अगर आप अपने बैंक अकाउंट की डिटेल प्राप्त करने के लिए भाग दौड़ करते हैं, बैंक या एटीम पर जाते हैं तो अब आपको ऐसा करने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है और ना ही किसी भी तरह का कोई ऐप अपने फोन में डाउनलोड करने की जरूरत है. ऐसा इसलिए क्योंकि अब आप बड़ी ही आसानी से और बिना किसी परेशानी के घर बैठे अपने अकाउंट से संबंधित सभी डिटेल्स प्राप्त कर सकते हैं, वो भी फोन में किसी भी तरह का ऐप डाउनलोड किये बिना. आप सोच रहे होंगे कि कैसे? तो आपकी जानकारी के लिए बता दें कि ऐसा करने के लिए आपको बस कुछ आसान से कोड्स डायल करने होंगे. ये USSD कोड्स हैं. जो हर बैंक के लिये अलग-अलग हैं.
आपका अकाउंट चाहे जिस भी बैंक में हो उसका ऐप डाउनलोड किये बिना इन USSD कोड्स को डायल कर आप अपने बैंक अकाउंट की डिटेल्स की जानकारी ले सकते हैं. ये USSD कोड्स हर बैंक के लिये अलग-अलग हैं. इन कोड्स को डायल करने के बाद मोबाइल बैलेंस की तरह ही बैंक अकाउंट की जानकारी प्राप्त की जा सकती है. जब आप इन कोड़्स का इस्तेमाल पहली बार करेंगे तो आपको कुछ डिटेल्स के साथ इसमें रजिस्टर करना होगा.
जानें किस बैंक के लिये है क्या USSD कोड-
पंजाब नेशनल बैंक में अगर आपका अकाउंट है तो आपको *99*42# कोड डायल करना होगा. कोड डायल करने के बाद आप निर्देशों का पालन करेंगे और आपके बैंक अकाउंट की डिटेल्स आपके सामने होगी.
YES बैंक के कस्टमर *99*66# कोड डायल कर के बैंक अकाउंट की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं.
अगर आपका बैंक अकाउंट SBI में है तो आपको *99*41# कोड डायल करना होगा.
UCO बैंक के लिए *99*56# कोड डायल करना होगा.
HDFC बैंक के लिए *99*43# कोड डायल करना होगा.
जिन लोगों को ICICI बैंक की जानकारी प्राप्त करनी है उन्हें *99*44# कोड डायल करना होगा.
AXIS बैंक के कस्टमर *99*45# डायल कर के बैंक अकाउंट की डिटेल्स पता कर सकते हैं.
केनरा बैंक में जिन लोगों का अकाउंट है उन्हें *99*46# कोड डायल करना होगा.
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क्या आपको पता है की अब पेटीएम के जरिए आप मुंबई के डब्बावालों को पेमेंट कर सकते हैं, अगर नहीं पता तो चलिये हम आपको बताते हैं, अब पेटीएम के जरिए भी डब्बावाला भोजन के लिए भुगतान कर सकेंगे. पेटीएम पेमेंट्स बैंक ने मुंबई के डब्बावाला एसोसिएशन के साथ मिलकर नकदी में भुगतान की समस्या को दूर करने के मद्देनजर भागीदारी में काम करने का फैसला लिया है.
पेटीएम पेमेंट्स बैंक की प्रबंध निदेशक व सीईओ रेणु सत्ती ने कहा, “मुंबई के डब्बावाला ने विश्वस्तरीय सप्लाई चेन मैनेजमेंट की मिसाल स्थापित कर दुनिया में अपनी पहचान बनाई है. हमें खुशी है कि हम उनके मजबूत नेटवर्क को अपना पेटीएम क्यूआर कोड व बैंकिंग सेवा मुहैया करा रहे हैं . इस भागीदारी का लाभ दो लाख से ज्यादा मुंबईकरों को मिलेगा, जो पेटीएम के जरिए अब डब्बावालों को भुगतान कर पाएंगे.
मुंबई में डब्बावालों का एक मजबूत नेटवर्क
उन्होंने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि मुंबई में डब्बावालों का एक मजबूत नेटवर्क है, जो रोजाना दो लाख मुंबईकरों को घर का पका भोजन डिलीवर करते हैं. डब्बावाला एसोसिएशन से करीब 5,000 डब्बावाले जुड़े हैं, जो अब पेटीएम क्यूआर कोड के जरिये अपने उपभोक्ताओं से भोजन के बदले में भुगतान स्वीकार कर पाएंगे. साथ ही, पेटीएम पेमेंट्स बैंक में बैंक अकाउंट्स खोलकर वे बैंकिंग के साथ ही अन्य वित्तीय सेवाओं का लाभ भी उठा सकेंगे .
पेटीएम का एटीएम
डब्बावाले बैंकिंग आउटलेट्स ‘पेटीएम का एटीएम’ में जाकर व्यक्तिगत बैंकिंग का लाभ उठा सकते हैं. जहां वे नकदी जमा कर सकते हैं और निकाल भी सकते हैं. बचत खाते की जमा पर उनको 4 प्रतिशत ब्याज मिलेगा और धन प्रबंधन खाते की जमा पर व्याज दर 6.85 प्रतिशत मिलेगा. मुंबई के डब्बावाला के साथ-साथ पेटीएम इकोसिस्टम में बैंक का मिशन देश की 50 करोड़ आबादी को मुख्य धारा की अर्थव्यवस्था में लाना है .
डब्बावाला एसोसिएशन की ओर से कहा गया कि नकदी स्वीकार करना थोड़ा मुश्किल हो रहा था, लेकिन अब पेटीएम क्यूआर-बेस्ड मोबाइल पेमेंट्स से इस समस्या का हल हो गया है. एसोसिएशन ने कहा, “भारत तेजी से डिजिटल फस्र्ट इकोनौमी की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में हम भारत के सबसे बड़े डिजिटल बैंक से जुड़कर बेहद उत्साहित महसूस कर रहे हैं.
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फेसबुक के स्वामित्व वाली मैसेजिंग सेवा कंपनी व्हाट्सएप भारत में नए भुगतान फीचर का परीक्षण कर रही है, जो आपको व्हाट्सएप के जरिए धन भेजने में सक्षम बनाएगी. जी हां, बहुत जल्द इसका इस्तेमाल कर आप अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को मैसेज के साथ ही साथ पैसे भी भेज वा हासिल कर सकेंग. व्हाट्सएप भारत में अपने यूपीआई बेस्ड पेमेंट फीचर्स के टेस्टिंग मोड की शुरूआत भी कर चुका है.
टेकक्रंच ने कंपनी की योजनाओं से परिचित सूत्रों के हवाले से बताया कि यह फीचर फिलहाल बीटा मोड में है और इसलिए इसकी सार्वजनिक रूप से घोषणा नहीं की गई है, क्योंकि यह अभी व्यापक स्तर पर उपलब्ध नहीं है. जब यह फीचर लौन्च होगा तो नया व्हाट्सएप ई-वालेट प्लेटफौर्म पेटीएम और पेमेंट फीचर वाले मैसेजिंग सेवाओं को कड़ी चुनौती देगा. खासतौर से गूगल द्वारा हाल में लौन्च किए गए तेज वालेट को इससे कड़ी चुनौती मिलेगी.
यह भुगतान सेवा यूपीआई (यूनीफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) के माध्यम से काम करेगी और कई बैंकों का इसे समर्थन मिलेगा, जिनमें भारतीय स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और ऐक्सिस बैंक शामिल हैं. बीटा परीक्षकों ने पाया है कि व्हाट्सएप का इंटरफेस समर्थन वाले बैंकों की बड़ी सूची दिखा रहा है और व्हाट्सएप के सेटिंग्स मेन्यू में पेमेंट फीचर का विकल्प दिया गया है.
कैसे भेज सकेंगे पैसे
इस फीचर को अटैचमेंट मेन्यू के जरिये चैट विंडो में एक्सेस किया जा सकता है. बताया जा रहा है कि यह विकल्प इसके साथ गैलरी, वीडियो और डौक्यूमेंट में भी उपलब्ध होगा. इसमें पेमेंट्स पर क्लिक करते ही डिस्कलेमर विंडो खुल जाएगा. इसके बाद बैंकों की लिस्ट आएगी और आप उनमें से अपने बैंक का चुनाव कर सकते हैं.
अपने बैंक अकाउंट पर क्लिक करते ही यह यूपीआई से कनेक्ट हो जाएगा. अगर आपने अब तक यूपीआई प्लेटफौर्म का इस्तेमाल नहीं किया है तो आपसे authentication पिन क्रिएट करने के लिए कहा जाएगा. अगर यूपीआई अकाउंट नहीं है तो इसे बनाने के लिए कहा जाएगा.
आप यूपीआई ऐप या अपने बैंक की वेबसाइट के जरिये यह अकाउंट बना सकते हैं. हालांकि पैसा भेजने और पाने वाले दोनों के पास व्हाट्सएप पेमेंट फीचर होना चाहिए.
फिलहाल यह आईओएस एंड्रौयड पर चुनिंदा व्हाट्सएप बीटा यूजर्स के लिए उपलब्ध है. इसका इस्तेमाल कर वे सरकार के यूपीआई स्टैंडर्ड का इस्तेमाल कर पैसा भेज और मंगा सकते हैं. यह फीचर ios के लिए व्हाट्सएप वर्जन 2.18.21 पर और एंड्रौयड के लिए 2.18.41 पर उपलब्ध होगा. माना जा रहा कि इस नए फीचर्स के इस्तेमाल से देश में डिजिटल पेमेंट को काफी रफ्तार मिलेगी.
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इन दिनों कई छोटे पर्दे के कलाकार बौलीवुड में एंट्री के लिए तैयार हैं. जहां अंकिता लोखंडे फिल्म ‘मणिकर्णिका’ में नजर आएंगी तो वहीं मौनी रौय फिल्म ‘गोल्ड’ से अपना डेब्यू करने को तैयार हैं. इस कड़ी में अब टीवी सीरियल ‘ससुराल सिमर का’ से मशहूर हुई अदाकारा दीपिका कक्कड़ का भी नाम जुड़ गया है.
बता दें, दीपिका बहुत ही जल्द बौलीवुड में जेपी दत्ता की अगली फिल्म ‘पलटन’ से अपना डेब्यू करने जा रही हैं. इस बात की जानकारी खुद दीपिका ने अपने इंस्टाग्राम पर दी है. दीपिका इंस्टाग्राम पर पलटन का पोस्टर शेयर करते हुए लिखा, ‘इससे बेहतर और क्या हो सकता है कि मेरी पहली फिल्म जेपी दत्ता के साथ है. पलटन का हिस्सा बनना बहुत ही सम्मान की बात है.’
जेपी दत्ता ने एक बयान में पलटन के बारे में कहा था फिल्म उन रिश्तों के बारे में है जो जवान पीछे छोड़ जाते हैं और इससे परिवारों पर कैसा असर पड़ता है बौर्डर में जवानों के प्यार के बारे में दिखाया गया था लेकिन पलटन में उनके पैरेंट्स और भाई-बहनों के बारे में भी दिखाया जाएगा इसके साथ ही युद्ध के समय जवानों के भाईचारे को भी फिल्म में दिखाया जाएगा.
जवानों की जिंदगी पर आधारित इस फिल्म में हर्षवर्धन राणे, अर्जुन रामपाल, गुरमीत चौधरी, सिद्धांत कपूर, सोनल चौहान और ईशा गुप्ता जैसे स्टार्स नजर आएंगे. इससे पहले जेपी दत्ता ‘बौर्डर’ और ‘एलओसी करगिल’ जैसी फिल्में बना चुके हैं.
बता दें दीपिका ने 2011 से 2017 तक ‘ससुराल सिमर का’ में लीड कैरेक्टर सिमर का किरदार निभाया था. ये सीरियल सुपरहिट रहा था, और सिमर के किरदार को बहुत पसंद भी किया गया था. दीपिका कक्कड़ शोएब इब्राहिम को डेट कर रही हैं दोनों साथ में ससुराल सिमर का में काम करते थे. इन दिनों दीपिका ‘एंटरटेनमेंट की रात’ में नजर आ रही हैं, और दर्शकों को हंसाने का काम कर रही हैं. ‘पलटन’ की शूटिंग इन दिनों चंडीगढ़ में चल रही है. फिल्म में सोनल चौहान और ईशा गुप्ता भी हैं.
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अपनी बल्लेबाजी से दुनिया के दिग्गज गेंदबाजों को दहशत में रखने वाले वेस्टइंडीज के क्रिकेटर क्रिस गेल लग्जरी लाइफ जीते हैं. आपने उन्हें अक्सर महंगी गाड़ियों में घूमते देखा होगा. गेल के पास मर्सडीज, औडी और फरारी समेत विंटेज रौल्स रौयस जैसी बेशकीमती कार हैं. गेल आज करोड़ों के घर में रहते हैं लेकिन कभी उनके पास रहने की टीन का घर होता था. उनके पास खाने के लिए पैसे तक नहीं होते थे. तंग हालत के चलते गेल पढ़ाई तक पूरी नहीं कर सके.
गेल खुद अपनी औटोबायोग्राफी में इस बात का खुलासा कर चुके हैं कि बचपन में उन्होंने खाली बोतलों को कचरे से बीनकर उन्हें बेचा. इतना ही नहीं उन्होंने एक वक्त के खाने के लिए कई बार चोरी भी की.
तिहरा शतक ठोक जब लारा को कर दिया था चिंतित
गेल ने ‘सिक्स मशीन: आई डोंट लाइक क्रिकेट…आई लव इट’ किताब में लिखा है, ‘जब ब्रायन लारा उस मैच में चार रन पर आउट हो गए थे तब वह ड्रेसिंग रूम में बैठकर किताब पढ़ रहे थे. थोड़ी थोड़ी देर में वह बालकनी में जाकर स्कोरबोर्ड देखते और फिर आकर बैठ जाते. रामनरेश सरवन उन्हें देख रहा था. जितनी बार ब्रायन बाहर आकर मेरा स्कोर देखते, उनकी चिंता बढ़ जाती.
जब मैं लंच और चाय के दौरान आया तो उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा. कोई सलाह नहीं दी कि ऐसे ही खेलते रहो या टीम के लिए बड़ा स्कोर बनाओ. जब मैं वापस गया तो फिर वह कुछ देर ड्रेसिंग रूम में और कुछ देर बालकनी में आकर मेरा स्कोर देखने लगे.’ हालांकि गेल 317 रन पर आउट हो गए और लारा का 400 रन का रिकौर्ड नहीं तोड़ सके.
बाएं हाथ के इस बल्लेबाज के अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन पर अगर नजर डालें, तो उन्होंने 103 टेस्ट मैचों की 182 पारियों में 11 बार नाबाद रहते हुए 7215 रन बनाए हैं. इस दौरान गेल ने 15 शतक, 2 दोहरे शतक और 37 अर्धशतक जड़े. गेल का टेस्ट में सर्वाधिक स्कोर 333 रहा है. वहीं 275 वनडे मुकाबलों में गेल 85.57 के स्ट्राइक से 9420 रन बना चुके हैं. इस दौरान गेल 22 शतक और 48 फिफ्टी लगा चुके हैं. गेल टी20 के शानदार बल्लेबाज माने जाते हैं और ये उन्होंने इस फौर्मेट में 2 शतक लगाकर साबित भी किया है. गेल ने टी20 में 2 शतक और 13 अर्धशतक की मदद से 1589 रन बनाए हैं.
हालांकि गेल फिलहाल किग्स इलेवन पंजाब के लिये आइपीएल में खेल रहे हैं, नीलामी के दौरान तो ऐसा लग रहा था कि इस साल आईपीएल क्रिस गेल के बगैर ही खेला जाएगा. पहले दो दिन क्रिस गेल के अनसोल्ड जाने के बाद उनके फैंस भी निराश हो गए थे, लेकिन अंतिम समय में उन्हें बेस प्राइज पर पंजाब द्वारा खरीद लिया गया. पंजाब की टीम ने गेल की तस्वीर को शेयर करते हुए लिखा, ”पंजाब आने के लिए क्रिस गेल तो बहुत पहले से ही तैयार बैठे हैं”.
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संजय लीला भंसाली की फिल्म ‘‘पद्मावत’’ के सिनेमाघरों में प्रदर्शन की तारीख बदलने की वजह से 2018 में प्रदर्शित होने वाली सभी फिल्मों का गणित गड़बड़ा गया है. फिल्म ‘पद्मावत’ पहले 01 दिसंबर 2017 को प्रदर्शित होनी थी, मगर विवादों के चलते यह फिल्म 25 जनवरी को प्रदर्शित हुई, जिसके बाद ‘पैडमैन’‘ अय्यारी’, ‘परमाणु’, ‘परी’ सहित दो दर्जन से अधिक फिल्मों के सिनेमघरों में पहुंचने की तारीखें बदल गयी.
अब खबर है कि वासु भगनानी ने अपनी ‘‘पूजा इंटरटेनमेंट’’ के बैनर तले बनी आलिया सेन शर्मा निर्देशित रोमांटिक कौमेडी फिल्म ‘‘दिल जंगली’’ को सोलह फरवरी की बजाय नौ मार्च को प्रदर्शित करने का फैसला लिया है. फिल्म ‘‘दिल जंगली’’ में तापसी पन्नू के संग साकिब सलीम की जोड़ी है.
‘‘पूजा इंटरटेनमेंट’’ से जुड़े सूत्रों के अनुसार पहले ‘अय्यारी’ 25 जनवरी को प्रदर्शित होने वाली थी, उस वक्त ‘‘दिल जंगली’’ को 16 फरवरी को प्रदर्शित करने का फैसला किया गया था. फिर ‘अय्यारी’ को नौ फरवरी को प्रदर्शित होना था, तब भी ‘दिल जंगली’ की तारीख नहीं बदली गयी. लेकिन अब जबकि ‘‘अय्यारी’’ सोलह फरवरी को प्रदर्शित हो रही है, तो फिल्म ‘‘दिल जंगली’’ को 9 मार्च को प्रदर्शित करने का निर्णय लिया गया, जिससे दोनो फिल्मों को नुकसान की बजाय फायदा हो सके. सूत्रों के अनुसार फिल्म ‘दिल जंगली’ के निर्माताओं का मानना है कि एक फिल्म का भविष्य दर्शक ही तय करते हैं, इसलिए वह नहीं चाहते हैं कि दोनों फिल्में आपस में टकराएं.
बहरहाल, वासु भगनानी के इस निर्णय पर खुशी का इजहार करते हुए फिल्म ‘‘अय्यारी’’ के निर्माता जयंतीलाल गाड़ा ने कहा है- ‘‘इस इंडस्ट्री में एक दूसरे की मदद कम लोग ही करते हैं, पर एकजुटता लंबा रास्ता तय करती है. हम वासु भगनानी और पूजा इंटरटेनमेंट की सराहना करते हैं कि उन्होने ‘दिल जंगली’ के प्रदर्शन की तारीख आगे खिसका दी. सभी फिल्मों को फलने फूलने के लिए सिनेमाघरों में सही जगह की जरुरत होती है. पर इस बात को कोई समझ नही पा रहा है. हम फिल्म निर्माताआओं की तुलना में अधिक सराहना करते हैं.’’
इसी मसले पर वासु भगनानी कहते हैं- ‘‘एक निर्माता और फिल्मकार के लिए उसकी फिल्म उसका प्रिय बच्चा होता है. और हम अपने बच्चों के लिए सर्वश्रेष्ठ चाहते हैं. एक निर्माता की हैसियत से मैं बौक्स औफिस के दबावों को बेहतर ढंग से समझता हूं. जरुरी है कि दूसरे निर्माता भी इस तथ्य को समझें. सभी फिल्म को पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए, इसीलिए हमने अपनी फिल्म को 9 मार्च को लाने का फैसला किया है. जिससे हमारी फिल्म के साथ ही सभी फिल्मों को दर्शक मिल सकें.’’
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साल के आखिरी महीने यानी दिसंबर 2017 में दिल्ली से सटे गौतमबुद्घनगर के ग्रेटर नोएडा में गौड़ सिटी सोसायटी में 15 वर्षीय किशोर बेटे ने अपनी मां और बहन की सिर्फ इस बात पर हत्या कर दी कि उसे पढ़ाई पर मां की डांट और छोटी बहन को मिल रहे ज्यादा प्यार पर बहुत गुस्सा आता था. जरा सोचिए, क्या एक 15 साल का मासूम मन इतना हिंसक हो सकता है कि अपने ही घर में यह खूनी खेल खेले. सच तो यही है, यही हुआ है. लेकिन सवाल है, क्यों?
पेन स्टेट शेनंगो में मानव विकास और परिवार पर किए गए अध्ययन के सहयोगी प्रोफैसर विलियम मैकग्यूगन के मुताबिक, जो मातापिता अपने बच्चों को नजरअंदाज करते हैं वे बच्चे हिंसक प्रवृत्ति के होते हैं. और यह बात दुनिया के हर देश, हर परिवार व समाज पर लागू होती है. आज परिवार और पेरैंट्स के सामने भी यही समस्या सब से बड़ी बन कर उभरी है कि उन के बच्चे हिंसक होते जा रहे हैं. गौड़ सिटी वाले मामले में भी जाहिर है बच्चे को लगता था कि उस की मां उसे नजरअंदाज करती थी. इस का मतलब उपरोक्त अध्ययन बिलकुल सही इशारा कर रहा है कि अगर बच्चे पेरैंट्स द्वारा नजरअंदाज किए जाएंगे तो इस के परिणाम हिंसक होंगे.
पेरैंट्स की गलती
अभिभावक और बाल मनोवैज्ञानिक तकनीक, स्मार्टफोन और इंटरनैट के सिर सारा दोष यह कह कर मढ़ देते हैं कि जब से ये गैजेट और इंटरनैट बच्चों के हाथ आया है, तभी से बच्चे हिंसक व गुस्सैल होते जा रहे हैं. हो सकता है किसी हद तक यह बात सच हो लेकिन फिर भी यह अधूरा सच होगा क्योंकि जब बच्चे का जन्म होता है और वह धीरेधीरे बढ़ता है तब तक उसे तकनीक और इंटरनैट की दुनिया से कोई वास्ता नहीं होता. लेकिन जब वह खिलौने, चित्र और आवाजें पहचानने लगता है तो अभिभावक उस के साथ समय बिताने के बजाय उसे टीवी के कार्टून्स, इंटरनैट के वीडियो और स्मार्टफोन के संसार से परिचित करा देते हैं. हां, सिर्फ परिचय के लिए ही नहीं कराते, बल्कि दैनिक स्तर पर उन्हें उस की लत लगा देते हैं ताकि उन्हें अपने कामों की फुरसत मिल सके.
जब यह लत बच्चे के मन को घेर रही होती है, उस समय पेरैंट्स यह सोच कर खुश हो रहे होते हैं कि उन का बच्चा मोबाइल में बिजी हैं और उन्हें अपने लिए या औफिस के काम के लिए समय मिल रहा है. हालांकि, जब वे बच्चे के साथ थोड़ा सा समय साथ बिताने के लिए उस से गैजेट छीनना चाहते हैं तब वह रोनेचिल्लाने लगता है. और अब वह उन के बिना खेलने से भी इनकार कर देता है. तब जा कर पेरैंट्स को इस बात का एहसास होता है कि उन्होंने बच्चे को समय न दे कर बड़ी भूल की है.
आत्महत्या और यौनशोषण
जब बच्चों को चिकित्सक या काउंसलर की जरूरत पड़ने लगे तो समझ जाइए कि हालत इस से भी बदतर हो सकती है. मोबाइल गेम्स एडिक्शन उसे हिंसक कृत्यों, आत्महत्या या यौनशोषण का शिकार भी बना सकती है.
अमेरिका में हुई सैंटर्स फौर डिजीज कंट्रोल ऐंड प्रिवैंशन की रिसर्च बताती है कि किशोर उम्र के बच्चों में आत्महत्या की दर 2 दशकों तक गिरने के बाद 2010 से 2015 के बीच बढ़ गई.
ये संकेत बताते हैं कि इंटरनैट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल इस की एक वजह हो सकती है. 17 साल की काइतलिन हर्टी अमेरिका के कोलोराडो हाईस्कूल की सीनियर छात्र है, उस के मुताबिक, ‘‘कई घंटों तक इंस्टाग्राम की फीड को देखने के बाद मुझे मेरे बारे में बहुत बुरा महसूस हुआ, मैं खुद को अलगथलग महसूस कर रही थी.’’ जाहिर है यह अकेलापन ही कई बार अवसाद या आत्महत्या की मनोदशा की ओर ढकेल देता है.
क्लिनिकल साइकोलौजिकल साइंस जर्नल में छपी रिसर्च के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 36 फीसदी किशोरों ने अत्यंत निराशा व दुख की अवस्था का सामना करने के साथ ही आत्महत्या पर विचार करने की बात भी मानी. रिसर्च यह साफ करती है कि जो लोग सोशल मीडिया का कम इस्तेमाल करते हैं उन के मुकाबले इन लड़कियों के तनाव में रहने की प्रवृत्ति 14 प्रतिशत ज्यादा दिखाई दी.
रिसर्च की लेखिका ज्यां ट्वेंगे सैन डिएगो की यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान की प्रोफैसर हैं. उन का कहना है, ‘‘हमें यह सोचना बंद करना होगा कि मोबाइल फोन नुकसानदेह नहीं है. यह कहने की आदत बनती जा रही है कि अरे, ये तो सिर्फ अपने दोस्तों से संपर्क रख रहे हैं. बच्चों के स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर नजर रखना जरूरी है और साथ ही, उसे उपयुक्तरूप से सीमित करना भी.’’
इंटरनैट के सहारे बढ़ता बालशोषण भी एक बड़ी समस्या है. एंटीवायरस मेकर्स कंपनी मैकऐफी की ओर से कराए गए सर्वेक्षण में कहा गया है कि इंटरनैट पर छोटे बच्चों के शिकारी खुलेआम घूम रहे हैं. वे लोग ऐसे बच्चों को बहलाफुसला कर उन से अपना मतलब साधते हैं. इंटरनैट पर दोस्ती बढ़ाने के बाद उन का यौनशोषण किया जाता है और कई मामलों में इसी के जरिए अपहरण भी कर लिया जाता है.
दरअसल, अब बच्चों के पास स्मार्टफोन से ले कर आईपैड तक हैं जिन से सोशल नैटवर्किंग साइटों पर लौगइन किया जा सकता है. बच्चे इन उपकरणों की सहायता से चौबीसों घंटे इंटरनैट से जुड़े रहते हैं. इन सब से बचने के लिए पेरैंट्स को बच्चे के साथ लगातार संवाद बरकरार रखना जरूरी है. वरना, वे वर्चुअल दुनिया में खो कर आत्महत्या या यौनशोषण की ऐसी अंधेरी गली में खो जाएंगे जहां से वापस आना उन के लिए आसान नहीं होगा.
पढ़ने की आदत डालें
इंटरनैट के आगे बेबस होने के बजाय अगर अभिभावक ठान लें तो बच्चों को इंटरनैट के संसार से बाहर कर उन्हें किताबी दुनिया में ला सकते हैं. इस के लिए उन में पढ़ने की आदत विकसित करनी होगी क्योंकि किताबें किसी भी बच्चे के मन को दूषित नहीं करती हैं, न ही भटकाती हैं.
जब पत्रिका और अखबार घर पर बच्चे पढ़ते हैं तो उन्हें सिर्फ सार्थक जानकारियां मिलती हैं और वे रचनात्मक बातें सीखते हैं लेकिन अब मोबाइल हाथ में होने से उन से किताबें व पत्रिकाएं छीन ली गई हैं. अगर अभिभावक चाहें तो उन्हें फिर से किताबों के रोचक संसार से जोड़ सकते हैं. इस से वे सकारात्मक और ज्ञानवर्धक बातें ही सीखेंगे और नुकसानदेह तकनीकी दखल उन की जिंदगी से दूर होगा.
टैक्नो नजर जरूरी
अगर बच्चे गैजेट की दुनिया से बाहर ही नहीं आना चाहते हैं और इंटरनैट के मोह में पूरी तरह फंस चुके हैं तो उन्हें इस से बचाने के लिए आप को टैक्नोसेवी होना पड़ेगा और कुछ सिक्योरिटी फिल्टर लगाने होंगे ताकि वे गलत दिशा में न भटकें. कई बार बच्चे पेरैंट्स को तकनीकी भाषा के जाल में फंसा कर यह समझा देते हैं कि वे स्मार्टफोन पर स्कूल का प्रोजैक्ट या पढ़ाई कर रहे हैं. इसलिए पेरैंट्स भी अपडेट रहें तकनीकी मोरचे पर बच्चों का मार्गदर्शन करने के लिए.
यह बात सच है कि कई बार जानकारियां जमा करने के लिए इंटरनैट की जरूरत पड़ जाती है और अब बच्चे लाइब्रेरी में जा कर इनसाइक्लोपीडिया या मोटीमोटी किताबों में जानकारी खोजने के बजाय एक क्लिक पर हासिल कर लेना ज्यादा समझदारी का काम समझते हैं.
सब से सही तो यह रहेगा कि जब वे गैजेट का इस्तेमाल करें, आप उन के साथ ही बैठें. छोटी आयु के बच्चों को मातापिता या अन्य किसी बड़े पारिवारिक सदस्य के साथ बैठा कर ही सर्फिंग करानी चाहिए और उन को एक निश्चित समय तक ही इन का प्रयोग करने दें. इंटरनैट पर कई तरह के फिल्टरिंग और ब्लौकिंग सिस्टम भी हैं, जिन में सुविधा होती है कि आप ऐच्छिक साइट्स ही खोल सकें और अनचाही व अनुपयोगी वैबसाइट्स सर्फ ही न की जा सकें.
बेशक बच्चों की शैक्षिक यात्रा में आज कंप्यूटर, इंटरनैट और स्मार्टफोन जरूरी टूल्स बन चुके हैं लेकिन जानकारियों के अथाह सागर और मनोरंजन के सोर्स के रूप में इंटरनैट बच्चों के लिए कहीं घातक न हो जाए, इस के लिए तो पेरैंट्स को ही सजग रहना होगा.
हर चीज के अच्छे और बुरे दोनों पहलू होते हैं. अगर अच्छे पहलू को आप फौलो करते हैं, तो आप को उस का सही फायदा मिलता है और अगर बुरे पहलू को फौलो करते हैं, तो नुकसान और भटकाव के अलावा आप को कुछ नहीं मिलता.
आजकल के बच्चों में स्मार्टफोन और सोशल मीडिया की आदत को देखते हुए यह लाइन उन पर बिलकुल फिट बैठती है. अभिभावक होने के नाते अब बेहतरी इसी में है कि बच्चे को समय दें और उन के साथ कदम से कदम मिला कर तकनीकी चुनौतियों का सामना करें.
वर्चुअल जगत का मनोवैज्ञानिक पहलू
मैंटल हैल्थ व बिहेवियर साइंस से जुड़े विशेषज्ञ भी मानते हैं कि कच्ची उम्र के बच्चे, जो सही और गलत में फर्क नहीं कर पाते, इंटरनैट के जंगल में भटक जाते हैं. स्मार्टफोन में दिखने वाली असीमित सामग्री बच्चों के मन में उथलपुथल पैदा कर देती है. बच्चे व युवा इन जानकारियों का इस्तेमाल रचनात्मक कार्यों में न के बराबर कर पाते हैं और सारा दिन फेसबुक, ट्विटर, स्काइप व सब से गंभीर पोर्नोग्राफिक साइटों को ब्राउज करने में लगे रहते हैं.
कोई क्लास बंक करता है तो कोई औनलाइन गेम खेलने व इंटरनैट ब्राउज करने में समय बिताता है. और तो और, सड़क पर भी वह मोबाइल पर गेम खेलने में व्यस्त रहता है. कई बार तो बच्चे अपने पेरैंट्स के साथ मनोचिकित्सक या डाक्टर के पास जाते हैं तो पता चलता है कि वे तो पूरी तरह वर्चुअल दुनिया में खोए हैं.
पेरैंट्स को समझना चाहिए कि बच्चों को इंटरनैट की दुनिया में धकेलने की गलती उन्होंने की है. और अब चिकित्सक या काउंसलर की जरूरत पड़ी है तो इस के लिए वे ही जिम्मेदार हैं. बेहतर यही है कि बच्चों को मोबाइल से दूर रखें. सप्ताह में एक दिन सिर्फ छुट्टी के दिन ही मोबाइल उन के हाथ में दें. मोबाइल सिर्फ फोन या शब्दकोष की तरह इस्तेमाल हो. बच्चा इंटरनैट पर क्या ब्राउज करता है, उस पर भी नजर रखें. बच्चों को तकनीक का सही इस्तेमाल करना सिखाएं. उन्हें किताबें या कहानियों को पढ़ना सिखाएं.
पेरैंट्स बच्चों के साथ समय बिताने से बचने के लिए उन्हें स्मार्टफोन व तकनीक का लालच दे कर उस में उलझा देते हैं, बाद में यही गैजेट्स लत बन कर उन्हें अपनी चपेट में ले लेते हैं.
इंटरनैट व स्मार्टफोन के जंगल
बच्चों के हिंसक प्रवृत्ति के होने का एक पहलू यह भी है कि आजकल के पेरैंट्स ही बच्चों को टीवी, हिंसक गेम्स, स्मार्टफोन की असीमित दुनिया व इंटरनैट के जंगल में भटकने के लिए छोड़ते हैं जिस के परिणाम आज हादसों की शक्ल में सामने आ रहे हैं. कभी वे ब्लू व्हेल्स जैसे हिंसक गेम्स की चपेट में आ कर आत्महत्या कर रहे हैं तो कहीं चैटिंग और पोर्न के जाल में फंस कर अपने मासूम मन के अलावा अपने भविष्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं.
इंटरनैट में लिप्त बच्चों का बचपन रचनात्मक कार्यों की जगह स्मार्टफोन और इंटरनैट के जंगल में गुम हो रहा है. सूचना तकनीक से बच्चे और युवा इस कदर प्रभावित हैं कि एक पल भी वे स्मार्टफोन से खुद को अलग रखना गवारा नहीं समझते. इन पर हर समय एक तरह का नशा सा सवार रहता है. इसे ‘इंटरनैट एडिक्शन डिसऔर्डर’ भी कहा जाता है.
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भारत में हर साल करीब 1.25 करोड़ लोग कैंसर से पीडि़त पाए जाते हैं. इन में 5,99,000 से अधिक महिलाएं होती हैं. आंकड़े दर्शाते हैं कि इन में से करीब 50 प्रतिशत कैंसर रोगियों की उम्र 50 वर्ष से कम होती है.
युवा कैंसर रोगियों की इस तेजी से बढ़ती संख्या से उन की प्रजनन क्षमता को संरक्षित रखने को ले कर चिंता व्यक्त की जाने लगी है. अब तक तो किसी कैंसर पीडि़त को ले कर चिकित्सकों का मुख्य फोकस इस पर होता था कि कैंसर कोशिकाओं को हटा कर किसी तरह से मरीज की जान बचाई जाए. प्रजनन और बच्चे पैदा करने की क्षमता आदि के बारे में कम ही ध्यान दिया जाता था. परंतु, प्रौद्योगिकी में सुधार और चिकित्सा में प्रगति होने के साथ अब मरीज की जान बचाने के अलावा यह भी देखा जाने लगा है कि इलाज के बाद उस व्यक्ति को संतानोत्पत्ति योग्य भी बनाया जाए.
कैंसर रोगी अब अकसर बचा लिए जाते हैं और चिकित्सकीय प्रगति इस बीमारी पर भारी पड़ने लगी है. ऐसे में कैंसर से बचाए जा चुके लोग अब संतानोत्पत्ति और पारिवारिक जीवन के बारे में सोच सकते हैं.
कैंसर और बांझपन का खतरा
एक कैंसर रोगी के बांझपन का खतरा कैंसर के प्रकार और उसे दिए जा रहे विशेष उपचार पर निर्भर करता है. विभिन्न प्रकार के कैंसर और उन के उपचार, जैसे- कीमोथेरैपी, रेडिएशन थेरैपी, सर्जरी, टारगेटेड और जैविक (इम्यून) चिकित्सा, बोन मैरो या स्टेम सैल प्रत्यारोपण आदि गर्भधारण करने में रोगी की क्षमता को विभिन्न तरह से प्रभावित कर सकते हैं. ऊसाइट (प्रजनन में शामिल जर्म सैल) पर विषैले प्रभाव के कारण कीमोथेरैपी एक कैंसर रोगी की प्रजनन क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है.
रोगी की आयु, दवाओं की मात्रा और उन के प्रकार के आधार पर नुकसान का अंदाजा लगाया जा सकता है. कीमोथेरैपी में प्रयोग होने वाली मेथोट्रेक्जेट जैसे एंटीमेटाबोलाइट्स से बांझपन का कम खतरा होता है, जबकि साइक्लोफौस्फेमाइड जैसे एल्काइलेटिंग एजेंटों से यह खतरा बढ़ जाता है. रेडिएशन थेरैपी से बांझपन का खतरा बढ़ जाता है, लेकिन ओवरी ट्रांसपोजीशन जैसी विधियां सुरक्षित हैं, जिन में ओवरीज को सर्जरी के जरिए रेडिएशन वाले क्षेत्र से अस्थायी तौर पर हटा दिया जाता है. जोखिम को कम करने के लिए रेडिएशन शील्डिंग का प्रयोग किया जाता है. यदि प्रजनन अंग में कोई बदलाव न हुआ हो, तो कैंसर की सर्जरी में आमतौर पर बांझपन का खतरा कम ही रहता है.
स्तन कैंसर या अन्य किसी कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली हार्मोन थेरैपी एक महिला की बच्चे पैदा करने की क्षमता को प्रभावित कर सकती है. टेमहृक्सीफैन लेने वाली महिलाएं गर्भवती हो सकती हैं, लेकिन इस से शिशु में जन्मजात दोष हो सकते हैं, इसलिए इसे लेते समय प्रभावी बर्थ कंट्रोल का उपयोग करने की सलाह दी जाती है. अन्य हार्मोन चिकित्साएं अंडे बनने की प्रक्रिया को पूरी तरह से रोक सकती हैं क्योंकि ऐसी महिला रोगी को एक तरह से अस्थायी रजोनिवृत्ति या मेनोपौज की स्थिति में रखा जाता है. कुछ नए उपचारों के बांझपन संबंधी जोखिम अस्पष्ट रहते हैं. यह सच है कि कई टारगेटेड उपचार एंजाइमों को रोकते हैं, लेकिन उन सभी एंजाइमों की प्रतिक्रिया के बारे में अधिक जानकारी नहीं है.
क्या होती है एग फ्रीजिंग
युवा कैंसर रोगियों के लिए एग फ्रीजिंग तकनीक किसी वरदान से कम नहीं है, विशेषकर उन के लिए जो विवाह योग्य हैं. यह एक सामान्य तथ्य है कि कीमोथेरैपी, रेडिएशन थेरैपी और सर्जरी आदि के दौरान कैंसर पीडि़त स्त्रियों के डिंब या एग्स नष्ट हो जाते हैं जिस से प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है. इसलिए, कैंसर की प्रकृति, इलाज की विधि, और संबंधित खतरों को ध्यान में रखते हुए एक युवा महिला रोगी को एग फ्रीजिंग की सलाह दी जा सकती है.
क्या है प्रक्रिया
क्रायोप्रिजर्वेशन महिलाओं में प्रजनन क्षमता को बरकरार रखने की एक जांचीपरखी विधि है और इस में काफी हद तक सफलता मिल जाती है. यह ऐसे मरीजों के लिए लाभकारी विधि है जिन्होंने अभी अपने परिवार की योजना नहीं बनाई है, लेकिन आगे ऐसी इच्छा रखते हैं. इस प्रक्रिया में शुक्राणुओं के संपर्क से बचे परिपक्व एग्स को अलग कर शीतलन हेतु सुरक्षित कर लिया जाता है. इस प्रक्रिया को एग बैंकिंग भी कह सकते हैं.
फ्रोजन एग को बाद में एक शुक्राणु से निषेचित करा कर उस महिला के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया जाता है, जो शिशु को जन्म देने की इच्छुक है. हालांकि, कुछ मामलों में, जो कैंसर एस्ट्रोजन पर निर्भर हैं, इस विधि को विशेष सावधानी से प्रयोग में लाया जाता है, ताकि घूम रहा एस्ट्रोजन कैंसर को आगे न फैला दे.
उदाहरण के तौर पर, यदि एक 32 वर्षीया अविवाहित महिला को स्तन कैंसर है. उस की कीमोथेरैपी से पहले ही 18 अंडे फ्रीज किए हुए थे. वह 3 साल बाद वापस लौटती है और इस बार उस की शादी हो चुकी है. उस का गर्भाशय तैयार था, अंडे डीफ्रीज किए गए, और उस के पति से प्राप्त शुक्राणुओं का उपयोग कर के अंडों को निषेचित यानी फर्टिलाइज किया गया. इस प्रक्रिया
को इंट्रोसिस्टोप्लाज्मिक स्पर्म इंजैक्शन (आईसीएसआई) कहते हैं. इस से 8 भू्रण प्राप्त किए गए और 3 को उस महिला के गर्भाशय में स्थानांतरित कर दिया गया. अन्य भू्रणों को फ्रीज कर दिया गया. इस तरह से वह गर्भवती हो गई और अब उस के एक वर्ष का लड़का है. यदि वह दूसरे बच्चे के लिए फिर क्लिनिक आती है, तो फ्रीज किए गए बाकी भू्रण प्रयोग किए जा सकते हैं. यह किसी वैज्ञानिक उपलब्धि से कम नहीं है, जिस की सुविधा 5 वर्षों पहले तक हमारे देश में नहीं थी.
कैंसर के इलाज और रेडिएशन थेरैपी लेने के बाद किसी की प्रजनन क्षमता के बारे में पक्के तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता. इसलिए, एग फ्रीजिंग तकनीक के सहारे, ठीक हो चुके ऐसे कैंसर रोगियों से संतानोत्पत्ति की अपेक्षा की जा सकती है जिन की प्रजनन क्षमता भले ही खत्म हो चुकी हो. यह तकनीक निश्चिततौर पर कैंसरपीडि़त युवा महिलाओं के लिए एक वरदान की तरह है.
(लेखक ब्लूम आईवीएफ ग्रुप के मैडिकल डायरैक्टर हैं.)
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अमेरिका में अब मैडिकल कालेजों में लड़कियों की संख्या लड़कों से ज्यादा हो गई है. अश्वेत, लैटिनो भी बढ़ने लगे हैं. अब तक अमेरिकी चिकित्सा क्षेत्र मेल डौमिनेटेड और व्हाइट डौमिनेटेड था. अब नए कालेज भी खुल रहे हैं और विविधता भी आ रही है जबकि मैडिकल शिक्षा महंगी है और स्टूडैंट लोन के बल पर पढ़ाई की जाती है.
भारत में चिकित्सा शिक्षा लड़खड़ा रही है. पहले जब तक सरकारी थी, पर्याप्त डाक्टर नहीं मिल रहे थे. अब प्राइवेट हो गई है तो पढ़ाने की मंडी की तरह हो गई है, जहां दाखिले से ले कर अंतिम परिणामों तक बोलियां लगती हैं.
दुनिया की नई मांग चिकित्सा सुविधाओं की है. सब से ज्यादा लाभदायक उद्योग चिकित्सा क्षेत्र ही है. समृद्ध देशों में मकानों और नौकरियों की कमी नहीं, अपने बढ़ते बुढ़ापे में देखभाल और दवाओं की कमी खल रही है. महिला डाक्टर ये रोल ज्यादा अच्छी तरह से अदा कर सकती हैं.
भारत का चिकित्सा क्षेत्र अमेरिका की ओर बहुत देखता है और ज्यादातर सफल डाक्टरों के पीछे उन के अमेरिकी अनुभव रहते हैं, जहां नई सोच और नई तकनीकों पर प्रयोग होते रहते हैं. वहां किसी भी तरह का सुखद बदलाव यहां असर डालता ही है और अमेरिकी मैडिकल कालेजों का बदलता रंग भारत की औरतों को भी प्रोत्साहित करेगा.
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दुनिया भर में इंटरनैट टैक्नोलौजी का इस्तेमाल कर घरेलू चीजों को घर बैठे पहुंचाना असल में औरतों की शौपिंग की मूलभूत स्वतंत्रता और घूमने के अधिकार पर गहरा आघात है. मगर औरतें हैं कि यह समझ ही नहीं रहीं और न ही सोच पा रही हैं. वे सोच रहीं कि घर बैठे चीजें मिल रही हैं तो उन की आफत टली.
यही आफत तो औरतों का घर से निकलने का एक अनूठा उपाय था, जो पिछले 100 वर्षों में बड़ी मुश्किल से उन्हें मिला हुआ था वरना अनाज या सब्जी मंडी से सामान आदमी लाया करते थे. दूसरा फुटकर सामान फेरी वाले घरघर पहुंचाया करते थे. साडि़यां, जेवर सेठ व्यापारी घर ले जा कर ही दिखाया करते थे. अमेरिका में पिछली सदी में सेल्समैन पीठ पर 100-100 किलोग्राम वजन के संदूक उठा कर घरघर जाते थे और कढ़ाई की गई शौलों से ले कर कांच की मूर्तियां तक बेचा करते थे.
यह अधिकार तो बड़ी मुश्किल से मिला था कि औरतें सजधज कर खुद बाजारों में निकल सकती थीं और नई चीजों को देखने के बहाने अपने नए कपड़ों और जेवरों की नुमाइश भी कर आती थीं. आतेजाते कुल्फी और चाट का मजा भी पता चल जाता था. अब तो हर चीज की होम डिलिवरी है.
यह होम डिलिवरी या औनलाइन शौपिंग वैसी ही है जैसेकि लड़की को 10 फोटो दिखा कर कहा जाए कि इन में से एक को चुन लो, शादी कर लो, बच्चे पैदा करो और पूरी जिंदगी यों ही बंद माहौल में गुजार दो. औनलाइन शौपिंग सुविधा हो या न हो पर यह औरतों की महत्त्वपूर्ण स्वतंत्रता को छीन रही है.
डर यह है कि भीरु और अदूरदर्शी औरतें औनलाइन शौपिंग न अपना लें और कहीं इतना न अपना लें कि शोरूम और मौल ही बंद हो जाएं और अकेला तरीका औनलाइन शौपिंग रह जाए.
ठीक है, औनलाइन शौपिंग में पैसे बचते हैं पर ये पैसे बचाना भी किस काम का होगा जब बाहर निकलने की जरूरत ही न हो. औनलाइन पर तो सभी जा सकती हैं, इसलिए किसी के पास ऐक्सक्लूसिव सामान न होगा.
सब एक सा पहनेंगी, औनलाइन सस्ता, बिना क्वालिटी परखे सामान बरतेंगी और यदि किसी किट्टी पार्टी में मिली भीं तो वह किट्टी पार्टी औनलाइन बुकिंग पर व्हाट्सऐप संदेशों के जरीए बुक होगी.
खुद की महकती, मदमाती आवाज का इस्तेमाल भी यह मुआ औनलाइन कंप्यूटर या मोबाइल छीन लेगा. कल्पना कीजिए मुंह बंद, नाइटी में सारा दिन कैद, इंटरनैट के नैट में फंसी औरतों की आजादी होगी कहां?
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