह पुश्तैनी धंधे की तरफ किसी भी शर्त पर नहीं लौटने वाली. लिहाजा, उस पर पढ़ाई का दबाव सुरसा के मुंह की तरह बढ़ रहा है.

घर और घाट के बीच

एक सीताराम या ओमप्रकाश के ही नहीं, बल्कि करोड़ों पिछड़ी जाति वालों के बच्चे नहीं जानते कि उन के दादापरदादा कौन सा धंधा करते थे. इन बच्चों की नजर और मकसद दोनों नौकरियां हैं. इन्हें यह भी समझ आ गया है कि अगर अव्वल नहीं आए तो नौकरी नहीं मिलेगी. और तब, ये घर के रहेंगे, न घाट के.

नतीजतन, इन बच्चों पर उन के मांबाप की उम्मीदों और नसीहतों का दबाव बढ़ रहा है. इसलिए वे तनाव में जी रहे हैं. तमाम बड़े और नामी स्कूलों में आधी तादाद पिछड़े वर्ग के छात्रों की है. मैडिकल, इंजीनियरिंग और मलाईदार सरकारी नौकरियों में भी ये तकरीबन 35 फीसदी हैं, लेकिन अब मुश्किलें पेश आने लगी हैं.

रेलवे में एक इंजीनियर सुरेश विश्वकर्मा की मानें तो मंडल कमीशन लागू होने के बाद पिछड़ों को धड़ाधड़ नौकरियां आरक्षण के चलते मिली थीं. पर अब कंपीटिशन बहुत बढ़ गया है जिस में बने रहने के लिए हमारे बच्चों को जरूरत से ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है. हम समाज की मुख्यधारा में आ गए हैं पर इस में बने रहने के लिए जरूरी है कि हमारे बच्चे हम से भी बेहतर करें.

सुरेश का यह भी कहना है कि अगर हमारे बच्चों को अच्छी नौकरी नहीं मिली तो उन की हालत जाति की बिना पर बापदादों से बदतर हो जाएगी. उन के पास तो अपने पुश्तैनी धंधे का हुनर था पर इन के पास वह नहीं है. हमारे पास सवर्णों सरीखी जायदाद भी नहीं है. हमारा कमाया एक हद तक ही इन का साथ दे पाएगा.

बच्चों की जबानी

भोपाल के एक कौन्वैंट स्कूल में पढ़ रही 11वीं की छात्रा नेहा का कहना है कि वह देश के किसी बड़े इंस्टिट्यूट से एमबीए कर किसी अच्छी कंपनी में तगड़ी पगार वाली नौकरी पाना चाहती है और इस के लिए अभी से तैयारी कर रही है. नेहा साफ कहती है कि अब पिछडे़ वर्ग का आरक्षण नौकरी की गारंटी नहीं रहा और सरकार के पास भी देने के लिए नौकरियां नहीं हैं.

नेहा की तरह ही 12वीं के सुयश कुशवाह की ख्वाहिश सौफ्टवेयर इंजीनियर बन कर अमेरिका जाने की है. उस का डर यह है कि अगर पढ़ाई में अव्वल नहीं रहा तो वह कहीं का नहीं रह पाएगा.

पिछड़े वर्ग की ही भोपाल की एक प्रोफैसर का कहना है कि पिछड़े तबके के अधिकांश बच्चों का ख्वाब अब पुश्तैनी धंधा नहीं, बल्कि तगड़ी पगार वाली नौकरी है. उन की मंशा मुख्यधारा में जुड़ने की है और इस का रास्ता तगड़ी पगार वाली नौकरियों से हो कर ही जाता है. इस प्रोफैसर का मानना है कि यह ठीक है कि पिछड़े वर्ग में भी ऊंची जाति वाले, मसलन यादव, कुशवाह, साहू, नामदेव, ताम्रकार, किरार, लोधी और रिजर्वेशन वाले क्षत्रिय ज्यादा तादाद में बड़ी नौकरियों में आ रहे हैं लेकिन उन की देखादेखी उन से नीचे वाले भी पढ़ने के लिए आ रहे हैं.

दरअसल, इन बच्चों पर बदलाव का और पढ़ कर कुछ बन जाने का दबाव ज्यादा है, इसलिए वे ज्यादा तनाव में भी हैं. ये छात्र अगर पढ़ाई में खुद को जरा सा भी फिसड्डी महसूस करते हैं तो तनाव की गिरफ्त में आ जाते हैं और अब तो हर्ष की तरह खुदकुशी भी करने लगे हैं. पढ़ाईलिखाई में पिछड़ने पर जो छात्र खुदकुशी कर लेते हैं उन में, एक अंदाजे के मुताबिक, 50 फीसदी पिछड़ी जातियों के होते हैं. बिलाशक जमाना पिछड़ों का है. वे हर क्षेत्र में आगे आ रहे हैं. पर नई पीढ़ी को आगे बने रहने के लिए जो मशक्कत करनी पड़ रही है, वह बेहद महंगी भी है.

 

कोहली संग लाल लहंगे में नजर आईं अनुष्का

विराट कोहली और एक्‍ट्रेस अनुष्‍का शर्मा की जोड़ी बौलीवुड और क्रिकेट के आपसी कनेक्‍शन की एक और मिसाल है. यह दोनों जब-जब साथ नजर आते हैं सारी निगाहें इन्‍हीं की तरफ मुड़ जाती हैं. ऐसा ही कुछ तब हुआ जब इंटरनेट पर इस जोड़ी की एक फोटो वायरल होने लगी. लहंगे में सजी खूबसूरत अनुष्‍का और शेरवानी में विराट कोहली.

नहीं,  नहीं आप कुछ सोचें, उससे पहले ही हम आपको बता दें कि जानकारी के अनुसार यह लुक इन दोनों के एक नए विज्ञापन का है, जिसमें यह जोड़ी साथ नजर आने वाली है. दरअसल अनुष्‍का और विराट एक विज्ञापन के लिए शूटिंग कर रहे थे और वहीं का यह फोटो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है.

Love Birds! ❤️?

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अनुष्‍का और विराट की ऐसी ही एक फोटो कुछ समय पहले भी सोशल मीडिया पर वायरल हुई थी, जिसमें भी यह दोनों ऐसे ही सजे-धजे नजर आ रहे थे.

कोहली अनुष्का को अपना लकी चार्म मानते हैं. उनसे जब भी अनुष्का के बारे में सवाल किया जाता है तो वे तारीफ करने से नहीं चूकते. हाल ही कोहली जी टीवी के दीवाली स्‍पेशल शो में शामिल हुए थे, जहां पर आमिर ने उनसे अनुष्का के बारे में बातें पूछीं.

इस दौरान आमिर ने विराट से पूछा कि उन्‍हें अनुष्‍का की कौनसी चीज सबसे ज्‍यादा अच्छी लगती है तो कोहली ने बताया की सच्‍चाई. कोहली ने कहा कि अनुष्का बेहद इमानदार हैं. इसी बातचीत में यह भई खुलासा हुआ कि विराट अनुश्का को प्यार से नुष्की बुलाते हैं.

इससे पहले भी विराट और अनुष्का की कई तस्वीरें वायरल हो चुकी हैं. जानते हैं इस फोटो के अलावा विराट और अनुष्का की नौ अन्य रोमांटिक तस्वीरें.

ये तस्वीर एक एड फिल्म की है. जिसमें दोनों ने साथ स्क्रीन शेयर की थी.

इस साल वैलेंटाइन डे पर दोनों की ये तस्वीरें वायरल हुई थी. दोनों ने साथ हौलिडे मनाया था.

शौपिंग के दौरान की दोनों की ये तस्वीर भी काफी वायरल हुई.

एक पार्टी की जब ये तस्वीर सामने आई तो विराट और अनुष्का की सगाई की खबरें तेज हो गई थीं.

इस सेलेब्र‍िटी कपल की ये सेल्फी भी छाई रही थी.

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