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फोन खोने पर इस तरह करें व्हाट्सऐप री-स्टोर

फोन खोने या चोरी हो जाने पर हमें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है. फोन चोरी होने पर उसमें सुरक्षित डेटा का खो जाना पैसों के नुकसान के साथ एक बड़ा नुकसान है. आजकल हर कोई व्हाट्सऐप का इस्तेमाल करता है. फोन खोने पर जाने वाले डेटा में व्हाट्सऐप डेटा भी बहुत महत्वपूर्ण है. हम तो यही चाहेंगे कि किसी के भी साथ ऐसा ना हो, लेकिन अगर कभी आपके साथ ऐसा होता है और आप अपने व्हाट्सऐप डेटा को रिस्टोर करना चाहते हैं तो अब परेशान होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि आज हम आपको बता रहे हैं कुछ आसान से स्टेप्स जिन्हें अपनाकर आप अपना व्हाट्सऐप री-स्टोर कर सकते हैं.

तो चलिए जानते हैं इसके बारें में-

फोन खो जाने पर सबसे पहले तो आप अपने सिम प्रोवाइडर को फोन करके अपना सिम तुरंत लौक कराएं ताकि आपके नंबर का गलत इस्तेमाल ना किया जा सके. ऐसा होने के बाद आपके खोए हुए डिवाइस पर आपके नंबर वाला व्हाट्सऐप नहीं चल पाएगा. ऐसा इसलिए होगा क्योंकि व्हाट्सऐप चलाने पर रजिस्टर्ड नंबर पर एक वेरिफिकेशन का कोड आएगा लेकिन सिम बंद होने के कारण वह कोड नहीं मिलेगा और आपके नंबर वाला व्हाट्सऐप नहीं चल पाएगा.

सिम बंद करवाने के बाद किसी भी मोबाइल स्टोर पर जाकर अपना नया सिम निकलवा लें. अब आप किसी भी नए डिवाइस पर व्हाट्सऐप इंस्टाल कर सकते हैं. याद रखें, एक नंबर से एक समय पर सिर्फ एक ही फोन में व्हाट्सऐप चालू हो सकता है.

यूजर के पास अपना अकाउंट दोबारा चालू करने के लिए 30 दिन का समय होता है. एक महीने के बाद आपका अकाउंट अपने आप डिलीट हो जाएगा. इस दौरान अगर कोई आपको मैसेज भेजेगा तो वे पेंडिंग में रहेंगे लेकिन 30 दिन बाद वे भी डिलीट हो जाएंगे. इसके अलावा अगर आपने किसी औनलाइन क्लाउड पर बैकअप ले रखा है तो आप अपनी चैट हिस्ट्री को री-स्टोर कर पाएंगे.

आप व्हाट्सऐप टीम को भी मेल कर सकते हैं. इसके लिए मेल में आपको Lost/stolen: Deactivate my account के साथ अपने व्हाट्सऐप नंबर भी लिखने होंगे.

पीएनबी महाघोटाले का असर कहीं आप पर तो नहीं

पीएनबी महाघोटाले ने जहां देश को हिला कर रख दिया है. वहीं, केंद्र सरकार भी अब कोई ढिलाई नहीं बरतना चाहती है. देश के सबसे बड़े बैंकिंग घोटाले में सीबीआई और ईडी लगातार छापेमारी कर रही हैं. देशभर में नीरव मोदी, मेहुल चौकसी के कई ठिकानों पर छापे मारे गए. सोमवार को सीबीआई ने पीएनबी की मुंबई स्थित ब्रैडी हाउस ब्रांच को सील कर दिया. साथ ही बैंक के बाहर नोटिस भी चस्पा कर दिया है. फिलहाल, अगले आदेश तक बैंक में कोई काम नहीं होगा. आम नागरिकों से लेकर बैंक कर्मचारियों तक के ब्रांच में जाने पर रोक लगा दी गई है. इस ब्रांच में जिसका भी खाता है वो फिलहाल कोई काम नहीं कर पाएगा.

ब्रैडी हाउस ब्रांच में जांच होगी

पीएनबी के ब्रैडी हाउस ब्रांच में जांच शुरू हो गई है. रविवार को ही सीबीआई की एक टीम ने कई दस्तावेजों को अपने कब्जे में लिया. वहीं, पीएनबी के अधिकारियों से भी पूछताछ की गई. इसके अलावा सीबीआई ने विपुल अंबानी और नीरव मोदी के स्टाफ से भी आठ घंटे पूछताछ की गई.

आपको बता दें, विपुल अंबानी का ताल्लुक धीरूभाई अंबानी परिवार से है. वह धीरूभाई अंबानी के छोटे भाई नटुभाई अंबानी के बेटे हैं और वह नीरव मोदी की कंपनी फायरस्टार के फाइनेंस डिपार्टमेंट के प्रेसिडेंट हैं. सीबीआई ने उन्हें कुछ दस्तावेजों के साथ दफ्तर बुलाया था.

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कमीशन राशि का होता था बंटवारा

सीबीआई ने पीएनबी के 11 अफसरों, विपुल अंबानी के अलावा गिरफ्तार गए पीएनबी के रिटायर्ड डिप्टी मैनेजर गोकुलनाथ शेट्टी समेत तीन आरोपियों से भी पूछताछ की. शेट्टी ने पूछताछ में खुलासा किया कि नीरव मोदी और मेहुल चौकसी की कंपनियों को फर्जी एलओयू जारी करने के लिए मोटा कमीशन मिलता था. इस कमीशन राशि का बंटवारा मुंबई की ब्रैडी हाऊस शाखा के घोटाले में लिप्त सभी कर्मचारी में होता था.

पासवर्ड का भी होता था गलत इस्तेमाल

शेट्टी ने बताया कि वह फर्जी एलओयू (लेटर औफ अंडरटैकिंग) के लिए लेवल-5 पासवर्ड का अनधिकृत रूप से उपयोग करता था. स्विफ्ट सिस्टम के जरिए भी नीरव और मेहुल की कंपनियों को फर्जी एलओयू जारी करने की सूचना विदेशी बैंकों को भी दी जाती थी. विदेशों में कई बैंकों ने नीरव और मेहुल की कंपनियों को 11,400 करोड़ रुपए (1.77 अरब डौलर) का भुगतान किया गया.

आप पर भी होगा असर

घोटाले का असर आम खाताधारकों पर भी पड़ेगा. दरअसल, सीबीआई ने जिस ब्रांच को सील किया है. वहां, अभी कोई काम नहीं होगा. इसका मतलब यह है कि रोजाना का लेनदेन करने वालों को बड़ा झटका लगेगा. साथ ही दस्तावेजों से जुड़े कामकाज पर भी असर पड़ेगा. ब्रांच में जमा पैसा न बाहर जाएगा न ही कोई पैसा अंदर आएगा. जिनके ड्राफ्ट, कैश मेमो, बैलेंसशीट ब्रांच में होगी वह भी नहीं निकल सकेगी.

गूगल ने हटाया अपना यह अहम फीचर, क्या आपने ध्यान दिया

गूगल ने अपने सर्च इंजन से एक अहम फीचर हटा दिया है. ये फीचर उसके इमेज औप्शन से जुड़ा हुआ है. बताया जा रहा है कि गूगल ने ये कदम कौपी राइट की परेशानी को देखते हुए हटाया है. दरअसल, अब आपको गूगल इमेज में किसी भी फोटो पर व्यू इमेज का औप्शन नहीं मिलेगा. इस फीचर का इस्तेमाल करते हुए पहले यूजर फोटो को उसके ओरिजनल साइज में देख पाता था. इतना ही नहीं उसे डाउनलोड करना भी आसान होता था. लेकिन अब इमेज को ओरिजनल साइज में डाउनलोड करना थोड़ा मुश्किल हो जाएगा.

गूगल ने ट्विटर पर दी जानकारी

इस संबंध में गूगल ने अपने आधिकारिक ट्विटर अकाउंट के जरिए जानकारी दी है. गूगल की ओर से ट्वीट करते हुए लिखा गया, हम यूजर्स और कई वेबसाइट से जुड़ने के लिए इमेज सेक्शन में कुछ बदलाव करने जा रहे हैं. इसके अंतर्गत व्यू इमेज का बटन हटा दिया जाएगा. हालांकि, विजिट बटन बरकरार रहेगा, ताकि यूजर इमेज से जुड़ी खबर को संबंधित वेबसाइट पर पढ़ सकें.

गैटी इमेज के साथ करार है अहम वजह

बताया जा रहा है कि गूगल के इस कदम के पीछे उसका गैटी इमेज के साथ हुआ एक करार है. इमेज सेक्शन में हुए ये बदलाव स्टौक फोटो प्रोवाइडर गैटी इमेज के साथ गूगल की पार्टनरशिप के बाद देखने को मिल रहे हैं. गूगल ने हाल ही में गैटी इमेज के साथ मल्टी-ईयर ग्लोबल लाइसेंसिंग डील साइन की है. इस करार के तहत गूगल को इमेज सेक्शन में गैटी के फोटो के साथ उससे संबंधित कौपीराइट जानकारी भी देनी होगी.

कुछ को पसंद, कुछ को नापसंद आया बदलाव

गौरतलब है कि इससे पहले कई फोटोग्राफर्स ने गूगल के जरिए लोगों द्वारा बिना परमिशन के आसानी से फोटो डाउनलोड किए जाने पर आपत्ति जताई थी. कौपीराइट होने के बावजूद इन्हें इमेज सेक्शन के जरिए लोग डाउनलोड कर रहे थे. गैटी इमेज के द्वारा भी इसी तरह की शिकायत की गई थी.

इस बदलाव को लेकर लोगों ने मिली जुली प्रतिक्रिया दी है. जहां प्रोफेशनल फोटोग्राफर्स और कुछ वेबसाइट इस बदलाव से खुश हैं, तो वहीं आम लोगों में से कुछ इसे गूगल का अब तक का सबसे बेकार बदलाव बता रहे हैं.

अरिजीत से अब तक नाराज हैं सलमान खान, अब इस फिल्म से हटवाया गाना

फिल्म ‘सुल्तान’ की रिलीज के वक्त अभिनेता सलमान खान की सिंगर अरिजीत सिंह से नाराजगी की बात सामने आई थी, जो अब तक खत्म नहीं हुई है. कई मौकों पर अरिजीत सिंह के माफी मांगने के बाद भी सलमान खान की नाराजगी नहीं दूर हो पाई है. इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सलमान के दखल के बाद फिल्म ‘वेलकम टू न्यूयौर्क’ से अरिजीत सिंह के गाने को हटा दिया गया है.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक कुछ दिन पहले ही सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म ‘वेलकम टू न्यूयौर्क’ का गाना ‘नैन फिसल गए’ रिलीज हुआ है. इस गाने में सलमान खान ने काम किया है लेकिन फिल्म का हिस्सा बनने से पहले सलमान ने फिल्म से अरिजीत के गाने को हटाने के लिए कहा था.

बता दें, फिल्म के गाने ‘इश्तिहार’ को पहले अरिजीत की आवाज में रिकौर्ड किया जाना था लेकिन सलमान के मना करने के बाद फिल्म के इस गाने को राहत फतेह अली खान ने आवाज दी. इस फिल्म में दिलजीत दोसांज, करण जौहर, ऋतेश देशमुख और बोमन ईरानी जैसे कलाकार अहम भूमिकाओ में हैं.

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बाबुल सुप्रियो ने पाक सिंगर को लेकर उठाए सवाल

बता दें, बाबुल सुप्रियो ने भारत में पाकिस्तानी कलाकारों पर बैन लगाने की मांग करते हुए कहा है कि, ‘मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि जब भारत-पाक के बीच तनाव बढ़ा हुआ है, तो हम सीमा पार प्रतिभा और कौशल की तलाश क्यों कर रहे हैं’. उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि एफएम पर पाकिस्तानी गायकों के गाने चलाए जाए और न्यूज चैनल्स पर पाकिस्तानी हमले में शहीद हुए भारतीय जवानों की खबरें. इसके साथ ही सुप्रियो ने फिल्म ‘वेलकम टू न्यूयौर्क’ के निर्माताओं से एक गाने से राहत फतेह अली खान की आवाज़ को हटाने की मांग की है.

अरिजीत ने फेसबुक पर की थी रिक्वेस्ट

गौरतलब है कि अरिजीत सिंह ने सलमान खान की फिल्म ‘सुल्तान’ के लिए गाना गाया था और बाद में उन्होंने अपने फेसबुक पर एक पोस्ट करते हुए सलमान खान से रिक्वेस्ट भी की थी कि वह इस फिल्म से उनके गाने को न हटाए लेकिन सलमान ने फिल्म से अरिजीत के गाने को हटवा दिया था. इसके बाद सलमान की फिल्म ‘टाइगर जिंदा’ है में भी सलमान ने अरिजीत को गाने का मौका नहीं दिया था और इस वजह से उनकी फिल्म के गाने ‘दिल दियां गल्ला’ को आतिफ असलम ने आवाज दी थी.

डांस मेरा एक्स्ट्रा टैलेंट है और अभिनय मेरा पैशन : उर्वशी

फिल्म ‘सिंह साहब द ग्रेट’ से कैरियर की शुरुआत करने वाली खूबसूरत अभिनेत्री उर्वशी रौतेला, उत्तराखंड के हरिद्वार की हैं. स्कूल के दिनों से मौडलिंग की शुरुआत करने वाली उर्वशी ने साल 2015 को ‘मिस दिवा’ का खिताब जीता और ‘मिस इंडिया यूनिवर्स 2015’ का प्रतिनिधित्व भी किया. हिंदी के अलावा उसने कन्नड़ और बंगाली फिल्मों में भी काम किया है. फिल्म ‘हेट स्टोरी 4’ में उर्वशी मुख्य भूमिका निभा रही हैं. जिसे लेकर वह बहुत खुश हैं. उनसे मिलकर बात करना रोचक था. पेश है अंश.

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इस फिल्म को करने की खास वजह क्या है?

ये एक अलग खास रोमांटिक थ्रिलर फिल्म है. कहने को तो ये हेट स्टोरी है, पर इस श्रृंखला को सबसे अधिक प्यार मिला है. ये मेरे कैरियर की पहली महिला प्रधान फिल्म है. मैं खुश होने के साथ – साथ नर्वस भी हूं, क्योंकि बाकी फिल्मों के साथ इसकी तुलना की जाएगी. उसका मुझे डर है. इसके अलावा इससे पहले की फिल्मों में मैंने सेकेण्ड लीड की भूमिका की थी, जिसमें कामयाबी या असफलता दोनों बट जाया करती थी. इसमें सब मुझे ही सहना पड़ेगा.

फिल्म में ‘हील्स कोरियोग्राफी’ है, जिसे आपने किया है, कैसे और कहां से सीखा?

मैंने डांस के 11 फौर्म सीखे है. मसलन भरतनाट्यम, जैज, बेले, बौलीवुड डांस आदि. इससे मुझे किसी भी प्रकार के डांस को सीखने में मेहनत नहीं लगती. इसके अलावा मैंने इस फिल्म में एक सुपर मौडल की भूमिका निभाई है, जो बहुत साहसी, मजबूत, आत्मविश्वास से परिपूर्ण होने के साथ-साथ सौफ्ट और संवेदनशील भी है. ऐसे में जब मैंने इस के एक गाने को सुना, तो नया करने की इच्छा हुई और मैंने किया और इसे करने में समय नहीं लगा.

क्या फिल्मों में आना इत्तफाक था या पहले से सोचा था?

मैंने फिल्मों में आने की कल्पना कभी भी नहीं की थी. मैं जिमनास्ट, एस्ट्रोनौट, बास्केटबौल प्लेयर या एरोनौटिकल इंजीनीयर बनना चाहती थी. फिल्मों में आने के लिए परिवार वालों और दोस्तों ने कहा. पहले मुझे लगा था कि मैं इस क्षेत्र में सफल होउंगी या नहीं, पर जब मौडलिंग के औफर आने लगे, तो अपने ऊपर विश्वास हुआ और जब दो बार मिस इंडिया का खिताब जीती, तो आत्मविश्वास बढ़ा.

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किस फिल्म ने आपको प्रेरित किया?

मैंने पहले थिएटर में फिल्म ‘कहो न प्यार है’ देखी थी, उसमें ऋतिक के अभिनय से बहुत प्रेरित हुई थी. इसके बाद जब उन्होंने फिल्म ‘काबिल’ का गाना ‘हसीनों का दीवाना….’ डांस के लिए बुलाया, तो मुझे बहुत खुशी हुई थी. डांस मेरी एक्स्ट्रा टैलेंट है और अभिनय मेरा पैशन है.

परिवार का सहयोग कैसे था?

मैं इकलौती संतान हूं और बचपन से ही पैम्पर चाइल्ड रही हूं. मैं 16 साल की उम्र में मुंबई आ गयी थी. मेरी मां मीरा रौतेला, एक बिजनेस वुमन होने के साथ-साथ इंडस्ट्री की सबसे सुंदर महिला हैं और मेरे पिता भी व्यवसायी हैं, उनसे मानसिक और भावनात्मक सहयोग जो जरुरी होता है वह मिला.

‘मिस दिवा’ से अब तक का सफर कैसा था? कितना संघर्ष था?

मुझे मिस इंडिया बनना था और मैंने कई ब्यूटी प्रेजेंट भी जीता है, जिससे लोगों के बीच में जल्दी पोपुलर हो गयी थी, इससे मुझे मौडलिंग और एक्टिंग के औफर भी मिलने लगे थे. मुश्किल की अगर बात करें तो मैंने 16 साल की उम्र में ‘मिस यूनिवर्स’ के लिए पूरी तैयारिया की थी, लेकिन कौम्पीटिशन के समय पर मैं 20 दिन छोटी पड़ने की वजह से भाग नहीं ले सकी, यह मेरे लिए बहुत दुखद था. इसके अलावा सही फिल्मों के मिलने के लिए भी संघर्ष होता है.

क्या कभी ‘कास्टिंग काउच’ का पाला पड़ा?

कास्टिंग काउच का सीधा सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन कभी मुझे लीड बताकर किसी स्टार किड्स को ले लेना जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ा है. इंडस्ट्री में भाई-भतीजावाद है, लेकिन अगर मेरे अंदर प्रतिभा है, तो मैं उसे किसी न किसी दिन अवश्य बाहर लाने में समर्थ होउंगी. समय लगता है, पर काम अवश्य मिलता है.

फिल्मों में अन्तरंग दृश्य को करने में कितनी सहज हैं?

फिल्म में कहां क्या करना है मुझे पता होता है, इसके लिए में शोध भी करती हूं. अगर फिल्म में कोई इमोशन को दिखाना है, तो अपने मूड को बनाने के लिए मैं 500-500 बार पुशअप मारती थी. अचानक से अगर बेड सीन करना है, तो उसे करने के लिए मैं अपने ट्रिक्स का इस्तेमाल करती हूं. किसी चरित्र में जाने के लिए मैं अपने आप को पूरी तरह से तैयार करती हूं.

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फैशन कितना पसंद करती हैं? कितनी फूडी हैं?

मुझे क्रिएटिविटी बहुत पसंद है और ड्रेस में भी मैं खुद ही कुछ न कुछ क्रिएट करती रहती हूं. मुझे अपनी ‘क्लोदिंग लाइन’ भी निकालने की इच्छा है. मुझे बर्साची के पोशाक बहुत पसंद है. मुझे फैशन पसंद है. मैं बहुत फूडी हूं. हर तरह के व्यंजन पसंद है. मां के हाथ की बनाई हुई भिन्डी की सब्जी, पनीर के पराठे, रबड़ी के साथ इमरती, रसमलाई आदि सब पसंद है. मैं जंक फूड नहीं खाती, हेल्दी फूड लेती हूं. साथ ही हेल्थ ट्रेनिंग खूब लेती हूं.

आपका स्टाइल स्टेटमेंट क्या है? आपकी खूबसूरती का राज क्या है?

मैं हमेशा लुक बदलती रहती हूं. गाने में, फिल्मों में अलग-अलग लुक मैं खुद क्रिएट करती हूं. इससे मुझे काम करने में मजा आता है.

मेरी खूबसूरती का राज मेरे माता-पिता हैं, जिन्होंने अपनी जींस को मुझे दिया. इसके अलावा उत्तराखंड की खूबसूरत वादियां है.

क्या कोई ड्रीम प्रोजेक्ट है?

मुझे प्रोजेक्ट से अधिक खास निर्देशक के साथ काम करने की इच्छा है, जिसमें संजय लीला भंसाली और राजू हिरानी का नाम सबसे ऊपर है.

आपको लेकर कई बार ट्रोलिंग हुई है, उसे कैसे लिया?

‘ट्रोलर्स’ तो करते ही रहेंगे, उस पर मैं अधिक ध्यान नहीं देती, ‘इग्नोर’ करती हूं.

क्या कुछ सामाजिक काम करती हैं?

मेरी एक फाउंडेशन उर्वशी रौतेला फाउंडेशन है, जिसके तहत वहां के गरीब बच्चों को हर तरह की सुविधाएं दी जाती है.

पंडों और भिखारियों में आखिर फर्क क्या है

इंद्रेश कुमार आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक और कार्यकर्ता हैं जो महज 21 साल की उम्र में बीई करने के बाद आरएसएस से जुड़ गए थे. वे एक चुनौती पूर्ण और दुसाहसी काम करते रहे हैं वह है देश के तमाम मुसलमानों को आरएसएस से जोड़ने का, वावजूद यह जानने समझने के देश का इतिहास तो इतिहास वर्तमान भी इस पर सहमत नहीं. इंद्रेश मुसलमानों को हिन्दू नहीं बनाते बल्कि यह कहते हैं कि मुसलमानों को मुख्यधारा से जुड़ जाना चाहिए.

अब यह मुख्यधारा है क्या बला यह बताने की जरूरत नहीं कि वह हिन्दुत्व है जो इंद्रेश कुमार जैसे संघियों की राय में कोई धर्म नहीं बल्कि एक जीवन पद्धति है और मुसलमान इसके अपवाद नहीं. अक्सर आरएसएस की तरफ से रोजा इफ्तार दावतों में दिखने बाले इंद्रेश सालों बाद भी वहीं खड़े हैं जहां से चले थे यानि एक फ्लौप मुहिम की अगुवाई वे अभी तक कर रहे हैं.

अक्सर अपने बड़बोलेपन के चलते सुर्खियों और विवादों में रहने वाले इस वरिष्ठ कार्यकर्ता ने 13 फरवरी को दिल्ली के एक कार्यक्रम में एक दिलचस्प बात यह कही कि भीख मांगना भी देश के 20 करोड़ लोगों का रोजगार है, जिन्हें किसी ने रोजगार नहीं दिया उन लोगों को धर्म में रोजगार मिलता है , जिस परिवार में पांच पैसे की भी कमाई न हो उस परिवार का दिव्यांग और दूसरे सदस्य धार्मिक स्थलों में भीख मांगकर परिवार का गुजारा करता है, ये छोटा काम नहीं है.

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नरेंद्र मोदी के पकौड़ा बेचो के मशवरे पर भी वे कुछ कुछ बोले पर मुद्दे की बात 20 करोड़ भिखारी हैं जो बकौल इंद्रेश कुमार धर्म स्थलों पर भीख मांगकर गुजर करते हैं. बिना किसी लाग लपेट के कहा जाये तो धर्म वाकई सबसे बड़ा नियोक्ता और दाता है. निसंदेह इस सच बयानी के लिए इंद्रेश साधुवाद के पात्र हैं पर जाने क्यों वे धर्मस्थलों की अंदर पसरे लेनदेन पर खामोश रह गए. पैसा देने पर अंदर बाहर दोनों जगह आशीर्वाद और दुआएं मिलती हैं फर्क सिर्फ इतना है कि बाहर बाला तिरस्कृत और भीतर बाला स्वीकृत है, बाहर वाले की जात पात किसी को नहीं पता रहती पर अंदर लेने बाले पंडें के बारे में सब जानते हैं कि वह ब्राम्हण ही होता है.

भीख और दक्षिणा के फर्क से मुंह भले ही इंद्रेश चुराएं पर इस सच को वे अस्वीकार नहीं कर सकते कि दक्षिणा या चढ़ावा भी पुश्तैनी रोजगार है फर्क स्तर का है. करोड़ों पंडों के पेट और परिवार इसी से पल रहे हैं और भीख मांगने से तो यह काम लाख गुना बेहतर है. अमित शाह ने नरेंद्र मोदी के मशवरे को विस्तार देते हुए राज्यसभा में यह कहा था कि भीख मांगने से तो बेहतर है कि पकोड़ा बेचा जाये यह कोई शर्म की बात नहीं.  यही बात इंद्रेश कुमार ने भी कही लेकिन वे तो भीख को भी बुरा, छोटा या हिकारत वाला काम नहीं मानते. भाजपा और आरएसएस की मानसिकता का सूक्ष्म अंतर अमित शाह और इंद्रेश कुमार के बयानों से समझ  आता है कि धर्म के नाम पर भीख मांगना कोई हीनता नहीं इस लिहाज से तो करोड़ों पंडों को सम्मानजनक रोजगार मिला हुआ है.

समझ यह भी आता है कि रोजगार के मुद्दे पर भगवा खेमा अपनी बात स्पष्ट कह और कर चुका है कि सत्ता में रहते भाजपा इसके लिए कुछ नहीं करेगी, अब यह लोगों की मर्जी है कि वे पकोड़े तलें या धर्मस्थल पर भीख मांगे. दोनों ही काम छोटे नहीं. बड़ा काम धर्मस्थल के अंदर दक्षिणा समेटने का है और एक जाति विशेष के लिए आरक्षित है जो अक्सर जातिगत आरक्षण पर हाय हाय करती रहती है.

मान लेने में ही भलाई है कि अब देश में कोई समस्या नहीं है, अच्छे दिन आ चुके हैं धर्मस्थलों के बाहर रुपये दो रुपये की भीख के एवज में भगवान से भला करवाने वाले 20 करोड़ भारतीय ही भारत को विश्वगुरु बनवाएंगे जिनके चेहरे पर मेल की खुरचन है, होठों से बहती लार है फूले पेट और बिखरे बाल हैं, दयनीयता से लबरेज ये 20 करोड़ लोग अपने पिछले और इस जन्म के पापों की सजा भुगत रहे हैं. ये दरिद्रनरायण भी पंडों की तरह भक्त और भगवान के बीच की कड़ी हैं. ये जोड़ी और बच्चे सलामत रहें की गुजारिश उस भगवान से दूसरों यानि दाता के लिए करते हैं जिसने इनकी किस्मत में भीख मांगने जैसा गौरवशाली कर्म लिख दिया है. ये तगड़ी दक्षिणा लेकर मोक्ष नहीं दिलवा सकते सिर्फ इसलिए कि ये मंदिर के बाहर हैं और पंडे नहीं हैं.

ये 20 करोड़ अनुत्पादक लोग ही धर्म की श्रेष्ठता और महत्ता स्थापित करते हैं इसलिए इनका बने रहना जरूरी है.

कुछ भीगे अल्फाज : बेहतरीन अभिनय से सजी सुंदर प्रेम कहानी

‘बस एक पल’, ‘आई एम’, ‘शब’ जैसी विचारोत्तेजक फिल्मों के सर्जक ओनीर पहली बार पूर्णरूपेण रोमांटिक फिल्म ‘‘कुछ भीगे अल्फाज’’ लेकर आए हैं. वर्तमान समय में जबकि युवा पीढ़ी पूरी तरह से फेसबुक, ट्वीटर व व्हाट्स अप जैसे सोशल मीडिया की दीवानी है. इस आधुनिक सोशल मीडिया की ही वजह से न सिर्फ दो अजनबी इंसानों की प्रेम कहानी परवान चढ़ती है, बल्कि यह दोनों अपनी कमजोरियों से उबरते हैं.

फिल्म की कहानी के केंद्र में कलकत्ता के एक एफएम रेडियो पर देर रात प्रसारित होने वाला कार्यक्रम ‘‘कुछ भीगे अल्फाज’’ और सोशल मीडिया है. रेडियो के इस कार्यक्रम में रेडियो जौकी अल्फाज (जेन खान दुर्रानी) रोमांटिक कहानियों के साथ रोमांटिक गाने सुनाते हैं. पर वह अपनी असली पहचान हर किसी से छिपाकर रखते हैं. इसी वजह से वह सोशल मीडिया के किसी प्लेटफार्म पर नहीं हैं. उनकी इसी जिद के चलते रेडियो मालिक को भी नुकसान होता है. क्योंकि अल्फाज सामने नहीं आना चाहते.

उधर कलकत्ता की एक विज्ञापन एजेंसी से जुड़ी और अपनी मां के साथ रह रही अर्चना प्रधान (गीतांजली थापा) के चेहरे पर 8 साल की उम्र से ही सफेद दाग/ ल्यूकोडर्मिक है. वह इसी के चलते  हीन भावना से ग्रस्त है. उसे लगता है कि उसे प्यार करने वाला कोई युवक नहीं मिलेगा. इसलिए वह हर दिन ब्लाइंड डेट पर जाती रहती है. सहकर्मी अप्पू (श्रेय तिवारी) से उसकी अच्छी दोस्ती है. वह अल्फाज के कार्यकम्र की बहुत बड़ी फैन है. ब्लाइंड डेट पर जाने के लिए फेसबुक पर उनके नाम चुनकर फोन करती रहती है, जिन्होंने अपने बारे में खुलकर फेसबुक पर बयां नहीं किया है.

एक दिन अर्चना अनजाने में एक गलत नंबर मिला बैठती है, जो कि अल्फाज का है. उसके बाद अल्फाज से वह अक्सर बातें करने लगती है. इधर करियर में उंचाइयां छूने के लिए अर्चना का बनाया हुआ एक जोक अप्पू अपने नाम से मालिक को दे देता है, इस बात से अर्चना को ठेस पहुंचती है और वह नौकरी छोड़ कर घर बैठ जाती है. तब अर्चना अपनी मां के कहने पर वाट्स अप से जुड़ जाती है. अब अर्चना ‘कुछ भीगे अल्फाज’ कार्यक्रम में अल्फाज द्वारा पेश की गयी शायरी को किसी तस्वीर या कोई चेहरा बना कर सोशल मीडिया पर डालना शुरू करती है.

वाटस अप पर वह अल्फाज को भी जोड़ती है. तो अल्फाज तक भी सारी चीजें पहुंचती है. कहानी आगे बढ़ती है. एक दिन अर्चना अपने चेहरे की कमी का जिक्र अल्फाज से कर देती है. अल्फाज उसे समझाता है कि वह निराश न हो, क्योंकि असली प्यार में चेहरे की रंगत नहीं देखी जाती. उसे प्यार करने वाला युवक अवश्य मिलेगा. फिर अर्चना, अल्फाज को ट्राम में मिलने के लिए बुलाती है. दोनों पहुंचते हैं, पर मुलाकात नहीं हो पाती.

एक दिन अर्चना एफएम रेडियो के औफिस जाती है, तो उसे अल्फाज की असलियत पता चल जाती है. तब अल्फाज खुद को गुमनाम रखने की वजह बताते हैं. पता चलता है कि शिमला में कालेज के दिनों में अल्फाज बास्केटबाल खेलते थे. उन्हे अपनी सहपाठी व कालेज में मशहूर एक लड़की से प्यार हो गया था. यह लड़की कालेज में भाषण व निबंध प्रतियोगिता में हिस्सा लेती थी. जब उसे अल्फाज की सबसे ज्यादा जरुरत होती है, उस वक्त अल्फाज खेल के चक्कर में उसका साथ नहीं देते हैं. वह लड़की आत्महत्या कर लेती है.

कालेज का प्रिंसिपल सब कुछ जानते हुए भी अल्फाज के दादाजी के सामने लड़की की मौत के लिए एक वाचमैन पर दोष मढ़ देते हैं. असलियत अल्फाज के दादाजी को भी पता नहीं चलती. पर इस अपराध बोध से ग्रस्त अल्फाज शिमला से कलकत्ता आ जाते हैं और अब अपनी पहचान छिपाकर रहकर रेडियो जाकी के रूप में ऐसी रोमांटिक कहानियां सुनाते हैं, जिससे दो प्रेमियों या पति पत्नी के बीच की दूरी मिट सके.

तब अर्चना, अल्फाज को दर्द से उबरने के लिए प्रेरित करती है. अंत में अर्चना के कहने पर अल्फाज ट्राम में मिलने आते हैं और दोनों की प्रेम कहानी आगे बढ़ जाती है.

अभिषेक चटर्जी लिखित पटकथा पर ओनीर ने रोमांस, सोशल मीडिया, एफएम रेडियो के देर रात के कार्यक्रम, कलकत्ता, कलकत्ता की ट्राम और बारिश का बहुत सुंदर संयोजन किया है. ओनीर ने एक बार फिर साबित किया है कि वह किसी भी विषय पर एक बेहतरीन मनोरंजक फिल्म बना सकते हैं. वैसे तो फिल्म कि गति थोड़ी धीमी है, पर रोमांस का असली मजा भी शायद इसी में है.

बतौर निर्देषक ओनीर ने एक बार फिर साबित किया है कि वह रोमांस को भी परर्दे पर बहुत बेहतर तरीके से पेश कर सकते हैं, उन्होंने तमाम दृश्यों को बहुत बेहतर तरीके से गढ़ा है. फिल्म उदासीन मूड़ से वर्तमान तक को बेहतर ढंग से चित्रित करती है. अभिषेक चटर्जी की पटकथा लेखक के तौर पर पहली फिल्म है. उन्होंने एक अच्छी पटकथा लिखी है. पर यदि इसकी गति थोडी बढ़ जाती, तो अच्छा होता. अर्चना, अल्फाज के कार्यक्रम की फैन है, वह हर दिन अल्फाज का रेडियो कार्यक्रम ध्यान से सुनती है और अल्फाज से भी हर दिन बात करती है, मगर वह अल्फाज की आवाज पहचान नहीं पाती. यह पटकथा लेखक के अलावा निर्देशक की भी सबसे बड़ी चूक है. फिल्म में पुराने गानों को अच्छे ढंग से उपयोग किया गया है. शायरी काफी अच्छी लिखी गयी हैं. कुछ संवाद अच्छे बन पड़े हैं.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो बतौर अभिनेता जेन खान दुर्रानी के करियर की यह पहली फिल्म है. प्यार में चोटिल व अपराध बोध से ग्रसित रेडियो जौकी अल्फाज के जटिल किरदार को काफी अच्छे ढंग से निभाया है. यूं तो वह अपने अंदर के दर्द व अपराध बोध को बेहतर तरीके से पेश कर पाए हैं, अपने दर्द को छिपाकर लोगों को रोमांटिक कहानियां व शायरी सुनाते हुए लोगों को प्रेरित सुनाते हुए शानदार आवाज के रूप में शोहरत बटोरते हैं, पर लंबी रेस का घोड़ा बनने के लिए अभी उन्हें और मेहनत करने की जरूरत है. कई जगह चेहरे के भाव सही ढंग से नहीं उभरते. अर्चना के किरदार में गीतांजली थापा ने कमाल का अभिनय कर पूरी फिल्म को अपनी फिल्म बना लेती हैं.

ल्यूकोड्म से पीड़ित होते हुए भी अपने दर्द को छिपाकर जिस तरह से वह एक सामान्य लड़की के रूप आती हैं, वह कमाल का अभिनय है. फिल्म खत्म होते होते दर्शकों के दिलो दिमाग पर गीतांजली थापा अपनी छाप छोड़ जाती हैं. अप्पू के किरदार में श्रेय तिवारी भी ठीक ठाक हैं.

कुल मिलाकर यह एक ऐसी प्रेम कहानी है, जिसे अवश्य देखना चाहिए. विक्रम मेहरा और सिद्धार्थ आनंद कुमार द्वारा ‘सारेगामा’ व ‘यूडली फिल्मस’ के बैनर तले निर्मित फिल्म ‘‘कुछ भीगे अल्फाज’’ के लेखक अभिषेक चटर्जी, निर्देशक ओनीर, संगीतकार शाश्वत श्रीवास्तव, कैमरामैन नुसरत एफ जाफरी तथा कलाकार हैं – गीतांजली थापा, जेन खान दुर्रानी, श्रेय तिवारी, मोना अंबेगांवकर, चंद्रेय घोष, सौरव दास, साहेब भट्टाचरजी, शंखू करमरकर व अन्य.

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कासगंज का कलंक : कासगंज के दंगे को धर्म व राष्ट्र से न जोड़ें

कासगंज के दंगों को ले कर बरेली के डीएम से ले कर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने जो कहा वह सच है.  राज्यपाल ने कासगंज के दंगों को कलंक कहा. डीएम के खिलाफ सत्ता से ले कर कट्टरवादी संगठनों तक ने मोरचा खोल दिया पर राज्यपाल की बात पर वे चुप्पी साध गए. देखा जाए तो उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की टिप्पणी कुछ वैसी ही है जैसी गुजरात में हुए दंगों के समय भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने तब के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को राजधर्म का पालन करने का संदेश दिया था.

भाजपा के लोग डीएम की टिप्पणी को ले कर मुखर हैं, जबकि सांसद राजवीर सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति और विनय कटियार के बयानों पर चुप्पी साधे रहे. कासगंज में हुए हादसे को राष्ट्रधर्म से जोड़ कर जिस तरह से प्रचारित किया गया उस से भावनाओं को भड़काने में मदद मिली. जिस का खमियाजा अकरम जैसे तमाम लोगों को भुगतना पड़ा.

लखीमपुर में रहने वाले अकरम की पत्नी अलीगढ़ में रहती थी. उस की पत्नी को बच्चा होने वाला था. अकरम कार से अलीगढ़ जा रहा था. कासगंज हाईवे पर दंगाइयों ने अकरम की कार को घेर लिया और तोड़फोड़ शुरू कर दी. अकरम को खूब मारापीटा. जैसेतैसे वह चोट लगने के बाद अस्पताल पंहुचा तो पता चला कि उस की दाहिनी आंख की रोशनी चली गई है. ऐसे लोगों की संख्या बहुत सारी है. कितने ही बेगुनाह लोगों से मारपीट कर उन की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया.

कासगंज की घटना को सांप्रदायिक रंग दे कर वोटबैंक की राजनीति करने से पूरे समाज को नुकसान हो रहा है. देशप्रेम के प्रदर्शन में जोरजबरदस्ती का कोई स्थान नहीं होना चाहिए. ‘तिरंगा यात्रा’ के दौरान कार्यकर्ताओं का रंगढंग मुसलिम महल्ले के लोगों को रास नहीं आया. छोटी सी यह घटना दंगे में बदल कर कासगंज का कंलक बन गई.

कासगंज उत्तर प्रदेश का एक छोटा सा जिला है. 2 हजार किलोमीटर वाले कासगंज में मिश्रित आबादी है. 2011 की जनगणना के अनुसार यहां पर 66 फीसदी हिंदू और 32 फीसदी मुसलिम आबादी है. कासगंज शहर में रहने वाले लोग ज्यादातर कारोबारी हैं. गांव में रहने वाले लोग खेतीकिसानी पर आश्रित हैं. गंगा नदी का कछला खेती के लिए प्रयोग किया जाता है. बलुई मिटटी होने के कारण यहां खेती में आलू, तरबूजजैसी फसलें ज्यादा होती हैं.

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कासगंज फरूखाबाद और बरेली के करीब स्थित है. उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से यह सीधे रास्ते पर नहीं है. कानपुर से फरूखाबाद हो कर वहां पहुंचना होता है. देश की राजधानी दिल्ली से यह सीधे मार्ग से जुड़ा है. सड़क और रेलमार्ग दोनों से कासगंज पहुंचा जा सकता है. कासगंज स्टेट हाईवे 33 पर बसा है. लोकल बोली में इस को मथुराबरेली हाईवे कहते हैं.

कासगंज के आमापुर में सुशील गुप्ता का परिवार रहता है. इन का घर गली के अंदर है. सुशील गुप्ता के परिवार में पत्नी संगीता गुप्ता और बेटी वंदना सहित 22 साल का बेटा अभिषेक गुप्ता रहता था. सुशील गुप्ता का अपना बिजनैस है. बेटा अभिषेक उर्फ चंदन गुप्ता ‘संकल्प’ नाम की संस्था चलाता था. वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ा हुआ था. वह हिंदूवादी विचारधारा का प्रबल समर्थक था. उस की संस्था में 20 से 30 युवा सक्रिय रूप में जुडे़ थे. ये सभी शहर में तमाम तरह की सामाजिक गतिविधियां चलाते थे.

26 जनवरी को चंदन गुप्ता और उस के साथियों ने मोटरसाइकिल से तिरंगा यात्रा निकालने का संकल्प लिया. शुक्रवार को दिन में करीब 10 बजे चंदन गुप्ता और उस के साथ कुछ युवकों ने हिंदूवादी संगठनों के साथ तिरंगा यात्रा निकालनी शुरू की. ये लोग पूरे कासगंज में तिरंगा यात्रा निकालना चाहते थे. सरकार पर प्रभाव होने के कारण तिरंगा यात्रा निकालने के लिए प्रशासन से अनुमति लेने की जरूरत नहीं समझी गई.

आग में घी बनी तिरंगा यात्रा

हिंदूवादी संगठनों ने जिला प्रशासन से तिरंगा यात्रा निकालने की अनुमति नहीं ली थी. असल में इस अनुमति न लेने के पीछे जिले में फैला तनाव था. कासगंज में ही चामुंडा मंदिर है. यहां पर बैरीकेटिंग लगाने को ले कर 22 जनवरी से विवाद चल रहा था. जिस के चलते दोनों पक्षों में तनाव बढ़ा हुआ था.

कासगंज जिला प्रशासन ने इस तनाव को गंभीरता से नहीं लिया. ऐसे में जब 26 जनवरी को 40 से 50 मोटरसाइकिलों के साथ तिरंगा यात्रा निकली और यात्रा में शामिल लोगों द्वारा भड़काऊ नारे लगाए गए तो बडुनगर में दूसरे पक्ष के साथ तकरार शुरू हो गई. तकरार के कारणों पर अलगअलग लोगों की अलगअलग बातें हैं. कुछ लोगों का कहना है कि तिरंगा यात्रा में शामिल युवकों की नारेबाजी को ले कर विवाद हुआ. पथराव के बाद तिरंगा यात्रा वाले लोग वापस चले गए.

बडुनगर महल्ले से 500 मीटर दूर जा कर ये लोग रुक गए और वहां से आधे घंटे के बाद वापस आए. इस बार ये 20-25 लोग थे. नारेबाजी करते इन युवकों पर हमला शुरू हो गया, जिस में चंदन के कंधे पर और नौशाद नामक युवक के पैर में गोली लगी. चंदन की अस्पताल ले जाते समय मौत होगई. इस खबर के फैलते ही माहौल गरम हो गया. पूरे कासगंज और हाईवे पर आगजनी, तोड़फोड़ और हिंसा की घटनाएं होने लगीं.

कासगंज के रहने वाले लोग बताते हैं कि यहां पर इस से पहले कभी भी ऐसा भयंकर दंगा नहीं हुआ था. राममंदिर आंदोलन के दौरान भी ऐसी हिंसक घटनाएं नहीं घटी थीं. यहां के लोग 25 साल के इतिहास में इस को सब से बड़ा दंगा मानते हैं. चंदन के पोस्टमौर्टम से पता चला कि गोली कंधे की तरफ से लगी थी. यह शरीर में धंस गई. किडनी में यह धंसी मिली. जिस से साफ लगा कि गोली छत जैसी किसी जगह से मारी गई थी.

कासगंज दंगों को ले कर 2 मुकदमे लिखे गए. पहला मुकदमा इंस्पैक्टर कासगंज की तरफ से आईपीसी की धारा 147/148/149/307/336/436/295/427/323/504/ व 7 सीएल एक्ट के तहत

4 नामजद और करीब 150 अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज कराया गया. दूसरा मुकदमा, फायरिंग में मारे गए चंदन गुप्ता के पिता सुशील गुप्ता की तरफ से आईपीसी की धारा 147/148/149/

341/ 336/307/302/504/506/12 ए व राष्ट्रीय ध्वज अधिनियम के तहत दर्ज कराया गया. चंदन की हत्या में वसीम नामक युवक का नाम आया जो समाजवादी पार्टी से जुड़ा माना जा रहा है. वसीम के पिता भी बिजनैसमैन हैं.

आवाज को दबाने की कोशिश

कासगंज के पड़ोसी बरेली जिले के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने फेसबुक पर अपना दर्द बयान करते हुए सामाजिक संदेश में लिखा, ‘अजीब रिवाज बन गया है, पहले मुसलिम महल्ले में पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाते घुस जाओ. क्या वे पाकिस्तानी हैं. ऐसा बरेली के अलीगंज खैलम में हुआ. इस के बाद मुकदमे कायम हुए.’ डीएम बरेली का यह संदेश कट्टरपंथियों को रास नहीं आया. सत्ता पक्ष से ले कर कट्टरवादी हिंदू संगठनों तक ने इस का विरोध करना शुरू कर दिया. ऐसे में मजबूर हो कर डीएम बरेली को फेसबुक से अपना संदेश हटाना पड़ा. संदेश हटाने पर तर्क देते डीएम बरेली ने लिखा, ‘हमारा संदेश हिंदूमुसलिम एकता के लिए था जिस से कि तनाव कम हो सके. इस को सही तरह से समझा नहीं गया.’

हालांकि जो बात बरेली के डीएम राघवेंद्र विक्रम सिंह ने कही, उस से कहीं कठोर शब्दों में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाइक ने कही. उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने कासगंज के दंगे को कलंक बताया. राज्यपाल खुद भाजपा के हैं. ऐसे में कटट्रवादी संगठन उन का विरोध नहीं कर पाए. हर बार की तरह कासगंज में भी सत्ता और विपक्ष ने अपनीअपनी राजनीतिक रोटियां सेंकीं. राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए जुलूस निकाल कर लोगों को उकसाने का काम बारबार होता है. प्रशासन कुछ दिनों के बाद सबकुछ भूल जाता है. इस तरह की घटनाओं में शामिल युवकों को यह देखनासमझना चाहिए.

कासगंज में मारे गए चंदन गुप्ता के मातापिता और बहन सप्ताह बाद तक भी सोचनेसमझने की हालत में नहीं हैं. मां संगीता गुप्ता को यकीन ही नहीं हो रहा है कि चंदन नहीं रहा. वह अपने आंचल में वही तिरंगा दबाए है जो अंतिम समय चंदन के साथ था. बहन वंदना ने पिता से साफ कह दिया है कि अगर वे सरकारी सहायता के 25 लाख रुपए लेंगे तो वह आत्महत्या कर लेगी.

चंदन की तरह तमाम युवक धार्मिक प्रचार में झोंक दिए जाते हैं. जो धर्म के नाम पर दोनों समुदायों की तरफ से जीनेमरने को तैयार होते हैं. ऐसे युवकों को समझना चाहिए कि धर्म की घुट्टी अफीम के नशे से कम नहीं होती है. चंदन गुप्ता के परिवार के साथ दिख रही लोगों की संवेदनाएं धीरेधीरे खत्म हो जाएंगी लेकिन उस का परिवार वर्षों उस की याद में अंदर ही अंदर सुलगता रहेगा.

पुलिस प्रशासन की लापरवाही

1992 और उस के बाद 1994 में कासंगज सांप्रदायिक तनाव की वजह से तोड़फोड़ और आगजनी हुई थी.  2010 में तहसील परिसर में प्रशासन द्वारा एक  मंदिर के तोडे़ जाने से तनाव फैला था. तिरंगा यात्रा का तनाव इन सब पर भारी पड़ गया. इस की वजह चामुंडा मंदिर में भड़का विवाद था. विवाद की यह आग अंदर ही अंदर सुलग रही थी. पुलिस और प्रशासन इस की लपटों को समझने में असफल रहे. दोनों ही पक्ष किसी न किसी अवसर की तलाश में थे. चामुंडा मंदिर विवाद का गुस्सा तिरंगा यात्रा में खुल कर बाहर आ गया. अगर जिला प्रशासन ने चामुंडा मंदिर विवाद को देखते हुए सतर्कता बरती होती तो तिरंगा यात्रा में हिंसक वारदात न होती.

तिरंगा यात्रा में चंदन गुप्ता की मौत के बाद भड़काऊ राजनीति का दूसरा दौर चल पड़ा. जिस के तहत चंदन गुप्ता के शरीर को तिरंगे से लपेटा गया. सोशल मीडिया पर इस को वायरल किया गया. 26 जनवरी को अखबारों के औफिस बंद होते हैं. ऐसे में कासगंज और बाहर के लोगों को इस समाचार के बारे में सोशल मीडिया व खबरिया चैनलों से खबरें मिलनी शुरू हुईं.

इन में तमाम खबरें बिना किसी आधार के प्रसारित हो रही थीं.  जिला प्रशासन ने सोशल मीडिया पर देर से काबू किया. तब तक आग भड़क चुकी थी. खबरिया चैनलों ने भी अपने हिसाब से खबरों को दिखाना शुरू किया. सब से अहम बात यह थी कि हर निष्पक्ष खबर या संदेश को राष्ट्रवादी विचारधारा के खिलाफ जोड़ दिया गया. इन में कासगंज गए मीडियाकर्मियों से ले कर प्रशासनिक अधिकारियों के सोशल मीडिया पर दिए गए संदेश तक शामिल हैं.

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धार्मिक कर्मकांड : गुमराह करता अद्वैतवाद

दर्शनशास्त्र में स्नातकोत्तर होने के नाते मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस विषय में दिलचस्पी स्वाभाविक बात है लेकिन इस का प्रदर्शन बीते 2 सालों से जिस तरह से वे कर रहे हैं वह प्रदेश को सिर्फ बरबाद कर रहा है.

साल 2005 से ले कर 2014 तक शिवराज सिंह की लोकप्रियता किसी सुबूत की मुहताज नहीं थी, क्योंकि इस वक्त तक वे धार्मिक पाखंडों को व्यक्तिगत स्तर तक सीमित रखते थे लेकिन 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो धर्म का दर्शन उन के सिर इस तरह चढ़ कर बोलने लगा कि तब से ले कर अब तक का अधिकांश वक्त उन्होंने धार्मिक यात्राओं व समारोहों में जाया किया.

भाजपाई और हिंदूवादियों का धर्मप्रेम आएदिन तरहतरह से उजागर होता रहता है. इस के बिना उन्हें सत्ता और जीवन व्यर्थ लगने लगते हैं.

शिवराज सिंह चौहान ने धर्म को सीधे पाखंडों और कर्मकांडों के जरिए कम थोपा इस के बजाए यह कहना सटीक साबित होगा कि उन्होंने दर्शनशास्त्र और पर्यावरण जैसे गंभीर मुद्दों की ओट ले कर धर्म को अभिजात्य तरीके से थोपने की कोशिश की और ऐसी उम्मीद है कि पूरे चुनावी साल वे यही करते रहेेंगे.

इस के पीछे उन का मकसद सिर्फ यह है कि जनता बहुत बड़े पैमाने पर सूबे की बदहाली के बाबत सवालजवाब न करने लगे कि बेरोजगारी क्यों बढ़ रही है, राज्य बिकने की हद तक कर्ज में क्यों डूबा है, प्रदेशभर में अपराधों का ग्राफ तेजी से क्यों बढ़ा है और किसान क्यों आत्महत्याएं कर व आंदोलनों के जरिए अपना दुखड़ा रो रहे हैं.

एकात्म यात्रा ने दिए जवाब

22 जनवरी को मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में आदि शंकराचार्य की 108 फुट की मूर्ति की स्थापना के साथ धूमधड़ाके वाली 22 दिवसीय एकात्म यात्रा आखिरकार  समाप्त हो गई.

यह एकात्म यात्रा वाकई अद्भुत थी जो राज्य के चारों कोनों से शुरू हुई थी और इस का हर जगह सरकारी स्तर पर सरकारी पैसे से स्वागत किया गया. जगहजगह कलैक्टरों और विधायकों ने आदि शंकराचार्य की जूतियां, जिन्हें चरण पादुकाएं कहा गया, सिर पर ढो कर एक नए किस्म के पाखंड का प्रदर्शन किया तो उन की हीनता व मानसिक दरिद्रता पर तरस आना स्वाभाविक बात थी.

अधिकारी और जनप्रतिनिधि जनता के काम करने और उन की समस्याएं हल करने के लिए होते हैं या फिर किसी धर्मविशेष के गुरु की पादुकाएं सिर पर ढोने के लिए, इस सवाल का जवाब भी जनता न चाहने लगे, इसलिए शिवराज सिंह ने चालाकी दिखाते जगहजगह शंकराचार्य के अद्वैतवाद का राग अलापा जिस का अनुसरण जनप्रतिनिधियों और अफसरों ने भी अपना फर्ज समझ कर किया.

यह अद्वैतवाद आखिर क्या बला है और क्यों इस की जरूरत आ पड़ी, यह समझनेसमझाने की किसी ने जरूरत नहीं समझी, तो स्पष्ट हो गया कि अब लोग अपनी परेशानियां भूल इस नए सम्मोहक दर्शन में खोए अपनी जिज्ञासाओं के जवाब ढूंढ़ते रहेंगे. ईश्वर साकार है या निराकार, यह सवाल सदियों से उत्सुकता से पूछा जाता रहा है पर यह कोई नहीं पूछता कि ईश्वर आखिर कहीं है भी कि नहीं, कहीं वह कोरी गप तो नहीं जिसे सच साबित करने के लिए तथाकथित विद्वान और धर्म के दुकानदार सदियों से तरहतरह की बातें करते रहे हैं.

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कोई शासक नहीं चाहता कि प्रजा नास्तिक या अनीश्वरवादी हो कर तर्क करने लगे, इसलिए भगवान में भरोसा बनाए रखने के लिए तरहतरह के स्वांग रचते रहते हैं. लोकतंत्र इस परंपरा का अपवाद नहीं है. एकात्म यात्रा के समापन पर शिवराज सिंह चौहान ने अद्वैत दर्शन का सार बांच दिया कि विश्व शांति का मार्ग युद्ध में नहीं है, बल्कि आदि शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन में है.

बकौल शिवराज सिंह चौहान, अद्वैत दर्शन मानता है कि संपूर्ण प्रकृति और प्राणियों में एक ही चेतना है और राजनीति लोगों को तोड़ती है जबकि धर्म जोड़ता है.

विरोधाभासी दर्शन

सुनने वालों ने इस फिलौसफी को हाजमे के चूर्ण की तरह फांक लिया और यह भी आत्मसात कर लिया कि एकात्म यात्रा कोई मामूली यात्रा नहीं है जिस में राज्य की 23 हजार ग्राम पंचायतों से 30 हजार कलश आए जिन में मिट्टी और धातुएं थीं.

राजनीति अगर तोड़ती है तो फिर क्यों अद्वैत के पैरोकार शिवराज सिंह चौहान राजनीति करते हैं, यानी तोड़ने का गुनाह करते हैं, इस सवाल का जवाब शायद ही शिवराज ईमानदारी से दे पाएं. रही बात एक चेतना की, तो वह निहायत ही फुजूल की बात है जिस का देशप्रदेश की समस्याओं से कोई वास्ता नहीं.

एकात्म यात्रा के नाम पर हुआ सिर्फ इतना है कि ओंकारेश्वर में एक अवतार आदि शंकराचार्य का मठ बन गया है जहां कुछ साल बाद लोग जा कर पैसा चढ़ाएंगे, मन्नतें मांगेंगे और पूजापाठ करेंगे.

मुट्ठीभर बुद्धिजीवी, जो खुद को मुख्यधारा मानते हैं, धर्म और अद्वैतवाद ब्रैंड अफीम का सेवन करते बहस करते रहेंगे कि यह चेतना ही दरअसल, आत्मा है जो मृत्यु के बाद शरीर का साथ छोड़ देती है और फिर ऊपर आकाश की तरफ 84 लाख योनियों की परिक्रमा के बाद नया शरीर ढूंढ़ने लगती है. पुराना शरीर पंचतत्त्व में विलीन हो जाता है जिस के बाबत तुलसीदास ने कहा भी है कि क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंचतत्त्व मिल बना शरीरा.

वैसे भी यह एकात्म यात्रा उन जाहिलों के लिए नहीं थी जो ईश्वर को वैज्ञानिक स्तर पर समझने की कोशिश नहीं कर पाते. यह यात्रा उन ब्राह्मण विद्वानों को खुश करने के लिए थी जो वर्णव्यवस्था और मनुवाद में यकीन करते हैं. खुद आदि शंकराचार्य ब्राह्मण थे और उन का इकलौता मकसद देशभर के ब्राह्मणों को एक वैचारिक मंच के नीचे लाना था कि आपस में लड़ोगे तो रोजीरोटी चली जाएगी. लोग तेजी से नास्तिक हो रहे हैं, उन्हें रोकने के लिए जरूरी है कि ब्राह्मण आपसी विवादों को त्यागें और इस बाबत उन्होंने चारों कोनों में मठ बना कर मठाधीश भी नियुक्त कर दिए थे.

चारों पीठों के शंकराचार्य आज भी धर्मध्वज फहराते शानोशौकत की जिंदगी जी रहे हैं. ये महामानव पैदावार नहीं बढ़ाते, रोजगार के मौके मुहैया नहीं कराते और लेशमात्र भी मेहनत नहीं करते.

परेशान है तो आम जनता जो अपनी समस्याओं का हल धर्म में ढूंढ़ने की गलती दोहरा रही है. देशप्रदेश के बुद्धिजीवियों ने यह नहीं सोचा कि एकात्म जैसी धार्मिक यात्राओं पर करोड़ों रुपए फूंके जाते हैं जो जनता के हैं और क्या सरकार को उसे इस तरह बरबाद करने का हक है.

साजिश की देन हैं समस्याएं

धर्म और राजनीति दोनों एकदूसरे को ताकत देते हैं. राजा के जरिए धर्म के दुकानदार धर्म को तरहतरह से थोपते हैं जिस से वह आसानी से धार्मिक खर्चों की भरपाई करने के लिए टैक्स लगा सके और उस में से उन का हिस्सा उन्हें चढ़ावे की शक्ल में मिलता रहे. राजा का स्वार्थ यह रहता है कि लोग तंगहाली और बदहाली में जीने के बाद भी उसे सत्ता में बनाए रखें. हजारों सालों से यह षड्यंत्रकारी व्यवस्था ही लोगों को जीवनचक्र और मृत्यु के बाद क्या, जैसे फुजूल के सवालों में उलझाए रखे हुए है.

महंगाई, बेरोजगारी और बढ़ते अपराध जैसी समस्याएं इसी साजिश की देन हैं जिन से घबराए लोग इन्हीं मठमंदिरों में जा कर त्राहिमामत्राहिमाम करते हैं और तथाकथित भगवान से गुहार लगाते हैं कि हे प्रभु, बचाओ.

अब प्रभु कहीं हो, तो कुछ करे या बचाए. लेकिन राजा और पंडे बेफिक्र रहते हैं कि सबकुछ ठीकठाक चल रहा है–लोग मंदिर जा रहे हैं, पूजाअर्चना कर रहे हैं, दानदक्षिणा दे रहे हैं और थोड़े बहुत विरोध व असहमति के बाद भी सबकुछ ठीकठाक है. लोकतंत्र इस का अपवाद नहीं है, यह एक बार फिर मध्य प्रदेश सरकार की एकात्मक यात्रा से साबित हो गया है जिस के तहत मुमकिन है कुछ सालों बाद कोई मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री चार्वाक दर्शन को जीवन का सार बताते हुए देश को बेच डाले.

हालांकि चिंता की बात ऐसा शुरू हो जाना भी है. उदाहरण मध्य प्रदेश का ही लें, तो एकात्मक यात्रा के 2 दिनों बाद ही मध्य प्रदेश सरकार को यह फैसला लेने की पहल करनी पड़ी कि क्यों न सरकारी जमीनें बेच कर खजाना भरा जाए. कंगाल होते सूबे की दयनीय हालत किसी

सुबूत की मुहताज नहीं रही जो किसी द्वैतअद्वैतवाद से तो हल होने से रही. जब राज्य का मुखिया ही अधिकांश वक्त पूजापाठ और धार्मिक यात्राओं में गुजारे तोे क्या खा कर राज्यवासियों से यह उम्मीद रखी जाए कि वे उत्पादन बढ़ाने के लिए कोई कोशिश या मेहनत करेंगे.

रही बात एकात्म यात्रा के नायक शिवराज सिंह चौहान की, तो साफसाफ दिख रहा है कि वे अपना बढ़ता विरोध और बिगड़ती छवि देख घबराने लगे हैं, इसलिए ज्यादा से ज्यादा वक्त वे धर्म व भगवान की शरण में बिता रहे हैं और सपत्नीक प्रार्थना करते रहते हैं कि हे प्रभु, इस बार भी नैया पार लगा देना. यह एहसास उन्हें है कि नीचे वाले प्रभु यानी जनता उन्हें तभी चुनेगी जब वह वास्तविकताओं से मुंह मोड़े, रामराम करती रहेगी, इसलिए उस का ध्यान द्वैतअद्वैत जहां भी हो, की तरफ मोड़े रखने में ही फायदा है.

थप्पड़ से कतराता मीडिया

अखबारों की हालत आज घर के किसी कोने में पड़े उपेक्षित बुजुर्गों सरीखी हो चली है, जो होते हुए भी नहीं होते. आमतौर पर अब लोग अखबार पर यों ही सरसरी नजर डाल मान लेते हैं कि आज के ढाईतीन रुपए वसूल हो गए. लेकिन मध्य प्रदेश के लोग कुछ दिनों से पूरा अखबार खोल कर इस उम्मीद के साथ पढ़ते रहे कि शायद किसी कोने में यह खबर दिख जाए कि धार के सरदारपुर कसबे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आपा खोते एक सुरक्षाकर्मी कुलदीप सिंह गुर्जर को जोरदार थप्पड़ जड़ दिया.

खबर धांसू थी लेकिन सोशल मीडिया के दायरे में सिमट कर रह गई. एकाध न्यूज चैनल ने एकाध बार ही इसे दिखाया, फिर यह गधे के सिर से सींग की तरह गायब होने वाली कहावत को चरितार्थ करने वाली हो गई. इधर लोगों ने अखबार टटोले, पर किसी ने इसे नहीं छापा.

खुद शिवराज सिंह को हैरानी और खुशी हो रही होगी कि बात तो बात, बेबात में भी तिल का ताड़ बना देने वाला मीडिया उन का कितना लिहाज और सम्मान करता है. इधर प्रदेशभर में गुर्जर समाज के लोगों ने आहत होते इस ऐतिहासिक हो चले थप्पड़ के विरोध में न केवल धरनेप्रदर्शन किए, बल्कि शिवराज सिंह का पुतला भी फूंका, लेकिन मीडिया के मुंह में मानो गुड़ भरा है, जो इस खबर को खबर मानने को तैयार ही नहीं हुआ.

अब कहने वाले कहते रहें कि मीडिया बिकाऊ है या मैनेज कर लिया गया है, पर इस से शिवराज सिंह के अदब व रसूख की टीआरपी नहीं गिर रही. उलटे और बढ़ रही है. गोया कि एक अदने से मुलाजिम का कोई स्वाभिमान ही नहीं होता और सीएम से पिटना जिल्लत या जलालत की नहीं, बल्कि फख्र की बात होती है. लोकतंत्र के इस अलिखित उसूल का ही प्रताप इसे कहा जाएगा कि सरकारी विज्ञापनों के एहसान तले दबा मीडिया इस थप्पड़ पर इस तरह खामोश है जैसे अगर इस पर कुछ बोला, लिखा या दिखाया तो अगला थप्पड़ उस के ही गाल पर पड़ना है.

अब भला कौन किस मुंह से कहने का साहस रखता है कि देश में इमरजैंसी सरीखे हालात हैं और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का गला घोंटा जा रहा है. कल को हुक्मरान अगर खुलेआम गुंडागर्दी पर भी उतारू हो आएं, तो यकीन मानें किसी के पेट में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसी मरोड़ नहीं उठेगी, अब डर तो इस बात का सताने लगा है कि कहीं इस को, यानी मुलाजिमों की सरेआम पिटाई को, सर्विस बुक में शामिल न कर लिया जाए.

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अंधविश्वास : बाबागिरी का गोरखधंधा, मीडिया भी है जिम्मेदार

  • ‘बाबा की ऐयाशी का अड्डा’
  • ‘गुफा का रहस्य’
  • ‘दत्तक पुत्री का सच’

आजकल लगभग हर न्यूज चैनल ऐसी कितनी ही कहानियां और गुफा के आभासी वीडियो दिखा कर लोगों को भ्रमित कर रहा है.

सवाल उठता है कि खोजी मीडिया चैनल्स इतने सालों से कहां थे? न तो बाबा नए हैं, न ही गुफाएं रातोंरात बन गई हैं. फिर यह कैसी दबंग पत्रकारिता है जो अब तक सो रही थी. अब बाबाओं के जेल जाते ही यह मुखरित होने लगी है.

इन स्वार्थी और अवसरवादी चैनलों पर भी जानबूझ कर जुर्म छिपाने का आरोप लगना चाहिए, क्योंकि ये दावा करते हैं कि–देशदुनिया की खबर सब से पहले, आप को रखे सब से आगे… वगैरहवगैरह.

किसी भी बाबा का मामला उजागर होते ही सारा इलैक्ट्रौनिक मीडिया एक सुर में अलापना शुरू कर देता है कि लोग इतने अंधविश्वासी कैसे हो गए?

चैनल्स राशिफल, बाबाओं के प्रवचन, तथाकथित राधे मां या कृष्णबिहारी का रंगारंग शो, प्यासी चुडै़ल, नागिन का बदला, कंचना, स्वर्गनरक, शनिदेव जैसे तमाम अंधविश्वासों पर आधारित कार्यक्रम दिनरात चला कर लोगों के दिमाग में कूड़ा भरते हैं और बेशर्म बन कर टीवी पर चोटी कटवा जैसे मुद्दे पर डिबेट करवाते हैं. फिर पूछते हैं कि लोग अंधविश्वासी कैसे बन गए.

society

अगर सच में आप जनता को सचाई दिखाना चाहते हैं तो अपने जमीर को जिंदा कर दिखाएं. गरीबी से जूझ रहे लोगों, बढ़ती बेरोजगारी, रोजाना बढ़ रही महंगाई, अस्पतालों की अवस्था, डाकू बने डाक्टरों, जगहजगह पड़े कचरे के ढेरों, भ्रष्टाचार में लिप्त सरकारी तंत्रों की जमीनी हकीकत और निष्पक्ष जांच न्याय प्रणालियों को दिखाओ. तब जा कर नए भारत का सपना कुछ हद तक सही हो सकता है.

पिछले दिनों एक दैनिक अखबार के मुखपृष्ठ पर एक विज्ञापन छपा था. अखबार के एक ही एडिशन में उस के छपने की कीमत कम से कम डेढ़दो लाख रुपए तो होगी ही. ऐसे न जाने कितने एडिशनों में यह विज्ञापन छपा था.

समझ में यह नहीं आता कि इतने महान बाबाओं के समागमों और प्रवचनों के बावजूद देश में असमानता, हिंसक वारदातें, अपराध लगातार बढ़ते जा रहे हैं. यही न कि धर्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाते रहो और अपनी दुकान चलाते रहो.

विज्ञापन में यह दावा भी किया गया कि इस कथित ब्रह्मांडरत्न को साक्षात श्रीहरि ने देवराज इंद्र को प्रदान किया था.

कहते हैं कि जिस देश की प्रजा जैसी होती है, उसे वैसा ही राजा मिल जाता है. इस में कमी हम भारतीयों की भी नहीं है. किसी गरीब को 10 रुपए मेहनत के देने हों तो उसे पाठ पढ़ा देंगे, लेकिन मंदिरमसजिदों में, बाबाजी के समागमों में हजारों खर्च कर देंगे.

मीडिया भी है जिम्मेदार

आध्यात्मिक या धार्मिक पोंगापंथ फैलाने वाले चैनल्स व समाचारपत्र बाबाओं की एक ऐसी फौज खड़ी कर रहे हैं जो देश में धर्म के नाम पर लूटखसोट मचा रही है. लगातार बढ़ रही इन की फेहरिस्त और इन पर हर रोज चलने वाले बाबाओं के प्रवचनों में आध्यात्म के नाम पर लोगों को उल्लू बनाया जा रहा है.

धर्मभीरू जनता का जितना शोषण धार्मिकता का लबादा ओढ़े इन बाबाओं ने किया है, उस में चैनलों और समाचारपत्रों का भी बराबर या उस से भी ज्यादा हाथ है. चैनल अपने फायदे को कैश करने के लिए बाबाओं को बराबर पब्लिसिटी और एंकर तक मुहैया करवा कर उन का तथाकथित धार्मिक सामान बेचने का औफर दे रहे हैं.

पाखंडी बाबा किसी भी तरह से अपनी जेबें भरने में जुटे हुए हैं. इन की प्रौपर्टी और बैंकबैलेंस का मुकाबला कुबेरपति भी नहीं कर सकते. भक्तों के बीच ये ऐसे महात्मा हैं जिन का माहात्म्य विवादों में उलझ कर रह गया है. ये मोहमाया छोड़ने का आह्वान करते हैं जबकि वे खुद गले तक मोह और माया में जकड़े हुए हैं.

VIDEO : अगर प्रमोशन देने के लिए बौस करे “सैक्स” की मांग तो…

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