कहने को तो यह एक कमउम्र छात्र द्वारा पढा़ई में नाकाम रहने पर खुदकुशी जैसा बुजदिलीभरा कदम उठाने की नादानी है लेकिन इस में एक छटपटाहट और अहम संदेश भी है जिसे अगर वक्त रहते नहीं समझा गया तो कई और हर्ष बदलाव की राह में यों ही भटके नजर आ सकते हैं.

भोपाल के 52 क्वार्टर्स, पंचशील नगर में रहने वाले 15 वर्षीय  हर्ष ने 20 जून को खुदकुशी कर ली. वजह थी 9वीं की कक्षा में लगातार फेल होना. इस पर उस के मांबाप आएदिन उसे नसीहत दिया करते थे जो उन का हक भी था और जिम्मेदारी भी. हालांकि इस बात का उन्हें कतई अंदाजा नहीं था कि हर्ष उन की डांटफटकार और समझाइश को इस तरह लेगा.

हर्ष के पिता सुनील कुमार पेशे से ड्राइवर हैं. उन्हें परिवार के गुजारे लायक ही आमदनी हो पाती है. सुनील की ख्वाहिश थी कि उन के बेटे पढ़लिख कर अच्छी पगार वाली नौकरी कर इज्जत की जिंदगी जिएं. इस के लिए वे बेटों की पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ते थे. अपनी यह ख्वाहिश वे बेटों पर जाहिर भी कर चुके थे कि उन्हें ड्राइवरी जैसा छोटा काम नहीं करना है जस में न इज्जत है न खास पैसा.

यह बात सुनील को वक्त रहते समझ आ गई थी कि अगर बेटों की जिंदगी बनानी है तो उन्हें बेहतर शिक्षा दिलानी जरूरी है. खुद पर जो गुजरी, उस के शिकार बेटे न हों, इस बाबत वे अकसर तीनों बेटों को पढ़ाईलिखाई की अहमियत बताया करते थे. पर सुनील को यह अंदाजा नहीं था कि मंझला बेटा हर्ष उन की उम्मीदों और नसीहतों के बोझ तले दब कर मर जाएगा.

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