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2जी स्पैक्ट्रम : जनता के साथ घोटाला और राजनीतिक पार्टियों का खेल

बौलीवुड फिल्म ‘जौली एलएलबी’ में पुलिस थानों की नीलामी का एक मजेदार दृश्य दिखाया गया है. फिल्म में एक हवलदार थानों की बोली  लगाता है. हवलदार के सामने कई थानेदार बैठे हैं. थानों की नीलामी के इस दृश्य में हवलदार जिन क्षेत्रों के नाम लेता है वे दिल्ली के थाने हैं. सदर थाने की बोली 20 लाख रुपए से शुरू होती है. इसी तरह दिल्ली यूनिवर्सिटी थाने की. बोली के दौरान थानेदार एकदूसरे के भ्रष्ट चरित्र को ले कर टिप्पणी करते हैं.

फिल्म का यह दृश्य नितांत काल्पनिक नहीं है बल्कि दिल्ली और देश के दूसरे महानगरों, नगरों की हकीकत बयां करता है. इस तरह की नीलामियों में इस देश की जनता के साथ कितना बड़ा धोखा छिपा होता है, आम नागरिक को एहसास नहीं हो पाता.

2जी घोटाले का सच

दरअसल, यूपीए यानी संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के सब से चर्चित घोटालों में से एक 2जी स्कैम मामला 2008 में सामने आया था. यूपीए सरकार के समय कंप्ट्रोलर ऐंड औडिटर जनरल यानी सीएजी विनोद राय ने अनुमान के आधार पर 2जी स्पैक्ट्रम आवंटन में 1.76 लाख करोड़ रुपए के घोटाले की रिपोर्ट दी थी.

रिपोर्ट में कहा गया कि  2जी स्पैक्ट्रम का आवंटन 2001 की दरों पर किया गया. इस में कई अयोग्य कंपनियों को कम दरों पर सुविधा प्रदान की गईर्. अगर नई दरों के आधार पर स्पैक्ट्रम की खुली नीलामी हुई होती तो सरकार को 1.76 लाख करोड़ रुपए की कमाई होती. कंपनियों को नीलामी के बजाय ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नीति पर स्पैक्ट्रम दिया गया, जिस के चलते सरकारी खजाने को यह नुकसान हुआ.

यूपीए सरकार में इस कथित घोटाले की बात सामने आई तो सुब्रह्मण्यम स्वामी यह मामला कोर्ट में ले कर गए. सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सरकार से जांच के लिए कहा. सरकार ने मामले की जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा.

अक्तूबर 2009 में मामला सीबीआई में दर्ज हुआ था. सीबीआई ने तब के दूरसंचार मंत्री ए राजा, द्रमुक सांसद कनिमोझी समेत 34 लोगों को आरोपी बनाया. आरोपियों में 21 व्यक्ति और 13 कंपनियां थीं.  इन में 2 बड़े नौकरशाह तब के दूरसंचार मंत्रालय के सचिव सिद्धार्थ बेहुरा और ए राजा के निजी सचिव आर के चंदोलिया थे. डीएमके प्रमुख एम करुणानिधि की पत्नी दयालु अम्माल भी आरोपियों में शामिल थीं.

खबरें आने लगी कि सरकार के मंत्रियों और अधिकारियों ने मिल कर गैरकानूनी तरीके से 2जी स्पैक्ट्रम लाइसैंस आवंटित किए थे. इस में 3 मामले दर्ज किए गए. पहले मामले में सीबीआई ने तब के संचार मंत्री ए राजा, पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि की बेटी कनिमोझी, दूरसंचार मंत्रालय के सचिव सिद्धार्थ बेहुरा, ए राजा के निजी सचिव आर के चंदोलिया, स्वान टैलीकौम के प्रमोटर शाहिद उस्मान बलवा और विनोद गोयनका, यूनीटैक लिमिटेड  के एमडी संजय चंद्रा, रिलायंस के अनिल धीरूभाई अंबानी समूह से गौतम दोसी, सुरेंद्र पिपास व हरि नायर के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया था.

दूसरे मामले में एस्सार गु्रप के प्रमोटर रवि रूइया, अंशुमन रूइया, लूप टैलीकौम के प्रमोटर किरण खेतान, आई पी खेतान, एस्सार समूह के निदेशक विकास आरोपी थे. सीबीआई ने ए राजा, कनिमोझी, शाहिद बलवा, विनोद गोयनका, आसिफ बलवा, राजीव अग्रवाल, करीम मोरानी, शरद समेत 19 आरोपियों के खिलाफ मनी लौंडिं्रग के मामले भी दर्ज किए थे.

प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी ने तीसरे मामले में डीएमके के प्रमुख और पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की पत्नी दयालु अम्माल समेत कई लोगों को आरोपी बनाया था. उन पर आरोप था कि उन्होंने एसटीपीएल प्रमोटर्स के जरिए डीएमके द्वारा चलाए जाने वाले कलईनार टीवी को 200 करोड़ रुपए का भुगतान किया. उन से कई दिनों तक ईडी ने पूछताछ भी की थी.

नियमों में हेरफेर

सीबीआई जांच में दूरसंचार मंत्री ए राजा पर लगे आरोप में कहा गया कि कटऔफ तारीख 1 अक्तूबर, 2007 की थी पर जब 525 आवेदन आ गए तो अचानक कटऔफ तारीख 25 सितंबर कर दी गई. इस से 400 आवेदन खारिज हो गए. ‘पहले आओ, पहले पाओ’ नीति को बदल कर ‘पहले आओ, पहले चुकाओ’ कर दिया गया. नई समयसीमा के भीतर जो आवेदक लाइसैंस फीस का ड्राफ्ट ले कर आए, केवल उन्हीं आवेदकों के आवेदनों पर विचार किया गया.

ए राजा और कनिमोझी को कई महीने जेल में रहना पड़ा था. कनिमोझी पर आरोप था कि अपने चैनल के लिए उन्होंने 200 करोड़ रुपए की रिश्वत डीबी रियल्टी के शाहिद बलवा से ली और बदले में स्पैक्ट्रम दिलाया था.

मामले में 8 कंपनियों के 122 लाइसैंस सुप्रीम कोर्ट के आदेश से रद्द कर दिए. फरवरी 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने स्पैक्ट्रम आवंटन को ‘असंवैधानिक और विवेकाधीन’ घोषित कर दिया था. कोर्ट ने अपने आदेश में सरकार से कहा कि वह 2007 से 2009 के बीच जारी 122 लाइसैंसों को रद्द कर दे और इन लाइसैंसों को फिर से सही नियमों के अनुसार आवंटित किया जाए.

पूर्व दूरसंचार सचिव सिद्धार्थ बेरा, राजा के पूर्व निजी सचिव आर के चंदोलिया पर आरोप लगे कि सरकारी पद का दुरुपयोग करते हुए इस आपराधिक साजिश में शामिल हो कर भ्रष्टाचार किया. अदालत ने ताजा फैसले में साफ किया कि एजेंसी ने अपनी चार्जशीट में सरकारी कर्मचारियों पर आरोप तो लगाए पर उस ने इन्हें साबित करने के लिए कोई सुबूत नहीं पेश किया.

अफवाह इस कदर फैली कि देश में राजनीतिक उथलपुथल मची. मामले को ले कर राजनीति गरमाई. जनता में घोटालों के प्रति आक्रोश फैला. घोटाले के बाद लोकपाल मुद्दे पर जन आंदोलन शुरू हुआ और सत्ता का तख्त पलट गया. दूरसंचार मंत्री को हटाने के लिए संसद की कार्यवाही विपक्ष ने ठप कर दी थी. बाद में ए राजा को इस्तीफा देना पड़ा.

चुनावी मुद्दा

सीएजी की रिपोर्ट को भाजपा ने हाथोंहाथ लिया और भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस पर जमकर हमला बोला था. मामले को खूब उछाला गया. चुनावों में नरेंद्र मोदी समेत भाजपा नेताओं ने यूपीए सरकार के घोटालों को खूब भुनाया. देश में हर बड़ी रैली में 2जी मुद्दे पर कांग्रेस को आड़े हाथों लिया. उन चुनावों में भ्रष्टाचार सब से बड़ा मुद्दा बना. मनमोहन सरकार को संसद से ले कर सड़क तक बदनाम किया गया.

हालांकि सीएजी के नुकसान के आंकड़ों पर भी कई तरह के आरोप थे पर यह एक बड़ा राजनीतिक विवाद बना दिया गया.

और भी घोटाले

उस समय यूपीए की मनमोहन सिंह सरकार का 2जी के अलावा 70 हजार करोड़ रुपए का कौमनवेल्थ घोटाला भी चर्चा में आया. इस के चलते सुरेश कलमाड़ी को त्यागपत्र देना पड़ा. 3 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का कोयला घोटाला सामने आया. इन तमाम कथित घोटालों के चलते मनमोहन सिंह सरकार विपक्ष के निशाने पर थी. इन घोटाले के चलते आम जनता में उस के खिलाफ गुस्सा बढ़ने लगा था और अन्ना हजारे के नेतृत्व में दिल्ली के जंतरमंतर पर आंदोलन शुरू हो गया. कुछ समय बाद लोकसभा चुनाव नजदीक आ गए.

2014 में भाजपा की अगुवाई में एनडीए की सरकार बन गई. कथित घोटालों की बदौलत नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए.

इन कथित घोटालों से देश की अंतर्राष्ट्रीय छवि पर भी असर पड़ा.  घोटाले के आरोपों के बाद टैलीकौम सैक्टर की हालत खराब हो गई. बैंकों का करोड़ों रुपए का लोन डूब गया क्योंकि टैलीकौम कंपनियां बैठ गईं और उन का दिया पैसा डूब गया. उपभोक्ताओं को भी कोई फायदा नहीं हुआ.

2जी स्पैक्ट्रम की नीलामी का मामला भी कुछ ऐसा निकला  जिस में सीबीआई कोई सुबूत पेश नहीं कर पाई और अदालत द्वारा आरोपियों को बरी करना पड़ा.

फिल्म ‘जौली एलएलबी’ की कहानी के अंत में जज एक केस का फैसला सुनाते हुए कहते हैं कि मैं यहां बैठा रहता हूं और इंतजार करता रहता हूं. मुझे जजमैंट देना होता है एविडैंस की बिना पर, लेकिन एविडैंस आता नहीं है और मुजरिम छूट जाता है. मुझे मालूम होता है कि मुजरिम कौन होता है. इस कोर्ट में बैठा हर आदमी जानता है कि मुजरिम कौन है पर सुबूत नहीं आता.

2जी स्पैक्ट्रम घोटाले के फैसले में भी सीबीआई के स्पैशल जज ओ पी सैनी सुबूत के अभाव में आरोपियों को बरी करते हुए लगभग यही शब्द कहते हैं, ‘‘मैं ने 7 वर्षों तक सुबह 10 बजे से ले कर शाम 5 बजे तक लगातार 2जी स्पैक्ट्रम मामले की सुनवाई की. यहां तक कि गरमी की छुट्टियों में भी इसे सुना. मैं इंतजार करता रहा कि कोई तो इस मामले में ठोस सुबूत ले कर आएगा पर सब व्यर्थ. एक भी ऐसा सुबूत सामने नहीं आया. यह मामला लोगों द्वारा फैलाई गई सामाजिक धारणा अर्थात अफवाह से बढ़ कर कुछ नहीं था.’’

जनता के साथ ठगी

अदालत के इस फैसले के बाद देश की जनता ठगी सी महसूस कर रही है पर कांग्रेस और भाजपा दोनों ही पार्टियों को इस ठगी का कोई अफसोस नहीं है.  फैसले के बाद कांग्रेस कठघरे से बाहर निकल कर लड़ने के लिए मैदान में आ खड़ी हुई है. आरोपप्रत्यारोप का खेल जारी है.

सीबीआई ने जांच में हजारों पन्ने रंगे पर इन में सुबूत नहीं थे. 2012 में सीबीआईर् ने इस मामले में 86 हजार पेज की चार्जशीट दाखिल की. कोर्ट ने 2,183 पेज के फैसले में सीबीआई और ईडी दोनों को आड़े हाथों लिया. 7 वर्षों तक चले मामले में सुबूत पेश न किए जाने के कारण सीबीआई की विशेष अदालत को सभी आरोपियों को बरी करना पड़ा.

असल में मामले में कोर्ट के समक्ष जो चार्जशीट दायर की गई थी वह तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थी. पूरी चार्जशीट आधिकारिक रिकौर्ड की गलत व्याख्या, मामले पर पूरी तरह से अध्ययन न करने, कम अध्ययन करने और अधूरे साक्ष्यों पर आधारित थी. चार्जशीट में कई बातें तथ्यात्मक रूप से सही नहीं थीं. 7 साल में पूरी सुनवाई के दौरान यह समझना बेहद मुश्किल था कि अभियोजन पक्ष अपनी दलीलों से अदालत में क्या साबित करना चाह रहा था. अभियोजन पक्ष बेहद कमजोर दलील पेश कर रहा था और मामले में सुनवाईर् पूरी होने तक अदालत को यह साफ हो गया था कि अभियोजन पक्ष पूरी तरह दिशाहीन हो गया है. इस मामले में नियुक्त स्पैशल सरकारी वकील और सामान्य वकील बिना किसी तालमेल के अलगअलग दिशा में दलील देते पाए गए.

दूरसंचार मंत्रालय द्वारा पेश ज्यादातर दस्तावेज अवस्थित व बेतरतीब थे और मंत्रालय के नीतिगत मुद्दे पूरी तरह मामले को और पेचीदा कर रहे थे. गाइडलाइन स्पष्ट नहीं थी. अव्यवस्थित दस्तावेजों और नीतियों से संदेह पैदा होता है कि मामले को घोटाले का स्वरूप देने के लिए तथ्यों को तोड़मरोड़ कर पेश किया गया जिस के चलते किसी को भी पूरा मामला समझ नहीं आया.

निशाने पर विनोद राय   

इस फैसले के बाद विनोद राय से माफी मांगने की मांग की जा रही है. कांग्रेस नेता आरोप लगा रहे हैं कि विनोद राय ने भाजपा के लिए यह काम किया और उस की सरकार आने पर उन्हें बीसीसीआई में प्रशासक समिति (सीओए) का महत्त्वपूर्र्ण पद दे दिया गया.

इस मामले से यह भी जाहिर है कि किसी के खिलाफ मामला दर्ज करा कर परेशान किया जा सकता है. लेकिन, इस की भरपाई करना मुश्किल है. कांग्रेस ने कहा कि जो घोटाला हुआ ही नहीं, उस के कारण उसे हारना पड़ा.

इस मुद्दे को भाजपा ने खूब भुनाया. लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के इस कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ जनता के बीच जा कर नरेंद्र मोदी ने भाषण दिए. कांग्रेस के खिलाफ घोटालों को ले कर ऐसा माहौल बना दिया गया कि देशभर में लोगों में उस के प्रति गुस्सा फैला. इसी अफवाह की बिना पर भाजपा प्रचंड बहुमत के साथ केंद्र की सत्ता में आ गई.

मामले के झूठ का इतना शोर मचा कि सचाई सुनाई ही नहीं दी. सच की आवाज दब गई. अफवाह और अनुमान का मामला महाभारत युद्ध के दौरान ‘अश्वत्थामा मारा गया’ जैसा ही है.

महाभारत युद्घ में गुरु द्रोणाचार्य हस्तिनापुर राज्य के प्रति निष्ठा के कारण कौरवों के साथ थे. शस्त्र विद्या में निपुण द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा भी युद्घ में सक्रिय थे. वे कौरव सेना के एक सेनापति थे. उन्होंने भीमपुत्र घटोत्कच को परास्त किया. घटोत्कच के पुत्र अंजनपर्वा का वध किया. इन के अलावा द्रुपदकुमार, शत्रुजय, बलानीक, जायाश्रव और राजा श्रुताहु को भी मार डाला था.

पितापुत्र दोनों ने महाभारत युद्ध में पांडव सेना को तितरबितर कर दिया था. पांडवों की सेना की हार देख कर कृष्ण ने युधिष्ठिर से कूटनीति का सहारा लेने को कहा. इस योजना के तहत यह अफवाह फैला दी गई कि अश्वत्थामा मारा गया. जब द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से अश्वत्थामा के मारे जाने की सचाई जाननी चाही तो उन्होंने जवाब दिया, ‘अश्वत्थामा मारा गया पर हाथी…’

कृष्ण ने उसी समय शंखनाद कर दिया, जिस के शोर में द्रोणाचार्य आखिरी शब्द सुन नहीं पाए. अपने प्रिय पुत्र की मौत की बात सुन कर द्रोणाचार्य ने हथियार डाल दिए. वे युद्धभूमि में आंखें बंद कर शोक अवस्था में बैठ गए. द्रोणाचार्य को निहत्था जान कर द्रौपदी के भाई द्युष्टद्युम्न ने तलवार से उन का सिर काट डाला. सेनापति अश्वत्थामा के मरने की झूठी अफवाह से कौरव सेना हताश हुई और पांडव सेना में जोश भर गया. द्रोणाचार्य की निर्मम हत्या के बाद पांडवों की जीत होने लगी. इस तरह महाभारत युद्ध में अर्जुन के तीरों और भीम की गदा से कौरवों का नाश हो गया.

अफवाह फैला कर जीत हासिल करना धर्र्म में पुरानी कूटनीति रही है. धर्म के सहारे राज चलाने वाली भाजपा को धर्र्म से ही तो इस तरह की प्रेरणा मिलती रही है. उस के नेता बातबात में धर्र्म के किस्सेकहानियां कहते सुने जा सकते हैं.

यह कैसी शराफत

इसी तरह के झूठ की एक और कथा लाक्षागृह की है. दुर्योधन और शकुनि ने पांडवों से छुटकारा पाने के लिए षड्यंत्र के तहत पुरोचन की मदद से लाक्षागृह बनवाया. लाक्षागृह ज्वलनशील चीजों से बनवाया गया ताकि आग लगने पर वहां कोई जीवित न बचे. धृतराष्ट्र द्वारा पांडवों को सलाह दी गई कि उन्हें आध्यात्मिक खोज के लिए वहां जाना चाहिए. पांचों पांडव भाई अपनी मां कुंती के साथ इस महल में रहने के लिए गए. विदुर को इस गुप्त योजना का पता चल गया था. उस ने पांडवों को गुप्त चेतावनी भेजी और एक आदमी भेजा जिस ने उस महल से सुरक्षित बच निकलने के लिए एक सुरंग बनाई.

पांडव सुरंग के जरिए लाक्षागृह से सकुशल बाहर निकल गए पर पांडवों और उन की मां की जगह महल में एक भील परिवार की स्त्री और उस के 5 बेटों को रखा गया जो जल कर मर गए. दुर्योधन और धृतराष्ट्र समेत सभी कौरवों ने भी शोक मनाने का दिखावा किया और अंत में उन्होंने पांडवों की अंत्येष्टि भी करवा दी.

लाक्षागृह के भस्म होने का समाचार जब हस्तिनापुर पहुंचा तो पांडवों को मरा समझ कर प्रजा को बहुत दुखी होना पड़ा पर प्रजा इस चालाकी व बेईमानी को समझ नहीं पाई.

जनता के साथ ऐसे घोटालों के किस्से पुराणों में भरे पड़े हैं. अफवाहों और षड्यंत्रों के माध्यम से राज हथियाने और दुश्मनों को परास्त करने के नुस्खे पुराणों में हैं. भाजपा इन्हीं से सीख ले कर आगे बढ़ती रही है.

कांग्रेसी खेमे में खुशी

अदालत का फैसला आने के बाद कांग्रेस नेता खुश हैं. पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा कि 2जी घोटाला हमें बदनाम करने की साजिश थी. कोर्ट के फैसले ने हमारी सरकार के पक्ष को सही साबित किया है.

कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने कहा कि मेरी बात सिद्ध हुई है. कोई करप्शन नहीं हुआ, कोई नुकसान नहीं हुआ. अगर स्कैम है तो झूठ का स्कैम है. विपक्ष और विनोद राय के झूठ का. दोनों को माफी मांगनी चाहिए.

कांग्रेस नेताओं के जवाब में भाजपा के वरिष्ठ नेता व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली कहते हैं कि कांग्रेस इस तरह बयानबाजी कर रही है जैसे उसे कोई सम्मान मिल गया है. ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की पौलिसी को बदल कर ‘पहले पेमैंट करो, पहले पाओ’ कर दिया गया था. यह पूरी तरह भ्रष्ट पौलिसी थी. 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने भी यही कहा था.

नेता झूठी रिपोर्ट देने वाले विनोद राय से माफी की मांग तो कर रहे हैं पर असली माफी तो इस देश की जनता से दोनों ही पार्टियों को मांगनी चाहिए. एक ने झूठ की बिना पर सत्ता हासिल कर ली और दूसरी ने जनता को भ्रम के बीच में फंसाए रखा.

कांगे्रस और भाजपा दोनों ही पार्टियों में कोई भी दूध की धूली नहीं है. दोनों के शासन में घोटाले हुए और दोनों ने अपनेअपने बचाव के रास्ते तलाशे. दोनों ही दल एकदूसरे को फंसाने के लिए तरहतरह के हथकंडे अपनाने में पीछे नहीं रहे.

दोनों पार्टियों के नेता नौकरशाहों से मिल कर पैसा उगाहते रहे हैं. जहांजहां इन दलों की सरकारें हैं, पार्टियों के संगठन में पैसा वहीं से आता है. नौकरशाह योजना बनाते समय अपनों का खयाल रखते हैं. देश में करोड़ोंअरबों की योजनाओं में लाइसैंस, नीलामी, ठेकों में नौकरशाह अपने रिश्तेदारों को पहले ही योजनाओं का खुलासा कर फायदा उठा लेते हैं.

मसलन, राजधानी दिल्ली से सटे नोएडा के पास जेवर में अंतर्राष्ट्रीय हवाईर् अड्डा बन रहा है. योजना का पता सब से पहले नौकरशाही को रहता है. वह अपने रिश्तेदारों को पहले ही बता देती है कि इस जगह पर जमीन खरीद ली जाए. हवाई अड्डा बनते ही वहां की जमीन सोना उगलने लगेगी.

खास बात यह है कि ऐसे मामले भ्रष्टाचार तो हैं पर इन में सुबूत नहीं मिलते. लाइसैंस, ठेका, नीलामी में नौकरशाह और नेताओं की संलिप्तता रहती है. इस तरह के भ्रष्टाचार के अनगिनत मामले हैं पर जब कोई मामला अदालत में जाता है तो उसे सिद्ध करना बहुत मुश्किल होता है.

सुबूतों का अभाव

इस तरह का यह पहला मामला नहीं है. 80 के दशक में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने कांग्रेस के खिलाफ बोफोर्स मामले का दैत्य खड़ा किया. इस में भाजपा भी शामिल थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह आएदिन कहते थे कि बोफोर्स दलालों के नाम उन की जेब में रखी लिस्ट में हैं पर वे कभी कोईर् नाम उजागर नहीं कर पाए. जनता के सामने कांग्रेस को भ्रष्टाचार के लिए कठघरे में खड़ा किया गया.जैन हवाला कांड भी ऐसा ही था. इन मामलों में आज तक न तो  किसी को सजा हुई, न पैसा वसूल हुआ.

देश में ऐसे अनगिनत मामले होते हैं जिन में नेता और नौकरशाह नीतियां, योजनाएं बनाने से ले कर उन्हें लागू करने तक खुद और नातेरिश्तेदारों के लिए प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष तौर पर करोड़ोंअरबों का वारान्यारा करते हैं. वे इस तरह की बेईमानी, भ्रष्टाचार करते हैं जो दिखाईर् नहीं देते और इन का कोई सुबूत नहीं होता, क्योंकि देश में भ्रष्ट सरकारी नौकरों की नीचे से ले कर ऊपर तक एक लंबी कड़ी है. वे एकदूसरे के हित साधने व बचाव करने के लिए हमेशा सतर्क रहते हैं. इस मशीनरी का एक भी पुर्जा ढीला हो तो उसे ठीक कर दिया जाता है.

देश में हजारोंलाखों भ्रष्टाचारी, सुबूतों के अभाव में अदालतों में ठहरते ही नहीं. आरोपियों को बाइज्जत बरी करने के अलावा अदालतों के पास कोई चारा नहीं होता. जातिवाद, भाईभतीजावाद को बढ़ावा और इन के नाम पर औरों को वंचित कर अपनों को फायदा पहुंचाना भी शासन व प्रशासन का भ्रष्टाचार है. हितों के टकराव जैसे अनगिनत मामले होते हैं जिन्हें अदालतों में सुबूत के साथ प्रमाणित करना बड़ा मुश्किल होता है. ऐसे भ्रष्टाचार समाज की नसनस में व्याप्त हैं.

दरअसल, 2जी स्पैक्ट्रम मामले का फैसला देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज के तरीके पर बड़ा सवाल खड़ा करता है. इस मामले में साफ दिखता है कि हर संस्था अपनी भूमिका को सही और स्पष्ट ढंग से निभाने में नाकाम है. फैसले से कंप्ट्रोलर ऐंड औडिटर जनरल से ले कर सीबीआई, ईडी, दूरसंचार मंत्रालय का निकम्मापन नजर आया.

यह देश की जनता के साथ, दरअसल, धोखाधड़ी है, घोटाला है जिस के आगे अनगिनत शून्य लगते रहे हैं. ,देश की राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक तरक्की के लिए जितनी सचाई, कर्तव्यनिष्ठा राजनीतिबाजों व नौकरशाहों की होनी चाहिए उतनी ही सतर्कता व जागरूकता जनता में भी होनी की आवश्यक है.

जनता के साथ जबरन वसूली

सरकार ने आधारकार्ड के नाम पर इतना कन्फ्यूजन पैदा कर दिया है कि नर्सरी में 3-4 साल के बच्चों से ले कर बैंकों की अलगअलग सेवाओं में इसे लिंक करने के नियम थोपे जा रहे हैं. अभिभावकों की इस परेशानी का फायदा एजेंट्स और आधारकार्ड बनवाने वाले इस तरह उठा रहे हैं कि जिस आधार कार्ड को निशुल्क बनाने का सरकारी नियम है, उस के पैसे लिए जा रहे हैं.

पूर्वी दिल्ली का कृष्णानगर इलाके के मेनमार्केट में ऐसे ही आधारकार्ड बनाने वाले ने एक दुकाननुमा औफिस खोल रखा है जो फोटोकौपी स्कैन करने व औनलाइन टिकट बुक कराने का काम करता है. जब उस के पास बच्चे का आधारकार्ड बनवाने गए तो भीड़ के सामने उस ने यह कह कर मना कर दिया अब 1 महीने से आधारकार्ड बनाने बंद कर दिए हैं जबकि बाद में वह अगले दिन शाम को 6 बजे 350 रुपए ले कर आने को कहता है और बदले में आधारकार्ड बनाने का वादा भी. यह खेल सरकारी लापरवाही व नियमित केंद्र न बनाने की वजह से खेला जा रहा है. अगर सरकार आधारकार्ड के स्थाई केंद्र निर्धारित कर दे तो सरकार की निशुल्क सेवाओं के लिए जनता को अपनी जेब न ढीली करनी पड़े.

इसी तरह आय प्रमाणपत्र, गैस कनैक्शन, राशनकार्ड से ले कर ड्राइविंग लाइसैंस बनाने के सारे काम ऐसे ही जबरन अतिरिक्त पैसे दे कर करवाने पड़ते हैं. सीधे रास्ते और खाली जेब से इन कामों में इतने पेचीदा नियमकानून के अड़ंगे डाले जाते हैं कि आमजन भी पैसा दे कर काम निबटाने में भलाई समझता है. भ्रष्टाचार व जनता के साथ ठगी यहीं से शुरू हो कर बड़ेबड़े घोटालों तक पहुंचती है.

भारत में ज्यादा गरीबी क्यों, इस रिपोर्ट में आप भी जानिए

हमारा देश प्राचीन काल से गरीब है. गुलामी बाद में आई, गरीबी तो सनातन है. भारत एक ही सनातन धर्म को जानता है, वह है गरीबी. हम लोग जो कहानियां सुनते आ रहे हैं कि भारत सोने की चिडि़या था, उन कहानियों में विश्वास मत करो क्योंकि जिन के लिए भारत एक सोने की चिडि़या था, उन के लिए आज भी सोने की चिडि़या है. वे थोड़े से लोग हैं लेकिन अधिकतर लोगों के लिए कहां सोना, कैसी सोने की चिडि़या? ज्यादातर लोग गरीब और सदा से भूखे रहे. इसलिए कुछ लोग सोने के महल खड़े कर सके.

वास्तव में गरीबों का नाजायज फायदा उठा कर कुछ लोग अमीर बन गए. हम हमेशा से ही भयानक हीनता की भावना से पीडि़त रहे हैं, इसलिए गरीब हैं. हम क्या कर सकते हैं?

हम अवश हैं, विवश हैं. हम किसी न किसी के पीछे भेड़ की तरह चलेंगे, पंडितपुरोहितों का अंधानुकरण करेंगे क्योंकि हीन व्यक्ति कर ही क्या सकता है. उस की सामर्थ्य कितनी? वह हमेशा किसी का पल्लू पकड़ कर ही चलेगा. वह तो भेड़ है, आदमी नहीं. ऐसा आदमी कभी उन्नति नहीं करेगा, हमेशा गरीब ही रहेगा.

हर मानव के जीवन में जन्म और मृत्यु निश्चित है, बाकी कुछ भी निश्चित नहीं है. मानव के जन्म के बाद उसे जीने का अधिकार है चाहे वह गरीब के घर या अमीर के घर में पैदा हो. अगर परिवार के पास रहने के लिए अपना मकान, पेट भर खाना और पहनने के लिए कपड़े नहीं हैं तो हम उसे गरीब परिवार कहेंगे और उस परिवार के सदस्यों को हम गरीब कहेंगे.

society

इस दुनिया में साधारणतया 3 प्रकार के लोग हैं. एक, गरीब श्रेणी के लोग जिन के पास 3 मूलभूत चीजें रोटी, कपड़ा और मकान नहीं है. दूसरे, मध्य श्रेणी के लोग जिन के पास उपरोक्त 3 आवश्यकताओं में से 2 या 1 आवश्यकता की कमी है और तीसरे, संपन्न लोग जिन के पास तीनों चीजें हैं. कुछ लोग जन्म से ही गरीब परिवार में पैदा होते हैं और कुछ परिस्थितिवश गरीब हो जाते हैं.

गरीबी की यह भौतिकवादी परिभाषा है. कुछ लोग आर्थिक दृष्टि से संपन्न हैं लेकिन मानसिक या शारीरिक दृष्टि से गरीब हैं. लेकिन साधारणतया ऐसे लोगों को गरीब नहीं कहते, क्योंकि उन के पास इलाज करवाने के लिए पर्याप्त धन है.

हमारे देश में 65 प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे अपना जीवनयापन कर रहे हैं. खासकर गांवों में 72 प्रतिशत अधिक गरीब लोग रहते हैं क्योंकि ये लोग थोड़ी सी जमीन पर खेती कर के अपना जीवनयापन करते हैं और बिना पानी के खेती मानसून पर निर्भर है. ये लोग खेती से केवल खाने के लिए सालभर का अनाज पैदा कर पाते हैं. गांवों में मजदूरी का काम भी कम मिलता है. इतना ही नहीं, गांव में अधिकतर लोग शादियों में खर्च, मृतक पर खर्च और अन्य धार्मिक कार्यों पर खर्च करते हैं जिस से वे कर्ज में डूबे रहते हैं और हमेशा गरीब ही बने रहते हैं.

कुछ मिस्त्री, कारीगर और मजदूर इतना कमाते हैं कि वे अपने छोटे परिवार का जीवनयापन कर सकते हैं, लेकिन वे हमेशा शाम को नशा करते हैं और व्यसनी हो जाते हैं. नशा चाहे शराब का हो या तंबाकू का या नशीली जड़ीबूटियों का हो, सभी नशे मानव के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं और इन में पैसा खर्च होता है व उन के परिवार गरीबी में दिन काटते हैं. कुछ व्यसनी शरीर से इतने कमजोर हो जाते हैं कि वे अपना काम करने में असमर्थ हो जाते हैं और उन की औरतें घरों में झाड़ूपोंछा व बरतन साफ कर के पैसा कमाती हैं. जब तक लोग नशीली वस्तुओं का सेवन नहीं छोड़ेंगे तब तक गरीबी उन का पीछा नहीं छोड़ेगी.

धर्म की घुट्टी

बचपन से ही सभी भारतवासियों के घरों में धर्म की घुट्टी पिलाई जाती है. जीवन में कुछ अजीब घटनाओं के डर और कुछ सवालों के जवाब न मिलने पर हम इन रहस्यों को अंधविश्वास का रूप दे देते हैं. देश में धर्मगुरुओं की समृद्ध परंपरा रही है. धर्मगुरुओं के भाषणों द्वारा लोगों को दान करने के लिए प्रेरित किया जाता है, क्योंकि दान करने को सब से बड़ा पुण्य माना जाता है. भोलेभाले गरीब लोग केवल मंदिरों में अपनी हैसियत से ज्यादा दान दे कर ही नहीं लुटते आए हैं, बल्कि वे ढोंगी बाबाओं के जगहजगह आश्रमों के जाल में फंसते रहे हैं.

छोटीबड़ी समस्याएं हरेक के जीवन में आती हैं लेकिन ये लोग इन्हीं समस्याओं का हल ढोंगी बाबाओं के आश्रमों में दान दे कर ढूंढ़ने लगते हैं. लाइलाज बीमारी से ग्रस्त लोग, निसंतान दंपती, परिवार में कलह से दुखी, गरीब और बेरोजगार लोग ढोंगी बाबाओं के चंगुल में फंस कर लुटते नजर आते हैं. यह सब से बड़ा कारण है कि हमारे देश में गरीबी बढ़ रही है.

हमारे देश में अधिकतर गरीब लोग धार्मिक हैं और सरकार द्वारा समझाए नारे- ‘हम दो हमारे दो’ को अस्वीकार कर के 2 से अधिक संतानों में विश्वास रखते हैं क्योंकि घर में जितने हाथ बढ़ेंगे उतने लोग मजदूरी कर के पैसा कमाएंगे और घर का खर्च चलाने में सहायक होंगे. लेकिन घर में अधिक सदस्यों के कारण जीवनयापन मुश्किल से हो पाता है. वास्तव में जनसंख्या में वृद्धि हमारे समाज और देश के लिए घातक है. इस से भी गरीबी बढ़ती जा रही है.

डा. मारथा फरहा (प्रोफैसर, विश्वविद्यालय, पैन्सिलवेनिया) के मुताबिक गरीबी में पलने वाले बच्चों की कार्य करने में स्मरणशक्ति की क्षमताएं मध्यम श्रेणी में पलने वाले बच्चों से कम होती है. काम करने में स्मरणशक्ति का अर्थ है रोजाना के कामों को करने की क्षमता, जैसे फोन नंबरों को याद रखना. यहां तक भाषाओं को समझने का काम, पढ़ना और प्रतिदिन की समस्याओं को हल करना भी उन के लिए दुसाध्य कार्य है. उन लोगों को प्रसिद्ध युद्ध की तारीख याद रखना और यहां तक कि साइकिल चलाना भी दुसाध्य लगता है.

डा. फरहा के बाद मेरी इवांस और माइकल स्केम्बर्ग (कोर्नेल विश्वविद्यालय) ने इस विषय पर विस्तृत रूप से अध्ययन किया. उन्होंने नैशनल साइंस एकेडमी के साप्ताहिक जर्नल को बताया कि गरीब बच्चों में तनाव के कारण स्मरणशक्ति की क्षमता कम हो जाती है, जो उन के विकसित हो रहे दिमाग पर असर करती है. बच्चे के पैदा होने पर उस का भार, बच्चे की माता की उम्र, माता की शिक्षा और शादी के बाद पति से संबंध का बच्चों पर कोई असर नहीं पड़ता, लेकिन बच्चों की तनावपूर्ण जिंदगी उन को शिक्षाग्रहण करने नहीं देती. गरीब आदमी भी तनावग्रस्त हो जाते हैं क्योंकि उन्हें अपना भविष्य निश्चित नजर नहीं आता.

माइकल मारमोट ने पता लगाया है कि गरीबी से तनावयुक्त लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है. सरकार को इन गरीब बच्चों के तनाव को कम करने की कोशिश करनी चाहिए जिस से शिक्षा हासिल करने में वे दिलचस्पी लें अन्यथा गरीबों के तनावयुक्त बच्चे शिक्षा ग्रहण नहीं करते और गरीब ही रहते हैं.

हमारी सरकार पैट्रोल और डीजल पर टैक्स बढ़ाती है तो सभी वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं. महंगाई लोगों के जीवन स्तर को नीचे धकेल रही है. महंगाई ने लोगों की कमर तोड़ दी है और मध्यम श्रेणी वाले भी गरीबी में दिन गुजारने लगे हैं.

आत्मकेंद्रित संपन्न वर्ग

देश के लोग बुद्धिमान तो हैं किंतु बुद्धि का उपयोग किस दिशा में होना चाहिए, यह नहीं जानते. धनी लोग निर्बल, कमजोर व गरीब लोगों के साथ आत्मीयता से जुड़ें क्योंकि उन से कट कर किसी का भला होने वाला नहीं है. अंबानी बंधुओं में अपनी बीवियों को तोहफे देने की होड़ मची है. मुकेश अंबानी ने अपनी पत्नी के लिए 242 करोड़ रुपए का जेट विमान खरीद कर दिया तो अनिल अंबानी ने अपनी पत्नी को 400 करोड़ रुपए का लग्जरी फ्लैट तोहफे में दे डाला. इन धनी लोगों के पास देश की गरीब जनता के कल्याण के बारे में सोचने तक का समय नहीं है.

बौलीवुड के चमकते सितारे अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और अन्य सितारों ने इतना पैसा कमाया है कि वे करोड़ों रुपए अनावश्यक वस्तुएं खरीदने में खर्च करते हैं लेकिन वे देश के भूखे, गरीब व सड़कों पर सोने वाली जनता के कल्याण के बारे में नहीं सोचते. धनी आदमी आत्मकेंद्रित और स्वार्थी होते हैं जो अपने देश की गरीब जनता के कल्याण के बारे में नहीं सोचते. देश के लोगों में मन की एकाग्रता, संकल्पशीलता और प्रशिक्षण का अभाव है, इसलिए धनी आदमी धनी होता जा रहा है और गरीबी बढ़ती जा रही है.

देश को आजाद हुए 69 वर्ष हो गए. सभी राजनीतिक पार्टियां देश से गरीबी को हटाने का वादा करती रही हैं, लेकिन गरीबी तो नहीं हटी. हां, गरीब नेता रातोंरात अमीर जरूर बन रहे हैं. देश में भ्रष्टाचार और हर स्तर पर रिश्वत लेने का बोलबाला है. नेता मस्त है, जनता त्रस्त है. दुनिया की कुल गरीब जनसंख्या की 32.5 प्रतिशत गरीब जनता भारत में है.

सरकारी टैक्स वसूली

सरकार जनता की गाढ़ी कमाई से विभिन्न प्रकार के टैक्स वसूल कर सरकारी खर्चों में व्यर्थ बरबाद करती है जिस के कारण भी देश में गरीबी बढ़ रही है.

दुनिया के सभी देश अपनेअपने विकास में लगे हुए हैं. दुनिया में हर दिशा में विकास हो रहा है. मनुष्य भी निरंतर विकास करता जा रहा है. विकास के आधार पर हम विश्व के देशों को 3 भागों में बांट सकते हैं,  विकासशील राष्ट्र और विकसित राष्ट्र, अविकसित राष्ट्र. जहां अधिक कलकारखाने हैं वे उन्नतिशील यानी विकासशील राष्ट्र हो गए. विकसित राष्ट्रों में मानव जाति के लिए अनावश्यक बातें ज्यादा हैं. मनुष्य के लिए सब से आवश्यक है, रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, चिकित्सा आदि. वे राष्ट्र जिन के करोड़ों नागरिक दो वक्त खाने को तरसते हैं, वे अविकसित राष्ट्र हैं. विकसित राष्ट्र अरबों रुपयों के हथियार खरीद रहे हैं और ऐसे भवनों का निर्माण कर रहे हैं जिन की मानव को आवश्यकता नहीं है.

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विदेशों में अपेक्षाकृत गरीबी कम है. बैल्जियम में रहने वाले युवक से पता चला कि बैल्जियम की धरती पर कोई पहुंचे और वह रोटी, कपड़ा व मकान जैसी जरूरतों से वंचित रहे, यह वहां की सरकार को मंजूर नहीं. हमारी भारत सरकार भी ऐसी व्यवस्था कर दे तो कितनी अच्छी बात होगी. हमारी सरकार चांद पर पहुंचने की योजना बना रही है लेकिन मूलभूत समस्या गरीबी की है, उसे मिटाने की बात कम करती है.

सरकारी प्रशासन में उच्च पदों पर बैठे कुछ अफसरों और नेताओं में संकल्पशक्ति का अभाव है और वे अनैतिक कार्य कर के अरबों रुपयों का गबन कर के रातोंरात अमीर बन गए हैं. लेकिन वे गरीब जनता के बारे में बिलकुल नहीं सोचते.

उदाहरण के लिए बिहार में नए कुओं की खुदाई की योजना बनी थी. इस योजना के अंतर्गत एक हजार कुएं खोदे गए लेकिन वास्तव में एक भी कुआं नहीं खोदा गया, लेकिन पता चला कि सरकारी फाइलों में कुओं की खुदाई और खुदाई में लगे खर्च की रकम दर्ज हो चुकी है. यह अनैतिकता की पराकाष्ठा है. हमारी सरकार के प्रशासन में अफसर और नेता मानसिक एकाग्रता (नैतिकता) का प्रशिक्षण ले कर कार्यक्षेत्र में काम करें तो 5 क्या, 3 वर्षों में ही देश की गरीबी समाप्त हो सकती है.

इसराईल विवाद-2 : यहूदियों ने सहीं सदियों यातनाएं

दुनिया में अत्याचारों और उन के प्रतिकार संघर्ष के किस्से,  कहानियां तो सब ने बहुत सुनीपढ़ी होंगी, लेकिन क्या कोई  विश्वास करेगा  संसार में यहूदी कौम ऐसी है जिस ने एकदो सदी नहीं, बल्कि 3,500 सालों तक अत्याचार सहा है और अपने अदम्य साहस, संघर्ष, बलिदान के दम पर आज इसराईल देश के रूप में एक मिसाल कायम कर दी है. वह देश जिसे दुनिया में सब से स्वाभिमानी, सब से खतरनाक माना जाता है. जो कभी कुछ कहता नहीं, बल्कि कर के दिखाता है. वह ईंट का जवाब पत्थर से देता है.

यहूदियों के जीवट, अदम्य साहस, असंभव को संभव करने का जज्बा, दृढ़ इच्छाशक्ति और राष्ट्रप्रेम की परिणति है कि 14 मई, 1948 को यहूदियों का स्वतंत्र राष्ट्र कायम हुआ जो आज पूरी दुनिया के लिए उदाहरण बन गया है.

आक्रमक तेवरों का इसराईल इतना खतरनाक क्यों बना, इस की वजह उस के अतीत के संघर्ष की गाथाओं में छिपी है. हर राजवंश ने यहूदियों को उस की धरती से बारबार खदेड़ कर दरदर की ठोकरें खाने को मजबूर कर दिया. नरसंहार का क्रम तभी रुका जब स्वतंत्र इसराईल का अस्तित्व स्थापित हुआ.

याकूब के एक पुत्र कानाम यहूदा अथवा जूडा था. सो उस के वंशज यहूदी अथवा ज्यूज कहलाए. यहूदियों के अतीत की जानकारी उन के धर्मग्रंथों विशेष कर बाइबिल के पूर्वार्ध ओल्ड टैस्टामैंट से मिलती है. एक रोचक तथ्य देखें, येरुशलम 3 धर्मों यहूदी, ईसाई और इसलाम के उदय से जुड़ा है. इन तीनों धर्मों को संयुक्त रूप से इब्राहिमी धर्म भी कहा जाता है. इस का कारण इब्राहीम का तीनों धर्मों के मूल से जुड़ा होना है. अब्राहम को अपने क्रांतिकारी विचारों के कारण उर (सूमेरियन सभ्यता का प्राचीन नगर) से निर्वासित हो आजीवन संघर्ष झेलना पड़ा. उस के बाद हजरत मूसा यहूदियों के सब से महान स्मृतिकार हुए. उन्होंने 1500 ई.पू. में असीम कष्ट संघर्ष सहन कर टुकड़ों में बंटी यहूदी जाति, जो अत्याचार सहती आ रही थी, को मिला कर एक जगह फिलिस्तीन में बसा दिया.

यहूदी अब इसे अपनी मातृभूमि, अपना देश समझने लगे, जिसे इसराईल नाम दिया गया. कालांतर में हजरत दाऊद और उन के पुत्र सुलेमान के समय यहूदियों ने खूब तरक्की की. उन का व्यापार अरब, एशिया, अफ्रीका, यूरोप और भारत तक फैल गया.

937 ई.पू. सुलेमान की मृत्यु से यहूदियों के बुरे दिन फिर से शुरू हो गए. उन के मरते ही इसराईल और जूडा (यहूदा) फिर से बंट गए. जिन्हें 884 ई.पू. में उमरी नामक शासक ने मिल कर यहूदी एकता स्थापित की. उन की मृत्यु के बाद फिर आत्मघाती कलह शुरू हो गई.

722 ई.पू. में असीरिया ने यहूदियों की फूट का फायदा उठा कर उन की जगह पर कब्जा कर लिया. इस आक्रमण में हजारों यहूदियों का कत्लेआम हुआ. हजारों को बंदी बना कर असीमिया भेज दिया गया. कालांतर में यहूदी 610 ई.पू. में खल्दियों के अधीन आ गए.

ईरानी आधिपत्य

550 ई.पू. ईरान में हखमनी राजवंश सत्ता में आया और यहूदियों पर अब ईरानियों का आधिपत्य स्थापित हो गया. लेकिन ईरानी शासकों की उदारता रही जिस से यहूदियों ने इस कालखंड में खूब विकास उत्कर्ष किया. येरुशलम के नष्ट हुए मंदिर को फिर से बचाने की छूट व बंदियों को मुक्ति मिल गई. शताब्दियों बाद यहूदियों को खुशी का अवसर मिला जिस का दोनों फिरकों ने महत्त्व समझा. उसी समय यहूदी धर्म परिपक्व रूप से संकलित हुआ.politics

यूनानी अत्याचार

330 ई.पू. सिकंदर ने ईरान जीत कर हखमनी राजवंश का खात्मा कर दिया. उस के सेनापति टौलेमी प्रथम ने इसराईल और यहूदा पर अधिकार कर लिया. एक बार फिर 198 ई.पू. एंटीओकस चतुर्थ ने येरुशलम को लूट कर यहूदियों के शहर नेस्तनाबूद कर दिए. यहूदियों के प्रदेश यूनानी साम्राज्य में मिला दिए गए और मौत व जुल्म का तांडव शुरू हुआ. यहूदी धर्म पर प्रतिबंध लगा दिया गया. यूनानी देवताओं की पूजा जबरन शुरू कराई गई. 142 ई.पू. में एक यहूदी सेनापति साइमन ने यूनानी शासन से यहूदियों को मुक्ति दिलाई. यह आजादी 63 ई.पू. तक बनी रही.

रोमन सम्राटों के अत्याचार

66 ई.पू. में रोमन सेनापति पांपे ने येरुशलम सहित यहूदी प्रदेशों पर अधिकार स्थापित कर अत्याचारों की अमानवीय शृंखला शुरू की. हजारों यहूदी बंदी बनाए गए और 12,000 को मौत के घाट उतार दिया गया. अत्याचारों की इस कड़ी में 135 ई.पू. में रोमन सम्राट ने येरुशलम मंदिर को ध्वस्त कर, एकएक यहूदी को खोजखोज कर मार डालने का प्रयास किया. येरुशलम की जगह एक नया रोमन शहर बसाया गया जहां यहूदियों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित कर दिया गया. यहूदी फिर से दरदर की ठोकरें खाने लगे. समय ने पलटा खाया और पहले ईसाई सम्राट कोंटेसटाइन ने रोमन शहर का नाम फिर से येरुशलम कर दिया. छठी सदी तक यहूदी रोम तथा कालांतर में बेजेंटाइन साम्राज्य के अधीन रहे.

अरब और यहूदी

इसलाम के उदय के बाद अरबों ने रोमन साम्राज्य का खात्मा किया. तब फिलिस्तीन जिस में इसराईल और यहूदा शामिल थे, अरबों के अधीन आ गए. सुखद पहलू यह रहा कि खलीफा उमर ने यहूदी पैगंबर दाऊद का प्रार्थनास्थल यहूदियों को सौंप दिया. 1099 में ईसाइयों ने इसराईल पर कब्जा कर लिया. एक बार फिर से विध्वंस का दौर चला जिस में लाखों यहूदियों को जान से हाथ धोना पड़ा.

क्रूसेड यानी धर्मयुद्ध

1147 से 1204 तक ईसाइयों के स्वयंसेवकों, जिन में बच्चे भी शामिल थे, ने इसराईल को जीतने की कोशिश की जो धर्मयुद्ध कहलाया. यह संघर्ष लंबा चला लेकिन येरुशलम पर वे अधिकार स्थापित नहीं कर पाए.

मध्यकाल में मंगोल शासक हलाकू और समरकंद के तैमूर ने येरुशलम को नेस्तनाबूद कर दिया. हिंसा के तांडव को झेलते हुए यहूदी 19वीं सदी तक मिस्र और तुर्की के प्रभुत्व में रहे. प्रथम विश्वयुद्ध (1941-1918) के समय इसराईल तुर्कों के अधीन था.

स्वतंत्र इसराईल की नींव

तुर्की चूंकि मिस्र राष्ट्र के खिलाफ लड़ा था, इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की पराजय के बाद इसराईल पर ब्रिटेन का अधिकार कायम हो गया.

2 नवंबर, 1917 को ब्रिटिश विदेश मंत्री वालफोर ने ऐतिहासिक घोषणा की, ‘इसराईल को ब्रिटिश सरकार यहूदी राष्ट्र बनाना चाहती है, जिस में पूरी दुनिया से यहूदी आ कर बस सकते हैं.’ इस घोषणा के बाद पूरी दुनिया से यहूदियों का पलायन इसराईल में होने लगा.

होलोकास्ट – यहूदी नरसंहार

द्वितीय विश्वयुद्ध के पूर्वकाल में वह दौर शुरू हुआ जिस में जरमनी के नाजी तानाशाह हिटलर ने यहूदियों के संपूर्ण खात्मे का प्रयास किया. उस जुल्मोसितम की दास्तान से इतिहास भी शरमाता है. होलोकास्ट समूची यहूदी प्रजाति को जड़मूल से नष्ट करने का हिटलर का योजनाबद्ध कार्य था. वह जरमनी में जरमन जाति की श्रेष्ठता का नस्लवादी साम्राज्य स्थापित करना चाहता था. उस के विचार में यहूदी इंसानों की श्रेणी में नहीं थे, इसलिए उस की नफरत और हिंसा चरम पर जा पहुंची. हिसाब लगाया गया, यदि गोली मार कर यहूदियों का खात्मा किया तो यह बहुत खर्चीला काम होगा. इसलिए सस्ते उपाय खोजे गए ताकि कम लागत से यहूदियों की जान ले कर उन का नामोनिशान मिटाया जा सके.

1939 ई. में अंतिम हल (फाइनल सौल्यूशन) शुरू हुआ. इस में जहरीले गैस चैंबरों में हजारोंलाखों यहूदियों को जबरन ठूंस कर मारा जाने लगा. औस्विज ऐसा ही एक कुख्यात कत्लगाह कैंप था. अनुमान है कि उस दौर में लगभग 60 लाख यहूदियों को मौत के घाट उतारा गया. करीब एकतिहाई आबादी हिटलर के पागलपन का श्किर बनी. इस संगठित जनसंहार का प्रबंधन और कार्यप्रणाली मानव सभ्यता के लिए कलंक है. यहूदियों का दोष सिर्फ इतना था कि वे यहूदी पैदा हुए थे.

हिटलर को यहूदियों से नफरत के कारण

इस विषय पर इतिहास में अनेक व्याख्याएं मिलती हैं. धार्मिक, ऐतिहासिक, जातीय, नस्लभेद, मनोवैज्ञानिक व वैचारिक घृणा इस नृशंस कृत्य की वजह बने थे. हिटलर जरमन नस्ल की सर्वश्रेष्ठता स्थापित करने पर तुला था. उसे यहूदियों की काबिलीयत तथा उन का प्रभुत्व सहन नहीं था. वह यहूदियों को विश्वासघाती और प्रथम विश्वयुद्ध में जरमनी की पराजय का कारण मानता था.

विनाशकारी आर्थिक मंदी के समय जब जरमन नागरिक भूख से मर रहे थे तब यहूदी संपन्नता का जीवन जी रहे थे. हिटलर यह भूल गया कि यह उन की मेहनत, समर्पण का परिणाम था न कि उन का षड्यंत्र. ऐसा भी माना जाता है कि हिटलर के बचपन के अनुभव भी यहूदियों के प्रति घृणा के कारण बने. हिटलर के समय रूढि़वादी ऐंटी सिमिटिक विचारधारा लोकप्रिय थी जिस में जरमनी को हर बुराई या दुरावस्था का कारण यहूदियों को माना जाने लगा था. उन के नागरिक होने अथवा इंसान होने पर ही सवाल उठाए जाने लगे थे.

हिटलर का मानसिक संतुलन प्रथम विश्वयुद्ध के बाद हताश सिपाहियों की मनोदशा यहूदियों को षड्यंत्रकारी मानने लगी थी. इसलिए वह उन के खून का प्यासा बन गया. भीषण रक्तपात से उसे असीम सुकून मिलता था. जरमनी की कुल आबादी में यहूदी एक प्रतिशत भी नहीं थे, लेकिन उन का जरमनी में हर क्षेत्र में बोलबाला था. यही उन के पतन का कारण बन गया.

ऐन फ्रैंक 

यहूदी संघर्ष और हिटलर के अमानवीय जनसंहार की गाथा ऐन फ्रैंक नाम के उल्लेख के बिना अधूरी है. उस दौर के यहूदियों के दर्द, सहनशक्ति, प्रतिकार, अदम्य साहस की अनुभूति ऐन फ्रैंक से होती है. 12 जून, 1929 में फ्रैंकफर्ट में जन्मी ऐनेलीज मेरी फ्रैंक को 1933 में नाजी अत्याचारों के कारण अपने परिवार के साथ जरमनी छोड़ना पड़ा. एम्सटर्डम में शरण लेने के बाद नाजियों ने उन पर वहां भी जुल्म ढाए. उस का परिवार नाजियों के यातना शिविरों में मरखप गया. मरने से पूर्व उस ने एकएक कर अपने परिवार के सदस्यों को यातना शिविरों में दम तोड़ते देखा. यातना शिविरों के अत्याचारों को अपनी गुप्त डायरी में लिख कर छिपा दिया. यह 1947 में प्रकाशित हुई जिस ने तकरीबन 67 भाषाओं में अनुवाद होने तथा दुनिया में सब से ज्यादा पढ़ी जाने वाली रचना का गौरव हासिल किया. अंगरेजी में इसे ‘द डायरी औफ ए यंग गर्ल’ शीर्षक से छापा गया.

इस डायरी में उस के 12 जून, 1942 से 1 अगस्त, 1944 के बीच के घटनाक्रम का जिक्र है. इस से नाजीदल के भीषण अत्याचारों की जानकारी मिलती है. इस डायरी से प्रेरित हो कर साहित्य, फिल्म और कलाकृतियां निर्मित हुई हैं. वह होलोकास्ट की सब से जीवंत शिकार बन गई. वह उन 10 लाख यहूदी बच्चों में है जो हिटलर के पागलपन का शिकार हुए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इसराईल यात्रा से जहां एक ओर कूटनीति की नई इबारतें लिखी गई हैं वहीं इसराईल एक बार फिर से विश्व रंगमंच पर छा गया है. इसराईल के विषय में जिज्ञासा बढ़ गई है. यह सच है कि इसराईल दुनिया का एकमात्र राष्ट्र है जो अलगथलग हो कर भी अपने दम पर आतंकवाद के खिलाफ मिसाल बना हुआ है.

किराएदार : प्यारा या आफत, इसे कुछ इस तरह समझिए

छोटा शहर और बड़ा मकान. सासससुर रहे नहीं और दोनों बच्चे बाहर चले गए. बेटी अपनी ससुराल और बेटा आगे की पढ़ाई करने के लिए किसी दूसरे शहर या देश. पूरा घर सायंसायं करता है. और तो और घर की ठीक से साफसफाई भी नहीं हो पाती. रिटायरमैंट में अभी 5 साल बाकी हैं. इतने बड़े घर में रहते हुए सरोज को बड़ा अकेलापन महसूस होता था. दोनों पतिपत्नी आखिर करें तो क्या करें. दोनों हिस्सों के बीच पार्टीशन करवा लिया ताकि दोनों परिवारों की प्राइवेसी बनी रहे. घर के बाहर टू-लेट का बोर्ड टांगते ही किराएदारों की लाइन लग गई.

राजेश और सीमा भी मकान देखने आए थे. मकान तो खैर सभी को पहली ही नजर में पसंद आ जाता था मगर यह परिवार सरोज को भी पसंद आ गया था. खासकर सीमा की 8 माह की बिटिया ने सरोज को अपने मोहपाश में बांध लिया था. सबकुछ तय हो जाने के बाद 11 महीने के किराएनामे पर दोनों तरफ से हस्ताक्षर हुए और 4 दिन बाद ही राजेश अपनी छोटी सी फैमिली के साथ घर में पहले किराएदार के रूप में शिफ्ट हो गया.

सरोज की यों भी किसी के फटे में टांग अड़ाने की आदत नहीं थी, इसलिए सबकुछ बहुत सही चल रहा था. सीमा की तरफ से आती उस की बिटिया की किलकारी से घर में रौनक होने लगी. घर भी साफसुथरा रहने लगा और सब से बड़ी बात कि सरोज को कभीकभार दुलारने के लिए एक नन्ही साथी मिल गई थी.

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संबंधों का बेजा इस्तेमाल

एक दिन जैसे ही सरोज औफिस से आई, दरवाजे पर दस्तक हुई. देखा तो सीमा खड़ी थी अपनी बिटिया के साथ. ‘‘आंटी, मैं जरा बाजार तक हो कर आती हूं, आप प्लीज पीहू को रख लेंगी?’’

हालांकि सरोज का मन नहीं था, वह थकी होने के कारण आराम से बैठ कर पति के साथ चाय पीने के मूड में थी मगर शिष्टाचारवश मना नहीं कर सकी और पीहू को गोद में ले लिया. सरोज की पूरी शाम पीहू को संभालने में बीत गई. कहीं उस ने पानी बिखेरा तो कहीं शूशू किया. उस के चक्कर में सरोज रात का खाना भी नहीं बना सकी जिस से पति नाराज हुए सो अलग.

इस के बाद तो अकसर ही सीमा पीहू को उन्हें थमा कर सैरसपाटे पर, कभी पिक्चर तो कभी बाजार और सहेलियों के यहां जाने लगी. सरोज सीधीसादी महिला थी, कुछ कह नहीं सकी और किराएनामे के अनुसार, 11 महीने से पहले मकान खाली भी नहीं करवा सकती थी. धीरेधीरे सरोज को सीमा से मन ही मन डर लगने लगा. जब भी दरवाजे पर दस्तक होती, वह सहम उठती कि कहीं सीमा पीहू को न थमा दे. किराएदार सरोज के गले की हड्डी बन गए जिसे न उगलते बन रहा था, न निगलते.

लक्ष्मी की कहानी भी कोई अलग नहीं थी, पति के रिटायरमैंट के बाद अतिरिक्त आमदनी के विकल्प में उन्होंने अपने घर के 2 कमरे किराए पर दे दिए. उन्होंने कालेज स्टूडैंट्स को किराएदार के रूप में चुना ताकि मकान खाली करवाने में ज्यादा दिक्कत न आए. मगर देर रात तक आने वाली तेज म्यूजिक की आवाज ने उन की रातों की नींद हराम कर दी. आएदिन लड़के पार्टियां करते थे. कभीकभी शराबकबाब भी चलता था. और तो और, किराया भी टाइम पर नहीं मिलता था. ऐसे में उन्हें अपने फैसले पर पछतावा हो रहा था.

किराएदार सलमा का अनुभव तो सब से ही अलग था. हुआ यों कि सबकुछ देखभाल कर उस ने अपना खाली पड़ा मकान किराए पर दे दिया और खुद बेटे के पास रहने दिल्ली चली गई. किराया हर 6 माह का एडवांस देने की बात तय हुई थी. पहली छमाही के बाद जब वह अपने शहर किराया लेने और मकान को संभालने के उद्देश्य से गई तो किराएदार ने उन्हें यह कहते हुए खाली हाथ लौटा दिया कि मकान में काफी टूटफूट थी. मरम्मत और रंगरोगन करवाने में सारा किराया ऐडजस्ट हो गया. सलमा से कुछ भी कहते नहीं बना. उस ने अगले 6 महीने में उन्हें मकान खाली करवाने का नोटिस देने में ही भलाई समझी.

मगर ऐसा हमेशा नहीं होता कि किराएदार आफत का पिटारा ही होते हों. कई बार ये बहुत प्यारे भी होते हैं. मीनल कभी सावित्री देवी की किराएदार रही थीं. आज भी उन का रिश्ता फोन के माध्यम से जुड़ा हुआ है. मीनल ने एक बहू की तरह उन का खयाल रखा था तो सावित्री ने भी उसे नासमझ उम्र में बच्चे पालने सिखाए थे. मीनल के बच्चे आज भी उन्हें दादी कहते हैं.

सामंजस्य जरूरी

मीना बरसों से अपने मकान में पेइंग गेस्ट रखती आई है. वह सिर्फ कामकाजी महिलाओं और लड़कियों को ही रखती है. अपने उसूलों की पक्की मीना किराएनामे के नियमों में जरा भी लापरवाही या ढील बरदाश्त नहीं करती. साथ ही, वह अपनी तरफ से भी किसी को शिकायत का मौका नहीं देती. न तो किसी को ज्यादा मुंह लगाती है और न ही किसी को नजरअंदाज करती है. इसी का नतीजा है कि बरसों बाद भी जब वे किराएदार उस शहर में आती हैं तो मीना से मिले बिना नहीं जातीं.

मकान मालिक और किराएदार का रिश्ता बेहद नाजुक होता है. किराएदार को एक ऐसे मकान से लगाव रखना होता है जिसे छोड़ कर जाना निश्चित है. वहीं मकान मालिक को भी अपने खूनपसीने की कमाई से बना मकान ऐसे व्यक्ति को सौंपना होता है जिसे उस मकान से दिली लगाव नहीं होता. दोनों को ही एकदूसरे पर भरोसा करना होता है. तो ऐसा क्या करें कि दोनों के बीच टकराव की स्थिति न आए, मकान खाली करने के  बाद भी दिलों में जगह बनी रहे.

यदि आप मकान मालिक हैं

– अपनी और किराएदार दोनों की निजता का सम्मान करें यानी मकान का जो हिस्सा आप किराए पर देना चाहते हैं, कोशिश करें कि उस का प्रवेश आप के घर के अंदर से न हो, कमरे ऊपरी मंजिल पर हैं तो सीढि़यां बाहर से रखें और निचली मंजिल पर हों तो दोनों हिस्सों के बीच एक पार्टीशन अवश्य हो जो इन्हें एकदूसरे से अलग करता हो.

– अपनी प्राथमिकता तय करें कि आप मकान को किराए पर क्यों देना चाहते हैं. अकेलापन दूर करने के लिए, आय के अतिरिक्त स्रोत के लिए या फिर उस की देखभाल करवाने के लिए. किराएदार चुनते समय अपनी प्राथमिकता को ध्यान में रखें.

– किराए पर मकान देने से पहले सभी आपसी शर्तें तय कर लें कि आप उन से क्या चाहते और क्या नहीं चाहते हैं. उन पर स्वयं भी कायम रहें और किराएदार को भी पाबंद करें. सभी शर्तों को किराएनामे में दर्ज करें और दोनों पक्षों व गवाहों की उपस्थिति में किरायानामा पंजीकृत करवाएं.

– किराएदार से एक निश्चित दूरी बना कर रखें यानी न तो उस के व्यक्तिगत मामलों में आप हस्तक्षेप करें और न ही उसे ये अधिकार दें. महल्ले में यहांवहां पीठ पीछे उस की चुगली या बुराई न करें.

– सामान्य शिष्टाचार अवश्य निभाएं, जैसी हारीबीमारी में उस की मदद करें. सामाजिक और बड़े पारिवारिक समारोह में किराएदार को भी आमंत्रित करें. अत्यंत निजी समारोह में यह आवश्यक नहीं है.

– समयसमय पर किराएदार बदलते रहें वरना कई बार दबंग किस्म के लोगों से मकान खाली करवाना मुश्किल हो जाता है.

– किराएदार के बिजलीपानी आदि के कनैक्शन अलग रखें ताकि बिलों के भुगतान में कोई झंझट न हो.

– मकान के रखरखाव के बारे में पहले ही तय कर लें ताकि सलमा की तरह कड़वा अनुभव न हो.

– मकान देने से पहले ही किराएदार के संबंध में आवश्यक जानकारी जुटा लें. उस के पहचानपत्र की पड़ताल कर लें. आजकल तो पुलिस वैरिफिकेशन भी आवश्यक हो गया है.

– किराएदार से मोह का नहीं, स्नेह का रिश्ता रखें. उस से साफ कह दें कि आप को क्याक्या नापसंद है.

– कभीकभार किराएदार के साथ बैठ कर चाय पिएं.

– यदि किराएदार के बच्चे छोटे हैं तो उन से प्रेमभाव रखें, मगर उतना ही जितना आप की पर्सनललाइफ को डिस्टर्ब न करे.

– सभी सावधानियों के बाद भी यदि किराएदार से पटरी न बैठे तो किराएनामे के अनुसार नोटिस दे कर उस से मकान खाली करने को कह दें. मगर यहां भी इंसानियत के नाते, एक बार उस की भी अवश्य सुनें. यदि उसे कुछ समय की मुहलत चाहिए तो सहानुभूतिपूर्वक विचार करें.

यदि उपरोक्त इन बातों का खयाल रखेंगी तो आप का किराएदार प्यारा सा होगा, आफत का पिटारा नहीं.

मासूमों से हवस पूरी करने की घिनौनी प्रवृत्ति

उत्तर प्रदेश के उन्नाव में 62 साल के एक बुजुर्ग ने 7 साल की मासूम बच्ची को अपनी हवस की आग में झोंक दिया. यह बुजुर्ग अपनी वासना की पूर्ति के लिए उस बच्ची को अश्लील फिल्में दिखाता था. बच्ची के मना करने पर उसे जान से मारने की धमकी दे कर डराता रहता था. घटना 2 नवंबर, 2017 की है. इस से पहले भी वह इस बच्ची को बहलाफुसला कर अपने घर ले जा चुका था.

इस बार उस ने बच्ची के साथ दुष्कर्म किया तो मां को बच्ची की सहमी हालत देख कर शक हुआ. बहुत पूछने पर बच्ची ने मां को सच बताया तो उस के पैरों तले जमीन ही खिसक गई. जब मां ने पुलिस थाने में शिकायत दर्ज कराई तब जा कर बुजुर्ग की असलियत खुली.

नवंबर माह में ही हाथरस के शिक्षक ने भी 7 साल की मासूम लड़की, जोकि उस के पास ट्यूशन पढ़ने आई, को अपनी हवस का शिकार बना डाला.

गुरुशिष्य के रिश्ते को तारतार करने वाली ऐसी घटना और पड़ोसी बुजुर्ग की हरकत बताती हैं कि मासूमों से हवस पूरी करने की घिनौनी प्रवृत्ति कम नहीं हो रही है. एक शिक्षक जब ऐसी करतूत करता है तो यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे यौन अपराध सिर्फ अशिक्षित व निम्नवर्गीय तबकों में ही नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग में होते हैं. बच्चों को ऐसे हैवानों से बचाने के लिए कानूनी उपायों के अलावा आम लोगों को जागरूक होना पड़ेगा.

ये भी हैं शिकार

मशहूर सितारवादक अनुष्का शंकर भी बचपन में बाल यौनशोषण की शिकार हुई थीं. बकौल अनुष्का शंकर, ‘‘मैं बचपन में छेड़छाड़ व विभिन्न प्रकार के शारीरिक शोषण का शिकार हुई. मुझे नहीं पता था, इस से किस प्रकार निबटना है. मुझे नहीं पता था कि इसे कैसे रोका जा सकता था. बतौर महिला, मुझे लगता है कि मैं ज्यादातर समय भय के साए में रहती हूं, रात में अकेले बाहर निकलने में डरती हूं, घड़ी का समय पूछने वाले व्यक्ति को जवाब देने में डरती हूं. इसी प्रकार की तमाम अन्य बातें हैं जिन से मुझे डर लगता है.’’

महिला अधिकारों के लिए खुल कर बोलने वाली अभिनेत्री कल्कि कोचलिन ने भी अपने बचपन के दुखद हिस्से को बयान किया. एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वे अपनी कहानी सुना कर सुर्खियां नहीं बटोरना चाहती थीं. यह तो उन के जीवन की सचाई है और उन्होंने इसे लंबे वक्त तक झेला है.

टैलीविजन की मशहूर हस्ती ओपरा विनफ्रे को भावुक इंटरव्यू लेने के लिए जाना जाता है. लेकिन डेविड लैटरमैन के शो में जब वे पहुंचीं तो उन की जिंदगी के बारे में जान कर लोगों की आंखें भर आईं. ओपरा का 9 साल की उम्र में एक रिश्तेदार ने बलात्कार किया. 10 से 14 वर्ष की उम्र तक उन का शोषण होता रहा.

ये मशहूर हस्तियां हैं जिन को हम सभी जानते हैं, ये गिनेचुने नाम ही हैं. कुछ ही लोग खुल कर कह पाते हैं लेकिन ज्यादातर लोग अपने इस दर्द को कह नहीं पाते. वे शर्मिंदगी के साथ जीवन जीते रहते हैं. हालांकि दोष उन का नहीं, फिर भी वे अपने साथ हुई घटना में खुद को अपराधियों की तरह महसूस करते हैं. दरअसल, हमारा समाज, हमारी मानसिकता ऐसी हो गई है कि हम उन्हें हेयदृष्टि से देखने लगते हैं, बातें बनाते हैं. हम ऐसे लोगों को समाज की मुख्यधारा से जुड़ने का अधिकार क्यों छीन लेते हैं.

स्कूल व परिवार

परिवार वाले अपने बच्चों के साथ घटने वाली यौनशोषण की घटनाओं को छिपा लेते हैं और बच्चों के ऊपर ही पहरा सा लगा देते हैं जिस कारण बच्चा उन चिंताओं से उबर ही नहीं पाता. सभ्य समाज का हिस्सा होते हुए भी हमारे नौनिहाल अपनों से ही सुरक्षित नहीं. जिन शिक्षण संस्थानों में बच्चों को भविष्य निर्माण के लिए भेजा जाता है उन शिक्षण संस्थानों में भी वे अब सुरक्षित नहीं हैं.

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के मुताबिक, बीते 3 सालों में स्कूलों के भीतर बच्चों के साथ होने वाली शारीरिक प्रताड़ना, यौनशोषण, दुर्व्यवहार और हत्या जैसी घटनाओं में तीनगुना बढ़ोतरी हुई है. शिक्षकों और स्कूल कर्मचारियों द्वारा ही बच्चों के उत्पीड़न की घटनाएं पिछले कुछ सालों में काफी बढ़ी हैं. बाल सुरक्षा एक्ट 2012 के अस्तित्व में आने के बाद ऐसे मामले ज्यादा सामने आए हैं.

एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, अमूमन बाल यौनशोषण व लड़कियों के साथ होने वाली यौनहिंसा में 90 प्रतिशत पहचान वालों के जरिए ही ये अपराध अंजाम पाए जाते हैं. यानी सब से ज्यादा अपने बच्चों को सुरक्षा अपनों से देनी है. कितनी अजीब बात है न कि जिन अपनों पर हम आंख मूंद कर विश्वास करते हैं वे ही इस तरह की चोट दे जाते जो जिंदगीभर सालती रहती है.

सवाल यह उठता है कि छोटे बच्चों को हम किस तरह से समझाएं कि उन के कोमल मन पर हमेशा दुश्चिंताएं न शामिल हों या कोमल मन में कोई ऐसा प्रभाव न पड़े कि वे डरेसहमे रहें और उन के नैसर्गिक विकास में कोई प्रभाव पड़े.

अपने बच्चों को एक मां बेहतर तरीके से समझा सकती है कि गुड टच और बैड टच क्या होता है. अगर कोई उन को छूता है, तो वह छुअन बुरी भी होती है. उस से कैसे बचें, छोटे बच्चों को उन के शारीरिक संरचना के जरिए समझाया जा सकता है कि मम्मी के अलावा कोई दूसरा उन के शरीर के कोमल अंगों को हाथ नहीं लगा सकता और न वे ही किसी दूसरे को गलती से या खेल में यहां छू सकते हैं.

अकसर घर के बड़े सदस्य बच्चों की बातें नहीं सुनते हैं. छोटे बच्चों से संवाद बेहद जरूरी है. वे स्कूल में क्या पढ़ते हैं? कौन सी टीचर या सर उन के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? किस के साथ खेलतेकूदते हैं आदि ये सब बातें बच्चों से रोजाना पूछनी हैं. बच्चा चाव से अपनी बातें बताना चाहता है लेकिन अकसर पेरैंट्स उन्हें या तो खेलने के लिए कह देते हैं या चुप रहने को कह देते हैं. कहने का अर्थ सिर्फ इतना है कि अपने बच्चों से संवाद बनाए रखिए ताकि वे अपने साथ घटित सभी बातें बताएं.

खुद करें पहल

बच्चों से अपने उन रिश्तेदारों को दूर रखिए, बच्चे जिन्हें पसंद नहीं करते. अकसर हम देखते हैं कुछ परिचित बच्चों को चूमना, कस के पकड़ना या फिर उन के गालों को चिकोटी काटते हैं. हमारी नजर में वह उन के प्यार जताने का तरीका है लेकिन बच्चे अच्छी बुरी छुअन को महसूस कर लेते हैं. अगर बच्चा पसंद नहीं करता है ये सब, तो अपने परिचित को रोकिए. अपने बच्चे के दिल को पढ़ना सीखिए.

आप का बच्चा अगर दैनिक क्रियाकलाप से हट कर कोई व्यवहार करता है, ज्यादा चुप है, अपने किसी अंग में दर्द बता रहा है या रात में चौंक रहा है, किसी खास परिचित को देख के सहम रहा है तो तुरंत उस का मन टटोलिए. कहीं कुछ अनचाही घटना घटित न हुई हो. कुछ भी अप्रिय किसी परिचित या अनजाने से भी हुआ है तो पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराइए. लोकलाज का भय या बच्चे को गलत न समझिए. बच्चे को घर में बंद कर देना, उस को ही डांटना गलत होगा. कोमल मन ने वैसे ही बहुतकुछ सहा है, उस पर उसी को अपराधियों की तरह जिंदगी जीने के लिए मजबूर करना अन्यायपूर्ण होगा. साथ ही, बच्चे की काउंसलिंग भी कराइए. पारिवारिक प्यार के साथ उस के मन पर पड़े घाव को काउंसलर की भी जरूरत होती है जो उस के बालमन पर पड़ी चोट के दबाव को हटा कर जिंदगी की तरफ मोड़ सके.

अपनी सुरक्षा बच्चे स्वयं कर सकें, इस के लिए उन्हें मूलभूत बातों को बताएं, उन्हें समझाएं. हो सके तो सैल्फ डिफैंस के लिए मार्शल आर्ट भी सिखाएं. मजबूत मन के साथ एक मजबूत तन की भी जरूरत है. इसलिए, जरूरी है बच्चों को नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाए. उन्हें वह शिक्षा दी जाए कि वे मजबूत किरदार व एक आदर्श इंसान बनें.

भारी भारी रात

कितनी तनहा, कितनी कातिल

गुजरी अपनी सारी रात

टूटे सपने, भीगी पलकें

बीती भारीभारी रात

याद तुम्हारी बनी ब्याहता

लेटी रही संग मेरे

फिर भी मुझे रही सताती

मादक बदन, कुंआरी रात

बिना तुम्हारे यौवन रोया

संयम ने ताने मारे

चटक चांदनी रही चिढ़ाती

रोई प्यारीप्यारी रात

एक प्रश्न का हल तलाशते

बीत गया था दिन सारा

अब न पूछना, हाय, किस तरह

मैं ने यहां गुजारी रात.

– सूर्यकुमार पांडेय

कांग्रेस का पथ : गुजरात चुनाव के बाद मिलते स्पष्ट संकेत

गुजरात में कांग्रेस का भारतीय जनता पार्टी को भारी चुनौती देने में सफलता पा लेने और बाद के कई उपचुनावों के परिणामों से स्पष्ट है कि देश को अगर एक पार्टी की तानाशाही से बचाना है तो सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ बाकी पार्टियों को एकसाथ मिल कर काम करना होगा. यह आसान नहीं है क्योंकि ‘फूट डालो राज करो’ की हिंदू संस्कृति हमारी रगरग में भरी है और इस का परिणाम हम सदियों से भुगत रहे हैं.

देश की उन्नति के लिए जरूरी है कि पूरा देश एक सोच के साथ निर्माण के कार्य में लगे और जाति, वर्ण, धर्म, भाषा और संस्कृति के भेदभावों को भुला दे. भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह 2014 में एक स्वच्छ, विकास को समर्पित सरकार का रोडमैप पेश किया था, वह आकर्षक था पर अब पता चल रहा है कि कथनी और करनी में बहुत अंतर है. देश को भ्रष्टाचारमुक्त शासन तो नहीं मिला, ऊपर से धार्मिक अनाचारयुक्त शासन पल्ले में मिल गया है.

देशभर में आज विध्वंसक बातें हो रही हैं. कहीं गाय के नाम पर हत्याएं हो रही हैं, कोई कभी पद्मावती के नाम पर तो कोई लव जिहाद का नाम ले कर उत्पात मचा रहा है. कोई संविधान बदलने की बात कर रहा है. कभी लोगों की नकदी पर हमला हो रहा है तो कहीं चुनाव जीतने के घिनौने हथकंडे अपनाए जा रहे हैं. देश बिखर सा रहा है. अर्थव्यवस्था में स्थायित्व की बात है ही नहीं.

देश की आंतरिक नीतियां हों या विदेश नीति, कभी उत्तर की ओर दौड़ती है तो कभी दक्षिण की ओर. कभी पाकिस्तान व चीन हमारे गहरे दोस्त बन जाते हैं तो कभी शत्रु. कभी नई तकनीक की बुलेट ट्रेनों की बात होती है तो कभी रामसीता की विशाल मूर्तियों को विकास की गोली बताया जाता है.

इस का दोष देश की विपक्षी पार्टियों को जाता है कि वे सत्तारूढ़ पार्टी को इस तरह कठघरे में नहीं खड़ा कर पा रही हैं जैसे भारतीय जनता पार्टी ने 2010 और 2014 के बीच कांग्रेस को खड़ा किया था. विनोद राय जैसे भाजपा मित्र कंप्ट्रोलर ऐंड औडिटर जनरल (सीएजी) की सहायता से भाजपा ने सफलतापूर्वक कांग्रेस को कोयले और 2जी स्पैक्ट्रम घोटालों से पोत दिया था. दूसरी पार्टियां तब भाजपा का खुल कर साथ दे रही थीं.

कांग्रेस ने गुजरात में हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी व अल्पेश ठाकोर के साथ समझौता कर के सफल सा प्रयास किया पर बाद में वह इसे भुला सा रही है. वह काम उसे हर शहर में, हर उपचुनाव में, हर राज्य के चुनावों में करना होगा. कांग्रेस को अपनी 70 साल तक राज करने की अकड़ छोड़ कर, छोटी पार्टियों व छोटे गुटों को साथ ले कर चलना होगा ताकि भगवाई संकीर्णवादी सोच के खतरे से देश को निकाला जा सके.

देश का विकास अपनी छाती पीटने से या राजपथ पर योग करने से नहीं होगा, यह कारखानों, खेतों, बैंकों, दफ्तरों, बाजारों, विश्वविद्यालयों, रेलों व हवाईअड्डों को ढंग से चलाने से होगा. अगर हर जगह पूजापाठ का आलम रहेगा तो देश हमेशा की तरह फिसड्डी रहेगा.

मानवीय मामलों में राजनीति के आखिर क्या है मायने

पाकिस्तान ने गुप्तचरी के आरोप में पकड़े भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को 25 दिसंबर को मां अवंती जाधव व पत्नी चैतन्य जाधव से मिलने तो दिया पर शीशे की दीवार के पीछे और केवल टैलीफोन से बात कर के. सारी बात रिकौर्ड भी की गई और सुनी भी गई. कमरे में जाने से पहले मां व पत्नी के कपड़े बदलवाए गए, आभूषण उतरवाए गए और जूते तक निकलवाए गए. भारत में इस पर गंभीर आपत्ति की जा रही है.

हमारी आपत्ति तो सही है पर यह अब एक स्टैंडर्ड व्यवस्था है जो दुनियाभर में जासूसों व अपराधियों के साथ की जाती है. पाकिस्तान ने चाहे कितनी ही अति की हो, कुलभषण जाधव को सजा दे कर वह अपने कानूनों के अनुसार तो यह हक रखता है. अंतर्राष्ट्रीय कानून भी इस बारे में देशों को छूट देता है और अमेरिका जैसे लोकतंत्र में भी देशीविदेशी अपराधियों, खासतौर पर गुप्तचरों के साथ ऐसा ही किया जाता है.

इस प्रक्रिया को असल में सामान्य मानना चाहिए और व्यर्थ में पाकिस्तान विरोधी माहौल नहीं बनाना चाहिए. भारत सरकार आजकल चीन और पाकिस्तान का राजनीतिक उपयोग उसी तरह करने लगी है जैसे एक जमाने में इंदिरा गांधी ने हर मामले में विदेशी हाथ को कोसना शुरू कर दिया था. खालिस्तान समस्या की जड़ भी पाकिस्तान को घोषित कर दिया गया था जबकि उस का हल अंत में ब्लूस्टार औपरेशन व राजीव गांधी-संत लोगोंवाल समझौते से हुआ था.

जासूसी कांडों में अगर अपने जासूस को वापस लाना हो तो जासूसों की अदलाबदली होती है. पर इस मामले में अगर यह प्रक्रिया चल रही हो तो अभी तक सामने नहीं आई है. भारत ने घोषित रूप से किसी पाकिस्तानी जासूस को नहीं पकड़ रखा है जबकि नरेंद्र मोदी तो मणिशंकर अय्यर और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर तीरतुक्का लगाते हुए गुजरात चुनाव में फायदा उठाने के मकसद से गुप्तचरी का सा आरोप लगा चुके हैं. अगर ऐसे हालात में हमारे पास कोई पाकिस्तानी कुलभूषण जाधव नहीं है तो यह हमारी असफलता की निशानी है. पाकिस्तानी जासूस यहां नहीं होंगे, यह तो नहीं माना जा सकता.

मानवीय मामलों में राजनीति जितनी कम हो उतना अच्छा है. संवेदनशील मामलों को सैंसेशनल बनाने की इलैक्ट्रौनिक मीडिया की आदत देश की मानसिकता में जहर घोल रही है. कुलभूषण जाधव अब तक ठीकठाक है, यही गनीमत समझी जानी चाहिए.

आपके इस दवाब से कहीं भ्रष्ट न हो जाए बचपन

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के एक नामी विद्यालय में विज्ञान की परीक्षा चल रही थी. विद्यार्थियों के निरीक्षण करने के कार्य पर तैनात वरिष्ठ अध्यापिका ने देखा कि एक छात्रा पांव की तरफ पड़े अपने कुरते का सिरा बारबार उठाती है और फिर ठीक कर देती है. पीछे से उस के करीब जा कर अनुभवी अध्यापिका ने तिरछी नजर से देखा, तो पाया कि सफेद कुरते के उस सिरे के पीछे कुछ फार्मूले लिखे थे.

अध्यापिका ने चपरासी से कैंची मंगवाई और कुरते के उस सिरे को काट कर अपने पास रख लिया और छात्रा से कहा कि कल अपने अभिभावक को ले कर स्कूल आना, तभी परीक्षा में बैठने दिया जाएगा.

हालांकि अध्यापिका चाहती तो परीक्षा में नकल करते हुए उस लड़की को रंगेहाथों पकड़ कर रस्टीकेट करने यानी परीक्षा कक्ष से निकालने की प्रक्रिया अपना सकती थी, लेकिन छात्रा के भविष्य और उस की कोमल भावनाओं को देखते हुए उन्होंने ऐसा नहीं किया.

परीक्षा क्यों

परीक्षा प्रणाली का अर्थ है कि छात्र अपने अध्ययन के प्रति संजीदा हों. वर्षभर जो पाठ्यक्रम उन्हें पढ़ाया गया है, उस से उन्होंने कितना सीखा है, परीक्षा से इस का आकलन हो जाता है. छात्र कठिन परिश्रम व अपनी कुक्षाग्रता के आधार पर परीक्षा में अंक प्राप्त कर अपनी श्रेष्ठता सिद्घ करें, न कि नकल कर के.

‘योर स्कूल एज चाइल्ड’ के लेखक लारेंस कुटनर अमेरिका में एक सर्वेक्षण का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि तकरीबन 70 प्रतिशत छात्रों ने माना है कि उन्होंने अपने हाईस्कूल तक के स्कूली सफर में कभी न कभी नकल की है.

नकल क्यों करते हैं बच्चे

गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस युग में जो बच्चे आगे दौड़ते हैं वे ही जीवन के शिखर तक पहुंच सकते हैं, जबकि प्रतिस्पर्धा में फिसड्डी रहने वाले बच्चों का कैरियर अनिश्चित रहता है. इसलिए आज का छात्र आरंभ से ही यह समझता है कि यदि उसे जीवन में ऊंचाई प्राप्त करनी है तो प्रतिस्पर्धा में सब से, आगे रहना है. ये बातें घर में सोतेबैठते व खाते हर समय मातापिता द्वारा उस से दोहराई जाती हैं.

छात्र जीवन उम्र का ऐसा पड़ाव होता है जहां एकाग्रता केवल लक्ष्य प्राप्त करने की ही होती है. ऐसे में नैतिकता, आदर्श, ईमानदारी आदि पढ़ाए गए पाठ गौण हो जाते हैं. छात्र लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कोई भी मार्ग अपना सकता है फिर चाहे वह नकल करना हो या कोई और.

किसी भी तरह से ज्यादा अंक हासिल करने की होड़ से एक खामोश संदेश यह मिल रहा है कि नकल ऐसे की जाए कि पकड़े न जा सकें और जो न पकड़ा गया वह औरों से आगे निकल गया. अनेक छात्रों में यह धारणा बनी हुई है कि इस खामोश संदेश के विरुद्ध जाना यानी नकल न करने में नंबर कम हो जाएंगे और तब पछतावा होगा. वहीं जो मातापिता इस का विरोध करते हैं उन्हें दाकियानूसी करार दिया जाता है.

बच्चे देश के भविष्य हैं

देश में भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है. जिस को जहां मौका मिल रहा है अपना घर भरने की सोच रहा है. लालची लोगों ने देश के विकास में बाधाएं डाली हैं.

ऐसे माहौल में स्कूलों और अभिभावकों का यह नैतिक दायित्व है कि वे बच्चों को आरंभ से ही नैतिक और राष्ट्र को सर्वोपरि मान कर कार्य करने का पाठ पढ़ाएं. परीक्षा में जो बच्चे नकल करते हैं या शौर्टकट अपनाते है उन पर विशेष ध्यान दें और उन के प्रति सुधार के कार्य करें. क्योंकि जो आज स्कूल जा रहे हैं, कल वे ही देश को चलाएंगे.

बालमन पढ़ें अभिभावक

बच्चों की सब से बड़ी पाठशाला उस का घर होती है. मातापिता का दायित्व है कि वे कारण ढूंढ़ें कि बच्चे ने नकल करने का अपराध क्यों किया. ऐसा हो सकता है कि कुछ और समस्याएं रही हों जिन के कारण बच्चे पर मानसिक दबाव पड़ रहा है और वह स्वतंत्र मानस से अध्ययन नहीं कर पा रहा है. यदि ऐसा है तो मातापिता उस दबाव को दूर करने का प्रयास करें ताकि विद्यार्थी स्वतंत्र मानस से अध्ययन के प्रति निष्ठावान हो जाए और परीक्षा में नकल करने की नौबत न आए.

बच्चे पर कभी भी दबाव न डालें कि वह अमुक बच्चे की तरह अच्छे ग्रेड लाए या अपनी कक्षा या स्कूल में टौप करे. कई बार परीक्षा में नकल करने का कारण अच्छा ग्रेड लाना या अमुक बच्चे से अधिक अंक लाना या टौप करना भी होता है, जिस के लिए बच्चे के मातापिता उस पर जोर डालते रहते हैं. अभिभावकों को चाहिए कि विद्यार्थी को मानसिक दबाव से मुक्ति दिलाने के लिए उसे ऐसे खेल खेलने की सलाह दें जिन में प्रतिस्पर्धा का दबाव न हो.

अनैतिक आचरण न अपनाएं

अभिभावक बच्चों के समक्ष सदैव आदर्श प्रस्तुत करें, क्योंकि मातापिता द्वारा किए जा रहे कार्यों का बच्चों की कोमल मानसिकता पर सीधा प्र्रभाव पड़ता है और वे उस का अनुसरण करने लगते हैं. यदि माता या पिता टैक्स बचा कर परिवार में यह कहते हैं कि सरकार को फालतू पैसा देने का क्या फायदा है, तो उन के इस प्रकार के आचरण का छात्र पर बुरा असर पड़ता है, जबकि अभिभावक को परिवार में यही कहना चाहिए कि टैक्स बचाना एक चोरी है और इसे कभी नहीं करना चाहिए.

अभिभावकों की जिम्मेदारी

दिल्ली के एक प्रतिष्ठित सीनियर सैकंडरी स्कूल के प्रिंसिपल बताते हैं कि नकल करते पकड़े गए छात्रों के अभिभावकों को बुलाया जाता है और उन्हें सलाह दी जाती है कि वे अपने बच्चों को घर में अच्छी नैतिक व आदर्श शिक्षा दें ताकि बच्चा जीवन में कभी भी गलत हथकंडा न अपनाए. वे बताते हैं कि अभिभावक बहुत शर्मिंदा होते हैं. और दुखी हो कर बच्चे को भविष्य में इस तरह उन्हें बुलाने की नौबत न आने के लिए बच्चे को समझाते हैं.

कभीकभी अभिभावक इतने क्रोधित हो जाते हैं कि बच्चों पर वहीं हाथ छोड़ देते हैं या फिर घर जा कर उस की बुरी तरह पिटाई करते हैं.

बच्चा इतना तेज होता है कि वह पहले से ही अपनी मां को समझा कर आता है कि फलां अध्यापक मुझ से जलता है और मेरे बगल की सीट में बैठा बच्चा नकल कर रहा था उसे छोड़ दिया जबकि मैं नकल नहीं कर रहा था मुझे पकड़ लिया. ऐसे अभिभावक अपने बच्चे का खुल कर पक्ष लेते हैं और अध्यापक को आड़े हाथों लेते हैं.

क्या आप जानते हैं : चुकंदर में छिपा है सेहत का खजाना

किसी को खून की कमी होती है, तो सभी उसे चुकंदर खाने को कहते हैं. चुकंदर में अनेक गुण होते हैं. चुकंदर को जब काटा या छीला जाता है तो अंदर से लाल या गुलाबी रंग का रस निकलता है.

चुकंदर में अच्छी मात्रा में लौह, विटामिन और खनिज होते हैं जो खून बढ़ाने और साफ करने के काम में मददगार होते हैं. इस में पाए जाने वाले एंटीऔक्सीडैंट तत्त्व शरीर को रोगों से लड़ने की क्षमता प्रदान करते हैं. यह प्राकृतिक शर्करा का खजाना होता है. इस में सोडियम, पोटैशियम फास्फोरस, क्लोरीन, आयोडीन और अन्य महत्त्वपूर्ण विटामिन पाए जाते हैं. चुकंदर में गुरदे और लिवर को साफ करने के प्राकृतिक गुण हैं.

इस में उपस्थित पोटैशियम शरीर को प्रतिदिन पोषण प्रदान करने में मदद करता है तो वहीं क्लोरीन गुरदों के शोधन में मदद करता है. यह हाजमा संबंधी समस्याओं जैसे उलटी, दस्त, चक्कर आदि में लाभदायक होता है. चुकंदर का रस पीने से खून की कमी दूर हो जाती है क्योंकि इस में लौह भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. चुकंदर का रस हाइपरटैंशन और हृदय संबंधी समस्याओं को दूर रखता है, खासतौर से महिलाओं के लिए यह बहुत लाभकारी है.

चुकंदर में बेटेन नामक तत्त्व पाया जाता है, आंत व पेट को साफ करने के लिए शरीर को इस की आवश्यकता होती है और चुकंदर में उपस्थित यह तत्त्व उस की भरपाई करता है. कई शोधों के अनुसार, चुकंदर कैंसर में भी लाभदायक होता है. चुकंदर और उस के पत्ते फोलेट का अच्छा स्रोत होते हैं, जो उच्च रक्तचाप और अल्जाइमर यानी भूलने की बीमारी को दूर करने में सहायक होते हैं.

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