स्कूटर का पुराना डिजाइन अगर आपको पसंद है तो आपके लिए खुशखबरी है. ब्रिटिश बीस्पोक स्कूटर निर्माता कंपनी स्कोमादी (Scomadi) भारत आने वाली है. यह कंपनी भारत में अपने स्कूटर लौन्च करने की प्लानिंग कर रही है. अभी कंपनी TL200, TL200i, TL50, TL125 और TT125 स्कूटर बनाती है. यह कंपनी जल्द भारत आने वाली है.
यह पुणे के AJ डिस्टीब्यूटर्स के साथ मिलकर अपने स्कूटर्स भारत में सेल करेगी. स्कूटर कंपनी स्कोमादी भारत में TT125 स्कूटर को थाईलैंड से इंपोर्ट करके बेचेगी. इस स्कूटर का डिजाइन पूराने लेम्ब्रेटा स्कूटर्स जैसा ही मौडर्न लुक के साथ LED हेडलाइट और टेललाइट के साथ फुल डिजिटल इंस्ट्रूमेंट क्लस्टर दिया गया है. स्कूटर में 12 इंच के एलौय व्हील्स के साथ पिरेली के ट्यूबलेस टायर लगाए जाएंगे. स्कूटर का वजन 100 Kg है.
इंजन: स्कोमादी के TT125 में अप्रिलिया वाला 125cc का इंजन दिया जाएगा. यह इंजन इटली से लाकर थाईलैंड में बनाए जा रहे TT125 में असेंबल किया जाएगा. इस इंजन की खास बात ये होगी कि यह इंजन अप्रिलिया 125 जैसा नहीं होगा, इसके डायमेंशन और स्ट्रोक्स अलग होंगे. इसमें 125cc यूनिट दी जाएगी जो एयर-कूल्ड इंजन के साथ डेल्फी फ्यूल इंजेक्शन से लैस होगी. यह इंजन 7300rpm पर 11bhp की पावर जनरेट करेगा. कंपनी के मुताबिक इसमें अपग्रेडेड एग्जौस्ट सिस्टम का औप्शन भी दिया जाएगा जो 15bhp की पावर जनरेट करेगा.
स्कोमादी TT 125 की कीमत करीब 1.98 लाख रुपए (एक्सशोरुम, पूणे) हो सकती है. इस स्कूटर के ब्रेकिंग सिस्टम की बात करें तो इसके फ्रंट में 220 mm डिस्क और रियर में डुअल चैनल ABS फीचर दिया जाएगा. स्कोमादी TT125 में 11 लीटर का फ्यूल टैंक दिया गया है. इस कंपनी ने 2009 में बड़े पैमाने पर उत्पादन टूरिज्मो लेग्गेरा 250 से साथ किया था.
हालांकि अभी कंपनी ने इसकी आधिकारिक बुकिंग शुरू नहीं की है, Scomadi स्कूटर के पहले बैच को मई 2018 तक बिक्री के लिए उपलब्ध कराया जा सकता है. इस स्कूटर को खरीदने वालों को अपने मुताबिक कस्टमाइजेशन की सुविधा भी मिलेगी.
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धरती पर स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर में हर इंसान एक बार जाना चाहता है. बौलीवुड में हर फिल्मकार व कलाकार कम से कम एक बार अपनी फिल्म की शूटिंग कश्मीर में जाकर करना चाहता है. तो भला ‘पिंक’ और ‘नाम शबाना’ फेम अभिनेत्री तापसी पन्नू की यह हसरत क्यों न हो.
वह भी कश्मीर में अपनी फिल्म की शूटिंग के लिए जाना चाहती थीं. पर अब तक उन्हें यह मौका नहीं मिला. पर अब तापसी पन्नू अपनी नई फिल्म‘‘मनमर्जियां’की शूटिंग के लिए कश्मीर जाने वाली हैं.
आनंद एल राय निर्मित और अनुराग कश्यप निर्देशित फिल्म‘‘मनमर्जियां’’ की शूटिंग वह अभी तक अमृतसर, पंजाब में विक्की कौशल व अभिषेक बच्चन के साथ कर रही थीं. पर अब इसी फिल्म के कुछ दृष्य फिल्माने के लिए वह पूरी युनिट के साथ कश्मीर जा रही हैं.
जानकारी के मुताबिक तापसी पन्नू फिल्म‘मनमर्जिया’में खेल उपकरण की दुकान मालकिन के किरदार में नजर आएंगी.
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पिछले 14 वर्षों से बौलीवुड में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष करते आए अभिनेता पंकज त्रिपाठी की अभिनय प्रतिभा पिछले दो वर्ष के अंतराल में ‘निल बटे सन्नाटा’, ‘अनारकली आफ आरा’, ‘न्यूटन’ और ‘फुकरे रिटर्न’ जैसी फिल्मों के माध्यम से जिस तरह से निखर कर आई है, उससे सिर्फ बौलीवुड ही नहीं टौलीवुड भी उन्हे हाथों हाथ लेने लगा है. अब तो फिल्म ‘न्यूटन’ में उनके जानदार अभिनय के लिए उन्हें ‘स्पेशल मेंशन’ का राष्ट्रीय पुरस्कार देने की भी घोषणा हो गयी है.
राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने की खबर सुनते ही पंकज त्रिपाठी ने कहा – ‘‘मैं बहुत खुश हूं. मुझे तो पता भी नहीं था कि राष्ट्रीय पुरस्कार की दौड़ में मेरा नाम भी चल रहा है. मुझे खुशी के साथ इस बात को जानकर आश्चर्य भी हो रहा है कि फिल्म ‘न्यूटन’ में मेरे अभिनय को पूरे देश ने सराहा. और फिल्म‘न्यूटन’का मेरा किरदार ऐसा रहा, जिसने मुझे ‘स्पेशल मेंशन’ का राष्ट्रीय पुरस्कार दिला दिया. भारत का यह सबसे बड़ा व अति सम्मानित पुरस्कार है. मेरे निर्देशक व सह अभिनेता ने मुझे मेरे अभिनय को निखारने तथा ‘न्यूटन’ के किरदार को सहजता से निभाने में काफी मदद की.’’
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मनुष्य को हमेशा पशुओं की ताकत से ईर्ष्या रही है. उस की इच्छा हमेशा ही पौराणिक युग के पशुओं जैसे गुण रखने वाले मानवों की तरह संपूर्णता पाने की रही है. हर सभ्यता में परियों, दैत्यों, उड़ने वाले देवताओं की कल्पनाओं की भरमार रही है. चाहे वे ग्रीक हों, रोमन हों, भिक्षु हों या भारत के.
मिथक और लोककथाएं मानवपशु मिश्रित प्राणियों से भरी रही हैं. इन में से बहुत से पात्रों को देवत्व का दर्जा दे दिया गया है चाहे ईश्वर या फिर शैतान के रूप में. ईसाई कल्पना के अनुसार शैतान को मानव शरीर, बकरी के सींगों वाले, भेड़ की खाल और नाककान वाले तथा जंगली सूअर के दांतों वाले पात्र के रूप में प्रस्तुत किया गया है.
यह कैसा अंधविश्वास
मानवपशु मिश्रित पात्र हजारों साल पुरानी गुफाओं में बने चित्रों में दिखते हैं. इन में पुजारियों को पशुओं की तरह की ताकत पाते दर्शाया गया है. भारत में मानवपशु मिश्रित पात्र का सब से लोकप्रिय उदाहरण गणेश का है. भारतीय मिथकों में इन मिश्रित पात्रों को ही पूजनीय नहीं बनाया जाता है, यहां कुर्मा-कछुए, मत्स्य-मछली, गरुड़-बाज, जामवंत-भालू, कामधेनु-गाय, नाग-सर्प को पूजा जाता रहा है.
पेन ग्रीकमिथक में एक देवता है, जिस का ऊपर का बदन मानव का है पर निचला हिस्सा सींग, टांगें बकरी की हैं. वह जंगलों, खेतों, भेड़ों के झुंडों, प्रकृति और संगीत का देवता है. वह अपनी आवाज से डराता है. अंगरेजी का शब्द पैनिक उसी से बना है. जब विशाल दैत्यों टाइटनों ने ग्रीक देवताओं पर हमला किया तो पेन ने ही अपनी आवाज निकाल कर उन्हें डरा कर भगाया.
अजबगजब लोक कथाएं
मरमेड यानी जलपरी, आधा मानव, आधी मछली लगभग हर सभ्यता के मिथकों का हिस्सा है. जेंगू अफ्रीकी देश कैमरून की एक मान्यता के अनुसार एक पानी की देवी है. उस की पूजा करने वालों को वह सुख व समृद्घि देती है. सिरेना और सिरेनी जलपरी और जलचर हैं. फिलीपींस की लोककथाओं के अनुसार ये पानी की रक्षा करते हैं. सिरेना की मधुर आवाज से नाविकों पर मदहोशी छा जाती है और उन की नावें टकरा कर डूब जाती हैं.
डैगोन एक जलचर है जिसे मैसोपोटामिया में पूजा जाता था. जापान में समुद्री चुड़ैलों की कहानियां प्रचलित हैं
प्रथाएं जो खत्म होने को हैं
हार्पी ग्रीको- रोमन भिक्षकों के अनुसार एक ऐसा प्राणी है जिस का निचला शरीर पंख और पंजे पक्षी की तरह के हैं और छाती और सिर औरत का. हार्पी गुस्सैल व लड़ाकू होते हैं और गंदगी में रहते हैं. उन्हें उन लोगों को लाने के लिए भेजा जाता है जो मरने को तैयार नहीं होते. वे दूसरे देवताओं के छोटेमोटे काम भी करते हैं. लिलिटस ग्रीक मान्यताओं के अनुसार पक्षी के पैर वाले, पंखों सहित दैत्य हैं जो लोगों को पाप करने की प्रेरणा देते हैं ताकि समाज को नष्ट करा जा सके.
हर समाज और सभ्यता में इस तरह के मिश्रित मानवपशु देवीदेवता या प्राणी हैं, लेकिन नई सभ्यता में पशुओं के आम जनजीवन से जोड़ने की प्रथा समाप्त होने लगी है. इराक के यजीदी मोर जैसे प्रिय प्राणी मेलक तव्वुस को पूजते हैं. इसी कारण शियाओं और सुन्नियों दोनों के लिए शैतान को पूजने वाले अपराधी घोषित कर दिए गए हैं. पशुप्रेम अब मिथकों में बंध कर रह गया है.
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रमा के पिता रिटायर्ड सरकारी कर्मचारी हैं. तीसरी श्रेणी के कर्मचारी रमा के पिता ने रिटायरमैंट का पैसा बेटी की शादी के लिए बचा कर रखा था. शादी तय होने के बाद रमा के पिता ने सोचा कि अपने गांव से शादी समारोह संपन्न हो जाए तो खर्चा कम होगा. मगर लड़के वालों की तरफ से शर्त रख दी गई कि वे गांव में शादी करने नहीं जाएंगे. ऐसे में काफी तलाश के बाद हाइवे पर एक रिसौर्ट शादी के लिए बुक किया गया तो पता चला कि कम से कम 10 लाख का खर्च होगा. रमा के पिता के पास इतना पैसा नहीं था. लड़के वालों की बात को मानने के अलावा उन के पास कोई विकल्प भी नहीं था. ऐसे में वे पैसों के इंतजाम में लग गए.
शादी के खर्च में हाल के कुछ महीनों में 30 से 40% की बढ़ोत्तरी हो गई है, जिस का असर रमा के पिता जैसे कितने ही पेरैंट्स पर पड़ रहा है.
टैक्स पर टैक्स
इस में जीएसटी का बड़ा रोल है. पहले रिसौर्ट, क्लब और होटल में 12% टैक्स पड़ता था. जीएसटी के बाद यह टैक्स बढ़ कर 18 से 28% हो गया है. रिसौर्ट, क्लब और होटल में शादी करने वाले लोग पहले की तरह शादी का इंतजाम खुद नहीं करते हैं. वे सजावट से ले कर शादी तक का पूरा काम अलगअलग कंपनियों पर डाल देते हैं. अब ये कंपनियां अलग अलग इंतजाम पर अलग टैक्स लेने लगी हैं. शादी के इन इंतजामों में मैरिज हाल, गेस्ट हाउस और क्लब के हिसाब से अलग अलग टैक्स देना पड़ता है. इस के अलावा डैकोरेशन, कैटरिंग, मेकअप, डीजे आदि के लिए भी अलगअलग टैक्स हैं. पहले फ्रूट चाट, आइसक्रीम पार्लर और चाट वाले लोग अपने खाने पर टैक्स नहीं लेते थे. अब ये लोग भी जीएसटी लेने लगे हैं.
हर बिल में जीएसटी
कमाल की बात यह है कि ये लोग सरकार को भले ही जीएसटी न देते हों पर खुद जीएसटी के नाम पर टैक्स लेने लगे हैं. इस के साथ ही जीएसटी के बाद अपने प्रोडक्ट्स की कीमतें भी बढ़ा चुके हैं.
बेटी की शादी करने वाले दिनेश कुमार कहते हैं कि सरकार कहती थी कि जीएसटी लागू होने के बाद जनता को लाभ मिलेगा. शादी का इंतजाम करते समय मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिस ने यह कहा हो कि यह सामान पहले से सस्ता हो गया है. छोटेछोटे काम करने वाले भी जीएसटी के नाम पर टैक्स लेने लगे हैं, जिस से शादी के खर्च में बहुत बढ़ोत्तरी हो गई है.
पिछले साल अपनी बेटी की शादी करने वाले प्रेम कुमार का कहना है कि सरकार ने शादी के सीजन के समय ही नोटबंटी की थी, जिस से शादी के लिए बैंक से पैसे निकालने में लोगों को बहुत परेशानियों का सामना करना पड़ा था. जिलाधिकारी से ले कर बैंक मैनेजर तक के सामने जी हुजूरी करनी पड़ी थी.
इस साल शादी के सीजन से पहले ही जीएसटी लागू हो गया. शादी में अलगअलग तरह का बिजनैस करने वाले लोग खुद भले ही जीएसटी को ठीक से समझ न पाए हों पर वे शादी करने वालों से जीएसटी वसूलने में पीछे नहीं हैं. जीएसटी की आड़ ले कर वस्तुओं की कीमत बढ़ा दी गई है.
लड़की वालों की बढ़ी परेशानी
वैसे तो शादी हमेशा दो परिवारों का मिलन होता है, मगर हमारे समाज में शादी का बोझ हमेशा लड़की वालों पर ही पड़ता है. आज भी शादी में दहेज बंद नहीं हुआ है. इस के साथ शादी के इंतजाम में दिखावा बढ़ गया है. गांव में रहने वाले ज्यादातर लोग शहरों में रहने लगे हैं. वे अब गांव में शादी नहीं करना चाहते. ऐसे में उन को होटल, रिसौर्ट का सहारा लेना पड़ता है. वहां खुद ही सारा इंतजाम करना पड़ता है और लड़की के पिता पर ही सारा बोझ डाल दिया जाता है.
निशा के पिता दिवाकर बताते हैं कि लड़की पसंद आने के बाद सब से पहले लड़के वाले यह पूछते हैं कि शादी कैसे होगी? खाने का क्या इंतजाम होगा? बरात कहां रुकेगी? दहेज के साथसाथ यह सब भी लड़की वाले को करना पड़ता है. महंगाई बढ़ने से ये खर्चे और बढ़ गए हैं.
पहले दहेज की मार और अब शादी आयोजन में टैक्स का बोझ लड़की के परिवार को खर्च से दबा रहा है. इस ओर किसी ने सोचने की जरूरत नहीं समझी. आज गांवगांव तक शादी से जुड़े कारोबार करने वाले फैल गए हैं, जिस वजह से लड़की की शादी में आज भी घर, जमीन गिरवी रखने या बेचने की नौबत आ रही है.
समाज में हर किसी को इस का पता है. सभी इस से परेशान हैं इस के बाद भी कोई इस के खिलाफ खड़ा नहीं होना चाहता. महंगी शादियों के बोझ तले दब रहे लड़की के मातापिता की परवाह किसी सरकार को नहीं.
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कल अचानक पड़ोसिन मालती कुछ रुपए उधार मांगने आ गई. उस का उदास चेहरा बता रहा था कि दाल में कुछ काला है. मेरे पूछने पर डबडबाई आंखों से उस ने अपने पति की एक बाबा पर अंधभक्ति के विषय में बताया. आए दिन वह बाबा मालती के पति को आने वाले बुरे समय से डराता और पूजापाठ के नाम पर खूब रुपए ऐंठता. मालती और उस के घर वाले लाख मना करते, पर उस के पति के कानों पर जूं तक न रेंगती. नौबत यहां तक आ पहुंची कि मालती को बेटी के स्कूल में फीस जमा करवाने के लिए पैसे उधार लेने पड़े. अच्छेभले घर को इस दशा में पहुंचा कर मालती का पति न जाने कौन से आनंद भरे दिनों की कल्पना कर, उस बाबा पर सब निछावर कर रहा था.
मालती के पति अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं. अंधविश्वास का शिकार हो कर रुपए बरबाद करने वालों की संख्या लाखों में है.
अंधविश्वास का दलदल
प्रश्न है कि अंधविश्वास क्या है और मानव का अंधविश्वास से इतना गहरा रिश्ता कैसे जुड़ गया? यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो कुछ ऐसे विश्वास जिन्हें तर्क की कसौटी पर कसे बिना ही मान लिया जाए अंधविश्वास है. कुछ लोग अज्ञानतावश तो कुछ रूढि़वादिता के कारण अंधविश्वास का शिकार होते हैं. अंधविश्वास को धर्म से जोड़ कर धर्म के ठेकेदार व्यक्ति की इस कमजोरी का भरपूर लाभ उठाते हैं.
ग्रहनक्षत्रों का ढकोसला
विज्ञान के वर्तमान युग में जब वैज्ञानिक नएनए ग्रहों की खोज कर उन के अध्ययन में लगे हैं, कुछ लोग अब भी इन ग्रहों को अपने जीवन के सुखदुख का आधार मान रहे हैं. बच्चे के जन्म लेते ही जन्मपत्री बनवा कर उसे ग्रहनक्षत्रों से जोड़ दिया जाता है. वह जीवन में कितना पढ़ेगा, जन्म के समय की ग्रहचालों के अनुसार वह कौन सा व्यवसाय करेगा, उस का विवाह कब होगा आदि की भविष्यवाणी ग्रहनक्षत्रों के अनुसार कर दी जाती है.
ग्रह खराब या अशांत हों तो पूजापाठ, हवन, दान आदि का सहारा ले कर उन्हें शांत व अनुकूल करने की सलाह पंडितों व ज्योतिषियों द्वारा दी जाती है. आम व्यक्ति यह क्यों नहीं समझ पाता कि यह इन लोगों द्वारा फैलाया जाल है, जिस में फंसा कर वे अपने ऐशाआराम का जुगाड़ करने में लगे हैं. न जाने कब तक आम आदमी की खूनपसीने की कमाई इन लोगों की भेंट चढ़ती रहेगी? कब तक इस प्रकार के अंधविश्वास लोगों को भटकाते रहेंगे?
धार्मिक लुटेरों की जालसाजी
ईश्वर को प्रसन्न रखने, भूतप्रेत, चुड़ैल तथा देवीदेवताओं के कुपित होने का डर दिखा कर आम लोगों को मूर्ख बनाने का कार्य सदियों से होता आ रहा है. मनुष्य की भाग्य पर सब कुछ डाल देने की मनोवैज्ञानिक सोच ने इस प्रकार के धार्मिक लुटेरों को और बढ़ावा दिया है. जालसाजी का यह कार्य मनोवैज्ञानिक सोच से प्रेरित हो कर किया जाता है. पीडि़त व्यक्ति को यह विश्वास हो जाता है कि अमुक बाबा या गुरु अवश्य ही किसी दिव्यशक्ति के स्वामी हैं. अत: उन के निर्देशों का पालन करने से सचमुच ही कष्टों से मुक्ति मिल जाएगी. मगर वास्तविकता के धरातल पर लोगों की जेब ही हलकी होती है, कष्ट नहीं.
दिल्ली निवासी रमेश कुमार ने बताया कि वे एक बार अपनी मां के साथ किसी बाबा के पास गए थे, क्योंकि उन का पत्नी से झगड़ा चल रहा था. बाबा से मिलने के लिए उन्हें बाहर काउंटर पर मोटी रकम जमा करवानी पड़ी. भीतर पहुंचे तो एक एअरकंडीशनर कमरे में पैंटशर्ट पहने बड़ी सी कुरसी पर बैठे बाबा सब की समस्याएं सुन कर ऊलजलूल हल बता रहे थे. किसी को वे समोसे खाने, किसी को मंदिर में शराब चढ़ाने तो किसी को नीले पैन का प्रयोग करने की सलाह दे रहे थे. रमेश को उन्होंने कहा कि खीर खाने से उस पर कृपा बरसने लगेगी और सभी समस्याएं शीघ्र दूर हो जाएंगी.
घर आ कर जब रमेश ने खीर खाई तो उस की तबीयत बिगड़ गई, क्योंकि वह डायबिटीज से पीडि़त था. फिर क्या था. अस्पताल में खूब खर्चा हुआ और बाबा को दिए हजारों रुपए भी यों ही बरबाद हुए. उस की पत्नी संबंधी समस्या जस की तस रही.
ठगी के रूप
धर्म के नाम पर ठगी करने वाले अपनी मोटी कमाई के लिए जाल में फंसे शिकार की जेब खाली कराने के नएनए तरीके खोज निकालते हैं. हस्तरेखा व जन्मकुंडली देख कर भविष्य बताना और फिर मुंहमांगी फीस वसूल करना तो आम बात है.
ग्रहों की दशा से बचने के लिए पहले महंगेमहंगे नगों से जड़ी सोनेचांदी की अंगूठी भी लोग पहने अकसर दिख जाते हैं. कभीकभी तो ये तथाकथित भविष्यवक्ता ही सस्ते से पत्थरों से बनी अंगूठियों को चमत्कारी बता कर खूब रुपए ऐंठ लेते हैं. तंत्रमंत्र का झूठा प्रयोग कर गंडेताबीज बना कर बेचने का काम भी न जाने कब से चल रहा है. किसी भी कार्य की पूर्ति के लिए पूजापाठ, हवन और अभिषेक आदि करवाने के नाम पर धन लुटाने का काम तो अच्छेअच्छे पढ़ेलिखे लोगों से ले कर सैलिब्रिटी तक करते हैं.
शादीविवाह न होना, नौकरी न मिल पाना और धंधे में घाटा होने पर लोग स्वयं में सुधार करने की आवश्यकता ही नहीं समझते. इस के लिए भाग्य को दोषी मान कर वे धर्म के नाम पर ठगी करने वालों के चंगुल में बड़ी आसानी से फंस जाते हैं और उन के द्वारा बताए उपाय करने के चक्कर में जेबें खाली कर बैठते हैं.
चीनी फेंगशुई है ढकोसला
जीवनस्तर सुधारने का झांसा दे कर आजकल कुछ अन्य भ्रामक जाल भी फैलाए जा रहे हैं. चीनी वास्तु यानी फेंगशुई भी इसी श्रेणी में आता है. इन दिनों इसे अपनाने का चलन बहुत बढ़ रहा है. धनदौलत, अच्छा स्वास्थ्य, सफलता व सुखशांति की लालसा में विभिन्न रंगों की मछलियां, मेढक, ड्रैगन, कछुए और हंसते हुए बुद्ध की मूर्तियों, सिक्कों व क्रिस्टल बौल्स पर लोग नाहक ही पैसा बरबाद कर रहे हैं.
चारों ओर ठग
धर्म के नाम पर ठगने वाले जगहजगह अपने दफ्तर खोले बैठे हैं. सड़क के किनारे, फुटपाथ पर, बसस्टैंड और यहां तक कि खरीदारी के आधुनिक स्थान मौल में भी इन पाखंडियों ने अपना व्यापार फैलाना शुरू कर दिया है. कुछ धार्मिक पुस्तकें लिए, माथे पर टीका लगा बड़ी आसानी से लोगों को आकर्षित कर लेते हैं. वहां आने वाले लोग थोड़ाबहुत पैसा खर्च कर अपने आने वाले दिनों के बारे में जानने को उत्सुक होते हैं. उन की यही उत्सुकता अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाली सिद्ध होती है. कपटी भविष्यवक्ताओं के पौ बारह होते हैं.
विभिन्न प्रकार की बीमारियों को ठीक करने, विवाह या प्रेम संबंधी समस्या का निवारण करने, व्यापार व नौकरी संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए संपर्क करने हेतु जालसाजों के मोबाइल नंबर ट्रेन, बसों और मैट्रो स्टेशनों पर भी लगे दिखाई देते हैं. यदि कोई इन से संपर्क करता है तो कुछ देर बातचीत करने के बाद ही ये अपना असली चेहरा दिखाने लगते हैं. जब व्यक्ति इन के जाल में फंस जाता है तो ये मोटी रकम वसूलते हैं.
धार्मिक ठगी का बदलता स्वरूप
अंधविश्वास के नाम पर पैसों की ठगी का यह खेल अब टीवी चैनलों व वैबसाइट्स तक भी पहुंच चुका है. मीडिया ऐसे कुकृत्यों का विरोध करने की जगह इन्हें पोषित कर रहा है. भविष्य में आने वाले अच्छे दिनों का भ्रम दिखा कर विभिन्न देवीदेवताओं की मूर्तियां, धातु पर खुदे यंत्रमंत्र, अंगूठियां, ताबीज व महंगे पत्थरों के विक्रय का चलन खूब बढ़ गया है. रुद्राक्ष, स्फटिक पत्थर व तुलसी आदि की माला धारण कर विभिन्न बीमारियों से बचने का झांसा देना आम बात हो गई है. टीवी चैनलों व वैबसाइट्स पर ऐसे विज्ञापनों की बाढ़ सी आई हुई है. फेंगशुई का सामान भी शौपिंग साइट्स पर खूब बिक रहा है.
तथाकथित भविष्यवक्ता भी अब औनलाइन उपलब्ध होने लगे हैं. वैबसाइट्स पर ये मदद करने के बहाने लोगों की समस्या पूछते हैं और परिवार, रुपएपैसे आदि की जानकारी ले कर औनलाइन ही ठगी का धंधा करते हैं. व्यक्ति इन की लच्छेदार बातों में ऐसा फंसता है कि अपनी समस्या के समाधान की प्रतीक्षा में इन के निर्देशानुसार रुपएपैसे इन्हें भेंट चढ़ा देता है.
अंधविश्वास के विरुद्ध कानून
मनुष्य के मन में संस्कार बचपन से ही गहरी पैठ बनाए रहते हैं. कुछ संस्कार नैतिकता की राह दिखाते हैं तो कुछ केवल अंधविश्वास को बढ़ाने का काम करते हैं. इस के विरुद्ध अब यकीनन जनजागरण की आवश्यकता है. विभिन्न जागृति कार्यक्रमों व मीडिया का सहारा ले कर अंधविश्वास को दूर करने का प्रयास किया जा सकता है. समाचारपत्रों व पत्रिकाओं में धार्मिक आडंबरों का विरोध करने वाले समाचारों व लेखों को प्रधानता मिलनी चाहिए. टीवी के कार्यक्रमों विशेषतया रोज प्रसारित होने वाले सीरियलों में पाखंडता को बढ़ावा न दिया जाए. स्कूलों व कालेजों में इन पर लेख पाठ्यक्रम का भाग हों. अशिक्षितों में एनजीओ की मदद से जनचेतना जागृत की जाए.
अंधविश्वास सदैव शोषण को बढ़ावा देता है. अत: इस के विरुद्ध कानून बनाया जाना चाहिए. यदि ऐसा होगा तो समाज व उस की किसी भी संस्था को पाखंड का साथ देने व अंधविश्वास का प्रचारप्रसार करने पर कानून का भय होगा.
अपने जीवन में सदैव अंधश्रद्धा के विरुद्ध संघर्ष करने वाले डा. नरेंद्र दाभोलकर का मानना था कि मनुष्य को तर्कसंगत व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि असंगत विचारों पर आधारित व्यवहार के कारण वह कभी विजयी नहीं हो सकता.
वास्तव में ढोंग और पाखंड के अभिशाप में बचने का सब से कारगर उपाय है व्यक्ति की तर्क पर आधारित सोच. यदि व्यक्ति की सोच तार्किक हो जाएगी तो अंधविश्वास के लिए कोई स्थान नहीं होगा.
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6 लाख रुपए के नकली बिल से एनीमल हसबैंड्री डिपार्टमैंट से पैसे निकलवाने पर यदि जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो ने करनी हो तो 6,000 करोड़ रुपए की हेराफेरी कौन करेगा, यह सवाल आप न ही पूछें. हमारे यहां छोटेछोटे मामले इस तरह सीबीआई को सौंपे जा रहे हैं कि नीरव मोदी जैसे मामलों के लिए उस के पास समय ही नहीं या फिर सीबीआई आम पुलिस फोर्स की तरह भारीभरकम और अकुशल मशीनरी बन रही है.
यह 6 लाख रुपए का मामला कम रोचक नहीं है जो सुप्रीम कोर्ट तक 22 साल में पहुंचा. साल 1995 में मुजफ्फरपुर में एनीमल हसबैंड्री डिपार्टमैंट में 6 लाख रुपए के नकली बिलों के आधार पर पैसा निकाला गया. जांच के बाद तथ्य मिलने पर नरेश चौबे और दूसरे 2 लोगों को चार्जशीट दी गई और मामला सीबीआई को सौंप दिया गया. सीबीआई की जांच पर निचली अदालत ने उन तीनों को 3 साल की सजा सुनाई. मामला सुप्रीम कोर्ट में गया पर अपराधियों की सुनी नहीं गई.
जब मामला अपराधी सुप्रीम कोर्ट में ले गए तो उन में से नरेश चौबे 75 साल का हो चुका था. सुप्रीम कोर्ट ने सजा तो बरकरार रखी पर कैद में राहत दी कि 20 महीने ही जो उन्होंने कभी जेल में काटे थे काफी हैं.
जब एक छोटे अफसर का मामला पूरी तरह सुलझाने में 22 साल लग रहे हों तो नीरव मोदी जैसे 11,000 से 20,000 करोड़ रुपए के मामले को सुलझाने में कितने साल लगेंगे, इस का अंदाजा लगाया जा सकता है. मुजफ्फरपुर के मामले में तो अपराधी एक साधारण अफसर था और उस के साधन सीमित थे पर जब मामला नीरव मोदी का होगा तो शायद 8-10 सरकारें बदल जाएंगी पर फैसला नहीं आ पाएगा.
यह सोच लेना कि सीबीआई को मामला दे दिया गया है तो हल हो गया गलत है. न्याय व्यवस्था में देर इतनी है कि अंधेरा ही अंधेरा लगता है. लाखों कैदी जेलों में बिना अपराध साबित हुए बंद हैं क्योंकि वे जमानत के लिए वकील और पैसे का इंतजाम नहीं कर सकते और सैकड़ों को सजा तब मिलती है जब सजा देना बेमतलब का हो जाता है.
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आजकल बौलीवुड के 2 नए सितारों, प्रियंका चोपड़ा और दीपिका पादुकोण की चर्चा खूब सुनने को मिलती है. उन्होंने हौलीवुड में काम किया है, पर आप को यह जान कर शायद हैरानी होगी कि सब से पहले जिस भारतीय ने हौलीवुड फिल्मों में काम किया था उस का नाम साबू दस्तगीर है जिस ने 1937 में ‘द एलिफैंट बौय’ में काम किया था. इस के बाद 60 के दशक में शशि कपूर और पर्सिस खंबाटा ने अनेक अंगरेजी हौलीवुड की फिल्मों में काम किया था. आइए, एक नजर डालते हैं बौलीवुड सितारों के सफर पर :
साबू दस्तगीर
साबू की कहानी बहुत दिलचस्प है. महावत का 12 साल का बेटा साबू, पिता की मृत्यु के बाद एक ब्रिटिश टीम को जंगल में हाथी के साथ मिला. वह टीम एक फिल्म की शूटिंग कर रही थी. उन्हें एक महावत की तलाश थी. वह रोल साबू को मिला.
साबू को वे इंगलैंड ले गए, उसे पढ़ाया और तब आगे जा कर इंगलैंड और अमेरिका में अनेक फिल्मों में उस ने अभिनय किया. मात्र 39 साल की उम्र में साबू का देहांत भी हो गया था. उन के जितनी अंगरेजी फिल्में शायद किसी और भारतीय ने न की हों.
रुडयार्ड किपलिंग की जंगल बुक पर आधारित फिल्म ‘द एलिफैंट बौय’ से अपना सफर शुरू कर साबू ने कई फिल्मों में ऐक्टिंग की है, ‘ड्रम्स’, ‘थीफ औफ बगदाद’, ‘जंगल बुक’, ‘अरेबियन नाइट्स’, ‘वाइट सैवज’, ‘कोबरा वुमन’, ‘तैंजियर’, ‘ब्लैक नार्सिसस’, ‘द ऐंड औफ द रिवर’, ‘मैनईटर औफ कुमाऊं’, ‘सौंग औफ इंडिया’, ‘सैवेज ड्रम’, ‘हेल्लो एलिफैंट’, ‘जगुधार’, ‘जंगल हेल’ आदि.
अमिताभ बच्चन
सदी के महानायक बिग बी ने 2013 में आई फिल्म ‘द ग्रेट गैट्सबी’ में 11 औस्कर अवार्ड विनर फिल्म ‘टाइटैनिक’ के हीरो लियोनार्डो डी कैपरियो के साथ काम किया है.
शशि कपूर
शशि कपूर ने 12 अंगरेजी फिल्मों में काम किया है, ‘द हाउस होल्डर’, ‘शेक्सपीयरवाला’, ‘अ मैटर औफ इनोसैंस,’ ‘बौम्बे टौकी’, ‘हीट ऐंड डस्ट’, ‘द डिसीवर्स’, ‘साइड स्ट्रीट्स’, ‘द डर्टी ब्रिटिश बौयज’ आदि प्रमुख हैं. उन की ज्यादातर फिल्मों के निर्माता या सहनिर्माता इस्माइल मर्चेंट और निर्देशक जेम्स आइवरी रहे हैं. इस के अतिरिक्त एक अंगरेजी फिल्म में वे नैरेटर रहे हैं.
लीला नायडू
1963 की फिल्म ‘द हाउस होल्डर’ में वे शशि कपूर की नायिका रही थीं. हाल में प्रदर्शित अक्षय कुमार की ‘रुस्तम’ 1963 की उन की फिल्म ‘ये रास्ते हैं प्यार के’ की रीमेक है.
पर्सिस खंबाटा
1965 में मिस इंडिया और मिस यूनिवर्स में भारत का प्रतिनिधित्व करने वाली पर्सिस ने हौलीवुड की काफी फिल्मों और टीवी सीरियल्स में काम किया है. उन की कुछ प्रमुख फिल्में हैं, ‘डेडली इंटैंट’, ‘फीनिक्स द वौरियर’, ‘फर्स्ट स्ट्राइक’, ‘माय ब्यूटीफुल लौंडे्रट’, ‘वौरियर औफ द लौस्ट वर्ल्ड’, ‘मेगाफोर्स’, ‘नाइटवौक्स’, ‘स्टार ट्रेक’, ‘कंडक्टर अनबिकमिंग’, ‘द विल्बी कौन्सपिरेसी’, ‘कामसूत्र’ आदि.
वे पहली भारतीय थीं जिन्हें 1980 में मशहूर अकादमी अवार्ड प्रेजैंट करने का अवसर मिला था.
कबीर बेदी
बौलीवुड कलाकार कबीर बेदी ने जेम्स बांड मूवी ‘ओक्टोपसी’ में काम किया है. इस के अतिरिक्त ‘संदोकान’ टीवी सीरीज से उन्होंने यूरोप में काफी नाम कमाया है.
अमरीश पुरी
बौलीवुड के विलेन किंग माने जाने वाले अमरीश पुरी ने 8 औस्कर जीतने वाली फिल्म ‘गांधी’ के अलावा मशहूर फिल्म ‘इंडिआना जोंस द टैंपल औफ डूम’ में भी अभिनय किया है.
ओम पुरी
ओम पुरी की अंगरेजी फिल्में ‘द ज्वैल इन द क्राउन’, ‘वोल्फ’, ‘घोस्ट ऐंड डार्कनैस’, ‘ईस्ट इज ईस्ट’, ‘वेस्ट इज वेस्ट’, ‘द हंडे्रड फुट जर्नी’, ‘माय सन द फैनेटिक,’ ‘कोड 46’ आदि हैं.
नसीरुद्दीन शाह
अपने अभिनय का लोहा मनवाने वाले नसीरुद्दीन शाह ने मशहूर फिल्म ‘द लीग औफ एक्स्ट्रा और्डिनरी जैंटलमैन’, ‘मानसून वेडिंग’, ‘द ग्रेट न्यूज वंडरफुल’ में अभिनय किया है.
गुलशन ग्रोवर
‘द बैड मैन औफ बौलीवुड’ गुलशन ग्रोवर की अंगरेजी फिल्में हैं, ‘द सैकंड जंगल बुक’, ‘प्रिजनर्स औफ द सन’, ‘कैप कर्मा’, ‘नेफिलिम’, ‘माय बौलीवुड ब्राइड’ आदि.
अनुपम खेर
‘बेंड इट लाइक बेकहम’, ‘लस्ट कौशन’, ‘सिल्वर लाइनिंग्स प्लेबुक’, ‘प्रेजुडिस’, ‘ब्रेकअवे’ आदि हौलीवुड फिल्मों में अनुपम खेर ने काम किया है.
इरफान खान
8 औस्कर अवार्ड विनर ‘स्लम डौग मिलिनेयर’ के अतिरिक्त इरफान की अंगरेजी फिल्में हैं, ‘द नेमसेक’, ‘अमेजिंग स्पाइडरमैन’, ‘ए माइटी हार्ट’, ‘लाइफ औफ पाइ’ आदि.
तब्बू
तब्बू ने ‘लाइफ औफ पाइ’ और ‘द नेमसेक’ में अच्छा अभिनय किया है.
फ्रीडा पिंटो
‘स्लम डौग मिलिनेयर’ से सुर्खियों में आने के बाद पिंटो ने ‘यू विल मीट ए टौल डार्क स्ट्रैंजर’, ‘द इम्मोर्टल्स’, ‘राइज औफ प्लेनेट औफ एप्स’ में अभिनय किया है.
देव पटेल
‘स्लम डौग मिलिनेयर’ से हौलीवुड में प्रवेश करने वालों में देव पटेल भी हैं. इस के अलावा ‘द लास्ट एयर बेंडर’, ‘द बेस्ट एक्जोटिक होटल’, ‘अबाउट चेरी’, ‘द रोड विदिन’, ‘चैप्पी’, ‘द मैन हु न्यू इन्फिनिटी’, ‘लायन’ में भी देव ने अभिनय किया है.
अनिल कपूर
‘स्लम डौग मिलिनेयर’ के अलावा अनिल कपूर ने ‘द मिशन इंपौसिबल-घोस्ट प्रोटोकौल’ में काम किया है.
ऐश्वर्या राय बच्चन
विश्व सुंदरी व बौलीवुड अभिनेत्री की प्रमुख अंगरेजी फिल्में हैं, ‘पिंक पैंथर 2’, ‘ब्राइड ऐंड प्रेजुडिस’, ‘द प्रोवोक्ड’, ‘मिस्ट्रैस औफ स्पाइसेज’, ‘द लास्ट लीजन.’
मल्लिका शेरावत
मल्लिका ने ‘हिस्स’, ‘द मिथ’, ‘पौलिटिक्स औफ लव’ आदि हौलीवुड की फिल्में की हैं.
प्रियंका चोपड़ा
टीवी सीरियल ‘क्वांटिको’ से अमेरिका में पैर जमाने के बाद उन की फिल्म ‘द बेवाच’ हाल में प्रदर्शित हुई है. अमेरिकन टीवी में सब से ज्यादा पारिश्रमिक पाने वाली अभिनेत्रियों में वे शामिल हैं.
दीपिका पादुकोण
दीपिका ने हाल में प्रदर्शित फिल्म ‘××× रिटर्न औफ जैंडर केज’ में काम किया है.
भारतीय मूल के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त निर्देशक : शेखर कपूर
विभाजन से कुछ पहले लाहौर में जन्मे शेखर कपूर ने बौलीवुड और हौलीवुड दोनों में अच्छा नाम कमाया है. बौलीवुड में उन्होंने अनेक फिल्मों में अभिनय के अलावा फिल्म ‘मासूम’, ‘मिस्टर इंडिया’, ‘बैंडिट क्वीन’ का निर्देशन भी किया है और फिल्म ‘दिल से’ के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर भी हैं. दूसरी ओर हौलीवुड में उन्होंने कुछ बहुचर्चित और प्रशंसित फिल्मों का निर्देशन किया है. उन की फिल्म ‘एलिजाबेथ’ तो पूरे विश्व में मशहूर हुई थी. इस के अतिरिक्त ‘न्यूयौर्क आई लव यू’, ‘द फोर फैदर्स, एलिजाबेथ द गोल्डन एज’ आदि फिल्मों का निर्देशन किया है.
गुरिंदर चड्ढा
केन्या में जन्मी और इंगलैंड में पलीबढ़ीं गुरिंदर चड्ढा ने अनेक सफल अंगरेजी फिल्मों का निर्देशन किया है. उन की प्रमुख फिल्में हैं, ‘ब्राइड ऐंड प्रेजुडिस’, ‘बेंड इट लाइक बेकहम’, ‘पेरिस’, ‘व्हाट इज कुकिंग’, ‘वाइसराय हाउस’, ‘एंगस’, ‘इट्स अ वंडरफुल आफ्टर लाइफ’ आदि.
कुछ ऐसे भी उदाहरण मिलते हैं जब बौलीवुड के सितारों ने हौलीवुड के औफर ठुकरा दिए हों. दिलीप कुमार, अक्षय कुमार, रितिक रोशन और एक बार खुद प्रियंका चोपड़ा ने (व्यस्तता के चलते) हौलीवुड के औफर ठुकरा दिए थे.
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60 वर्षीय वर्माजी आजकल बड़े खुश नजर आने लगे हैं. इसी वर्ष सरकारी डाक्टर के पद से रिटायर होने के बाद उन्होंने अपना एक क्लीनिक खोल लिया है जिस में एक महिला डाक्टर के साथ बैठते हैं. मेरे पति के अच्छे मित्र हैं.
एक दिन जब वे घर आए तो मेरे पति ने मजाकिया अंदाज में पूछा, ‘‘क्या बात है गुरु आजकल तो बड़े खिलेखिले नजर आते हो, कैसी कट रही है रिटायर्ड जिंदगी?’’
‘‘अरे बहुत बढि़या कट रही है. अपना क्लीनिक खोल लिया है जिस में मैं और लेडी डाक्टर मिसेज गुप्ता साथसाथ बैठते हैं. क्या सुलझी हुई महिला है यार. मैं ने आज तक अपने जीवन में ऐसी महिला नहीं देखी, एकदम फिट और कुशल. अधिकांश मरीज तो उस की मीठी वाणी सुन कर ही ठीक हो जाते हैं.’’ वर्माजी अपनी डाक्टर मित्र की तारीफ के कसीदे पढ़े जा रहे थे और मैं व मेरे पति मंदमंद मुसकरा रहे थे, क्योंकि हमें पता था कि उन की पत्नी यानी मिसेज वर्मा को उन का क्लीनिक पर बैठना जरा भी पसंद नहीं था.
न तुम्हें फुरसत न हमें
इसी बात को ले कर दोनों में तनातनी होती रहती थी. बच्चे बाहर होने के कारण दोनों पतिपत्नी अकेले ही हैं. वर्माजी जहां स्वयं को क्लीनिक में व्यस्त कर के बाहर ही सुख और प्रेम तलाशते हैं वहीं उन की पत्नी की अपनी भजन मंडली हैं जिस में वे सदा व्यस्त रहती हैं.
दोनों की व्यस्तता का आलम यह है कि कई दिनों तक आपस में संवाद तक नहीं होता. एक बार जब उन की बेटियां विदेश से आईं तो मातापिता का परस्पर व्यवहार देख कर दंग रह गईं. दोनों ही अपनेअपने में मस्त. बेटियों को कुछ ठीक नहीं लगा सो मां से कहा, ‘‘मां यह ठीक नहीं, हम लोग इतनी दूर विदेश में रहते हैं. ऐसे में आप दोनों को एकदूसरे का खयाल रखना होगा. यदि आप कहें तो मैं पिता से बात करूं. आप दोनों ने तो अपनी अलगअलग दुनिया बसा रखी है, यहां तक कि आप लोगों की तो कई दिनों तक आपस में बात ही नहीं होती.’’
मिसेज वर्मा को भी काफी हद तक बेटियों की बात सही लगी. ‘‘नहीं, मैं ही देखती हूं क्या कर सकती हूं.’’ कह कर बेटियों को तो बहला दिया पर उन्हें स्वयं ही अहसास होने लगा कि शायद भक्ति में वे अपने पति को ही भूलने लगी हैं और इसलिए पति घर से बाहर प्यार तलाशने लगे हैं.
काफी सोचविचार के बाद वे एक दिन अपने पति से बोलीं, ‘‘आप का क्लीनिक खोलना ठीक ही रहा, कम से कम व्यस्त और फिट तो रहते हो. घर में रह कर तो आदमी अपनी उम्र से पहले ही बूढ़ा हो जाता है. आप की बगल वाली एक दुकान खाली है न, मैं भी एक बुटीक खोल लेती हूं. बोलो ठीक है न.’’
वर्माजी अपनी पत्नी को आश्चर्य से देखने लगे और फिर धीरे से बोले, ‘‘फिर भजन कौन करेगा.’’
‘‘दरअसल बेटियों ने मुझे समझाया कि मम्मी कब से बुटीक खोलना आप का सपना था, तो अब खोल लीजिए. बस मुझे क्लिक कर गया. आप भी पास में रहेंगे तो मुझे कोई टैंशन नहीं रहेगी और मैं सब संभाल भी पाउंगी.’’ मिसेज वर्मा ने सफाई देते हुए कहा.
कुछ ही दिनों बाद वर्माजी ने अपनी बगल की शौप में श्रीमतीजी का बुटीक खुलवा दिया. इस बहाने दोनों एकदूसरे को वक्त देने लगे तो शीघ्र ही खोई नजदीकियां वापस आने लगीं.
55 वर्षीय गुप्ताजी जबतब अपने स्कूटर पर औफिस की महिलाकर्मियों को बैठा कर घूमते नजर आते हैं. अकसर अपनी एक महिला मित्र के साथ कौफी शौप में भी नजर आते हैं. समाज में ऐसी बातें बड़ी तेजी से फैलती हैं सो मिसेज गुप्ता के कानों में भी पड़ी.
तभी एक दिन उन की पड़ोसन, जिस के पति गुप्ताजी के औफिस में ही काम करते थे, मिसेज गुप्ता से व्यंग्यपूर्वक बोली, ‘‘क्या बात है आजकल भाईसाहब औफिस की महिलाओं के बहुत काम करवाते हैं.’’
मिसेज गुप्ता अंदर से तो बहुत आहत हुईं पर फिर कुछ संयत हो कर बोलीं, ‘‘अब औफिस हैड हैं तो आफिस वालों का ध्यान तो रखना ही पड़ता है. आप चिंता न करें. उन की चिंता करने के लिए मैं हूं न.’’
पड़ोसन के जाने के बाद वे गहरी सोच में पड़ गईं कि आखिर उन के पति ऐसा क्यों कर रहे हैं? वे सोचने लगीं चीखनेचिल्लाने या कलह करने से तो बात बनने वाली नहीं है. प्यार ही वह रास्ता है जिस से गुप्ताजी को वापस लाया जा सकता है ताकि वे घर के हो कर रहें.
तलाश सच्चे साथी की
55 वर्षीया मिसेज सिन्हा लंबी कदकाठी और बला की खूबसूरती स्वयं में समेटे हैं. औफिस का प्रत्येक पुरुष उन से बात करने को लालायित रहता है. नए अधिकारी मिश्राजी की पत्नी की कुछ समय पूर्व मृत्यु हो चुकी थी. कुछ दिनों के बाद जब उन्होंने मिसेज सिन्हा को कौफी के लिए पूछा तो मिसेज सिन्हा का दिल भी बागबाग हो उठा. आखिर वे भी अपने शराबी पति की रोजरोज की चिकचिक से परेशान थीं सो दिल में सोया हुआ रोमांस मानो हिलोरें लेने लगा. मिश्राजी का औफर उन्होंने खुशीखुशी स्वीकार कर लिया.
बस यहीं से दोनों के प्यार की जो रेलगाड़ी निकली वह मिसेज सिन्हा के अपने पति से तलाक और फिर मिश्राजी से शादी पर जा कर ही रुकी. आखिर वे भी कब तक पति की रोज गालीगलौज और मारपीट को सहतीं. प्यार और सुकून से जीने का हक तो संसार में सभी को है.
34 साल की तनूजा एक स्कूल में शिक्षिका हैं. एक बच्ची को पढ़ाने उस के घर जाती हैं. कुछ दिनों तक बच्ची को पढ़ाने के बाद उन्होंने नोटिस किया कि वे जितनी देर तक बच्ची को पढ़ाती हैं, बच्ची के 60 वर्षीय दादाजी किसी न किसी बहाने से कमरे में आतेजाते हैं. एक दिन जब पोती अंदर किसी काम से गई तो उन्होंने तनूजा से कहा, ‘‘मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. प्लीज शाम को 4 बजे पास वाली कौफी शौप में आ जाना.’’
तनूजा पहले तो घबरा गई फिर कुछ संभल कर बोली, ‘‘क्यों अंकल?’’
‘‘घबराओ नहीं मैं बस मिलना चाहता हूं.’’
शाम को कौफी शौप में वे दोनों आमनेसामने थे. तनूजा को देखते ही बोले, ‘‘न जाने क्यों तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो. तुम बहुत काबिल हो और मेरी पोती को बेहद अच्छे ढंग से पढ़ाती हो. मेरी पत्नी तो मुझे दुत्कारती रहती है पर तुम्हें देखना और तुम से बात करना मुझे अच्छा लगता है.’’
अपनी तारीफ सुन कर तनूजा के गाल सुर्ख लाल हो उठे. उस के बाद से वे दोनों अकसर आपस में मिलने लगे. तनूजा को भी उन से मिल कर बड़ा ही सुकून मिलता और वह दोगुने उत्साह से अपना काम करने लगती परंतु कुछ ही समय में उसे एक पत्नी और एक मां होने का अहसास होने लगा.
जब अपने पति से उस ने दादाजी की समस्या शेयर की तो पहले तो पति चौंक गए पर फिर कुछ सोच कर बोले ‘‘हम दोनों मिल कर उन की समस्या का हल निकालेंगे.’’ इस के बाद तनूजा और उस के पति ने एक अनुभवी काउंसलर से दोनों की काउंसलिंग करवाई. आज दादाजी और दादीजी तो एकदूसरे का साथ पा कर खुश हैं ही, तनूजा और उन के परिवार के घनिष्ठ पारिवारिक संबंध भी हैं.
प्यार उम्र नहीं देखता
वास्तव में प्यार एक ऐसी भावना है जो न उम्र देखती है, न जाति और न धर्म. वह तो कहीं भी, कभी भी, और किसी से भी हो सकता है. जिस प्रकार किशोरावस्था या युवावस्था में व्यक्ति प्यार से वशीभूत हो कर सब भूल जाता है उसी प्रकार इस उम्र में भी प्यार का अहसास व्यक्ति को मानसिक और भावनात्मक सुकून देता है.
किशोरावस्था का प्यार महज एक आकर्षण होता है जब कि युवावस्था के प्यार में गहराई और स्थायित्व होता है. इस के विपरीत 60 साल के प्यार में प्यार के सभी भाव पाए जाते हैं क्योंकि इस उम्र का व्यक्ति रिश्तों के कई बंधनों में बंध चुका होता है और प्यार के कई रूप देख चुका होता है.
इस उम्र में बच्चे अपनीअपनी राह पकड़ चुके होते हैं. पतिपत्नी में यदि सामंजस्य का अभाव है तो वे बाहर किसी व्यक्ति से मिले प्यार और अपनेपन के कारण मानसिक सुकून और ऊर्जा से ओतप्रोत हो उठते हैं. सामाजिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो इस प्रकार का व्यवहार अशोभनीय और मर्यादाविहीन है पर इस से परे इंसान को जहां सुकून या शांति का आभास होगा उस ओर स्वत: उस के कदम उठ ही जाएंगे.
आखिर खुश हो कर जीने का अधिकार तो सभी को है. वास्तव में घर की जिम्मेदारियों, बच्चों और काम की अधिकता के कारण कई बार पतिपत्नी का वो पहले सा प्यार कहीं गुम सा हो जाता है.
जब 60 की उम्र में पति या पत्नी किसी और की तरफ आकर्षित होने लगे तो क्या करें, आइए जानते हैं:
– यदि पतिपत्नी में से किसी को भी अपने साथी के प्यार की इस अद्भुत राह पर होने का अहसास होता है, तो एक बारगी मन बेकाबू होने लगता है पर इस का हल भी आप को स्वयं ही निकालना होगा ताकि घर की बात घर में ही रहे.
– प्रेमी पति या पत्नी को वापस अपने करीब लाने के लिए कभी परिवार, पड़ोस या बच्चों का सहारा न लें. क्योंकि इस प्रकार की समस्या को जितनी अच्छी तरह आप खुद हैंडल कर सकते हैं उतनी अच्छी तरह कोई और नहीं.
– अपनी दिनचर्या का आकलन करें कि क्या आप अपने जीवनसाथी को पर्याप्त समय और अपनापन दे पा रहे हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि प्यार और अपनेपन के अभाव में उन्होंने बाहर की राह पकड़ ली हो.
– साथी की किसी से अंतरंगता का पता चलने पर अपने व्यवहार को शांत, मधुर और प्रेम से ओतप्रोत रखें ताकि आप समस्या का समाधान निकाल सकें.
– इस उम्र तक आतेआते आमतौर पर महिला और पुरुष दोनों जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं. शरीर पर चर्बी की मोटी परत, भद्दा व्यक्तित्व किसी को भी अपनी ओर आकर्षित नहीं करता. ऐसे में बाहरी आकर्षण व्यक्ति को अपनी ओर खींच लेता है. आवश्यकता है खुद को फिट, स्वस्थ, जिंदादिल और आकर्षक बनाए रखने की ताकि परस्पर आकर्षण और प्यार की भावना बनी रहे.
यदि आप अपने साथी को अपने प्रयासों से वापस लाने में सफल नहीं हो पा रहे हैं तो बजाय नातेरिश्तेदारों, पड़ोसी अथवा मित्रों से मदद लेने के आप प्रोफैशनल काउंसलर का सहारा लें जो आप की समस्या को भलीभांति समझ कर हल निकालेंगे.
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सवाल मैं 44 साल की महिला हूं. मुझे हर महीने पीरियड्स होने के कुछ दिन पहले स्तनों में भारीपन और दर्द महसूस होने लगता है. मुझे डर है कि कहीं यह ब्रैस्ट कैंसर का लक्षण तो नहीं? मेरी मौसी को भी यह रोग हुआ था और वे इस कारण कम उम्र में ही चल बसी थीं. मुझे क्या करना चाहिए?
जवाब
ब्रैस्ट कैंसर से मौसी के चल बसने के कारण आप के भीतर उस रोग का डर बैठना अस्वाभाविक नहीं है. लेकिन जिस प्रकार के मासिकचक्र के साथ उठने वाले चक्रनुमा दर्द की आप बात कर रही हैं वह फाइब्रोयडिनोसिस या फाइब्रोसिस्टिक ब्रैस्ट डिजीज का क्लासीकल लक्षण है. यह दर्द मासिकधर्म से 3-4 दिन पहले शुरू होता है और स्राव के शुरू होने पर थम जाता है. स्तनों के हिलनेडुलने पर यह दर्द बढ़ जाता है. यह शरीर में मासिकचक्र के साथ होने वाले यौन हारमोनों में आए परिवर्तनों से उत्प्रेरित होता है. इस का ब्रैस्ट कैंसर से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कोई संबंध नहीं होता.
इस दर्द से आराम पाने के लिए आप कुछ छोटेछोटे उपाय कर सकती हैं. सब से आसान यह है कि उन दिनों चौबीसों घंटे दिनरात ब्रेजियर पहन कर रखें ताकि स्तनों को पूरा आवलंबन मिलता रहे.
फिर भी दर्द महसूस हो तो कोई साधारण दर्दनिवारक दवा जैसे पैरासिटामोल या इबुप्रोफेन लें. इस से भी बात न बने तो एक बार किसी सर्जन से मिल लें. जरूरी होने पर विटामिन ई और कुछ हारमोनल दवाएं दे कर भी आराम दिलाया जा सकता है.
चूंकि आप की मौसी को ब्रैस्ट कैंसर हुआ था, इसलिए आप का भी उस के प्रति चौकस रहना अच्छा होगा. वाजिब होगा कि आप हर माह ब्रैस्ट सैल्फ ऐग्जामिनेशन का नियम बना लें. बिस्तर पर लेट कर और शीशे के सामने खड़े हो कर दोनों स्तनों में गांठ, त्वचीय परिवर्तन और ब्रैस्ट निपल परिवर्तन के लिए विधि अनुसार जांच लें. जरा भी शक हो तो तुरंत किसी सर्जन से जांच करवाएं. इसे टालें नहीं. आजकल समय से इलाज लेने से बहुत से मामलों में ब्रैस्ट कैंसर जड़ से खत्म किया जा सकता है.
अपना शारीरिक वजन सीमा में और आहार सदा संतुलित रखें. मोटापा, अधिक वसीय भोजन जैसे जंक फूड, तले व्यंजन, मांसाहार आदि ब्रैस्ट कैंसर के जोखिम को बढ़ावा देते हैं. आप के साथ एक रिस्क फैक्टर पहले से ही है कि आप की फैमिली में यह रोग रहा है. अत: इस रिस्क को और अधिक न बढ़ने देने में ही समझदारी है.
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