Download App

Rahul Gandhi : धर्म नहीं कर्म

Rahul Gandhi : कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष व सांसद राहुल गांधी ने गुजरात में अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को खूब खरीखरी सुनाई. उन्होंने साफसाफ कहा कि उन में से आधे भारतीय जनता पार्टी से मिले हुए हैं और यही वजह है कि विपक्ष 40 फीसदी वोट पा कर भी कमजोर और बिखरा हुआ है. उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे तथाकथित कांग्रेसियों को निकाल बाहर किया जाएगा.

वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने अपनी पार्टी की कमजोरी तो पकड़ ली लेकिन वे यह साफ नहीं कर पाए कि कांग्रेस ऐसा कौन सा करिश्मा करेगी जो भारतीय जनता पार्टी नहीं कर सकती.

हर व्यापार की तरह पौलिटिक्स के बिजनैस में भी एक पार्टी दूसरी पार्टी के एजेंडे की चोरी करती है और दिल्ली विधानसभा चुनावों में यह एकदम स्पष्ट हुआ जब अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की मुफ्त बिजली, बस यात्रा, कैश सहायता, मुफ्त सा इलाज जैसी नीतियों को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने दोहरानी शुरू कर दीं.

नतीजा यह हुआ कि जिस पार्टी के पास ज्यादा कमिटेड वर्कर थे वह जीत गई. आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन को मुगलकालीन विरोधियों को सताने की नीति की तरह भाजपा की केंद्र सरकार ने जेल में डाल दिया, बिना सुबूत के, केवल एक अभियुक्त के बयान के आधार पर जिसे उस ने ईडी को 7वीं-8वीं जिरह में तब दिया था जब उसे केंद्र सरकार की जांच एजेंसियों की तरफ से कोई छूट मिलने वाली थी. अपने नेताओं के जेल में डाल दिए जाने से आप के कार्यकर्ता कमिटेड नहीं रह पाए, जिस का फायदा भाजपा को मिला.

गुजरात में कांग्रेस के पास कुछ अलग करने की बात कहने के लिए है क्या? गुजरात ही नहीं, अन्य राज्यों में जनता से कांग्रेस ऐसा कौन सा वादा कर सकती है जो भाजपा नहीं कर सकती? केवल संविधान की किताब लहरा कर भगवे झंडे की लहर का मुकाबला नहीं किया जा सकता.

गुजरात हो या कोई और राज्य, कांग्रेस को साफ कहना होगा कि वह सिर्फ मंदिरों की पार्टी नहीं है, वह जनता की पार्टी है. भाजपा मंदिर नहीं छोड़ सकती. कांग्रेस को जनता को समझना होगा कि मंदिर ही सामाजिक भेदभाव की जड़ हैं. उन्हीं से वे जहरीली हवाएं निकलती हैं जो न केवल धर्म के नाम पर बंटवारा करती हैं बल्कि जातियों के नाम पर भी बंटवारा करती हैं.

राहुल को देश के मतदाताओं को यह भी समझना होगा कि संविधान आदमी और औरत में कोई भेद नहीं करता जबकि मंदिर, मसजिद, चर्च आदि सभी अपने धर्म में, अपनी ही जाति में औरतों को जन्म से कमजोर और पुरुष के पैर की जूती मानते हैं. भाजपा मंदिरों को चलाती है और वह जातिवादी बंटवारे को बढ़ाने/फैलाने के साथ सवर्ण औरतों को कमजोर करना चाहती है.

कांग्रेसी सरकारों ने, कट्टरपंथी हिंदुओं के बयानों के मुताबिक, मुसलिमों को सिर पर चढ़ा रखा था और मोदी, योगी की सरकारों ने उन्हें सही ठिकाने पर लगाया है. कांग्रेस को खुलेआम कहना होगा कि वह हर कमजोर के साथ है और मंदिर, मसजिद, चर्च की धौंस के खिलाफ है.

जब तक कांग्रेस में यह हिम्मत नहीं आएगी, उस में वे लोग आते रहेंगे जो टोपी तो कांग्रेसी पहनेंगे पर दिल से धर्म की भेदभाव की साजिशों के पक्षधर हैं.

धर्म चाहे लोगों को 2,000 से ज्यादा वर्षों से पूरी तरह नियंत्रित कर रहा हो लेकिन अब नई वैज्ञानिक शिक्षा ने उन्हें धर्मजंजाल से निकलने का अवसर दिया है. पिछले 100 सालों में धर्म का प्रभाव कम हुआ था. लेकिन अब रूस में व्लादिमीर पुतिन, अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप और भारत में नरेंद्र मोदी के आने पर इन 3 बड़े देशों में धर्म को नई जान मिली है. पंडेपुजारी, पादरी एक बार फिर मजबूत हुए हैं, वे सत्ता में आ गए हैं. इसलामिक देशों में तो कभी भी वैज्ञानिक सोच आई ही नहीं थी. वहां न सिर्फ औरतें बल्कि आदमी भी धर्म और धर्म को चलाने वाले शासकों के गुलाम रहे हैं.

कोई भी समाज धर्म के साए में प्रगति नहीं कर सकता, कांग्रेस के राहुल गांधी शायद यह समझते हों क्योंकि उन का परिवार मिश्रित धर्मों से आया. उन की दादी ने पारसी से शादी की तो पिता ने ईसाई से. राहुल गांधी हिंदू हैं हालांकि भाजपा के कुप्रचार के चलते उन्हें अपने को हिंदू होना जताने के लिए देशवासियों के सामने खुलेतौर पर मंदिरों के चक्कर लगाने पड़े. अब वे लगातार कर्म कर रहे हैं और कर्म करते रहने की बात कह भी रहे हैं. आज वे उस स्थिति में हैं कि जब वे भारतवासियों को धर्म के दलदल से निकाल सकते हैं.

भारतीय जनता पार्टी ने ही नहीं बल्कि लगभग सभी दूसरे दलों ने भी कुंभ के कीचड़ में डुबकी लगा कर साबित कर दिया है कि उन की नीति धर्म की चालबाजी, चतुराई, कथित चमत्कारी, चिड़चिड़ी और सदियों से चली आ रही सड़ीगली मान्यताओं पर टिकी है, संविधान के नैतिक, तार्किक, व्यावहारिक या वैज्ञानिक आधार पर नहीं.

गुजरात एक नमूना हो सकता है हालांकि वहां कोई नैतिकता की खेती कभी हुई, ऐसा लगता नहीं. दक्षिण के तमिलनाडु के अलावा अंधविश्वास का सार्वजनिक विरोध कहीं नहीं हो पाया.

Love Story : न्यूयार्क की एक शाम

Love Story : न्यूयार्क से न्यूजर्सी लगभग डेढ़ घंटे का रास्ता था. सड़क मार्ग 6 लेन का था. भारत की साइबर सिटी बेंगलुरु के समान न्यूजर्सी भी एक तरह साइबर सिटी था. न्यूयार्क काफी महंगा शहर होने के साथसाथ घनी आबादी वाला भी हो गया था. मकानों का किराया काफी ज्यादा था. साथ ही मकान मिलना भी मुश्किल था. इसलिए ज्यादातर नौकरीपेशा आसपास स्थित उपनगरों में रहते थे. सुबह काम पर आते और शाम को वापस लौट जाते थे.

अमेरिका में 100-200 किलोमीटर का रोजाना सफर सामान्य समझा जाता था. मल्टीलेन सड़कों का जाल बिछा होने से कार, जीप और अन्य हलके वाहनों की अधिकतम गति 120 किलोमीटर तक चली जाती थी जिस से 100 किलोमीटर की दूरी 1 घंटे में तय हो जाती थी.

शैलेश और उस की पत्नी गीता काम तो न्यूयार्क में करते थे मगर रिहाइश न्यूजर्सी में थी. शैलेश एक डिपार्र्टमेंटल स्टोर में सेल्समैन था. गीता एक कंपनी में लेखाकार थी. दोनों शाम को अपनीअपनी ड्यूटी समाप्त होने पर कार द्वारा न्यूजर्सी लौट जाते थे.

अमेरिका आते समय दोनों ने आमदनी के बारे में ज्यादा सोचा था, खर्च के बारे में कम. कमाई अगर डौलर में होनी थी तो खर्च भी डौलर में होना था. डौलर कमाओगे तो डौलर ही खर्च करोगे.

भारत में छोटेमोटे कामों के लिए मजदूरी जहां काफी कम थी वहां अमेरिका में काफी ज्यादा थी.

ब्यूटी सैलून या हेयर ड्रेसर के पास जाने पर किसी की आधी तनख्वाह चली जाती थी. धोबी और मोची नहीं मिलते थे. कपड़े या तो खुद धोने पड़ते थे या फिर लांड्री से धुलवाने पड़ते थे. मगर धुलाई का खर्च इतना ज्यादा था कि ज्यादातर लोग कपड़ों को धुलवाने की जगह उन्हें फेंक कर नया खरीदने को तरजीह देते.

आम स्तर के लोगों की आमदनी का एक बड़ा हिस्सा किस्त चुकाने में निकल जाता था. इसलिए ज्यादातर एशियाई या भारतीय दोहरी शिफ्ट में काम कर अपना खर्च पूरा कर पाते थे.

मगर डबल या दोहरी शिफ्ट करने के बाद काम से लौटने पर शाम रात में बदल जाती थी और फिर लंबी दूरी का सफर कर न्यूजर्सी या अन्य उपनगरों में लौटना, वह भी रात के समय, खतरे से खाली नहीं था क्योंकि अमेरिका जहां सब से विकसित देश है वहीं लूटपाट, राहजनी में भी अव्वल है.

शैलेश व गीता की हरसंभव कोशिश यही रहती कि वे सूरज ढलने से पहले ही ड्यूटी से फारिग हो न्यूजर्सी के लिए चल दें मगर कभीकभी न चाहते हुए भी देर हो जाती थी.

कभी डिपार्टमेंटल स्टोर में ग्राहकों की भीड़ बढ़ जाती थी, कभी गीता को ज्यादा खाताबही का काम करना पड़ता था. कभी एक जल्दी फारिग हो जाता तो दूसरे का ओवरटाइम लगा होता था, इसलिए दोनों को ही देर हो जाती थी.

आधी रात को घर लौटने पर भला खाना कौन पकाए? इसलिए सभी डब्बा- बंद खाना ले कर चलते थे. बर्गर, हैमबर्गर, सैंडविच, अन्य सामान्य खानेपीने की चीजें सामान्य थीं. कार या वाहन में सफर में चलतेचलते ही खापी लेते थे.

हाइवे का सफर काफी लंबा होने की वजह से गति का काफी तेज होना आम था. इस से दुर्घटनाएं भी काफी होती थीं. किसी का एक्सीडेंट होने या वाहन खराब हो जाने पर आगेपीछे के वाहन चालकों से मदद की उम्मीद करना फुजूल था.

इतने विकसित देश में मानवीय स्तर पर निर्भयता हद से ज्यादा थी. ‘हमें क्या लेना’ की मानसिकता से भरे सभी एक नजर डाल आगे बढ़ जाते थे.

आज शाम आसमान पर बादल छाए थे. देश का मौसम पहले ही ठंडा था. उस पर बारिश ने ठंडक और बढ़ा दी थी. 2 घंटे का ओवरटाइम करने के बाद जब पतिपत्नी कार पर सवार हुए तो शाम का धुंधलका रात के गहरे अंधेरे में बदलने लगा था. समय कोई ज्यादा नहीं हुआ था. मगर भीगे मौसम और घने बादलों ने अंधेरा और बढ़ा दिया था.

एक शराब की दुकान से ह्विस्की की 4 बोतलें और एक स्नैक स्टोर से डब्बाबंद खाने के डब्बे और हैमबर्गर के पैकेट खरीदने के बाद कार न्यूजर्सी के लिए चल दी.

ठंडे देश में शराब के सेवन की नशे से ज्यादा जरूरत थी. इस को गलत भी नहीं समझा जाता.

न्यूजर्सी जाने के लिए लंबा चक्कर काट कर फिर फ्लाईओवर पार कर के हाइवे पर पहुंचने के लिए तकरीबन 4 किलोमीटर का लंबा रास्ता तय करना पड़ता था.

कई उत्साही वाहन चालक लंबा चक्कर काटने से बचने के लिए इन कम ऊंचाई वाले स्थानों से अपना वाहन चढ़ा कर सड़क पार कर मुख्य सड़क पर आ मिलते थे.

रोजाना एक ही रास्ते से चलने वालों को इन छोटे शार्टकटों की और सड़क पर आने वाले स्पीड ब्रेकरों के बारे में जानकारी होती थी और इधरउधर नजर मार कर कि कहीं बीट पुलिस की जीप या मोटरसाइकिल तो आसपास नहीं, इन शार्टकटों को पार कर कभी मुख्य सड़क से छोटी सड़क पर, कभी छोटी सड़क से मुख्य सड़क पर आ मिलते थे.

शैलेश और गीता को भी छोटी सड़क से बड़ी सड़क को मिलाने वाले इन शार्टकट रास्तों की पहचान थी. वे अनेक बार आगेपीछे, दाएंबाएं नजर मार कर कि कोई बीट पुलिस आसपास नहीं, एक झटके में मुख्य सड़क पर पहुंच न्यूजर्सी का रास्ता पकड़ लेते थे.

आज तो वैसे भी घना अंधेरा था. अंधेरे और बरसात के ठंडे मौसम में भला कौन सा पुलिस वाला चौकसी से हाइवे की निगरानी कर रहा होगा? शैलेश ने एक नजर दाएंबाएं फिर आगेपीछे डाली, कहीं बीट पुलिस नजर नहीं आई तो उस ने अपने जानेपहचाने ‘शार्टकट’ से कार छोटी सड़क से मुख्य सड़क पर चढ़ा दी और फिर इत्मीनान से न्यूजर्सी की तरफ दौड़ा दी.

लगभग 7 किलोमीटर आगे आ कर कार की गति धीमी करते हुए शैलेश ने कहा, ‘‘आज ठंड है, थोड़ी थकावट भी है, एक पैग डाल दो.’’

सफर के दौरान खानापीना या सिर्फ पीना आम बात थी. एक डिस्पोजेबल गिलास में ह्विस्की में सोडा मिला कर गीता ने उसे थमा दिया. कार को धीमी गति से चलाता एक हाथ में स्टियरिंग थामे शैलेश ह्विस्की पीने लगा. शराब पीने के बाद उस ने कार की रफ्तार तेज कर दी.

तभी उसे अपने पीछे बीट पुलिस का सायरन सुनाई पड़ा. बैक मिरर में सफेदपीले रंग की मोटरसाइकिल पर गोल टोप पहने पुलिस वाले दिखाई पड़े.

वे दोनों घबरा गए. शैलेश ने गाड़ी की रफ्तार तेज कर दी, पीछा करने वालों ने भी अपनी स्पीड बढ़ा दी. शैलेश और भी घबरा गया. उस ने रफ्तार और तेज कर दी. पीछे वालों ने भी अपनी स्पीड और बढ़ा दी. चंद मिनटों तक यह सब चलता रहा.

शैलेश समझ गया कि पुलिस से पीछा छुड़ाना उस के लिए आसान नहीं है. सो उस ने अपनी गाड़ी की रफ्तार कम कर दी.

‘‘अब क्या होगा? एक तो हम ने गलत तरीके से हाइवे पार किया, ऊपर से अब आप ने शराब भी पी ली है,’’ गीता ने घबराए स्वर में कहा.

‘‘शांति रखो, शायद कोई और बात हो.’’

तभी मोटरसाइकिल गुजरती हुई कार को क्रास कर गई. थोड़ा आगे जा कर पुलिस वाले उतर पड़े. उन्होंने रुकने का इशारा किया.

‘‘मिस्टर, आप ने हमें देख कर कार की स्पीड क्यों बढ़ाई?’’ कार के समीप आ कर पुलिस वाले ने कहा.

‘‘मैं ने आप को देख कर नहीं, अपने तौर पर ही स्पीड बढ़ाई थी.’’

‘‘आप कहां जा रहे हो?’’

‘‘न्यूजर्सी.’’

‘‘गाड़ी में क्या है?’’

‘‘कुछ नहीं, थोड़ा खानेपीने का सामान है.’’

‘‘दिखाओ,’’ पुलिसकर्मी ने कार की तलाशी ली. स्कौच की बोतलें देख उस की आंखों में चमक आ गई.

‘‘मिस्टर, आप शराब पी कर गाड़ी चला रहे थे. ऐसा करना अपराध है. आप को अपना सांस टेस्ट देना होगा,’’ कहते हुए उस ने शैलेश को बाहर आने का इशारा किया.

सांस में अलकोहल जांचने से शैलेश के शराब पीने की पुष्टि हो गई.

‘‘मिस्टर, आप का चालान करना होगा. शराब पी कर गाड़ी चलाना और ‘रैश ड्राइव’ करना अपराध है. इस जुर्म में आप को 1 हजार डौलर तक जुर्माना और शायद सजा भी हो सकती है.’’

कहते हुए उस ने अपनी जेब से चालान बुक निकाल ली. शैलेश के साथसाथ गीता का चेहरा भी उतर गया. 3-4 किलोमीटर का रास्ता बचाने के चक्कर में वे गलत तरीके से हाइवे पर आए थे और गलतफहमी में कार दौड़ा इस चक्कर में खुद को फंसा लिया था.

‘1 हजार डौलर जुर्माना और शायद सजा भी. जुर्माने की भारी रकम जहां उन का सारा बजट बिगाड़ देगी वहीं सजा कैसे भुगतेंगे?’ यह सोच कर गीता कार से बाहर निकल आई. उस ने विनय भरे स्वर में कहा, ‘‘देखिए सर, सर्दी काफी ज्यादा है इसलिए मेरे पति ने थोड़ी पी ली थी, वैसे ये ड्राइव करते वक्त नहीं पीते.’’

भारत होता तो शायद शैलेश पुलिस वालों से लेदे कर मामला निबटा लेता. मगर यह अमेरिका था, यहां ‘रिश्वत’ और वह भी पुलिस को, कभी सुना भी नहीं था.

अब क्या करें? पुलिसकर्मी चालान बुक के फार्म में कार्बन चढ़ा रहा था. तभी दूसरा पुलिस वाला उस के समीप आया. दोनों एक तरफ जा खुसरपुसर करने लगे.

‘‘देखो मिस्टर, आज सर्दी ज्यादा है, रात भी गहरा रही है. आप का पहला अपराध है, हम वार्निंग दे कर छोड़ रहे हैं.’’

शैलेश और गीता के चेहरे खिल उठे. वे वापस जाने को हुए.

‘‘ठहरो, कार में रखी शराब की 2 बोतलें हमें दे दो, क्या पता आप फिर पीने लगो.’’

सुन कर शैलेश चौंक पड़ा. फिर वह मुसकरा पड़ा. उस ने चुपचाप 2 बोतल स्कौच और एक हैमबर्गर का पैकेट उन को थमा दिया. वे दोनों पुलिस वाले मोटरसाइकिल दौड़ाते वापस चल दिए.

कार में बैठ कर गीता ने कुछ समझते, कुछ न समझते हुए शैलेश की तरफ देखा. शैलेश ने कार स्टार्ट कर आगे बढ़ाई और एक बांह पत्नी के कंधे पर रखते हुए कहा, ‘‘डार्लिंग, पुलिस वाला पुलिस वाला ही होता है, चाहे दिल्ली का हो या न्यूयार्क का.’’

इस पर पति के साथ गीता भी खिलखिला कर हंस पड़ी.

Romantic Story : गुलाब यों ही खिले रहें – रिया और शिखा का क्या रिश्ता था?

Romantic Story : शादी की शहनाइयां बज रही थीं. सभी मंडप के बाहर खड़े बरात का इंतजार कर रहे थे. शिखा अपने दोनों बच्चों को सजेधजे और मस्ती करते देख कर बहुत खुश हो रही थी और शादी के मजे लेते हुए उन पर नजर रखे हुए थी. तभी उस की नजर रिया पर पड़ी जो एक कोने में गुमसुम सी अपनी मां के साथ चिपकी खड़ी थी. रिया और शिखा दूर के रिश्ते की चचेरी बहनें थीं. दोनों बचपन से ही अकसर शादीब्याह जैसे पारिवारिक कार्यक्रमों में मिलती थीं. रिया को देख शिखा ने वहीं से आवाज लगाई, ‘‘रिया…रिया…’’

शायद रिया अपनेआप में ही खोई हुई थी. उसे शिखा की आवाज सुनाई भी न दी. शिखा स्वयं ही उस के पास पहुंची और चहक कर बोली, ‘‘कैसी है रिया ’’

रिया ने जैसे ही शिखा को देखा, मुसकरा कर बोली, ‘‘ठीक हूं, तू कैसी है ’’

‘‘बिलकुल ठीक हूं, कितने साल हुए न हम दोनों को मिले, शादी क्या हुई बस, ससुराल के ही हो कर रह गए.’’

शिखा ने कहा, ‘‘आओ, मैं तुम्हें अपने बच्चे से मिलवाती हूं.’’ रिया उन्हें देख कर बस मुसकरा दी. शिखा को लगा रिया कुछ बदलीबदली है. पहले तो वह चिडि़या सी फुदकती और चहकती रहती थी, अब इसे क्या हो गया  मायके में है, फिर भी गम की घटाएं चेहरे पर क्यों जब वह सभी रिश्तेदारों से मिली तो उसे मालूम हुआ कि रिया की उस के पति से तलाक की बात चल रही है. वह सोचने लगी, ‘ऐसा क्या हो गया, शादी को इतने वर्ष हो गए और अब तलाक ’ उस से रहा न गया इसलिए मौका ढूंढ़ने लगी कि कब रिया अकेले में मिले और कब वह इस बारे में बात करे. शिखा ने देखा कि शादी में फेरों के समय रिया अपने कमरे में गई है तो वह भी उस के पीछेपीछे चली गई. शिखा ने कुछ औपचारिक बातें कर कहा, ‘‘मेरी प्यारी बहना, बदलीबदली सी क्यों लगती है  कोई बात है तो मुझे बता.’’

पहले तो रिया नानुकर करती रही, लेकिन जब शिखा ने उसे बचपन में साथ बिताए पलों की याद दिलाई तो उस की रुलाई फूट पड़ी. उसे रोते देख शिखा ने पूछा, ‘‘क्या बात है, पति से तलाक क्यों ले रही है, तुझे परेशान करता है क्या ’’

‘‘ऐसा कुछ नहीं, वे तो बहुत नेक इंसान हैं.,’’ रिया ने जवाब दिया.

‘‘तो फिर क्या बात है रिया, तलाक क्यों ’’ शिखा ने पूछा.

रिया के नयनों की शांत धारा सिसकियों में बदल गई, ‘‘कमी मुझ में है, मैं ही अपने पति को वैवाहिक सुख नहीं दे पाती.’’ मुझे पति के पास जाना भी अच्छा नहीं लगता. मुझे उन से कोई शिकायत नहीं, लेकिन मेरा अतीत मेरा पीछा ही नहीं छोड़ता.’’

‘‘कौन सा अतीत ’’

आज रिया सबकुछ बता देना चाहती थी, वह राज, जो बरसों से घुन की मानिंद उसे अंदर से खोखला कर रहा था. जब उस ने अपनी मां को बताया था तो उन्होंने भी उसे कितना डांटा था. उस की आधीअधूरी सी बात सुन कर शिखा कुछ समझ न पाई और बोली, ‘‘रिया, मैं तुम्हारी मदद करूंगी, मुझे सचसच बताओ, क्या बात है’’ रिया उस के गले लग खूब रोई और बोली, ‘‘वे हमारे दूर के रिश्ते के दादा हैं न गांव वाले, किसी शादी में हमारे शहर आए थे और एक दिन हमारे घर भी रुके थे. मां को उस दिन डाक्टर के पास जाना था. मां को लगा कि दादा हैं इसलिए मुझे भाई के भरोसे घर में छोड़ गईं. जब भैया खेलने गए तो दादा मुझे छत पर ले गए और…’’ कह कर वह रोने लगी. उस की बात सुन कर शिखा की आंखों में मानो खून उतर आया. उस के मुंह से अनायास ही निकला, ‘‘राक्षस, वहशी, दरिंदा और न जाने कितनी युवतियों को उस ने अपना शिकार  बनाया होगा. तुम्हें मालूम है वह बुड्ढा तो मर चुका है. उस ने सिर्फ तुम्हें ही नहीं मुझे भी अपना शिकार बनाया था. मैं एक शादी में गई थी. वह भी वहां आया हुआ था. मेरी मां मुझे शादी के फेरों के समय कमरे में अकेली छोड़ गई थीं. सभी लोग फेरों की रस्म में व्यस्त थे. उस ने मौका देख मेरे साथ बलात्कार किया. मात्र 15 वर्ष की थी मैं उस वक्त, जब मेरे चीखने की आवाज सुनाई दी तो मेरी मां दौड़ कर आईं और पिताजी ने उन दादाजी को खूब भलाबुरा कहा, लेकिन रिश्तेदारों और समाज में बदनामी के डर से यह बात छिपाई गईं.’’

‘‘वही तो,’’ रिया कहने लगी, ‘‘मेरी मां ने तो उलटा मुझे ही डांटा और कहा कि यह तो बड़ा अनर्थ हो गया. बिन ब्याहे ही यह संबंध. न जाने अब कोई मुझ से विवाह करेगा भी या नहीं.

‘‘जैसे कुसूर मेरा ही हो, मैं क्या करती. उस समय सिर्फ 15 वर्ष की थी, इस लिए समझती भी नहीं थी कि बलात्कार क्या होता है, लेकिन शादी के बाद जब भी मेरे पति नजदीक आए तो मुझे बारबार वही हादसा याद आया और मैं उन से दूर जा खड़ी हुई. जब वे मेरे नजदीक आते हैं तो मुझे लगता है एक और बलात्कार होने वाला है.’’

शिखा ने पूछा, ‘‘तो फिर वे तुम से जबरदस्ती तो नहीं करते ’’

‘‘नहीं, कभी नहीं,’’ रिया बोली.

‘‘तब तो तुम्हारे पति सच में बहुत नेक इंसान हैं.’’

‘‘मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण वे दुख की जिंदगी जिएं इसलिए मैं ने ही उन से तलाक मांगा है. मैं तो उन्हें वैवाहिक सुख नहीं दे पाती पर उन्हें तो आजाद करूं इस बंधन से.’’

‘‘ओह, तो यह बात है. मतलब तुम मन ही मन उन्हें पसंद तो करती हो ’’

‘‘हां,’’ रिया बोली, ‘‘मुझे अच्छे लगते हैं वे, किंतु मैं मजबूर हूं.’’

‘‘तुम ने मुझे अपना सब से बड़ा राज बताया है, तो क्या तुम मुझे एक मौका नहीं दोगी कि मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं. देखो रिया, मेरे साथ भी यह हादसा हुआ लेकिन मांपिताजी ने मुझे समझा दिया कि मेरी कोई गलती नहीं, पर तुम्हें तो उलटा तुम्हारी मां ने ही कुसूरवार ठहरा दिया. शायद इसलिए तुम अपनेआप को गुनाहगार समझती हो,’’ शिखा बोली.

‘‘तुम कहो तो मैं तुम्हारे पति से बात करूं इस बारे में ’’

‘‘नहींनहीं, तुम ऐसा कभी न करना,’’ रिया ने कहा.

‘‘अच्छा नहीं करूंगी, लेकिन अभी हम 3-4 दिन तो हैं यहां शादी में, तो चलो, मैं तुम्हें काउंसलर के पास ले चलती हूं.’’

‘‘वह, क्यों ’’ रिया ने पूछा

‘‘तुम मेरा विश्वास करती हो न, तो सवाल मत पूछो. बस, सुबह तैयार रहना.’’

अगले दिन शिखा सुबह ही रिया को एक जानेमाने काउंसलर के पास ले गई. काउंसलर ने बड़े प्यार से रिया से सारी बात पूछी. एक बार तो रिया झिझकी, लेकिन शिखा के कहने पर उस ने सारी बात काउंसलर को बता दी. यह सुन कर काउंसलर ने रिया के कंधे पर हाथ रख कर कहा, ‘‘देखो बेटी, तुम बहुत अच्छी हो, जो तुम ने अपनी मां की बात मान कर यह राज छिपाए रखा, लेकिन इस में तुम्हारी कोई गलती नहीं. तुम अपनेआप को दोषी क्यों समझती हो  क्या हो गया अगर किसी ने जोरजबरदस्ती से तुम से संबंध बना भी लिए तो ’’

रिया बोली, ‘‘मां ने कहा, मैं अपवित्र हो गई, अब मुझे अपनेआप से ही घिन आती है. इसलिए मुझे अपने पति के नजदीक आना भी अच्छा नहीं लगता.’’ काउंसलर ने समझाते हुए कहा, ‘‘लेकिन इस में अपवित्र जैसी तो कोईर् बात ही नहीं और इस काम में कुछ गलत भी नहीं. यह तो हमारे समाज के नियम हैं कि ये संबंध हम विवाह बाद ही बनाते हैं. ‘‘लेकिन समाज में बलात्कार के लिए तो कोई कठोर नियम व सजा नहीं. इसलिए पुरुष इस का फायदा उठा लेते हैं और दोषी लड़कियों को माना जाता है. बेचारी अनखिली कली सी लड़कियां फूल बनने से पहले ही मुरझा जाती हैं. अब तुम मेरी बात मानो और यह बात बिलकुल दिमाग से निकाल दो कि तुम्हारा कोई दोष है और तुम अपवित्र हो. चलो, अब मुसकराओ.’’

रिया मुसकरा उठी. शिखा उसे अपने साथ घर लाई और बोली, ‘‘अब तलाक की बात दिमाग से निकाल दो और अपने पति के पास जाने की पहल तुम खुद करो, इतने वर्ष बहुत सताया तुम ने अपने पति को. अब चलो, प्रायश्चित्त भी तुम ही करो.’ रिया विवाह संपन्न होते ही ससुराल चली गई. उस ने अपने पति के पास जाने की पहल की और साथ ही साथ काउंसलर ने भी उस का फोन पर मार्गदर्शन किया. उस के व्यवहार में बदलाव देख उस के पति भी आश्चर्यचकित रह गए. उन्होंने रिया को एक दिन अपनी बांहों में भर कर पूछा, ‘‘क्या बात है रिया, आजकल तुम्हारा चेहरा गुलाब सा खिला रहता है ’’

वह जवाब में सिर्फ मुसकरा दी और बोली, ‘‘अब मैं सदा के लिए तुम्हारे साथ खिली रहना चाहती हूं, मैं तुम से तलाक नहीं चाहती.’’

उस के पति ने कहा, ‘‘थैंक्स रिया, लेकिन यह मैजिक कैसे ’’

वह बोली, ‘‘थैंक्स शिखा को कहो. अभी फोन मिलाती हूं उसे,’’ कह कर उस ने शिखा का फोन मिला दिया. उधर से शिखा ने रिया के पति से कहा, ‘‘थैंक्स की बात नहीं. बस, यह ध्यान रखना कि गुलाब यों ही खिले रहें. ’’

Social Story : गिरिजा ग्वालिन – बलवंत सिंह को गिरिजा ने कैसे धमकाया ?

Social Story : गिरिजा ग्वालिन हर रोज जैसलमेर से सुबहसवेरे 25 लिटर दूध पीतल के घड़े में अपने सिर पर रख कर 3-4 किलोमीटर दूर तक सड़क से निकलती थी. रास्ते में दूध बेचते हुए लाठी गांव पहुंच कर फिल्मी अंदाज में आवाज लगाती, ‘मेरा नाम है गिरिजा ग्वालिन, मैं आई दूध बेचने जैसलमेर से…’

गिरिजा 25 साल की भरेपूरे बदन की औरत थी. उस का गोरा रंग, लाललाल होंठ, गुलाबी गाल, उभरी छाती, मटकते कूल्हे, अदा भरी निगाहें सब को अपनी ओर खींच लेती थीं. गिरिजा के सिर पर ओढ़नी होती थी, जिस के दोनों सिरे वह अपनी चोली में खोंस देती थी. कमर से घुटनों तक छींटदार घाघरा उस पर खूब फबता था. खुले गोरेगोरे घुटनों के नीचे के पैर हर एक को देखने को मजबूर कर देते थे. इस तरह गिरिजा अपना दूध बेचती रहती थी और जो रुपए आते थे, उन्हें अपनी चोली में खोंसती रहती थी. जब चोली में रुपए नहीं समाते थे, तो वह उन्हें और दबा कर भर देती थी. इस तरह कुछ रुपए चोली के बाहर तक ऊपर दिखाई दे जाते थे.

गिरिजा अपना सारा दूध बेच कर जैसलमेर लौट जाती थी. लाठी गांव के लठैत अपना लट्ठ लिए धमकाते, जबरन पैसे छीनते व जवान लड़कियोंऔरतों को छेड़ने से भी नहीं चूकते थे. जब गिरिजा दूध बेचने आती, तो ये लोग भी उस के आगेपीछे मंडराते थे, पर भीड़भाड़ व गिरिजा का कसरती बदन देख कर हिम्मत नहीं कर पाते थे.

एक दिन जब गिरिजा सारा दूध बेच कर अकेले खड़ी थी, तो कुछ मनचलों ने मौका देखा. उन के ग्रुप में बलवंत सिंह भी था.

उस के दोस्तों में से एक ने बलवंत सिंह से कहा ‘‘देख, आज मौका है. गिरिजा की चोली के ऊपर रुपए झांक रहे हैं. तुझे पुकार रहे हैं. रुपए भी छीन ले और उस की छाती को भी सहला आ.’’

बलवंत सिंह ने कहा, ‘‘बात तो तुम पते की कह रहे हो.’’ गिरिजा उन की कानाफूसी ताड़ गई और सचेत हो गई.

बलवंत सिंह ने गिरिजा की पीठ पर अपना एक हाथ रखा और उस की बगल के सहारे चोली तक डालने के लिए आगे बढ़ाया. यह देख कर गिरिजा ने उस का हाथ अपनी बगल में ही दबा दिया, जिस से वह चोली तक नहीं पहुंच सका.

गिरिजा ने कहा, ‘‘रे बलवंत, पीठ पीछे से हाथ डालता है? हिम्मत होती, तो सामने से आ कर मेरी चोली को टटोलने की कोशिश करता. तू तो बुजदिल निकला रे. ‘‘अब सुन, तेरा हाथ मेरी बगल में दबा हुआ है. तू उसे छुड़ाने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा दे. अगर तू अपना हाथ छुड़ाने में कामयाब हो जाएगा, तो मेरी चोली में सारे रुपए तेरे हो जाएंगे और मैं तुझे मुफ्त में जैसलमेर सैर कराने ले जाऊंगी.

‘‘पर याद रखना कि तेरे साथी बीच में आए, तो उन की भी खैर नहीं.

‘‘अब तू ताकत लगा कर अपना हाथ छुड़ाने की कोशिश कर.

‘‘पर अगर तू हाथ छुड़ाने में नाकाम रहा, तो यह दूध का घड़ा है न, इसे पानी से भर कर तुझे अपने सिर पर रख कर पूरे गांव का चक्कर लगाना पड़ेगा.

जब वहां यह जोरआजमाइश हो रही थी, तो काफी भीड़ इकट्ठा हो गई. लोग तमाशा देख कर कहते थे कि अब क्या होगा. इधर बलवंत सिंह अपना हाथ छुड़ाने के लिए पूरा जोर लगा रहा था, उधर गिरिजा का शिकंजा उतना ही कसता जा रहा था.

आखिर में बलवंत सिंह थकने लगा. उस के हाथ में तेज दर्द होने लगा. वह कराहने लगा. उस का हाथ टूटने की कगार पर आ गया.

तब लोगों ने कहा कि गिरिजा, अब उस पर रहम कर और इस का हाथ अपनी पकड़ से छुड़ा दे.

गिरिजा ने फिर फिल्मी अंदाज में बलवंत सिंह से कहा, ‘‘बोल तेरे साथ क्या सुलूक किया जाए? तेरा हाथ तोड़ दिया जाए या छोड़ दिया जाए?’’

बलवंत सिंह बोला, ‘‘मैं तेरा बेटा हूं. मैं हारा, माफी मांगता हूं. मैं ने गलती कर दी. मुझे माफ कर दे. मेरा हाथ छोड़ दे, वरना टूट जाएगा. मेरा दिमाग खराब था, जो मैं ने मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डाला.’’

तब गिरिजा ने कहा, ‘‘मैं अब तुझे अपनी गिरफ्त से तभी छोड़ूंगी, जब तू और ये तेरे यारदोस्त मुझे और इन सारे गांव वालों को वचन देंगे कि आगे से गुंडागर्दी नहीं करेंगे.’’

बलवंत सिंह ने सब लोगों के सामने जब वादा किया, तो गिरिजा ने उस का हाथ अपनी पकड़ से छोड़ दिया.

बलवंत सिंह हाथ सहलाता हुआ नीची निगाहें करते हुए वहां से इस तरह गायब हुआ, जैसे गधे के सिर से सींग.

गांव वालों ने गिरिजा की हिम्मत की तारीफ की और नारा लगाया, ‘गिरजा ग्वालिन जिंदाबाद…’

इस के बाद गांव वालों ने गिरिजा ग्वालिन को सम्मान के साथ जैसलमेर जाने को कहा और वह वहां से मुसकराते हुए चल दी.

Hindi Story : सैल्फी – निशि को हर वक्त अपनी बेटी की चिंता क्यों रहती थी?

Hindi Story : निशिपत्रिका के पेज पलटे जा रही थी, परंतु कनखियों से बेटी कुहू को देखे जा रही थीं. आधे घंटे से कुहू अपने फोन पर कुछ कर रही थी. देखतेदेखते निशि अपना धैर्य खो बैठीं तो डांटते हुए बोलीं, ‘‘कुहू, क्यों अपना भविष्य अंधकारमय कर रही हो? हर समय फोन से खेलती रहती हो… आखिर तुम्हारी पढ़ाईलिखाई का क्या होगा? यदि नंबर अच्छे नहीं आए तो किसी अच्छे कालेज में दाखिला नहीं मिलेगा,’’ और उन्होंने उस के हाथ से फोन छीन लिया.

‘‘मम्मा, देखो भी मैं ने फेसबुक पर अपनी सैल्फी पोस्ट की थी. 100 लाइक्स थोड़ी सी देर में ही मिल गए और कौमैंट तो देखिए, मजा आ गया. कोई हौट, लिख रहा है, तो कोई सैक्सी… यह तो कमाल हो गया,’’ कह कुहू प्यार से मां से लिपट गई.

‘‘कुहू छोड़ो भी मुझे… तुम तो पागल कर के छोड़ोगी… फेसबुक पर अपना फोटो क्यों डाला?’’

‘‘तो क्या हुआ? मेरी सारी फ्रैंड्स डालती हैं, तो मेरा भी मन हो आया.’’

‘‘अच्छा, अब बहुत हो गया. उसे तुरंत डिलीट कर दो.’’

‘‘मम्मा, आप पहले कमैंट्स तो पढ़ो, मजा आ जाएगा.’’

‘‘उफ, तुम्हें कब अक्ल आएगी,’’ निशि सिर पर हाथ रख कर बैठ गईं.

तभी निधि की सास सुषमाजी कमरे में घुसती हुई बोलीं, ‘‘क्या हुआ निशि, क्यों बेटी को डांट रही हो? क्या किया इस ने?’’

‘‘मम्मीजी, आप इसे समझाती क्यों नहीं. इस ने फेसबुक पर अपना फोटो डाला है. 18 साल की हो चुकी है, लेकिन बातें हर समय बच्चों वाली करती है… आजकल समय बहुत खराब है.’’

‘‘निशि, मैं तुम्हें बारबार समझाती हूं… पर तुम कुछ ज्यादा ही इसे ले कर परेशान रहती हो.’’

‘‘क्या करूं मम्मीजी, टीवी, पत्रपत्रिकाएं सभी लड़कियों के साथ होने वाले अत्याचारों से भरे होते हैं. अब तो हद हो गई है… रास्ते में चलती लड़कियों को कार वाले खींच कर ले जाते हैं… अपनी दिल्ली अब लड़कियों के लिए कतई सुरक्षित नहीं रह गई है. जब से दामिनी वाला हादसा हुआ है मेरा तो दिल हर समय डर से कांपता रहता है.

‘‘कल शाम को मेरी सहेली पूजा आई थी. कह रही थी कि उस का मैनेजर उसे रोज शाम को काम के बहाने रोक लेता था और फिर कभी कौफी, तो कभी डिनर के लिए चलने को कहता. फिर एक दिन तो उस ने उस का हाथ भी पकड़ लिया. बस उसी दिन से इस्तीफा दे कर वह घर बैठ गई. अब दूसरी नौकरी ढूंढ़ रही है.

‘‘मम्मीजी, हम आगे बढ़ रहे हैं या पीछे होते जा रहे हैं… 2-3 दिन पहले मुंबई से ईशा का फोन आया था कि जूनियर लोगों की प्रोमोशन होती जा रही है, परंतु उस की प्रोमोशन रुकी हुई है, क्योंकि वह लड़की है… लड़के अपने बौस की विदेशी दारू से सेवा करते हैं… लड़की हो तो उन की डिमांड को समझो… मम्मीजी, मुझे अपनी कुहू को देख कर बहुत डर लगता है.’’

‘‘निशि, जो डरा सो मरा. इसलिए बहादुरी से जीवन जीओ… सब की लड़कियां बड़ी होती हैं और लड़के भी बड़े होते हैं. उसे अपने पास बैठा कर अच्छेबुरे की पहचान करना सिखाओ.

‘‘यदि उस ने फेसबुक पर फोटो पोस्ट कर दिया तो इतना परेशान होने की जरूरत नहीं है. आजकल सभी बच्चे ये सब करते रहते हैं.’’

छोटे शहर और साधारण परिवार से संबंध रखने वाली निशि अपनी सुंदरता के कारण नेताजी के लड़के साथ ब्याह कर दिल्ली जैसे महानगर में आ गई थीं. नेताजी कपड़ों की तरह पार्टियां बदलते रहते और उन का बेटा रंगीनमिजाज नीरज सुरा और साकी दोनों ही बदलता रहता. इन सब कारणों से वह अपनी बेटी के भविष्य को ले कर बहुत चिंतित रहती थीं.

‘‘मम्मीजी, कुहू कुछ समझने को ही तैयार नहीं… अपने कमरे में शीशे के सामने मेकअप करेगी, म्यूजिक चैनल पर डांस देखदेख कर वैसे ही डांस करती है.’’

‘‘निशि, तुम समझदार बनो… यह तो उस की उम्र है. इस समय मस्ती नहीं करेगी तो कब करेगी? तुम अपना भूल गई… तुम भी अपनी हमउम्र सहेलियों के साथ फिल्मी पत्रिकाएं और फैशन की बातें छिपछिप कर करती रही होंगी.’’

‘‘मम्मीजी, आप सही कह रही हैं, मैं भी एक बार स्कूल कट कर पिक्चर देखने गई थी…’’

‘‘नीरज कह रहे हैं कि यह को-एड कालेज में ही पढ़ेगी. आप क्यों नहीं मना करती हैं? यह इतनी सुंदर है और साथ ही भोली और नाजुक भी है. कैसे लड़कों की निगाहों को झेल पाएगी?’’

‘‘माई डियर मम्मा, लो गरमगरम चाय पीओ. मैं ने बनाई है. आप खुश रहा करो… तब आप बहुत प्यारी लगती हो. आप की बेटी किसी भी लफड़े में नहीं पड़ेगी, इतना तो आप पक्का समझो.’’ कह कुहू अंदर चली गई.

‘‘निशि, मैं तुम्हारे दर्द को समझ सकती हूं कि तुम नीरज के रोजरोज के नएनए स्कैंडल से परेशान रहती हो, परंतु बेटी सब से अच्छा उपाय है कि तुम अपनी बेटी पर विश्वास करो. मैं ने भी तुम्हारे पापाजी की राजनीति में रहने के कारण बड़ी विषम परिस्थितियों को झेला है.’’

तभी निशि की बचपन की सहेली स्नेहा आ गई. बोली, ‘‘क्या बात है, चाय पर सासबहू में क्या चर्चा हो रही है?’’

सुषमाजी उठती हुई बोलीं, ‘‘मेरी तो मीटिंग है, इसलिए मैं चलती हूं… अपनी सहेली को समझा कर जाना.’’

‘‘कुहू, स्नेहा के लिए 1 कप चाय बना दो.’’

‘‘नो मम्मा. मेरा आज का चाय बनाने का कोटा फिनिश हो गया… अब मैं स्नेहा आंटी से बातें करूंगी.’’

स्नेहा एक कंपनी में मार्केटिंग हैड है, इसलिए निशि हमेशा उसे अपना आदर्श मानती हैं और अपने दिल का बोझ उस के सामने हलका कर लिया करती हैं.

स्नेहा ने कुहू को प्यार से गले लगाते हुए कहा, ‘‘माई स्वीटी, लुकिंग वैरी नाइस.’’

‘‘थैंक्यू आंटी. मम्मा ने तो मुझे परेशान कर रखा है.’’

‘‘क्या हुआ? निशि बड़ी परेशान दिख रही हो?’’

‘‘कुछ नहीं… यह बड़ी हो रही है… इसे वही समझाने की कोशिश करती रहती हूं, पर इस ने तो मानो न समझने का प्रण कर रखा है.’’

‘‘दिन भर टीवी पर रेप की खबरें देखदेख कर जी दहल जाता है. जराजरा सी बात पर मुंह पर ऐसिड फेंक देते हैं.’’

‘‘निशि, सड़क पर ऐक्सीडैंट हो जाते हैं, यह सोच कर न तो गाडि़यां चलनी बंद होती हैं और न ही इनसानों का चलना. हर समय परेशान रहने से समस्या का समाधान नहीं हो सकता… कुहू को अपनी सुरक्षा के लिए जूडोकराटे क्लास जौइन कराओ.’’

‘‘आंटी, मम्मा तो चाहती हैं कि मैं रातदिन किताबों के सामने से न हटूं… बताइए क्या यह संभव है? बालकनी में खड़ी हो कर बाल सुलझाने लगूं तो लंबा लैक्चर दे डालेंगी. यदि किसी दिन ट्यूशन से आने में 5 मिनट की भी देरी हो जाए तो हंगामा कर देंगी… आंटी, मेरी सारी फ्रैंड्स के बौयफ्रैंड हैं. सब साथ मूवी देखने जाते हैं, कैफे जाते हैं… खूब मस्ती करते हैं. लेकिन मैं कहीं नहीं जा सकती… सब मेरा मजाक उड़ाते हैं कि मम्माज डौटर.’’

निशि किसी काम से अंदर गई हुई थीं.

‘‘आंटी, मुझे तो खुद ही लड़कों से दोस्ती ज्यादा पसंद नहीं है, लेकिन हर समय टोकाटाकी से मैं परेशान हो जाती हूं,’’ कुहू की आंखें भर आई थीं.

तभी निशि कमरे में आ गईं. वे कुहू को डांटते हुए बोलीं, ‘‘तुम्हारी शिकायतें पूरी हो गई हों तो जाओ… तुरंत पढ़ने बैठ जाओ.’’

‘‘मम्मा, प्लीज ठहरिए. मुझे आंटी से बात कर लेने दीजिए. मैं 15 मिनट बाद जा कर पढ़ने बैठ जाऊंगी.’’

स्नेहा प्यार से कुहू के सिर पर हाथ फेरती हुई बोलीं, ‘‘कुहू, अपने कालेज फ्रैंड़स के बारे में बताओ?’’

कुहू ने चुपके से निशि की ओर इशारा किया तो स्नेहा बोलीं, ‘‘निशि चाय पीने का मन है… चाय बना लाओ.’’

मजबूरन निशि को वहां से जाना पड़ा.

निशि के जाते ही कुहू बोली, ‘‘आंटी, मम्मा मुझ पर शक करती हैं… मेरे फोन के मैसेज छिपछिप कर चैक करती हैं… मेरा लैपटौप खंगालती रहती हैं.’’

‘‘यह तो गलत बात है. अपनी बेटी पर शक नहीं करना चाहिए.’’

‘‘आंटी, एक मजे की बात बताऊं? मैं ने अपना फोटो पोस्ट किया तो मुझे 50 फ्रैंड रिक्वैस्ट आईं… मैं ने भी मस्ती के लिए एक को क्लिक कर चैटिंग करने लगी… उस ने लिखा था कि तुम बहुत सुंदर हो… मुझ से दोस्ती करोगी? मैं ने जवाब में लिखा कि मैं तो बहुत भद्दीमोटी और काली हूं… आई एम टोटली अगली गर्ल… इसलिए मेरा कोई बौयफ्रैंड नहीं है. इस पर उस ने लिखा कि फिर भी मैं तुम से दोस्ती करूंगा, क्योंकि तुम लड़की तो हो ही… मस्ती के लिए लड़की चाहिए… गोरीकाली कोई भी चलेगी… बताओ कल शाम 5 बजे कहां मिलोगी?

‘‘आंटी, मुझे बहुत गुस्सा आया. अत: मैं ने लिख दिया कि मस्ती के लिए गंदे नाले में डूब मरो.

‘‘आंटी, मैं मम्मा से कहती हूं, पुरातनपंथी बातें छोड़ कर मेरी तरह मौडर्न बनो. मुझ से मेरी कालेज की बातें सुना करो, पर वे मुझे डांट देती हैं.’’

‘‘तुम्हारे पापा के स्कैंडल्स की वजह से वे परेशान रहती हैं.’’

‘‘हां, मैं समझती हूं… इसीलिए तो मैं उन्हें और भी हंसाना और खुश रखना चाहती हूं.’’

छोटी सी लड़की के दिमाग में इतना कुछ भरा हुआ है, सोच कर स्नेहा को बहुत अच्छा लग रहा था.

‘‘आंटी, परसों मेरा बर्थडे था… मम्मीपापा रात को डिनर के लिए बाहर ले जा रहे थे… मैं ने जींस के साथ शौर्ट टौप पहना… बस मम्मा ने डांटना शुरू कर दिया कि टौप बहुत छोटा है… तेरा पेट दिखाई दे रहा है. फिर पापा ही बोले कि ठीक है निशि, बच्ची है हर बात में टोका न करो.’’

निशि ने कुहू की बात सुन ली थी. आगे क्यों नहीं बताया कि मौल में किसी लड़के ने कुहनी मारी… फिर पापा से लड़ाई होने लगी… वह तो मौल के गार्ड के बीचबचाव से मामला शांत हो गया… मेरा तो मूड ही खराब हो गया था.

‘‘आप मम्मा को समझाइए कि अब मैं बड़ी हो गई हूं. चौकलेट मुझे पसंद है, इसलिए खाती हूं. जैसे ही मैं ड्रैसअप होती हूं, मुझे देखते ही डांटना शुरू कर देती हैं कि फिर तुम ने इस टौप को पहन लिया… कानों में ये क्या लटका लिए… किस के साथ जा रही हो? कहां जा रही हो? कब आओगी…? मेरी सारी फ्रैंड्स मेरा मजाक उड़ाती हैं.

‘‘भैया सारे घर में तौलिया पहन कर घूमता रहेगा… कोई कुछ नहीं बोलेगा. सारी बंदिशें मेरे लिए ही. स्लीवलैस टौप नहीं पहनोगी, शौर्ट्स नहीं पहनोगी, लिपस्टिक क्यों लगा ली? किस का फोन था? किस का मैसेज था? किस के संग बैठ कर पढ़ोगी… जैसे उन के हजार प्रश्नों से मैं तंग हो चुकी हूं. प्लीज आंटी मम्मा को समझाइए.’’

निशि के कमरे में घुसते ही कुहू पल भर में वहां से उड़नछू हो गई थी पर आंखोंआंखों से स्नेहा से रिक्वैस्ट कर गई थी.

‘‘निशि तुम ने चाय बहुत अच्छी बनाई है… क्या बात है, तुम्हारे चेहरे पर परेशानी और चिंता झलक रही है?’’

‘‘स्नेहा, मैं कुहू के भविष्य को ले कर बहुत चिंतित हूं. नीरज को तो जानती ही हो, उन की अपनी दुनिया है, इसलिए हर पल मैं किसी अनिष्ट की आशंका से डरती रहती हूं.’’

‘‘ऐसा भी क्या है? अच्छीभली है तुम्हारी बेटी… पढ़ने में होशियार है… समझदार है… सुंदर है. तुम्हारे पास पैसा भी है. फिर किस बात का डर तुम्हें सताता रहता है?’’

‘‘मेरे घर का माहौल तो तुम जानती ही हो. पापाजी नेता हैं. सैकड़ों लोग आतेजाते रहते हैं… उन के कुछ दोस्त अकसर आते हैं, जिन्हें कुहू दादू कहती है… यह उन के पास बैठ कर बातें करती है, ठहाके लगाती है तो मेरा खून खौल उठता है… घर में पीनेपिलाने वाली पार्टियां होती रहती हैं… बापबेटा दोनों साथ बैठ कर पीते हैं. मैं अपने मन का डर आखिर किस से कहूं? अगले साल इसे अच्छे कालेज में दाखिला मिल जाए, तो होस्टल भेज दूंगी… मगर होस्टल का नाम सुनते ही मुझ से चिपक कर सिसकने लगती है.

‘‘जब टीवी या पेपर में रेप या ऐसिड अटैक की घटना सुनती हूं तो डर से कांपने लगती हूं. ऐसा मन करता है इसे अपने पल्लू में छिपा लूं. लेकिन ऐसा संभव नहीं है… इसे पढ़नालिखना है, भविष्य में आगे बढ़ना है, अपने पैरों पर खड़े होना है…’’

‘‘निशि, जब तुम ये सब समझती हो तो क्यों परेशान रहती हो?’’

‘‘जैसे ही मैं इसे डांटती हूं तो तुरंत मुझे जवाब देती है कि मम्मा आप बैकवर्ड हो… आप से अच्छी तो दादी हैं… वे मौडर्न हैं… आप मुझ से न जाने क्या चाहती हैं? ऐसा मन करता है कि एक दिन इस की पिटाई कर दूं.’’ एक ओर मासूम कुहू की बातें तो दूसरी ओर निशि के दिल का डर, सब कुछ मन में गड्डमड्ड होने लगा था. दोनों अपनीअपनी जगह सही थीं. फिर स्नेहा निशि का हाथ अपने हाथ में ले कर बोलीं, ‘‘निशि, मैं तुम्हारे डर को महसूस कर रही हूं… हर मां इस दौर से गुजरती है. मेरी भी बेटी बड़ी हो रही है. जब वह ड्राइवर के साथ गाड़ी में स्कूल जाती है, तो मुझे भी मन में बुरेबुरे खयाल आते हैं, लेकिन स्कूल भेजना बंद तो नहीं हो जाएगा? कुहू उम्र के ऐसे दौर में है जब सब कुछ इंद्रधनुष की तरह आकर्षक और सतरंगा दिखाई पड़ता है.

‘‘आजकल के बच्चे हम लोगों से ज्यादा होशियार और समझदार हैं… सब से पहली बात यह कि अपनी बेटी पर विश्वास करो. अपने मन से शक का कीड़ा निकाल फेंको.

‘‘तुम दिन भर घर में रहती हो. नीरज की अपनी दुनिया है. इन सब कारणों से तुम्हारे मन में नकारात्मक विचारों ने अपना घर बना लिया है… तुम्हें इस से उबरना पड़ेगा… तुम घर से बाहर निकलो. अनेक हौबी क्लासेज है… अपनी रुचि की क्लास जौइन कर लो… तुम्हें पहले घर सजाने का बड़ा शौक था… तुम इंटीरियर डिजाइनिंग का कोर्स जौइन करो. इस समय तुम खाली दिमाग शैतान का घर वाली कहावत को चरितार्थ कर रही हो.

‘‘जब तुम रोज घर से निकलोगी. 10-20 लोगों से मिलोगी, उन की समस्याओं और बातों को सुनोगी तो तुम्हें समझ में आएगा कि दुनिया उतनी बुरी भी नहीं है. अपने को व्यस्त रखोगी तो दिन भर कुहू के लिए होने वाली चिंता अपनेआप कम हो जाएगी.

‘‘तुम कुहू की सहेली बनने का प्रयास करो. वह 21वीं शताब्दी की लड़की है. वह अपने भविष्य के लिए पूरी तरह जागरूक है.

‘‘मेरी वह निशि कहां खो गई है, जो बड़ीबड़ी बहसों में सब को हरा कर प्रथम आती थी? यदि मेरी बात कुछ समझ में आई हो तो दोनों मांबेटी मिल कर फेसबुक के कौमैंट्स पर ठहाके लगा कर देखो, कितना मजा आता है. अच्छा निशि, बातों में समय का पता ही नहीं लगा… चलती हूं… किसी दिन मेरे घर आना.’’

पीछेपीछे कुहू भागती हुई आई… शायद वह हम दोनों की बातें सुन रही थी. उस की आंखों की मासूम चमक देख अच्छा लग रहा था. वह मेरा हाथ पकड़ कर मेरे कान में फुसफुसाई, ‘‘थैंक्स आंटी.’’

Hindi Kahani : लिव टुगैदर का मायाजाल – हर सुख से क्यों वंचित थी सपना

Hindi Kahani : सामने महेश खड़ा था. आंखों से झरझर आंसू बहाता हुआ, अपमानित सा, ठगा हुआ, पिटा हुआ सा, अपने प्रेम की यह हालत देखते हुए… स्वयं को लुटा हुआ महसूस कर, हिचकियों के साथ रो रहा था. मैं उसे सामने देख कर अवाक् थी. मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मेरी वीरान जिंदगी में अब कोई आया है.

‘‘सपना…’’ रुंधे गले से महेश मुश्किल से बोल पाया. किसी गहरे कुएं से आती मरियल सी आवाज…आज मुझे मेरे उन सब उद्बोधनों से ज्यादा भारी और अपनी महसूस हुई, जो मैं पिछले 10-12 साल से सुनती चली आ रही थी.

‘‘सपना स्वीटहार्ट… सपना डियर… सपना डार्लिंग…’’ की आवाजों का खोखलापन, जो मैं पिछले 2-3 बरस से महसूस कर रही थी, आज और ज्यादा खोखली लगने लगीं. मेरे चारों तरफ मेरा अपना बनाया, अपना रचाया हुआ संसार खड़ा था. मलिन और निस्तेज पड़े हुए मेरे शरीर के चारों ओर शानदार चीजों से सजा हुआ मेरा बंगला अभिमान के साथ आसमान से बातें कर रहा था. उसी अभिमान के रथ पर कभी मैं भी सवार हो कर सपने संजोया करती थी…

‘‘सपना…एक बार मुझे खबर तो कर दी होती अपनी बीमारी की…’’ मेरे निशक्त शरीर को देखते हुए महेश के गले से दबीदबी सी आवाज निकली. महेश के दिल में मेरे लिए… टिमटिमा कर जलता हुआ दीपक… मेरे मन के अंधेरे में एक किरण सी चमकी. अकेलापन, अवसाद और उदासी भरे मन में, महेश की उपस्थिति की दस्तक से एक नई तरह की आशा का संचार हुआ.

महेश ने ढूंढ़ कर कमरे की लाइट जलाई. कमरा एक बार फिर से रोशन हो गया. चारों तरफ गर्द ही गर्द जमा हो गया था. महंगामहंगा आधुनिक सामान धूल से अटा पड़ा था. कमरे की सजावट जहां अपने अतीत की आलीशानता बयान कर रही थी, वहीं उस पर जमी धूल की परत वर्तमान की बेजान तसवीर पेश कर रही थी.

स्पर्श सुख की अनुभूति पिछले कई महीने से उस ने महसूस नहीं की थी. मेरी अवसादग्रस्त जिंदगी की चिड़चिड़ाहट और चिल्लाहट से त्रस्त हो कर, नौकरनौकरानियां काम छोड़ कर चली गई थीं. महीनों से साफसफाई नहीं हुई थी. पैसे से श्रम खरीदा जा सकता है, अपनापन नहीं, इस का प्रत्यक्ष दर्शन मुझे हो रहा था. दीवार पर लगे विशाल आईने पर निगाह पड़ते ही मैं चौंक गई. लेटेलेटे ही अपना प्रतिबिंब देख कर मुझे रोना आ गया. एक बार को तो मैं खुद को ही नहीं पहचान पाई.

मेरे पर हमेशा हंसतेखिलखिलाते रहने वाला विशाल आईना, गंदला हो कर मायूसी प्रकट कर रहा था. रोशनी से मेरी हालत का जायजा ले कर महेश और भी ज्यादा द्रवित हो गया. ‘‘सपना… कम से कम एक फोन तो कर दिया होता. इतनी बीमार पड़ी थीं. एकदम पीली पड़ गई हो,’’ महेश अपराधबोध से ग्रस्त हो कर अपनी ही रौ में कहे जा रहा था. मैं महेश की हालत समझ रही थी. एकएक बीती बात मुझे याद आ रही थी.

जब शरीर था तब विचार नहीं थे, अब शरीर नहीं रहा तो विचार डेरा डालने लगे. अकेलेपन और अवसाद से महेश की सहानुभूति मुझे कुछ हद तक उबार रही थी. मैं उस से आंखें नहीं मिला पा रही थी. ‘महेश मेरा इतना लंबा इंतजार करता रहा. मेरे लिए… अभी तक इंतजार या फिर यों ही आया है अचानक.’

यादों के खंजर दिमाग में ठकठक कर रहे थे. महेश मेरा सहपाठी था. कालेज के वे दिन हवा में उड़ने के थे… आसमान से बातें करने के. यौवन पूरे निखार पर था. मैं तितलियों की तरह इधरउधर मंडराती रहती. कलियां खिलेंगी तो मधुप मंडराएंगे ही और फिर यह तो समय होता है युवाओं को आकर्षित करने का… लोगों की फिसलती निगाहें पकड़ कर आह्लादित होने का.

हरदम सजनासंवरना, इधरउधर इतराते हुए फिरते रहना, न कोई चिंता थी, न ही कोई परवा. बस उड़ते ही जाना, लोगों की निगाहों में चढ़ते जाना. उन की कानाफूसियां सुन कर उल्लासित होना और उन की प्यासी निगाहें ताड़ कर उन्हें और तड़पाना. उन की अतृप्तता भरी मनुहार सुन कर स्वयं को तृप्त महूसस करना. चिंता नहीं थी तो चिंतन भी नहीं था… महेश न जाने कब मुझ से दिल लगा बैठा था. भावुक महेश मेरे रूपयौवन के मोहजाल में फंस गया था. हरदम वह बिन पानी की मछली की तरह तड़पता रहता था.

पुरुष बेचारा, पहले प्यार को अपने दिल पर लगा लेता है… मेरे लिए पुरुषों की तड़प मेरी आत्मसंतुष्टि थी. अनादि काल से चली आई परंपरा नारी की तड़प से पुरुषों की आत्मसंतुष्टि को तोड़ना मेरे अहं को तुष्ट करती थी.

मैं 20वीं सदी की नारी थी. मेरे विचारों में खुला आसमान था. मेरा एक स्वतंत्र अस्तित्व है. मैं भी पुरुष की तरह एक इकाई हूं. प्रेम, प्यार एक अलग बात है. लेकिन शादी, बच्चे का बंधन मुझे नागवार लगता था. कालेज के दिन फुरफुर कर उड़ गए. महेश की मासूम याचना मेरे मस्तिष्क पर सामान्य सी ठकठक थी. अपनी अलग पहचान बनाने की लौ मन में निरंतर जलती रहती. मैं भावुकता में न बह कर पूर्ण व्यावसायिक हो गई थी.

बहुराष्ट्रीय कंपनी में अच्छी नौकरी, ऊंचा ओहदा, भरपूर पगार… सारी सुखसुविधाएं मेरे कदमों को चूम रही थीं. मैं स्वतंत्र, आर्थिक रूप से मजबूत, अच्छी प्रतिष्ठा वाली, फिर क्यों किसी पुरुष के अधीन रहूं. परिवार के बंधनों में बंधूं. पैसे से हर चीज हासिल की जा सकती है. अपनी शारीरिक जरूरतों के लिए एक अदद पुरुष भी.

जब पदप्रतिष्ठा पा कर पुरुष बौरा सकता है तो स्त्री क्यों नहीं. मैं आर्थिक रूप से स्वतंत्र थी, मुझ में खुद के अहम की बू कुछ ज्यादा ही आ गई थी. औफिस में ही कमल से मेलमिलाप बढ़ा. हर मुद्दे पर हमारी बौद्धिक बहसें होतीं. राजनीतिक, सामाजिक विचारविमर्श होता. हर विषय पर हम लोग खुले विचार रखते, यहां तक कि प्रेम और सैक्स पर भी.

मेरी मानसिक भूख के साथसाथ शारीरिक भूख भी जोर मारने लगी थी. समान बौद्धिक स्तर वाले कमल के साथ काफी तार्किक विचारविमर्श के बाद हम दोनों एकसाथ रहने लगे, बिना किसी वैवाहिक बंधन के. लिव टुगैदर, हम 2 स्वतंत्र इकाई, 2 शरीर थे. एक छत के नीचे हो कर भी हमारी साझी छत नहीं थी. पहले तो अड़ोसपड़ोस में हमारे साथसाथ रहने पर कानाफूसियां हुईं, ‘छिनाल’, ‘वेश्या’ और न जाने किनकिन संबोधनों से मुझे नवाजा गया, लेकिन मैं तो उड़ान पर थी. इन सब बातों से मैं कहां डरने वाली थी. हवा में उड़ने वाले परिंदे जमीन पर बिछे जाल से कहां डरते हैं.

महल्ले के युवकयुवतियों को मेरे घर के आसपास फटकने की सख्त मनाही हो गई थी. मेरे घर के चारों तरफ अघोषित एलओसी बन गई थी, जिसे पार करना सफेदपोश शरीफों के बस की बात नहीं थी. इक्कादुक्का कभी मेरे मकान की तरफ लोलुप निगाहें ले कर बढ़ते पर मेरी हैसियत से डर कर पीछे हो जाते.

जब शरीर बोलता है, तो विचार चुप रहते हैं. एलओसी के घेरे में मैं कब अकेली पड़ती गई इस का मुझे भान तक नहीं हुआ. शरीर था कि खिलता ही जा रहा था. मैं शरीर के रथ पर सवार हो कर अभिमान के आसमान में उड़ रही थी.

कमल के साथ रहते हुए भी हमारा साझा कुछ नहीं था. मैं जब चाहती कमल के शरीर का भरपूर उपभोग करती. कमल को हमेशा उस की सीमारेखा दिखाती रहती. पुरुष हो कर भी कमल का पुरुषत्व मेरे सामने बौना रहता. अपना फ्रैंड सर्कल मुझे खुशनुमा महसूस होता. लिव टुगैदर में पतिपत्नी के बीच की लाज और लिहाज, सामाजिक दबाव और बच्चे होने का मानसिक दबाव नहीं था. बस, उच्छृंखल व्यवहार, शरीर का विभिन्न तरह से भरपूर उपभोग, परम आनंद प्रदान करता.

देखते ही देखते कमल के साथ का मौखिक अनुबंध पूरा हो चला. साथ रहते कमल के मन में घर बसाने की चाहत घुल रही थी. कमल बहुत भावुक हो उठा था. अलगाव से उसे बेचैनी हो रही थी. वह शादी कर घर बसाने के लिए मिन्नतें करने लगा. लेकिन मैं तो मन और तन के उफान पर थी. तन अभी भी भरपूर बोल रहा था. भाव तो मन में थे ही नहीं. भाव होते तो मन कमजोर पड़ जाता. मैं नारी की गुलामी की पक्षधर बिलकुल नहीं थी. शादी… यानी नारी की गुलामी के दौर की शुरुआत… मैं ने एक झटके में कमल को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

मुझ में शारीरिक आकर्षण अभी भी उफान पर था. मर्दों की लाइन लगने को तैयार थी. प्रेम, प्यार बेवकूफों का शगल. बेकार में अपनी ऊर्जा जलाओ. तनमन को तरसाओ. मेरा सिद्धांत था, खाओपियो और मौज करो. मांबाप के बीच की यदाकदा की खिंचन की पैठ मेरे मन में इतनी गहरी समाई हुई थी कि पारिवारिक स्नेह का तानाबाना पकड़ने में मैं कभी सफल नहीं हो पाई.

फिर बदलाव के धरातल पर पैर रख कर कभी महसूस करने और समझने की कोशिश ही नहीं की. भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति मेरी प्राथमिकता रही थी. उन की पूर्ति के लिए मेरे पास संसाधनों की किसी तरह कोई कमी नहीं थी. बस पैसा फेंको, सभी सुविधाएं हाजिर हो जाएंगी.

आलीशान बंगला होने के कारण कभी घर की ऊष्मा महसूस करने की कोशिश ही नहीं की. आधुनिकता के जनून में मेरा स्व ही मुझ पर सवार था.

कमल के बाद अब सैक्स पूर्ति के लिए सुरेश टकरा गया था. उस का भरापूरा शरीर था, छुट्टे सांड़ जैसा मस्तमस्त. मेरे साथ लिव टुगैदर उस के लिए बहुत अच्छा औफर था. हम दोनों साथसाथ रहने लगे, बिना किसी साझी छत के. फिर से वही शारीरिक आनंद की सुनहरी गुफा में विचरण. मन की स्वतंत्र उड़ान में मैं कभी अपने को हारी हुई महसूस नहीं करती. ऐसा लगता कि मैं ने सुरेश के पौरुष के साथसाथ मर्दों के पौरुष को हरा दिया है.

समय कब गुजर जाता है, पता ही नहीं चलता. देह के कोणों का तीखापन कम होने लगा था. मन के कोण कुछ तीखे हो कर अधूरापन महसूस करने लगे थे. हर माह मेरे वजूद में अंडा तैयार होता. निषेचित हो कर मुझे नारी का पूर्णत्व प्रदान करने के लिए आतुर रहता, पर शुरुआत में मैं पुरुष से बिलकुल हार मानने वाली नहीं थी. कमल और सुरेश के लाखों शुक्राणु बिना संगम के बह चुके थे. पर अब मेरा मन करता कि मैं हार जाऊं और मेरा मातृत्व जीते. नारी के अधूरेपन का एहसास मुझे महसूस होने लगा था. मन में कचोट सी उठने लगी थी.

मेरी चाहत सुन कर सुरेश एकदम से बिफर गया, ‘हमारे लिव टुगैदर के अनुबंध में बच्चा नहीं था.’ अब मुझे यह समझ ही नहीं आ रहा था कि मैं सुरेश को यूज कर रही हूं कि सुरेश मेरा इस्तेमाल कर रहा है. अपनेअपने अहं की जीत में हम दोनों ही हार रहे थे. हालांकि सब से ज्यादा शारीरिक और मानसिक नुकसान नारी को ही उठाना पड़ता है. पुरुष तो हमेशा हार कर भी जीतता है और जीत कर तो जीतता ही है.

अब मेरा शरीर ढलान पर था तो विचार उठने लगे. सामाजिक तानेबाने की कमी महसूस होने लगी. समाज में प्रतिष्ठा, पद, पैसा पा कर भी मैं सामाजिक कार्यक्रमों में अछूत जैसी स्थिति में रहती. इंटरनैट, फेसबुक, ट्विटर, औरकुट, ब्लैकबेरी मैसेंजर से सारी दुनिया हमारी थी, लेकिन हमारा पड़ोसी, हमारा नहीं था. मेरा अभिमान चकनाचूर हो कर मिटने के लिए तैयार था, पर सुरेश बिलकुल झुकने के लिए तैयार नहीं था.

अब मेरी मिन्नतों के बाद भी वह अपने स्पर्म मेरी कोख में डालने के लिए तैयार नहीं था. मेरी हालत ‘जल बिन मछली’ जैसी हो रही थी. मेरा मन बच्चे के कोमल स्पर्श को बेचैन होता. कोमलकोमल हाथों की छुअन को महसूस करने के लिए मेरा मन व्यग्र होता, कंपित होता. सामाजिक अकेलापन, अधूरा नारीत्व मुझे अवसादग्रस्त करने लगा था. सुरेश का ज्वार, उस का हारा हुआ चेहरा, अब मुझे आह्लादित नहीं करता था. उस का सपना डियर, सपना डार्लिंग… कहना मेरे मन को चिड़चिड़ा बना रहा था.

लिव टुगैदर मुझे इंद्रधनुषी मायाजाल सा महसूस होने लगा था. मेरा सबकुछ लुट कर भी मेरा अपना कुछ नहीं था. अनुबंध का समय पूरा हो गया. सुरेश एक झटके के साथ मुझे छोड़ गया. मेरी लाख मिन्नतों के बाद भी वह एक पल भी रुकने को तैयार नहीं हुआ. मेरे जज्बातों से उस को कोई लगाव नहीं था. जैसे एक झटके में मैं ने कमल को छोड़ दिया था, वैसे ही सुरेश ने मुझे छोड़ दिया. आलीशान घर, महंगा विदेशी सामान मेरे चारों तरफ अभिमान के साथ सजा हुआ था, लेकिन मेरा अभिमान छंट रहा था. अकेलापन भयावह हो रहा था. परिवार के आपसी तानेबाने की कमी महसूस होने लगी थी.

समाज की नजरों में, अपने बौद्धिक विचारों में तो मैं नारी की जीत का आदर्श मौडल बन ही चुकी थी, पर वास्तविकता में मैं अपने अंदर जो रीतापन महसूस कर रही थी, वह मुझे सालता. निराशा और अकेलापन मुझे दिवास्वप्नों में खोने लगा था. परिणामत: चिड़चिड़ापन और गुस्सा मुझ पर हरदम हावी रहने लगा था. औफिस में, घर में, मैं हरदम झुंझलाती, चिड़चिड़ाती रहती.

कभी मुझे लगता मेरा भी प्यारा सा परिवार है. पति है, छोटा सा बच्चा है, जो अपने नाजुक मसूड़ों से मेरे स्तन चूस रहा है. गीलेगीले होंठों से मुझे चूम रहा है. उस की सूसू की गरमाहट मुझे राहत दे रही है.

कभी लगता, मेरा अभिमान अट्टहास कर रहा है. मुझे चिढ़ा रहा है. मैं एकदम से अकेली पड़ गई हूं. चारों तरफ डरावनीडरावनी सूरतें घिर आई हैं. घबराहट में मेरी एकदम से चीख निकल जाती. तंद्रा टूटती तो अकेला घर सांयसांय करता मिलता. नौकरनौकरानियां अपनी ड्यूटी निभातीं. मुझे खाना खाने के लिए जोर डालतीं, तो मैं उन पर ही चिल्ला पड़ती.

कुछ दिन मुझे झेलने के बाद वे भी मुझे छोड़ कर चली गईं. अकेलापन और घिर आया. घर के चारों तरफ खिंची लक्ष्मण रेखा पार करने का साहस किसी में नहीं था. लिव टुगैदर के फंडे ने समाज से टुगैदरनैस होने ही नहीं दिया. मैं अवसादग्रस्त होती जा रही थी.

मन में घोर निराशा थी तो तन भी बीमार रहने लगा. न किसी काम में मन लगता न कुछ करने, खानेपीने की इच्छा होती. हरदम अकेलापन सालता, काटने को दौड़ता रहता, अकेलेपन का एहसास भी मुझे भयभीत करता रहता. अब मैं क्या करूं? मेरे विचार कुंद पड़ते जा रहे थे. नातेरिश्तेदारों की परवा मैं ने कभी की ही नहीं थी, तो अब कौन साथ देता.

अवसादग्रस्त हो कर मैं ने नौकरी भी छोड़ दी थी. अकेली घर में पड़ी रहती. न खाने की सुध, न कोई बनाने वाला, न कोई मनाने वाला. मम्मीपापा के बीच की मनुहार मुझे अब बारबार याद आती. भाइयों और बहनों के बीच की तकरार, लड़ाईझगड़ा याद आता.

अजीब हालत हो गई थी. शरीर सूख कर कांटा होता जा रहा था. न दिन का पता रहता न रात का. दीवाली पर हरदम रोशन रहने वाला मेरा बंगला और मेरा मन अंधेरे में घिरा रहता. परिवार की अवधारणा को ताड़ कर लिव टुगैदर का मायाजाल, असीम सुख, अब समझ आ रहा था.

‘‘सपना… डाक्टर को बुला लाता हूं…’’ महेश कह रहा था. मैं बेसुध सी पड़ी उस से आंखें नहीं मिला पा रही थी.

Best Hindi Story : रंग और रोशनी – शादी की बात सुन प्रिया सकपका क्यों गई?

Best Hindi Story : मनीष अपनी पत्नी मुक्ता के साथ बरामदे में बैठा शाम की चाय की चुसकियां ले रहा था. दफ्तर में बीते दिन के  कुछ रोचक पल मुक्ता को सुना रहा था. मुक्ता भी उस के साथ अपने दिन भर के अनुभव बांट रही थी. अरेंज्ड मैरिज और नईनई गृहस्थी के अनुभव. बहुत कुछ था दोनों के बीच साझा करने को.

‘‘वाह, एक तो तुम्हारे हाथ के बने समोसे और वे भी एअर फ्रायर में. स्वाद भी और सेहत भी. एक अच्छी पत्नी का फर्ज तुम बढि़या ढंग से निभा रही हो.’’

मनीष के कथन पर मुक्ता शरमाते हुए हंसी ही थी कि तभी मनीष का दोस्त गोपाल आ गया.

‘‘आओ गोपाल, बैठो. मुक्ता 1 कप चाय गोपाल के लिए भी हो जाए.’’

मनीष के कहते ही मुक्ता फुरती से रसोई की ओर चल दी.

‘‘क्या दोस्त, मेरे आते ही भाभी को भगा दिया? खैर, अच्छा ही किया. आज मैं तुझे एक समाचार देने आया हूं. तेरी प्रिया अपनी मां के घर वापस आ गई है. मुझे आज बाजार में मिली थी. मैं ने जैसे ही तेरे बारे में खबर दी तो, वह तेरा फोन नंबर मांगने लगी… कहने लगी उस का फोन चोरी हो गया था, इसलिए तेरा नंबर खो गया.’’

आगे गोपाल ने क्या कहा, वह मनीष को सुनाई नहीं दिया. वह तो प्रिया का नाम सुनते ही अतीत की गहरी खाई में गिरता चला गया. 6 माह पहले तक इस नाम के इर्दगिर्द ही उस का पूरा जीवन सिमटा था. उस की प्रिया, उस की जान, उस का प्यार…

कमल की पार्टी में प्रिया अलग ही चमक रही थी. कौन था ऐसा पार्टी में जिस की नजर उस पर न पड़ी हो. मनीष अपने शरमीले स्वभाव के कारण बस दूर से ही उसे निहार कर खुश था. पर पार्टी के बाद जब पता चला कि प्रिया का घर मनीष के रास्ते में आता है, तो उसे घर छोड़ने का काम उस ने सहर्ष स्वीकार लिया. प्रिया की आंखों और मुसकराहट में भी तो कुछ महसूस किया था उस ने. रास्ते में पता चला कि प्रिया कालेज में पढ़ती है. मनीष कालेज की पढ़ाई के बाद प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी कर रहा था.

‘‘तब तो तुम बहुत मेधावी होगे. मुझे जो समझ न आया करे उसे क्या तुम से समझने आ जाया करूं?’’

‘‘जब तुम्हारा मन करे,’’ मनीष ने बिना देर किए कहा. आखिर अंधा क्या चाहे 2 आंखें.

मनीष अपने मातापिता की इकलौती संतान थी. उस के पिताजी नौकरी के सिलसिले में अकसर दौरे पर रहते थे और मां इतनी सीधी थीं कि प्रिया का घंटों मनीष के कमरे में रहना उन्हें जरा भी नहीं अखरता था. प्रिया के घर जाने में मनीष को किसी बहाने की जरूरत न थी. प्रिया की मां अकसर घर से बाहर रहती थीं. पति से उन का तलाक हो चुका था.

धीरे-धीरे मनीष और प्रिया के संबंधों में प्रगाढ़ता आने लगी. कुछ दोष उम्र का भी था. कच्ची उम्र, सतरंगी सपने. बिना आई लव यू कहे भी दोनों एकदूसरे को अपने दिल का हाल सुनाने में सक्षम थे. दोनों को एकदूसरे का साथ बहुत भाता. जब साथ न

होते तब व्हाट्सऐप पर हरपल की खबर रहती. प्रिया मनीष की हर बात में अपनी हां मिलाती. मनीष उसे नित नए कपड़े, नेलपौलिश, लिपस्टिक, परफ्यूम इत्यादि देता रहता. यहां तक कि प्रिया की औनलाइन शौपिंग के लिए उसे क्रैडिट कार्ड भी मनीष ने ही दिया था. इस के बदले में प्रिया ने मनीष की हर कमी को पूरा कर दिया था. उस ने कभी मनीष को स्वयं को हाथ लगाने से नहीं रोका था. शायद मनीष का शरमीला स्वभाव उसे आगे बढ़ने की स्वीकृति नहीं देता यदि प्रिया ने उस दोपहर अपने अकेले घर में स्वयं को मनीष को न सौंप दिया होता. उस अनुभव के बाद मनीष का मन प्रिया के बिना कहीं लगता ही नहीं था. दोनों एकदूसरे के घर, कमरे में एकांत तलाशते. एकदूसरे के बिना स्वयं को अकेला पाते.

‘‘प्रिया, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. तुम्हारे मेरी जिंदगी में आने से पहले मेरा जीवन कितना सूना था. तुम ने उस में रंग और रोशनी भर दी.’’

मनीष प्रिया के प्रेम की लहर में बह जाता-

‘‘जीना हराम कर रखा है मेरी इन आंखों ने,

खुली हों तो तलाश तेरी और बंद हों तो ख्वाब तेरे.’’

इस प्रेम का असर मनीष की निजी जिंदगी में तो हो ही रहा था, उस की पढ़ाई पर भी पड़ने लगा था. उस की प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी में न तो वह लगन थी और न ही मेहनत, जिस की जरूरत होती है. प्रिया की सूरत और उस के सपने कभी उसे अकेला न छोड़ते. इस का नतीजा यह रहा कि वह परीक्षा में असफल रहा. अब चूंकि घर पिताजी की पेंशन पर चल रहा था, इसलिए मनीष को जेबखर्ची, क्रैडिट कार्ड इत्यादि सब बंद करने पड़े.

मनीष को आज भी अच्छी तरह याद है जब उस के मित्र परीक्षा में अनुत्तीर्ण रह जाने पर अफसोस करने आए थे. सब के साथ प्रिया भी आई थी पर उस के चेहरे पर अफसोस का कोई भाव न था, बल्कि जब उस के एक मित्र ने यह कहा कि मनीष प्रिया के कारण परीक्षा में पूरी मेहनत न कर सका तो कितनी बेहयाई से हंसते हुए उस ने कहा था कि वाह, एक तो फेल हो गए, उस पर तुर्रा यह कि इलजाम किसी और के सिर मढ़ दो. यह अच्छा है यानी उस के स्वर में हमदर्दी की जगह व्यंग्य था.

मनीष को प्रिया की यह बात बुरी अवश्य लगी थी, पर वह इसे प्रिया का अल्हड़पन समझ कर टाल गया था. अभी तक उस ने प्रिया से अपने जीवन का हिस्सा बनने की बात भी कहां छेड़ी थी. जब वह उस के जीवन में शामिल हो जाएगी, तभी तो एक की स्थिति की जिम्मेदारी दूसरे की भी होगी. उसे विश्वास था कि प्रिया के साथ से वह जीवन में अवश्य सफल होगा. इसीलिए जल्द ही बिना देर किए मनीष ने प्रिया के समक्ष शादी का प्रस्ताव रख दिया.

प्रिया स्तब्ध सी उसे देखती रह गई. फिर उस ने साफसाफ कह दिया, ‘‘कैसी बातें कर रहे हो मनीष? माना कि तुम मुझे अच्छे लगते हो,

पर शादी? शादी की क्या जरूरत है, मैं तो तुम्हारी हूं ही.’’

‘‘पर प्रिया ऐसे कब तक चलेगा? मेरे मातापिता मेरी शादी की सोचेंगे और आखिर तुम्हारी मां भी कब तक इंतजार करेंगी. उन्हें भी तो तुम्हारी शादी की चिंता होगी. मैं ने सोचा है कि कोई छोटीमोटी नौकरी तो मुझे मिल ही जाएगी. पिताजी ने एक जगह बात चलाई है, छोटी ही सही पर गृहस्थी का बोझ मैं उठा लूंगा.’’

‘‘छोटीमोटी नौकरी? समझने की कोशिश करो मनीष… पैसे के बिना जीवन क्या है? देखो, आजकल तुम न तो मुझे कोई उपहार दे पाते हो और न ही मेरी खरीदारी करा पाते हो. ऐसे में भला शादी की कैसे सोच सकते हो? वैसे भी शादी का मतलब है खाना पकाना, घर संभालना, बच्चे पैदा करना और फिर उन का पालनपोषण और भविष्य की चिंता में घुलते रहना. बदले में एक ढर्रे की जिंदगी. मुझे इन सब से चिढ़ है. मैं एक स्वतंत्र विचारों की लड़की हूं. मेरी मां को ही देख लो. आज अकेले कितनी प्रसन्न और मस्त हैं. मैं भी वैसा ही जीवन चाहती हूं.’’

प्रिया के इस उत्तर ने मनीष को निरुत्तर कर दिया. उस दिन के बाद से मनीष को न जाने ऐसा क्यों लगने लगा जैसे प्रिया उस से कतराने लगी है, जैसे उस का व्यवहार ठंडा पड़ने लगा है, वह उस से किनारा करने लगी है. वह कई दिनों तक उस से न मिलती, न ही फोन पर संपर्क करती. कहीं टकरा जाने पर बहानों की कतार लगा देती, ‘‘बस इतना ही जान पाए अपनी प्रिया को तुम मनीष? मैं तुम्हें कैसे भूल सकती हूं? मैं स्वयं को भूल सकती हूं पर तुम मेरी हर सांस में बसते हो…’’

बात इमोशनल ब्लैकमेल तक पहुंच जाती. मनीष पूछना चाहता कि इतनी चाहत है, तो छलकती क्यों नहीं है तुम्हारे चेहरे पर? पर डरता था कि कहीं बात साफ करतेकरते वह प्रिया को खो न बैठे. उसे इंतजार मंजूर था पर अपने सुनहरे स्वप्नों की उड़ान में दरार नहीं.

‘प्रिया को पाने से पहले मुझे जीवन में कुछ और बुलंदियां भी हासिल करनी होंगी,’ सोच उस नेएक बार फिर प्रशासनिक सेवा की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. अब की बार उस ने शुरू से ही पूरा परिश्रम करने की ठानी थी. कभीकभार फोन पर प्रिया से बात कर वह स्वयं को हलका महसूस कर लेता था.

फिर एक दिन प्रिया ने बताया, ‘‘मैं अपने मामा के घर जा रही हूं… तुम यों परेशान हो रहे हो जैसे मेरी शादी हो रही है. तुम क्या समझते हो मैं तुम्हारे बिना खुश रह सकूंगी? पर मैं यह सब तुम्हारे लिए कर रही हूं. मेरे यहां रहते तुम पढ़ाई में मन नहीं लगा पाओगे. यह हमारी परीक्षा की घड़ी है. मनीष इस में हमें पास हो कर दिखाना है.’’

बड़ी मुश्किल से मनीष का मन शांत हो पाया था.

प्रिया के जाने के बाद सुहावना मौसम भी बोझिल लगता. मानो अंदर का बुझापन बाहर की रौनक पर हावी हो गया हो. लेकिन समय अपनी गति कब छोड़ता है? परीक्षा की तारीख पास आ रही थी. किसी तरह मनीष ने अपना ध्यान पढ़ाई में लगाया. पर प्रिया के पत्र का इंतजार उसे रोज रहता. अंतत: 3 महीने बाद उस का पत्र आया. पत्र में प्रिया की मजबूरियों का बखान था…. मनीष के बिना वह कितनी अधूरी थी, कितनी तनहा. प्रिया की तड़प पढ़ कर मनीष की आंखें भर आईं कि क्यों वह बारबार प्रिया के प्यार पर अविश्वास की परत चढ़ा देता है? हर किसी का प्यार करने और जताने का ढंग अलगअलग होता है और फिर प्रिया एक लड़की है. कुछ शर्म, कुछ हया उस के व्यक्तित्व का हिस्सा है. जरूरी तो नहीं हर बात कही जाए, कुछ महसूस भी की जाती है. एक सच्ची प्रेमिका पा कर वह स्वयं को धन्य मान रहा था.

परीक्षा समाप्त हो गई. कुछ ही समय बाद परिणाम भी आ गया. इस बार मांपिताजी की प्रसन्नता का ठिकाना न था. घर पर दोस्तों के लिए एक छोटी सी दावत रखी थी. उस शाम मनीष को प्रिया की कमी बहुत खली थी. वह प्रिया को यह खुशखबरी स्वयं सुनाना चाहता था. उस के चेहरे की खुशी को वह अपनी आंखों से देखना चाहता था. फोन पर खबर दे कर वह इस दृश्य को खोना नहीं चाहता था.

मनीष ने कमल से प्रिया का पता मांगते

हुए, जो उस के अलावा प्रिया का भी दोस्त था कहा, ‘‘यार, प्रिया को यह खुशखबरी दे दूं…

सच कहूं तो मैं उस से शादी करना चाहता हूं.

हम दोनों ने अलग रह कर बहुत कठिन परीक्षा दी है. यह त्याग उस ने मेरी सफलता के

लिए दिया और अब जब मैं अपने पैरों पर खड़ा हूं तो…’’

‘‘अरे मनीष, तुम्हारे जैसा सुशील और लायक लड़का प्रिया जैसी तितली के जाल में फंस जाएगा यह तो मैं सोच भी नहीं सकता था. प्रिया जैसी लड़की सैरसपाटे के लिए ठीक है

पर शादी के लिए नहीं. क्यों अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी मार रहा है?’’

कमल ने मनीष के मन की शांत झील में पहला पत्थर मारा था. उस ने प्रिया के बारे में जो कुछ भी बताया उसे सुन कर मनीष स्तब्ध रह गया.

‘‘प्रिया के प्रियों की संख्या का भान है तुझे? आए दिन वह किसी न किसी से रासलीला रचा रही होती है… उस की मां भी तो वैसी ही,’’ और फिर आगे कुछ कहने के बजाय कमल हंसने लगा.

‘‘बदलता है रंग आसमान कैसेकैसे.’’

मनीष की नायिका अचानक खलनायिका बना दी गई थी. उस के मन में उथलपुथल मची थी कि क्या सच में वह बेवकूफ बन रहा था या प्रिया जैसी प्रेमिका के कारण कमल उस से जल रहा है? उस का मन बेचैन हो उठा था. यह उस के जीवन का अहम निर्णय था. इसलिए उस ने खुद छानबीन करने की ठानी. मनीष ने काफी पूछताछ की. जितनी जानकारी मिलती गई, उस का मन उतना ही खिन्न होता गया. वह कितना पागल था प्रिया के प्यार में. प्रिया की रस घुली बातों में आने में उसे जरा भी देर न लगती थी.

‘‘ख्वाहिशों के काफिले भी बड़े अजीब होते हैं, वे गुजरते वहीं से हैं जहां रास्ते नहीं होते हैं.’’

अब मनीष की सफलता का परिणाम सुन कर शायद प्रिया शादी के लिए फौरन हामी भर

दे. विरह में बीते दिनरातों की व्यथा सुनाए. पर आंखों देखी मक्खी किस से निगली जाती है भला? इसलिए मां के बारबार पूछने पर मनीष ने उन की पसंद की लड़की से शादी के लिए हां कह दी.

उसी सप्ताहांत मनीष अपने मांपिताजी के साथ लड़की देखने उन के घर पहुंचा. लड़की सुंदर थी. उन्हें भी मनीष पसंद आया. रिश्ता पक्का हो गया. किंतु मनीष अपनी जीवनसंगिनी से अपने जीवन का अतीत अंधेरे में नहीं रखना चाहता था. अत: उस ने मुक्ता से अकेले में बात करने की इच्छा व्यक्त की. संकोचवश मुक्ता कुछ असहज थी.

मनीष ने ही शुरुआत की, ‘‘जब हम दोनों अपना पूरा जीवन साथ गुजारने का निर्णय लेने जा रहे हैं, तो हमें अपना अतीत भी साझा कर लेना चाहिए. मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. पहले सुन लो, फिर जो तुम्हारा निर्णय होगा, मुझे मान्य होगा,’’ और फिर मनीष ने मुक्ता को प्रिया के बारे में पूरी ईमानदारी से सब बता दिया.

कुछ क्षण चुप रहने के बाद मुक्ता बोली, ‘‘चलिए, खट्टा ही सही पर आप को प्यार में अपना निर्णय लेने का मौका तो मिला… ताउम्र यह गिला तो नहीं रह जाएगा कि किसी से प्यार ही न कर सके. मेरा भी मन था कि मैं लव मैरिज करूं पर हमारे यहां तो लड़कियों का आंख उठाना भी वर्जित है.’’

‘‘तो तुम क्या इसलिए उदास लग रही हो?’’

मुक्ता चुप रही, लेकिन उस की आंखों ने हामी भर दी थी.

‘‘अच्छा किया तुम ने अपने दिल की बात मुझ से कही. हमारे बीच कोई संकोच नहीं होना चाहिए.’’

‘‘दरअसल, मैं भी चाहती थी कि जो खुशी प्यार में पड़े लोगों को महसूस होती है,

उसे मैं भी अनुभव कर पाती… प्यार में जिंदगी बदल देने वाले वे…’’ बोलते ही मुक्ता रुक गई. फिर जीभ काटते हुए कहने लगी, ‘‘माफ कीजिए, मैं भी पागल हूं, पता नहीं क्याक्या बोल रही हूं.’’

मगर उस की बातें सीधे मनीष के दिल तक पहुंचीं. कितनी साफगोई से मुक्ता ने अपनी ख्वाहिश उस पर जाहिर कर दी थी. ठीक ही तो है मनीष ने अपनी मरजी कर के देख ली और अब मातापिता की इच्छा से शादी कर रहा था. किंतु मुक्ता को अपनी मरजी का अवसर कहां मिला?

मनीष ने उसी दिन से मुक्ता के जीवन में प्यार का रंग और प्यार के  खुमार की रोशनी भरने की जिम्मेदारी उठा ली. उस ने हर प्रयास कर के मुक्ता को प्यार में मिलने वाली हर खुशी दी. यहां तक कि शादी होने तक मुक्ता को लगने लगा कि जैसे उस की लव मैरिज हो रही हो.

सच कहते हैं कि शादियां ऊपर तय होती हैं. यहां जमीन पर तो हम सिर्फ उन का मेल कराते हैं. मनीष और मुक्ता असल मानों में हमसफर बने.

आज गोपाल फिर उसी भूकंप की खबर लाया था, जिस से कभी मनीष का संसार डोल जाया करता था. पर आज वह शांत था. उस का संसार प्रसन्नता के झूले में झूल रहा था और इस की डोर थी मुक्ता के हाथों में. दोनों प्यार में जिंदगी बदल देने वाले रंग और रोशनी अनुभव कर रहे थे.

Justice : मुकदमों की बढ़ती तादाद

Justice : फसाद की जड़ हकीकत में जजों की कमी है. यह बात वक्तवक्त पर विधि आयोग सहित दूसरी एजेंसियों के आंकड़ों से तो उजागर होती ही रहती है लेकिन अच्छी बात यह है कि अब कुछ ही सही जज साहबान भी सार्वजनिक तौर पर यह सच उजागर करने मजबूर होने लगे हैं. लेकिन यह कोई ऐसी बड़ी समस्या भी नहीं है जिसे दूर न किया जा सके. जजों की कमी अगर राजनातिक मुद्दा बने तो क्या समस्या हल हो सकती है ?

अदालतों के बाहर तो अकसर पीड़ित लोग न्याय प्रक्रिया को कोसते नजर आ जाते हैं कि यह तो हद हो गई, सालों से चक्कर लगा रहे हैं लेकिन फैसला तो दूर की बात है 4 – 6 साल से सुनवाई ही पूरी नहीं हो पा रही. जाने कौन सी मनहूस घड़ी थी जब पैर अदालत की चौखट पर पड़े थे जहां रोजरोज तमाशा होता रहता है. भगवान किसी को यहां तक कि दुश्मन को भी अदालत का मुंह न दिखाए.

यही बात एक वकील साहब ने भरी अदालत में कह दी तो अब वे कंटेम्प्ट औफ कोर्ट के चक्कर में फंसते नजर आ रहे हैं. बात बीती 27 मार्च की है जबलपुर हाईकोर्ट के एक वकील पीसी पालीवाल ने लगभग भड़कते हुए कहा, इस कोर्ट में 4 घंटे से तमाशा चल रहा है मैं बैठा देख रहा हूं हाईकोर्ट के जज दूसरी जगह जा कर कहते हैं कि नए जज की नियुक्ति करो. लेकिन जजेस का हाल तो देखो जो दिल्ली में हुआ वह भी देखा जाए.

सुनवाई कर रहीं जस्टिस अनुराधा शुक्ला ने इन बातों पर कान न देते हुए इसे अदालत की अवमानना माना और पूरे वाकिये का जिक्र करते उस की प्रमाणित प्रति हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेज दी. उन्होंने लिखा, इस प्रकार की भाषा अत्यंत अनुचित है और यह अदालत की प्रतिष्ठा के विरुद्ध है.

अब जो होगा वो भी सामने आ ही जाएगा लेकिन वकील साहब की यह भड़ास ये कुछ बातें तो साफ कर ही गई.

– अदालतों पर मुकदमों का बोझ और जजों की कमी है.
– कोर्ट में कामकाज के नाम पर तमाशा सा होता है,
– न्याय मिलने में जरूरत से ज्यादा देर लगती है, और
– अदालतों के बाहर भले ही अपना गुबार निकाल लो लेकिन इजलास में मुंह पर लगाम होना जरुरी है.

इतने क्यों घबराए

कह तो दिया लेकिन पालीवाल को जल्द ही एहसास हो गया कि गुस्से में वे जरूरत से ज्यादा ही बोल गए हैं. इसलिए बाहर आ कर वे अपनी बात में दम लाने या उसे जस्टिफाई करने की गरज से बोले, जस्टिस शुक्ला के पास 149 केस सुनवाई के लिए आए थे. लेकिन अधिकांश समय उन्होंने केवल उन 6 मामलों में लगाया जिन में सेशन कोर्ट पहले ही आरोपियों को जमानत दे चुका था.

घबराहट इतनी बढ़ी कि वे वकालात छोड़ने तक की दुहाई देने लगे. अब यह और बात है कि किसी ने उन के हाथपांव नहीं जोड़े कि ऐसा मत करना वकील साहब नहीं तो न्याय व्यवस्था का क्या होगा. लेकिन उन के यह कहने में दम था कि जिस मामले की सुनवाई के लिए वे आए थे वह 20 बार लग चुका है. बड़ी मुश्किल से आज नंबर आया. बकौल पालीवाल, ‘मैं अपने केस की सुनवाई यहां नहीं करना चाहता इसे किसी अन्य बेंच में भेज दिया जाए.’

उन्होंने अपने मुवक्किलों के गरीब और हम्माल होने की दुहाई भी दी. जबलपुर हाई कोर्ट में सुनवाई नंबर से न होने की शिकायत भी इन वकील साहब ने की और यह भी बताया कि हम मेडम की नातजुर्बेकारी और लगभग मनमानी की शिकायत पहले ही चीफ जस्टिस से कर चुके हैं. यह घबराहट बेवजह नहीं थी. इस के पीछे मुमकिन है अदालत की अवमानना की सजा का डर हो या फिर मुमकिन यह भी है कि यह जजों और वकीलों की अपनी आपसी पौलिटिक्स हो लेकिन जो भी हो लोगों का ध्यान तो इस तरफ एक बार फिर गया कि अदालतों में देर लगती है जिस की वजह जजों की संख्या न बढ़ाया जाना है. पता नहीं क्यों सरकार जजों की संख्या बढ़ाने से कतराती है

सरकार ही है जिम्मेदार

प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है की थ्योरी के तहत इत्तफाक से ही सही वकील साहब के कहे पर प्रतिक्रिया हुई. जबलपुर की घटना के दूसरे दिन ही सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अभय ओक ने सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट औन रिकौर्ड एशोसियन के एक कार्यक्रम में इलाहाबाद हाई कोर्ट के वकीलों की हड़ताल की तरफ इशारा करते हुए कहा, ‘क्या वकीलों का यह कार्य बहिष्कार मुवक्किलों के साथ अन्याय नहीं कर रहा है. फरियादियों को होने वाले नुकसान और उन के साथ पक्षपात की आप कल्पना कीजिए.’

कम हैरत की बात नहीं कि जबलपुर हाईकोर्ट में वकील पीसी पालीवाल जज साहिबा के ढीलेपन को देरी की वजह बता रहे थे तो जस्टिस ओक वकीलों को दोषी करार दे रहे थे. लेकिन हकीकत में न्याय प्रक्रिया से जुड़े सभी लोग देरी के जिम्मेदार हैं जिन में अदालतों के क्लर्क रीडर और रजिस्ट्रार सहित खुद पक्षकार भी शामिल हैं. जहां तक जजों की कमी की बात है तो जस्टिस अभय ओक ने भी इस का जिम्मेदार सरकार को ठहराते हुए कहा, ‘सरकारें निचली अदालतों में जजों की संख्या बढ़ाने और कोर्ट के बुनियादी ढांचे में सुधार करने में विफल रही हैं. अदालतों में मुकदमों की बढ़ती तादाद पर उन का कहना था कि न्यायालयों में कुल लंबित मामलों में 20 से 30 फीसदी वैवाहिक विवाद से जुड़े होते हैं.

बढ़ते वैवाहिक विवाद तो बजाय चिंता के संतोष की बात होनी चाहिए कि महिलाएं भी न्याय पाने के लिए कोर्ट जाने लगी हैं. क्योंकि वे शिक्षित और जागरूक हो रही हैं. हिंदू मैरिज एक्ट के वजूद में आने के पहले वैवाहिक विवाद के मुकदमे कहीं दायर ही नहीं होते थे. घरों और समाज में सीधा इंसाफ होता था जिस में कोई भी पति अपनी पत्नी को घर से धकियाने का अधिकार रखता था. पत्नी के साथ मारपीट और हिंसा भी उस का और उस के घर वालों का अधिकार था जिस की पीड़िता इंसाफ मांगने कहीं नहीं जा सकती थी. तलाक सहित दूसरे अधिकार महिला को मिले तो पुरुषों को भी अदालत जाना मजबूरी हो गई. तो ऐसे में यह तो होना ही था जो हो रहा है कि वैवाहिक विवाद के मुकदमे बढ़ रहे हैं. ये तो भविष्य में और बढ़ेंगे.

मुद्दे की बात जजों की कमी में सरकार का शक के दायरे में आता रोल है. यह रोना अब जज साहबान भी खुलेआम रोने लगे हैं लेकिन सरकार की मंशा यह है कि लोग हैरान परेशान अदालतों के चक्कर काटते रहें और दोष हमे नहीं बल्कि भाग्य को दें. और उसे भी सुधारने के लिए मंदिरों में पंडेपुजारियों के चक्कर काटते रहें. भगवान के ये दलाल वादी और प्रतिवादी दोनों की गुहार उपर तक पहुंचाने का माद्दा रखते हैं और कई बार वकील से भी ज्यादा फीस ले कर अपने लेवल पर ही अनुष्ठान वगैरह करवा देते हैं. तंत्र, मंत्र, ज्योतिष, रत्न और दीगर दर्जनों उपाय तो ये लोग थोक में देते हैं.

वकील, जज और जनता जब सब मानते हैं कि जजों की कमी सारे फसाद की जड़ है तो वे सब मिल कर सरकार पर दबाब क्यों नहीं बनाते. खास तौर से वकील और जज एक इस मुद्दे पर हो जाएं तो सरकार को झुकना तो पड़ेगा. लेकिन ये दोनों एक कभी नहीं हुए जिस से लगता है कि कहीं यह उन की ही अघोषित मिलीभगत तो नहीं कि जनता को फुसलाने के लिए सरकार को दोष देते रहो जिस से अपनी दुकानें यथावत चलती रहेंगी. वकील को हर पेशी पर पैसा मिलता रहेगा और जजों की पूछ परख और रुतबा दोनों बने रहेंगे.

क्योंकि यह मुद्दा ही नहीं

कभी किसी ने नहीं सुना कि देरी से न्याय मिलने पर जनता ने किसी किस्म का विरोध अदालत जा कर या बाहर ही जताया हो. यही जनता अस्पताल में इलाज न मिलने पर या डाक्टर की लापरवाही से परिजन के मर जाने पर तोड़फोड़ और चक्काजाम भी करती है और डाक्टर की कुटाई भी कर देती है. ऐसा या कैसा भी विरोध वह हर सरकारी दफ्तर में करती है लेकिन अदालत में नहीं कर पाती क्योंकि न्याय विकल्पहीन है. आप इंसाफ के लिए कहीं और नहीं जा सकते और अदालत में गुस्से में कोई वकील यह बात कहे तो यह अवमानना हो जाती है.

इस के बाद भी लोग मानते हैं कि देरी से ही सही इंसाफ तो मिलता है यानी अदालतों पर लोग भरोसा करते हैं. क्योंकि उन में विकट का अनुशासन है और दूसरे सरकारी दफ्तरों जैसा भ्रष्टाचार व भेदभाव नहीं है. खामी है तो बस इतनी कि न्याय के नाम पर तमाशा होता रहता है. तो जनता को यह भी समझना चाहिए कि इस तमाशे की असल जिम्मेदार सरकार है जज और वकील नहीं जो एकदूसरे को दोष दिया करते हैं.

चुनाव के वक्त तमाम दलों के नेता जनता को लुभाने तरह तरह के लालीपाप देते हैं. मसलन हम बिजली, पानी, सड़क देंगे. इलाज के लिए अस्पताल खोलेंगे या वार्ड बढ़ाएंगे, बच्चे अच्छे से पढ़ सकें इस के लिए अध्यापक और स्कूल बढ़ाएंगे. लेकिन कोई राजनैतिक दल कभी यह कहते नहीं सुना गया कि आप को वक्त पर न्याय मिल सके इस के लिए हम अदालतों और जजों की संख्या बढ़ाएंगे. अगर एक बार जनता जागरूक हो जाए तो ये लोग जजों और अदालतों को भी बढ़ाने का वादा और दावा करेंगे और सत्ता हासिल करने के बाद उसे पूरा करने भी बाध्य होंगे.

साफ दिख रहा है कि जजों की कमी की समस्या जब तक चुनावी मुद्दा नहीं बनेगी तब तक कुछ नहीं होने वाला. सत्ता में रहते न कांग्रेस ने इस पर गौर किया न सत्ता पर काबिज भाजपा कुछ कर रही क्योंकि जनता ने कभी मांग ही नहीं की, सार्वजनिक धरने प्रदर्शन नहीं किए, जाम नहीं लगाया. अब बारी जनता की है कि वह राजनैतिक दलों पर इस बाबत दबाब बनाए नहीं तो सालोंसाल अदालतों के चक्कर काटते तमाशबीन बनी रहे.

यह कहते हैं आंकड़े

आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि वाकई में अदालतों में जजों की उल्लेखनीय कमी है. देश भर की छोटीबड़ी अदालतों में लगभग 5 करोड़ मुकदमे लंबित हैं. अब यह मान लिया जाए कि वादी और प्रतिवादी दोनों को मिला कर औसतन 5 लोग भी एक मुकदमे से जुड़े रहते हैं या इन से प्रभावित होते हैं तो प्रभावितों की संख्या 25 करोड़ होती है. यह छोटामोटा आंकड़ा नहीं है लेकिन कई कारणों से इस की तरफ किसी का खासतौर पर सरकार का ध्यान नहीं जाता.

साल 1987 में विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि जजों की कमी की दो वजहें हैं एक तकनीकी और दूसरी राजनीतिक. राजनैतिक कारणों के तहत ब्रिटिश हुकुमत के वक्त से ही जानबूझ कर भारतीय न्यायपालिका में कम जज और स्टाफ रखे गए. आजादी के बाद भी इस औपनिवेशिक स्थिति को जारी रखा गया.

इस रिपोर्ट में कही ये बातें आज भी मौजू हैं कि राजनैतिक कारणों में केवल भारत सरकार या राज्य सरकारों ने ही नहीं बल्कि राजनातिक दलों, मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बार एसोशियन ने भी इस समस्या की तरफ ध्यान नहीं दिया. तकनीकी कारणों के तहत न्यायिक प्रशासन देखने वाले नीतिनिर्माताओं श्रम शक्ति के नियोजन के वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने के बजाय पेंच वर्क और एडहौक जैसे अव्यवस्थित सुझाव दिए.

नतीजा आज हम सब के सामने है. यह रिपोर्ट कहां धूल खा रही होगी पता नहीं लेकिन 37 साल बाद भी हालात ज्यों के त्यों हैं बल्कि और खराब हो चले हैं. अदालतों में चल रहे 5 करोड़ मुकदमों को निबटाने महज 20 हजार जज देश भर में है. उन से निबटान की अपेक्षा रखना उन के साथ ज्यादती ही होगी. संसद के मानसूत्र सत्र में कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने बताया था कि सुप्रीम कोर्ट में 84 हजार मामले लंबित हैं वहां जजों की कुल संख्या महज 34 है. उच्च न्यायालयों में 60 लाख से भी ज्यादा मुकदमे हैं जो केवल 737 जजों के जिम्मे हैं. निचली अदालतों में सब से ज्यादा साढ़े 4 करोड़ से भी ज्यादा मुकदमे हैं जो 20011 जजों के हवाले हैं.

नैशनल ज्यूडिशियल डेटा ग्रिड के मुताबिक हाईकोर्ट में प्रति जज पर जुलाई 2024 तक 7879 मुकदमे लंबित हैं तो निचली अदालतों में प्रति जज 2268 मुकदमे लंबित हैं. सुप्रीम कोर्ट में 34 जजों पर 84 हजार मुकदमे लंबित हैं.

जजों के खाली पदों पर नजर डालें तो स्थिति और स्पष्ट हो जाती है उच्च न्यायालयों में 357 जजों के पद खाली हैं. निचली अदालतों में जजों के 22 फीसदी पद खाली हैं. केवल सुप्रीम कोर्ट में ही सभी पद भरे हुए हैं.

इस स्थिति को आबादी के आईने में देखें तो ला कमीशन औफ इंडिया के मुताबिक प्रति 10 लाख लोगों पर 30 जज होने चाहिए जबकि आज 1987 के 10.5 जजों के मुकाबले 21 जज तो हैं लेकिन इस में भी खामी यह है कि यह आंकड़ा 2011 की आबादी के लिहाज से है आज की आबादी के लिहाज से नहीं. जिस की गिनती ही सरकार नहीं करवा पा रही. इस रिपोर्ट को पेश हुए 40 साल होने को आ रहे हैं, इस दौरान देश में 13 बार प्रधानमंत्री बदले जा चुके हैं और 31 बार मुख्य न्यायाधीश बदले जा चुके हैं.

दूसरे देशों से तुलना करें तो हम इस मामले में भी बहुत पीछे खड़े हैं. सब से ज्यादा आबादी वाले देश चीन में प्रति 10 लाख नागरिकों पर 300 जज उपलब्ध हैं. अमेरिका में इतनी ही आबादी पर 150 जज हैं. इंटरनैशनल जर्नल फोर कोर्ट एडमिनिस्ट्रशन के मुताबिक क्रोएशिया और स्लोवेनिया में यही संख्या 400 से ज्यादा है. हंगरी और आस्ट्रेलिया में आंकड़ा 280 है.

जाहिर है सरकार की अनदेखी की सजा जनता भुगत रही है. जानकर हैरानी होती है कि सिवाय दिल्ली के कोई भी राज्य अपने बजट का एक फीसदी भी न्यायपालिका पर खर्च नहीं करता. इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022 की रिपोर्ट बताती है कि देश में न्यायपालिका पर औसत खर्च 1 रूपए 46 पैसे मात्र है तो ऐसे में कोई क्या कर लेगा.

BJP : 75 साल के बाद क्या संन्यास लेंगे नरेंद्र मोदी ?

BJP : हिंदू धर्म के आश्रम सिद्वांत मानते हैं कि 75 साल के बाद संन्यास आश्रम शुरू हो जाता है. इस के बाद मोक्ष की दिशा में जाना चाहिए. पौराणिक कथाएं बताती हैं कि दशरथ ने जिंदा रहते हुए अपना राजपाट राम को सौंपने का फैसला कर लिया था. सवाल यह है कि नरेंद्र मोदी क्या करेंगे ?

2024 लोकसभा चुनावों के दौरान आम आदमी पार्टी नेता अरविंद केजरीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रिटायरमैंट को ले कर कहा था कि नरेंद्र मोदी 15 सिंतम्बर 2025 को 75 साल के पूरे हो जाएंगे. भाजपा की रिटायरमैंट पौलसी के तहत वह रिटायरमैंट लेंगे. इस के बाद वह अमित शाह को प्रधानमंत्री बना देगें. अरविंद केजरीवाल इस के जरिए भाजपा के वोटर को भ्रम में डालना चाहते थे जिस से वह पीएम मोदी के नाम पर वोट न दें. अरविंद केजरीवाल ने वोटर से कहा कि मोदी का वोट दे कर क्या लाभ वह तो 2025 में रिटायर हो जाने वाले हैं.

दिल्ली विधानसभा चुनाव के पहले 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 400 पार का नारा दिया था. जबकि वह 240 सीटे ही ला सकी थी ऐसे में राजनीतिक हलको को यह उम्मीद थी कि अब भाजपा के भीतर मोदी बनाम योगी, योगी बनाम अमित शाह, संघ बनाम भाजपा जैसे कई खेमेबंदी दिखने लगेगी. तब पार्टी मे भीतरघात का लाभ विपक्ष को होगा जैसे 2004 में हुआ था. जैसे विधानसभा चुनाव के नतीजे आए विपक्ष वापस नरेंद्र मोदी के रिटायरमैंट को मुद्दा बनाने लगा.

क्या है 75 साल में रिटायरमैंट की कहानी

75 पर रिटायरमैंट की बात नरेंद्र मोदी ने 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले कही थी जब भाजपा में प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी को ले कर सवाल उठ रहे थे. भाजपा नेता अमित शाह ने कहा कि 75 साल के बाद कोई प्रधानमंत्री नहीं बन सकता भाजपा में ऐसा कोई कानून नहीं है’.

भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी 2009 से पीएम पद की रेस में थे. उन को ‘पीएम इन वेटिंग’ कहा जा रहा था. इस के पीछे की वजह यह थी कि 1999 में भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली एनडीए की सरकार बनी तो अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री बने थे. भाजपा में उस दौरान ‘अटल-आडवाणी और जोशी’ की तिकड़ी का राज चलता था. अटल के प्रधानमंत्री बनने के बाद आडवाणी खेमा विद्रोही मुद्रा में रहता था.

संतुलन बनाने के लिए आडवाणी को डिप्टी पीएम बना दिया गया था. तभी से आडवाणी को ‘पीएम इन वेटिंग’ कहा जा रहा है. इस का मतलब यह था कि जैसे ही अटल हटेंगे आडवाणी प्रधानमंत्री बन जाएंगे. इस लड़ाई के चलते ही अटल सरकार ने 2004 मे समय से पहले ही लोकसभा के चुनाव करा दिए थे.

अटल बिहारी वाजपेई को इंडिया शाइंनिंग का भ्रम दिखाया गया. अटल खेमे को लग रहा था कि समय से पहले चुनाव होने का लाभ मिलेगा और अटल सरकार बहुमत के साथ चुनाव जीत जाएगी. तब वह किसी दबाव में नहीं रहेगी. ऐसे में आडवाणी के प्रधानमंत्री बनने का सपना धरा का धरा रह जाएगा. प्रधानमंत्री पद को ले कर भाजपा में खींचतान थी.

2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के खिलाफ गए. पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा. जिस से कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए को सरकार बनाने का मौका मिल गया. डाक्टर मनमोहन सिंह प्रधानमत्री बने. 2004 में भी आडवाणी ‘पीएम इन वेटिंग’ रहें. 2009 लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस की जीत हुई. लगातार 2 लोकसभा चुनाव में ‘पीएम इन वेटिंग’ रहने के बाद 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए भी आडवाणी ‘पीएम इन वेटिंग’ मान रहे थे.

ऐसे में भाजपा ने उनके इस भ्रम को दूर करने के लिए नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का चेहरा बनाया. तब वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे. 2014 का चुनाव भाजपा की नई टीम बिना किसी विवाद के लड़ सके इस के लिए लालकृष्ण आडवाणी सहित बुजुर्ग हो चले नेताओं को दरकिनार कर के ‘मार्गदर्शक मंडल का सदस्य’ बना दिया गया था. उस समय नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 75 साल की उम्र के नेताओं को रिटायरमैंट के बारें में सोचना चाहिए.

रिटायरमैंट के बहाने मोदी को घेरने की तैयारी

तब विपक्षी नेता नरेंद्र मोदी की कही बात को ही हथियार बना कर उन के सामने सवाल खड़े कर रहे हैं. अरविंद केजरीवाल ने 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार में यह बात कही. लोकसभा चुनाव में भाजपा की सीटें घट कर 240 रह गई. उस ने 400 पार का नारा दिया था. विपक्ष को लगा कि नरेंद्र मोदी कीक ताकत घट गई है. ऐसे में भाजपा के भीतर ‘अटल-आडवाणी’ के समय वाला विवाद शुरू हो सकता है.

3-4 माह तक भाजपा और खुद नरेंद्र मोदी खुद कमजोर दिखने लगे थे. चुनावी हार किसी तरह से चेहरे का रंग उतार देती है यह उस समय की भाजपा को देख कर समझा जा सकता है. मोदी ही नहीं भाजपा के फायर ब्रांड नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को उतरा हुआ चेहरा दिखाई टीवी पर बार बार दिखाई पड़ता था. विपक्ष इस बात से खुश था कि 10 साल में नेता प्रतिपक्ष का पद राहुल गांधी को मिला है. भाजपा अपने बल पर सरकार नहीं बना पाई. समाजवादी पार्टी तीसरे नम्बर की पार्टी बनी. संविधान और आरक्षण का मुद्दा जीत का हथियार बन गया. 4 जून 2024 को दूसरी आजादी माना जाने लगा. विपक्ष को लग गया कि अब मोदी रिटरयरमैंट ले या न ले उनकी हार तय है.

विपक्ष का बढ़ा हुआ आत्मविश्वास तब टूट गया जब हरियाणा, महाराष्ट्र और दिल्ली में भाजपा जीत गई. विपक्ष खासकर कांग्रेस की हार ने इंडिया ब्लौक के उत्साह को तोड़ दिया. ऐसे में विपक्ष अब नरेंद्र मोदी से खुद यह चाहने लगा है कि वह पद अपने पद से हट जाए. जिस से भाजपा का हराया जा सके. प्रधानमंत्री रहते 11 साल के बाद नरेंद्र मोदी जब नागपुर स्थित संघ मुख्यालय गए तो विपक्ष ने कहा कि नरेंद्र मोदी अपने रिटायरमैंट प्लान को अंजाम पहुंचाने नागपुर गए थे.

संजय राउत ने उठाए सवाल

शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा ‘प्रधानमंत्री मोदी नागपुर स्थित आरएसएस मुख्यालय इसलिए पहुंचे थे ताकि वे संदेश दे सकें कि वह सेवानिवृत्त हो रहे हैं. आरएसएस देश के राजनीतिक नेतृत्व में बदलाव चाहता है. मोदी संभवत सितंबर में अपना सेवानिवृत्ति आवेदन लिखने के लिए आरएसएस मुख्यालय गए होंगे.’ महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस को उम्मीद थी कि उन की जीत होगी. यहां जीत भाजपा को मिली. चुनाव के बाद देवेन्द्र फडनवीस मुख्यमंत्री बने.

संजय राउत का जवाब देते महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने कहा ‘प्रधानमंत्री मोदी साल 2029 में चौथी बार प्रधानमंत्री बनेंगे. नेता के सक्रिय रहते उत्तराधिकार पर चर्चा करना भारतीय संस्कृति में अनुचित माना जाता है. अभी इस पर चर्चा का समय भी नहीं आया है. वे कई वर्षों तक देश का नेतृत्व करते रहेंगे. हमारी संस्कृति में जब पिता जीवित हो तो उत्तराधिकार के बारे में बात करना अनुचित है. यह मुगल संस्कृति है जहां पिता के रहते बेटा उत्तराधिकारी बन जाता है.’

यह बात अपनी जगह ठीक हो सकती है कि भाजपा में 75 साल के बाद नेता के रिटायरमैंट को ले कर कोई कानून नहीं है. राजनीति में नेता से उम्मीद की जाती है कि वह अपनी राजनीतिक सुचिता का पालन करें. कांग्रेस प्रवक्ता आकाश जाधव ने कहा कि ‘ये 75 साल की उम्र में रिटायरमैंट की बात खुद पीएम मोदी ने ही की थी. एलके आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को जबरदस्ती रिटायर कर दिया गया. यह एक मर्यादा है. पीएम मोदी पद पर रहें न रहें, यह उन का विषय है. कांग्रेस का इस में क्या लेनादेना. मोदी को अपनी कही बात पर कायम रहना चाहिए.’

भाजपा का पक्ष है कि पार्टी में कहीं भी यह लिखित नियम नहीं है कि इस उम्र के बाद पद पर कोई नहीं रह सकता. 2034 तक पीएम मोदी कहीं नहीं जाने वाले. कोई नेतृत्व परिवर्तन नहीं होगा. भाजपा से अलग राजनीतिक जानकार यह मानते हैं कि 2029 के लोकसभा चुनाव के नतीजे यह तय करेंगे कि क्या होगा ? 2027 में 12 राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं इस के पहले राष्ट्रपति और उप राष्ट्रपति का चुनाव है. ऐसे में 2027 से 29 के दो साल काफी अहम रहने वाले हैं. कई फैसले इस को देख कर होंगे.

संन्यास आश्रम को बदल गया समय

नरेंद्र मोदी से रिटायरमैंट की अपेक्षा इस कारण भी की जा रही है क्योंकि वह अपनी बात को जीवन में उतार कर दिखाने वाले नेता हैं दूसरे पौराणिक कथाओं और हिंदू धर्म पर उन का पूरा भरोसा है. उस के अनुसार ही अपनी दिनचर्या को रखते हैं. पौराणिक कथाओं में हिंदू धर्म में जीवन के 4 प्रमुख भाग ब्रह्मचर्य, ग्रृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम बताए गए हैं. प्रत्येक आश्रम 25 वर्षं का होता है. ब्रह्मचर्य आश्रम जन्म से 25 वर्ष तक शिक्षा का समय होता है. गृहस्थ आश्रम 25 से 50 वर्ष तक होता है जिस में सामाजिक विकास हेतु धर्म, अर्थ, काम को प्राप्त करने का समय होता है. वानप्रस्थ आश्रम 50 से 75 वर्ष तक होता है जिस में आध्यात्मिक उत्कर्ष हेतु काम करना चाहिए इस के बाद संन्यास आश्रम 75 से 100 वर्ष तक होता है. जिस में मोक्ष प्राप्त करना होता है.

भारतीय जनता पार्टी के नेता, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चैहान ने अपने बेटों की शादी करने के बाद कहा ‘आज से वह गृहस्थ से वानप्रस्थी हो रहे है. अब वह अपना पूरा समय किसानों की सेवा में देंगे.’ शिवराज सिंह की उम्र 66 साल है. जब भाजपा के एक नेता हिंदू धर्म के आश्रम सिद्वांत को मान रहे हैं तो नरेंद्र मोदी को भी इस को मानना ही चाहिए. ऐेसे में नरेंद्र मोदी के उपर दबाव बढ़ गया है.

वैसे आज समाज में लोगों के रिटायरमैंट की उम्र तय है. नौकरियों में 58 साल से ले कर 62 साल तक के अलगअलग नियम है. आज जीवन की लाइन बढ़ रही है. लोग 80-85 साल तक सक्रिय जीवन में रहते हैं. वह भी संन्यास लेने को तैयार नहीं होते हैं. बहुत सारे घरों में इस बात के झगड़े होते हैं. नरेंद्र मोदी के रिटायरमैंट को ले कर जो बात महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस ने कही कि पिता के रहते उत्तराधिकार नहीं होता. संविधान और कानून भी इस बात को मानता है. घरों में जमीन जायदाद तबतक पुत्र के नाम कर हस्थांतरित नहीं होती जब तक पिता जीवित रहता है. तमाम कारोबारी घरानों को भी देखें तो जब तक पिता सक्रिय होता है पुत्र को पूरा अधिकार नहीं होता है.

पौराणिक कथाओं में राजा अपने जीवित रहते पुत्र का राजपाट सौंप देता था. रामायण में इस बात का जिक्र है कि जब राजा दशरथ जीवित थे. पूरी तरह से सक्षम थे उसी समय उन्होने अपने बेटे राम को राजपाट सौंपने का फैसला कर लिया था. क्योंकि राजपाट चलाने के लिए जिस ताकत और उर्जा की जरूरत होती है वह युवा में ही होती है.

सामान्य घर और बिजनैस में संन्यास लेने की उम्र भले ही न रखी जाए लेकिन जहां मसला राजपाट का होता है वहां तो यह नियम मानने ही चाहिए. कई बार नेता पद के मोह में उम्र की बात का टाल जाते हैं. जिस का खामियाजा जनता को चुकाना पड़ता है. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस का उदाहरण हैं. उन की आलोचना होने लगी है. विरोधी कहते हैं कि वह बात करतेकरते भूल जाते हैं. राजनीति, बिजनैस और घर अलगअलग मसले हैं. रिटायरमैंट के नियम भी एक से नहीं हो सकते. राजा को अपने जीवन काल में ही राजपाट की जिम्मेदारी सौंप देनी चाहिए जिस से राज्य का सही विकास हो सके. ऐसे में नेताओे को रिटायरमैंट का नियम पालन करना चाहिए.

Hindi Kavita : शुरुआत

Hindi Kavita : “चलो करें फिर से एक आज नई शुरुआत,
तोड़ दें हर बंधन, खोल दे मन के सारे द्वार,
स्वछंद हो मन -आँगन, पँख पसार दूर तलक फैले आसमान में,
कर खुद को मुक्त,
आज जो मन हो कर लेते हैं, जी भर कर जी ही लेते हैं। कितने बंधन लादे खुद पर।
सारा जीवन जीते रहे घुट -घुट कर।
पंछियों की उड़ान देखी,
जी किया इसी तरह उडूं विस्तृत नभ में,
खुद को हमने बाँध लिया क्यों जीवन -समर में
किन्तु कुछ कर न सके पँख ही कतरे गए,
अच्छा जो बीत गई वह गई बात,
चलो फिर से करें आज एक नई शुरुआत

लेखिका : निमिषा वर्मा, समस्तीपुर, बिहार

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें