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Best Hindi Story : आवारा बादल – शिखा के बर्ताव में क्यों आया बदलाव ?

Best Hindi Story : ‘जब मैं बादल बन जाऊं, तुम बारिश बन जाना.  जो कम पड़ जाएं सांसें, मेरा दिल बन जाना.’

एक गाने की इन पंक्तियों को गाते हुए सुरेंद्र शिखा के बालों में उंगलियां फंसाता है और शरारती नजरों के साथ उस को को छेड़ता है.

“हटो जी, आज क्या सूझी है तुम्हें जो तुम यों गाना गा रहे हो? कुछ अपनी उम्र का भी खयाल रखो. तुम कालेज वाले लड़के नहीं रहे, 2 बच्चों के पिता बन चुके हो.”  शिखा ने सुरेंद्र के हाथों को अपने बालों से हटाते कहा.

सुरेंद्र और शिखा जवानी की दहलीज पार कर चुके थे और अधेड़ उम्र में ही बुढ़ापा हौले से अपनी आमद का एहसास कराने लगा था. उन के एक बेटा और एक बेटी थी. दोनों बच्चों से उन की दुनिया गुलजार थी.  सुरेंद्र रांची यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर था और अभी दोतीन वर्ष ही हुए थे यहां ट्रांसफर हुए.  इस कारण दोनों पतिपत्नी रांची में ही रहते थे.

आज रविवार की छुट्टी थी तो सुरेंद्र शिखा को अपनी चुहलबाजियों से परेशान कर रहा था और शिखा का चेहरा देख मुसकरा रहा था. “यह गाना न गाऊं तो फिर क्या गाऊं,  बीते जमाने वाला-ऐ मेरी जोहरा जबीं, तुझे मालूम नहीं…,” यह गुनगुनाते हुए सुरेंद्र हंसने लगता है.

“सुबहसुबह तुम सठिया गए हो,”  कहते हुए शिखा चाय बनाने के लिए उठने लगी. मगर सुरेंद्र ने उसे खींच कर पास बिठा लिया.

“ओफ्फो, जब देखो तब किचन में जाने को तैयार रहती है. आज मेरी छुट्टी है और साथ में घर के काम से तुम्हारी भी छुट्टी. आज कामवाली को भी फोन कर के न आने का कह दो. संडे उस की भी छुट्टी,”  सुरेंद्र ने कहा.

“छुट्टी, और वह भी मेरी, आज तक मुझे गृहस्थी और अपनी जिम्मेदारियों से छुट्टी नहीं मिली,” शिखा मुंह बनाती है.

“इसलिए आज छुट्टी और आगे भी हम छुट्टियां मनाएंगे,”  सुरेंद्र ने कहा.

“क्यों जी, आज तुम्हारा लहजा इतना बदलाबदला सा क्यों है,  आखिर इरादा क्या है?”  शिखा सुरेंद्र की आंखों में झांकती है.

“इरादा तो नेक है,”  सुरेंद्र शरारती अंदाज में हंसते हुए आगे कहता है, “आज से हम अपनी जिंदगी को जीने की शुरुआत करेंगे और इस के लिए कोई बहानेबाजी नहीं चलेगी.  देखो न शिखा, अपनीअपनी जिम्मेदारियों को निभाते हम दोनों एकदूसरे के साथ सिर्फ फौर्मल लाइफ ही जी पाए हैं.  तुम्हें भी तो मुझ से कितनी शिकायतें रहती थीं.”

सुरेंद्र की बात सुन कर शिखा अपने बीते वर्षों में चली जाती है.  नईनई शादी हुई थी उस की और वह भी संयुक्त परिवार में.  सुरेंद्र तब दूसरे शहर में कालेज में पढ़ाता था और वहीं रहता था दोतीन दोस्तों के साथ रूम शेयर कर के. वह छुट्टियों में घर आता था.  ऐसे में शिखा नईनवेली दुलहन हो कर भी परिवार के बीच जिम्मेदार बहू बन कर रह गई. फिर उस के बाद बच्चों को पालने से ले कर खुद को सैट करने तक अपनीअपनी जिम्मेदारियों को निभाते हुए इन दोनों ने अपने दांपत्य सैटलमैंट को पीछे छोड़ दिया था.

“कहां खो गईं, कहीं शिकायतों का पिटारा तो नहीं खुलने लगा?”

सुरेंद्र की आवाज पर शिखा की तंद्रा टूटती है और वह वर्तमान में लौट आती है.

“जब हमारी उम्र बिंदास जीने की थी तब तो सिर्फ जिम्मेदारियां दिखी तुम्हें और अब? अब अपने पेट और बाल को देखो, बुढ़ापे की दस्तक दे रहे हैं. अब क्या आंखें चार करोगे? मोटे पावर के इस चश्मे से तुम्हारी आंखें कब से चार की गिनती करवा रही हैं,” शिखा की बातों में कटाक्ष का अंश था.

“मानता हूं, शिखा. मैं तुम्हें समय पर वह प्यारभरा साथ नहीं दे पाया, कभी तुम्हें हनीमून पर नहीं ले गया,  कभी तुम्हारे साथ क्वालिटी टाइम नहीं बिताया, लेकिन मेरी लाचारी को समझो,” सुरेंद्र अब गंभीर हो चला था, आगे बोला, “वह बात तो सुनी है न, जब जागो तभी सवेरा. तो आंखें खोल कर देखो, हमारे जीवन में एक नया सवेरा हुआ है.  कल बीत चुका है और उस की खामियां गिनते हुए इस नई सुबह को क्यों खराब करें. मैं ने हमारा हनीमून प्लान किया है. अगले हफ्ते मैं छुट्टियां ले रहा हूं.  किसी हिल स्टेशन पर चलेंगे और…,” सुरेंद्र अब फिर शरारती हो जाता है.

शिखा का दिल भी धीरेधीरे सुरेंद्र की बातों में डूबने लगता है. सकुचाते हुए वह बोलती है, “और बच्चे, परिवार वाले जानेंगे तो क्या कहेंगे? इस उम्र में हनीमून ट्रैवल?  लोग तो फैमिली टूर पर निकलते हैं.  मैं ससुराल में सब से नजरें कैसे मिला पाऊंगी और समाज के लोग, सोचो, पड़ोसी हम पर कितना हंसेंगे?”

“फिर से बचकानी बातें शुरू कर दीं तुम ने,”  सुरेंद्र झुंझला उठा, “लोगों के कहनेसुनने के चक्कर में हम अपनी बची जिंदगी को बेजान कर दें? क्या प्रेम की हरियाली को सिर्फ एक उम्र तक ही सीमित रखना चाहिए? नहीं शिखा, मैं ने लोगों की छोड़ खुद के लिए सोचना शुरू कर दिया है.  तुम भी अपना जीवन अपने ढंग से जीने की शुरुआत करो.  और इस में गलत भी क्या है? हम पतिपत्नी हैं. माना कि हमारी थोड़ी उम्र हो चली हैं  लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि हम जीवन को किसी तरह गुजारने लगें. खुशहाल जीने के लिए उम्र की बंदिश नहीं होती.”

शिखा सुरेंद्र की बातों से सहमत हो जाती है.

“अब नहाधो कर फ्रैश हो जाओ, हम बाहर चल रहे हैं. शौपिंग, खाना और मूवी तीनों के साथ आज का संडे,”  सुरेंद्र बोल कर बाथरूम में चला गया.

थोड़ी देर में शिखा दोनों बच्चों के साथ तैयार हो गई. वे गाड़ी से बाहर निकले. ड्राइव करते हुए सुरेंद्र धीमी आवाज में खूबसूरत संगीत का आनंद ले रहा था.  शिखा भी कार से बाहर दिखती तेज बढ़ती सड़क के साथ खुद को गतिमान बना रही थी. आज बाहर का नजारा उसे कुछ नया सा और मोहक महसूस हो रहा था.

एक रैस्टोरैंट में वे दोनों हलका सा कुछ खा कर शौपिंग के लिए एक मौल में चले जाते हैं. बच्चे दूसरी तरफ अपनी पसंद की चीजें देखने लगते हैं. इधर  सुरेंद्र शिखा के लिए एक हलके ब्लू कलर का गाउन पसंद करता है, “देखो तो, यह ड्रैस तुम पर जंच रही है.”

“तुम भी न. फिर से मुझे बोलने को मजबूर मत करो. मैं अब यह पहन कर घूमूंगी?”  शिखा ने आंखें दिखाते हुए कहा.

“अच्छा चलो, नाराज मत होना. कुछ नए अच्छे कपड़े पसंद कर लो बाहर ले जाने के लिए.”

शिखा ने सिल्क की साड़ी और कुछ कौटन खादी मिक्स के सलवारकुरते पसंद किए, साथ ही सुरेंद्र ने भी अपने लिए कुछ नए कपड़े खरीदे.

दोपहर का लंच कर के वे घर आ गए.  शिखा सारा सामान सोफे पर रख कर आराम की मुद्रा में बैठे गई.  सुरेंद्र कार गैरेज में लगा कर अंदर आया.
“चलो दिन का रूटीन पूरा. अब थोड़ा आराम कर लो, फिर शाम चलेंगे.”

“अब शाम को मैं कहीं नहीं जाने वाली,” शिखा बोल पड़ी.

“यह क्या, थोड़ा सा बाहर निकलीं और थक गईं. फिर अपने हनीमून टूर का क्या होगा,”  सुरेंद्र ने शिखा को देख कर कहा.

“इसीलिए बोल रही हूं कि अब बुढ़ापे में यह जवानी वाले चोंचले छोड़ो और भक्तिभजन की तैयारी करो.”

शिखा की बातों का सुरेंद्र पर कोई असर नहीं हुआ. हालांकि शाम में सुरेंद्र की मरजी न चली और शिखा की बात उसे माननी पड़ी. शाम की चाय के साथ रात का खाना भी उन्होंने घर पर ही खाया. अगली सुबह सोमवार का दिन सभी अपनेअपने रूटीन वर्क में लग गए.  बच्चे स्कूल जा चुके थे और सुबह का नाश्ता ले कर सुरेंद्र कालेज के लिए निकल गया लेकिन जातेजाते शिखा को टूर की बात फिर से याद दिला गया.

दोपहर का खाली समय, शिखा आराम करने के लिए बैठी थी कि तभी डोरबेल बजी. उस ने दरवाजा खोला तो देखा, पड़ोस में रहने वाली निर्मला आई है.  निर्मला सिर्फ पड़ोसिन ही नहीं बल्कि शिखा की अच्छी सहेली भी बन गई थी.  खुशियों के पल या दुख के भारी दिन, ये दोनों एकदूसरे से साझा करती थीं.

“आओ निर्मला, बैठो.  5 दिनों से तुम दिखी नहीं, तो मैं समझी कि तुम मुझ से रूठ गई हो.  तुम्हें फोन भी लगाया लेकिन कनैक्ट नहीं हुआ,”  निर्मला को सोफे पर बैठने का इशारा करते हुए शिखा ने कहा.

“क्या बताऊं, शिखा. कुछ दिनों के लिए गांव चली गई थी. गांव में मेरे पति के बचपन के घनिष्ठ मित्र हैं.  अचानक उन की पत्नी के मर जाने की सूचना मिली, जिस के बाद हम दोनों वहां चले गए,”  निर्मला ने बताया.

“मगर कैसे, कुछ तो हुआ होगा, पहले से कोई बीमारी या किसी प्रकार की दुर्घटना?”  शिखा ने आश्चर्य से कहा.

“अरे नहीं, हार्ट अटैक हुआ था. समय कि बलवान थी कि सुहागिन के जोड़े में संसार से विदा हुई.  उस के पति का तो रोरो कर बुरा हाल था,”  कहते हुए निर्मला के चेहरे पर थोड़े दुख के भाव उभर आए.

“पत्नी के जाने से अब उस व्यक्ति के जीवन में निराशा और दुख के बादल ही भरे दिखेंगे,”  शिखा ने दुखी महसूस होते हुए कहा.

“ऐसा क्यों होगा भला, यदि वे चाहें तो आगे के बचे पल को सामान्य बना कर जी सकते हैं. माना कि जीवन में दुखद घटनाएं घटती हैं, विकट परिस्थितियां आती हैं, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि एक जीवित व्यक्ति निर्जीव सा जीवन जिए.”

“मतलब,”  शिखा निर्मला की बातें समझ न सकी.

“मतलब यह कि किसी भी व्यक्ति को अपनी दुखद परिस्थितियों में अधिक समय तक बंधे नहीं रहना चाहिए. बंधे रहने का मतलब आजीवन वह हताश और निराश रहेगा व जीवन को सलीके से जी नहीं पाएगा.  फिर इस का दोष देगा समय पर और प्रकृति पर कि उसे ऐसी जिंदगी क्यों मिली,”  निर्मला बोले जा रही थी.

“एक सामान्य व्यक्ति क्या चाहता है, जीवन को खुशहाल और आनंददायी बिताना.  लेकिन इस अवस्था को जीने के लिए वह प्रयास नहीं करता, इंतजार करता है कि उस के जीवन में सारे सुख बैठेबिठाए मिल जाएं. अरे शिखा, खुशी व्यक्ति के अंदर ही विराजमान रहती है. उसे भरपूर जीने के लिए खुशी को मन की गहराइयों से खींच कर बाहर उभारना पड़ता है.  लेकिन लोग हैं कि इतना छोटा सा भी प्रयास नहीं करते.”

“बात तो तुम्हारी सही लग रही है, निर्मला लेकिन कुछ चीजें समय से भी मिलती हैं. भला समय का लिखा कौन बदल सकता है. प्रकृति की कृपा सर्वोपरि है.”

“तू भी न, धार्मिक प्रवचन सुनते और पूजाअर्चना करते कुछ ज्यादा ही आध्यात्मिक हो गई है.”

“आध्यात्मिक, हुंह, आध्यात्मिक. अच्छा बता, मैं प्रकृति का ध्यान न करती तो क्या करती. शादी के बाद सिर्फ और सिर्फ जिम्मेदारियों का केंद्र बन कर रह गई. पति का साथ तन तक सीमित रह गया. मन तो हमारा संस्कार और कर्तव्य में उलझे रह गए,”  शिखा बीते दिनों का दुखड़ा सुनाने लगी.

“कब तक तुम उन्हीं पलों में खुद को समेटे रहोगी. माना कि तुम्हारा कल तुम्हारी सोच से परे था लेकिन तुम्हारा आज खुशियों की चादर बिछाए हुए है, तुम अपनी सोच से उसे धूसरित क्यों कर रही हो?”

शिखा निर्मला की बात को समझती जा रही थी.

“देख शिखा, व्यक्ति के पास प्रकृति ने जो अवस्थाएं दी हैं उन्हें अब कितना और किस प्रकार जीना है, उस के खुद के हाथ में होता हैं. कुछ लोग इसे जल्दी समझ लेते हैं.  कुछ तमाम उम्र समझ नहीं पाते.”

“अच्छा ज्ञानी बहना, अब यह भी तो बताओ कि जिसे देरसवेर इस रहस्य की समझ आ जाए, वह खुश रहने के लिए क्या करे?”  शिखा ने शरारतभरे अंदाज में कहा.

“ज्यादा कुछ नहीं, अपने वर्तमान को देखो और उस में निहित परिस्थितियां आदि को स्वीकार करते हुए सकारात्मकता का लैवल ऊंचा कर दो.  दबाना है तो नकारात्मक चीजें, दुख, चिंता आदि का दमन करो.  जीवन में मिली छोटीछोटी खुशियों को उभारो और उस का आकार बड़ा करो.  गांव पर भी भाईसाहब को खुद के बाकी बचे जीवन को जीने का तरीका बता आई हूं.”

निर्मला काफी देर तक बैठने के बाद चली गई थी.  मगर शिखा अब भी उस के शब्दों और तथ्यों को अपने अंदर महसूस कर रही थी.  बातोंबातों में निर्मला ने शायद शिखा के हृदय को परिवर्तित कर दिया था.  अब शिखा को भी खुद पर खीझ हो रही थी, ‘कितनी बड़ी बेवकूफ है वह जो बीते दिनों को पकड़ कर अपना आज खराब कर रही है.  उसे सुरेंद्र की बातें सही लगने लगीं. सच है कि उन दोनों ने जिम्मेदारियों और परिस्थितियों के कारण जीवन को भरपूर नहीं जिया.  उसे वो खुशियां नहीं मिल पाईं जिन की वह लालसा पाल रखे थी.  मगर अब जबकि खुशियां उस के समक्ष खड़ी हैं और कह रही हैं कि आओ, मुझ में समाहित हो जाओ और आनंददायक जीवन का लुत्फ उठाओ तो वह इसे ठुकरा रही है.  कल किस ने देखा है. फिर क्यों  न वह भी अपने आज को जी ले.’

शाम हो चली थी. सुरेंद्र घर आ गया.  लेकिन बीते कुछ घंटों में शिखा अब नईनवेली शिखा बन चुकी थी.  उस में वह अल्हड़पन और शरारतें फिर जीवंत होने लगीं जो वर्षों पहले कहीं दिल की गहराइयों में खो चुकी थीं.

चाय के साथ शिखा सुरेंद्र की पसंद का नमकीन लाई थी और संग में गाजर का हलवा भी, जो शायद उन के इस पल में मिठास घोलने के लिए काफी था.

“वाह, वाह, आज तो हमारी श्रीमतीजी ने हमारा मन जीत लिया. बात क्या है.”

“कुछ नहीं, बस, यों हीं. वो हमारे टूर का क्या हुआ? मैं सोच रही हूं कि हम दोनों शिमला की वादियों में कुछ सुकून के पल बिताएं.”

“जानेमन, तुम्हारे आदेश की तामील की जाएगी,” सुरेंद्र ने शरारतभरे लहजे में कहा, “चलने की तैयारी करो, इस हफ्ते मेरी छुट्टियां मंजूर हो जाएंगी.”

“जब मैं बादल बन जाऊं, तुम बारिश बन जाना…”  सुरेंद्र फिर से गाने की यह पंक्ति गुनगुनाने लगा.

“बादल तो तुम हो ही, अब आवारा बादल बन जाओ,”  और शिखा उस के अल्हड़पन पर मुसकराने लगती है.

Love Story : तीसरी गलती – सुधा क्यों परेशान थी ?

Love Story : टूर पर जाने के लिए प्रिया ने सारी तैयारी कर ली थी. 2 बैग में सारा सामान भर लिया था. बेटी को पैकिंग करते देख सुधा ने पूछा, ‘‘इस बार कुछ ज्यादा सामान नहीं ले जा रही हो?’’

‘‘हां मां, ज्यादा तो है,’’ गंभीर स्वर में प्रिया ने कहा. अपने जुड़वां भाई अनिल, भाभी रेखा को बाय कह कर, उदास आंखों से मां को देखती हुई प्रिया निकल गई. 10 मिनट के बाद ही प्रिया ने सुधा को फोन किया, ‘‘मां, एक पत्र लिख कर आप की अलमारी में रख आई हूं. जब समय मिले, पढ़ लेना.’’ इतना कह कर प्रिया ने फोन काट दिया.

सुधा मन ही मन बहुत हैरान हुईं, उन्होंने चुपचाप कमरे में आ कर अलमारी में रखा पत्र उठाया और बैड पर बैठ कर पत्र खोल कर पढ़ने लगीं. जैसेजैसे पढ़ती जा रही थीं, चेहरे का रंग बदलता जा रहा था. पत्र में लिखा था, ‘मां, मैं मुंबई जा रही हूं लेकिन किसी टूर पर नहीं. मैं ने अपना ट्रांसफर आप के पास से, दिल्ली से, मुंबई करवा लिया है क्योंकि मेरे सब्र का बांध अब टूट चुका है. अभी तक तो मेरा कोई ठिकाना नहीं था, अब मैं आत्मनिर्भर हो चुकी हूं तो क्यों आप को अपना चेहरा दिखादिखा कर, आप की तीसरी गलती, हर समय महसूस करवाती रहूं. तीसरी गलती, आप के दिल में मेरा यही नाम हमेशा रहा है न. ‘इस दुनिया में आने का फैसला तो मेरे हाथ में नहीं था न. फिर आप क्यों मुझे हमेशा तीसरी गलती कहती रहीं. सुमन और मंजू दीदी को तो शायद उन के हिस्से का प्यार दे दिया आप ने. मेरी बड़ी बहनों के बाद भी आप को और पिताजी को बेटा चाहिए था तो इस में मेरा क्या कुसूर है? मेरी क्या गलती है? अनिल के साथ मैं जुड़वां हो कर इस दुनिया में आ गई. अपने इस अपराध की सजा मैं आज तक भुगत रही हूं. कितना दुखद होता है अनचाही संतान बन कर जीना.

‘आप सोच भी नहीं सकतीं कि तीसरी गलती के इन दो शब्दों ने मुझे हमेशा कितनी पीड़ा पहुंचाई है. जब से होश संभाला है, इधर से उधर भटकती रही हूं. सब के मुंह से यही सुनसुन कर बड़ी हुई हूं कि जरूरत अनिल की थी, यह तीसरी गलती कहां से आ गई. अनिल तो बेटा है. उसे तो हाथोंहाथ ही लिया जाता था. आप लोग हमेशा मुझे दुत्कारते ही रहे. मुझ से 10-12 साल बड़ी मेरी बहनों ने मेरी देखभाल न की होती तो पता नहीं मेरा क्या हाल होता. मेरी पढ़ाईलिखाई की जिम्मेदारी भी उन्होंने ही उठाई.

‘मेरी परेशानी तब और बढ़ गई जब दोनों का विवाह हो गया था. अब आप थीं, पिताजी थे और अनिल. वह तो गनीमत थी कि मेरा मन शुरू से पढ़ाईलिखाई में लगता था. शायद मेरे मन में बढ़ते अकेलेपन ने किताबों में पनाह पाई होगी. आज तक किताबें ही मेरी सब से अच्छी दोस्त हैं. दुख तब और बढ़ा जब पिताजी भी नहीं रहे. मुझे याद है मेरे स्कूल की हर छुट्टी में आप कभी मुझे मामा के यहां अकेली भेज देती थीं, कभी मौसी के यहां, कभी सुमन या मंजू दीदी के घर. हर जगह अकेली. हर छुट्टी में कभी इस के घर, कभी उस के घर. जबकि मुझे तो हमेशा आप के साथ ही रहने का दिल करता था. ‘कहींकहीं तो मैं बिलकुल ऐसी स्पष्ट, अनचाही मेहमान होती थी जिस से घर के कामों में खूब मदद ली जाती थी, कहींकहीं तो 14 साल की उम्र में भी मैं ने भरेपूरे घर का खाना बनाया है. कहीं ममेरे भाईबहन मुझे किचन के काम सौंप खेलने चले जाते, कहीं मौसी किचन में अपने साथ खड़ा रखतीं. मेरे पास ऐसे कितने ही अनुभव हैं जिन में मैं ने साफसाफ महसूस किया था कि आप को मेरी कोई परवा नहीं थी. न ही आप को कुछ फर्क पड़ता था कि मैं आप के पास रहूं या कहीं और. मैं आप की ऐसी जिम्मेदारी थी, आप की ऐसी गलती थी जिसे आप ने कभी दिल से नहीं स्वीकारा.

‘मैं आप की ऐसी संतान थी जो आप के प्यार और साथ को हमेशा तरसती रही. मेरे स्कूल से लेट आने पर कभी आप ने यह नहीं पूछा कि मुझे देर क्यों हुई. वह तो मेरे पढ़नेलिखने के शौक ने पढ़ाई खत्म होते ही मुझे यह नौकरी दिलवा दी जिस से मैं अब सचमुच आप से दूर रहने की कोशिश करूंगी. अपने प्रति आप की उपेक्षा ने कई बार मुझे जो मानसिक और शारीरिक कष्ट दिए हैं. उन्हें भूल तो नहीं पाऊंगी पर हां, जीवन के महत्त्वपूर्ण सबक मैं ने उन पलों से ही सीखे हैं. ‘आप की उपेक्षा ने मुझे एक ऐसी लड़की बना दिया है जिसे अब किसी भी रिश्ते पर भरोसा नहीं रहा. जीने के लिए थोड़े से रंग, थोड़ी सी खुशबू, थोड़ा सा उजाला भी तो चाहिए, खुशियोें के रंग, प्यार की खुशबू और चाहत का उजाला. पर इन में से कुछ भी तो नहीं आया मेरे हिस्से. अनिल के साथ जुड़वां बन दुनिया में आने की सजा के रूप में जैसे मुझे किसी मरुस्थल के ठीक बीचोंबीच ला बिठाया गया था जहां न कोई छावं थी, न कोई राह.‘मां, आप को पता है अकेलापन किसी भयानक जंगल से कम नहीं होता. हर रास्ते पर खतरा लगता है. जब आप अनिल के आगेपीछे घूमतीं, मैं आप के आगेपीछे घूम रही होती थी. आप के एक तरफ जब अनिल लेटा होता था तब मेरा मन भी करता था कि आप की दूसरी तरफ लेट जाऊं पर मेरी हिम्मत ही नहीं हुई कभी. आज आप का दिल दुखाना मेरा मकसद नहीं था पर मेरे अंदर लोगों से, आप से मिली उपेक्षा का इतना जहर भर गया है कि मैं चाह कर भी उसे निगल नहीं सकती. आखिर, मैं भी इंसान हूं. आज सबकुछ उगलना ही पड़ा मुझे. बस, आज मैं आप सब से दूर चली गई. आप अब अपने बेटे के साथ खुश रहिए.

‘आप की तीसरी गलती.

‘प्रिया.’

सुधा को अब एहसास हुआ. आंसू तो कब से उन के गाल भिगोते जा रहे थे. यह क्या हो गया उन से. फूल सी बेटी का दिल अनजाने में ही दुखाती चली गई. वे पत्र सीने से लगा कर फफक पड़ीं. अब क्या करें. जीवन तो बहती नदी की तरह है, जिस राह से वह एक बार गुजर गया, वहां लौट कर फिर नहीं आता, आ ही नहीं सकता.

Romantic Story : ये कहां आ गए हम ?

Romantic Story : नंदिनी घर में घुसी ही थी कि आरव दौड़ता हुआ आया और गोदी में चढ़ने की जिद करने लगा. नंदिनी ने शेखर को आवाज लगाई, “शेखर यार, जरा आरव को पकड़ लो.”

शेखर भुनभुनाते हुआ आया और आरव को ऐसे गुस्से से पकड़ा कि वो बुक्का फाड़ कर रोने लगा.

नंदिनी मायूसी से बोली, “अरे, थोड़ा आराम से…” तभी काशवी नंदिनी के पास भागती हुई आई, पर अपनी मम्मी का गुस्सा देख कर एकाएक ठिठक गई.

नंदिनी जल्दी से हाथमुंह धोने बाथरूम में घुस गई. अक्तूबर में भी उमस का बुरा हाल था. बाथरूम का बुरा हाल था. गंदे कपड़ों का ढेर एक तरफ पड़ा तो दूसरी तरफ बालों के गुच्छे जमा हो रखे थे.

जब आधे घंटे में नंदिनी नहाधो कर बाहर निकली, तो शेखर काफी हद तक संयमित हो चुका था.

आरव काशवी के साथ खेल रहा था. शेखर ने नंदिनी को चाय और मैगी की प्लेट पकड़ा दी.

नंदिनी ने कहा भी, “अरे मैं बना देती, तुम ने क्यों बनाई?”

शेखर मायूसी से बोला, “कितना करोगी तुम…? अगर नौकरी ना जाती, तो तुम्हें ऐसे बच्चों को घर में छोड़ कर नौकरी करने जाने देता.”

नंदिनी शेखर के बालों पर हाथ फेरते हुए बोली, “ये दिन भी निकल जाएंगे…”

तभी नंदिनी ने मशीन लगाई और शेखर ने सारे गंदे कपड़ो का ढेर उस में डाल दिया.

नंदिनी ने झाड़ू लगानी शुरू करी तो शेखर ने डस्टिंग.

तभी आरव ने पोट्टी कर दी और नंदिनी झाड़ू रख कर बाथरूम की ओर भागी.

आज 16 अक्तूबर हैं, 30 अक्तूबर में उन की विवाह की वर्षगांठ है. 2 साल पहले जब कोरोना का राक्षस नहीं था, तो वो लोग काशवी को मम्मीपापा के पास छोड़ कर महाबलीपुरम गए थे. पिछले 2 साल से तो अचानक से पूरी दुनिया ही उलटपुलट हो गई थी.

शेखर और नंदिनी की दुनिया में सबकुछ परफेक्ट था. शेखर एक मल्टीनेशनल कंपनी में मार्केटिंग हेड था. अपनी काबिलीयत के बल पर कम उम्र में ही वो इतनी ऊंची पोस्ट पर पहुंच गया था. शेखर को पैसे की कभी कोई कमी नहीं रही थी. उस के काम में पैसे के साथ साथ तनाव भी बहुत अधिक था. इसलिए जब नंदिनी का रिश्ता आया तो शेखर ने हां कर दी थी.

नंदिनी के परिवार को खुद विश्वास नहीं हुआ था कि शेखर जैसी ऊंची नौकरी वाला युवक एक आम से परिवार की आम लड़की को पसंद कर लेगा.

शेखर को नंदिनी बेहद सुलझी और खुशमिजाज लगी थी.

विवाह के एक वर्ष बाद शेखर और नंदिनी के जीवन में उन की पहली संतान के रूप में काशवी आ गई थी.

फिर जब काशवी 4 वर्ष की हुई, तो नंदिनी ने एक स्कूल में टीचर की नौकरी कर ली थी.

यह नौकरी नंदिनी पैसों के लिए नहीं, बल्कि अपने शौक के लिए कर रही थी. थोड़े ही दिनों में वो बच्चों की पसंदीदा टीचर बन गई थी. फिर आराव के आने की आहट हुई, तो नंदिनी ने स्कूल की नौकरी छोड़ दी थी.

बहुत बार नंदिनी को ऐसा लगता था कि वह कितनी भाग्यशाली है. वर्ष 2020 का वैलेंटाइन डे भी शेखर पूरे परिवार के साथ आमेर के महल में मना कर आया था.

सब्जी काटते हुए नंदिनी सोच रही थी कि उस की ही

काली नजर लग गई. वर्ष 2020 की होली पर भी कोरोना की दस्तक के बावजूद कितना मजा किया था. और फिर शुरू हो गया

नंदिनी और शेखर के जीवन में कोरोना का विपत्ति काल.

मार्च से ही सारी आर्थिक गतिविधियों पर रोक लग गई थी. आरव को देखने वाली नैनी भी अपने गांव

चली गई थी. जनता कर्फ्यू लगते ही कुक और मैड का काम भी नंदिनी के कंधों पर आ गया था.

शेखर चाह कर भी लेपटौप से सिर नहीं उठा पाता था. क्या करे, हर कोई परेशान था. किसी ने भी यह नहीं

सोचा था कि कभी ऐसा समय भी आएगा कि अकेलापन ही हर व्यक्ति का सब से बड़ा सहारा होगा. लोग एकदूसरे को देख कर कटने लगे हैं.

नंदिनी ने थके हुए शरीर को धकेलते हुए दाल और चावल उबाले. तभी काशवी आई और जल्दीजल्दी प्लेट

में डाल कर खाने लगी. पहले इस लड़की का कितना नखरा था, हर रोज एक नई फरमाइशें होती थीं, पर अब जो मिलता है, खा लेती है.

कोरोना को जीवन में आए हुए अब लगभग 2 साल से ज्यादा हो जाएंगे, पर जीवन की गाड़ी है कि पटरी पर आने का नाम नही ले रही है. कोरोना के चलते मंदी का ऐसा दौर आया कि  शेखर को कंपनी ने फायर कर दिया था. कोरोना के कारण कंपनी अधिक सैलरी वाले लोगों को रखने में असमर्थ थी.

शेखर को इस बात का एहसास था कि कंपनी के शेयर वैल्यू घट रही है, पर उसे इस बात का इल्म नहीं था कि उस के जैसे मेहनती और ईमानदार कर्मचारी को भी वो दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल देगी.

घर का किराया, कार का लोन और भी बहुत सारे अगड़मसघड़म खर्च थे, जो उन्होंने जिंदगी में शुमार कर लिए थे.

शेखर और नंदिनी को अपने मातापिता की कही हुई बात कोरोना काल में सही लग रही थी. जब भी शेखर और नंदिनी ट्रिप्स पर जाते तो नंदिनी के मम्मीपापा हमेशा टोकते थे. नंदिनी भी झुंझला उठती थी और शेखर भी कहता कि हमारे मम्मीपापा के युग के लोगों को जिंदगी को एंजौय करना नहीं आता है.

अगले ही रोज से नंदिनी और शेखर ने जगहजगह आवेदन करना शुरू कर दिया था. शुक्र था कि जल्द ही नंदिनी को एक स्कूल में नौकरी मिल गई थी. काम अधिक था और वेतन भी कम था, पर डूबते को तिनके का सहारा भी बहुत होता है.

किराए और कार लोन की चिंता तो खत्म हो गई थी. पर, बाकी खर्च का क्या करें? शेखर ने भी एक छोटी सी कंपनी में नौकरी पकड़ ली थी. पर शेखर और नंदिनी दोनों ही जिंदगी के इस अकस्मात मोड़ पर आ कर चिड़चिड़े हो उठे थे.

जब चार बैडरूम के फ्लैट का रेंट और हाई सोसाइटी का मेंटेनेंस उन की जेब पर भारी पड़ने लगा, तो सब से पहले उन्होंने एक छोटा सा फ्लैट किराए पर ले लिया था. काशवी के महंगे स्कूल की औनलाइन पढ़ाई शेखर और नंदिनी को बेहद भारी पड़ रही थी.

नंदिनी ने ही पहल कर काशवी को अपने स्कूल में डाल दिया था. स्कूल पहले वाले स्कूल के मुकाबले बेहद छोटा था, पर क्या करें?

हर महीने जो सिर पर भारी फीस की तलवार लटकी रहती है, कम से कम उस से तो थोड़ी राहत मिलेगी.जो चेहरे पहले हर समय खुशी से दमकते रहते थे, अब हर समय बेबसी और लाचारी के कारण बुझेबुझे से रहते थे.

नंदिनी ने जब शेखर को रात में चाय पकड़ाई, तो शेखर भुनभुनाते स्वर में बोला, “यार, कम से कम चीनी तो ठीक से डाल दिया करो.”

नंदिनी भी उतने ही गुस्से में बोली, “शेखर, मैं भी इनसान हूं, मशीन नहीं हूं.”

तभी आरव ने फिर से रोना शुरू कर दिया. नंदिनी उसे उठा कर ड्राइंगरूम में चली गई. उस की आंखें छलछला रही थीं. बाहर ड्राइंगरूम की दीवारों पर नंदिनी और शेखर के प्यार के स्मृति चिन्ह अंकित थे. नंदिनी को ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो वो कोई पिछले जन्म की बात थी .

तभी शेखर के चिल्लाने की आवाज आ रही थी. वो किसी से फोन पर बहस में उलझा हुआ था. नंदिनी को समझ नहीं आ रहा था कि वह कहां आ गई है. वह शेखर के साथसाथ ज़िन्दगी के सफर में चलतेचलते.

फोन रखते ही शेखर बोला, “मुझ से बरदाश्त नहीं होता कि मुझ से कम काबिल लोग मुझे सिखाएं कि बस 50 हजार के लिए इतनी जिल्लत सहन करनी पड़ेगी, कभी नहीं सोचा था.

नंदिनी बिना कुछ बोले, एग्जाम की कौपियां चैक करने लगी. शेखर भुनभुनाते हुए बोला, “तुम्हारे भैया से जो 2 लाख लिए थे, उसे भी नहीं लौटा पा रहा हूं. आज ही उन का फोन आया है कि उन्हें बेटे के एडमिशन के लिए पैसों की जरूरत है.

नंदिनी बोली, “भाभी भी ताना देने का कोई मौका नही छोड़ती हैं. हमेशा बोल देती हैं कि पहले ही हाथ रोक कर खर्च किया होता, तो ये हाल ना होता.”

शेखर बोला, “कोशिश तो कर रहा हूं, सब खर्चों में कटौती भी कर दी है, मगर कुछ कर ही नहीं पा रहा हूं.”

नंदिनी उसांस छोड़ते हुए बोली, “सुनो, ये कार बेच कर छोटी कार ले लेते हैं. लोन भी खत्म हो जाएगा और थोड़ा खर्च भी कम होगा.”

शेखर गुस्से में बोला, “तुम भी सब की तरह यही सोचती हो कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा.”

नंदिनी बिना कुछ जवाब दिए बच्चों के कमरे में चली गई. दोनों बच्चे नींद में थे. अचानक से नंदिनी को लगा कि उस का पूरा शरीर पसीने से सराबोर हो गया है. चुपके से उठ कर उस ने एयरकंडीशनर चालू किया. बिजली के बिल के कारण अब वो लोग बच्चों के कमरे में ही कूलर या  एयरकंडीशनर चलाते हैं.

नंदिनी मन ही मन सोच रही थी कि पता नहीं, कब वो रात आएगी, जब वो पहले की तरह प्यार से शेखर के सीने पर सिर रख कर सो पाएगी. पहले क्या दिन थे और अब क्या हो गए हैं. पिछले 2 साल से नंदिनी और शेखर अलगअलग ही सो रहे हैं.

मार्च, 2020 में अचानक से लौकडाउन लग गया था. सबकुछ बंद हो गया था. घर पर कोई भी गर्भनिरोधक नहीं था, इसलिए अनचाहे गर्भ के डर के कारण नंदिनी ने शेखर को अपने नजदीक नहीं आने दिया था. फिर शेखर की नौकरी छूट गई और एक के बाद एक जिंदगी में इतने परिवर्तन हो गए कि दोनों का मन ही अंदर से मर गया था.

परंतु आज नंदिनी की दीदी ने उस का हालचाल पूछने के लिए फोन किया था और उन्होंने ही नंदिनी को कहा कि अब शेखर के पास सोना शुरू करो. ये समस्याएं तो थोड़े दिनों के बाद समाप्त हो ही जाएंगी, परंतु कहीं ऐसा ना हो कि शेखर तुम से दूर हो जाए. मर्द की भूख एक बच्चे की तरह होती है.

नंदिनी के दिमाग में दीदी की ये ही बातें घूम रही थीं.

पहले शेखर नंदिनी के बिना एक रात भी नहीं रह पाता था और अब अगर वो उस के कमरे में जाती भी है, तो शेखर अनमने स्वर में बोलता है कि मैं तो पंखे में ही सोऊंगा. तुम्हें गरमी ज्यादा लगती है, तो बच्चों के साथ सो जाओ.

ना जाने क्यों नंदिनी को लगता था कि शेखर अपने कमरे में अकेला रहना चाहता है. नंदिनी इसे तनाव ही समझ रही थी, परंतु आज दीदी के फोन के कारण उस का मन बेचैन हो उठा था.

चुपचाप दबे पांव नंदिनी शेखर के कमरे में गई, तो देखा कि शेखर फोन हाथ में लिए कुछ कर रहा था, मगर चेहरे पर एक शरारती मुसकान थी. इस मुसकान को नंदिनी अच्छे से पहचानती थी, जब भी शेखर उस से प्यारभरी बातें करता था, तब भी उस के चेहरे पर ऐसी ही मुसकान होती थी.

नंदिनी को देख कर शेखर बोला, “तुम क्यों चोरों की तरह कमरे में खड़ी हो? अगर इसी कमरे में सोना है, तो चुपचाप सो जाओ.”

फिर शेखर फोन बंद कर के पीठ फेर कर सो गया था.

ये वो ही शेखर था, जो पहले नंदिनी के करीब आते ही उसे बांहों में भरने के लिए बेचैन हो उठता था.

नंदिनी की आंखें अपमान से छलछला उठी. ये कहां आ गया है उन का रिश्ता यों ही साथ चलतेचलते. कहीं ऐसा तो नहीं कि कोरोना के बाद उपजा ये जानलेवा तनाव उन की शादी की नींव को भी धीरेधीरे खोखला कर रहा है.

नंदिनी ने मन ही मन खुद से वादा किया कि बस अब और नहीं, कल ही वो शेखर से खुल कर बात करेगी.

थोड़े दिनों के लिए ही सही, बच्चों की दादी या नानी को बुला लेगी. बच्चे भी खुश रहेंगे और शेखर को भी थोड़ा आराम हो जाएगा. ये कोरोना उन की जिंदगी का एक खतरनाक मोड़ अवश्य हो सकता है, पर वो इस मोड़ पर  संभलसंभल कर ही चलेगी. शेखर शायद इस मोड़ पर रुक गया है, पर नंदिनी धीमेधीमे ही सही शेखर को साथ ले कर इसे पार अवश्य कर लेगी.

Hindi Poetry : मन की सारी बातें

Hindi Poetry : कठिन बहुत है कहना सबसे
मन की सारी बातें
पर जिसको हम कह जाते सब
क्या उसको हम कहते

दौर कठिन है लोग कठिन हैं
दुनिया में जज़्बातें
हाँ भाती है सबको देखा
हाँ में हाँ की बातें

दूर देश में सबकुछ अच्छा
देखा करती आँखें
जब आती है बात खुदी की
किसको कैसे साधे

रोज रोज की दकियानूसी
दिन हो चाहे रातें
करनी होती है सबको है
ऊपर की सौगातें

आन मान और शान कहाँ
दौलत से सब नाते
अगर मगर और नज़र उठा कर
देखा सबको गाते

लेखिका – सरिता त्रिपाठी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

Hindi Poem : क्या पूर्ण हुई मेरी कविता

Hindi Poem : मेरे शब्दों की छाँव तले
कभी बैठ जरा क्षण दो क्षण,
हृदय में उपजे भावों से
सिञ्चित करती कण-कण,
मेरे अंतर्मन में भावों की
बहती रहती नित सरिता,
शब्द भाव को बुन-बुन कर
गढ़ देती फिर एक कविता,
स्नेह प्रेम अनुराग से
विनती करती यह वनिता।
क्या मन को छुई मेरी कविता?

कहीं बीज में हो अंकुरण
कभी कहीं जो खिले सुमन
या फूलों के ही पाश में
भ्रमर करते रहते गुंजन
निज उर के ही भावों का
करके रखती थी अवगूंठन
न जाने कब निकला उदगार
कर बैठा एक नवीन सृजन
सच-सच कहना तुम सखे
विनती करती यह नमिता।
सहमी सकुचाई सविता
क्या गढ़ लेती है कविता?

कभी छंद लिखूँ स्वच्छंद लिखूँ
सजल गज़ल दोहा मुक्तक,
लेखनी सफल होगी तभी
जब पहुँचे सबके हृदय तक,
माँ शारदे यह करूँ विनती
सक्रिय रहे मेरी तूलिका,
शब्द भाव का ज्ञान रहे
रचती रहूँ बस गीतिका,
आहत ना करूँ मर्म को
लेखनी में रहे शुचिता
अब कह भी दो हे मदने!
क्या पूर्ण हुई मेरी कविता?

लेखिका : सविता सिंह मीरा
जमशेदपुर

Hindi Kavita : काश की हम पागल होते

Hindi Kavita : हंसते गाते बिना बात के खुश होते
काश की हम पागल होते

उच्चाकांक्षाओं से ना घायल होते
काश की हम पागल होते

समझ ना पाते लोगों के ताने
करते काम सब मनमाने

सब हमको बस दूर भगाते
तब शायद हम खुद को पा जाते

हर पल समाज के ना पहरे होते
दिल के ज़ख्म ना इतने गहरे होते

मर्यादाओं की भी ना मजबूरी होती
सोच और शब्द के बीच ना कुछ दूरी होती

ना ऊंचे ऊंचे सपने होते
झूठ मूठ के ना अपने होते

जान बूझ कर अंजान न बनते
झूठी महफिल के मेहमान न बनते

षडयंत्रों के व्यूह से घिरे न होते
हम कुछ पाने को इतना गिरे न होते

बिन मर्जी कोई काम न करते
बड़े बड़े लोगो से तनिक ना डरते

मन पर इतने अवसाद ना होते
बोझिल से दिन रात ना होते

मन में इतने अंतर्द्वंद ना होते
जीवन में इतने दंद फंद ना होते

ऊंची चौखट पे ही माथा टेके
काश हम इतने होशियार ना होते

लेखिका : प्रज्ञा पांडेय मनु

Box Office : निर्माताओं ने डुबाई ‘डिप्लोमेट’ और ‘इन गलियों में’

Box Office : बड़ी फिल्मों का बज इतना ज्यादा होता है कि छोटी फिल्में कहीं दबी रह जाती हैं. यही ‘डिप्लोमेट’ और ‘इन गलियों में’ के साथ हुआ है. फिल्में हौल में बेदम हो चली हैं.

मार्च माह के दूसरे सप्ताह यानी कि 14 मार्च से 20 मार्च, 14 मार्च होली के दिन एक साथ दो फिल्में रिलीज हुईं. इन में से एक जौन अब्राहम की फिल्म ‘द डिप्लोमेट’ और दूसरी अविनाश दास की फिल्म ‘इन गलियो में’ रही. इन के निर्माताओं ने जो हरकत की, उसे देख कर तो यही कहा जा सकता है कि दोनों ने ‘आ बैल मुझे मार’ वाला कारनामा किया.

जौन अब्राहम और सादिया खतीब की मुख्य भूमिका से सजी फिल्म ‘द डिप्लोमेट’ का निर्देशन शिवम नायर और निर्माण जौन अब्राहम ने टीसीरीज के साथ मिल कर किया है. शिवम नायर की गिनती बेहतरीन संजीदा फिल्म निर्देशक के तौर पर होती है. वह इस फिल्म से पहले ‘आहिस्ता आहिस्ता’, ‘महारथी’, ‘भाग जौनी’ और ‘नाम शबाना’ जैसी फिल्में निर्देशित कर चुके हैं. उन्हें सिनेमा की अच्छी समझ है. यही वजह है कि ‘द डिप्लोमेट’ भी अच्छी फिल्म बनी है. मगर यह फीचर फिल्म की बनिस्बत डाक्यूमेंट्री फिल्म नजर आती है.

2017 की सत्य घटनाक्रम पर आधारित फिल्म की कहानी 2017 के उज्मा अहमद केस पर है. भारतीय महिला उज्मा अहमद पाकिस्तान में एक लड़के के प्रेम के चक्कर में फंस जाती है, किसी तरह वह भारतीय दूतावास में जा कर वहां भारतीय राजदूत जेपी सिंह से मदद मांगती है. पाक में मौजूद तत्कालीन भारतीय राजदूत जेपी सिंह, तत्कालीन भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की मदद से उज्मा अहमद को भारत भेजने में सफल होते हैं.

फिल्म अच्छी बनी लेकिन जौन अब्राहम और सादिया खतीब ने इस फिल्म का प्रमोशन ही नहीं किया. दूसरी बात फिल्म के रिलीज से एक सप्ताह पहले अलजजीरा द्वारा एक लेख छापा गया था कि किस तरह हिंदी सिनेमा को कुछ निर्माता कुछ पत्रकारों को पैसा दे कर गलत रिव्यू लिखवा कर बरबाद कर रहे हैं. इस खबर को गलत साबित करने और अपनी सोच को ही सही साबित करने के लिए फिल्म ‘द डिप्लोमेट’ के निर्माता जौन अब्राहम और टीसीरीज ने एक निर्णय के तहत फिल्म का प्रेस शो ही नहीं किया. लेकिन जिन पत्रकारों के नाम ‘जलजजीरा’ में छपे थे, उन्हें बुला कर फिल्म दिखाई और इन सभी ने चार व साढ़े चार स्टार दिए.

इस का एक पोस्टर पत्रकारों के नाम व दिए गए स्टार के साथ विज्ञापन के तौर पर कुछ अखबारों में 14 तारीख की सुबहसुबह छपवा दिया. मजेदार बात यह है कि इस में एक नाम वीरेंद्र चावला का भी है, जो कि फिल्म क्रिटिक्स की बजाय फोटोग्राफर हैं. निर्माता का यह कदम उन की फिल्म को ले डूबा. दर्शकों ने देखा कि जिन पत्रकारों पर पैसे ले कर रिव्यू लिखने के आरोप ‘जलजजीरा’ में लगे हैं, उन्हीं ने ‘द डिप्लोमेट’ को बेहतरीन फिल्म बताई है, तो दर्शक ने फिल्म से दूरी बना ली.

पूरे 7 दिन में ‘द डिप्लोमेट’ बाक्स आफिस पर लगभग 17 करोड़ ही कमा सकी. वैसे फिल्म के पीआरओ ने 19 करोड़ 45 लाख रूपए एकत्र करने का दावा किया है. इस में से निर्माता की जेब में बामुश्किलों 7 करोड़ रूपए ही आएंगे. इतना ही नहीं निर्माता ने गुरूवार 20 मार्च और शुक्रवार 21 मार्च को महज 99 रूपए में ‘द डिप्लोमेट’ दिखाने का भी ऐलान किया हुआ है, पर दर्शक जाने को तैयार नहीं.

निर्माता को सब से बड़ा झटका ओटीटी की तरफ से लगा है, सभी ओटीटी प्लेटफार्म ने इस फिल्म को लेने से मना कर दिया है. पहले निर्माता की तरफ से विक्कीपीडिया पर फिल्म की लागत 120 करोड़ बताई गई थी, लेकिन 21 मार्च की शाम 5 बजे विक्कीपीडिया पर फिल्म का बजट 20 करोड़ और सात दिन में इकट्ठा की गई राशि 18 करोड़ एक लाख रूपए दिखा रहा है. यहां याद दिला दें कि फिल्म की नायिका सादिया खातिब का पीआर ‘यूनिवर्सल कम्यूनीकेशन’ कर रहा है, जिस के मालिक पराग देसाई हैं. और फिल्म का पीआर टीसीरीज की अपनी आंतरिक पीआर टीम कर रही है. अब किस ने क्या सलाह दी, पता नहीं मगर एक अच्छी फिल्म को निर्माताओं ने खुद ही डुबा डाला.

2017 में बतौर लेखक व निर्देशक अविनाश दास ने स्वरा भाक्सर को मेन लीड में ले कर फिल्म ‘अनारकली आफ आरा’’ बनाई थी जिसे काफी सराहा गया था. इस के बाद अविनाश दास ने ‘शी’, ‘रात बाकी है’, ‘रन अवे लुगाई’ जैसी फिल्में निर्देशित कीं. और अब अविनाश दास ने ‘इन गलियों में’ का निर्देशन किया है. इस रोमांटिक कौमेडी फिल्म को दर्शक ही नहीं मिले. इस की सब से बड़ी वजह यह रही कि फिल्म के रिलीज के बाद भी दर्शक को पता नहीं चला कि ‘इन गलियों में’ नामक कोई फिल्म रिलीज हुई है. जबकि निर्माता ने फिल्म का पीआरओ ‘यूनिवर्सल कम्युनिकेशन’ को रखा हुआ है, जिस के मालिक पराग देसाई हैं. यह वही हैं जो कि अमिताभ बच्चन, अजय देवगन, रोहित शेट्टी सहित कई दिग्गज कलाकारों और लगभग हर बड़ी फिल्म के पीआओ होते हैं.

फिल्म ‘इन गलियो में’ ने बौक्स औफिस पर 7 दिन के अंदर एक करोड़ रूपए भी नहीं एकत्र किए. निर्माता अपनी शर्मिंदगी को बचाने के लिए फिल्म के बजट और बौक्स औफिस कलैक्शन पर कुछ भी कहने को तैयार नहीं हैं.

Healthy Life : नींद आने में नहीं होगी परेशानी, इस आसान ट्रिक को आजमाएं

Healthy Life : बिस्तर पर मोजे पहनने से आप को जल्दी नींद आने में मदद मिल सकती है और रात में बेहतर नींद आ सकती है. बिस्तर पर मोजे पहनना कूलिंग मैकेनिज्म (ठंडा करने की प्रक्रिया) के रूप में काम करता है, क्योंकि मोजे पहनने से आप के पैरों का तापमान नियंत्रित रहता है, जो आप के पूरे शरीर के तापमान को प्रभावित कर सकता है.

2018 के एक अध्ययन से पता चला है कि पैरों में बहुत सारी ब्लड वेसेल्स होती हैं, जो शरीर के तापमान को कंट्रोल करने में मदद करती हैं. जब हम मोजे पहनते हैं तो ये ब्लड वेसेल्स को गरम होने से रोकते हैं, जिस से शरीर को आरामदायक स्थिति में रखा जाता है. हमारे शरीर का तापमान रात के दौरान स्वाभाविक रूप से गिरता है और यह अच्छी नींद के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है.

स्टडी में पाया गया कि औसतन जो लोग 7 घंटे की नींद की अवधि के दौरान मोजे पहनते थे वे 7.5 मिनट पहले सो गए, 7.5 कम बार जागना पड़ा और उन्हें 32 अतिरिक्त मिनट की नींद मिली.

हमारे शरीर में कुछ प्रमुख जगहें हैं जहां गरमी का आदानप्रदान ज्यादा होता है. पैरों के तलवे उन में से एक हैं. मोजे पहनने से शरीर के तापमान में सुधार हो सकता है, क्योंकि यह रक्त वाहिकाओं के विस्तार में मदद करता है. जैसे ही पैरों में ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है, शरीर से गरमी बाहर निकलने लगती है और शरीर ठंडा होता है, जिस से बेहतर नींद मिलती है. यह कूलिंग प्रक्रिया शरीर को आरामदायक स्थिति में लाती है, जिस से व्यक्ति गहरी नींद में जा सकता है.

Trending Debate : औरंगजेब की कब्र पर राजनीतिक मातम

Trending Debate : आजकल ट्रेंड चल पड़ा है कि जिस को भी बड़ा नेता बनना है वो हिंदू भावनाओं को भड़काने वाला कोई विवादित बयान दे दे तो रातोंरात पोपुलर हो जाता है. इस समय औरंगजेब और औरंगजेब की कब्र को लेकर खूब विवादास्पद बयान दिए जा रहे हैं. जाहिर है कि कब्र की आग अभी और फैलेगी और यह मामला बाबरी मसजिद से भी ज्यादा गंभीर हो सकता है.

महाराष्ट्र सहित पूरे उत्तर भारत में औरंगजेब की कब्र को लेकर सियासत गरम है. फिल्म छावा जो छत्रपति शिवाजी और उन के पुत्र छत्रपति संभाजी महाराज के जीवन और मुगल शासक औरंगजेब से उन के युद्ध पर आधारित है, की रिलीज के बाद हिंदू संगठन औरंगजेब के खिलाफ आग उगल रहे हैं. खुल्दाबाद से औरंगजेब की कब्र को उखाड़ फेंकने के लिए विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और भाजपा के कार्यकर्ता सड़क पर हैं. मजे की बात यह है कि जिस फिल्म को देख कर हिंदूवादी उग्र हो रहे हैं, उस फिल्म की कहानी इतिहास के पन्नों से नहीं बल्कि मराठी के उपन्यासकार शिवाजी सावंत के मराठी उपन्यास ‘छावा’ से उठाई गई है.

हिंदू संगठनों ने महाराष्ट्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर सरकार द्वारा कब्र को नहीं हटाया जाएगा तो हम अयोध्या की बाबरी मसजिद की तरह इसे खुद हटा देंगे. इस के बाद से छत्रपति संभाजी नगर (औरंगाबाद) में स्थित औरंगजेब की कब्र की सुरक्षा बढ़ा दी गई है और बड़ी संख्या में पुलिस बल की वहां तैनाती है.

गौरतलब है कि औरंगजेब की कब्र भारत की ऐतिहासिक विरासत है. इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का संरक्षण प्राप्त है. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के कानून के अनुसार, कोई भी प्राचीन स्मारक या संरचना जो कम से कम 100 वर्षों से मौजूद हो, उसे पुरातत्वीय स्थल या संरक्षित स्मारक माना जाता है. औरंगजेब की कब्र 1707 से खुल्दाबाद में मौजूद है. इस आधार पर केंद्र सरकार ने इसे संरक्षित स्मारक घोषित किया है और महाराष्ट्र की फडणवीस सरकार इस को चाह कर भी हटा नहीं सकती.

बावजूद इस के औरंगजेब की कब्र को ले कर कारसेवा की गूंज बिलकुल वैसे ही उठ रही है और माहौल कुछ उसी तरह गरम हो रहा है, जिस तरह बाबरी मसजिद विध्वंस के समय हुआ था. राम जन्मभूमि को ले कर शुरू हुई कारसेवा के पहले उत्तर प्रदेश के कई शहरों में दंगे शुरू हो गए थे. 17 मार्च को नागपुर के महाल में दो गुटों के बीच जिस तरह हिंसा भड़की उस ने दंगों के लिए धरातल तैयार कर दिया है. महाल के बाद देर रात हंसपुरी में भी हिंसा हुई. उपद्रवियों ने दुकानों में तोड़फोड़ की और वाहनों में आग लगा दी. इस दौरान जम कर पथराव भी हुआ. हिंसा के बाद कई इलाकों में कर्फ्यू लगा दिया गया है.

हिंसा की खबर जब उत्तर प्रदेश पहुंची तो श्री कृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास ने मुगल शासक औरंगजेब की कब्र पर बुलडोजर चलाने वाले को 21 लाख रुपए इनाम के तौर पर देने का ऐलान कर डाला. कहा कि ऐसी कब्र हिंदुस्तान में नहीं होनी चाहिए. अगर किसी को कब्र की जरूरत है तो पाकिस्तान ले जाए. इस से पहले एक लेखक मनोज मुन्तशिर ने औरंगजेब की कब्र पर शौचालय बनवाने का मशवरा भी दिया था.

आजकल ट्रेंड चल पड़ा है कि जिस को भी बड़ा नेता बनना है वो हिंदू भावनाओं को भड़काने वाला कोई विवादित बयान दे दे तो रातोंरात पोपुलर हो जाता है. इस समय औरंगजेब और औरंगजेब की कब्र को ले कर खूब विवादास्पद बयान दिए जा रहे हैं. जाहिर है कि कब्र की आग अभी और फैलेगी और यह मामला बाबरी मसजिद से भी ज्यादा गंभीर हो सकता है.

हैरानी की बात है कि जो शासक 300 साल पहले मर चुका है, दक्षिणपंथियों को उस की कब्र हटाने की याद अब आ रही है. गौर करिये कि जिस दिन नौसेना पोत चालक, हैलीकौप्टर पायलट, परीक्षण पायलट, पेशेवर नौसैनिक, गोताखोर, पशुप्रेमी, मैराथन धावक और नासा की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स विश्व कीर्तिमान रच कर, मानवज्ञान का दायरा विकसित करने के लिए अंतरिक्ष के रहस्यों को समेटे 289 दिन के बाद धरती पर वापस आ रही थीं, उस दिन हमारे देश के युवा एक 300 साल पुरानी कब्र खोदने को बेकरार हो रहे थे.

यह बात सच है कि औरंगजेब के हाथ कई राजाओं के खून से रंगे हुए हैं. खुद अपने बाप और भाइयों की ह्त्या का आरोप इस मुगल शासक पर है. पर सत्ता में रहे कितने ही शासक हैं जिन पर ऐसे आरोप हैं. कोई औरंगजेब अकेला तो ऐसा शासक नहीं है. हमारे तमाम धर्मग्रंथ सगे भाइयों और परिजनों के लहू से ही लाल हैं. उन की हत्याएं किसी बाहरी ने नहीं बल्कि सत्ता पाने की लालसा में उन के अपने लोगों ने की. क्या महाभारत का युद्ध किसी बाहरी से अपना राज्य बचाने के लिए हुआ था? आखिर भाईभाई में ही मारकाट मची थी और पूरे वंश को गाजर मूली की तरह रणभूमि में काट डाला गया था. सत्ता के लालच में आज के राजनेता अपने करीबियों का कत्ल कर देते हैं या करवा देते हैं तो सिर्फ औरंगजेब पर ही दोषारोपण क्यों?

अच्छेअच्छे राजाओं ने अपने राज को बढ़ाने के लिए क्रूरता की. अशोक महान का उदाहरण सामने है. उस ने तो इतना खून बहाया कि अंत में खुद ग्लानि से भर गया और सब कुछ छोड़ कर धर्म प्रचार में लग गया. उल्लेखनीय है कि सम्राट अशोक ने कलिंग पर 362 ईसा पूर्व में युद्ध किया था. इस युद्ध में एक लाख लोग मारे गए थे और इतने ही लोग युद्ध के बाद पैदा हुई परिस्थितियों से मरे थे. डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों को या तो बंदी बनाया गया था या निर्वासित किया गया था. मारे गए लोगों में से ज्यादातर लोग असैनिक थे. युद्ध के बाद अशोक उड़ीसा के धावली क्षेत्र गए, तो वहां एक नदी थी जो खून से लाल हो गई थी. इन तमाम दृश्यों और युद्ध भूमि में खूनखराबे, रोतेबिलखते लोगों को देख कर अशोक विचलित हो गया. इस युद्ध के बाद अशोक ने बौद्ध धर्म को अपना लिया.

औरंगजेब अपने पड़दादा अकबर के बाद सब से अधिक समय तक शासन करने वाला मुगल शासक था. उस के शासन में मुगल साम्राज्य अपने विस्तार के शिखर पर पहुंचा. औरंगजेब जब सत्ता में आया तो जो राज्य उस को विरासत में मिला था उस ने उस का विस्तार करना शुरू किय, जैसा कि हर राजा करता है. दक्षिण भारत उस से बाहर था, तो उस ने इस के लिए लड़ाइयां लड़ीं. औरंगजेब ने दक्कन से ले कर बदख़्शान (उत्तरी अफगानिस्तान) और बाल्ख (अफगान-उज़्बेक) तक अपने राज्य को फैलाया और लगभग आधी सदी (50 साल) तक सफलतापूर्वक राज किया. औरंगजेब की सफलता इस बात से आंकी जा सकती है कि उस की प्रजा ने उस को ‘आलमगीर’ का नाम दिया था. आलमगीर यानी विश्व विजेता. क्योंकि औरंगजेब ने हिंदुस्तान ही नहीं बल्कि उस के आसपास के क्षेत्रों को भी जीत कर भारत भूमि से मिलाया था. यह उपलब्धियां इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं. मगर भाजपा के शासनकाल में मुगल बादशाहों के खिलाफ जहर उगल कर समाज के ध्रुवीकरण की कोशिश अपने चरम पर है. कहीं उन के नाम पर रखे जिलों, शहरों, सड़कों के नाम बदले जा रहे हैं तो कहीं उन की कब्र उखाड़ फेंकने की कोशिश हो रही है.

आज की राजनीति में इतिहास के राजाओं के नाम का जम कर उपयोग हो रहा है. कहा जा रहा है कि हिंदू राजा महान थे और मुसलमान राजा खराब थे. यह सिर्फ ध्रुवीकरण कर हिंदू वोट पाने का एक तरीका है. ‘बांटो और राज करो’ का यह तरीका अंगरेजों और अंगरेज इतिहासकारों का इजाद किया हुआ है जिसे अंगरेजी में कहते हैं ‘कम्युनल राइटिंग औफ हिस्ट्री’ यानी इतिहास का सांप्रदायिक लेखन. उस का आधार होता है राजा के कार्य को उस के धर्म से जोड़ना जबकि वास्तव में किसी भी राजा को प्रजा के धर्म से कोई लेनादेना नहीं होता है. राजा जो कुछ भी करता है वह सत्ता और सम्पत्ति के लिए करता है और अपने राज्य के विस्तार के लिए करता है.

ऐसा सिर्फ औरंगजेब ने नहीं किया बल्कि हर शासक ने किया फिर चाहे वह हिंदू था या मुसलमान. मगर आम जनता को कहानी कुछ इस तरह सुनाई जाती है कि जैसे मुसलिम शासकों ने दूसरों की जगहों पर अतिक्रमण किया. इसे कैसे ठीक कहेंगे कि हिंदू राजा अगर अपने राज्य का विस्तार करे तो वह प्रतापी और महान. वह अश्वमेघ यज्ञ करे और घोड़ा छोड़ कर तमाम दूसरे राज्यों को अपने अधीन होने के लिए विवश करे तो वह प्रतापी राजा और वहीं अगर मुसलिम राजा अपने राज्य के विस्तार के लिए लड़ाई लड़े तो वह क्रूर और आक्रांता हो जाता है.

औरंगजेब को सब से विवादास्पद मुगल शासक कहा गया. उस का नाम हिंदुओं के मंदिर तोड़ने और हिंदू तीर्थ पर जजिया कर लगाने के लिए बदनाम है. लेकिन विकिपीडिया पर औरंगजेब के इन फैसलों और कृत्यों के बारे में काफी रोचक तथ्य मिलते हैं. विकिपीडिया लिखता है –

औरंगजेब द्वारा लगाया गया जिज्या/जज़िया कर उस समय के हिसाब से था. मुगल काल में यह कर पहले भी लगाया जाता था. मुगल शासक अकबर ने जज़िया कर को हटा दिया था, लेकिन औरंगजेब के समय यह दोबारा लागू किया गया. जज़िया सामान्य करों से अलग था जो गैरमुसलमानों को चुकाना पड़ता था. इस के 3 स्तर थे और इस का निर्धारण संबंधित व्यक्ति की आमदनी से होता था. इस कर के कुछ अपवाद भी थे. गरीबों, बेरोजगारों और शारीरिक रूप से अशक्त लोग इस के दायरे में नहीं आते थे. इन के अलावा हिंदुओं की वर्ण व्यवस्था में सब से ऊपर आने वाले ब्राह्मण और सरकारी अधिकारी भी इस से बाहर थे. मुसलमानों के ऊपर लगने वाला ऐसा ही धार्मिक कर जकात था जो हर अमीर मुसलमान के लिए देना जरूरी था.

विकिपीडिया लिखता है, आधुनिक मूल्यों के मानदंडों पर जज़िया निश्चितरूप से एक पक्षपाती कर व्यवस्था नजर आती थी. आधुनिक राष्ट्र, धर्म और जाति के आधार पर इस तरह का भेद नहीं कर सकते. इसीलिए जब हम 17वीं शताब्दी की व्यवस्था को आधुनिक राष्ट्रों के पैमाने पर देखते हैं तो यह बहुत अराजक व्यवस्था लग सकती है, लेकिन औरंगजेब के समय ऐसा नहीं था. उस दौर में इस के दूसरे उदाहरण भी मिलते हैं. जैसे मराठों ने दक्षिण के एक बड़े हिस्से से मुगलों को बेदखल कर दिया था. उन की कर व्यवस्था भी तकरीबन इसी स्तर की पक्षपाती थी. वे मुसलमानों से ज़कात वसूलते थे और हिंदू आबादी इस तरह की किसी भी कर व्यवस्था से बाहर थी.

अब अगर औरंगजेब द्वारा मंदिरों को तोड़ने की चर्चा करें तो स्थापित और ख्यात इतिहासकार कहते हैं कि उस ने ज्यादा से ज्यादा 15 मंदिर तोड़े, जिन्हें तोड़ने के पीछे वजह थी.

विश्व प्रसिद्ध इतिहासकार रिचर्ड ईटन के मुताबिक मुगल काल में मंदिरों को ढहाना दुर्लभ घटना थी और जब भी ऐसा हुआ तो उस के कारण राजनीतिक ही रहे. ईटन के मुताबिक वही मंदिर तोड़े गए जिन में विद्रोहियों को शरण मिलती थी या जिन की मदद से शहंशाह के खिलाफ साजिश रची जाती थी. उस समय मंदिर तोड़ने का कोई धार्मिक उद्देश्य नहीं था. उस की जड़ में राजनीतिक कारण ही थे.

उदाहरण के लिए औरंगजेब ने दक्षिण भारत में कभी भी मंदिरों को निशाना नहीं बनाया, जबकि उन के शासनकाल में ज्यादातर सेना वहां तैनात थी. उत्तर भारत में उन्होंने जरूर कुछ मंदिरों पर हमले किए जैसे मथुरा का केशव राय मंदिर लेकिन इस का कारण धार्मिक नहीं था. मथुरा के जाटों ने सल्तनत के खिलाफ विद्रोह किया था इसलिए यह हमला किया गया.

आजकल बुलडोजर बाबा भी मस्जिदों को और मुसलमानों की सम्पत्तियों को यही कह कर तोड़ रहे हैं कि उस में आतंकी, विद्रोही, बदमाश रहते हैं. कोई फर्क नहीं है. सत्ता में जो बैठा है उस को अपने खिलाफ कहीं विद्रोह की ज़रा भी सुगबुगाहट मिली नहीं कि वह उस विद्रोह को दबाने के लिए निकल पड़ता है. इंदिरा गांधी ने स्वर्ण मंदिर में सेना भेजी थी क्योंकि वहां विद्रोही गतिविधियों की सूचना थी. फिर औरंगजेब पर इतनी चिल्लपों क्यों?

डा. पट्टाभि सीतारमैया जो आजादी की लड़ाई में एक बड़े लीडर भी थे, की लिखी एक किताब है ‘फेदर्स एंड स्टोन’. इस किताब में वो लिखते हैं कि काशी का जो मंदिर तोड़ा गया था उस में कुछ अनैतिक काम चल रहे थे. ऐसे और भी कारण होंगे जिस के चलते औरंगजेब ने 12-15 मंदिर तोड़े. यह दुर्भाग्यपूर्ण था. पर सवाल यह उठता है कि अगर उस ने मंदिर तोड़े या वह हिंदूओं से नफरत करता था, तो उस ने बाकी मंदिरों को दान क्यों दिया?

औरंगजेब ने अनेक मंदिरों को संरक्षण दिया. किंग्स कालेज, लंदन की इतिहासकार कैथरीन बटलर लिखती हैं कि औरंगजेब ने जितने मंदिर तोड़े, उस से ज्यादा बनवाए थे. कैथरीन फ्रैंक, एम अथर अली और जलालुद्दीन जैसे विद्वान इस तरफ भी इशारा करते हैं कि औरंगजेब ने कई हिंदू मंदिरों को अनुदान दिया था जिन में बनारस का जंगम बाड़ी मठ, चित्रकूट का बालाजी मंदिर, इलाहाबाद का सोमेश्वर नाथ महादेव मंदिर और गुवाहाटी का उमानंद मंदिर सब से जानेपहचाने नाम हैं.

डा. विशम्भर नाथ पांडेय जो आजादी के आंदोलन से जुड़े थे और आजादी के बाद उड़ीसा के गवर्नर भी बने, ने एक किताब ‘फरमान औफ किंग औरंगजेब’ लिखी थी. इस किताब को लिखने से पहले उन्होंने अपने कई रिसर्च स्कौलर्स को दक्षिण भारत के मंदिरों के पुजारियों के पास भेज कर औरंगजेब द्वारा दिए गए आदेशों यानी फरमानों की प्रतियां इकट्ठा करवाई थीं. इन फरमानों से उन्हें पता चला कि औरंगजेब ने करीब सौ मंदिरों को बड़े दान दिए. अब यह आश्चर्य की बात है. यह बात दक्षिणपंथी सरकार के नेता कभी नहीं बताएंगे. गुवाहाटी (आसाम) में कामाख्या देवी का मंदिर, उज्जैन में महाकाल के मंदिर को और वृन्दावन में भगवन कृष्ण के मंदिर को औरंगजेब ने बड़े दान दिए. कहीं उस ने जागीरें दीं, कहीं आभूषण और स्वर्ण मुद्राएं दीं. तो औरंगजेब हिंदू विरोधी था इस बात को इतिहास नकारता है.

मुगल काल में भी भारत की ज्यादा प्रजा हिंदू थी और सत्ता में बैठा हर व्यक्ति इस बात को अच्छी तरह समझता है कि प्रजा की भावनाओं का आदर किए बगैर आप सुचारु रूप से राज्य नहीं कर सकते हैं. औरंगजेब ने तो 50 साल तक राज किया. उस की सेना में हिंदू राजा बड़ी संख्या में थे. वह हिंदू प्रजा को अपने साथ ले कर चला. औरंगजेब के दरबार में हिंदू अधिकारियों की संख्या 34 फ़ीसदी थी. उस में राजा जयसिंह (जो छत्रपति शिवाजी से मोर्चा लेने गए थे) दूसरे राजा जसवंत सिंह और तीसरे थे राजा रघुनाथ बहादुर, जो औरंगजेब का रेवेन्यू डिपार्टमेंट देखते थे. राजा रघुनाथ बहादुर राजा टोडरमल के पोते थे. वही राजा टोडरमल जो बादशाह अकबर के दरबार में ऊंचे ओहदे पर थे. तो मुगल प्रशासन हमेशा ही एक मिलाजुला प्रशासन था जिस में हिंदू राजपूत राजाओं को बड़ेबड़े ओहदे और सम्मान प्राप्त था.

छत्रपति शिवाजी महाराज के राज में भी बहुतेरे मुसलमान अधिकारी थे. उन के सब से बड़े अधिकारी थे मौलाना हैदर अली, जो उन के गोपनीय सचिव और सेनापति थे. उन का तोपखाना मुसलमान अधिकारी के नियंत्रण में काम करता था. ये सारी बातें इतिहास में दर्ज हैं और जिन को नकारा नहीं जा सकता है.

दरअसल सत्ता का आधार धर्म हो ही नहीं सकता. यह एक प्रमाणित सत्य है कि जिस ने भी अपनी सत्ता का आधार धर्म को बनाया, वह सत्ता कुछ ही समय में समाप्त हो गई. इतिहास को हिंदूमुसलमान के चश्मे से देखेंगे तो हिंसा और उपद्रव ही होंगे.

औरंगजेब किस तरह हिंदू विरोधी था जबकि उस के दरबार में सभी हिंदू त्यौहार मनाए जाते थे. ‘जश्ने चरागां’ यानी दिवाली और ‘जश्ने गुलाबी’ यानि होली यह दोनों ही त्यौहार खासी धूमधाम से मनाए जाते थे.

मुगल काल में ब्रज भाषा और उस के साहित्य को हमेशा संरक्षण मिला और यह परंपरा औरंगजेब के शासन में भी जारी रही. कोलंबिया यूनिवर्सिटी से जुड़ी इतिहासकार एलिसन बुश लिखती हैं कि औरंगजेब के दरबार में ब्रज को प्रोत्साहन देने वाला माहौल था. शहंशाह के बेटे आज़म शाह की ब्रज कविता में खासी दिलचस्पी थी. ब्रज साहित्य के कुछ बड़े नामों जैसे महाकवि देव को उन्होंने संरक्षण दिया था. इसी भाषा के एक और बड़े कवि वृंद तो औरंगजेब के प्रशासन में भी अधिकारी नियुक्त थे.

हिंदू धर्म की भक्ति परम्परा इसी मुगल शासनकाल में विकसित हुई. मुगल दौर में ही धार्मिक परम्पराओं का मेलजोल भी बढ़ा. गंगाजमुनी संस्कृति का विकास इस दौर में हुआ. हिंदूमुसलिम ने एकदूसरे के तौरतरीके, खानपान, पहनावा आदि को अपनाया. अगर मुगल हिंदूओं से नफरत करते तो हमारी महान भक्ति परम्परा को वे कतई विकसित न होने देते. भक्ति काल के अनेक बड़े कवि इसी दौर में हुए.

मुगलों के 300 साल तक शासन किया, अगर वे हिंदूओं से नफरत करते होते तो हिंदू धर्म समाप्त क्यों नहीं हुआ? वह तो इस दौर में खूब उन्नत हुआ. खूब मंदिरों का निर्माण हुआ. हिंदू बनाम मुसलिम का राग अलापना अंगरेजों ने शुरू किया और बाद में चल कर साम्प्रदायिक ताकतों ने इस को पकड़ लिया और उस के आधार पर हिंदूमुसलमानों को आपस में लड़वा कर अपना उल्लू सीधा करते रहे. मुसलिम लीग ने हिंदुओ के खिलाफ नफरत फैलाई. हिंदू महासभा और आरएसएस ने मुसलमानों के खिलाफ नफरत फैलाई. एक लम्बे समय से हिंदूमुसलिम कार्ड खेल कर भाजपा सत्ता में है. यह उस का अमोघ अस्त्र है जो कभी खाली नहीं जाता.

Hindi Story : दत्तक बेटी ने झुका दिया सिर

Hindi Story : लंदन के वेंबली इलाके में ज्यादातर गुजराती रहते हैं. नैरोबी से लंदन आ कर बसे घनश्याम सुंदरलाल अमीन भी अपनी पत्नी सुनंदा के साथ वेंबली में ही रहते थे. वे लंदन में अंडरग्राउंड ट्रेन के ड्राइवर थे. नौकरी से रिटायर होने के बाद वे पत्नी के साथ आराम से रह रहे थे.

घनश्यामभाई को सोशल स्कीम के तहत अच्छा पैसा मिल रहा था. इस के अलावा उन की खुद की बचत भी थी. उन्हें किसी चीज की कमी नहीं थी. बस, एक कमी के अलावा कि वे बेऔलाद थे. गोद में खेलने वाला कोई नहीं था, जिस का पतिपत्नी को काफी दुख था.

किसी दोस्त ने घनश्यामभाई को सलाह दी कि वे कोई बच्चा गोद ले लें. ब्रिटेन में बच्चा गोद लेना बहुत मुश्किल है, वह भी भारतीय परिवार के लिए तो और भी मुश्किल है, इसलिए घनश्यामभाई ने अपने किसी भारतीय दोस्त की सलाह पर कोलकाता की एक स्वयंसेवी संस्था से बात की. उस संस्था ने एक अनाथाश्रम से उन का परिचय करा दिया.

अनाथाश्रम वालों ने घनश्यामभाई से कोलकाता आने को कहा. वे पत्नी के साथ कोलकाता आ गए.

कोलकाता के उस अनाथाश्रम में उन्हें सुचित्र नाम की एक लड़की पसंद आ गई. वह 15 साल की थी. जन्म से बंगाली और महज बंगाली व हिंदी बोलती थी. देखने में एकदम भोली, सुंदर और मुग्धा थी.

पतिपत्नी ने सुचित्र को पसंद कर लिया. सुचित्र भी उन के साथ लंदन जाने को तैयार हो गई. घनश्यामभाई ने सुचित्र को गोद लेने की तमाम कानूनी कार्यवाही पूरी कर ली. सुचित्र को वीजा दिलाने में तमाम मुश्किलों का सामना करना पड़ा. तरहतरह के प्रमाणपत्र देने पड़े. आखिरकार 6 महीने बाद सुचित्र को वीजा मिल गया.

सुचित्र अब लंदन पहुंच गई. उस के लिए वहां सबकुछ नया नया था. देश नया, दुनिया नई, भाषा नई, लोग नए. वहां उस का एक स्कूल में दाखिल करा दिया गया. उस ने जल्दी ही इंगलिश भाषा सीख ली. वह गोरी थी और छोटी भी, इसलिए जल्दी से गोरे बच्चों के साथ घुलमिल गई. स्कूल में गुजराती, पंजाबी और बंगलादेश से आए परिवारों के तमाम बच्चे पढ़ते थे.

सुचित्र अब बड़ी होने लगी. वह अकेली लंदन में अंडरग्राउंड ट्रेन में सफर कर सकती थी. वह बिलकुल अकेली पिकाडाली तक जा सकती थी. वह पढ़ने में भी अच्छी थी.

सुचित्र को गोद लेने वाले घनश्यामभाई और उन की पत्नी सुनंदा खुश थे अपनी इस बेेटी से. छुट्टी के दिनों में वे कभी उसे मैडम तुसाद म्यूजियम दिखाने ले जाते तो कभी उसे हाइड पार्क घुमाने ले जाते. दोस्तों के घर पार्टी में भी वे सुचित्र को हमेशा साथ रखते. सुचित्र सुनंदा को ‘मम्मी’ कहती तो वे खुश हो जातीं. उन्हें ऐसा लगता कि सुचित्र उन्हीं की बेटी है. वह स्कूल तो जा ही रही थी, अब कभीकभार अपनी सहेली के घर रुक जाती. समय के साथ अब वह हर शनिवार को सहेली के घर रुकने की बात करने लगी थी. अभी वह 17 साल की ही थी.

एक दिन सुनंदा को पता चला कि सुचित्र घर से तो अपनी सहेली के घर जा कर रुकने की बोल कर गई थी, पर वह सहेली के घर गई नहीं थी. उन्होंने सुचित्र से सख्ती से पूछताछ की तो सुचित्र खीज कर बोली, “मैं कहीं भी जाऊं, इस से आप को क्या मतलब…”

सुचित्र की इस बात से घनश्यामभाई और सुनंदा को गहरा धक्का लगा. कुछ दिनों बाद एक दूसरी घटना घटी. सुचित्र अकसर स्कूल नहीं जाती थी. घनश्यामभाई और सुनंदा ने जब उस से पूछा तो उस ने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया.

पतिपत्नी ने सुचित्र की सहेलियों से पूछताछ की तो पता चला कि सुचित्र सुखबीर नाम के एक पंजाबी लड़के के साथ घूमती है. वह स्कूल छोड़ कर उस के साथ बाहर घूमने चली जाती है.

घनश्यामभाई ने शाम को सुचित्र से पूछा, “मुझे पता चला है कि तुम सुखबीर नाम के किसी लड़के के साथ घूमती हो, क्या यह सच है?”

यह सुन कर सुचित्र ने कहा, “मैं कहां जाती हूं और बाहर जा कर क्या करती हूं, यह आप को बिलकुल नहीं पूछना चाहिए.”

सुनंदा ने कहा, “तुम हमारी बेटी हो. हमें चिंता होती है. तुम अभी 17 साल की ही तो हो.”

“मैं आप की बेटी नहीं हूं. आप ने अपने फायदे के लिए मुझे गोद लिया है. मैं आप की कोख से पैदा नहीं हुई हूं. मेरे ऊपर आप के बहुत कम अधिकार हैं, समझीं?”

“मतलब?” सुनंदा ने पूछा.

“मैं तुम्हारे शरीर का कोई भी हिस्सा नहीं हूं. मेरे शरीर पर मेरा ही अधिकार है?”

सुचित्र की बात सुन कर घनश्यामभाई को गुस्सा आ गया. उन्होंने सुचित्र को एक तमाचा मार दिया.

सुचित्र चिल्लाई, “अगर दूसरी बार आप ने ऐसा किया तो मैं पुलिस बुला लूंगी.”

घनश्यामभाई ने कहा, “मैं खुद ही पुलिस को बताऊंगा कि मेरे द्वारा गोद ली गई बेटी पढ़ने की उम्र में गलत काम करती है. तुम्हें सामाजिक काउंसलिंग में भेज दूंगा।. उस के बाद भी नहीं सुधरी तो फिर भारत वापस भेज दूंगा.”

भारत वापस भेजने की बात सुन कर सुचित्र सोच में पड़ गई. वह एकदम चुप हो गई और अपने बैडरूम में चली गई. अगले दिन उठ कर उस ने मम्मीपापा से माफी मांगी. यह सुन कर घनश्यामभाई और सुनंदा शांत हो गए.

सुनंदा ने कहा, “देखो बेटा, यह तुम्हारी पढ़नेलिखने की उम है. तुम अच्छी तरह पढ़लिख कर अपना कैरियर बना लो. अभी तुम टीनएज हो. जिस लड़के के साथ मन हो, नहीं घूम सकती हो.”

सुचित्र ने सिर झुका कर कहा, “मम्मी, इस तरह की गलती अब दोबारा नहीं करूंगी.”

इस के बाद सुचित्र नियमित रूप से स्कूल जाने लगी. धीरेधीरे इस बात को काफी समय बीत गया.

एक दिन घनश्यामभाई और सुनंदा के पड़ोसियों ने पुलिस से शिकायत की कि हमारे बगल वाले घर से बहुत तेज बदबू आ रही है. तुरंत पुलिस आ गई. घर का दरवाजा बंद था, पर अंदर से ताला नहीं लगा था. पुलिस ने धक्का मारा तो दरवाजा खुल गया.

पुलिस ने अंदर जा कर देखा तो बैडरूम में घनश्यामभाई और उन की पत्नी की लाशें पड़ी थीं. पूछताछ में पड़ोसियों ने बताया कि इन के साथ गोद ली गई एक बेटी भी रहती थी. उस समय वह घर में नहीं थी.

दोनों लाशों को पुलिस ने पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. उन की गोद ली गई बेटी गायब थी. पता चला कि वह कई दिनों से स्कूल भी नहीं गई थी. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पता चला कि पतिपत्नी की मरने से पहले खाने मेेें नींद की दवा दी गई थी. उस के बाद घनश्यामभाई की हत्या चाकू से और सुनंदा की हत्या मुंह पर तकिया रख कर की गई थी.

पुलिस का पहला शक मारे गए पतिपत्नी की गोद ली गई बेटी सुचित्र पर गया. उन्होंने घनश्यामभाई और सुचित्र के मोबाइल का काल रिकौर्ड चैक किया. 2 ही दिनों में पुलिस सुचित्र के बौयफ्रैंड सुखबीर के घर पहुंच गई.

सुखबीर अकेला ही अपनी विधवा मां के साथ रहता था. सुचित्र भी उसी के घर पर मिल गई. पुलिस ने दोनों से सख्ती से पूछताछ की तो सुचित्र और सुखबीर ने स्वीकार कर लिया कि उन्होंने प्रेम का विरोध करते की वजह से घनश्यामभाई और सुनंदा की हत्या की है.

सुचित्र ने बताया, “उस रात मैं ने ही अपने मम्मीपापा के खाने में नींद की गोलियां मिला दी थीं, जिस से वे जाग न सकें. दोनों गहरी नींद सो गए तो मैं ने सुखबीर को बुला लिया. उस के बाद मम्मी के मुंह पर तकिया रख कर पूरी ताकत से दबाए रखा तो उन की सांसों की डोर टूट गई.

“मम्मी के छटपटाने की आवाज सुन कर मेरे पापा जाग गए. सुखबीर अपने साथ चाकू लाया था. उसी चाकू से उस ने पापा पर ताबड़तोड़ वार कर के उन्हें बुरी तरह घायल कर दिया. उस के बाद हम दोनों भाग गए.”

दोनों के बयान सुन कर पुलिस हैरान रह गई. सुचित्र अभी नाबालिग थी. पुलिस ने उस की मैडिकल जांच कराई तो पता चला कि वह पेट है. सुचित्र ने जो किया, उसे सुन कर तो अब यही लगता है कि इस तरह बच्चे को गोद लेने में भी कई बार सोचना पड़ेगा.

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