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Box Office : सलमान की ‘सिकंदर’ ने किया निराश, रद्द करने पड़े शो

Box Office : बौलीवुड के भाईजान सलमान खान का दमखम भी काम न आया और इस बार भी बौलीवुड बौक्स औफिस पर कुछ खास कमाल नहीं कर पाया. क्या रहा ‘सिकंदर’ का हाल, जानिए.

मार्च माह के चौथे सप्ताह की शुरूआत 27 मार्च से हुई, जब पृथ्वीराज सुकुमारन निर्देशित, मोहनलाल और पृथ्वीराज के अभिनय से सजी मलयालम फिल्म ‘लूसी 2 इम्पूरन’ मलयालम के साथ ही हिंदी में भी डब हो कर रिलीज हुई. फिर 30 मार्च, गुड़ी परवा के दिन सलमान खान के अभिनय से सजी साजिद नाड़ियादवाला निर्मित और ए आर मुरूगादास निर्देशित फिल्म ‘सिकंदर’ रिलीज हुई. पर अफसोस इन दोनों ही फिल्मों को दर्शकों ने सिरे से नकार दिया.

सब से पहले बात हिंदी फिल्म ‘सिकंदर’ की. पिछले कुछ समय से बौलीवुड के अंदर एक डर सा बैठ गया है कि बिना दक्षिण की मदद के हिंदी फिल्म बनाने पर सफलता हासिल नहीं हो सकती. इसी वजह से पिछले लंबे समय से असफलता का दंश झेल रहे अभिनेता सलमान खान ने ‘किसी का भाई किसी की जान’ से सबक सीखते हुए दो साल बाद परदे पर वापसी करते हुए फिल्म ‘सिकंदर’ में दक्षिण के निर्देशक ए आर मुरूगादास के साथ ही फिल्म ‘पुष्पा 2’ फेम दक्षिण की अभिनेत्री रश्मिका मंदाना और विलेन के किरदार में दक्षिण के अभिनेता सत्यराज को जोड़ा. निर्देशक ए आर मुरूगादास ने अपनी 2018 की असफल तमिल फिल्म ‘सरकार’ की ही कहानी को कुछ बदलाव के साथ ‘सिकंदर’ में पेश कर दी. ए आर मुरुगादास ने कहानी में जो बदलाव किया, वह बदलाव करते हुए सलमान खान के इशारे पर अपनी ‘बीइंग ह्यूमन’ का ही प्रचार वाले दृश्य जोड़ दिए. यह काम सलमान खान ने फिल्म ‘भारत’ के अलावा ‘राधे’, ‘जय हो’, ‘किसी का भाई किसी की जान’ में भी कर चुके थे. पर इस बार फिल्म बहुत घटिया बनी. ट्रेलर लांच पर निर्माता ने फिल्म का बजट 400 करोड़ रुपए बताया था. हिंदू पर्व गुड़ी परवा और मुस्लिम के ईद का फायदा उठाने के मकसद से फिल्म को शुक्रवार की बजाय रविवार, 30 मार्च को एक साथ पूरे देश के 5500 सिनेमाघरों के 22 हजार शो के साथ रिलीज किया गया. पहले ही दिन मुंबई सहित कई शहरों में इस फिल्म के कुछ शो रद्द हो गए. क्योंकि दर्शक नहीं थे. 22 हजार शो यदि हाउस फुल होते तो पहले ही दिन करीबन 125 करोड़ रुपए का बौक्स औफिस कलेक्शन होना चाहिए था, पर पहले दिन बौक्स औफिस कलेक्शन बामुश्किल 26 करोड़ रुपए हुआ. दूसरे दिन 29 करेाड़ रुपए हुआ. इसी के साथ निर्माताओं ने ऐलान किया कि फिल्म का बजट 200 करोड़ रुपए है.

कहा जा रहा है कि इस में से 120 करोड़ रुपए की फीस सलमान खान और 5 करोड़ की फीस रश्मिका मंदाना ने ली. बाकी के बारे में कुछ नहीं कहा गया. बहरहाल, 7 दिन की बजाय रवीवार 30 मार्च से गुरूवार, 3 अप्रैल के इस 5 दिवस में सैकनिल के अनुसार ‘सिकंदर’ ने 90 करोड़ 25 लाख रुपए ही बौक्स औफिस पर एकत्र किए. इस में से निर्माता की जेब में सिर्फ 30 करोड़ रुपए ही जाएंगे. लेकिन बौक्स औफिस इंडिया के अनुसार 5 दिन में ‘सिकंदर ‘ केवल 83 करोड़ 75 लाख रुपए ही एकत्र कर सकी. यदि यह आंकड़ास ही है तब तो निर्माता की जेब में 27 करोड़ रुपए ही जाएंगे.

मार्च माह के तीसरे सप्ताह रिलीज हुई फिल्म ‘तुम को मेरी कसम’ ने पहले सप्ताह बौक्स औफिस पर केवल एक करोड़ रुपए ही कमा सकी थी. लेकिन बेचारे ‘इंदिरा आईवीएफ के डाक्टर अजय मूर्डिया तो उस दिन को रो रहे हैं, जब उन्होंने इस फिल्म के निर्देशन की जिम्मेदारी विक्रम भट्ट को दी थी. वास्तव में अजय मूर्डिया अपने द्वारा स्थापित ‘इंदिरा आईवीएफ’ का 3500 हजार करोड़ का पब्लिक इशू ले कर आने वाले थे. इसीलिए प्रचार के लिए उन्होंने फिल्म बनवाई. मगर एक तरफ फिल्म को दर्शक न मिलने की वजह से कमाई व प्रचार दोनों नहीं हुआ, उधर ‘सेबी’ इन के खिलाफ अलग से जांच शुरू कर दी है.

मार्च माह के चौथे सप्ताह में ही पृथ्वीराज सुकुमारन निर्देशित, मोहनलाल और पृथ्वीराज के अभिनय से सजी मलयालम फिल्म ‘लूसी 2 इम्पूरन’ मलयालम के साथ ही हिंदी में भी डब हो कर रिलीज हुई. मलयालम की यह पहली फिल्म थी, जिस में हिंदूमुसलिम अजेंडा चलाया गया, जिस की जम कर आलोचना हुई. और 3 दिन बाद मोहनलाल ने ऐलान कर दिया कि वह फिल्म से 17 सीन काट कर इसे रिलीज करेंगे. इस में से 3 मिनट का वह दृश्य भी काटा गया जिस में हिंदुओं को आहत किए जाने के आरोप लगे थे. मोहनलाल ने इस तरह सारा दोष निर्देशक पृथ्वीराज सुकुमारन पर थोप कर दोनों पक्षों के भले बन गए. यह बात पृथ्वीराज सुकुमारन के परिवार को पसंद नहीं आई और पृथ्वीराज की मां ने वीडियो जारी कर मोहनलाल पर आरोप लगा दिया. उन्होंने कहा कि यदि कुछ गलत हुआ तो उस के लिए निर्देशक व कलाकार दोनो ही दोषी हैं. क्योंकि जब फिल्म की शूटिंग हुई, तो क्या मोहनलाल को पता नहीं था कि वह क्या शूट कर रहे हैं. इस के बाद अब मलयालम फिल्म इंडस्ट्री में दो फाड़ की खबरें आ रही हैं.

बहरहाल, पूरे सप्ताह में इस फिल्म ने हिंदी क्षेत्रों में महज दो करोड़ रुपए ही कमाए. मगर मलयालम में इस ने 86 करोड़ रुपए कमा लिए.

इस फिल्म के लिए मोहनलाल और पृथ्वीराज ने कोई फीस नहीं ली है. फिल्म की कमाई में से दोनों अपना हिस्सा लेंगे.

Superstition : पूर्वजन्म के कर्म, सच या अंधविश्वास

Superstition : जो विश्वास तर्क पर आधारित नहीं, वह रेत पर बने घर के समान है, जो समय की कसौटी पर टिक नहीं सकता.

तीन मित्र- 2 महिलाएं और एक पुरुष-लोनावला के तुंगार्ली जंगल और बांध की सैर के बाद लौट रहे थे. संकरे और क्षतिग्रस्त रास्ते पर उखड़े हुए पत्थरों पर से उन की एसयूवी धीरेधीरे आगे बढ़ रही थी. रास्ते में स्कूल यूनिफौर्म पहने कुछ लड़कियां शायद तुंगार्ली बांध के आगे राजमाची गांव को लौट रही थीं. वहीं, बांध से रिसने वाले पानी का एक छोटा सा सोता फूट पड़ा था, जिस में से एक लड़की पीने के पानी की बोतल भर रही थी.

2 आदिवासी महिलाएं सिर पर लकड़ी के गट्ठर उठाए सड़क पार करने के लिए उन की गाड़ी के गुजरने का इंतजार कर रही थीं. उन के फटे हुए कपड़े, कृशकाय शरीर और धूप से जली गहरी त्वचा देख कर सैलानियों का दिल करुणा से भर आया.

पुरुष ने गाड़ी रोक कर उन्हें रास्ता पार करने का इशारा किया और अपने मित्रों से बोला, ‘‘यहां तो समय ठहर गया है. ये लोग जैसे पचास या सौ साल पहले की जिंदगी जी रहे हैं.’’

एक महिला ने दार्शनिक लहजे में कहा, ‘‘यह तो महज संयोग है कि उन्हें गरीबी में जन्म मिला और हमें खातेपीते घरों में. यह संभव है कि हम ‘वह’ होते और वे ‘हम’. इसलिए हमारा अपने जीवन पर गर्व करना बेकार है.’’

दूसरी महिला ने तुरंत जोड़ा, ‘‘यह पूर्वजन्म के कर्मों का फल है.’’ फिर इसी विषय पर तीनों में गंभीर चर्चा शुरू हो गई.

पहली महिला की व्याख्या- संयोग या गणितीय प्रायिकता (संभावना) वैज्ञानिक आधार दर्शाती है, भले ही जन्म और मृत्यु विज्ञान के लिए आज भी गूढ़ रहस्य बने हुए हैं. लेकिन ‘पूर्वजन्म के कर्म’ वाली व्याख्या अकसर धार्मिक चर्चाओं में सुनाई देती है. तीनों मित्रों को यह विचार बेमानी लगा कि सिर पर लकड़ी ढोती गरीब महिलाएं पिछले जन्म के पापों का फल भुगत रही हैं. न्याय की बात करें तो अपराध का विवरण सुने बिना दंड मिलना अनुचित है. क्या धर्म के पुरोहित इन गरीबों को उन के कथित अपराधों का विवरण दे सकते हैं?

यह सवाल विज्ञानवादी को अंधविश्वासी से अलग करता है. वैज्ञानिक जानते हैं कि विज्ञान के पास हर प्रश्न का उत्तर नहीं है. इसलिए विज्ञानवादी में एक बौद्धिक विनम्रता होती है. धर्म का भी एक दार्शनिक दृष्टिकोण होता है, जो आस्था और तर्क के बीच एक विचारशीलता का पुल बनाता है. लेकिन आडंबरवादी पुरोहित ब्रह्मांड और जीवनमृत्यु के हर प्रश्न का उत्तर धर्म के ‘विश्वास’ के सहारे दे सकते हैं, भले ही वह तार्किक हो या न. इन की ‘पूर्वजन्म के कर्म’ जैसी व्याख्याओं ने भारतीय समाज पर गहरी छाप छोड़ी है. दुखों को पूर्वजन्म से जोड़ने के बाद समाज और सरकार का दायित्व खत्म हो जाता है और व्यक्ति भी अपनी दशा को पूर्वजन्म का परिणाम मान कर निष्क्रिय हो जाता है.

सैलानियों की गाड़ी अब पक्की सड़क पर पहुंच गई थी. चर्चा को समेटते हुए एक मित्र ने कहा, ‘‘मन, बुद्धि और शरीर की दृष्टि से सारे मनुष्य लगभग समान ही होते हैं. फिर भी देश संपन्न या विपन्न होते हैं. अर्थात गरीबी के लिए गरीबों के पूर्वजन्म के कर्म नहीं, बल्कि समाज और समाज की चुनी हुई सरकारों के बुरे कर्म जिम्मेदार हैं.’’ सच ही है, भारतीय समाज में बदलाव की गति बहुत धीमी है.

आज 21वीं सदी में भी हम जातिवाद और चिंताजनक स्तर तक बड़ी आर्थिक असमानता से जूझ रहे हैं. ‘पूर्वजन्म के कर्म’ जैसी मान्यताएं इन समस्याओं को सहारा देती हैं.

पुर्नजन्म में कर्म का सिद्धांत : बेवकूफ बनाने का जरिया

यह सच है कि व्यक्ति के कर्म उस के वर्तमान और भविष्य को प्रभावित करते हैं. एक अच्छा बीज (अच्छे कर्म) ही एक स्वस्थ पौधा (अच्छा भविष्य) बनाएगा. लेकिन इस का यह अर्थ नहीं कि हम बिना किसी प्रमाण के पुनर्जन्म या पूर्वजन्म के कर्मों को स्वीकार कर लें. मूलतया धर्मों का कर्म सिद्धांत न नैतिकता और उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित करता है और न ही व्यावहारिक है. इस का उद्देश्य केवल एक है और वह है धर्म के कल्पित भगवान के अस्तित्व को स्थापित करना.

धर्मों के भक्त जब अपने साथ हो रहे भेदभाव की शिकायत करते हैं कि भगवान यह भेदभाव कैसे स्वीकार करता है तो हिंदू धर्म के एजेंट कह देते हैं कि यह पिछले जन्मों का फल है जबकि ईसाई और मुसलिम मरने के बाद स्वर्ग में पुनर्जन्म होने की कहानी सुना देते हैं. धर्मों की इन बातों को निश्चित रूप से स्वीकार नहीं किया जा सकता पर आस्था के मामले में धर्म के एजेंटों की बात अंतिम मान ली जाती है.

नैतिकता अवश्य एक महत्त्वपूर्ण कौन्सैप्ट है जिस का एक अर्थ यह है कि व्यक्ति जो कार्य करे, उस का और उस के परिणामों का पूरा उत्तरदायित्व भी ले. आसान शब्दों में कहें तो राह जीवन की हो या शहर की, अगर किसी ने लालबत्ती को लांघा हो तो जुर्माना भी सिर उठा कर भरे. आखिर, हर गलती सीख भी तो दे जाती है. यह कर्म का सिद्धांत नहीं है, बल्कि कानून का और नैतिकता का है.

विज्ञान दुनिया की सब से खुली किताब है जिस में लिखने, पढ़ने व समझने और उस में प्रश्नचिह्न लगाने का अधिकार हर व्यक्ति को है.

आधीअधूरी जानकारी

कुछ शोधकर्ताओं (जैसे डा. वौल्टर सेमकिव) ने बच्चों द्वारा पूर्वजन्म की यादों के दावों का समर्थन किया है. उन के उद्देश्य पर तो संदेह नहीं लेकिन उन के निष्कर्ष वैज्ञानिक कसौटी पर खरे नहीं उतरते. अधिकतर वैज्ञानिक उन्हें मनोवैज्ञानिक स्थितियों, जैसे क्रिप्टोम्नेसिया (अवचेतन स्मृति) या सुझाव का परिणाम मानते हैं. दूसरी ओर, धर्म और पुरोहित ‘पूर्वजन्म’ की व्याख्या को बिना किसी तर्क के पवित्र ग्रंथों के आधार पर करते हैं. धार्मिक कथाओं की जटिल व्याख्या कई बार आम लोगों के लिए कठिन हो जाती है, जिस से वे अनजाने में अंधविश्वास का शिकार हो जाते हैं. जब तक ठोस प्रमाण न मिले, पुनर्जन्म और पूर्वजन्म के कर्मों पर विश्वास करना अंधविश्वास ही रहेगा.

हमारे सैलानियों की चर्चा का रुख अचानक पुनर्जन्म से भविष्य की ओर मुड़ गया था. वे लंच के लिए लोनावला के एक प्रसिद्ध होटल में पहुंचे थे. खाली टेबल का इंतजार करते हुए एक अखबार के ज्योतिष/भविष्य वाले पन्ने को देखते हुए एक महिला ने मुसकरा कर कहा, ‘‘देखें, आज हमारे 140 करोड़ देशवासियों का भविष्य क्या है?’’ तीनों मित्र हंस पड़े. यह उन अखबारों और ज्योतिषियों पर एक व्यंग्य था जो जन्मदिन के आधार पर रची गई 12 राशियों द्वारा दुनिया के 800 करोड़ लोगों का भाग्य रोज बताने का दावा करते हैं.

ज्योतिष एक रुढ़ि है और सभी ज्योतिषी रुढ़िवादी हैं. लेकिन अब उन की भाषा परिष्कृत हो गई है, जैसे आज आप का आशावाद आप को परेशानियों से दूर ले जाएगा. इस प्रत्यक्ष सत्य को जानने के लिए ज्योतिष विद्या जरूरी नहीं, यह जानते हुए भी शिक्षित लोग भविष्यफल वाले पन्ने की ओर आकृष्ट हो ही जाते हैं; हमारे शिक्षित सैलानी भी हुए. क्या आश्चर्य कि मुखपृष्ठ पर बड़े गर्व से ‘स्था:1838’ छापने वाला अखबार पिछले 186 वर्षों से हर रोज पाठकों को राशिफल से अनुग्रहीत करता है. मनुष्य हर दिन जन्म लेते हैं, अर्थात (हमारे ज्योतिषियों के अनुसार) एक ही राशि में जन्मे दुनिया के लगभग 67 करोड़ लोग (या 800 करोड़ का 12वां हिस्सा) हर रोज एक ही भाग्य साझा करेंगे?

दार्शनिक कहते हैं, मनुष्य का सारा जीवन ‘इस पल में’ यानी वर्तमान काल में समाया हुआ है. बीते हुए कल को बदला नहीं जा सकता और आने वाले कल की, बस, कल्पना की जा सकती है. हां, भूतकाल के अनुभवों (जिन में ‘पूर्वजन्म’ के अनुभव निश्चित ही शामिल नहीं हैं) से आने वाले कल को संवारा जा सकता है पर भविष्य की अनिश्चितता जीवन की एक सच्चाई है और जीने का प्रमुख आकर्षण, कुतूहल और रोमांच भी. बल्कि किसी ने कहा है कि सच्चाई कल्पना से भी ज्यादा विलक्षण होती है.

आखिर एक मेज खाली हुई और मित्रों का लंच शुरू हुआ. बातचीत अब गुजराती? व मराठी पाककला पर केंद्रित थी. खाने के बाद मीठा पान प्रस्तुत किया गया. बिल चुका कर तीनों यात्री महानगर की ओर चल दिए. तब तक शायद तुंगार्ली की लकड़ी ढोने वाली महिलाएं भी घर पहुंच कर भोजन कर चुकी होंगी. उन का भोजन बिलकुल अलग ढंग का होगा हालांकि कड़ी मेहनत के बाद स्वादिष्ठ जरूर लगा होगा. सब दिन एक से नहीं होते. आज नहीं तो कल देश की प्रगति में उन का न्यायपूर्ण हिस्सा उन्हें मिलेगा और कोई सुबह उन के जीवन में संपन्नता की बहार जरूर लाएगी.

गाड़ी अब एक्सप्रैसवे पर सरपट दौड़ रही थी. एफएम रेडियो पर नएपुराने गीत बज रहे थे. उन में यह सुप्रसिद्ध गीत भी था- ‘जिंदगी कैसी है पहेली, कभी तो हंसाए, कभी यह रुलाए…’ हम सामान्य लोग कुछ अधिक नहीं तो अपने कर्मों से किसी न किसी तरह दूसरों के जीवन को बेहतर जरूर बना सकते हैं. शायद, यही मानवीयता का सार है.

Senior Citizens : बुजुर्गों को वृद्धाश्रम में भेजना कितना सही?

Senior Citizens : बुजुर्गों की बढ़ती आबादी छोटे होते परिवारों के लिए एक समस्या भी बन रही है. जिन घरों में बुजुर्ग भी साथ रहते हैं वहां औरतों को कई तरह की समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं. न तो वह औफिस मैनेज कर पाती हैं न ही घर के बुजुर्ग. ऐसे में एक ही औप्शन बचता है, वृद्धाश्रम. लेकिन बुजुर्गों को वृद्धाश्रम भेजना कहां तक सही डिसिजन है?

2011 में हुई जनगणना के अनुसार देश में बुजुर्गों की संख्या 10.4 करोड़ थी. NSO के आंकड़ों के अनुसार, साल 2021 में देश में बुजुर्गों की आबादी 13 करोड़ 80 लाख थी जो कि अगले एक दशक में यानी साल 2031 तक 41 फीसदी बढ़ कर 19 करोड़ 40 लाख हो जाएगी और अनुमान है कि 2050 तक भारत में बुजुर्गों की आबादी 31.9 करोड़ हो जाएगी.

बुजुर्गों की यह बढ़ती आबादी छोटे होते परिवारों के लिए एक समस्या भी बन रही है. पुराने जमाने में बड़े परिवार हुआ करते थे. संयुक्त परिवारों में कई लोग साथ रहते थे और मिल कर बुजुर्गों की देखभाल किया करते थे. उस दौर की सामाजिक स्थिति यही थी लेकिन पिछले कुछ दशकों से परिवार लगातार छोटे होते जा रहे हैं.

इस बीच औरतों की स्थिति में भी बदलाव आया है. औरतें जौब कर रही हैं, बिजनेस कर रही हैं, मर्दों के साथ कंधा मिला कर चल रही हैं. आज की औरतें घर में रह कर चौकाबर्तन करना पसंद नहीं कर रहीं. यह औरतों की आजादी का दौर है इसलिए यह दौर पहले से बेहतर है लेकिन जिन घरों में बुजुर्ग भी साथ रहते हैं वहां औरतों को कई तरह की समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं.

बुढ़ापा सभी के जीवन में आता है. यह जीवन की स्वाभाविक प्रक्रिया है. जो लोग अपने बच्चों की परवरिश में अपना जीवन खपा देते हैं जब उन्हें बुढ़ापे में अपनी देखभाल की जरूरत पड़ती है तब बच्चों के पास समय नहीं होता. बच्चे अपनी जिंदगी की जद्दोजहद में इतना व्यस्त हो जाते हैं कि उन के लिए घर के बुजुर्ग बोझ बन जाते हैं लेकिन इस का दूसरा पहलू भी है. बुजुर्ग लोगों को सब से ज्यादा इमोशनल सपोर्ट की जरूरत होती है और उन की यह भावनात्मक अपेक्षाएं बढ़ती चली जाती हैं. नौकरीपेशा लोगों के पास इतना समय नहीं होता कि वो बुजुर्गों की अपेक्षाएं पूरी कर सकें.

बेटी के घर का पानी नहीं पी सकते

पुरुषवादी व्यस्था में लड़कियां पराई समझी जाती हैं. भारतीय बाप तो बेटी के घर का पानी पीने से भी परहेज करते हैं इस मानसिकता के कारण बेटों पर ही अपने पेरैंट्स की देखभाल की जिम्मेदारी होती है.

यही कारण है कि भारत में पेरैंट्स अपना बुढ़ापा बेटों के साथ ही गुजारना चाहते हैं. हैंडबुक औफ एजिंग की स्टडी के अनुसार 80% लोग अपने बुढ़ापे में बेटे के साथ रहना चाहते हैं. 2012 UNFPA ने भारत के 7 राज्यों में सर्वे किया जिस में 50% बुजुर्ग ही अपने बेटेबहू के साथ रह रहे थे.

क्लिनिकल साइकोलौजिस्ट प्रियंका श्रीवास्तव कहती हैं कि “ज्यादातर बुजुर्ग पेरैंट्स बेटियों के साथ इसलिए नहीं रहना चाहते क्योंकि उन्हें बेटी में फाइनैंशियल और इमोशनल सिक्योरिटी नजर नहीं आती, जो उन्हें बेटों को देख कर मिलती है. पेरैंट्स शादीशुदा बेटी के साथ चाह कर भी सहज नहीं रह पाते जब कि लड़कियां इमोशनल होती हैं और वे पेरैंट्स की मजबूरी और परेशानी बेटों से बेहतर समझती हैं”

बेटों के साथ बुढापा बिताने की इस मानसिकता में सब से बड़ी समस्या यह है कि बेटे अपने पेरैंट्स के देखभाल की जिम्मेदारी अपनी पत्नियों पर डाल देते हैं. जो औरतें हाउसवाइफ हैं वो इस जिम्मेदारियों को पूरी तरह निभाती भी हैं लेकिन जो औरतें जौब कर रहीं हैं उन के लिए पति के पेरैंट्स की जिम्मेदारी संभालना आसान नहीं होता.

मनोज के पिता वैजनाथ की उम्र 82 साल थी. मनोज और उस की वाइफ श्रुति दोनों नोएडा में रहते थे और दोनों ही जौब करते थे. दोनों की दो बेटियां थीं. रिंकी और पिंकी. रिंकी उज्बेकिस्तान में रह कर एमबीबीएस कर रही थी और पिंकी बैंगलोर में रह कर एमबीए की पढ़ाई कर रही थी. ऐसे में घर के बुजुर्ग की देखभाल श्रुति और मनोज के लिए एक बड़ी चुनौती थी. श्रुति जौब पर रहती तो उसे अपने ससुर वैजनाथ की ही चिंता लगी रहती.

वैजनाथ जी की थोड़ी भी तबियत बिगड़ने पर श्रुति को औफिस से छुट्टी लेनी पड़ती और पूरे दिन उन की देखभाल करनी पड़ती. श्रुति के साथ मनोज भी काफी परेशान हो चुका था इसलिए दोनों ने पास के वृद्धाश्रम में बात की और वैजनाथ जी को वृद्धाश्रम में भेज दिया. वहां उन्हें समय पर दवाइयां मिलती. देखभाल होती और खाना वगैरह भी समय पर मिलता. अपने जैसे बहुत से लोगों के बीच वह भी काफी बेहतर फील करने लगे. दोनों पतिपत्नी वीकैंड पर वृद्धाश्रम जाते और वहां से वैजनाथ जी को साथ ले कर पास के पार्क में समय बिताते. महीनेदोमहीने पर उन्हें साथ ले कर कहीं घूमने चले जाते.

वैजनाथ जी के वृद्धाश्रम जाने के बाद श्रुति को बहुत आराम मिला. अब वह निश्चिंत हो कर जौब पर जाती और घर आने के बाद बेहद सुकून महसूस करती लेकिन अपने घर के इकलौते बुजुर्ग को वृद्धाश्रम में भेज देने से मनोज के रिश्तेदार बेहद नाराज थे. वो कहने लगे कि “देखो ये लोग कितने खुदगर्ज हैं एक बुजुर्ग की सेवा नहीं कर सके उन्हें वृद्धाश्रम में फेंक दिया. जिंदगीभर वैजनाथ ने संघर्ष किया बेटे को पढ़ाया लिखाया, उस की शादी की अब वही बेटा अपने बाप को वृद्धाश्रम में डाल आया.”

वृद्धाश्रम या ओल्ड एज होम को ले कर हमारे समाज में बहुत सी धारणाएं बैठी होती हैं. जिन लोगों के बुजुर्ग वृद्धाश्रमों में होते हैं उन्हें ले कर समाज का नजरिया अच्छा नहीं होता. लोग तरहतरह की बातें बनाते हैं.

सासससुर की सेवा कौन करे

सत्संगों में बाबा लोग औरतों को अकसर सासससुर की सेवा करने के पुण्य समझाते हैं और इस तरह के प्रवचनों से मर्द लोग बेहद खुश होते हैं. दरअसल, सत्संगों से निकलने वाले इस तरह के विचार औरतों को गुलाम बनाए रखने के हथकंडे होते हैं. क्या कोई बाबा मर्दों को अपने सासससुर की सेवा करने का पुण्य समझाता है? तमाम तरह की परंपराओं के साथ बुजुर्गों की सेवा का भार भी औरतों के कंधों पर डाला गया है ताकि औरतें पारिवारिक जिम्मेवारियों के बोझ तले दबी रहें.

मुस्लिम औरतों को भी बचपन से इसी तरह के संस्कार दिए जाते हैं उन्हें सासससुर की सेवा के बदले जन्नत में इनाम का झांसा दिया जाता है और औरत इस झांसे में फंस कर अपनी जिंदगी खपा देती हैं लेकिन उसे बदले में कुछ नहीं मिलता. समाज औरत की इस सेवा को औरत का फर्ज मान कर चलता है.

फिरदौस अपने अब्बू की इकलौती संतान थी. फिरदौस की अम्मी अरसा पहले गुजर चुकी थी. तीन साल पहले फिरदौस की शादी नसीम से हुई. शादी के बाद फिरदौस अपने ससुराल दिल्ली आई तो कानपुर में फिरदौस के अब्बू बिल्कुल अकेले पड़ गए. फिरदौस की ससुराल में उस के शौहर के अलावा बूढ़े ससुर थे. वो अपने ससुर का ख्याल अपने अब्बू की तरह रखती थी लेकिन कानपुर में उस के अपने अब्बू की सेवा के लिए कोई नहीं था.

फिरदौस के अब्बू को घुटनों में तकलीफ थी. अब्बू से फोन पर जब भी बात होती फिरदौस परेशान हो जाती. एक दिन फिरदौस ने नसीम से कहा- नसीम, मैं सोच रही हूं कि अपने अब्बू को कानपुर से दिल्ली बुला लूं और एम्स में उन के घुटने का इलाज करवा दूं ताकि उन्हें चलनेफिरने में होने वाली तकलीफ से निजात मिले. फिरदौस की बात सुन कर नसीम बोला- “तुम्हारे अब्बू अकेले रहते हैं तो तुम उन्हें वृद्धाश्रम में क्यों नहीं भेज देती वहां उन का इलाज भी हो जाएगा और अकेलापन भी दूर होगा.”

फिरदौस को नसीम से ऐसी बात सुनने की उम्मीद नहीं थी उसे गुस्सा आ गया और वह गुस्से में तमतमाते हुए नसीम से बोली- “मैं यहां रह कर तुम्हारे बूढ़े अब्बू की खिदमत में अपनी जिंदगी गंवा दूं और मेरे अब्बू को तकलीफ है तो उन्हें वृद्धाश्रम में भेज दूं. मैं शादी के बाद जौब करना चाहती थी लेकिन तुम्हारे अब्बू की वजह से मैं ने जौब नहीं किया ताकि उन्हें तकलीफ न हो अगर मेरे अब्बू वृद्धाश्रम जा सकते हैं तो तुम्हारे अब्बू क्यों नहीं जा सकते?”

फिरदौस की बात सुन कर नसीम को भी गुस्सा आ गया. उस ने फिरदौस के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया और बोला- “तुम औरत हो और सासससुर की खितमत करना तुम्हारा फर्ज है तुम्हे अपने बाप की चिंता है तो निकल जाओ यहां से और चली जाओ अपने बाप के पास.”

फिरदौस को अपने शौहर से ऐसी उम्मीद नहीं थी लेकिन बात उस के स्वाभिमान पर आ गई थी इसलिए वो शाम की ट्रेन से ही कानपुर के लिए निकल गई. कानपुर के प्राइवेट हास्पिटल में उस ने अपने अब्बू का ट्रीटमैंट करवाया और अपने अब्बू के पास रह कर कानपुर में ही जौब करने लगी इस बीच नसीम को अपनी गलती का एहसास तो हुआ लेकिन वो चाहता था कि फिरदौस खुदबखुद दिल्ली चली आए लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

अब घर में बूढ़े बाप की खितमत नसीम के लिए मुश्किल था. अपने अब्बू के चक्कर मे वह जौब भी ठीक से नहीं कर पा रहा था. नसीम ने अपनी बहन से बात की तो उस ने भी अब्बू को अपने पास रखने से मना कर दिया आखिरकार नसीम को नजदीकी वृद्धाश्रम में अपने अब्बू को भेजना पड़ा.

वृद्धाश्रम क्यों जरूरी हैं ?

भारत में बुजुर्गों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से वृद्धावस्था पेंशन की व्यवस्था है. यह अलगअलग राज्यों में 600 रुपए से 1000 रुपए तक हर महीने होती है लेकिन सवाल उठता है कि बुजुर्गों की बड़ी आबादी को ध्यान में रखते हुए क्या ये रकम पर्याप्त हैं?

यह सच है कि बुजुर्गों के लिए परिवार से बेहतर कोई जगह नहीं. परिवार में अपनों के बीच रह कर बुजुर्ग अपनी आयु से ज्यादा जी लेता है लेकिन स्थितियां बदल रही हैं और इन बदलती परिस्थितियों मे वृद्धाश्रम की अहमियत बढ़ रही है लेकिन वृद्धाश्रम के मामले में समाज का नजरिया आज भी नकारात्मक ही है.

हमारा समाज बदलाव को सहजता से नहीं लेता. बुजुर्गों के मामले में आज भी पारंपरिक सोच कायम है जब कि इस से बहुत सी समस्याएं पैदा हो रही हैं और यह समस्याएं महिला ही झेल रहीं हैं. आज भी हमारा पुरुषवादी समाज महिलाओं को इतनी आजादी देने के पक्ष में नहीं है कि वह सासससुर की देखभाल की जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए. वृद्धाश्रम वक्त की जरूरत है इस बात को भारतीय समाज हजम नहीं कर पा रहा लेकिन शिक्षित और विकसित समाजों में वृद्धाश्रम की अहमियत समझी जा रही है.

फिनलैंड में बुजुर्गों की स्थिति

फिनलैंड दुनिया का सब से खुशहाल देश हैं. वर्ल्ड हैपीनेस इंडेक्स में नंबर-1 पर आने वाला यह देश अपने बुजुर्गों की देखभाल के मामले में भी नंबर वन है. सिनियर सिटीजन को दी जाने वाली बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं और सोशल सिक्योरिटी सिस्टम के कारण यहां लोगों की लाइफ एक्सपैटेंसी 84 साल तक पहुंच गई है.

फिनलैंड में 60 साल से अधिक उम्र का हर शख्स ओल्ड एज पेंशन का हकदार होता है. फिनलैंड 60 साल से ऊपर के बुजुर्गों को ओल्ड एज पेंशन के तौर पर हर महीने 1888 यूरो देता है जो कि भारतीय रुपए में एक लाख 65 हजार रुपए है. इस के अलावा, सरकार की ओर से बुजुर्गों को फिजिकली और सोशली एक्टिव रखने के लिए भी कई तरह के कदम उठाए जाते हैं.

फिनलैंड की आबादी में बुजुर्गों की हिस्सेदारी 27 फीसदी से अधिक है. ओल्ड एज होम को बढ़ावा देने की जगह वहां का प्रशासन जहां तक संभव हो पाता है बुजुर्गों को उन के घर पर ही हैल्थ केयर, मेडिकल चेकअप और बाकी सुविधाएं मुहैया कराता है. ताकि यहां के बुजुर्ग लोग अपने घरों में ही आराम से रह सकें. इस के लिए स्थानीय एजेंसियां उन के घर की, सीढ़ियों की, इंटीरियर को भी आ कर डिजाइन करती हैं ताकि बुजुर्गों को घर में दिक्कतों का सामना न करना पड़े.

इतनी फैसिलिटीज और स्कीम के अलावा फिनलैंड में दुनिया में सब से ज्यादा ओल्ड एज होम भी बने हैं जहां तमाम तरह की सुविधाओं के साथ बुजुर्गों के फिट रहने और खुश रहने के लिए तमाम तरह के साधन मौजूद हैं.

भारत में हम बुजुर्गों के लिए सरकार की ओर से इस तरह की सुविधाओं की उम्मीद नहीं कर सकते. 600 या 1000 रुपए प्रतिमाह की पेंशन दे कर सरकार अपनी जिम्मेवारी छुड़ा लेती है. सामाजिक तौर पर बुजुर्गों के लिए हमदर्दी तो होती है लेकिन बुजुर्गों को सहूलत और सकून देने का कोई समाधान नहीं होता. इस अव्यवस्था में औरतों का सब से ज्यादा शोषण होता है. सासससुर की सेवा के नाम पर औरतें बंध जाती हैं और अपने जीवन का कीमती समय इस संस्कार को ढोने में लगा देती हैं.

भारत में कुल 728 वृद्धाश्रम हैं और इन 728 वृद्धाश्रमों में एक करोड़ अस्सी लाख बुजुर्ग रहते हैं. हैरानी की बात है कि दुनिया के सब से शिक्षित और खुशहाल देश फिनलैंड में सब से ज्यादा वृद्धाश्रम हैं तो भारत के सब से शिक्षित और सब से विकसित राज्य केरल में सब से ज्यादा 182 वृद्धाश्रम हैं.

इस से वृद्धाश्रम को ले कर जो नकारात्मक सोच बनी हुई है उस की पोल खुल जाती है. फिनलैंड और केरल इस बात का उदाहरण हैं कि वृद्धाश्रम या ओल्ड एज होम वक्त की जरूरत है और शिक्षित समाज की पहचान भी.

वृद्धाश्रम का संचालन वृद्ध लोग ही करें

ज्यादातर वृद्धाश्रमों का संचालन एनजीओज करते हैं. इन वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों की देखभाल, मैनेजमेंट और केयरटेकर के लिए सरकार की कोई खासा गाइडलाइंस नहीं होती. कई ओल्ड एज होम तो सिर्फ डोनेशन इकट्ठा करने के लिए ही चलाए जाते हैं. बुजुर्गों को इन वृद्धाश्रमों में अपनापन फील नहीं हो पाता. शहरों में जगह की कमी के कारण छोटी जगहों में भी वृद्धाश्रम चल रहे हैं जो बुजुर्गों के लिए किसी जेल से कम नहीं हैं. घर के एक कमरे में खुशी से रहने वाले बुजुर्ग का एक एकड़ में बने वृद्धाश्रम में दम घुटने लगता है.

बुजुर्गों की केयर करना बच्चों का काम नहीं है. यह एक हुनर है. यह स्किल की बात है. भावनात्मक लगाव जो अपने परिवार के बीच मिलता है वो वृद्धाश्रम कभी नहीं दे सकते लेकिन वृद्धाश्रमों का मैनेजमेंट यदि बुजुर्गों के हाथों में हो और केयरटेकर भी 65 से ऊपर के हों तो इस से बड़ा फर्क पड़ सकता है.

छोटा बच्चा स्कूल जाने से कतराता है और शुरुआत में बहुत परेशान करता है लेकिन स्कूल का वातावरण घर जैसा हो और टीचर उस से मां जैसा बर्ताव करें तो स्कूल में बच्चे का मन लगने लगता है. बुजुर्ग होने पर लोग भी बच्चे जैसा हो जाते हैं. उन्हें वृद्धाश्रम के नाम से भी डर लगता है लेकिन वृद्धाश्रम में घर जैसा वातावरण हो और केयरटेकर बुजुर्गों की भावनाओं से जुड़ जाएं तो वृद्धाश्रम में उन का मन लगने लगता है.

वृद्धाश्रम का चयन कैसे करें

जब तक संभव हो अपने बुजुर्ग की देखभाल करें. अपने बुजुर्गों के साथ इमोशनल जुड़ाव कायम रखें. उन से बातें करें. महीने दो महीने में उन्हें ले कर कहीं आसपास घूम आएं. उन्हें सुबह नजदीक के पार्क तक साथ ले जाएं. बच्चों को बुजुर्गों के साथ वक्त बिताने के लिए प्रेरित करें और जब ऐसा लगने लगे कि आप के बुजुर्ग की देखभाल के चक्कर में आप या आप के घर की औरत पिस रही है तब ही वृद्धाश्रम का ख्याल दिल में लाएं.

वृद्धाश्रम में भेजने से पहले अपने बुजुर्ग को विश्वाश में लीजिए. उन्हें अपनी समस्या बताइए. उन से कहिए कि आप की बेहतर देखभाल के लिए ही आप ऐसा सोच रहे हैं. भावनात्मक रूप से आप के बुजुर्ग के लिए फैसला लेने में थोड़ी मुश्किल तो जरूर होगी लेकिन आप उन्हें भरोसा दिलाएंगे तो वे मान जाएंगे.

आप जिस भी शहर में रहते हो वहां नजदीक के वृद्धाश्रम में विजिट कीजिए. माहौल देखिए और मैनेजमेंट भी. यह भी ध्यान दीजिए की वृद्धाश्रम का एरिया कितना बड़ा है. टहलने के लिए पार्क हो. बैठने के लिए बैंचे और कुर्सियां पर्याप्त मात्रा में हो. वृद्धाश्रम का कंपाउंड जेल की तरह बंद न हो वरना आप के बुजुर्ग को जल्द ही घुटन महसूस होने लगेगी.

वृद्धाश्रम भीड़भाड़ वाले इलाके में न हो वरना पूरे दिन शोर की आवाजें आती रहेंगी. वृद्धाश्रम के स्टाफ के बर्ताव पर गौर कीजिए और उन से बातें कीजिए. स्टाफ का व्यवहार बहुत मायने रखता है. पहली विजिट से यदि आप संतुष्ट हैं तो शुरुआत में पंद्रह दिनों के लिए अपने बुजुर्ग को यहां भेजिए और इस बीच लगातार उन से मिलने आते रहिए.

बच्चे हों तो उन्हें भी साथ ले कर अपने बुजुर्ग से मिलने पहुंचिए. पंद्रह दिनों के बाद एक सप्ताह के लिए उन्हें फिर से घर ले आइए और इस तरह लगातार छह महीनों तक कीजिए. अपने जैसे कई लोगों के बीच रह कर उन्हें अपने परिवार से दूरी का एहसास कम होने लगेगा. धीरेधीरे उन्हें वृद्धाश्रम में रहने की आदत हो जाएगी.

Best Story : तारा की भाभी – सालों बाद बिस्मिल समझा भाभी की बेरुखाई की वजह

Best Story : समय के दरीचे हर दर्रे की कहानी कह रहे हैं. उन्हीं में मैं अपने इश्क़ की निशानी तलाश रहा हूं. लंबे अंतराल  के बाद आया हूं. एक पल को भी उसे भूला हूं, ऐसा कभी नहीं हुआ. हर इश्क़ की तरह ही हमारा इश्क़ भी धर्म के नाम पर ही क़ुरबान हुआ था. ठाकुर चाचा के साथ हमारे अब्बा की दांतकाटी रोटी थी. हम सब बच्चे एक ही आंगन में खेलते रहते थे. तब किसी ने नहीं कहा कि बिस्मिल, तुम तारा के साथ मत खेला करो. जब हम घरघर खेलते हुए घर सजाने के सपने संजोने लगे तब तारा की भाभी को न जाने क्या हो गया कि उन्होंने हम दोनों के मिलने पर रोक लगानी शुरू कर दी.

भाभी घर की बड़ी थीं. हम सब की भाभी थीं. मैं तो उन्हें बहुत पसंद भी करता था. बर्फ जैसे सफ़ेद रंग की वे मुझे बहुत सुंदर लगती थीं. ईद में मिली ईदी से शिवालय जा कर मैं उन के लिए गुलाबी चुटीला भी लाया था. ऐसा नहीं कि वे मुझे प्यार नहीं करती थीं, बहुत प्यार करती थीं. फिर उन्हें हमारे इश्क़ से क्यों नफ़रत हुई, उस वक़्त मैं समझ ही नहीं सका था. हमें एकसाथ देख कर वे तुरंत कहतीं- ‘बिस्मिल, आप अपने घर जाइए. बहुत रात हो चुकी है. तारा, आप भी चलिए या तो पढ़ाई करिए या फिर आइए रसोई में हमारा हाथ बंटाइए.’

भाभी लखनऊ की थीं. उन की भाषा हमारे कानपुर की भाषा से थोड़ी अलग थी. अभी मेरी दाढ़ीमूंछों में स्याह रंग फूटना शुरू ही हुआ था. सिर पर टोपी लगाना भी अब मुझे अच्छा लगने लगा था. समझ गया था कि हमारे मज़हब में इस जालीदार टोपी की क्या ख़ासीयत है. दिल में हर वक़्त तारा के नाम के हिलोरे उठते रहते थे. तारा भी मेरे लिए दिन में कईकई बार छत पर आती. वह अब सलवारक़मीज़ के साथ दुपट्टा भी डालने लगी थी.

अब्बा की दुकान से ही पीला ज़रीवाला दुपट्टा ले कर मैं ने उसे जन्मदिन पर तोहफ़े में दिया था. अब्बा  ने कहा भी था- ‘तेरी अम्मी उस के लिए पूरा सूट ले कर गई हैं. सहबज़ादे, फिर आप अपनी तरफ़ से दुपट्टा क्योंकर ले जाना चाहते हैं?’

मैं थोड़ा सा हकलाया तो अब्बा ने मेरे कान मरोड़ते हुए कहा- ‘बरखुरदार, क्या  हमारी दोस्ती को रिश्ते में बदलवाना चाहते हो?’

मैं शर्म से लाल हो गया था. मेरे चेहरे पर आई सुर्ख़ी देख कर अब्बा थोड़ा चिंतित हुए, फिर बोले- ‘ज़नाब, यह इश्क़ बड़ी ज़ालिम चीज़ है. इस की आतिश से ख़ुद को बचा कर रखिए ताकि हमारे शीरीं रिश्ते की मिठास बची रहे.’

अगर उसी वक़्त कह देता कि अब्बा, ठाकुर चाचा से आप मेरी ख़ातिर बात कर लो तो कितना अच्छा होता. मुझे तो वैसे भी दुकान ही संभालनी थी. ‘भाईजी सलवारक़मीज़ वाले’ कानपुर के जनरलगंज की मशहूर दुकान थी. आख़िर बापदादा का बिज़नैस बेटे को ही तो देखना था. यह बात मेरे दिमाग़ में बैठी हुई थी, तभी पढ़ाई में भी मेरा मन नहीं लगता था.

उस जन्मदिन पर भाभी ने मुझ से कहा- ‘बिस्मिल, आप और तारा अब बड़े हो रहे हो. अब आप को मर्यादा का खयाल रखना होगा. हमारे घरों में बहुत अच्छी दोस्ती है किंतु हमारे धर्म अलग हैं. हम अपनी बेटी ठाकुरों के घर ही ब्याहेंगे. बड़ों की दोस्ती में कोई दरार न आए, इसलिए आप दोनों को समझा रही हूं. मैं ने कई मर्तबा रिश्तों का ख़ून होते देखा है, नहीं चाहती कि आप दोनों की वज़ह से ऐसा कुछ हो. अच्छा होगा तारा से दूरी बना कर रहिए.’

मैं सहम गया था. ऐसा लगा जैसे मैं ने कोई चोरी की हो. डबडबाई आंखें लिए बिना तारा से मिले ही मैं वापस आ गया. उस पूरी रात मैं सो नहीं सका. दूसरी सुबह तारा भी छत पर नहीं आई.

मेरे भीतर पनपा इश्क़ सुलग उठा. उसे किसी भी तरह एक नज़र देखने को मैं बेचैन होने लगा. छत और आंगन के कई चक्कर लगा लिए पर भाभी छोड़ तारा एक बार भी नहीं दिखी. भाभी मुझे टहलते देख कर बोली भी थीं- ‘जा कर पढ़ लीजिए. हाईस्कूल की परीक्षा ज़िंदगी में आगे बढ़ने के लिए पहली सीढ़ी होती है.’

मैं समझ गया कि वह मेरी बेक़रारी को समझ मुझे ताना मार रही हैं. जी किया छत पर पड़ा ईंटा उठा कर उन के ऊपर दे मारूं पर डबडबाई आंखें लिए नीचे आ गया.

दोपहर तक अचानक शहर ही जल उठा. नारे तक़दीर और जय श्रीराम के नारों ने गलियों की गंगाजमुनी तहज़ीब को नंगा कर के रख दिया.

मैं समझ ही नहीं पा रहा था कि हो क्या रहा है?

जनरलगंज से अब्बा को ठाकुर चाचा अपनी कार में छिपा कर ले कर आए. हम सब ठाकुर चाचा के घर में छिपा दिए गए. ठाकुर चाचा ने ही ख़बर दी कि हमारी दुकान जला दी गई है. आठ दिन हम उन के घर के नीचे बने तहख़ाने में छिपे रहे. उस वक़्त भी भाभी ने हम सब का बहुत खयाल रखा था. ठाकुर चाचा बाहर के सभी लोगों से छिप कर हमारे लिए बहुत सारे इंतज़ाम करते रहे.

फिर अब्बा ने अपनी और मेरी टोपी बैग में रख कर चेन लगा दी.  रात के अंधेरे में हमें अपना शहर और देश दोनों छोड़ कर विदेश जाना पड़ा था. कई बरसों तक अब्बा और ठाकुर चाचा का टैलीफ़ोन पर संपर्क बना रहा. फिर वक़्त ने दूरियों को गले लगा लिया.

बीते कई वर्षों के अंतराल बाद इस साल कई बार भाभी का फ़ोन आया कि उन की तबीयत बहुत ख़राब है, वे मिलना चाहती हैं. तब मुझे दुबई से आना ही पड़ा. भाभी का सफ़ेद चेहरा पुराने काग़ज़ सा पीला पड़ा हुआ था.

मिलते ही भाभी ने हमें हमारे घर के काग़ज़ दिए और कहा- “बहुत सालों से आप की अमानत संभाली हुई थी. अब आप के हवाले करती हूं. बड़ों की दोस्ती में कोई दाग़ न लगे, इसीलिए अपनों से लड़ कर भी हवेली बचाती रही.”

मुझ से रहा न गया, पूछ ही बैठा- “भाभी, आप इतनी अच्छी हो, फिर भी आप से एक बात पूछना चाहता हूं.”

“तारा के बारे में?”

“नहीं, आप बस यह बताइए जब आप ने हमारे परिवार का तब से ले कर अब तक इतना खयाल रखा तो आप को मेरा और तारा का मिलन क्यों मंज़ूर नहीं था?”

“आप अभी तक बात को दिल में गांठ बांध कर बैठे हैं.”

“जी, मुझे तारा कभी नहीं भूली यहां तक कि मैं ने अपनी बेटी का नाम भी तारा ही रखा है. ज़िंदगी में आगे भी बढ़ा. जितना खोया था उस से कहीं ज़्यादा पाया. पर तारा मेरी दुनिया में आज भी टिमटिमाती रहती है.”

“बिस्मिल, चंद सांसें बची हैं. आप से सच ही कहूंगी. मैं इश्क़ की दुश्मन नहीं थी. मैं तो ख़ुद इश्क़ की मारी हुई थी. आप के भाईसाहब, जिन्हें मैं ब्याही गई थी, उम्र में मुझ से 10 साल बड़े थे. ऐसा नहीं था कि यह बात हमारी अम्मा और बाऊजी को अखरी न हो. वे चाहते तो मेरे लिए मेरा हमउम्र भी तलाश सकते थे किंतु उन्हें हमारे इश्क़ का पता चल गया था. बस, मेरी पढ़ाई छुड़वा कर बिना कुछ भी सोचेसमझे तुरंत हमारी शादी कर दी गई. हमारी सहेली ने ही हमें बताया था कि उस ने ज़हर ख़ा कर अपनी जान दे दी थी. आप की ही तरह वह भी अपनी अम्मी का इकलौता ही था.”

यह सब कहते हुए भाभी की आंखें भीग गईं. उन की गहराई जान कर मेरा सिर उन के लिए और झुक गया. उन का हाथ थाम कर मैं ने पूछा, “भाभी, तारा कैसी है?

भाभी ने आंखें मूंदते हुए कहा, “जैसी आप की यादों में है उसे वैसी ही रहने दीजिए.”

भाभी गहरी नींद सो चुकी थीं. मैं छत पर चला आया. दरक चुकी दीवार के बीच भी नीम के नन्हेंनन्हें 2 पौधे मुसकरा रहे थे. कड़वी नीम गहरी चोट पर भी ठंडा लेप ही देती है, बिलकुल भाभी की तरह.

लेखिका : ज्योत्सना सिंह

Online Hindi Story : हूबहू वही मुसकान

Online Hindi Story : ‘‘आंटी, आप बारबार मुझे इस तरह क्यों घूर रही हैं?’’ मेघा ने जब एक 45 साल की प्रौढ़ा को अपनी तरफ बारबार घूरते देखा तो उस से रहा न गया. उस ने आगे बढ़ कर पूछ ही लिया, ‘‘क्या मेरे चेहरे पर कुछ लगा है?’’

‘‘नहीं बेटा, मैं तुम्हें घूर नहीं रही हूं. बस, मेरा ध्यान तुम्हारी मुसकराहट पर आ कर रुक जाता है. तुम तो बिलकुल मेरी बेटी जैसी दिखती हो, तुम्हारी तरह उस के भी हंसते हुए गालों पर गड्ढे पड़ते हैं,’’ इतना कह कर सुनीता पीछे मुड़ी और अपने आंसुओं को पोंछती हुई मौल से बाहर निकल गई. तेज कदमों से चलती हुई वह घर पहुंची और अपने कमरे में बैड पर लेट कर रोने लगी. उस के पति महेश ने उसे आवाज दी, ‘‘क्या हुआ, नीता?’’ पर वह बोली नहीं. महेश उस के पास जा कर पलंग पर बैठ गया और सुनीता का सिर सहलाता रहा, ‘‘चुप हो जाओ, कुछ तो बताओ, क्या हुआ? किसी ने कुछ कहा क्या तुम से?’’

‘‘नहीं,’’ सुनीता भरेमन से इतना ही कह पाई और मुंह धो कर रसोई में नाश्ता बनाने के लिए चली गई. महेश को कुछ समझ में नहीं आया. वह सुनीता से बहुत प्यार करता है और उस की जरा सी भी उदासी या परेशानी उसे विचलित कर देती है. वह उसे कभी दुखी नहीं देख सकता. वह प्यार से उसे नीता कहता है. वह उस के पीछेपीछे रसोई में चला गया और बोला, ‘‘नीता, देखो, अगर तुम ऐसे ही दुखी रहोगी तो मेरे लिए बैंक जाना मुश्किल हो जाएगा. अच्छा, ऐसा करता हूं कि आज मैं बैंक में फोन कर देता हूं छुट्टी के लिए. आज हम दोनों पूरे दिन एकसाथ रहेंगे. तुम तो जानती ही हो कि जब तुम्हारे होंठों की मुसकान चली जाती है तो मेरा भी मन कहीं नहीं लगता.’’

‘‘मुसकान तो कब की हमें छोड़ कर चली गई है,’’ सुनीता के इन शब्दों से महेश को पलभर में ही उस की उदासी का कारण समझ में आ गया. आखिरकार, जिंदगी के 20 साल दोनों ने एकसाथ बिताए थे, इतना तो एकदूसरे को समझ ही सकते थे.

‘‘उसे तो हम मरतेदम तक नहीं भूल सकते पर आज अचानक, ऐसा क्या हो गया जो तुम्हें उस की याद आ गई?’’

सुनीता ने मौल में मिली लड़की के बारे में बताया, ‘‘वह लड़की हमारी मुसकान की उम्र की ही होगी, यही कोई 16-17 साल की. पर जब वह मुसकराती है तो एकदम मुसकान की तरह ही दिखती है. वही कदकाठी, गोरा रंग. मैं तो बारबार चुपकेचुपके उसे देख रही थी कि उस ने मेरी चोरी पकड़ ली और पूछ लिया, ‘आंटी, आप ऐसे क्या देख रहे हैं?’ मैं कुछ कह नहीं पाई और घर वापस आ गई,’’ सुनीता ने फिर कहा, ‘‘चलो, अब तुम तैयार हो जाओ. मैं तुम्हारा खाना पैक कर देती हूं. अब मैं ठीक हूं,’’ और वह रसोई में चली गई. महेश तैयार हो कर बैंक चला गया पर सुनीता को रहरह कर बेटी मुसकान का खयाल आता रहा. एक जवान बेटी की मौत का दर्द क्या होता है, यह कोई सुनीता व महेश से पूछे. मुसकान खुद तो चली गई, इन से इन के जीने का मकसद भी ले गई. 4 साल पहले उन्होंने अपनी इकलौती बेटी को एक दुर्घटना में खो दिया था. हर समय उन के दिमाग में यही खयाल आता था कि क्यों किसी ने मुसकान की मदद नहीं की? अगर कोई समय रहते उसे अस्पताल ले गया होता तो शायद आज वह जिंदा होती. उस पल की कल्पना मात्र से सुनीता के रोंगटे खड़े हो गए और वह फफकफफक कर रोने लगी.

जी भर कर रो लेने के बाद सुनीता जब उठी तो अचानक उसे चक्कर आ गया और वह सोफे का सहारा ले कर बैठ गई. ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ. थोड़ी कमजोरी महसूस हो रही थी तो वह बैडरूम में जा कर पलंग पर ढेर हो गई और फिर उसे याद नहीं कि वह कब तक ऐसे ही पड़ी रही. दरवाजे की घंटी की आवाज से वह उठी और बामुश्किल दरवाजे पर पहुंची. महेश उस के लिए उस का मनपसंद चमेली के फूलों का गजरा लाया था. चमेली की खुशबू उसे बहुत अच्छी लगती थी. पर आज ऐसा न था. आज उसे कुछ अच्छा न लग रहा था, चाह कर भी वह उस गजरे को हाथों में न ले पाई. जैसे ही महेश उस के बालों में गजरा लगाने के लिए आगे बढ़ा तो उस ने उसे रोक दिया, ‘‘प्लीज महेश, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है.’’

‘‘क्या हुआ? क्या तुम अभी तक सुबह वाली बात से परेशान हो?’’ महेश ने कहा और उस का हाथ पकड़ कर उसे सोफे पर अपने पास बैठा लिया. ‘‘आज सुबह से ही कमजोरी महसूस कर रही हूं और चाह कर भी उठ नहीं पा रही हूं,’’ सुनीता ने बताया. महेश ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘अरे कुछ नहीं है. वह सुबह वाली बात ही तुम सोचे जा रही होगी और मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि तुम ने खाना भी नहीं खाया होगा.’’सुनीता चुपचाप अपने पैरों को देखती रही.

‘‘अच्छा चलो, आज बाहर खाना खाते हैं. बहुत दिन हुए मैं अपनी बीवी को बाहर खाने पर नहीं ले कर गया.’’ महेश सुनीता को उस उदासी से छुटकारा दिलाना चाहता था जो हर पल उसे डस रही थी. उस के लिए शायद यह दुनिया की आखिरी चीज होगी जो वह देखना चाहेगा – सुनीता का उदास चेहरा. उस के तो दो जहान और सारी खुशियां सुनीता तक ही सिमट कर रह गई थीं, मुसकान के जाने के बाद. दोनों तैयार हो कर पास के होटल में खाना खाने चले गए. महेश ने उन सभी चीजों को मंगवाया जो सुनीता की मनपसंद थीं ताकि वह उदासी से बाहर आ सके.

‘‘अरे बस करो, मैं इतना नहीं खा पाऊंगी,’’ जब महेश बैरे को और्डर लिख रहा था तो उस ने बीच में ही कह कर रोक दिया.

‘‘अरे, तुम अकेले थोडे़ ही न खाओगी, मैं भी तो खाऊंगा. भैया, तुम जाओ और फटाफट से सारी चीजें ले आओ. मैं अपनी बीवी को अब और उदास नहीं देख सकता.’’ एक हलकी मुसकान सुनीता के होंठों पर फैल गई. यह सोच कर कि महेश उस से कितना प्यार करता है और अपनेआप पर उसे गर्व भी हुआ ऐसा प्यार करने वाला पति पा कर. खाना खाने के बाद सुनीता की तबीयत कुछ संभल गई. दोनों मनपसंद आइसक्रीम खा कर घर लौट आए. इतनी गहरी नींद में सोई सुनीता कि सुबह देर से आंख खुली. उस ने खिड़की से बाहर झांक कर देखा तो बादल घिरे हुए थे. फिर उस ने पास लेटे महेश को देखा. वह चैन की नींद सो रहा था. एक रविवार को ही तो उसे उठने की जल्दी नहीं होती बाकी दिन तो वह व्यस्त रहता है. फ्रैश हो कर वह रसोई में चली गई चाय बनाने. जब तक चाय बनी, महेश उठ कर बैठक में अखबार ले कर बैठ गया. रोज का उन का यही नियम होता था-एकसाथ सुबहशाम की चाय, फिर अपनेअपने काम की भागदौड़. बाहर बादल गरजने लगे और फिर पहले धीरे, फिर तेज बारिश होने लगी. अचानक सुनीता को लगा कि कोई बाहर खड़ा है. उस ने खिड़की में से झांका. एक लड़की खड़ी थी. उस ने जल्दी से दरवाजा खोला तो देखा वह वही मौल वाली लड़की थी. उसे दोबारा देख कर सुनीता बहुत खुश हुई, ‘‘अरे बेटा, तुम आ जाओ, अंदर आ जाओ.’’

‘‘नहीं आंटी, मैं यहीं ठीक हूं,’’ उस ने डरते हुए कहा. वह कौन सा उसे जानती थी जो उस के घर के अंदर चली जाती. सुनीता ने बड़े प्यार से उस का हाथ पकड़ा और उसे खींच कर अंदर ले आई.

‘‘आंटी, आप यहां रहती हैं? मैं तो कई बार इधर से गुजरती हूं पर मैं ने आप को नहीं देखा.’’ ‘‘हां बेटा, मैं जरा घर में ही व्यस्त रहती हूं.’’

‘‘आंटी, आई एम सौरी. शायद मैं ने आप का दिल दुखाया,’’ मेघा ने कहा.

महेश एक पल को मेघा को देख कर हतप्रभ रह गया. उसे अंदाजा लगाते देर नहीं लगी कि वह मौल वाली लड़की ही है, ‘‘आओ बेटा बैठो, हमारे साथ चाय पियो.’’ उस ने घबराते हुए महेश से नमस्ते की और बोली, ‘‘अंकल, मैं चाय नहीं पीती.’’

‘‘मुसकान भी चाय नहीं पीती थी. बस, कौफी की शौकीन थी. आजकल के बच्चे कौफी ही पसंद करते हैं,’’ ऐसा बोल कर सुनीता रसोई में चली गई. मेघा भी उस के पीछेपीछे रसोई में चली गई.

‘‘तुम्हारा घर पास में ही है शायद?’’ सुनीता ने पूछा.

‘‘हां आंटी, अगली गली में सीधे हाथ को मुड़ते ही जो तीसरा छोटा सा घर है वही मेरा है,’’ मेघा ने बताया. ‘‘अच्छा, वह नरेश शर्मा के साथ वाला?’’ महेश ने पूछा.

‘‘जी हां, वही. मैं रोज यहां से अपने कालेज जाती हूं. आज रविवार है सो अपनी सहेली से मिलने जा रही थी. बारिश तेज हो गई, इसलिए यहीं पर रुक गई.’’ ‘‘कोई बात नहीं बेटा, यह भी तुम्हारा ही घर है. जब मन करे आ जाया करना, तुम्हारी आंटी को अच्छा लगेगा,’’ महेश ने कहा, ‘‘जब से मुसकान गई है तब से इस ने अपनेआप को इस घर में बंद कर लिया है, बाहर ही नहीं निकलती.’’ ‘‘मेरा नहीं मन करता किसी से भी बात करने का. जब से मुसकान गई है…’’ इतना बोलते ही सुनीता की रुलाई छूट गई तो मेघा ने उस के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘आंटी, यह मुसकान कौन है?’’

‘‘मुसकान हमारी बेटी थी जिसे 4 साल पहले हम ने एक ऐक्सिडैंट में खो दिया.’’ मेघा ने देखा सुनीता आंटी लाख कोशिश करे अपना दुख छिपाने की पर फिर भी उदासी उन पर, अंकल पर और पूरे घर पर पसरी हुई थी.

इस बीच महेश बोले, ‘‘हौसला रखो नीता, मैं हूं न तुम्हारे साथ, बस मुसकान का इतना ही साथ था हमारे साथ.’’ इधर, मेघा ने अब जिज्ञासा जाहिर की, ‘‘आंटी, आप मुझे विस्तार से बताइए, क्या हुआ था.’’ ‘‘बेटा, हमारी शादी के 3 साल बाद मुसकान हमारे घर आई तो हमें ऐसा लगा कि इक नन्ही परी ने जन्म लिया है. हमारे घर में उस की मुसकराहट हूबहू तुम्हारे जैसी थी, ऐसे ही गालों में गड्ढे पड़ते थे.’’

‘‘ओह, तो इसलिए उस दिन आप मुझे मौल में बारबार मुड़मुड़ कर देख रही थीं.’’ ‘‘हां बेटा, अब तुम्हें सचाई पता चल गई, अब तो तुम नाराज नहीं होना अपनी आंटी से,’’ महेश ने कहा.

‘‘नहीं अंकल, वह तो मैं कब का भूल गई.’’

‘‘खुश रहो बेटा,’’ कहते हुए महेश चाय पीने लगे. सुनीता ने मेघा को बताना जारी रखा, ‘‘मुसकान को बारिश में घूमना बहुत पसंद था. हमारे लाड़प्यार ने उसे जिद्दी बना दिया था. इकलौती संतान होने से वह अपनी सभी जायजनाजायज बातें मनवा लेती थी. जब उस ने 10वीं की परीक्षा पास की तो स्कूटी लेने की जिद की. हम ने बहुत मना किया कि तुम अभी 15 साल की हो, 18 की होने पर ले लेना, पर वह नहीं मानी. खानापीना, हंसना, बोलना सब छोड़ दिया. हमें उस की जिद के आगे झुकना पड़ा और हम ने उसे स्कूटी ले दी. मैं ने उसे ताकीद की कि वह स्कूटी यहीं आसपास चलाएगी, दूर नहीं जाएगी. इसी शर्त पर मैं ने उसे स्कूटी की चाबी दी. वह मान गई और हम से लिपट गई. ‘‘उस दिन वह जिद कर के स्कूटी से अपनी सहेली के घर चली गई. हम उस का इंतजार कर रहे थे. उस दिन भी ऐसी ही बारिश हो रही थी. 2 घंटे बीत गए तब सिटी अस्पताल से फोन आया, ‘जी, हमें आप का नंबर एक लड़की के मोबाइल से मिला है. आप कृपया कर के जल्द सिटी अस्पताल पहुंच जाएं.’ ‘‘डर और घबराहट के चलते मेरे पैर जड़ हो गए. हम दोनों बदहवास से वहां पहुंचे. देखा, हमारी मुसकान पलंग पर लेटी हुई थी, औक्सीजन लगी हुई थी, सिर पर पट्टियां बंधी हुई थीं और साथ वाले पलंग पर उस की सहेली बेहोश थी. जब उसे होश आया तो उस ने बताया, ‘हम दोनों बारिश में स्कूटी पर दूर निकल गईं. पास से एक गाड़ी ने बड़ी तेजी से ओवरटेक किया, जिस से हमें कच्चे रास्ते पर उतरना पड़ा और उस गीली मिट्टी में स्कूटी फिसल गई. हम दोनों गिर गए और बेहोश हो गए. उस के बाद हम यहां कैसे पहुंचे, नहीं मालूम.’ ‘‘इसी बीच डाक्टर आ गए. उन्होंने मुझे और महेश को बताया कि सिर पर चोट लगने से बहुत खून बह गया है. हम ने सर्जरी तो कर दी है पर फिर भी अभी कुछ कह नहीं सकते. अभी 48 घंटे अंडर औब्जर्वेशन में रखना पड़ेगा. डाक्टर की बात सुन कर हम रोने लगे. ये भी परेशान हो गए. पलभर में हमारी दुनिया ही बदल गई. नर्स ने कहा, ‘घबराइए नहीं, सब ठीक हो जाएगा,’ तकरीबन 2 घंटे बाद मुसकान को होश आया,’’ बोलतेबोलते सुनीता का गला रुंध आया तो वह चुप हो गई.

‘‘फिर क्या हुआ अंकल? प्लीज, आप बताइए?’’ मेघा ने डरते हुए पूछा. महेश के चेहरे पर अवसाद की गहरी परत छा गई थी तो सुनीता ने कहा, ‘‘वह जब होश में आई तो उस से कुछ कहा ही नहीं गया. बस, अपने हाथ जोड़ दिए और हमेशा के लिए शांत हो गई.’’ और फिर सुनीता फूटफूट कर रोने लगी. उन का रुदन देख कर मेघा की भी रुलाई छूट गई. उसे समझ नहीं आया कि वह उन से क्या कहे. उस ने सुनीता और महेश का हाथ अपने हाथों में ले कर बस इतना ही कहा, ‘‘मुझे अपनी मुसकान ही समझिए और मैं पूरी कोशिश करूंगी आप की मुसकान बनने की.’’

उन दोनों के मुंह से बस इतना ही निकला, ‘‘खुश रहो बेटा.’’ बाहर बारिश थम चुकी थी और अंदर तूफान गुजर चुका था. मेघा वापस आने का वादा कर के वहां से चली गई. उस से बातें कर के दोनों बहुत हलका महसूस कर रहे थे. दोनों रविवार का दिन अनाथ आश्रम में गरीब बच्चों के साथ बिताते थे. दोनों कपड़े बदल कर वहां चले गए. मेघा जब भी कालेज जाती तो अकसर सुनीता और महेश को बाहर लौन में बैठे देखती तो कभी हाथ हिलाती, कभी वक्त होता तो मिलने भी चली जाती थी. वक्त गुजरने लगा. मेघा के आने से सुनीता अपनी सेहत को बिलकुल नजरअंदाज करने लगी. यदाकदा उसे चक्कर आते थे, कई बार आंखों के आगे धुंधला भी नजर आता तो वह सब उम्र का तकाजा समझ कर टाल जाती. इंतजार करतेकरते 10 दिन हो गए पर मेघा नहीं आई, न ही वह कालेज जाती नजर आई. दोनों को उस की चिंता हुई और जब दोनों से रहा नहीं गया तो वे एक दिन उस के घर पहुंच गए.दरवाजे की घंटी बजाई तो एक 49-50 साल की अधेड़ महिला ने दरवाजा खोला, ‘‘कहिए?’’

‘‘क्या मेघा यहीं रहती है?’’ महेश ने पूछा.

‘‘जी हां, आप सुनीता और महेशजी हैं?’’

सुनीता ने उत्सुकता से जवाब दिया, ‘‘हां, मैं सुनीता हूं और ये मेरे पति महेश हैं.’’

‘‘आप अंदर आइए. प्लीज,’’ बोल कर सुगंधा उन्हें कमरे में ले आई. पूरा घर 2 कमरों में सिमटा था. एक बैडरूम और एक बैठक, बाहर छोटी सी रसोई और स्नानघर. मेघा यहां अपनी मां सुगंधा के साथ अकेली रहती थी उस के पिताजी, जब वह बहुत छोटी थी तब ही संसार से जा चुके थे. सुगंधा एक स्कूल में अध्यापिका थी जिस से उन का घर का गुजारा चलता था. ‘‘मेघा कहां है? बहुत दिन हुए, वह घर नहीं आई तो हमें चिंता हुई. हम उस से मिलने आ गए,’’ सुनीता ने चिंता व्यक्त की.

‘‘वह दवा लेने गई है,’’ सुगंधा ने कहा.

‘‘आप को क्या हुआ बहनजी?’’ महेश ने पूछा.

सुगंधा उदास हो गई, ‘‘मेरी दवा नहीं भाईसाहब, वह अपनी दवा लेने गई है.’’

‘‘उसे क्या हुआ है?’’ दोनों ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘2-3 साल पहले की बात है. इसे बारबार यूरीन इनफैक्शन हो जाता था. डाक्टर दवा दे देते तो ठीक हो जाता पर बाद में फिर हो जाता. पिछले 10 दिनों से इनफैक्शन के साथ बुखार भी है. पैरों में सूजन भी आ गई है. मैं ने बहुत मना किया पर फिर भी जिद कर के दवा लेने चली गई. अभी आ जाएगी.’’

‘‘डाक्टर ने क्या कहा?’’ सुनीता ने पूछा.

‘‘डाक्टर को डर है कि कहीं किडनी फेल्योर का केस न हो,’’ कह कर वे रोने लगीं. सुनीता ने उठ कर उन्हें गले से लगा लिया और सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘सुगंधाजी, ऐसा कुछ नहीं होगा. सब ठीक हो जाएगा.’’

‘‘सुनीताजी, डाक्टर ने कुछ टैस्ट करवाए हैं. कल तक रिपोर्ट आ जाएगी,’’ सुगंधा ने बताया. इतने में मेघा आ गई. उस की मुसकान होंठों से गायब हो चुकी थी, रंग पीला पड़ गया था, आंखों के आसपास सूजन आ गई थी, वह बहुत कमजोर लग रही थी. सुनीता और महेश उसे देख कर सन्न रह गए. वे वहां ज्यादा देर न बैठ सके. चलते समय महेश ने मेघा के सिर पर हाथ रखा और सुगंधा से कहा, ‘‘बहनजी, कल हम आप के साथ रिपोर्ट लेने चलेंगे,’’ ऐसा कह कर वे दोनों अपने घर लौट आए. घर आ कर सुनीता सोफे पर ऐसी ढेर हुई कि काफी देर तक हिली ही नहीं. जब महेश ने उस से अंदर जा कर आराम करने को कहा तो वह अपनेआप को चलने में ही असमर्थ पा रही थी. महेश उसे सहारा दे कर अंदर ले गया, ‘‘परेशान न हो, सब ठीक हो जाएगा.’’ अगले दिन दोनों सुगंधा के साथ अस्पताल चले गए. उन पर पहाड़ टूट पड़ा जब डाक्टर ने बताया, ‘यह केस किडनी फेल्योर का है. अब मेघा को डायलिसिस पर रहना होगा जब तक डोनर किडनी नहीं मिल जाती.’ सुगंधा तो बेहोश हो कर गिर ही जाती अगर महेश ने उसे सहारा न दिया होता. उस ने उसे कुरसी पर बैठाया और पानी पिलाया, ‘‘हिम्मत रखिए सुगंधाजी, अगर आप ऐसे टूट जाएंगी तो मेघा को कौन संभालेगा? हम जल्दी मेघा के लिए डोनर ढूंढ़ लेंगे, आप चिंता न करें.’’

मेघा की बीमारी से दोनों परिवारों पर दुख का पहाड़ टूट पड़ा. सुनीता तो अब ज्यादातर बीमार ही रहने लगी और अचानक एक दिन बेहोश हो कर गिर पड़ी. महेश अभी बैंक जाने के लिए तैयार ही हो रहा था कि धम्म की आवाज से रसोई में भागा तो देखा सुनीता नीचे फर्श पर बेहोश पड़ी हुई है. उस के हाथपैर फूलने लगे पर फिर हिम्मत कर के उस ने एंबुलैंस को फोन कर के बुलाया. इमरजैंसी में उसे भरती किया गया और सारे टैस्ट किए गए पर कुछ हासिल न हो सका. सुनीता हमेशा के लिए चली गई. डाक्टर ने जब कहा, ‘‘यह केस ब्रेन डैड का है, हम उन्हें बचा न पाए,’’ तो महेश धम्म से कुरसी पर गिर गया और सुनीता का चेहरा उस की आंखों के आगे घूमने लगा. पता नहीं वह कितनी देर वहीं पर उसी हाल में बैठा रहा कि अचानक वह फुरती से उठा और डाक्टर के पास जा कर बोला, ‘‘डाक्टर साहब, मैं सुनीता के और्गन डोनेट करना चाहता हूं. मैं चाहता हूं कि सुनीता की किडनी मेघा को लगा दी जाए.’’ डाक्टर ने फटाफट सारे टैस्ट करवाए और सुगंधा व मेघा को अस्पताल में बुला लिया. संयोग ऐसा था कि सुनीता की किडनी ठीक थी और वह मेघा के लिए हर लिहाज से ठीक बैठती थी. खून और टिश्यू सब मिल गए.औपरेशन के बाद डाक्टर ने कहा, ‘‘औपरेशन कामयाब रहा. बस, कुछ दिन मेघा को यहां अंडर औब्जर्वेशन रखेंगे और फिर वह घर जा कर अपनी जिंदगी सामान्य ढंग से जिएगी.’’

सुगंधा ने आगे बढ़ कर महेश के पांव पकड़ लिए और रोने लगीं. महेश ने उन्हें उठाते हुए कहा, ‘‘सुगंधाजी, आप रोइए नहीं. बस, मेघा का खयाल रखिए.’’ घर आ कर सब क्रियाकर्म हो गया. बारीबारी से लोग आते रहे, अफसोस प्रकट कर के जाते रहे. अंत में महेश अकेला रह गया सुनीता की यादों के साथ. उस ने उठ कर सुनीता की फोटो पर हार चढ़ाया. अपने चश्मे को उतार कर अपनी आंखों को साफ करते हुए बोला, ‘‘देखा नीता, हमारी मुसकान को तो मैं बचा नहीं पाया, पर इस मुसकान को तुम ने बचा लिया.’’ जैसे ही महेश पलटा तो उस ने देखा कि उस के पीछे मेघा खड़ी थी और उसी ‘डिंपल वाली मुसकान के साथ जैसे कह रही हो कि आप अकेले नहीं हैं, यह ‘मुसकान’ है आप के साथ.

Family Story : सी सा – मां और बीवी के बीच फंसा पूरन ?

Family Story : पूरन ने चैन की सांस ली. सालभर से वह परेशान था. वह दो पाटों के बीच पिसा जा रहा था. एक पाट थी मां और दूसरा थी पत्नी. पूरन इकोनौमिक्स में एमबीए था और एक एमएनसी में सीनियर ऐनैलिस्ट की जौब पर था. वह अलमोड़ा का निवासी था पर उस की शिक्षादीक्षा इलाहाबाद में हुई थी. अब यहीं के ब्रांच में उसे नौकरी मिल गई. पिता का देहांत बचपन में हो गया था. मां अभी भी पहाङिन बेटी थी. पति की अकाल मौत के बाद वह इकलौते बेटे को ले कर इलाहाबाद चली आई. उस ने एक स्कूल में नर्सरी में आया का काम कर के बेटे को उच्च शिक्षा दिलाई.

पढ़ाई पूरी करने के बाद बेटे को नौकरी भी मिल गई. 2 साल पहले एक सुंदर लङकी देख कर मां ने उस की शादी भी कर दी. पत्नी का नाम तारा था. उस का पिता सचिवालय में विभागाध्यक्ष था. तारा हर दृष्टि से सुंदर थी. उस ने हिंदी में प्रथम श्रेणी में एमए किया था. गृहकार्य में वह अधिक कुशल नहीं थी. पहाड़ी रीतिरिवाज, खानपान, भाषा आदि से भी वह अपरिचित थी, क्योंकि उस के पूर्वज 3 पीढ़ी पहले लखनऊ आ बसे थे. अब तो वे पहाड़ों पर सैलानियों की भांति ही जाते थे.

शादी के बाद तारा का 1 साल आनंद से बीता. वह कभी इलाहाबाद में रहती, कभी अपनी मां के पास लखनऊ चली जाती. सासबहू दोनों ही एकदूसरे को तौल रही थीं, आपस में तालमेल बैठाने का प्रयत्न कर रही थीं। सालभर बाद जब जम कर साथ रहने का अवसर आया तो दोनों एकदूसरे की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं.

मां का पहले से पूरन पर पूरा अधिकार था. सात फेरे पड़ते ही जैसे किसी ने उस के अधिकार को चुनौती दे दी थी. उसे लगता, जैसे बेटे पर उस की पकड़ ढीली होती जा रही है. वह उस के हाथ से निकला जा रहा है. उस की ओर कम ध्यान देता है. उस की कम सेवा करता है. फुजूलखर्ची अधिक करता है और रात देर तक जागजाग कर अपना स्वास्थ्य चौपट कर रहा है.

मां को रात बहुत देर से और बहुत कम नींद आती. पास के कमरे से पूरन और तारा की गुटरगूं देर रात सुनाई पड़ती रहती. मां करवटें बदलती रहती और गठिया के दर्द को सहती रहती. मां ने सोचा था कि बहू के आ जाने पर वह पलंग पर बैठी राज करेगी.

उधर तारा की सब से बड़ी कसक यह थी कि पूरन उसे कहीं हनीमून के लिए नहीं ले गया था. शादी जिंदगी में एक ही बार तो होती है. पूरनचंद उसे मां के कारण ही हनीमून के लिए नहीं ले गया था. कहता रहा, ‘‘मां अकेली कैसे रहेगी.’’

तारा सोचती, ‘मां कोई बच्चा है कि उसे बंदर उठा ले जाएगा. पति न हुआ दूधपीता बच्चा हो गया, जो हर समय मिमियाता रहता है. हर समय मां का ही गुणगान करता रहता है. मां की सेवा, मां का त्याग, मां का परिश्रम. कौन मां अपने बच्चे के लिए यह सब नहीं करती. पशुपक्षी भी अपने बच्चों का ध्यान रखते हैं. मां को जब देखो, तब पहाड़ी गांव वाले व्यंजनों की रट लगी रहती है. उस ने कई बार कहा है कि वह बनाना नहीं जानती, न ही उसे पसंद है. पर वह उन्हीं के गुण गाती रहती है.’

लखनऊ में तो तारा रोज शाम को घूमने निकल जाती थी, सहेलियों के साथ या भाइयों के साथ. यहां शाम को बोर होती. कितनेकितने दिन हो जाते फिल्म देखे, शौपिंग किए, घूमने गए. क्यों? कारण वही, मां का पुछल्ला. मां बोर न हो, पत्नी भले ही बोर होती रहे. टीवी या मोबाइल पर आखिर कितना कुछ क्या देखा जाए.

हाथपैर मारने के बाद तारा को एक प्राइवेट स्कूल में नौकरी भी मिल गई.
मां चाहती कि बेटा दिनभर का हाराथका आता है, घर पर आराम करे. पत्नी जानती थी कि दफ्तर में कोई चक्की तो पीसता नहीं है. मां का मन करता है कि वह भी उन लोगों के साथ जाए. कोई जानपहचान का मिले तो बता सके कि यह मेरा बेटा पूरन है और यह उस की बहू. पर सिनेमा हौल में 3 घंटे बैठे रहना उस के बस का नहीं. बिना औटो के 2 कदम भी चलना उस से भी कठिन है. फिर औटो में 2 व्यक्ति बैठते हैं, 3 नहीं. तीनों को जाना होता तो टैक्सी करनी पढ़ती.

शौपिंग में मां की पंसद आधुनिकाओं के लिए कोई अर्थ नहीं रखती. दृष्टि क्षीण होने के कारण वैसे भी वह ठीक रंग या डिजाइन नहीं आंक पाती थी और आजकल जो भी मौल थे उन में चलना बहुत पड़ता था. घूम भी वह ज्यादा नहीं पाती थी. पर अकेला घर उसे काटने को दौड़ता. उस का जी घबराने लगता. कभी कोई पड़ोसिन आ जाती तो वह बेटेबहू की अपने प्रति उदासीनता की चर्चा करने लगती. पड़ोसिनें भी इक्कादुक्का ही थीं क्योंकि उन के आसपास जनरल कास्ट भी ज्यादा थे जो अब उन से बात करने में कतराते थे, क्योंकि वे पिछङी जाति से थे।

तारा के संबंध में वह पूरन से भी चोरीछिपे कहती. सलोनी सूरत पर रीझ जाने के अपने निर्णय पर मलाल करती. बहू के आलसी होने, गृहकार्य में कुशल न होने, सेवा न करने आदि की बात कहती. पुराने जमाने की, आपबीती कहती रहती. पूरन हां…हूं करता रहता. क्या कहता. उसे तो अपने प्रति समर्पण में तारा में कहीं कमी नहीं दिखाई देती थी. पर वह अशिक्षित सी मां की आंखों पर लगा एक पीढ़ी पुराना चश्मा कैसे उतार फेंकता. मां के संस्कारों को कैसे पलटता. जिस मां का समूचा स्नेह उसी को मिला हो, उसे कैसे समझाता.

मां और तारा दोनों ही पूरन के दफ्तर से लौटने की प्रतीक्षा करतीं. तारा भी स्कूल से 2 बजे तक आ जाती थी. उस का भी समय काटे नहीं कटता था. यदि वह मां के पास बैठ जाता तो तारा के बढ़े रक्तचाप का ज्ञान उसे रसोई में गिरतेखनकते बरतनों से हो जाता. वह रसोई में नहीं होती तो धपधप कर के आंगन में कई बार बेमतलब गुजरती. स्वागत की मुसकराहट के स्थान पर उस के अधरों पर उपेक्षा का भाव रहता.
यदि पूरन सीधा पत्नी के पास भीतर चला जाता तो मां कराहती, घिसटती, घुटनों के जोड़ों में दर्द को कोसती, स्वयं कमरे के बाहर बरामदे में आ जाती और कहने लगती, ‘‘कफ सिरप से खांसी में तो लाभ है, पर जोड़ों के दर्द में कतई फायदा नहीं है. उन से यह भी कहना कि भूख एकदम कम हो गई है. पूछना, मुनक्के सर्दी तो नहीं करेंगे…’’

फिर वह साड़ी ऊपर उठा कर घुटनों की सूजन पर हाथ फेरने लगती. तारा को चायनाश्ता लाने का आदेश देती.
तारा कुढ़ जाती. मां नहीं कहेंगी तो क्या वह नाश्ता नहीं देगी. रात देर तक तारा का मूड बिगड़ा रहता. वह कहती कि मां का बुढ़ापा है, रोग भी है पर वह नाटक अधिक करती हैं. दिन में खुद 2 बार बाथरूम हो आती हैं, गैस पर पानी गरम कर लेती हैं, पर पूरन के आते ही ठिनकने लगती हैं.

पूरन समझाता, ‘‘बच्चे और बूढ़े एकजैसे होते हैं. जीवन के आखिरी दौर में हैं, जितनी बन पड़े सेवा कर लो.’’

तारा सुबह जल्दी उठती थी. पर स्कूल जाने में कुछ और काम करने का समय नहीं होता. पूरन भी सवेरे जल्दी उठता. तारा को बैड पर ही चाय देता. उस के बिना तो उस की आंख ही नहीं खुलती थी. फिर मां को हाथमुंह बिस्तर पर ही धोने को गरम पानी देता. बाथरूम ले जाता. शेव बना कर नहाताधोता और बाजार से दूध का पैकेट और सब्जी लेने चला जाता. उसी समय लौट कर नाश्ता करता और काम पर चल देता.

शाम को हाराथका लौटता. चायनाश्ते के बाद मां के पास बैठता. उस के जोड़ों पर हाथ फेरता, तेल लगाता, दवा के बारे में पूछता, डाक्टर की दवाई लाने की पेशकश करता. तारा तब तक खाना बनाती. पूरन मां को गरम खाना खिलाता. दर्द अधिक बताती तो सिंकाई करता. उसे बिस्तर पर लिटा कर फिर अपराधी की तरह तारा के सम्मुख जाता.

तारा खाना सामने रखती हुई कहती, ‘‘मिल गई छुट्टी?’’

सोने जाने से पहले पूरन फिर एक बार मां को देख कर आता, दवाई देता.
मां तो यहां तक चाहती थीं कि पूरन या तारा में से कोई एक रात को उस के ही कमरे में सोए, वह घूमाफिरा कर कहती, ‘‘रात को आंख खुल जाती तो बहुत जी घबराता है. कोई पानी देने वाला भी नहीं होता. किसी दिन ऐसे ही तड़पतड़प कर मर जाऊंगी. कोई पास हो तो दर्द बढ़ने पर दवा तो मल सकता है. बाथरूम जाना होता है तो बिजली का स्विच खोलने में दीवार से टकरा जाती हूं.’’

पूरन कहता, ‘‘मां पुकार लिया करो न. बराबर के कमरे में ही तो हम सोते हैं. रातभर बिजली खुली रखा करो.’’ पर रोशनी में मां को नींद नहीं आती थी. वह आंखों की रहीसही रोशनी से भी हाथ धो बैठने का डर बताती.

पूरन की अपनी जिंदगी जैसे कुछ रह ही नहीं गई थी. भरसक दोनों की सेवा करता था. पर कोई भी उस से संतुष्ट नहीं था. तारा के लिए कपङे लाता तो मां का मुंह टेढ़ा हो जाता, ‘‘मेरे लिए भी कफन ले आया होता. बढ़िया, महंगी दवाएं तो लाता नहीं है और…’’
तारा को सदा शिकायत रहती, ‘‘तुम्हारा सारा वेतन मां की दवादारू पर खर्च हो जाता है और मेरे लिए हाथ तंग…’’

पूरन के अपने शौक तो जैसे हिरण हो गए थे. उस का जी करता, वह दोस्तों में बैठे, गपशप करे. जब घर पर कम रहता तो चिकचिक भी कम सुनने को मिलेगी. आखिर कहता भी तो किस से. करता भी तो क्या. फिर कौन दर्द बांटता है.

सालभर में पूरन टूट सा गया. दिनभर दफ्तर में खपता और शेष मां व पत्नी में खप जाता. सासबहू का माध्यम बनेबने तो वह पिसता चला जाएगा. उसे लगा वह अब अधिक नहीं निभा पाएगा.

एक शाम दफ्तर से लौटते समय मोहल्ले के बाहर पार्क का जंगला पकड़ कर वह 2 मिनट के लिए रुक गया. बच्चे खेल रहे थे. किलकारी मार रहे थे. दौड़ रहे थे. सब से अधिक भीड़ झूलों पर थी. तभी उस की दृष्टि ‘सी सा’ पर संतुलन करती 2 छोटी लड़कियों पर पड़ी स्थिर स्तंभ पर लंबा तख्ता लगा हुआ था. एक लङकी एक छोर पर और दूसरी लङकी दूसरे छोर पर बैठी थी. तख्ता किसी पक्षी के पंखों की तरह हवा में लहरा रहा था.

एक लङका पास में खड़ा था. वह कभी एक छोर पर बैठ जाता, कभी दूसरे पर. जिस छोर पर वह बैठता, वह नीचा हो जाता और दूसरा हलका होने के कारण अनायास ऊपर उठ जाता. ऊपर जाती लङकी चीख पड़ती. लङका खुश हो कर ताली बजाता. हंसने लगता. वह कूद पड़ता तो फिर संतुलन हो जाता. वह बारीबारी कभी इधर के, कभी उधर के छोर पर बैठ कर संतुलन बिगाड़ देता. जिधर वह बैठा होता उस छोर की लङकी स्वयं को सुरक्षित महसूस करती. दूसरी लङकी को अकस्मात ऊपर उठ जाने से गिरने का भय रहता.

पूरनचंद विचार में डूब गया. यही स्थिति तो उस की है. मां के पास बैठता है तो पत्नीत्व डोलने लगता है और पत्नी के पास रहने में मातृत्व डगमगाने लगता है. यदि वह हट जाए, किनारा कर जाए तो दोनों संतुलित रह सकती है. उसे लगा कि असंतुलन का कारण यही है.
रातभर वह कुछ सोचता रहा. अगले दिन उस ने 1 माह की छुट्टी ली और मुंबई में एक मित्र के पास जाने का कार्यक्रम बना लिया. घर पर उस ने कह दिया कि उस का मुंबई में तबादला हो गया है. फिलहाल अकेला जाएगा. मुंबई में मकान आसानी से नहीं मिलता. जब मकान की सुविधा हो जाएगी तब मां व पत्नी को भी ले जाएगा.

मां परेशान हो गई. पूरन के बिना कैसे काम चलेगा. कौन उस की सेवा करेगा. बोली, ‘‘बेटा, तबादला रुक क्यों नहीं सकता.’’

‘‘तरक्की पर जा रहा हूं मां, मार्केटिंग मैनेजर हो कर. अवसर छोड़ दिया तो फिर आगे कोई नहीं पूछेगा. सारी जिंदगी ऐनैलिस्ट में सड़ते रहना पड़ेगा.’’

तारा अलग परेशान थी. कैसे रहेगी अकेली. और फिर मां के साथ या मायके चली जाए. पर स्कूल की जौब भी थी. कम पैसे मिलते थे तो क्या समय तो कटता था और घर के खर्च पूरे होते थे. पर लोग क्या कहेंगे. दोस्त रिश्तेदार थूकेंगे. पीछे कहीं मां दुनिया छोड़ गई तो मिट्टी खराब होगी. रात को आंसुओं से पूरन की छाती भिगोते हुए उस ने भी वही बात कही, ‘‘तबादला रुक नहीं सकता क्या?’’
और पूरन ने वही उत्तर दोहरा दिया.
आखिर पूरन चला गया.

अगली सुबह तारा बिस्तर में ही थी कि सास चाय ले कर आ गई. तारा आश्चर्यचकित आंखें मलमल कर देखती रही. मां ही थी. वह हड़बड़ा कर उठ बैठी. सास बोली, ‘‘गरम पानी करने को गैस जलाई थी. सोचा, तेरी चाय भी बना दूं.’’

घंटे भर बाद मां सब्जी की टोकरी उठाती हुई बोली, ‘‘ला तारा, सब्जी ला दूं. तू इतने में स्कूल जाने की तैयारी कर। दोपहर को क्या खाएगी? यहां तो ठेले वाला दोपहर को आएगा, वह भी बासी सब्जी लिए. बेचेगा भी महंगी. मसालावसाला तो कुछ नहीं लाना है? डाक्टर को अपना हाल बता कर दवाई भी लेती आऊंगी.’’

तारा ने खोएखोए 500 का नोट बढ़ा दिया, ‘मां ने तो बेटे का काम संभाल लिया,’ वह बुदबुदाई.

बाजार से लौट कर मां अपने घुटनों पर तेल मलने बैठ गई. तारा ने जब झाड़ूपोंछा किया तो सास का कमरा भी साफ कर दिया. बिस्तर धूप में डाल दिया. पहले यह काम पूरन करता था. तारा को कमरे में जहांतहां पड़े थूकबलगम से उबकाई आती थी. आज पहली बार उसे घृणा नहीं हुई.
1 सप्ताह में सासबहू पर्याप्त निकट आ गईं, अब मां को पूरन का अभाव नहीं अखर रहा था. कोई तो है उस की देखभाल को. तारा को भी सास से अपनत्व होता जा रहा था. सालभर का अलगाव धीरेधीरे पिघलता जा रहा था. तारा ने अपनी खाट सास के कमरे में ही डाल ली. सास तो जैसे निहाल हो गई.

1 माह बाद पूरन लौटा. आंगन में घुसते ही उस का चेहरा खिल गया. तारा बरामदे में बैठी मां के घुटनों पर तेल मल रही थी. दोनों के चेहरे तनावमुक्त थे. दिनभर दोनों में से किसी ने उस से कोई शिकवाशिकायत नहीं की. पूरन की मां से अकेले में भी बातचीत हुई. वह तारा की भूरिभूरि प्रशंसा कर रही थी. कह रही थी, ‘‘खरा सोना है मेरी तारा.’’

रात को तारा से भेंट होने पर पूरन बोला, ‘‘प्लेन में पहाड़ के एक पंडित मिले थे. मां को जानते हैं. कह रहे थे हरिद्वार भेज दो. वृद्धाश्रम है, सस्ता भी है. लंगर में खा लिया करेंगी. बहुत से बुजुर्ग वहां रहते हैं.’’

तारा तेवर चढ़ाती हुई बोली, ‘‘क्या कह रहे हो. मां क्या कोई हम पर भार है. मैं उन्हें कहीं नहीं भेजने दूंगी. जब तक हैं, यहीं रहेंगी.’’

पूरन की आंखों में खुशी के आंसू छलक आए. अगले दिन उस ने घर पर बताया कि मुंबई की जलवायु माफिक न आने के कारण उस ने इलाहाबाद अपने पुराने पद पर ही तबादला करा लिया है. सास और बहू के मुंह से एकसाथ प्रसन्नता से निकला, ‘‘सच.’’

पूरन के जीवन का ‘सी सा’ पूर्ण संतुलित हो गया था.

दुलहन पर लगा दांव – क्या माया और रवि की साजिश पूरी हो पाई

सुर्ख जोड़े में सजी नईनवेली दुलहन सुलेखा दोस्त जैसे पति रवि राउत को पा कर बहुत खुश थी. यौवन की दहलीज पर उस ने खुली आंखों से जो सपने देखे थे, वे साकार हो गए थे. सुलेखा 15 जुलाई, 2018 को ब्याह कर खुशीखुशी ससुराल आई थी. शादी के 6 दिन बीत जाने के बावजूद उस के हाथों पर पति के नाम की मेहंदी का रंग अभी भी ताजा था.

रवि राउत बिहार के जिला गया के थाना मुफस्सिल क्षेत्र में आने वाले शहीद ईश्वर चौधरी हाल्ट स्थित मोहल्ला कुर्मी टोला के रहने वाला था. उस के पिता श्यामसुंदर कपड़े के व्यापारी थे. गया में उन का कपड़े का काफी बड़ा कारोबार था, जो अच्छा चल रहा था. इस से अच्छी कमाई होती थी. श्यामसुंदर राउत के 3 बेटे थे, रवि, विक्की और शुक्कर. विक्की और शुक्कर पिता के व्यापार में सहयोग करते थे.

सुबह दोनों नाश्ता कर के पिता के साथ दुकान पर चले जाते थे और रात में दुकान बढ़ा कर उन्हीं के साथ घर लौटते थे. जबकि यारदोस्तों की संगत में रह कर रवि की आदतें बिगड़ गई थीं. उस की आदतें सुधारने के लिए श्यामसुंदर ने उस की शादी कर दी थी ताकि बहू के आने पर अपनी जिम्मेदारियों को समझ सके.

बात 21 जुलाई, 2018 की रात की है. पढ़ीलिखी, समझदार सुलेखा ससुराल वालों को रात का भोजन करा कर पति के साथ फर्स्ट फ्लोर पर सोने चली गई. दिन भर की थकीहारी सुलेखा को बिस्तर पर लेटते ही नींद आ गई. रवि भी सो गया.

रवि तब अचानक नींद से उठ बैठा, जब उस के कानों में सुलेखा की दर्दनाक चीख पड़ी. नींद से जाग कर रवि ने पत्नी की ओर देखा तो सन्न रह गया. सुलेखा के गले से तेजी से खून बह रहा था. लगा जैसे किसी ने तेजधार हथियार से गला रेत कर उस की हत्या की कोशिश की हो. खून देख कर रवि बुरी तरह घबरा गया. जब उस की समझ में कुछ नहीं आया तो उस ने चादर से सुलेखा का गला लपेट दिया, ताकि खून बहना बंद हो जाए.

तभी अचानक रवि की नजर एक महिला पर पड़ी. वह अपना चेहरा कपड़े से ढंके हुए थी और उसी कमरे से निकल कर बाहर की ओर भाग रही थी. उस महिला से थोड़ी दूर आगे 2 और महिलाएं तेजी से भागी जा रही थीं.

इस से पहले कि नकाबपोश महिला भागने में सफल हो पाती, सुलेखा की चीख सुन कर उस के देवर विक्की और शुक्कर कमरे में आ गए थे.

रवि और उस के दोनों भाइयों ने दौड़ कर नकाबपोश महिला को पकड़ लिया और लातघूसों से उस की जम कर पिटाई की. नकाबपोश महिला जब बेसुध हो गई तो विक्की ने उस के चेहरे से नकाब उतार दिया. नकाब हटते ही रवि, विक्की और शुक्कर तीनों दंग रह गए. वह महिला रवि के जानने वालों में थी, जिस का नाम माया था. वह सूढ़ीटोला में रहती थी.

उधर ज्यादा खून बहने से सुलेखा की हालत बिगड़ती जा रही थी. इस बीच रवि के भाई विक्की ने 100 नंबर पर फोन कर के इस घटना की सूचना पुलिस कंट्रोलरूम को दे दी थी. कंट्रोलरूम से सूचना मिलते ही थाना मुफस्सिल के थानेदार कमलेश शर्मा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. घटनास्थल पर पहुंच कर उन्होंने हत्या की कोशिश करने वाली माया को आलाकत्ल ब्लेड के साथ गिरफ्तार कर लिया.

सुलेखा की हालत बिगड़ती जा रही थी. रवि उसे इलाज के लिए मगध मैडिकल अस्पताल ले गया और इमरजेंसी वार्ड में भरती करा दिया. डाक्टरों ने उस का इलाज शुरू कर दिया. समय पर इलाज मिल जाने से सुलेखा बच गई. यह 15/16 जुलाई, 2018 की रात ढाई बजे की बात थी.

अगले दिन रवि राउत की नामजद लिखित तहरीर पर मुफस्सिल थाने में माया के खिलाफ 307 आईपीसी के अंतर्गत केस दर्ज कर लिया गया. मुकदमा दर्ज होने के बाद थानेदार कमलेश शर्मा सुलेखा का बयान लेने मगध मैडिकल अस्पताल पहुंचे.

सुलेखा ने कमलेश शर्मा को बताया कि रात एकडेढ़ बजे के करीब उस का पति रवि दरवाजा खोल कर बाहर चला गया था, तभी एक नकाबपोश औरत ने कमरे में घुस कर मुझ पर हमला बोल दिया. एक औरत कमरे के अंदर थी, जबकि दूसरी कमरे के दरवाजे के पास खड़ी थी.

वह वहीं से पूछ रही थी कि सुलेखा मरी या नहीं. मुझ पर नकाबपोश औरत ने न केवल हमला किया बल्कि मुझे तेजाब पिलाने की भी कोशिश की. लेकिन मेरी चीख सुन कर ऊपर आए मेरे देवरों ने मुझे बचा लिया.

पकड़ी गई औरत ने अपना नाम माया बताया. जांच अधिकारी ने जब उस से हमले की वजह पूछी तो वह वजह बताने में असमर्थ रही. वह खुद हैरान थी कि माया ने उस की हत्या करने का प्रयास क्यों किया, जबकि वह उसे जानती तक नहीं थी. सुलेखा की बात सुन कर एसओ कमलेश शर्मा हैरान रह गए.

कमलेश शर्मा को सुलेखा के बयान ने परेशानी में डाल दिया था. इस का जवाब सिर्फ माया ही दे सकती थी या फिर सुलेखा का पति रवि राउत. माया महिला थाने के हवालात में बंद थी. कमलेश शर्मा ने थाने लौट कर आरोपी माया को महिला थाने से बुलवाया, फिर उस से पूछताछ की. माया का बयान सुन कर विवेचक शर्मा अवाक रह गए.

माया ने पुलिस को बताया कि रवि और उस के बीच करीब 3 साल से प्रेम संबंध थे. दोनों एकदूसरे को प्यार करते थे, रवि उस से शादी करना चाहता था. लेकिन अपने घर वालों की वजह से वह ऐसा नहीं कर पाया. अपने बयान में माया एकएक राज से परदा उठाती गई

माया के बयान से इस मामले में एक दिलचस्प मोड़ आ गया. उस के बयान पर विश्वास कर के पुलिस जब रवि से पूछताछ करने मगध मैडिकल अस्पताल पहुंची तो रवि वहां नहीं था. उस की जगह सुलेखा के पास उस का छोटा भाई विक्की बैठा था. पुलिस ने जब विक्की से रवि के बारे में पूछताछ की तो उस ने बताया कि रवि घर पर होगा.

एसओ कमलेश शर्मा ने रवि को अस्पताल बुलाने के लिए एक सिपाही उस के घर भेजा. सिपाही रवि के घर पहुंचा तो वह वहां भी नहीं था.

पूछने पर घर वालों ने बताया कि वह रात से अस्पताल से घर नहीं लौटा है. सिपाही ने लौट कर यह बात एसओ को बता दी. कमलेश शर्मा सोच में पड़ गए कि जब रवि न अस्पताल में है और न ही घर पर, तो वह कहां गया?

इस का मतलब वह फरार हो चुका था. निस्संदेह पत्नी की हत्या के प्रयास के पीछे उस का भी हाथ था. उस के फरार होने से यह बात साफ हो गई कि माया ने जो बयान दिया था, वह सच था. अब इस गुत्थी को सुलझाने के लिए रवि की गिरफ्तारी जरूरी थी. हकीकत जानने के लिए पुलिस ने रवि के मोबाइल फोन की काल डिटेल्स निकलवाई.

काल डिटेल्स से पता चला कि रवि और माया के बीच बातें होती रहती थीं. घटना वाले दिन भी रवि और माया के बीच काफी देर तक बात हुई थी. इस डिटेल्स से पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि रवि ने अपनी प्रेमिका माया के साथ मिल कर पत्नी की हत्या का षडयंत्र रचा था. लेकिन वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाया था.

बहरहाल, सुलेखा ठीक हो कर अस्पताल से घर आ गई, लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी रवि पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ा. इस बीच पुलिस ने माया को अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया था. आखिरकार घटना के एक महीने बाद रवि उस वक्त पुलिस के हत्थे चढ़ गया, जब वह गया रेलवे स्टेशन से कहीं भागने के लिए ट्रेन के इंतजार में वेटिंग रूम में बैठा था.

पुलिस रवि को गिरफ्तार कर के थाने ले आई और सुलेखा की हत्या की योजना जानने के लिए उस से पूछताछ की. चाह कर भी रवि हकीकत को छिपा नहीं सका. उस ने पुलिस के सामने सच उगल दिया. पूछताछ में रवि ने अपनी और माया की प्रेम कहानी सिलसिलेवार बतानी शुरू की.

माया मुफस्सिल थाना क्षेत्र के सूढ़ीटोला की रहने वाली थी. वह शादीशुदा और 3 बच्चों की मां थी. उस का पति मनोहर बाहर रह कर नौकरी करता था. वह 6 महीने या साल भर में एकाध बार ही घर आ कर कुछ दिन बिता पाता था.

माया भले ही 3 बच्चों की मां थी, लेकिन उस का शारीरिक आकर्षण खत्म नहीं हुआ था. उस का कसा हुआ शरीर और गोरा रंग पुरुषों को आकर्षित करने के लिए काफी था. सजसंवर कर माया जब घर से बाहर निकलती थी तो अनचाहे में लोगों की नजरें उस की ओर उठ ही जाती थीं.

कभीकभी रवि माया के घर के सामने से हो कर घाटबाजार स्थित अपनी दुकान पर जाया करता था. एकदो बार का आमनासामना हुआ तो दोनों की नजरें टकरा गईं. धीरेधीरे दोनों एकदूसरे की ओर आकर्षित होने लगे. जल्दी ही वह समय भी आ गया, जब दोनों ने आकर्षण को प्यार का नाम दे दिया. इस प्यार को शारीरिक संबंधों में बदलते देर नहीं लगी. इस की एक वजह यह भी थी कि माया का पति परदेस में था और वह शारीरिक रूप से प्यार की प्यासी थी.

धीरेधीरे रवि और माया के प्यार के चर्चे पूरे सूढ़ीटोला में होने लगे. रवि घर से दुकान पर जाने की कह कर निकलता और पहुंच जाता माया के पास. जब तक वह दुकान पर पहुंचता, तब तक उस के दोनों भाई विक्की और शुक्कर दुकान पर पहुंच कर पिता के साथ काम में लग जाते.

रवि देर से पहुंचता तो पिता श्यामसुंदर राउत उस से देर से आने की वजह पूछते, लेकिन वह चुप्पी साध लेता था. इस से श्यामसुंदर और भी परेशान हो जाते थे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि रवि को आखिर हो क्या गया. उन्होंने उस के देर से आने का रहस्य पता लगाने का फैसला किया.

आखिरकार श्यामसुंदर ने जल्द ही सच का पता लगा लिया. पता चला उन का बड़ा बेटा रवि एक शादीशुदा और 3 बच्चों की मां माया के प्रेमजाल में फंसा है. बेटे की सच्चाई जान कर वह परेशान हो गए.

उन्होंने रवि को माया से दूर रखने के बारे में सोचना शुरू किया. सोचविचार कर वह इस नतीजे पर पहुंचे कि रवि की शादी कर दी जाए तो वह माया को भूल जाएगा. उन्होंने रवि की शादी की बात चलाई तो बात बन गई. फलस्वरूप सुलेखा से रवि का रिश्ता तय हो गया.

रिश्ता तय हो जाने के बाद रवि जब कभी माया के घर के सामने से गुजरता तो उस से नजरें मिलाने के बजाय चुपचाप निकल जाता. रवि में अचानक आए बदलाव से माया परेशान हो गई. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक रवि को क्या हो गया, जो उस ने मुंह फेर लिया.

माया से रवि की जुदाई बरदाश्त नहीं हो पा रही थी. एक दिन वह रवि का रास्ता रोक कर उसे अपने घर ले आई. फिर उस ने रवि से पूछा, ‘‘तुम्हें अचानक ऐसा क्या हो गया जो मुझ से मुंह फेर लिया.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है माया.’’ रवि ने सहज भाव से कहा.

‘‘ऐसी कोई बात नहीं है तो अचानक मुझ से मुंह क्यों मोड़ लिया?’’

‘‘माया, अब हमारा मिलना संभव नहीं है.’’ रवि ने नजरें झुका कर कहा.

‘‘क्यों, संभव नहीं है हमारा मिलना? मैं तुम से कितना प्यार करती हूं, जानते तो हो. फिर हमारा मिलना क्यों नहीं संभव है?’’

“‘क्योंकि मेरे घर वालों ने मेरी शादी करने का फैसला कर लिया है.’’

रवि का जवाब सुन कर माया के होश उड़ गए. माथे पर हाथ रख कर वह बिस्तर पर जा बैठी. कुछ देर दोनों के बीच खामोशी छाई रही.

उस खामोशी को माया ने ही तोड़ा, ‘‘आखिर क्या समझ रखा है तुम ने मुझे? मैं कोई खिलौना नहीं हूं कि जब चाहा, खेला और जब चाहा छोड़ दिया. मेरी जिंदगी बरबाद कर के तुम किसी और के साथ शादी रचाओगे? तुम ने यह कैसे सोच लिया कि मैं ऐसा होने दूंगी? मेरे जीते जी ऐसा हरगिज नहीं हो सकता.’’

‘‘मेरी बात समझने की कोशिश करो, माया.’’ माया के सामने रवि हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगा, ‘‘मैं घर वालों के सामने बेबस हूं. मुझे उन के सामने झुकना ही पड़ा.’’ रवि ने माया को समझाने की कोशिश की, ‘‘तुम तो जानती हो, मैं भी तुम से कितना प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना जीने की कल्पना तक नहीं कर सकता.’’

‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहती. तुम्हें जो भी करना हो करो, लेकिन मैं तुम्हारी शादी नहीं होने दूंगी.’’ माया ने रवि को धमकाया. रवि माया को काफी देर तक समझाता रहा. लेकिन माया ने रवि की शादी की बात स्वीकार नहीं की. उस ने खुल कर धमकी दी कि अगर उस ने किसी और से शादी की तो इस का अंजाम उसे भुगतना पड़ेगा.

उस दिन के बाद से रवि ने न तो माया से बात की और न ही मिला. माया ने सपने में भी नहीं सोचा था कि रवि उसे धोखा देगा और किसी दूसरी लड़की से शादी रचा लेगा. उस की बेवफाई से माया घायल नागिन सी बन गई. उस के सीने में बदले की आग धधकने लगी. यह मई 2018 की बात थी.

माया रवि से बदला लेने के लिए भले ही घायल नागिन बन गई थी, लेकिन उस की जुदाई में उस से कहीं ज्यादा तड़प रही थी. रवि भी माया से मिलने के लिए विरह की आग में जल रहा था. अंतत: उस से रहा नहीं गया और एक महीने बाद वह माया के पास लौट आया. सारे गिलेशिकवे भुला कर माया ने उसे प्यार के आंचल में छिपा लिया ताकि उन के प्यार को जमाने की नजर न लग जाए.

रवि ने माया से कहा कि मांबाप की खुशी के लिए वह सुलेखा से शादी तो जरूर करेगा, लेकिन उसे कभी पत्नी का दर्जा नहीं देगा और मौका मिलते ही उसे सदा के लिए अपने रास्ते से हटा देगा. रवि की बात पर माया ने सहमति जता दी. रवि की शादी के बाद सुलेखा को रास्ते से हटाने के लिए माया शादी से पहले ही योजना बनाने में जुट गई.

बहरहाल, वह दिन भी आ गया जिस का रवि और माया को इंतजार था. 15 जुलाई, 2018 को रवि की शादी सुलेखा के साथ हो गई. सुलेखा मायके से विदा हो कर ससुराल आ गई.

दूसरी ओर माया का आनाजाना बंद हो जाने से ईर्ष्या की आग में जल रही थी. रवि भले ही माया के पास नहीं जा रहा था, लेकिन फोन से दोनों की अकसर बातें हो जाती थीं. माया उसे बारबार उस का वादा याद दिलाती रहती थी. रवि उस से कह देता था कि जल्द ही अपना वादा पूरा करेगा.

शादी के 4-5 दिन बाद रवि के घर से सब मेहमान चले गए. घर पूरी तरह खाली हो गया. 21 जुलाई, 2018 की दोपहर रवि चुपके से माया से मिलने उस के घर जा पहुंचा. उस वक्त घर में माया के अलावा कोई नहीं था. उस के तीनों बच्चे स्कूल गए हुए थे.

पहले तो दोनों ने मौके का भरपूर फायदा उठाया. फिर रवि और माया अपनी पहले से तैयार योजना पर बात की. रवि ने माया से कहा कि आज रात सुलेखा को हमेशा के लिए रास्ते से हटा दिया जाएगा. मेरे फोन का इंतजार करना. जैसे ही मैं फोन करूं, धारदार हथियार ले कर मेरे घर आ जाना. घर का दरवाजा खुला रहेगा.

रात 10 बजे के करीब सुलेखा पति, सास, ससुर और देवरों को खाना खिला कर पति के साथ पहली मंजिल पर सोने चली गई. उसे क्या पता था कि आज की रात उस पर भारी पड़ने वाली है. खैर, पतिपत्नी बातें करतेकरते कब सो गए, पता ही नहीं चला.

रात 1 बजे के करीब रवि की आंखें खुल गईं. उस ने देखा, सुलेखा गहरी नींद में सो रही थी. रवि मोबाइल ले कर आहिस्ता से बिस्तर से नीचे उतरा और दरवाजा खोल कर बाहर चला गया. तभी सुलेखा की आंखें खुल गईं. उस ने पति से इतनी रात गए बाहर जाने के बारे में पूछा तो रवि ने कहा कि बाथरूम जाना है, अभी आता हूं.

रवि घर से बाहर निकल आया और फोन कर के माया को बता दिया कि रास्ता साफ है, आ जाओ. थोड़ी देर बाद रवि बाहर से लौट आया और फिर सोने का नाटक करने लगा. करीब 30 मिनट बाद माया 2 महिलाओं के साथ रवि के घर पहुंच गई.

माया इन महिलाओं को सुरक्षा के लिए लाई थी. उन्हें उस ने बाहर ही रोक दिया था. माया स्वयं चुपके से सीढि़यों के सहारे रवि के कमरे में दाखिल हो गई. उसे रवि के घर का कोनाकोना पता था.

सुलेखा रवि के बगल में सोई हुई थी. माया ने साथ लाए धारदार ब्लेड से सुलेखा के गले, चेहरे और आंख पर वार किए. साथ ही उस का गला दबाने का भी प्रयास किया. अचानक हुए हमले से सुलेखा के मुंह से दर्दनाक चीख निकल गई.

पत्नी की चीख सुन कर सोने का बहाना कर रहा रवि उठ बैठा. तब तक नीचे से रवि के दोनों भाई विक्की और शुक्कर ऊपर कमरे में पहुंच गए. विक्की और शुक्कर को देख माया डर गई, क्योंकि रवि का पूरा गेम ही उलटा पड़ गया था.

जैसे ही माया वहां से भागी, विक्की और शुक्कर ने उसे दौड़ा कर पकड़ लिया और उसे मारनेपीटने लगे. किसी को शक न हो, सोच कर रवि भी भाइयों के साथ जा मिला और मौका देख कर माया को लातथप्पड़ मारने लगा.

माया के गिरफ्तार हो जाने के बाद उस से महिला थाने में एसओ विमला ने पूछताछ की. माया ने सुलेखा की हत्या की योजना का खुलासा कर दिया कि कैसे उस ने अपने प्रेमी रवि के साथ मिल कर सुलेखा की हत्या की योजना बनाई थी. उस के बयान पर पुलिस ने उस के प्रेमी और सुलेखा के पति रवि को पत्नी की हत्या की कोशिश करने का मुकदमा दर्ज कर के गिरफ्तार कर लिया.

कथा लिखे जाने तक दोनों प्रेमीप्रेमिका रवि राउत और माया जेल में बंद थे. बेटे की करतूत पर मांबाप को काफी दुख पहुंचा. स्वस्थ हो चुकी सुलेखा ससुराल से मायके लौट गई. उस रात माया के साथ आई 2 महिलाओं का पता नहीं चल सका.

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Hindi Story : उड़ान – मोहिनी के हुस्न के जाल से क्या निकल पाया कपिल

Hindi Story : कपिल का नईनवेली पत्नी को छोड़ कर ड्यूटी पर जाने का जरा भी मन नहीं था. शादी के लिए उस ने कंपनी से एक महीने की छुट्टी ली थी. शादी के बाद पत्नी की खूबसूरती में वह कुछ इस तरह खो गया कि कब 2 महीने बीत गए, उसे पता ही नहीं चला.

जब कंपनी के मैनेजर ने फोन पर कपिल को चेतावनी दी कि अगर एक हफ्ते के अंदर उस ने ड्यूटी जौइन नहीं की, तो उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया जाएगा. तब उस की आंखें खुलीं. अब तो उस का नौकरी पर जाना जरूरी था.

घर से विदा लेते समय कपिल ने पत्नी से कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो. दिल्ली जा कर सब से पहले एक बड़ा मकान किराए पर लूंगा, फिर तुम्हें बुला लूंगा.’’

कपिल बलिया के एक गांव का रहने वाला था. उस के पिता चाय की दुकान चलाते थे. गांव के स्कूल में 9वीं जमात फेल हो जाने के बाद कपिल का मन पढ़ाई से हट गया, तो उस ने नौकरी करने का मन बना लिया. कुछ दिन बाद नौकरी की तलाश में वह दिल्ली चला गया. 15 दिन भटकने के बाद उसे एक प्राइवेट कंपनी में डिलीवरी बौय की नौकरी मिल गई. रहने के लिए उस ने किराए पर छोटा सा मकान भी ले लिया.

कपिल को जो कमरा मिला था, उस में पहले से ही 2 लोग रहते थे. जल्दी ही वह दोनों से घुलमिल गया.

कपिल के बोलचाल के ढंग की वजह से उसे लोग जल्दी दोस्त बना लेते थे. वह हमेशा साफसुथरा रहता था. थोड़ी वर्जिश भी वह करता था. कपिल को कंपनी से 8 हजार रुपए मिलते थे. 3 हजार रुपए वह अपने पिता को भेज देता था, बाकी रुपयों से अपना गुजारा कर लेता था.

शादी के बाद कपिल से उस के पिता ने कहा था कि वह पत्नी को साथ में दिल्ली ले जाए. पत्नी भी उस के साथ रहना चाहती थी. मगर कपिल पत्नी को साथ कैसे ले जा सकता था. जब वह कुंआरा था, तो 5 हजार रुपए में गुजारा कर लेता था. दोस्तों के साथ एक ही कमरे में रह लेता था.

पत्नी को साथ में रखने के लिए एक कमरा तो अलग से चाहिए ही था. रुपए भी कुछ ज्यादा चाहिए थे.

कपिल भी पत्नी से प्यार करता था. वह खुद उस के बिना नहीं रहना चाहता था. वह उसे अपने साथ रखना चाहता था, इसलिए पहले ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरी ढूंढ़ने लगा. उस ने सोचा कि एक कमरा किराए पर ले कर पत्नी को बुला लेगा. वह कम से कम 12 हजार रुपए की नौकरी पाना चाहता था.

मनपसंद नौकरी की तलाश में दरदर भटकता हुआ कपिल एक दिन मोहिनी की दुकान में गया. उस की कपड़े की दुकान थी. उस समय मोहिनी दुकान में मौजूद थी. कपिल के बात करने के तरीके से मोहिनी प्रभावित हो गई. उस ने कपिल का मोबाइल नंबर यह कहते हुए ले लिया कि जगह खाली होते ही वह उसे बता देगी. कपिल को जरा भी विश्वास नहीं था कि मोहिनी की दुकान में उसे नौकरी मिलेगी.

हैरानी तो कपिल को तब हुई, जब 5-6 दिन बाद मोहिनी ने फोन किया और इंटरव्यू के लिए उस ने रात के 8 बजे अपनी दुकान पर बुलाया.

कपिल ठीक समय पर मोहिनी की दुकान में पहुंच गया. मोहिनी ने कहा कि वह दुकान बंद कर रही है, इसलिए घर चलो. उस का मकान बड़ा था. वहां कोई और नहीं था.

मकान का दरवाजा खुद मोहिनी ने खोला था. मोहिनी ने उसे बताया कि उस की पार्टटाइम नौकरानियां हैं.

कपिल से उस के घरपरिवार की जानकारी लेने के बाद मोहिनी ने कहा, ‘‘तुम्हारी काबिलीयत के मुताबिक कोई भी तुम्हें 10 हजार से ज्यादा की नौकरी नहीं देगा.

‘‘मैं तुम्हें 15 हजार रुपए हर महीने की नौकरी दे सकती हूं, अगर तुम मेरी बात मान लोगे.’’

‘‘कौन सी बात मैडम?’’

‘‘बात यह है कि तुम मेरे दिल में बस गए हो. एक रात के लिए तुम्हें अपना बनाना चाहती हूं.’’

कपिल को समझते देर नहीं लगी कि मोहिनी चरित्रहीन औरत है. कपिल पत्नी के साथ बेवफाई नहीं करना चाहता था. लेकिन सामने औरत को देख कर वह नौकरी के लालच में आ गया.

यह सोच कर उस ने मोहिनी की बात मान ली कि सिर्फ एक रात की बात है. उस के बाद वह पत्नी के साथ कभी बेवफाई नहीं करेगा. फिर वह मोहिनी के साथ बैडरूम में चला गया. अपने तन की आग बुझाने के बाद मोहिनी बाथरूम में चली गई.  अगले दिन सुबह कपिल चला गया. मोहिनी ने उसे अपनी दुकान में नौकरी दे दी.

एक हफ्ते तक सबकुछ ठीकठाक चला. उस के बाद एक दिन दुकान पर मोहिनी ने कपिल से कहा, ‘‘रात के 10 बजे मेरे घर आ जाना. मुझे कुछ जरूरी बात करनी है.’’ मोहिनी उस दिन भी घर पर अकेली थी. वह उसे सीधे बैडरूम में ले गई. अब कपिल को यह समझते देर नहीं लगी कि मोहिनी ने उसे अपने घर क्यों बुलाया है.

‘‘आप चाहें तो नौकरी से निकाल दीजिए. मगर अब मैं पत्नी के साथ विश्वासघात नहीं करूंगा,’’ कपिल ने अब अपना फैसला सुना दिया.

मोहिनी ने कपिल को तरहतर  से समझाने की कोशिश की, मगर वह नहीं माना.

कपिल जब वहां से जाने लगा, तो मोहिनी ने कहा, ‘‘मेरा कहा नहीं मानोगे, तो तुम्हें मेरा रेप करने के आरोप में जेल जाना होगा.’’

‘‘मैं पुलिस को सुबूत दूंगी कि तुम ने मेरा रेप किया है. तुम्हें मेरी बात पर यकीन नहीं है, तो खुद यह वीडियो देख लो.’’

मोहिनी ने कपिल को एक वीडियो दिखाया. उस में वह उस के साथ बिस्तर पर था. मोहिनी की चाल कपिल समझ गया. उस के जाल से निकलने का उस के पास कोई रास्ता नहीं था, इसलिए उस की बात उस ने मान ली. बात यह थी कि पहले दिन मोहिनी ने कपिल को साथ सोने के लिए जब कहा था, तो उस ने यह वीडियो तैयार कर लिया था.

मजबूर हो कर कपिल को मोहिनी की सारी बात मान लेनी पड़ी. दोस्तों का साथ छोड़ कर वह मोहिनी के मकान में असिस्टैंट बन कर रहने लगा. मोहिनी के कहने पर उस ने दोस्तों के साथसाथ पत्नी और अपने घर वालों से भी नाता तोड़ लिया. पिता को रुपए भेजना भी उस ने बंद कर दिया था.

मोहिनी ने उस से कहा था कि उस का सारा रुपया वह 2-3 साल बाद एकसाथ देगी, जिस से वह खुद का अपना कोई कारोबार कर सके. मोहिनी की बात मानने के सिवा कपिल के पास कोई रास्ता नहीं था. वैसे, उसे विश्वास था कि मोहिनी उस के साथ विश्वासघात नहीं करेगी.

बात यह थी कि मोहिनी के पति की मौत तकरीबन 5 साल पहले एक सड़क हादसे में हो गई थी. उस समय उस का बेटा आकाश 4 साल का था. पति की मौत के बाद मोहिनी कपड़े की दुकान की मालकिन हो गई.

उस के मातापिता ने उसे दूसरी शादी करने की सलाह दी थी, मगर उस ने दूसरी शादी करने से मना कर दिया. वह आकाश की परवरिश करते हुए अपनी जिंदगी गुजार देना चाहती थी.

पति की यादों के सहारे मोहिनी ने 2 साल तो गुजार दिए, उस के बाद अचानक उसे लगने लगा कि मर्द के बिना वह नहीं रह सकती है. जवानी की भूख जब उसे ज्यादा सताने लगी, तो एक दिन उस ने पड़ोस के एक लड़के से संबंध बना लिया. आकाश को उस की सचाई का पता न चल सके, इसलिए उस ने उसे होस्टल में दाखिल कर दिया. वह उसे घर पर सिर्फ छुट्टियों पर लाती थी.

2 साल तक वह लड़का मोहिनी के हुस्न से बंधा रहा. उस के बाद उस की शादी हो गई, तो उस ने संबंध तोड़ लिया. फिर मोहिनी ने कपिल को फांसा. कपिल उस के चंगुल से कभी न निकल सके, इसीलिए उस ने अपनी और उस की एक वीडियो क्लिप भी बना ली थी.

पुलिस का डर दिखा कर मोहिनी ने कपिल को अपने वश में तो कर ही लिया था. इस के अलावा उस ने उसे शराब की लत भी लगा दी थी.

कपिल को भी ऐशोआराम की यह जिंदगी अच्छी लगने लगी थी. इस तरह एक साल बीत गया. एक दिन मोहिनी ने कपिल से पूछा, ‘‘तुम्हें मेरे साथ कैसा लगता है?’’

‘‘बहुत अच्छा.’’

‘‘तुम सारी जिंदगी मेरे साथ रहोगे न?’’

‘‘यह भी कोई पूछने वाली बात है. अब तो मैं आप के बिना रह ही नहीं सकता.’’

‘‘जैसा मैं कहूंगी, वैसा करोगे न?’’

‘‘जरूर करूंगा.’’

‘‘बात यह है कि मेरे हुस्न पर एक अमीर शादीशुदा लड़का फिदा हो गया है. मैं उस से संबंध बना कर लाखों रुपए ऐंठना चाहती हूं.’’

कुछ सोचने के बाद कपिल ने कहा, ‘‘आप जो चाहें कर सकती हैं. मैं आप का कोई विरोध नहीं करूंगा. बस इतना खयाल रखिएगा कि कभी मुझे अपने से जुदा न कीजिएगा.’’

‘‘तुम्हें अपने से जुदा करने की तो मैं कभी सोच भी नहीं सकती, क्योंकि तुम मेरी धड़कन बन गए हो.

‘‘तुम मेरे बताए रास्ते पर चुपचाप चलते जाना. देखना, जल्दी ही हम दोनों के पास करोड़ों की जायदाद होगी. वह जायदाद सिर्फ मेरे नाम नहीं, तुम्हारे नाम भी होगी.’’

अगले दिन मोहिनी अपने साथ एक लड़के को ले कर घर पर आई. योजना के मुताबिक कपिल ने वीडियो बनाने की पूरी तैयारी कर ली थी. कपिल ने मोहिनी और उस लड़के का वीडियो बना लिया था.

उस वीडियो के बल पर मोहिनी ने उस लड़के से बहुत दिनों तक रुपए ऐंठे. उस के बाद मोहिनी ने दूसरे लड़के को फांसा, फिर तीसरे और…

एक दिन जब कपिल दुकान से निकल रहा था, तो पुलिस जिप्सी आई और उसे गिरफ्तार कर लिया. मोहिनी ने उस पर रेप का केस कर दिया था. कई महीनों तक वह जेल में रहा, पर मोहिनी ने दया कर के उस को छुड़वा दिया, पर यह वादा ले कर कि वह कभी पास नहीं आएगा.

कपिल के पास न अब पत्नी है, न पिता हैं, न मोहिनी जैसी औरत. वह मजदूरी कर के किसी तरह मौत का इंतजार कर रहा है.

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Romantic Story : आबू की घुमावदार सड़कों और हरीभरी वादियों के बीच बसे उस छोटे से रमणीक स्थल पर मूकबधिरों की सेवा करती सौदामिनी से यों भेंट हो जाएगी, इस की तो मैं ने कभी कल्पना भी नहीं की थी. गहरा नीला रंग उसे सब से अधिक प्रिय था. गहरे नीले रंग की साड़ी में उस ने सलीके से अपनी दुर्बल काया को छिपा रखा था. हाथ में पकड़े पैन को, रजिस्टर पर तेजी से दौड़ाती हुई मैं उस को अपलक निहारती रह गई.

माथे पर चौड़ी लाल बिंदी और मांग में रक्तिम सिंदूर की आभा इस बात की पुष्टि कर रही थी कि इतना संघर्षभरा जीवन जीने के बाद भी अपने अतीत से जुड़े उन चंद पृष्ठों को वह अपने वर्तमान से दूर रखने में शायद असमर्थ थी. मेज की दराज से उस ने पुस्तकें निकालीं तो मैं ने उस का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए पुकारा, ‘‘सौदामिनी, पहचाना नहीं क्या मुझे?’’

सौदामिनी चौंकी जरूर थी, पर मुझे पहचान लिया हो, ऐसा भी नहीं लगा था. वह अपनी जगह पर यों ही बैठी रही, न मुसकराई, न ही कुछ बोली. उस का शुद्ध व्यवहार मुझे अचरज में डाल गया था. सोचा, समय का अंतराल चाहे कितना ही क्यों न फैल जाए, इंसान का चेहरा, रूपरंग इतना तो नहीं बदल जाता कि उसे पहचाना ही न जा सके.

चश्मे को पोंछ कर उस ने फ्रेम को कुछ ऊपर खिसका दिया और पहचानने की कोशिश करने लगी. मैं ने फिर याद दिलाया, ‘‘सौदामिनी, मैं हूं, तनु, तुम्हारे अच्युत काका की बेटी.’’

‘‘अरे, तनु तुम? आओआओ, इतने बरसों बाद कैसे आना हुआ?’’ उस ने मेरे कंधे पर अपना हाथ रखते हुए पूछा.

फिर दराज बंद कर के उस ने चाबी का गुच्छा, पास ही खड़े चौकीदार को पकड़ाया और कमरा बंद करने का निर्देश दे कर बाहर निकल आई. कुछ ही कदमों के फासले पर हरीभरी झाडि़यों व लतिकाओं से घिरा हुआ उस का घर था. लौन का गेट खोल कर उस ने बाहर रखी चारपाई को, घुटने मोड़ कर सीधा किया और उस पर मोटी सी दरी बिछा कर बोली, ‘‘अमेरिका में रहते हुए तुम्हारी तो चारपाई पर बैठने की आदत छूट गई होगी? मुश्किल हो तो आरामकुरसी निकाल दूं?’’

‘‘कैसी बातें करती हो? यही सब तो वहां याद आता है…आम का अचार, उड़द की दाल की बडि़यां. सच पूछो तो यहां की मिट्टी की सोंधी महक ही तो बारबार मुझे खींच लाती है.’’

झुर्रीदार चेहरे पर हंसी प्रस्फुटित हुई थी, ‘‘अच्छा, यह तो बताओ, मेरा पता तुम्हें किस ने दिया?’’

‘‘अविनाश और मैं दोनों ही काम पर जाते हैं, इसलिए रोजरोज तो छुट्टी मिलती नहीं है. 5 वर्षों में एक बार आ पाते हैं. कुल मिला कर 3 सप्ताह की छुट्टी मिलती है, उन में 2 सप्ताह तो अम्मा, बाबूजी के पास रामपुर में ही बीत जाते हैं. बाकी एक सप्ताह किसी न किसी पहाड़ी जगह पर ही हम बिताते हैं. इस बार बच्चों ने आबू देखने की जिद की, तो यहीं चले आए.’’

कुछ देर बाद चारों ओर पसरे मौन को मैं ने ही बींधा, ‘‘दरअसल, शारीरिक रूप से अपंग बच्चों पर मैं एक किताब लिख रही हूं. किसी ने तुम्हारे आश्रम का नाम सुझाया, तो यहीं चली आई.’’

मैं ने उसे वस्तुस्थिति से अवगत कराया. वह चुपचाप गुमसुम सी बैठी रही, जैसे न ही कुछ पूछना चाह रही हो, न ही कुछ कहने की इच्छुक हो. वातावरण कुछ बोझिल सा हो चला था. दिसंबर की ठंडी धूप सामने वाले पेड़ पर जा अटकी थी. ठंडी हवाओं से कुछ सिहरन सी महसूस हुई तो मैं ने शौल ओढ़ ली.

‘‘यहां अकसर शाम को ठंड बढ़ जाती है. चलो, अंदर चल कर बैठते हैं. अब तो अंधेरा भी होने लगा है.’’

दरवाजा खोल कर उस ने मुझे अंदर बिठाया और खुद अलमारी में से कुछ निकालने लगी. पलस्तर उखड़े कमरे में 4 कुरसियां और मेजपोश से ढकी मेज के अलावा, कोने में एक पुराना पलंग था, जिस पर कांच सी पारदर्शी आंखों में तटस्थ सा भाव लिए एक छोटा सा बालक लेटा था. सौदामिनी को देख कर उस के चेहरे पर स्मित हास्य के चिह्न मुखर हो उठे थे. न जाने कौन सी भाषा में वह उस से प्रश्न करता जा रहा था और वह भी उसी की भाषा में उस की जिज्ञासा शांत करती जा रही थी.

मैं एकटक उसे निहारती रह गई. बालों में छिटके चांदी के तार, चेहरे पर पड़ आई झुर्रियों ने उसे असमय ही बुढ़ापे की ओर धकेल दिया था. दुग्ध धवल सा गौर वर्ण आबनूस की तरह काला हो चुका था. भराभरा सा गदराया शरीर संघर्ष करतेकरते दुर्बल काया का रूप ले चुका था.

‘‘यह मानव है, मेरा बेटा, बहुत प्यारा है न?’’ बच्चे के कपड़े बदलते हुए उस ने मुझ से कहा तो मैं चौंकी. कमरे में पसरी सड़ांध मेरे नथुनों में समाने लगी थी. बड़ी मुश्किल से मैं ने उबकाई को रोका. मेरी परेशानी माथे पर पड़ी सिलवटों से जाहिर हो उठी थी. वह शायद समझ गई थी. बोली, ‘‘वैसे तो हमेशा लघुशंका और दीर्घशंका के लिए संकेत देता है. आज ठंड कुछ ज्यादा है न, इसलिए…अच्छा, तुम बैठो, मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

पर मेरा ध्यान कहीं और था, इस पसोपेश में थी कि यह बालक है कौन? जहां तक मुझे याद था, आदित्य के घर से जब वह लौटी थी तो निसंतान ही थी.

सौदामिनी चाय बनाने चली गई तो मैं पास ही पड़ी आरामकुरसी पर आंखें मूंद कर लेट गई. हवा के झोंकों से यादों के किवाड़ धीरेधीरे खुलने लगे तो मन दद्दा की हवेली में भटकने लगा था…

बाबूजी के चचेरे भाई थे, दद्दा. लोग उन्हें राय साहब भवानी प्रसाद के नाम से पहचानते थे. शहर के बीचोंबीच संगमरमर से बनी उन की कोठी की शान निराली थी.

दद्दा ने बड़ा ही निराला स्वभाव पाया, तबीयत शौकीन और अंदाज रईसी वाले. हर काम अपने ही ढंग से करते, न किसी के काम में हस्तक्षेप करते, न ही किसी की टीकाटिप्पणी बरदाश्त करते.

जन्म लेते ही सौदामिनी के सिर से मां का साया उठ गया था. पिता करोड़ों की जायदाद के इकलौते वारिस थे, पर प्यार और अपनत्व का आदानप्रदान करने में गजब के कंजूस. भावनाएं और संवेदनाएं तो उन्हें छू तक नहीं पाई थीं. हर शाम शहर के रईस लोगों के बीच शतरंज की बाजी खेलने वाले दद्दा ने अपनी बेटी के लालनपालन में कहीं कोताही की हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता. हर समय उस पर कड़ी निगरानी रखते थे.

सौदामिनी जरा सा सिसकती, तो दद्दा चिल्लाते. उन की चीखपुकार सुन कर सेविकाएं दौड़ी चली आतीं और बिटिया बिना दुलारेपुचकारे सहम कर यों ही चुप हो जाती. ठोकर खा कर गिरती, तो दद्दा एक ही गति में निरंतर चिंघाड़ते रहते. सेविकाओं की पेशी होती, कोई इधर दौड़ती कोई उधर भागती, और कोई खिलौनों की अलमारी के सामने जा खड़ी हो जाती पर सौदामिनी तो तब तक पिता का रौद्र रूप देख कर ही दहशत के मारे चुप हो चुकी होती थी.

स्कूल या कालेज सौदामिनी कभी गई ही नहीं. इस का कारण था, राय साहब की रूढि़वादी सोच. घर से बाहर बेटियों को निकालने के वे सख्त विरोधी थे. वे सोचते, लड़कों के संग बतिया कर उन की बिटिया कहीं भाग गई तो? पास ही एक मिशनरी स्कूल था, वहीं की एक ईसाई टीचर को उन्होंने सौदामिनी की शिक्षा के लिए नियुक्त कर दिया था. ऐसे में उस की शिक्षा का दायरा हिंदी, अंगरेजी की वर्णमाला तक ही सिमट कर रह गया था.

बेटी के प्रति अपनी आचारसंहिता में नित नए विधानों की रचना करने वाले दद्दा. उस के हर काम, हर गतिविधि पर कड़ी निगरानी रखने लगे.

सौदामिनी हर समय व्याकुल रहती जीवन की उन सचाइयों से परिचित होने के लिए, जिन की चर्चा अकसर वह अपनी सहेलियों से सुन लिया करती थी.

कलकत्ता का राजभोग और मथुरा के पेड़े खाते समय उस का मन कच्चे अमरूद खाने के लिए तरसता. ऐसे में दोपहरी में हम दोनों दद्दा की नजरें चुरा कर पिछवाड़े की बगिया में जा पहुंचतीं. पेड़ पर चढ़ कर कच्चे अमरूद ढूंढ़ने का आनंद वैसा ही था जैसे किसी गोताखोर के लिए मोती ढूंढ़ने का.

एक दिन यह खबर, न जाने कैसे दद्दा के दीवानखाने जा पहुंची. और तब सौदामिनी की पेशी हुई.

पिता का तिरस्कारपूर्ण स्वर सुन कर बालहृदय छलनी हो गया. सहम कर अपना मुंह अपने नन्हेनन्हे हाथों से छिपा कर वह देर तक रोती रही.

सौदामिनी हर समय सहमीसिमटी रहती थी, न हंसती न बोलती. पिंजरे के तार चाहे सोने के हों या लोहे के, कैद तो आखिर कैद ही है.

धीरेधीरे उस का मनोबल गिरता चला गया. हाथपांव पसीने में भीगे रहते, जबान लड़खड़ाने लगी. रात को सोती तो चीखनेचिल्लाने लगती. कई हकीम, डाक्टर और वैद्यों का इलाज करवाया गया, पर सौदामिनी की दशा दिनपरदिन बिगड़ती ही चली गई.

एक दिन दद्दा के मुनीम अपने अनुज, डाक्टर मृदुल को सौदामिनी के इलाज के लिए ले आए. अचानक अपने सामने किसी नए डाक्टर को देख कर राय साहब असमंजस में पड़ गए. एक तो मुनीम का भाई, दूसरा अनुभवहीन. सोचा, जहां बड़ेबड़े डाक्टर कुछ नहीं कर पाए, यह नौसिखिया क्या कर लेगा? बस, यही सोच कर दद्दा चुप्पी साधे रहे.

पर सौदामिनी की ऐसी दशा अम्मा, बाबूजी से सहन नहीं हो पा रही थी. पहली बार अम्मा ने तब दद्दा के सामने मुंह खोला था और न जाने क्या सोच कर वे मान भी गए.

मृदुल की दवा से सौदामिनी की दशा दिनपरदिन सुधरने लगी. मृदुल जानते थे, उस का रोग शारीरिक कम, मानसिक अधिक है. दवा से ज्यादा उसे प्यार और अपनत्व की जरूरत है. उधर सौदामिनी को स्वास्थ्यलाभ मिला, इधर राय साहब के विश्वास की जड़ें मृदुल पर जमने लगीं. वह तेजस्वी व्यक्तित्व और विलक्षण बुद्धि का स्वामी था, सदा अपने आकर्षण में सब को बांधे रखता. घंटों सौदामिनी के पास बैठा रहता.

मृदुल की संवेदनाओं ने न जाने कब अपमान, उपेक्षा और तिरस्कार के वज्र खंड तले सहमीसिमटी सौदामिनी के हृदय की बसंती बयार को सुगंधित झोंके के समान छू कर उस के दिल में प्रेम का बीज अंकुरित कर दिया.

सौदामिनी मृदुल के साहचर्य के लिए हर समय तरसती. उधर मृदुल भी सौदामिनी के ठहाकों, मुसकराहटों और उलझनों से अनजाने ही जुड़ते चले गए.

शुरूशुरू में राय साहब को इस प्रेमप्रसंग की जरा भी जानकारी नहीं मिली. प्यार, स्नेह, आसक्ति जैसी नैसर्गिक भावनाएं उम्र के किसी भी सोपान पर, जीवन के किसी भी मोड़ पर स्वाभाविक रूप से जन्म ले सकती हैं. उन के नियम, विधान के संसार में ऐसा सोचना भी प्रतिबंधित सा था.

ऊंची मानमर्यादा और प्रतिष्ठा के स्वामी राय साहब लाखों का दहेज देने की सामर्थ्य रखते थे. मुनीम के भाई के साथ अपनी इकलौती बेटी को ब्याह कर समाज में अपनी प्रतिष्ठा पर उन्हें कालिख थोड़े ही पुतवानी थी.

मैं उस प्रेमकहानी को कभी नहीं भूली, जिस की एकएक ईंट, राय साहब ने अपने छल से गिरवा दी थी और रह गया था, एक खंडहर.

कुछ दिनों के लिए सौदामिनी को दद्दा ने उस के ननिहाल भिजवा दिया था. नाना की तबीयत बेहद खराब थी, इसलिए उन की सेवा के लिए कोई तो चाहिए ही था. पिता के बारे में सौदामिनी के मन में कोई दुर्भावना नहीं उपजी और न ही कोई राय बनी. जब तक लौटी, मुनीम और उन का अनुज पूरे दृश्यपटल से ओझल हो चुके थे. मृदुल यों बिना बताए क्यों चले गए, कहां चले गए? इस की जरा भी भनक न सौदामिनी को मिली, न ही हवेली वालों को.

छल, प्रवंचनाओं के छद्म भेदों से दूर सौदामिनी का मन मैला करना कोई बहुत कठिन काम नहीं था. जीवन के गूढ़ रहस्यों से अनभिज्ञ भोलीभाली बेटी के सामने दद्दा ने मृदुल के चरित्र का ऐसा घिनौना चित्रण प्रस्तुत किया कि उस का मन मृदुल के प्रति वितृष्णा से भर उठा.

प्रेम में चोट खाए हृदय का दुख समय के साथ ही मिटता जाएगा, यह सभी जानते थे. दद्दा भी जानते थे कि वक्त बड़े से बड़े जख्म भर देता है. समय बीतता गया. सौदामिनी के रिसते घाव भरने लगे.

विश्वास, अविश्वास के चक्रवात में उलझी सौदामिनी अब एक बार फिर प्रेम का घरौंदा बनाने के लिए सुनहरे स्वप्न संजोने लगी थी. इस घर से भावनात्मक रूप से वह जुड़ी ही कब थी, जो यहां मन रमता? करोड़पति पिता ने करोड़पति परिवारों की खोज शुरू कर दी थी. रिश्तों की कमी न थी. पर दद्दा को हर रिश्ते में कोई न कोई खामी नजर आती ही थी.

आखिर एक दिन बड़ी ही जद्दोजेहद के बाद उन्हें दीवान दुर्गा प्रसाद का इकलौता बेटा आदित्य अपनी सौदामिनी के लिए उपयुक्त लगा. आदित्य डाक्टर था, व्यक्तित्व का ही नहीं, कृतित्व का भी धनी था.

अतीत के सारे दुखद प्रसंगों को भूल कर सौदामिनी खुद को कल्पनाओं के मोहक संसार में पिरोने लगी थी.

दोनों ही पक्षों ने दिल खोल कर खर्चा किया था. दीवान साहब की प्रतिष्ठा का अंदाजा बरात में आए लोगों की भीड़ देख कर लगाया जा सकता था. जीवनपर्यंत सुखदुख का साथी बने रहने का संकल्प ले कर सौदामिनी ने ससुराल की देहरी पर कदम रखा था.

रात्रि की नीरवता चारों ओर पसरी हुई थी. सभी मेहमान अपनेअपने कमरों में सो चुके थे. कमरे के बाहर उस की सास तारिणी सामान को सुव्यविस्थत करने में जुटी हुई थीं. रात्रि का तीसरा पहर भी ढलने को था. लेकिन आदित्य का दूरदूर तक कहीं पता न था.

सुबह की पहली किरण के साथ आदित्य कमरे में लौटे तो सौदामिनी और भी सिमट गई.

वे बिना कोई भूमिका बांधे पास ही पड़ी कुरसी पर बैठ गए और बोले, ‘सौदामिनी, हमारे समाज में मातापिता बेटे के लिए पत्नी नहीं, अपने लिए कुलवधू ढूंढ़ते हैं, गृहलक्ष्मी ढूंढ़ते हैं,’ आदित्य के स्वर में ऐसा भाव था, जिस ने सौदामिनी के मन को छू लिया.

‘मैं किसी और को प्यार करता हूं. सूजी नाम है उस का…मेरे ही अस्पताल में नर्स है. तुम्हें बुरा तो लगेगा, पर मैं सच कह रहा हूं. मैं ने तो तुम्हें एक नजर देखा भी नहीं था. कई बार मैं ने इस विवाह का विरोध किया, पर मां न मानीं. सच पूछो तो उन्होंने भी तुम्हारी धनसंपदा को ही पसंद किया है, तुम्हें नहीं,’ इतना कह कर आदित्य दूसरे कमरे में चले गए थे और छोड़ गए थे सूनापन.

कल्पना का महल खंडित हो चुका था. सौदामिनी अपनी जगह से हिली, न डुली. उसे लगा, वह जमीन में धंसती चली जा रही है. ऐसे समय में कोई नवविवाहिता कह भी क्या सकती है. बस, आदित्य के अगले वाक्य की प्रतीक्षा करती रही. वे लौट आए थे, ‘इस घर में तुम्हें सारे अधिकार मिलेंगे, पर मेरे हृदय पर अधिकार सूजी का ही होगा. उसे भुलाना मेरे वश में नहीं,’ आदित्य की आंखों में भावुकता से अश्रुकण छलक आए.

सौदामिनी सोच रही थी, अगर उस के दिल पर उस का अधिकार नहीं तो इस घर में रह कर क्या करेगी? किलेनुमा उस हवेली में वह खुद को कैदी ही समझ रही थी.

कुछ ही देर में आदित्य की मां थाल में नए वस्त्र और आभूषण ले कर आईं, जिन्हें अपने शरीर पर धारण कर के उसे आगंतुकों से शुभकामनाएं लेनी थीं. सौदामिनी ने मां का लाड़प्यार कभी देखा नहीं था, सुना जरूर था कि मां का हृदय विशाल होता है, एक वटवृक्ष की तरह, जिस की छाया तले न जाने कितने पौधे पुष्पित, पल्लवित होते हैं. बस, यही सोच कर उन का हाथ पकड़ कर सौदामिनी सिसक उठी, ‘मांजी, सबकुछ जानते हुए भी, आप ने मेरा जीवन बरबाद क्यों किया? आप को उन की प्रेमिका से ही उन का विवाह करवाना चाहिए था.’

तारिणी ने अपना हाथ छुड़ाते हुए रुखाई से कहा, ‘बहू, रिश्ते जोड़ते समय खानदान, जात, वर्ग, परंपरा जैसी कई बातों को ध्यान में रखना पड़ता है.’

कांपते स्वर में उस ने इतना ही कहा, ‘चाहे इन सब बातों के लिए किसी दूसरी लड़की के जीवन की सारी खुशियां ही दांव पर क्यों न लग जाएं?’

‘ऐसा कुछ नहीं होता, बहू. पत्नी में सामर्थ्य हो तो साम, दाम, दंड, भेद जैसा कोई भी अस्त्र प्रयोग कर के अपने पति का मन जीत सकती है.’

सास ने कहा, ‘देखो सौदामिनी, तुम इस घर की बहू हो. इस घर की मानमर्यादा तुम्हें ही बना कर रखनी है. समाज में हमारा नाम है, इज्जत है. आदित्य और सूजी के संबंधों पर परदा पड़ा रहे, इसी में तुम्हारी भलाई है और हम सब की भी. किसी को इस विषय में कुछ भी पता नहीं चलना चाहिए. तुम्हारे ससुर दीवान साहब को भी पता नहीं चलना चाहिए. वे दिल के मरीज हैं. उन का ध्यान रख कर ही मैं ने तुम्हें इस घर की बहू बनाया है, वरना सूजी ही आती इस घर में. अगर उन्हें कुछ हो गया तो इस का उत्तरदायित्व तुम पर ही होगा.’

सभी का अपनाअपना मत था. कोई मजबूरी जतला रहा था, कोई धमकी दे रहा था. सौदामिनी को समाज के कठघरे में खड़ा करने वाले उस के तथाकथित संबंधी, उस की भावनाओं से सर्वथा अनभिज्ञ थे. राय साहब के साम्राज्य की इकलौती राजकुमारी का अस्तित्व ससुराल वालों ने कितनी बेरहमी से नकार दिया था.

नववधू अपमान का घूंट पी कर रह गई थी. न जाने क्यों, उस दिन मृदुल बहुत याद आए थे, ‘क्यों छोड़ कर चले गए उसे यों मझधार में? कम से कम एक बार मिल तो लेते, कुछ कहनेसुनने का मौका तो दिया होता.’

दीवान साहब नेक इंसान थे. एक बार सौदामिनी के जी में आया कि वह उन से सबकुछ कह दे, पर सहज नहीं लगा था. वह होंठ सीए रही थी.

कोई एक बरस बाद राय साहब ने अपनी लाड़ली बेटी को पीहर बुलवा भेजा था. रोजरोज बेटी को मायके बुलाने के पक्ष में वे कतई नहीं थे. आदित्य के साथ सजीधजी सौदामिनी मायके आई तो राय साहब कृतकृत्य हो उठे. रुके नहीं थे आदित्य, बस औपचारिकता निभाई और चले गए. राय साहब ने भी कुछ पूछने की जरूरत नहीं समझी थी. धनदौलत की तुला पर बेटी की खुशियों को तोलने वाले दद्दा ने उस के अंतस में झांकने का प्रयत्न ही कब किया था? जितने दिन सौदामिनी पीहर में रही, अम्मा, बाबूजी रोज उसे बुलवा भेजते थे. वह कभी कुछ नहीं कहती थी. बस, अपने खयालों में खोई रहती. आखिर एक दिन अम्मा ने बहुत कुरेदा तो वह पानी से भरे पात्र सी छलक उठी, ‘मेरी इच्छाअनिच्छा, भावनाओं, संवेदनाओं को जाने बिना, क्या मेरे जीवन में ठुकराया जाना ही लिखा है, चाची? एक ने ठुकराया तो दूसरे के आंगन में जा पहुंची. अब आदित्य ने ठुकराया है तो कहां जाऊं?’

अम्मा और बाबूजी ने विचारविमर्श कर के एक बार दद्दा को बेटी के जीवन का सही चित्र दिखलाना चाहा था. वस्तुस्थिति से पूरी तरह परिचित होने के बाद भी दद्दा न चौंके, न ही परेशान हुए. वैसे भी ब्याहता बिटिया को घर बिठा कर उन्हें समाज में अपनी बनीबनाई प्रतिष्ठा पर कालिख थोड़े ही पुतवानी थी. उन्होंने सौदामिनी को बहुत ही हलकेफुलके अंदाज में समझाया, ‘पुरुष तो स्वभाव से ही चंचल प्रकृति के होते हैं. हमारे जमाने में लोग मुजरों में जाया करते थे. अकसर रातें भी वहीं बिताते थे और घर की औरत को कानोंकान खबर नहीं होती थी. शुक्र कर बेटी, जो आदित्य ने अपने संबंध का सही चित्रण तेरे सामने किया है. अब यह तुझ पर निर्भर करता है कि तू किस तरह से उस को अपने पास लौटा कर लाती है.’

पिता द्वारा आदित्य का पक्ष लिया जाना उसे बुरा नहीं लगा था, बल्कि इस बात की तसल्ली दे गया था कि जैसे भी हो, उसे अपनी ससुराल में ही समझौता करना है.

समय धीरेधीरे सरकने लगा था. सौदामिनी को समय के साथ सबकुछ सहने की आदत सी पड़ने लगी थी. भीतर उठते विद्रोह का स्वर, कितना ही बवंडर मचाता, संस्कारों की मुहर उस के मौन को तोड़ने में बाधक सिद्ध होती.

इसी तरह 2 वर्ष बीत गए. सौदामिनी का हर संभव प्रयत्न व्यर्थ ही गया. आदित्य उस के पास लौट कर नहीं आए. स्नेह के पात्र की तरह आदमी घृणा के पात्र को एक नजर देखता अवश्य है, पर आदित्य के लिए उस की पत्नी मात्र एक मोम की गुडि़या थी, संवेदनाओं से कोसों दूर, हाड़मांस का एक पुतलाभर.

कभीकभी जीवन में इंसान को जब कोई विकल्प सामने नजर नहीं आता तो उस का सब्र सारी सीमाएं तोड़ कर ज्वालामुखी के लावे के समान बह निकलता है. ऐसा ही एक दिन सौदामिनी के साथ भी हुआ था. घर से बाहर जा रहे आदित्य का मार्ग रोक कर वह खड़ी हुई, ‘किस कुसूर की सजा आप मुझे दे रहे हैं? आखिर कब तक यों ही मुंह मोड़ कर मुझ से दूर भागते रहेंगे?’

‘सजा कुसूरवार को दी जाती है सौदामिनी, तुम ने तो कुसूर किया ही नहीं, तो फिर मैं तुम्हें कैसे सजा दे सकता हूं? मैं ने सुहागरात को ही तुम से स्पष्ट शब्दों में कह दिया था कि हमारा विवाह मात्र एक समझौता है. तुम चाहो तो यहां रहो, न चाहो तो कहीं भी जा सकती हो. मेरी ओर से तुम पूर्णरूप से स्वतंत्र हो.’

उस रात आदित्य का स्वर धीमा था, पर इतना धीमा भी नहीं था कि हवेली की दीवारों को न भेद सके. एक कमरे से दूसरे कमरे का फासला ही कितना था. दीवान साहब के कानों में आदित्य का एकएक शब्द पिघले सीसे के समान उतरता गया. अपना ही खून इतना बेगैरत हो सकता है? क्या उन की बहू परित्यक्ता का सा जीवन बिताती आई है? इस की तो उन्होंने कल्पना भी नहीं की थी.

उन्होंने पत्नी को बुला कर कई प्रश्न किए, पर कोई भी उत्तर संतोषजनक नहीं लगा था. तारिणी पूर्णरूप से बेटे की ही पक्षधर बनी रही थीं. दीवान साहब ने सौदामिनी को पीहर लौट जाने का सुझाव दिया था. वह वहां भी नहीं गई.

तब जीवन की हर समस्या की ओर व्यावहारिक दृष्टिकोण रखने वाले दीवान साहब ने बहू को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया. दबी, सहमी सौदामिनी के लिए यह प्रस्ताव अप्रत्याशित सा ही था. बस, यही सोचसोच कर कांपती रही थी कि बरसों पहले छोड़ी गई किताब और कलम पकड़ने में कहीं हाथ कांपे तो क्या करेगी?

पर दृढ़निश्चयी दीवान साहब के आगे उस की एक भी न चली. उधर तारिणी ने सुना, तो घर में हड़कंप मच गया. पूरी हवेली की व्यवस्था ही चरमरा कर रह गई थी. इतने बरसों बाद बहू को पोथी का ज्ञान करवाना क्या उचित था? पर पति के सामने उन की आवाज घुट कर रह गई.

सौदामिनी की मेहनत, लगन और निष्ठा रंग लाई. उस का मनोबल बढ़ा, व्यक्तित्व में निखार आया. अब लोग उस की तरफ खिंचे चले आते थे, आदित्य का स्थान अब गौण हो चला था.

पत्नी के इस परिवर्तन पर आदित्य परेशान हो उठा था. वैसे भी पुरुष, नारी को अपने ऊपर या अपने समकक्ष कब देखना चाहता है. यदि चाहेअनचाहे पत्नी या उस के संबंधियों के प्रयास से ऐसा हो भी जाता है तो पुरुष की हीनभावना उसे उग्र बना देती है. ऐसा ही यहां भी हुआ था जो थोड़ाबहुत मान पति के अधीनस्थ हो कर उसे मिल रहा था, वह भी छिनता चला गया. पर सौदामिनी रुकी नहीं, आगे ही बढ़ती गई.

अमेरिका में उस के पत्र मुझे नियमित रूप से मिलते रहे थे. मन में राहत सी महसूस होती.

उधर दीवान साहब की दशा दिनपरदिन गिरती चली गई. बहू का दुख घुन के समान उन के शरीर को खाता जा रहा था. हर समय वे खुद को सौदामिनी का दोषी समझते. उस का जीवन उन्हें मझधार में फंसी हुई उस नाव के समान लगता, जिस का कोई किनारा ही न हो. भारीभरकम शरीर जर्जरावस्था में पहुंचता गया, जबान तालू से चिपकती गई. एक दिन देखते ही देखते उन के प्राणपखेरू उड़ गए और सौदामिनी अकेली रह गई.

उस दिन उसे लगा, वह रिक्त हो गई है. ऐसा कोई था भी तो नहीं, जो उस के दुख को समझ पाता. जिस कंधे का सहारा ले कर वह आंसुओं के चंद कतरे बहा सकती थी, वह भी तो स्पंदनहीन पड़ा था.

पिता की मृत्यु के बाद आदित्य पूर्णरूप से आजाद हो गया था. तेरहवीं की रस्म के बाद ही सूजी को घर में ला कर वह मुक्ति पर्व मनाने लगा था. सूजी उस के दिल की स्वामिनी तो थी ही, पूरे घर की स्वामिनी भी बन बैठी. घर की पूर्ण व्यवस्था पर उस का ही वर्चस्व था.

संवेदनशील सौदामिनी विस्मित हो पति का रवैया निहारती रह गई.

आदित्य का व्यवहार धीरेधीरे उसे परेशान नहीं, संतुलित करता गया. उस में निर्णय लेने की शक्ति आ गई थी.

अपने आखिरी पत्र में उस ने मुझे लिखा था…

‘सारे रस्मोंरिवाजों के बंधनों को तोड़ कर एक दिन मैं आजाद हो जाऊंगी. नासूर बन गए जुड़ाव की लहूलुहान पीड़ा से तो मुक्ति का सुख ज्यादा आनंददायक होगा. लगता है, वह समय आ गया है. अगर जिंदा रही तो जरूर मिलूंगी.

तुम्हारी सौदामिनी.’

उस के बाद वह कहां गई, मैं नहीं जानती थी. दद्दा को भी मैं ने कई पत्र लिखे थे, पर उन्होंने तो शायद दीवान साहब की मृत्यु के बाद बेटी की सुध ही नहीं ली थी. बेटी को अपनी चौखट से विदा कर के ही उन के कर्तव्य की इतिश्री हो गई थी.

सामने मेज पर रखी चाय बर्फ के समान ठंडी हो चुकी थी. गुमसुम सी बैठी सौदामिनी से मैं ने प्रश्न किया, ‘‘दीवान साहब के घर से निकल कर तुम कहां गईं, कहां रहीं?’’

सौदामिनी गंभीर हो उठी थी. उस के माथे पर सिलवटें सी पड़ गईं. ऐसा लगा, उस के सीने में जो अपमान जमा है, एक बार फिर पिघलने लगा है.

‘‘तनु, अतीत को कुरेद कर, वर्तमान को गंधाने से क्या लाभ? उन धुंधली यादों को अपने जीवन की पुस्तक से मैं फाड़ चुकी हूं.’’

‘‘जानती हूं, लेकिन फिर भी, जो हमारे अपने होते हैं और जिन्हें हम बेहद प्यार करते हैं, उन से कुछ पूछने का हक तो होता है न हमें. क्या यह अधिकार भी मुझे नहीं दोगी?’’

आत्मीयता के चंद शब्द सुन कर उस की आंखें भीग गईं. अवरुद्ध स्वर, कितनी मुश्किल से कंठ से बाहर निकला होगा, इस का अंदाजा मैं ने लगा लिया था.

‘‘जिस समय आदित्य की चौखट लांघ कर बाहर निकली थी, विश्वासअविश्वास के चक्रवात में उलझी मैं ऐसे दोराहे पर खड़ी थी, जहां से एक सीधीसपाट सड़क मायके की देहरी पर खत्म होती थी. पर वहां कौन था मेरा? सो, लौटने का सवाल ही नहीं उठता था.

‘‘आत्महत्या करने का प्रयास भी कई बार किया था, पर नाकाम रही थी. अगर जीवन के प्रति जिजीविषा बनी हुई हो तो मृत्युवरण भी कैसे हो सकता है? इतने बरसों बाद अपनी सूनी आंखों में मोहभंग का इतिहास समेटे जब मैं घर से निकली थी तो मेरे पास कुछ भी नहीं था, सिवा सोने की 4 चूडि़यों के. उन्हें मैं ने कब सुनार के पास बेचा, और कब ट्रेन में चढ़ कर यहां माउंट आबू पहुंच गई, याद ही नहीं. यहांवहां भटकती रही.

‘‘ऐसी ही एक शाम मैं गश खा कर गिर पड़ी. पर जब आंख खुली तो अपने सामने श्वेत वस्त्रधारी, एक महिला को खड़े पाया. उस के चेहरे पर पांडित्य के लक्षण थे. उस के हाथ में ढेर सारी दवाइयां थीं. मिसरी पगे स्वर में उस ने पूछा, ‘कहां जाना है, बहन? चलो, मैं तुम्हें छोड़ आती हूं.’

‘‘किसी अजनबी के सामने अपना परिचय देने में डर लग रहा था. वैसे भी अपने गंतव्य के विषय में जब खुद मुझे ही कुछ नहीं मालूम था तो उसे क्या बताती. उस के चेहरे पर ममता और दया के भाव परिलक्षित हो उठे थे. मेरे आंसुओं को वह धीरेधीरे पोंछती रही. उस ने मुझे अपने साथ चलने को कहा और यहां इस आश्रम में ले आई.

‘‘कई दिनों से बंद पड़े एक कमरे को उस ने भली प्रकार से साफ करवाया, रोजमर्रा की जरूरी चीजों को मेरे लिए जुटा कर वह मेरे पास ही बैठ गई. कुछ देर बाद उस ने मेरे अतीत को फिर से कुरेदा तो मैं ने हिचकियों के बीच सचाई उसे बता दी.

‘‘उस का नाम श्यामली था. एक दिन वह बोली, ‘यों कब तक अंधेरे में मुंह छिपा कर बैठी रहोगी, सौदामिनी. जब जीवन का हर द्वार बंद हो जाए तो जी कर भी क्या करेगा इंसान?

‘‘‘जीवन एक अमूल्य निधि है, इसे गंवाना कहां की अक्लमंदी है? केवल भावनाओं और संवेदनाओं के सहारे जीवन नहीं जीया जा सकता. जीविकोपार्जन के लिए कुछ न कुछ साधन जुटाने पड़ते हैं.’

‘‘श्यामली इसी आश्रम की संचालिका थी. बरसों पहले उस ने और उस के डाक्टर पति ने इस आश्रम को स्थापित किया था. वह मुझे इसी आश्रम में बने एक स्कूल में ले गई. इधरउधर छिटकी, बिखरी कलियों को समेट कर एक कक्षा में बिठा कर पढ़ाना शुरू किया तो लगा, पूर्ण मातृत्व को प्राप्त कर लिया है. घर के बाहर कुछ सब्जियां वगैरा उगा ली थीं. समय भी बीत जाता, खर्च में भी बचत हो जाती.

‘‘दिन तो अच्छा बीत जाता था. शाम को अकेली बैठती तो गहरी उदासी के बादल चारों ओर घिर आते थे. श्यामली अकसर मुझे अपने घर बुलाती, पर कहीं जाने का मन ही नहीं करता था.

‘‘कई आघातों के बाद जीवन ने एक स्वाभाविक गति पकड़ ली थी. सहज होने में कितना भी समय क्यों न लगा हो, जीवन मंथर गति से चलने लगा था. अतीत की यादें परछाईं की तरह मिटने लगी थीं. उसी वातावरण में रमती गई, तो जीवन रास आने लगा.

‘‘इधर एक हफ्ते से श्यामली मुझ से मिली नहीं थी. मैं अचरज में थी कि वह इतने दिनों तक अनुपस्थित कैसे रह सकती है. कभी उस के घर गई नहीं थी. इसलिए कदम उठ ही नहीं रहे थे. पर जब मन न माना तो मैं उसी ओर चल दी.

‘‘दरवाजा श्यामली ने ही खोला था. मुझे देख कर उस के चेहरे पर स्मित हास्य के चिह्न मुखर हो उठे थे. उसे देख कर मुझे अपने अंदर कुछ सरकता सा महसूस हुआ. पहले से वह बेहद कमजोर लग रही थी.

‘‘उस ने आगे बढ़ कर मेरे कंधे पर हाथ रखा और अंदर ले गई. पालने में एक बालक लेटा हुआ था. मानसिक रूप से उस का पूर्ण विकास अवरुद्ध हो गया है, ऐसा मुझे महसूस हुआ था. पूरे घर में शांति थी.

‘‘‘पिछले कुछ दिनों से मेरे पति की तबीयत अचानक खराब हो गई. आजकल रोज अस्पताल जाना पड़ता है,’ उस ने बताया.

‘‘क्या कहते हैं, डाक्टर?’

‘‘‘उन्हें कैंसर है,’ उस का स्वर धीमा था.

‘‘कुछ देर बाद उस के पति के कराहने का स्वर सुनाई दिया, तो वह अंदर चली गई. साथ ही, मुझे भी अपने पीछे आने को कहा.

‘‘दुर्बल शरीर, खिचड़ी से बेतरतीब बाल, लंबी दाढ़ी…पर मैं उसे एक पल में पहचान गई थी. सामने मृदुल मृत्युशय्या पर लेटा था. सैलाब के क्षणों में जैसे समूची धरती उलटपलट जाती है, वैसे ही मेरे अंतस में भयावह हाहाकार जाग उठा था. वक्त ने कैसा क्रूर मजाक किया था, मेरे साथ? अतीत के जिस प्रसंग को मैं भूल चुकी थी, वर्तमान बन कर मेरे सामने खड़ा था. वितृष्णा, विरक्ति, घृणा जैसे भाव मेरे चेहरे पर मुखरित हो उठे थे. उस की पीड़ा देख कर मेरे चेहरे पर संतोष का भाव उभर आया.

‘‘‘अगर तुम यहां मृदुल के पास कुछ समय बैठो, तो मैं आश्रम का निरीक्षण कर आऊं?’ श्यामली ने मुझे वर्तमान में धकेला था.

‘‘‘हांहां, तुम निश्चिन्त हो कर जाओ, मैं यहीं पर हूं.’

‘‘श्यामली के जाने के बाद वातावरण असहज हो उठा था. मैं अपनेआप में सिमटती जा रही थी. मृदुल की मुंदी हुई आंखें हौलेहौले खुलने लगी थीं. उस के हावभाव में बेहद ठंडापन था. झील जैसी शांत शीतल छाया बिखेरती निगाहें उठा कर उस ने मुझे देखा और अपने पास रखी कुरसी पर बैठने को कहा. फिर हौले से बोला, ‘तुम यहां, इस शहर में?’

‘‘‘और अगर यही प्रश्न मैं तुम से करूं तो? मृदुल, क्या सपनों के राजकुमार यों ही जिंदगी में आते हैं? अगर श्यामली से ही ब्याह करना था तो मुझ से प्रेम ही क्यों किया था? मुझे तो अकेले जीने की आदत थी.’ रुलाई को बमुश्किल संयत करते हुए मैं ने पूछा तो उस ने अपनी कांपती मुट्ठी में मेरी दोनों हथेलियों को कस कर पकड़ लिया.

‘‘उस के स्पर्श में दया, ममता और अपनत्व के भाव थे. वह हौले से बोला, ‘क्या दोषारोपण के सारे अधिकार तुम्हारे ही पास हैं? मुझे लगता है तुम ने उतना ही सुना और समझा है, जितना शायद तुम ने सुनना और समझना चाहा है. अपने इर्दगिर्द की सारी सीमाएं तोड़ दो और फिर देखो, क्या कोई फरेब दिखता है, तुम्हें?’

‘‘मैं उसे एकटक निहारती रही. अपना सिर पीछे दीवार से टिका कर उस ने आंखें बंद कर लीं. उन बंद आंखों के पीछे बहुतकुछ था, जो अनकहा था.

‘‘आखिर मृदुल ने खुद ही मौन बींधा, ‘तुम्हारे पिता राय साहब बड़े आदमी थे. वहां का रुख तक वे अपने अनुसार मोड़ने में सिद्धहस्त थे. यह मुझ से ज्यादा शायद तुम समझती होगी. जिन दिनों मैं तुम्हारे पास आया करता था, मेरे भैया की तबीयत अचानक खराब हो गई थी. डाक्टर ने दिल का औपरेशन करने का सुझाव दिया था. देखा जाए तो भारत में न डाक्टरों की कमी है, न ही अस्पतालों की, पर तुम्हारे पिता ने उस समय मुझे भैया को ले कर अमेरिका में औपरेशन करने का सुझाव दिया था.

‘‘‘तुम तो जानती हो, मेरी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, पर राय साहब ने आननफानन सारी तैयारी करवा कर 2 टिकट मेरे हाथ में पकड़वा दिए थे. उस समय मेरा मन उन के प्रति श्रद्धा से नतमस्तक हो उठा था.

‘‘‘तुम सोच रही होगी, मैं तुम से मिलने क्यों नहीं आया? मैं तुम्हारे घर गया था, पर तब तक तुम ननिहाल जा चुकी थीं. कुछ ही दिन बीते तो अमेरिका में तुम्हारे ब्याह की खबर सुनी थी. तुम्हारे पिता के प्रति मन घृणा से भर उठा था. शतरंज की बिसात पर 2 युवा प्रेमियों को मुहरों की तरह प्रयोग कर के कितनी कुशलता से उन्होंने बाजी जीत ली थी. फिर तुम ने भी तो सच को समझने का प्रयास ही नहीं किया.’

‘‘छोटे बालक की तरह वह सिसकता रहा. अतीत की धूमिल यादें, एक बार फिर मानसपटल पर साकार हो उठी थीं. झूठी मानमर्यादा और सामाजिक प्रतिष्ठा की दुहाई देने वाले मेरे पिता को, 2 युवा प्रेमियों को अलग करने से क्या मिला? मृदुल को तो फिर भी गृहस्थी और पत्नी का सुख मिला था. लुटती तो मैं ही रही थी. कितनी देर तक पीड़ा के तिनके हृदयपटल से बुहारने का प्रयास करती रही थी, पर बरसों से जमी पीड़ा को पिघलने में समय तो लगता ही है.

‘‘घर पहुंच कर सुख को मैं कोसने लगी कि मृदुल से क्यों मिली. मृगतृष्णा ही सही, आश्वस्त तो थी कि उस ने मुझे छला है. धोखा दिया है. अब तो घृणा का स्थान दया ने ले लिया था. उस से मिलने को मन हर समय आतुर रहता. उस के सान्निध्य में, कुंआरे सपने साकार होने लगते. यह जानते हुए भी कि मैं अंधेरी गुफा की ओर बढ़ रही हूं, खुद को रोक पाने में अक्षम थी.

‘‘एक दिन मेरे अंतस से पुरजोर आवाज उभरी, ‘यह क्या कर  रही है तू? जिस महिला ने तुझे जीवनदान दिया, जीने की दिशा सुझाई, उसी का सुखचैन लूट रही है. मृदुल तेरा पूर्व प्रेमी सही, अब श्यामली का पति है. फिर तू भी तो आदित्य की ब्याहता पत्नी है. श्यामली के जीवन में विष घोल रही है?’

‘‘मन ने धिक्कारा, तो पैरों में खुदबखुद बेडि़यां पड़ गईं. श्यामली से भी मैं दूर भागने लगी थी. अपने ही काम में व्यस्त रहती. मन उचटता तो गूंगेबहरे, विक्षिप्त बच्चों के पास जा पहुंचती. इस से राहत सी महसूस होती थी. श्यामली संदेशा भिजवाती भी, तो बड़ी ही सफाई से टाल जाती.

‘‘एक रात श्यामली के घर से करुण क्रंदन सुनाई दिया था. मन हाहाकार कर उठा. दौड़ती हुई मैं श्यामली के पास जा पहुंची, लोगों की भीड़ जमा थी.

‘‘पाषाण प्रतिमा बनी श्यामली पति के सिरहाने गुमसुम सी बैठी थी. पास ही, उस का बेटा लेटा हुआ था. सच, पुरुष का साया मात्र उठ जाने से औरत कितनी असहाय हो उठती है. मुझे जिंदगी ने छला था तो उसे मौत ने.

‘‘उस दिन के बाद मैं प्रतिदिन श्यामली के पास जाती. घंटों उस के पास बैठी रहती. उस की खामोश आंखों में मृदुल की छवि समाई हुई थी.

‘‘पति की मौत का दुख घुन की तरह उस के शरीर को बींधता रहा था. उस की तबीयत दिनपरदिन बिगड़ने लगी थी. वह अकसर कहती, ‘मृदुल बहुत नेक इंसान थे. जीवन के इस महासागर में, उन्हें बहुत कम समय व्यतीत करना है, यह शायद वे जानते थे. उन्होंने कभी किसी को चोट नहीं पहुंचाई, कभी किसी को दुख नहीं दिया. पर अब मुझे जीवन की तल्खियों से जूझने के लिए अकेला क्यों छोड़ गए?’

‘‘जब निविड़ अंधकार में प्रकाश की कोई किरण दिखाई नहीं देती, तब आदमी जिंदगी की डोर झटक कर तोड़ देने को मजबूर हो जाता होगा. श्यामली का जीवन भी ऐसा ही अंधकारपूर्ण हो गया होगा, तभी तो एक दिन चुपके से उस ने प्राण त्याग दिए थे और जा पहुंची थी अपने मृदुल के पास.

‘‘मृदुल की मृत्यु के बाद मैं उसी के घर में उस के साथ रहने लगी थी. हर समय उस का बेटा मेरे ही पास रहता. हर समय उस के मुख पर एक ही प्रश्न रहता कि उस के बाद उस के बेटे का क्या होगा? मैं उसे धीरज बंधाती, उस का मनोबल बढ़ाती, पर वह भीतर ही भीतर घुटती रहती.

‘‘‘जीने का मोह ही नहीं रहा,’ उस ने एक दिन बुझीबुझी आंखों से कहा था, ‘एक बात कहूं? मेरी मृत्यु के बाद इस आश्रम और मेरे बेटे मानव का दायित्व तुम्हारे कंधों पर होगा,’ उसे मेरी हां का इंतजार था, ‘हमारा रुपयापैसा, जमापूजीं तुम्हारी हुई सौदामिनी…’

‘‘मैं चुप थी. क्या इतना बड़ा उत्तरदायित्व मैं संभाल सकूंगी? मन इसी ऊहापोह में था.

‘‘फिर थोड़ा रुक कर वह बोली, ‘मृत्युवरण से कुछ समय पूर्व ही मृदुल ने अपने और तुम्हारे संबंधों के बारे में मुझे सबकुछ बता दिया था. यह भी कहा था कि अगर मुझे कुछ हो जाए तो मानव का दायित्व मैं तुम्हें सौंप दूं. उन की अंतिम इच्छा क्या पूरी नहीं करोगी? एक बार हां कह दो, तो चैन से इस संसार से विदा ले लूं.’

‘‘मन कृतकृत्य हो उठा था. साथ ही, मृदुल का मेरे प्रति अटूट विश्वास इस अवधारणा से मुक्त कर गया था कि सप्तपदी और विवाह का अनुष्ठान तो मात्र एक मुहर है जो 2 इंसानों को जोड़ता है. असल तो है, मन से मन का मिलन.

‘‘मानव का उत्तरदायित्व लेने से हिचकिचाहट तो हुई थी. एक बार फिर समाज और इस के लोग मेरे सामने आ गए थे. मन कांपा था, लोग अफवाहें फैलाएंगे. फिकरे कसेंगे, पर एक झटके से मन पर नियंत्रण भी पा लिया था. सोचा, जिस समाज ने हमेशा घाव ही दिए, उस की चिंता कर के इस बच्चे का जीवन क्यों बरबाद करूं? मृदुल के विश्वास को क्यों धोखा दूं?’’

आसमान पर चांद का टुकड़ा कब खिड़की की राह कमरे में दाखिल हो गया, हम दोनों को पता ही नहीं चला. मैं उठ कर बाहर आई, तो चांद मुसकरा रहा था.

USA : ग्रेट अमेरिका या गटर अमेरिका

USA : एक बड़े देश के नेता का दंभी और गुस्सैल होना स्वाभाविक है पर एक छोटे देश के नेता का आत्मसम्मानी और बड़े देश के सामने याचक की तरह खड़े होने पर भी अपना और अपने देश के सम्मान को न बेचना अद्भुत है. यूक्रेन के राष्ट्रपति व्लोदोमिर जेलेंस्की ने डोनाल्ड ट्रंप और जेडी वेंस के सामने कैमरों के बीच खरीखरी कह कर दर्शा दिया कि यूक्रेन की हिम्मत रूस के व्लादिमीर पुतिन और अमेरिका के खब्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से ज्यादा है.

यह ठीक है कि अमेरिकी हथियारों के बिना यूक्रेन 2 साल तक रूस को रोक न पाता पर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि अगर यूक्रेन की जनता जान जोखिम में डाल कर पुतिन के सामने न खड़ी होती तो आज पुतिन पूरे यूरोप ही नहीं, दुनिया के बहुत से देशों में दखलंदाजी कर रहे होते.

यूक्रेन को हथियार दे कर यूरोप और अमेरिका ने दया नहीं की है, उन्होंने अपनी खुद की रक्षा की है. डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति एकदम बेहूदा है कि अमेरिका को यूरोप से कुछ लेनादेना नहीं है. अमेरिका को यह नहीं भूलना चाहिए कि रूसी और चीनी आज इतने ताकतवर हैं कि वे मिल कर अमेरिका का मुकाबला कर सकते हैं और चाह कर भी अमेरिका उन से जीत नहीं सकता.

अमेरिका वियतनाम में हारा, कोरिया में हारा, अफगानिस्तान में हारा, इराक और लीबिया में हारा. इन जगह अमेरिकी फौजी सामान के साथ सैनिक भी थे पर जनता नहीं. यूक्रेन में अमेरिकी सेना नहीं है, सिर्फ हथियार हैं और उस पर अमेरिकी राष्ट्रपति की अकड़ एक सिरफिरे नेता की बेवकूफी ही है. इस की बहुत बड़ी कीमत अमेरिकी जनता अगले दशकों में चुकाएगी जब रूस व यूरोप अमेरिका से लेनदेन बंद कर देंगे.

अमेरिका आज अमीर हो रहा है क्योंकि वह अपनी विशाल तकनीकी जानकारी और मार्केट के दोहरे वार को इस्तेमाल कर के बहुत से देशों को रूसी-चीनी खेमों में भटकने से रोक पा रहा था. डोनाल्ड ट्रंप ने एक दोस्त देश, जो अपने देशवासियों की हजारों जानें यूरोप की शांति के लिए गंवा चुका हो व भिखारी सा दिखने लगा हो, को खो दिया है.

अमेरिका अब फिलहाल किसी भी देश के लिए भरोसे लायक नहीं रह गया है. अमेरिकी कंपनियों के मालिकों, जो ज्यादातर ट्रंप भक्त हैं, से व्यापार करना भी खतरे से खाली नहीं है. ट्रंप हर नियम व कानून से अपने को ऊपर मानने हैं क्योंकि उन्होंने नाजियों जैसी ‘भगवा’ भीड़ जमा कर ली है जो अमेरिका को ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ बनाने का नारा-वादा कर रही है पर असल में वह अमेरिका को ‘मेक अमेरिका गटर एरिया’ बना रही है.

भारत के जो युवा अमेरिका में जा कर बसना या पढ़ने के सपने देख रहे थे उन्हें तुरंत इन सपनों को बुरा सपना मान कर भूल जाना चाहिए. कम से कम 4 साल के लिए तो अमेरिका ‘ग्रेट गटर’ ही रहेगा जब तक खब्ती का कार्यकाल चलेगा.

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