क्रिकेट के अलावा अन्य खेलों के खिलाड़ी अगर विदेशी भूमि से भी मैडल ले आएं तो उन के जीवन पर कोई असर नहीं पड़ता. अन्य खेलों के ज्यादातर खिलाड़ी बहुत गरीब घरों से आते हैं और जैसे ही वे मैडल पाने की उम्र से बाहर हो जाते हैं, उन की थोड़ीबहुत पूछ जो होती थी, खत्म हो जाती है.
क्रिकेट में तो 20-30 खिलाडि़यों को अच्छा पैसा मिल जाता है पर हौकी, फुटबाल, एथलैटिक्स, कुश्ती, मुक्केबाजी आदि खेलों के पदक प्राप्त खिलाड़ी शुरू से ही खेल अफसरों की कृपा के आदी हो जाते हैं. उन्हें हमेशा पिछड़ा समझा जाता है और खेल अफसर केवल इन खिलाडि़यों को अपने पद के लाभ उठाने का माध्यम बनाते हैं. पदक प्राप्त कर चुके खिलाडि़यों के ईंटगारा उठाते या सब्जी बेचते फोटो अकसर छपते रहते हैं पर देश पर इस का कोई असर नहीं पड़ता.
यह तो मूल बात है कि समाज हो, घर हो या देश हो, पैसा तो काम करने के बाद ही मिलेगा. जब पदक पाया तो जो किया उसे संभाल कर रखा तो ठीक वरना बाद में कोई भाव न देगा, यह स्वाभाविक है. कभी पदक प्राप्त किया था इस बलबूते पर जीवनभर पैंशन पाने की तमन्ना करना ही गलत है. पदक पाने वाला देश या समाज से जीवनभर देखभाल करने की उम्मीद न करे.
असल दिक्कत यह है कि जब खिलाडि़यों को तैयार करा जा रहा होता है तब उन में एक गरूर भर दिया जाता है. उन्हें किसी भी कमाऊ क्षेत्र की योग्यता पाने के लिए तैयार करने की जगह केवल मैडल पाने का मजदूर बना कर रख दिया जाता है. वे न अच्छे श्रमिक रह जाते हैं न अच्छे कारीगर. न अच्छे अफसर और न ही अच्छे प्रशिक्षक. इन सब के लिए पर्याप्त शिक्षा की जरूरत होती है जो इन खिलाडि़यों को नहीं दी जाती.
मैडल पाने के बाद हार पहना कर इन के फोटो खिंचवा कर इन्हें एक तरह से रिटायर कर दिया जाता है और ये पदकों की चमक में जीवन की असलियत भी भूल जाते हैं. अगर ये पिछड़ी या दलित जातियों के हुए तो थोड़ा भी मानसम्मान पदक पाने के 2-3 साल बाद नहीं बचता.
खेलों को भविष्य की संपन्नता की चाबी समझना ही गलत है. एक बार का पदक जीवनभर की गारंटी नहीं बन सकता. इस बारे में हर खिलाड़ी को पहली सफलता के बाद ही समझ लेना चाहिए. ये वे सितारे हैं जिन्हें तभी तक देखा जाता है जब तक चमक रहे हैं. अपनी रोशनी खो बैठने के बाद ये बेकार ही हो जाते हैं.
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ग्रामीण इलाकों और बैंकिंग सेवा से अब तक दूर रहने वाले देशभर के दूर-दराज के इलाकों के लोगों को भी अब अत्याधुनिक बैंकिंग सेवाएं मिल सकेंगी. ऐसा इसलिए क्योंकि अब आपका नजदीकी डाकघर जल्द ही बैंक बनने जा रहा है. अब आप दूसरे बैंकों की तरह इसमें पैसे डिपौजिट कर सकेंगे और यह आपको दूसरे बैंकों के मुकाबले कई फ्री सेवाएं भी देगा. इस साल अप्रैल से इंडिया पोस्ट्स पेमेंट्स बैंक (IPPB) देश भर में अपना कामकाज शुरू कर देगा और इसमें डिजिटल लेनदेन भी शामिल होंगे.
इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (IPPB) के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ए पी सिंह के मुताबिक वर्ष 2018 के अंत तक उसके सभी तीन लाख कर्मचारी यह सेवा देने लगेंगे. इसके बाद पहुंच के मामले में यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा भुगतान बैंक होगा.
शुरुआत में IPPB करीब 3,500 कर्मचारियों के साथ कामकाज चालू करेगा, जिनमें से अधिकांश बैकिंग और संबंधित क्षेत्रों से संबंध रखने वाले हैं. एक विज्ञप्ति में भारतीय डाक विभाग ने कहा, “इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (IPPB) विस्तार कार्यक्रम तेजी से प्रगति कर रहा है और अप्रैल 2018 में इसे राष्ट्रीय स्तर पर चालू करने की तैयारी है.”
खबर है कि ये पेमेंट बैंक इंडिया पोस्ट्स के 1.55 लाख डाक घरों के जरिये काम करेगा. देश भर के 650 जिलों में डाक घर मौजूद हैं जो करीब 70 फीसदी ग्रामीण इलाकों तक पहुंच रखते हैं. जिले में इन बैंकों के कई कस्टमर एक्सेस प्वाइंट्स होंगे, ताकि उन तक भी पहुंचा जाए जो अभी तक बैंकिंग नहीं कर रहे हैं.
यह बैंक, डाकघर बचत बैंक के 17 करोड़ से ज्यादा सक्रिय खाताधारकों को NEFT, RTGS, UPI और बिल पेमेंट सेवाएं जैसे कहीं से भी लेनदेन करने योग्य डिजिटल भुगतान के फायदे लेने में सक्षम करेगा. IPPB की योजना है कि इस साल के अंत तक वो अपने सभी डाकियों को स्मार्टफोन से लैस कर दे ताकि ग्राहकों के घर के दरवाजे पर ही बैंकिंग सेवाएं दी जा सकें.
देश के पुराने बैंक एटीएम और अन्य इंटरनेट बैंकिंग सुविधाओं के लिए पैसे चार्ज करते है, लेकिन पोस्टऔफिस पेमेंट बैंक के कस्टमर को एटीएम लेने के लिए किसी तरह का कोई चार्ज नहीं देना होगा. इसी तरह मोबाइल अलर्ट के लिए भी बैंक कोई चार्ज नहीं लेगा. अभी ज्यादातर बैंक 25 रुपए से लेकर 50 रुपए तक एसएमएस अलर्ट के लिए चार्ज लेते हैं. इसी तरह क्वार्टरली बैलेंस मेंटेन करने के लिए भी कोई चार्ज नहीं देना पड़ेगा.
फिलहाल IPPB 1 लाख रुपये बैलेंस तक के बचत खाते खोलने की सुविधा दे रहा है, और इसके साथ ही सभी तरह के वैयक्तिक लेनदेन और डिजिटल भुगतान की सेवाएं. आगे चलकर यह बैंक चालू खाता के साथ ही बीमा, म्यूचुअल फंड्स, पेंशन, क्रेडिट उत्पाद और विदेशी मुद्रा जैसी छर्ड पार्टी वित्तीय सेवाएं भी देगा.
इस बैंक की परिकल्पना रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने की थी. नवंबर 2014 में डाक विभाग ने रिजर्व बैंक औफ इंडिया में पेमेंट्स बैंक के लिए आवेदन किया था और सितंबर 2015 में इसे सैद्धांतिक मंजूरी मिल गई थी. माना जा रहा है कि इससे बैंकिंग सेक्टर में विविधता आएगी और अब तक बैंकिंग व्यवस्था से दूर रही जनता भी जुड़ेगी. कोई भी उपभोक्ता अपने पहचान पत्र के जरिए इससे जुड़ सकता है. इसके जरिए बैंक खाता खुलवाने के झंझटों से भी आप बच सकते हैं.
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साउथ इंडियन फिल्मों की चर्चित अदाकारा अमाला पौल पिछले कुछ समय से लगातार चर्चा में हैं. पिछले दिनों उन्होंने एक बिजनेसमैन के खिलाफ यौन उत्पीड़न का एक मामला दर्ज करवाया था, जिसके बाद से वह सुर्खियों में आ गई थीं. उनके इस कदम की सभी तारीफ कर रहे थे.
वहीं हाल ही में सोशल मीडिया पर एक्ट्रेस ने इस मामले में एक और बयान दिया है. उन्होंने अपने ट्विटर हैंडल पर ट्वीट कर कहा, ‘यह हर महिला का कर्तव्य है कि वह खुद के लिए खड़ी हों’. अमाला ने ट्वीट कर कहा, ‘वह मुझे एक मांस के लोथड़े की तरह बेच देना चाहता था. उसकी हिम्मत ने मुझे डरा दिया था. उसके अस्तित्व ने मुझे बीमार कर दिया था’.
Thank you Vishal for standing by me and assuring me that I must not let it go, and I didn’t, now I believe it’s every woman’s duty, to not let it go and stand for themselves. He was ready to trade me off like a meatloaf, his guts make me sick, his existence makes me sick #MeToohttps://t.co/SEPrE4bxPr
अमाला साउथ की बोल्ड अभिनेत्रियों में से एक हैं. उन्होंने पिछले दिनों खुद के साथ हुए यौन शोषण के एक मामले की वजह से चर्चा बटोरी थी. वहीं अमाला के इस कदम की तारीफ सभी कर रहे हैं. इस मामले में अमाला के सपोर्ट में तमिलनाडू के चर्चित निर्माता और एक्टर विशाल ने भी ट्विटर पर उनकी तारीफ की.
इसके जवाब में अमाला ने ट्विटर पर #MeToo के साथ लिखा, ‘धन्यवाद विशाल मेरे साथ खड़े रहने के लिए और बताने के लिए कि मुझे इसे जाने नहीं देना चाहिए, और मैंने नहीं जाने दिया. अब मुझे लगता है कि यह हर औरत का कर्तव्य है कि वह उन्हें इस तरह नहीं जाने दें और खुद के लिए खड़ी हों. वह मुझे मांस के लोथड़े के समान बेचने को तैयार था.
इससे पहले एक्टर और निर्माता विशाल ने अमाला के लिए ट्वीट कर कहा, ‘तुम्हारा ये कदम वाकई काबिल-ए-तारीफ है. हाल ही के इस वाक्ये ने तुम्हारी बोल्डनेस को दिखाया है. यौन उत्पीड़न के किसी मामले में इस तरह सामने आने के लिए काफी हिम्मत चाहिए. विशाल ने यहां पुलिस विभाग के एक्शन की भी तारीफ की. उनका मानना था कि इस मामले से आरोपी कुछ सीखेगा’.
बता दें अमाला ने कुछ समय पहले एक आदमी के खिलाफ यौन उत्पीड़न से जुड़ा एक मामला दर्ज करवाया था. उनका आरोप था कि डांस रिहर्सल के दौरान उनके साथ एक व्यक्ति ने छेड़छाड़ की. उन्होंने कहा कि वह आदमी उनके अकेले में बात करने की कोशिश कर रहा था जिसकी वजह से वह काफी असहज महसूस कर रही थीं. वह उनके मलेशिया के इवेंट के बारे में भी सब जानता था. इसी वजह से अमाला ने उस आदमी के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई थी.
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बिग बौस कंटेस्टेंट तथा बौलीवुड में काम कर चुकीं एली अवराम बीते दिनों क्रुणाल पांड्या की शादी में दिखीं, जिसके बाद उनका नाम हार्दिक पांड्या से जोड़ा गया. इतना ही नहीं खबर ये तक आई कि दोनों एक-दूसरे को डेट भी कर रहे हैं. हालांकि अब इस अफवाह पर एली अवराम ने विराम लगा दिया है.
उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा कि लोगों का काम इन अफवाहों पर भरोसा करना है. मुझे इसपर कुछ सफाई देने की जरूरत नहीं, बीते सालों में मुझे लेकर काफी बातें बोली गईं लेकिन मैंने इन सबका जवाब देना ठीक नहीं समझा. एक सेलिब्रेटी होने के नाते आपके बारे में काफी बाते होती हैं और इसकी आपको आदत डाल लेनी चाहिए क्योंकि आप अफवाहों पर ज्यादा अधिक कुछ नहीं कर सकते.
बता दें कि हार्दिक पांड्या ने अभी तक 25 एकदिवसीय मैचों की 16 पारियों में 40.76 की औसत के साथ तीन बार नाबाद रहते हुए 530 रन बनाए हैं. इस दौरान उन्होंने 120.72 की स्ट्राइक के साथ 4 अर्धशतक जड़े हैं. साथ ही 28 छक्के और 31 चौके लगाए. इस दौरान उनका सर्वश्रेष्ठ स्कोर 83 रहा. वहीं बात अगर गेंदबाजी की करें तो उन्होंने 5.55 की इकौनमी के साथ 28 विकेट झटके हैं.
बता दें कि इससे पहले कोलकाता की 22 वर्षीय फेमस मौडल लीशा शर्मा पिछले साल हार्दिक पांड्या के साथ काफी सुर्खियों में आई थीं. 5 फीट 10 इंच की हाइट वाली लीशा जमशेदपुर की रहने वाली हैं, जिन्होंने कई नामी ब्रांड्स के लिए मौडलिंग की है. हार्दिक पांड्या और लीशा एक-दूसरे को काफी वक्त से जानते हैं.
जब लीशा से हार्दिक के बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि हार्दिक एक हीरा इंसान हैं. हार्दिक जमीन से जुड़े, शांत और एक परफेक्ट शख्स हैं. लीशा का कहना है की वह दोनों अच्छे दोस्त हैं. इसमें कोई शक नहीं है की हार्दिक एक परफेक्ट डेटिंग मटेरियल हैं.’
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3 जुलाई, 2017 को आतिश नाइक पत्नी तनुजा के साथ अपने गांव वरड़गांव आया था. तनुजा को घर में ही छोड़ कर वह दोपहर को होटल से खाना लाने गया तो शाम तक नहीं लौटा. इस बीच तनुजा भी घर से बाहर नहीं निकली तो पड़ोस में रहने वाली आतिश की चाची मोहिनी को चिंता हुई. क्या बात है, जानने के लिए उन्होंने आतिश के मोबाइल पर फोन किया तो उस का फोन बंद था.
उन्होंने आतिश के घर का दरवाजा खटखटाया तो अंदर से कोई आवाज नहीं आई. किसी अनहोनी की आशंका से उन का दिल बैठने लगा. जब आतिश से संपर्क नहीं हो सका और तनुजा ने भी दरवाजा नहीं खोला तो घबरा कर मोहिनी ने गोवा के मडगांवराय में रहने वाली आतिश की बहन को फोन कर के यह बात बता दी.
चाची की बात सुन कर आतिश की बहन घबरा गई. उस ने भी भाई को फोन किया, लेकिन संपर्क नहीं हो सका. इस के बाद वह पति के साथ वरड़ गांव के लिए रवाना हो गई. गांव पहुंच कर आतिश की बहन दूसरी चाबी से घर का ताला खोल कर अंदर दाखिल हुई तो वहां का मंजर देख उस के पैरों तले से जमीन खिसक गई. अंदर की स्थिति हैरान कर देने वाली थी. उस ने तुरंत पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी.
घटनास्थल चूंकि फोंडा पुलिस थाने के अंतर्गत आता था. पुलिस कंट्रोल रूम से यह सूचना थाना फोंडा को मिली तो थानाप्रभारी सुदेश आर. नाइक तुरंत इंसपेक्टर परेश सिनारी, नितिन हरर्णकर आदि के साथ घटनास्थल के लिए रवाना हो गए. घटनास्थल थाने से ज्यादा दूर नहीं था, इसलिए पुलिस टीम 20 मिनट में वहां पहुंच गई. तब तक गांव के तमाम लोग इकट्ठा हो चुके थे.
पड़ोस में रहने वाली आतिश नाइक की चाची मोहिनी नाइक ने पुलिस को बताया कि आतिश अपनी पत्नी तनुजा के साथ उसी दिन सुबह करीब 8 बजे आया था और उन से अपने घर की चाबी ले गया था. घर के अंदर जाने के बाद दोनों के बीच कहासुनी होने लगी थी. पता नहीं वे किस बात पर झगड़ रहे थे. उन के लड़नेझगड़ने की आवाजें घर के बाहर तक आ रही थीं. पतिपत्नी के बीच इस तरह की कहासुनी होती रहती है, इसलिए उन्होंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था.
दोपहर करीब 12 बजे वह आतिश और तनुजा को खाने के लिए बुलाने गईं तो आतिश दरवाजे पर ताला लगा कर कहीं जा रहा था. उन्होंने उस से खाने के लिए पूछा तो उस ने कहा, ‘‘तनुजा नानवेज खाना चाहती है, इसलिए होटल से नानवेज लाने जा रहा हूं. तनुजा सोई हुई है, इसलिए दरवाजे पर ताला लगा दिया है.’’
दोपहर का गया आतिश शाम तक लौट कर नहीं आया तो उन्होंने यह बात आतिश के बहनबहनोई को बता दी. पुलिस टीम घर में दाखिल हुई तो कमरे में खाट पर तनुजा की लाश सीधी अवस्था में पड़ी थी. उस के सीने पर एक तकिया रखा था.
इस से लगा कि तनुजा की हत्या उसी तकिए से की गई थी. तकिए के बीचोबीच एक दिल बना था, जिस में ‘लव यू’ लिखा था. इस के अलावा तकिए के एक कोने में ‘रेस्ट इन पीस’ लिखा हुआ था. कातिल ने लव यू लिख कर अपने मन का दर्द जाहिर किया था और रेस्ट इन पीस लिख कर शांति से आराम करने को कहा था. शायद हत्या करने वाला मृतका से काफी दुखी था.
सूचना पा कर एसपी कार्तिक कश्यप और डीएसपी सुनीता सावंत भी घटनास्थल पर आ गई थीं. इन्हीं के साथ फोरैंसिक टीम भी आई थी. फोरैंसिक टीम का काम खत्म हो गया तो अधिकारियों ने घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. इस के बाद जरूरी काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भिजवा दिया गया.
मोहिनी नाइक की ओर से हत्या का मुकदमा दर्ज कर पुलिस ने मामले की जांच शुरू कर दी. हत्या का शक आतिश नाइक पर था. लेकिन वह फरार था. उस का पता नहीं चल रहा था. उस का फोन भी बंद था.
पुलिस आतिश को खोज रही थी, तभी पता चला कि उस ने अपनी बहन और बहनोई को फोन कर के कहा है कि उसी ने तनुजा की हत्या की है और वह गांव आ रहा है. यह पता चलते ही पुलिस सतर्क हो गई. फोंडा बसअड्डा और आतिश के घर के आसपास पुलिस लगा दी गई.
फोंडा आने वाली हर बस पर पुलिस की नजर थी. एक बस से जैसे ही आतिश उतरा, पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया. डीएसपी सुनीता सावंत के सामने उस से पूछताछ शुरू हुई तो उस ने बिना हीलाहवाली के तनुजा की हत्या का अपराध स्वीकार कर लिया. उस ने पत्नी की हत्या की जो कहानी बताई, वह इस प्रकार थी—
26 साल के आतिश नाइक के मातापिता की मौत तभी हो गई थी, जब वह 4 साल का था. मांबाप की मौत के बाद उसे गोवा के तटवर्ती इलाके मड़गांवराय में रहने वाली उस की बहन और बहनोई ने पालापोसा. आतिश की बहन और बहनोई जिस मोहल्ले में रहते थे, उसी मोहल्ले में तनुजा का भी परिवार रहता था.
वैसे तनुजा के घर वाले मूलरूप से कर्नाटक के कारवार शहर के रहने वाले थे. रोजीरोटी की तलाश में वे गोवा के मड़गांवराय आए थे. तनुजा और आतिश हमउम्र थे. चूंकि दोनों के परिवार आसपास रहते थे, इसलिए उन के बीच पारिवारिक संबंध थे. आतिश और तनुजा एक ही क्लास में पढ़ते थे, इतना ही नहीं दोनों स्कूल भी साथसाथ आतेजाते थे.
पढ़ाई के मामले में तनुजा आतिश से होशियार थी. आतिश का मन पढ़ाई में कम लगता था, नतीजा यह हुआ कि वह 10वीं में फेल हो गया. फेल होने के बाद उस ने पढ़ाई छोड़ दी और अपने बहनोई के साथ धंधे में लग गया, जबकि तनुजा पढ़ती रही. आतिश ने पढ़ाई भले छोड़ दी थी, लेकिन उस का तनुजा से मिलनाजुलना बरकरार था.
दोनों ने जवानी की दहलीज पर कदम रखा तो उन्हें एकदूसरे से प्यार हो गया. उन के दिलों में प्यार के अंकुर फूटे तो वे एकदूसरे को जीवनसाथी के रूप में देखने लगे. उन्हें लगता था, जैसे वे दोनों एकदूसरे के लिए ही बने हैं. दोनों सारी मर्यादाओं को ताक पर रख कर साथसाथ पार्क, पिकनिक, सिनेमा और रेस्टोरेंट जाने लगे.
समय के साथ दोनों का प्यार बढ़ता गया. आतिश ने अपना खुद का कैटरिंग का काम शुरू कर दिया, जो अच्छा चल निकला. तनुजा ने भी अच्छे नंबरों से 12वीं पास कर ली. अब दोनों शादी के बारे में सोचने लगे. लेकिन जब इस बात की जानकारी तनुजा के घर वालों को हुई तो वे सन्न रह गए. जबकि आतिश के घर वालों पर इस बात का किसी तरह का कोई असर नहीं हुआ.
तनुजा के घर वाले उस के भविष्य को ले कर परेशान थे. उन्होंने तनुजा को आतिश से मिलनेजुलने से रोका. तनुजा ने घर वालों की बात पर ध्यान न देते हुए कहा, ‘‘आखिर आतिश में बुराई क्या है, हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं. उस का कामधंधा भी ठीक चल रहा है.’’
तनुजा की इस बात पर उस के पिता ने कहा, ‘‘बेटा, उस में कोई बुराई नहीं है, लेकिन तुम यह क्यों नहीं समझतीं कि वह तुम्हारे काबिल नहीं है. वह 10वीं फेल है. तुम्हारा भविष्य और कैरियर दोनों उज्ज्वल हैं. तुम पढ़लिख कर आगे बढ़ सकती हो. तुम्हें अच्छी नौकरी और शादी के लिए अच्छा परिवार मिल सकता है. हम जो भी कह रहे हैं, तुम्हारे भले के लिए कह रहे हैं.’’
‘‘लेकिन पापा…’’ तनुजा अपनी बात पूरी कर पाती, उस के पहले ही उस के पिता ने कहा, ‘‘देखो बेटी, अब तुम बच्ची नहीं हो, 20-22 साल की हो गई हो. तुम खुद सोचसमझ सकती हो, मेरी भी कुछ मानमर्यादा है, समाज है. हम बस यही चाहते हैं कि तुम कोई ऐसा कदम मत उठाना, जिस से समाज और सोसायटी में मेरा और परिवार का सिर शर्म से झुक जाए.’’
तनुजा अजीब स्थिति में फंस गई थी. एक तरफ मातापिता और परिवार था तो दूसरी ओर प्यार था. कुछ दिनों तक तनुजा के दिलोदिमाग में मंथन चलता रहा. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे. आखिर उस ने परिवार के बजाय प्यार को ज्यादा महत्त्व दिया और घर वालों से बगावत कर के सन 2015 में आतिश से प्रेम विवाह कर लिया. इस विवाह में आतिश का पूरा परिवार उस के साथ था, जबकि तनुजा के परिवार का कोई भी सदस्य शादी में शामिल नहीं हुआ था. विवाह के बाद दोनों किराए का मकान ले कर रहने लगे. दोनों काफी खुश थे. उन्हें किसी से कोई शिकायत नहीं थी. आतिश अपने काम में रम गया तो तनुजा ने गृहस्थी संभाल ली.
लेकिन तनुजा जल्द ही घरगृहस्थी के कामों से ऊब गई. आतिश के काम पर जाने के बाद वह घर में अकेली रह जाती थी, जिस से उस का मन नहीं लगता था. ऐसे में उस ने आगे की पढ़ाई करने का फैसला लिया. उस के इस फैसले पर आतिश ने भी मोहर लगा दी. उस ने मड़गांवराय के एक कालेज में तनुजा का दाखिला करा दिया.
दाखिला होने से तनुजा बहुत खुश हुई. आतिश उस की पढ़ाई में हर तरह से सहयोग कर रहा था. लेकिन समय के साथ दोनों के बीच दूरियां बढ़ने लगीं. इस की वजह यह थी कि तनुजा अब कालेज के माहौल में रम गई थी. उस का आचारविचार और व्यवहार बदल गया था.
उस के कई नए दोस्त और सहेलियां बन गई थीं. वह उन के बीच समय भी बिताने लगी थी. घर और आतिश के प्रति वह लापरवाह हो गई थी. कालेज से घर आने के बाद भी वह घंटों मोबाइल से चिपकी रहती, बिना बताए यारदोस्तों के साथ पार्टी और पिकनिक पर चली जाती.
यह सब देख कर आतिश के मन में तरहतरह के सवाल उठने लगे. वह उस पर शक करने लगा. उसे डर लगने लगा कि कहीं वह तनुजा को खो न दे. अपने इस डर को दूर करने के लिए जब भी वह उस से बात करने की कोशिश करता, तनुजा उस पर बरस पड़ती और ताने मारने के साथसाथ उस का अपमान भी करने से नहीं चूकती.
कभीकभी वह यह भी कह देती कि मेरे मांबाप ठीक ही कहते थे कि तुम मेरे लायक नहीं हो. पता नहीं मुझे क्या हो गया था कि मैं ने तुम जैसे कम पढ़ेलिखे से विवाह कर लिया. मेरा एहसान मानने के बजाय तुम मुझ पर संदेह करते हो. न तुम्हारे पास कोई अच्छी सर्विस है और न ही भविष्य उज्ज्वल है. इस के बावजूद मैं तुम पर भरोसा करती हूं, पर तुम्हें मुझ पर भरोसा नहीं है.
दोनों के बीच विवाद बढ़ जाता तो तनुजा लड़झगड़ कर कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली जाती. कुछ दिनों बाद आतिश ससुराल जा कर उसे मना कर ले आता. मातापिता के समझाने के बाद तनुजा का रवैया कुछ दिनों तक तो ठीक रहता, लेकिन फिर वैसा ही हो जाता. धीरेधीरे तनुजा का व्यवहार और ताने आतिश की बरदाश्त से बाहर होते गए.
पहली जुलाई, 2017 को तनुजा कालेज से काफी देर से घर आई. घर आते ही वह मोबाइल फोन से चिपक गई तो आतिश का धैर्य जवाब दे गया. उसे यकीन हो गया कि उस का किसी से अफेयर चल रहा है. उस ने उस से कालेज से देर से आने और आते ही फोन करने के बारे में पूछा तो वह ठीक से जवाब देने के बजाय उसे ही चुप कराने लगी. इस से आतिश का रहासहा धैर्य भी जवाब दे गया. उस ने उसी समय एक खतरनाक फैसला ले लिया.
3 जुलाई, 2017 को आतिश गांव घुमाने के बहाने तनुजा को वहां ले गया. उसे मालूम था कि गांव वाले घर की एक चाबी चाची मोहिनी के पास रहती है. चाची ही उस के घर और काश्तकारी की देखरेख करती थीं. गांव पहुंच कर आतिश ने बीती बातों का जिक्र फिर से छेड़ दिया. वह उस पर कालेज छोड़ने और दोस्तों से ज्यादा बातें न करने का दबाव बनाने लगा, जबकि तनुजा यह नहीं चाहती थी. उसे अपनी कालेज लाइफ भी देखनी थी.
वह कह रही थी कि उस के दोस्त सिर्फ दोस्त हैं. इस के अलावा उन का उस से कोई और रिश्ता नहीं है. लेकिन संदेह का कीड़ा आतिश के दिमाग में घुस कर कुछ इस तरह हावी हो गया था कि उस की सोचने और समझने की शक्ति खत्म हो गई थी. उसे अब तनुजा की किसी भी बात पर भरोसा नहीं हो रहा था, जिस की वजह से आतिश ने सोते समय तनुजा के मुंह पर तकिया रख कर उस की हत्या कर दी.
पत्नी की हत्या कर के वह कुछ देर तक बुत बना उसे देखता रहा. इस के बाद उस ने तनुजा के पर्स से लिपस्टिक निकाली और तकिए के कवर पर दिल का आकार बना कर उस के अंदर ‘लव यू’ और तकिए के एक कोने में ‘रेस्ट इन पीस’ लिख दिया. इस के बाद जब वह बाहर आ कर मुख्य दरवाजे पर ताला लगा रहा था, तभी उस की चाची मोहिनी आ गईं. उस ने चाची को बताया कि वह तनुजा के लिए होटल से नानवेज लाने जा रहा है.
आतिश वहां से सीधे कर्नाटक के वेलगांव में रहने वाले अपने एक दोस्त के यहां चला गया. लेकिन वहां उसे सुकून नहीं मिला. उस के सामने बारबार तनुजा का सुंदर चेहरा घूम रहा था. अगले दिन सुबह उस ने अपनी बहन को फोन कर के अपना गुनाह कबूल करते हुए कहा कि अब वह भी अपने जीवन का अंत करने जा रहा है, क्योंकि तनुजा के बिना उस के जीवन में कुछ नहीं बचा है.
उस के बहनबहनोई ने उसे समझाते हुए ऐसा करने से मना किया और उसे गांव लौट आने को कहा. उन के समझाने पर आतिश जब अपने गांव पहुंचा तो उस की ताक में बैठी पुलिस ने उसे पकड़ लिया. आतिश ने अपना अपराध स्वीकार कर के पूरी बात पुलिस को बता दी.
विस्तार से पूछताछ के बाद पुलिस ने आतिश के खिलाफ तनुजा की हत्या का मुकदमा दर्ज कर उसे अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. कथा लिखे जाने तक वह जेल में था. मामले की जांच थानाप्रभारी सुरेश नाइक कर रहे थे.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
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21 जून, 2017 की सुबह करीब 6 बजे की बात है. पूर्वी दिल्ली के सीमापुरी थाना के एएसआई हीरालाल नाइट ड्यूटी पर थे. उन्हें पुलिस कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि दिलशाद गार्डन के पी ब्लौक के फ्लैट नंबर-पी 13 में हिंसक वारदात हो गई है. मामले की सूचना दर्ज कर वह हैडकांस्टेबल कर्मवीर को साथ ले कर मोटरसाइकिल से घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.
घटनास्थल थाने से करीब एक किलोमीटर दूर था, इसलिए वह 10 मिनट के अंदर ही वहां पहुंच गए. फ्लैट के बाहर खड़े लोग कानाफूसी कर रहे थे. हीरालाल ने उन में से किसी से घटना के बारे में पूछा तो पता चला कि उस फ्लैट में रहने वाले विनोद बिष्ट ने अपनी पत्नी रेखा के ऊपर कातिलाना हमला किया है.
हीरालाल फ्लैट के अंदर पहुंचे तो उन्हें कमरे के फर्श पर खून ही खून फैला दिखाई दिया. वहां मौजूद लोगों ने उन्हें बताया कि गंभीर रूप से घायल रेखा और उस के बेटे विनीत को पीसीआर वैन गुरु तेगबहादुर (जीटीबी) अस्पताल ले गई है. घटनास्थल की निगरानी के लिए एएसआई हीरालाल ने हैडकांस्टेबल कर्मवीर को वहीं छोड़ दिया और खुद जीटीबी अस्पताल पहुंच गए.
अस्पताल पहुंचने पर उन्हें पता चला कि रेखा ने अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया था. उस के बेटे विनीत का इलाज चल रहा था. हीरालाल विनीत से मिले. उस ने बताया कि मां को बचाने की कोशिश में उस के पिता ने उस के ऊपर भी चापड़ से वार कर दिया था, जिस से उस की हथेली कट गई थी. उन्होंने घायल विनीत का बयान दर्ज कर लिया.
विनीत का बयान ले कर एएसआई हीरालाल ने घटना की सूचना थानाप्रभारी संजीव गौतम को फोन द्वारा दे दी. इस के बाद अन्य औपचारिक काररवाई पूरी कर के उन्होंने रेखा की लाश को पोस्टमार्टम के लिए जीटीबी अस्पताल की मोर्चरी में रखवा दिया.
थानाप्रभारी संजीव गौतम ने घटना की जानकारी एसीपी हरेश्वर वी. स्वामी और डीसीपी नूपुर प्रसाद को दी और खुद घटनास्थल के लिए चल दिए. थानाप्रभारी विनोद बिष्ट के पड़ोसियों से घटना के संबंध में पूछताछ कर रहे थे, तभी क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम, एसीपी हरेश्वर वी. स्वामी के साथ डीसीपी नूपुर प्रसाद भी पहुंच गईं. दोनों अधिकारियों ने घटनास्थल का मुआयना किया और जीटीबी अस्पताल में भरती विनीत से मिलने पहुंच गए.
क्राइम इनवैस्टीगेशन टीम ने घटनास्थल से सबूत जुटाए. विनीत से बात कर के साफ हो गया था कि घर के मुखिया विनोद बिष्ट ने ही वारदात को अंजाम दिया था, इसलिए पुलिस ने विनोद के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 324 के तहत मामला दर्ज कर लिया.
विनोद बिष्ट फरार हो चुका था. उस की गिरफ्तारी के लिए डीसीपी नूपुर प्रसाद ने एसीपी हरकेश्वर वी. स्वामी के निर्देशन में सीमापुरी थाने और स्पैशल स्टाफ की एक टीम का गठन किया, जिस में थानाप्रभारी संजीव गौतम, अतिरिक्त थानाप्रभारी जे.के. सिंह, एसआई राहुल, गौरव, एएसआई हीरालाल, हैडकांस्टेबल कर्मवीर, कांस्टेबल जगवीर एवं स्पैशल स्टाफ के एएसआई अशोक राणा आदि को शामिल किया.
अतिरिक्त थानाप्रभारी जे.के. सिंह ने आरोपी के भाई मदन बिष्ट को पूछताछ के लिए थाने बुलाया. उस से विनोद के मोबाइल नंबर, दोस्तों के नाम तथा उस के छिपने के संभावित जगहों के बारे में पूछताछ की गई तो उस ने बताया कि वह पौड़ी गढ़वाल स्थित अपने पैतृक घर जा सकता है.
एसीपी के निर्देश पर पुलिस टीमों को बसअड्डों तथा रेलवे स्टेशनों पर भेजा गया, मगर विनोद पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा. पुलिस टीमें खाली हाथ लौट आईं. पुलिस ने अपने मुखबिरों को भी सतर्क कर दिया था. मुखबिर की सूचना पर अतिरिक्त थानाप्रभारी जे.के. सिंह अपनी टीम के साथ विनोद के फ्लैट के निकट पहुंच कर उस का इंतजार करने लगे.
कुछ देर बाद किसी ने बताया कि पार्क के पास एक आदमी छिपा बैठा है. पुलिस टीम ने वहां पहुंच कर उस आदमी को हिरासत में ले लिया. वह कोई और नहीं, विनोद बिष्ट ही था. उस की पीठ पर एक पिट्ठू बैग था. बैग की तलाशी ली गई तो उस में से एक खून सनी शर्ट और एक चापड़ बरामद हुआ. पुलिस टीम उसे ले कर थाने आ गई. थाने में जब विनोद से पूछताछ की गई तो उस ने अपना जुर्म स्वीकार कर पत्नी की हत्या करने की जो वजह बताई, वह इस प्रकार थी—
मूलरूप से उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल का रहने वाला विनोद अपने परिवार के साथ पिछले 30 सालों से दिल्ली के दिलशाद गार्डन के पी ब्लौक में रह रहा था. उस के परिवार में पिता सतीश बिष्ट, माता शकुंतला देवी, भाई मदन बिष्ट, उस की पत्नी कुसुम और विनोद की पत्नी रेखा तथा 2 बेटे थे.
उस का बड़ा बेटा विनीत पढ़ने में ठीकठाक था. वह 10वीं में पढ़ रहा था, जबकि छोटा बेटा संचित छठीं कक्षा में पढ़ता था. विनोद की सन 2001 में रेखा से शादी हुई थी.
शादी के बाद से पतिपत्नी अपने फ्लैट में खुशहाल जीवन गुजार रहे थे. विनोद कृष्णानगर के गुरमीत टेंटहाउस में मैनेजर था, जहां उसे अच्छा वेतन मिलता था. किसी बात की कमी न होने के कारण उस के दोनों बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ रहे थे.
विनोद की ड्यूटी अकसर रात में होती थी. ऐसे में वह सुबह घर लौटता था. छोटा भाई मदन बिष्ट अपने परिवार के साथ पड़ोस में ही रहता था. दोनों भाई दिल्ली में ही रह रहे थे. उन्हें गांव जाने का मौका न के बराबर मिलता था, इसलिए कुछ सालों पहले विनोद ने अपने मातापिता को भी अपने पास दिल्ली बुला लिया था.
विनोद के बड़े बेटे विनीत को 10वीं में अच्छे नंबर मिले थे. बेटे के अंक देख कर विनोद और रेखा काफी खुश थे और उस के भविष्य की रूपरेखा तय करने में जुटे थे.
वैसे तो विनोद और रेखा का दांपत्य ऊपर से शांत और स्वच्छ नजर आ रहा था. लेकिन हकीकत कुछ और थी. रेखा की उम्र 36 साल के आसपास थी. लेकिन मौडर्न लाइफस्टाइल और आकर्षक डिजाइनर कपड़ों में वह मुश्किल से 25 साल की लगती थी. वह रोजाना अपने छोटे बेटे को स्कूल छोड़ने जाती थी, जहां और भी कई बच्चों के मातापिता आते थे.
उसी कालोनी का रहने वाला विकास भी अपने बेटे को स्कूल छोड़ने जाता था. उसे रेखा बहुत अच्छी लगती थी. वह चोरीछिपे उसे निहारता रहता था. रेखा उसे इस तरह चोरीछिपे ताकते हुए देखती तो उसे मन ही मन अजीब सी खुशी मिलती. विकास ऊंची कदकाठी का तनदुरुस्त युवक था. शक्लसूरत अच्छी होने के साथ वह खुद को मेंटेन रखता था. कुछ दिनों तक रेखा ने उसे ज्यादा तवज्जो नहीं दी. वह उस की नजरों को नजरअंदाज करती रही.
पर रेखा ज्यादा दिनों तक अपने इस रुख पर कायम नहीं रह सकी. विकास की चाहत ने उस के दिल में घंटी बजानी शुरू कर दी. वह भी कनखियों से उसे देखने लगी. एक दिन दोनों की नजरें मिलीं तो रेखा ने मुसकरा दिया. इस के बाद विकास की हिम्मत बढ़ गई. उस के समीप आ कर उस ने पूछा, ‘‘कहां से आती हैं आप?’’
रेखा ने भी उसे निराश नहीं किया. जवाब में उस ने कहा, ‘‘पी ब्लौक से.’’
इस के बाद दोनों इधरउधर की बातें करने लगे. जाते समय दोनों ने एकदूसरे को अपनेअपने मोबाइल नंबर दे दिए.
इस के बाद उन्हें जब भी मौका मिलता, अपने दिल की बातें कर लेते. रात को विनोद घर पर नहीं होता था और रेखा के बच्चों का बैडरूम अलग था. अकेली तनहाई में जब रेखा को नींद न आती तो वह मोबाइल पर विकास से मीठीमीठी बातें कर के अपने दिल की आग को शांत करने की कोशिश करती.
दोनों जवान और खूबसूरत होने के साथ एकदूसरे के प्रति आकर्षित थे. कुछ ही दिनों में दोनों ने मोबाइल पर समय तय कर के मिलना शुरू कर दिया. रेखा को घर के कामकाज से बाहर जाना ही पड़ता था. ऐसे में वह विकास को फोन कर देती थी. विकास उस से मिलने आ जाता था.
मुलाकातों का सिलसिला चल निकला तो दोनों करीब आ गए और उन के बीच शारीरिक संबंध भी बन गए. इस के बाद रेखा के स्वभाव में परिवर्तन यह आ गया कि उस ने पति की ओर ध्यान देना बंद कर दिया.
रेखा के बदलते रंगढंग देख कर विनोद को उस पर शक होने लगा. वह दिन में घर पर ही रहता था, इसलिए उस ने उस की हरकतों पर नजर रखनी शुरू कर दी. एक दिन उस ने रेखा के मोबाइल फोन के सारे नंबर चैक किए. जब भी उसे कोई अंजान नंबर दिखाई दे दिया, उस ने पूरी तसल्ली के साथ उस नंबर के बारे में पूछा. रेखा निडर हो कर जवाब दे रही थी, पर विनोद महसूस कर रहा था कि रेखा उस से कुछ छिपा रही है.
शक की दीवार रिश्तों के बीच आई तो दांपत्य में कड़वाहट घुलने लगी. उन के बीच अविश्वास की खाई चौड़ी होती गई. परिणामस्वरूप अकसर दोनों के बीच किसी न किसी बात को ले कर लड़ाईझगड़ा होने लगा.
कुछ दिनों पहले विनोद के मातापिता पौड़ी गढ़वाल चले गए. इसी बीच एक दिन रेखा बेटे को स्कूल से लाने गई तो उसे विकास मिल गया. विकास से बातें कर रेखा अपने सारे दुख दूर कर लेती थी. वह विकास से बातें कर रही थी कि उस के मोबाइल पर विनोद का फोन आ गया. वह पति का फोन रिसीव कर उस से बातें करने लगी. बीचबीच में वह अपने साथ चल रहे प्रेमी विकास से भी बातें करती रही.
वह प्रेमी से जो बातें कर रही थी, उसे विनोद भी सुन रहा था. विनोद ने उन बातों को अपने फोन में रिकौर्ड कर लिया था. रेखा की इन बातों से विनोद समझ गया कि रेखा का जरूर किसी से संबंध है. वह घर आई तो विनोद ने बेटे को दूसरे कमरे में भेज कर रेखा को अपने पास बिठा कर मोबाइल की रिकौर्डिंग सुनाई. रिकौर्डिंग में कुछ ऐसी बातें भी थीं, जो कोई औरत अपने पति या प्रेमी से ही कर सकती थी.
रिकौर्डिंग सुन कर रेखा सन्न रह गई. विनोद ने उस दिन रेखा को जम कर पीटा. शाम को उस ने रेखा को नया मोबाइल नंबर दिला दिया, साथ ही उस ने उसे चेतावनी दी कि अब अगर उस ने उस से बात की तो ठीक नहीं होगा. फोन नंबर बदलने के कारण उस की प्रेमी से बात नहीं हो पा रही थी. इस की वजह यह थी कि विकास का नंबर उसे याद नहीं था और विनोद ने फोन से उस का नंबर डिलीट कर दिया था. रेखा को प्रेमी से बात किए बिना चैन नहीं मिल रहा था. इसलिए उस ने अपना नया नंबर विकास को दे दिया. वह फिर प्रेमी से मिलने लगी. यानी उस ने प्रेमी से मिलनाजुलना नहीं छोड़ा.
विनोद को जब पता चला कि रेखा अब भी प्रेमी से मिलती है तो उसे बहुत गुस्सा आया. उस ने रेखा से साफ कह दिया कि अगर उसे उस के साथ रहना है तो ठीक से रहे अन्यथा अपने प्रेमी के साथ रहने चली जाए. वह उसे कुछ नहीं कहेगा.
लेकिन रेखा भी अब ढीठ हो गई थी. उस ने विनोद की बात एक कान से सुनी अैर दूसरे से निकाल दी. लिहाजा उन के बीच कलह बढ़ने लगी. जब भी दोनों के बीच ज्यादा झगड़ा होता, रिश्तेदार बीचबचाव कर के सुलह करा देते. इस की वजह से घरेलू कलह का मामला कभी थाने तक नहीं पहुंचा.
20 जून, 2017 मंगलवार को दिलशाद गार्डन में स्थानीय साप्ताहिक बाजार लगा था. बाजार में रेखा को विकास मिल गया. दोनों आपस में बातें करने लगे. उसी बीच वहां विनोद पहुंच गया. उस ने रेखा और विकास को देखा तो उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. लेकिन गुस्से को काबू कर वह अपने फ्लैट पर आ गया. रेखा घर लौटी तो उस ने दोटूक कहा, ‘‘तुम अब मेरे साथ नहीं रह सकती. तुम मेरा घर छोड़ कर उसी कमीने के साथ रंगरलियां मनाने चली जाओ.’’
इस पर रेखा ने कहा कि वह घर छोड़ कर नहीं जाएगी और जो उस का मन करेगा, वही करेगी. पत्नी की बात सुन कर विनोद को गुस्सा तो बहुत आया, पर वह कुछ सोच कर गुस्से को पी गया.
अगले दिन छोटे बेटे को स्कूल से लाने के लिए विनोद खुद गया और उसे उस के ननिहाल छोड़ कर अकेला घर आया. विनोद का साला भी दिलशाद गार्डन में ही रहता था. रेखा ने बेटे को मायके में छोड़ आने की बात पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया. शाम को दोनों में काफी लड़ाई हुई. इस के बाद विनोद ड्यूटी पर कृष्णानगर चला गया. वहां वह रात भर शराब पीता रहा. योजना बना कर उस ने मीट काटने वाला चापड़ अपने बैग में छिपा कर रख लिया और सुबह 5 बजे घर पहुंचा.
योजना को अंजाम देने के लिए विनोद ने छोटे भाई के कमरे की कुंडी बाहर से बंद कर दी. इस के बाद उस ने रेखा से दरवाजा खोलने को कहा. जैसे ही रेखा ने फ्लैट का दरवाजा खोला, विनोद ने उसे मारना शुरू कर दिया. रेखा ने बेटे विनीत को बचाने के लिए आवाज दी. उसी समय विनोद ने छिपाया चापड़ निकाल लिया.
खतरा भांप कर रेखा बचने के लिए बाहर भागी, लेकिन विनोद चौकन्ना था. वह किसी कीमत पर रेखा को छोड़ना नहीं चाहता था. उस ने चापड़ से रेखा के सिर पर वार कर दिया. रेखा के सिर से खून का फव्वारा फूट पड़ा. वह वहीं फर्श पर गिर पड़ी.
विनीत ने मम्मी को बचाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया तो चापड़ उस के हाथ पर लग गया. पापा की इस हरकत से डर कर विनीत चाचा मदन को बुलाने बाहर भागा. उस गुस्से में विनोद ने रेखा के ऊपर 35 वार किए. विनीत चाचा के कमरे की बाहर से लगी कुंडी खोल कर उन्हें बुला लाया. रेखा की चीखपुकार सुन कर पड़ोसी भी वहां आ गए थे. लोगों को देख कर विनोद वहां से भाग निकला.
आनंद विहार के पास एक सुनसान पब्लिक टायलेट में जा कर उस ने अपना रक्तरंजित शर्ट बदला और उसे पिट्ठू बैग में रख लिया. दिन भर उस ने कौशांबी में गुजारा. शाम को उसे अपने घायल बेटे विनीत की चिंता हुई तो वह उस के बारे में जानने के लिए फ्लैट पर आ रहा था. वह अपने कपड़े और नकदी ले कर पौड़ी गढ़वाल भाग जाना चाहता था, लेकिन अतिरिक्त थानाप्रभारी जे.के. सिंह की टीम ने उसे फ्लैट पर पहुंचने से पहले ही गिरफ्तार कर लिया.
22 जून को पत्नी के के हत्यारे विनोद को कड़कड़डूमा की अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. आखिर रेखा की चरित्रहीनता ने एक हंसतेखेलते परिवार को बरबाद कर दिया.
– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
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सरकार ने महिलाओं को धर्म के जाल में उलझाए रखने के लिए बिंदी पर लगे जीएसटी को तो कम कर दिया पर जिस तरह से सैनिटरी पैड से जीएसटी हटाने की मांग हो रही थी उसे नजरअंदाज कर दिया है. सैनिटरी पैड महिलाओं की हैल्थ और हाइजीन के लिए सब से अहम है. ऐसे में जरूरी है कि इस पर लगे टैक्स को खत्म किया जाए ताकि यह सस्ता हो और ज्यादा से ज्यादा महिलाएं इस का प्रयोग कर सकें.
महिलाओं की सुरक्षा और सेहत की बात करें तो माहवारी सुरक्षा सब से प्रमुख विषय है. आज भी भारत में 70 फीसदी महिलाएं माहवारी के दौरान सैनिटरी पैड का प्रयोग नहीं करती हैं. इस की जगह गंदे घरेलू कपड़ों का प्रयोग माहवारी के समय करती हैं. सैनिटरी पैड के अलावा महावारी के दिनों में कुछ भी प्रयोग करना सेहत के लिए खतरा होता है. इस से संक्रमण फैलता है. कई बार यह संक्रमण इतना बढ़ जाता है कि महिला बांझपन का शिकार हो सकती है. माहवारी के दौरान फैलने वाले संक्रमण से माहवारी के समय रक्तस्राव अधिक हो सकता है, जिस से महिलाओं में ऐनीमिया का रोग बढ़ सकता है.
प्रयोग को बढ़ावा
विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि भारत में महिलाओं की स्वास्थ्य सुरक्षा को देखते हुए सैनिटरी नैपकिन के प्रयोग को बढ़ावा देना चाहिए. केंद्र सरकार से महिलाओं को यह उम्मीद थी कि सैनिटरी पैड के प्रयोग को देखते हुए इस पर लगने वाले टैक्स को सरकार जीएसटी में कम करेगी.
सैनिटरी नैपकिन के कम प्रयोग का सब से प्रमुख यह कारण है कि इस की कीमत ज्यादा है. बाजार में इस की कीमत क्व20 प्रति पैकेट से शुरू हो कर क्व120 प्रति पैकेट तक है. एक पैकेट में
5 से 8 पैड होते हैं. महिलाओं में माहवारी का समय 3 से 5 दिन तक रहता है. कुछ में यह 7 दिन तक भी हो जाता है. माहवारी में 2-3 पैकेट तक प्रयोग में आते हैं. ऐसे में क्व60 से ले कर क्व300 तक का खर्च सैनिटरी पैड्स पर हर माह आता है.
कम हो कीमत
माहवारी के अलावा बच्चा होने के बाद होने वाले रक्तस्राव को रोकने के लिए भी सैनिटरी पैड का प्रयोग बढ़ जाता है. नेहा तिवारी कहती हैं कि गांवों और कसबों की ज्यादातर महिलाएं सैनिटरी पैड के खर्च को नाहक समझती हैं. मगर अब लोगों के लगातार प्रयास से वे यह तो समझने लगी हैं कि इस का प्रयोग जरूरी है पर इस के खर्च को वे फुजूलखर्ची समझती हैं. ऐसे में अगर इस की कीमत कम हो जाए तो महिलाएं इस का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग कर सकती हैं. शादी के बाद कुछ दिन तक शहरों में महिलाएं सैनिटरी पैड का प्रयोग करती हैं. पर बाद में पढ़ीलिखी महिलाएं भी इस का प्रयोग बंद कर देती हैं. इस पर हर माह क्व100-200 उन्हें अखरने लगता है.
सैनिटरी पैड की कीमत को कम करने का प्रयास हर स्तर पर हो रहा है. सरकारों ने सस्ते सैनिटरी पैड बनाए, जो क्व10 से क्व20 प्रति पैकेट ही बिकते हैं पर समस्या यह है कि ये हर जगह नहीं मिलते. फिर सस्ते होने के कारण इन की क्वालिटी भी बेहतर नहीं होती, जिस से माहवारी में रक्तस्राव को रोकने में ये असफल होते हैं. ऐसे में महिलाओं को औसतन क्व30 से अधिक कीमत वाले पैकेट ही लेने पड़ते हैं.
जानकार कहते हैं कि सस्ते पैड्स की सिलाई भी अच्छी नहीं होती, जिस से वे खुल जाते हैं. इन में रक्त सोखने वाला मैटीरियल भी बेहतर नहीं होता, जिस से ये ज्यादा उपयोगी नहीं रहते हैं. ऐसे में महिलाएं केंद्र सरकार से यह उम्मीद कर रही थीं कि जीएसटी में सैनिटरी पैड पर टैक्स कम होगा, जिस से यह सस्ता हो सके पर केंद्र सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया और इस पर जीएसटी की दर 12 फीसदी ही रखी. अजीब बात यह है कि काजल, बिंदी और सिंदूर पर टैक्स कम करने वाली सरकार को सैनिटरी पैड की उपयोगिता नजर नहीं आई.
हैल्थ और हाइजीन के लिए हैं खास
जीएसटी को घटाने को ले कर महिलाएं अलगअलग स्तर पर प्रयास कर रही हैं. इसे ले कर सोशल मीडिया पर एक कैंपेन भी चली, दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका भी दाखिल हुई. इस पर सरकार ने अपने बयान में कहा कि सैनिटरी पैड बनाने में जो मैटीरिल लगाया जाता है वह विदेशों से आता है, जिस के चलते सैनिटरी पैड पर टैक्स में बदलाव संभव नहीं हो सकता है.
जानकार सवाल करते हैं कि जब काजल, बिंदी पर टैक्स कम हो सकता है जोकि बहुत जरूरी और सेहत से जुड़ी चीजें नहीं है तो फिर सैनिटरी पैड पर जीएसटी कम क्यों नहीं हो सकता? हैरानी इस बात की भी है कि एक तरफ जहां केंद्र सरकार साफसफाई को बढ़ावा देना चाहती है तो वहीं दूसरी तरफ महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए सब से जरूरी सैनिटरी पैड पर वह जीएसटी कम करने को तैयार नहीं है. ऐसे में यह साफ है कि सरकार को महिलाओं की सेहत व हाइजीन का कोई खयाल नहीं है.
सफल नहीं होगा सफाई का संदेश
सैनिटरी पैड का प्रयोग 13 साल से ले कर 50-55 साल तक की महिलाएं करती हैं. यह हर माह की जरूरत है. एक तरफ इस का प्रयोग बढ़ाने के लिए तमाम तरह के जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकार ने इस पर जीएसटी 12 फीसदी कर रखा है. अगर सरकार इसे कम करे तो ज्यादा से ज्यादा महिलाएं इस का प्रयोग कर सकेंगी और खुद को स्वस्थ रख सकेंगी. जब तक हर महिला सैनिटरी पैड का प्रयोग करना शुरू नहीं करेगी तब तक घरघर में शौचालय बना कर सफाई देने का संदेश भी सफल नहीं होगा. गांवों और कसबों में महिलाएं केवल शौच के लिए ही खेतों में नहीं जातीं माहवारी के समय प्रयोग किए जाने वाले गंदे कपड़ों को भी फेंकने जाती हैं. माहवारी से गंदे हुए कपड़ों की जगह पर सैनिटरी पैड का डिस्पोजल करना आसान होता है.
हस्तक्षेप करे सरकार
महिला स्वास्थ्य की दिशा में काम कर रही रागिनी उपाध्याय कहती हैं कि 35 साल के बाद बहुत सारी महिलाओं की बच्चेदानी में कई ऐसी बीमारियां फैलने लगी हैं जो माहवारी में रक्तस्राव को बढ़ा देती हैं. इसे रोकने के लिए जब गंदे कपड़ों का प्रयोग किया जाता है तो बच्चेदानी के कैंसर तक की संभावना बढ़ जाती है. ऐसे में यह जरूरी है कि महिलाएं ज्यादा से ज्यादा सैनिटरी पैड का प्रयोग करें. अगर सरकार सैनिटरी पैड पर लगे 12 फीसदी जीएसटी को माफ कर दे तो पैड की कीमत आधी रह जाएगी, जिस से महिलाएं इस का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग कर सकेंगी. उन की हैल्थ और हाइजीन के लिए यह बहुत जरूरी है.
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नीना बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थी. मातापिता ने उस के सपनों को पंख दिए. उस का सिलैक्शन मैडिकल में हो गया. वहीं उस की मुलाकात समीर से हुई. मैडिकल फाइनल में नीना टौप कर गई. पढ़ाई पूरी करने के बाद घर वालों की रजामंदी से दोनों ने शादी रचाई. नीना की हसरत थी कि वह क्लीनिक खोले. उस में 2-3 साल लग गए. इसी बीच, उस की गोद में रोहन आ गया.
सासससुर का कोई दबाव नहीं था लेकिन इस बात का जिक्र वे हमेशा करते कि बच्चों के सही पालनपोषण के लिए मां का घर पर रहना जरूरी है. 2 वर्ष बाद निधि का जन्म हो गया. नीना कशमकश में थी. बच्चों के लिए समय कम पड़ रहा था. उस ने समीर से बात की. दोनों ने मिल कर निर्णय लिया कि फिलहाल नीना कैरियर से ज्यादा बच्चों पर ध्यान दे. यह ज्यादा सही रहेगा. सासससुर ने न सिर्फ बहू के फैसले का स्वागत किया बल्कि वे सब के सामने बहू के त्याग की प्रशंसा करते.
ऐसा ही कुछ बैंककर्मी विजयलक्ष्मी के साथ हुआ. उस ने और राकेश ने एकसाथ बैंक जौइन किया. दोनों की अरेंज मैरिज थी. बच्चों के जन्म के बाद विजयलक्ष्मी ने फैसला किया कि वह प्रमोशन नहीं लेगी. बच्चों की पढ़ाईलिखाई के लिए किसी एक को स्थायी रहना होगा. भले ही उस ने जौब नहीं छोड़ी लेकिन इस निर्णय के कारण वह कभी आगे नहीं बढ़ सकी. उस के जूनियर बौस होते गए. उस के पति राकेश आज जीएम हैं और वह आज तक उसी टेबल पर कलम घिस रही है.
ये 2 उदाहरण बानगी मात्र हैं. हमारे आसपास ऐसे बहुत सारे उदाहरण मिल जाएंगे, जहां लड़कियों ने शादी के बाद घरपरिवार की जिम्मेदारी के लिए अपनी जौब को तिलांजलि दे दी. ऊपरी तौर पर देखने से लगता है कि वे स्वयं अपनी नौकरी छोड़ती हैं, लेकिन गहराई से विचार करें तो पता चलता है उन पर प्रत्यक्षअप्रत्यक्ष रूप से मानसिक दबाव डाला जाता है कि वे जौब को बाय कह दें. एक ऐसा वातावरण बनाया जाता है कि वे जौब छोड़ने को मजबूर हो जाती हैं.
जिस जौब को हासिल करने में महिलाएं दिनरात संघर्ष करती हैं, मेहनत करती हैं, उसे एक झटके में छोड़ना भला वे क्यों चाहेंगी? जौब उन का बचपन का सपना होता है, उन की महत्त्वाकांक्षा होती है, कितनी विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए वह इसे हासिल करती हैं. ऐसे में किसी की दिली चाहत होगी कि वह लगीलगाई नौकरी छोड़े या फिर बिना प्रमोशन जिंदगी गुजार दे.
शादी के बाद नौकरी छोड़ने के लिए 3 कारण ज्यादा जिम्मेदार होते हैं, बच्चों की परवरिश, पति के अच्छे कैरियर के लिए उस के जौब की कुर्बानी और ससुराल वालों की नापसंदगी. ये कारण इस कदर लड़कियों पर हावी हो जाते हैं कि उन्हें अपनी नौकरी छोड़ने का निर्णय लेना पड़ता है. यह निर्णय भविष्य में उन पर भारी भी पड़ सकता है. कई बार कुछ ऐसी परिस्थितियां बन जाती हैं कि कैरियर को ठोकर मारने वाली महिलाएं बेबस और लाचार हो जाती हैं. उस समय उन्हें लगता है, काश, जौब न छोड़ी होती.
खुद को कमजोर न पड़ने दें
जौब छोड़ने का निर्णय लेने से पहले खुद से सवाल करें कि क्या जौब छोड़ना जरूरी है? इस बात को गांठ बांध लीजिए कि जौब मिलना आसान नहीं होता. बहुत सारी प्रतियोगिताओं से गुजरते हुए यह प्राप्त होता है और छोड़ने के बाद हासिल नहीं होता. आप पलपल आगे बढ़ती दुनिया से काफी पीछे छूट जाती हैं. आप जौब नहीं छोड़ने की बात पर दृढ़ रहिए. खुद को कमजोर मत पड़ने दीजिए. क्या कोई पुरुष अपने कैरियर का परित्याग सिर्फ इसलिए करता है कि उस की पत्नी आगे बढ़े.
विजयलक्ष्मी ने सिर्फ बच्चों के लिए प्रमोशन नहीं छोड़ा था. यह बात भी थी कि पति का कैरियर निर्विघ्न आगे बढ़े. उस के लिए विजयलक्ष्मी का त्याग जरूरी हो गया. अब जब पति जीएम हो गए हैं, बच्चे विदेश में बस गए हैं, कहती हैं, पति पर गर्व होता है लेकिन कभीकभी अकेले में लगता है आज मैं भी जीएम होती अगर… विजयलक्ष्मी के अधूरे वाक्य में वह दर्द बिना है जो वे चाह कर भी कभी व्यक्त नहीं कर पातीं. वक्त फिसल गया. पीठ पीछे औफिस में यह चर्चा भी होती.
महिलाओं में इतनी काबिलीयत कहां, देखो इस के पति को, दोनों ने साथसाथ नौकरी शुरू की और आज वह जीएम हैं. विजयलक्ष्मी की काबिलीयत पर धूल जम गई है. त्यागसमर्पण सब हाशिए पर आ गया है. अब उंगली सीधेसीधे उस की योग्यता पर उठती है. फिर उसे हासिल क्या हुआ? समाज महिलाओं को हमेशा कमतर आंकता है, यह तनाव भी महिलाओं को झेलना पड़ता है.
दबाव में निर्णय न लें
हम अपने को चाहे जितना मौडर्न मान लें लेकिन कड़वी सचाई यही है कि आज भी कामकाजी महिलाओं को खुले दिल से स्वीकार नहीं किया जाता. लड़की और लड़के की नौकरी को एकसमान नहीं समझा जाता. ससुराल वाले बहू की कमाई पर नजर रखते हैं. कई परिवारों में बहू के सारे पैसे भी ले लिए जाते हैं और दूसरी ओर यह भी सुनाया जाता है कि बेटा अच्छाखासा कमा रहा है, तुम्हें नौकरी करने की क्या जरूरत है?
कई घर वाले बच्चों की जिम्मेदारी लेने से भी इनकार कर देते हैं, ‘इस उम्र में हम से बच्चे नहीं संभलते. बच्चों की जिम्मेदारी से बचने के लिए नौकरी करती है.’ समाज में यह कहने वाले भी मिल जाएंगे, ‘घर और बच्चों को छोड़ कर नौकरी करने की क्या जरूरत है भला? पति इतने अच्छे ओहदे पर है. घरमकान, बैंकबैलेंस है. सिर्फ अपने शौक के लिए घरपरिवार की तिलांजलि दे रही है.’
एक लड़की जब नौकरी कर रही होती है, उसे ढेर सारे दबाव के बीच काम करना होता है. ऐसे ही किसी कमजोर पल में वह नौकरी छोड़ने का मन बनाती है. लेकिन जौब छोड़ने का निर्णय कभी किसी तरह के दबाव में न लें. आप खुद से विचारें कि क्या जो महिलाएं काम कर रही हैं, वो घरपरिवार के प्रति जिम्मेदार नहीं हैं? क्या वे अपने घर को अच्छे से मेंटेन नहीं कर पा रही हैं? यदि आप इस पर कुछ विचार करेंगी तो पाएंगी कि कई मामलों में कामकाजी महिलाएं
बच्चों की परवरिश और पारिवारिक जिम्मेदारी घरेलू महिलाओं से बेहतर निभा रही होती हैं.
आप के आसपास और पहचान वालों में ऐसी कई कामकाजी महिलाएं मिल जाएंगी. आप उन्हें अपना रोल मौडल चुनें और बेफिक्र हो कर जौब करती रहें.
भविष्य की सोचें
एक झटके में नौकरी छोड़ने का फैसला भविष्य में भारी पड़ सकता है. इस मामले में कुछ बातों को नजरअंदाज करना चाहिए, जैसे घर के लोगों के ताने या बेरुखी, रोकटोक. कुछ बातों को मैनेज करना सीखें, बच्चों के लिए अतिरिक्त ट्यूटर रखें, घर के बड़ेबुजुर्गों को उन के हिसाब से खुश रखने की कोशिश करें ताकि बच्चों की देखभाल होती रहे.
जौब छोड़ने में जल्दीबाजी न करें. यह भी सोचें कि आप के जौब छोड़ने पर घर की आर्थिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ेगा. बच्चे जब छोटे होते हैं, उन की फीस और अन्य खर्चे कम होते हैं. जैसेजैसे वे बड़े होते जाते हैं, खर्च बढ़ता जाता है. सिर्फ एक सदस्य की आमदनी से घर की स्थिति डांवांडोल हो सकती है.
मीता एक प्रकाशन विभाग में काम करती थी. उस को कामकाजी होने के ताने ससुराल वाले देते थे. उस के बच्चों की कोई केयर नहीं करता. कई बार वे स्कूल से आ कर भूखे सो जाते. उस के दोनों बच्चे जब 8-10 साल के थे, उस ने जौब छोड़ दी. अब वे कालेज जाने लगे हैं. मीता अपने होनहार बेटों का दाखिला इंजीनियरिंग और मैडिकल में इसलिए नहीं करा सकी, क्योंकि उस के पास बच्चों की महंगी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं थे. एक दिन उस के बेटों ने किसी बात पर उलाहना दे दी, ‘‘तुम्हें जौब छोड़ने की क्या जरूरत थी मां, तुम्हें हमारे भविष्य के बारे में भी सोचना चाहिए था.’’
अन्य विकल्पों पर विचार करें
जौब छोड़ना आप की समस्या का समाधान नहीं है. तत्काल आप को किसी परेशानी से छुटकारा मिलता नजर आएगा लेकिन बाद में कईकई समस्याएं सिर उठाने लगेंगी. जैसे हर परिस्थिति का सामना आप डट कर करती हैं, वैसे ही इस का सामना भी मजबूत हो कर करें. पूरी तरह नौकरी छोड़ने से बेहतर है आप उन औप्शंस पर ध्यान दें जिन्हें आप वर्तमान नौकरी छोड़ने के बाद कर सकती हैं.
पूजा शर्मा पटना में बुटीक चलाती हैं. उन की बुटीक की शहर में एक पहचान है. लेकिन 10 साल पहले वे शिक्षिका थीं. पति और ससुराल वाले चाहते थे कि वे घर पर रहें. उन की 3 बेटियां हैं. अभी तीनों बेंगलुरु में पढ़ रही हैं. जब वे छोटी थीं, उन्हीं के स्कूल में वे शिक्षिका थीं.
बेटियों के हिसाब से शेड्यूल तय था. जब वे बड़ी हो गईं, घर में ही पूजा ने अपना बुटीक खोल लिया. शादी के पहले उन की इस में रुचि थी. वे कहती हैं, ‘‘अगर दबाव में आ कर नौकरी छोड़ देती तो शायद ही मैं बुटीक खोल पाती. हो सकता है मैं अपना आत्मविश्वास खो देती. समय बदल गया. अब घर के लोग भी खुश हैं. मुझे भी खुद पर गर्व होता है कि मैं ने कई लोगों को रोजगार दिया है.’’
आत्मनिर्भरता पर गर्व करें
अपने आत्मनिर्भर होने पर पूजा शर्मा की तरह गर्व करें. अपना नजरिया बदलें. यह जरूरी नहीं कि आप बिजनैस वुमन बन कर ही किसी को रोजगार दे सकती हैं, यदि आप एक अदद नौकरी करती हैं, फिर भी कई लोगों को टुकड़ोंटुकड़ों में आत्मनिर्भर बना सकती हैं. घरेलू महिलाएं आमतौर पर बाई रखती हैं लेकिन ज्यादातर कामकाजी महिलाएं बाई के अतिरिक्त बच्चों की देखभाल और खाना बनाने वाली मेड भी रखती हैं. खुद को और घर को मेंटेन करने के लिए धोबी रखना या कपड़ा आयरन करवाना उन की मजबूरी होती है. कामकाजी होने के कारण वे स्वयं सारे खर्च वहन करती हैं. इस पर किसी की ज्यादा बंदिश नहीं होती. आप तभी ऐसा कर सकती हैं जब तक आप जौब में हैं, आत्मनिर्भर हैं. आप कभी इस तरह सोच कर देखिए, दिल को तसल्ली मिलेगी.
सम्मान से समझौता क्यों
जौब कोई भी हो, लोगों की नजर में आप के लिए सम्मान होता है. यदि आप शिक्षिका हैं तो हजारों विद्यार्थी और उन के गार्जियन आप को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं. पत्रकार हैं तो समाज के हर तबके में आप का रुतबा होता है. बड़ेबड़े पदाधिकारी भी आप का सम्मान करते हैं. लेखिका हैं तो लोग आप की बातों को वजन देते हैं. इसी तरह वकील, कलाकार, डाक्टर, बैंककर्मी आदि जितने भी पेशे हैं, सब आप को सम्मान दिलाते हैं.
सागरिका को पत्रकारिता से जुड़े 6 महीने ही हुए हैं. वह गर्व से कहती हैं, ‘मुझे कोई मैडम बुलाता है तो बहुत खुशी होती है. लगता है मेरा कोई अपना वजूद है.’ गांठ बांध लीजिए, यह सम्मान आप को आप का काम दिलाता है. नौकरी छोड़ने का मतलब है, आप को अपने सम्मान से समझौता करना होगा. लोग आप की काबिलीयत का सम्मान करते हैं. नौकरी छोड़ने के साथ आप का रुतबा और सम्मान जाता रहेगा.
कामना सिन्हा एक मल्टीनैशनल कंपनी में मार्केटिंग हेड थी. उस ने अंतरजातीय विवाह किया. शुरू के 3-4 साल ठीक रहे. पतिपत्नी की पोस्टिंग अलगअलग जगह पर होती है, वे एडजस्ट कर लेते. बेटी होने के बाद कामिनी ने नौकरी छोड़ने का फैसला लिया. अब बेटी 8 साल की है. पति के साथ कैरियर शुरू करने वाली कामिनी अब हाउसवाइफ है और पति कैरियर में बहुत ऊंची छलांग लगा चुका है. कामिनी मानती है, ‘वैसे तो मुझे कोई मलाल नहीं लेकिन कभीकभी लगता है मेरा सम्मान कहीं खो गया है.’
याद करें अपना संघर्ष
यदि आप जौब छोड़ने का मन बना रही हैं तो उस संघर्ष को याद कीजिए जिस के कारण आप की रातों की नींद उड़ी थी, दिन का चैन खोया था. अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होती है. सारा फोकस पढ़ाई पर होता है. आंखें मींचमींच कर पढ़ना पड़ता है. जब लोग रातों को चैन की नींद सो रहे होते हैं या पार्टी एंजौय कर रहे होते हैं तब अपने विषय के सवालों से घिरी आप जवाब ढूंढ़ रही होती हैं. जौब सिर्फ पढ़ाई से नहीं मिलती है और भी परेशानी साथसाथ चलती है. संघर्ष कई स्तरों पर हो सकता है.
मध्यवर्गीय परिवारों में आज भी रूढि़वादिता है. कुछ लोग बेटियों को अच्छी शिक्षा दिलवाते हैं लेकिन उसे जौब नहीं करने देते. ऐसे में जौब की परमीशन लेने में लड़कियों को कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं, वह उन्हें ही पता होता है.
स्वाति एमबीए फाइनल ईयर में थी, तभी उस का कैंपस सेलैक्शन हो गया. यह खुशखबरी ले कर वह घर पहुंची लेकिन कोई ज्यादा खुश नहीं हुआ. पापा ने नौकरी के लिए सीधेसीधे मना कर दिया. उन का मानना था कि अच्छी पढ़ाई अच्छे घर में शादी की गारंटी है. स्वाति अड़ गई.
कालेज के टीचरों ने आ कर उस के पापा को कई स्तरों पर समझाया तब उन्होंने हां की. लेकिन शादी के 2 साल बाद ही स्वाति ने जौब छोड़ दी. वही परंपरावादी कारण, ससुराल वालों के ताने, हमारे पास इतना बैंकबैलेंस है, फिर बहू को काम करने की क्या जरूरत है? जौब छोड़ने के पहले स्वाति ने स्वयं यह नहीं सोचा कि कितनी बाधाएं पार कर उस ने उसे पाया था.
लड़कियों को जौब में जाने से पहले कई स्तरों पर संघर्ष करना पड़ता है. कभीकभी ऐसा होता है कि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होती. एकएक पैसे का किसी तरह जुगाड़ कर पढ़ाई पूरी होती है. कभी भाइयों की तुलना में खुद को साबित करना पड़ता है. और भी कितनी तरह के संघर्ष करने पड़ते हैं.
उन का संघर्ष सिर्फ पारिवारिक स्तर पर नहीं होता, जौब शुरू करने के बाद औफिस में भी उन्हें खुद को बेहतर प्रेजैंट करने के लिए कड़ी मेहनत और संघर्ष करना पड़ता है. आश्चर्य है कि नौकरी छोड़ते वक्त इन बातों पर वे गौर नहीं करतीं. यदि वे अपना संघर्ष याद करेंगी तो निश्चितरूप से जौब नहीं छोड़ेंगी.
सब को समझाएं
पहले खुद समझें कि नौकरी छोड़ना न तो आप के हित में है न परिवार के. उस के बाद उन्हें समझाएं जो आप पर जौब छोड़ने के लिए दबाव डाल रहे हैं. आप उन्हें समझाएं कि घर की जिम्मेदारी से भागने के लिए आप जौब नहीं कर रहीं बल्कि आप अपनी जिम्मेदारी और अच्छे से निभा सकें, इसलिए जौब कर रही हैं. घर की आर्थिक मजबूती और बच्चों की अच्छी परवरिश के लिए नौकरी करना बहुत जरूरी है. इस महंगाई के जमाने में एक आदमी की आमदनी से आगे कई तरह की परेशानियां सिर उठाएंगी.
आज हमारा लाइफस्टाइल बदल चुका है. रहनसहन का स्तर ऊंचा उठ चुका है. आज की पीढ़ी यानी हमारे बच्चे गुजारा करने या समझौता करने के मूड में कतई नहीं हैं, इसलिए जौब करना बेहद जरूरी है. यह भविष्य को सुरक्षित करता है. नौकरी छोड़ने से परिवार में कई मुश्किलें आएंगी. अपनी बात समझाने के लिए उन महिलाओं का जिक्र अवश्य करें जिन के जौब छोड़ने से परिवार में आर्थिक संकट उत्पन्न हुए और कई तरह की परेशानियां आईं.
नौकरी छोड़ना विकल्प नहीं
मधु कौल सैंटर में काम करती थी. ससुराल वालों की नजर में यह अच्छा जौब नहीं था. वे मधु पर नौकरी छोड़ने का दबाव डालने लगे. किसी तरह ढाईतीन साल उस ने नौकरी की. आखिरकार बेटे के जन्म के बाद उसे जौब छोड़नी पड़ी. बाद में उस की 2 बेटियां हुईं. प्राइवेट नौकरी करने वाला पति एक हादसे का शिकार हो गया.
मधु पूरी तरह टूट गई. उसे काम छोड़े 8 साल हो गए थे. कौल सैंटरों में फ्रैशरों की डिमांड थी. अन्य नौकरी के लिए उस के पास कोई ऐक्सपीरियंस नहीं था. उस के साथ कौल सैंटर में काम शुरू करने वाली लड़कियां आज कैरियर के अच्छे मुकाम पर थीं और वह एक मामूली जौब के लिए एडि़यां घिस रही है.
मधु ने अपनी जौब नहीं छोड़ी होती तो आज उसे ये दिन नहीं देखने पड़ते, बच्चे दानेदाने को मुहताज नहीं होते. दयनीय स्थिति से गुजरती मधु उस घड़ी को कोसती है जब उस ने जौब छोड़ने का निर्णय लिया था. उसे अब लगता है, नौकरी छोड़ना विकल्प नहीं था.
आत्मनिर्भर होना आप का गौरव है, आप का आत्मसम्मान है, आप का सुरक्षित भविष्य है. लगीलगाई नौकरी छोड़ना किसी एंगल से बुद्धिमानी का कार्य नहीं है. ऐसा करने से किसी समस्या का समाधान नहीं होगा.
इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि आप के जौब छोड़ने से परेशानी समाप्त हो जाएगी. समस्याएं नए सिरे से सिर उठाने लगती हैं और उस समय आप के पास अपनी जौब का संबल भी नहीं होता. जिंदगी कठिन होती जाती है. इसलिए खुद भी जौब न छोड़ने का निर्णय लें और दूसरों को जौब में रहने के फायदे और छोड़ने के नुकसान समझाएं.
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हवाईयात्रा के दौरान कुछ ऐसी बातें होती हैं जिन से सामान्यतया हम अनभिज्ञ रहते हैं. ये बातें पायलट या फ्लाइट अटेंडैंट हमें नहीं बताते हैं. उदाहरणस्वरूप, ऐसी कुछ बातें निम्न हैं :
– इमरजैंसी में पायलट अपनी खिड़की के रास्ते बाहर निकल सकता है.
– पायलट के लिए ऊपर के कंपार्टमैंट में रस्सी भी होती है. कमर्शियल वायुयान में पैराशूट या इजैक्शन सीट नहीं होती है. पायलट को जब पता चलता है कि अब जहाज का बचना असंभव है और यह क्रैश होने जा रहा है तो फिर भी वह जहाज को बचाने के लिए अंत समय तक पूरी कोशिश करता है.
– पायलट पर एक तरह से दबाव रहता है कि ईंधन जरूरत से ज्यादा न रखा जाए क्योंकि ऐक्स्ट्रा ईंधन के बोझ को ले कर उड़ने में ज्यादा ईंधन की खपत भी होती है. खराब मौसम या इमरजैंसी में अचानक नजदीकी हवाईअड्डे पर उतरने का विकल्प संभव होता है, इसलिए जरूरत से ज्यादा ईंधन न रख कर एक तरह से बचत करते हैं.
– ‘वाटर लैंडिंग’ ऐसी कोई चीज नहीं है, इसे ‘ओशन क्रैशिंग’ कहा जाता है. दरअसल, इसे डिचिंग कहते हैं जब इमरजैंसी में जहाज को पानी में उतारा जाता है.
– जहाज के उड़ते समय या जमीन पर उतरते समय लाइट को धीमी रखने
का निर्देश दिया जाता है. ऐसा इसलिए कि फ्लाइट अटेंडैंट इमरजैंसी में ठीक से बाहर देख सके कि किस तरफ के आपातकालीन द्वार से विमान को खाली कराना सही होगा.
– विमान का एक इंजन फेल होने पर पायलट विमान को लैंड करा सकता है और अकसर इसे तकनीकी समस्या बताते हैं. यहां तक कि इस की भनक कभी फ्लाइट अटेंडैंट को भी नहीं लगती जब तक कि धुआं या आग की लपटें न दिखाई दें.
– पायलट ठीक से सो नहीं पाते या 2 उड़ानों के बीच सोने का समुचित अवसर नहीं मिलता, फिर भी वे चेहरे पर मुसकान बनाए रखते हैं ताकि यात्री और फ्लाइट अटेंडैंट सहज रहें.
– यदि पायलट फ्लाइट अटेंडैंट को बैठने के लिए कहते हैं तो अकसर इस का अर्थ है कि आगे वायुमंडल में तूफान या उथलपुथल है.
– चाय या कौफी के लिए भी पानी उसी टंकी से आता है जिस से शौचालय में सप्लाई होता है और इस पानी में बैक्टीरिया नौर्मल पानी की तुलना में कई गुणा ज्यादा होते हैं.
– पायलट्स कौकपिट में अपनी टोपी नहीं पहनते हैं.
– पायलट्स को अपनी पढ़ाई और ट्रेनिंग पर लाखों रुपए खर्च करने पड़ते हैं.
– विमान सीधे रनवे पर लैंड नहीं करता बल्कि कुछ दूर हवा में रहने के बाद ही धरती को छूता है. लैंडिंग के समय पिछला चक्का ही पहले धरती को छूता है.
– कभीकभी कौकपिट में लैपटौप, सैलफोन या अन्य कारणों से पायलट का ध्यान हट जाता है और विमान अपने गंतव्य से आगे निकला जाता है.
– विमान अपने पीछे आकाश में लंबे बादल की पूंछ छोड़ता जाता है उसे कौंट्रेल कहते हैं.
– कभी वायुयान का वैस्ट वाटर वायुमंडल में लीक कर जाता है और यह बर्फ बन जाता है जिसे ब्लू आइस कहते हैं. यह जहाज के नीचे अकसर चिपका रह जाता है. इस का ब्लू रंग इस में मिले कीटनाशक के कारण होता है. कभीकभी लैंडिंग के समय जब यह बर्फ बाहर की गरम हवा के संपर्क में आती है तो पिघल कर धरती पर गिरती है. ऐसी कई घटनाएं रिहायशी इलाकों में हुई हैं जिन से घरों की छतों को काफी नुकसान हुआ है.
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हाल ही में हुए अंडर-19 वर्ल्ड कप में भारतीय टीम ने चौथी बार इस खिताब को अपने नाम किया. जहां एक तरफ अंडर-19 वर्ल्ड कप के टीम की तारिफे हो रही है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय टीम के तेज गेंदबाज अनुकूल राय पर आरोप लगाया गया है कि वे 19 साल से ज्यादा उम्र के हैं और 2017 में BCCI की तरफ से एज वेरिफिकेशन प्रोसेज (AVP) टेस्ट में दोषी पाए गए थे.
आईपीएल स्पौट फिक्सिंग केस के पिटिशनर आदित्य वर्मा ने BCCI के कार्यवाहक सचिव अमिताभ चौधरी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है कि उन्होंने ओवरएज अनुकूल राय को अंडर-19 वर्ल्ड कप में खिलाने के लिए फर्जीवाड़ा किया था. वर्मा ने आईसीसी के चेयरमैन शशांक मनोहर और भारतीय क्रिकेट को चलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त कमिटी औफ ऐडमिनिस्ट्रेटर (COA) के प्रमुख विनोद राय को इस बारे में खत लिखा है.
आदित्य वर्मा ने आईसीसी और बीसीसीआई को लिखे खत में कहा कि, ”अनुकूल राय 2017 में BCCI के AVP (एज वेरिफिकेशन प्रोसेस) टेस्ट में दोषी पाए गए थे. उस वक्त चौधरी ने अपनी ताकत का इस्तेमाल कर अनुकूल राय को घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट में झारखंड की अंडर-19 टीम में शामिल कराया था. JSCA के प्रेसिडेंट होने के नाते चौधरी और सेक्रटरी होने के नाते राजेश वर्मा अच्छी तरह जानते थे कि JSCA के 33 खिलाड़ी 2013 में AVP टेस्ट में ओवरएज पाए गए थे. अनुकूल राय भी उस लिस्ट में शामिल थे और उन्हें 2016 के बाद अंडर-19 में खेलने की इजाजत नहीं थी, लेकिन बीसीसीआई का सचिव और जूनियर सिलेक्शन कमिटी का संयोजक होने के नाते चौधरी ने उन्हें टीम में शामिल करा लिया.”
वर्मा ने आगे लिखा कि, ”अमिताभ चौधरी बीसीसीआई के ऐक्टिंग सेक्रटरी हैं और हर कोई जानता है कि वह इंडियन क्रिकेट बोर्ड में सबसे बड़े कानून तोड़ने वाले हैं. मैंने चौधरी के गैरकानूनी कृत्यों के बारे में COA को कई खत लिखे लेकिन किसी का भी जवाब नहीं मिला. आदित्य वर्मा ने यह भी आरोप लगाया कि बीसीसीआई में सीईओ राहुल जौहरी समेत हर कोई चौधरी के इशारे पर नाच रहा है. वर्मा ने कहा कि वह इस मामले में विनोद राय से इंसाफ चाहते हैं.
बता दें कि झारखंड के अनुकूल राय अंडर-19 वर्ल्ड कप 2018 को जीतने वाली भारतीय टीम का हिस्सा थे. उन्होंने टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा 14 विकेट चटकाए हैं.
VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…
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