इंद्रेश कुमार आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक और कार्यकर्ता हैं जो महज 21 साल की उम्र में बीई करने के बाद आरएसएस से जुड़ गए थे. वे एक चुनौती पूर्ण और दुसाहसी काम करते रहे हैं वह है देश के तमाम मुसलमानों को आरएसएस से जोड़ने का, वावजूद यह जानने समझने के देश का इतिहास तो इतिहास वर्तमान भी इस पर सहमत नहीं. इंद्रेश मुसलमानों को हिन्दू नहीं बनाते बल्कि यह कहते हैं कि मुसलमानों को मुख्यधारा से जुड़ जाना चाहिए.
अब यह मुख्यधारा है क्या बला यह बताने की जरूरत नहीं कि वह हिन्दुत्व है जो इंद्रेश कुमार जैसे संघियों की राय में कोई धर्म नहीं बल्कि एक जीवन पद्धति है और मुसलमान इसके अपवाद नहीं. अक्सर आरएसएस की तरफ से रोजा इफ्तार दावतों में दिखने बाले इंद्रेश सालों बाद भी वहीं खड़े हैं जहां से चले थे यानि एक फ्लौप मुहिम की अगुवाई वे अभी तक कर रहे हैं.
अक्सर अपने बड़बोलेपन के चलते सुर्खियों और विवादों में रहने वाले इस वरिष्ठ कार्यकर्ता ने 13 फरवरी को दिल्ली के एक कार्यक्रम में एक दिलचस्प बात यह कही कि भीख मांगना भी देश के 20 करोड़ लोगों का रोजगार है, जिन्हें किसी ने रोजगार नहीं दिया उन लोगों को धर्म में रोजगार मिलता है , जिस परिवार में पांच पैसे की भी कमाई न हो उस परिवार का दिव्यांग और दूसरे सदस्य धार्मिक स्थलों में भीख मांगकर परिवार का गुजारा करता है, ये छोटा काम नहीं है.
नरेंद्र मोदी के पकौड़ा बेचो के मशवरे पर भी वे कुछ कुछ बोले पर मुद्दे की बात 20 करोड़ भिखारी हैं जो बकौल इंद्रेश कुमार धर्म स्थलों पर भीख मांगकर गुजर करते हैं. बिना किसी लाग लपेट के कहा जाये तो धर्म वाकई सबसे बड़ा नियोक्ता और दाता है. निसंदेह इस सच बयानी के लिए इंद्रेश साधुवाद के पात्र हैं पर जाने क्यों वे धर्मस्थलों की अंदर पसरे लेनदेन पर खामोश रह गए. पैसा देने पर अंदर बाहर दोनों जगह आशीर्वाद और दुआएं मिलती हैं फर्क सिर्फ इतना है कि बाहर बाला तिरस्कृत और भीतर बाला स्वीकृत है, बाहर वाले की जात पात किसी को नहीं पता रहती पर अंदर लेने बाले पंडें के बारे में सब जानते हैं कि वह ब्राम्हण ही होता है.
भीख और दक्षिणा के फर्क से मुंह भले ही इंद्रेश चुराएं पर इस सच को वे अस्वीकार नहीं कर सकते कि दक्षिणा या चढ़ावा भी पुश्तैनी रोजगार है फर्क स्तर का है. करोड़ों पंडों के पेट और परिवार इसी से पल रहे हैं और भीख मांगने से तो यह काम लाख गुना बेहतर है. अमित शाह ने नरेंद्र मोदी के मशवरे को विस्तार देते हुए राज्यसभा में यह कहा था कि भीख मांगने से तो बेहतर है कि पकोड़ा बेचा जाये यह कोई शर्म की बात नहीं. यही बात इंद्रेश कुमार ने भी कही लेकिन वे तो भीख को भी बुरा, छोटा या हिकारत वाला काम नहीं मानते. भाजपा और आरएसएस की मानसिकता का सूक्ष्म अंतर अमित शाह और इंद्रेश कुमार के बयानों से समझ आता है कि धर्म के नाम पर भीख मांगना कोई हीनता नहीं इस लिहाज से तो करोड़ों पंडों को सम्मानजनक रोजगार मिला हुआ है.
समझ यह भी आता है कि रोजगार के मुद्दे पर भगवा खेमा अपनी बात स्पष्ट कह और कर चुका है कि सत्ता में रहते भाजपा इसके लिए कुछ नहीं करेगी, अब यह लोगों की मर्जी है कि वे पकोड़े तलें या धर्मस्थल पर भीख मांगे. दोनों ही काम छोटे नहीं. बड़ा काम धर्मस्थल के अंदर दक्षिणा समेटने का है और एक जाति विशेष के लिए आरक्षित है जो अक्सर जातिगत आरक्षण पर हाय हाय करती रहती है.
मान लेने में ही भलाई है कि अब देश में कोई समस्या नहीं है, अच्छे दिन आ चुके हैं धर्मस्थलों के बाहर रुपये दो रुपये की भीख के एवज में भगवान से भला करवाने वाले 20 करोड़ भारतीय ही भारत को विश्वगुरु बनवाएंगे जिनके चेहरे पर मेल की खुरचन है, होठों से बहती लार है फूले पेट और बिखरे बाल हैं, दयनीयता से लबरेज ये 20 करोड़ लोग अपने पिछले और इस जन्म के पापों की सजा भुगत रहे हैं. ये दरिद्रनरायण भी पंडों की तरह भक्त और भगवान के बीच की कड़ी हैं. ये जोड़ी और बच्चे सलामत रहें की गुजारिश उस भगवान से दूसरों यानि दाता के लिए करते हैं जिसने इनकी किस्मत में भीख मांगने जैसा गौरवशाली कर्म लिख दिया है. ये तगड़ी दक्षिणा लेकर मोक्ष नहीं दिलवा सकते सिर्फ इसलिए कि ये मंदिर के बाहर हैं और पंडे नहीं हैं.
ये 20 करोड़ अनुत्पादक लोग ही धर्म की श्रेष्ठता और महत्ता स्थापित करते हैं इसलिए इनका बने रहना जरूरी है.
‘बस एक पल’, ‘आई एम’, ‘शब’ जैसी विचारोत्तेजक फिल्मों के सर्जक ओनीर पहली बार पूर्णरूपेण रोमांटिक फिल्म ‘‘कुछ भीगे अल्फाज’’ लेकर आए हैं. वर्तमान समय में जबकि युवा पीढ़ी पूरी तरह से फेसबुक, ट्वीटर व व्हाट्स अप जैसे सोशल मीडिया की दीवानी है. इस आधुनिक सोशल मीडिया की ही वजह से न सिर्फ दो अजनबी इंसानों की प्रेम कहानी परवान चढ़ती है, बल्कि यह दोनों अपनी कमजोरियों से उबरते हैं.
फिल्म की कहानी के केंद्र में कलकत्ता के एक एफएम रेडियो पर देर रात प्रसारित होने वाला कार्यक्रम ‘‘कुछ भीगे अल्फाज’’ और सोशल मीडिया है. रेडियो के इस कार्यक्रम में रेडियो जौकी अल्फाज (जेन खान दुर्रानी) रोमांटिक कहानियों के साथ रोमांटिक गाने सुनाते हैं. पर वह अपनी असली पहचान हर किसी से छिपाकर रखते हैं. इसी वजह से वह सोशल मीडिया के किसी प्लेटफार्म पर नहीं हैं. उनकी इसी जिद के चलते रेडियो मालिक को भी नुकसान होता है. क्योंकि अल्फाज सामने नहीं आना चाहते.
उधर कलकत्ता की एक विज्ञापन एजेंसी से जुड़ी और अपनी मां के साथ रह रही अर्चना प्रधान (गीतांजली थापा) के चेहरे पर 8 साल की उम्र से ही सफेद दाग/ ल्यूकोडर्मिक है. वह इसी के चलते हीन भावना से ग्रस्त है. उसे लगता है कि उसे प्यार करने वाला कोई युवक नहीं मिलेगा. इसलिए वह हर दिन ब्लाइंड डेट पर जाती रहती है. सहकर्मी अप्पू (श्रेय तिवारी) से उसकी अच्छी दोस्ती है. वह अल्फाज के कार्यकम्र की बहुत बड़ी फैन है. ब्लाइंड डेट पर जाने के लिए फेसबुक पर उनके नाम चुनकर फोन करती रहती है, जिन्होंने अपने बारे में खुलकर फेसबुक पर बयां नहीं किया है.
एक दिन अर्चना अनजाने में एक गलत नंबर मिला बैठती है, जो कि अल्फाज का है. उसके बाद अल्फाज से वह अक्सर बातें करने लगती है. इधर करियर में उंचाइयां छूने के लिए अर्चना का बनाया हुआ एक जोक अप्पू अपने नाम से मालिक को दे देता है, इस बात से अर्चना को ठेस पहुंचती है और वह नौकरी छोड़ कर घर बैठ जाती है. तब अर्चना अपनी मां के कहने पर वाट्स अप से जुड़ जाती है. अब अर्चना ‘कुछ भीगे अल्फाज’ कार्यक्रम में अल्फाज द्वारा पेश की गयी शायरी को किसी तस्वीर या कोई चेहरा बना कर सोशल मीडिया पर डालना शुरू करती है.
वाटस अप पर वह अल्फाज को भी जोड़ती है. तो अल्फाज तक भी सारी चीजें पहुंचती है. कहानी आगे बढ़ती है. एक दिन अर्चना अपने चेहरे की कमी का जिक्र अल्फाज से कर देती है. अल्फाज उसे समझाता है कि वह निराश न हो, क्योंकि असली प्यार में चेहरे की रंगत नहीं देखी जाती. उसे प्यार करने वाला युवक अवश्य मिलेगा. फिर अर्चना, अल्फाज को ट्राम में मिलने के लिए बुलाती है. दोनों पहुंचते हैं, पर मुलाकात नहीं हो पाती.
एक दिन अर्चना एफएम रेडियो के औफिस जाती है, तो उसे अल्फाज की असलियत पता चल जाती है. तब अल्फाज खुद को गुमनाम रखने की वजह बताते हैं. पता चलता है कि शिमला में कालेज के दिनों में अल्फाज बास्केटबाल खेलते थे. उन्हे अपनी सहपाठी व कालेज में मशहूर एक लड़की से प्यार हो गया था. यह लड़की कालेज में भाषण व निबंध प्रतियोगिता में हिस्सा लेती थी. जब उसे अल्फाज की सबसे ज्यादा जरुरत होती है, उस वक्त अल्फाज खेल के चक्कर में उसका साथ नहीं देते हैं. वह लड़की आत्महत्या कर लेती है.
कालेज का प्रिंसिपल सब कुछ जानते हुए भी अल्फाज के दादाजी के सामने लड़की की मौत के लिए एक वाचमैन पर दोष मढ़ देते हैं. असलियत अल्फाज के दादाजी को भी पता नहीं चलती. पर इस अपराध बोध से ग्रस्त अल्फाज शिमला से कलकत्ता आ जाते हैं और अब अपनी पहचान छिपाकर रहकर रेडियो जाकी के रूप में ऐसी रोमांटिक कहानियां सुनाते हैं, जिससे दो प्रेमियों या पति पत्नी के बीच की दूरी मिट सके.
तब अर्चना, अल्फाज को दर्द से उबरने के लिए प्रेरित करती है. अंत में अर्चना के कहने पर अल्फाज ट्राम में मिलने आते हैं और दोनों की प्रेम कहानी आगे बढ़ जाती है.
अभिषेक चटर्जी लिखित पटकथा पर ओनीर ने रोमांस, सोशल मीडिया, एफएम रेडियो के देर रात के कार्यक्रम, कलकत्ता, कलकत्ता की ट्राम और बारिश का बहुत सुंदर संयोजन किया है. ओनीर ने एक बार फिर साबित किया है कि वह किसी भी विषय पर एक बेहतरीन मनोरंजक फिल्म बना सकते हैं. वैसे तो फिल्म कि गति थोड़ी धीमी है, पर रोमांस का असली मजा भी शायद इसी में है.
बतौर निर्देषक ओनीर ने एक बार फिर साबित किया है कि वह रोमांस को भी परर्दे पर बहुत बेहतर तरीके से पेश कर सकते हैं, उन्होंने तमाम दृश्यों को बहुत बेहतर तरीके से गढ़ा है. फिल्म उदासीन मूड़ से वर्तमान तक को बेहतर ढंग से चित्रित करती है. अभिषेक चटर्जी की पटकथा लेखक के तौर पर पहली फिल्म है. उन्होंने एक अच्छी पटकथा लिखी है. पर यदि इसकी गति थोडी बढ़ जाती, तो अच्छा होता. अर्चना, अल्फाज के कार्यक्रम की फैन है, वह हर दिन अल्फाज का रेडियो कार्यक्रम ध्यान से सुनती है और अल्फाज से भी हर दिन बात करती है, मगर वह अल्फाज की आवाज पहचान नहीं पाती. यह पटकथा लेखक के अलावा निर्देशक की भी सबसे बड़ी चूक है. फिल्म में पुराने गानों को अच्छे ढंग से उपयोग किया गया है. शायरी काफी अच्छी लिखी गयी हैं. कुछ संवाद अच्छे बन पड़े हैं.
जहां तक अभिनय का सवाल है, तो बतौर अभिनेता जेन खान दुर्रानी के करियर की यह पहली फिल्म है. प्यार में चोटिल व अपराध बोध से ग्रसित रेडियो जौकी अल्फाज के जटिल किरदार को काफी अच्छे ढंग से निभाया है. यूं तो वह अपने अंदर के दर्द व अपराध बोध को बेहतर तरीके से पेश कर पाए हैं, अपने दर्द को छिपाकर लोगों को रोमांटिक कहानियां व शायरी सुनाते हुए लोगों को प्रेरित सुनाते हुए शानदार आवाज के रूप में शोहरत बटोरते हैं, पर लंबी रेस का घोड़ा बनने के लिए अभी उन्हें और मेहनत करने की जरूरत है. कई जगह चेहरे के भाव सही ढंग से नहीं उभरते. अर्चना के किरदार में गीतांजली थापा ने कमाल का अभिनय कर पूरी फिल्म को अपनी फिल्म बना लेती हैं.
ल्यूकोड्म से पीड़ित होते हुए भी अपने दर्द को छिपाकर जिस तरह से वह एक सामान्य लड़की के रूप आती हैं, वह कमाल का अभिनय है. फिल्म खत्म होते होते दर्शकों के दिलो दिमाग पर गीतांजली थापा अपनी छाप छोड़ जाती हैं. अप्पू के किरदार में श्रेय तिवारी भी ठीक ठाक हैं.
कुल मिलाकर यह एक ऐसी प्रेम कहानी है, जिसे अवश्य देखना चाहिए. विक्रम मेहरा और सिद्धार्थ आनंद कुमार द्वारा ‘सारेगामा’ व ‘यूडली फिल्मस’ के बैनर तले निर्मित फिल्म ‘‘कुछ भीगे अल्फाज’’ के लेखक अभिषेक चटर्जी, निर्देशक ओनीर, संगीतकार शाश्वत श्रीवास्तव, कैमरामैन नुसरत एफ जाफरी तथा कलाकार हैं – गीतांजली थापा, जेन खान दुर्रानी, श्रेय तिवारी, मोना अंबेगांवकर, चंद्रेय घोष, सौरव दास, साहेब भट्टाचरजी, शंखू करमरकर व अन्य.
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कासगंज के दंगों को ले कर बरेली के डीएम से ले कर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने जो कहा वह सच है. राज्यपाल ने कासगंज के दंगों को कलंक कहा. डीएम के खिलाफ सत्ता से ले कर कट्टरवादी संगठनों तक ने मोरचा खोल दिया पर राज्यपाल की बात पर वे चुप्पी साध गए. देखा जाए तो उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की टिप्पणी कुछ वैसी ही है जैसी गुजरात में हुए दंगों के समय भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने का संदेश दिया था.
भाजपा के लोग डीएम की टिप्पणी को ले कर मुखर हैं, जबकि सांसद राजवीर सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति और विनय कटियार के बयानों पर चुप्पी साधे रहे. कासगंज में हुए हादसे को राष्ट्रधर्म से जोड़ कर जिस तरह से प्रचारित किया गया उस से भावनाओं को भड़काने में मदद मिली. जिस का खमियाजा अकरम जैसे तमाम लोगों को भुगतना पड़ा.
लखीमपुर में रहने वाले अकरम की पत्नी अलीगढ़ में रहती थी. उस की पत्नी को बच्चा होने वाला था. अकरम कार से अलीगढ़ जा रहा था. कासगंज हाईवे पर दंगाइयों ने अकरम की कार को घेर लिया और तोड़फोड़ शुरू कर दी. अकरम को खूब मारापीटा. जैसेतैसे वह चोट लगने के बाद अस्पताल पंहुचा तो पता चला कि उस की दाहिनी आंख की रोशनी चली गई है. ऐसे लोगों की संख्या बहुत सारी है. कितने ही बेगुनाह लोगों से मारपीट कर उन की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया.
कासगंज की घटना को सांप्रदायिक रंग दे कर वोटबैंक की राजनीति करने से पूरे समाज को नुकसान हो रहा है. देशप्रेम के प्रदर्शन में जोरजबरदस्ती का कोई स्थान नहीं होना चाहिए. ‘तिरंगा यात्रा’ के दौरान कार्यकर्ताओं का रंगढंग मुसलिम महल्ले के लोगों को रास नहीं आया. छोटी सी यह घटना दंगे में बदल कर कासगंज का कंलक बन गई.
कासगंज उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा जिला है. 2 हजार किलोमीटर वाले कासगंज में मिश्रित आबादी है. 2011 की जनगणना के अनुसार यहां पर 66 फीसदी हिंदू और 32 फीसदी मुसलिम आबादी है. कासगंज शहर में रहने वाले लोग ज्यादातर कारोबारी हैं. गांव में रहने वाले लोग खेतीकिसानी पर आश्रित हैं. गंगा नदी का कछला खेती के लिए प्रयोग किया जाता है. बलुई मिटटी होने के कारण यहां खेती में आलू, तरबूजजैसी फसलें ज्यादा होती हैं.
कासगंज फरूखाबाद और बरेली के करीब स्थित है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से यह सीधे रास्ते पर नहीं है. कानपुर से फरूखाबाद हो कर वहां पहुंचना होता है. देश की राजधानी दिल्ली से यह सीधे मार्ग से जुड़ा है. सड़क और रेलमार्ग दोनों से कासगंज पहुंचा जा सकता है. कासगंज स्टेट हाईवे 33 पर बसा है. लोकल बोली में इस को मथुराबरेली हाईवे कहते हैं.
कासगंज के आमापुर में सुशील गुप्ता का परिवार रहता है. इन का घर गली के अंदर है. सुशील गुप्ता के परिवार में पत्नी संगीता गुप्ता और बेटी वंदना सहित 22 साल का बेटा अभिषेक गुप्ता रहता था. सुशील गुप्ता का अपना बिजनैस है. बेटा अभिषेक उर्फ चंदन गुप्ता ‘संकल्प’ नाम की संस्था चलाता था. वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा हुआ था. वह हिंदूवादी विचारधारा का प्रबल समर्थक था. उस की संस्था में 20 से 30 युवा सक्रिय रूप में जुडे़ थे. ये सभी शहर में तमाम तरह की सामाजिक गतिविधियां चलाते थे.
26 जनवरी को चंदन गुप्ता और उस के साथियों ने मोटरसाइकिल से तिरंगा यात्रा निकालने का संकल्प लिया. शुक्रवार को दिन में करीब 10 बजे चंदन गुप्ता और उस के साथ कुछ युवकों ने हिंदूवादी संगठनों के साथ तिरंगा यात्रा निकालनी शुरू की. ये लोग पूरे कासगंज में तिरंगा यात्रा निकालना चाहते थे. सरकार पर प्रभाव होने के कारण तिरंगा यात्रा निकालने के लिए प्रशासन से अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी गई.
आग में घी बनी तिरंगा यात्रा
हिंदूवादी संगठनों ने जिला प्रशासन से तिरंगा यात्रा निकालने की अनुमति नहीं ली थी. असल में इस अनुमति न लेने के पीछे जिले में फैला तनाव था. कासगंज में ही चामुंडा मंदिर है. यहां पर बैरीकेटिंग लगाने को ले कर 22 जनवरी से विवाद चल रहा था. जिस के चलते दोनों पक्षों में तनाव बढ़ा हुआ था.
कासगंज जिला प्रशासन ने इस तनाव को गंभीरता से नहीं लिया. ऐसे में जब 26 जनवरी को 40 से 50 मोटरसाइकिलों के साथ तिरंगा यात्रा निकली और यात्रा में शामिल लोगों द्वारा भड़काऊ नारे लगाए गए तो बडुनगर में दूसरे पक्ष के साथ तकरार शुरू हो गई. तकरार के कारणों पर अलगअलग लोगों की अलगअलग बातें हैं. कुछ लोगों का कहना है कि तिरंगा यात्रा में शामिल युवकों की नारेबाजी को ले कर विवाद हुआ. पथराव के बाद तिरंगा यात्रा वाले लोग वापस चले गए.
बडुनगर महल्ले से 500 मीटर दूर जा कर ये लोग रुक गए और वहां से आधे घंटे के बाद वापस आए. इस बार ये 20-25 लोग थे. नारेबाजी करते इन युवकों पर हमला शुरू हो गया, जिस में चंदन के कंधे पर और नौशाद नामक युवक के पैर में गोली लगी. चंदन की अस्पताल ले जाते समय मौत होगई. इस खबर के फैलते ही माहौल गरम हो गया. पूरे कासगंज और हाईवे पर आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा की घटनाएं होने लगीं.
कासगंज के रहने वाले लोग बताते हैं कि यहां पर इस से पहले कभी भी ऐसा भयंकर दंगा नहीं हुआ था. राममंदिर आंदोलन के दौरान भी ऐसी हिंसक घटनाएं नहीं घटी थीं. यहां के लोग 25 साल के इतिहास में इस को सब से बड़ा दंगा मानते हैं. चंदन के पोस्टमौर्टम से पता चला कि गोली कंधे की तरफ से लगी थी. यह शरीर में धंस गई. किडनी में यह धंसी मिली. जिस से साफ लगा कि गोली छत जैसी किसी जगह से मारी गई थी.
कासगंज दंगों को ले कर 2 मुकदमे लिखे गए. पहला मुकदमा इंस्पैक्टर कासगंज की तरफ से आईपीसी की धारा 147/148/149/307/336/436/295/427/323/504/ व 7 सीएल एक्ट के तहत
4 नामजद और करीब 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कराया गया. दूसरा मुकदमा, फायरिंग में मारे गए चंदन गुप्ता के पिता सुशील गुप्ता की तरफ से आईपीसी की धारा 147/148/149/
341/ 336/307/302/504/506/12 ए व राष्ट्रीय ध्वज अधिनियम के तहत दर्ज कराया गया. चंदन की हत्या में वसीम नामक युवक का नाम आया जो समाजवादी पार्टी से जुड़ा माना जा रहा है. वसीम के पिता भी बिजनैसमैन हैं.
आवाज को दबाने की कोशिश
कासगंज के पड़ोसी बरेली जिले के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने फेसबुक पर अपना दर्द बयान करते हुए सामाजिक संदेश में लिखा, ‘अजीब रिवाज बन गया है, पहले मुसलिम महल्ले में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते घुस जाओ. क्या वे पाकिस्तानी हैं. ऐसा बरेली के अलीगंज खैलम में हुआ. इस के बाद मुकदमे कायम हुए.’ डीएम बरेली का यह संदेश कट्टरपंथियों को रास नहीं आया. सत्ता पक्ष से ले कर कट्टरवादी हिंदू संगठनों तक ने इस का विरोध करना शुरू कर दिया. ऐसे में मजबूर हो कर डीएम बरेली को फेसबुक से अपना संदेश हटाना पड़ा. संदेश हटाने पर तर्क देते डीएम बरेली ने लिखा, ‘हमारा संदेश हिंदूमुसलिम एकता के लिए था जिस से कि तनाव कम हो सके. इस को सही तरह से समझा नहीं गया.’
हालांकि जो बात बरेली के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने कही, उस से कहीं कठोर शब्दों में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक ने कही. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने कासगंज के दंगे को कलंक बताया. राज्यपाल खुद भाजपा के हैं. ऐसे में कटट्रवादी संगठन उन का विरोध नहीं कर पाए. हर बार की तरह कासगंज में भी सत्ता और विपक्ष ने अपनीअपनी राजनीतिक रोटियां सेंकीं. राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए जुलूस निकाल कर लोगों को उकसाने का काम बारबार होता है. प्रशासन कुछ दिनों के बाद सबकुछ भूल जाता है. इस तरह की घटनाओं में शामिल युवकों को यह देखनासमझना चाहिए.
कासगंज में मारे गए चंदन गुप्ता के मातापिता और बहन सप्ताह बाद तक भी सोचनेसमझने की हालत में नहीं हैं. मां संगीता गुप्ता को यकीन ही नहीं हो रहा है कि चंदन नहीं रहा. वह अपने आंचल में वही तिरंगा दबाए है जो अंतिम समय चंदन के साथ था. बहन वंदना ने पिता से साफ कह दिया है कि अगर वे सरकारी सहायता के 25 लाख रुपए लेंगे तो वह आत्महत्या कर लेगी.
चंदन की तरह तमाम युवक धार्मिक प्रचार में झोंक दिए जाते हैं. जो धर्म के नाम पर दोनों समुदायों की तरफ से जीनेमरने को तैयार होते हैं. ऐसे युवकों को समझना चाहिए कि धर्म की घुट्टी अफीम के नशे से कम नहीं होती है. चंदन गुप्ता के परिवार के साथ दिख रही लोगों की संवेदनाएं धीरेधीरे खत्म हो जाएंगी लेकिन उस का परिवार वर्षों उस की याद में अंदर ही अंदर सुलगता रहेगा.
पुलिस प्रशासन की लापरवाही
1992 और उस के बाद 1994 में कासंगज सांप्रदायिक तनाव की वजह से तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी. 2010 में तहसील परिसर में प्रशासन द्वारा एक मंदिर के तोडे़ जाने से तनाव फैला था. तिरंगा यात्रा का तनाव इन सब पर भारी पड़ गया. इस की वजह चामुंडा मंदिर में भड़का विवाद था. विवाद की यह आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी. पुलिस और प्रशासन इस की लपटों को समझने में असफल रहे. दोनों ही पक्ष किसी न किसी अवसर की तलाश में थे. चामुंडा मंदिर विवाद का गुस्सा तिरंगा यात्रा में खुल कर बाहर आ गया. अगर जिला प्रशासन ने चामुंडा मंदिर विवाद को देखते हुए सतर्कता बरती होती तो तिरंगा यात्रा में हिंसक वारदात न होती.
तिरंगा यात्रा में चंदन गुप्ता की मौत के बाद भड़काऊ राजनीति का दूसरा दौर चल पड़ा. जिस के तहत चंदन गुप्ता के शरीर को तिरंगे से लपेटा गया. सोशल मीडिया पर इस को वायरल किया गया. 26 जनवरी को अखबारों के औफिस बंद होते हैं. ऐसे में कासगंज और बाहर के लोगों को इस समाचार के बारे में सोशल मीडिया व खबरिया चैनलों से खबरें मिलनी शुरू हुईं.
इन में तमाम खबरें बिना किसी आधार के प्रसारित हो रही थीं. जिला प्रशासन ने सोशल मीडिया पर देर से काबू किया. तब तक आग भड़क चुकी थी. खबरिया चैनलों ने भी अपने हिसाब से खबरों को दिखाना शुरू किया. सब से अहम बात यह थी कि हर निष्पक्ष खबर या संदेश को राष्ट्रवादी विचारधारा के खिलाफ जोड़ दिया गया. इन में कासगंज गए मीडियाकर्मियों से ले कर प्रशासनिक अधिकारियों के सोशल मीडिया पर दिए गए संदेश तक शामिल हैं.
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दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर होने के नाते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस विषय में दिलचस्पी स्वाभाविक बात है लेकिन इस का प्रदर्शन बीते 2 सालों से जिस तरह से वे कर रहे हैं वह प्रदेश को सिर्फ बरबाद कर रहा है.
साल 2005 से ले कर 2014 तक शिवराज सिंह की लोकप्रियता किसी सुबूत की मुहताज नहीं थी, क्योंकि इस वक्त तक वे धार्मिक पाखंडों को व्यक्तिगत स्तर तक सीमित रखते थे लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो धर्म का दर्शन उन के सिर इस तरह चढ़ कर बोलने लगा कि तब से ले कर अब तक का अधिकांश वक्त उन्होंने धार्मिक यात्राओं व समारोहों में जाया किया.
भाजपाई और हिंदूवादियों का धर्मप्रेम आएदिन तरहतरह से उजागर होता रहता है. इस के बिना उन्हें सत्ता और जीवन व्यर्थ लगने लगते हैं.
शिवराज सिंह चौहान ने धर्म को सीधे पाखंडों और कर्मकांडों के जरिए कम थोपा इस के बजाए यह कहना सटीक साबित होगा कि उन्होंने दर्शनशास्त्र और पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों की ओट ले कर धर्म को अभिजात्य तरीके से थोपने की कोशिश की और ऐसी उम्मीद है कि पूरे चुनावी साल वे यही करते रहेेंगे.
इस के पीछे उन का मकसद सिर्फ यह है कि जनता बहुत बड़े पैमाने पर सूबे की बदहाली के बाबत सवालजवाब न करने लगे कि बेरोजगारी क्यों बढ़ रही है, राज्य बिकने की हद तक कर्ज में क्यों डूबा है, प्रदेशभर में अपराधों का ग्राफ तेजी से क्यों बढ़ा है और किसान क्यों आत्महत्याएं कर व आंदोलनों के जरिए अपना दुखड़ा रो रहे हैं.
एकात्म यात्रा ने दिए जवाब
22 जनवरी को मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में आदि शंकराचार्य की 108 फुट की मूर्ति की स्थापना के साथ धूमधड़ाके वाली 22 दिवसीय एकात्म यात्रा आखिरकार समाप्त हो गई.
यह एकात्म यात्रा वाकई अद्भुत थी जो राज्य के चारों कोनों से शुरू हुई थी और इस का हर जगह सरकारी स्तर पर सरकारी पैसे से स्वागत किया गया. जगहजगह कलैक्टरों और विधायकों ने आदि शंकराचार्य की जूतियां, जिन्हें चरण पादुकाएं कहा गया, सिर पर ढो कर एक नए किस्म के पाखंड का प्रदर्शन किया तो उन की हीनता व मानसिक दरिद्रता पर तरस आना स्वाभाविक बात थी.
अधिकारी और जनप्रतिनिधि जनता के काम करने और उन की समस्याएं हल करने के लिए होते हैं या फिर किसी धर्मविशेष के गुरु की पादुकाएं सिर पर ढोने के लिए, इस सवाल का जवाब भी जनता न चाहने लगे, इसलिए शिवराज सिंह ने चालाकी दिखाते जगहजगह शंकराचार्य के अद्वैतवाद का राग अलापा जिस का अनुसरण जनप्रतिनिधियों और अफसरों ने भी अपना फर्ज समझ कर किया.
यह अद्वैतवाद आखिर क्या बला है और क्यों इस की जरूरत आ पड़ी, यह समझनेसमझाने की किसी ने जरूरत नहीं समझी, तो स्पष्ट हो गया कि अब लोग अपनी परेशानियां भूल इस नए सम्मोहक दर्शन में खोए अपनी जिज्ञासाओं के जवाब ढूंढ़ते रहेंगे. ईश्वर साकार है या निराकार, यह सवाल सदियों से उत्सुकता से पूछा जाता रहा है पर यह कोई नहीं पूछता कि ईश्वर आखिर कहीं है भी कि नहीं, कहीं वह कोरी गप तो नहीं जिसे सच साबित करने के लिए तथाकथित विद्वान और धर्म के दुकानदार सदियों से तरहतरह की बातें करते रहे हैं.
कोई शासक नहीं चाहता कि प्रजा नास्तिक या अनीश्वरवादी हो कर तर्क करने लगे, इसलिए भगवान में भरोसा बनाए रखने के लिए तरहतरह के स्वांग रचते रहते हैं. लोकतंत्र इस परंपरा का अपवाद नहीं है. एकात्म यात्रा के समापन पर शिवराज सिंह चौहान ने अद्वैत दर्शन का सार बांच दिया कि विश्व शांति का मार्ग युद्ध में नहीं है, बल्कि आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में है.
बकौल शिवराज सिंह चौहान, अद्वैत दर्शन मानता है कि संपूर्ण प्रकृति और प्राणियों में एक ही चेतना है और राजनीति लोगों को तोड़ती है जबकि धर्म जोड़ता है.
विरोधाभासी दर्शन
सुनने वालों ने इस फिलौसफी को हाजमे के चूर्ण की तरह फांक लिया और यह भी आत्मसात कर लिया कि एकात्म यात्रा कोई मामूली यात्रा नहीं है जिस में राज्य की 23 हजार ग्राम पंचायतों से 30 हजार कलश आए जिन में मिट्टी और धातुएं थीं.
राजनीति अगर तोड़ती है तो फिर क्यों अद्वैत के पैरोकार शिवराज सिंह चौहान राजनीति करते हैं, यानी तोड़ने का गुनाह करते हैं, इस सवाल का जवाब शायद ही शिवराज ईमानदारी से दे पाएं. रही बात एक चेतना की, तो वह निहायत ही फुजूल की बात है जिस का देशप्रदेश की समस्याओं से कोई वास्ता नहीं.
एकात्म यात्रा के नाम पर हुआ सिर्फ इतना है कि ओंकारेश्वर में एक अवतार आदि शंकराचार्य का मठ बन गया है जहां कुछ साल बाद लोग जा कर पैसा चढ़ाएंगे, मन्नतें मांगेंगे और पूजापाठ करेंगे.
मुट्ठीभर बुद्धिजीवी, जो खुद को मुख्यधारा मानते हैं, धर्म और अद्वैतवाद ब्रैंड अफीम का सेवन करते बहस करते रहेंगे कि यह चेतना ही दरअसल, आत्मा है जो मृत्यु के बाद शरीर का साथ छोड़ देती है और फिर ऊपर आकाश की तरफ 84 लाख योनियों की परिक्रमा के बाद नया शरीर ढूंढ़ने लगती है. पुराना शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो जाता है जिस के बाबत तुलसीदास ने कहा भी है कि क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंचतत्त्व मिल बना शरीरा.
वैसे भी यह एकात्म यात्रा उन जाहिलों के लिए नहीं थी जो ईश्वर को वैज्ञानिक स्तर पर समझने की कोशिश नहीं कर पाते. यह यात्रा उन ब्राह्मण विद्वानों को खुश करने के लिए थी जो वर्णव्यवस्था और मनुवाद में यकीन करते हैं. खुद आदि शंकराचार्य ब्राह्मण थे और उन का इकलौता मकसद देशभर के ब्राह्मणों को एक वैचारिक मंच के नीचे लाना था कि आपस में लड़ोगे तो रोजीरोटी चली जाएगी. लोग तेजी से नास्तिक हो रहे हैं, उन्हें रोकने के लिए जरूरी है कि ब्राह्मण आपसी विवादों को त्यागें और इस बाबत उन्होंने चारों कोनों में मठ बना कर मठाधीश भी नियुक्त कर दिए थे.
चारों पीठों के शंकराचार्य आज भी धर्मध्वज फहराते शानोशौकत की जिंदगी जी रहे हैं. ये महामानव पैदावार नहीं बढ़ाते, रोजगार के मौके मुहैया नहीं कराते और लेशमात्र भी मेहनत नहीं करते.
परेशान है तो आम जनता जो अपनी समस्याओं का हल धर्म में ढूंढ़ने की गलती दोहरा रही है. देशप्रदेश के बुद्धिजीवियों ने यह नहीं सोचा कि एकात्म जैसी धार्मिक यात्राओं पर करोड़ों रुपए फूंके जाते हैं जो जनता के हैं और क्या सरकार को उसे इस तरह बरबाद करने का हक है.
साजिश की देन हैं समस्याएं
धर्म और राजनीति दोनों एकदूसरे को ताकत देते हैं. राजा के जरिए धर्म के दुकानदार धर्म को तरहतरह से थोपते हैं जिस से वह आसानी से धार्मिक खर्चों की भरपाई करने के लिए टैक्स लगा सके और उस में से उन का हिस्सा उन्हें चढ़ावे की शक्ल में मिलता रहे. राजा का स्वार्थ यह रहता है कि लोग तंगहाली और बदहाली में जीने के बाद भी उसे सत्ता में बनाए रखें. हजारों सालों से यह षड्यंत्रकारी व्यवस्था ही लोगों को जीवनचक्र और मृत्यु के बाद क्या, जैसे फुजूल के सवालों में उलझाए रखे हुए है.
महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते अपराध जैसी समस्याएं इसी साजिश की देन हैं जिन से घबराए लोग इन्हीं मठमंदिरों में जा कर त्राहिमामत्राहिमाम करते हैं और तथाकथित भगवान से गुहार लगाते हैं कि हे प्रभु, बचाओ.
अब प्रभु कहीं हो, तो कुछ करे या बचाए. लेकिन राजा और पंडे बेफिक्र रहते हैं कि सबकुछ ठीकठाक चल रहा है–लोग मंदिर जा रहे हैं, पूजाअर्चना कर रहे हैं, दानदक्षिणा दे रहे हैं और थोड़े बहुत विरोध व असहमति के बाद भी सबकुछ ठीकठाक है. लोकतंत्र इस का अपवाद नहीं है, यह एक बार फिर मध्य प्रदेश सरकार की एकात्मक यात्रा से साबित हो गया है जिस के तहत मुमकिन है कुछ सालों बाद कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चार्वाक दर्शन को जीवन का सार बताते हुए देश को बेच डाले.
हालांकि चिंता की बात ऐसा शुरू हो जाना भी है. उदाहरण मध्य प्रदेश का ही लें, तो एकात्मक यात्रा के 2 दिनों बाद ही मध्य प्रदेश सरकार को यह फैसला लेने की पहल करनी पड़ी कि क्यों न सरकारी जमीनें बेच कर खजाना भरा जाए. कंगाल होते सूबे की दयनीय हालत किसी
सुबूत की मुहताज नहीं रही जो किसी द्वैतअद्वैतवाद से तो हल होने से रही. जब राज्य का मुखिया ही अधिकांश वक्त पूजापाठ और धार्मिक यात्राओं में गुजारे तोे क्या खा कर राज्यवासियों से यह उम्मीद रखी जाए कि वे उत्पादन बढ़ाने के लिए कोई कोशिश या मेहनत करेंगे.
रही बात एकात्म यात्रा के नायक शिवराज सिंह चौहान की, तो साफसाफ दिख रहा है कि वे अपना बढ़ता विरोध और बिगड़ती छवि देख घबराने लगे हैं, इसलिए ज्यादा से ज्यादा वक्त वे धर्म व भगवान की शरण में बिता रहे हैं और सपत्नीक प्रार्थना करते रहते हैं कि हे प्रभु, इस बार भी नैया पार लगा देना. यह एहसास उन्हें है कि नीचे वाले प्रभु यानी जनता उन्हें तभी चुनेगी जब वह वास्तविकताओं से मुंह मोड़े, रामराम करती रहेगी, इसलिए उस का ध्यान द्वैतअद्वैत जहां भी हो, की तरफ मोड़े रखने में ही फायदा है.
थप्पड़ से कतराता मीडिया
अखबारों की हालत आज घर के किसी कोने में पड़े उपेक्षित बुजुर्गों सरीखी हो चली है, जो होते हुए भी नहीं होते. आमतौर पर अब लोग अखबार पर यों ही सरसरी नजर डाल मान लेते हैं कि आज के ढाईतीन रुपए वसूल हो गए. लेकिन मध्य प्रदेश के लोग कुछ दिनों से पूरा अखबार खोल कर इस उम्मीद के साथ पढ़ते रहे कि शायद किसी कोने में यह खबर दिख जाए कि धार के सरदारपुर कसबे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आपा खोते एक सुरक्षाकर्मी कुलदीप सिंह गुर्जर को जोरदार थप्पड़ जड़ दिया.
खबर धांसू थी लेकिन सोशल मीडिया के दायरे में सिमट कर रह गई. एकाध न्यूज चैनल ने एकाध बार ही इसे दिखाया, फिर यह गधे के सिर से सींग की तरह गायब होने वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली हो गई. इधर लोगों ने अखबार टटोले, पर किसी ने इसे नहीं छापा.
खुद शिवराज सिंह को हैरानी और खुशी हो रही होगी कि बात तो बात, बेबात में भी तिल का ताड़ बना देने वाला मीडिया उन का कितना लिहाज और सम्मान करता है. इधर प्रदेशभर में गुर्जर समाज के लोगों ने आहत होते इस ऐतिहासिक हो चले थप्पड़ के विरोध में न केवल धरनेप्रदर्शन किए, बल्कि शिवराज सिंह का पुतला भी फूंका, लेकिन मीडिया के मुंह में मानो गुड़ भरा है, जो इस खबर को खबर मानने को तैयार ही नहीं हुआ.
अब कहने वाले कहते रहें कि मीडिया बिकाऊ है या मैनेज कर लिया गया है, पर इस से शिवराज सिंह के अदब व रसूख की टीआरपी नहीं गिर रही. उलटे और बढ़ रही है. गोया कि एक अदने से मुलाजिम का कोई स्वाभिमान ही नहीं होता और सीएम से पिटना जिल्लत या जलालत की नहीं, बल्कि फख्र की बात होती है. लोकतंत्र के इस अलिखित उसूल का ही प्रताप इसे कहा जाएगा कि सरकारी विज्ञापनों के एहसान तले दबा मीडिया इस थप्पड़ पर इस तरह खामोश है जैसे अगर इस पर कुछ बोला, लिखा या दिखाया तो अगला थप्पड़ उस के ही गाल पर पड़ना है.
अब भला कौन किस मुंह से कहने का साहस रखता है कि देश में इमरजैंसी सरीखे हालात हैं और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गला घोंटा जा रहा है. कल को हुक्मरान अगर खुलेआम गुंडागर्दी पर भी उतारू हो आएं, तो यकीन मानें किसी के पेट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी मरोड़ नहीं उठेगी, अब डर तो इस बात का सताने लगा है कि कहीं इस को, यानी मुलाजिमों की सरेआम पिटाई को, सर्विस बुक में शामिल न कर लिया जाए.
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आजकल लगभग हर न्यूज चैनल ऐसी कितनी ही कहानियां और गुफा के आभासी वीडियो दिखा कर लोगों को भ्रमित कर रहा है.
सवाल उठता है कि खोजी मीडिया चैनल्स इतने सालों से कहां थे? न तो बाबा नए हैं, न ही गुफाएं रातोंरात बन गई हैं. फिर यह कैसी दबंग पत्रकारिता है जो अब तक सो रही थी. अब बाबाओं के जेल जाते ही यह मुखरित होने लगी है.
इन स्वार्थी और अवसरवादी चैनलों पर भी जानबूझ कर जुर्म छिपाने का आरोप लगना चाहिए, क्योंकि ये दावा करते हैं कि–देशदुनिया की खबर सब से पहले, आप को रखे सब से आगे… वगैरहवगैरह.
किसी भी बाबा का मामला उजागर होते ही सारा इलैक्ट्रौनिक मीडिया एक सुर में अलापना शुरू कर देता है कि लोग इतने अंधविश्वासी कैसे हो गए?
चैनल्स राशिफल, बाबाओं के प्रवचन, तथाकथित राधे मां या कृष्णबिहारी का रंगारंग शो, प्यासी चुडै़ल, नागिन का बदला, कंचना, स्वर्गनरक, शनिदेव जैसे तमाम अंधविश्वासों पर आधारित कार्यक्रम दिनरात चला कर लोगों के दिमाग में कूड़ा भरते हैं और बेशर्म बन कर टीवी पर चोटी कटवा जैसे मुद्दे पर डिबेट करवाते हैं. फिर पूछते हैं कि लोग अंधविश्वासी कैसे बन गए.
अगर सच में आप जनता को सचाई दिखाना चाहते हैं तो अपने जमीर को जिंदा कर दिखाएं. गरीबी से जूझ रहे लोगों, बढ़ती बेरोजगारी, रोजाना बढ़ रही महंगाई, अस्पतालों की अवस्था, डाकू बने डाक्टरों, जगहजगह पड़े कचरे के ढेरों, भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी तंत्रों की जमीनी हकीकत और निष्पक्ष जांच न्याय प्रणालियों को दिखाओ. तब जा कर नए भारत का सपना कुछ हद तक सही हो सकता है.
पिछले दिनों एक दैनिक अखबार के मुखपृष्ठ पर एक विज्ञापन छपा था. अखबार के एक ही एडिशन में उस के छपने की कीमत कम से कम डेढ़दो लाख रुपए तो होगी ही. ऐसे न जाने कितने एडिशनों में यह विज्ञापन छपा था.
समझ में यह नहीं आता कि इतने महान बाबाओं के समागमों और प्रवचनों के बावजूद देश में असमानता, हिंसक वारदातें, अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यही न कि धर्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाते रहो और अपनी दुकान चलाते रहो.
विज्ञापन में यह दावा भी किया गया कि इस कथित ब्रह्मांडरत्न को साक्षात श्रीहरि ने देवराज इंद्र को प्रदान किया था.
कहते हैं कि जिस देश की प्रजा जैसी होती है, उसे वैसा ही राजा मिल जाता है. इस में कमी हम भारतीयों की भी नहीं है. किसी गरीब को 10 रुपए मेहनत के देने हों तो उसे पाठ पढ़ा देंगे, लेकिन मंदिरमसजिदों में, बाबाजी के समागमों में हजारों खर्च कर देंगे.
मीडिया भी है जिम्मेदार
आध्यात्मिक या धार्मिक पोंगापंथ फैलाने वाले चैनल्स व समाचारपत्र बाबाओं की एक ऐसी फौज खड़ी कर रहे हैं जो देश में धर्म के नाम पर लूटखसोट मचा रही है. लगातार बढ़ रही इन की फेहरिस्त और इन पर हर रोज चलने वाले बाबाओं के प्रवचनों में आध्यात्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाया जा रहा है.
धर्मभीरू जनता का जितना शोषण धार्मिकता का लबादा ओढ़े इन बाबाओं ने किया है, उस में चैनलों और समाचारपत्रों का भी बराबर या उस से भी ज्यादा हाथ है. चैनल अपने फायदे को कैश करने के लिए बाबाओं को बराबर पब्लिसिटी और एंकर तक मुहैया करवा कर उन का तथाकथित धार्मिक सामान बेचने का औफर दे रहे हैं.
पाखंडी बाबा किसी भी तरह से अपनी जेबें भरने में जुटे हुए हैं. इन की प्रौपर्टी और बैंकबैलेंस का मुकाबला कुबेरपति भी नहीं कर सकते. भक्तों के बीच ये ऐसे महात्मा हैं जिन का माहात्म्य विवादों में उलझ कर रह गया है. ये मोहमाया छोड़ने का आह्वान करते हैं जबकि वे खुद गले तक मोह और माया में जकड़े हुए हैं.
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के इंदिरा गांधी इंदौर स्टेडियम में खेलो इंडिया स्कूल गेम्स के उद्घाटन के बाद कहा कि देश में खेल प्रतिभाओं की कमी नहीं है और सरकार ऐसे खिलाडि़यों का सहयोग करना चाहती है, जिन्हें खेल से प्यार है. उन्होंने कहा कि खेल इंडिया का मतलब पदक जीतना नहीं है, यह और अधिक खेलने के जन आंदोलन को मजबूत बनाने की कोशिश है.
इस लिहाज से प्रधानमंत्री की यह चिंता और पहल काबिलेतारीफ है कि वे युवाओं का सहयोग करना चाहते हैं. पर उन के इस जोशीले भाषण से लगता है कि या तो उन्हें यह अंदाजा नहीं है कि गड़बड़झाला कहां और कैसा है या फिर उन्हें सबकुछ मालूम है कि कैसे मौजूदा सिस्टम में खेल और खिलाड़ी भी बाबूशाही के शिकार हो कर उस की गिरफ्त में हैं.
खिलाडि़यों को सरकार सीधे पैसा या दूसरी सुविधाएं नहीं देती है बल्कि जिस किसी सरकारी एजेंसी के जरिए देती है वह खिलाडि़यों का वैसे ही शोषण करती है जैसे पटवारी किसानों का करता है.
सरकारी बाबुओं की धौंस राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर तक है, जो ज्यादातर खिलाडि़यों को एहसास दिलाते हैं कि बिना कुछ लिएदिए या चापलूसी किए तुम्हारा भला नहीं हो सकता. खिलाडि़यों को भी इन के चक्कर लगातेलगाते ज्ञान हो जाता है कि असल सरकार तो यही हैं और यही हमारा भला कर सकते हैं. मगर कुछ खिलाड़ी ऐसे भी हैं जो इन के खिलाफ आवाज बुलंद करते हैं पर कुछ दिनों बाद उन की भी बोलती बंद कर दी जाती है.
कई ऐसे खिलाड़ी हैं इस देश में जो राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय मैडल जीत चुके हैं पर गुमनामी में जी रहे हैं या फिर वे पसरी बाबूशाही और भेदभाव को देख खेलने का अपना सपना छोड़ खेती करते हैं, मजदूरी करते हैं, गाडि़यों के शीशे साफ करते हैं या चायपकौड़े का ठेला लगा कर गुजारा कर रहे हैं.
सरकारी बाबुओं को ऐसे खिलाड़ी पत्र लिखलिख कर थकहार चुके होते हैं पर सरकारी बाबुओं के कानों में जूं तक नहीं रेंगती. सरकारी बाबुओं को यह सबकुछ मालूम है. लेकिन उन्हें तो नईनई योजनाओं को लागू करने में इसलिए मजा आता है ताकि उन के आका खुश हो सकें.
खेलों को बढ़ावा देने के लिए ऐसी कई सारी सरकारी योजनाएं हैं लेकिन उन पर सही से न तो अमल होता है और न ही खिलाडि़यों का इस से भला होता है.
सुविधाओं के नाम पर सरकारी दावे बहुत किए जाते हैं, बावजूद इस के, ओलिंपिक जैसे खेलों या दूसरे अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खेलों में हम बहुत पीछे हैं. वर्ष 1952 के ओलिंपिक में चीन एक भी पदक नहीं जीत पाया था. 32 वर्षों तक चीन ओलिंपिक खेलों से दूर रहा पर 1984 में 15 स्वर्ण पदक जीत कर उस ने सब को चौंका दिया. वर्तमान समय में चीन हम से बहुत आगे है.
केवल योजना बना देने से खेलों का विकास नहीं हो सकता. प्रधानमंत्री को भी मालूम है कि इस देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है पर इन खिलाडि़यों को निखारने की जिम्मेदारी जिस को आप ने सौंपी है क्या वाकई में वे यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं?
खेलों को तो खेल संघों और रसूखदारों ने राजनीति का अखाड़ा बना दिया है. ऐसे में इंडिया खेल पाएगा, ऐसा लग नहीं रहा. प्रधानमंत्री की नजर खेलों के स्याह पहलुओं पर नहीं गई जिन के चलते खिलाड़ी पलायन कर जाते हैं.
ऐसा नहीं है कि भारतीय युवा शारीरिक और मानसिक रूप से बेहतर नहीं हैं. अभावों में खेलते कई खिलाडि़यों ने झंडे गाड़े हैं पर उन्हीं की दास्तां बताती है कि वे कैसीकैसी बाधाओं को पार कर एक मुकाम तक पहुंचे हैं. इस हकीकत को बताती कई फिल्में खिलाडि़यों की जिंदगी पर बनी भी हैं. मसलन, ‘मैरीकौम’ और ‘दंगल’. इन फिल्मों ने सरकारी तंत्र की पोल खोल कर रख दी है.
खेलों में परचम लहराना भारतीय युवाओं के लिए चुनौती नहीं है. अगर चुनौती है तो सरकारी प्रक्रिया जो इंडिया को खेलने नहीं देती. ऐसे में चिल्लाचिल्ला कर खेलो इंडिया, खेलो इंडिया कहने से न तो इंडिया खेल पाएगा और न ही खिलाडि़यों का भला होगा.
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भारत ने दृष्टिहीन विश्वकप क्रिकेट 2018 के फाइनल मुकाबले में पाकिस्तान को हरा कर खिताब पर कब्जा जमा लिया. भारत ने पिछली बार यानी वर्ष 2014 में भी विश्वकप का खिताब अपने नाम किया था.
उधर अंडर-19 वर्ल्डकप में भी भारत ने आस्ट्रेलिया को मात दे कर चौथी बार वर्ल्ड चैंपियन का खिताब हासिल कर लिया.
इस देश के खिलाडि़यों की विडंबना देखिए एक तरफ अंडर-19 क्रिकेट टीम व इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल में क्रिकेटरों पर करोड़ों रुपए की बारिश होती है वहीं दूसरी तरफ दृष्टिहीन क्रिकेट टीम के कई सदस्यों के पास रोजगार तक नहीं है. कोई खेतिहर मजदूर है तो कोई घरों में दूध बेचता है तो कोई और्केस्ट्रा में गा कर जीवन व्यतीत करता है.
जब वर्ष 2014 में भारतीय टीम विश्व विजेता बनी थी तो बहुत बड़ीबड़ी बातें की गई थीं लग रहा था कि अब दृष्टिहीन क्रिकेटरों के भी दिन फिरने वाले हैं पर हकीकत इस से कोसों दूर है.
वलसाड़ के रहने वाले गणेश मूंडकर को वर्ष 2014 में गुजरात सरकार ने नौकरी देने का वादा किया था पर गणेश को नौकरी नहीं मिली. नतीजतन वे आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं लेकिन उन का हालचाल लेने वाला कोई नहीं. गणेश के मातापिता खेत में मजदूरी करते हैं और किसी तरह अपना जीवनयापन करते हैं. कई बार तो आर्थिक स्थिति के चलते वे गणेश को क्रिकेट खेलने के लिए मना भी कर चुके हैं.
आंध्र प्रदेश के कूरनूल जिले के प्रेम कुमार बी वन श्रे यानी पूर्णरूप से नेत्रहीन हैं और और्केस्ट्रा में गा कर अपना गुजारा करते हैं.
यही हाल गुजरात के वलसाड़ के रहने वाले अनिल आर्या का भी है. वे भी दूध बेच कर अपना जीवनयापन करते हैं लेकिन उन्हें क्रिकेट का जनून है. आंध्र प्रदेश के रहने वाले वेंकटेश्वर राव किसी तरह 13-14 हजार रुपए कमा लेते हैं लेकिन इतने कम पैसे में महंगाई के इस दौर में भला क्या हो सकता है.
टीम इंडिया में हर सदस्य किसी सैलिब्रिटी से कम नहीं है पर दृष्टिहीन क्रिकेट टीम के सदस्यों के नाम तक लोगों को नहीं मालूम. कप्तान अजय रेड्डी का मानना है कि जहां क्रिकेटरों को एक जीत पर सिरआंखों पर बिठाया जाता है वहां ये नौकरी और सम्मान के लिए तरस रहे हैं. खिलाड़ी अपना फोकस खेल पर नहीं कर पा रहे हैं. बीसीसीआई और खेल मंत्रालय से मान्यता मिलने से समस्याओं का समाधान हो सकता है पर वह भी नहीं मिली है.
खेल मंत्रालय खिलाडि़यों की बेहतरी के लिए कई सारी योजनाएं लागू करता है और योजनाएं चल भी रही हैं पर विश्व विजेता टीम का यह हाल है तो वाकई में चिंता की बात है. बिना आर्थिक मदद या रोजगार के भला ये कब तक खेल पाएंगे, यह सोचने वाली बात है.
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सरकार ने हाल ही में अखबारों में विज्ञापन दे कर नकद लेनदेन पर लगाई गई नई पाबंदियों की जनसाधारण को सूचना दी है. नई व्यवस्था के तहत 2 लाख रुपए या इस से अधिक की राशि एक दिन में किसी व्यक्ति से स्वीकार न करने, इतनी राशि का एक या एक से ज्यादा बार एकसाथ लेनदेन न करने, अचल संपत्ति के हस्तांतरण में 20 हजार रुपए नकद लेने या देने और अपने व्यापार या व्यवसाय के खर्च में 10 हजार रुपए से ज्यादा का नकद भुगतान न करने जैसी हिदायतें दी गई हैं. इस के साथ ही, राजनीतिक दलों को 2 हजार रुपए से अधिक का चंदा नहीं देने को भी कहा गया है.
आयकर विभाग ने नकद लेनदेन को नियंत्रित करने के लिए यह पाबंदी लगाई है. इन पाबंदियों का पालन न करने पर आयकर विभाग जुर्माना लगा सकता है. सरकार की इस नई नियमावली से कारोबारी परेशान हैं, लेकिन कुछ कारोबारियों का कहना है कि जो लोग ईमानदारी से अपना काम करते हैं, उन के लिए यह नई पाबंदी सुकूनभरी है.
कई कारोबारियों का कहना है कि इस से नए उद्यमियों को ईमानदारी से अपना कारोबार करने में आसानी होगी और आयकर विभाग के नाम पर उन के साथ प्रताड़ना बंद हो जाएगी. विश्लेषकों का मानना है कि इन पाबंदियों का मकसद राजनीतिक चंदे के नाम पर होने वाले घोटाले पर रोक लगाना है. कारोबारी राजनीतिक दलों को चंदे के नाम पर जिस तरह से अपने पक्ष में कर के अराजक तरीके से लाभ अर्जित करते हैं, इस व्यवस्था से उस पर लगाम कसी जा सकेगी.
सरकार ने राजनीतिक दलों को चंदा देने की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए गत वर्ष चुनावी बौंड जारी करने की अधिसूचना जारी की थी. राजनीतिक दल ये बौंड देश में सरकारी क्षेत्र के सब से बड़े बैंक स्टेट बैंक औफ इंडिया की चुनिंदा शाखाओं पर और निर्धारित समय के भीतर ही खरीद सकते हैं.
उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार की इस सख्ती से बेलगाम चुनावी चंदे पर रोक लगेगी और राजनीतिक दल अपने चहेते कारोबारियों को नियमों का उल्लंघन कर लाभ नहीं पहुंचा सकेंगे. चुनावी चंदे के काले कारोबार को रोके जाने से चुनाव में होने वाले अनापशनाप खर्च की बदौलत मतदाताओं को अपने पक्ष में कर चुनाव जीतने वाले राजनेताओं द्वारा जीत हासिल करने के बाद की जाने वाली वसूली को नियंत्रित भी किया जा सकेगा.
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हाल ही में एक चौंकाने वाला सर्वेक्षण आया है जिस में कहा गया है कि 1 फीसदी अमीरों के पास देश की 73 फीसदी संपत्ति है. यह सर्वेक्षण अंतर्राष्ट्रीय राइट्स समूह औक्सफेम ने किया है. सर्वे के अनुसार, 67 करोड़ भारतीयों की संपत्ति 2017 में महज 1 फीसदी बढ़ी है जबकि देश के नागरिकों की कुल आय के 73 प्रतिशत हिस्से पर अमीरों का कब्जा रहा. सामाजिक असमानता की यह तसवीर वैश्विक स्तर पर भी चौंकाने वाली है.
सर्वे के अनुसार, गत वर्ष दुनिया में कुल अर्जित की गई संपत्ति के 82 प्रतिशत हिस्से पर सिर्फ 1 प्रतिशत अमीरों का कब्जा रहा और दुनिया में 3.7 अरब लोगों की संपत्ति में इस दौरान कोई इजाफा नहीं हुआ. मतलब कि पिछले साल विश्व की आधी से अधिक आबादी की संपत्ति में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई जबकि 1 फीसदी अमीरों ने इस दौरान भी पहले की तरह चांदी काटी.
आश्चर्य की बात है कि समाजवाद और सब के लिए समान अवसर की बात करने वाली दुनिया में गरीब के हिस्से उस की खूनपसीने की कमाई भी पूरी तरह से नहीं आती है. उस के खूनपसीने पर भी बेईमान नजर गड़ाए रहते हैं.
यह आम धारणा है कि हर अमीर ने गरीब का खून चूस कर अमीरी के पायदान पर कदम रखा है और गरीब के परिश्रम की बदौलत ही अमीरों का आलीशान संसार चल रहा है. गरीबी उन्मूलन से ले कर सब का साथ सब का विकास जैसे नारे दे कर राजनीतिक दलों ने सिर्फ गरीब को सपने दिखाए हैं और उन को बरगला कर उन के वोट बटोरने की साजिश की तथा लोकतंत्र की सुरक्षा की दुहाई दे कर सत्ता की रोटी सेंकी है.
लोकतंत्र के पैरोकार कहे जाने वाले अखबार भी देश और दुनिया के सब से अमीर व्यक्ति के बारे में जानने को उत्सुक रहते हैं और प्रमुखता से देश व दुनिया के सब से ज्यादा दौलत वाले अमीरों की प्रशंसा में खोए रहते हैं और उन्हीं से जुड़ी खबरें प्रकाशित हैं. कभी किसी मीडिया संस्थान का जमीर गरीब के लिए नहीं जागा और उस ने यह सवाल नहीं उठाया कि आखिर सब से अमीर आदमी की तर्ज पर सब से गरीब आदमी का उल्लेख क्यों नहीं होता. इस का सीधा और सरल कारण यह है कि पूरी दुनिया गरीबों से भरी है और गरीबी इस कदर है कि उस में डूबे सब से गरीब की पहचान की ही नहीं जा सकती.
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लगातार रिकौर्ड बना रहे बौंबे शेयर बाजार को वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा आम बजट पेश करने के एक दिन बाद अचानक करारा झटका लगा और सूचकांक करीब साल में पहली बार सर्वाधिक गिरावट पर बंद हुआ. 1 फरवरी को जब वित्त मंत्री आम बजट पेश कर रहे थे तो बाजार में हलचल रही और सूचकांक ऊपरनीचे झूलता रहा, लेकिन शुक्रवार 2 फरवरी को अचानक बिकवाली का दौर शुरू हुआ और बाजार में तेज गिरावट आ गई. जनवरी के आखिर में बहुत कम समय में शेयर बाजार 36,000 अंक के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर अचानक करीब 850 अंक लुढ़क कर 35,66 पर आ गया.
ऐसा ही माहौल नैशनल स्टौक ऐक्सचेंज के निफ्टी में भी देखने को मिला. कारोबार के दौरान नए रिकौर्ड पर टिका निफ्टी 255 अंकों की गिरावट के साथ 10,760 पर लुढ़क कर आ गया. बाजार में मचे इस कोहराम के बीच वैश्विक क्रैडिट रेटिंग एजेंसी फिच ने यह कह कर गिरते बाजार को और झटका दिया कि सरकार पर कर्ज के भारी दबाव के चलते भारत की रेटिंग में सुधार कार्यक्रम अवरुद्ध हो रहे हैं.
फिच का बयान आने से एक ही दिन पहले पेश बजट में वित्त मंत्री ने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी 3.2 प्रतिशत से बढ़ा कर 3.5 प्रतिशत किया. जानकार शेयर बाजार को अचानक लगे इस झटके की वजह शेयरों से कमाई पर लौंग टर्म कैपिटल गेन टैक्स यानी 1 लाख रुपए से ज्यादा के शेयर पर दीर्घकालिक कर लगाना और म्यूचुअल फंड में 10 प्रतिशत का कर लगाना मान रहे हैं.
बजट के बाद बाजार के अचानक औंधेमुंह गिरने से निवेशकों के करीब 5 लाख करोड़ रुपए स्वाहा हो गए और सूचकांक 2.25 फीसदी से ज्यादा गिर कर बंद हुआ. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने बाजार की गिरावट पर चुटकी ली और कहा कि मोदी सरकारके बजट को बाजार ने भी खारिज कर दिया. पहले, साल की शुरुआत से ही बाजार का मूड बहुत अच्छा था और बाजार में लगातार रिकौर्ड बन रहे थे.
VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…
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